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फ़ैक्ट चेक: कंधार प्रकरण के लिए अजीत डोभाल को राहुल गाँधी द्वारा दोषी ठहराना दुर्भावनापूर्ण और तथ्यों से परे है

देश में चुनाव का मौसम शुरू हो चुका है और ऐसे में राजनीतिक गलियारे में उथल-पुथल होना आम बात है। विपक्ष का केंद्र के ख़िलाफ़ हमलावर रहना कोई नई बात नहीं है लेकिन जब उन बेबुनियादी मुद्दों को हवा दी जाती है, जिनका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं होता तो यह काम निंदनीय होता है। हाल के दिनों में राहुल गाँधी द्वारा ऐसे ही झूठ का दुष्प्रचार किया जा रहा है जिसका संबंध राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NSA) के अजीत डोभाल से है। बीते रविवार (मार्च 10, 2019) को राहुल गाँधी ने अजीत डोभाल को 1999 में आतंकवादी मसूद अज़हर को रिहा करने वाली वार्ता टीम का हिस्सा बनाने की भरसक कोशिश की। अपनी इस कोशिश में वो मसूद अज़हर की रिहाई के लिए अजीत डोभाल को दोषी करार देने पर तुले नज़र आए।

अपने ट्विटर पोस्ट में, राहुल गाँधी ने कुख्यात आतंकवादियों द्वारा IC-814 के अपहरण का ज़िक्र किया। राहुल ने अपने ट्वीट में प्रधानमंत्री मोदी से सवालिया होते हुए लिखा कि वो 40 CRPF शहीदों के परिवारों को बताएँ, जिन्होंने उनके हत्यारे मसूद अज़हर को रिहा कर दिया। इसके अलावा राहुल ने अपने ट्वीट में अजीत डोभाल पर भी निशाना साधा। हालाँकि, राहुल गाँधी के अधिकतर दावे आधे-अधूरे ही नज़र आते हैं।

बता दें कि IC-814 जब अमृतसर से दक्षिणी अफ़गानिस्तान में कंधार ले जाया गया था तब आतंकवादी मुल्ला मोहम्मद उमर के नेतृत्व में अपहर्ताओं ने खूंखार आतंकवादी मौलाना मसूद अज़हर सहित भारतीय जेलों से 35 आतंकवादियों को रिहाई के अलावा 200 मिलियन डॉलर नकद की माँग की थी।

इसके बाद भारत सरकार ने राजनयिक विवेक काटजू, अजीत डोभाल के नेतृत्व में वार्ताकारों की एक टीम भेजी। इस टीम में उस समय के एक उच्च श्रेणी के इंटेलिजेंस ब्यूरो अधिकारी नेचल संधू और सीडी सहाय समेत ब्यूरो ऑफ़ सिविल एविएशन सिक्योरिटी के कुछ अन्य प्रतिनिधि भी शामिल थे। 31 दिसंबर 1999 को, इस मसले को हल कर लिया गया। बता दें कि इस मसले को हल करने के लिए भारत सरकार आतंकवादी संगठन, जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अज़हर सहित तीन शीर्ष आतंकवादियों को रिहा करने पर सहमत हो गई थी। इन सभी गतिविधियों में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि कई वार्ताओं के दौरान, अजीत डोभाल ने आतंकवादियों की रिहाई संख्या को 35 से घटाकर सिर्फ़ तीन किया था और इसके लिए उन्होंने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, अजीत डोभाल ने आतंकवादी मसूद अज़हर की रिहाई का विरोध किया था, क्योंकि वे जानते थे कि इस तरह के खूंखार आतंकवादी को रिहा करने के नतीजे भविष्य में बुरे परिणाम होंगे। हालाँकि, तब अजीत डोभाल एक सरकारी अधिकारी थे और उन्हें सरकार के फ़ैसलों के अनुसार चलना पड़ा। कथित तौर पर, अजीत डोभाल ने बंधकों को छुड़ाने के लिए अज़हर की रिहाई के बिना सौदे पर बातचीत करने के लिए सरकार से और समय भी माँगा था।

यह बात चौंकाने वाली है कि भविष्य में देश का नेतृत्व करने की इच्छा रखने वाले राहुल गाँधी को ऐसी राष्ट्रीय आपात स्थितियों के दौरान आतंकी समूहों के साथ होने वाली जटिल वार्ताओं के बारे में पूरी और सही जानकारी अब तक नहीं है। राहुल गाँधी ने जानबूझकर इस तथ्य की अवहेलना की कि इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा बुलाई गई बैठक में तत्कालीन कॉन्ग्रेस प्रमुख सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह भी उपस्थित थे। बावजूद इसके राहुल गाँधी ने न सिर्फ़ सच को छिपाया बल्कि देश की जनता को भ्रमित करने का अपराध भी किया।

कंधार घटना को कवर करने वाले कुछ पत्रकारों ने इस बात का भी ख़ुलासा किया था कि 1999 में वाजपेयी सरकार को तीन आतंकवादियों को रिहा करना पड़ा था क्योंकि उस समय मीडिया और कार्यकर्ताओं ने IC-814 अपहरण की भड़काऊ कवरेज की थी और जल्द निर्णय लेने के लिए सरकार पर बहुत अधिक दबाव बनाने का काम किया था।

यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है जब बड़े स्तर पर होने वाली राजनीतिक बातचीत और चर्चा को ग़लत रूप से प्रचारित कर हमारे ‘राष्ट्रीय नायकों’ की सम्मानित छवि को धूमिल करने का भरसक प्रयास किया जाता है। राहुल गाँधी, जिनका एकमात्र ध्येय केवल केंद्र सरकार को बेवजह घेरना भर रहता है, उन्हें अजीत डोभाल को दोषी ठहराए जाने वाले इस निंदनीय कृत्य के लिए शर्मिंदा होना चाहिए।

जावेद साहब! प्रेमगीत लिखिए, वीर रस आपको शोभा नहीं देता

जावेद अख्तर अल्फ़ाज़ों के अच्छे जादूगर हैं। हाल ही में उन्होंने एक बार फिर जादू दिखाया है। इस बार उन्होंने भारतीय सेना के कंधे पर कमान रखकर मोदी के तीर से संघ को निशाना बनाया है। अख्तर का कहना है कि नरेंद्र मोदी को भारतीय सेना में गुजराती रेजिमेंट बनानी चाहिए ताकि उसमें स्वयंसेवक भर्ती हो सकें।

जावेद अख्तर अपने इस कथन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘स्वयंसेवकों’ को निशाना बना रहे थे। लेकिन शायद उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं है कि भारतीय सेना में रेजिमेंट सिस्टम अंग्रेज़ों का बनाया हुआ है। अंग्रेज़ों ने कुछ क्षेत्रों और जातियों के लोगों को ‘मार्शल कास्ट’ घोषित किया था। ब्रिटिश अधिकारी नस्लभेदी विचारधारा से ग्रसित होते थे इसीलिए कुछ क्षेत्र विशेष या जाति के लोगों के प्रति उनकी यह धारणा थी कि उस जाति के लोगों का जन्म युद्ध लड़ने के लिए ही हुआ है।

क्षेत्र और जाति विशेष के आधार पर ही अंग्रेज़ों ने सेना की इन्फैंट्री में रेजिमेंट बनाई थी। आज की भारतीय सेना एक मॉडर्न फ़ोर्स है और वह उस पुरातन औपनिवेशिक अवधारणा में विश्वास नहीं करती। हालाँकि रेजीमेंट सिस्टम आज भी हैं और प्रत्येक रेजिमेंट का अपना गौरवशाली इतिहास है। लेकिन यह भी सत्य है कि सेना में देश के प्रत्येक क्षेत्र की अपनी एक रेजिमेंट नहीं है। और यदि किसी क्षेत्र या जाति के नाम पर रेजिमेंट नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस क्षेत्र अथवा जाति, समुदाय, पंथ के लोग हीन हैं। वास्तव में स्वतंत्रता के बाद भारतीय सेना ने यह निर्णय लिया था कि रेजिमेंट का नाम किसी क्षेत्र या समुदाय के नाम पर नहीं रखा जाएगा।

यदि भारतीय सेना में गुजरात रेजिमेंट नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि गुजराती लोगों का देश की प्रगति में कोई योगदान नहीं है। वस्तुतः देश की आर्थिक प्रगति में गुजरातियों का सबसे बड़ा हाथ है। सेना जहाँ देश की अखंडता सुनिश्चित करती है वहीं अर्थ जगत प्रगति का कारक है। सेना में गुजराती रेजिमेंट भले न हो लेकिन गुजराती लोग सेना में हैं और उनका पराक्रम किसी से कम नहीं है।

जावेद अख्तर ने सेना में गुजरातियों के बहाने संघ के स्वयंसेवकों पर निशाना साधा है। नरेंद्र मोदी को यह सलाह देने से पहले कि आरएसएस के स्वयंसेवकों को सेना में लिया जाए अख्तर को अपनी योग्यता जाँच लेनी चाहिए थी। क्या जावेद अख्तर इस योग्य हैं कि वे प्रधानमंत्री को सलाह दें कि देश की सेना कैसे चलानी है? देश कोई एक व्यक्ति नहीं चलाता। यहाँ सेना, व्यवसायी, लेखक, पत्रकार, सिनेमा के लोग सबका योगदान होता है और एक प्रधानमंत्री को सबको साथ लेकर चलना होता है। वह किसी संगठन के लोगों को किसी दूसरे संस्थान का हिस्सा बनने पर मजबूर नहीं कर सकता।

जावेद अख्तर को यह समझना चाहिए कि लोकतंत्र में हर किसी का अपना काम होता है। एक गीतकार गाने लिखता है, सैनिक युद्ध लड़ता है, शिक्षक पढ़ाता है और प्रधानमंत्री शासन करता है। ऐसे में संघ का जो काम है वह संघ बखूबी समझता है और करता है। एक गाना लिखने वाला व्यक्ति जिसने कभी किसी संगठन की कमान नहीं संभाली वह क्या जानेगा कि आरएसएस कैसे काम करता है? क्या कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर किसी कलाकार को यह बता सकता है कि उसे अभिनय कैसे करना है?

जावेद अख्तर ने खुद को इतना काबिल कैसे मान लिया कि अब वह देश के प्रधानमंत्री को समझाएंगे कि सेना में फलाने रेजिमेंट होनी चाहिए? प्रधानमंत्री भी सेना से संबंधित निर्णय स्वयं नहीं लेते। सेना से संबंधित निर्णय लेने के लिए सेना से पूछा जाता है। मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों तथा सेनाध्यक्ष की राय ली जाती है तब कोई निर्णय होता है। इसलिए जावेद साहब आप गाने लिखते हैं तो वही काम कीजिए। देश कैसे चलाना है यह शासन व्यवस्था पर छोड़ दीजिए।

कॉन्ग्रेसी नेशनल हेराल्ड की ‘पत्तलकारिता’: BSP से चुनाव लड़ चुके पुजारी को जोड़ दिया RSS और BJP से, कांड हुआ दुबई में

नेश्नल हेराल्ड ने कल (मार्च 10, 2019) एक ख़बर छापी। इसमें नासिक के पुजारी सुधीर प्रभाकर के दुबई में अरेस्ट होने का समाचार था। इस ख़बर में मूल जानकारी के साथ कई तरह की पृष्ठभूमि को तैयार किया गया। इसे पढ़ते हुए आपको बार-बार लगेगा कि ख़बर पुजारी पर न होकर मुख्यत: RSS और BJP पर केंद्रित है। जिस तरह से नेशनल हेराल्ड ने इस खबर को एंगल दिया है, वो इस बात को ही दर्शाता है कि आरोपित पर लगे आरोप से ज्यादा बड़ा मुद्दा RSS और भाजपा को टारगेट करना है।

नेशनल हेराल्ड की हेडलाइन का स्क्रीनशॉट

अपनी इस खबर को एंगल देने के लिए नेशनल हेराल्ड के सूत्रों का तर्क कितना हास्यास्पद है… जरा समझिए। इस खबर में बताया गया है कि दुबई में जिस सुधीर प्रभाकर को पकड़ा गया है वह RSS का करीबी है। इसलिए उसके गिरफ्तार होने के कुछ देर बाद ही भारतीय दूतावास का एक अधिकारी खुद पुलिस थाने में आकर उसकी बेल को सुनिश्चित किया।

इस ख़बर में अपनी बात को उचित साबित करने के लिए सुधीर के फेसबुक पेज का हवाला देते हुए बताया गया कि सोशल मीडिया पर वह ‘सुधीर दास पुजारी महाराज’ के नाम से सक्रिय है। साथ ही उसकी डीपी RSS प्रमुख मोहन भागवत और महाराष्ट्र मुख्य मंत्री के साथ भी है। यह तर्क किसी के आरोपों को समझाने के लिए जितने हास्यास्पद हैं उतने ही हैरान करने वाले भी… आखिर कोई किसी के सोशल मीडिया अकॉउंट से किसी के अपराधों की पृष्ठभूमि को किस तरह से तय कर सकता है?

साभार: सुधीर प्रभाकर का फेसबुक अकॉउंट

इस पूरे ख़बर में हर दूसरी बात में प्रभाकर को आरएसएस और बीजेपी से जुड़ा हुआ बताया जाता रहा है। जबकि ख़बर लिखने वाले ने खुद ही यह बताया है कि प्रभाकर 2006-07 में उस समय लाइमलाइट में आए, जब उन्होंने दलितों के लिए नासिक में मंदिर खोला था, और कहा था कि वह अपने दादा के पापों का प्रायश्चित कर रहे हैं, जिन्होंने डॉ बीआर अम्बेडकर को मंदिर में जाने से रोका था। इसके बाद वह बहुजन समाज पार्टी से जुड़े और 2009 में बीएसपी की ओर से लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन इसमें वो हार गए।

नेशनल हेराल्ड इतने पर भी नहीं रुका। इसके तुरंत बाद ख़बर में जिक्र किया गया कि प्रभाकर विश्व हिन्दू परिषद के प्रमुख कार्यकर्ता और सलाहकारी बोर्ड के सदस्य भी रह चुके हैं। साथ ही लगातार इस बात पर फोकस किया गया कि यह शख्स बीजेपी का और प्रधानमंत्री मोदी का कट्टर समर्थक है। इसे प्रमाणित करने के लिए खबर में सुधीर के ट्विटर से कई ट्वीट भी शामिल किए गए। कोई व्यक्ति अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर कैसी चीजें पोस्ट कर रहा, किसके साथ ली गई फोटो शेयर कर रहा, इससे वह व्यक्ति किस संस्था से जुड़ा है कैसे पता चल जाता है, यह खुद जाँच का विषय है।

सोचने वाली बात है कि आखिर कोई मीडिया संस्थान किसी व्यक्ति के अपराध की ख़बर को उसके सोशल मीडिया की वॉल से जोड़कर क्यों दिखाने का प्रयास कर रहा है। आप किसी के सोशल मीडिया से कैसे जाँच सकते हैं कि उसके किए कारनामों के पीछे उसके सोशल मीडिया पर शेयर की गई चीजें जिम्मेदार हैं। स्वयं ही इस बात को बताना कि प्रभाकर बीएसपी से चुनाव लड़ चुके हैं और फिर खुद ही प्रभाकर के सोशल मीडिया खंगालना दर्शाता है कि खबर कि दिशा चाहे कुछ भी लेकिन उसे मोड़ा आरएसएस और बीजेपी की तरफ ही जाएगा।

किसी खबर को कवर करना हर मीडिया संस्थान का काम होता है लेकिन झूठ और अनुमानों का सहारा लेकर किसी खबर को एंगल देना उस संस्थान की विश्वस्नीयता पर सवाल खड़ा करता है। प्रभाकर पर इल्जाम है कि उन्होंने अपनी पूँजी को बढ़ाने के लिए एक शाही परिवार के नाम का इस्तेमाल किया है लेकिन नेशनल हेराल्ड ने इस ख़बर को जो एंगल देकर पेश किया उसमें साफ़ है कि वह विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस की छवि को धूमिल करने के लिए प्रयासरत है। नेशनल हेराल्ड जैसी पत्तलकारिता (माफी चाहती हूँ क्योंकि पत्रकारिता तो ये कर नहीं रहे) करने वाले संस्थानों को समझने की आवश्यकता है कि किसी पार्टी का समर्थन करना और किसी से व्यक्तिगत धोखेबाजी करना एक दूसरे का पर्याय नहीं है।

महाराष्ट्र: पीछे हटे शरद पवार, नहीं लड़ेंगे आगामी लोकसभा चुनाव

एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने लोकसभा चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। आज सोमवार (मार्च 11, 2019) को एक अहम बयान देते हुए उन्होंने कहा कि वे आगामी लोकसभा चुनावों में एक उम्मीदवार के तौर पर हिस्सा नहीं लेंगे। तीन बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का पद संभाल चुके पवार के इस ऐलान के बाद सियासी गलियारों में चर्चाएँ तेज़ हो गयी है। लोगों का कहना है कि राज्य में भाजपा-शिवसेना का गठबंधन होने और मोदी लहर के कारण उन्होंने आगामी चुनाव परिणाम भाँप लिया है। इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए एनसीपी सुप्रीमो ने कहा:

“मैंने सोचा कि मेरे परिवार के दो सदस्य इस बार चुनाव लड़ रहे हैं, इसलिए मुझे लगा कि यह सही समय है उचित फैसला लेने का। इसलिए मैंने चुनाव नहीं लड़ने का निर्णय लिया। मैं पहले के 14 चुनाव लड़ चुका हूं।”

शरद पवार के मढ़ा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के क़यास लगाए जा रहे थे। राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं ने उनसे चुनाव लड़ने का आग्रह भी किया था। 78 वर्षीय पवार अभी राज्यसभा के सदस्य हैं। कभी केंद्र सरकार में कृषि मंत्री और रक्षा मंत्री जैसे अहम पद संभाल चुके पवार पर भाजपा भी काफ़ी आक्रामक हो गई थी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कुछ दिनों पहले कहा था कि भाजपा राज्य में 2014 के मुक़ाबले एक सीट अधिक जीतेगी और वह सीट होगी- बारामती। ज्ञात हो कि बारामती पवार का गढ़ माना जाता रहा है। वे यहाँ से 1984, 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में जीत दर्ज कर चुके हैं। पवार 1967, 1972, 1978, 1980, 1985 और 1990 में बारामती विधानसभा क्षेत्र से विधायक भी रह चुके हैं।

पवार की बेटी सुप्रिया सुले 2009 और 2014 में बारामती लोकसभा क्षेत्र से जीत दर्ज कर चुकी हैं। उनके भतीजे अजित पवार ने 1991 में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था। इसके अलावा 1991, 1995, 1999, 2004, 2009 और 2014 में अजित पवार बारामती विधानसभा क्षेत्र का भी प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अगर पवार चाहते तो मढ़ा या बारामती से चुनाव लड़ सकते थे क्योंकि ये क्षेत्र उनके परिवार का गढ़ रहा है लेकिन उन्होंने पाँव पीछे खींच लिए हैं। पवार ने 2009 में मढ़ा लोकसभा क्षेत्र से जीत दर्ज की थी। पवार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संस्था आईसीसी और भारतीय क्रिकेट की सर्वोच्च संस्था बीसीसीआई के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पवार के इस निर्णय पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पवार हवा का रुख पहले ही भाँप लेते हैं और इसी कारण उन्होंने ऐसा ऐलान किया है। बता दें संसद में सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव भी मोदी के फिर से प्रधानमंत्री बनने की कामना कर चुके हैं। रविवार (मार्च 10, 2019) को चुनाव आयोग ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान भी कर दिया। महाराष्ट्र में 4 चरणों में चुनाव संपन्न कराए जाएँगे।

J&K: त्राल मुठभेड़ में मारा गया पुलवामा हमले का साज़िशकर्ता ‘मोहम्मद भाई’

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों को बड़ी कामयाबी मिली है। दक्षिण कश्मीर स्थित पुलवामा ज़िले के त्राल में हुई मुठभेड़ में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी मुदस्सिर अहमद ख़ान को मार गिराया गया। आतंकियों के बीच उसे ‘मोहम्मद भाई’ के नाम से जाना जाता था। मुठभेड़ में उसके अलावा दो अन्य आतंकियों के मारे जाने की भी पुष्टि हुई है। हालाँकि, अभी फॉरेंसिक रिपोर्ट आनी बाकी है लेकिन उसके शव की शिनाख़्त पुलिस द्वारा की जा चुकी है। मोहम्मद पुलवामा हमले का साज़िशकर्ता था। बता दें कि 14 फरवरी को पुलवामा में हुए आत्मघाती आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इसके बाद जवाबी कार्रवाई करते हुए भारतीय वायु सेना ने एयर स्ट्राइक द्वारा पाकिस्तान स्थित कई आतंकी कैम्पों को तबाह कर सैंकड़ों आतंकियों को मौत के घात उतार दिया था।

आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद पाकिस्तान से संचालित होता है और इसकी स्थापना आतंकी मसूद अज़हर ने की थी। तब से वह भारत में कई हमलों को अंजाम दे चुका है। मारे गए तीनों आतंकियों का शव बरामद कर लिया गया है। जिस घर में इन आतंकियों ने पनाह ली थी, वह भी इस मुठभेड़ में पूरी तरह नष्ट हो गया। रविवार की रात (मार्च 11, 2019) हुए इस एनकाउंटर में मारे गए आतंकियों के शव बुरी तरह झुलस चुके हैं। यही कारण है कि पुलिस को शिनाख़्त करने में देरी हो रही है। दरअसल, सुरक्षा बलों को पिंगलिश इलाक़े में आतंकियों के छिपे होने की ख़ुफ़िया सूचना मिली थी। इसके बाद वहाँ सर्च अभियान चलाया गया। आतंकी पहले से ही घात लगाकर बैठे थे और उन्होंने तलाशी दल पर फायरिंग की। सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई करते हुए आतंकियों को मार गिराया।

मारा गया आतंकी मुदस्सिर ख़ान अका मोहम्मद भाई

मुदस्सिर अक्सर परदे के पीछे से कार्य किया करता था और चर्चा में कम रहता था। 23 वर्षीय मुदस्सिर ने स्नातक पास किया था और इलेक्ट्रीशियन था। उसने आईटीआई का कोर्स कर रखा था। पुलवामा आतंकी हमले के दौरान उसने ही गाड़ी और विस्फोटक का इंतजाम किया था। आदिल अहमद डार नामक आत्मघाती आतंकी ने सीआरपीएफ की वैन को टक्कर मारी थी। मुदस्सिर लगातार उसके संपर्क में था। वह फ़रवरी 2018 में सुंजवाँ में हुए आतंकी हमले में भी शामिल था। उस हमले में 6 सुरक्षा बल के जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे और एक नागरिक की भी मृत्यु हो गई थी। आईटीआई से एक साल का डिप्लोमा करने वाला आतंकी मुदस्सिर के पिता एक मज़दूर हैं।

इसके अलावा जनवरी 2018 में लेथपुरा सीआरपीएफ कैम्प पर हुए हमले में भी मुदस्सिर का हाथ था। उस हमले में सीआरपीएफ के 5 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। पुलवामा हमले की जाँच के दौरान एनआईए ने मुदस्सिर के घर छापा भी मारा था। 27 फरवरी को यह कार्रवाई की गई थी।

दूल्हे की हालत देख दुल्हन ने किया शादी से इंकार, लौटानी पड़ी दहेज की पूरी रकम

बिहार में भले ही पूर्ण शराबबंदी हो गई है, लेकिन आज भी लोग शराब के सेवन से गुरेज नहीं कर रहे हैं। कुछ मौकों पर तो ऐसे नजारे देखने को मिल जाते हैं, जहाँ बिहार पुलिस के हर वो दावे खोखले नज़र आते हैं, जिसमें वो प्रदेश में असरदार ढंग से कानून का पालन करवाने का दंभ भरती दिखाई देती है।

बिहार के छपरा जिले में एक दूल्हे की शराब की लत उस पर भारी पड़ गई। शराब पीने की वजह से दूल्हे और उसकी बारात को बिना दुल्हन के ही वापस लौटना पड़ा। मामला बिहार के तरैया थाने के डुमरी छपिया गाँव का है। यहाँ बबलू नाम के शख्स की शादी त्रिभुवन शाह की पुत्री रिंकी के साथ होने वाली थी, मगर दूल्हे को शराब के नशे में देख दुल्हन ने शादी करने से इंकार कर दिया।

दुल्हन के पिता त्रिभुवन शाह ने बताया कि दूल्हा जब बारात के साथ पहुँचा तो वह नशे में चूर था। उसने इतनी ज्यादा पी रखी थी कि उसे यह भी नहीं पता चल पा रहा था कि उसके आसपास क्या हो रहा है। जयमाला के दौरान वह स्टेज पर बदमतीजी भी कर रहा था। लड़के को ऐसी हालत में देखकर लड़की ने शादी से इंकार कर दिया।

शादी में शामिल लोगों के मुताबिक नशे में धुत्त दूल्हा ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था, किसी रस्म को भी ठीक से नहीं निभा पा रहा था। इतना ही नहीं वो वहाँ पर मौजूद लोगों के साथ बदसलूकी करने के साथ ही महिलाओं के लिए अपशब्द का भी प्रयोग कर रहा था। ये सब देखकर दुल्हन को गुस्सा आ गया और वो शादी से इंकार करते हुए वहाँ से चली गई। हालाँकि दोनों परिवार के लोगों ने रिंकी को काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन रिंकी नहीं मानी।

रिंकी की जिद के आगे दोनों परिवारों की एक नहीं चली। इसके बाद दूल्हे को बिना दुल्हन के ही लौटना पड़ा, मगर गाँव वालों ने दूल्हे को तब तक वहाँ से वापस नहीं जाने दिया, जब तक कि उसने दहेज में ली गई पूरी रकम वापस नहीं कर दी।

दिखावे के लिए पूजा में जाते हैं ‘राहुल भइया’: सुनिए उन्हीं से इस 19 सेकंड के वीडियो में

राहुल गाँधी। नाम ही काफी है। फिर भी न जाने क्यों ये मीडिया वाले दिन-रात भोकार पारते रहते हैं कि राहुल ये हैं, वो हैं। वे कई बार ‘परिपक्व’ हो चुके हैं। जब कॉन्ग्रेस कोई पंचायत स्तरीय चुनाव भी जीतती है, राहुल गाँधी की धारदार वापसी होती है और मीडिया वाले इसे उनकी मैच्योरिटी लेवल बढ़ने का सबूत मानते हैं। वे कई बार ‘मैच्योर’ हो चुके हैं। मीडिया वाले कई बार उनकी धारदार वापसी करा चुके हैं। लेकिन, राहुल तो राहुल ठहरे। कभी जनेऊधारी बन जाते हैं, कभी मौलाना का रूप धारण कर लेते हैं, कभी मंदिरों की परिक्रमा शुरू कर देते हैं, कभी गंभीर दुःख के मौक़ों पर मुस्कराते नज़र आते हैं तो कभी राफेल के दाम एक ही भाषण में 4 बार बदलते हैं। अब राहुल गाँधी ने कुछ ऐसा किया है, जिसे जानकार आपके सामने उनके दिखावे की पोल तो खुल ही जाएगी, साथ ही यह भी पता चलेगा कि वे भारतीयता, हिंदुत्व और हमारी पूजा पद्धति से कितने अनभिज्ञ हैं।

नोट कीजिए, वे अनभिज्ञ हैं लेकिन इस बारे में जानना नहीं चाहते। कई लोग ऐसे हैं जिन्हें मन्त्रों का ज्ञान नहीं और यह बुरा नहीं लेकिन अगर उनके सामने कोई मंत्र पढ़ रहा हो तो वे उसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। हमारे घर में जब कोई पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन, आराधना-अष्टयाम का कार्यक्रम होता है तो हम उनमें हिस्सा लेते हैं, गर्व के साथ। भले ही कई बार हमें उनके बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं होता, हम सभी कार्य संपन्न करते हैं और जिज्ञासु बन कर और अधिक जानने की कोशिश करते हैं। लेकिन, राहुल गाँधी अलग हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पूजा-पाठ को हँसी-मज़ाक का विषय समझते हैं और इसे हेय दृष्टि से देखते हैं। इसका प्रमाण आप स्वयं देखिए। सुनिए, ख़ुद राहुल की ज़ुबानी- नीचे दिए गए इस वीडियो में।

राहुल गाँधी का दिखावा

इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे पूजा के बाद जब राहुल गाँधी से पूछा जाता है कि वे यहाँ क्या करने आए हैं तो वे मज़ाक के मूड में कहते हैं कि उन्हें तो कुछ पता ही नहीं कि यहाँ क्या हो रहा है। बकौल राहुल, उन्हें बुलाया गया और वे आ गए। सीधा अर्थ ये कि उन्हें हिंदुत्व के लिए बस दिखावा करना है, इसीलिए वे आ गए। ये कैसी पूजा है, किस देवता की है, क्यों की गई- इन सबके बारे में उन्हें लेशमात्र भी पता नहीं लेकिन वे आ गए क्योंकि उन्हें कैमरे के सामने पूजा करते दिखना था। हिंदुत्ववादी इमेज बना कर हिन्दुओं के वोट ठगने थे। आप भी इस वीडियो को देखिए और सोचिए कि ऐसे दिखावेबाज़ नेताओं का क्या होना चाहिए जो पूजा-पाठ को हँसी-मज़ाक का विषय समझते हैं। उनके पुछल्ले ‘राहुल भईया ज़िंदाबाद’ का नारा लगा हैं और राहुल हैं कि उन्हें क्या हो रहा है इसके बारे में ‘No Idea’ है।

कंप्यूटर बाबा की सत्ता के गलियारों में वापसी, कमलनाथ ने आनन-फ़ानन में की नियुक्ति

अपने आप में न तो किसी सन्यासी के कंप्यूटर या अन्य गैजेट इस्तेमाल करने पर किसी को आपत्ति हो सकती है, न ही उन गैजेट्स के नाम पर ही अपना नाम ‘कंप्यूटर बाबा’ रख लेने पर, पर सांसारिक मोह-माया से कट्टी कर लेने का दावा करने वाले कंप्यूटर बाबा की राजनैतिक निष्ठा और विचारधारा यदि पेंडुलम की तरह सुविधा और अवसर की हवाओं के मुताबिक डोले तो सवाल उठना लाज़मी है।

मध्य प्रदेश की कमलनाथ नीत ‘हिंदुत्ववादी’(??) कॉन्ग्रेस सरकार ने प्रदेश के चर्चित संत कंप्यूटर बाबा को माँ नर्मदा, माँ क्षिप्रा, एवं माँ मन्दाकिनी रिवर ट्रस्ट का अध्यक्ष नियुक्त करने की घोषणा की है, वह भी चुनावों की तारीख चुनाव आयोग द्वारा घोषित किए जाने और आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले।

चुनावों से ठीक पहले नियुक्ति (‘जनता के रिपोर्टर एक्सपोज़ करने से चूके’)

कंप्यूटर बाबा (नामदेव त्यागी) की नियुक्ति न केवल लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले (रविवार, 10 मार्च को) घोषित की गई, जबकि नियुक्ति का आदेश 8 मार्च (शुक्रवार) को जारी किया जा चुका था, बल्कि ख़बरों के मुताबिक कंप्यूटर बाबा ने इस नियुक्ति और आदेश के समय में बरती गई चालाकी की खुले तौर पर तारीफ़ भी की है। वहीं जनता के हक़ और हुकूक की लड़ाई लड़ने वाले (ठीक उसी तरह, जैसे AAP आम आदमियों की पार्टी है) जनता के स्वनामधन्य रिपोर्टर योगी सरकार द्वारा राजू श्रीवास्तव को फ़िल्म विकास परिषद के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति पर सवाल उठाने के चक्कर में इस खबर को कवर करना ही भूल गए।

भाजपा भी दे चुकी है राज्यमंत्री का दर्जा

इससे पूर्व पिछले वर्ष ही, कंप्यूटर बाबा को तत्कालीन भाजपाई मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सरकार ने योजना, आर्थिक और सांख्यिकी विभाग का राज्यमंत्री बनाया था। चार अन्य आध्यात्मिक नेताओं- (अब दिवंगत) भय्यूजी महाराज, सर्वश्री नर्मदानंद जी, श्री हरिहरानंद जी, एवं पण्डित योगेन्द्र महंत जी को भी राजयमंत्री का दर्जा दिया गया था। उस समय देश के लेफ़्ट-लिबरल धड़े ने इसे हिन्दुत्ववादी एजेंडा बताते हुए बहुत हल्ला काटा था। यहाँ तक कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस प्रवक्ता श्री पंकज चतुर्वेदी ने तो इसे उस समय के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर उपरोक्त आध्यात्मिक विभूतियों द्वारा आम लोगों की श्रद्धा को निचोड़ने का प्रयास करने और अपने पाप धोने का प्रयास करने का भी आरोप लगाया था।

जहाँ तक कि हमारी जानकारी है, श्री पंकज चतुर्वेदी जी की कॉन्ग्रेस ने अभी तक कमलनाथ सरकार के इस सांप्रदायिक कदम की कोई आलोचना नहीं की है, पर हम उसे पूरी तत्परता से तलाश रहे हैं, और मिलते ही यहाँ अपडेट कर देंगे।

हवा के रुख और अवसर की आंधी से बदलती रही है कंप्यूटर बाबाजी की राजनीतिक निष्ठा

पिछले साल जब कंप्यूटर बाबाजी को मार्च में शिवराज सरकार ने राज्यमंत्री का दर्जा दिया था, उस समय वह और योगेन्द्र महंतजी 15-दिवसीय नर्मदा स्कैम यात्रा निकालने की तैयारी कर रहे थे। पर उस नियुक्ति के पश्चात समाचार एजेंसी से यह खबर आई कि कंप्यूटर बाबा ने अपने ऊपर भरोसा जताए जाने के लिए प्रदेश सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया, वह भी सम्पूर्ण संत समाज की ओर से। शिवराज सरकार ने पाँचों संतों को नर्मदा के किनारे वृक्षारोपण, जल संरक्षण, और स्वच्छता के प्रति जागरुकता वर्धन हेतु बनी समिति में नियुक्त किया था। विकिपीडिया के अनुसार इससे पहले 2014 लोकसभा चुनावों में कंप्यूटर बाबाजी ने आम आदमी पार्टी से भी मध्य प्रदेश में टिकट देने की गुज़ारिश की थी।

हम न तो आध्यात्मिक व्यक्तियों की राजनीतिक राय होने के विरोधी हैं और न ही सत्ता को प्रभावित करने के उनके प्रयासों के। लोकतंत्र में एक बाबा और एक सीईओ का वोट और राजनीतिक अधिकार बराबर के दिए गए हैं और हम इसका न केवल सम्मान बल्कि पुरज़ोर समर्थन करते हैं। पर राजनीति में यदि वायु वेग से और सुविधानुसार किसी शिक्षक, राजनेता या व्यापारी की राजनीतिक राय बदलने पर सवाल पूछे जाएँगे तो अध्यात्म जगत से राजनीति में आए महानुभावों को भी छूट नहीं दी जा सकती। हमारा यह मानना है कि श्री कंप्यूटर बाबाजी को स्वयं इस विषय पर स्पष्टीकरण देकर मामला ख़त्म कर देना चाहिए।

इसके अलावा कॉन्ग्रेस पार्टी को भी यह साफ़ करना चाहिए कि इन्हीं कंप्यूटर बाबाजी की पर्यावरण संरक्षण और मध्य प्रदेश के करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र नर्मदा नदी के उद्धार हेतु बनी समिति में नियुक्ति यदि गलत और हिन्दुओं का ‘तुष्टिकरण’ थी तो आज हालातों में ऐसे क्या बदलाव हुए हैं कि उन्हीं बाबाजी की नियुक्ति अब सही हो गई है? वह भी बिना उनके अधिकारों, पद, सुविधाओं आदि को रेखांकित किए।

जनता के स्वनामधन्य रिपोर्टरों से भी हमारा विनम्र आग्रह है कि यदि आपका उद्देश्य भाजपा का येन-केन प्रकारेण विरोध करना नहीं बल्कि ‘इश्यू-बेस्ड स्टैंड’ लेना है तो किसी भी ‘इश्यू’ पर भाजपा का नाम आते ही एकतरफ़ा रिपोर्टिंग चालू कर देने की बजाय उसी मुद्दे पर भाजपा के आलावा बाकियों पर भी अपनी ‘कृपा-दृष्टि’ ज़रूर डालें। क्योंकि कृपा वहीं से रुक रही है।

आलोचना बंद कीजिए, धोनी की सलाह महत्वपूर्ण लेकिन उनके बिना भी सक्षम हैं कप्तान कोहली

रविवार (मार्च 10, 2019) को भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए वनडे मैच में भारतीय बल्लेबाजों के अच्छे प्रदर्शन के बावजूद टीम को हार का सामना करना पड़ा। ओपनर्स रोहित शर्मा और शिखर धवन ने किसी भी भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया वनडे मैच में सबसे बड़ी ओपनिंग साझेदारी (188 रन) कर के ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों के पसीने छुड़ा दिए। ऑस्ट्रेलिया के सामने ये स्कोर भी छोटा नज़र आया और उन्होंने 2.1 ओवर रहते जीत दर्ज की। चहल और जाधव ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों के पसंददीदा शिकार रहे और दोनों ने 8 रन प्रति ओवर की दर से रन खाए। मोहाली में जीत दर्ज करने के साथ ही ऑस्ट्रेलिया ने सीरीज बराबर कर लिया है। इन सबके बीच ऋषभ पंत को लेकर ख़ासी चर्चा हुई और विकेट के पीछे उनके ख़राब प्रदर्शन को लेकर फैंस ने उन्हें निशाना बनाया।

ऋषभ पंत युवा विकेटकीपर हैं और उनके पास अनुभव की कमी है। ये अलग बात है कि आज आईपीएल के दौर में नए क्रिकेटर्स भी काफ़ी मैच खेल लेते हैं और उन्हें अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ ड्रेसिंग रूम साझा करने का मौक़ा मिलता है। अब बदले ज़माने में आपसे शुरू से ही चमत्कारिक प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है। हालाँकि, पिछले कुछ टेस्ट मैचों में पंत का प्रदर्शन अच्छा रहा है और इस मैच में भी उन्होंने 36 रन की पारी खेली लेकिन भारत के पास एमएस धोनी के रूप में एक सक्षम विकेटकीपर बल्लेबाज मौजूद है, जिसके कारण फैंस का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने धोनी को आराम देने के फ़ैसले पर सवाल खड़े किए। इस सिक्के के कई पहलू हैं। आगे बढ़ने से पहले पिछले मैच के शतकवीर शिखर धवन की राय जानते हैं।

शिखर धवन ने ऋषभ पंत का बचाव करते हुए उनके आलोचकों को फटकार लगाते हुए धोनी से उनकी तुलना न करने की सलाह दी। अगर आईपीएल को हटा कर बात करें तो 500 से भी अधिक अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुके और क्रिकेट के तीनों फॉर्मेट में सबसे ज्यादा संख्या में मैचों की कप्तानी कर चुके एमएस धोनी जैसे क़द के क्रिकेटर के साथ नए-नवेले ऋषिभ पंत की तुलना को धवन ने नाइंसाफी बताया। धोनी का करियर लम्बा रहा है और उनके करोड़ों फैंस भी हैं लेकिन भारत ने सचिन तेंदुलकर और सुनील गावस्कर जैसे प्रसिद्धि की चरम सीमा पर पहुँच चुके बल्लेबाजों को देखा है और हमें पता होना चाहिए कि वे भी आलोचना से नहीं बच सके थे। समय आने पर सबको जाना पड़ा।

कई न्यूज़ रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि विराट कोहली सिर्फ़ और सिर्फ़ एमएस धोनी की वजह से मैच जीतते हैं और धोनी के बिना उनकी कप्तानी में वो धार नहीं रहती। आलोचक ये कहते समय भूल जाते हैं कि वे क्रिकेट के महानतम बल्लेबाजों में से एक की बात कर रहे हैं- जिसकी तकनीक, रणनीति और सोच किसी भी समकालीन बल्लेबाज़ से ऊपर है। रही बात धोनी की उपस्थिति या अनुपस्थिति की तो बता दें कि वे अभी भारतीय टीम के सीनियर खिलाड़ी हैं और उनकी सलाह महत्वपूर्ण ज़रूर है लेकिन ऐसा नहीं है कि उनके बिना कोहली कप्तानी नहीं कर सकते या टीम नहीं जीत सकती। हम वो दौर भी देख चुके हैं जब सचिन की उपस्थिति से धोनी को ख़ासा फ़ायदा मिला करता था और मैच के बीच में वे अक़्सर सचिन की सलाह लिया करते थे। टीम में किसी भी बड़े सीनियर या धोनी अथवा सचिन के क़द के अनुभवी बल्लेबाजों की उपस्थिति से फ़ायदा मिलता ही मिलता है- यह कोई नई बात नहीं है।

पंत और धोनी की तुलना पर धवन की फटकार

विराट कोहली और एमएस धोनी की कप्तानी की शैली अलग-अलग है। उनकी फील्ड सेटिंग भी काफ़ी हद तक अलग है। राँची में हुए मैच में एमएस धोनी ने काफ़ी धीमी बैटिंग की थी और नागपुर में तो वे गोल्डन डक का शिकार हुए थे। धोनी की धीमी बल्लेबाजी कुछ स्थितियों में चिंता का विषय बन जाती है। हाँ, विकेट के पीछे वे अभी भी तेज-तर्रार हैं और बिजली माफिक चमकते हैं। लेकिन, अगर युवा विकेटकीपर बलबाज़ों को अभी से ही अच्छी तरह मौक़ा नहीं दिया गया तो उनके वनडे से रिटायर होते ही टीम संकट में फँस जाएगी। इसीलिए ज़रूरी है कि पंत जैसे क्रिकेटर्स को मौके दिए जाएँ और वो भी धोनी के रहते ताकि वे धोनी से काफ़ी कुछ सीख सकें। इसीलिए उनको आराम देने पर हंगामा मचाना सही नहीं है। यह भारतीय टीम के अच्छे भविष्य के लिए है। धोनी के साथ ड्रेसिंग रूम साझा कर पंत जैसे नए विकेटकीपर बल्लेबाज़ों को काफ़ी कुछ सीखने को मिलेगा।

अब बात करते हैं कोहली की कप्तानी की। ये कहना बिलकुल सही नहीं है कि उनकी कप्तानी सिर्फ़ और सिर्फ़ धोनी पर निर्भर है क्योंकि टेस्ट मैचों की कप्तानी में विराट कोहली के जीत का औसत एमएस धोनी से बेहतर है और उन्होंने धोनी के रिटायरमेंट के बाद कप्तानी करनी शुरू की। टेस्ट मैचों में कप्तान की रणनीति, सोच और क्षमता की अच्छी-ख़ासी परीक्षा होती है और विराट कोहली अगर उनमें सफल हुए हैं तो एकाध वनडे मैचों में धोनी के बिना मिली हार को लेकर उनको निशाना नहीं बनाया जा सकता। सावधान रहें, क्योंकि आप लगातार 9 टेस्ट सीरीज जीतने वाले कप्तान की बात कर रहे हैं। यह कारनामा कोहली के अलावा सिर्फ़ करिश्माई ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग ही कर सके हैं। विराट कोहली को धोनी की सलाह की ज़रूरत तो है लेकिन उनकी कप्तानी धोनी के बिना शून्य है, यह थोड़ा बचकाना सा स्टेटमेंट है।

2019 के आँकड़ों की बात करें तो एमएस धोनी ने कई बार नॉटआउट रह कर टीम की नैया पार लगाई है और पिछले दिनों के अपने ख़राब रिकार्ड्स में अच्छा सुधार किया है। लेकिन, उनकी स्ट्राइक रेट अभी भी चिंता का विषय है। धोनी को 2019 विश्व कप खेलना है और उनकी फिटनेस को ध्यान में रखते हुए ज़रूरी है कि उन्हें सही समय पर आराम देते रहा जाए। धोनी की जगह पंत जैसे एक विकेटकीपर बल्लेबाज़ को मौक़ा देना ज़रूरी है ताकि विश्व कप या महत्वपूर्ण सीरीज के दौरान अगर धोनी फिट नहीं रहते हैं तो टीम में उनकी कमी पूरी की जा सके। इसीलिए, अधीर मत होइए क्योंकि यह टीम के भले के लिए है।

लोकसभा चुनाव 2019: वो 15 VIP सीटें जिन पर होगी पूरे देश की नज़र

बीते रविवार (मार्च 10, 2019) को चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा करते हुए बताया कि इस बार के चुनाव सात चरण में होने वाले हैं। वैसे तो चुनाव में एक-एक सीट की अपना महत्व होता है लेकिन फिर भी पूरे देश की नज़रें कुछ VIP सीटों पर हमेशा टिकी रहती हैं कि वहाँ से कौन जीता और कौन हारा…। लेकिन यह VIP सीटें कौन-कौन सी हैं, और इनमें मतदान कौन सी तारीख को होने वाले हैं, आइए आपको इसकी जानकारी देते हैं।

वाराणसी: वाराणसी में मतदान आखिरी चरण में यानि 19 मई को होना तय हुआ है। 2014 में इस सीट से नरेंद्र मोदी ने पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा था और प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचे थे। ऐसे में लोगों की उत्सुकता इस सीट को लेकर बनी हुई है कि आखिर इस बार कौन होगा यहाँ से खड़ा और कौन मारेगा बाजी?

अमेठी और रायबरेली: कॉन्ग्रेस का गढ़ कहा जाता है अमेठी और रायबरेली। 2014 लोकसभा चुनाव में देश के सबसे बड़े राज्य (लोकसभा सीटों की संख्या के आधार पर) से कॉन्ग्रेस को सिर्फ 2 सीटें आईं थीं और वो दोनों सीटें थीं – अमेठी व रायबरेली। देखना है कि इस बार कॉन्ग्रेस इन दोनों संसदीय सीटों पर अपनी लाज बचा पाती है या नहीं…

लखनऊ: 6 मई को लखनऊ में मतदान की तारीख तय हुई है। यहाँ से 2014 में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने विजय हासिल की थी। कभी यह सीट अटल बिहारी वाजपेयी का हुआ करता था। और अब राजनाथ सिंह का। परंपरागत तौर पर VIP सीट का दर्जा पा चुका लखनऊ इस बार किस करवट बैठेगा, यह देखना वाकई दिलचस्प होगा।

वडोदरा और पुरी: इन दोनों ही संसदीय सीट पर मतदान 23 अप्रैल को होगा। इन दोनों को VIP सीट की सूची में डालने का कारण है यह है कि पिछली बार नरेंद्र मोदी वाराणसी के अलावा वडोदरा से भी निर्वाचित हुए थे। लेकिन इस बार खबरें आ रही हैं कि पुरी वह दूसरी सीट हो सकती है, जहाँ से पीएम मोदी चुनाव लड़ेंगे। हालाँकि इस पर बीजेपी की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।

गाँधी नगर और पीलीभीत: VIP सीटों की सूची में गांधी नगर और पीलीभीत में चुनाव 23 अप्रैल को होना निश्चित हुआ है। गाँधी नगर जहाँ भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की सीट है, वहीं पीलीभीत की सीट का प्रतिनिधित्व केंद्रीय मंत्री मेनका गाँधी करती हैं।

अमृतसर: यहाँ मतदान के लिए 19 मई की तारीख निर्धारित की गई है। गौरतलब है कि इस क्षेत्र के मायने इस वर्ष इसलिए भी अधिक हैं क्योंकि मनमोहन सिंह को यहाँ से चुनाव लड़ाने की बात कॉन्ग्रेस में चल रही है। 2014 लोकसभा की बात करें तो पिछली बार यहाँ से अरुण जेटली ने चुनाव लड़ा था और हार गए थे।

सुल्तानपुर: केंद्रीय मंत्री मेनका गाँधी के बेटे वरुण गाँधी की संसदीय सीट सुल्तानपुर में मतदान 12 मई को होना है। भले ही वरुण गाँधी अभी लाइमलाइट में नहीं हैं लेकिन एक समय वो फायर ब्रांड नेता थे। साथ में गाँधी सरनेम तो है ही!

मैनपुरी और आजमगढ़: 23 अप्रैल को होने वाले मैनपुरी में मतदान पर लोगों की नजरें इसलिए भी होंगी क्योंकि 2014 में मुलायम सिंह यादव यहीं से निर्वाचित हुए थे। इसके अलावा आजमगढ़ में भी 12 मई को मतदान होना है, जहाँ मुलायम ने अपनी दूसरी सीट को भी बरकरार रखा था।

कन्नौज: मुलायम सिंह की बहू और उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम की पत्नी डिंपल यादव 2014 में यहीं से सांसद बनी थीं। यहाँ पर चुनाव 29 अप्रैल को होना तय हुआ है।

झांसी और कानपुर: इन दोनों संसदीय क्षेत्रों में मतदान 29 अप्रैल को होना है। बता दें कि झांसी की संसदीय सीट उमा भारती की है जबकि कानपुर की संसदीय सीट मुरली मनोहर जोशी की है।

आखिर में बताते चलें की सात चरणों में होने वाले यह मतदान 11 अप्रैल से शुरू होंगे और 19 मई को समाप्त होंगे। इसके बाद मतगणना के लिए 23 मई की तारीख निश्चित हुई है।