मद्रास में उच्च न्यायलय के भीतर कल मंगलवार (मार्च 19, 2019) को सुरक्षा को लेकर एक बड़ी चूक का मामला सामने आया है। जहाँ पति ने अपनी पत्नी पर कोर्ट में ही चाकू से वार किए। मीडिया खबरों के अनुसार यह घटना एक फैमिली कोर्ट में सुनवाई के दौरान हुई।
हालाँकि, इस घटना के बाद वकीलों ने आरोपी को पकड़कर उसकी पिटाई की। पुलिस के मुताबिक सरवनन और वरालक्ष्मी नामक दंपत्ति अदालत में लंबित वैवाहिक विवाद की सुनवाई में हिस्सा लेने वहाँ पहुँचे थे। इसी बीच दोनों के बीच कहा-सुनी हुई और आदमी ने चाकू निकाला और जज के सामने ही अपनी पत्नी पर वार कर दिया।
इस घटना के तुरंत बाद वरालक्ष्मी को स्थानीय सरकारी अस्पताल ले जाया गया। जहाँ अब उनकी हालत को स्थिर बताया जा रहा है। लेकिन फिर भी ऐसे में सवाल उठता है कि अदालत परिसर में आखिरकार व्यक्ति चाकू लेकर घुसा कैसे, क्योंकि वहाँ प्रवेश से पहले तलाशी ली जाती है।
Majority of cases in family courts are run on the ego of the representing advocates – https://t.co/ufAq6VZT5L
वैसे इस घटना को सुरक्षा में चूक का मामला बताया जा रहा है, लेकिन सोचने वाली बात है कि जिस दंपत्ति के बीच में विवाद का स्तर इस हद तक पहुँच जाता हो, वहाँ इनके बीच तलाक के मामले पर 2009 से लेकर अब तक सुनवाई चल रही है।
महिला पैसेंजर से बद्तमीजी करने के कारण एक बार फिर से उबर कैब सर्विस सुर्खियों का हिस्सा बन गई है। घटना मंगलवार (मार्च 19, 2019) दिल्ली की है जब महिला पैसंजर ने ड्राइवर से गाड़ी में एसी चलाने को कहा और बदले में ड्राइवर ने उससे बेहूदा जवाब दिया।
अमृता दास नाम की इस लड़की ने अपनी आप बीती को ट्विटर पर साझा किया है और साथ ही ड्राइवर के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की माँग की है।
अमृता के मुताबिक उन्होंने ड्राइवर से गाड़ी का एसी चलाने को कहा, लेकिन ड्राइवर ने तुरंत मना कर दिया। अमृता के विरोध पर वो बोला कि अगर ज्यादा गर्मी लग रही है तो मेरी गोद में बैठ जाओ।
@Uber_Delhi@Uber@Uber_Support rude and creepy driver. I demand action. First he refused to turn on ac then says garmi lag rahi hai to age mere godi me baith jao. He also ended trip moments after starting to drive and forced me out. This is when I was with husband. @DelhiPolicepic.twitter.com/qE40ib3B5d
इस ट्रिप शुरू होने से खत्म होने तक वह ड्राइवर बार-बार उन्हें गाड़ी से उतरने के लिए जबरदस्ती करता रहा। उनका कहना है कि जब उनके साथ यह वाकया हुआ तब अमृता अपने पति के साथ थीं।
अमृता के इस ट्वीट पर उबर कंपनी ने जवाब दिया है कि ऐसी जानकारी मिलने से काफ़ी दुख हुआ, उनकी टीम से मेल के ज़रिए अमृता को जवाब भेज दिया है और कहा कि अगर वह कुछ जानना चाहती हैं तो रिप्लाई करें। उबर के प्रवक्ता का कहना है कि इस मामले में जो कुछ भी हुआ है, उसके लिए उनके प्लैटफॉर्म पर कोई जगह नहीं है। साथ ही बताया कि जाँच पूरी होने तक आरोपी ड्राइवर को अपने ऐप सिस्टम से हटा दिया गया है।
भाजपा नेता मनोहर पर्रिकर के निधन के साथ ही भारतीय राजनीति में मौजूद उसूलों, सेवा भाव और कर्तव्यपरायणता पर एक बार फिर जमकर चर्चा हुई। वास्तव में आज के समय में ऐसा कोई व्यक्ति विरल ही मिलता है, जिसे अपने कार्य के प्रति ईमानदारी और समर्पण के कारण विपक्ष भी सम्मान देता हो। वर्तमान राजनीति में उत्तराखंड के डॉ. भक्तदर्शन एक मिसाल हैं और जब-जब सियासत में उसूलों की बातें होती हैं, तो लगातार 4 बार लोकसभा चुनाव जीतने के बावजूद मात्र 59 की उम्र में राजनीति से संन्यास लेने वाले कॉन्ग्रेस नेता भक्तदर्शन का जिक्र करना आवश्यक हो जाता है।
राजनीति आरोप-प्रत्यारोप का पर्याय बन चुकी है, और दुर्भाग्यवश हमने हाल ही में वो काला दिन भी देखा, जब अजातशत्रु कहे जाने वाले भारतरत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी पर सत्ता की कुंठा में विवेक शून्य हो चुकी कॉन्ग्रेस पार्टी ने जमकर आरोप लगाए और इस काम के लिए उन्होंने जो दिन चुना, वो था अटल जी के निर्वाण का!
डॉ. भक्तदर्शन सिंह
सियासत में ऐसा ही एक बड़ा नाम है, 50 से 60 के दशक में आजाद भारत की प्रथम लोकसभा में गढ़वाल (उत्तराखंड) का प्रतिनिधित्व करने वाले, राजनीति के पुरोधा एवं साहित्यकार डॉ. भक्तदर्शन सिंह का। भक्तदर्शन सिंह उत्तराखंड राज्य की राजनीति का बहुत बड़ा चेहरा थे। आजादी के बाद वर्ष 1951 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में भक्तदर्शन गढ़वाल सीट से कॉन्ग्रेस के टिकट पर पहली बार सांसद चुने गए थे।
‘राजदर्शन’ नाम में गुलामी की बू भाँपकर खुद अपना नाम रखा था भक्तदर्शन
भक्तदर्शन का जन्म 12 फरवरी 1912 को गोपाल सिंह रावत के घर हुआ था। उत्तराखंड में उनका मूल गाँव था, भौराड़, पट्टी साँबली, पौड़ी गढ़वाल। ब्रिटिश उपनिवेश के समय सम्राट जॉर्ज पंचम के राज्यारोहण वर्ष में पैदा होने के कारण उनके पिता ने उनका नाम ‘राजदर्शन’ रखा था, परन्तु राजनीतिक चेतना विकसित होने के बाद जब उन्हें अपने नाम से गुलामी की बू आने लगी, तो उन्होंने अपना नाम राजदर्शन से बदलकर ‘भक्तदर्शन’ कर लिया था।
1929 में डॉ. भक्तदर्शन कॉन्ग्रेस के अधिवेशन में बने थे स्वयंसेवक
प्रारम्भिक शिक्षा के बाद भक्तदर्शन ने डी.ए.वी. कॉलेज देहरादून से इंटरमीडिएट किया और विश्व भारती (शान्ति निकेतन) से कला स्नातक व 1937 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर परीक्षाएँ पास कीं। शिक्षा प्राप्त करते हुए ही उनका सम्पर्क गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर, डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि से हुआ। वर्ष 1929 में ही डॉ. भक्तदर्शन लाहौर में हुए कॉन्ग्रेस के अधिवेशन में स्वयंसेवक बने। 1930 में नमक आंदोलन के दौरान उन्होंने प्रथम बार जेल यात्रा की। इसके बाद वे 1941, 1942 व 1944, 1947 तक कई बार जेल गए।
डॉ. भक्तदर्शन और खादी प्रेम
18 फरवरी 1931 को शिवरात्रि के दिन भक्तदर्शन का विवाह जब सावित्री जी से हुआ था, तब उनकी जिद के कारण सभी बारातियों ने खादी वस्त्र पहने थे। उन्होंने न वर के रूप में पारम्परिक मुकुट धारण किया और न ही शादी में कोई भेंट स्वीकार की। देशभक्ति का जुनून उन पर इतना था कि शादी के अगले दिवस ही वे स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए चल दिए, इसी दौरान संगलाकोटी में ओजस्वी भाषण देने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। यदि भक्तदर्शन आज के समय में ऐसा करते तो कॉन्ग्रेस द्वारा दिहाड़ी रोजगार पर रखे गए सस्ते कॉमेडियन और मीडिया गिरोह उन्हें ‘हायपर नेशनलिज़्म’ और ‘देशभक्त’ कहकर चुटकुले जरूर बनाते।
इसके बाद भक्तदर्शन ने ‘गढ़देश’ के सम्पादकीय विभाग में कार्य किया। ‘कर्मभूमि’ पत्रिका लैंसडौन में वो 1939 से 1949 तक सम्पादक रहे। प्रयाग से प्रकाशित ‘दैनिक भारत’ के लिए काम करने के कारण उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। वे कुशल लेखक थे। उनकी लेखन शैली व सुलझे विचारों का पाठकों पर बड़ा प्रभाव पड़ता था। भक्तदर्शन 1945 में गढ़वाल में कस्तूरबा गाँधी राष्ट्रीय स्मारक निधि और आजाद हिन्द फौज के सैनिकों हेतु निर्मित कोष के संयोजक रहे। उन्होंने प्रयत्न कर आजाद हिन्द फौज के सैनिकों को भी स्वतंत्रता सेनानियों की तरह पेंशन व अन्य सुविधाएँ दिलवाई थीं।
भक्तदर्शन बन चुके थे गढ़वाल सीट पर कॉन्ग्रेस की जीत का पर्याय
आजादी के बाद 1951 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में भक्तदर्शन गढ़वाल सीट से कॉन्ग्रेस के टिकट पर पहली बार सांसद चुने गए, जिसमें उन्होंने 68.81% मत प्राप्त कर शानदार जीत दर्ज की। वर्ष 1951-52 में उन्होंने लोकसभा में गढ़वाल सीट का प्रतिनिधित्व किया। उस समय गढ़वाल सीट में मुरादाबाद तक का क्षेत्र शामिल था, इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और कुल 4 बार इस सीट पर जीत दर्ज की। 1957, 1962, 1967 के लोकसभा चुनाव में भक्तदर्शन बार-बार चुनाव जीतते गए।
भक्तदर्शन के रूप में गढ़वाल लोकसभा सीट कॉन्ग्रेस की जीत का पर्याय बन चुकी थी। वह भक्तदर्शन की राजनीति का स्वर्णिम दौर था। देश की राजनीति में उनका तगड़ा दखल था। नेहरू कैबिनेट में वे केंद्रीय शिक्षा मंत्री तक रह चुके थे। केन्द्रीय शिक्षामंत्री के रूप में उन्होंने केन्द्रीय विद्यालयों की स्थापना करवाई और केन्द्रीय विद्यालय संगठन के पहले अध्यक्ष रहे। अपने व्यक्तित्व के कारण वर्ष 1963 से 1971 तक वे जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री व इंदिरा गाँधी के मंत्रिमंडलों के सदस्य रहे।
हिंदी भाषा प्रेमके कारण जवाहरलाल नेहरू को किया था ‘ट्रॉल’
गाँधी जी के हिन्दी के प्रति प्रेम और उन्हीं के विचारों से प्रेरित होकर भक्तदर्शन ने केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की स्थापना कराई थी। दक्षिण भारत व पूर्वोत्तर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में उनका अद्वितीय योगदान रहा। वे ओजस्वी वक्ता थे और इतना सुन्दर बोलते थे कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे। संसद में वे हिन्दी में ही भाषण देते थे और प्रश्नों का उत्तर भी हिन्दी में ही देते थे। एक बार जवाहरलाल नेहरू ने डॉ. भक्तदर्शन को टोका तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक टालते हुए जवाब दिया, “मैं आपके आदेश का जरूर पालन करता, परन्तु मुझे हिन्दी में बोलना उतना ही अच्छा लगता है, जितना अन्य विद्वानों को अंग्रेजी में।”
प्रियंका गाँधी की ‘दादी’ को कह दिया था, “No मने No”
इंदिरा गाँधी का रुतबा और छवि ऐसी थी कि बड़े-बड़े नेता भी उनसे आँख मिलाकर बात करने में घबराते थे। लेकिन वो पहाड़ी ही क्या, जो अपनी ‘चौड़ाई’ में न रहे। 1971 में भक्तदर्शन ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का विचार किया। इस पर इंदिरा गाँधी चाहती थीं कि भक्तदर्शन लोकसभा चुनाव लड़ें और उनको संन्यास लेने से मना किया क्योंकि इस समय भक्तदर्शन अपने राजनीतिक करियर के शीर्ष पर थे। अपने सिद्धान्तों के धुनी भक्तदर्शन ने इंदिरा गाँधी को यह कह कर एक ही बार में मना कर दिया कि उनकी उम्र अब सक्रिय राजनीति में रहने की नहीं रह गई है। उनका मानना था कि नए लोगों को राजनीति में मौका दिया जाना चाहिए।
भक्तदर्शन ने 1971 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। जब भक्तदर्शन का सक्रिय राजनीति से मोहभंग हुआ तो उनकी आयु मात्र 59 वर्ष थी। वे उन दुर्लभ राजनेताओं में थे, जिन्होंने उच्च पद पर रह कर स्वेच्छा से राजनीति छोड़ी। जीवन पर्यन्त, एक लम्बे समय तक राजनीति के शीर्ष पर रहने के बावजूद वे बेदाग निकल आए।
आज की राजनीति में नए लोगों को मौका देने की बातें तो खूब होती हैं, लेकिन इन पर अमल करने वाले कम ही उदाहरण मिलते हैं। लेकिन भक्तदर्शन ने इंदिरा गाँधी से जो कहा, उसे जीवन भर निभाया। एक बार सक्रिय राजनीति से मुँह फेरा, तो फिर उस ओर झाँका तक नहीं।
प्रेरणाशील व्यक्ति अपने साधन और मार्ग तलाश लेता है। राजनीति से संन्यास लेने के पश्चात् उन्होंने अपना सारा जीवन शिक्षा व साहित्य की सेवा में लगा दिया। वे एक लोकप्रिय जनप्रतिनिधि थे। जिस किसी पद पर भी वे रहे, उन्होंने निष्ठा व ईमानदारी से कार्य किया। महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व का प्रभाव उनके जीवन के हर भाग में आया, वे सादा जीवन और उच्च विचार के जीवन्त उदाहरण बने रहे। बड़े से बड़ा पद प्राप्त होने पर भी अभिमान और लोभ उन्हें छू न सका। वे ईमानदारी से सोचते थे, ईमानदारी से काम करते थे। निधन के समय भी डॉ. दर्शन किराए के मकान में रह रहे थे। आजीवन किसी दबाव पर अपनी सत्यनिष्ठा छोड़ने को वे कभी तैयार नहीं हुए।
1972 से 1977 तक भक्तदर्शन खादी बोर्ड के उपाध्यक्ष रहे और 1972 से 1977 तक कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर आसीन रहे। 1988-90 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष रहे और दक्षिण भारत के अनेक हिन्दी विद्वानों को उन्होंने सम्मानित करवाया। हिन्दी और भारतीय भाषाओं के लेखकों की पुस्तकों का अनुवाद करवाया और उनके प्रकाशन में सहायता की।
डॉ. भक्तदर्शन ने अनेक उपयोगी ग्रंथ लिखे और सम्पादित किए। इनमें श्रीदेव सुमन स्मृति ग्रंथ (श्रीदेव सुमन ने टिहरी में प्रजा मंडल आंदोलन द्वारा जनता को ब्रिटिश सरकार के एहसानों में दबी राजशाही के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी), गढ़वाल की दिवंगत विभूतियाँ (दो भाग), कलाविद मुकुन्दी लाल बैरिस्टर, अमर सिंह रावत एवं उनके आविष्कार तथा स्वामी रामतीर्थ पर आलेख प्रमुख हैं। इसीलिए डॉ. भक्तदर्शन को मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया था। 79 वर्ष की उम्र में अप्रैल 30, 1991 को देहरादून में डॉ. भक्तदर्शन का निधन हो गया।
वर्तमान समय में जरूरी है उन हस्तियों को याद किया जाना, जिन्होंने समाज में उदाहरण पेश किए कि यदि व्यक्ति अपने कार्य के प्रति समर्पित, लग्नशील और ईमानदार है तो वह निडर होकर परिस्थितियों का सामना कर समाज के लिए मिसाल बन जाता है।
होली नज़दीक है तो होलिका दहन की बात भी होगी। प्रह्लाद की याद भी लोगों को आएगी, जिन्हें नहीं याद आया उन्हें इस कहानी में छुपे किसी तथाकथित नारीविरोधी मानसिकता की याद दिला दी जायेगी। कभी-कभी होलिका को उत्तर प्रदेश का घोषित कर के इसमें दलित विरोध और आर्यों के हमले का मिथक भी गढ़ा जाता है। ऐसे में सवाल है कि प्रह्लाद को किस क्षेत्र का माना जाता है? आखिर किस इलाक़े को पौराणिक रूप से हिरण्याक्ष-हिरण्यकश्यप का क्षेत्र समझा जाता था?
वो इलाक़ा होता था कश्यप-पुर जिसे आज मुल्तान नाम से जाना जाता है। ये कभी प्रह्लाद की राजधानी थी। यहीं कभी प्रहलादपुरी का मंदिर हुआ करता था जिसे नरसिंह के लिए बनवाया गया था। कथित रूप से ये एक चबूतरे पर बना कई खंभों वाला मंदिर था। अन्य कई मंदिरों की तरह इसे भी इस्लामिक हमलावरों ने तोड़ दिया था। जैसी कि इस्लामिक परंपरा है, इसके अवशेष और इस से जुड़ी यादें मिटाने के लिए इसके पास भी हज़रत बहाउल हक़ ज़कारिया का मकबरा बना दिया गया। डॉ. ए.एन. खान के हिसाब से जब ये इलाक़ा दोबारा सिक्खों के अधिकार में आया तो 1810 के दशक में यहाँ फिर से मंदिर बना।
मगर जब एलेग्जेंडर बर्निस इस इलाक़े में 1831 में आए तो उन्होंने वर्णन किया कि ये मंदिर फिर से टूटे-फूटे हाल में है और इसकी छत नहीं है। कुछ साल बाद जब 1849 में अंग्रेजों ने मूल राज पर आक्रमण किया तो ब्रिटिश गोला किले के बारूद के भण्डार पर जा गिरा और पूरा किला बुरी तरह नष्ट हो गया था। बहाउद्दीन ज़कारिया और उसके बेटों के मकबरे और मंदिर के अलावा लगभग सब जल गया था। इन दोनों को एक साथ देखने पर आप ये भी समझ सकते हैं कि कैसे पहले एक इलाक़े का सर्वे किया जाता है, फिर बाद में कभी दस साल बाद हमला होता है। डॉक्यूमेंटेशन, यानि लिखित में होना आगे के लिए मदद करता है।
एलेग्जेंडर कन्निंगहम ने 1853 में इस मंदिर के बारे में लिखा था कि ये एक ईंटों के चबूतरे पर काफी नक्काशीदार लकड़ी के खम्भों वाला मंदिर था। इसके बाद महंत बावलराम दास ने जनता से जुटाए 11,000 रुपए से इसे 1861 में फिर से बनवाया। उसके बाद 1872 में प्रहलादपुरी के महंत ने ठाकुर फ़तेह चंद टकसालिया और मुल्तान के अन्य हिन्दुओं की मदद से फिर से बनवाया। सन 1881 में इसके गुम्बद और बगल के मस्जिद के गुम्बद की ऊँचाई को लेकर दो समुदायों में विवाद हुआ जिसके बाद दंगे भड़क उठे।
दंगे रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कुछ नहीं किया। इस तरह इलाके के 22 मंदिर उस दंगे की भेंट चढ़ गए। मगर मुल्तान के हिन्दुओं ने ये मंदिर फिर से बनवा दिया। ऐसा ही 1947 तक चलता रहा जब इस्लाम के नाम पर बँटवारे में पाकिस्तान हथियाए जाने के बाद ज्यादातर हिन्दुओं को वहाँ से भागना पड़ा। बाबा नारायण दास बत्रा वहाँ से आते समय भगवान नरसिंह का विग्रह ले आए। अब वो विग्रह हरिद्वार में है। टूटी-फूटी, जीर्णावस्था में मंदिर वहाँ बचा रहा। सन 1992 के दंगे में ये मंदिर पूरी तरह तोड़ दिया गया। अब वहाँ मंदिर का सिर्फ अवशेष बचा है।
सन 2006 में बहाउद्दीन ज़कारिया के उर्स के मौके पर सरकारी मंत्रियों ने इस मंदिर के अवशेष में वजू की जगह बनाने की इजाजत दे दी। वजू मतलब जहाँ नमाज पढ़ने से पहले नमाज़ी हाथ-पाँव धो कर कुल्ला कर सकें। इसपर कुछ एन.जी.ओ. ने आपत्ति दर्ज करवाई और कोर्ट से वहाँ वजू की जगह बनाने पर स्टे ले लिया। अदालती मामला होने के कारण यहाँ फ़िलहाल कोई कुल्ला नहीं करता, पाँव नहीं धोता, वजू नहीं कर रहा। वो सब करने के लिए बल्कि उस से ज्यादा करने के लिए तो पूरा हिन्दुओं का धर्म ही है ना! इतनी छोटी जगह क्यों ली जाए उसके लिए भला?
बाकी, जब गर्व से कहना हो कि हम सदियों में नहीं हारे, हज़ारों साल से नष्ट नहीं हुए तो अब क्या होंगे ? या ऐसा ही कोई और मुंगेरीलाल का सपना आये, तो ये मंदिर जरूर देखिएगा। हो सकता है शेखुलर नींद से जागने का मन कर जाए।
महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में रसूख रखने वाले मोहित पाटील परिवार के रणजीत सिंह ने फैसला किया है कि वह NCP को छोड़कर आज बुधवार (मार्च 20, 2019) को भाजपा में शामिल हो जाएँगें। रणजीत सिंह महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री विजय सिंह के बेटे हैं। रणजीत के इस कदम को एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार और कॉन्ग्रेस के गठबंधन के लिए बड़ा झटका बताया जा रहा है।
रणजीत ने अपने हजारों समर्थकों के सामने इसकी घोषणा की है कि वह राज्य मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की उपस्थिति में वानखेडे स्टेडियम के गरवारे हॉल में बीजेपी में शामिल होंगे। इसके साथ ही उन्होंने NCP के पद से इस्तीफ़ा देने की भी घोषणा कर दी है।
यहाँ बता दें कि साल 2014 में मोदी लहर होने के बावजूद भी रणजीत के पिता विजय सिंह ने माढा से चुनावों को जीता था। लेकिन, हाल ही में यहाँ से शरद पवार ने चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी। जिसके कारण उन्होंने सीट छोड़ने का फैसला ले लिया। लेकिन जब शरद के पीछे हटने के बाद भी उनको वहाँ से उम्मीदवार नहीं बनाया गया और पूर्व आईएएस प्रभाकर देशमुख के नाम को आगे किया गया तो पूरा पाटील परिवार पार्टी से काफ़ी नाराज़ हो गया।
#DECISION2019 | This comes a week after Sujay Vikhe Patil, the son of Maharashtra Leader of Opposition Radhakrishna Vikhe Patil, joined the BJPhttps://t.co/fgma89KXsx
इसके अलावा अभी हाल ही में आज तेलंगाना में कॉन्ग्रेस पार्टी को एक और बड़ा झटका लगा है। जहाँ बंगाल से लेकर गुजरात तक पार्टी के नेता लगातार दूसरे दलों में शामिल हो रहे हैं, तेलंगाना में पूर्व मंत्री डीके अरुणा ने भी भाजपा का दामन थाम लिया है। डीके अरुणा तेलंगाना की एक शक्तिशाली राजनीतिक परिवार से आती हैं और उनका परिवार 1957 से ही गडवाल की राजनीति का एक अहम हिस्सा रहा है। अरुणा के भाजपा के टिकट पर महबूबनगर से चुनाव लड़ने का क़यास लगाए जा रहे हैं। भाजपा में शामिल होने के बाद अरुणा ने कहा:
“तेलंगाना में कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए थोड़ी भी उम्मीदें नहीं बचीं हैं और अपने लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए मैंने भाजपा में शामिल होने का निर्णय लिया है। भाजपा सत्ता में वापस लौटेगी और नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे।”
मीडिया ने अपनी तरफ से कसर नहीं छोड़ी है कैम्पेनिंग में। लगातार नए झूठ बनाए गए, विचित्र तरह के सवाल उठाए गए, लेकिन हर तरफ से लगातार मुँह की खाने के बाद भी मीडिया ने मोदी को किसी भी तरह नीचे लाने के लिए अपनी रचनात्मकता, जिसे अंग्रेज़ी में क्रिएटिविटी कहते हैं, नहीं छोड़ी। हमने और आपने पिछले कुछ समय में ‘मोदी की जगह गडकरी’ वाली बात ज़रूर सुनी होगी।
ये वही मीडिया है, और ये वही लम्पटों का समूह है जो मोदी को घेरने के लिए एक हाथ पर यह कहता है कि विकास नहीं हुआ है, रोजगार कहाँ हैं, और दूसरे हाथ पर, फिर से मोदी को ही घेरने के लिए ही, यह कहता है कि गडकरी ने सही काम किया है, उसका काम दिखता है।
ये बात मैं भी मानता हूँ कि मैंने मोदी को किसी भी हाइवे पर बेलचा लेकर गिट्टी और कोलतार के मिक्सचर को उड़ेलते हुए नहीं देखा। न ही मैंने मोदी को किसी भी जगह कोलतार के ड्रम के नीचे आग लगाकर उसे गर्म करता देखा। मीडिया ने भी नहीं देखा, वरना कहते कि वो समुदाय विशेष वालों को जलाने के लिए ऐसा कर रहा है।
ख़ैर, जब मोदी ने न तो कोलतार खौलाया, न ही गिट्टी वाला मिक्सचर डाला, तो फिर इन्फ़्रास्ट्रक्चर बनाने का श्रेय मोदी को कैसे जाएगा?
तो बात यह है कि काम किया है गडकरी ने, इसलिए उसको प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए, ऐसी बात स्टूडियो में गम्भीर चेहरा बनाकर, लोकतंत्र को हर रात मारने के बाद, माउथ टू माउथ देकर अगले दिन फिर से मारने के लिए ज़िंदा करने वाले एंकर लगातार करते दिख जाते हैं। एंकर न भी दिखे तो माओवंशी लम्पट पत्रकार गिरोह आँखों में चमक लिए, ऐसा कहता, लिखता, या बोलता नज़र आ ही जाता है।
इसका उद्देश्य कोई देश सेवा नहीं है। इसका उद्देश्य यह क़तई नहीं है कि उन्हें सच में लगता है कि मोदी की जगह गडकरी बेहतर होगा। नहीं, इसका उद्देश्य बस इतना है कि किसी तरह भाजपा भीतर से टूटने लगे। भला पीएम बनने की लालसा किसे नहीं होती? स्टूडियो में बैठा पत्रकार भी पद्मश्री पाने के बाद, अपने आप को राज्यसभा के माध्यम से पीएम की कुर्सी पर पहुँचने का सपना ज़रूर देख लेता है।
ऐसे में किसी नेता को यह बताना कि तुम्हारी क़ाबिलियत मोदी से ज्यादा है, और तुम्हें मीडिया का भी समर्थन हासिल है, यह एक ऐसा ऑफ़र है, जो वन कान्ट रिफ्यूज टाइप का है। आप जरा सोचिए इस बात को ठीक से कि इसके पीछे की मंशा क्या हो सकती है। नितिन गडकरी एक ऐसे मंत्री हैं जो भाजपा अध्यक्ष रह चुके हैं, मंत्रालय का काम हर शहर और गाँव में दिख रहा है, भाजपा के उन चुनिंदा मंत्रियों में हैं जिनके बारे में मीडिया और सोशल मीडिया ऑर्गेनिकली लिखता है।
ये एक तरीक़ा होता है एकता को तोड़ने का। लेकिन मीडिया यहाँ पर एक गलती कर रहा है। ‘दो सिगरेट हैं आपके पास और माचिस/लाइटर न हो, तो कैसे जलाएँगे’ वाले चुटकुले में आपको एक सिगरेट की बड़ाई करनी होती है और दूसरा ईर्ष्या से जल जाता है। मीडिया का लाइन यही है कि किसी तरह इस पार्टी के कोर ग्रुप में दरार पैदा करो, और महात्वाकांक्षा अपना काम कर देगी।
मीडिया यह भूल गई कि भाजपा उन मूल्यों से चलने वाली पार्टी नहीं है जिसमें इस तरह की बचकानी बातों से दरार आ जाए। जब मोदी राष्ट्रीय राजनीति में नहीं थे, तब उन्हें भाजपा ने नेतृत्व दिया था। अब तो उनके पास अनुभव है, हर तरह के काम हैं दिखाने के लिए, और जनता में स्वीकार्यता है, तब फिर भाजपा के भीतर कौन ऐसा मूर्ख होगा जो उससे अलग होकर अपनी सीट गँवाना चाहेगा?
जब मैं सीट गँवाने की बात करता हूँ तो मैं बहुत गम्भीर हूँ। सीट गँवाने से मतलब यह है कि जनता के लिए मोदी और भाजपा एक हैं, सरकार ‘मोदी सरकार’ के रूप में ज़्यादा प्रसिद्ध है, न कि राजग सरकार के रूप में। इसमें बहुत लोग तानाशाही खोज निकालेंगे, उनके लिए आयुष्मान योजना का प्रावधान है। मोदी सरकार का मतलब यह है कि सरकार और उसके मंत्रियों ने मिलकर ऐसा काम किया है कि कैबिनेट पार्टी के नाम से ऊपर, अपनी नेतृत्व क्षमता के बल पर उभर का सामने आ रहा है।
तो, इस भ्रम में रहना कि गडकरी का नाम दस बार फेंककर वो गडकरी को मोदी के विरोध में खड़ा कर लेंगे, या मजबूर कर देंगे कि NDA के बाकी नेता मोदी से अलग जाकर, गडकरी के साथ हो जाएँ, ऐसा कहना या सोचना मानसिक कमजोरी है। इसका मतलब है कि आपको राजनीति और मानवीय भावों को परखना नहीं आता।
जब बाकी दलों के नेता मोदी-शाह के कारण भाजपा में आना चाह रहे हैं, तो यह सोचना कि चुनावों के बाद कम सीट पड़ जाने पर कोई इन दोनों को मजबूर कर देगा, ये सस्ते नशे से उपजा हुआ विचार है। मोदी और शाह मजबूर नहीं होते, उनके जलवे से बाकी लोग मजबूर होकर भाजपा में आ रहे हैं। आप उन दो व्यक्तियों की संगठन क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं जिन्होंने अल्पमत के बावजूद सरकारें बना रखी हों!
अब बात आती है कि क्या भाजपा को वाक़ई में बहुमत नहीं मिल पाएगा? संभव है कि ऐसा हो जाए। संभव है कि कर्नाटक की तरह केन्द्र में भी यूपीए की सरकार बनकर आ जाए जिसमें हर पार्टी की साझेदारी हो। और संभव है कि भाजपा को तीन सौ से ज़्यादा सीटें मिल जाएँ। संभव कुछ भी है, लेकिन मीडिया संभव की संभावना को प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही।
बाद में 220 सीट मिले, यह एक संभावना है, लेकिन अभी से ही यह तय कर दिया जाए कि बाद में 220 सीट ही मिले, इसे सधा हुआ कैलकुलेशन कहते हैं। यहाँ आप विचारों से संभावना को निश्चितता की तरफ ढकेलते नज़र आते हैं। यहाँ आप डेस्पेरेशन में एक दाँव खेलते हैं कि लेट्स थ्रो सम शिट् ऑन द वाल एंड सी व्हाट स्टिक्स!
लेकिन, जब दीवार पर आपने फेंकी ही टट्टी है, तो चिपककर कुछ रह ही गया, तो उसका क्या हो पाएगा! अब उम्मीद का क्या करें, आशा पर ही जीवन चलता है। मीडिया यही आशा कर रहा है। मठाधीश लगे हुए हैं कि किसी तरह एक काल्पनिक बात को मेनस्ट्रीम किया जाए, और लोगों के बीच इस पर चर्चा चलाई जाए।
इसके केन्द्र में एक और ढकोसला है कि मोदी की छवि हार्ड कोर हिन्दुत्व नेता की तरह है, और कुछ लोग थोड़ा माइल्ड नेतृत्व चाहते हैं। पहली बात तो यह है कि मोदी हार्ड कोर हिन्दू ही नहीं बन पाया, और उसके कारण गाली भी खूब सुन रहा है। दूसरी बात यह है कि माइल्ड और अल्ट्रामाइल्ड सिगरेट होता है, सत्ता के नेतृत्व का एक ही ध्येय होता है: सत्ता पाना, सत्ता में होना, सत्ता को पास रखना, और हर बार सत्ता में आना।
मोदी के समर्थक तो चाहते हैं कि वो थोड़ा हार्डकोर हो। वो तो इस बात से नाराज हो जाते हैं कि वो ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात मोदी क्यों करता है जबकि समुदाय विशेष तो उसे वोट देने से रहा। कुछ समर्थकों ने इस पर कई बार सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी बात रखी है कि मोदी को हिन्दुओं की बात करनी चाहिए क्योंकि हिन्दुओं ने उसे जिताया है।
इसलिए हार्ड और सॉफ़्ट वाला लॉजिक एकेडेमिक डिबेट और डीटैच्ड लॉजिक वाले पैनल डिस्कशन में खूब चलता है। इन लोगों ने जानबूझकर यह सोच रखा है कि जनता यही सोचती है। लेकिन, जनता क्या सोचती है, उसके लिए बाहर निकलना पड़ता है।
खैर, नितिन गडकरी को सच्चाई पता है, और उन्हें अपनी सीमाओं का भी भान है। इसलिए वो ऐसी अफ़वाहों को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं कि भाजपा में एक ऐसा ग्रुप है जो चाहता है कि मोदी को 220 सीटें मिलें ताकि गडकरी को पीएम बनाया जाए। इसके भीतर का एक अनकहा लॉजिक यह बताया जाता है कि मोदी किसी को पैसा बनाने नहीं दे रहा, इसलिए मंत्री सत्ता तो चाहते हैं लेकिन प्रधानमंत्री की जगह मोदी को छोड़कर किसी और को चाहते हैं।
ये लॉजिक नहीं है, ये लम्पटों के भीतर बैठा चोर है जो सही चलती व्यवस्था पर विश्वास ही नहीं कर पा रहा कि कॉन्ग्रेस काल की डकैती क्यों नहीं हो पा रही। अब उनके पास कोसने के लिए रवीश जैसे लोगों के पास जो सवाल बचे हैं उनमें से प्रमुख यह हैं कि ‘आप मोदी से सवाल पूछिए कि कितने कपड़े पहने थे, रैलियों के डिज़ायनर कपड़े कहाँ से आते हैं।’ मैं मजाक नहीं कर रहा, द वायर के एक कार्यक्रम में सरकार से सवाल पूछने को उकसाते हुए रवीश ने यही सवाल पूछने को कहा था।
इसलिए चिल मारिए। टीवी खूब देखा कीजिए, सोशल मीडिया पर खूब लिखिए। जो मन में आता है लिखिए। ये समय चुप रहने का नहीं है। लिखना नहीं आता, तो बोलिए।अगर आपके कारण पाँच आदमी प्रभावित हो रहा है, तो कीजिए। चाहे आप जिस विचारधारा से चलते हों, तर्क का दामन मत छोड़िए। थोड़ा दिमाग लगाइएगा तो पता चल जाएगा कि मीडिया आपको कैसे प्रभावित करने की कोशिश में है।
जब मीडिया नितिन गडकरी को, इंटरव्यू के लिए समय लेने के बाद, इस तरह से भटकाने की कोशिश करता है, तो आप तो फिर भी आम जनता कहलाते हैं।
इस बात में कोई दोराय नहीं कि नरेन्द्र मोदी के मुकाबले में आज कोई राष्ट्रीय रूप से पहचाने जा सकने वाला नेता है तो वह कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ही हैं। हालाँकि इसमें उनकी खुद की मेहनत शायद ही है। मेहनत अगर किसी का है तो वो उनके खानदान का है और उससे भी ज्यादा योगदान कुलीनतंत्र यानि Oligarchy की मलाई काटने के आदी हो चुके मीडिया के समुदाय विशेष का।
मोदी के सामने राहुल गाँधी की न तो उपलब्धियों की कोई ऐसी गंभीर फेहरिस्त है, न ही कोई ऐसी ‘गेम-चेंजिंग’ वैकल्पिक विचारधारा या योजना। बावजूद इसके, मीडिया के एक धड़े ने 5 साल तक यह उम्मीद नहीं छोड़ी कि कभी तो राहुल गाँधी उनके तारणहार बनेंगे! राहुल 2.0, 2.5, चिर-युवा- कोई ‘रूप’ नहीं बचा, जिसका आह्वाहन नहीं किया।
और अब जबकि इस सारी मेहनत के बाद अंततः लोगों ने राहुल गाँधी को थोड़ा-बहुत गंभीरता से लेना शुरू किया, लगा कि चलो 5 साल की मेहनत बर्बाद नहीं होगी- गठबंधन के कंधे पर सवार होकर राहुल गाँधी किसी तरह सरकार शायद बना लेंगे, और इतने ‘इन्वेस्टमेंट’ पर कुछ तो ‘रिटर्न’ बन ही जाएगा! पर राहुल गाँधी हैं कि गठबंधन पक्का करने में देर किए जा रहे हैं, और मोदी-शाह इस देरी का फायदा ले रहे हैं। ज़ाहिर सी बात है कि मीडिया के एक धड़े में कॉन्ग्रेस की संभावित हार को लेकर अफरा-तफरी का माहौल है।
नीचे इन ट्वीट्स में जो चिंता है, वह किसी नेता या घोषित आग्रह वाले व्यक्ति की हो तो कोई आपत्ति नहीं हो सकती। पर निष्पक्षता का छद्म आवरण ओढ़कर पत्रकारिता के नाम पर राजनीति करने वालों को कम-से-कम आवरण का तो लिहाज करना चाहिए था।
Every single non Congress opposition leader I’ve spoken to in recent days is befuddled, exasperated and angry at the Congress Party refusal to close alliances. Advantage Modi. https://t.co/1u932zppHi
पर शायद राहुल गाँधी की जीत और मोदी की हार पर इन्होंने इतना कुछ ‘दाँव’ पर लगा दिया है कि अब खुलकर अपनी असलियत दिख जाने की कीमत पर भी भाजपा को हराने की हिमायत करना इनकी मजबूरी है।
NDA to announce Bihar candidates tomorrow but UPA still a divided house there. Tejashwi’s veiled attack on Congress says the same thing as other allies have been saying: Congress is not fighting to defeat Modi. https://t.co/dwZtngOb90
इस वार्तालाप का तो आधार ही मोदी को हराने की दिशा में क्या सही हो रहा है और कहाँ और ‘मेहनत’ करनी होगी, इस पर चर्चा है। (Click कर के पूरा वार्तालाप पढ़िए, और खुद तय करिए)
Need for nuance on Congress alliances: 1 Jharkhand, Kar, TN: Deal Done 2 UP: Neither side really wanted it 3 AP, WB: Alliance wont help much 4 Bihar, Maha, J&K: old alliances which should’ve been sealed by now 5 Delhi: Alliance can help, party seems confused 4&5 are main problem
पत्रकारों का अपने काम की परिभाषा, यानि हो रही घटनाओं को यथास्थिति पत्रांकित करने, से आगे जाकर राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप आज का नहीं है। इसकी जड़ें शायद सत्ता और पत्रकारिता जितनी ही पुरानी होंगी। फिर कई सारे महान नेताओं ने भी अपने राजनितिक करियर की शुरुआत पत्रकारिता से की थी- वाजपेयी, प्रणब मुखर्जी, भगत सिंह, बोस, आडवाणी, और पत्रकारिता के gold-standard गणेश शंकर विद्यार्थी।
पर इन सभी ने तो अपने राजनीतिक आग्रह कभी छिपाए नहीं, खुल कर एजेण्डा अखबारों में एजेण्डा पत्रकारिता की। कई अन्य पत्रकारों ने यथासंभव निष्पक्ष पत्रकरिता करते हुए भी अपनी निजी पसंद-नापसंद भी बता दी ताकि उनके पाठक उनसे प्रभावित हुए बगैर तथ्यों के आधार पर निर्णय करें।
लेकिन नहीं! पत्रकारिता का यह समुदाय विशेष इन लोगों के ठीक उलट है। यह पत्रकारिता को तो केवल जरिये के तौर पर इस्तेमाल करता है- असली मकसद होता है पहले पाठकों के बीच अपना एक प्रभाव-क्षेत्र कायम करना, और फिर उस प्रभाव क्षेत्र का प्रयोग कर उन नेताओं का एजेण्डा आगे बढ़ाना, जो इस प्रभाव-मण्डल की कीमत दे सके।
हमारी बात पर यकीन न हो तो कॉन्ग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड में छपे इस लेख को देख लीजिए जिसमें कैसे इस कैंसर की कहानी सुनाई गई है।
मोदी ने इस पर रोक लगा दी थी- इसी का दुःख है जो छलक-छलक कर बाहर आ रहा है।
अब न तो कोई खबर चलाने के पैसे आ रहे थे, न दबाने के। यहाँ तक कि कैबिनेट नोटों की जिस ‘सप्लाई’ के ज़रिए ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ की सनसनीबाजी चलती थी, मोदी उस छेद को भी अगर बंद नहीं कर पाए तो बहुत छोटा जरूर कर दिया। राजदीप सरदेसाई का वो दर्द याद है कि अब प्रधानमंत्री के विशेष विमान में वीआईपी बनकर चलने नहीं मिलता??
तीसरी मलाई जो पहले कटती थी और अब बंद हो गई, वो है सत्ता की दलाली यानि ‘पावर-ब्रोकिंग’ की। सरकारें बनवाने, गिरवाने, और बचाने में नेताओं के करीबी पत्रकारों की भूमिका पर कई लोगों ने काफी कुछ लिखा है। दिल्ली प्रेस क्लब ही ‘लुटियंस ज़ोन’ शब्द के नकारात्मक हो जाने के पीछे सबसे बड़ा कारक है। अर्णब गोस्वामी ने तो यहाँ तक कहा था कि भारत में मीडिया हाउसों को मुख्यालय दिल्ली के बाहर कर देना चाहिए- चाहे वे मुंबई या बंगलौर से चलें, चाहे बिहार या दक्षिण भारत के गाँवों से, पर सत्ता से पत्रकारों की करीबी टूटनी चाहिए।
2G घोटाले में भी इसी समुदाय विशेष की विशेष सदस्या द्रमुक और कॉन्ग्रेस के बीच संवाद-सेतु का काम करते पकड़ीं गईं थीं।
राहुल गाँधी को वापिस लाने के लिए यह बेचैनी शायद इसी ‘पावर-ब्रोकिंग’ संस्कृति को वापिस लाने की जद्दोजहद है।
नरेंद्र मोदी द्वारा वंशवाद को लेकर लिखे गए ब्लॉग प्रकाशित होने के बाद कॉन्ग्रेसी नेता बौखला गए हैं और उन्होंने प्रधानमंत्री को लेकर व्यक्तिगत और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करनी शुरू कर दी हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री तारिक़ अनवर ने नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत छींटाकशी करते हुए कहा कि वे इस तरह बोल रहे हैं क्योंकि उनका कोई वंश ही नहीं रहा है। उन्होंने पूछा कि जिसका कोई वंश ही न हो, वो कैसे ये बातें कह सकता है? उन्होंने कहा कि चूँकि मोदीजी को आगे भी अपना वंश बढ़ाना नहीं है, इसीलिए इस तरह की बातें कर रहे हैं। तारिक़ अनवर के इस बयान की निंदा करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने इसे ‘बिलकुल घिनौना बयान’ करार दिया। अनवर पाँच बार लोकसभा और 2 बार राज्यसभा के सांसद रह चुके हैं।
भाजपा ने कहा कि तारिक़ अनवर का बयान कॉन्ग्रेसी नेताओं की सामूहिक वंशवादी मानसिकता को दर्शाता है जो केवल एक परिवार की ही गुलामी करना जानते हैं। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अनवर के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि देश के 130 करोड़ लोग ही मोदी के परिवार हैं। ये भाजपा में ही है, जहाँ एक बूथ स्तरीय कार्यकर्ता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकता है। उन्होंने नितिन गडकरी और अमित शाह का उदाहरण देते हुए ऐसा कहा। प्रसाद ने प्रधानमंत्री के उस बयान की याद दिलाई, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन पर फेंके जाने वाले गलियों के पत्थर से वे आगे बढ़ने के लिए सीढ़ी बना लेते हैं।
उधर कर्णाटक कॉन्ग्रेस के विधायक बी नारायण राव ने भी पीएम पर ओछी टिप्पणी करते हुए उन्हें नामर्द बताया। विधायक ने कहा कि जो लोग शादी कर सकते हैं लेकिन बच्चे नहीं पैदा कर सकते, वे नामर्द हैं। उन्होंने कहा कि मोदी झूठ बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं, काम करने वाले नहीं। नारायण कर्णाटक के बसवकल्याण से विधायक हैं। बीदर लोकसभा क्षेत्र के भीतर आने वाले बसवकल्याण से बी नारायण ने 2018 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की थी।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ब्लॉग में कॉन्ग्रेस और वंशवादी राजनीति पर करारा वार किया है। पीएम ने लिखा कि 2014 के जनादेश को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि तब भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर वंशवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था। उन्होंने लिखा, ‘तब आम चुनाव में देशवासियों ने भ्रष्टाचार में डूबी उस सरकार से मुक्ति पाने और एक बेहतर भविष्य के लिए मतदान किया था। जब कोई सरकार ‘फैमिली फर्स्ट’ की बजाए ‘इंडिया फर्स्ट’ की भावना के साथ चलती है तो यह उसके काम में भी दिखाई देता है। यह हमारी सरकार की नीतियों और कामकाज का ही असर है कि बीते 5 वर्षों में भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है।’
आर्थिक भगोड़े नीरव मोदी को लंदन में गिरफ़्तार कर लिया गया है। थोड़ी देर में उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा। लंदन मेट्रोपोलिटन पुलिस ने यह कार्रवाई की है। उसे वेस्टमिंस्टर मेजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश किया जाएगा। वैसे, विश्लेषकों का मानना है कि उसे ज़मानत मिल जाने की संभावना है लेकिन उसके बाद प्रत्यर्पण के लिए सुनवाई शुरू हो जाएगी।
लंदन के वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने आर्थिक भगोड़े नीरव मोदी के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी किया था। एएनआई ने प्रवर्तन निदेशालय के सूत्रों के हवाले से यह सूचना दी थी। अंदेशा लगाया जा रहा था कि इसके बाद नीरव मोदी की कभी भी गिरफ़्तारी हो सकती है। दरअसल, बैंकों का 13000 करोड़ रुपया डकार कर फरार नीरव मोदी पिछले दिनों लंदन की सड़कों पर अपना लुक बदलकर निडर घूमता दिखा था। मीडिया के सवालों को उसने हँस कर टाल दिया था। उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी किया जा चुका था। इसके बाद ब्रिटेन की वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया और गिरफ़्तारी वॉरंट जारी किया था। अब उसे गिरफ़्तार भी कर लिया गया है। इसे भारत सरकार की एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।
इस दौरान भारत में प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई की टीमें लंदन स्थित सम्बंधित विभागों से लगातार संपर्क में थी। भारतीय हाई कमीशन को भी संपर्क में रखा गया है। हाल ही में लंदन की सड़कों पर नीरव मोदी के दिखने के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी बयान जारी किया था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा था कि नीरव मोदी के प्रत्यर्पण को लेकर कार्यवाही की जा रही है। उन्होंने कहा था कि लंदन में उनके दिखने का मतलब यह नहीं है कि उसे तुरंत भारत लाया जा सकता है। इसके लिए एक चरणबद्ध प्रक्रिया होती है, जिसे पूरी की जा रही है। अब उसकी गिरफ़्तारी के बाद सरकार ने राहत की साँस ली होगी।
#BREAKING: Nirav Modi arrested by London Metropolitan Police, two days after arrest warrant was issued by Westminster Magistrate’s Court. Police to produce him in Court at 15:30 IST. Modi to seek bail immediately. This kickstarts a lengthy hearing for extradition of Modi from UK.
भगोड़ा हीरा कारोबारी नीरव मोदी लंदन में शानो-शौकत की ज़िंदगी जी रहा था। नवभारत टाइम्स में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, वह लंदन के वेस्ट एंड इलाके के जिस अपार्टमेंट में रह रहा है, उसकी कीमत 73 करोड़ रुपए के आसपास है। नीरव मोदी ने अपने आवास से कुछ दूरी पर ही हीरे का नया कारोबार शुरू किया है, जो उसके फ्लैट से जुड़ा हुआ है। मई 2018 में उसने नई कंपनी बनाई थी, जो उसके अपार्टमेंट से लिंक्ड है। यह कंपनी घड़ी और जूलरी का होलसेल और रिटेल कारोबार करने के लिए लिस्टेड है। गिरफ़्तारी के बाद उसका प्रत्यर्पण भी हो सकता है।
ख़बर आई थी कि पंजाब नैशनल बैंक को ₹13000 करोड़ का चूना लगाने वाले भगोड़े हीरा कारोबारी के अवैध बंगले ध्वस्त किए जाएँगे। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में अलीबाग बीच के पास उसके ‘अवैध’ बंगले हैं, जिन्हें इसी सप्ताह ध्वस्त किया जाएगा। ये वही बंगले हैं जहाँ कभी नीरव भव्य पार्टियाँ दिया करता था। हाल ही में इस बंगले को कलेक्टर ऑफ़िस ने जाँच के बाद अवैध घोषित किया था।
साल 2002 के गोधरा मामले के आरोपित याकूब पटालिया को अहमदाबाद की एक विशेष एसआईटी अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। दरअसल, यह याकूब नाम का शख्स उसी भीड़ का हिस्सा था जिसने 27 फरवरी 2002 के दिन साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाई थी और जिस आग में 59 हिन्दुओं ने झुलसकर दम तोड़ दिया था।
2002 Godhra train burning case: A Special SIT Court in Ahmedabad sentences convict Yakub Pataliya to life imprisonment.
याकूब के ख़िलाफ़ सितंबर 2002 में ही एफआईआर दर्ज हुई थी। जिसके बाद उसपर हत्या की कोशिश समेत आईपीसी की विभिन्न धाराओं के साथ मुकदमे चलाए गए थे। इनकी सजा से बचने के लिए वह तब से भाग रहा था, लेकिन विगत वर्ष पुलिस ने 16 साल बाद याकूब को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की और 64 वर्षीय याकूब को मामले की जाँच में जुटी एसआईटी को सौंप दिया।
इससे पहले 2015 में इस मामले में याकूब के भाई कादिर को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन मामले की सुनवाई के दौरान ही कादिर की जेल में मौत हो गई थी।
At last a small justice for 2002 #godhra train victims, who were mercilessly burnt alive by these goons. And for those who blame outside factors for terrorism, none of their family members took to terrorism. https://t.co/2abO7Lc3Pt
बता दें कि अक्टूबर 2017 में गुजरात के उच्च न्यायलय ने इस पूरे कांड में 11 आरोपितों की मौत की सजा को उम्रकैद में बदला था, और साथ में 20 आरोपितों की उम्रकैद की सज़ा को बरकरार रखा था। वहीं निचली अदालत ने इस मामले में 31 आरोपितों को दोषी ठहराते हुए 63 को बरी कर दिया था।
साल 2002 में 27 फरवरी को साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में गुजरात के गोधरा स्टेशन पर समुदाय विशेष के कुछ लोगों ने आग लगा दी थी, जिसमें 59 लोगों की मौत हो गई थी। मृतकों में अधिकतर कार सेवक थे। इस घटना के बाद 28 फरवरी से 31 मार्च तक गुजरात में दंगे भड़के। जिसके कारण 1200 से अधिक लोग मारे गए थे और साथ ही 1500 लोगों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज हुई थी।