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रॉबर्ट वाड्रा को मिलना चाहिए भारत रत्न: भाजपा ने बुरे वक़्त में ‘दिया साथ’

बीजेपी ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के जीजा और प्रियंका वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा पर कटाक्ष करते हुए कहा है कि उन्हें भारत रत्न सम्मान से नवाजा जाना चाहिए। बीजेपी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से यह ट्वीट किया है।

भाजपा ने ट्विटर एकाउंट से ट्वीट में लिखा, “रॉबर्ट वास्तव में ईमानदार हैं। आपने स्वीकार किया कि आपने लूटा है, इसके लिए धन्यवाद। अब आप अपने परिवार के कोटे के मुताबिक भारत रत्न सम्मान के योग्य हैं।”

बीजेपी ने यह ट्वीट इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट को शेयर करते हुए किया, जिसमें रॉबर्ट वाड्रा ने अपने बयान में कहा था, “मैं इस देश में ही हूँ। ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्होंने देश को लूटा है और भाग गए। उनके खिलाफ क्या हुआ? मैं हमेशा इस देश में ही रहने वाला हूँ। मैं देश छोड़कर भी नहीं जा रहा हूँ और जब तक पूरे मामले से मेरा नाम नहीं हट जाता है, तब तक सक्रिय राजनीति में भी हिस्सा नहीं लूँगा।”

हाल ही में रॉबर्ट ने अपनी पत्नी प्रियंका के समान स्वयं भी सक्रिय राजनीति में आने का संकेत दिया था। लेकिन अब उन्होंने यह बयान भी दे दिया है कि वह जब तक अपने नाम पर लगे दाग को मिटा नहीं लेते तब तक राजनीति से नहीं जुड़ेंगे। फिलहाल के लिए बता दें कि दिल्ली की अदालत ने उनकी लंदन वाली संपत्ति पर चल रहे केस में मिलने वाली अंतरिम जमानत की तारीख़ को 19 मार्च तक के लिए बढ़ा दिया है।

UN ने ठुकराई आतंकी सरगना हाफिज़ सईद की माँग: बरकरार रहेगा एक आतंकवादी के रूप में प्रतिबंध

संयुक्त राष्ट्र ने हाफिज़ सईद पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध को हटाने की माँग ठुकरा दी है। आतंकी संगठन जमात-उद-दावा के सरगना हाफिज़ सईद ने संयुक्त राष्ट्र से यह माँग की थी कि उसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों के नाम की लिस्ट से हटाया जाए। लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने हाफिज की माँग को ठुकरा दिया। संयुक्त राष्ट्र ने 10 दिसंबर 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के कारण हाफिज़ सईद पर प्रतिबंध लगाया था।

2017 में सईद ने अपने ऊपर लगे प्रतिबंध को हटाने के लिए लाहौर स्थित लॉ फर्म के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र में अपील की थी। भारत के अलावा अमरीका, यूके और फ्रांस ने भी इस अपील का विरोध किया था। पाकिस्तान ने भी जमात उद दावा और उसके साथी संगठन फलह-ए-इंसानियत फाउंडेशन पर प्रतिबंध लगाने का नाटक किया था लेकिन हाफिज सईद पर कोई कार्रवाई नहीं की। सईद आतंकी संगठन लश्कर ए तय्यबा का भी संस्थापक है।

संयुक्त राष्ट्र की 1267 सेंक्शन कमेटी को हाल ही में जैश ए मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध भी प्राप्त हुआ है। जैश ए मोहम्मद ने पुलवामा में हुए आतंकी हमले की जिम्मेदारी ली थी।

पीटीआई की खबर के अनुसार संयुक्त राष्ट्र के इंडिपेंडेंट ओम्बुड्सपर्सन डेनियल किप्फर फासियाटि ने बताया कि उनके पास हाफिज़ सईद के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं जिनके आधार पर प्रतिबंध बरकरार रहेगा। भारत ने संयुक्त राष्ट्र को लश्कर ए तय्यबा से संबंधित अतिगोपनीय सूचनाएँ प्रदान की थीं जिनके आधार पर हाफिज सईद पर प्रतिबंध लगा रहेगा।

आतंकी यासीन मलिक के JKLF की कुंडली- मकबूल बट, मंदिर में नमाज, टिकालाल, जस्टिस नीलकंठ गंजू…

पृष्ठभूमि

कश्मीर घाटी से पंडितों का पलायन कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं थी। इसकी पटकथा सन 1965 में लिख दी गयी थी जब भारत-पाक युद्ध चल रहा था। यह स्मरण रहे कि सन ’65 का युद्ध जम्मू कश्मीर राज्य को पूरी तरह पाकिस्तान में मिलाने के उद्देश्य से लड़ा गया था किंतु पाकिस्तान इस उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया था क्योंकि तब तक कश्मीर में पाकिस्तान परस्ती और अलगाववाद का बीज नहीं बोया जा सका था। इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अगस्त 1965 में अमानुल्लाह खान और मकबूल बट ने पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर में ‘नेशनल लिबरेशन फ्रंट’ नामक अलगाववादी आतंकी संगठन बनाया था।

इस संगठन ने जून 1966 में मकबूल बट को ट्रेनिंग देकर नियन्त्रण रेखा के इस पार भेजा। छह सप्ताह बाद ही पुलिस से हुई एक मुठभेड़ में मकबूल बट ने सी० आई० डी० सब इंस्पेक्टर अमर चंद की हत्या कर दी। दो वर्ष बाद अगस्त 1968 में मकबूल बट को तत्कालीन सेशन जज नीलकंठ गंजू ने फाँसी की सजा सुनाई। किन्तु उसी वर्ष दिसम्बर में मकबूल बट अपने एक साथी के साथ जेल तोड़कर नियन्त्रण रेखा के उस पार भाग गया। वह 1976 में लौटा और इस बार उसने कुपवाड़ा में बैंक डकैती का असफल प्रयास किया और पकड़ा गया।

डकैती के प्रयास में उसने बैंक मैनेजर की हत्या की जिसके लिए उसे पुनः फाँसी की सजा हुई। मकबूल बट के पकड़े जाने के बाद उसके साथी आतंकवादी इंग्लैंड चले गये जहाँ उन्होंने 1977 में ‘जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ (JKLF) नामक संगठन बनाया। इसी संगठन से संबद्ध ‘नेशनल लिबरेशन आर्मी’ ने मकबूल बट को जेल से छुड़ाने के लिए फरवरी 1984 में भारतीय उच्चायुक्त रवीन्द्र म्हात्रे का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी। इस घटना के पश्चात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने तत्काल मकबूल बट को तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी थी।      

मकबूल बट को फाँसी दिए जाने के बाद के घटनाक्रम

सन 1984 में जिस दिन मकबूल बट को फांसी दी गयी थी उस दिन कश्मीर घाटी के लोगों पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की स्थापना को अभी एक दशक भी पूरा नहीं हुआ था। इस संगठन को अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते घाटी के लोगों में अपनी पैठ बनाने की आवश्यकता महसूस हुई। मकबूल बट को फाँसी दिए जाने के दो वर्ष पश्चात् सन 1986 में फारुख अब्दुल्लाह को हटाकर गुलाम मोहम्मद शाह जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बनाये गए।

शाह ने अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाते हुए जम्मू स्थित न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक प्राचीन मन्दिर परिसर के भीतर मस्जिद बनाने की अनुमति दे दी ताकि मुस्लिम कर्मचारी नमाज पढ़ सकें। इस विचित्र निर्णय के विरुद्ध जम्मू के लोग सड़क पर उतर आये जिसके फलस्वरूप दंगे भड़क गये। अनंतनाग में पंडितों पर भीषण अत्याचार किया गया, उन्हें बेरहमी से मारा गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया और उनकी संपत्ति व मकान तोड़ डाले गये। सन 1987 से जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की गतिविधियों में तेजी आई।

बाद के सालों में अलगाववादियों की दुष्प्रचार मशीनरी ने एक सुनियोजित षड्यंत्र रचकर पंडितों के विरुद्ध वैमनस्य फैलाना प्रारंभ कर दिया। यही कारण था कि जिस मकबूल बट को 1984 में कोई जानता नहीं था फरवरी 1989 में उसका ‘शहादत दिवस’ मनाने के लिए लोग सड़कों पर उतर आये थे। विश्वभर में सलमान रुश्दी की पुस्तक ‘सैटेनिक वर्सेज़’ का विरोध चरम पर था जिसकी आग कश्मीर तक भी पहुँची। परिणामस्वरूप 13 फरवरी को श्रीनगर में दंगे हुए जिसमें कश्मीरी पंडितों को बेरहमी से मारा गया।

पंडित टिकालाल टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या का उद्देश्य

पं० टिकालाल टपलू पेशे से वकील और जम्मू कश्मीर बीजेपी के अध्यक्ष थे। पं० टपलू आरंभ से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे तथा उदारमना व्यक्ति थे। पं० टपलू ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ाई की थी परंतु पैसे कमाने के लिए उन्होंने इस पेशे का कभी दुरुपयोग नहीं किया। वकालत से वे जो कुछ भी कमाते उसे विधवाओं और उनके बच्चों के कल्याण हेतु दान दे देते थे। उन्होंने कई मुस्लिम लड़कियों की शादियाँ भी करवाई थीं। पूरे हब्बाकदल निर्वाचन क्षेत्र में हिन्दू और मुस्लिम सभी पं टपलू का सम्मान करते थे तथा उन्हें ‘लाला’ अर्थात बड़ा भाई कह कर सम्बोधित करते थे।

उनकी यह छवि अलगाववादी गुटों की आँखों का काँटा थी क्योंकि पं० टिकालाल टपलू उस समय कश्मीरी पंडितों के सर्वमान्य और सबसे बड़े नेता थे। वास्तव में अलगाववादियों को घाटी में अपनी राजनैतिक पैठ बनाने के लिए कश्मीरी पंडितों के समुदाय को हटाना जरुरी था जो किसी भी कीमत पर पाकिस्तान का समर्थन नहीं करते। इसीलिए जम्मू कश्मीर लिबेरशन फ्रंट ने पंडितों के विरुद्ध दुष्प्रचार के विविध हथकंडे अपनाये। कश्मीर घाटी के कुछ लोकल अखबारों ने पंडित टिकालाल टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू समेत कई प्रतिष्ठित पंडितों के विरुद्ध दुष्प्रचार सामग्री प्रकाशित करना आरंभ कर दिया था।

आतंकियों ने पं० टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या की रणनीति बनाई। पं० टपलू को आभास हो चुका था कि उनकी हत्या का प्रयास हो सकता है इसीलिए उन्होंने अपने परिवार को सुरक्षित दिल्ली पहुँचा दिया और 8 सितम्बर 1989 को कश्मीर लौट आये। चार दिन बाद चिंक्राल मोहल्ले में स्थित उनके आवास पर हमला किया गया। यह हमला उन्हें सचेत करने के लिए था किंतु वे भागे नहीं और डटे रहे। महज दो दिन बाद 14 सितम्बर को सुबह पं० टिकालाल टपलू अपने आवास से बाहर निकले तो उन्होंने पड़ोसी की बच्ची को रोते हुए देखा। पूछने पर उसकी माँ ने बताया कि स्कूल में कोई फंक्शन है और बच्ची के पास पैसे नहीं हैं।

पं० टपलू ने बच्ची को गोद में उठाया, उसे पाँच रुपये दिए और पुचकार कर चुप करा दिया। इसके बाद उन्होंने सड़क पर कुछ कदम ही आगे बढ़ाये होंगे कि आतंकवादियों ने उनकी छाती कलाशनिकोव की गोलियों से छलनी कर दी। सन 1989-90 के दौरान कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करने पर मजबूर करने के लिए की गयी यह पहली हत्या थी। पंडितों के सर्वमान्य नेता को मार कर अलगाववादियों ने स्पष्ट संकेत दे दिया था कि अब कश्मीर घाटी में ‘निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा’ ही चलेगा।

टिकालाल टपलू की हत्या के बाद काशीनाथ पंडिता ने कश्मीर टाइम्स में एक लेख लिखा और अलगाववादियों से पूछा कि वे आखिर चाहते क्या हैं। अगले दिन इसका जवाब जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने यह लिख कर दिया कि या तो कश्मीरी पंडित भारत राज्य को समर्थन देना बंद करें और अलगाववादी आन्दोलन का साथ दें अथवा कश्मीर छोड़ दें।

पं टपलू की हत्या के मात्र सात सप्ताह बाद जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गयी। सन 1989 तक पं० नीलकंठ गंजू- जिन्होंने मकबूल बट को फांसी की सजा सुनाई थी- हाई कोर्ट के जज बन चुके थे। वे 4 नवंबर 1989 को दिल्ली से लौटे थे और उसी दिन श्रीनगर के हरि सिंह हाई स्ट्रीट मार्केट के समीप स्थित उच्च न्यायालय के पास ही आतंकियों ने उन्हें गोली मार दी थी। इस वारदात से डर कर आसपास के दूकानदार और पुलिसकर्मी भाग खड़े हुए और खून से लथपथ जस्टिस गंजू के पास दो घंटे तक कोई नहीं आया।

कुछ दिनों बाद अमिराकदल के पास स्थानीय लड़के जस्टिस गंजू की हत्या का जश्न मनाते दिखाई दिए। आतंकियों ने जस्टिस गंजू से मकबूल बट की फाँसी का प्रतिशोध लिया था। साथ ही मस्जिदों से लगते नारों ने कश्मीर के लोगों को यह भी बता दिया था कि ‘ज़लज़ला आ गया है कुफ़्र के मैदान में, लो मुजाहिद आ गये हैं मैदान में।’ अर्थात अब अलगाववादियों के अंदर भारतीय न्याय, शासन और दंड प्रणाली का भय नहीं रह गया था।

पं० टिकालाल टपलू और जस्टिस गंजू की हत्या के बाद भी कई कश्मीरी पंडितों को मारा गया परन्तु तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्लाह कोरा दिलासा मात्र देते रहे और मार्तण्ड सूर्य मन्दिर के भग्नावशेष पर सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते रहे।   

दिसंबर 8, 1989 को मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के बाद पंद्रह दिनों तक ड्रामा चला था जिसके बाद वी पी सिंह सरकार द्वारा अब्दुल हमीद शेख़, शेर खान, नूर मोहम्मद कलवल, अल्ताफ अहमद और जावेद अहमद जरगर नामक आतंकियों को जेल से छोड़ा गया था। चौदह साल बाद जेकेएलएफ के जावेद मीर ने रुबैया सईद के अपहरण की बात कबूल की थी। अगले साल जनवरी 25 जनवरी 1990 को जेकेएलएफ ने भारतीय वायु सेना के पाँच अधिकारियों की हत्या कर दी थी। खुद यासीन मलिक ने भी बीबीसी को दिए इंटरव्यू में यह स्वीकार किया था कि उसने ड्यूटी पर जा रहे 40 वायुसैनिकों पर गोलियाँ चलाई थीं। यासीन मलिक और जेकेएलएफ को आज भी उनके किए की सज़ा नहीं मिल पाई है। हाँ, आज यह खबर आई कि सीबीआई ने वो केस फिर से खोला है।

       

मोदी और इमरान की मैच फिक्सिंग से हुआ पुलवामा हमला: कॉन्ग्रेस सांसद

शुरुआत के कुछ दिनों को छोड़ने के बाद, कॉन्ग्रेस के नेताओं की जीभ लगातार उस तरफ मुड़ती जा रही है जिसे मानसिक आघात के बाद की स्थिति कहा जा सकता है। राहुल गाँधी हर जगह ज्ञान देते नज़र आते हैं कि पुलवामा हमले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा।

चाहे वो दिग्विजय सिंह हों, सलमान खुर्शीद हों, सिद्धू हों, या कमलनाथ, सब ने लगातार मोदी की आलोचना या विरोध के चक्कर में उन्होंने भारतीय सेना और भारत राष्ट्र पर ही सवाल उठा दिए हैं। ये तो इनके सीनियर नेताओं के कुकर्म हैं, छोटे नेताओं को तो गिना भी नहीं जा रहा।

इसी कड़ी में कॉन्ग्रेस से राज्यसभा संसद बी के हरिप्रसाद का बयान पार्टी की अघोषित लाइन पर ही है। उन्होंने अभी तक की अजीब बातों और आरोपों से एक कदम आगे बढ़कर कहा है कि इस हमले में मोदी और इमरान खान की मिलीभगत थी। उन्होंने कहा, “पुलवामा अटैक के बाद के घटनाक्रम पर यदि आप नजर डालेंगे तो पता चलता है कि यह पीएम नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के बीच मैच फिक्सिंग थी।”

<blockquote class=”twitter-tweet” data-lang=”en”><p lang=”en” dir=”ltr”>Mr Ravi Shankar Prasad (<a href=”https://twitter.com/rsprasad?ref_src=twsrc%5Etfw”>@rsprasad</a>) should clarify whether there is any match-fixing between Pakistan and Mr Modi or else without their knowledge, Pulwama incident would have not taken place: BK Hariprasad, Congress <a href=”https://t.co/J8zWCLQ6fd”>pic.twitter.com/J8zWCLQ6fd</a></p>— TIMES NOW (@TimesNow) <a href=”https://twitter.com/TimesNow/status/1103621956107026433?ref_src=twsrc%5Etfw”>March 7, 2019</a></blockquote>

कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह जैसे कई विपक्षी नेता भारतीय सेना और IAF का मजाक बनाते नजर आ रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने पुलवामा हमले को ‘दुर्घटना’ बताया तो वहीं नवजोत सिंह सिद्धू जैसे कुछ नेता तो एयर स्ट्राइक पर ही यह कहकर सवाल उठा रहे हैं कि आतंकी मारने गए थे या पेड़ गिराने? बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह द्वारा एयर स्ट्राइक में 250 से अधिक आतंकियों के मारे जाने के दावे के बाद से विपक्ष हमलावर है कि उनके पास यह आँकड़ा कहाँ से आया?

ऐसे ही सबूत माँगने वालों के लिए मंत्री जनरल (retd) वीके सिंह ने कहा था, “अगली बार जब भारत कोई कार्रवाई करे तो जो विपक्षी नेता प्रश्न उठाते हैं, उन्हें फाइटर प्लेन के नीचे बाँध के ले जाएँ। जब बम गिराया जाएगा तो उन्हें वहीं से टारगेट दिख जाएगा। इसके बाद उनको वहीं पर उतार दें। वे लोग टारगेट की जगहों को गिन लें और वापस आ जाएँ।”

कुछ ही घंटों में पकड़ा गया जम्मू में ग्रेनेड से हमला करने वाला आतंकी यासिर अरहान

जम्मू के बस स्टैंड पर आज आतंकियों ने ग्रेनेड से हमला किया जिसमें एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई और 30 लोग घायल हो गए। दरअसल आज सुबह जम्मू में बस स्टैंड पर सुबह करीब 11 बजे के बाद एक बस के पास अचानक ब्लास्ट हुआ। ब्लास्ट के वक्त बस स्टैंड पर खासी भीड़ थी। जम्मू के आईजी पुलिस एमके सिन्हा के मुताबिक बस पर एक ग्रेनेड फेंका गया जो बस के ठीक नीचे जाकर गिरा जिससे ये ब्लास्ट हुआ और बस में बैठे हुए और आस-पास खड़े लोग इस हमले में घायल हो गये।

घायलों को बख्शीनगर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। मृतक की पहचान 17 साल के मोहम्मद शारिक के रूप में हुई है जो अहतमाल, हरिद्वार (उत्तराखंड) का रहने वाला था। इस बीच पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज की मदद से संदिग्धों की धरपकड़ शुरू कर दी। ताज़ा जानकारी के अनुसार पुलिस ने 10 संदिग्धों की हिरासत में लिया था जिनसे पूछताछ की गई।

पुलिस द्वारा की गई जाँच पड़ताल में यह सामने आया है कि ग्रेनेड फेंकने वाले व्यक्ति का नाम यासिर अरहान है और वह कुलगाम का रहने वाला है। वारदात को अंजाम देने के बाद यासिर भाग रहा था जब जम्मू कश्मीर पुलिस ने उसे धर दबोचा।

जम्मू कश्मीर पुलिस के महानिदेशक दिलबाग सिंह के अनुसार कुछ घंटों में ही यासिर अरहान को पुलिस ने पकड़ लिया।

पुलिस को शक है कि यह धमाका जैश ए मोहम्मद के आतंकियों ने करवाया है। रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने सुबह ही आश्वासन दिया था कि मामले की त्वरित जाँच के आदेश दे दिए गए हैं और सुरक्षा बलों को आवश्यक कार्रवाई के लिए खुली छूट प्रदान की गई है। पुलिस के तुरंत हरकत में आने के कारण बम फेंकने वाले व्यक्ति को भागने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया।

नई जर्सी पर धोनी और विराट का रिएक्शन, धोनी ने कहा- 38 साल का आदमी ऐसा कह रहा है तो…

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने हाल ही में वर्ल्ड कप को देखते हुए भारतीय टीम के लिए नई जर्सी को लॉन्च किया। इस जर्सी को देखने के बाद टीम के कप्तान विराट कोहली और पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने इसपर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए बताया कि आख़िर उन्हें इस नई जर्सी में क्या पसंद आया।

विराट की मानें तो हर कोई स्लीक लुक को पसंद करता है। इसलिए, वह इसे स्लीक ही चाहते थे, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलते समय खास दिखना पड़ता है। विराट का मानना है कि बतौर एथलीट आपकी किट और जर्सी कुछ अलग होनी चाहिए।

इसके अलावा इस नई जर्सी में इस्तेमाल किया गया हल्का फैब्रिक विराट को खूब पसंद आया। उन्होंने कहा कि यह नई जर्सी पुरानी वाली से हल्की है। विराट की मानें तो वो जर्सी को बेहद हल्का चाहते थे और इसका फैब्रिक बिलकुल वैसा ही है।

वहीं भारत के पूर्व कप्तान और विकेटकीपर महेंद्र सिंह धोनी ने भी इसे हल्का बताते हुए कहा कि ‘यह बहुत आरामदेह है।’ उन्होंने कहा कि 38 साल का एक व्यक्ति यह बात अगर कह रहा है तो यह थोड़ा मजाकिया लग सकता है लेकिन उन्हें इसका डिजाइन बेहद पसंद आया। उनके अनुसार वो अभी तक जो जर्सी पहनते हुए चले आ रहे थे यह उससे काफ़ी अलग है। धोनी ने इसके बारे में कहा कि इस जर्सी में टू-टोन कलर किया है जो कि भविष्य का डिजाइन नज़र आता है।

टीम इंडिया की नई जर्सी

बता दें कि इस जर्सी में पहली की जर्सी के मुकाबले कई बदलाव किए गए हैं। एक बार फिर से कॉलर के रंग को बाहर से नीला कर दिया गया है। साथ ही, इस पर 1983 विश्व कप और 2011 की जीत की तारीख भी लिखी हुई है। इसके साथ ही जर्सी का रंग पहले के मुक़ाबले और भी गहरा नीला कर दिया गया है। इस जर्सी पर तीन स्टार भी है जिसका पर्याय है कि भारत की तीन विश्व कप में जीत है।

वित्त मंत्रालय पहली बार करेगा ₹20 का सिक्का जारी, जानिए क्या है इसकी खासियत

वित्त मंत्रालय द्वारा बुधवार (मार्च 6, 2019) को ₹20 का सिक्का जारी करने की घोषणा की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा इस सिक्के को लॉन्च किया गया। यह सिक्का आकार और रूप के मामले में बाकी सिक्कों के काफ़ी अलग है।

अभी तक हमने 1, 2, 5, 10 के सिक्कों को देखा लेकिन अब जल्द ही बाज़ार में ₹20 के सिक्के चलन में होंगे। इन सिक्कों की खासियत होगी कि यह 12 किनारे वाले बहुभुज आकार वाला होगा। इसका बाहरी व्यास 27 मिमी होगा और इसका वजन 8.54 ग्राम होगा।

वित्त मंत्रालय द्वारा जारी की गई अधिसूचना में यह बात कही गई कि इस नए सिक्के की बाहरी रिंग पर 65% तांबा, 15% ज़िंक और 20% निकेल होगा। इसके अलावा सिक्के के अंदर वाली रिंग पर 75% कॉपर, 20% ज़िंक और 5% निकेल होगा।

₹20 के इस नए सिक्के पर सामने की ओर अशोक स्तंभ होगा, जिसके साथ सत्यमेव जयते लिखा होगा। इस सिक्के पर अंग्रेजी में इंडिया और हिंदी में भारत भी लिखा होगा।

रुपए के नए चिह्न के साथ सिक्के के पीछे की ओर बड़े अक्षरों में 20 लिखा होगा। साथ ही देश में कृषि प्रधान देश की छवि को दिखाने के लिए अनाज का चित्र भी उकेरा गया है। 

बता दें कि 10 साल पहले आरबीआई ने मार्च 2009 में दस रुपए का सिक्का जारी किया था और अब दस साल बाद नया सिक्का जारी किया जा रहा है। 10 का सिक्का चलन में होने के बाद आमजन को काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था जिससे दस के सिक्के में 13 बार बदलाव करने पड़े थे।

9 AAP विधायक हमारे संपर्क में: कॉन्ग्रेस दे रही है केजरीवाल को झटके पर झटका

कॉन्ग्रेस पार्टी ने दावा किया है कि 9 आम आदमी पार्टी विधायक उसके संपर्क में हैं। अभी कुछ ही दिनों पहले अरविन्द केजरीवाल के साथ गठबंधन ठुकरा कर उन्हें करारा झटका देने वाली कॉन्ग्रेस ने फिर से चौंकाने वाली बात कही है। दिल्ली कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता जीतेन्द्र कोचर ने कहा कि आप के 9 विधायक पाला बदल कर कॉन्ग्रेस से जुड़ना चाहते हैं। उधर आप से निष्काषित नेता व पूर्व मंत्री संदीप कुमार ने दिल्ली कॉन्ग्रेस के दफ़्तर जाकर राज्य में पार्टी की अध्यक्षा शीला दीक्षित ने मुलाक़ात की। बैठक के बाद उन्होंने कहा कि फिलहाल उनका कॉन्ग्रेस में शामिल होने का कोई इरादा नहीं है।

संदीप ने कहा कि वे वाल्मीकि समुदाय के आग्रह पर प्रतिनिधि के रूप में शीला से मिलने गए थे। उन्होंने कहा कि वे अपने क्षेत्र में अभी बहुजन समाज पार्टी का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। हाँलाँकि, उन्होंने आधिकारिक रूप से बसपा नहीं ज्वाइन की है।

कोचर ने इस बारे में विशेष जानकारी देते हुए कहा- “कॉन्ग्रेस की ओर से गठबंधन के प्रयासों को ख़ारिज करने के बाद आम आदमी पार्टी में भगदड़ की स्थिति है। क़रीब 9 मौजूदा विधायक हमारे संपर्क में हैं और कॉन्ग्रेस में शामिल होना चाहते हैं।” उन्होंने बताया कि इन विधायकों ने पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से बात भी की है और कुछ ही दिनों में वे कॉन्ग्रेस में शामिल होंगे।

कॉन्ग्रेस आगामी लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सभी सीटों पर अकेले दम पर ताल ठोकने वाली है। राहुल गाँधी के निवास पर हुई बैठक के बाद पार्टी आलाकमान ने निर्णय लिया कि प्रदेश में कॉन्ग्रेस का आप से गठबंधन नहीं होगा। इसके बाद अरविन्द केजरीवाल ने कॉन्ग्रेस पर भाजपा के लिए काम करने का आरोप लगाया था। लोगों ने सोशल मीडिया में ‘तन्हा केजरीवाल‘ ट्रेंड करा कर उनका ख़ूब मज़ाक उड़ाया था। लोगों का कहना था कि तमाल मिन्नतों के बावजूद कॉन्ग्रेस ने केजरीवाल की एक न सुनी।

फिलहाल आम आदमी पार्टी ने कॉन्ग्रेस के इस दावे पर कोई टिप्पणी नहीं की है। आज सुबह आप विधायक मोहिंदर गोयल पर बलात्कार का मामला दर्ज किया गया। इस पर भी पार्टी की तरफ़ से कोई प्रतिक्रया नहीं आई है।

आतंकी यासीन मलिक ने रुबैया का अपहरण किया, 4 IAF अफसरों की हत्या की और बच निकला, लेकिन 30 साल बाद CBI ने कसा शिकंजा

यासीन मालिक के बुरे दिन चालू हो गए हैं। कश्मीर में अलगाववाद पर लगाम लगाने की कवायद में जुटे राज्य प्रशासन ने सख्ती दिखाते हुए जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के प्रमुख यासीन मलिक को गिरफ्तार कर लिया है। पब्लिक सेफ्टी एक्ट(PSA) के तहत यासीन मलिक को गिरफ्त में लिया गया और उसे श्रीनगर से बाहर जम्मू स्थित कोट भलवाल जेल में रखा जाएगा। इसके साथ ही 30 साल पुराने रुबैया सईद अपहरण मामले में भी नया मोड़ आया है।

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने यासीन मलिक का केस जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय की श्रीनगर विंग से जम्मू विंग में स्थानांतरित करने की अर्जी लगाई है जिस पर उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल ने मुहर लगा दी है। यह मामला 30 साल पहले का है जिसमें प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण और भारतीय वायुसेना के 4 अधिकारियों की हत्या के मुख्य आरोपित यासीन मलिक पर केस दर्ज हुआ था।

सीबीआई का कहना है कि कश्मीर घाटी में यासीन मलिक एक रसूखदार व्यक्ति है जिसके कारण वह मुकदमे को प्रभावित कर सकता है इसलिए इस मामले को श्रीनगर विंग से हटाकर जम्मू विंग में ट्रांसफर किया जाए। सीबीआई की अर्जी पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस गीता मित्तल ने मामले को कोर्ट की जम्मू विंग में स्थानांतरित करने पर यासीन मलिक और एक अन्य को आपत्ति दर्ज कराने के लिए एक दिन का मौका दिया है।

ध्यातव्य है कि यासीन मलिक एक आतंकी है और ‘अलगाववादी नेता’ के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है और जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का चीफ भी है। जेकेएलएफ मूलतः एक आतंकवादी संगठन है जिसकी स्थापना 1977 में की गई थी। सन 1989 में इसी संगठन के आतंकियों ने जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या की थी। दिसंबर 1989 में मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद का अपहरण किया गया था जिसके बदले में पाँच आतंकियों को छोड़ा गया था।

दिसंबर 8, 1989 को रुबैया सईद के अपहरण के बाद पंद्रह दिनों तक ड्रामा चला था जिसके बाद वी पी सिंह सरकार द्वारा अब्दुल हमीद शेख़, शेर खान, नूर मोहम्मद कलवल, अल्ताफ अहमद और जावेद अहमद जरगर नामक आतंकियों को जेल से छोड़ा गया था। चौदह साल बाद जेकेएलएफ के जावेद मीर ने रुबैया सईद के अपहरण की बात कबूल की थी

अगले साल जनवरी 25 जनवरी 1990 को जेकेएलएफ ने भारतीय वायु सेना के 4 अधिकारियों की हत्या कर दी थी। खुद यासीन मलिक ने भी बीबीसी को दिए इंटरव्यू में यह स्वीकार किया था कि उसने ड्यूटी पर जा रहे 40 वायुसैनिकों पर गोलियाँ चलाई थीं। इसके बावजूद वह आजतक कानून के शिकंजे से बाहर खुला घूम रहा है। उम्मीद है कि केस में सीबीआई के नए निर्णय के बाद इस मामले में तेज़ी आएगी और यासीन मलिक को सज़ा मिलेगी।      

मेरे कार्यकाल में ISI जैश की मदद से भारत में कराती थी बम धमाके: परवेज मुशर्रफ

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान के एक वरिष्ठ पत्रकार को दिए इंटरव्यू में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को लेकर सनसनीखेज खुलासा किया है। उन्होंने कहा है कि उनके कार्यकाल में जैश-ए-मोहम्मद की मदद से पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी भारत पर बम धमाके कराने का काम किया करती थी।

पाकिस्तानी पत्रकार नदीम मलिक को फोन पर दिए इंटरव्यू में परवेज मुशर्रफ ने वर्तमान समय में पाकिस्तान द्वारा जैश-ए-मोहम्मद पर की जा रही कार्रवाई का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि जिस समय वे पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे, उस समय जैश-ए-मोहम्मद ने उन पर 2 हमले करवाए थे। पत्रकार मलिक ने इस इंटरव्यू की 2 मिनट की क्लिप ट्विटर पर 5 मार्च को पोस्ट की है।

परवेज मुशर्रफ ने इस इंटरव्यू में कहा, “यह एक अच्छा कदम है। मैं हमेशा से कहता रहा हूँ कि जैश-ए-मोहम्मद एक आतंकी संगठन है। इस आतंकी संगठन के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।”

परवेज मुशर्रफ ने खुद इंटरव्यू में स्वीकारा है कि जिस समय वो पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे, उस समय जैश ने उन पर दो बार हमले कराए थे, जिसमें वे बाल-बाल बच गए थे। दिसंबर 2003 में रावलपिंडी के झांडा चिची में आत्मघाती हमलावर ने परवेज मुशर्रफ पर हमला कराया था। मुशर्रफ ने कहा कि यह सौभाग्य कि बात है कि वे इस हमले में बच गए।

परवेज मुशर्रफ ने कहा, “मेरे पुल को पार करने के बाद कुछ देर बाद हमलावर ने बटन दबाया था।” मुशर्रफ से जब यह पूछा गया कि उनके राष्ट्रपति रहते समय क्यों जैश के खिलाफ एक्शन नहीं लिया गया तो उन्होंने कहा, “पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियाँ (ISI) जैश का इस्तेमाल भारत में बम धमाके कराने के लिए कर रही थीं।”

भारत की कार्रवाई और आतंकवाद पर दुनिया भर के देशों के दबाव के बीच पाकिस्तान ने मंगलवार (5 मार्च, 2019) को जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर के भाई और बेटे सहित 44 दहशतगर्द को गिरफ्तार करने का दावा किया था। हालाँकि, इस बात को प्रोपेगेंडा माना जा रहा है।

वैसे, कल ही पाकिस्तान द्वारा एक बयान आया है कि पाकिस्तान में जैश-ए-मोहम्मद जैसी कोई संस्था है ही नहीं।