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कॉन्ग्रेस की 5वीं लिस्ट जारी, प्रत्याशियों को बदलने का खेल भी शुरू

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव की तारीखें नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे सियासी हलचल भी तेज हो रही है। सभी पार्टियाँ चुनाव जीतने की भरपूर कोशिशों में जुटी हुई हैं। इसी कड़ी में कॉन्ग्रेस ने सोमवार (मार्च 18, 2019) की रात अपने उम्मीदवारों की पाँचवीं सूची जारी कर दी। जिसमें उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और लक्षद्वीप की 56 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं।

पार्टी ने आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए 132 और ओडिशा विधानसभा सीटों के लिए 36 सीटों पर भी उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। पार्टी महासचिव मुकुल वासनिक की तरफ से जारी किए गए बयान के मुताबिक उत्तर प्रदेश की 3, आंध्र प्रदेश की 22, असम की 5, ओडिशा की 6, तेलंगाना की 8, पश्चिम बंगाल की 11 और लक्षद्वीप की एक लोकसभा सीट पर उम्मीदवार घोषित किए गए हैं।

उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद से डॉली शर्मा, बुलन्दशहर से बंशीलाल पहाड़िया और मेरठ से हरेंद्र अग्रवाल को टिकट दिया गया है। आपको बता दें कि मेरठ से पहले ओमप्रकाश शर्मा को उम्मीदवार बनाया गया था, जिसे अब बदल दिया गया है। वहीं, पश्चिम बंगाल में जांगीपुर से पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पुत्र अभिजीत मुखर्जी, बहरामपुर से अधीर रंजन चौधरी और रायगंज से दीपा दास मुंशी को उम्मीदवार बनाया गया है। इससे पहले कॉन्ग्रेस उत्तर प्रदेश एवं कुछ अन्य राज्यों के लिए चार बार में कुल 81 उम्मीदवारों की घोषणा कर चुकी है, जिनमें सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के नाम भी शामिल हैं।

आपको बता दें कि दो दिन पहले ही लोकसभा चुनाव को मद्देनजर रखते हुए कॉन्ग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के नामों की चौथी सूची जारी की थी। इस सूची में कुल 27 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की गई थी। जिसमें 7 नाम उत्तर प्रदेश से, 2 नाम अरुणाचल प्रदेश से, 5 नाम छत्तीसगढ़ से, 1 नाम अंडमान निकोबार और 12 नाम केरल से थे। इसमें शशि थरूर समेत कई दिग्गजों का नाम शामिल था। इस लिस्ट के तहत वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री शशि थरूर को तिरुवनंतपुरम से चुनाव मैदान में उतारा गया है। वहीं अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नबम टुकी को अरुणाचल प्रदेश पश्चिम से टिकट दिया गया है।

‘विमान से जाने वाले की लाश ही वापस आती है’ – पर्रिकर का वो लेख, जो हर माँ-बाप-पति-पत्नी को पढ़ना जरूरी

मनोहर पर्रिकर- एक ऐसा नाम, जो गोवा वासियों के लिए बेहद अपनत्व भरा है। उनकी अनेक कहानियाँ गोवा भर में प्रचलित हैं। चार बार गोवा वासियों के सेवा का प्रण ले जीवन पर्यन्त ख़ुद पूरी तरह समर्पित कर देना आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा स्रोत रहेगा। शिखर पर पहुँच कर भी सादगी को जीना उनके लिए दिखावा नहीं बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा था।

आज बेशक गोवा के मुख्यमंत्री और पूर्व रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर जी ब्रह्मलीन हो चुके हैं। लेकिन उनका पूरा जीवन जनता को समर्पित रहा। हालाँकि एक सत्य यह भी है कि उनके बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। उन्होंने अपने निजी दुखों को कभी भी अपने काम और जनता की सेवा पर हावी नहीं होने दिया। लोग यह तो जानते हैं कि उनकी मृत्यु कैंसर से हुई। लेकिन शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि उनकी पत्नी का निधन भी कैंसर से ही हुआ था। ये भी शायद बहुत कम लोगों को पता होगा कि पत्नी मेधा को खोने के बाद वो निजी रूप से टूट गए थे परंतु जनता और पार्टी की सेवा में कभी अपना निजी दुख न आड़े आने दिया, न ही कभी कहीं वाणी से व्यक्त ही किया।

बस एक बार पता नहीं कौन से मनोभाव में उन्होंने ख़ुद को एक लेख के माध्यम से व्यक्त किया था। उन्होंने अपनी निजी पीड़ा पर एक भावुक लेख एक मराठी पत्रिका में लिखा था, जिसका सुरेश चिपलूनकर जी ने अनुवाद किया है। उन्होंने यह लेख अपनी षष्ठीपूर्ति के अवसर पर एक मराठी पत्रिका “ऋतुरंग” (दिवाली अंक 2017) में लिखा था। एक राजनेता के जीवन में पर्दे के पीछे चलते हुए उसके जीवन के घटनाक्रमों और दुःख-दर्द में भीगी हुई कलम से लिखा हुआ यह अदभुत लेख है। यह लेख मनोहर पर्रिकर को राजनीति से अलग एक पति, पिता और बेटे के रूप में तो व्यक्त करती ही है, साथ ही उनके जीवन के उन पहलुओं को भी उजागर करती है जो अभी तक समाज से अछूता रहा है।

मनोहर पर्रिकर जी लिखते हैं

“राजभवन का वह हॉल कार्यकर्ताओं की भीड़ से ठसाठस भरा हुआ था। पहली बार गोवा में भाजपा की सरकार बनने जा रही है, यह सोचकर सभी का उत्साह मन के बाँध तोड़ने को आतुर था। मेरे निकट के मित्र, गोवा के भिन्न-भिन्न भागों से आए हुए असंख्य कार्यकर्ता इस शपथ समारोह के कार्यक्रम में दिखाई दे रहे थे। इन सभी की वहाँ उपस्थिति का कारण एक ही था, मुझे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेते हुए देखना। मैंने जिनके साथ राजनीति में प्रवेश किया ऐसे मेरे सहकारी, मेरे हित-चिन्तक, पार्टी के कार्यकर्ताओं की इस भारी भीड़ में मुझे मेरे दोनों बेटे, भाई-बहन सभी लोग दिखाई दे रहे थे। परन्तु फिर भी सामने दिखाई देने वाला चित्र अधूरा सा था। मेरी पत्नी मेधा, और मेरे माता-पिता इन तीनों में से कोई भी उस भीड़ में नहीं था। मुझे तीव्रता से इन तीनों की याद आ रही थी। मैंने जिस बात की कभी कल्पना तक नहीं की थी, वह अब सच होने जा रही थी, अर्थात मैं गोवा का मुख्यमंत्री बनने जा रहा था, परन्तु फिर भी इस आनंद के क्षण में दुखों के पल भी समाए हुए थे।

नियति के खेल निराले होते हैं। एक-दो वर्ष के अंतराल में ही मेरे सर्वाधिक पास के ये तीनों ही व्यक्तित्त्व मुझसे हमेशा के लिए दूर जा चुके थे। जिनके होने भर से मुझे बल मिलता था, प्रेरणा मिलती थी ऐसे मेरे “आप्त स्वकीय” जनों की कमी कभी कोई नहीं भर सकता था। एक तरफ भाजपा गोवा में पहली बार सत्ता स्थान पर विराजमान होने का आनंद और दूसरी तरफ इस घनघोर आनंद में मेरे साथ सदैव सहभागी रहने वाले माता-पिता और पत्नी का वहाँ मौजूद नहीं होना, ऐसी दो विपरीत भावनाएँ मेरे मन में थीं। यदि ये तीनों आज होते तो उन्हें कितना आनंद हुआ होता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अपनी जिम्मेदारी निभाते समय ये तीनों सतत मेरे पीछे मजबूती से खड़े रहे। राजनीति में मेरा प्रवेश अचानक ही हुआ। इस नई जिम्मेदारी को मैं ठीक से निभा सका, इसका कारण इन तीनों का साथ ही था। आज मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करते समय उन्हें यहाँ होना चाहिए था, ऐसा रह-रहकर लगता था। वास्तव में देखा जाए तो अब मेरे राजनैतिक जीवन का एक नया प्रवास शुरू हुआ था, लेकिन मेरे अपने जो लोग साथ होने चाहिए थे, वही नहीं थे।

अक्सर हम अपने एकदम नजदीक वाले व्यक्ति को गृहीत (ग्रांटेड) मानकर चलते हैं, कि ये तो अपना ही व्यक्ति है, ये कभी अपने को छोड़कर जाने वाला नहीं है। यह सदैव अपने साथ ही रहेगा, परन्तु वैसा होता नहीं है। अचानक ऐसी कई बातें और घटनाएँ होने लगती हैं कि आपको समझ ही नहीं आता कि क्या करना चाहिए, बल्कि मैं तो कहूँगा कि अक्सर इतनी देर हो जाती है कि अपने हाथ में करने लायक कुछ बचता ही नहीं। मेरी पत्नी मेधा के बारे में भी ऐसा ही घटित हुआ। अत्यधिक तेजी से उसकी बीमारी बढ़ी। किसी को भी समय दिए बिना उस बीमारी ने हमसे उसे छीन लिया। सब कुछ अच्छा चल रहा था। ऐसा भी कभी हो सकता है, यह विचार तक कभी मन में नहीं आया था। मनुष्य ऐसा ही होता है।

मुझे आज भी वे दिन अच्छे से स्मरण हैं। हमारी शादी को पंद्रह वर्ष बीत चुके थे। एक तरफ मेरी फैक्ट्री का काम बढ़ता जा रहा था, और दूसरी तरफ राजनीति में आई नई जिम्मेदारियों के कारण मेरा दिनक्रम अत्यधिक व्यस्त हो गया था। ऐसा लगने लगा था कि शायद कुछ वर्ष में ही भाजपा गोवा में सत्ता में आ सकती है। मेधा को बीच-बीच में कभी-कभी बुखार आता रहता था, उसने अपना कष्ट अपने शरीर को ही भोगने दिया, बताया नहीं। मेरी व्यस्तता के कारण मैं भी गंभीरता से उसे डॉक्टर के यहाँ नहीं ले गया। मैंने उसे कहा कि घर के ही किसी व्यक्ति के साथ चली जाओ और पूरा चेकअप करवा लो, उसके अनुसार वह डॉक्टर के यहाँ जाकर आई। सिर्फ उसकी रिपोर्ट आनी बाकी थी। पार्टी की एक महत्त्वपूर्ण बैठक चल रही थी, तभी मुझे डॉक्टर शेखर सालकर का फोन आया, मैंने जल्दबाजी में फोन उठाया और शेखर ने कहा कि मेधा की ब्लड रिपोर्ट अच्छी नहीं है। आगे के समस्त चेकअप के लिए मेधा को तत्काल मुम्बई ले जाना पड़ेगा। मुझे कुछ सूझा ही नहीं। अगले ही दिन हम मेधा को मुम्बई ले गए। अभिजीत (मेरा बेटा) बहुत छोटा था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी माँ को लेकर हम कहाँ जा रहे हैं।

मुम्बई पहुँचने पर पता चला कि मेधा को ब्लड कैंसर है। पैरों के नीचे से जमीन सरकना किसे कहते हैं, यह उस क्षण जीवन में पहली बार मुझे पता चला। मेधा तो मेरे साथ ही रहेगी, उसे कभी कुछ नहीं होगा मैंने अपने मन में ऐसा गृहीत भाव रखा हुआ था। सभी लोग ऐसा ही मानकर तो चलते हैं। लेकिन अचानक पता चला कि केवल अगले कुछ ही माह, कुछ ही दिन बाद शायद वह न रहे, इस विचार मात्र ने मुझे भीषण रूप से बेचैन कर दिया। मुम्बई में ही उसका उपचार चालू हुआ। परन्तु एक माह से पहले ही उसका निधन हो गया। देखते ही देखते वह मुझे छोड़कर चली गयी। वह थी, इसीलिए मुझे कभी अपने बच्चों की चिंता नहीं थी, परन्तु अब अचानक मुझे बच्चों की भी चिंता होने लगी। उत्पल तो फिर भी थोड़ा समझदार हो गया था, परन्तु अभिजीत को यह सब कैसे बताऊँ यह मुझे समझ नहीं आ रहा था।

मेधा के जाने का सबसे बड़ा धक्का अभिजीत को ही लगा। उसने अपनी माँ को उपचार के लिए विमान से मुम्बई जाते हुए देखा था, लेकिन विमान से उसकी माँ का शव ही वापस आया। अभिजीत के बाल-मन पर इसका इतना गहरा प्रभाव हुआ कि उसने लम्बे समय तक मुझे विमान से यात्रा ही नहीं करने दिया। उसके मन में कहीं गहरे यह धँस गया था कि विमान से जाने वाले व्यक्ति की लाश ही वापस आती है। उन दिनों अभिजीत को संभालना बहुत कठिन कार्य था। ऊपर ही ऊपर कठोर निर्णय लेने वाला राजनीतिज्ञ यानी मैं, अन्दर ही अन्दर पूरी तरह से टूट चुका था। राजनैतिक व्यस्तताओं एवं जिम्मेदारियों ने मेरा दुःख कुछ कम किया और मैं स्वयं को अधिक से अधिक काम में झोंकने लगा।

मेरा और मेधा का प्रेमविवाह हुआ था। मेधा मेरी बहन की ननद थी, इसलिए मैं अपनी बहन के विवाह के समय से ही उसे पहचानता था। मैं आईआईटी मुम्बई पढ़ने गया। पढ़ाई के अगले कुछ वर्ष मेरा ठिकाना IIT मुम्बई ही रहा। बहन मुम्बई में ही थी। पढ़ाई के दौरान IIT में पूरा सप्ताह तो पता ही नहीं चलता था कि कैसे निकल गया, परन्तु रविवार को घर के खाने की याद तीव्रता से सताती थी। स्वाभाविक रूप से बहन के मेरे यहाँ साप्ताहिक फेरे लगने लगे। इन्हीं दिनों वहाँ एक लम्बे बालों वाली, उन बालों में गजरा-वेणी लगाने वाली एक घरेलू सी लड़की ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। धीरे-धीरे हमारी मित्रता हो गई। चूँकि, उसे पढ़ने का बहुत शौक था, इसलिए हमारी चर्चाएँ अक्सर अध्ययन अथवा सामाजिक-देश संबंधी विषयों पर होती थीं। मुझे भी पता नहीं चला कि कब मैं उसके प्रेम में पड़ गया। चूँकि, लड़की रिश्तेदारी में ही थी, परिजनों ने देखी हुई थी, इसलिए इस प्रेमविवाह का विरोध होने का सवाल ही नहीं उठा।

मुम्बई IIT से निकलने के बाद मैंने कुछ दिन वहीं नौकरी की। लेकिन मुझे नौकरी में रूचि नहीं थी, मुझे अपनी फैक्ट्री शुरू करनी थी। नौकरी छोड़ते समय ही मैंने मेधा से विवाह करने का निर्णय लिया। सभी को घोर आश्चर्य हुआ, क्योंकि सामान्यतः मध्यम वर्गीय मराठी परिवारों में ऐसा ही होता है कि नौकरी मिले, जीवन में थोड़ी स्थिरता आए, तभी शादी का विचार किया जाता है। ऐसे समय नौकरी हाथ में न हो और मैं विवाह करूँ यह सभी के लिए कुछ अटपटा सा था। लेकिन मेरी माँ मेरे निर्णय से सहमत थी। उसने कहा, “..मनु अगर तूने यह निर्णय लिया है तो सोच समझकर ही लिया होगा…” एक बेहद सादे समारोह में हमारा विवाह हुआ। मैंने गोवा जाकर अपनी फैक्ट्री शुरू करने का निर्णय लिया था और मेधा इस निर्णय में मेरे साथ थी। उसी के कारण मैं इतना बड़ा कदम उठाने की हिम्मत जुटा सका था। मुम्बई के गतिमान और व्यस्त जीवनशैली से निकलकर मेधा हमारे गोवा के म्हापसा स्थित घर में रम गई। धीरे-धीरे वह म्हापसा के सामाजिक उपक्रमों में भी सहभागी होने लगी। मैंने म्हापसा के पास ही एक फैक्ट्री शुरू की थी, उसका बिजनेस भी जमने लगा था। संघ के संचालक के रूप में भी मेरी जिम्मेदारी थी। इसके बाद अधिक समय बचता ही नहीं था, लेकिन मेधा उत्पल और अभिजात की जिम्मेदारी बखूबी संभाल रही थी। यानी एक तरह से जीवन एक स्थिर स्वरूप में आने लगा था।

गोवा आने के बाद कुछ ही दिनों में मुझे “संघचालक” की जिम्मेदारी दी गई। घर के सभी लोग संघ के कार्य में लगे ही थे, परन्तु मैं राजनीति की तरफ जाऊँगा ऐसा मुझे या उन्हें कभी नहीं लगा। 1994 के चुनावों में भाजपा की तरफ से उम्मीदवार की खोजबीन जारी थी। संघ ने मुझे उम्मीदवार चुनने का कार्य दिया था। अनेक लोगों से इंटरव्यू और भेंट करने के बाद मैंने कुछ नाम समिति के पास भेजे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। मैंने जिनके नाम चुनाव समिति को भेजे थे, उन सभी ने आपस में एकमत होकर मेरा ही नाम उम्मीदवार के रूप में पेश कर दिया। मेरे लिए और मेधा के लिए भी यह एक झटके के समान ही था। 1994 में मेरी राजनैतिक पारी शुरू हुई। मेरे लिए पणजी विधानसभा क्षेत्र चुना गया। भाजपा का गठबंधन महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी से था, लेकिन मुकाबला कड़ा था, इसलिए चुनाव प्रचार में मेधा के साथ मेरे माता-पिता भी जुट गए थे। यह मेरे लिए उनका पहला और अंतिम चुनाव प्रचार था। राज्य की राजधानी का मैं प्रतिनिधि चुना गया और इस प्रकार मेरे जीवन का अलग चरण आरम्भ हुआ।

राजनीति के कामों ने मुझे और भी अत्यधिक व्यस्त बना दिया। सब कुछ इतना अचानक घटित होता चला गया कि विचार करने का समय ही नहीं मिला। मेधा उन दिनों कुछ बेचैन रहती थी। फैक्ट्री चलाने और उसकी व्यावसायिक गतिविधियों के नुकसान को लेकर उसने चिंता जताई। मुझे भी पूर्णकालिक राजनीति पसंद नहीं थी, मैंने मेधा से वादा किया कि केवल दस वर्ष ही मैं राजनीति में रहूँगा और उसके बाद अपनी फैक्ट्री और बिजनेस पर ध्यान केंद्रित करूँगा। लेकिन समस्याएँ बताकर थोड़े ही आती हैं। राजनीतिक जीवन में प्रवेश करते ही कुछ दिनों में हृदयाघात से पिताजी का निधन हो गया। मानो घर का मजबूत आधार स्तंभ ही ढह गया। इस दुःख से बाहर भी नहीं निकल पाया था कि माताजी का भी स्वर्गवास हो गया। ईश्वर ने मानो मेरी परीक्षा लेने की ठान रखी थी।

माताजी के दुःख से उबरने के प्रयास में ही मेधा की बीमारी सिर उठाने लगी थी, यानी संकट एक के बाद एक चले ही आ रहे थे। उधर राजनैतिक जीवन में यश और सफलता की सीढ़ियाँ बिना किसी विशेष प्रयास के चढ़ता जा रहा था, लेकिन इधर एक-एक करके “मेरे अपने” मुझसे जुदा होते जा रहे थे। यदि मेधा जीवित रहती तो शायद उसे राजनीति छोड़ने वाला दिया हुआ वचन निभाया होता, लेकिन उसके न रहने के बाद मैंने खुद को राजनीति में पूरा ही झोंक दिया। अनेक लोग मुझसे पूछते हैं कि आप 24 घंटे काम क्यों करते हैं? लेकिन मैं भी क्या करूँ, जिसके कारण मैं राजनीति छोड़ने वाला था अब वही नहीं रही। परन्तु मेधा को दिए हुए वचन का आंशिक भाग मैंने पूरा किया, अपनी फैक्ट्री की तरफ अनदेखी नहीं की। आज भी मैं चाहे जितना व्यस्त रहूँ, दिन में एक बार फैक्ट्री का चक्कर जरूर लगाता हूँ और खुद भी वहाँ कुछ घंटे काम करता हूँ।

हाल ही में रक्षामंत्री बनने के बाद मेरी षष्ठीपूर्ति (60 साल की आयु पूरी होने पर) के अवसर पर कार्यकर्ताओं ने मेरे लिए एक सम्मान समारोह रखा था। इस कार्यक्रम में केन्द्रीय स्तर के सभी नेता और मित्र मौजूद थे। अपने शुभकामना भाषण में एक कार्यकर्ता ने (जिसे मालूम नहीं था कि मेधा अब इस दुनिया में नहीं है) कहा कि, “सर, आपने भी कभी ये गाना गाया होगा…. हम जब होने साठ साल के, और तुम होगी पचपन की…”, यह सुनते ही मेरी आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसमें उस बेचारे कार्यकर्ता की कोई गलती नहीं थी। अगले ही क्षण मेधा का मुस्कुराता हुआ चेहरा मेरे सामने आ गया। मैं तो साठ साल का हो चुका था, लेकिन जो पचपन की होने वाली थी वह मेरा साथ छोड़ चुकी थी। आज मेरे पास लगभग सब कुछ है, लेकिन जिसका साथ हमेशा के लिए चाहिए था, अब वही नहीं रही…”


सन्दर्भ :- मराठी पत्रिका “ऋतुरंग” दिवाली अंक 2017
मूल मराठी लेखक :- मनोहर पर्रिकर
अनुवाद :- Suresh Chiplunkar

13 साल की दलित से गैंगरेप, वीडियो बना किया वायरल: भाई ने देखा तो कराया FIR, 5 मुस्लिम युवक गिरफ़्तार

उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर से एक ऐसी चौंकाने वाली ख़बर आई है, जिसे उचित मीडिया कवरेज नहीं मिला। यहाँ कुछ मुस्लिम युवकों ने एक 13 वर्षीय नाबालिग छात्रा का तब सामूहिक बलात्कार किया, जब वह शौच के लिए घर से निकली थी। इतना ही नहीं, मुस्लिम युवकों ने गैंगरेप का वीडियो भी बना कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। इस नृशंस अपराध का मामला लगभग एक महीने बाद प्रकाश में तब आया जब उक्त किशोरी के भाई ने वीडियो को सोशल मीडिया पर देखा। रतनपुरी थाना क्षेत्र के तितावी में हुई इस घटना को लेकर इलाक़े में तनाव बना हुआ है।

हिंदुस्तान अख़बार के स्थानीय संस्करण में छपी ख़बर

स्थानीय अख़बारों में छपी ख़बर के अनुसार, उक्त किशोरी देर शाम शौच के लिए घर से बाहर निकली थी। वह पाँचवी कक्षा की छात्रा है। कुछ मुस्लिम युवकों ने सुनसान जगह देख कर उसे जबरन उठा लिया और खाली पड़े एक मकान में ले गए। उसी मकान में उन्होंने इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया। हथियार व तमंचे से लैस मुस्लिम युवकों के सामने दलित किशोरी की एक न चली और चिल्लाने के बावजूद सुनसान जगह होने के कारण उसकी आवाज़ किसी ने नहीं सुनी।

दैनिक जागरण के स्थानीय संस्करण में छपी ख़बर

अपराध को अंज़ाम देने के बाद अपराधी किशोरी को बदहवास अवस्था में छोड़ कर फरार हो गए। डर व लोक-लाज के कारण पीड़िता ने अपने घर में किसी को इस घटना की जानकारी नहीं दी थी। जब उसके भाई ने वायरल हुए वीडियो को देखा तो अपने पिता के साथ थाने में इस मामले की शिकायत की। जिसके बाद किशोरी को मेडिकल परिक्षण के लिए भेज दिया गया। पुलिस ने मामले का संज्ञान लेते हुए बलात्कार के पाँचों आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया है। वो मोबाइल भी बरामद कर लिया गया है, जिससे घटना के वक्त वीडियो बनाया गया था। गिरफ़्तार युवकों के नाम दानिश, माज उमामा, फरीद और सबूर हैं। उमामा के पास से तमंचा व हथियार भी बरामद किए गए हैं।

बलात्कार के आरोपित मुस्लिम युवकों द्वारा सोशल मीडिया पर वायरल की गई गैंगरेप की क्लिप को गाँव में भी कई लोगों ने देखा। अपराधियों पर पॉस्को एक्ट, एससी-एसटी एक्ट और आईटी एक्ट के तहत मुक़दमे दर्ज किए गए। हिंदुस्तान अख़बार में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, कुछ दिनों पूर्व हुई इस वारदात के बाद आरोपितों ने किशोरी को ब्लैकमेल भी किया था।

अमर उजाला के स्थानीय संस्करण में इस ख़बर के बारे में विस्तृत जानकारी

सभी अपराधियों ने मिलकर पीड़िता के परिजनों को धमकाया भी था। पीड़िता को जान से मारने की धमकी भी दी गई। क्षेत्र में तनाव की स्थिति होने के कारण अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है।

मोदी लहर बरकरार, बहुमत के साथ केंद्र में फिर लौटेगी मोदी सरकार: टाइम्स नाउ-VMR सर्वे

इस बार लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल से 19 मई तक सात चरणों में होने तय हुए हैं। ऐसे में चुनाव के पहले चरण की तारीख़ आने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। 2019 में सत्ता को लेकर हर पार्टी अपने-अपने दावे कर रही है, लेकिन आख़िरी नतीजे क्या होंगे यह तो 23 मई को ही मालूम पड़ेगा। उससे पहले लोगों की जिज्ञासा को कुछ हद तक शांत करने करने के लिए टाइम्स नाउ द्वारा एक सर्वे कराया गया है। जिसके निष्कर्ष बताते हैं कि इस बार भी लोगों का मूड एनडीए सरकार को ही सत्ता में लाने का है।

पाकिस्तान के बालाकोट में हुए हमले के बाद यह सबसे बड़ा सर्वे है। जिसका उद्देश्य ये जानना था कि क्या इस बार एनडीए सरकार को दूसरा कार्यकाल संभालने का मौक़ा मिलेगा? क्या नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे? हालाँँकि, इस सर्वे के मुताबिक 2014 में चली मोदी लहर के मुकाबले इस बार एनडीए के हिस्से में कम सीटें आती दिख रही हैं, लेकिन बावजूद इसके जीत एनडीए की ही होगी।

सर्वे के मुताबिक एनडीए को 543 में से 283 सीटें मिलने का अनुमान है, वहीं यूपीए केवल 135 सीटों पर सिमट जाएगी। इसके साथ ही इस सर्वे में ये बात भी निकलकर सामने आई कि दक्षिण भारत में एनडीए का जादू कुछ खास नहीं चल पाएगा, लेकिन बंगाल में बीजेपी को बढ़त प्राप्त होगी। इसके अलावा नार्थ इस्ट और हिंदी पट्टी वाले राज्यों में बीजेपी का दबदबा खासा कायम रहने वाला है। सर्वे बताता है कि भाजपा की पकड़ हिन्दी पट्टी राज्यों में बेहद मज़बूत है और सहयोगी दलों के बहुमत का आँकड़ा छूने के आसार भी नज़र आ रहे हैं।

यूपी में हुए सर्वेक्षण के अनुसार भाजपा अपना 2014 वाला जादू बरकरार रखने में असफल दिखाई पड़ रही है, क्योंकि 2014 में भाजपा का 43.3 फीसदी वोट साझा था और सहयोगियों के साथ मिलकर भाजपा ने 73 सीटें जीती थीं, लेकिन लग रहा है इस बार बीजेपी को केवल 42 सीटों पर ही संतुष्ट होना पड़ेगा। हालाँकि जीत तब भी बीजेपी की ही तय होने का अनुमान है, क्योंकि महागठबंधन के खाते में 36 और कॉन्ग्रेस के खाते में केवल 2 सीटें आ सकती हैं।

जैसा कि हमने बताया कि सर्वे के अनुसार बीजेपी और एनडीए को सत्ता वापसी कराने में हिंदी पट्टी के राज्य काफ़ी मददगार साबित होंगे। सर्वे कहता है कि दिल्ली की 7 सीटों पर बीजेपी का कब्जा होगा, जबकि मध्य प्रदेश के 29 में से 22 सीटों पर बीजेपी के जीतने के और राजस्थान में 25 में से 20 सीटें जीतने के अनुमान हैं।

काफी अड़चनें आने के बाद भी बीते कुछ दिनों से पश्चिम बंगाल में बीजेपी खुद को मज़बूत दिखाने में जुटी हुई है। ऐसे में यह सर्वे बीजेपी के लिए खुशखबरी लेकर आया है। अगर यह अनुमान हक़ीक़त में बदलते हैं, तो भाजपा को 32 फीसदी वोट शेयर और 11 सीटें प्राप्त हो सकती है। जबकि कॉन्ग्रेस और लेफ्ट का खाता खुलना न के बराबर नज़र आ रहा है।

बिहार में मोदी की लहर का जादू बरकरार है। 2014 में जहाँ पूरा चुनाव एकतरफा नज़र आ रहा था, वहीं हल्की फेर-बदल के साथ स्थिति वैसी ही हैं। 2014 में बिहार में बीजेपी को 51.5% वोट शेयर के साथ 30 सीटें मिली थी, जबकि 2019 में 48.40 वोट शेयर के साथ 27 सीटें मिलने का अनुमान है। वहीं यूपीए को चुनावों में 42.40 फीसदी वोट शेयर और 13 सीटें मिल सकती हैं।

दक्षिण राज्यों जीत हासिल करने की हर संभव कोशिशें बीजेपी द्वारा की जा रही है, लेकिन सर्वें के आधार पर इन सीटों पर भाजपा को फायदा मिलता नहीं दिख रहा है। 2014 में भी भाजपा को यहाँ से निराशा हाथ लगी थी और टाइम्स नाउ के सर्वे के मुताबिक इस बार भी परिस्थितियाँ पहले के मुकाबले बहुत बेहतर होती नहीं दिख रही हैं। तेलंगाना में टीआरएस के जीतने की संभावनाएँ हैं, क्योंकि यहाँ सर्वे भी उसे 17 में 12 सीट देता दिखा रहा है।

वहीं आन्ध्र प्रदेश में कॉन्ग्रेस को पिछले चुनावों में 8 सीटों पर जीत हासिल हुई, लेकिन इस बार यह आँकड़ा 22 सीटों के साथ जीत तक पहुँच संभव है। बता दें कि इससे पहले भी टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक मेगा पोल किया था जिसके नतीजों ने दर्शाया था कि इस बार बीजेपी को क़रीब 84 प्रतिशत लोग वापस सत्ता में लाना चाहते हैं।

हिन्दूफोबिया टपकता है हसन मिन्हाज के शो से

सोशल मीडिया पर कहीं पढ़ा था कि इस्लाम ने नरसंहार-पर-नरसंहार करते जाने और खुद को नफ़रत और असहिष्णुता का पीड़ित दिखाने की जुड़वाँ कला (twin arts) सदियों में परिष्कृत की है।

‘भारतीय’-अमेरिकी “मजहबी” (यह वह खुद लगाते हैं, हम नहीं) कॉमेडियन हसन मिन्हाज के नेटफ्लिक्स कॉमेडी शो ‘पैट्रियट एक्ट’ का भारतीय चुनावों पर एपिसोड इसी की तस्दीक करता है।

झूठ, प्रोपेगैंडा, अर्ध-सत्य, एकतरफा नैरेटिव बुनने की कोशिश- हसन मिन्हाज समुदाय विशेष

chutzpah यह कि हाँ, हाँ, हम तो समुदाय वाले हैं, इसलिए हमें तो बोलना ही नहीं चाहिए इन मुद्दों पर, वर्ना हम पाकिस्तान के एजेंट घोषित हो जाएँगे। गोया आपके घर कोई चोरी करे और उसके बाद बोले हाँ, हाँ, अब तो हमें चोर बोलोगे ही!

ओपनिंग ही विक्टिम-कार्ड से

शो शुरू करने से पहले ही हसन मिन्हाज वीडियो क्लिप्स चलाते हैं जिनमें उनके शुभचिंतक उन्हें भारतीय राजनीति पर न बोलने की सलाह देते हैं। एक मित्र तो उनसे कहते हैं कि ‘बाहर बहुत गंदगी है वहाँ, तुम अगर उन पर बोलोगे तो वही गन्दगी तुम पर आ जाएगी।’ उनके शो को देखकर यह साफ़ पता चलता है कि वह गंदगी हिदुत्व या हिन्दू धर्म को ही कह रहे हैं। ठीक भी है- जब इस्लाम काफ़िरों को इन्सान ही ‘काबिल-ए-क़त्ल’ मानता है तो आत्माभिमानी काफ़िर हिन्दू जाहिर तौर पर इन्सान नहीं, गंदगी ही बचेगा।

एयरस्ट्राइक पर पाकिस्तान का पक्ष, भारत का मखौल

हसन मिन्हाज शुरू से भारत सरकार को विलेन के तौर पर पेश करते हैं। वह बताते हैं कि ‘भारत सरकार मुकदमा कर देगी’ के डर से वह कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं दिखा सकते- यानि अगर डर न होता तो दिखा देते कि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है, है न?

उसके बाद वह बताते हैं कि कैसे दूसरों के कश्मीर के नक़्शे धुंधले कराते-कराते भारत के खुद के नक़्शे धुंधले हो गए और इसीलिए भारतीय वायुसेना आतंकवादियों को मारने की जगह पेड़ों पर बम गिरा आई। Chutzpah इसी को कहते हैं- आप पाकिस्तान की बोली भी बोलिए, और पाकिस्तान-समर्थक, जिहाद-समर्थक कहे जाने से बचने के लिए खुद ही यह ‘भविष्यवाणी’ कर दीजिए कि अब आपको पाकिस्तान का एजेंट करार दिया जाएगा।

असहिष्णुता का प्रोपेगैंडा, माइनॉरिटी होने पर भी इस्लामी एकाधिकार

हसन बताते हैं कि मोदी के आने के बाद से भारत अल्पसंख्यकों के प्रति ज़्यादा आक्रामक हो गया है। न केवल यह साफ झूठ है बल्कि इस्लाम की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति को भी वो एक बार फिर उजागर करते हैं।

उनके लिए ‘माइनॉरिटी’ केवल प्यारे, शांतिप्रिय समुदाय वाले ही हैं- जो न मंदिर तोड़कर मस्जिदें बनाते हैं, न मज़हब के आधार पर 4 शादियों के विशेषाधिकार से लेकर कमलेश तिवारी का सर कलम करने तक की माँग रखते हैं, और न ही नाम बदल-बदल कर हिन्दू लड़कियों से धोखे से शादी करने और उनका मज़हब बलात् बदलने का प्रयास करते हैं।

हसन मिन्हाज की माइनॉरिटी की परिभाषा में न तो बौद्ध, जैन, सिख आते हैं, और न ही भारत में बाहर से आए और शांति से रह रहे पारसी और यहूदी। क्योंकि माइनॉरिटी की परिभाषा और उसका समूचा फायदा ऐंठने पर भी हिन्दुओं/मूर्तिपूजकों को नीचा देखने वाले ईसाईयों व समुदाय विशेष का ही तो एकछत्र अधिकार है न?

केवल अल्पसंख्यक मंत्रालय के अंतर्गत अल्पसंख्यकों के लिए खास तौर उन्हें सिविल सर्वेंट बनाने के लिए ‘नई उड़ान’ योजना लाई गई, उनके हुनर को सलामत रखने के लिए ‘हमारी धरोहर’ योजना शुरू की गई, स्कूल ड्रापआउट्स के लिए ‘नई मंजिल’ योजना लाई गई।

इसी कालखण्ड में हिन्दुओं ने सबरीमाला और शनि शिगनापुर मंदिर खो दिए, केवल और केवल हिन्दुओं द्वारा संचालित स्कूलों पर लागू आरटीई आज भी बदस्तूर जारी है, संविधान की धारा 25-30 हमें मज़हबी प्रताड़ना और सरकारी हस्तक्षेप से नहीं बचाती- अगर मोदी सरकार से किसी को मज़हबी तौर पर नाराज़ होना चाहिए तो हिन्दुओं को, न कि आपके जैसे उन कट्टरपंथियों को जिनका हिंदुस्तान से कोई लेना-देना ही नहीं है।

पंथनिरपेक्षता का झूठ, हिन्दुओं में हज़ारों वर्णों का झूठ

“सेक्युलरिज्म भारत के संविधान में प्रतिष्ठापित है”। साफ झूठ।

भारत के संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने जबरन उस समय ठूंसा था जब हिंदुस्तान में लोकतंत्र नहीं था, आपातकाल था।

इसके विपरीत जिस हिन्दू-धर्म/हिंदुत्व को आप गंदगी, ‘आक्रामक’, व ‘अल्पसंख्यक-विरोधी’ कहते हैं, उसी हिंदुत्व ने भारत में समुदाय विशेष वालों सहित सभी मज़हबों और आस्थाओं के लोगों को हज़ारों साल पनाह दी। उस समय न संविधान था न संविधान में लिखा हुआ ‘सेक्युलरिज्म’। इसके बावजूद लाखों लोगों की हत्या और बलात्कार के बाद भी, हज़ारों मंदिरों के तोड़े और जलाए जाने के बाद भी हिन्दू और हिंदुस्तान ने समुदाय विशेष को अपने बीच बनाए रखा।

हसन मिन्हाज का अगला झूठ था कि हिन्दू समाज “हज़ारों वर्णों” में बँटा हुआ है। और उनके झूठ की तस्दीक खुद उनकी स्क्रीन पर ‘ब्राह्मण’, ‘क्षत्रिय’, ‘वैश्य’, ‘शूद्र’ (और साथ में ‘दलित’) को हाईलाईट करना करता है। साफ पता चलता है कि मकसद खाली हिन्दू समाज को बँटा हुआ दिखाकर और बाँटने की ज़मीन तैयार करना है।

हसन भारत को ‘दुनिया की सबसे विभिन्नता भरी जगहों में से एक’ तो बताते हैं, पर यह गोल कर जाते हैं कि यह विभिन्नता ‘गंदे’, काफ़िर हिंदुत्व/हिन्दू धर्म के चलते है। उनके प्यारे इस्लाम में तो एक अल्लाह की सरपरस्ती न मानने वाले को जहन्नुम में भेजने का वादा भी है और उसे जल्दी-से-जल्दी जहन्नुम के लिए रवाना कर देने के लिए जिहाद का हुक्म भी। यह काफिर हिन्दुओं का “एकं सद् विप्रैः बहुधा वदन्ति” ही है, जिसने हिंदुस्तान में आपकी प्यारी ‘डाइवर्सिटी’ को जिंदा रखा है।

कश्मीर, गुजरात दंगों पर फिर से प्रोपेगैंडा

कश्मीर की ‘त्रासदी’ का ज़िक्र करते हुए हसन मिन्हाज भूल कर भी उन कश्मीरी पण्डितों का ज़िक्र नहीं करते जिन्हें तीस साल पहले अपनी औरतों का बलात्कार और मासूम बच्चों का बेरहमी से कत्ल दिखाने के बाद अपने घरों से दरबदर कर दिया गया था।

हसन वामपंथियों के उस पसंदीदा विषय को भी उठाते हैं जिसे हिंदुस्तान के वामपंथियों ने उठाना बंद कर दिया है क्योंकि पता है कि उस झूठ से मोदी को फायदा ही हो रहा है- 2002। वह ‘मोदी ने 2002 में कुछ नहीं किया’ का रोना तो रोते हैं पर यहाँ इसकी साँस-डकार भी नहीं लेते कि 2002 के दंगों के पीछे कारक 60 बेकसूर, निहत्थे, अहिंसक कारसेवकों को इस्लामी भीड़ द्वारा जिन्दा जला दिया जाना था।

नोटबंदी पर वह ‘गरीबों को बड़ी तकलीफ हुई’ का रोना रोते हैं पर यह भूल जाते हैं कि उन्हीं गरीबों ने कुछ ही हफ़्तों बाद भाजपा को उत्तर प्रदेश में प्रचण्ड बहुमत दिया।

असम में वह भाजपा पर ‘प्रवासियों’ से नागरिकता छीनने का आरोप लगाते हैं। शायद अमेरिका में अवैध प्रवास की राजनीति करते-करते वो भूल गए हैं कि हिंदुस्तान के काफ़िर गैरकानूनी तरीके से आने वालों को ‘प्रवासी’ नहीं घुसपैठिया कहते हैं।

आदित्यनाथ, दलितों, लिंचिंग पर फिर झूठ

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ तो उनका झूठ ऐसा है कि लगता है उनका खुद बोलने का मन नहीं, ज़बरदस्ती बुलवाया जा रहा है। रजत शर्मा से आदित्यनाथ के इंटरव्यू का वीडियो चलता है। रजत शर्मा पूछते हैं कि योगी को, सन्यासी को असलहों का क्या काम? आदित्यनाथ जवाब देते हैं कि उनकी शिक्षा शस्त्र और शास्त्र दोनों में हुई है।

हसन मिन्हाज इस वार्तालाप का साफ़ तौर पर झूठा अनुवाद करते हैं। वे कभी इसे हथियारों का साम्य ध्यान लगाने से जोड़ना बताते हैं तो कभी हथियारों और अनुशासन की एकता का दावा करने का आरोप आदित्यनाथ पर लगाते हैं।

काफ़िरों के बारे में यहाँ पर हसन मिन्हाज को एक बात बता देना ज़रूरी है। हम काफ़िरों के ‘गंदे’ धर्म हिंदुत्व में आदित्यनाथ जिस नाथ संप्रदाय से आते हैं, उसकी परंपरा ही शस्त्र और शास्त्र में साम्य बिठाकर चलने की रही है। और नाथपंथी योगियों का हथियार उठाना भी सामान्यतः हसन मिन्हाज के ‘पाक’ इस्लाम के हमलों और कत्ले-आम के खिलाफ रहे हैं।

और हम ही क्यों, शस्त्रधारी योगियों की परंपरा जापानी और चीनी काफ़िरों की भी रही है।

आदित्यनाथ पर वह मुगलकालीन नामों वाली जगहों का नाम हिन्दू कर देने का आरोप लगाते हैं। पर यह नहीं बताते कि उन जगहों के पहले हिन्दू ही नाम थे, जिन्हें तलवार की नोक पर इस्लामी शासकों ने बदला था।

दलितों और लिंचिंग पर वह दो झूठ बोलते हैं:

  1. दलित समुदाय विशेष की तरह एक ‘अल्पसंख्यक’ समुदाय हैं
  2. लिंचिंग की घटनाएँ मोदी के आने के बाद से हो रहीं हैं

दलित हिन्दू हैं या नहीं यह तो उन्हें जाकर दलितों से ही पूछना चाहिए कि वे हिन्दू हैं या समुदाय विशेष की ही तरह अल्लाह के बन्दे। काफ़िर दलित वह जवाब देंगे कि हसन मिन्हाज याद ही रखेंगे। लिंचिंग की घटनाएँ मोदी के आने के बाद से हो रहीं हैं वाली झूठ के खिलाफ़ दो ही सबूत काफ़ी हैं- एक किसी अज्ञात स्रोत द्वारा इकट्ठा किया गया नमूना, और दूसरा अनीश्वरवादी, नोटावादी (यानि इन पर हिन्दू राष्ट्रवाद या राजनीतिक हित का आरोप नहीं लग सकता) वैज्ञानिक-लेखक आनंद रंगनाथन का यह ट्वीट, जो केवल 2013 की लिंचिंग की प्रमुख घटनाएँ इंगित करता है।

इस्लाम को सुधारने पर दीजिए ध्यान

हसन मिन्हाज जी, बेहतर होगा कि आप अपना समय हिन्दूफोबिया फैलाने की बजाय इस्लाम की एकाधिकारवादी, वर्चस्ववादी, मध्ययुगीन बर्बरता को मिटाने पर खर्च करें। कॉमेडी मैटर की वहाँ भी कमी नहीं है।

बाकी हर मज़हब समय के अनुसार बदल चुका है पर आपका दीन आज भी 1400 साल पुरानी मानसिकता की जंजीरों में जकड़ा है।

रही बात हिंदुस्तान के समुदाय विशेष वालों की, तो जो आधुनिक समय और मुख्यधारा के साथ बदल रहे हैं, कट्टरता छोड़ कॉमन सेन्स और सिविक सेन्स को अपना रहे हैं, वह हिंदुस्तान से बेहतर किसी मुल्क को नहीं मानते। अहमद शरीफ का यह लेख आपकी आँखें खोल देने के लिए काफी होना चाहिए।

विवादित कॉन्ग्रेस MLA ने महिला सरपंच का किया अपमान, बगल की कुर्सी से हटा जमीन पर बिठाया

चुनाव जीतने के बाद से ही लगातार अपने तेवर दिखा रही राजस्थान के ओसियाँ से कॉन्ग्रेस विधायक दिव्या मदेरणा का एक और वीडियो सामने आया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में विधायक महिला सरपंच को अपने बराबर बैठने से रोकती हुई दिख रही है। महिला सरपंच का अपमान करते हुए विधायक ने उन्हें मंच पर बैठने से रोक दिया। खेतासर गाँव की सरपंच चंदू देवी को विधायक दिव्या ने अपने बगल की कुर्सी से उठ कर मंच से नीचे पंडाल में बैठने को कहा। मजबूर सरपंच को मंच छोड़ कर नीचे बैठना पड़ा। इस वीडियो को लेकर विधायक साहिबा की जबरदस्त किरकिरी हो रही है। सोशल मीडिया पर लोगों ने विधायक के इस तेवर पर निशाना साधा। सरपंच के पति ने कहा कि चंदू देवी ने किसी भी प्रकार का विरोध नहीं किया क्योंकि वह एक सीधी-सादी महिला हैं और जीतने के बाद पहली बार गाँव आई विधायक का अपमान नहीं करना चाहती थीं।

वीडियो में साफ़-साफ़ देखा जा सकता है कि महिला सरपंच जैसे ही आकर विधायक के बगल में बैठती हैं, विधायक को यह नागवार गुजरता है। इसके बाद विधायक उन्हें कुर्सी से उठने का इशारा कर के नीचे बैठने को कहती हैं। इसके बाद सरपंच चंदू देवी को वापस जाना पड़ता है। महिला सरपंच ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि विधायक ने जनप्रतिनिधि होने के बावजूद उन्हें बराबर नहीं बैठने दिया और उनका अपमान किया। सरपंच ने कहा कि यह विधायक की सोच हो सकती है लेकिन उन्होंने ग्रामीणों के आग्रह करने पर विधायक का स्वागत किया और मंच पर पहुँचीं। इस पूरे घटनाक्रम पर सफाई देते हुए विधायक ने कहा कि वे कॉन्ग्रेस के कार्यक्रम में गई थीं लेकिन सरपंच भाजपा की थी।

सरपंच ने कहा कि गाँव का प्रथम नागरिक होने के कारण उनके लिए मंच पर कुर्सी लगाई गई थी लेकिन विधायक ने फिर भी उन्हें बैठने से मना कर दिया। इस से पहले चुनाव जीतने के बाद पहली बार क्षेत्र में पहुँची दिव्या मदेरणा का एसडीएम को फटकारते हुए वीडियो वायरल हुआ था। उन्होंने एसडीएम को धमकी देते हुए कहा था कि प्रदेश में सबसे पहले सीएम गहलोत हैं और जोधपुर में सबसे पहले उनका स्थान आता है। उन्होंने अपने कार्यक्रम में लेट आए एसडीएम को फटकारते हुए कहा था कि विधायक का कार्यक्रम छोड़कर आपके पास क्या अर्जेन्ट काम हो सकता है। उन्होंने एसडीएम से पूछा था कि क्या वह सीएम के पास गए थे जो अर्जेन्ट कार्य को देरी का कारण बता रहे हैं।

इसके अलावा पुलिस अधिकारियों को घुड़की देते हुए भी विधायक का वीडियो वायरल हुआ था। मथानिया बाईपास पर पुलिस अधिकारियों को फटकारते हुए दिव्या मदेरणा ने उन्हें कहा था कि सरकार और विधायक दोनों बदल गए हैं, इसीलिए वे भी अपना रवैया बदल लें। विधायक ने अपने पास शासन की बन्दूक होने की धमकी दी थी।

2010 में जिला परिषद का चुनाव जीती मदेरणा ने 2018 राजस्थान विधानसभा चुनाव में तत्कालीन भाजपा विधायक भारा राम चौधरी को हराया था। विधायक दिव्या मदेरणा के पिता पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा बहुचर्चित नर्स भँवरी देवी केस में आरोपित हैं। भँवरी देवी के पति ने कहा था कि महिपाल के कहने पर उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया गया था। इसके बाद सीएम गहलोत ने महिपाल मदेरणा को मंत्रिमंडल से बरख़ास्त कर दिया था। इस से पहले 1970 में पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत के भतीजे दिलीप सिंह की हत्या के मामले में भी महिपाल आरोपित रह चुके हैं। दिलीप सिंह की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी।

प्रमोद सावंत ने राजभवन में रात 2 बजे गोवा के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, कैबिनेट ने भी ग्रहण की शपथ

गोवा में मनोहर पर्रिकर के उत्तराधिकारी के रूप में प्रमोद सावंत को पार्टी ने जिम्मेदारी सौंपी है। प्रमोद सावंत ने रात 2 बजे गोवा के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। प्रमोद सावंत को गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने पद और गोपनियता की शपथ दिलाई। बता दें कि प्रमोद सावंत के अलावा गोवा में दो डिप्टी सीएम भी बनाए गए हैं। इस अवसर पर प्रमोद सावंत ने कहा, “पार्टी ने जो जिम्मेदारी मुझे दी है उसे निभाने की मेरी पूरी कोशिश रहेगी। मैं जो भी कुछ हूँ मनोहर पर्रिकर की वजह से ही हूँ। उन्होंने ही मुझे राजनीति में लाया और उन्हीं के बदौलत मैं गोवा विधानसभा का स्पीकर बना।”

पेशे से किसान और आर्युर्वेदिक डॉक्टर प्रमोद सावंत मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने से पहले गोवा विधानसभा के अध्यक्ष हैं। 45 वर्षीय डॉ. सावंत की पत्नी सुलक्षणा भी बीजेपी में नेत्री हैं और साथ में शिक्षिका भी हैं। गोवा बीजेपी के नेता 45 साल के डॉ. प्रमोद सावंत का जन्म 24 अप्रैल 1973 को हुआ। सैंकलिम विधानसभा क्षेत्र से चुनकर आए डॉ. प्रमोद सावंत का पूरा नाम डॉ. प्रमोद पांडुरंग सावंत है।

MGP के सुदिन धवलिकर और गोवा फॉरवर्ड पार्टी के विजय सरदेसाई डिप्टी सीएम बनाए गए हैं। प्रमोद सावंत के साथ दोनों डिप्टी सीएम और मंत्रिमंडल ने भी शपथ ग्रहण किया। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के रविवार (मार्च 17, 2019) को हुए निधन के बाद से यह पद खाली था।   

रंग ला रहे भारत के प्रयास, लंदन कोर्ट ने नीरव मोदी के ख़िलाफ़ जारी किया गिरफ़्तारी वारंट

ताज़ा ख़बरों के अनुसार लंदन के वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने आर्थिक भगोड़े नीरव मोदी के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी किया है। एएनआई ने प्रवर्तन निदेशालय के सूत्रों के हवाले से यह सूचना दी। इसके बाद नीरव मोदी की कभी भी गिरफ़्तारी हो सकती है। दरअसल, बैंकों का 13 हजार करोड़ रुपया डकार कर फरार नीरव मोदी पिछले दिनों लंदन की सड़कों पर अपना लुक बदलकर निडर घूमता दिखा था। मीडिया के सवालों को उसने हँस कर टाल दिया था। उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया जा चुका है। इसके बाद ब्रिटेन की वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और गिरफ़्तारी वारंट जारी कर दिया। इसे भारत सरकार की एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

इस दौरान भारत में प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई की टीमें लंदन स्थित सम्बंधित विभागों से लगातार संपर्क में है। भारतीय हाई कमीशन को भी संपर्क में रखा गया है। रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि कुछ ही दिनों में भारतीय एजेंसियों की टीमें लंदन के लिए रवाना होंगी। हाल ही में लंदन की सड़कों पर नीरव मोदी के दिखने के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी बयान जारी किया था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा था कि नीरव मोदी के प्रत्यर्पण को लेकर कार्यवाही की जा रही है। लंदन में उनके दिखने का मतलब यह नहीं है कि उसे तुरंत भारत लाया जा सकता है। इसके लिए एक चरणबद्ध प्रक्रिया होती है, जिसे पूरी की जा रही है।

भगोड़ा हीरा कारोबारी नीरव मोदी लंदन में शानो-शौकत की ज़िंदगी जी रहा है। नवभारत टाइम्स में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, वह लंदन के वेस्ट एंड इलाके के जिस अपार्टमेंट में रह रहा है उसकी कीमत 73 करोड़ रुपए के आसपास है। नीरव मोदी ने अपने आवास से कुछ दूरी पर ही हीरे का नया कारोबार शुरू किया है, जो उसके फ्लैट से जुड़ा हुआ है। मई 2018 उसने नई कंपनी बनाई, जो उसके अपार्टमेंट से लिंक्ड है। यह कंपनी घड़ी और जूलरी का होलसेल और रिटेल कारोबार करने के लिए लिस्टेड है। ब्रिटेन की वेस्टमिंस्टर कोर्ट की तरफ से वारंट जारी करने से एक उम्मीद बँध रही है कि नीरव मोदी की गिरफ्तारी हो सकती है। इसके बाद उसका प्रत्यर्पण भी हो सकता है।

ख़बर आई थी कि पंजाब नैशनल बैंक को ₹13 हजार करोड़ का चूना लगाने वाले भगोड़े हीरा कारोबारी के अवैध बंगले ध्वस्त किए जाएँगे। महाराष्‍ट्र के रायगढ़ जिले में अलीबाग बीच के पास उसके ‘अवैध’ बंगले हैं, जिन्हें इसी सप्ताह ध्वस्त किया जाएगा। ये वही बंगले हैं जहाँ कभी नीरव भव्‍य पार्टियाँ दिया करता था। हाल ही में इस बंगले को कलेक्‍टर ऑफ़िस ने जाँच के बाद अवैध घोषित किया था।

दादी का घर घूमने वाली प्रियंका गाँधी ने कुछ ही दूर दादाजी फ़िरोज़ के क़ब्र को पूछा तक नहीं, जानिए क्यों?

प्रियंका गाँधी रविवार (मार्च 17, 2019) की रात स्वराज भवन में गुजारी। इस दौरान ‘भावुक’ प्रियंका ने अपनी दादी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को भी याद किया। उन्होंने बताया कि उनकी दादी बचपन में उन्हें ‘जॉन ऑफ ओर्क’ की कहानी सुनाया करती थी। लेकिन, प्रियंका गाँधी ने अपने दादाजी को याद करना मुनासिब नहीं समझा। आनंद भवन से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित फ़िरोज़ गाँधी की कब्र को प्रियंका ने वैसे ही नज़रअंदाज़ किया, जैसे राहुल व सोनिया करते आए हैं। ऐसे में प्रियंका गाँधी जब अपनी दादी की बात कर रही थी, लोगों द्वारा यह पूछना लाजिमी था कि वह अपने दादा को कब याद करेंगी? पारसी समुदाय से आने वाले फ़िरोज़ जहाँगीर गाँधी का निधन 8 सितंबर 1960 को हो गया था। फ़िरोज़ ने महत्मा गाँधी से प्रेरित होकर अपना सरनेम ‘गैंडी’ से ‘गाँधी’ कर लिया था।

प्रियंका गाँधी से पहले राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी भी फ़िरोज़ गाँधी के कब्र को नज़रअंदाज़ करते आए हैं। कॉन्ग्रेस के प्रथम परिवार सहित सभी बड़े नेता राजीव गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गाँधी की समाधी पर तो जाते रहे हैं लेकिन फ़िरोज़ गाँधी की समाधी को कोई पूछता तक नहीं। फ़िरोज़ के अलावा गाँधी परिवार के अन्य पूर्वजों की जयंती या पुण्यतिथि के मौके पर सभी बड़े कॉन्ग्रेसी नेताओं का जमावड़ा लगता है लेकिन फ़िरोज़ की जयंती और पुण्यतिथि कब आकर निकल जाती है, इसका पता भी नहीं चलता। उनका कब्र यूँ ही सूना पड़ा होता है, सभी मौसम में, बारहो मास। चुनावी मौसम में भी कॉन्ग्रेस द्वारा इंदिरा, राजीव और नेहरू तो ख़ूब याद किए जाते हैं लेकिन उनकी ही पार्टी में फ़िरोज़ का नाम लेने वाला भी कोई मौजूद नहीं है।

ऐसा नहीं फ़िरोज़ गाँधी कॉन्ग्रेसी नहीं थे या राजनीति में उनकी हिस्सेदारी नहीं थी। गाँधी परिवार की परंपरागत सीट रायबरेली के पहले सांसद भी फ़िरोज़ गाँधी ही थे। 1952 में हुए स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव में उन्होंने यहाँ से जीत दर्ज की थी। इसके बाद 1957 में भी उन्होंने यहाँ से जीत दर्ज की थी। राजनीति में सक्रिय रहने वाले फ़िरोज़ गाँधी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भी काफ़ी मुखर थे। आप जान कर चौंक जाएँगे कि उनके विरोध के कारण प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कैबिनेट में वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। उस दौरान कॉन्ग्रेस नेताओं के बड़े उद्योगपतियों के साथ अच्छे-ख़ासे सम्बन्ध बनने लगे थे, जिसका फ़िरोज़ ने भरपूर विरोध किया था।

क्या कॉन्ग्रेस इसीलिए फ़िरोज़ गाँधी को याद नहीं करना चाहती क्योंकि उनका नाम आते ही उनका नेहरू सरकार की आलोचना करना फिर से प्रासंगिक हो जाएगा? क्या कॉन्ग्रेस इसीलिए फ़िरोज़ को याद नहीं करना चाहती क्योंकि उनका नाम आते ही उनके कारण नेहरू के मंत्री के इस्तीफा देने की बात फिर से छेड़ी जाएगी? क्या कॉन्ग्रेस फ़िरोज़ खान की बात इसीलिए नहीं करना चाहती क्योंकि बड़े कॉंग्रेस नेताओं व उद्योगपतियों के बीच संबंधों की बात फिर से चल निकलेगी? जब उनका नाम आएगा, तो इतिहास में फिर से झाँका जाएगा। अगर उनका नाम आएगा तो उनके सुनसान कब्रगाह की बात आएगी, कॉन्ग्रेस नेताओं व गाँधी परिवार की थू-थू होगी। अब कॉन्ग्रेस चाह कर भी फ़िरोज़ गाँधी की प्रासंगिकता को ज़िंदा नहीं करना चाहेगी क्योंकि उनसे सवाल तो पूछे जाएँगे।

फ़िरोज़ गाँधी की सूनी पड़ी कब्र

आपको बता दें कि पारसी फ़िरोज़ गाँधी का अंतिम संस्कार पूरे हिन्दू रीती-रिवाजों के साथ किया गया था। बीबीसी के अनुसार, उन्होंने कई बार अंतिम संस्कार के पारसी रीति-रिवाजों से नाख़ुशी जताई थी। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका क्रिया-कर्म हिन्दू तौर-तरीकों से ही किया जाए। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने राहुल गाँधी को उनके दादा की याद दिलाई। जनवरी 2019 में शर्मा ने राहुल गाँधी को कुम्भ में आने का आमंत्रण देते हुए उन्हें फ़िरोज़ गाँधी के कब्रगाह पर मोमबत्ती जलाने की सलाह दी थी। शर्मा ने कहा था कि राहुल के ऐसा करने से दिवंगत आत्मा को शांति मिलेगी, फ़िरोज़ गाँधी की कब्रगाह भी प्रयागराज में ही है।

पारसी कब्रगाह के एक कोने में फ़िरोज़ गाँधी की कब्र अभी भी आगुन्तकों की बाट जोह रही है। राहुल गाँधी शायद एक-दो बार वहाँ जा चुके हैं लेकिन पिछले 8 वर्षों से शायद ही गाँधी परिवार का कोई व्यक्ति वहाँ गया हो। पिछले एक दशक में प्रियंका गाँधी के वहाँ जाने के कोई रिकॉर्ड नहीं हैं। आलम यह है कि कब्रिस्तान की रखवाली के लिए एक चौकीदार है जिसके रहने के लिए दो कमरे बने हुए हैं। इसके अलावा कब्रिस्तान में एक कुआँ और एक मकान है। कब्र और कब्रिस्तान की स्थिति जर्जर हो चुकी है। अपने ही परिवार की उपेक्षा के कारण यह स्थिति हुई है। कहा जाता है कि 1980 में उनकी बहू मेनका गाँधी ने यहाँ का दौरा किया था। मेनका गाँधी अभी मोदी कैबिनेट में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।

अगर कॉन्ग्रेस फ़िरोज़ गाँधी की बात करती है तो यह भी याद दिलाया जाएगा कि उन्ही की पत्नी इंदिरा गाँधी ने अपने पति के द्वारा बनवाए गए क़ानून को कचरे के डब्बे में फेंक दिया था। नेहरू काल में नियम था कि संसद के भीतर कुछ भी कहा जा सकता था लेकिन अगर किसी पत्रकार ने इस बारे में कुछ लिखने या बोलने की कोशिश की तो उसे सज़ा तक मिल सकती थी। इसे हटाने के लिए फ़िरोज़ गाँधी ने संसद में प्राइवेट मेम्बरशिप बिल पेश किया। बाद में इस क़ानून को फ़िरोज़ गाँधी प्रेस लॉ के नाम से जाना गया। आपातकाल के दौरान इंदिरा ने अपने पति के नाम के इस क़ानून की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी। क्या कॉन्ग्रेस को इस बात के चर्चा में आने का डर है? बाद में विरोधी जनता पार्टी की सरकार ने इस क़ानून को फिर से लागू किया। इस तरह से फ़िरोज़ गाँधी को अपनों ने ही दगा दिया, विरोधियों ने अपनाया।

क्या कारण है कि देश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक परिवार के पूर्वज की कब्रगाह पर कचरों का ढेर लगा पड़ा है? दशकों तक केंद्र से लेकर यूपी तक कॉन्ग्रेस की सरकार रही लेकिन फ़िरोज़ गाँधी उपेक्षित क्यों रहे? सवाल तो पूछे जाएँगे। प्रियंका से भी पूछे जाएँगे। दादी को याद कर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाली प्रियंका को दादा को याद करने से शायद कोई राजनीतिक फ़ायदा न मिले। अफ़सोस कि भारत में एक ऐसा भी परिवार है जो अपने पुरखों को याद करने के मामले में भी सेलेक्टिव है। आशा है कि प्रियंका गाँधी उत्तर प्रदेश कैम्पेन के दौरान एक न एक बार तो फ़िरोज़ गाँधी की समाधी पर ज़रूर जाएँगी।

जिस ‘गंगा’ को लेकर हमेशा पीएम मोदी पर साधा निशाना, क्यों आज उसी की शरण में पहुँची प्रियंका

चुनाव के समय में राजनीति के गलियारे में हलचल होना तो लाजिमी है। कुछ राजनेता या राजनेत्रियों को चुनाव के समय ही देश की जनता और उनकी समस्याएँ दिखाई देती हैं। इन्हीं में से एक हैं हाल फिलहाल में ही राजनीति में सक्रिय होने वाली कॉन्ग्रेस नेत्री प्रियंका गाँधी वाड्रा। जिन्हें मोदी सरकार के कार्यकाल के साढ़े चार साल बाद याद आया कि देश और देश की जनता संकट में है।

दरअसल, कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने अपने चुनावी स्वार्थ साधने के लिए प्रयाग से काशी तक ‘गंगा यात्रा’ किया। इस दौरान उन्होंने एक जनसभा को संबोधित करते हुए देश की जनता प्रति अपनी सहानुभूति दिखाते हुए कहा कि इस समय देश संकट में है, इसलिए उन्हें घर से बाहर निकलना पड़ा।

अब यहाँ पर ये सवाल बन पड़ता है कि उनके मुताबिक देश में अभी जो भी समस्याएँ हैं, जिसकी वजह से देश संकट में है, वो क्या इन्हीं पिछले छ: महीने में उत्पन्न हुई है? वास्तव में तो उनका ये मानना है कि जब से कॉन्ग्रेस के हाथ से सत्ता छिनकर मोदी सरकार के हाथ में आई, तभी से समस्याएँ हैं। तो फिर वो इतने दिन कहाँ थी? क्यों नहीं उन्होंने भारत भ्रमण करके देश के जनता की समस्याओं को जानने और समाधान करने की कोशिश की? अभी अचानक से क्यों याद आई? चूँकि, अभी चुनाव है इसलिए आपको देश की जनता और देश के ऊपर संकट नज़र आ रहा है।

वैसे गौर करने वाली बात तो ये भी है कि जिस वाराणसी क्षेत्र से पीएम मोदी ने 2014 में चुनावी बिगुल फूँका था और कहा था कि वो यहाँ खुद नहीं आए हैं। उन्हें माँ गंगा ने बुलाया है और फिर उन्होंने गंगा सफाई की बात की थी, जिसके लिए बाद में मंत्रालय भी बनाया गया। गंगा की सफाई को लेकर कॉन्ग्रेस ने हमेशा सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार जनता को बरगला रही है। साथ ही गंगा की सफाई को लेकर भी सवाल उठाए। आज उसी कॉन्ग्रेस की महासचिव माँ गंगा की शरण में जाकर जनता से वोट माँग रही है। वो जनता से कह रही हैं, “गंगा उत्तर प्रदेश का सहारा है। मैं गंगा का सहारा लेकर आपके बीच पहुँचूँगी।” इसके साथ ही उन्होंने गंगा जल भी पिया। जब आपकी नज़र में गंगा इतनी अस्वच्छ है तो फिर आप इसका जल पीकर जनता को क्या दिखाना चाहती हैं?

इससे तो साफ जाहिर होता है कि प्रियंका ने इन सब चीजों का सहारा हिंदुत्व और गंगा प्रेम दिखाने के लिए लिया है। जिससे कि वो हिंदू वोटरों को साधने में सफल हो सकें। वरना हमेशा पीएम मोदी का विरोध करने वाली प्रियंका क्यों आज उनका अनुसरण कर चुनाव जीतने की कोशिश में जुटी है?