Home Blog Page 5990

‘भारत की नदियों से पाकिस्तान जाने वाला 5 लाख 30 हज़ार एकड़ फ़ीट पानी रोका गया’: अर्जुन राम मेघवाल

भारतीय जनता पार्टी के नेता और बीकानेर लोकसभा क्षेत्र के सांसद अर्जुन राम मेघवाल ने अपने एक बयान में यह साफ कर दिया है कि भारत की तरफ से पाकिस्तान जाने वाला ब्यास नदी का पानी रोक दिया गया है और उसे संरक्षित कर लिया गया है। राजस्थान और पंजाब के हिस्से के पानी को पाकिस्तान जाने से रोकने के लिए उन्होंने भारत सरकार की सराहना की और इसे बड़ी उपलब्धि बताया।

वर्तमान में केन्द्रीय जल संसाधन, गंगा विकास राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि मंत्रालय में इसके बारे में निर्णय लिया गया और इस पर एक्शन भी लिया गया। मेघवाल ने कहा कि भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड से जो उन्हें आँकड़ा प्राप्त हुआ है, उसके मुताबिक 5 लाख 30 हज़ार एकड़ फीट पानी को रोक दिया गया है जो कि पाकिस्तान जा रहा था।

सांसद ने कहा कि अभी तो शुरूआत हुई है, जैसे जैसे पानी को रोका जाएगा और स्टोर किया जाएगा, ये आँकड़ा बढ़ता जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अब जैसे ही राजस्थान या पंजाब को पानी की ज़रूरत होगी वो उपलब्ध रहेगा, पीने के लिए भी और सिंचाई के लिए भी।

गौरतलब है कि पुलवामा आतंकी हमले के बाद केंद्रीय जल संसाधन नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी ने ऐलान करते हुए कहा था कि अब पाकिस्तान जाने वाले पानी को रोक कर यमुना में लाया जाएगा
उन्होंने बताया था कि भारत के अधिकार में जो 3 नदियाँ हैं, उनके लिए प्रोजेक्ट्स तैयार कर लिया गया है। उन्होंने कहा था कि भारत से पाकिस्तान की तरफ जाने वाली रावी, व्यास और सतलुज नदी की धारा को पाक की तरफ जाने से रोक कर पंजाब व राजस्थान की तरफ मोड़ दिया जाएगा जिसकी शुरूआत हो चुकी है।


होली के पर्व पर ‘पानी’ की तरह बर्बाद होती किराए की कलमों की स्याही

कुछ ही वर्ष पहले तक मार्च की दस तारीख के आसपास गर्मियों का मौसम शुरू हो चुका होता था। होली के वक्त बदन पर पानी पड़ जाना सुखद होता था। मौसम के चक्र का समय बदलना हम लोग हाल के वर्षों में देख चुके हैं। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जो होगा वो सब अब किताबों और अंग्रेजी फिल्मों की कल्पना से निकलकर हकीकत की जमीन पर उतर आई घटनाएँ हैं।

हाल के वर्षों के समाचारों में लातूर दिखा। महाराष्ट्र में इस नाम की कोई जगह है, इसके बारे में ज्यादातर भारतीय लोग जानते भी नहीं होंगे। जब वहाँ रेल और टैंकर से पानी भेजे जाने की जरूरत पड़ने लगी तो ये अज्ञात सा इलाका अचानक सुर्ख़ियों में आ गया। जैसा कि हम अक्सर कहा करते हैं, मीडिया के पत्रकारों लिए “अच्छी खबर वो है जो बुरी खबर हो”, वैसा ही इस घटना में भी देखने को मिला।

जब सूखा पड़ा और ट्रेन से पानी भेजा जाने लगा, तब तो लातूर की ख़बरें खूब छपीं। आज वहाँ हालात बदले हैं, या नहीं, ये झाँकने कोई नहीं गया। क्या लोगों को वहाँ बारिश का पानी बचाना सिखाया गया? क्या जल संरक्षण के परम्परागत उपायों को जीवित किया गया? क्या अनुपम मिश्र की “आज भी खरे हैं तालाब” जैसी किताबों से निकाल कर कोई योजना वहां की जमीन पर उतरी? ऐसी कहानियां ढूँढने किसी को भेजा नहीं जाता।

एक दिन की होली को पानी की बर्बादी घोषित करने वाले लोग आपको ये नहीं बताते कि तथाकथित शुद्ध जल आरओ (रिवर्स ओसमोसिस) से निकालना हो तो एक लीटर पानी निकालने में कम से कम नौ लीटर पानी बर्बाद होता है। स्कूलों में जो बच्चों को सूखी होली खेलने के प्रण दिलवा रहे थे, उन्होंने आरओ में इस वर्ष कितना पानी बर्बाद किया, इसका हिसाब उनसे कोई पूछने ही नहीं गया।

हाल के दौर में भारत के प्रधानमंत्री ही नहीं, बिहार के मुख्यमंत्री भी पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर अपनी ओर से पहल करते नजर आये हैं। बिहार में हाल ही में, शराब की ही तरह, प्लास्टिक को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। बिहार के आधे हिस्से के लिए पानी की समस्या सूखा-ग्रस्त क्षेत्रों वाली ही है, लेकिन बाकी आधा ज्यादातर बाढ़ से जूझ रहा होता है। ऐसे में प्लास्टिक से निपटना जरूरी भी था।

पानी के निकास के लिए बनी नालियाँ, ज्यादातर वक्त कचरे, ख़ास तौर पर प्लास्टिक से जाम रहती हैं। पटना शहर मामूली सी बारिश में ही बाढ़-ग्रस्त सा दिखने लगता है। सिर्फ प्लास्टिक रोक देने से ये ठीक हो जाएगा ऐसा भी नहीं है, लेकिन फिर भी, कुछ ना करने से बेहतर ये एक शुरुआत तो है। पर्यावरण को सुरक्षित रखने के प्रयासों में बोतलबंद पानी पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

एक समस्या तो ये है कि इस तरह के बोतलबंद पानी के उत्पादन में, एक लीटर पानी निकालने के लिए कम से कम नौ लीटर पानी पूरी तरह बर्बाद हो रहा है। ये होली में हुई पानी की बर्बादी से कई सौ गुना ज्यादा है। होली में फेंका गया पानी तो जमीन सोख लेगी और वो फिर से पर्यावरण के चक्र में जाएगा। आरओ से खराब हुए पानी को दोबारा कृषि, सिंचाई इत्यादि में भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

बोतलबंद पानी से होने वाली दूसरी समस्या है उस पानी की बोतल। स्लमडॉग मिलियनेयर फिल्म जैसा उस पानी की बोतल का दोबारा इस्तेमाल ना हो, इसलिए तोड़ मरोड़ के प्लास्टिक की बोतल को फेंक दिया जाता है। शहरों के लिए ये कचरा कितना भारी होता है, इस बात का अंदाजा दिल्ली में हुई कुछ मौतों से लगाया जा सकता है। हाल ही में दिल्ली में चार लोग कचरे के ढेर के निचे दब कर मर गए थे जिन्हें देखने के लिए वहां के मुख्यमंत्री को जाना पड़ा था।

अगली पीढ़ी के लिए सोचना हो तो याद रखिये कि सबसे ज्यादा जहाँ बर्बादी होती हो, पहले उसपर नजर डालनी होगी। बाकी होली पर पानी की बर्बादी का रोना रोने से मिलने वाली जो टीआरपी है, उसका लालच तो कुछ किराये की कलमों को रहेगा ही।

पिछले 6 महीनों में दक्षिणपंथी न्यूज़ वेबसाइटों पर बढ़ा ट्रैफिक, वामपंथी में उतार-चढ़ाव

दक्षिणपंथी न्यूज़ पोर्टलों का बेहतरीन प्रदर्शन

यदि वेबसाइटों पर रहे ट्रैफिक को जनता के मूड के पैमाने के तौर पर देखें तो दक्षिणपंथी विचारधारा आम भारतीय जनमानस में तेज़ी से जगह बना रही है। वेब ट्रैफिक को इकठ्ठा कर उसमें रुझानों का विश्लेषण करने वाली वेब एनालिटिक्स कंपनी सिमिलरवेब द्वारा जारी फरवरी तक के वेब ट्रैफिक डेटा से इसकी पुष्टि होती है।

सिमिलरवेब द्वारा इकट्ठे किए गए आँकड़ों के अनुसार भारत के शीर्ष दक्षिणपंथी न्यूज़ पोर्टलों स्वराज्य और ऑपइंडिया ने बीते 6 महीनों (सितम्बर 2018 से फ़रवरी 2019 तक) में वेब ट्रैफिक में बेहतरीन बढ़ोतरी दर्ज की है। स्वराज्य पोर्टल पर उपरोक्त समय में मासिक ट्रैफ़िक जहाँ बढ़कर 17 लाख से 30 लाख तक जा पहुँची, वहीं ऑपइंडिया ने 10 लाख (सितम्बर 2018) से बढ़कर लगभग 17 लाख (फ़रवरी 2019) मासिक ‘विज़िटर्स’ तक छलाँग लगाई। इसी बीच ऑपइंडिया ने अंग्रेज़ी के साथ-साथ अपना हिंदी संस्करण हिंदी पइंडिया भी शुरू किया।

वामपंथी न्यूज़ पोर्टलों में उतार-चढ़ाव का माहौल

वहीं इसी समय सीमा के दौरान वामपंथी रुझान वाले न्यूज़ पोर्टलों पर ट्रैफ़िक या तो सुस्त या उतार चढ़ाव वाला रहा। वामपंथी रुझान वाले न्यूज़ पोर्टलों में शीर्ष पर मौजूद ‘द वायर’ में जहाँ नवम्बर के बाद से वेब ट्रैफिक लगातार ढलान पर है, वहीं दूसरे पायदान पर मौजूद द क्विन्ट इस साल (वर्ष 2019 में ) वेब ट्रैफ़िक में बढ़ोतरी देखने वाले चुनिंदा पोर्टलों में शामिल है। पर सिमिलरवेब द्वारा संज्ञान में लिए गए पूरे छः महीनों की समयसीमा पर यदि गौर करें तो ‘द क्विन्ट’ का भी मासिक ट्रैफ़िक ~65 लाख से गिरकर ~50-55 लाख हो जाना एक सुरक्षित अनुमान होगा।

रामायण के वर्तमान भारत नहीं बल्कि वर्तमान ईरान-अफ़ग़ानिस्तान में घटित होने जैसे विवादस्पद लेख छापने वाला पोर्टल ‘स्क्रॉल’ लगातार उतार-चढ़ाव के बीच सितम्बर, 2018 में 50 लाख से थोड़े कम से बढ़कर फ़रवरी, 2019 में 50 लाख से ज़रा ही ऊपर तक पहुँचने में सफल रहा।

आजतक चैनल चलाने वाले इंडिया टुडे ग्रुप का ‘डेली-ओ’ भी उतार-चढ़ाव भरी छमाही के अंत में अंततोगत्वा लगभग उतना ही ट्रैफ़िक (~9 लाख) जुटा पाया जितना कि छमाही के शुरू में था।

पुलवामा में हताहत हुए सीआरपीएफ जवानों की जातिगत गणना करने व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल के पुत्र पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने को लेकर विवादों का केंद्रबिंदु बने “कारवाँ” न्यूज़ पोर्टल को सबसे तगड़ा झटका लगा है। 5 महीनों में 2 लाख मासिक से बढ़कर 4.4 लाख मासिक तक पहुँचा कारवाँ का वेब ट्रैफ़िक फरवरी में लगभग 1 लाख का गोता लगाने के पश्चात् 3.4 लाख पर जा टिका।

नकारात्मक पत्रकारिता को नकारा

इसमें कोई दोराय नहीं कि मोदी सरकार न रामराज्य है और न ही उसकी वैचारिक भिन्नता के चलते आलोचना करना गलत या आपराधिक है, पर वामपंथी समाचार पोर्टलों ने मोदी-विरोध और देश-विरोध में कोई अंतर ही नहीं छोड़ा है। मोदी-विरोध में सच-झूठ का अंतर भुला देने और ख़बरों की यथास्थिति रिपोर्टिंग करने की बजाय एक नकारात्मकता और निराशा का एजेंडा आगे बढ़ाने का काम आज ज़्यादातर वामपंथी न्यूज़ पोर्टल कर रहे हैं।

और इसी नकारात्मकता से देश के उकताने का परिणाम है कि देश एक वैकल्पिक नैरेटिव की तलाश में है, जो कि दक्षिणपंथी मीडिया में उसे मिल रहा है।

एक बात और गौर करने लायक है कि अधिकांश दक्षिणपंथी मीडिया आउटलेट अपना वैचारिक आग्रह (ideological bias) खुल कर घोषित कर देते हैं (और जनता भी हमारी बातों पर विश्वास-अविश्वास उसी परिमाण में करती है जितने कि हम निष्पक्ष असल में रह पाते हैं)।

इसके ठीक उल्टे शायद ही कोई वामपंथी समाचार पोर्टल अपना वैचारिक आग्रह सर्वप्रथम आगे रखता है। आप, प्रिय वामपंथियो, अपना एजेंडा निष्पक्षता की ओट में चलाते हैं, जब कि अधिकांश दक्षिणपंथी पत्रकार और मीडिया संस्थान घोषित आग्रह के बावजूद यथासंभव निष्पक्षता-पूर्वक ख़बरों का विश्लेषण करने का प्रयास करते हैं, और खबर व अपनी राय को अलग-अलग परोसते हैं।

सिमिलरवेब और आंकड़ों के बारे में

वेब ट्रैफ़िक के आंकड़ों को इकठ्ठा और विश्लेषित करने वाली सिमिलरवेब इकलौती कंपनी नहीं है, और न ही इन आंकड़ों को ‘अंतिम तौर पर’ निर्णायक माना जा सकता है, चूँकि यह आँकड़े सिमिलरवेब की सीमित, मुफ़्त सेवा का प्रयोग कर इकट्ठे किए गए हैं।

पर इन तमाम सीमाओं के भीतर भी यह आंकड़े किसी भी विवेकशील व्यक्ति को यथास्थिति का भान कराने के लिए पर्याप्त हैं।

राष्ट्रवाद को गाली बनाने वाली स्वरा दिमाग से पैदल है: सोनम

पिछले दिनों लखनऊ के डालीगंज इलाके में सूखे मेवे बेच रहे दो कश्मीरी युवकों के साथ कुछ लोगों ने मारपीट की। इस बीच वहाँ मौजूद कुछ स्थानीय लोगों ने उन्हें बचाया और पुलिस को घटना की जानकारी दी।

बता दें कि डालीगंज पुल के फुटपाथ पर कश्मीरी युवक ड्राई फ्रूट बेच रहे थे तभी कुछ लोगों ने उन्हें पत्थरबाज बताते हुए उनकी पिटाई कर दी थी। किसी ने इस घटना का वीडियो बना लिया। इसके बाद पुलिस हरकत में आई और मुख्य अपराधी बजरंग सोनकर को गिरफ्तार कर लिया गया। सोनकर के तीन अन्य सहयोगियों हिमांशु गर्ग, अनिरूद्ध और अमर कुमार को भी गुरुवार को गिरफ्तार कर लिया गया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सोनकर का पुराना आपराधिक इतिहास रहा है और उसके ऊपर करीब एक दर्जन मुकदमे भी दर्ज हैं। पीड़ित जम्मू कश्मीर के कुलगाम के रहने वाले हैं और यहाँ मेवे बेचने आए हैं। कश्मीरी युवकों ने बाद में पत्रकारों से कहा कि वह पुलिस द्वारा की गई त्वरित कार्रवाई से संतुष्ट हैं।

मामला आक्रोश का था, जिसने अपराध का रूप लिया और जो भी इसमें शामिल रहा आज वह सलाखों के पीछे है।

पूरा मामला इतना ही है लेकिन ट्विटर पर स्वरा भास्कर ने इसे हाइपर राष्ट्रवाद से लेकर, जिन्गोइज़म से लेकर न जाने कौन-कौन से अपने चिर-परिचित रटे-रटाए वाद से जोड़कर पूरा विवाद खड़ा करना चाहा। जिसका जवाब भी उसी अंदाज में दूसरे ट्विटर यूजर सोनम महाजन ने दिया। आप भी देखिए कैसे तिल का ताड़ बनाया जाता है।

स्वरा ने कहा गुंडे और झूठे राष्ट्रवादी मस्कुलर राष्ट्रवाद और हाइपर राष्ट्रवाद में अंतर नहीं कर सकते तो जवाब में सोनम महाजन ने उन्हें दिमाग से पैदल कहा। पढ़िए स्वरा भास्कर और सोनम महाजन के सवाल-जवाब—

मोदी आतंकवादी जैसा दिखते हैं, डर लगता है बम गिरा देंगे: कॉन्ग्रेस नेता विजयाशांति

तेलंगाना शमशाबाद में आज प्रियंका गाँधी के भाई राहुल गाँधी की रैली से पहले कॉन्ग्रेस पार्टी नेता और पूर्व सांसद विजयाशांति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विवादित टिप्पणी कर अपनी मानसिक अशांति का परिचय दिया है। विजयाशांति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बारे में बेहद भद्दी टिप्पणी की है।

कॉन्ग्रेस की स्टार प्रचारक विजयाशांति ने तेलंगाना के शमशाबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी के भाषण से पहले बयान देते हुए कहा, “हर किसी को ये डर लगता है कि नरेंद्र मोदी कब बम गिरा देंगे, वो आतंकवादी की तरह दिखते हैं। लोगों को प्यार करने के बजाए वो लोगों को डराते हैं, प्रधानमंत्री को इस तरह पेश नहीं आना चाहिए।”

ट्विटर यूज़र्स ने विजयशांति के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि शायद विजयाशान्ति ने ये बयान राहुल गाँधी के भाषण से पहले उन्हें खुश करने के लिए दिया होगा। हालाँकि, कुछ लोगों का कहना है कि कॉन्ग्रेस ये डर नरेंद्र मोदी का नहीं बल्कि आने वाले लोकसभा चुनावों में मिलने वाली हार का डर है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी और इसके नेता अक्सर अपना दायरा लाँघ देते हैं और यही शायद पार्टी ने अपने सदस्यों को भी अच्छी तरह से समझाया है। इसी डर वाली बात पर नरेंद्र मोदी ने एक बार अपने भाषण में कहा था कि कुछ लोगों उनसे डर लगना भी चाहिए।

दो वामपंथी पार्टियों ने बाँटी सारी लोकसभा सीटें, गठबंधन किंकर्तव्यविमूढ़

सिद्धांत और व्यवहार का अंतर देखना हो तो किसी वामपंथी पार्टी को देख लीजिए। ध्यान देंगे तो वहाँ तानाशाही से लेकर पितृसत्ता सब नज़र आएगी। महिलाओं को अधिकार देने की बात केवल दूसरी पार्टियों को घेरने में इस्तेमाल की जाती है।

बात हो रही है वामपंथ के एकमात्र दुर्ग केरल की। जहाँ बाकी 8 पार्टियों के हक को दरकिनार कर 10 पार्टियों के गठबंधन की सारी सीटों को मात्र दो पार्टियों ने आपस में बाँट लिया और दोनों ने अपने उम्मीदवार उतारने का ऐलान भी कर दिया है।

बता दें कि, केरल में कुल 20 लोकसभा सीटें हैं। सभी 20 सीटों को गठबंधन की दो बड़ी पार्टियों ने साझा कर लिया है। LDF में शामिल सबसे बड़ी पार्टी सीपीआई (एम) ने राज्य की 16 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया, वहीं दूसरी बड़ी पार्टी सीपीआई 4 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने जा रही है।

मजेदार बात यह है कि इन सीटों पर भी मौजूदा सांसदों और विधायकों को ही मौका दिया गया है, यह कहकर कि इस बार जीतना ज़रूरी है। शायद मोदी फैक्टर का डर इतना हावी हो गया है कि गठबंधन की बाकी पार्टियों को पूर्णतया नज़रअंदाज कर दिया गया है।

ख़ैर, अब शायद ही कोई गठबंधन से पूछे कि कहाँ गई समानता की बात? क्या केरल में पिछड़ों को आगे बढ़ाने की बात LDF भूल गई। यह सिद्धांत उसे केवल दूसरी पार्टियों के सन्दर्भ में ही नज़र आता है।

बता दें कि महिला अधिकारों की दलील देने वाली इस गठबंधन के व्यवहार में कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा। कुल 20 सीटों में मात्र दो महिलाओं को मौका दिया गया है और वो भी उन्हें जो मौजूदा समय में सत्ता में हैं।

ISIS की ‘जिहादी दुल्हन’ के नवजात बच्चे की मौत, सीरिया से आना चाहती है वापस

‘जिहादी दुल्हन’ के नाम से दुनिया भर चर्चित हुई शमीमा बेगम के नवजात बेटे की मौत हो गई है।

बता दें कि बांग्लादेशी मूल की ब्रिटिश युवती ने 2015 में सीरिया जाकर आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट में शामिल होने का फैसला लिया था। ब्रिटेन से भागकर आतंकी संगठन आईएसआईएस में शामिल हुई शमीमा बेगम को पिछले दिनों बांग्लादेश और नीदरलैंड्स ने भी झटका दिया था। दोनों ही देशों ने उसे अपने यहाँ शरण देने से मना कर दिया था।

इससे पहले ब्रिटेन ने जिहादी दुल्हन के नाम से पहचान बना चुकी शमीमा की नागरिकता रद्द कर दी थी। तब बांग्लादेश ने अपनी सफाई में कहा था कि शमीमा के पास अब दोहरी नागरिकता नहीं है, इसलिए उसका फिलहाल उनके देश से कोई लेना-देना नहीं है।  

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सीरियन डेमोक्रेट के प्रवक्ता ने बताया कि बेगम के नवजात बेटे की मौत खराब स्वास्थ्य के कारण हुई है। दो सप्ताह पहले ही जन्मे बच्चे का नाम जर्राह था और जन्म के समय से ही न्यूमोनिया पीड़ित था।

यह जिहाद का जुनून ही था कि आईएसआईएस  में शामिल होने के लिए बेगम महज 15 साल की उम्र में लंदन से भागकर सीरिया पहुँच गई थी। आज उसके उसी जुनून ने उसकी ज़िन्दगी ज़हन्नुम बना दी है।

वह पिछले महीने दुनिया भर में उस समय सुर्खियों में छा गई, जब इस ‘ज़िहादी दुल्हन’ ने उसने सार्वजनिक रूप से ब्रिटिश सरकार से उसे वापस आने की अनुमति देने का अनुरोध किया था। और अब शमीमा बेगम के परिवार के लोग भी उसे ब्रिटेन वापस आने देने की माँग कर रहे हैं।

टिमाटर-लहसुन ‘स्ट्राइक’ से ठुका पाकिस्तान कर रहा भारत से तस्करी

पुलवामा हमले के बाद से ही पाकिस्तान के साथ बढ़ रही तनातनी के कारण पाकिस्तान पिछले दिनों कई तरह की समस्याओं से गुजर रहा है। लेकिन अन्य सभी समस्याओं के समानांतर पाकिस्तान इन दिनों ‘टिमाटर’ और लहसुन की समस्या से भी जूझ रहा है।

पुलवामा अटैक और उसके बाद भारत की एयर स्ट्राइक के चलते पाकिस्तान में टमाटर और लहसुन की किल्लत काफी बढ़ गई है। जिस कारण लाहौर के बादामी बाग स्थित सब्जी मार्केट में 2 घंटे के भीतर भारत से पहुँची 2 ट्रक लहसुन हाथों-हाथ बिक गई। इस बात की पुष्टि पाकिस्तानी अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने अपनी रिपोर्ट में की है। अखबार के अनुसार भारतीय पायलट अभिनंदन को छोड़े जाने के बाद भारत से टमाटर और लहसुन की तस्करी शुरू हो गई है।

दोनों देशों के बीच तनाव के चलते कारोबार ठप हो गया था और ट्रकों की आवाजाही भी रुक गई थी। लेकिन, अब श्रीनगर से पाकिस्तान के कब्जे वाले चकोटी के बीच ट्रकों का आवागमन शुरू हो गया है। रावलपिंडी और लाहौर के बाजारों में भारत से आई सब्जियों से लदे ट्रक पहुँचने लगे हैं।

शुक्रवार (मार्च 08, 2019) को लाहौर के सब्जी बाजार में भारत से गए 2 ट्रक लहसुन पहुँचे, बाजार के एक होलसेलर ने यह ऑर्डर दिया था। होलसेलर एसोसिएशन ने भारत के खिलाफ बैनर लगा रखे हैं, लेकिन कुछ कारोबारी भारत से आई सब्जियों को बेच कर मुनाफा कमा रहे हैं।

लाहौर के बादामी बाग फल एवं सब्जी मार्केट की एसोसिएशन के महासचिव के चौधरी खलील महमूद के मुताबिक यह ट्रक तस्करी के जरिए पहुँच रहे हैं। खलील ने दावा किया कि सीमा पर घूसखोरी के जरिए ट्रकों को पाकिस्तान में एंट्री दी जा रही है।

क्रिकेटर की मिलिट्री कैप हो गई ‘खतरनाक’, पाक अकुपाइड पत्रकार कब सुधरेंगे?

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ एक दिवसीय मैच के तीसरे मुकाबले में भारतीय क्रिकेट टीम ने शुक्रवार (मार्च 8, 2019) को पुलवामा में वीरगति प्राप्त हुए सेना के जवानों और उनके परिवार के सम्मान में मिलिटरी कैप को पहना।भारतीय टीम के इस कदम को सबके द्वारा सराहा गया लेकिन कुछ लोगों से यह बर्दाशत नहीं हुआ। वैसे तो इस कदम का विरोध पाकिस्तान द्वारा भी किया गया जो कि अपेक्षित था लेकिन कुछ घर के दीमकों ने इसे मुद्दा बनाया और अपनी सनी हुई विचारधारा को परोसने का एक बार फिर प्रयास किया।

इस मैच के खत्म होने के साथ ही न्यूज़ में एक हेडलाइन आई, “Indian team wearing Military Cap is a dangerous sign” जिसका अर्थ हुआ कि भारतीय टीम ने जो मिलिटरी कैप पहनी है वो एक खतरनाक निशान है। जाहिर है कि इतनी ‘बढ़िया’ हेडलाइन वाले आर्टिकल को अंदर तक पढ़ने का किसी का भी मन करेगा। आखिर इसी से तो मालूम चलता है कि एक पाठक को किस तरह बकवास बताते हुए बरगलाया जाता है।

इस लेख में पहले बताया गया कि वीरगति को प्राप्त हुए जवानों के परिवार वालों की मदद के लिए टीम द्वारा मिलिटरी कैप पहनकर प्रचार करना आवश्यक नहीं था और बाद में इस लेख में भारतीय टीम के इस कदम को अंधराष्ट्रीयता (outward military jingoism) से जोड़कर बताया गया। हालाँकि, भारतीय क्रिकेट टीम के लिए इस प्रकार के शब्दों का इस्तेमाल एक मज़ाक से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं लेकिन ऐसा करने के साथ आर्टिकल को लिखने वाले लेखक ने खुद के लिए अतिश्योक्ति के रास्ते को अख्तियार कर दिया।

मिलिट्री कैप को पहनने का स्पष्ट अर्थ था कि भारतीय क्रिकेट टीम वीरगति प्राप्त हुए सीआरपीएफ के जवानों और उनके परिवार वालों के साथ खड़ी है। यह कोई युक्ति नहीं थी जिससे अंदाजा लगाया जाए कि ऐसा दान कार्य को प्रचारित करने के लिए किया गया है। बल्कि यह कदम तो सभी भारतीय नागरिकों को राष्ट्रीय रक्षा कोष में योगदान देने के लिए प्रेरित करने का एक प्रयास था।

मालूम नहीं कि इस लेख को लिखने वाले लेखक इस बात को जानते हैं या नहीं लेकिन भारत में जिन दो चीजों को सबसे ज्यादा सराहा जाता है वो एक भारतीय सेना और दूसरी भारतीय क्रिकेट टीम है। सीमा पर सेना की कार्रवाई और पिच पर भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी के प्रदर्शन को लेकर लोगों में उत्साह बराबर ही देखने को मिलता है। ऐसे में अगर भारतीय क्रिकेट टीम भारतीय सेना के साथ खड़ी दिखती है, तो जाहिर है न इसमें कोई हैरानी वाली बात है और न ही खतरे वाली।

लेकिन इस लेख में इतने के बावजूद भी टीम और मिलिट्री कैप का military jingoism (सैन्य अंध-राष्ट्रभक्ति)के साथ तुल्नात्मक अध्य्यन खत्म नहीं हुआ और धीरे-धीरे इसका इतना विस्तार हुआ कि केवल मिलिट्री कैप पहनने भर को खतरनाक राष्ट्रवाद का नाम दे दिया गया।

राष्ट्रवाद के नाम पर ऐसा कभी नहीं हुआ? सचिन का हेलमेट भूल गए…

इस आर्टिकल में आगे लच्छेदार बातें करते हुए कहा गया कि आज से पहले कभी भारतीय क्रिकेट टीम ने इस तरह की ‘अंध-राष्ट्रीयता’ को अपने सर पर नहीं पहना था, लेकिन शायद लेखक महोदय भूल गए हैं कि क्रिकेट की दुनिया के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर ने हमेशा मैदान में अपने सिर पर तिरंगे को गर्व से सजाए रखा है।

सचिन तेंदुलकर

इसके बाद इस आर्टिकल में सवाल किया गया कि आखिर अब तक भारतीय टीम ने शिक्षा और अन्य जगहों में अपनी कमाई को क्यों नहीं दिया? मतलब साफ़ है लेखक को दिक्कत इस बात से हैं कि जवानों के लिए भारतीय क्रिकेट टीम में इतना प्यार क्यों है… खैर इस पूरे आर्टिकल को पढ़ते हुए आपको लगातार हँसी आएगी और आप यह सोचने पर मजबूर हो जाएँगे कि लेखक को आखिर यह तय करने का अधिरकार किसने दिया कि भारतीय टीम अपनी कमाई कब, किसे और कैसे देगी। लेकिन फिर भी, चूँकि इस लेख से लगता है कि लिखने वाला ‘गजनी’ फिल्म वाली बीमारी से पीड़ित है इसलिए याद दिला दें कि हाल ही में केरल बाढ़ पीड़ितों के लिए भारतीय क्रिकेट टीम ने पूरे टेस्ट मैच में मिलने वाले रुपयों को दान में दिया था। इसके अलावा टीम के खिलाड़ियों ने आम बच्चों और कैंसर पीड़ितों के लिए चैरिटी फुटबॉल मैच भी खेला था।

लेखक ने अपने लेख में जिन खिलाड़ियों पर सवाल उठाए हैं वो शायद नहीं जानते कि इन खिलाड़ियों ने निजी स्तर पर पशु कल्याण, स्वच्छ भारत मिशन, नारी सशक्तिकरण जैसे आदि मुद्दों पर अलग-अलग अपना योगदान दिया है। और अगर उन्हें याद है तो लगता है चुनाव के नज़दीक होने के कारण लेखक को केवल राष्ट्रवाद की छवि धूमिल करना ही उचित लग रहा है।

इस लेख में उस समय का भी हवाला दिया गया जब भारत की हॉकी टीम ने 1936 में “हेल हिटलर” को सैल्यूट करने से इंकार कर दिया था। उस समय इस घटना को फॉसिज्म के ख़िलाफ़ उठा कदम बताया गया था लेकिन वहीं आज भारतीय टीम के कदम को खतरनाक बता दिया गया जो स्पष्ट रूप से जवानों के साथ और आतंकवाद के ख़िलाफ़ खड़े थे।

वैसे देखा जाए तो अब हमें ऐसे लोगों की कही बातों पर हैरान होने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि देश में अभिव्यक्ति की आजादी का फायदा उठा कर तो ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारे दे दिए गए। फिर सेना की टोपी भर पहनने को अगर यहाँ पर ‘सैन्य अंध-राष्ट्रवाद’ से जोड़ा जाए तो क्या हैरानी है। दरअसल ऐसे लोगों को कोई लेना-देना नहीं हैं कि देश की सेना हमें सुरक्षित रखने के लिए किस तरह के प्रयास कर रही है। एक मिलिट्री कैप को पहनना इनके लिए निश्चचित ही डरावना हो सकता है, क्योंकि उससे इनकी विचारधारा पर खतरा मंडराना शुरू हो जाता है।

जब मोइन अली ने कलाई में बैंड बाँधकर खेला था मैच

इस आर्टिकल में लिखे झूठ अभी यहीं खत्म नहीं होते बल्कि आगे भी इसमें झूठों का विस्तार है। इस आर्टिकल में लिखा है कि मॉडर्न क्रिकेट के इतिहास में कभी अंतरराष्ट्रीय मैच के दौरान किसी ने भी सैन्य छलावरण टोपी या फिर कोई प्रतीक नहीं पहना। अब लेखक को कौन बताए कि आर्टिकल लिखने से पहले अगर वो सिर्फ गूगल पर थोड़ी जानकारी ले लेते तो उन्हें मालूम पड़ता कि 2014 में साउथएम्पटन टेस्ट में मोइन अली ने गाजा और पैलेस्टीन को आजाद करने के लिए कलाई में बैंड बांधकर खेल खेला था और पूरी टीम के कॉलर पर ‘हेल्प फॉर हीरोज़’ का लोगो भी लगा था। जाहिर है अति लिब्रल लोगों को उनके इस इशारे से किसी भी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं हुई होगी क्योंकि यहाँ से उनकी विचारधारा को कोई दिशा नहीं मिलती।

मोइन अली

जब धोनी और कोहली मिलिट्री कैप को पहनकर मैदान पर उतरे तब उन्होंने देश के उन करोड़ों लोगों का दिल जीता जिनके भीतर राष्ट्र और सेना के प्रति सम्मान है।

लेकिन आज हमारे देश में कुछ तथाकथित पत्रकारों की वो हालत है कि वो देश के नागरिकों में राष्ट्रवाद का गलत पर्याय फैलाने में जुटे हुए हैं। ऐसे लोग डरते हैं कि राष्ट्रवाद की भावना लोगों के भीतर जागरूकता को फैला रही है, जिसके कारण इनके अजेंडे कामयाब नहीं हो रहे। अब ऐसे में इसलिए यह लोग ऐसे माहौल का निर्माण कर रहे हैं जिसमें एक राष्ट्रवादी को आतंकवाद का चेहरा बताकर पेश किया जा रहा है और आतंकियों को सहिष्णुता और मानवता का संरक्षक।

बता दिया जाए कि ऐसे प्रोपोगेंडा फैलाने वाले ये वहीं लोग हैं जो ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं’ जैसे नारों को पैदा करते हैं और ‘भारत माता की जय’ बोलने पर इन्हें शर्म आने लगती हैं। ऐसे ही लोग पत्थरबाजों के समर्थन में खोज-खोज कर आर्टिकल लिखने को तैयार रहते हैं लेकिन जैसे ही भारतीय सेना इनके ख़िलाफ़ कदम उठाती हैं तो इन्हें उससे गुरेज़ होता है।

अंग्रेज़ी के मूल लेख का अनुवाद जयंती मिश्रा ने किया है।

तुम्हारे चक्कर में पाकिस्तानी एजेंट समझने लगे हैं लोग: वरिष्ठ कॉन्ग्रेस प्रवक्‍ता ने इस्तीफ़ा देकर किया टंटा खतम

एयर स्ट्राइक का सबूत माँगने पर कॉन्ग्रेस के अंदर ही ताबड़तोड़ घमासान शुरू हो गई है। आगामी लोकसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और बिहार कॉन्ग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. विनोद शर्मा ने ये कहते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया है कि कॉन्ग्रेस द्वारा सैनिकों के बलिदान का मजाक बनाना और सबूत माँगना निंदनीय है, इसी वजह से लोग उन्हें और कॉन्ग्रेस पार्टी को पाकिस्तान का एजेंट कहने लगे हैं।

शर्मा ने पार्टी की इस हरकत को शर्मनाक बताते हुए पद और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे दिया है। डॉ. विनोद शर्मा ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और प्रियंका गाँधी के भाई राहुल गाँधी को भेजे पत्र में लिखा, “मैंने पहले भी आपको पत्र और ई-मेल के जरिये पार्टी के कार्यकर्ताओं और जनता की भावना से अवगत कराने का प्रयास किया, लेकिन आपने इसकी अनदेखी की। पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद पूरा देश शोकाकुल है और आक्रोशित है, इसके बाद भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान में आतंकी प्रशिक्षण केंद्र बालाकोट पर एयर स्ट्राइक कर के साहसिक काम किया, जिसमें सैकड़ों आतंकवादियों की जानें गईं। आज पूरा देश सेना के पराक्रम और शौर्य पर गर्व कर रहा है, लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा एयर एयर स्ट्राइक और आतंकियों की सूची माँगना एक शर्मनाक और बचकानी हरकत है।”

विनोद शर्मा ने कहा, “कॉन्ग्रेस पार्टी सेना से पाकिस्तान के बालाकोट में मारे गए आतंकियों की सूची माँगती रही। यह निश्चित रूप से किसी भी देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी ऐसी बात करे। यह तय है कि सेना ने जो बम गिराए हैं, उससे 70 फीट गहरे गड्ढे होते हैं। 70 फीट गड्ढा और वहाँ आग का जो गोला था, ऐसे में कोई आतंकी कैसे बचेगा? यह सोचने वाली बात है। लेकिन कॉन्ग्रेस का बार-बार इस तरह की बातें उठाकर राजनीति करना, मुझे पसंद नहीं आया। मैं पिछले 30 वर्षों से पार्टी में काम कर रहा था। इस वजह से काफी दुखी मन से मैंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। पार्टी हित से ज्यादा राष्ट्रहित जरूरी है, इसलिए मैंने ऐसा किया।”

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता विनोद शर्मा ने कहा, “राहुल गाँधी को पार्टी के कार्यकर्ताओं की भावना को समझना चाहिए। पार्टी के कार्यकर्ता भी चाहते थे कि कॉन्ग्रेस इस तरह की बयानबाजी न करे। वजह ये है कि हमें सड़कों पर रहना पड़ता है। आम लोगों की बातों को सुननी पड़ती है। आम लोग चाह रहे थे कि पूरे देश के लोगों को सेना के साथ खड़ा रहना चाहिए। सभी राजनीतिक पार्टियों को सेना का साथ देना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यवश कॉन्ग्रेस जैसे भी हो, कहीं न कहीं गलत कदम उठा रही थी। सेना का मनोबल तोड़ने का काम कर रही थी।”

सेना के नाम पर राजनीति करने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी की गतिविधियों से दुखी पूर्व कॉन्ग्रेस प्रवक्ता विनोद शर्मा ने कहा, “हम लोगों को लगा कि देश सबसे सर्वोपरि है। राष्ट्र सर्वोपरि है। कॉन्ग्रेस अपने पथ से भटक रही है। आज हम इंदिरा जी का 47 वर्षों से नाम लेते हैं कि उन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े किए। ऐसा क्यों? उस समय वाजपेयी जी ने भी इंदिरा जी की सराहना की थी। लेकिन आज दुर्भाग्य ये है कि हमारे नेता राहुल गाँधी आम लोगों की भावना को नहीं समझ रहे हैं। सेना के पराक्रम और शौर्य को नीचा करने का काम कर रहे थे। ऐसी स्थिति में काफी दुखी मन से कॉन्ग्रेस पार्टी छोड़नी पड़ रही है।”

किसी और पार्टी में शामिल होने के सवाल पर विनोद शर्मा ने कहा, “अभी तक किसी पार्टी से बात नहीं हुई है। लेकिन जो पार्टी देश हित में बात करेगी, पार्टी से पहले देश को तवज्जो देगी, उसके साथ जाने पर विचार कर सकते हैं। मैं देश की जनता की भावना को ध्यान में रखते हुए आम आदमी के लिए काम करूँगा। हमारे पुराने नेता नेहरू जी, इंदिरा जी ने जो काम किया, उससे आज के नेता भटक रहे हैं। देश की भावना को नहीं समझ पा रहे हैं। हम लोगों को सड़कों पर लोग पाकिस्तानी एजेंट कहने लगे हैं।”

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता विनोद शर्मा ने कहा, “हमारा मन काफी द्रवित हुआ कि अगर हम भारत में हैं और कोई हमें ही पाकिस्तानी एजेंट कहे, कॉन्ग्रेस पार्टी के लोग को कहने लगे, तो हमारी अंतरात्मा से आवाज उठी। मैंने इस्तीफा देने का निर्णय लिया। हमारे प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा जी भी काफी आहत हैं। उन्हें भी लगता है कि राहुल गाँधी को ऐसा नहीं बोलना चाहिए। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष होने की वजह से वे खुलकर नहीं बोल रहे हैं।”

राहुल गाँधी की हरकतों से दुखी वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता का इस्तीफ़ा
https://platform.twitter.com/widgets.js

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता के इस्तीफे के बाद भाजपा ने ट्वीट कर कहा, “एयर स्ट्राइक पर सबूत माँगने वाली कॉन्ग्रेस के बिहार प्रदेश प्रवक्ता विनोद शर्मा ने पद और पार्टी से दिया त्यागपत्र। कहा पाकिस्तान का एजेंट के रूप में कॉन्ग्रेस को लोग देखने लगे हैं, ऐसे में इस पार्टी में रहना मुश्किल।”