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मल्लिका दुआ ने पिता पर मोलेस्टेशन का आरोप लगाने वाली महिला पर उठाए सवाल

विनोद दुआ की बेटी मल्लिका दुआ का विवादित चेहरा एक बार फिर सामने आया है। अपने पिता पर आरोप लगाने वाली महिला के ख़िलाफ़ एक बार फिर वो मुखर रूप से नज़र आई हैं। पिता पर लगे आरोपों को मनगढ़ंत बताने वाली मल्लिका दुआ ने पीड़िता को ही कटघरे में रखते हुए उसके ऊपर सवाल उठाए।

24 मार्च के एक ट्वीट में, मल्लिका ने गायिका सोना महापात्रा को ट्वीट किया। अपने ट्वीट में सोना महापात्रा से मल्लिका ने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मकार अर्घ्य बसु की आत्महत्या पर उनकी चुप्पी पर सवाल खड़े किए। 2017 में, फिल्म निर्माता अर्घ्य बसु पर एक निष्ठा जैन द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था, जो उनकी पूर्व बैचमेट थी। जैन ने आरोप लगाया था कि जब वे दोनों अध्ययन कर रहे थे, तब बासु ने उनके साथ छेड़छाड़ की थी, लेकिन चूंकि बसु अब एक फैकल्टी बन गए थे, उन्होंने अपना नाम राया सरकार की ‘कॉशनरी लिस्ट‘ में डाल दिया था, जिसे प्रोफेसरों के बीच यौन अपराधी कहा जाता था।

आपको बता दें कि निष्ठा जैन वही महिला हैं जिन्होंने पिछले साल अक्टूबर में विनोद दुआ पर मारपीट और छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। इस ख़बर के सुर्खियों में आते ही मल्लिका दुआ तुरंत एक्शन में आ गई थीं। इसके लिए उन्होंने सोना महापात्रा को निशाना बनाया क्योंकि इससे पहले भी महापात्रा ने मल्लिका को उनके पिता का समर्थन करने और उन लोगों का ज़िक्र करने की बात कही थी, जिन्होंने अवसरवादी के रूप में विनोद दुआ पर उत्पीड़न का आरोप लगाया।

मल्लिका दुआ के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए महापात्रा ने स्पष्ट किया कि वह बसु को नहीं जानती थी लेकिन उन्हें बसु की शराब की लत के बारे में अपने कुछ दोस्तों से पता चला था।

साथ ही महापात्रा इस बात से भी आश्चर्यचकित थी कि मल्लिका ने उन्हें ट्विटर पर अनब्लॉक कर दिया था, ताकि वो उन्हें और पीड़िता निष्ठा जैन को ताना दे सकें, जिन्होंने उनके पिता विनोद दुआ पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। इसके लिए मल्लिका ने महापात्रा पर एक एजेंडा होने का आरोप लगाकर इसे तुच्छ बताया।

मल्लिका ने यहाँ तक ​​कहा कि #MeToo आंदोलन पर उनके रुख़ के कारण सोना महापात्रा के पास काम की कमी है। जो, एक नारीवादी और महिलाओं के अधिकारों के चैंपियन के रूप में एक चौंकाने वाली बात है।

इस घटिया व्यवहार के बाद, मल्लिका ने सोना को फिर से ब्लॉक कर दिया और फिर से उन्हें धमकाने का आरोप लगाया।

इसके बाद मल्लिका, जिन्होंने सोना को ‘अनब्लॉक’ कर दिया था, ने उन्हें ट्विटर पर तमाम तरह के ट्वीट के ज़रिए टिप्पणी करना जारी रखा।

खादी बिक्री ₹3200 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर

खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार खादी की बिक्री ने चालू वित्त-वर्ष (2018-19) में ₹3200 करोड़ का आँकड़ा छू लिया है, और यह सर्वकालिक उच्चतम स्तर है। यह छलांग कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2013-14 में यही वार्षिक बिक्री केवल ₹1081 करोड़ की थी।

सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योग मंत्रालय (MSME) के मुताबिक 2017-18 में ₹2510 करोड़ की बिक्री हुई थी।

मोदी सरकार के दौरान लगभग 5x से दौड़ा चरखा

मोदी सरकार के पहले चार वर्षों के दौरान खादी बिक्री में बढ़त की दर 30% के करीब रही, जो पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के दस सालों के 6.7 फीसदी से लगभग 5 गुना अधिक है। इसके पीछे मुख्य कारक सरकार और खुद मोदी द्वारा खादी का आक्रामक प्रचार-प्रसार कारण माना जा सकता है, जिसके तहत मोदी ने न खुद कई महत्वपूर्ण मौकों पर खादी के स्टाइलिश परिधान पहने बल्कि अपने समर्थकों से भी कई-कई बार खादी पहनने और खरीदने का आग्रह किया। यहाँ तक कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के 2014 में भारत आगमन पर मोदी ने उन्हें भी खादी की जैकेट पहना दी

केवीआईसी चेयरमैन विनय कुमार सक्सेना के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष 201-18 में न केवल सरकारी कम्पनियों ने खादी की बम्पर खरीददारी की बल्कि केवीआईसी ने कई निजी कम्पनियों जैसे रेमण्ड, अरविन्द मिल्स, आदित्य बिरला फैशन आदि के साथ भी आपूर्ति अनुबंध किया। अकेले रेमण्ड ने पिछले वित्त वर्ष में 7.26 लाख मीटर सिलेटी खादी खरीदी। अरविन्द मिल्स ने खादी डेनिम के दस लाख वर्ग मीटर की खरीददारी की। यह कम्पनियाँ खादी को कच्चे मॉल के रूप में खरीद के इनसे बने परिधान अपने ब्राण्ड से बेचतीं हैं।

अगर सरकारी कम्पनियों द्वारा की जा रही खरीद की बात करें तो  वित्त वर्ष 2017-18 में ₹46 करोड़ के परिधानों का आर्डर ONGC से आया तो ₹43 करोड़ के आर्डर के साथ इंडियन ऑइल कारपोरेशन (IOC) भी ज्यादा पीछे नहीं रहा

इसके अतिरिक्त, सक्सेना के अनुसार, आयोग भारतीय डाक विभाग से भी अनुबंध को तेजी से अंतिम चरण में ले जाना चाहता है। इस अनुबंध के पश्चात 83,000 डाकियों का पहनावा भी खादी हो जाएगी।

खादी ग्रामोद्योग भवन में भी भारी बिक्री

दिल्ली के दिल कनाट प्लेस में स्थित खादी ग्रामोद्योग भवन ने भी जम कर खादी की बिक्री की है। केवल अक्टूबर-नवम्बर में ही 20,000 वर्ग फिट में फैला यह भवन 3 बार ₹1 करोड़  से ज़्यादा की बिक्री एक ही दिन में कर ले गया। इसके लिए डिस्काउंट स्कीम का सहारा लिया गया, जिसके नतीजे काफी उत्साहजनक रहे। 2017-18 में खाली इसी स्टोर से ₹103 करोड़ से अधिक की बिक्री हो चुकी है।

इंदिरा की नाक और राहुल का दिमाग वाली प्रियंका जी, भारत कॉन्ग्रेस की बपौती नहीं है

प्रियंका गाँधी को कौन नहीं जानता! गाँधी तो आप राहुल में भी लगा दोगे तो लोग उसे जानने लगते हैं, और इस क़दर जानने लगते हैं कि उसे जन्मजात प्रधानमंत्री समझने लगते हैं। प्रियंका गाँधी आजकल बोल रही हैं, जबकि आम तौर पर वो कहीं भी दिखती या बोलती नहीं। इस बार चुनाव नहीं लड़ रहीं क्योंकि ब्रिटेन के बैकऑप्स सर्विसेज़ और भारत की FTIL, Unitech जैसी संस्थाओं से उनके संबंधों को चुनावी हलफ़नामे में दिखाना पड़ेगा।

ये बात और है कि ‘गाँधी’ उपनाम को ढोने वाली प्रियंका इतनी ज्यादा विनम्र हो गई हैं कि उनके बयान को सुनकर आप भोक्कार पार कर (मतलब कलेजा फाड़ कर) रोने लगेंगे। इंदिरा की नाक के जस्ट नीचे वाले मुखारविंदों से वाड्रा जी की अर्धांगिनी ने कहा है कि अगर पार्टी चाहे तो वो चुनाव लड़ सकती हैं!

ग़ज़ब! मतलब… एकदम ग़ज़ब! प्रियंका गाँधी चुनाव लड़ेंगी या नहीं, ये पार्टी चाहेगी। इस पर विश्लेषण करके मैं अपना और अपने राष्ट्रवादी मित्रों का समय खराब नहीं करूँगा। हाँ, तीन सेकेंड चुप रहूँगा ताकि वो इस पर क़ायदे से हँस लें।

जब व्यक्ति चुप रहने का आदी हो, जितना कहा जाए, लिख कर दिया जाए उतनी ही पढ़ सकती हो, तो उससे जहाँ-तहाँ कुछ भी पूछ दीजिएगा तो अलबला जाएगी। ‘अलबलाना’ बिहार में प्रयुक्त होने वाला शब्द है जिसका मतलब वही है जो ऐसे सवाल पूछने पर प्रियंका गाँधी की प्रतिक्रिया होती है: समझ में नहीं आना कि क्या बोलें, और फिर कुछ भी बोल देना।

कल मोदी जी एक घोषणा की कि भारत के वैज्ञानिकों ने स्वदेशी तकनीक से निर्मित एंटी सैटेलाइट मिसाइल से एक सक्रिय उपग्रह को मार गिराया। उन्होंने कहीं भी, एक भी बार पार्टी या सरकार को बधाई नहीं दी। बल्कि उन्होंने इसके लिए डीआरडीओ, इसरो और वैज्ञानिकों समेत समस्त देश को इस उपलब्धि के लिए शुभकामनाएँ दीं। 

चूँकि, कॉन्ग्रेस स्वयं ही राहुल और प्रियंका जैसे बड़े चैलेंजों से जूझ रहा है, तो उनके पास मुद्दे तो वैसे भी और कुछ बचे नहीं है, इसलिए वो देश की हर उपलब्धि में नेहरू जी को टैग कर देते हैं। कॉन्ग्रेस ने तुरंत ही बता दिया कि इसरो की स्थापना किस सरकार, माफ कीजिएगा, किस पार्टी के शासनकाल में हुई थी, और असली श्रेय किसको जाना चाहिए। 

यहाँ कॉन्ग्रेस कन्वीनिएंटली भूल गई कि कुछ ही दिन पहले तक, और फिर पूछेंगे तो फिर कह देगी, बालाकोट एयर स्ट्राइक के लिए वो सेना का अभिनंदन कर रही थी और यह कैटेगोरिकली कहा था कि इसमें सरकार का कोई हाथ नहीं क्योंकि जेट में सैनिक थे, मोदी नहीं। अब यही कॉन्ग्रेस यह भी बताए कि इसरो की ईंट सोनिया गाँधी ने सर पर ढोई थी, कि राहुल गाँधी पान खाकर डीआरडीओ में स्पैनडैक्स पहनकर जॉगिंग किया करते थे।

बात यहीं खत्म हो जाती तो मुझे यहाँ तक आने की ज़रूरत नहीं पड़ती लेकिन प्रियंका गाँधी ने हाल ही में जिन शब्दों का प्रयोग किया है, वो सुनकर किसी भी नागरिक के तलवे की लहर मगज तक पहुँच जाएगी। उनका कहना है कि भारत में माचिस की डिब्बी से लेकर, मिसाइल तक, जो भी है, वो कॉन्ग्रेस की देन है।

यह बात कई स्तर पर मूर्खतापूर्ण है, या यूँ कहें कि राहुलपूर्ण है, या अब प्रियंकापूर्ण भी कह सकते हैं। पहली बात तो यह है कि कॉन्ग्रेस ने भले ही भारत को अपनी बपौती समझ रखी हो, लेकिन सत्तारूढ़ होने भर से एक पार्टी भारत सरकार नहीं हो जाती। प्रियंका ने यह भी कहा होता कि पहले की सरकारों की देन है, तो भी थोड़ी देर चर्चा हो सकती थी। लेकिन, इसे कॉन्ग्रेस की देन कहना एक एलिटिस्ट, एनटायटल्ड, स्पॉइल्ट ब्रैट टाइप का बयान है जो ये सोच कर चलता है कि जो है, उसी का है।

कॉन्ग्रेस ने पार्टी फ़ंड से इसरो नहीं बनवाया था, न ही डीआरडीओ के कर्मचारियों और वैज्ञानिकों को सोनिया गाँधी के हस्ताक्षर वाले चेक जारी हुआ करते थे। कॉन्ग्रेस के नाम ये संस्थान महज़ संयोग के कारण हैं क्योंकि सबसे पहले सत्ता में वही आई। और सत्ता में वह पहले इसीलिए आई क्योंकि विकल्प नहीं थे।

इसलिए, यह कह देना कि भारत के स्कूल और दुकान सब कॉन्ग्रेस की ही देन हैं, निहायत ही बेवक़ूफ़ी भरी बात है। जो पहली सरकार होगी वो हर बुनियादी व्यवस्था को बनाने का कार्य करेगी। नेहरू ने वही किया। वहाँ उस समय राहुल गाँधी भी संयोगवश होते तो उनके नाम भी भारत को आईआईटी देने की बात लिखी होती। आपकी ही सरकार है, ग़ुलामी से अभी आज़ाद हुई है, और आपको ही सारे पहले कार्य करने हैं, तो क्या वहाँ पर अमित शाह जाकर इसरो की स्थापना करेगा?

इसमें कौन सा विजन है कि आईआईटी खोले, स्पेस प्रोग्राम की शुरूआत की, सड़के बनवाईं, कानून बनाए, विज्ञान पर जोर दिया? ये विजन नहीं, ज़रूरत थी। ये न्यूनतम कार्य हैं जो कोई भी सरकार आज़ादी मिलते ही सबसे पहले करेगी। और, दुनिया में अगर आप उस वक्त थे, और आपको विज्ञान या तकनीक को लेकर सरकारी संरक्षण में कुछ संस्थाएँ खोलने का विचार नहीं आ रहा था, तो आप गुफ़ाओं में रहने वाले कहे जाएँगे।

इसलिए, प्रियंका गाँधी जी, नाक का तो इस्तेमाल आपकी पार्टी वोट जुटाने में कर ही रही है, दिमाग का आप स्वयं कर लीजिए, क्योंकि कुछ चीज़ों का इस्तेमाल पार्टी नहीं करती। कॉन्ग्रेस एक पार्टी है। एक बार फिर से बता रहा हूँ कि कॉन्ग्रेस एक पार्टी है। ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ से बाहर आइए, भारत एक रजवाड़ा नहीं है, न ही कॉन्ग्रेस ने अपने पैसों से कोई कार्य किया है। 

भले ही आपके और आपके भाई के नाम से छात्रावासों के नाम हों, और आपके पिता, दादी, परनाना के नाम पर भारत की नालियों से लेकर पुलों, और स्कूलों, कॉलेजों, खेल के मैदानों, हवाई अड्डों और सड़कें हों, लेकिन वो आपको ये कहने का हक़ नहीं देती की सब आपके पारिवारिक उद्यम कॉन्ग्रेस पार्टी प्राइवेट लिमिटेड की निजी संपत्ति है। उस पर ये नाम इसलिए हैं क्योंकि इस पार्टी ने और आपके घरवालों ने इसे अपनी बपौती जागीर समझ रखी थी।

जिस पार्टी के भविष्य के सबसे बड़े गुण दो डिम्पल और ‘साड़ी में बिलकुल इंदिरा गाँधी लगती है’ हो, उसे कोई गगनयान ऊपर नहीं ले जा सकता। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए मुझे निजी तौर पर दुःख होता है कि पहले उन्हें राहुल गाँधी की नादानियों और मूर्खताओं को डिफ़ेंड करना होता था, अब प्रियंका भी आ गईं। 

भले ही लम्पट पत्रकार गिरोह प्रियंका के जीन्स और टॉप पर आर्टिकल लिखकर उसे कपड़ों के आधार पर ही कुशल प्रशासक बताता रहे, लेकिन सत्य यही है कि कई बार मुँह खोलकर आदमी एक्सपोज हो जाता है। कई बार सिर्फ ग़रीबों के साथ फोटो खिंचाने, अमेठी की झुग्गी से पिता के निकलने की तस्वीर और तीस साल बाद बेटे के निकलने की तस्वीर, कइयों को भावविह्वल कर देती है। कई बार आप साड़ी पहनकर आत्मविश्वास के साथ, सीरियस चेहरा बनाए दादी के दिए ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के शिकार हुए ग़रीबों को गौर से सुनती दिखाई देती थी, तो लगता था कि गम्भीर नेत्री है।

लेकिन आपने जब से मुँह खोलना शुरु किया है, सारे लोग कन्फर्म होते जा रहे हैं कि एलिटिज्म, एनटायटलमेंट, और परिवार से होने का घमंड आपमें इतना ज़्यादा है कि भारतीय नागरिक एक बार फिर से आपकी पार्टी को अफोर्ड नहीं कर पाएगी। मोदी ने बार-बार कहा है कि कॉन्ग्रेस को भी कॉन्ग्रेस वाली मानसिकता से मुक्त हो जाना चाहिए। आपको उनकी बात पर ध्यान देना चाहिए।

आपको देखकर बहुतों की उम्मीद जगी थी कि एक सशक्त महिला राजनीति में आ रही है। मैंने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि समाज के हर तबके का प्रतिनिधित्व होता रहे। आप महिलाओं की प्रतिनिधि तो बिलकुल नहीं, बल्कि एक परिवार की अभिजात्य और नकारात्मक मानसिकता का प्रतिनिधित्व ज़रूर कर रही हैं जो बाप-दादी-परनाना की लगाई ईंटों पर तो अपना अधिकार जताता है लेकिन वैसी ही ईंटों पर सैकड़ों दंगों के लगे ख़ून, वैसी ही ईंटों को सोना बनाकर लाखों करोड़ों लूटने की बात, वैसी ही ईंटों पर लिखे घोटालों के नाम, और वैसी ही ईंटों के खोखलेपन से खोखले हुए देश की ज़िम्मेदारी नहीं ले पाता।

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कोलकाता में लोगों को धमका कर TMC लगा रही है अपनी पार्टी के झंडे

‘बंगाल का मतलब बिज़नेस’ के होर्डिंग्स से कोलकाता की लगभग हर गली, मोहल्ला और सड़क छप गई है। लेकिन, ये किसके बिज़नेस की बात हो रही है, ये शायद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से जरूर पूछा जाना चाहिए क्योंकि TMC कार्यकर्ता जिस तरह से वहाँ पर रहने वाले लोगों को चुनाव के दौरान डराते और धमकाते हुए नजर आ रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि ये बिज़नेस सिर्फ ममता बनर्जी की तानाशाही का है।

कोलकाता के कस्बा में एक पॉश एरिया में The Belgian Waffle Co. Kasba नाम से रेस्टोरेंट चलाने वाली रिद्धिमा खन्ना वासा ने TMC की गुंडागिर्दी पर ऑपइंडिया को बताया कि TMC चुनाव से पहले कस्बा के पूरे बाजार की हर दुकान पर अपनी पार्टी के झंडे लगाने के लिए लोगों को मजबूर कर रही है और विरोध करने पर उन्हें डराया, धमकाया जा रहा है। रिद्धिमा ने बताया कि पुलिस और प्रशासन से शिकायत करने के बावजूद भी कोई एक्शन नहीं लिया गया है और उन्हें चुप रहने की सलाह दी जा रही है।

रिद्धिमा का कहना है कि वो एक निजी बिज़नेस चलाती है और किसी भी राजनीतिक दल से अपने बिज़नेस को नहीं जोड़ना चाहती है। साथ ही, उन्होंने कहा कि कोलकाता में इस प्रकार की गुंडागिर्दी के कारण ही लोग वहाँ पर बिज़नेस नहीं करना चाहते हैं। लेकिन चुनाव से पहले TMC हमेशा की तरह अपनी तानाशाही का परिचय देते हुए हर दुकान और स्टोर के बाहर अपनी पार्टी के झंडे लगा रही है।

रिद्धिमा खन्ना ने अपनी बात सुने न जाने से निराश होकर फेसबुक पर लिखा है, “कस्बा में मेरे स्टोर को चुनावों से पहले TMC के झंडे लगाने के लिए कहा गया है। हमने स्थानीय पार्टी के प्रतिनिधि को बताया कि यह एक निजी व्यवसाय है, इसलिए हम किसी भी राजनीतिक दल के साथ खुद को नहीं जोड़ना चाहते हैं, तो हमें इसका अंजाम भुगतने की धमकी दी गई। यहाँ चुनाव एक आम आदमी के दिल में डर पैदा कर देता है, और कई अन्य परेशानियों से हमें जूझना होता है। कोई आश्चर्य नहीं कि लोग अब इस शहर में नहीं रहना चाहते हैं। इस तरह से कोलकाता में कोई व्यवसाय किस तरह से बढ़ेगा? फिर कोई बड़ी फ्रेंचाइजी कोलकाता क्यों आएगी? बंगाल का अर्थ व्यापार नहीं, बल्कि बंगाल का अर्थ है बिज़नेस का दमन है।”

इसके साथ ही रिद्धिमा खन्ना को यह भी डर है कि उन्हें TMC की गुंडागिर्दी के खिलाफ आवाज उठाने के कारण अब परेशान भी किया जाएगा। केंद्र सरकार पर हर दूसरे दिन लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को शायद स्वयं लोकतंत्र की परिभाषा पढ़नी चाहिए। रिद्धिमा के पोस्ट को सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया जा रहा है लेकिन स्थानीय पुलिस और पार्टी ने भी TMC की इस मनमानी पर अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है।

वामपंथियों के बेचे हुए सपने खरीदने वाले भारतीय अब ‘अंतरिक्ष के सेनानी’ बन चुके हैं

सन 1998 में जब भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण कर स्वयं को ‘न्यूक्लियर पॉवर स्टेट’ घोषित कर दिया था तब अमेरिका आदि देशों के अतिरिक्त भारत के कुछ बुद्धिजीवियों ने भी इस निर्णय की निंदा की थी। उन बुद्धिजीवियों की कुंठा इतनी अधिक थी कि पाँच वर्ष सरकार की आलोचना करने के पश्चात भी उन्हें यही लगता रहा कि कोई उनकी बात सुन नहीं रहा। तब ओरिएंट लॉन्गमैन प्रकाशक ने उन बुद्धिजीवियों को बुलाकर “Prisoners of the Nuclear Dream” नामक पुस्तक लिखवाई जो सन 2003 में प्रकाशित हुई थी।

इस पुस्तक का शीर्षक एक पाकिस्तानी न्यूक्लियर पॉलिसी एक्सपर्ट ज़िया मियाँ ने सुझाया था, संभवतः इसीलिए मुझमें इसे पढ़ने की उत्सुकता जगी थी। इस पुस्तक में यह स्थापित किया गया था कि भारत को परमाणु परीक्षण करने की कोई आवश्यकता नहीं थी और ऐसा कर के भारत ने दक्षिण एशिया की स्थिरता और सुरक्षा के वातावरण को दूषित कर दिया था। कई वामपंथी विद्वानों ने विविध प्रकार के विचार विभिन्न दृष्टिकोण से प्रस्तुत किए थे जिनका एकमात्र उद्देश्य यही बताना था कि भारत को परमाणु परीक्षण क्यों नहीं करने चाहिए थे।

लेखक एक प्रकार से भारत के नागरिकों को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनने के दिवास्वप्न की बेड़ियों से बंधा हुआ बंदी मानते थे जो नींद से जागकर और मुक्त होकर सत्य नहीं देख पा रहे थे। वस्तुतः दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन पर चिंतन करने वाले उन बुद्धिजीवियों के अनुसार इस क्षेत्र में शांति की एकमात्र गारंटी पाकिस्तान का तुष्टिकरण ही थी। अर्थात भारत को कभी भी ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए था जिससे पाकिस्तान (या चीन) भड़क जाए अथवा नाराज़ हो जाए।  

आज इक्कीस वर्ष पश्चात भारत के उन्हीं नागरिकों ने बुद्धिजीवियों के उस मिथक को तोड़ दिया है जिसके अनुसार भारत को एक दब्बू राष्ट्र की भाँति सब कुछ सहते हुए निरस्त्रीकरण की निद्रा में सोते हुए शांति के स्वप्न देखने चाहिए थे। आज भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र ही नहीं वरन अंतरिक्ष शक्ति संपन्न राष्ट्र भी बन गया है। दिनांक 27 मार्च 2019 को भारत के रक्षा वैज्ञानिकों ने मिशन शक्ति के अंतर्गत ‘एंटी सैटलाईट’ मिसाईल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। भारत यह उपलब्धि अर्जित करने वाला विश्व का चौथा राष्ट्र बन गया है।

बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम से एंटी सैटलाइट वेपन बनने की कहानी

पूर्व डीआरडीओ अध्यक्ष वी के सारस्वत ने 2010 में ही कहा था कि अग्नि शृंखला की मिसाइलें भविष्य में एंटी सैटलाइट हथियार के रूप में भी विकसित की जा रही हैं। एंटी सैटलाइट वेपन क्या है? नाम से ही स्पष्ट है कि किसी सैटलाइट को मार गिराने की क्षमता वाले अस्त्र को एंटी सैटलाइट वेपन कहा जाता है। एंटी सैटलाइट वेपन का विकास बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम के विकास के साथ ही हुआ था। बैलिस्टिक मिसाइल वह मिसाइल होती है जो एक बार फायर करने के बाद वायुमंडल में बहुत ऊपर तक जाती है फिर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ही नीचे निर्धारित लक्ष्य पर गिरती है।

उदाहरण के लिए एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप पर मार करने वाली इंटर-कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें जिन्हें ICBM भी कहा जाता है। भारत की अग्नि-5 मिसाइल ICBM की श्रेणी में आती है। यह परमाणु आयुध ले जाने में सक्षम है और वैश्विक शक्ति बनने के लिए भारत के पास ऐसी मिसाइल होना अनिवार्य भी है। बहरहाल, रूस और अमेरिका ने एक दूसरे की बैलिस्टिक मिसाइलों के हमले से बचने के लिए बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) सिस्टम विकसित किए थे।

शीतयुद्ध के दौरान पचास और साठ के दशक में अमेरिका और रूस ने सोचा कि ऐसे BMD विकसित किए जाएँ जिनके ऊपर न्यूक्लियर बम लगा हो जो शत्रु की बैलिस्टिक मिसाइल को नष्ट कर सके। लेकिन इस विचार को त्याग दिया गया क्योंकि ऐसे किसी भी जवाबी हमले में दोनों तरफ की क्षति होने का खतरा था और वायुमंडल में न्यूक्लियर रेडिएशन फैलने का भी अंदेशा था। अमेरिका ने स्ट्रेटेजिक डिफेंस इनिशिएटिव (SDI) के अंतर्गत ऐसे BMD विकसित करने का विचार अपनाया था लेकिन बाद में इसे रद कर दिया गया और बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस ऑर्गेनाइज़ेशन (BMDO) की स्थापना की गई।

इस परियोजना के अंतर्गत ऐसे BMD विकसित किए गए जो शत्रु की बैलिस्टिक मिसाइल को हवा में एक निश्चित ऊँचाई पर मार गिराने में सक्षम हों। आज ऐसे BMD विकसित हो चुके हैं जो शत्रु की बैलिस्टिक मिसाइल को बीच रास्ते में, यहाँ तक की लॉन्च होने से पहले ही नष्ट कर सकें। एक्स रे लेज़र, पार्टिकल बीम जैसी किरणों की तकनीक भी विकसित की जा रही है जो बैलिस्टिक मिसाइल को नष्ट कर सके। यह बिलकुल वैसा ही होगा जैसा जेम्स बॉन्ड की एक फिल्म में ‘इकेरस’ डिवाइस करती है।

भारत के बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम की बात करें तो हमारे पास तीन सिस्टम हैं: एडवांस्ड एयर डिफेंस (AAD), जो 30 किमी ऊँचाई से आ रही मिसाइल को मार गिराने में सक्षम है; पृथ्वी एयर डिफेंस (PAD) जो 80 किमी ऊँचाई पर बैलिस्टिक मिसाइल को नष्ट कर सकता है और पृथ्वी डिफेंस वेहिकल (PDV) जो 150 किमी की ऊँचाई पर बैलिस्टिक मिसाइल को नष्ट कर सकने में सक्षम है।

बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम के विकास क्रम में यह विचार उत्पन्न हुआ कि यदि हमला करने वाली वस्तु कोई बैलिस्टिक मिसाइल न होकर शत्रु देश की सैटलाइट हुई तो उसे कैसे नष्ट किया जाएगा। इसी विचार से एंटी सैटलाइट अस्त्र की परिकल्पना साकार हुई। एक सैटलाइट को नष्ट करने के लिए न्यूक्लियर वारहेड या किसी अन्य विस्फोटक की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए ‘काईनेटिक किल’ (Kinetic Kill) तकनीक विकसित की गई। इस तकनीक में मिसाइल के ऊपर धातु का एक टुकड़ा लगा दिया जाता है जिसे सैटलाइट को लक्षित कर दागा जाता है। पृथ्वी का चक्कर काट रही सैटलाइट की गति ही इतनी अधिक होती है कि वह धातु से टकरा कर टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। भारत ने भी मिशन शक्ति के अंतर्गत इसी तकनीक से उपग्रह को मार गिराया।

क्या अंतरिक्ष का सैन्यीकरण अवश्यंभावी है?

किसी महान विचारक ने कहा था कि हम युद्ध को नहीं चुनते, युद्ध हमें चुनता है। अमेरिका ने रूस के साथ होड़ करने के चक्कर में सन 1985 में पहली बार किसी सैटलाइट को मार गिराया था। दक्षिण एशिया में अपनी दादागिरी दिखाने को आतुर चीन ने सन 2007 से 2014 के बीच एक दो नहीं बल्कि सात ऐसे कारनामे किए जिन्हें एंटी सैटलाइट वेपन के परीक्षण के रूप में देखा जा सकता है। चीन के परीक्षणों से ढेर सारा मलबा अंतरिक्ष में इकठ्ठा हो चुका है और यह मलबा दूसरे देशों की सैटलाइट के लिए संकट बन चुका है। मलबे का एक छोटा सा टुकड़ा भी तीव्र गति से पृथ्वी का चक्कर लगाती किसी सैटलाइट से टकरा कर उसे नष्ट करने की क्षमता रखता है।

धरती के ऊपर सैटलाइट प्रायः तीन कक्षाओं में प्रक्षेपित की जाती हैं: लो अर्थ ऑर्बिट (LEO; 2000 KM above earth’s surface), मीडियम अर्थ ऑर्बिट (MEO; 2000-35,786 KM above earth’s surface) तथा हाई अर्थ ऑर्बिट (above 35,786 KM). चीन की गतिविधियाँ लो अर्थ ऑर्बिट से लेकर हाई अर्थ ऑर्बिट में परिक्रमा कर रहे उपग्रहों को नष्ट करने की तकनीक विकसित करने का संदेह उत्पन्न होने के पर्याप्त कारण गिनाती हैं। ध्यातव्य है कि हम जिसे अंतरिक्ष कहते हैं वह धरातल से 100 किमी ऊपर का आकाश है।

वायुमंडल से अंतरिक्ष को अलग करने वाली रेखा कारमन लाइन कहलाती है। इसके ऊपर जो कुछ भी है वह लीगल शब्दावली में ‘आउटर स्पेस’ कहलाता है। सन 1967 में संयुक्त राष्ट्र ने सभी सदस्य देशों से एक आउटर स्पेस संधि पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया था। सौ से अधिक देशों के साथ भारत ने भी इस संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। किंतु आउटर स्पेस ट्रीटी के बावन वर्ष बीत जाने के बाद भी विश्व में एंटी सैटलाइट अस्त्र विकसित होने बंद नहीं हुए हैं क्योंकि ऐसे किसी भी अस्त्र के प्रयोग पर यह संधि मौन है। आउटर स्पेस संधि मूल रूप से यही कहती है कि कोई देश चंद्रमा या किसी ऐसी खगोलीय वस्तु पर अपना अधिकार नहीं कर सकता और अंतरिक्ष का उपयोग वैज्ञानिक शोध के लिए किया जाना चाहिए इत्यादि।

अंतरिक्ष विधि विशेषज्ञ आउटर स्पेस में निरस्त्रीकरण के लिए मुख्य रूप से दो शब्दों का प्रयोग करते हैं: Militarization of Space और Weaponization of Space. इन दोनों के भिन्न अर्थ हैं। अंतरिक्ष के सैन्यीकरण का अर्थ हुआ कि हम अंतरिक्ष के संसाधनों का उपयोग सैन्य आवश्यकताओं के लिए करें, जैसे कि नेविगेशन, संचार या खोजी उपग्रह इत्यादि। जबकि अंतरिक्ष के ‘वेपनाईज़ेशन’ का अर्थ हुआ किसी दूसरे देश के संसाधनों को अंतरिक्ष से धरती पर अथवा धरती से अंतरिक्ष में नष्ट करना।

कोई भी संधि अंतरिक्ष के सैन्य उपयोग से मना नहीं करती इसीलिए विश्व के कुछ सक्षम देशों के साथ भारत ने भी IRNSS उपग्रह समूह द्वारा स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली NAVIC विकसित की है। दूसरी तरफ अमेरिका चीन और रूस के कारण हुए अंतरिक्ष के वेपनाईज़ेशन से जो संकट उत्पन्न हुआ है उसके प्रति निरोधक (deterrence) क्षमता होना अत्यंत आवश्यक था इसलिए भारत को एंटी सैटलाइट वेपन विकसित करना पड़ा।

इतिहास देखें तो भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम सदैव शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही समर्पित रहा है। हमने संचार (टीवी, रेडियो) उपग्रह प्रक्षेपित किए, शिक्षा के लिए EDUSAT छोड़ा गया। धीरे-धीरे भारत ने रिमोट सेंसिंग तकनीक विकसित की, कुछ वर्ष पहले ही खगोलीय विश्लेषण के लिए ASTROSAT छोड़ा गया था। मंगलयान की कीर्ति इतनी फैली कि विदेशी अख़बारों ने कटाक्ष तक किया। चंद्रयान द्वितीय चरण शीघ्र ही मूर्तरूप लेगा और तब तक शायद हम मानव को भी अंतरिक्ष में भेजने की योजना भी पूर्ण कर लेंगे। इंटेलिजेंस जुटाने वाली सैटलाइट EMISAT 1 अप्रैल 2019 को अंतरिक्ष में भेजी जाएगी।

भारत सरकार ने एक संयुक्त सैन्य स्पेस एजेंसी के गठन को स्वीकृति पहले ही प्रदान कर दी है। इन सब उपलब्धियों के आलोक में राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से ‘ASAT-मिशन शक्ति’ निश्चित ही एक मील का पत्थर सिद्ध होगा। एंटी सैटलाइट वेपन से लैस होने पर कोई अन्य देश हमारे सैटलाइट को नष्ट करने की हिमाकत नहीं करेगा। चूँकि आज बैंक के वित्तीय लेनदेन से लेकर जीपीएस तक और गहरे समुद्र में तैरते जहाज से लेकर सियाचिन ग्लेशियर तक सब जगह की संचार और नेविगेशन व्यवस्था सैटलाइट पर ही निर्भर है इसलिए हमारे पास शत्रु के उपग्रह को मार गिराने वाली प्रतिरक्षात्मक प्रणाली होना गर्व की बात है।

इस प्रकार उन बुद्धिजीवियों के मुँह पर भी तमाचा पड़ा है जिन्हें मई 1998 में किए गए ऑपरेशन शक्ति पर आपत्ति थी। भारत तकनीकी विकास में कभी पीछे नहीं रहा। हमने अपने बलपर वह प्रत्येक तकनीक विकसित की है जो विश्व हमें नहीं देना चाहता था चाहे वह सुपर कंप्यूटर हो या परमाणु अस्त्र की सामग्री। एंटी सैटलाइट वेपन बनाकर हम कुंठा की बेड़ियों से आज़ाद हुए हैं। हम वामपंथी बुद्धिजीवियों की उस स्वप्न नगरी से मुक्त हुए हैं जहाँ केवल यही सिखाया जाता रहा कि शांतिप्रिय देश होने का अर्थ कम्युनिस्ट चीन और जेहादी पाकिस्तान का तुष्टिकरण होता है। न्यूक्लियर सुपर पॉवर बनने का स्वप्न देखने वाले भारतीय आज अंतरिक्ष के योद्धा भी बन चुके हैं।      

J&K में 35A को ख़त्म कर देगी मोदी सरकार! खुद जेटली कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे हैं

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जम्मू कश्मीर के ताज़ा हालातों का विश्लेषण करते हुए एक ब्लॉग लिखा है, जिसमें उन्होंने आर्टिकल 35-A पर निशाना साधा है। हम आपको पहले ही बता चुके हैं कि कैसे यह आर्टिकल दलित विरोधी है और दलितों पर इसके कितने दुष्प्रभाव हुए हैं। हम जेटली के ब्लॉग में लिखी महत्वपूर्ण बातों को जानेंगे, लेकिन उस से पहले समझते हैं कि आर्टिकल 35A क्या है?

  • दूसरे राज्य का कोई भी व्यक्ति जम्मू-कश्मीर का स्थाई निवासी नहीं बन सकता है।
  • जम्मू-कश्मीर के बाहर का कोई भी व्यक्ति यहाँ पर अचल संपत्ति नहीं खरीद सकता।
  • इस राज्य की लड़की अगर किसी बाहरी लड़के से शादी करती है, तो उसके सारे प्राप्त अधिकार समाप्त कर दिए जाएँगे।
  • राज्य में रहते हुए जिनके पास स्थायी निवास प्रमाणपत्र नहीं हैं, वे लोकसभा चुनाव में मतदान कर सकते हैं लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में वोट नहीं कर सकते हैं।
  • इस अनुच्छेद के तहत यहाँ का नागरिक सिर्फ़ वही माना जाता है जो 14 मई 1954 से पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो या फिर इस बीच में यहाँ उसकी पहले से कोई संपत्ति हो।

आर्टिकल 35A पर अरुण जेटली के विचार, उन्हीं के शब्दों में

अनुच्छेद 35A को 1954 में संविधान में राष्ट्रपति द्वारा एक अधिसूचना जारी कर शामिल किया गया था। यह न तो संविधान सभा द्वारा तैयार किए गए मूल संविधान का हिस्सा था और न ही संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संवैधानिक संशोधन के रूप में आया था, जिसमें दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। संसद के सदन पर यह राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचना के रूप में आया जो कि संविधान में एक छल से की हुई शासनात्मक प्रविष्टि है।

यह आर्टिकल राज्य सरकार को राज्य में रह रहे नागरिकों के बीच स्थानीय बनाम बाहरी के रूप में भेदभाव करने का अधिकार देता है। यह राज्य के नागरिकों व भारत के अन्य राज्य के नागरिकों के बीच भेदभाव करता है। जम्मू और कश्मीर में लाखों भारतीय नागरिक लोकसभा चुनावों में वोट देते हैं लेकिन विधानसभा, नगरपालिका या पंचायत चुनावों में नहीं। उनके बच्चों को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती। उनके पास संपत्ति नहीं हो सकती और उनके बच्चे सरकारी संस्थानों में भर्ती नहीं हो सकते। यही बात उन लोगों पर भी लागू होती है, जो देश में अन्यत्र रहते हैं। राज्य के बाहर शादी करने वाली महिलाओं के उत्तराधिकारियों को संपत्ति या विरासत में मिली संपत्ति से वंचित कर दिया जाता है।

आज की तारीख़ में राज्य (जम्मू कश्मीर) के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं। अधिक वित्तीय लाभ उठाने की इसकी क्षमता को अनुच्छेद 35A द्वारा अपंग कर दिया गया है। कोई भी निवेशक यहाँ पर उद्योग, होटल, निजी शिक्षण संस्थान या निजी अस्पताल स्थापित करने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि वह राज्य में न तो ज़मीन या संपत्ति ख़रीद सकता है और न ही उसके अधिकारी ऐसा कर सकते हैं। उनके बच्चों को सरकारी नौकरियों या कॉलेजों में प्रवेश नहीं मिल सकता है। आज, ऐसी कोई बड़ी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय होटल चेन नहीं है, जिसने पर्यटन केंद्रित राज्य में एक भी होटल स्थापित किया हो।

यह समृद्धि, संसाधन निर्माण और रोज़गार सृजन को रोकता है। कॉलेज की पढ़ाई के लिए छात्रों को नेपाल और बांग्लादेश सहित सभी जगहों पर जाना पड़ता है। जम्मू में केंद्र सरकार द्वारा स्थापित सुपर-स्पेशियलिटी सुविधा सहित इंजीनियरिंग कॉलेज और अस्पताल या तो अंडर-यूज़ किए गए या प्रयोग करने लायक ही नहीं हैं क्योंकि बाहर से प्रोफेसर और डॉक्टर वहाँ जाने के लिए तैयार ही नहीं हैं। अनुच्छेद 35A ने निवेश को रोक दिया है और राज्य की अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया है। इस आर्टिकल को कई लोग राजनीतिक हथियार रूप में भी प्रयोग कर रहे हैं

देश के बाकी हिस्सों पर लागू होने वाला क़ानून का शासन इस राज्य में लागू क्यों नहीं होना चाहिए? क्या हिंसा, अलगाववाद, व्यापक पैमाने पर पत्थरबाजी (Stone Pelting), ख़तरनाक विचारधारा इत्यादि को इस दलील पर अनुमति दी जानी चाहिए कि अगर हम इसकी जाँच करते हैं, तो इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यह गलत नीति है, जो विकास-विरोधी साबित हुई है। आज वर्तमान सरकार ने निर्णय लिया है कि कश्मीर घाटी के लोगों के हित में और भारत के हित में, क़ानून का शासन सबके लिए समान रूप से लागू होना चाहिए।

लद्दाख और कारगिल हिल डेवलपमेंट काउन्सिल को आज और प्रभावशाली बनाया गया है। लद्दाख डिवीज़न का अलग से गठन किया गया है। लद्दाख में एक नया विश्वविद्यालय भी बनाया गया है। अलगाववादियों और आतंकियों पर बुरी तरह से मार पड़ी है। मुख्यधारा की दो पार्टियाँ केवल टेलीविज़न बाइट्स दे रही हैं और उनकी गतिविधियाँ सोशल मीडिया तक ही सीमित हैं। राज्य के लोग केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए क़दमों का स्वागत कर रहे हैं। वे शांति चाहते थे। हिंसा और आतंक से मुक्ति चाहते थे। घाटी में क़ानून का शासन लागू किया जा रहा है और लोगों के लिए एक सुरक्षित और शांतिपूर्ण जीवन सुनिश्चित किया जा रहा है।

एनआईए ने टेरर फंडिंग पर शिकंजा कसा है। आयकर विभाग ने सत्रह वर्षों के बाद कार्रवाई की और देश के ख़िलाफ़ उपयोग होने वाले धन के स्रोतों के मामले में कड़ी कार्रवाई कर रही है। सीबीआई हाल के वर्षों में दिए गए 80,000 बंदूक लाइसेंस पर नज़र बनाए हुए है और इसकी जाँच कर रही है। पिछले कुछ महीनों में सबसे ज्यादा आतंकी मारे गए हैं। बेकार के प्रदर्शनों व पत्थरबाजी की घटनाओं में कमी आई है। आतंकी संगठनों में भर्ती होने वाले युवाओं में कमी आई है।

गर्भवती पत्नी पर क्रूरता के लिए मुस्तफ़ा को मिली जेल की सज़ा

क्रूरता की हद पार करते हुए मुस्तफ़ा नाम के एक शख़्स ने अपनी प्रेमिका को न सिर्फ़ मारा-पीटा बल्कि उसके गर्भवती होने की बात को जानते हुए भी उसे गंभीर चोटें पहुँचाई। सिंगापुर ज़िला अदालत के न्यायाधीश मैथ्यू जोसेफ ने बीते बुधवार (मार्च 27, 2019) को दो मामलों में दोषी करार देते हुए सज़ा सुनाई। इसमें एक मामला 2017 का है जब वो एक रोड रेज मामले में दोषी ठहराया गया और दूसरा मामला अपनी गर्भवती प्रेमिका को चोट पहुँचाने से संबंधित है।

द न्यू पेपर की ख़बर के अनुसार न्यायाधीश ने 24 वर्षीय मुस्तफ़ा को हिंसा और अपने गुस्स पर क़ाबू न रख पाने के लिए कड़ी फटकार लगाते हुए 10 सप्ताह जेल की सज़ा सुनाई है। इस 10 सप्ताह की सज़ा में 6 सप्ताह की सज़ा अपनी पत्नी से किए गए क्रूर व्यवहार के लिए दी गई और 4 सप्ताह की सज़ा रोड रेज मामले के लिए दी गई है।

ख़बर के अनुसार, 11 जून 2017 को  मुस्तफ़ा का अपनी प्रेमिका से किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया था। यह आपसी विवाद इतना बढ़ गया कि मुस्तफ़ा ने अपनी प्रेमिका के गाल पर तीन तमाचे जड़ दिए और उसकी जांघ पर दो बार लात भी मारी। हालत गंभीर होने पर उन्हें उपचार संबंधी सुविधाएँ दिलवाए जाने पर महिला ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। बता दें कि प्रेमिका से पत्नी बनीं शिखा ने बताया कि मुस्तफ़ा द्वारा किए जा रहे अभद्र व्यवहार से ऊब चुकी है।

मुस्तफ़ा ने यह बेरहमी भरा बर्ताव ऐसे समय में किया जब वो उसके बच्चे की माँ बनने वाली थी। इस तरह का व्यवहार पर हैरान भी कर देता है कि आख़िर समाज किस दिशा में अपने पैर पसार रहा है।

BJP से नहीं मोदी से डर लगता है: दिग्विजय सिंह

अक्सर अनाप-सनाप बयानों के कारण चर्चा में बने रहने वाले कॉन्ग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक मीडिया चैनल को दिए अपने इंटरव्यू में स्वीकार किया है कि बीजेपी से कॉन्ग्रेस को कोई खतरा नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी से है और इस बात से वो चिंतित हैं।

इस मीडिया चैनल के पत्रकार ने बंटे हुए विपक्ष पर चिंता व्यक्त करते हुए दिग्विजय सिंह से सवाल पूछा, “आप सभी कहते हैं कि इस देश को बीजेपी से खतरा है और जब चुनाव का मौका आया है तो विपक्ष काफी हद तक बँटा हुआ है और उसमें मेरे लिए समझना बड़ा मुश्किल है कि कॉन्ग्रेस ने भी पूरा रोल निभाया है। UP में कॉन्ग्रेस बीजेपी को फायदा पहुँचाएगी, ये बिलकुल साफ दिख रहा है, ये क्या राजनीति है?”

पत्रकार की इस चिंता पर जवाब देते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा, “हमें भारतीय जनता पार्टी से कोई खतरा नहीं है। नरेंद्र मोदी ने भारत की राजनीति को जो स्वरुप दिया है, उससे हमें चिंता है। 6 साल तक अटल बिहारी वाजपेयी भी सत्ता में रहे, तब हमें कोई दिक्कत नहीं रही। अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसे प्रधानमंत्री थे, जो प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ एक डेमोक्रेट भी थे, वो कम से कम लोगों की सुनते थे जबकि नरेंद्र मोदी जी शुरू से ही कॉन्ग्रेस-मुक्त भारत का सपना देख रहे हैं, यानी सारी राजनीतिक पार्टियों को मुक्त करके वो राज करना चाहते हैं।”

इसके आगे दिग्विजय सिंह ने कहा, “हमारी जो चिंता है वो बीजेपी से नहीं है, वो नरेंद्र मोदी से है, गुजरात विकास मॉडल की बात कहते थे। लेकिन वो गुजरात डेवलपमेंट मॉडल क्या है? गुजरात विकास मॉडल ये है कि केवल हिन्दू-मुस्लिम के बीच में खाई पैदा करके लड़ाई करवा कर राज करो, लोगों को परेशान करो, लोगों के ऊपर जासूसी करो, उन पर झूठे-सच्चे प्रकरण बनाओ। ये गुजरात में सफल हो गया लेकिन भारत में सफल नहीं होगा।”

बिहार: माओवादियों ने डाइनामाइट से उड़ाया BJP नेता का घर, मिले चुनाव बहिष्कार के पर्चे

बुधवार (मार्च 27, 2019) की रात बिहार के गया में नक्सलियों ने भाजपा नेता और पूर्व जदयू विधान पार्षद अनुज कुमार सिंग के पैतृक आवास को डायनामाइट लगाकर उड़ा दिया। हालाँकि इस घटना में किसी की जान को कोई नुकसान नहीं हुआ है। लेकिन मीडिया खबरों के मुताबिक पूर्व एमएलसी का परिवार लंबे समय से नक्सलियों के निशाने पर था।

जानकारी के मुताबिक नक्सली संगठन भाकपा माओवदी गिरोह ने कल (मार्च 25, 2019) देर रात अनुज कुमार सिंह के चचेरे भाई के घर को डाइनामाइट के विस्फोट से क्षतिग्रस्त किया। इस घटना के पूर्व नक्सलियों ने पहले अनुज कुमार के भाई अजय सिंह को जगाया और फिर उन्हें कब्जे में लेकर भाजपा नेता के घर की चाभी ले ली।

दैनिक जागरण में छपी रिपोर्ट के अनुसार अजय ने बताया कि हथियारों से लैस सौ से अधिक भाकपा माओवादियों ने देर रात 12 बजे घर का ताला तोड़कर, डाइनामाइट लगाया और फिर घर को तहस-नहस कर दिया। अजय ने बताया कि आधे घंटे तक उन्हें माओवादियों ने कब्जें में रखा। उन्होंने कहा कि उनके सामने ही डाइनामाइट लगाकर विस्फोट किया गया। जिसके बाद एक खूबसूरत मकान मलबे में तब्दील हो गया।

ये विस्फोट इतना भयानक था कि पूरे घर के दरवाजे और दीवारों के टुकड़े जगह-जगह बिखर गए। साथ ही कीमती सामान रद्दी में बदल गया। घटना स्थल से लोकसभा चुनाव के बहिष्कार को लेकर पुलिस को पोस्टर और पर्चे भी बरामद हुए।

नक्सल अभियान एसपी अरुण कुमार ने बताया कि नक्सलियों का यह बेहद कायरपूर्ण है। उन्होंने आश्वासन दिया कि लोकसभा का चुनाव निष्पक्ष और शांतिपूर्ण वातावरण में पूरा होगा। उन्होंने बताया कि भाकपा माओवादियों को पकड़ने का अभियान तेज कर दिया गया है।

‘फिरोज की नातिन रेहान की माई, चुनाव मा मंदिर- मंदिर परी दिखाई’ प्रियंका और मम्मी के नाम पोस्टर

लोकसभा चुनाव 2019 के प्रचार के लिए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की बहन व जमीन घोटालों के लिए रोजाना ED ऑफिस के चक्कर लगाने वाले रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी पूरी तरह से कमर कस चुकी हैं। पार्टी के लिए प्रचार के लिए वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती हैं। प्रियंका गाँधी अपनी मम्मी सोनिया गाँधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली जाकर भी जनता का उत्साह बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन प्रशंसकों ने कॉन्ग्रेस की इस माँ-बेटी की जोड़ी के लिए, यानि सोनिया और प्रियंका गाँधी के लिए अलग से तैयारी कर रखीं थीं।

प्रियंका गाँधी के रायबरेली दौरे से पहले ही तिलक भवन के पास स्थित कॉन्ग्रेस कार्यालय के बाहर सोनिया और प्रियंका गाँधी विरोधी पोस्टर लगाए गए। इस पोस्टर में सोनिया और प्रियंका की तस्वीर और नीचे हिंदी में लिखा हुआ है, “जब जब आई संकट की घड़ी, कबो न महतारी बिटिया दिखाई पड़ी, सेवा के लिए दिहने रहै वोट, लेकिन प्रियंका सोनिया किहिन दिल पर चोट। फिरोज की नातिन रेहान की माई, चुनाव मा मंदिर-मंदिर परी दिखाई।”

इससे पहले रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी अपने भाई राहुल गाँधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी में भी प्रचार करने के लिए गई थीं। उनके अमेठी जाने से पहले भी पोस्टर पर इस तरह की तुकबंदी देखने को मिली थी। उनके खिलाफ कई जगहों पर पोस्टर लगाए गए थे, जिसमें प्रियंका गाँधी का विरोध करते हुए बातें लिखी गई हैं। पोस्टर पर प्रियंका गाँधी पर निशाना साधते हुए लिखा है, “क्या खूब ठगती हो, क्यों पाँच साल बाद ही अमेठी दिखती हो। साठ साल का हिसाब दो।”

अमेठी के मुसाफिरखाना कस्बे में लगे पोस्टर में लिखा गया है, “देख चुनाव पहन ली सारी, नहीं चलेगी होशियारी।” इन पोस्टर पर SP छात्रसभा के नेता जयसिंह प्रताप यादव का नाम लिखा हुआ है। हालाँकि, छात्र नेता ने ऐसे किसी भी तरह के पोस्टर लगाने का खंडन किया है। 

2014 लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस की हार के बाद प्रियंका गाँधी को आम जन के बीच शायद ही किसी ने देखा हो, लेकिन 2019 में चुनाव आते ही एक बार फिर से प्रियंका जनता के बीच आ गई हैं। 5 सालों में जनता के बीच कभी न दिखने वाली प्रियंका गाँधी ने केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी के बारे में कहा था कि अमेठी में वह ‘टाइम पास’ करने आती हैं और अमेठी से उन्हें कोई मतलब नहीं है।

प्रियंका ने बताया कि वह अपने पिता (राजीव गाँधी) के साथ अमेठी आया करती थी, उनका बचपन यहाँ बीता है। उनसे ज्यादा अमेठी कौन समझ सकता है। लेकिन वोटर समझदार हो चुके हैं। आपको बता दें कि प्रियंका पर सवाल करते ऐसे पोस्टरों से पहले भी राहुल गाँधी गायब के पोस्टर अमेठी में देखे जा चुके हैं। इन सभी पोस्टर्स द्वारा जनता की प्रतिक्रिया देखकर यही कहा जा सकता है कि “Do not underestimate the power of a common man”