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केरल: कॉन्ग्रेस के तीन विधायकों पर रेप के मामले में एफआईआर दर्ज, मिल सकता था लोकसभा टिकट

केरल में कॉन्ग्रेस के तीन विधायकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। बता दें कि सरिता एस नायर ने इन तीनों के खिलाफ यौन दुराचार का आरोप लगाते हुए पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाई है। ऐसा बताया जा रहा है कि ये तीनों वो विधायक हैं, जिन्हें लोकसभा के लिए टिकट मिल सकता था।

करोड़ों रुपये के सौर ऊर्जा निवेश घोटाले के एक आरोपी सरिता एस नायर ने एर्नाकुलम कॉन्ग्रेस के विधायक हिबी एडेन पर बलात्कार और राज्य के पूर्व मंत्रियों अडूर प्रकाश एवं ए पी अनिल कुमार पर अभद्रता करने का आरोप लगाया है। विधायकों के खिलाफ ये एफआईआर फास्ट ट्रैक मामलों के लिए गठित एक विशेष अदालत में दायर की गई है।

हालाँंकि ऐसी संभावना जताई जा रही थी कि एडेन को एर्नाकुलम लोकसभा सीट से मैदान में उतारा जा सकता है, तो वहीं प्रकाश को अत्तिंगल या अलाप्पुझा के लिए संभावित प्रत्याशी माना जा रहा था और अनिल कुमार को अलाथुर से टिकट मिल सकता था।

एडेन ने एफआईआर को कॉन्ग्रेस और उसके उम्मीदवारों की छवि खराब करने वाला करार दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि यह उनके लिए राजनीतिक रूप से उपयोग करने के लिए एक मुद्दा है।

कोच्चि स्थित सौर कंपनी टीम सोलर रिन्यूएबल एनर्जी सॉल्यूशंस, जो कि नायर और उसके लिव-इन पार्टनर बीजू राधाकृष्णन द्वारा चलाई जा रही है, के ऊपर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने एक सौर ऊर्जा परियोजना के लिए निवेशकों के करोड़ों रूपयों का घोटाला किया था।

इस घोटाले ने 2013 में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) सरकार पर आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री के कार्यालय से निकटता के कारण नायर निवेशकों को चकमा दे सकती है। गौरतलब है कि उस समय के मुख्यमंत्री ओमन चांडी के निजी सचिव टेनी जोप्पन को भी इस मामले में गिरफ्तार किया गया था।

16 साल की Greta Thunberg के आह्वान पर पर्यावरण संरक्षण के लिए 105 देशों के स्कूली छात्र ‘स्ट्राइक’ पर

पर्यावरण संरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जिसको लेकर आज पूरा विश्व चिंतित है। वैज्ञानिक बहुत समय पहले से ही लगातार हमें चेतावनी दे रहे हैं कि यदि मनुष्य अभी नहीं सुधरा तो भविष्य में होने वाले नुकसान के लिए उसे तैयार रहना पड़ेगा। वैसे तो पर्यावरण को लेकर हर देश अपने स्तर पर जागरूकता फैलाने का प्रयास करता रहा है।

लेकिन आज 15 मार्च को ऐसा पहली बार हो रहा है कि पर्यावरण को बचाने के लिए 105 देशों के स्कूली छात्र हड़ताल करने वाले हैं। विश्व भर के क़रीब 1,500 से अधिक शहरों के स्कूली छात्र इस हड़ताल में भाग लेंगे। आप सोच रहे होंगे कि एकदम से स्कूली छात्रों में पर्यावरण को लेकर इतनी जागरूकता कैसे जाग उठी कि एक साथ इतने बच्चों ने हड़ताल करने का फैसला कर लिया। तो आपको बता दें कि इस हड़ताल की वजह के पीछे एक 16 वर्षीय छात्रा है जिसका नाम ग्रेटा थनबर्ग है।

स्वीडन की ग्रेटा पर्यावरण के लिए काफ़ी चिंतित है। उसके अनुसार जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ उठाए कदमों पर्यावरण को बचाने के लिए पर्याप्त नहीं है। एक 16 साल की छात्रा में पर्यावरण को लेकर ऐसी जागरूकता वाकई सराहनीय है। इस हड़ताल की खबर के बाद आज ग्रेटा को हर कोई जानना चाहता है कि आख़िर एक 16 साल की बच्ची की सोच को इतना विस्तार कैसे मिला? तो बता दें कि ग्रेटा अब सिर्फ एक छात्रा नहीं रह गई हैं, बल्कि उनके विचारों ने उन्हें समाज में बहुत प्रतिष्ठित बना दिया है।

आज पूरे विश्व में अपनी पहचान बना लेने वाली ग्रेटा को नार्वे के 3 सांसदों द्वारा नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। पिछले वर्ष 2018 में ग्रेटा को पर्यावरण के मुद्दे पर बोलने के लिए TEDx Stockholm में वक्ता के रूप में भी बुलाया गया और साथ ही दिसंबर में ग्रेटा संयुक्त राष्ट्र की क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस में भी बुलाया गया। ग्रेटा के विचारों से प्रभावित होकर उन्हें 2019 में दावोस में हुई वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम में भी आमंत्रित किया गया था। जहाँ पर उनके भाषण को सुनकर लोग हैरान रह गए थे।

जाहिर है कि एक 16 साल की लड़की अगर बड़े-बड़े दिग्गजों के समक्ष कहे कि वह उन लोगों को पर्यावरण को लेकर आश्वस्त नहीं बल्कि परेशान देखना चाहती है तो लोगों की हैरानी बनती ही है। ग्रेटा कहती है कि नेताओं को पर्यावरण को बचाने के लिए उस घोड़े की तरह बर्ताव करना चाहिए जो कि आग में घिरा हो और बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा हो।

ग्रेटा को अपनी इन्हीं बातों के कारण टाइम मैग्जीन द्वारा वर्ष 2018 की सबसे प्रभावशाली किशोरी के तौर पर शामिल किया था। आज 105 देशों के स्कूली छात्रों की सहायता से होने वाली हड़ताल पर ग्रेटा का कहना है कि उन्हें इस स्ट्राइक से काफ़ी उम्मीदें हैं। वो कहती हैं कि वो और उनके साथ के बच्चे अब ऐसा करने के लिए युवा हो चुके हैं, लेकिन फिर भी सत्ता में बैठे लोगों को इसके लिए गंभीर रूप से काफ़ी कुछ करना चाहिए।

ग्रेटा ने इस मुहिम को #FridaysForFuture और #SchoolsStrike4Climate नाम से शुरू किया। इस मुहिम की शुरूआत पिछले वर्ष की गई थी, जिसमें ग्रेटा स्वीडिश संसद तक साइकिल पर गईं और वहाँ पर हाथ का बना हुआ एक साइन बोर्ड लेकर बैठीं रहीं थी।

ग्रेटा के कदम को काफी लोगों द्वारा सराहा गया। ग्रेटा का कहना है कि पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सिर्फ़ रैलियाँ करने भर से कुछ नहीं होने वाला है। आपकों बता दें कि ग्रेटा के द्वारा शुरू की गई यह मुहिम एक आंदोलन की तरह है जो कि सम्पूर्ण मानव जाति के भविष्य के लिए किया जा रहा है। हाल ही वैज्ञानिकों ने खबरदार किया था कि जलवायु परिवर्तन के कारण न केवल विश्व के औसत तापमान में वृद्धि हुई है बल्कि लू की गर्माहट में भी काफ़ी वृद्धि हुई। इस गर्मी को वैज्ञानिकों ने वन्यजीवों के लिए जानलेवा बताया।

याद दिला दें कि इन बातों को हल्के में लेने का मतलब अपने भविष्य को अंधकार में ढकेलने के समान है क्योंकि शोधकर्ताओं के मुताबिक बढ़ते तापमान के कारण लू से जितनी मौतें 2003 में यूरोप में हुई थीं, 21 वीं सदी के आखिर तक यह लू का तापमान पहले से 4 गुना बढ़कर अधिक हो जाएगा और इससे होने वाली मौतों का आँकड़ों का अंदाज फिर आप खुद ही लगा सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम भी पर्यावरण को बचाने में अपना योगदान दें और 16 साल की ग्रेटा की तरह व्यापक स्तर पर लोगों को जागरूक करें।

चीन से भी MFN दर्ज़ा वापस लो: RSS के स्वदेशी जागरण मंच की सरकार से अपील

कुख्तात आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना और पुलवामा हमले के गुनहगार मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करने की राह में चीन ने एक बार फिर से अड़ंगा लगा दिया। मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने के प्रस्ताव पर चीन द्वारा वीटो लगाने से भारत में आक्रोश का माहौल है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की संस्था स्वदेशी जागरण मंच ने चीन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। स्वदेशी जागरण मंच का कहना है कि भारत द्वारा चीन को दिया गया मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) का दर्जा वापस ले लेना चाहिए। इसके साथ ही चीन से आयात होने वाले रक्षा और टेलीकॉम सामान पर भी प्रतिबंध लगाने की भी मांग की गई है।

मंच के अखिल भारतीय सह संयोजक डॉक्‍टर अश्विनी महाजन ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी भी लिखी है। उन्‍होंने पाकिस्‍तान की ही तरह चीन को दिया गया मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) का दर्जा वापस लेने की माँग की है।

अश्विनी महाजन ने पीएम मोदी को लिखी चिट्ठी में कहा, “संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने वाले प्रस्‍ताव पर चीन के वीटो से पूरे देश में गुस्‍सा है। चीन का यह कदम बेहद निंदनीय और आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के विरुद्ध है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी चीन के इस कदम की आलोचना कर रहा है। ऐसे में अब वक्‍त आ गया है कि चीन को दिए गए MFN का दर्जा वापस ले लिया जाए। पाकिस्‍तान के मामले में आपकी (पीएम मोदी) सरकार पहले ही ऐसा कर चुकी है। इसके अलावा चीन की वस्‍तुओं को प्रतिबंधित भी किया जाए।”

स्‍वदेशी जागरण मंच ने कहा कि भारत पड़ोसी देश चीन से 76 अरब डॉलर (5.27 लाख करोड़ रुपए) से ज्‍यादा का आयात करता है। इस वजह से व्‍यापार घाटा भी बहुत ज्‍यादा है। इस पत्र में अश्विनी महाजन ने मंच की ओर से कराए गए सर्वेक्षण का भी हवाला दिया है।

उन्‍होंने लिखा, “स्‍वदेशी जागरण मंच द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण में चीनी वस्‍तुओं पर मौजूदा टैरिफ बेहद कम होने की बात सामने आई है। चीन से किए जाने वाले आयात को कम करने के लिए भारत सरकार को टैरिफ रेट बढ़ाने की जरूरत है।”

इसके साथ ही आरएसएस ने कहा, “जवाहर लाल नेहरू ने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा दिया था, मगर अब वही चीन धोखा दे रहा है और यह नेहरू जी की ही देन है कि चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य है और भारत उन पाँच स्थायी सदस्यों की लिस्ट से बाहर है। आज हर भारतीय को चीनी सामानों का बहिष्कार करना चाहिए।” बता दें कि यह चौथी बार है जब चीन ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में अड़ंगा डाला है।

न्यूज़ीलैंड की 2 मस्जिद में फायरिंग, बांग्लादेश क्रिकेट टीम बाल-बाल बची

भारतीय समयानुसार शुक्रवार (15 मार्च) की सुबह न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च शहर के अल नूर मस्जिद में गोलीबारी का मामला सामने आया है, जिसमें कई लोगों के हताहत होने की खबर है। इस घटना के बारे में न्यूज़ीलैंड पुलिस ने अपने बयान में कहा, ”क्राइस्टचर्च में गंभीर स्थिति पैदा हो गई है। यहां एक शूटर मौजूद है। पुलिस इससे निपटने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है, लेकिन अभी भी खतरे का माहौल है।”

शहर के सभी स्कूलों को बंद करवा दिया गया है। पुलिस ने क्राइस्टचर्च में सभी को भीड़भाड़ वाले इलाके से बचने की सलाह दी है। किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविधि के बारे में तुरंत सूचित करने को कहा है और साथ ही लोगों से घर के अंदर रहने का आग्रह किया है।

बताया जा रहा है कि गोलीबारी की घटना के दौरान एक मस्जिद में बांग्लादेश क्रिकेट टीम के खिलाड़ी भी मौजूूद थे। बांग्लादेश क्रिकेट टीम के खिलाड़ी तमीम इकबाल ने ट्वीट कर कहा, ”गोलीबारी में पूरी टीम बाल-बाल बच गई। बेहद डरावना अनुभव था।”

घटने का प्रत्यक्षदर्शी लेन पनेहा ने बताया कि उसने काले कपड़े पहने एक शख्स को मस्जिद अल नूर में आते देखा और इसके बाद दर्जनों गोलियों की आवाजें सुनाई दीं। गोलीबारी होते ही मस्जिद में अफरातफरी मच गई, लोग इधर-उधर भागने लगे। उसने बताया कि गोलीबारी के बाद शख्स वहाँ से भाग निकला। लेन ने आगे बताया कि गोलीबारी होने के बाद वह मस्जिद में लोगों की मदद करने के लिए अंदर भी गया लेकिन वहाँ पर उसे हर तरफ लाशें और खून ही खून ही दिखाई दिया।

ताजा खबर के अनुसार एक संदिग्ध को गिरफ्तार किया जा चुका है। हालाँकि इस घटना में कितने लोग हतातहत हुए उसकी कोई जानकारी स्पष्ट नहीं है। न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री ने कहा कि यह देश के इतिहास का सबसे काला दिन है। अमेरिका समेत कई देशों ने इस घटना की निंदा की है।

मुंबई में रेलवे स्टेशन के पास गिरा फुटओवर ब्रिज, 5 की मौत

मुंबई के सीएसटी (छत्रपति शिवाजी टर्मिनस) रेलवे स्टेशन के पास एक फुटओवर ब्रिज गिर गया। हादसे में 5 लोगों की मौत हो गई है, जबकि 34 से ज्यादा घायल हुए हैं। घटना आज शाम करीब 07.30 बजे की है। हादसे के चलते ब्रिज का करीब 60% हिस्सा ढह गया है। यह ब्रिज रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक को जोड़ने का कार्य करता था। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) मौके पर मौजूद है।

पुलिस ने बताया कि हादसे में 34 लोग घायल भी हुए हैं। घायलों को सेंट जॉर्ज और जीटी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हादसे के वक्त कई वाहन और लोग ब्रिज के नीचे से गुजर रहे थे। ब्रिज के मलबे में कई लोगों के फँसे होने की आशंका है।

हादसे के समय पुल पर बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। शाम का समय होने के चलते दफ्तरों से वापस आने वाले लोग भी पुल का इस्तेमाल करते हैं। बताया जा रहा है कि इस हादसे में जिन 2 महिलाओं की मृत्यु हुई है वो जीटी अस्पताल की कर्मचारी थीं। यह हादसा उस वक्त हुआ जब वह शाम को अस्पताल से घर जा रही थीं। बचाव कार्य में जुटे NDRF के मुताबिक 10 से 12 लोगों के मलबे में फँसे होने की आशंका है। क्षेत्रीय प्रतिक्रिया केंद्र के एक दल को घटनास्थल पर रवाना किया गया है।

हादसे को लेकर रेलवे मंत्रालय ने कहा कि ब्रिज बीएमसी के अंतर्गत आता है। हम घायलों की हर संभव सहायता कर रहे हैं। रेलवे के डॉक्टर और अधिकारी राहत व बचाव कार्य में बीएमसी की मदद कर रहे हैं।

AAP से गठबंधन को लेकर कॉन्ग्रेस में मची चिल्ल-पों

दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर कॉन्ग्रेस की ओर से कराए जा रहे सर्वे से खुद कॉन्ग्रेस पार्टी में घमासान मच गया है। कॉन्ग्रेस के दिल्‍ली प्रभारी पीसी चाको की ओर से कराए जा रहे सर्वे को लेकर जहाँ दिल्‍ली प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी की अध्‍यक्ष शीला दीक्षित नाराज हैं, वहीं पूर्व प्रदेश अध्‍यक्ष अजय माकन ने इस सर्वे पर सहमति जताई है। शीला दीक्षित ने कहा कि दिल्ली कॉन्ग्रेस नेतृत्व गठबंधन को लेकर राहुल गाँधी के सामने अपनी राय रख चुका है और उन्होंने कार्यकर्ताओं से पूछकर ही गठबंधन न करने की बात शीर्ष नेतृत्व को बताई थी।

शीला दीक्षित ने आगे कहा, “सर्वे पर चाको जी ही बता सकते हैं। मैंने भी आज अखबारों में पढ़ा है। राहुल गाँधी जी ने गठबंधन न करने के लिए सहमति दी थी। अब ये क्यों किया जा रहा है, मुझे नहीं मालूम। कार्यकर्ताओं से बातचीत करके ही हमने राहुल जी से बात की थी। हमने सोचा था चैप्टर क्लोज हो गया, आपके सवाल का जवाब केवल चाको ही दे सकते हैं।”

रिपोर्ट्स के अनुसार, पीसी चाको के साथ मतभेद के सवाल पर शीला ने कहा, “हमारे बीच कोई टकराव नहीं है। जब वे आ जाएँगे तब देखा जाएगा। सीनियर लीडरशीप को लूप में लेकर सर्वे किया जा रहा होगा? इसका जवाब मुझे नहीं मालूम। अगर फायदा होता तो पहले ही कह देते।” शीला दीक्षित ने जोर देते हुए कहा कि उन्‍हें लगता है कि कॉन्ग्रेस को अकेले चुनाव लड़ना चाहिए, कॉन्ग्रेस सक्षम है और सब कुछ जानती है।

वहीं इस पर अजय माकन ने कहा, “अच्छी बात है कि कार्यकर्ताओं की राय ली जा रही है। कॉन्ग्रेस इसी तरह से काम करती आयी है। मेरी जो राय है, वो मैं राहुल गाँधी को बता चुका हूँ। ये सब कुछ राहुल गाँधी के निर्देश से ही हो रहा है। ‘शक्ति एप्प’ राहुल गाँधी ही देखते हैं। पीसी चाको के पास 52 हजार लोगों के नंबर नहीं हैं।”

बता दें कि दिल्ली कॉन्ग्रेस में शीला दीक्षित वाला खेमा नहीं चाहता कि लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी से गठबंधन किया जाए। जबकि, अजय माकन और प्रभारी पीसी चाको अरविन्द केजरीवाल की पार्टी से गठबंधन के पक्ष में माने जाते हैं। माना ये भी जा रहा है कि शीला दीक्षित यह गठबंधन इसलिए भी नहीं चाहती हैं क्योंकि उनकी नजर अगले विधानसभा चुनावों पर है।

पीसी चाको और शीला दीक्षित के इस सम्पूर्ण प्रकरण ने कॉन्ग्रेस में खलबली मचा दी है क्योंकि फिलहाल पार्टी की जितनी बैठकें हुई हैं, उनमें गठबंधन को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी न तो किसी अंजाम तक पहुँची है और न ही आगे की कोई संभावना जताई गई है।

ये सारा प्रकरण पीसी चाको के एक ऑडियो सन्देश से सामने आया है। यह ऑडियो मैसेज सुनकर साफ होता है कि कॉन्ग्रेस के अंदर एक खेमा ऐसा भी है जो आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन चाहता है। ऑडियो में चाको अपने कार्यकर्ताओं से गठबंधन की संभावनाओं के बारे में बता रहे हैं। चाको इस ऑडियो में कह रहे हैं, “अगर वे चाहें तो दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन हो सकता है।” चाको का यह ऑडियो मैसेज ‘शक्ति एप्प’ के जरिये दिल्ली के लगभग 50 हजार कार्यकर्ताओं को भेजा गया है।

शीला दीक्षित ने इस पर कहा, “मुझे नहीं पता कि चाको साहब ऐसा क्यों कर रहे हैं, जबकि पूरी दिल्ली यूनिट गठबंधन के खिलाफ है। मैं दिल्ली की इंचार्ज हूँ, इसलिए मुझे तो कम से कम बताना ही चाहिए।” हालाँकि, कॉन्ग्रेस नेता अजय माकन ने इस पर कहा कि चाको से जुड़ा सारा वाकया पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी के निर्देश पर हुआ है। माकन ने कहा, “यह राहुल गाँधी का फैसला है क्योंकि शक्ति एप्प केवल वे ही यूज करते हैं। राहुल गाँधी के निर्देश पर ही शक्ति एप्प का उपयोग किया गया है। इसलिए अगर कोई राहुल गाँधी पर सवाल उठा रहा है तो यह पूरी तरह से गलत है।”

आचार संहिता उल्लंघन के नाम पर चुनाव चिह्नों के इस्तेमाल पर रोक की बात हास्यास्पद

लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही चुनावी दंगल चालू हो चुका है। इस चुनावी दंगल में एक ऐसी अजीबोगरीब माँग की गई है जिसमें हँसी आना तो लाज़मी है ही साथ ही ऐसी माँग करने वाले की मानसिकता भी स्पष्ट होती है। चलिए आपको बताते हैं कि आख़िर इस हँसी की असल वजह क्या है।

दरअसल, चुनाव आयोग के पास राजनीतिक पार्टियों की एक के बाद एक कई शिक़ायतें पहुँच रही हैं इसमें एक शिक़ायत यह की गई है कि सभी सरकारी दफ़्तरों से छत वाले पंखे हटवा दिए जाएँ क्योंकि इससे चुनाव प्रचार होने की संभावना है। बता दें कि छत वाला पंखा YSRC पार्टी का चुनाव चिह्न है और यदि चुनावी दौर में छत वाले पंखे चलेंगे तो उससे आचार संहिता का उल्लंघन होगा।

चुनाव आयोग में यह अजीबोगरीब शिक़ायत आंध्र प्रदेश में चित्तूर ज़िले से की गई है जहाँ रामाकुप्पम मंडल में तेलगू देशम पार्टी (TDP) के एक प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि हर सरकारी दफ़्तर से जल्द से जल्द छत वाले पंखे हटवाए जाएँ।

TDP द्वारा की गई इस शिक़ायत के बाद तहसीलदार जनार्दन रेड्डी ने ज़िला प्रशासन को रिपोर्ट भेजकर शिक़ायत पर उचित फैसला लेने को कहा। चुनाव आयोग इस पर क्या फ़ैसला लेगा यह देखना बाक़ी है, फ़िलहाल इसका तो केवल इंतज़ार ही किया जा सकता है।

अगर राजनीतिक पार्टियों की इस तरह की मूर्खतापूर्ण माँगों को अगर गंभीरता से लिया जाए तो उसके परिणाम कितने भयंकर हो सकते हैं इसका तो केवल अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। राजनीतिक पार्टियों को मिले तमाम चुनाव चिह्नों की बात करें तो उनका इस्तेमाल हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ा हुआ है। उदाहरण के लिए उगता हुआ सूरज, हाथ, साईकिल, हंसिया, हथौड़ा, बाली, झाड़ू, लालटेन, घड़ी, शंख और छत का पंखा इत्यादि तमाम ऐसे चिह्न हैं जिनका हम दैनिक रूप से इस्तेमाल करते हैं। इन चीज़ों के इस्तेमाल पर रोक लगाने की माँग अगर उठती है तो ये किसी चुटकुले से अधिक और कुछ नहीं हो सकता।

इससे पहले भी चुनाव आयोग के समक्ष ऐसी शिक़ायतें आई थीं जिन पर चुनाव आयोग ने गंभीरता से निर्देश जारी किया था। साल 2012 उत्तर प्रदेश में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने के मद्देनजर राजधानी लखनऊ तथा गौतमबुद्ध नगर में जगह-जगह लगी तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती और उनकी पार्टी के चुनाव चिह्न हाथी की मूर्तियों को ढकने का निर्देश जारी किया गया था, जिसपर काफी राजनीति भी गरमाई थी।

साल 2013 में कॉन्ग्रेस ने भी ऐसी ही अनोखी माँग चुनाव आयोग से की थी कि चुनावी दौर में खिले हुए कमल के तालाबों को ढका जाए क्योंकि कमल बीजेपी का चुनाव चिह्न है और इससे प्रचार होने की संभावना है। प्रचार होने की संभावना से आचार संहिता का उल्लंघन होता है।

ऐसा ही एक मामला तब सामने आया था जब तेलंगाना में विधानसभा चुनाव के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले गुलाबी बैलेट पेपर को लेकर विवाद हो गया था। दरअसल, कॉन्ग्रेस पार्टी ने गुलाबी रंग के बैलट पेपर के इस्तेमाल पर आपत्ति उठाई थी और उसकी वजह ये बताई थी कि तेलंगाना राष्ट्रीय समिति पार्टी का चुनाव चिह्न गुलाबी रंग का है। तेलंगाना राष्ट्रीय समिति अपनी सभी प्रचार सामग्री गुलाबी रंग का इस्तेमाल करती है। टीआरएस प्रमुख के चंद्रशेखर राव सहित तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के सभी नेता गले में गुलाबी रंग का स्कार्फ़ पहनते हैं। गुलाबी रंग के इस्तेमाल से आचार संहिता का उल्लंघन हो जाता इसलिए कॉन्ग्रेस ने चुनाव आयोग से इसके इस्तेमाल पर रोक लगाने की माँग उठाई गई।

वर्तमान समय में चुनावी माहौल के इस महासंग्राम में राजनीतिक पार्टियाँ पता नहीं कब किस चुनाव चिह्न को मोहरा बनाकर आम जन-जीवन अस्त-व्यस्त कर दें इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता। इस तरह की माँग राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं की बचकानी सोच को उजागर करता है जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भले ही इन्हें भोली-भाली जनता अपना प्रतिनिधि चुनकर सत्ता के आसन पर बैठा दे लेकिन इनकी सोच जस की तस ही रहती है। जबकि जनता के इन नुमाइंदों से ये उम्मीद की जाती है कि ये जनता हित में कुछ ऐसे समझदारी वाले फ़ैसले लें जिससे उनका कुछ भला हो सके। लेकिन अफ़सोस होता है कि इनकी सोच अभी, पंखा चलाना बंद कर दो, मूर्तियों को ढक दो, गुलाबी रंग की पर्चियों के इस्तेमाल को रोक दो और कमल के तालाबों को छुपा दो जैसी माँगों से ऊपर ही नहीं उठ सकी।

अनायास ही एक सवाल मन में घर करता है कि ऐसी बेहूदी माँगों पर चुनाव आयोग का कितना समय नष्ट होता होगा, ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए न जाने कितने स्तरों पर विचार किया जाता होगा? इन परिस्थितियों में तो सिर्फ़ सलाह ही दी जा सकती है जिसपर अमल करना बेहद ज़रूरी है, वो ये कि जितना दिमाग इस तरह की माँगों पर लगाया जाता है, बेहतर होता कि उतना दिमाग जनता के हित पर लगाया होता तो लाइमलाइट में आने के लिए इन बेकार की हरक़तों का रुख़ न करना पड़ता।

मोहम्मद शमी पर दहेज़ और यौन-उत्पीड़न के मामले में चार्जशीट दाखिल

भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं क्योंकि कोलकाता पुलिस ने अलीपुर कोर्ट में उनके खिलाफ चार्जशीट पेश की। शमी की पत्नी हसीन जहाँ द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर, शमी पर IPC 498A (दहेज उत्पीड़न) और 354A (यौन उत्पीड़न) के तहत आरोप लगाए गए हैं।

बता दें कि शमी का अपनी पत्नी के साथ विवाद, सोशल मीडिया पर उनके कथित अफेयर की तस्वीरें सामने आने के बाद से ही गहरा गया था। मोहम्मद शमी के दक्षिण अफ्रीका दौरे से लौटने के बाद उनका हसीन जहाँ से विवाद हुआ और जल्द ही यह विवाद सार्वजनिक हो गया था। हसीन जहाँ ने अपने फेसबुक अकाउंट पर कई फोटो और वॉट्सअप के स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए शमी पर लड़कियों के साथ अवैध संबंध रखने का आरोप लगाया था।  

साथ ही पिछले साल हसीन जहाँ ने शमी पर घरेलू हिंसा और यौन शोषण का भी आरोप लगाया था। हालाँकि, शुरुआत में शमी ने इन आरोपों का खंडन किया, यह दावा करते हुए कि यह उनके क्रिकेटिंग करियर को बर्बाद करने की साजिश है।

हसीन जहाँ ने शमी पर मैच फिक्सिंग में लिप्त होने का भी आरोप लगाया था, जिसके बाद बीसीसीआई ने उनका नाम केंद्रीय अनुबंध सूची से वापस ले लिया था। हालाँकि, मैच फिक्सिंग के आरोपों पर आंतरिक जाँच असत्य पाए जाने के बाद, शमी को बीसीसीआई द्वारा ग्रेड ए अनुबंध सूची में बहाल कर दिया गया था।

विश्व कप के ठीक एक महीने पहले, शमी के खिलाफ चार्ज-शीट का दाखिल होना, उस क्रिकेटर के लिए बहुत बड़ा झटका हो सकता है, जिसने भारतीय क्रिकेट टीम में वापसी के लिए आस लगा रखी हो। फ़िलहाल, मामले की अगली सुनवाई 22 जून को तय की गई है।

30 साल में यह पहला ऐसा चुनाव है, जब PM के अलावा कोई और PM का उम्मीदवार नहीं

1991 का चुनाव, पहला ऐसा चुनाव था, जहाँ नेहरू-गाँधी परिवार की सत्ता पर दावेदारी नहीं थी। राजीव गाँधी कॉन्ग्रेस को लीड कर रहे थे, स्वाभाविक तौर पर पीएम पद के दावेदार थे परन्तु बीच चुनाव में उनकी हत्या हो जाने से उपजी सहानुभूति लहर से सत्ता तो कॉन्ग्रेस के पास आ गई, लेकिन गाँधी परिवार सत्ता से बाहर हो गया। बाद में चाहे जो भी हश्र हुआ हो लेकिन नरसिंह राव ने पाँच साल का कार्यकाल गाँधी परिवार और उनके पिट्ठुओं को छकाते हुए पूरा किया और निश्चित रूप से छाप छोड़ी।

उसके बाद जितने भी चुनाव हुए, उन सबकी एक खासियत यह रही कि भाजपा की तरफ से जहाँ अटल बिहारी वाजपेयी पीएम पद के दावेदार होते थे, वहीं विपक्ष की ओर से यह सपना देखने का हक़ सबको मिल गया था। और ऐसा करना कतई अस्वाभाविक और बेतुका नहीं था। क्योंकि यह वही दौर था, जब तीसरे मोर्चे की राजनीति अपने पूरे शबाब पर थी।

लालू, मुलायम, हरकिशन सिंह सुरजीत, अमर सिंह, ज्योति बसु, चंद्रशेखर, विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे नेता नेताओं को ताश के पत्तों की तरह फेंटकर उसमें से पीएम निकाल लेते थे। एच डी देवेगोड़ा, इंद्र कुमार गुजराल जैसे भूले-भटके पीएम, इसी ताश पद्धति से पीएम बन गए थे। बताते हैं कि जब तीसरे मोर्चे के नेताओं ने इंद्र कुमार गुजराल को पीएम बनाने का निर्णय लिया तब वे दिल्ली के आंध्र प्रदेश भवन के एक कमरे में सो रहे थे। उन्हें नींद से जगाया गया और कहा कि आप देश के अगले प्रधानमंत्री हैं। खुशी में उछलते हुए जब यही बात उन्होंने अपने घर पर बताई तो उनकी पत्नी ने कहा कि यह क्या बकवास है, तब उन्होंने डपटते हुए कहा कि तुम भारत के होने वाले पीएम से इस प्रकार बात नहीं कर सकतीं।

इसके अलावा जो बन नहीं सके, वह इन बन चुके प्रधानमंत्रियों से भी बड़े, इस पद के लिए दावेदार थे। जिनमें ज्योति बसु, शामिल हैं, जो पीएम बनने के लिए तैयार थे, लेकिन उनकी पार्टी ने फच्चर लगा दिया, जिसके बारे में उन्होंने बाद में अफ़सोस प्रकट किया कि यह उनकी ऐतिहासिक भूल थी। इसके अलावा मुलायम सिंह यादव, जिनकी दावेदारी पर दूसरे यादव नेता लालू प्रसाद ने वीटो लगा दिया, विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी उस कालखंड में फिर से एक बार पीएम बनाने की तैयारी कर ली गई थी, लेकिन वे अपने पहले कार्यकाल में हुए अनुभवों से इतने खौफज़दा थे, कि जब तीसरे मोर्चे के नेता उनके घर पर यह प्रस्ताव लेकर गए तो वे पीछे के दरवाजे से निकल चुके थे और कहीं पहुँचने की बजाय, घंटों अपनी गाड़ी में दिल्ली की सड़कों पर खाली घूमते रहे।

यही हाल उस दौर में भी था, जब अटल जी 13 महीने और फिर 5 साल के लिए पीएम बने… भाजपा की ओर से इस पद के लिए कोई कन्फ्यूजन नहीं रहता था, लेकिन विपक्षी दलों में दस सासंदों वाली पार्टी का मुखिया भी इस पद को अपने सपने में देखने के लिए अधिकृत था।

2004 में जब डॉ मनमोहन सिंह को सोनिया गाँधी ने पीएम बनाया तब उसकी तह में भी वही तीसरे मोर्चे की राजनीति थी, कि नेताओं को ताश की तरह फेंट दो, और जो नेता काबू में आ जाए उसे पीएम बना दो, बेशक वह जोकर ही क्यों न हो।

2009 में हालाँकि सोनिया गाँधी ने यह गलती कर दी कि या तो उन्हें अपनी ही पार्टी के किसी फुल टाइम राजनीतिज्ञ को पीएम बनाना था, या फिर मनमोहन सिंह को बनाया भी था, तो दो साल बाद उन्हें घर बिठाकर राहुल गाँधी को पीएम बना देतीं। तब उनकी पार्टी की वह दुर्गति न होती जो आज हुई है, और न ही राहुल गाँधी को आज इस पद के लिए संघर्ष करना पड़ता।

बाहरहाल, पीएम पद के अरमान सजाने वाले नेताओं की बात करें तो 2014 में भी फेहरिस्त खूब लम्बी थी। लालू, मुलायम, शरद पवार, मायावती, जय ललिता, चन्द्र बाबू नायडू सरीखे नेता इस पद के लिए स्वयंभू दावेदार थे, दावेदार तो राहुल गाँधी भी थे लेकिन नरेन्द्र मोदी ने अपनी छप्पर फाड़ जीत से इन सभी के अरमानों पर पानी फेर दिया।

पर यह सब लिखने और बताने के पीछे मेरा उद्देश्य उन नेताओं का बखान करना नहीं है, जिनके भाग्य से पीएम का पद छिंटक गया या जिनके भाग्य में दरिद्रता लिखी हुई थी, मैं यह सब इस लिए लिखने को विवश हूँ कि बीते लगभग तीस साल में यह पहला ऐसा चुनाव है, जब पीएम के अलावा कोई और पीएम का उम्मीदवार नहीं है।

लालू जी जेल में अपनी राजनीति ही नहीं बल्कि जीवन का भी भयावह समय गुजार रहे हैं। उनके पुत्र तेजस्वी कितनी ही चतुराई दिखा लें, लेकिन वे अपने पिता की राजनीति को आगे नहीं बढ़ा सकते, और उसका दौर भी अब बीत चुका है। मुलायम सिंह यादव तो टीवी पर सीधे प्रसारण में, करोड़ों लोगों के सामने मोदी जी को फिर से पीएम बनने का आशीर्वाद दे चुके हैं, जयललिता और करुणानिधि जैसे क्षत्रप अब इस दुनिया में नहीं हैं, ममता बनर्जी अधिक से अधिक 20 सीटें ला सकेंगी और इतनी सीटों पर उन्हें कौन पीएम बनाएगा और सहयोग कौन देगा? नवीन पटनायक और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता अपनी पूरी पारी खेल चुके हैं, और यह उनका आख़िरी चुनाव है।

अब अगर इस सीन में सबसे महत्वपूर्ण नेताओं की बात करें तो मायावती का नाम आता है, जिन्हें बीते कई वर्षों से पीएम पद का सशक्त दावेदार बताया जाता है, हमें कहना चाहिए कि वे इस बार फिर सशक्त दावेदार हो सकती थीं बशर्ते वे उत्तर प्रदेश की सभी सीटों पर लड़तीं, या पीएम पद पर कॉन्ग्रेस से समर्थन का आश्वासन लेने के बाद वे, देश भर में कॉन्ग्रेस से साथ गठबंधन करके लड़तीं, लेकिन वे ख़ुद अपने राजनीतिक जीवन के सबसे मुश्किल समय से जूझ रही हैं, जहाँ वे अपने गढ़ उत्तर प्रदेश में 80 में से मात्र 36 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं, कॉन्ग्रेस से उन्होंने खुली जंग का ऐलान कर दिया है और कॉन्ग्रेस ने भी इस जंग में चार कदम आगे बढ़कर, भविष्य में मायावती की राजनीति के सबसे बड़े संकट बनने वाले भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर के ऊपर अपनी सरपरस्ती का ‘हाथ’ रख दिया है।

वहीं इस पद के लिए 1991 से चूक रहे दिग्गज मराठा नेता, अपने ही राज्य नहीं बल्कि अपने ही परिवार में उलझ गए हैं, जहाँ उन्हें अपनी सीट अपने भतीजे अजीत पवार के बेटे पार्थ के लिए छोड़नी पड़ी है, वरना उनका समय तो बाद में खराब होता लेकिन ‘घड़ी’ पहले ही खंड-खंड हो जाती।

अंत में ‘बबुआ’ जितना जिक्र अखिलेश यादव का भी, जो कितनी भी डींगे हाँक लें, लेकिन उनके साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि जाति की राजनीति करने वाले अपने पिता जी की पार्टी के मुखिया सिर्फ ‘विरासत’ की वजह से हैं। और जाति की राजनीति में यह अयोग्यता ही मानी जाती है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण चौधरी अजीत सिंह है, जिनके पिताजी चौधरी चरण सिंह देश के प्रधानमंत्री भी रहे थे, लेकिन आज अजीत सिंह और उनके पुत्र एक-एक… दो-दो सीटों के लिए न केवल अपनी राजनीतिक निष्ठा बल्कि अपने समाज की निष्ठा को भी जहाँ-तहाँ नीलाम करते फिर रहे हैं। इसलिए बबुआ को अभी से ‘पैदल’ चलने का अभ्यास शुरू कर देना चाहिए क्योंकि चुनाव के बाद हाथी तो उनको उतार कर फेंक ही देगा, साइकिल के पहिए भी पंचर हो जाएँगे।

ऐसे में सिर्फ एक व्यक्ति बचता है जो अभी प्रधानमंत्री है, और आगे भी हर हाल में प्रधानमंत्री बनना चाहता है। जिसके पास न अब सत्ता और षड्यंत्रों के अनुभवों की कमी है, न संसाधनों की, न समर्थकों की, न ऊर्जा की, न मुद्दों की और न ही दिलेरी की। तब इन हालात में कोई मुझे यह बताए कि आखिर क्यों यह व्यक्ति फिर से पीएम नहीं बनेगा और 300 सीटों के साथ नहीं बनेगा ?

आतंकवाद से लड़ने में PM मोदी जितने कठोर नहीं थे मनमोहन सिंह: शीला दीक्षित

एक और जहाँ गाँधी परिवार जमीन घोटाले में अपने नाम मीडिया में आने के कारण परेशान चल रहा है, वहीं दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने आज एक बयान दिया है, जिसके कारण कॉन्ग्रेस में बवंडर मच सकता है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद से कॉन्ग्रेस लगातार ये माहौल बनाने के प्रयास कर रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आतंकवाद पर ठीक तरह से कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।

बृहस्पतिवार (मार्च 14, 2019) को एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में शीला दीक्षित ने स्वीकार करते हुए कहा कि मनमोहन सिंह आतंकवाद से लड़ने में उतने कठोर नहीं थे, जितने कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। हालाँकि, शीला दीक्षित ने यह भी कहा है कि नरेंद्र मोदी के ज्यादातर काम राजनीति से प्रेरित होने के साथ ही राजनीतिक लाभ उठाने के लिए होते हैं। इस बयान के सामने आने के बाद शीला दीक्षित ने सफाई देते हुए कहा है, “मनमोहन सिंह का आतंकवाद को लेकर उतना कड़ा कदम नहीं होता, जितना कि पीएम मोदी उठाते हैं। अगर मेरे बयान को किसी दूसरी तरह पेश किया जा रहा है तो मैं कुछ नहीं कह सकती।”

दिल्ली कॉन्ग्रेस प्रमुख शीला दीक्षित ने स्वीकार किया कि 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रतिक्रिया, पुलवामा आतंकी हमले  के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह मजबूत और दृढ़ नहीं थी।

शीला दीक्षित के इस बयान के बाद दिल्ली मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, जिन्हें आजकल सोशल मीडिया पर आत्ममुग्ध बौने के नाम से भी ‘वायरल’ किया जा रहा है, तुरंत एक्शन में आ गए हैं। उन्होंने शीला दीक्षित के इस बयान पर ट्वीट करते हुए कहा, “शीला जी का ये बयान वाक़ई चौंकाने वाला है। भाजपा और कॉन्ग्रेस में कुछ तो खिचड़ी पक रही है।” वहीं मनीष सिसोदिया ने भी ट्वीट में लिखा है, “हम तो पहले से ही कह रहे थे कि इस बार कॉन्ग्रेस, मोदी जी को दोबारा पीएम बनाने पर काम कर रही है।”

इन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इस सब जानकारी के बाद भी केजरीवाल लगातार हर दूसरे दिन कॉन्ग्रेस के सामने गिड़गिड़ाते हुए गठबंधन की भीख माँग रहे हैं। इसी कड़ी में आज हरियाणा कॉन्ग्रेस प्रमुख ने भी केजरीवाल की गठबंधन की पेशकश को लगभग रद्द कर दिया है।