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रॉबर्ट वाड्रा की गिरफ़्तारी पर रोक की अवधि 2 मार्च तक बढ़ी

शनिवार को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा और एक अन्य आरोपी मनोज अरोड़ा की मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अंतरिम ज़मानत बढ़ा दी। ताजा जानकारी के अनुसार वाड्रा की अंतरिम ज़मानत 2 मार्च तक बढ़ा दी गई है।

ख़बरों के मुताबिक, रॉबर्ट वाड्रा मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अपनी अग्रिम जमानत याचिका के सिलसिले में आज सीबीआई की विशेष अदालत में पेश हुए थे। वाड्रा को दी गई अंतरिम जमानत शनिवार को समाप्त होने वाली थी। ईडी के अधिकारियों ने इस मामले की पूछताछ में रॉबर्ट वाड्रा द्वारा सहयोग न किए जाने के संबंध में शिक़ायत की थी।

विशेष लोक अभियोजक डीपी सिंह ने विशेष अदालत को सूचित किया कि वाड्रा द्वारा सहयोग न किए जाने के लिए उनकी ज़मानत याचिका का विरोध कर रहे हैं। सिंह ने आगे कहा कि पूछताछ को पूरा करने के लिए उन्हें वाड्रा के चार से पाँच पेशी की ज़रूरत है।

सिंह ने कहा, “यदि वह सवालों के जवाब देने और सहयोग करने के लिए तैयार हैं, तो हम इसे देख सकते हैं। अगर वह ज़मानत याचिका पर बहस करना चाहते हैं, तो हम उस तरह से भी आगे बढ़ सकते हैं।” एसएसपी सिंह ने आरोपी रॉबर्ट वाड्रा द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग पर भी आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने ईडी की जांच को राजनीतिक बदला लेने के रूप में पेश किया था।

आज की सुनवाई के दौरान, ईडी अभियोजक ने इस बात पर आपत्ति जताई कि रॉबर्ट वाड्रा जहाँ भी जाते हैं, तो एक ‘बारात’ उनके पीछे चलती रहती है, फिर चाहे वह ईडी कार्यालय हो या अदालत।

आरोपी रॉबर्ट वाड्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी ने आश्वासन दिया कि वे पूछताछ के लिए अब पूरा सहयोग करेंगे। अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका की सुनवाई 2 मार्च तक के लिए टाल दी और गिरफ़्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की।

बता दें कि बीकानेर लैंड स्कैम मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कल रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी मैसर्स स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड की 4.62 करोड़ रुपये की संपत्ति अटैच की थी।

रॉबर्ट वाड्रा 6 फ़रवरी को कई समन के बाद पूछताछ के लिए ईडी कार्यालय में पेश हुए थे। तब से, ED ने वाड्रा से कई बार पूछताछ की।

पिछले साल अप्रैल में ईडी ने वाड्रा के सहयोगी जयप्रकाश बगरवा की संपत्तियों को बीकानेर भूमि घोटाला मामले में अटैच किया था। बीकानेर भूमि घोटाला मामले में, राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा अचल संपत्ति डेवलपर्स सहित कुछ धोखाधड़ी वाले व्यक्तियों की मिलीभगत से ग़ैर-मौजूद व्यक्तियों के नाम पर भूमि आवंटित की गई थी।

वाड्रा पर उनके ख़िलाफ़ धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत एक आपराधिक मामला भी दर्ज है, इसमें आरोप लगाया गया था कि उनकी फ़र्म स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी ने कोलायत और बीकानेर में ज़मीन का एक टुकड़ा सस्ते में ख़रीदा था और उसे अवैध लेनदेन के तहत बेहद उच्च प्रीमियम पर बेचा था।

जागो कैप्टेन जागो, देशहित में सिद्धू को मंत्रिमंडल से बाहर फेंको

एक दशक तक 125 करोड़ से भी अधिक जनसंख्या वाले देश ने एक ऐसे प्रधानमंत्री को बर्दाश्त किया जिसकी छत्रछाया में अनगिनत घोटाले होते गए लेकिन वह चुप रहा। अब समय आ गया है जब कैप्टेन अमरिंदर सिंह इतिहास से सीखें, दूसरा मनमोहन सिंह कहलाने से बचें और नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब मंत्रिमंडल से तत्काल बरख़ास्त करें। कैप्टेन अगर ऐसा करने में असमर्थ साबित होते हैं, तो उन्हें लेकर पूरे देश में गलत सन्देश जाएगा। अगर एक परिवार विशेष की चाटुकारिता राष्ट्रहित पर भारी पड़ती है तो जनता यही सोचेगी कि कैप्टेन अमरिंदर सिंह जैसे भारी-भरकम व्यक्तित्व वाला नेता भी राजनीति की उसी धारा का हिस्सा है, जो सत्ता के लिए ‘कुछ भी’ कर सकता है।

कैप्टेन साहब, आप सेना में रहे हैं। सेना से इस्तीफ़े के बाद भी भारत-पाक युद्ध के दौरान आपसे चुप नहीं रहा गया और आप फिर से सेना से जुड़ गए थे। क्या आज 76 वर्ष का यह मुख्यमंत्री 24 वर्ष के उस कैप्टेन पर भारी पड़ रहा है? क्या भारत-पाक युद्ध को क़रीब से देखने वाला सेना का वह जवान आज एक बूढ़े मुख्यमंत्री के रूप में अपने उस गौरवपूर्ण इतिहास को भूल चुका है? भारत-पाकिस्तान युद्ध पर पूरी की पूरी पुस्तक लिखने वाला विद्वान यह तो जानता ही है कि आतंकवाद का देश होता है। उसे यह भी पता है कि उस देश का नाम क्या है? फिर नवजोत सिंह सिद्धू के बयान पर चुप्पी क्यों?

पुलवामा में हुए आतंकी हमले ने हमारे 42 जवानों को हमसे छीन लिया। पड़ोसी देश में बैठे आतंक के निशाचरों ने हमें एक ऐसा घाव दिया है, जिस से उबरने में हमें काफी वक़्त लगेगा। हम इस घाव से भले उबर जाएँ, लेकिन देश के वो जवान हमारे स्मृति पटल में सदा के लिए बने रहेंगे। कैप्टेन साहब, क्या आपका रक्त नहीं खौलता? पाकिस्तान के करतूतों पर पुस्तक लिखने वाला वह अध्येता आज न जाने कहाँ गुम हो गया है। रह गया है तो बस एक राजनेता, जो अपने कैबिनेट में एक ऐसे व्यक्ति को बर्दाश्त कर रहा है जो बिना उनकी सलाह लिए बेख़बर पाकिस्तान जाता-आता है।

चाटुकारिता देशहित पर भारी पड़ रही है

यह सब आपकी नाक के नीचे हो रहा है कैप्टेन साहब। यह हमें दर्द देता है। यह हर उस व्यक्ति को दर्द देने वाला है, जिसे लगता है कि पंजाब कॉन्ग्रेस में एक तो शेर बैठा हुआ है जो राष्ट्रहित को व्यक्ति-पूजा से ऊपर रखता है। कैप्टेन साहब, आप NDA (नेशनल डिफेंस एकेडमी) के प्रोडक्ट हैं। आप जब पहली बार सेना में शामिल हुए थे तब से अब तक साढ़े पाँच दशक बीत चुके हैं। सेना से लेकर राजनीति तक, आपके अनुभवों की कोई कोई सीमा नहीं। फिर भी ऐसी चुप्पी? फिर भी ऐसा मौन? कारण क्या है कैप्टेन साहब? क्या मुख्यमंत्री की कुर्सी ने सेना के उस बहादुर जवान को सुला दिया है?

बार-बार अपमान, आपका भी… देश का भी…

नवजोत सिंह सिद्धू जब पाकिस्तान से लौटे थे तब उनसे यह सवाल पूछा गया था कि क्या उन्होंने पाकिस्तान जाने से पहले मुख्यमंत्री की सहमति ली है? उस पर उन्होंने जो जवाब दिया था, उन्हें पंजाब कैबिनेट से बाहर फेंकने के लिए वही काफ़ी था। लेकिन आपने, कैप्टेन साहब, चुप रहना बेहतर समझा। आपने कोई कार्रवाई नहीं की। नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा था कि उनके कैप्टेन सिर्फ़ और सिर्फ़ राहुल गाँधी हैं और उन्ही की सहमति से वह बार-बार दौड़ कर पाकिस्तान की गोद में जा बैठते हैं। यह अपमान कैसे सह लिया आपने कैप्टेन साहब? नवजोत सिंह चाटुकार हैं। किस मजबूरी में आपने एक चाटुकार को अपना और देश का अपमान करने का हक़ दे दिया?

जब खालिस्तान की बात आती है, तब राष्ट्रहित में आप कनाडा की भी नहीं सुनते। यह आपका ही प्रभाव था कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो को भारत में यह महसूस कराया गया कि अगर कनाडा खालिस्तानी आतंकियों को समर्थन देने वाला कोई भी कार्य करता है तो उसे भारत की भारी नाराज़गी झेलनी पड़ेगी। आपने कनाडा के प्रधानमंत्री से मुलाक़ात में भी राष्ट्रहित को प्रथम रखा। जहाँ नेतागण किसी ख़ास वर्ग का वोट पाने के लिए उस वर्ग के कट्टरवाद का भी पुरजोर समर्थन करते हैं, आपका यह स्टैंड सराहनीय था। प्रधानमंत्री मोदी ने भी आपके इस स्टैंड को तवज्जोह दी और कनाडा के पीएम से उनकी भारत यात्रा के दौरान ऐसा ही व्यवहार हुआ, जैसा आप चाहते थे।

आप तो राहुल गाँधी से नहीं डरते हैं न?

क्या नवजोत सिंह सिद्धू को मंत्रिमंडल ने निकाल कर बाहर फेंकने में आपको राहुल गाँधी का डर सता रहा है? कनाडा जैसे विशाल देश को उसकी गलती का एहसास दिलाने वाला योग्य शासक आज अपने ही अंतर्गत कार्य कर रहे एक मंत्री को उसके कुकर्मों की सज़ा तक नहीं दे सकता? लेकिन, आप तो राहुल गाँधी से नहीं डरते हैं न? हमें याद है कि कैसे बीच चुनाव के दौरान राहुल गाँधी ने आपको पंजाब में कॉन्ग्रेस का मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किया था। उस से पहले आपने कहा था कि राहुल गाँधी को ‘रियलिटी चेक‘ की ज़रूरत है। क्या वह सिर्फ एक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए था?

कैप्टेन साहब, आपके मंत्री ने पाकिस्तान का बचाव किया है। जनभावनाओं के प्रतिकूल जाकर देश को नीचा दिखाने वाला कार्य किया है। अनजान बन कर मत बैठिए। सोनी चैनल आपसे ज़्यादा समझदार निकला। उसे इसी देश में अपना व्यापार चलाना है। उसने जनता की माँग को मानते हुए सिद्धू को अपने शो से निकाल बाहर किया। आज जब एक प्राइवेट कम्पनी मिशाल पेश कर रही है, आपको अपने आप से पूछना पड़ेगा कि क्या पाकिस्तान परस्तों को अपने कैबिनेट में रख कर शासन करना जायज है? डॉक्टर मनमोहन सिंह भी रेनकोट पहन कर नहाया करते थे। इतिहास में उन्हें कैसे और किसलिए याद रखा जाएगा, आपको बख़ूबी पता है।

राहुल गाँधी तक को घुड़की देकर कॉन्ग्रेस में बने रहने वाले शायद आप अकेले नेता हैं। लेकिन एक चाटुकार ने आपको मनमोहन बना दिया है। खालिस्तान और वामपंथियों के ख़िलाफ़ बोलनेवाला व्यक्तित्व आज निःसहाय नज़र आ रहा है। शेर मेमना बन चुका है। कैप्टेन ने हथियार डाल दिए हैं। विद्वान मूर्खता कर रहा है। मुख्यमंत्री बनने के लिए अपनी पार्टी के आलाकमान तक को झुका देने वाला व्यक्ति आज देश की पुकार सुनने में असमर्थ है। कॉन्ग्रेस का शायद एकमात्र नेता जिसने सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कहा था कि उसे कोई सबूत की ज़रूरत नहीं है, आज सबूत होते हुए भी कार्रवाई नहीं कर रहा है। सेना के बयान पर शब्दशः भरोसे का दावा करने वाला व्यक्ति आज शहीदों के बलिदान पर असंवेदनशील बयान देने वाले के सामने झुका पड़ा है।

समय बदल गया है। कैप्टेन की यह निष्क्रियता भी इतिहास में दर्ज होगी। इतिहास आपको दूसरा डॉक्टर मनमोहन सिंह के नाम से याद रखेगा। पटियाला के राजवंशी परंपरा का ध्वजवाहक आज पाकिस्तान का गुणगान करने वाले अपने ही एक जूनियर के सामने झुक गया। राजनीति ने शौर्य को चकमा दे दिया। अभी भी वक़्त है कैप्टेन साहब, जागिए और कान साफ़ कर जनता की आवाज सुनिए। वो आपसे कोई बलिदान नहीं माँग रही, वही माँग रही जो आप एक सेकेंड में कर सकते हैं। नवजोत सिंह सिद्धू को अपने कैबिनेट से बाहर फेंक कर पटियाला का प्रताप दिखाइए

सबरीमाला: कहानी एक धर्मयुद्ध की

“नमस्ते, आप सभी को यहाँ इस सभा का भाग बना देख मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है।” तीस साल की प्रतिभा ने जब सभा को इन वाक्यों से संबोधित करना शुरू किया तो सभा में उपस्थित सारी औरतों ने ज़ोरदार तालियों से उसका स्वागत किया। प्रतिभा के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं थी। तेरह साल की उम्र से उसने ऐसी ना जाने कितनी सभाओं को संबोधित किया था। प्रतिभा का नाम तो जैसे उसके लिए ही बना था। उसमें अपनी बातों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देने की प्रतिभा कूट-कूट कर बसी थी।

प्रतिभा ने आगे बोलना शुरू किया, “जब मुझे इस सभा- अस्तित्व एक औरत का को संबोधित करने का न्योता दिया गया तो सबसे पहला सवाल मेरे मन में यह आया कि एक औरत है क्या? इस पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ एक औरत का सारा जीवन अपने पिता फिर पति और फिर बेटे की बातें सुनने में लग जाता है वहाँ एक औरत का अस्तित्व है क्या असल में? हमारे शास्त्र हमें जीवन भर एक दूसरे इंसान की ग़ुलामी करने और उसके अनुसार चलने का निर्देश देते हैं। ढोल, गवार, शुद्र, पशु , नारी । सकल ताड़ना के अधिकारी॥ मतलब कि एक औरत जो कि इस समाज का आधार है वो ताड़ना की अधिकारी हो गई, लेकिन क्यों? ऐसा क्या पाप किया है औरतों ने, कि वे ताड़ना की अधिकारी हो गईं? बचपन से एक औरत पर समाज दबाव डालना शुरू करता है। ये मत करो, ये मत बोलो, ऐसे मत बैठो, ये मत पहनो, क्यों? क्या औरत एक ग़ुलाम है? क्या उसे अपने निर्णय लेने का अधिकार नहीं?” प्रतिभा की इस बात पर एक बार फिर तालियाँ बज उठीं।

प्रतिभा ने हाथ उठाकर लोगों को शांत होने का आग्रह किया और आगे बोली “आजकल आप बहुत से लोगों को कहते सुनेंगे कि ये सब पुरानी बातें हो गई। आज तो समाज में औरतें आदमियों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं। जॉब कर रही हैं, आर्मी में जा रही हैं, विदेश जा रही हैं, यहाँ तक कि अन्तरिक्ष में भी पहुँच गईं। फिर वो कहेंगे कि औरतें अब बस अपनी हीन भावना का शिकार हैं और इस कारण अच्छा भला कमाने के बाद भी उत्पीड़ित होने का दावा करती हैं। मैं पूछती हूँ कि क्या सच में ऐसा है? क्या सच में समाज में औरतों की परिस्थिति में सुधार आया है?”

“हाँ, अब औरतें अपने हक़ की लड़ाई लड़ते हुए इतना अधिकार अपने लिए हासिल कर चुकी हैं कि वे काम पर जा सकें, घर से बाहर निकल सकें; पर क्या समाज में बराबरी का दर्जा उन्हें हासिल हो गया है? नहीं, ऐसा नहीं है। और आज भी इस बात का सबूत हमें कहीं ना कहीं हर रोज देखने को मिल ही जाता है। ज़रा उस औरत से पूछिए जो जॉब कर रही है। हर दिन घर आने के बाद जब उसका पति दिनभर की थकान का बहाना बनाकर बैठ जाता है तब वो अपनी थकान भूलकर परिवार के लिए किचेन में खाना बनाती है। क्या वो थकी नहीं होती? क्या उसका आराम करने का मन नहीं करता? पर अगर उसने थकान के कारण इस डिश कम बना दी, तो उससे क्या कहा जाएगा? जब इतनी ही तकलीफ़ हो रही है तो जॉब छोड़ दो ना?”

“आज भी एक औरत चाहे कितना भी कमा ले, उसका स्थान घर के अन्दर वही है। एक कामवाली बाई, एक दाई, एक मनोरंजन की वस्तु बस। और इस सबसे ऊपर एक औरत एक अछूत भी हो जाती है जब उसे महावारी होती है। बचपन से हमारे माँ-बाप हमें महावारी के समय एक कोने में ऐसे बिठा देते हैं जैसे कि हमें कोई कोढ़ हो गया हो। कुछ छू नहीं सकते क्योंकि हम अशुद्ध हैं। मंदिर जा नहीं सकते क्योंकि हमारे मंदिर जाने से मंदिर अशुद्ध हो जाएगा। क्यों भई? क्या एक औरत बिना महावारी के एक बच्चे को जन्म दे सकती है? और अगर नहीं तो जो प्रक्रिया हमें एक नए जीवन को जन्म देने की क्षमता देती है वो हमें अशुद्ध कैसे बना देती है? और अगर वो हमें अशुद्ध बना देती है तो हमारे शरीर से जन्म लेने वाला पुरुष शुद्ध कैसे हो गया?”

प्रतिभा के इस सवाल पर एक बार फिर ज़ोरदार तालियाँ बजीं। इस बार प्रतिभा ने उन्हें रोका नहीं। अपने पास रखी पानी के बोतल उठाकर कुछ घूँट पानी पीकर वो आगे बोली “आप सब ने सबरीमाला के अय्यप्पा स्वामी मंदिर में जो हो रहा है सुना ही होगा। आजकल वो मंदिर बहुत सुर्ख़ियों में है। क्यों? क्योंकि उस मंदिर में उन स्त्रियों को जाने की अनुमति नहीं है जिनके अन्दर महावारी की क्षमता है। यानी कि जहाँ एक स्त्री ने उस उम्र में पड़ाव डाला वो अछूत हो गई। और इतना ही नहीं वहाँ केरल के लोगों ने अपने घर की लड़कियों के दिमाग में इतना ज़हर घोला हुआ है कि वे भी इस बेहूदी प्रथा का समर्थन कर रही हैं।”

“पर ये ज़हर हमें अपने मन में नहीं घुलने देना है। इस ज़हर से हमें हमारी आने वाली पीढ़ियों को बचाना है। और इसलिए ही मैंने यहाँ आने से पहले एक निर्णय लिया था। मैंने निर्णय किया है कि मैं सबरीमाला जाऊँगी। वहाँ की इस ग़लत प्रथा को ख़त्म करने और औरतों के ख़िलाफ़ हो रहे इस अन्याय का विरोध करने। और इसमें मुझे आप सबके प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन की अपेक्षा है। मेरा अनुरोध है कि आप सभी अपने परिवार में इस तरह की प्रथाओं को जड़ से उखाड़ने का आज संकल्प लें। क्योंकि ये सारी प्रथाएँ आपके अस्तित्व पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं। ये आपको आपके सही रूप को समझने नहीं देंगी। ये प्रथाएँ आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ दबाने के लिए बनाई गई हैं और अगर आप अपने अस्तित्व को बचाना चाहती हैं तो उखाड़ फेंकियें इन्हें अपने मन से और इस समाज से।”

इसके साथ ही प्रतिभा का भाषण समाप्त हुआ और पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज गया।

एक न्यूज़ ऑर्गनाइज़ेशन में काम करने वाली प्रतिभा को तब बहुत ख़ुशी हुई जब उस ऑर्गनाइज़ेशन ने उसके निर्णय में उसका साथ देने का वादा किया। कुछ ही दिनों में प्रतिभा केरल की ओर रवाना हुई। सीधे सबरीमाला जाने से बजाय वह पहले कोल्लम गईं। कोल्लम के रेलवे स्टेशन पर उतरते ही वेंकटेश की मीठी सी मुस्कान ने उसका स्वागत किया। प्रतिभा और वेंकटेश की मुलाक़ात छः साल पहले कॉलेज में हुई थी। वहाँ पहले वो दोस्त बने और फिर प्रेमी। प्रतिभा भोपाल की थी और वेंकटेश त्रिशूर का, जो इस समय कोल्लम में काम कर रहा था। वेंकटेश को देखते ही प्रतिभा उसके गले से लग गई। वेंकटेश ने भी उसे ख़ुशी से बाहों में भर लिया।

कुछ पल एक दूसरे को जी भर कर गले लगाने के बाद ही दोनों को याद आया कि वे स्टेशन में खड़े थे। आसपास के लोग आते-जाते उन्हें अजीब सी निगाहों से घूर ही लेते थे। ये देखकर दोनों हँस दिए और स्टेशन से बाहर निकल आए। दोनों ने साथ खाना खाया और फिर वेंकटेश उसे उसके होटल रूम छोड़ने आया। होटल रूम में कुछ देर बैठकर इधर-उधर की बातें करने के बाद प्रतिभा ने वेंकटेश को अपने आने का मूल उद्देश्य बताया।

“क्या? पर प्रतिभा कम से कम इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले तुम मुझे बताती तो सही।” वेंकटेश ने जब प्रतिभा के सबरीमाला जाने के निर्णय के बारे में सुना तो वह स्तब्ध रह गया।

“अब बता रही हूँ ना? ऐसी भी क्या बड़ी बात है?” वेंकटेश ने अब तक प्रतिभा के हर निर्णय को सराहा ही था। ये पहली बार था जब उसकी आवाज़ में वह ख़ुशी नहीं थी और प्रतिभा को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था।

“बात है इसलिए ही तो कह रहा हूँ। देखो प्रतिभा, सबरीमाला में ऐसी कोई भी प्रथा नहीं है जो औरतों के विरुद्ध हो और जिसके ख़िलाफ़ आन्दोलन की ज़रूरत हो। तुम अगर एक बार मुझसे इस बारे में बात करती तो मैं तुम्हें समझा तो सकता था। ये अचानक से तुमने ऐसा निर्णय कैसे ले लिया?”

“अचानक जैसा कुछ भी नहीं वेंकट। मैं बहुत दिनों से न्यूज़ फॉलो कर रही थी और मुझे लगा कि मुझे कुछ करना चाहिए। पर मेरे समझ में यह नहीं आ रहा कि तुम इस तरह की प्रथा का समर्थन कैसे कर सकते हो? ये केरल के हिन्दुओं की समस्या क्या है? देश के सबसे साक्षर राज्य से होते हुए भी इस तरह की मिसोजेनिस्ट प्रथा का समर्थन कर रहे हैं।” प्रतिभा की चिड़चिड़ाहट अब उसकी आवाज़ में झलक रही थी। उसका चिड़चिड़ाना जायज़ भी था। आख़िरकार उसने अपना निर्णय वेंकट को सुनाते हुए उम्मीद की थी कि उसे प्रतिभा पर गर्व होगा; पर यहाँ तो सबकुछ उल्टा ही हो रहा था।

“साक्षरता का मतलब आँखें बंदकर हर प्रथा को पुराना और बेबुनियाद ठहरा देना तो नहीं होता ना प्रतिभा?”

“तो तुम्हारा कहना है कि औरतों को मंदिरों में ना जाने देना सही प्रथा है?”

“मंदिरों की बात कौन कर रहा है? यहाँ एक मंदिर की बात हो रही है। आजतक कितने मंदिरों में तुम्हें अन्दर जाने से मना किया गया?”

“मेरा सवाल ये है कि कोई भी औरतों को किसी भी मंदिर जाने से रोकने वाला होता कौन है? तुम समझ नहीं रहे वेंकट, आज इस मंदिर में औरतों का जाना मना है, क्या पता कल को देश के दूसरे मंदिरों में भी यहीं प्रथा चालू हो गई तो? इसलिए इस तरह की बेबुनियाद प्रथाओं को समय रहते जड़ से उखाड़ देना चाहिए।”

“ज़रूर करना चाहिए, अगर सच में यह प्रथा बेबुनियाद हो तो। तुम मुझे बताओ कि किस आधार पर तुम इसे बेबुनियाद कह रही हो? क्या सिर्फ़ इसलिए कि एक उम्र सीमा की औरतों को मंदिर में जाना मना है? या फिर तुम्हारे पास और भी कोई कारण है?”

“क्या इतना कारण काफी नहीं है? क्या ये अन्याय नहीं है?”

“वही तो मैं तुम्हें समझा रहा हूँ प्रतिभा कि इसमें कुछ भी अन्याय नहीं है। तुम पता करने की कोशिश तो करती कि ऐसी प्रथा क्यों है? चलो मैं तुम्हें बताता हूँ। “ऐसा कहते हुए वेंकटेश ने प्रतिभा का हाथ पकड़ने की कोशिश की पर प्रतिभा का मन अब बहुत ख़राब हो चुका था।

थोड़ा पीछे हटते हुए वह बोली “मुझे सब पता है। तुम जानते हो कि मैं कोई भी निर्णय लेने से पहले अपनी रिसर्च करती हूँ। अयप्पा स्वामी नैस्तिक ब्रह्मचारी हैं यहीं कारण है ना? मेरा सवाल यह है, कि अय्यपा स्वामी जो कि भगवान् हैं, उनका ब्रह्मचर्य एक औरत के उनके मंदिर में प्रवेश करने से कैसे टूट सकता है?” उसकी आवाज़ में बहुत सख़्ती थी।

“प्रतिभा ब्रह्मचर्य के कुछ नियम होते हैं और इन नियमों की कुछ वजहें होती हैं। एक मंदिर कोई चर्च या मस्ज़िद नहीं जहाँ लोग सभा करने या नमाज़ अता करने के लिए इकठ्ठा होते हैं। एक मंदिर एक देव या देवी का घर होता है और हर घर के कुछ नियम होते हैं। तुम अय्यप्पा स्वामी को जानती तक नहीं। वो कौन हैं, क्या हैं, नैस्तिक ब्रह्मचर्य क्या है, उसके नियम क्या हैं, तुम्हें नहीं पता। तुम्हारे मन में अय्यप्पा स्वामी के लिए कोई भक्ति या प्रेम नहीं है, तो फिर क्यों तुम्हें उनके घर के नियम तोड़ कर उनके घर में घुसना है? क्या अगर कल को मैं यह संकल्प लूँ कि मैं किसी औरत से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखना चाहता। मैं उनसे दूरी बनाकर रखना चाहता हूँ। और ये सब समझते हुए भी सामने वाली आंटी जो मुझे जानती तक नहीं सिर्फ़ यह सोचकर कि यह नियम एक औरत का अपमान है ज़बरदस्ती मेरे घर में घुस आयें तो क्या यह सही होगा? क्या उनका मेरे घर में घुस आना उनके और मेरे दोनों के लिए एक अजीब परिस्थिति नहीं हो जाएगी? और ऐसा करके उन्हें क्या मिलेगा? वो सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे घर का नियम तोड़ पलभर के लिए ख़ुश हो जाएँगी बस।”

“तुमने यह कैसे मान लिया कि मेरे मन में अय्यप्पा स्वामी के लिए भक्ति नहीं?”

“मानने की बात ही नहीं है। तुम ही सोचो जो अय्यप्पा स्वामी के भक्त होंगे वो उनके मंदिर में ज़बरदस्ती क्यों घुसेंगे? उनके मन की श्रद्धा उन्हें ऐसा करने ही नहीं देगी। वो उनके नैस्तिक ब्रह्मचर्य का सम्मान करेंगे। वो उनके घर की प्रथाओं का सम्मान करेंगे। वो वहाँ जायेंगे जहाँ अय्यप्पा स्वामी ब्रह्मचारी के रूप में नहीं हैं। तुम्हें अगर अय्यप्पा स्वामी के दर्शन की ही इच्छा है तो ठीक है, मैं तुम्हें केरल के ही उन मंदिरों में ले चलता हूँ जहाँ तुम आराम से बिना किसी और की भावनाओं को ठेंस पहुँचाए उनके दर्शन कर सकती हो।”

कुछ पल प्रतिभा वेंकटेश की बात सुनकर चुप बैठी रही फिर अचानक से बोल पड़ी “तो तुम्हारा कहना है कि अगर एक औरत एक ब्रह्मचारी के घर में घुस जाए तो उस ब्रह्मचारी का ब्रह्मचर्य टूट जाता है? बड़ा आसान है किसी का ब्रह्मचर्य तोड़ना।”

प्रतिभा की बात से वेंकटेश को थोड़ी चिड़चिड़ाहट हुई पर फिर भी वो ख़ुद को शांत करते हुए बोला “फिर वही बात! मैंने उनके घर के नियमों की बात की। मैंने उनके ब्रह्मचर्य के नियमों की बात की। क्या तुम किसी के संकल्प का सम्मान नहीं कर सकती? अगर एक नैस्तिक ब्रह्मचारी के लिए यह नियम है कि उसे उन औरतों से दूर रहना चाहिए जो अपनी रिप्रोडक्टिव एज में हैं तो उसे दूर रहने दो ना। क्यों तुम्हें जाकर उसका संकल्प को तोड़ने की कोशिश करनी है? क्या मिलेगा तुम्हें ऐसा करके?”

“ख़ुशी मिलेगी।” प्रतिभा ग़ुस्से में बोली “ऐसे बेफालतू के नियम जो सिर्फ़ औरतों को नीचा दिखाने के लिए बने हैं उन्हें तोड़कर मेरे मन को शान्ति मिलेगी। सच में वेंकट, मैंने सोचा भी नहीं था कि तुम मेरा साथ देने के बजाय ऐसी रूढ़िवादिता का समर्थन करोगे। मैं ख़ुश होकर आई थी कि तुम्हें मुझ पर गर्व होगा और तुम मेरी मदद करोगे पर यहाँ तो तुम भी वही बेवकूफी भरे तर्क कर रहे हो जिनका कोई मतलब नहीं बनता।”

“क्यों मतलब नहीं बनता?” वेंकटेश प्रतिभा के बात करने के तरीके से भड़क गया था। “मैंने औरतों को नीचा दिखाने वाली क्या बात कही? ऐसा कौन सा तर्क दे दिया मैंने, जो तुम्हें लगता है कि औरतों के ख़िलाफ़ है? ये हर चीज को फैमिनिज़्म का चश्मा लगाकर देखना ज़रूरी है क्या? तुम ख़ुद पर्सनल स्पेस और प्राइवेसी की बातें करती हो। तुम्हें पसंद नहीं कोई तुम्हारी मर्ज़ी या पसंद के ख़िलाफ़ तुमसे सम्बंधित कोई निर्णय ले। तो तुम यहाँ क्या कर रही हो? तुम भी तो किसी के मर्ज़ी की ख़िलाफ़ उसके घर में घुसने का निर्णय कर रही हो। किसी के नियमों का उल्लंघन करने की ही कोशिश कर रही हो। तो ये सही कैसे है?”

“यू नो व्हाट? इट्स यूजलेस। लेट्स फॉरगेट इट। मुझे नहीं लगता तुम मेरी बात समझना चाहते हो। और जायज़ भी है तुम ख़ुद भी एक आदमी ही तो हो। तुम्हें इन सब नियमों में कोई बुराई नहीं नज़र आएगी क्योंकि ये तुम्हें सुपीरियर होने का अहसास दिलाती हैं।” प्रतिभा चिढ़ते हुए बोली।

“क्या बेवकूफी भरी बात कर रही हो? इसमें सुपीरिओरिटी कैसे बीच में आ गयी। “वेंकटेश चिल्लाया पर अगले ही पल प्रतिभा को चौंकता देख उसे अहसास हुआ कि वो चिल्ला रहा था। एक कुर्सी लेकर प्रतिभा के सामने बैठकर उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए वह बोला “आई ऍम सॉरी। मैंने थोडा ज़्यादा ही ज़ोर से बोल दिया।” प्रतिभा का मूड अब भी ख़राब ही था। जब उसने कोई जवाब नहीं दिया तो दो पल रूक कर वेंकटेश आगे बोला “चलो ठीक है। इस वक़्त हम दोनों का मन ख़राब है तो इस मुद्दे को यहीं छोड़ते हैं। मैं बस इतनी उम्मीद करता हूँ कि तुम मेरी कही बातों पर एक बार विचार करोगी और जल्दबाज़ी में कोई क़दम नहीं उठाओगी। ठीक है ना?”

प्रतिभा फिर भी चुप ही थी।

“इतना ग़ुस्सा? कम से कम हाँ तो बोल दो। “वेंकटेश हँसते हुए बोला। प्रतिभा ने हाँ में सर हिला दिया।

“दो दिन बाद मैं अपने दो साथियों के साथ सबरीमाला जा रही हूँ। मैं दिल से चाहती थी कि तुम भी मेरे साथ चलो। तुम केरल से हो, सबरीमाला आते-जाते रहते हो, तुम्हारे हमारे साथ खड़े होने से हमारे इस उद्देश्य को एक अलग ही शक्ति मिलती। एक बार फिर सोच लो वेंकट।” वेंकटश के ऑफ़िस के सामने बने रेस्टोरेंट में उससे मिलने आई प्रतिभा उसका व्यवहार देखकर बहुत मायूस थी।

“नहीं प्रतिभा, जो तुम कर रही हो वो एकदम ग़लत है। इसमें मैं तुम्हारा साथ नहीं दे सकता। प्लीज़ मेरी बात मानो ये ज़िद छोड़ दो।” वेंकटेश के चेहरे पर दुःख था।

“ज़िद कहाँ हैं वेंकट? मैं तो कोशिश कर रही हूँ, समाज से एक कुरीति को मिटाने की।”

“यहीं तुम ग़लत हो प्रतिभा। अगर किसी प्रथा को तुम समझ नहीं पा रही तो इसका ये मतलब तो नहीं कि वो कुरीति है। मैंने उस दिन भी तुम्हें समझाने की कोशिश की थी पर तुम नहीं समझी। प्लीज़ मैं तुमसे रिक्वेस्ट कर रहा हूँ मेरी ख़ातिर ही सही अपना ये निर्णय बदल दो।”

“व्हाट? व्हाई आर यू गेटिंग सो पर्सनल? आजतक तो तुमने कभी ऐसा नहीं किया। बात क्या है? सच बोलो वेंकट, कहीं ऐसा तो नहीं कि अब तुम भी उन आदमियों जैसा सोचने लगे हो जिन्हें एक औरत घर की चारदीवारी में ही अच्छी लगती है। कहीं तुम मेरे सोशल वर्क्स से ऊब तो नहीं गए ना? क्या तुम भी ऐसी ही पत्नी की अपेक्षा रखते हो जो हाँ में हाँ मिलाती रहे?”

“तुम पागल हो क्या प्रतिभा? इतने सालों में मैंने हमेशा तुम्हारा साथ दिया क्योंकि मैं तुम्हारी बातों से, तुम्हारी सोच से सहमत था। पर मैं तुम्हारी इस सोच से सहमत नहीं क्योंकि मैं बचपन से अय्यप्पा स्वामी के मंदिर जाता रहा हूँ। मैंने देखी है लोगों की श्रद्धा। मैंने देखा है उन औरतों को जो चालीस साल इन्तज़ार करने में गर्व महसूस करती हैं। मैंने तुम्हें सबरीमाला की इस प्रथा का कारण भी समझाया, पर तुम समझने को तैयार नहीं। और अब तुम कहती हो कि जस्ट बिकॉज़ मैं तुम्हारे एक निर्णय में तुम्हारा साथ नहीं दे रहा तो मैं उन आदमियों जैसा हो गया जो चाहते हैं कि उनकी पत्नी उनकी हाँ में हाँ मिलाए। अगर तुम ध्यान दो प्रतिभा तो तुम्हें समझ आएगा कि कहीं ना कहीं तुम ऐसे पति की अपेक्षा रख रही हो तो तुम्हारी हाँ में हाँ मिलाए। “

प्रतिभा ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था पर वेंकटेश ने उसे रोक दिया और आगे बोला “और रही बात पर्सनल होने की, तो ये इशू पर्सनल ही है। जैसा कि मैंने कहा मैं बचपन से सबरीमाला जाता आया हूँ। मेरे परिवार का हर एक सदस्य अय्यप्पा स्वामी का डिवोटी है। मेरी माँ कोई अनपढ़ गँवार नहीं हैं प्रतिभा। वो एक लेक्चरर हैं। चाहतीं तो वो भी इस प्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठा सकती थीं, पर उन्हें अय्यप्पा स्वामी पर अपार श्रद्धा है और वो इस प्रथा को समझती हैं। सिर्फ़ वो ही नहीं मेरी मौसी, मेरी बहनें, मेरे पड़ोसी सब इस प्रथा को निभा रहे हैं और उनमें से एक भी नहीं जो आँखें बंद करके इस प्रथा को सपोर्ट कर रहा हो। सबने इसके कारण को समझा है और इस तपस को स्वीकार किया है। “

“तपस? तुम इस प्रथा को तपस बोल रहे हो?”

“हाँ, प्रतिभा क्योंकि ये तपस है।”

“और अगर मैं ये तपस करने से इनकार करूँ तो?”

“तो मत करो। कोई तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती नहीं कर रहा। पर मंदिर के नियम भी मत तोड़ो। उन औरतों की श्रद्धा का अपमान मत करो जिन्होंने सहर्ष इस तपस को स्वीकार किया है। तुम्हारी एक नादानी ना जाने कितने भक्तों का दिल तोड़ देगी और उनमें से एक मैं भी हूँ प्रतिभा। मुझे अय्यप्पा स्वामी में अपार श्रद्धा है इसलिए तुमसे रिक्वेस्ट कर रहा हूँ कि मेरे लिए मत जाओ।”

“सॉरी वेंकट, मैं तुम्हारी ये बात नहीं मान सकती। तुम्हारे कोई भी तर्क मुझे लॉजिकल नहीं लग रहे। मंदिर एक पब्लिक प्लेस है। वहाँ जाने की स्वतंत्रता सबको होनी चाहिए।”

“यही तो समस्या है प्रतिभा। तुम उसे एक पब्लिक प्लेस की तरह देख रही हो ना कि तुम्हारे आराध्य के घर की तरह। एक बार अगर तुम मेरी नज़र से देखती या उन औरतों की नज़र से देखती जो अय्यप्पा स्वामी में श्रद्धा रखती हैं तो तुम सच को समझ पाती। मैं जिन पर श्रद्धा रखता हूँ, उनके घर के नियम को तोड़ कर कोई ज़बरदस्ती अपनी सोच उन पर थोपे तो ये मुझे दुःख ही देगा। ये मेरे लिए मेरे आराध्य का अपमान ही होगा।”

“तुम अय्यप्पा स्वामी को बस एक आइडल की तरह देख रही हो, हम उनमें जीते जागते भगवान् को देखते हैं। तुम मंदिर को पब्लिक प्लेस बोलती हो, हम उसे अपने स्वामी के घर की तरह देखते हैं। तुम वहाँ के नियमों को अपनी स्वतंत्रता का हनन समझती हो, हम जानते हैं कि ये नियम सिर्फ़ अय्यप्पा स्वामी की प्रतिज्ञा के कारण हैं। तुम्हें मैंने दूसरे मंदिरों के बारे में बताया जहाँ तुम आराम से अय्यप्पा स्वामी के दर्शन कर सकती हो, पर दर्शन करना तुम्हारा उद्देश्य है ही नहीं, तुम बस एक पल की जीत के अहसास के लिए ये करना चाहती हो।”

“क्या? क्या कहा तुमने? एक पल की जीत के अहसास के लिए मैं ये करना चाहती हूँ? इतना ही समझ पाए इन छ: सालों में तुम मुझे वेंकट।” प्रतिभा बहुत ग़ुस्से में थी। उसकी आवाज़ तेज़ होने के कारण आसपास के लोगों ने एक बार उनकी ओर मुड़कर देखा, पर फिर वापस अपने अपने काम में लग गए। प्रतिभा ने अपने ग़ुस्से पर क़ाबू किया और शान्ति से बोली “ठीक है। अब इस डिस्कशन का कोई मतलब नहीं। जैसा कि मैंने कहा, मैं दो दिन बाद सबरीमाला जा रही हूँ। अब मैं तभी तुमसे मिलूँगी जब मैं अपने उद्देश्य में सफल हो जाऊँगी। उम्मीद करती हूँ कि तब तक तुम्हारी सोच भी बदल चुकी होगी। वरना तो हमारे साथ का मतलब भी क्या बनता है?”

प्रतिभा के इस व्यवहार और उसकी बातों से वेंकटेश के मन को जो चोट लगी वो उसकी आँखों में साफ़ दिख रही थी। उसकी कोशिश निरर्थक सिद्ध हो गई थी और उसे कोई तरीका नहीं सूझ रहा था प्रतिभा को समझाने का। एक पल वो प्रतिभा के चेहरे को यूँ ही चुपचाप देखता रहा, फिर “पछताओगी तुम प्रतिभा।” कहते हुए वो चुपचाप उठकर चला गया।

आज का दिन प्रतिभा के लिए जीत का दिन था। आज प्रतिभा ने जो चाहा था हासिल कर लिया था। कुछ हफ़्तों की लगातार कई कोशिशों के बाद आज आख़िरकार वो सबरीमाला मंदिर में पुलिस की मदद से घुस ही गई। पहले तो वह सिर्फ़ मंदिर में घुसकर उस पुरानी बेबुनियाद प्रथा को तोड़ना भर चाहती थी पर पता नहीं कब यह हार, जीत का मुद्दा बन गया। पिछले कुछ समय में उसे बहुत कुछ सहना पड़ा। उसकी पहली कोशिश के बाद उसे केरल के हिन्दुओं के ग़ुस्से का शिकार होना पड़ा। होटल्स ने उसे कमरा देने से मना कर दिया, ऑटोवालों ने उसे कहीं भी ले जाने से मना कर दिया, सब उसे इस तरह से देखते जैसे कि वो कोई अपराधी हो, पहली बार उसे केरल छोड़कर मजबूरी में जाना पड़ा। पर फिर वहाँ के कुछ ग्रुप्स उसकी मदद के लिए आगे आए और फिर कुछ कोशिशों के बाद उसे आज सफलता मिल ही गई।

सुबह के तीन बजे थे जब प्रतिभा सबरीमाला मंदिर में पुलिस की मदद से घुसी। मंदिर परिसर में घुसते ही ना जाने क्यों अचानक ही उसे वेंकटेश की याद आई। पछताओगी तुम प्रतिभा। उसके ये शब्द प्रतिभा के कानों में गूँज गए। पिछले कुछ हफ़्तों में जब भी उसने वेंकटेश से बात की, उनकी बात झगड़ों पर ही ख़त्म हुई। जब प्रतिभा ने पहली बार मंदिर में घुसने की कोशिश की और वेंकटेश को फोन पर बताया कि कैसे लोगों ने उसे वहाँ से भगा दिया और कैसे लोग उसे अपने यहाँ जगह भी नहीं दे रहे थे तो वेंकटेश ने कुछ भी रिएक्ट नहीं किया। वो आख़िरी बार था जब प्रतिभा और वेंकटेश की बात हुई थी। उसके बाद वेंकटेश ने प्रतिभा के फोन उठाने ही बंद कर दिए। प्रतिभा को अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि एक पुरानी सी प्रथा के लिए वेंकटेश ने उसका छ: साल का साथ छोड़ दिया। क्या बस इतना ही गहरा रिश्ता था उनका कि इतनी सी बात पर टूट गया?

मंदिर में घुसने के बाद प्रतिभा ज़्यादा कुछ सोच नहीं पाई। बस एक बार उसे वेंकटेश का ध्यान आया। वो कुछ सोच समझ पाती उससे पहले ही अयप्पा स्वामी के भक्तों को उसके मंदिर में घुसने की बात पता चल गई। उसे तुरंत पुलिस वहाँ से निकालने में जुट गई। प्रतिभा के पास समय नहीं था। पुलिस की मदद से वो वहाँ से भागी और फिर उसे जल्द ही एक गाड़ी में बैठा दिया गया। सुबह के चार बजे चुके थे। गाड़ी के बाहर लोग पुलिस वालों से झड़प कर रहे थे। पर प्रतिभा को इस सब की परवाह नहीं थी। ये तमाशा तो वह हर दूसरे दिन देख रही थी। उसका ध्यान तो आज रह रहकर वेंकटेश पर जा रहा था। क्या वेंकटेश उसे कॉल करेगा? क्या उसे यहाँ से सीधे वेंकटेश से मिलने जाना चाहिए? जब वो वेंकटेश से मिलेगी तो वह क्या बोलेगा? यहीं सब सवाल उसके मन में घूम रहे थे।

दिन बीता। बहुत से लोगों ने उसे उसकी सफलता की बधाई देने के लिए कॉल किया, पर वेंकटेश का ना तो कोई कॉल आया ना ही मैसेज। प्रतिभा को उसका यह व्यवहार अब बहुत खल रहा था। वो उसे फोन करके बहुत कुछ सुनाना चाहती थी पर कैसे भी ख़ुद को संभालते हुए उसने अपने आपको ऐसा करने से रोक लिया। वो क्यों कॉल करे? ग़लती वेंकटेश की थी। क्या उसे प्रतिभा की बिल्कुल भी चिंता नहीं थी? क्या एक बार फोन करके वह यह नहीं पूछ सकता था कि तुम ठीक तो हो? इसी सब उधेड़बुन में प्रतिभा ने कोल्लम जाने का निर्णय किया। वो आमने-सामने वेंकटेश से सवाल करना चाहती थी। एक टैक्सी पकड़कर वो कुछ ही घंटों में कोल्लम पहुँच गई। उसने सोच लिया था कि वेंकटेश से मिलकर वो उसे बहुत कुछ सुनाएगी।

जब प्रतिभा कोल्लम में उसके ऑफ़िस पहुँची तो उसे पता चला कि वेंकटेश छुट्टी के लिए घर गया हुआ था। उसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। प्रतिभा की मुलाक़ात वेंकटेश के घर वालों से कभी नहीं हुई थी इसलिए उसके पीछे त्रिशूर जाना उसे सही नहीं लगा। एक रात कोल्लम में बिताकर अगले दिन उसने वापस भोपाल जाने की सोची। वेंकटेश के ऑफ़िस से बाहर निकलते समय प्रतिभा ने वेंकटेश को व्हाट्सएप्प पर कुछ मेसेज भेजे-

“मैं तुमसे मिलने तुम्हारे ऑफ़िस आई थी, पर तुम तो शहर में ही नहीं। जब तुम छुट्टी पर हो तो ऑफ़िस में बिज़ी थे का बहाना नहीं बना सकते। इतना समय हो गया वेंकट क्या तुम्हें मेरी याद नहीं आई? क्या एक बार भी तुम्हारा मुझे कॉल करने का मन नहीं किया?”

“इससे पहले मेरी हर सफलता पर तुमने मुझे सबसे पहले कॉल करके विश किया। मुझे उम्मीद थी कि तुम सब भुलाकर मुझे कॉल ज़रूर करोगे पर तुमने इसकी ज़रूरत नहीं समझी। क्या छः साल का हमारा साथ इतना कमज़ोर था? मुझे तुमसे यह उम्मीद नहीं थी। “

कुछ समय तक जब वेंकटेश का कोई जवाब नहीं आया तो प्रतिभा ने ग़ुस्से में अपना फोन स्विच ऑफ़ कर दिया। उसने निर्णय ले लिया कि अब अगर वेंकटेश कुछ कहना भी चाहेगा तो वो नहीं सुनेगी। भाड़ में जाए। शायद उसे लगता है कि मैं उसके बिना जी नहीं पाऊँगी। ये सारे के सारे मर्द होते ही ऐसे हैं। अगर उसे मेरी ज़रूरत नहीं तो मुझे भी उसकी कोई ज़रूरत नहीं।

प्रतिभा इतना थकी हुई थी होटल रूम जाकर चुपचाप सो गई। अगले दिन की सुबह उसने अपने बैग्स उठाये और भोपाल की फ्लाइट पकड़ने के लिए निकल पड़ी। एअरपोर्ट पहुँचकर उसने एक न्यूज़ पेपर ख़रीदा। वो सबरीमाला की लेटेस्ट न्यूज़ जानना चाहती थी। वह देखना चाहती थी कि न्यूज़ पेपर वालों ने उसके बारे में क्या लिखा था।

न्यूज़ पेपर्स प्रतिभा की तारीफों से भरे पड़े थे। उसे देख प्रतिभा को थोड़ा ख़ुशी हुई। कम से कम कुछ लोग तो थे इस देश में जिन्हें सही और ग़लत की समझ थी। न्यूज़ पेपर पलटते हुए उसकी नज़र एक कोने पर छपी वेंकटेश की फोटो पर पड़ी। प्रतिभा का अब सारा ध्यान उस एक छोटे से न्यूज़-सेक्शन पर था। ख़बर में लिखा था- अय्यप्पा डिवोटी बर्नट सेल्फ टू डेथ। नहीं, वेंकटेश इतना बेवकूफ नहीं, यह पहला विचार उसके मन में आया। उसने तुरंत वेंकटेश को कॉल करने के लिए अपना फोन स्विच ऑन किया, और फोन के स्विच ऑन होते ही उसने देखा कि व्हाट्सएप्प में वेंकटेश ने उसे मैसेज किया था।

“माफ़ करना प्रतिभा, मैं अय्यप्पा स्वामी से अपने तीस सालों का रिश्ता नहीं निभा पाया तो तुमसे छः साल का रिश्ता कैसे निभा पाऊँगा? मैं थोड़ा स्वार्थी हूँ, तुम्हारी ये सफलता मेरी और मेरे जैसे बहुत से लोगों की बहुत बड़ी असफलता है, इसलिए तुम्हें बधाई नहीं दे सकता।”

प्रतिभा के चेहरे का रंग उड़ गया। वेंकटेश एक दिन पहले की दोपहर तक ज़िन्दा था। अगर प्रतिभा ने अपना फोन स्विच ऑफ नहीं किया होता तो शायद उसका मैसेज देखते ही वो उसको फोन कर सकती थी। शायद वो ये सब होने से रोक सकती थी। क्या ऐसा हो सकता था कि वेंकटेश की आत्महत्या की ख़बर ही झूठी हो। प्रतिभा ने ऑनलाइन वेंकटेश के नाम से न्यूज़ सर्च की और उसे कुछ और जगहों से उसकी आत्महत्या की ख़बर की पुष्टि हो गई। प्रतिभा के हाथ से उसका फोन छूट गया। पास से जा रही एक औरत ने प्रतिभा का फोन उठाकर उसे पकड़ाते हुए उसे पहचान लिया। उस औरत के चेहरे के भाव प्रतिभा को पहचानते ही बदल गए।

“आरेंट यू द वन हू एंटर्ड सबरीमाला फोर्सफुल्ली? व्हाट डिड यू गेन?”

प्रतिभा जो पहले से ही सदमें में थी, यह सवाल सुनकर भावुक हो उठी। उसकी ये हालत देख सामने वाली औरत ने उसे अकेला छोड़ दिया। उस औरत के एक सवाल ने प्रतिभा के सामने सवालों की झड़ी लगा दी। क्या पाया उसने? क्या सच में वह औरतों के हक़ की लड़ाई लड़ रही थी या फिर वेंकटेश की बात सच्ची थी? क्या सच में वह एक पल की जीत के अहसास के लिए ये करना चाहती थी? अगर वो सच में औरतों के हक़ की लड़ाई लड़ रही थी तो क्यों इतनी औरतें उसके ख़िलाफ़ हो गई थीं? क्यों सबकी नज़रों में उसे अपने लिए घृणा का भाव दिख रहा था? प्रतिभा के कानों में एक बार फिर से वेंकटेश की आवाज़ गूँज गई “पछताओगी तुम प्रतिभा।”

पूरी दुनिया से कहा पाक को ‘आतंकी देश’ घोषित करो, खुद के प्रस्ताव में नाम भी नहीं!

14 फरवरी को CRPF के काफिले पर हुए हमले के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में 16 को एक सर्वदलीय बैठक हुई। बैठक के बाद एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें यह कहा गया कि सभी दल पुलवामा में हुए आतंकी हमले की भर्त्सना करते हैं और आतंकवाद की हर रूप में निंदा करते हैं। पारित हुए प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि सभी दल सीमा पार द्वारा समर्थन प्राप्त आतंकवाद की कड़ी निंदा करते हैं।  

लेकिन पूरे प्रस्ताव में कहीं भी पाकिस्तान का नाम तक नहीं लिया गया। हमारे प्रधानमंत्री हर जगह जाकर पाकिस्तान को भिखमंगा देश और न जाने क्या-क्या कह रहे हैं लेकिन सर्वदलीय बैठक में पारित प्रस्ताव में एक बार भी पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया। यह आश्चर्यजनक होने के साथ ही बड़ी विचित्र विडंबना है कि पूरे देश के साथ प्रधानमंत्री भी पाकिस्तान को अपने भाषणों में कोस रहे हैं और चेतावनी भी दे रहे हैं लेकिन जब आतंकी हमले का विरोध करने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई जाती है तब उसमें पाकिस्तान का कहीं ज़िक्र तक नहीं किया जाता।

क्या राजनाथ सिंह सर्वदलीय बैठक में पाकिस्तान का नाम लेने से डर रहे थे? अगर नहीं तो ऐसी क्या वजह थी कि सर्वदलीय बैठक में पाकिस्तान को एक ‘आतंकवाद का समर्थक’ देश घोषित नहीं किया गया? सत्तर सालों से जो देश हमें घाव दे रहा है नाम लेने में क्या हर्ज़ है भला?

वैसे यह पहली बार नहीं है जब कई दलों के नेता मिले, आतंकवाद की कड़ी निंदा की और पाकिस्तान का नाम नहीं लिया। संसद में भी जब राजीव चंद्रशेखर ने प्राइवेट मेंबर बिल लाकर पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित करने की माँग की थी तब भी यह बिल पारित नहीं हुआ था। आखिर संसद और सभी दलों की क्या मजबूरी है कि वे बयानों और भाषणों में तो पाकिस्तान का नाम लेने से नहीं चूकते लेकिन जब आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित करने की बारी आती है तब मुकर जाते हैं।

पूरे प्रस्ताव में पाकिस्तान का नाम नहीं!

हमारे देश में पाकिस्तान प्रेम का एक विचित्र प्रकार का कीड़ा है जिसने सबको काटा है। बहुत कम ही लोग हैं जो इसके दंश से अछूते हैं। सिनेमा जगत और क्रिकेट के अलावा मीडिया का भी पाकिस्तान प्रेम छिपा नहीं है। जब इमरान खान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री चुना गया था तब हमारे मीडिया संस्थान इस पर लहालोट हो रहे थे कि अब पाकिस्तान में जम्हूरियत का सितारा बुलंद होगा।

हद तो तब हो गई थी जब सन 2013 में शीर्षस्थ जाँच एजेंसी सीबीआई ने विदेश मंत्रालय से अनुमति माँगी थी कि सीबीआई के स्थापना दिवस पर क़ुर्बान अली के परिवार को आमंत्रित किया जाए। यह माँग स्वीकार तो नहीं की गई थी लेकिन इसका कारण जानना आवश्यक है। दरअसल क़ुर्बान अली खान वह शख्स था जिसने भारत को हज़ार वर्षों में हज़ार घाव (bleeding India by thousand cuts) देने की रणनीति बनाई थी। चूँकि ब्रिटिश भारत में सीबीआई की पूर्वज एजेंसी का अध्यक्ष क़ुर्बान अली ही था इसलिए सीबीआई के कुछ अफसरों ने स्थापना दिवस पर उसके परिवारवालों को बुलाने का विचार किया था।

ग़ौर करें तो एक तरफ भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ क़ुर्बान अली की रणनीति को विफल करने में लगी थीं तो दूसरी तरफ सीबीआई के कुछ अधिकारी क़ुर्बान अली के परिवार को आमंत्रण देने की बात कर रहे थे। सोचने वाली बात यह है कि भारत को ऐसे विचारों से सर्वाधिक खतरा है। यह वैसा ही जैसे आप भाषणों में पाकिस्तान की भरसक निंदा करें लेकिन अपने देश की संसद में उसे एक आतंकी देश घोषित करने में आनाकानी करें।

इन बातों का सार यह है कि पाकिस्तान को लेकर भारत में राष्ट्रीय स्तर पर विचारों में एकरूपता नहीं है। कोई ऐसा सार्वजनिक पटल नहीं है जहाँ सर्वसम्मति से एक सुर में सभी भारतीय- चाहे वह नेता हों, अभिनेता हों, खिलाड़ी, सरकारी कर्मचारी या फिर पत्रकार- पाकिस्तान के प्रति एक राय, एक विचार रखें। सवाल है कि ऐसे ‘नेशनल कन्सेंसस’ की आवश्यकता क्यों है?

सर्वसम्मति की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि हमारा शत्रु एक है- ‘आतंकवाद’। जो भी देश आतंक का भरण पोषण करता है वह हमारे लिए आतंकी देश होना चाहिए। यह विचार भारत के प्रत्येक संस्थान और व्यक्ति द्वारा बिना किसी रिलिजियस अथवा सामुदायिक भेदभाव के अंगीकार किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि इस प्रकार के कानून अमेरिका ने बनाए हैं लेकिन हमारा रवैया पाकिस्तान के प्रति कभी स्पष्ट नहीं रहा।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन 1373 को स्वीकार किया है लेकिन हमारे यहाँ आतंकवाद को परिभाषित करने वाला कोई कानून नहीं है। विधिविरुद्ध क्रिया-कलाप (निवारण) अधिनियम (UAPA) आतंकी गतिविधियों को तो परिभाषित करता है लेकिन आतंकवाद को परिभाषित नहीं करता। इस बात की क्या गारंटी है कि भविष्य में आतंकवाद उसी रूप में हमारे सामने आएगा जो UAPA एक्ट में परिभाषित है?

आज हम पाकिस्तान को FATF जैसे अंतर्राष्ट्रीय फोरम पर ब्लैकलिस्ट करवाना चाहते हैं और संयुक्त राष्ट्र से यह मांग करते हैं कि आतंकवाद की परिभाषा गढ़ी जाए लेकिन जब हम स्वयं आधिकारिक रूप से पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा अर्थ यही है कि आतंकवाद से लड़ने की हमारी प्रतिबद्धता दृढ़ नहीं है।

अमिताभ, सहवाग, रिलायंस खड़ा हुआ जवानों के परिवार के साथ, करेंगे हर संभव मदद

पुलवामा आतंकी हमले के बाद सिर्फ़ सेना ने अपने 42 जवानों को नहीं खोया है बल्कि 42 परिवारों में किसी ने अपना पिता, किसी ने अपना बेटा, किसी ने भाई को खोया है। शायद सेना एक बार को भर्ती निकाल कर 42 जवानों के रिक्त स्थान को भर दे। लेकिन, उन परिवारों के लिए भरपाई कैसी होगी, जिनके घर में कमाई का एक मात्र स्त्रोत वही पिता, पति, भाई या बेटा था।

किसी जवान के घर में उसकी बेटी-बहन को पैसे न होने के कारण स्कूल न छोड़ना पड़े या किसी के घर में आर्थिक तंगी के कारण चूल्हा न जले, इसलिए सितारों से लेकर आम जन तक अपनी क्षमता के अनुसार इन परिवारों की मदद कर रहे हैं। इसमें हाल में अमिताभ बच्चन, सहवाग, रिलायंस फाउंडेशन का भी नाम आया है।

अमिताभ बच्चन ने घोषणा की है कि पुलवामा में बलिदान हुए जवानों के परिवार वालों को ₹5 लाख देंगे। कुल मिलाकर यह रकम ₹2.45 करोड़ बनेगी। जागरण में छपी रिपोर्ट के अनुसार ख़बर है कि अमिताभ की टीम इस वक्त भारत सरकार के संबंधित अधिकारियों के संपर्क में हैं, जिससे जल्द से जल्द ये मदद परिवारों तक पहुँचाई जा सके।

बता दें कि अमिताभ इससे पहले भी शहीदों के 44 परिवार वालों को ₹2.25 करोड़ की मदद कर चुके हैं।

इसके अलावा पूर्व भारतीय क्रिकेटर सहवाग ने पुलवामा आतंकवादी हमले में शिकार हुए सीआरपीएफ के जवानों के बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने का जिम्मा लिया है। सहवाग ने ट्वीट पर लिखा, “हम शहीदों के लिए कुछ भी करें तो वह काफी नहीं होगा, लेकिन पुलवामा में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवानों के बच्चों की पढ़ाई का झज्जर स्थित सहवाग स्कूल में मैं पूरा खर्च उठाने का प्रस्ताव देता हूँ।”

स्टार मुक्केबाज़ विजेन्द्र सिंह ने भी अपने एक महीने के वेतन को शहीदों के परिवार वालों के लिए दान किया है। विजेंद्र इस समय हरियाणा पुलिस में कार्यरत हैं। उन्होंने कहा, “मैं एक महीने का वेतन पुलवामा आतंकवादी हमले में शहीद हुए जवानों के लिए दान कर रहा हूँ और चाहता हूँ कि हर कोई उनके परिवारों की मदद के लिए आगे आए।”

रिलायंस फाउंडेशन ने शनिवार को यानी आज (फरवरी 16, 2019) प्रेस रिलीज के ज़रिए इस बात की घोषणा की है कि वो वीरगति को प्राप्त हुए सभी जवानों के बच्चों की शिक्षा और रोज़गार की स्वयं जिम्मेदारी लेता है। साथ ही इस रिलीज में अपने अस्पताल में घायल हुए जवानों को अच्छे से अच्छा इलाज देने की भी बात बोली है।

इसके अलावा बड़े नामी सितारों को छोड़कर सूरत के सेठ देवशी माणेक (हीरा व्यापारी) ने भी जवानों के परिवार वालों के लिए ऐसा काम किया है, जिसकी जितनी सराहना की जाए उतनी कम है। इस व्यापारी ने शहीदों के लिए अपनी बेटी का रिसेप्शन रद्द कर दिया। इसके बदले उन्होंने सेवा संस्थाओं को ₹5 लाख और शहीदों को परिवार को संयुक्त रुप से ₹11 लाख रुपए दान करने का निर्णय लिया है।

रेप आरोपित पादरी फ्रैंको ने ली रिलिजन की आड़, नन को मिली धमकियाँ

जब से सिस्टर लूसी कलापुरा ने जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल के ख़िलाफ़ अन्य छह ननों के साथ विरोध करना शुरू किया है, तब से कैथोलिक क्रिश्चन सोसायटी फ्रांसिस्कन क्लेरिस्ट कॉन्ग्रिगेशन (FCC) द्वारा अक्सर संस्था के नियमों का हवाला देकर लूसी कलापुरा और इनके साथियों की आवाज़ को दबाने की कोशिश की जाती है।

एफसीसी ने शनिवार को फिर से पीड़िता लूसी कलापुरा को एक चेतावनी पत्र भेजकर अपनी मानसिकता को बदलने के लिए कहा है। इस पत्र में यह भी कहा गया है कि यदि उसने बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर लगाए गए आरोप को वापस नहीं लिया तो उसे कॉन्ग्रिगेशन से ख़ारिज कर दिया जाएगा।

क्रिश्चयन कैथोलिक संस्था एफसीसी के ख़िलाफ़ जाकर बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर आरोप लगाए जाने की वजह से सभी छ: ननों को एफसीसी द्वारा उनके कथित अपराधों के लिए कई बार धमकियाँ दी गईं। इससे पहले, कैथोलिक चर्च ने सिस्टर कलापुरा को ‘चैनल चर्चा में भाग लेने’, ‘ग़ैर-ईसाई अख़बारों में लेख लिखने’ और कैथोलिक नेतृत्व के ख़िलाफ़ ‘ग़लत आरोप लगाने’ के लिए चेतावनी भेजी थी।

एफसीसी के अनुसार, नन लुसी कलापुरा ने इसके अलावा भी संस्था के ख़िलाफ़ जाकर कई अपराध किए हैं। उदाहरण के लिए चर्च की अनुमति के बिना कविताओं की एक पुस्तक प्रकाशित करना, एक चालक का लाइसेंस प्राप्त करना और एक कार ख़रीदना, अपनी पसंद के फेसबुक पोस्ट अपलोड करना, टीवी डिबेट में भाग लेना और चर्च की आलोचनात्मक टिप्पणी करना आदि।

सिस्टर लूसी को वायनाड में मंथावैदी से 260 किलोमीटर दूर अलुवा में एफसीसी मुख्यालय में अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया गया था। कलापुरा ने यह कहते हुए कि उसने कोई ग़लती नहीं की है, एफसीसी के मुख्यालय में जाने से मना कर दिया। कलापुरा ने यह भी कहा था कि फ्रेंको बिशप के ख़िलाफ़ होने वाले विरोध प्रदर्शन में वह फिर से भाग लेगी।

जालंधर के रोमन कैथोलिक चर्च के बिशप फ्रेंको मुलक्कल पर मई 2014 में कुराविलांगड़ के एक गेस्ट हाउस में 44 वर्षीय नन के साथ बलात्कार करने और उसके बाद यौन शोषण का आरोप है। नन ने जून 2018 में एक शिक़ायत दर्ज की थी और यह भी दावा किया था कि उनकी शिक़ायतों के बावजूद, चर्च ने बिशप पर कोई कार्रवाई नहीं की। यही नहीं कैथोलिक संस्था भी बलात्कार के अभियुक्त बिशप के साथ खड़ी हो गई थी और बिशप को “निर्दोष आत्मा” के रूप में प्रस्तुत किया गया।

फ्रेंको बिशप को जाँच दल द्वारा उसके ख़िलाफ़ सबूत मिलने के बाद गिरफ़्तार कर लिया गया था, लेकिन बाद में उसे सशर्त ज़मानत पर रिहा कर दिया गया, जिससे उसे हर दो सप्ताह में एक बार जाँच टीम के सामने पेश होने और अपना पासपोर्ट सरेंडर करने के लिए कहा गया।

नौशेरा में सर्च ऑपरेशन के दौरान IED ब्लास्ट, एक मेजर वीरगति को प्राप्त, दो जवान घायल

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी आत्मघाती हमले से देश अभी उठा भी नहीं था, कि आतंकियों ने एक और घाव दे दिया। इस बार आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर में रजौरी के नौशेरा में आईईडी ब्लास्ट किया, जिसमें इंजीनियरिंग कोर के मेजर के खेत आने के साथ दो अन्य गंभीर जवान गंभीर रूप से घायल हो गए।

ख़बर की मानें तो यह एक बैट हमला था, बताया जा रहा है कि पाकिस्तानी सेना और आतंकी मिलकर भारतीय सीमा के अंदर आए और उन्होंने आईडी प्लांट किया था। सर्च ऑपरेशन में संदिग्ध मानकर इसकी जाँच के समय पास जाते ही ब्लास्ट हुआ। फ़िलहाल भारतीय सेना इस विस्फोट पर और जानकारी जुटा रही है।

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ काफ़िले पर (14 फ़रवरी 2019) को आतंकियों ने देश को बड़ा जख्म दिया था। आतंकियों ने कायरतापूर्ण तरीके से सीआरपीएफ के काफ़िले पर हमला किया था, जिसमें 44 जवान शहीद जबकि दर्जनों जवान गंभीार रूप से घायल हुए थे। बता दें कि, घटना के बाद से पूरे देश में आतंकवादी हमले के ख़िलाफ़ अलग-अलग हिस्सों में लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। देश के कई शहरों में लोगों ने पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे भी लगाए हैं।

ठोको ताली! पुलवामा हमले पर घटिया बयान के बाद कपिल शर्मा शो से सिद्धू की छुट्टी

पुलवामा आतंकी हमले में 44 जवानों के बलिदान के बाद देश भर के लोगों में ग़ुस्सा है। ऐसे दर्दनाक हमले के बाद नवजोत सिंह सिद्धू ने विवादित बयान देकर लोगों के ग़ुस्से को और अधिक भड़का दिया। नवजोत सिंह सिद्धू के बयान पर एक्शन लेते हुए सोनी टीवी ने उन्हें कपिल शर्मा शो से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

दरअसल, पिछले दिनों हमले के बाद सिद्धू ने कहा था कि आप इस हमले का पूरा दोष किसी देश पर नहीं मढ़ सकते। पूरे देश या किसी एक को इसका दोष देना ठीक नहीं है। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा था कि आतंकवाद का कोई देश नहीं होता।

सिद्धू का यह बयान न सिर्फ़ दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि पाकिस्तान की तरफ़दारी भी करता है।आतंकी हमले के बाद जब जैश-ए-मोहम्मद ने इस घटना की ज़िम्मेदारी ली है। जब जैश-ए-मोहम्मद का मुखिया मसूद अज़हर खुलेआम पाकिस्तान में रह रहा है जो बार-बार भारत पर हमला करने की बात कहता रहता है, ऐसे में सिद्धू का यह कहना कि इस हमले की ज़िम्मेदारी किसी देश को नहीं देनी चाहिए, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

सिद्धू के इस बयान के बाद लोग सोशल मीडया पर सिद्धू के ख़िलाफ़ अपनी राय ज़ाहिर कर रहे हैं। लोगों ने सोशल मीडिया के ज़रिए टीवी के कपिल शर्मा शो से सिदधू को निकालने की माँग की। इसके बाद सोनी टीवी ने सिद्धू को कार्यक्रम से निकालने का यह फैसला लिया है।

बता दें कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के शपथग्रहण समारोह में गए सिद्धू को पाक अधिकृत कश्मीर के कथित प्रधानमंत्री के साथ बिठाया गया था। अक्सर भारत के ख़िलाफ़ ज़हरीले बयान देने वाले जनरल बाजवा से गले मिलने का सिद्धू कई बार बचाव भी कर चुके हैं। ऐसे में, सिद्धू के ताज़ा बयान को लेकर सोशल मीडिया ने उन पर निशाना साधा।

सिद्धू का पाकिस्तान प्रेम अक्सर सामने आता रहता है। अक्टूबर 2018 में हिमाचल के कसौली में चल रहे लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान सिद्धू ने दक्षिण भारत पर विवादित टिप्पणी करते हुए कहा था कि वहाँ जाने पर भाषा से लेकर खानपान तक सब बदल जाता है, लेकिन पाकिस्तान में कहीं भी यात्रा करने पर ऐसा नहीं होता।

करतारपुर कॉरिडोर को लेकर भी सिद्धू ने पाकिस्तान की तारीफ़ों के पुल बाँधे थे। एक पाकिस्तानी चैनल से बातचीत करते हुए सिद्धू ने कहा था कि शांति की पहल हमेशा से पाकिस्तान ने ही पहले की है।

NIA का मोस्ट वांटेड आरिफ़ चढ़ा STF के हत्थे

पश्चिम बंगाल के कोलकाता से एसटीएफ ने बिहार के बोधगया ब्लास्ट के मुख्य आरोपी अताउर उर्फ आरिफ़ को गिरफ़्तार किया है। एनआईए के मोस्ट वांटेड अताउर की तलाश लंबे समय से की जा रही थी। एसटीएफ ने कोलकाता के बाबूगढ़ से उसे गिरफ़्तार करने में सफलता प्राप्त की। ख़बर की मानें तो एसटीएफ ने अताउर के पास से एक मैप भी बरामद किया है, जो कोलकाता का है। इसके अलावा उसके पास से एक चिट्ठी भी बरामद की गई है।

क्या है बोधगया ब्लास्ट?

बिहार के बोधगया में 7 जुलाई 2013 को महाबोधी मंदिर परिसर में एक के बाद एक बम विस्फोट हुए थे, जिसमें दो बौद्ध भिक्षु समेत 5 लोग घायल हो गए थे। सभी विस्फोट उस सुबह 05:30 से 06:00 बजे के बीच किए गए थे। बता दें कि इस दौरान बौद्ध भिक्षुओं के ध्यान का समय होता है।

यहाँ मंदिर परिसर के अंदर चार बम विस्फोट किए गए थे। पहला विस्फोट 5:30 बजे हुआ जब मंदिर के शरणस्थान में प्रार्थना चल रही थी। इसके बाद लगभग दो मिनट बाद मंदिर के पूर्वी हिस्से में बम विस्फोट हुआ था। आरोप है कि अताउर ने ही बोधगया में 4 बम प्लांट किए थे।

साथियों को छुड़ाने की कोशिश में था

बताया जा रहा है कि आरोपित अताउर अपने अन्य साथियों के साथ बोधगया ब्लास्ट के एक अन्य आरोपी कौसर को छुड़ाने की प्लानिंग कर रहा था। आतयुर विस्फोटक सामान और अन्य हथियार के बल पर कौसर को जेल वैन पर हमला करते हुए भगाने का प्लान बना रहा था।

बता दें कि इससे पहले अताउर ने बांग्लादेशी पुलिस की जेल वैन से कौसर को इस तरह सफलतापूर्वक उठा लिया था। अताउर उसी तरह की प्लानिंग के तहत उसे छुड़ाना चाह रहा था, लेकिन एसटीएफ के हत्थे चढ़ गया। फिलहाल अब पुलिस इस मामले में उससे पूछताछ कर रही है।

6 लोगों के ख़िलाफ़ दायर हो चुकी है चार्जशीट

बोधगया ब्लास्ट के मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनआइए) ने सप्लीमेंट्री चार्जशीट के तौर पर दूसरी चार्जशीट दायर कर दी थी। एनआइए की ओर से दायर की गई इस चार्जशीट में 6 नामजद आरोपी बनाए गए। इनमें चार पश्चिम बंगाल, एक असम और एक विदेशी नागरिक के रूप में बांग्लादेशी नागरिक मोहम्मद जाहिदूल शेख़ उर्फ़ कौसर का नाम शामिल है।

बता दें कि, इस मामले में एनआइए ने 28 सितंबर, 2018 को पहली चार्जशीट दायर की थी, जिनमें तीन नामजद अभियुक्त बनाए गए थे। नामजद किए गए सभी लोगों पर राष्ट्रद्रोह के अलावा जनमानस को क्षति पहुँचाने, घातक विस्फोटक को पब्लिक प्लेस पर प्लांट करने का आरोप है।

गुजरात न्यूज़ एडिटर महोदय, बलिदान की संवेदना पर व्यक्तिगत घृणा थोप कर रात में कैसे सो पाते हैं आप?

श्रीमान श्रेयांश शांतिलाल शाह,

मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय अहमदाबाद में बिताया है। मैं आपके अख़बार को पढ़कर बड़ी हुई हूँ। मुझे याद है कि जब दिव्य भास्कर ने अहमदाबाद में डेब्यू किया था, तो गुजरात के लोगों का आपके अख़बार के प्रति निष्ठा का भाव ऐसा था कि नए अख़बार के साथ-साथ लोग गुजरात समचार को भी ख़रीदते थे।

गुजरात के लोग ये जानते हैं कि आपके नेतृत्व में प्रकाशित होने वाले अख़बार हमेशा सरकार विरोधी और प्रतिष्ठान विरोधी रुख़ अपनाता रहा है। यही वजह है कि बतौर संपादक आप तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज के ख़िलाफ़ लिखते रहे हैं।

2002 के दंगों के दौरान आपका ये रवैया और स्पष्ट हो गया जब आपने एक ज़िम्मेदार प्रकाशन की भूमिका निभाने की बजाए आपने अपने सरकार विरोधी आचरण को और बढ़ा दिया। आपने अख़बार में भड़काऊ सामग्री प्रकाशित की। प्रेस काउंसिल ने एक और गुजराती दैनिक संध्या में आपके और आपके मित्र से कुछ रिपोर्टों में पत्रकारीय आचरण के मानदंडों के उल्लंघन के संबंध में जवाब माँगा गया था।

ज़ाहिर तौर पर, जाँच समिति के सदस्यों को आपके इस व्यवहार से दु:ख हुआ क्योंकि अभिमानी और ज़रूरत से ज़्यादा जिद्दी होने के नाते आपने जाँच समिति के छह में से पाँच नोटिस का जवाब तक नहीं दिया। आपने इस संवेदनशील समय में सनसनीखेज़ रिपोर्ट को अख़बार के पन्नों पर छापना जारी रखा। आपने ऐसा इसलिए किया क्योंकि आप जिस व्यक्ति को पसंद नहीं करते थे वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा था।

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बरसों बाद वही मुख्यमंत्री अब देश के प्रधानमंत्री हैं। लेकिन आपके इस व्यवहार को देखने के बाद मुझे अहसास हुआ है कि घृणा प्यार की तुलना में अधिक प्राकृतिक मानवीय भावना है। इसलिए, जब एक ऐसे आतंकवादी जिसे लगता है कि गौमूत्र पीने वाले को मारकर उसे जन्नत मिलेगी और वो आतंकी सीआरपीएफ के 44 जवानों को मार देता है, तो इस दर्दनाक घटना के तुरंत बाद आपकी प्रवृत्ति सदमे और डर की नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के मजाक उड़ाने की होती है।

हमले के एक दिन बाद 15 फ़रवरी को, आपके अख़बार की हेडलाइन कुछ इस तरह थी, “56नी छत्तीनी कैवर्त: एतंकियॉ बेफाम, 44 जवान शहीद, आपके अख़बार के इस हेडलाइन का अनुवाद इस तरह है “56 इंच के सीने की कायरता, आतंकवादियों को खुली छूट मिलती है: 44 जवान शहीद।”

आपके अख़बार की सबहेडिंग कुछ इस तरह दी गई, ‘जेड प्लस सिक्योरिटी वाचा फर्ता वडप्रधान देश सुरक्षा कर्ता जवना माटे लचार’, यदि आपके अख़बार की हेडलाइन का अनुवाद करें तो यह इस तरह है कि प्रधानमंत्री जो जेड प्लस सुरक्षा के बीच कहीं जाते हैं, जब जवानों की सुरक्षा की बात आती है वो असहाय नज़र आने लगते हैं।

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हेडलाइन में लिखा है, “पुलवामा हमला: देश नी जनता सरकार, पुछे छे, कैसा है जोश?” का मोटे तौर पर अनुवाद इस तरह है कि, ‘पुलवामा हमला: नागरिक सरकार से पूछते हैं,’ कैसा है जोश?’ फ़िल्म उरी का संबंध भारतीय सर्जिकल स्ट्राइक से था, जिसमें उरी हमलों का बदला लेने के लिए भारतीय फौज ने अपनी जान की बाजी लगाकर बार्डर पार दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे। लेकिन आपने उसका इस्तेमाल अपने लेख में सरकार पर हमला करने के उद्देश्य से किया। आपने अख़बार के लेख में कुछ इस तरह लिखा है कि जनता आतंकी हमले के बाद सरकार से उरी फ़िल्म के इस डॉयलॉग के ज़रिए सवाल पूछ रही है।

लेकिन आप ग़लत हैं। वाक्यांश ‘जोश कैसा है’ का उपयोग नागरिकों द्वारा सरकार से सवाल पूछने के लिए नहीं किया गया है, लेकिन हमले के बाद इसका उपयोग वास्तव में ज़िहादियों द्वारा पुलवामा हमले का जश्न मनाने के लिए ज़रूर किया गया है। हाँ, यह बात अलग है कि कई बार आतंकियों से सहानुभूति रखने वाले कुछ मध्यस्थ और कुछ मीडिया कर्मी ऐसे मौक़े पर इस तरह के सवाल का इस्तेमाल करते हैं। अरे हाँ, यहाँ मेरे कहने का मतलब संपादक महोदय सिर्फ़आपसे नहीं है।

साहब, आप बहादुरों के बलिदान का शोक नहीं मना रहे हैं। लेकिन हाँ, आप इन 44 जवानों के जीवन को बचाने में मोदी सरकार के ‘विफल’ होने पर आप ज़रूर शोक जरूर मना रहे हैं। मुझे मालूम है कि उन सैनिकों की भयावह शव को देखकर आपकी आंखें नम भी नहीं हुई होंगी। लेकिन हाँ जवानों की मौत पर आपके चेहरे पर एक मुस्कुराहट ज़रूर दिख रही है।

मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि आपके अंदर इतनी नफ़रत कहाँ से आती है? आपको घमंड किस बात का है? यही कि आपके पास क़लम की ताक़त है?

संपादक महोदय आप देखिए कि लोग अब सोशल मीडिया पर अपनी बात रख रहे हैं। आपको यह मानना होगा कि सोशल मीडिया के आने से लोगों को पारम्परिक मीडिया के असली चेहरा का पता चल गया है। सोशल मीडिया के आने से लोगों ने मुख्यधारा की मीडिया पर सवाल खड़े करना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया के आने से राष्ट्रीय मीडिया या तो तथ्यों को सही करने की कोशिश कर रहा है या उन्होंने उन सभी का उल्लेख करना शुरू कर दिया है जो उन्हें सही करते हैं। संपादक महोदय आप देखते रहिए वह समय बहुत दूर नहीं है जब लोग क्षेत्रीय समाचार पत्रों से भी आगे निकल जाएँगे और उनसे उनकी नैतिकता और बुनियादी पत्रकारिता की आचार संहिता पर सवाल करेंगे।

यदि आप आज इंटरनेट पर आकर देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि लोगों को आपसे कितनी सारी शिक़यतें हैं। यदि आप यह सोच रहे हैं कि यह सभी लोग मोदी भक्त हैं तो आप ग़लत हैं, क्योंकि वे सभी मोदी भक्त नहीं बल्कि एक सभ्य इंसान हैं। यह सभी लोग हैरान हैं कि एक संपादक होने के नाते आपके अंदर भावना के रूप में सहानुभूति की कमी है। सच तो यह है कि आपसे शिक़ायत किसी और को नहीं बल्कि आपके अख़बार के नियमित पाठकों, देश के नौजवान छात्रों और पेशेवर लोगों को है। यक़ीन मानिए आपने आज उन्हें निराश कर दिया।

संपादक महोदय, मैं यह जानना चाहती हूँ कि आप ख़ुद के साथ कैसे न्याय करते हैं, यह जानते हुए कि आपने एक व्यक्ति की आलोचना को जवान के शवों से ज़्यादा अहमियत दे दी। ऐसा लिखने पर क्या आपकी अंतरात्मा आपको झकझोरती नहीं है? या फिर आप अंदर से ही इतने मर चुके हैं कि अब आपके पास कोई भावना शेष ही नहीं बची?