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दलाली की रक़म से ख़रीदा था वाड्रा ने लंदन में घर: ED

सोनिया गाँधी के दमाद रॉबर्ट वाड्रा की मुश्किलें आने वाले दिनों में बढ़ सकती हैं। जाँच में ईडी ने यह दावा किया है, कि कोरियाई कंपनी सैमसंग इंजीनियरिंग की तरफ से दी गई दलाली की रकम से लंदन में, उन्होंने अपना मकान ख़रीदा था। वाड्रा से पूछताछ करने वाले एक अधिकारी ने इसका दावा किया है। दलाली गुजरात के दाहेज में बनने वाले ओएनजीसी के एसईजेड से जुड़े निर्माण का ठेका मिलने के एवज में दिया गया था।

दैनिक जागरण में छपी रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर, 2008 में यह ठेका मिला था। ठेके 6 महीने बाद 13 जून, 2009 को सैमसंग ने संजय भंडारी की कंपनी सैनटेक को 49.9 लाख डॉलर दिया था। इसके बाद संजय भंडारी ने इसमें से 19 लाख पाउंड उस समय के विनियम दर के हिसाब से लगभग ₹15 करोड़ वोर्टेक्स नाम की कंपनी में ट्रांसफर किया था। ईडी ने दावा किया है कि इसी पैसे का इस्तेमाल 12, ब्रायंस्टन स्क्वायर की संपत्ति ख़रीदने के लिए किया गया था।

भंडारी के रिश्तेदार ने ईमेल भेजकर माँगी थी इजाज़त

ईडी का दावा है कि 2010 में भंडारी के रिश्तेदार सुमित चड्ढा ने इस सम्पत्ति की मरम्मत करवाने के लिए रॉबर्ट वाड्रा को ईमेल भेजकर इजाज़त माँगी थी। ईमेल में चड्ढा ने मरम्मत के पैसे की व्यवस्था करने की बात भी कही थी। वाड्रा ने इसके जवाब में मनोज अरोड़ा को इसकी व्यवस्था करने का निर्देश देने का भरोसा दिया था। दावा है कि घर की मरम्मत पर लगभग ₹45 लाख का ख़र्चा हुआ था।

‘सत्य की हमेशा होती है जीत’ फेसबुक पर वाड्रा कर चुके हैं पोस्ट

बीते दिनों वाड्रा ने अपने फ़ेसबुक पोस्ट में अपनी एक तस्वीर लगाई है और लिखा है, “सुप्रभात! मैं पूरे देश के अपने तमाम मित्रों और शुभचिंतकों का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा जो इस समय मेरे साथ खड़े हैं। मैं ठीक-ठाक हूँ और किसी भी परिस्थिति का सामना करने में मैं अपने आप को सक्षम पाता हूँ। सत्य की हमेशा जीत होती है। आप सभी का रविवार अच्छा बीते और आपका ये सप्ताह स्वास्थ्य और ख़ुशियाँ लाए।”

https://m.facebook.com/764044809/posts/10157100535029810

‘अल्पसंख्यक’ धर्म या आबादी के आधार पर: 3 महीने में तय हो परिभाषा, सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

अल्पसंख्यकों की परिभाषा तय करने के लिए बीजेपी नेता अश्विनि उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई आज सुप्रीम कोर्ट में हुई। जिसके बाद कोर्ट ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को यह निर्देश दिया कि वह अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करे।

उपाध्याय ने कोर्ट से परिभाषा तय करने की माँग करते हुए कहा था कि उन्होंने आयोग को इस मामले में ज्ञापन दिया था। याचिका में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 2(सी) को रद्द करने की माँग की गई है। याचिका में कहा गया है कि यह धारा मनमानी, अतार्किक और अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करती है।

1993 की अधिसूचना रद्द करने की माँग

इस धारा में केंद्र सरकार को किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने के असीमित अधिकार दिए गए हैं। याचिका में माँग की गई है कि केंद्र सरकार की 23 अक्टूबर, 1993 की उस अधिसूचना को रद्द किया जाए, जिसमें 5 समुदायों मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिख और पारसी को अल्पसंख्यक घोषित किया गया था।

याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करे, ताकि संविधान के अनुच्छेद 29-30 में उन्हें अधिकार और संरक्षण मिले, जो वास्तव में धार्मिक, भाषाई, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से प्रभावशाली न हों।

वास्तविक अल्पसंख्यक लाभ से वंचित

याचिका में कहा गया है कि हिंदू आँकड़ों के अनुसार एक बहुसंख्यक समुदाय है, जबकि पूर्वोत्तर के कई राज्यों और जम्मू-कश्मीर में यही हिंदू अल्पसंख्यक है। याचिका में इस बात का तर्क़ दिया गया है कि हिंदू समुदाय उन लाभों से वंचित है, जो कि इन राज्यों में अल्पसंख्यक समुदायों के लिए मौजूद है।

याचिका में तर्क देते हुए मुस्लिमों की आबादी का आँकड़ा भी दिया गया है। मुस्लिम आबादी के आँकड़े (याचिकानुसार): लक्षद्वीप में मुस्लिम आबादी 96.20%, जम्मू-कश्मीर में 68.30%, असम 34.20%, पश्चिम बंगाल 27.5%, केरल 26.60%, उत्तर प्रदेश 19.30% और बिहार 18%। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन सभी राज्यों में मुस्लिम असल में बहुसंख्यक होने के बावजूद भी अल्पसंख्यक हैं और इन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है। जबकि जो वास्तव में अल्पसंख्यक हैं, उन्हें इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।

‘जिसके हाथ में चाय का जूठा कप देना था, उसके हाथ में जनता ने देश दे दिया’

राजनीति के स्तर को गिराते हुए अभी कुछ समय पहले मध्य प्रदेश में एनसीपी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कुत्तों के गले में देश के पीएम का नाम लटकाया था। और, अब आन्ध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए धरने पर बैठे टीडीपी के प्रमुख और आन्ध्र प्रदेश मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के समर्थकों ने इस दिशा में सारी हदों को पार कर दिया है।

दिल्ली में चंद्रबाबू नायडू के धरने के दौरान उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं के हाथ में कुछ ऐसे पोस्टर्स नज़र आए, जिन्होंने इस धरने को विवादों ने लाकर खड़ा दिया है, और साथ ऐसी घटना से उनकी पार्टी की सोच पर भी सवालों का उठना स्वाभाविक ही है। दरअसल, इस धरने के दौरान वहाँ जो पोस्टर दिखे, उनपर लिखा था, ‘जिसके हाथ में चाय का जूठा कप देना था, उसके हाथ में जनता ने देश दे दिया।’

इस शर्मनाक घटना पर टीडीपी के जयादेव गल्ला ने सफ़ाई देते हुए कहा है कि धरना स्थल पर दिखे पोस्टर्स बिलकुल भी सही नहीं है, साथ ही वह इसका समर्थन भी नहीं करते हैं। उनका कहना है कि ऐसा बिलकुल भी नहीं किया जाना चाहिए। जयादेव ने साथ ही यह भी कहा कि यह कार्य उनकी पार्टी द्वारा नहीं किया गया है।

ऐसी हरक़तों पर सवाल यह उठता है कि अगर धरना स्थल पर उनके समर्थकों ने ऐसी ओछी हरक़त नहीं की है तो फिर किसने की है…? ज़ाहिर है देश में पीएम के अगर समर्थक हैं तो उनके विरोधी भी हैं, लेकिन इस तरह की हरक़तें चुनाव के आने के साथ बढ़ती ही जा रही हैं। इन घटनाओं से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि राजनीति की आड़ में किस तरह राजनेता अपनी मानसिकता का उदाहरण दे रहे हैं।

लादेन की मौत में शामिल हेलिकॉप्टर अब भारतीय वायुसेना के पास

अमेरिकी विमान निर्माता कंपनी बोईंग ने रविवार (10 फ़रवरी) को भारतीय वायुसेना को 4 चिनूक सैन्य हेलिकॉप्टर सौंप दिए। इन हेलीकॉप्टर्स को गुजरात में मुंद्रा बंदरगाह पर उतारा गया। कंपनी द्वारा जारी बयान के अनुसार सीएच-4एफ़ (I) चिनूक हेलिकॉप्टर को चंडीगढ़ ले जाया जाएगा, वहाँ उन्हें औपचारिक रूप से भारतीय वायुसेना में शामिल किया जाएगा।

सीएच-47एफ़ (I) चिनूक

बयान में कहा गया कि सीएच-47एफ़ (I) चिनूक बहुद्देशीय, वर्टिकल लिफ्ट प्लेटफॉर्म हेलिकॉप्टर है। इसका इस्तेमाल युद्ध के दौरान या सामान्य स्थिति में हथियारों, उपकरणों और ईंधन को ढोने में किया जाता है। इसके अलावा इसका इस्तेमाल मानवीय और आपदा राहत अभियानों में राहत सामग्री पहुँचाने और बड़ी सँख्या में लोगों को बचाने के लिए भी किया जाता है।

सीएच-47एफ़ (I) चिनूक

भारतीय वायुसेना ने वर्तमान में 15 चिनूक हेलिकॉप्टर का ऑर्डर दे रखा है। भारत द्वारा सितंबर 2015 में बोईंग के साथ 22 अपाचे हेलिकॉप्टर और 15 चिनूक हेलिकॉप्टर ख़रीदने की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा चुका है।

भारतीय वायुसेना में चिनूक के शामिल होने से देश की सुरक्षा प्रणाली को और मज़बूती मिलेगी। चिनूक के बारे में आपको बता दें कि यह वही हेलिकॉप्टर है जिसकी मदद से अमेरिका ने कुख्यात आतंकवादी ओसामा बिन लादेन का ख़ात्मा किया था।

फ़िलहाल भारतीय वायुसेना रूस के MI-17 जैसे मध्यम श्रेणी के हेलिकॉप्टरों पर निर्भर थी, लेकिन चिनूक के आने से भारतीय वायुसेना को अधिक बल मिलेगा। इस हेलिकॉप्टर की तमाम ख़ासियतों में एक ख़ास बात यह है कि इसमें एक बार में गोला-बारूद, हथियार के अलावा 300 सैनिक भी जा सकते हैं।

वायुसेना में शामिल होने वाले चिनूक की क्षमता की बात करें तो क़रीब 9.6 टन वजन उठाने में यह पूरी तरह से सक्षम है। इसमें भारी मशीनरी, तोप और बख़्तरबंद गाड़ियाँ लाना-ले जाना शामिल है। बता दें कि इस हेलिकॉप्टर के इस्तेमाल के लिए वायुसेना के चार पायलट और चार इंजीनियर को अमेरिका में ट्रेनिंग दी गई थी।

‘My Name is Raga’ ट्रेलर रिव्यु: राहुल गाँधी की पैरोडी या SPOOF?

हाल ही में एक फ़िल्म का ट्रेलर रिलीज़ हुआ है, जिसका नाम है- ‘माय नेम इज़ रागा’। इस फ़िल्म को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का बायोपिक बताया जा रहा है। ट्रेलर की समीक्षा से पहले फ़िल्म और इस से जुड़े लोगों की बात कर लेते हैं। इस फ़िल्म के निर्देशक रुपेश पॉल हैं जो ‘कामसूत्र 3D’ जैसी फ़िल्में बना चुके हैं। कामसूत्र इरोटिक जॉनर की फ़िल्म थी और इसे लेकर विवाद भी हुए थे। इसके अलावा रुपेश पॉल ‘पिथावुम कन्याकायुम (Daddy, You Bastard)’ नामक मलयालम फ़िल्म भी बना चुके हैं। इस फ़िल्म में एक पिता अपनी बेटी की वर्जिन सहेली के साथ एक रात गुज़ारता है

राहुल गाँधी का अपनी प्रेमिका के सामने उनका ट्रेडमार्क ‘विंक’ (साभार: ट्रेलर)

‘कामसूत्र’ और ‘डैडी यू बास्टर्ड’ जैसी फ़िल्मों के निर्देशन के बाद रुपेश पॉल ने अब चोला बदला है और इरोटिका से पॉलिटिकल जॉनर में उतर आए हैं। बकौल निर्देशक, यह फ़िल्म राहुल गाँधी के महिमा-गान के लिए नहीं है बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो विपत्तिजनक ज़िंदगी पर विजय पाकर अजेय (Unstoppable) हो जाता है। निर्देशक ने इसे एक बायोपिक मानने से भी इनकार किया है। उनके अनुसार यह ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिस पर लगातार हास्यास्पद रूप से अटैक किया जाता रहा है।

‘विलेन’ नरेंद्र मोदी और अमित शाह का चित्रण (साभार: ट्रेलर)

‘मई नेम इज़ रागा’ अप्रैल में रिलीज़ होनी है, यानी लोकसभा चुनाव से कुछ ही दिनों पहले। अब ट्रेलर पर आते हैं और पता करते हैं कि हाल ही में रिलीज़ हुई राजनीतिक बायोपिक फ़िल्मों (शिवसेना संस्थापक स्वर्गीय बाल ठाकरे की बायोपिक ‘ठाकरे’ और पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की बायोपिक ‘दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’) के मुक़ाबले ‘माय नेम इज़ रागा’ कहाँ ठहरती है। ज्ञात हो कि विवेक ओबेरॉय अभिनीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक के भी पोस्टर्स ज़ारी हो चुके हैं।

कॉन्ग्रेस के युवा नेताओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करते राहुल (साभार: ट्रेलर)

ट्रेलर के पहले दृश्य में ही राहुल गाँधी की एंट्री होती है। सिंघम की तरह वो भी पानी के भीतर से निकलते हैं। अंतर इतना है कि सिंघम को तालाब या नदी की पानी से पूजा करते हुए निकलते दिखाया जाता है, राहुल गाँधी स्विमिंग पूल में हिचकोले खाते हुए और मस्ती करते हुए पानी से निकलते हैं। स्विमिंग पूल के किनारे बैठी इंदिरा गाँधी एक पुस्तक पढ़ रही है जो कार्ल मार्क्स के बारे में है। इसके बाद इंदिरा गाँधी की हत्या को काफ़ी इमोशनलेस तरीक़े से दर्शाया गया है, जो अपने पोते राहुल गाँधी की बाहों में दम तोड़ती हुई दिखती है।

‘माय नेम इज़ रागा’ का ट्रेलर यहाँ देखें

सबसे बड़ी बात यह कि राहुल को ‘विक्टिम’ की तरह पेश करने के लिए इंदिरा गाँधी की हत्या वाले दृश्य में उन्हें भी ख़ून से लथपथ दिखाया गया है। ट्रेलर में बस एक यही सीरियस पार्ट है। इसके बाद कॉमेडी का दौर शुरू हो जाता है। 14 वर्ष की उम्र में गुड्डों से खेलने वाले राहुल गाँधी बड़े हो जाते हैं और उन्हें जबरन कॉन्ग्रेस की कमान देने की क़वायद शुरू हो जाती है। फाइलों का अध्ययन करती सीरियस सोनिया गाँधी और राहुल की बातचीत से पता चलता है कि राहुल जिम्मेदारी से भाग रहे हैं, लेकिन सबकी कोशिश यही है कि उन्हें किसी तरह कॉन्ग्रेस का नेतृत्व दिया जाए।

राहुल गाँधी के ‘निजी सलाहकार’ डॉक्टर मनमोहन सिंह (साभार: ट्रेलर)

कॉमेडी के लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के किरदार को लाया गया है। डॉक्टर सिंह जैसे क़द के व्यक्ति को प्रधानमंत्री कम, और राहुल गाँधी के निजी सलाहकार की तरह ज्यादा पेश किया गया है। मीडिया से बात करते हुए राहुल गाँधी को देख कर आपके मन में एक पल के लिए यह सवाल उठ सकता है कि कहीं इस फ़िल्म को भाजपा ने तो नहीं प्रोड्यूस किया है। फ़िल्म के राहुल गाँधी असली राहुल गाँधी की तरह डॉक्टर सिंह की प्लेट में केक का टुकड़ा नहीं पटकते (जैसा कि डॉ सिंह के जन्मदिन वाले वायरल वीडियो पर राहुल के बर्ताव को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठे थे), वह उनसे काफ़ी विनम्र तरीक़े से पेश आते हैं

राहुल गाँधी की प्रेमिका (साभार: ट्रेलर)

फ़िल्म की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें राहुल गाँधी युवा नेताओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करते दिख रहे हैं। 86 वर्षीय मनमोहन सिंह, 76 वर्षीय मल्लिकार्जुन खड़गे, 72 वर्षीय कमलनाथ और 67 वर्षीय अशोक गहलोत के साथ दिखने वाले राहुल गाँधी को युवा नेताओं के साथ दिखाना शायद बहुत लोगों को न पचे। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को ऐसा गेट-अप दिया गया है, जैसे वो पूजापाठ कराने वाले कोई पंडित जी हों। हाँ, नरेंद्र मोदी का भाषण सुनते हुए नाक-भौं सिकोड़े गाँधी परिवार की छवि काफ़ी अच्छे तरीक़े से पेश की गई है।

कार्ल मार्क्स को पढ़तीं इंदिरा गाँधी

अंत में राहुल गाँधी की रहस्यमयी प्रेमिका का परिचय कराया गया है, जिसने राहुल से ‘जीतना’ सीखा है। वो राहुल को सबका ‘प्यारा रागा’ ऐसे बताती हैं, जैसे वह कोई नेता न हो कर किसी कार्टून सीरीज़ के किरदार हों। ट्रेलर का अंत होते-होते आपको ऐसा महसूस हो सकता है जैसे किसी कार्टून कैरेक्टर का परिचय कराया जा रहा हो। राहुल गाँधी की प्रेमिका का चित्रण, डायलॉग डिलीवरी देख कर आपको पता चल जाएगा कि यह ‘कामसूत्र’ वाले निर्देशक द्वारा ही बनाई गई है।

बिखरे बालों के साथ प्रियंका को किसी हीरोइन की तरह पेश किया गया है (साभार: ट्रेलर)

कुल मिला कर देखा जाए तो यह फ़िल्म इरोटिक (कामुक) जॉनर के निर्देशक द्वारा राजनीतिक बायोपिक बनाने की कोशिश है। फ़िल्म में किसी जीत का क्रेडिट राहुल को दिए जाने की बात हो रही है, शायद यह फ़िल्म रिलीज़ होने तक सस्पेंस ही रहे कि राहुल ने ऐसा कौन सा चुनाव जिताया, जिसका भरा-पूरा क्रेडिट देकर उन्हें पेश किया जा रहा है। फिल्म पैरोडी और स्पूफ है या कॉमेडी या कार्टून- यह पूरी तरह से फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद ही पता चलेगा।

2019 में PM की कुर्सी के 8 सबसे बड़े दावेदार: ‘ईमानदार बाबा’ ने कर दी भविष्यवाणी

देश भर में भाजपा और कॉन्ग्रेस के समर्थक नरेंद्र मोदी और राहुल गाँधी के लिए प्रचार-प्रसार में ख्वामखा मेहनत कर रहे हैं।  क्योंकि भविष्यवाणी हो चुकी है कि देश की पीएम की कुर्सी पर इस बार न तो नरेंद्र मोदी बैठेंगें और न ही आएँगे राहुल गाँधी…। ‘कामदार’ और ‘नामदार’ की कथित लड़ाई में एक ‘ईमानदार’ ने अपनी भाँजी मारते हुए इस भविष्यवाणी की घोषणा की है ।

इस अंतरिम घोषणा के बाद कई श्रद्धालुओं की आँख में उम्मीद के तारे चमकते नज़र आए है। इन श्रद्धालुओं की कतार में यूपी से बंगाल के बाद महाराष्ट्र से मध्यप्रदेश के भी कई नामी चेहरे खड़े नज़र आ सकते हैं।  हालाँकि ‘ईमानदार बाबा’ केजरीवाल ने फ़िलहाल पीएम के पद के लिए अपने किसी भी श्रद्धालु का नाम नहीं लिया है। क्योंकि चुनाव के लिए अपनी पृष्ठभूमि भी तो बनानी है। लेकिन, फिर भी देश की विचलित जनता अपनी बेचैनी को मिटाने के लिए उनसे सवाल पर सवाल दागे जा रही है। साथ ही भारतीय मीडिया भी उनकी इस भविष्यवाणी को ‘बयान’ कहकर लज्जित कर रहा है।

ऐसे में मुझसे बिलकुल नहीं देखा जा रहा है कि लोग दशक की सबसे बड़ी भविष्यवाणी पर इतने सवाल खड़े कर रहे हैं। इसलिए मैं आपको उन श्रद्धालुओं के नाम बता देती हूँ जिनको राहत देने के लिए बाबा ने अपनी इंद्रिय शक्तियों का पूर्ण इस्तेमाल करते हुए भविष्यवाणी को परिणाम बताया है। लेकिन उससे पहले ये बताऊँगी कि किन पाप कर्मों की वजह से बाबा ने इन दो नास्तिकों पर अपनी कृपा नहीं बरसाई।

देखिए, मोदी का तो आप समझ सकते हैं कि, इस समय देश में कामदार व्यक्ति के नाम से पहचाने जाने वाले से हमारे ईमानदार बाबा बहुत ग़ुस्से में हैं। मोदी का लगातार देश के लिए और देश के नागरिकों के लिए काम करना, किसी को पिछले साढ़े 4 साल में हज़म हुआ है जो हमारे बाबा को हो जाएगा…पेट सफा तक की नौबत आ चुकी है साहिब..और तो क्या बोलें…।

कामदार व्यक्ति का लगातार काम करना देश की तस्वीर बदल सकता है, नौजवानों को रोज़गार दिला सकता, घर-घर को रौशन कर सकता है, महिलाओं को सशक्त बना सकता है ऐसे में फिर बाबाओं की भविष्यवाणियों को कौन पूछेगा। बाबाओं का ही धंधा ख़तरे में आ जाएगा। तो इसलिए मोदी का पत्ता उन्होंने पहले ही साफ़ कर दिया है। न दोबारा आएँगे न देश बाबाओं की भविष्यवाणी से ऊपर उठ पाएगा।

अब बात राहुल गाँधी की, मोदी ने तो चलिए देशहित में काम किया तो केजरीवाल बाबा की नाराज़गी ठीक है। लेकिन राहुल गाँधी पर बहुत- बहुत-बहुत सोचने के बाद मुझे ऐसा लगा कि हमारे बाबा को आने वाले समय में कॉम्पीटिशन की वजह से ख़तरा हो सकता है। क्योंकि देश को सोने की चिड़िया दोबारा बनाने के लिए केजरीवाल बाबा सिर्फ़ बात करते हैं जबकि राहुल बाबा पर तो आलू से सोना निकालने की मशीन है।

ऐसे में ज़ाहिर है अपने प्रतिद्वंदी से ख़तरा तो महसूस होता ही है। इसलिए बहुत सोच विचार के बाद, बाबा की घोषणा है- न मोदी होंगे पीएम और ही राहुल…तो कौम होगा पीएम…ममता या मायावती, अखिलेश या फिर तेजस्वी, चंद्रबाबू नायडू या शरद पवार… या हो सकता है ईमानदार बाबा ख़ुद ही अपनी दैवीय शक्तियों के बलबूते पर इस पद पर आसित हो जाएँ…

वैसे ‘बाबा’ के सब श्रद्धालुओं पर पीएम पद तक पहुँचने के लिए अपना-अपना एजेंडा है… इसलिए उन्होंने इसकी ज़मीन भी पहले से तैयार कर ही रखी है।

बाबा के श्रद्धालुओं में सबसे पहले ममता बनर्जी का नाम आता है। हाल ही में बंगाल में इनकी रैली का समर्थन भी बाबा द्वारा किया गया था। देश के पीएम के लिए उम्मीदवारों में सबसे सशक्त नाम इन्हीं का है। ममता की ख़ासियत तो पिछले दिनों देख ही ली गई। अपने ही घोटालों का सच छुपाने के लिए सीबीआई से लड़ाई कर बैठीं हैं। लोकतांत्रिक देश की सेकुलर सीएम अपने अधिकारों का भी इतना इस्तेमाल करना जानती हैं कि वो योगी आदित्यनाथ के प्लेन को अपने राज्य में नहीं उतरने देतीं। सोचिए! वैश्विक स्तर पर ममता देश का नाम कितना रौशन करेंगी।

इसके बाद दूसरा नाम मायावती का आता है। दलितों के लिए देवी बनकर भारतीय राजनीति में उभरे इस नाम ने यूपी की तस्वीर इस तरह बदली है कि अब सुप्रीम कोर्ट की फ़ाइलें सब हालातों को बयान कर रही हैं। अपने कार्यकाल में करीब 615 करोड़ रूपए मायावती ने सिर्फ़ ‘हाथी’ की मूर्तियों को बनावाने में ख़र्च किए थे। ये हाथी ही उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न भी था। अगर एक बार मायावती पीएम के पद पर बैठती है तो सोच लीजिएगा, देश के हर कोने में शान बढ़ाने के लिए हाथी ही हाथी बनवाए जाएँगे। फिर चाहे देश के बजट में रोटी-पानी के लिए पैसा बचे या न बचे।

अब बात अखिलेश यादव की…अखिलेश यादव भी देश के पीएम पद के लिए बाबा के तमाम श्रद्धालुओं की कतार में सटीक उम्मीदवार हैं। जैसे उनके सीएम पद से हटने के बाद सरकारी आवास की खस्ता हालात के बारे में पता चला …वैसे ही पीएम पद के बाद वो देश को खस्ता करने में अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे। वैसे भी पहले जीतने के लिए वो राहुल बाबा का हाथ थाम चुके थे और अब बुआ की शरण में आ गए हैं। आगे देखिए, पीएम पद तक पहुँचने के बाद ज़िंदगी उन्हें और कितने ईमानदार लोगों का साथ दिलाएगी।

इसके बाद सबसे पढ़े लिखे नेताओं में शुमार तेजस्वी यादव, जीता-जागता उदाहरण हैं कि देश की स्थिति जिस तरह से राजनेता बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, उस कोशिश को वहीं परिणाम तक पहुँचा सकते हैं। ऐसे में ज़रूरी है पीएम के पद के लिए तेजस्वी यादव का नाम जाए। क्योंकि देश में पढ़ाई से ज्यादा तवज्जो तो इंसान के बैकग्राउंड को दी जाती है। और जिनके पिताजी ख़ुद लालू प्रसाद हों…उन्हें फिर काहे बात की दिक्कत, बिना किसी क़ाबिलियत भी वो देश को गड्ढे में ले जा सकते हैं। इसलिए श्रद्धालुओं की कतार में पीएम पद के लिए एक नाम तेजस्वी का भी लिया जा सकता है।

इनके अलावा हो सकता है आने वाले समय में चंद्रबाबू नायडू, शरद पवार, फ़ारूख़ अब्दुल्लाह, आज़म ख़ान जैसे बड़े नेता भी पीएम की कुर्सी के लिए बाबा की शरण में खड़े दिखाई दें। क्योंंकि विवादित बयानों का तो दौर चला है और फिर इतनी काबिलियत वाले लोग देश के पीएम की कुर्सी को संभालना क्यों नहीं चाहेंगे। उम्र चाहे 28 की हो या फिर 78 की, जोश आज भी सबमें उतना ही हैं। और, हमारे ईमानदार बाबा को इन सबकी क़द्र है।

सबसे आख़िर में देश के सबसे बड़े समाजसेवी और अपने ईमानदार बाबा भी इस सूची के लिए सबसे सटीक नाम अपना ख़ुद का बता सकते हैं। हालाँकि उन्होंने अभी लोगों का इस दिशा में मार्गदर्शन नहीं किया है कि वो किस तरह से देश को सोने की चिड़िया बनाएँगे लेकिन वो लगातार अपनी भविष्यवाणियों से आपको इन बातों से अवगत कराते रहेंगे। आने वाले समय में भी आप उनसे जुड़े रहे ताकि चुनाव के परिणामों की घोषणा से पहले ही आपको सब जानकारी मिलती रहे। श्रद्धालुओं के नाम में आगे और भी घोषणाएँ हो सकती हैं।

इसके लिए आप ईमानदार बाबा और उनकी भविष्यवाणियों को ज़्यादा से ज़्यादा लाइक करें शेयर करें और सब्सक्राइब करें ताकि कोई किसी भी होने वाली घोषणा से आप अछूते और अंजान न रह जाएँ।

केरल के वामपंथी MLA का महिला-विरोधी बयान – ‘बिना दिमाग की हो’

केरल के मन्‍नार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक एस राजेंद्रन ने महिला आईएएस अधिकारी रेणु राज पर अभद्र टिप्पणी की। विधायक ने सार्वजनिक तौर रेणु के अधिकारियों के सामने ‘बिना बुद्धि के, बिना कॉमन सेंस के’ जैसी बातें उनके लिए कहीं। दरअसल विधायक एस राजेंद्रन ने यह अभद्र टिप्पणी उस समय की, जब महिला अधिकारी एक व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स में अनधिकृत निर्माण रोकने का प्रयास कर रही थीं।

कुछ टेलीविजन चैनलों ने इस घटना से संबंधित वीडियो फुटेज भी दिखाई है। इस वीडियो में भी विधायक द्वारा की गई टिप्पणी कैद है। विधायक ने कहा, “उन्होंने (महिला आईएएस) सिर्फ़ कलेक्टर बनने के लिए पढ़ाई की है। इन लोगों के पास काफी कम दिमाग होता है। क्या उन्हें स्केच और प्‍लान की जानकारी नहीं हासिल करनी चाहिए थी।” विधायक ने वहाँ मौजूद लोगों से कहा कि एक कलेक्टर पंचायत के निर्माण में दखल नहीं दे सकती। यह एक लोकतांत्रिक देश है।

बता दें कि 30 वर्षीया आईएएस अधिकारी रेणु राज, इदुक्की के देविकुलम की पहली महिला उप-कलेक्टर हैं। इदुक्की एक ऐसी जगह है, जो पर्यटकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय है, लेकिन यह जगह अवैध निर्माणों और भूमि अतिक्रमणों के लिए बदनाम भी है।

केरल उच्च न्यायालय के 2010 के आदेश के अनुसार, पारिस्थितिक चिंताओं के कारण, मुन्नार के सात गाँवों में किसी भी निर्माण कार्य को राजस्व अधिकारियों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) की आवश्यकता होती है। जानकारी के अनुसार, सब-कलेक्टर द्वारा इसी संबंध में “स्टॉप मेमो” जारी किया गया था, क्योंकि उन्हें एनओसी प्राप्त नहीं हुई थी।

युवा महिला IAS अधिकारी ने मीडिया को बताया, “उच्च न्यायालय ने मुझे इस विशेष निर्माण के संबंध में एक रिपोर्ट दर्ज करने का निर्देश भेजा था, जो अदालत की अवमानना ​​है। मैंने अदालत के आदेश के उल्लंघन पर मुख्य सचिव और राजस्व सचिव को रिपोर्ट दायर की। मुझे अपना कर्तव्य निभाने के लिए विरोध का सामना करना पड़ा।”

उन्होंने कहा, “विधायक ने मेरे अधिकारियों के सामने जैसा व्यवहार किया, बावजूद इसके मुझे मीडिया, नेताओं से और मेरे वरिष्ठजनों से ज़बरदस्त समर्थन मिला है। मुझे विश्वास है कि मैंने सही काम किया। मैं अपने पद के अनुसार अपने कर्तव्य को निभाना जारी रखूँगी, बिना इस बात को तवज्जो दिए कि आगे क्या होगा।”

इसी बीच इदुक्की ज़िले की सीपीएम इकाई ने कहा है कि वो विधायक से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगेगी।

सिर्फ़ 1 मंत्री के साथ 2 महीनों से सरकार चला रहे KCR, मीडिया चुप

आपको यह सुन कर आश्चर्य हो सकता है लेकिन यही सच है। तेलंगाना सरकार की कैबिनेट में सिर्फ़ दो मंत्री हैं- एक तो स्वयं मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव और दूसरे मोहम्मद अली। मोहम्मद अली राज्य के गृह मंत्री के तौर पर कार्य कर रहे हैं। बता दें कि 119 सीटों वाले तेलंगाना विधानसभा में बहुमत के लिए 60 सीटों पर जीत चाहिए होती है लेकिन केसीआर की पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति ने 88 सीटों पर जीत का परचम लहरा कर एकतरफा जीत दर्ज की थी।

विपक्ष ने दो सदस्यीय कैबिनेट के साथ सरकार चला रहे केसीआर पर निशाना साधा है। भाजपा ने कहा की यह भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक नया रिकॉर्ड है जब सरकार गठन के 2 महीने बाद तक मंत्रिमंडल में सिर्फ़ 2 ही मंत्री हों। पार्टी ने इसे शर्म का विषय बताते हुए राज्यपाल का दरवाज़ा खटखटाने की बात भी कही। तेलंगाना भाजपा प्रवक्ता कृष्णा सागर राव ने मुख्यमंत्री को आड़े हाथों लेते हुए कहा:

“कोई कैबिनेट नहीं है, अधिकारी सरकार चला रहे हैं। यह एक या दो दिनों की .. चार दिनों की देरी नहीं है, केसीआर (मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव) के पदभार ग्रहण करने के बाद से यह दूसरा महीना चल रहा है।”


वहीं आम आदमी पार्टी ने भी तेलंगाना राष्ट्र समिति व मुख्यमंत्री केसीआर पर निशाना साधते हुए कहा कि राज्य सरकार ने कैबिनेट विस्तार न कर के जनता के ‘गवर्नेंस के अधिकार’ को छीन लिया है। बता दें कि ऐसे क़यास लगाए जा रहे थे कि पोंगल के बाद राज्य में कैबिनेट विस्तार किया जाएगा लेकिन त्यौहार बीत जाने के बाद भी ऐसे कोई आसार नज़र नहीं आ रहे। मीडिया में प्रकाशित ख़बरों के अनुसार केसीआर सारे अहम विभाग अपने पास ही रखना चाहते हैं और यही कैबिनेट विस्तार में देरी का कारण भी है।

तेलंगाना मंत्रिमंडल में अधिकतम 18 मंत्री हो सकते हैं। बताया जा रहा है कि तमाम समीक्षा बैठकें मुख्यमंत्री के आवास पर ही होती है जहाँ से फ़ाइलों को आगे बढ़ाया जाता है। इस बैठक में अधिकारीगण शामिल होते हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी ने भी मुख्यमंत्री की आलोचना करते हुए पूछा कि दो सदस्यीय मंत्रिमंडल के साथ जनता तक कल्याणकारी योजनाएँ कैसे पहुँचाई जा सकती है? तेलंगाना प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष गुडुर नारायण रेड्डी ने कहा:

“लगभग 17,000 फाइलें उनके (केसीआर के) डेस्क पर पड़ी हुई हैं? वह राज्य के चार करोड़ लोगों के साथ न्याय कैसे कर सकते हैं? जनता निश्चित रूप से तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के सदस्यों के मौन को समझ रही है, जो इतने चुप हैं। तेलंगाना अब भारत का एक राज्य नहीं है। यह मुख्यमंत्री राव का साम्राज्य बन गया है।”

सोशल मीडिया पर लोगों ने मीडिया पर इस ख़बर को नज़रअंदाज़ करने के आरोप लगाए। लोगों ने कहा कि सिर्फ़ एक अतिरिक्त मंत्री के साथ तेलंगाना की सरकार चला रहे केसीआर तीसरे मोर्चे के गठन में व्यस्त हैं। ज्ञात हो कि हाल ही में केसीआर ने ममता बनर्जी और नवीन पटनायक से मुलाक़ात कर तीसरे मोर्चे की संभावनाओं पर विचार-विमर्श किया था। ख़बरें थीं कि अपने मैराथन दौरे के लिए उन्होंने एक स्पेशल हेलिकॉप्टर को एक महीने के लिए किराए पर ले रखा है। कॉन्ग्रेस ने उन पर ‘अलगाव की राजनीति’ करने का आरोप लगाया था।

BIGG BREAKINGG: प्रियंका को UP में घुसने पर रोक, लोकतंत्र भयंकर ख़तरे में!

योगी आदित्यनाथ ने बंगाल का बदला उत्तर प्रदेश में ले लिया। हालाँकि राजनीति बदले की भावना से नहीं करनी चाहिए लेकिन उन्होंने बिना किसी झूठ का सहारा लिए ही यह कर डाला। उत्तर प्रदेश का ’10जनपथवाँ’ संविधान संसोधन कर उन्होंने यह काम पूरा किया।

इस घटना के बाद राज्य के साथ-साथ दिल्ली का भी सियासी पारा गरमा गया है। जंतर-मंतर के बजाय ‘महाठगबंधन’ के नेता लोग क़ुतुब मीनार की ओर रवाना हो गए हैं। रास्ते में जब हमारे संवाददाता ने धरना स्थल को लेकर सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि बीजेपी को ज़मीनी बातें पसंद नहीं, इसीलिए वे लोग ‘आसमानी’ बातें करेंगे।

मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली की सरकार ने हाँफते-‘खाँसते’ हुए इसे विपक्षी साज़िश बताया और नगर-निगम वालों को जमकर कोसा। हालाँकि अफ़सरों के तब हाथ-पाँव फूल गए जब उन्हें सीसीटीवी कैमरे से यह पता चला कि ख़ुद उनके मुख्यमंत्री साब भी काम-धाम छोड़कर क़ुतुब की ओर बढ़ रहे हैं। खैर, अफ़सरों को यह पहले ही समझ जाना चाहिए था क्योंकि “कोई भी धरना छोटा नहीं होता और धरने से बड़ा कोई धर्म नहीं” यह आसमानी बात स्वयं अवतरित चचा केजरी ने दिल्ली-शासन की किताब के पहले पन्ने पर लिख डाली है।

राजनीतिक गहमागहमी में बीजेपी ने धरना करने वालों का बख़ूबी साथ दिया। उम्मीद के विपरीत। गाँधीवादी स्वभाव में। इस बाबत बीजेपी की मेहरौली इकाई ने शानदार काम किया है। क़ुतुब तक के पूरे रास्ते में चाय-पानी की व्यवस्था कर रखी है उन्होंने। रास्तों को फूलों से पाट दिया गया है। फूल सिर्फ़ पैरों के नीचे हो, और इस पर ‘फूलाधिकार’ आयोग कमीशन में कोई शिक़ायत न पहुँच जाए, इसलिए खुद पुलिस कमीश्नर हेलिकॉप्टर से फूल बरसा भी रहे हैं।

भारतीय राजनीतिक इतिहास में ऐसा नज़ारा शायद अब तक कभी नहीं दिखा। विपक्ष की रैली का सत्ता पक्ष फूलों से स्वागत करे… गाँधीवाद का ऐसा प्रयोग दक्षिण अफ्रीका में भी नहीं हुआ था। योगी आदित्यनाथ के ‘राजनीतिक बदले की भावना’ को दिल्ली बीजेपी ने राजनीतिक अवसर में बदल दिया। बीजेपी की मेहरौली इकाई ने तो ख़ैर लहरिया ही लूट लिया।

इसी बीच ख़बर यह भी आ रही है कि बहन प्रियंका का साथ देने राहुल भी लखनऊ जाने वाले थे। ट्वीट भी कर दिया। लेकिन योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ चलने वाले हमारे संवाददाता (चूँकि हम ‘राइट’ हैं तो यह हमारे लिए ‘लेफ़्ट’ हाथ का खेल है) ने बताया कि यूपी सीएम ‘बसंत आगमन पर पूरे रंग में’ हैं। दिल्ली-यूपी बॉर्डर के (i) सड़क मार्ग पर उन्होंने अलीगढ़ रोडवेज़ की बसें लगा दी हैं (ii) वायु मार्ग पर राफ़ेल (मोदी से पहले यूपी सरकार ने किया सौदा – मोदी-विरोध में अंधी विपक्ष ने इस ख़बर पर ध्यान ही नहीं दिया) तैनात कर दिया है (iii) यमुना जल मार्ग पर यूएस नेवी के एयर क्राफ्ट कैरियर जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश की तैनाती भी हो गई है। ‘सूत्रों’ ने यह भी बताया कि परम आदरणीय दक्षिण पंथी डोनल्ड ट्रंप ने ख़ुद ही योगी के समर्पण में यह फै़सला लिया है।

इतना सब होने के बाद राहुल और प्रियंका की प्रतिक्रिया आनी बाक़ी है। एक तरफ़ जहाँ उनके ‘ठग-बंधु-बंधुनी’ लोग क़ुतुब पर चढ़ने को बेताब हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह देखना दिलचस्प होगा कि सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े सूबे के लिए क्या राहुल या प्रियंका राफ़ेल पर ‘बोफ़ोर्स’ से हमला करेंगे या क़ुतुब पर चढ़ ‘आसमानी’ बातें करेंगे?

पढ़ते रहिए सिर्फ़ इसी पोर्टल को क्योंकि हमारी पहुँच ‘राइट’ है। लेफ्ट को तो ख़ैर आपने भी ‘लेफ्टिया’ दिया है… हे!हे!हे!

₹125 नहीं, ₹350 होगी हर दिन कमाई: आदिवासी महिलाओं के लिए वरदान होगी यह सिल्क मशीन

केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने शनिवार (9 फ़रवरी 2019) को आदिवासी महिलाओं को बुनियाद तसर सिल्क रीलिंग मशीनें वितरित की। बुनियाद रीलिंग मशीनें सिल्क उत्पादन में देश की आदिवासी महिलाओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पारम्परिक तरीकों को बदल कर उन्हें ज्यादा सक्षम बनाने के लिए हैं। साथ ही इससे घरेलू आय को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।

भारत में प्रतिवर्ष 32,000 मीट्रिक टन रेशम का उत्पादन होता है। शहतूत सिल्क, तसर सिल्क, मुगा सिल्क और एरी सिल्क भारत में उत्पादित सिल्क के मुख्य प्रकार हैं। कुल सिल्क उत्पादन में शहतूत का योगदान लगभग 80% है।

भारत में तसर सिल्क उत्पादन मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, उड़ीसा आदि राज्यों में होता है। इन राज्यों में रहने वाली आदिवासी महिलाओं की आय का यह एक प्रमुख स्रोत है। भारत प्रति वर्ष 2,080 मीट्रिक टन तसर सिल्क का उत्पादन करता है, जो कुल सिल्क उत्पादन का लगभग 6.5% है।

तसर सिल्क रीलिंग एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें कोकून से रेशा निकाला जाता है। परम्परागत रूप से, यार्न रीलिंग पारम्परिक तरीक़ों द्वारा निकाला जाता है, जिसे थाई रीलिंग कहते हैं। इसमें, रील करने वाले व्यक्ति को फ़र्श पर क्रॉस-लेग्ड बैठना पड़ता है, सोडियम कार्बोनेट में पकाए गए कोकून से जांघों को नुक़सान होता है, जिससे घाव भी हो जाते हैं। बता दें कि इस दौरान कुछ मात्रा में राख पाउडर, तेल और स्टार्च का भी उपयोग किया जाता है।

इस प्रक्रिया के माध्यम से, आदिवासी महिलाएँ 70 डेनियर यार्न का प्रतिदिन औसतन 70 ग्राम उत्पादन करती हैं। तसर सिल्क का ज्यादातर उत्पादन थाई रीलिंग के माध्यम से किया जाता है। यह प्रक्रिया न केवल आदिवासी महिलाओं के लिए हानिकारक होती है, बल्कि इस पारंपरिक तरीक़े से निकाले गए यार्न की प्रक्रिया धीमी भी होती है। दूसरी बात यह कि थाई रीलिंग करने वाली महिलाएँ दिन भर में मात्र 125 रुपए तक ही कमा पाती हैं।

महिलाओं की इसी तक़लीफ़ को समझते हुए छत्तीसगढ़ स्थित चंपा के एक उद्यमी ने उनके लिए एक अनोखा काम किया। महिलाओं को पुराने तरीक़े से निजात दिलाने के लिए उन्होंने एक ऐसी मशीन का निर्माण किया, जो न केवल आदिवासी महिलाओं को उनकी आय बढ़ाने में मददगार साबित होगा बल्कि इस व्यवसाय से जुड़े स्वास्थ्य संबंधी ख़तरों से भी बचाएगा। उद्यमी द्वारा बनाई गई बुनियाद रीलिंग मशीन के माध्यम से एक महिला प्रतिदिन 200 ग्राम सिल्क के धागे का उत्पादन कर सकती है, जिससे उसकी आय प्रतिदिन 350 रुपए तक बढ़ सकती है। निर्माता की इच्छानुसार मशीन को बिजली द्वारा या पैरों से चलाया जा सकता है।

कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी ने उम्मीद जताई है कि थाई रीलिंग तक़नीक से मशीन आधारित रीलिंग को 2020 की बजाए इसी वर्ष परिवर्तित किया जाएगा। कार्यक्रम में एक मोबाइल एप्लिकेशन ई-कोकून भी लॉन्च किया गया, जो रेशम क्षेत्र में गुणवत्ता प्रमाणन में मदद करेगा। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी वैश्विक बाज़ारों में सिल्क को बढ़ावा देने के लिए समर्थन देने का वादा किया।