Home Blog Page 6089

24 जनवरी: ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ बस एक दिन नहीं, हमारी सामाजिक सच्चाई का आईना है

24 जनवरी, हमारे देश में ‘नेशनल गर्ल चाइल्ड डे’ (राष्ट्रीय बालिका दिवस) के रूप में जाना जाता है। इस दिन को देश भर में अधिकांश बालिकाओं के साथ हो रही असमानता, भेद-भाव आदि पर प्रकाश डालने के लिए मनाया जाता है। साल 2008 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा इस दिन को मनाने की शुरूआत की गई थी। इस दिन को विशेष रूप से मनाने का यह भी उद्देश्य था कि लड़कियों की पढ़ाई, पोषण, कानूनी अधिकारों, चिकित्सा सेवा, महिला सुरक्षा जैसी ज़रूरी चीज़ों पर बात की जा सके।

आज इस दिन के उपलक्ष्य में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा नई दिल्ली, चाणक्यपुरी स्थित प्रवासी भारतीय केंद्र में समारोह भी आयोजित किया जा रहा है। इस समारोह में हाल ही में शुरू हुए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की वर्षगाँठ को मनाते हुए भी बात होगी। साल 2019 में इस समारोह का विषय “उज्ज्वल कल के लिए लड़कियों का सशक्तिकरण” है। इसका समारोह का मक़सद बाल लिंग अनुपात के बारे में जागरूकता पैदा करना है। इस पूरे समारोह की मुख्य अतिथि मेनका गाँधी होंगी।

हमारे समाज में इस दिन को मनाने का विशेष महत्व इसलिए भी होना चाहिए, क्योंकि अधिकांश बच्चियों और महिलाओं की स्थिति देश में ठीक उसी तरह है जैसे गरीबों और असहायों की। देश में बालिकाओं के लिए चलाए जाने वाले अभियान इस बात को स्पष्ट करते हैं कि चाहे लोग कितना ही आगे बढ़ जाएँ लेकिन सोच उनकी कुंठित ही है। राजनैतिक स्तर पर सरकार बच्चियों और महिलाओं के लिए योजनाओं को लागू करके, कानून बनाके, सुविधाएँ देकर, अभियान चलाकर अपना काम कर रही है, लेकिन उनकी स्थिति को सुधारने के लिए हमे सामाजिक स्तर पर कार्य करने की बेहद आवश्यकता है।

आज से कुछ समय पहले की बात करें चाहे आज की, शायद ही देश में कुछ एक अस्पताल ऐसे हों जहाँ के कूड़ेदान में कभी कोई नवजात बच्ची पड़ी न पाई गई हो। घर से लेकर सड़क तक, मार्केट से लेकर सुपर बाज़ार तक, स्कूल से लेकर दफ़्तर तक बालिकाओं और महिलाओं का शोषण किसी न किसी रूप में किया जाता रहा है। हाल ही में सोशल मीडिया पर ट्रेंड में रहा #MeToo अभियान इन्हीं सब घटनाओं का परिणाम था।

साल 2018 में मी_टू के तूल पकड़ने के बाद एक ऑनलाइन सर्वे कराया गया, जिसमें जो नतीज़े निकलकर आए वो बेहद हैरान करने वाले हैं। इस सर्वे में पाया गया कि करीब 81 प्रतिशत महिलाएँ अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी न कभी यौन शोषण का शिकार हुई हैं। इनमें 77 प्रतिशत महिलाओं ने वर्बल सेक्शुअल हैरस्मेंट (भद्दी गली, छींटाकशी, सीटी मारना, अश्लील कमेंट करना) का सामना किया। 51 प्रतिशत महिलाओं का कहना रहा कि उन्हें बिना उनकी मर्ज़ी के हाथ लगाया गया। 41 प्रतिशत ने बताया कि वो ऑनलाइन यौन शोषण का शिकार हुई हैं।

इस रिपोर्ट में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया था कि अधिकतर महिलाओं को कहाँ पर शोषण होता महसूस हुआ। एक तरफ़ जहाँ 66% महिलाओं ने उत्तर में सार्वजनिक जगहों का नाम लिया वहीं पर 38% ने अपने दफ्तरों में ये अनुभव किया। इसके अलावा 35% महिलाओं का जवाब उनका अपना घर रहा।

साल 2014 में अपने साक्षात्कार में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने अपने 100 दिन के कार्यकाल को पूरा करते हुए इस बात की जानकारी दी थी कि देश में हर दिन 2,000 लड़कियों को पैदा होने से पहले या तुरंत बाद मार दिया जाता है।

हमारे देश में जहाँ पर पितृसत्ता की जकड़ इतनी कसी हुई हो, कि एक औरत ही लड़की की दुश्मन बनती जा रही है। ऐसे में हम अंदाजा लगा सकते हैं कि हमें नेशनल गर्ल चाइल्ड डे को मनाने की कितनी ज़रूरत है, लड़कियों के अधिकारों पर आवाज़ उठाने की कितनी ज़रूरत है। जहाँ लड़की के पैदा होने से पहले ही उसकी शादी के दहेज की चिंता सर पर भार बन जाए वहाँ पर समझा जा सकता है ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के क्या महत्व होंगे।

मिड डे मील से लेकर लाडली योजना तक के पीछे का उद्देश्य सिर्फ यही रहा है कि लड़की को पढ़ाना और बढ़ाना घर के लोगों पर बोझ न बने। साल 2011 में आई ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में छपी ‘लैंसेट’ में पाया गया कि करीब 1.2 करोड़ भारतीय लड़कियाँ 1981 से अब तक पेट से ही गिराई जा चुकी हैं। 1981 में एक तरफ जहाँ 1000 लड़कों के मुकाबले 962 लड़कियाँ थी, वहीं 2011 के आते-आते ये अनुपात और भी बिगड़ गया, जिसमें लड़कियों की संख्या 918 ही रह गई।

समाज में पिछड़े हुए समाज पर न बात करते हुए अगर राज्य में मंत्री पद पर आसित व्यक्ति (सोमनाथ भारती, आप नेता) के बारे में ही यदि बात करें तो उनकी पत्नी भी घरेलू हिंसा की शिकार हुई हैं।

उपयुक्त लिखी सभी बातें मात्र ख़बरों का या फिर जानकारी का हिस्सा नहीं हैं, निबंध लिखने के लिए लिंग अनुपात के आँकड़े शायद हमें कहीं से भी मिल जाएँगे लेकिन अपने भीतर और आस-पास के माहौल में जागरूकता फैलाने का कार्य हमें स्वयं ही करना है। ये ऑनलाइन सर्वे, ये आँकड़े सिर्फ उन महिलाओं की दशा इंगित करते हैं जो खुलकर इन विषयों पर बात करती हैं या फिर अपने ख़िलाफ़ हो रहे अन्यायों को शिकायत के रूप में दर्ज़ कराती हैं।

इन सबके अलावा हमारे समाज में वो औरतें, वो लड़कियाँ भी शामिल हैं जो न ही कुछ बोलती है और न ही उनपर होते अत्याचार थमने का नाम ले रहे हैं। ऐसे में सरकार द्वारा चलाए गए अभियान और शुरू की गई योजनाएँ तब तक व्यर्थ हैं, जबतक हम खुद महिलाओं की स्थिति को सुधारने का बीड़ा नहीं उठाएँगे। देश की हर महिला को और हर व्यक्ति को इस बात की जानकारी होने बेहद आवश्यक है कि न केवल 24 जनवरी के दिन बल्कि हर दिन एक लड़की के भविष्य को सुधारने पर बात की जानी चाहिए।

26 जनवरी को न बाहर निकलें, न करें सफ़र: दारुल उलूम

गणतंत्र दिवस को देखते हुए देश में चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। हर सार्वजनकि स्थल पर सुरक्षा बलों द्वारा जाँच की जा रही है। इसी बीच उत्तर प्रदेश से आई एक ख़बर। चौंकाने वाली ख़बर। इस्लामिक शिक्षण संस्थान दारुल उलूम देवबंद ने अपने छात्रों को 26 जनवरी को कहीं भी बाहर न निकलने की हिदायत दी है।

दारुल उलूम के छात्रावास प्रभारी द्वारा यह हिदायत जारी किया गया है। इस हिदायत में उन्होंने कहा कि 26 जनवरी के मौके पर तिरंगा फहराने के बाद सभी छात्र अपने छात्रावास में वापस आ जाएँ। उस हिदायत में यह भी कहा गया है कि छात्र गणतंत्र दिवस के दिन ट्रेनों में सफ़र न करें।

26 जनवरी के संबंध में दारुल उलूम की हिदायत

दारुल उलूम के मुफ़्ती असद कासमी का कहना है कि गणतंत्र दिवस के दिन कुछ छात्र अपने दोस्तों के साथ इधर-उधर घूमने निकल जाते हैं। ऐसे में वो किसी विवादित स्थिति में न फंस जाए या उनका उत्पीड़न न हो जाए, इसी कारण से देवबंद ने उन सभी को सख़्ती से हिदायत दी है कि 26 जनवरी को कहीं पर भी न आएँ-जाएँ।

हिदायत में हालाँकि यह स्पष्ट किया गया कि अगर किसी को इस दिन बाहर जाने की बहुत जरूरत पड़ जाती है तो सफ़र करके वह तुरंत दारुल उलूम देवबंद का रुख़ करे। तर्क (अटपटा सा) देते हुए इसमें कहा गया है कि 26 जनवरी को हर जगह जाँच-पड़ताल होती है, इससे किसी को बिना वज़ह के परेशानी उठानी पड़ती है। इस कारण डर और ख़ौफ का माहौल पैदा होता है।

दारुल उलूम ने अपनी हिदायत में छात्रों से अपील की है कि अगर कोई इस दिन सफ़र करता है तो किसी भी प्रकार की बहसों में न पड़े और सब्र से काम लें।

AMU: तिरंगा यात्रा निकालने और ‘वन्दे मातरम’ के नारे पर छात्रों को नोटिस

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के प्रॉक्टर ने तिरंगा यात्रा निकालने और वन्दे मातरम का नारा लगाने पर 6 छात्रों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। जिन छात्रों को नोटिस जारी किया गया है, उनमें छात्र नेता ठाकुर अजय सिंह और सोनवीर शामिल हैं। तिरंगा यात्रा का नेतृत्व करने वाले अजय बरौली के भाजपा विधायक ठाकुर दलवीर सिंह के पौत्र हैं। AMU ने छात्रों पर निम्न गंभीर आरोप लगाए हैं-

  • बिना अनुमति यात्रा निकालना
  • यूनिवर्सिटी कैंपस में शैक्षणिक माहौल को ख़राब करना
  • क्लास में पढ़ रहे छात्रों को बहका कर रैली में ले जाना
  • यात्रा में असामाजिक तत्वों का शामिल होना
  • AMU को बदनाम करना, और
  • छात्रों के बीच भय का माहौल पैदा करना
AMU द्वारा छात्रों को थमाई गई नोटिस की कॉपी।

नोटिस मिलने के बाद छात्रों ने प्रॉक्टर मोहसिन ख़ान की तुलना जालियाँवाला बाग़ सामूहिक हत्याकांड को अंजाम देने वाले अंग्रेज अधिकारी जनरल डायर से की है। छात्रों ने कहा कि देशभक्ति के नारे लगाने और तिरंगा लहराने के लिए आज़ाद भारत में कहीं भी अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। उन्होंने AMU में हुई इन घटनाओं का जिक्र कर प्रॉक्टर को घेरा-

  • आतंकी बशीर वानी के भारतीय सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मारे जाने के बाद छात्रों ने उसके समर्थन में आज़ादी वाले नारे लगाए।
  • कैंपस में सामान्य वर्ग को आरक्षण देने सम्बन्धी बिल की कॉपी को जलाया गया।
  • जातिगत संघर्ष को बढ़ावा देने वाले सेमिनार आयोजित किए गए।

छात्रों ने कहा कि जब ये सब घटनाएँ होती हैं, तब प्रॉक्टर के कान में जूँ तक नहीं रेंगती लेकिन राष्ट्रवादी नारों से उन्हें बहुत तकलीफ़ होती है।

बता दें कि यूनिवर्सिटी कैंपस में इंजीनियरिंग फैकल्टी से लेकर बाबे सय्यद तक छात्रों ने बाइक रैली निकाली थी, जिसमें उन्होंने ‘वन्दे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए थे। इस रैली में छात्रों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। साथ ही उन्होंने अन्य छात्रों से शहीद भारतीय जवानों के परिवारों को आर्थिक मदद देने की अपील भी की थी। रैली के बारे में अधिक जानकारी देते हुए उस वक्त छात्र नेता अजय ठाकुर ने कहा था:

“तिरंगा यात्रा को सबका समर्थन मिलना चाहिए। हमको याद रखना होगा कि हम अपने घर व गांवों में सुरक्षित हैं। हमारे ही भाई सीमा पर शून्य डिग्री तापमान में अपनी हड्डियां गला रहे हैं… उनको हौसला देने के लिए ये तिरंगा शान से लहराता दिखना चाहिए। उनकी कुर्बानियों के सम्मान में ये तिरंगे लहरते रहने चाहिए। क्यूंकि इन तिरंगों की शान के लिए ही वो अपनी जान की बाजी लगाते हैं।”

AMU के प्रॉक्टर प्रोफ़ेसर एम मोहसिन खान ने रैली निकलने के तुरंत बाद कहा कि इस रैली के लिए विश्वविद्यालय प्रसाशन से अनुमति नहीं ली गई थी और छात्रों को नोटिस भेजा जाएगा। और अंततः यही हुआ। छात्रों को ‘कारण बताओ नोटिस’ थमा दिया गया। रैली के वक्त ही अजय ने यह साफ़ कर दिया था कि यह कोई राजनीतिक रैली नहीं है।

भारतीय जनता पार्टी ने भी AMU के नोटिस का विरोध किया है। भाजयुमो के मीडिया प्रभारी प्रतीक चौहान ने पूछा कि ऐसा कर के प्रॉक्टर देश को क्या सन्देश देना चाहते हैं? उन्होंने यात्रा की अनुमति न दिए जाने को लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ बताते हुए कहा कि यात्रा का मक़सद वीर ऐप के जरिए शहीदों के लिए आर्थिक मदद इकट्ठा करना था।

ICICI बैंक की पूर्व CEO चंदा कोचर के ठिकानों पर CBI की छापेमारी

ICICI बैंक की पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) और चीफ़ एग्जीक्यूटिव अफसर (CEO) चंदा कोचर से सम्बंधित चार ठिकानों पर CBI ने छापेमारी की है। बताया जा रहा है कि FIR दर्ज़ करने के बाद जाँच एजेंसी ने गुरुवार (जनवरी 24, 2019) की सुबह महाराष्ट्र में चार जगहों पर छापेमारी की। ख़बरों के अनुसार मुंबई और औरंगाबाद में चली इस छापेमारी में औरंगाबाद स्थित वीडियोकॉन ऑफिस की भी छानबीन की गई। नरीमन पॉइंट में वीडियोकॉन का मुख्यालय है।

चंदा कोचर 2016 में फ़ोर्ब्स पत्रिका की ‘एशिया की 10 सबसे शक्तिशाली बिज़नेस-वूमन’ की लिस्ट में शामिल रही थीं। उन पर आरोप है कि उन्होंने एक नई कम्पनी बना कर फर्जीवाड़ा किया। उनके पति दीपक कोचर ने वीडियोकॉन समूह के मालिक वेणुगोपाल धूत के साथ मिलकर दिसंबर 2008 में एक कंपनी बनाई थी और फिर ₹65 करोड़ की कम्पनी को ₹9 लाख में बेच दिया। इस कंपनी को ₹64 करोड़ का लोन भी दिया गया था।

बाद में इस कंपनी को दीपक कोचर के ट्रस्ट को सौंप दिया गया था। वीडियोकॉन ग्रुप को ICICI बैंक ने ₹3,250 करोड़ का लोन दिया था, जिसके कुछ महीनों बाद दीपक कोचर के हाथ में नई कम्पनी की कमान दे दी गई थी। इन लोन की कुल 86% राशि (₹2,810 करोड़) जमा नहीं कराई गई, जिसे NPA घोषित कर दिया गया। CBI इस मामले की जाँच कर रही है।

कश्मीर के पत्थरबाज़ों को चिन्हित करने में IIT मद्रास करेगा सेना की मदद

जब भीड़ कहीं एकत्रित होती है तब उसकी कार्यशैली का कोई फिक्स पैटर्न नहीं होता। कोई यह नहीं बता सकता कि भीड़ का अमुक व्यक्ति किस समय क्या करेगा। भीड़ की प्रतिक्रिया एकदम रैंडम होती है वैसे ही जैसे पदार्थ के कुछ कणों का व्यवहार अप्रत्याशित होता है जिसे ‘ब्राउनियन मोशन’ कहा जाता है। हालाँकि पदार्थ के कणों के रैंडम व्यवहार को मापने के लिए गणित का सहारा लिया जाता रहा है लेकिन मनुष्यों की भीड़ कब क्या करेगी इसकी भविष्यवाणी करना कठिन है।

युद्ध में किसकी सेना का पलड़ा भारी होगा यह गेम थ्योरी बता सकती है। बैक्टीरिया की संख्या कब और कितनी तेज़ी से बढ़ेगी यह सांख्यिकीय विश्लेषण से ज्ञात किया जा सकता है। लेकिन किसी समूह में जब एक से अधिक चीजें अप्रत्याशित व्यवहार करती हैं तब उनका सामूहिक व्यवहार कैसा होगा यह पता लगाना कठिन है वह भी तब जब समूह की प्रत्येक इकाई को मानव मस्तिष्क नियंत्रित कर रहा हो।

गत कुछ दशकों में विकसित हुई कंप्यूटर विज्ञान की शाखा ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ में इतनी प्रगति हुई है कि अब भीड़ जैसे सिस्टम के व्यवहार की भविष्यवाणी भी की जा सकती है। आईआईटी मद्रास के विद्यार्थियों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे कश्मीर में पत्थरबाज़ों की भीड़ के व्यवहार का अध्ययन किया जा सकता है और उससे बचने के उपाय खोजे जा सकते हैं।  

आईआईटी मद्रास में सेंटर फॉर इनोवेशन के स्टूडेंट एग्जीक्यूटिव हेड राघव वैद्यनाथन के अनुसार ‘एक्शन रिकग्निशन एल्गोरिदम’, ‘क्राउड डेंसिटी मैप’ और सीसीटीवी द्वारा प्राप्त लाइव इमेज को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक से जोड़ कर कश्मीर में पत्थरबाजी के दौरान होने वाली अप्रत्याशित घटनाओं का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और उन घटनाओं से निजात पाने के उपाय थलसेना द्वारा पहले से किए जा सकते हैं।

‘एक्शन रिकग्निशन एल्गोरिदम’ एक प्रकार का एल्गोरिदम है जो मनुष्य की हरकतों का संज्ञान लेने के लिए प्रयोग किया जाता है। ‘क्राउड डेंसिटी मैप’ से भीड़ का घनत्व अथवा आकार मापा जा सकता है। सीसीटीवी फुटेज से पत्थरबाजों की सटीक पहचान की जा सकती है। इन तीनों के मेल से यह बताया जा सकता है कि अमुक पत्थरबाज यदि दोबारा दिखाई दे तो वह कैसी प्रतिक्रिया कर सकता है।

आईआईटी मद्रास के चार विद्यार्थियों ने नई दिल्ली में आयोजित हुए आर्मी टेक्नोलॉजी सेमिनार-2019 (ARTECH) में भाग लेते हुए इस खोज के बारे में बताया जिसपर थलसेना के उच्च अधिकारियों द्वारा सकारात्मक प्रतिक्रिया आई। थलेसना का विभाग ‘आर्मी डिज़ाइन ब्यूरो’ इस प्रकार के सेमिनार करवाता रहता है जिससे सेना और तकनीकी संस्थानों के बीच विचारों का आदान प्रदान होता रहे।  

एक प्रश्न यह भी है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक आतंकवाद और पत्थरबाजी जैसी घटनाओं को रोकने में वास्तव में कारगर सिद्ध होगी। यहाँ बताते चलें कि आधुनिक तकनीक जैसे बिग डेटा एनालिटिक्स की सहायता से आतंकवादी घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने के प्रयास पहले भी किये जा चुके हैं।

मेरीलैंड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वी एस सुब्रमण्यन ने ऐसी एल्गोरिदम की खोज की है जिससे उन्होंने इंडियन मुजाहिदीन और लश्कर ए तय्यबा जैसे संगठनों की हरकतों की भविष्यवाणी की थी। वे इसे SOMA और Temporal Probabilistic Rules कहते हैं। इनकी सहायता से प्रोफेसर सुब्रमण्यन ने 2013 में नरेंद्र मोदी की पटना रैली में हुए बम धमाकों की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी।

यदि इस विषय पर निरंतर शोध होता रहा तो आईआईटी मद्रास के विद्यार्थियों द्वारा किया गया प्रयास भविष्य में सफल हो सकता है और थलसेना उनके द्वारा विकसित की गई तकनीक को अपना सकती है। यह इस पर निर्भर करेगा कि रियल टाइम सिचुएशन में आईआईटी के विद्यार्थियों द्वारा बनाया गया एल्गोरिदम कितने सटीक परिणाम दे पाता है। थलसेना द्वारा तकनीकी संस्थानों के विद्यार्थियों के साथ ARTECH जैसे संवाद और प्रोत्साहन भविष्य में निश्चित ही फलदायी होंगे।

वेतन मौलवियों को और PM ‘किसी’ को… हद कर दी ‘सड़’ने!

अरविन्द केजरीवाल ने मोदी-शाह की जोड़ी को रोकने के लिए ‘किसी भी हद’ तक जाने की बात कही है। उनकी हद कहाँ शुरू होती है और कहाँ ख़त्म, इस पर चर्चा जरूरी है लेकिन सबसे पहले उनके बयान के परिपेक्ष्य और बैकग्राउंड को समझने की जरूरत है।

सेक्युलर वातावरण में दिया गया बयान

अरविन्द केजरीवाल ने एक चौंकाने वाला बयान दिया है। यह बयान ऐसी परिस्थिति में दिया गया है, ताकि यह एकदम सेक्युलर लगे और मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा सवाल ही न पूछे जा सके। मौका था- दिल्ली के मौलवियों को सम्बोधित करने का। जिस कार्यक्रम स्थल पर उन्होंने यह बड़ा बयान दिया, उसका नाम था- ऐवान-ए-ग़ालिब। सब कुछ लग रहा है न सेक्युलर-सेक्युलर सा। और तो और, अरविन्द केजरीवाल ने यहाँ जो घोषणाएँ कीं, वो भी इतनी सेक्युलर थीं कि कोई इस पर सवाल खड़ा करने से पहले हज़ार बार सोचे।

दरअसल, इस कार्यक्रम में केजरीवाल ने दिल्ली की क़रीब 200 मस्ज़िदों के मौलवियों के वेतन में भारी बढ़ोतरी की और 1500 अन्य मस्जिदों के कर्मचारियों को भी वेतन देने की घोषणा की। इस पर अलग से सवाल खड़ा किया जा सकता है कि दिल्ली के इमाम, मुअज़्ज़िन व मस्ज़िद के अन्य कर्मचारी जनता की कौन सी ऐसी सेवा कर रहे हैं, जिसके कारण केजरीवाल उन पर सरकारी ख़ज़ाना लुटाने को तैयार बैठे हैं। इस बात पर भी बहस की जा सकती है कि मस्जिदों पर सरकारी रुपयों के वारे-न्यारे करने वाली AAP सरकार पुजारियों को कितने भत्ते दे रही है।

मज़बूरी में व्यक्तिगत राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पर ब्रेक?

लेकिन यहाँ हम केजरीवाल के उस बयान की चर्चा करेंगे, जिस में उन्होंने मोदी-शाह के ख़िलाफ़ किसी भी हद तक जाने की बात कही है। मौलवियों को सम्बोधित करते हुए अरविन्द केजरीवाल ने कहा:

“अभी तो यह किसी को पता नहीं है कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा, लेकिन मोदी-शाह को नहीं बनने देंगे। इसके लिए मैं किसी भी हद तक जाने को तैयार हूँ। इसके अलावा, जो भी बन रहा होगा उसको समर्थन दे देंगे। कांग्रेस अगर जीतती है तो उसको भी समर्थन देने को तैयार हैं।”

केजरीवाल के इस बयान के जो मायने निकल कर आ रहे हैं, वो राजनीतिक पंडितों की समझ से परे नहीं हैं, लेकिन इस पर मेनस्ट्रीम मीडिया में ज़्यादा विश्लेषण नहीं किया जाएगा। ऐसा इसीलिए, क्योंकि इस बयान के साथ ही अरविन्द केजरीवाल ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि वो प्रधानमंत्री की रेस में नहीं हैं। ये उन पत्रकारों और मीडिया हाउसेज के लिए शॉकिंग है, जिन्होंने केजरीवाल को पीएम मटेरियल बता-बता कर हमारा कान ख़राब कर दिया था।

सबसे पहले तो इस बात पर चर्चा करते हैं कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा? अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि यह किसी को पता नहीं है कि पीएम कौन बनेगा? महागठबंधन और कथित तीसरे मोर्चे के नेताओं का भी इस बारे में क़रीबन यही बयान होता है। सभी ये कहते हुए पाए जाते हैं कि पीएम कौन बनेगा, यह ‘जनता’ तय करेगी। उन्हें पता होना चाहिए कि आज़ादी के बाद 70 सालों से जनता ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री तय करते आ रही है। राजनीति, वंशवाद और मौक़ापरस्ती की मारी भारतीय लोकतंत्र में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि ही पीएम का चुनाव करते आ रहे हैं।

केजरीवाल का यह कहना उनकी इस मौन स्वीकृति को दिखाता है कि उन्होंने अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पर फ़िलहाल ब्रेक लगा दिया है। उन्होंने ऐसा मज़बूरी में किया है क्योंकि उन्हें अब इस बात का अहसास हो गया है कि AAP के लिए कुछ साल पहले जो वसंती हवा बहाई गई थी, उसने एक ऐसे लू का रूप ले लिया है, जिसमें लोग झुलसना नहीं चाहते। कम से कम केजरीवाल जनता को ये दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वह पीएम की रेस में नहीं हैं और पीएम कोई और ही बनेगा।

आपकी ‘हद’ क्या है केजरीवाल ‘सड़’?

अगर अरविन्द केजरीवाल की ‘हद’ की बात करनी हो तो हमें 2014 के आम चुनाव की एक घटना याद करनी पड़ेगी। उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता और कई अपराधों में जेल की हवा खा रहे मुख़्तार अंसारी का यूपी के कई इलाक़ों के मुस्लिमों में अच्छा-ख़ासा प्रभाव था। कई ख़बरों के अनुसार वाराणसी से मोदी के ख़िलाफ़ ताल ठोक रहे केजरीवाल और उनकी पार्टी AAP ने मुख़्तार को लुभाने की भरपूर कोशिश की थी। उस दौरान केजरीवाल ने कहा था कि वाराणसी से मोदी को हराने के लिए वो किसी का भी समर्थन ले सकते हैं।

ताज़ा बयान इस बात की पुष्टि करते हैं कि केजरीवाल की राजनीति कभी अलग थी ही नहीं। आज से पाँच साल पहले उन्होंने ‘किसी’ से भी समर्थन लेने की बात कही थी, आज वो ‘किसी’ को भी समर्थन देने की बात कह रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो भी पीएम बने, उसे समर्थन दे देंगे। ये इस तरफ इंगित करता है कि केजरीवाल मोदी को रोकने के लिए एक ऐसे मौक़ापरस्त किंगमेकर की भूमिका ढूंढ रहे हैं, जिसकी न कोई राजनीतिक विचारधारा होगी और न कोई नैतिकता।

पहले भी कॉन्ग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार चला चुके केजरीवाल ने कभी अपने बच्चों की कसम खाई थी कि कॉन्ग्रेस का साथ कभी नहीं लेंगे। राजनीतिक मौकापरस्ती के सशक्त हस्ताक्षर बन चुके अरविन्द केजरीवाल ने नैतिकता की सारी हदों को ताक पर रखते हुए ऐसे लोगों के साथ मंच साझा किया, जिन्हें वह गालियाँ देते थकते नहीं थे। जिनका विरोध करते-करते सत्ता की सीढ़ी तक चढ़े, आज उन्हीं के सुर में गा रहे केजरीवाल पर ‘धोबी के कुत्ते’ वाली कहावत भी लागू होती है।

महागठबंधन की रैलियों में उन्हें आमंत्रित तो किया जा रहा है, लेकिन कॉन्ग्रेस या कोई भी पार्टी उनके साथ गठबंधन की इच्छुक नहीं है। उन्हें KCR के प्रयासों द्वारा तैयार किए जा रहे तीसरे मोर्चे की तरफ से भी भाव नहीं दिया जा रहा है। इस परिस्थिति में बौखलाए केजरीवाल को पता है कि मोदी को रोकने के लिए अगर दिल्ली में कोई जोड़-तोड़ वाला प्रधानमंत्री बैठता भी है तो एक-एक सीटों का काफ़ी महत्व होगा। दो-चार सीटों के साथ भी मोलभाव का सपना देख रहे केजरीवाल ने ‘किसी’ को समर्थन देने की बात कह इस बात की आधिकारिक घोषणा कर दी है कि उनकी कोई राजनीतिक विचारधारा है ही नहीं।

जाति-धर्म के दलदल में और गहरे उतरने की तैयारी

केजरीवाल ने मुस्लिम धर्मगुरुओं को लुभाते हुए मौलवियों को वेतन का झुनझुना थमाया और कहा:

“दिल्ली में भाजपा को आप ही हरा सकती है। आप इस गणित को समझें और वोटों को बँटने न दें,अगर वोट बँटे तो फिर भाजपा जीत जाएगी।”

मुस्लिमों को यह बात समझाने के लिए उन्होंने बजाप्ते वोट प्रतिशत का अंकगणित भी समझाया। जाति और धर्म की राजनीति के दलदल में गहरे उतर चुके केजरीवाल ने कभी वैश्य समुदाय के लोगों को लुभाने के लिए बनिया कार्ड भी खेला था। आज मुस्लिमों को अपने पाले में करने के लिए उन्हें भाजपा का डर दिखा रहे हैं। यह वही कार्ड है, जिसे पूरे देश में कॉन्ग्रेस, बिहार में लालू, यूपी में मुलायम और कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार खेलते आया है। अरविन्द केजरीवाल ने यह बयान देकर यह साबित कर दिया है कि वो उनसे अलग नहीं हैं।

अब ये तो समय ही बताएगा कि सीटों की स्थिति में ख़ुद को किंगमेकर की भूमिका में देख रहे केजरीवाल ‘किसे’ समर्थन देते हैं। फ़िलहाल उन्होंने अपनी व्यक्तिगत लालसा को कुछ पल के लिए किनारे कर लिया है।

मध्य प्रदेश में अब RSS कार्यकर्ता की हत्या, 9 दिनों में 6 मर्डर से संघ-BJP में रोष

मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में आरएसएस के एक कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई। शिवपुर मंडल के पूर्व कार्यवाह हिम्मत पाटीदार की लाश बुधवार को उनके खेत के पास मिली। गला काटने के बाद पहचान मिटाने के लिए चेहरे को जला दिया गया, इससे आप हत्या की बेरहमी का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

राज्य में कॉन्ग्रेस की कमलनाथ सरकार आने के बाद से राजनीतिक हत्याओं का जो सिलसिला शुरू हुआ है, वो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। इन हत्याओं से भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं के साथ-साथ अब संघ के स्वयंसेवकों तक में गुस्सा फैल गया।

रतलाम के बीजेपी विधायक दिलीप मकवाना ने कमलनाथ सरकार पर सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि जब से कॉन्ग्रेस सत्ता में आई है, तब से बीजेपी और उससे जुड़े लोगों को टारगेट किया जा रहा है। मध्य प्रदेश के गृहमंत्री बाला बच्चन ने इस पर वही घिसी-पिटी प्रतिक्रिया दी, “अपराधी को पकड़ना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है।”

आपको बता दें कि मध्य प्रदेश में राजनीतिक हत्याओं का यह दौर 16 जनवरी से शुरू हुआ था। इन हत्याओं का ये रहा रिकॉर्ड:

  • 16 जनवरी (बुधवार) – इंदौर में कारोबारी और भाजपा नेता संदीप अग्रवाल को सरेआम गोलियों से भून दिया गया था।
  • 17 जनवरी (गुरुवार) – मंदसौर नगर पालिका के दो बार अध्यक्ष रहे भाजपा नेता प्रहलाद बंधवार की सरे बाजार गोली मारकर हत्या कर दी गई।
  • 20 जनवरी (रव‍िवार) – गुना में परमाल कुशवाह को गोली मारी गई। परमाल भारतीय जनता पार्टी के पालक संयोजक शिवराम कुशवाह के रिश्तेदार थे।
  • 20 जनवरी (रव‍िवार) – बड़वानी में भाजपा के मंडल अध्यक्ष मनोज ठाकरे को पत्थरों से कुचलकर बेरहमी से मार डाला गया।
  • 21 जनवरी (सोमवार) – ग्वालियर भाजपा के ग्रामीण जिला मंत्री नरेंद्र रावत के भाई छतरपाल सिंह रावत की लाश मिली। छतरपाल सिंह रावत खुद भी भाजपा कार्यकर्ता थे।
  • 24 जनवरी (बुधवार) – आरएसएस कार्यकर्ता और शिवपुर मंडल के पूर्व कार्यवाह हिम्मत पाटीदार की लाश उनके खेत से मिली।

1500 से अधिक मस्ज़िदों के मौलवियों और मुअज़्ज़िनों को वेतन देगी AAP सरकार

लोकसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच अरविन्द केजरीवाल ने समुदाय विशेष को लुभाने के लिए एक बड़ा पासा फेंका है। दिल्ली के मस्ज़िदों के इमामों के वेतन को ₹10,000 से बढ़ा कर ₹18,000 करने का ऐलान किया गया। यही नहीं, मस्जिदों में अज़ान पढ़ने वाले मुअज़्ज़िनों के वेतन में भी बढ़ोतरी कर इसे ₹9,000 से ₹16,000 कर दिया गया। बता दें कि दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के तहत कुल 185 मस्ज़िद आते हैं। ताज़ा ऐलान के बाद वक़्फ़ बोर्ड मस्ज़िद के कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन देगा।

इमाम और मोअज़्ज़िन लम्बे समय से वेतन बढ़ाए जाने की माँग कर रहे थे। इसके अलावा केजरीवल सरकार ने एक चौंकाने वाला फ़ैसला भी लिया। AAP सरकार ने दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के अंतर्गत नहीं आने वाले मस्ज़िदों के इमामों और मुअज़्ज़िनों के वेतन बढ़ाने की भी घोषणा की। इतिहास में शायद यह पहला ऐसा मौक़ा है जब बोर्ड के तहत नहीं आने वाले मस्ज़िदों के कर्मचारियों को सरकार वेतन दे रही है। दिल्ली में ऐसे 1,500 से भी अधिक मस्ज़िद हैं जो बोर्ड के अंतर्गत नहीं आते हैं। ऐसे में ये कयास लगाए जा रहे हैं कि दिल्ली सरकार इन सभी मस्ज़िदों के कर्मचारियों को वेतन देने के लिए रुपया कहाँ से लाएगी।

अरविन्द केजरीवाल सरकार के नए निर्णय के तहत बोर्ड के अंदर नहीं आने वाले मस्ज़िदों के इमामों को ₹14,000 और मुअज़्ज़िनों को ₹12,000 दिए जाएँगे। दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने ये सारी घोषणाएँ की। इस कार्यक्रम में केजरीवाल के अलावे दिल्ली सरकार में मंत्री इमरान हुसैन और AAP विधायक अमानतुल्लाह ख़ान भी उपस्थित थे। दिल्ली हज़ कमिटी के अध्यक्ष हाजी इशराक और वक़्फ़ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मो. ए अदीब ने भी इस कार्यक्रम में शिरकत की।

आज ही के दिन नेहरू के कड़े विरोध के बावजूद डॉ राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति चुन लिए गए थे

देश के राजनीतिक इतिहास में 24 जनवरी की तारीख़ बेहद ख़ास है। इसी दिन संविधान सभा ने राजेंद्र बाबू को देश के पहले राष्ट्रपति के रूप में चुन लिया था। लेकिन राजेंद्र प्रसाद का राष्ट्रपति पद तक पहुँचना बेहद उतार-चढ़ाव से भरा हुआ था। कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता और बाद में देश के पहले प्रधानमंत्री बनने वाले पंडित नेहरू किसी भी कीमत पर राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति नहीं बनने देना चाहते थे।

नेहरू के नहीं चाहने के बावजूद कॉन्ग्रेस संगठन में मजबूत पकड़ रखने वाले सरदार पटेल ने राष्ट्रपति पद के लिए अपनी तरफ़ से संविधान सभा में राजेंद्र प्रसाद के नाम का प्रस्ताव रखा और इस तरह प्रसाद संविधान सभा द्वारा देश के पहले राष्ट्रपति चुन लिए गए। लेकिन इतना पढ़ने के बाद क्या आपने सोचा कि पंडित नेहरू आखिर क्यों डॉ प्रसाद को देश का राष्ट्रपति नहीं बनने देना चाहते थे? आइए इस सवाल का जवाब आपको बताते हैं।

राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति चुने जाने से दो साल तीन महीने पहले अक्टूबर 1947 की बात है। संविधान सभा में डॉ भीमराव अंबेडकर ने हिंदू कोड बिल नाम से एक प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव पर बहस के दौरान संविधान सभा दो हिस्से में बँटी नजर आई।

संविधान सभा में बैठे हुए कुछ लोग हिंदू कोड बिल को कानूनी रूप देने के समर्थन में थे, जबकि कुछ इस पर किसी भी तरह की जल्दबाजी करने के पक्ष में नहीं थे। डॉ अंबेडकर द्वारा हिंदू कोड बिल प्रस्ताव पेश करने के बाद नेहरू हर हाल में बिल को कानूनी रूप देना चाहते थे, जबकि राजेंद्र प्रसाद इस मामले में जनमत के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहते थे।

दरअसल हिंदू कोड बिल के तहत देश में रहने वाले बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए एक नियम संहिता बनाई जानी थी। इस नियम संहिता के तहत हिंदुओं के लिए विवाह, विरासत जैसे मामले पर कानून बनाया जाना था। इस बिल के तहत हिंदुओं के लिए एक समान विवाह की व्यवस्था करने के अलावा भी कई तरह के कानून बनाए जाने थे।

इस मामले में राजेंद्र प्रसाद चाहते थे कि परंपराओं से जुड़े किसी भी मसले पर कानून बनाने से पहले पूरे देश में लोगों की राय जान लेना चाहिए। राजेंद्र प्रसाद मानते थे कि ऐसे मामलों पर महज नेताओं द्वारा बहस करके कोई कानून बनाने से बेहतर है कि आम लोगों की राय के आधार पर कानून बनाया जाना जाए।

परंपरा और संस्कृति से जुड़ाव होने की वजह से जैसे ही यह मामला सभा के समक्ष रखा गया बतौर संविधान सभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने तुरंत मामले में दखल दिया।

राजेंद्र प्रसाद के मामले में दख़ल देने के बाद नेहरू ने इस मसले पर सख़्त रूख अपना लिया था । यही नहीं नेहरू ने इस मसले को अपने प्रतिष्ठा से भी जोड़ लिया। इस तरह पंडित नेहरू द्वारा इस मामले में ज़ज्बाती फ़ैसले लेने से राजेंद्र प्रसाद इतने दु:खी हुए कि उन्होंने गुस्सा हो कर नेहरू को एक पत्र लिखा।

अपने पत्र में डॉ प्रसाद ने नेहरू को अलोकतांत्रिक व्यक्ति बताया। इंडिया टुडे के एक लेख में इस बात का ज़िक्र है कि नेहरू के पास पत्र भेजने से पहले राजेंद्र प्रसाद ने यह पत्र सरदार पटेल को दिखाया। पटेल ने पत्र पढ़ने के बाद अपने पास रख लिया और डॉ प्रसाद को गुस्सा करने के बजाय पार्टी में अपनी बात रखने के लिए कहा। पटेल आने वाले समय में राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे, शायद इसीलिए उन्होंने ऐसा किया था।

26 जनवरी 1950 को देश में संविधान लागू होना था। ऐसे में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होना था। नेहरू सी राजगोपालाचार्य को देश का राष्ट्रपति बनाना चाहते थे। जबकि सरदार पटेल ने राजेंद्र प्रसाद का नाम आगे किया। नेहरू के नहीं चाहने के बावजूद संगठन में मजबूत पकड़ रखने की वजह से संविधान सभा द्वारा डॉ राजेंद्र प्रसाद को देश का पहला राष्ट्रपति चुन लिया गया।

राष्ट्रपति बनने के बाद भी नेहरू व राजेंद्र प्रसाद के बीच मतभेद जारी रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि नेहरू आस्था व संस्कृति जैसी चीजों को ढकोसला मानते थे। जबकि इसके ठीक उल्टा राजेंद्र प्रसाद तरक्की पसंद ज़रूर थे, लेकिन अपनी परंपराओं को साथ लेकर चलना चाहते थे। राजेंद्र प्रसाद जानते थे कि वह राष्ट्र अपने स्वाभिमान को कभी नहीं गिरवी रख सकता, जहाँ के लोगों की रोम-रोम में अपनी परंपरा और संस्कृति बसती हो।

एक तरह से डॉ प्रसाद की छवि ऐसे लोगों की थी जिनका इरादा आसमान की तरह ऊँचा व विशाल था, परंतु पैर अपनी परंपरा के जमीन पर थी। जबकि नेहरू परंपरा व संस्कृति जैसी चीजों से नफ़रत करते हुए एक ऐसे भारत के निर्माण का सपना देखते थे, जिसकी बुनियाद भारतीय संस्कृति से बिल्कुल जुड़ी नहीं थी।

इसी तरह सोमनाथ मंदिर के मामले में भी राजेंद्र प्रसाद पर नेहरू अपना निजी राय थोपने लगे थे। दरअसल सोमनाथ मंदिर बनकर तैयार होने के बाद जब उद्घाटन के लिए राजेंद्र प्रसाद के पास न्योता भेजा गया तो उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।

इसके बाद नेहरू ने उनके इस फ़ैसले की जमकर आलोचना की। हालाँकि, नेहरू को करारा जवाब देते हुए डॉ प्रसाद ने कहा, “मैं एक हिंदू हूँ, लेकिन सारे धर्मों का आदर करता हूँ। कई मौकों पर चर्च, मस्जिद, दरगाह और गुरुद्वारा भी जाता रहता हूँ।”

इस तरह स्वतंत्र भारत में राजेंद्र प्रसाद आज ही के दिन एक ऐसे राष्ट्रपति के रूप चुने गए जिन्होंने धर्म, आस्था, संस्कृति व परंपराओं की जमीन पर विकसित राष्ट्र के सपने की बीज को बोया था, जो बीज आज के समय में एक पौधे का रूप ले रही है।

पीयूष गोयल को वित्त मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार, पेश करेंगे बजट

रेल मंत्री पीयूष गोयल को वित्त मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। हाल के दिनों में अरुण जेटली के स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उन्हें ये ज़िम्मेदारी दी गई है। अरुण जेटली स्वस्थ होने तक या फिर ऐसे समय तक जब वह वित्त मंत्री और कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री के रूप में अपने काम को फिर से शुरू करने में सक्षम नहीं हो जाते, बिना पोर्टफोलियो के मंत्री बने रहेंगे।

सरकारी सूत्रों के अनुसार संसद का बजट सत्र 31 जनवरी से 13 फ़रवरी के बीच आयोजित किया जाएगा और 1 फ़रवरी को अंतरिम बजट पेश किया जाएगा। संसदीय मामलों की कैबिनेट कमेटी (CCPA) में यह फैसला लिया गया है। यह बजट सत्र इस कारण भी महत्वपूर्ण होगा क्योंकि अप्रैल-मई में आम चुनाव होने के कारण यह वर्तमान लोकसभा के लिए आखिरी बजट सत्र है और सरकार कुछ ज़रूरी घोषणाएँ भी कर सकती है।

क्योंकि यह बजट सत्र लोकसभा चुनावों से ठीक पहले होगा, इसलिए आम आदमी की निगाह सरकार की ओर रहने वाली है। मौजूदा शीतकालीन सत्र में सरकार कुछ ऐसे विधेयक पास कराने में सफल रही है, जो जनता के लिए बेहद चौंकाने वाले थे। इसमें, सरकार सामान्य श्रेणी के गरीबों के लिए 10% आरक्षण का 124वाँ  संविधान संशोधन विधेयक ला चुकी है, जिसे लोकसभा में पारित किए जाने के बाद राज्यसभा में पारित किया जाना बाकी है। इसके अलावा, नागरिक संशोधन विधेयक को पास किया जाना भी एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हुई है, हालाँकि सरकार ने इसे सदन में पारित कर दिया है।

पिछले सत्र की तरह ही विपक्ष इस बजट सत्र में भी व्यवधान डालकर सत्र का समय ख़राब करने की पूरी कोशिश कर सकता है। आख़िरी वर्ष के बजट सत्र में आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर विपक्ष पहले भी समय बर्बाद कर चुका है। सरकार अन्य लंबित मामलों को इस सत्र में लाने का प्रयास करेगी, इसलिए यह देखना होगा कि विपक्ष सरकार के क्रियाकलापों में बाधा डालने की फिर से कोशिश करता है या नहीं?

जिस वर्ष लोकसभा चुनाव होते हैं उसमें मौजूदा सरकार ही अंतरिम बजट पेश करती है, बाद में नई सरकार पूरा बजट पेश करती है। फरवरी 2014 में पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने अंतरिम बजट पेश किया था, इसके बाद जुलाई में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में पूरा बजट लाए थे।