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अस्त होती सभ्यता का सूर्य हैं सरस्वती पुत्र ‘पद्मश्री’ प्रीतम भरतवाण


प्रीतम भरतवाण का नाम सुनते ही उत्तराखंड लोक कला और संस्कृति की वो विरासत दिमाग में कौंधती है जो विलुप्ति के कगार पर खड़ी है। कारण है कि उत्तराखंड जैसा राज्य जो विभिन्न जनजातीय समाज और सभ्यताओं से मिलकर बना है, आज पलायन, बेरोज़गारी और प्रशासन की बेख़याली की मार झेल रहा है। उत्तराखंड राज्य को ‘देवभूमि’ के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन यहाँ का एक दूसरा सत्य अभाव और संसाधनहीनता भी है।

ऐसे समय में उत्तराखंड की सुदूर जगहों के रहने वाली ऐसी हस्ती और उसकी विद्या को ढूँढकर उसे पद्म श्री से गौरवान्वित करने का जो काम वर्तमान सरकार ने किया है, वो हर लिहाज़ से सराहनीय है।

इस गणतंत्र दिवस पर भारत सरकार ने चिरकालिक प्रथा से बाहर निकलकर ऐसे लोगों को चुनकर उन्हें सम्मान देने का काम किया है, जो अब तक किसी ना किसी कारण से नज़रअंदाज़ किए जा रहे थे। इसी क्रम में जो एक नाम पद्म श्री पुरुस्कार की श्रेणी में आया, वो है प्रीतम भरतवाण यानि उत्तराखंड गढ़वाल के मशहूर ‘जागर सम्राट’।

जिस उम्र में बच्चे अपने माँ-बाप की उँगली पकड़कर चलना सीखते हैं, उस उम्र में प्रीतम के हाथों ने ‘ढोल-दमाऊँ’ थामा था। उत्तराखंड के लोक संगीत और वाद्य यंत्रों को विलुप्ति के अंधेरे से विश्व पटल पर लाने का श्रेय आज निसंदेह इस सरस्वती पुत्र को जाता है।

‘डौर’ के साथ स्टेज पर प्रस्तुति देते हुए प्रीतम भरतवाण

देवताओं की इस धरती पर यदि सबसे पहले किसी को नमन किया जाना चाहिए तो वह यह ‘दास समुदाय’ है जिन्हे स्थानीय भाषा में ‘औजी’ कहा जाता है, जिनके आह्वान से ही किसी भी शुभ कार्य या समारोह में सर्वप्रथम देवी-देवताओं का स्मरण किया जाता है। सांस्कृतिक देवताओं के साथ ही उत्तराखंड में स्थानीय देवताओं का भी बहुत महत्त्व है, जिनके स्मरण के लिए ‘औजी’ ढोल-दमाऊँ के साथ ‘जागर’ आदि गाते हैं। गढ़वाल में प्रत्येक सुबह, 4-5 बजे के बीच, उठकर गाँव के औजी ढोल-दमाऊँ द्वारा ‘नौबत’ बजाते हैं और साँझ गोधूलि पर भी ढोल-दमाऊँ के ज़रिए देवताओं को प्रणाम करते हैं।

उत्तराखंड अपनी सभ्यता के अंतिम पड़ाव पर है-

एक समय था जब उत्तराखंड में सभ्यताओं का महाकुम्भ हुआ करता था। सभ्यताओं की सजीव प्रतिमा, यह राज्य, आज उपेक्षाओं के कारण एक त्रासदी से गुजर रहा है। त्रासदी यह है कि अवसरों की कमी और साधनों की कमी के कारण यह राज्य अपनी तमाम पिछली विरासतों से विमुख होकर पलायन के लिए मजबूर है। सबसे त्रासद अगर आज के समय में कुछ है तो वह यही ‘औजी वर्ग’ है। इस वर्ग के लिए ढोल सागर अपनी अगली पीढ़ियों तक पहुँचाना इसलिए चुनौती बन रहा है क्योंकि इस कार्य से उनका पेट नहीं भरता है। सरकार को चाहिए कि उन्हें संरक्षण देकर इस विधा को जीवित रखने का प्रयास करें।

प्रीतम भरतवाण इसी कारण सम्मान के पात्र बने हैं। एक ओर जहाँ गढ़वाल का औजी इस ढोल विद्या को हीन समझकर त्याग रहा था, उसी वक़्त प्रीतम भरतवाण ने अपनी विद्या को सरस्वती बनाकर एक अनोखी मिसाल क़ायम की है। प्रीतम भरतवाण ने इस विरासत को बेहद सादगी से प्रणाम कर ढोल को अपने गले में धारण कर ऐसा जूनून दिखाया कि आज वह देश-विदेशों में अपनी इस कला के लिए सम्मानित किए जा रहे हैं और एक बहुत बड़ा वर्ग उनका प्रशंसक है।

प्रीतम भरतवाण ने गढ़वाल की विलुप्त होती ढोल विधा को परिमार्जित कर समाज पर अनुग्रह किया है। अपने प्रोग्राम के दौरान भी संगीत गाते-बजाते उनका अंग-अंग थिरकता है। उनके दैवीय जागरों को सुनकर नास्तिकों के सर भी देवताओं के सम्मुख अवनत हो जाते हैं। वह सगुण और निर्गुण दोनों भक्तिधारा के उपासक हैं।

एशिया से यूरोप, अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, दुबई तक संगीत की ‘जागर’ विधा को पहुँचाने और सम्मान दिलाने का काम प्रीतम भरतवाण ने किया है। आज हालात यह हैं कि देश-विदेश में उनके अनेक शिष्य हैं। बचपन से ही प्रीतम के कण्ठ में सरस्वती जाग्रत रूप में विराजमान हैं, सरस्वती इन्हें सिद्धस्त हैं। अपने बचपन का स्मरण करते हुए प्रीतम भरतवाण ने बताया कि गाँव में जब भी जागर का कोई कार्यक्रम होता था सबसे पहले ‘पिर्ति’ को ही बुलाया जाता था।

स्टेज पर उनके ‘लाइव’ कार्यक्रम देखते और सुनते समय दर्शकों को अपने भीतर किसी दैवीय चेतना का अनुभव होता है और कई लोग दैवीय स्वर में झूमने लगते हैं। प्रीतम भरतवाण बेहद सौम्य व्यव्हार के विराट व्यक्तित्व के धनी पुरुष हैं, इनके व्यक्तित्व की खासियत है कि बचपन के ‘पिर्ति’ की विनम्रता अभी भी उनके व्यक्तित्व में ज्यों की त्यों विद्यमान है।

विरासत में मिली इस सभ्यता को अपने दादा और पिता की तरह ही श्री भरतवाण जी ने भी ढोल वादन को आगे बढ़ाया। मात्र 6 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने विरासत में मिले ढोल वादन और जागर गायन के अपने हुनर का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। उनके घर पर ढोल, डौर-थाली जैसे कई उत्तराखंडी वाद्य यंत्र हुआ करते थे। इसके साथ ही उनके घर में भी संगीत का मौहाल था। वह अपने पिता के साथ गाँव-घरों में गाए जाने वाले जागरों में संगत करने लगे।

लेकिन जागर प्रीतम भरतवाण के संगीत का सिर्फ़ एक पहलू है। अपने संगीत के माध्यम से उन्होंने पहाड़ के अनेक पहलुओं पर गीत लिखे और गाए हैं। ख़ासकर, लोक संगीत पर उनकी पकड़ बेहद मजबूत रही है। लोक जागर के अलावा उन्होंने पहाड़ के दुरूह जीवन का चित्रण करते और पहाड़ से पलायन का दर्द भी अपने गीतों के माध्यम से बयाँ किया है।

अपने बेहद प्रचिलित गीत ‘आज कुजणी किलैई, गौं की याद आणि चा’ में उन्होंने पहाड़ से दूर रहने वाले व्यक्ति की पीड़ा को रखा है। ‘हम कुसल छौं माजी दगड्यून दगड़ी’ गाना सीमा पर तैनात सेना के जवानों की मनोस्थिति पर लिखा और गाया है। इसके अलावा उन्होंने ‘घुट-घुट बाडुलि लगिगे’ जैसे ‘खुदेड़’ लोकगीत भी गाए हैं। ‘धनुली मेरु जिया लगिगे’ और ‘सुंदरा छोरी’ प्रेम मनुहार वाले गाने हैं।

भले ही उनकी पहचान ‘जागर सम्राट’ की है, लेकिन वे गायकी की हर विधा के धनी हैं। अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय संस्थाएँ प्रीतम भरतवाण को सम्मानित कर चुकी हैं, फिर भी एक अटल तपस्वी की भाँति वे निर्विकार संगीत साधना में लीन हैं।

प्रीतम भरतवाण के प्रयासों का ही नतीजा है कि कभी ‘औजी’ या दास (ढोलवादक) समुदाय तक सीमित रहे जागर आज न केवल समाज के सभी वर्गों में सुने और गाए जाते हैं, बल्कि उन्हें पूरा सम्मान भी दिया जाता है। उनकी इन उपलब्धियों के लिए ही भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करने का निर्णय लिया।

‘जागर’ क्या है?

‘जागर’ का अर्थ सामान्य शब्दों में ‘जागृत करना’ होता है। उत्तराखंड में ग्राम्य देवताओं का विशेष महत्त्व रहा है और उनकी पूजा की जाती है, जैसे नरसिंह, गंगनाथ, गोलु, भनरीया, काल्सण आदि। कुछ देवताओं को स्थानीय भाषा में ‘ग्राम्य देवता’ कहा जाता है। ग्राम्य देवता का अर्थ गाँव का देवता है। उत्तराखंड की जाति और जनजातियाँ इन्हीं देवताओं को जगाने हेतु ‘जागर’ लगाते हैँ। जागर में ‘जगरिया’ मुख्य पात्र होता है जो रामायण, महाभारत आदि धार्मिक ग्रंथों से होते हैं। इसी जागर मंचन (जैसे देवी/देवता ऊर्जा रूप में शरीर में आ गए हों) के साथ ही जिस देवता का आवाह्न करना होता है, उस देवता के चरित्र को स्थानीय भाषा में वर्णन करता है। ‘औजी’ ढोल-दमाऊँ बजाने के साथ-साथ जगरीया हुड्का (हुडुक) कहानी गाता है।

प्रीतम भरतवाण संक्षिप्त परिचय :

प्रीतम भरतवाण उत्तराखंड के टिहरी जिले के जौनपुर विकासखंड के सिला गाँव के रहने वाले हैं। इस संगीत सम्राट का जन्म और बचपन बहुत कठिनाई में गुजरा है । प्रीतम का जन्म एक ‘औजी’ परिवार में हुआ है, जिस कारण लोक संगीत उन्हे विरासत में मिला है।

वर्ष 2000 के बाद से उत्तराखंड राज्य की अलग से स्थापना के बाद कुछ हद तक यहाँ की दूरस्थ जाति-जनजातियों को पहचान मिलनी शुरू हुई। हालाँकि, एक सत्य यह भी है कि तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उत्तराखंड राज्य पलायन जैसे अभिशाप जीने के लिए मजबूर है, जब गाँव ही नहीं रहे तो सभ्यताएँ किस तरह से जीवित रहेंगी, यह वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है।

प्रीतम भरतवाण के दादा और पिता भी जाने-माने ढोल वादक थे, जिन्होंने पूरा जीवन सरस्वती की साधना में लगाया। जागरों, लोकगीत और पंवाणों के ज्ञाता श्री भरतवाण जी को उत्तराखंड के लोक संगीत में  उल्लेखनीय योगदान देखते हुए विगत वर्ष उन्हें उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय (UOU) हल्द्वानी, कुमाऊँ ने (डॉक्ट्रेट) मानद उपाधि से गवर्नर के हाथों सम्मानित किया है।

प्रीतम की शुरूआती शिक्षा गाँव के पास ही एक विद्यालय में हुई। संगीत के प्रति रूझान और उनकी कला की पहचान सबसे पहले स्कूल में ‘रामी-बारौणी’ नाटक में बाल आवाज़ देने से हुई। उन्होंने मसूरी के एक नृत्य-नाटक में डांस किया, जिसके बाद स्कूल के शिक्षकों की उन पर नज़र पड़ी और वे उनका हुनर पहचान गए। इसके बाद तो उन्हें स्कूल के हर कार्यक्रम में गाने का मौका मिलने लगा। सबसे ख़ास बात यह रही कि मात्र 12 साल की उम्र में ही उन्होंने लोगों के सामने जागर गाना शुरू कर दिया था। उनके जीजाजी और चाचाजी से उन्हें जागर गाने के लिए प्रोत्साहित किया और वे उन्हें इसका पूरा श्रेय देते हैं।

उनकी सादगी का परिचय इसी बात से मिलता है कि जब उत्तराखंड के महामहिम राज्यपाल, श्रीमती बेबी रानी मौर्य द्वारा उन्हें मानद उपाधि भेंट की गई तो उनके शब्द थे, “मैं अपने पूर्वजों तथा जागर, पंवाणों, ढोल सागर, ढोल दमों, हुड़का, डौंर, थाली को एवं अपने सम्मानीय श्रोताओं, शुभचिंतकों, मार्गदर्शकों को कोटिशः नमन करता हूँ।”

उत्तराखंड की राज्यपाल द्वारा डॉक्ट्रेट उपाधि ग्रहण करते हुए लोकगायक प्रीतम भरतवाण

स्थानीय स्तर पर गायकी और ढोल वादन को सराहना मिली तो प्रीतम भरतवाण  ने 1988 में आकाशवाणी के लिए गाना शुरू कर दिया। 4 साल बाद उनका पहला ऑडियो एल्बम ‘रंगीली बौजी’ बाजार में आया, जिसे खूब पसंद किया गया। इसके बाद प्रीतम ने एक के बाद एक तौंसा बौ, पैंछि माया, सुबेर, सरूली, रौंस, तुम्हारी खुद, बाँद अमरावती जैसे सुपरहिट एलबम निकाले। अब तक 50 से अधिक एल्बम में वे 350 से ज्यादा गाने गा चुके हैं।

एक ‘लाइव’प्रोग्राम के दौरान प्रीतम भरतवाण

प्रीतम भरतवाण से पहले वर्ष 2017 में जागर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए बसन्ती बिष्ट को भी पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। कई वर्षों से समाज और सरकारों की उपेक्षा और संसाधानों के अभाव से दास समुदाय ढोल और दमाऊँ बजाने से परहेज कर रहे थे। ऐसे मौके पर प्रीतम भरतवाण ने ढोल-दमाऊँ को बजाना शुरु किया और नई पहचान दिलाई। उम्मीद है कि भारत सरकार द्वारा उन्हें इस विधा के लिए पुरस्कृत करना औजी समुदाय के लिए प्रेरणा का कार्य करेगा और विलुप्त होती यह परम्परा एक बार फिर जीवित हो उठेगी।

इन दिनों भरतवाण जी पहाड़ी संस्कृति का झंडा अमेरिका में बुलंद कर रहे हैं। अपने अमेरिका प्रवास में वह ओहायो की सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी में अमेरिकियों को ढोल-दमाऊँ की बारिकियाँ सिखा रहे हैं।

किसानों को ₹6680 करोड़ का राहत पैकेजः मोदी सरकार ने दी स्वीकृति

मोदी सरकार ने किसानों को बजट से पहले बड़ा तोहफ़ा दिया है। सरकार ने चार राज्यों में किसानों के लिए ₹6680 करोड़ के राहत पैकेज को मंजूरी दे दी है। इसका लाभ आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसानों को मिलेगा। कुल रकम में से आंध्र प्रदेश के लिए ₹900 करोड़, गुजरात के लिए ₹130 करोड़, महाराष्ट्र के लिए ₹4700 करोड़ जबकि कर्नाटक के लिए ₹950 करोड़ का पैकेज दिया गया है।

बता दें की इन राज्यों में सूखे की समस्या से किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ा है, और अब सरकार के इस पैकेज से किसानों को राहत मिलने की आशा है। सरकार छोटे एवं सीमांत किसानों की आय में कमी की समस्या को समाप्त करने की हर संभव कोशिश कर रही है।

बजट में भी किसानों को मिल सकती है बड़ी राहत

बिचौलियों के चलते किसानों को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ता है। तमाम कोशिशों के बावजूद भी उन्हें लाभ तो क्या लागत की रकम भी नहीं मिल पाती है। सरकार इसे लेकर गंभीर है। रिपोर्ट की मानें तो बजट में किसानों के खातों में डायरेक्ट कैश ट्रांसफर करने की योजना के बारे में विचार किया जा रहा है। इसके जरिए किसानों को अलग-अलग योजनाओं के जरिए सब्सिडी न देते हुए पूरा पैसा एक साथ सीधे उनके खाते में डाला जाएगा जो उनके लिए ज्यादा फायदेमंद साबित होगा। बता दें कि सरकार हर साल विभिन्न योजनाओं के तहत प्रत्येक किसान को सालाना ₹15,000 की सब्सिडी देती है।

FDI पर मोदी सरकार की उपलब्धिः 18% तक बढ़ा विदेश निवेश

विदेशी निवेश को लेकर गंभीर मोदी सरकार को एक और उपलब्धि हासिल हुई है। भारतीय रजर्व बैंक (RBI) ने रिपोर्ट जारी करते हुए बताया है कि भारत में वित्त वर्ष 2017-18 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में 18% बढ़ा है। अब निवेश की रकम बढ़कर ₹28.25 लाख करोड़ हो गई है। रिपोर्ट की मानें तो बीते वित्त-वर्ष के दौरान देश में सबसे ज्यादा निवेश मॉरीशस से 19.7% रहा।

आरबीआई के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017-18 में भारतीय प्रत्यक्ष निवेश कंपनियों की परिसंपत्तियों और विदेशी देनदारियों की गणना ₹4,33,300 करोड़ बढ़कर ₹28,24,600 करोड़ पहुँच गया, इसमें पिछले निवेशों का नया मूल्यांकन भी शामिल है।

बता दें कि, आरबीआई के मुताबिक हाल में 23,065 कंपनियों ने निवेश से जुड़े पूछे गए सवालों का जवाब दिया, जिसमें से 20,732 कंपनियों ने मार्च 2018 में अपनी बैलेंसशीट में एफडीआई या ओडीआई निवेश को दर्शाया है। इस दौरान भारतीय कंपनियों का विदेशों में निवेश (ओडीआई) 5% बढ़कर ₹5.28 लाख करोड़ हो गया।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में मॉरीशस (19.7%) के साथ पहले स्थान पर रहा। जबकि अन्य पर क्रमशः अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर और जापान का स्थान है। दूसरी तरफ भारतीय कंपनियों के विदेश में निवेश के मामले में 17.5% के साथ सिंगापुर सबसे प्रमुख स्थान रहा। विदेशी निवेशकों ने विनिर्माण क्षेत्र में सबसे अधिक निवेश किया। इसके अलावा सूचना एवं दूरसंचार सेवाओं, वित्तीय एवं बीमा गतिविधियाँ एफडीआई पाने वाले अन्य प्रमुख क्षेत्र रहे हैं।

क्या है एफडीआई?

जब कोई कंपनी दूसरे देश में निवेश करती है तो उसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) कहा जाता है। ऐसे निवेश से निवेशकों को दूसरे देश की उस कंपनी के प्रबंधन में कुछ हिस्सा हासिल हो जाता है, जिसमें उसका पैसा लगता है। आमतौर पर किसी निवेश को (FDI) का दर्जा दिलाने के लिए कम-से-कम कंपनी में विदेशी निवेशक को 10% शेयर खरीदना पड़ता है।

दरअसल, यह सीधा और दीर्घावधि का निवेश होता है। बता दें कि वर्तमान सरकार ने रक्षा, दवाई, नागरिक उड्डयन एवं खाद्य सामग्री के क्षेत्र में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दे रखी है।

एफडीआई से देश को क्या होता है फ़ायदा

जब कोई कंपनी देश में निवेश करती है तो वह केवल आर्थिक लाभ नहीं पहुँचाती है बल्कि उसके साथ कई प्रकार के अप्रत्यक्ष लाभ होते हैं। जब वह किसी दूसरे देश में निवेश करती है तो पूँजी के साथ आधुनिक तकनीक भी देश में लाती हैं, जिससे देश को दोहरा लाभ मिलता है।

बता दें कि, आज अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का एक कारण एफडीआई भी है। विदेशी निवेश से उत्पादन के क्षेत्र में बेहतर तकनीक भी आती है, जिससे वाणिज्य एवं कृषि-उत्पाद का विकास होता है और रोज़गार के अवसर भी बढ़ते हैं।

‘परीक्षा पे चर्चा’ के दौरान PM ने विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों को दिए स्ट्रेस मैनेजमेंट टिप्स

आमतौर पर एग्जाम फ़रवरी और मार्च के महीने में ही होते हैं और जैसे ही ये महीने क़रीब आते हैं, दसवीं और बाहरवीं की परीक्षा देने वाले छात्रों के साथ अभिभावकों की भी धड़कनें तेज़ होने लगती हैं। ऐसे में ज़रूरत होती है कि कोई उनका डर दूर कर हौसला बढ़ाए। आज प्रधानमंत्री ने बच्चों से परीक्षा पर चर्चा कर उनका और उनके अभिभावकों का भी डर दूर करने की कोशिश की।

पीएम मोदी वैसे तो ‘मन की बात’ के माध्यम से छात्र-छात्राओं को हमेशा से ही प्रेरित करते रहें हैं। लेकिन आज उन्होंने देश की राजधानी में ‘परीक्षा पे चर्चा’ के दूसरे संस्करण में लगभग 2000 विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों के साथ संवाद किया।

जैसा कि हम जानते हैं बोर्ड की परीक्षा में अब दो महीने से भी कम समय बचा है। ऐसे में प्रधानमंत्री ने बच्चों के साथ बात करते हुए उन्हें बताया और समझाया कि किस तरह से परीक्षा के प्रेशर को ख़ुद को बाहर निकालकर बेहतरीन प्रदर्शन किया जा सकता है।

तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित हुए इस समारोह पहली बार देश के अलग-अलग हिस्सों से आए छात्रों के साथ उनके अभिभावकों ने भाग लिया। इस समारोह में 24 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों से प्रतिभागी शामिल हुए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय अनुसार इस समारोह देश के अलग-अलग राज्यों से क़रीब 675 छात्रों के साथ दिल्ली के स्कूलों के हज़ारों बच्चे भी शामिल हुए थे।

उन्होंने इस चर्चा में कई छात्रों के सवालों का लाइव ज़वाब भी दिया। उन्होंने इस चर्चा में बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए विचारों की स्पष्टता और दृढ़ विश्वास की आवश्यकता होती है। आज देश में अवसर की कमी नहीं, भारत व्यापक संभावनाओं से भरा है।

भारत ने जापान को स्टील उत्पादन में पछाड़कर हासिल की दूसरी रैंक

भारत ने जापान को पीछे छोड़ते हुए स्टील उत्पादन में दूसरी रैंक हासिल कर ली है। जबकि चीन कच्चे इस्पात का उत्पादन करने के मामले में 51% शेयर के साथ पहले स्थान पर बना हुआ है। वर्ल्ड स्टील एसोसिएशन (वर्ल्ड स्टील) ने नई रिपोर्ट साझा करते हुए इसकी जानकारी दी।

रिपोर्ट की मानें तो, चीन का कच्चा इस्पात उत्पादन 2018 में 6.6% बढ़कर 928.3 मिलियन टन पर पहुँच गया है। जबकि, 2017 में यह 870.9 मीट्रिक टन था। उत्पादन के मामले में चीन का हिस्सा 2017 में 50.3% था, जो अब बढ़कर 51.3% हो गया।


जापान से आगे निकला भारत

रिपोर्ट की माने तो भारत का कच्चे इस्पात का उत्पादन 2018 में 4.9% बढ़कर 10.65 करोड़ टन रहा, जो 2017 में 10.15 करोड़ टन था। जापान का उत्पादन इस दौरान 0.3% घटकर 10.43 करोड़ टन पर रह गया, जिसके चलते भारत दूसरे स्थान पर पहुँच गया। रिपोर्ट में जानकारी दी गई है कि, 2018 में वैश्विक इस्पात उत्पादन 4.6% बढ़कर 180.86 करोड़ टन रहा, जो 2017 में 172.98 करोड़ टन था।

बता दें कि, टॉप 10 इस्पात उत्पादक देशों में अमेरिका 8.67 करोड़ टन के साथ चौथे स्थान पर है। वहीं दक्षिण कोरिया (7.25 करोड़ टन के साथ) 5वें, रूस (7.17 करोड़ टन के साथ) 6वें, जर्मनी (4.24 करोड़ टन के साथ) 7वें, तुर्की (3.73 करोड़ टन के साथ) 8वें, ब्राजील (3.47 करोड़ टन के साथ) 9वें और ईरान (2.5 करोड़ टन के साथ) 10वें स्थान पर आता है।

जावेद अख़्तर : स्क्रिप्ट-राइटर और गीतकार से लेकर ट्रोल तक का सफ़र

जावेद अख़्तर- एक ऐसा नाम, जिसने कई ऐतिहासिक बॉलीवुड फ़िल्मों की स्क्रिप्ट, कहानी और स्क्रीनप्ले लिखा। एक ऐसा नाम, जिसने सलीम खान के साथ जोड़ी बना कर अमिताभ बच्चन की सफलता को नया आयाम दिया, महानायक के सुपरस्टारडम को विस्तार दिया। एक ऐसा नाम, जिसने अपनी कालजयी लेखनी से फ़िल्मी गानों में अर्थ डाले- दर्द, दवा, ज़िंदगी लेकर युद्ध, शांति और प्यार तक को शब्दों के जाल में बुन कर आवाम तक पहुँचाने का काम किया। लेकिन, अब समय बदल गया है। जावेद अख़्तर ने एक बार फिर से अपना रोल बदल लिया है।

फ़िल्मों के स्क्रिप्ट लिखने से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अख़्तर ने बाद में गीतकार की भूमिका चुनी और सफल हुए। नवंबर 2009 में उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया। संसद में उनकी उपस्थिति मात्र 53% रही जो 78% के राष्ट्रीय औसत से काफ़ी कम रही। आज ट्विटर पर हर एक बहस में जबरन कूद कर अपनी ही इज्ज़त उछालने वाले अख़्तर ने अपने 6 वर्ष के संसदीय कार्यकाल में एक भी प्रश्न नहीं पूछे। इसके बाद अब वह ताज़ा किरदार में आ गए हैं। उन्होंने अपने लिए सोशल मीडिया ट्रोल की भूमिका ढूँढ ली है।

जावेद अख़्तर ट्विटर पर लोगों से ऐसे लड़ते हैं, जैसे वह सेलिब्रिटी न होकर कोई सड़क छाप रंगदार हों। जावेद अख़्तर की सोच कल भी वही थी, आज भी वही है। जब-जब भाजपा की सरकार आती है, उनके अंदर का विद्रोही कीड़ा कुलबुलाने लगता है और फिर जावेद साहब उलूलजलूल बयानों की शरण में उतर आते हैं। ट्विटर ट्रोल के किरदार में फ़िट बैठ रहे जावेद अख़्तर की सोच को समझने के लिए हमें 2002 में जाना होगा जब देश में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार चल रही थी।

उस दौरान जावेद अख़्तर की भाषा वही थी जो आजकल सक्रिय तथाकथित लिबरल और सेक्युलर लोगों की है। उस दौरान जावेद अख़्तर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि राजनीतिक विरोधियों, असंतुष्टों और अल्पसंख्यकों को हाशिये पर रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। यही वही भाषा है जो कश्मीरी UPSC टॉपर शाह फ़ैसल बोलते हैं। उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा देते वक़्त कहा कि हिंदुत्व ताक़तों से 20 करोड़ मुस्लिमों को हाशिये पर भेज दिया है। जब-जब भाजपा की सरकार आती है- यह राग इतनी बार आलापा जाता है कि आपके कान ख़राब हो जाएँ।

उसी इंटरव्यू में जावेद अख़्तर ने बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद को आतंकवादी संगठन बताया था। अब जावेद अख़्तर के इतिहास से उनके वर्तमान पर आते हैं। हमें यह देखना होगा कि सोशल मीडिया में वह जिस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, क्या उन्होंने ऐसी भाषा अपनी लिखी फिल्मों या गानों में प्रोग की है क्या? जावेद अख़्तर ने ऑपइंडिया अंग्रेजी की सम्पादक नुपुर शर्मा से बहस करते ट्विटर पर लिखा:

“जब भी ये नफ़रत की सौदाग़र मुझे कोई असभ्य सन्देश भेजेगी, मैं भी जवाब में एक असभ्य लेकिन अधिक मज़ाकिया प्रत्युत्तर के साथ वापस आऊँगा।”

जावेद अख़्तर के लिए उनके ट्वीट में व्याकरण की त्रुटियाँ निकालना ‘असभ्य’ है, वो भी उस ट्वीट में, जिसमे वह ख़ुद बहसबाज़ी में तल्लीन होकर सामनेवाले की मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे हों। इतना ही नहीं, ट्विटर ट्रोल की हर एक परिभाषा में फ़िट बैठने के लिए शायद उन्होंने कोई ख़ास प्रशिक्षण ले रखा है। अपने-आप को नास्तिक कहने वाले जावेद अख़्तर को जब इस बात की याद दिलाई गई कि केवल भारतीय धर्मों में नास्तिकों के लिए स्थान है, तो वह बिफ़र उठे। उन्हें बस यह सवाल पूछा गया था कि इस्लाम में नास्तिकों के साथ क्या किया जाता है? इस बात पर उन्होंने मज़ाक बनाते हुए दाभोलकर, पनसारे और कलबुर्गी का नाम लिया।

किसी की व्यक्तिगत राय अलग हो सकती है। यह तब तक स्वीकार्य है, जब तक वह राय व्यक्तिगत रहे, उसे किसी पर जबरन थोपने की कोशिशें न की जाए। जावेद अख़्तर हर उस व्यक्ति से लड़ पड़ते हैं जो उनकी विचारधारा, बयानों और सोच से मतभेद प्रकट करता है।

पिछले वर्ष अप्रैल में उन्होंने राष्ट्रीय जाँच एजेंसी NIA को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया था। मक्का मस्ज़िद मामले में NIA पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा था कि एजेंसी के पास विधर्मी विवाहों की जाँच करने के लिए दुनियाभर का समय है।

जावेद अख़्तर एक ऐसे ट्विटर ट्रोल के रूप में विकसित होकर उभरे हैं कि अगर हम उनके सारे ऐसे ट्वीट्स की पड़ताल करने बैठ जाएँ तो इस पर पूरी की पूरी पुस्तक लिखी जा सके। इसीलिए उसके ट्वीट्स से ज़्यादा उनकी दिन पर दिन विकृत होती जा रही मानसिकता, संकुचित होती जा रही सोच और फूहड़ होते जा रहे बयानों की चर्चा करना उचित रहेगा।

जावेद अख़्तर को जिस सरकार के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होता नज़र आ रहा था, उसी सरकार द्वारा उन्हें 1999 में पद्म श्री से नवाज़ा गया था। उसी सरकार के कार्यकाल में उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले। यह विरोधाभाषी है। 1971 से ही फ़िल्मों में सक्रिय अख़्तर को क़रीब 30 वर्ष बाद पहली बार पद्म पुरस्कार मिला, उसी पार्टी के कार्यकाल में, जिसके सत्ता में आते वो एक ट्रोल का रूप धारण कर लेते हैं।

जावेद अख़्तर से उनकी लिखी फ़िल्मों और गानों का फैन उनसे यही विनती करेगा कि कृपया एक ट्रोल की तरह व्यवहार करना बंद कर दें। आप सोशल मीडिया पर सक्रिय रहें, ख़ूब वाद-विवाद करें, संसद में जो मौका अपना गँवाया था, उसे ट्विटर पर धरे रखें। लेकिन, जो भाषा आप अपने गीतों में इस्तेमाल करते रहे है, जो भाषा आपकी लेखनी में झलकती है- उसी शालीन भाषा का उपयोग करें। गली के आवारा बदमाशों वाली भाषा आपको शोभा नहीं देती।

‘संस्कृत’ से नहीं उन्हें ‘संस्कृति’ से गुरेज़ है, उन्हें ‘श्लोक’ से नहीं ‘हिंदू-धर्म’ से परहेज़ है

हाल ही में ख़बरें आई हैं कि केंद्रीय विद्यालय में प्रार्थना के दौरान संस्कृत का एक श्लोक पढ़ने की वज़ह से संविधान को ठेस पहुँची है। लोकतंत्र की व्यवस्था चरमरा गई है। कई लोग इससे विशेष रूप से आहत भी हुए हैं। मसला इतना विकराल हो गया कि इसपर स्कूल प्रशासन नहीं बल्कि देश का सर्वोच्च न्यायालय फ़ैसला सुनाएगा। यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट में भी 5 जजों की संवैधानिक बेंच इस पर फ़ैसला करेगी। अब कोर्ट इसका निर्णय करेगा कि विद्यालयों में ‘असतो मा सदगमय’ (मुझे झूठ से सच की ओर ले चलें) जैसी प्रार्थनाएँ गाई जा सकती हैं या फिर नहीं।

कमाल की बात यह है कि इस शिकायत को कोर्ट तक ले जाने वाले विनायक शाह नाम के व्यक्ति खुद को नास्तिक बताते हैं। शायद इसलिए, उनमें बतौर सेकुलर देश का नागरिक होने के कारण इतनी पीड़ा, इतना दुख, देश के प्रति चिंता है।

सोचिए कि संस्कृत का श्लोक पढ़ने का दूसरा पर्याय आख़िर धार्मिकता का प्रचार करना कैसे हो सकता है। केंद्रीय विद्यालय की प्रार्थना में धार्मिक तत्व ढूँढ निकालने वाले मदरसों से लेकर मिशनरी स्कूलों के अस्तित्व में होने को लेकर चुप हैं। जिन्हें न जाने कितनी धार्मिक संस्थाओं से बाकायदा फंडिंग की जाती है। ऐसे शैक्षिक संस्थानों में विशेष समुदाय का हवाला देते हुए उसी धर्म के अनुरूप न केवल प्रार्थना होती है बल्कि शिक्षा भी उसी दिशा में दी जाती है।

केंद्रीय विद्यालय को देश में शिक्षा के लिहाज़ से एक प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थान का दर्ज़ा मिला हुआ है। हज़ारों लोगों की कोशिश होती हैं कि उनका बच्चा/बच्ची केंद्रीय विद्यालय से शिक्षा ग्रहण करे। यहाँ तक पहुँचना थोड़ा कठिन तो है लेकिन शायद ही कोई ऐसा अभिभावक होगा जो अपने बच्चे को यहाँ पढ़ाकर सिर-माथा पकड़े।

इतनी दलीलों के बाद भी मान लेते हैं कि संस्कृत हिंदू धर्म की वाहक हैं। लेकिन, 5000 साल पुरानी सभ्यता और संस्कृति का हवाला देने वाली दर्ज़नों किताबें इस बात का प्रमाण हैं कि संस्कृत जितना हिंदू धर्म से जुड़ी उसका उतना ही संबंध हमारे देश और संस्कृति से भी हैं। अब आप यह कहने लग जाएँ कि देश की उन सभी सभ्यताओं को ख़ारिज किया जाए जिनका संबंध हिंदू धर्म से हैं तो शायद फिर इस मुद्दे पर कोई बात करनी वाली ही नहीं बचेगी।

अगर मात्र स्कूल में संस्कृत के कुछ श्लोकों से संविधान को ठेस पहुँचती है, धर्म का प्रचार होता है तो आप उसे क्या कहेंगे जो जगह-जगह विद्यालयों में जाकर ईसा-मसीह के जीवन से लेकर उनके चमत्कारों पर बात करते हुए ईसाई धर्म को सर्वश्रेषठ बताते हैं। शैक्षिक संस्थान में इस तरह की बातों को तो फिर अराजकता की श्रेणी में डाल देना चाहिए।

इस पूरे मामले को दर्ज़ कराने वाले शाह ने इस बात का दावा किया है कि  केंद्रीय विद्यालय संगठन की ओर से 28 दिसंबर, 2012 को जारी संशोधित एजुकेशन कोड में पढ़ रहे सभी छात्रों के लिए सुबह की प्रार्थना में ‘असतो मा सदगमय’ को गाना अनिवार्य बनाया गया। उनका कहना है कि इससे नास्तिक लोगों की भावनाएँ आहत हो सकती हैं।

शाह साहिब को किस तरह बताया जाए कि शैक्षिक संस्थानों में आस्तिकता और नास्तिकता को प्राथमिकता देने से बड़ा कार्य वहाँ पढ़ रहे छात्रों को उचित दिशा दिखाना है। अगर नास्तिक और आस्तिक के झूले पर झूलते हुए छात्र स्कूल का रुख करें तो वो भले ही हिंदू-मुस्लिम, सुन्नी-सिया, ऊँच-नीच की लड़ाई में न पड़े लेकिन लड़ाईयों का विस्तार करते हुए आस्तिक-नास्तिक के दंगो को जन्म दे देंगे।

साल 2018 में भी इसी तरह की याचिका दर्ज़ कराई गई थी जिसमें लिखा था कि केंद्रीय विद्यालयों में 1964 से हिंदी-संस्कृत में सुबह की प्रार्थना हो रही है जो कि पूर्ण रूप से असंवैधानिक है। याचिका दर्ज़ कराने वाले ने इसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 के खिलाफ बताते हुए कहा था कि इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती है।

आज चाहे किसी भी समुदाय का कोई भी छात्र हो वो विद्यालय शिक्षा को लेने और खुद के विकास के उद्देश्य से जाता है। शायद एक भाषा के रूप में ही सही लेकिन हिंदू छात्र को उर्दू जुबां से गुरेज़ नहीं है और एक मुस्लिम छात्र को संस्कृत में टॉप करने से परहेज़ नहीं है। खुद सोचिए, बेवज़ह की दलीलों देना वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि आप नास्तिक है।

क्या देश में संस्कृत भाषा के श्लोक से हर शख्स की भावनाएँ आहत हो जाएँगी? शायद नहीं, लेकिन ऐसे लोग उस माहौल का निर्माण जरूर कर रहे हैं जब साहित्य,कविताओं को, गीतों को भी धर्म से ही लेकर देखा जाएगा। क्या कभी आपने किसी छात्र को इस तरह की शिकायतों में उलझता देखा है कि वो पढ़ाई छोड़कर शिकायत करता दिखा हो… इस प्रार्थना को बंद करो, मेरी भावनाएँ आहत होती है।

राम मंदिर: 0.3 एकड़ विवादित भूमि को छोड़ 67 एकड़ पर मोदी सरकार ने SC में चल दिया बड़ा दाँव

राम मंदिर मामले में केंद्र सरकार ने एक बड़ा क़दम उठाया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित ज़मीन को छोड़ कर बाकी की ज़मीन से यथास्थिति हटाने की माँग की है। बता दें कि 1993 में केंद्र सरकार ने अयोध्या अधिग्रहण एक्ट के तहत मंदिर और उसके आसपास की ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया था। इसके बाद उस ज़मीन को लेकर दायर की गई सारी याचिकाओं को भी ख़त्म कर दिया गया था। इस एक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

याचिका की PDF का स्क्रीशॉट

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दायर की है, उसके अनुसार 0.3 एकड़ के ‘विवादित’ क्षेत्र के अलावा बाकी के 67 एकड़ की भूमि को उनके मालिकों को लौटाया जा सकता है। इसी 67 एकड़ के लिए केंद्र सरकार ने कोर्ट में अर्ज़ी दाख़िल की है। अगर कोर्ट ने केंद्र सरकार के पक्ष में फ़ैसला दिया तो यह ज़मीन राम जन्मभूमि न्यास सहित सभी संबंधित पक्षों को लौटाई जाएगी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन 67 एकड़ में से लगभग 42 एकड़ भूमि राम जन्मभूमि न्यास की है। अदालत ने 1994 में कहा था कि जिसके पक्ष में निर्णय आएगा, उसे ही जमीन दी जाएगी। अदालत ने केंद्र सरकार को इस ज़मीन को ‘कस्टोडियन’ की तरह रखने को कहा था।

याचिका की PDF का स्क्रीशॉट

हाल ही में समाचार एजेंसी एएनआई की सम्पादक स्मिता प्रकाश को दिए साक्षात्कार में प्रधानमंत्री ने कहा था कि अदालती प्रक्रिया ख़त्म होने के बाद सरकार की जो भी जवाबदेही होगी, उस दिशा में कार्य किया जाएगा। उन्होंने अदालती प्रक्रिया ख़त्म होने का इंतज़ार करने की भी सलाह दी थी। तभी से यह क़यास लगाए जा रहे थे कि सरकार इस दिशा में कोई न कोई क़दम उठा सकती है।

याचिका की PDF का स्क्रीशॉट

राम मंदिर मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी भाजपा को घेरा था। कुछ दिनों पहले संघ के सहकार्यवाहक भैय्याजी जोशी ने कुंभ मेले में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि 2025 तक राम मंदिर का निर्माण हो जाना चाहिए।

याचिका की PDF का स्क्रीशॉट

केंद्र सरकार के ताज़ा कदम का विश्व हिन्दू परिषद (VHP) व अन्य हिन्दू संगठनों ने स्वागत किया है। सुप्रीम कोर्ट में बार-बार राम मंदिर मसले की सुनवाई टालने से नाराज़ चल रहे हिन्दू संगठनों में सरकार के इस क़दम के बाद नई आस जगी है।

‘अगर आप करते हैं अपने बच्चों से प्यार तो चुनें ‘AAP’ सरकार’

दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल और उप-मुख्समंत्री मनीष सिसोदिया ने न्यू फ्रेंड्स कॉलनी के सर्वोदय कन्या विद्यालय परिसर से 250 से ज्यादा सरकारी स्कूलों में बने 11,000 नए क्लासरूम के निर्माण कार्य का उद्घाटन किया। और इसके बाद शिक्षा-व्यवस्था पर बोलने या अभिभावकों की सुनने के बजाय राजनीति पर उतर आए।

इस मौके पर सीएम केजरीवाल ने अभिभावकों को सम्बोधित करते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं। ऐसे में उन्हें ‘देशभक्ति’ या फिर ‘मोदीभक्ति’ में से किसी एक को चुनना है।

केजरीवाल ने कहा कि अगर आप लोगों से पूछते हैं कि आप किसे वोट देंगे तो वो कहते हैं मोदी जी। अगर आप उनसे पूछेंगे कि ‘क्यों’ तो वह कहेंगे क्योंकि वह मोदी जी को प्यार करते हैं। सीएम ने कहा कि अब आप खुद सोचिए कि आप मोदी जी से प्यार करते हैं या फिर अपने बच्चों से। उन्होंने कहा कि अगर आप अपने बच्चों से प्यार नहीं करते हैं तो मोदी जी को ही वोट दीजिए।

सीएम केजरीवाल ने प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि मोदी जी ने जनता के लिए एक भी स्कूल नहीं बनवाए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे में या तो आप देशभक्ति कर सकते हैं या फिर मोदी-भक्ति। लेकिन दोनों एक साथ मुमकिन नहीं है।

सीएम की बात पर ज़ोर देते हुए उप-मुख्यमंत्री सिसोदिया ने कहा कि उन्हें किसी ने बताया था कि वो चुनाव में मोदी के लिए वोट देंगे क्योंकि उन्हें वो अच्छे लगते हैं।

”मैने उन्हें कहा कि अगर आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं तो उन्हें वोट दीजिए जो आपके बच्चों के लिए स्कूलों का निर्माण करवा रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि इसलिए वो ये बात हर अभिभावक को बता रहे हैं और हर बच्चे से पूछ रहे हैं कि घर जाकर अपने माता-पिता से यह जरूर पूछें कि वो उनसे प्यार करते हैं या नहीं। अगर वो जवाब में हाँ कहते हैं तो उन्हें बोलें कि वोट उन्हीं को दें, जो हमारे लिए स्कूल बना रहे हैं।

नहीं रहे पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस, 77 में जेल से चुनाव लड़ 3 लाख वोटों से पाई थी जीत

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान देश के रक्षा मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस का आज (जनवरी 29, 2019) निधन हो गया। लम्बे समय से बीमार चल रहे जॉर्ज फर्नांडिस ने दिल्ली के मैक्स अस्पताल में आख़िरी साँस ली। जॉर्ज फर्नांडिस अपने आख़िरी वर्षों में अल्ज़ाइमर से पीड़ित थे और उन्हें कुछ भी याद नहीं रहता था। रक्षा मंत्री के अलावा उन्हें आपातकाल के दौरान सक्रियता के कारण भी जाना जाता है।

वह 2004 में बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर से सांसद चुने गए थे। जॉर्ज फर्नांडिस का राजनीतिक जीवन काफ़ी लम्बा रहा है और उन्हें देश के दिग्गज नेताओं में से एक माना जाता था। वीपी सिंह की सरकार के दौरान उन्होंने केंद्रीय रेल मंत्री का पद भी संभाला था। मुंबई में ट्रेड यूनियन के नेता के तौर पर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करने वाले जॉर्ज वहाँ के कामगारों में काफ़ी लोकप्रिय थे और उनके हक़ के लिए उन्होंने कई लड़ाइयाँ लड़ी थीं।

अपने विरोध प्रदर्शनों और कड़े तेवर की वज़ह से जाने जाने वाले जॉर्ज फर्नांडिस ट्रेड यूनियन से लेकर राजनीति में ऊपर चढ़ते गए और उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 1976 में आपातकाल के दौरान उन्हें कोलकाता से गिरफ़्तार किया गया था।

जॉर्ज फर्नांडिस काफ़ी दिनों से राजनीति में सक्रिय नहीं थे और बीमारी के कारण उन्होंने लोगों से मिलना-जुलना भी कम कर दिया था। मुज़फ़्फ़रपुर के लोग आज भी उन्हें याद कर के भावुक हो उठते हैं। जिले में दूरदर्शन केंद्र, काँटी थर्मल पावर स्टेशन, लिज्जत पापर फैक्ट्री- इन सब की स्थापना का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। जिले में उनके इन सभी कार्यों से रोज़गार का सृजन हुआ था। 1977 में उन्होंने जेल से ही मुज़फ़्फ़रपुर से चुनाव लड़ा था और 3 लाख से भी अधिक मतों से विजयी हुए थे।

फर्नांडिस का रक्षा मंत्री वाला काल भी यादग़ार रहा है। उसी दौरान भारत ने कारगिल में पाकिस्तान को परास्त किया और पोखरण परमाणु परीक्षण के दौरान भी जॉर्ज फर्नांडिस ही देश के रक्षा मंत्री थे। उन्हें बिहार की वर्तमान सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) की स्थापना के लिए भी जाना जाता है।