उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक युवती की आत्महत्या को लेकर विपक्षी राजनीतिक दल लगातार माहौल बिगाड़ने की कोशिश में लगे हैं। सपा से लेकर कॉन्ग्रेस तक विपक्ष दल बार-बार इस मुद्दे पर झूठे खबरों के सहारे भड़काने की कोशिश में लगे हैं। अब विपक्ष की इन्हीं कोशिशों पर लगाम लगाने के लिए UP पुलिस ने कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। पुलिस ने कॉन्ग्रेस और सपा से जुड़े सपा मीडिया सेल के खिलाफ FIR दर्ज की है।
क्या है मामला?
गाजीपुर के करण्डा थाना क्षेत्र के कटारिया गाँव में 14 अप्रैल 2026 की रात निशा/नेहा विश्वकर्मा घर से लापता हो गई। CCTV में वह रात करीब 2 बजे अकेले गंगा पुल की ओर जाती दिखी। जाँच में पता चला कि वह अपने दोस्त हरिओम से मिलकर लौटी थी और घरवालों को पता चलने के डर से परेशान थी। सुबह करीब 5:30 बजे उसने अपने पिता को फोन करके आत्महत्या की बात कही और कुछ ही मिनट बाद गंगा नदी में कूद गई।
पुलिस को मौके से उसका मोबाइल, चप्पल और दुपट्टा मिला और पोस्टमार्टम में मौत का कारण डूबना बताया गया। हालाँकि, परिवार ने शुरुआत में आत्महत्या की बात कही लेकिन बाद में इसे हत्या बताया और केस दर्ज कराया। इस मामले में एक आरोपित गिरफ्तार भी हुआ है। बाद में मामला राजनीतिक बन गया और विपक्ष ने गैंगरेप-हत्या की बात कही लेकिन पुलिस का कहना है कि अब तक जाँच में रेप या हत्या के कोई सबूत नहीं मिले हैं और मामला आत्महत्या का ही लग रहा है। हालाँकि, राजनीतिक दल और नेता फिर भी अफवाह फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं।
कॉन्ग्रेस पर यूपी पुलिस ने की FIR
कॉन्ग्रेस ने इस मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ को घेरने के लिए झूठ का खूब सहारा लिया। लोकसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने झूठ फैलाकर लोगों को गुमराह करने की कोशिश की लेकिन गाजीपुर पुलिस ने उनका फैक्ट चेक कर लोगों को सच्चाई दिखाई। हालाँकि, कॉन्ग्रेस फिर भी नहीं मानी और लगातार इस मुद्दे पर झूठ फैलाती रही और अब उत्तर प्रदेश पुलिस ने कॉन्ग्रेस के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है।
ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR की कॉपी में लिखा गया है, “कटरिया गाँव की घटना को लेकर विश्वकर्मा समाज की एक बेटी के साथ बलात्कार एवं निर्मम हत्या और FIR कराने से रोकने जैसी गलत टिप्पणी सोशल मीडिया प्लेटफार्म X पर Congress (@INCIindia) की ओर की गई है। जिसको लेकर गाँव में तनाव का माहौल बना हुआ है।”
कॉन्ग्रेस के खिलाफ दर्ज FIR
सपा की मीडिया सेल के खिलाफ भी दर्ज हुआ केस
सिर्फ कॉन्ग्रेस ही नहीं बल्कि अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी सपा की मीडिया सेल के खिलाफ भी उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है। सपा के मीडिया सेल पर भी मामले में लोगों को गुमराह करने का आरोप है।
ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR की कॉपी में लिखा गया है, “कटरिया गाँव की घटना को लेकर विश्वकर्मा समाज की एक बेटी के साथ बलात्कार एवं निर्मम हत्या और FIR कराने से रोकने जैसी गलत टिप्पणी सोशल मीडिया प्लेटफार्म X पर Samajwadi Party Media Cell (@mediacellsp) की ओर से की गई है। जिसको लेकर गाँव में तनाव का माहौल बना हुआ है।”
सपा के खिलाफ दर्ज FIR
कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी व अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा ने जिस तरह इस संवेदनशील मामले को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया वह सिर्फ राजनीति नहीं बल्कि समाज को भड़काने की सुनियोजित कोशिश दिखाई देती है। बिना सबूत के ‘गैंगरेप’ और ‘हत्या’ जैसे गंभीर आरोप उछालकर इन दलों ने न केवल लोगों को गुमराह किया बल्कि एक पूरे क्षेत्र में तनाव फैलाने का जोखिम भी खड़ा कर दिया है।
अब UP पुलिस की यह कार्रवाई साफ संकेत है कि झूठ और अफवाह के सहारे माहौल बिगाड़ने की कोशिशें बर्दाश्त नहीं की जाएँगी। राजनीतिक फायदे के लिए ऐसी गैरजिम्मेदाराना बयानबाजी न सिर्फ कानून व्यवस्था को चुनौती देती है बल्कि न्याय प्रक्रिया को भी कमजोर करती है और इसी पर अब सख्ती जरूरी हो गई है।
दिल्ली के शराब घोटाला मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को एक पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह अब उनके समक्ष व्यक्तिगत रूप से या वकील के माध्यम से पेश नहीं होंगे।
पत्र में केजरीवाल ने क्या कहा?
केजरीवाल के अनुसार, यह फैसला उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर लिया। उन्होंने महात्मा गाँधी के ‘सत्याग्रह’ का हवाला देते हुए लिखा कि जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है, न्याय की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो उसे अपनी अंतरात्मा के अनुसार कदम उठाना चाहिए, चाहे उसके परिणाम उसके खिलाफ ही क्यों न जाएँ।
In all humility and with complete respect for judiciary, I have written the following letter to Justice Swarna Kanta Sharma, informing her that pursuing Gandhian principles of Satyagraha, it won’t be possible for me to pursue this case in her court, either in person or through a… pic.twitter.com/HmyOyNYug8
उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अब इस केस में न तो खुद कोर्ट में पेश होंगे और न ही उनके वकील उनकी ओर से कोई दलील देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वह इस निर्णय के संभावित कानूनी परिणामों को समझते हैं और उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह आगे चलकर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का जाने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।
जानिए क्या कहता है कानून?
अब यहाँ सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि कानून इस पूरे घटनाक्रम को किस नजरिए से देखता है। आज तक ने इस मामले पर कानूनी विशेषज्ञों से बातचीत की है और बताया है कि इसके क्या परिणाम हो सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश तामता ने विस्तार से कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।
उनके अनुसार, जब किसी आरोपित को ट्रायल कोर्ट से राहत मिलती है, तब भी उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत एक बॉन्ड भरना होता है। यह बॉन्ड आमतौर पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437A के तहत होता है, जिसमें आरोपित यह वादा करता है कि यदि हाई कोर्ट में अपील होती है, तो वह सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश होगा।
इस मामले में भी केजरीवाल ने ऐसा बॉन्ड भरा है। मतलब वह कानूनी रूप से बाध्य हैं कि हाई कोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान उपस्थित रहें। यदि वह कोर्ट में पेश नहीं होते हैं, तो यह बॉन्ड का उल्लंघन माना जाएगा और कोर्ट उनके खिलाफ पहले जमानती वारंट जारी कर सकती है।
यदि इसके बावजूद भी वे पेश नहीं होते हैं, तो गैर-जमानती वारंट भी जारी किया जा सकता है। कानून का एक और महत्वपूर्ण पहलू इस मामले में सामने आता है, जिसे ‘एकतरफा सुनवाई’ या Ex-Parte कहा जाता है। यदि कोई आरोपित कोर्ट में उपस्थित नहीं होता है, तो कोर्ट उसके बिना ही सुनवाई आगे बढ़ा सकती है।
इसका मतलब यह होता है कि केवल जाँच एजेंसी या विरोधी पक्ष की दलीलें सुनी जाएँगी और आरोपित को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिलेगा। यदि इस तरह की सुनवाई में फैसला जाँच एजेंसी के पक्ष में जाता है, तो ट्रायल कोर्ट का राहत देने वाला फैसला पलट सकता है और मामला दोबारा ट्रायल के लिए भेजा जा सकता है।
ऐसी स्थिति में अरविंद केजरीवाल को फिर से आरोपित के रूप में पेश होना पड़ सकता है और पूरी कानूनी प्रक्रिया एक बार फिर शुरू हो सकती है।
अब जानिए क्या है पूरा मामला?
मामला दिल्ली सरकार की 2021-22 की शराब नीति से जुड़ा है, जिस पर आरोप लगे कि इसमें नियमों को बदलकर कुछ निजी पक्षों को फायदा पहुँचाया गया और भ्रष्टाचार हुआ। जाँच एजेंसियों ने इस केस में केजरीवाल समेत कई लोगों को आरोपित बनाया और लंबी जाँच के बाद मामला कोर्ट तक पहुँचा।
इस केस में 27 फरवरी 2026 को ट्रायल कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए केजरीवाल और अन्य आरोपितों को राहत दे दी। कोर्ट ने साफ कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। इतना ही नहीं, कोर्ट ने जाँच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए और जाँच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश तक कर दी।
लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ जाँच एजेंसी ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दाखिल कर दी। यह अपील जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच के सामने आई। हाई कोर्ट ने सुनवाई के शुरुआती चरण में ट्रायल कोर्ट के कुछ निर्देशों पर रोक लगाई और मामले को आगे सुनने का निर्णय लिया।
यहीं से इस केस ने एक नया मोड़ लिया, क्योंकि अब यह सिर्फ ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा नहीं रह गया था, बल्कि हाईकोर्ट में पूरी प्रक्रिया फिर से खुलने की स्थिति बन गई थी।
अरविंद केजरीवाल के बेतुके माँग ने मोड़ा केस का रुख
इसी दौरान अरविंद केजरीवाल ने माँग की कि इस केस की सुनवाई जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच से हटाकर किसी दूसरी बेंच को दे दी जाए। इस माँग के पीछे उन्होंने ‘कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ यानी हितों के टकराव का मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि जस्टिस शर्मा के परिवार के सदस्य केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में हैं।
चूँकि इस केस में जाँच एजेंसी केंद्र सरकार के अधीन है और उसकी ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश होते हैं, इसलिए उन्हें आशंका है कि निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है। हालाँकि कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि किसी जज के रिश्तेदार वकालत करते हैं या किसी पैनल में हैं, यह नहीं माना जा सकता कि वह पक्षपाती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस तरह के आधार पर जज खुद को अलग करने लगें, तो न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा और हर पक्षकार अपनी सुविधा के अनुसार जज बदलने की कोशिश करेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी आरोपित या पक्षकार को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह तय करे कि उसका केस कौन सा जज सुनेगा।
जब उनकी यह माँग खारिज हो गई, तो इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता को एक विस्तृत पत्र लिखा। यह पत्र इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा बन गया है। इस पत्र में उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें अब इस कोर्ट से निष्पक्ष न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रही है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट की कार्यवाही सख्त नियमों और प्रक्रियाओं के तहत चलती है। इसमें व्यक्तिगत असहमति के आधार पर कोर्ट में पेश न होना न केवल खुद के केस को कमजोर करता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है।
यदि केजरीवाल कोर्ट में पेश नहीं होते हैं, तो हाई कोर्ट सख्त रुख अपना सकता है, जिसमें वारंट जारी करना और एकतरफा सुनवाई शामिल है। वहीं यदि हाई कोर्ट जाँच एजेंसी की अपील को स्वीकार कर लेता है, तो मामला फिर से निचली अदालत में जा सकता है और कानूनी लड़ाई एक बार फिर नए सिरे से शुरू हो सकती है।
मध्य प्रदेश के खंडवा में शुक्रवार (24 अप्रैल 2026) को पुलिस ने अनवर कुरैशी नाम के एक व्यक्ति को नकली घी बनाने और बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया। आरोप है कि कुरैशी जानवरों की चर्बी, हड्डियों और खाल का इस्तेमाल कर घी जैसी चीज तैयार करता था। यह अवैध यूनिट इमलीपुरा इलाके में बेगम पार्क के पास एक संकरी गली में चल रही थी।
कुरैशी के घर पर अधिकारी (फोटो साभार: दैनिक जागरण)
अधिकारियों को लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि वहाँ जानवरों को काटा जा रहा है और उनकी चर्बी, हड्डियों और खाल को प्रोसेस कर खाने-पीने की चीजों में इस्तेमाल किया जा रहा है। जिला प्रशासन, नगर निगम, पशु चिकित्सा विभाग और पुलिस की एक संयुक्त टीम बनाई गई और मौके पर छापा मारा गया।
अधिकारियों को शक है कि कुरैशी यह नकली घी स्थानीय बाजार में खासकर ढाबों और रेस्टोरेंट्स में सप्लाई कर रहा था। छापे के दौरान टीम को जानवरों की खाल और हड्डियों से भरे बोरे मिले। इसके अलावा चर्बी जैसे पदार्थ से भरे ड्रम और कंटेनर भी बरामद किए गए। मौके से बड़ी मात्रा में कच्चा माल, तैयार तरल पदार्थ और घी जैसी सामग्री मिली।
9 ड्रम और 79 कंटेनर जब्त
सिटी मजिस्ट्रेट बजरंग बहादुर ने मीडिया को बताया कि मौके से 79 कंटेनर बरामद किए गए, जिनमें से हर एक में करीब 30 किलो संदिग्ध पदार्थ भरा हुआ था। इसके अलावा 200 किलो क्षमता वाले 9 बड़े ड्रम भी मिले, जो जानवरों की चर्बी से भरे थे। पशु चिकित्सा विभाग ने सैंपल लेकर जाँच के लिए लैब भेज दिए हैं।
कुरैशी के घर पर अधिकारी (फोटो साभार: दैनिक जागरण)
अधिकारियों का कहना है कि पहली नजर में यह सामग्री जानवरों की चर्बी लग रही है, लेकिन इसकी असली प्रकृति और इस्तेमाल की पुष्टि लैब रिपोर्ट आने के बाद ही होगी।
FIR में क्या कहा गया है?
मामले की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। FIR के अनुसार, नगर निगम खंडवा के जोन प्रभारी की शिकायत पर मोगट रोड थाने में मामला दर्ज किया गया है। यह केस मध्य प्रदेश कृषि गोवंश संरक्षण अधिनियम की धारा 7 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 292 के तहत अनवर शेख बिस्मिल्लाह कुरैशी के खिलाफ दर्ज हुआ है।
साभार: खंडवा पुलिस, मध्य प्रदेश
SHO धरवाल ने बताया कि उन्हें नगर निगम की ओर से एक पत्र मिला था, जिस पर जोन प्रभारी जाकिर अहमद और भुवन श्रीमाली के हस्ताक्षर थे, जिसके आधार पर FIR दर्ज की गई।
शिकायत के अनुसार, सिटी मजिस्ट्रेट, सिटी सीएसपी, तहसीलदार, नगर निगम के डिप्टी कमिश्नर, मोगट रोड थाने के SHO और अन्य अधिकारियों की टीम ने बेगम पार्क के सामने, परदेशीपुरा इलाके में संयुक्त निरीक्षण किया।
साभार: खंडवा पुलिस, मध्य प्रदेश
यह जगह अनवर कुरैशी की बताई गई, जहाँ वह अपने घर के अंदर जानवरों की चर्बी पिघला रहा था। मौके पर उसने नगर निगम का जो लाइसेंस दिखाया, वह किसी और के नाम पर था और उसकी वैधता 2023 में ही खत्म हो चुकी थी। इसके बावजूद वह चर्बी, खाल, सींग और अन्य जानवरों के अवशेषों का अवैध रूप से भंडारण और व्यापार कर रहा था।
छापे के दौरान अधिकारियों ने 15 किलो क्षमता के 69 टिन चर्बी, 200 लीटर क्षमता वाले 9 ड्रम जिनमें अज्ञात केमिकल था, 600 चमड़े के टुकड़े, भैंस या इसी तरह के जानवरों के 35 बोरे सींग और 6 बोरे पाइप जैसे हिस्से बरामद किए।
स्थानीय लोगों ने उठाए सवाल, विधायक कंचन तंवे की प्रतिक्रिया
खंडवा CSP अभिराम वरांगे ने बताया कि आरोपित कुरैशी को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि यह कारोबार कब से चल रहा था और इसमें और कौन-कौन लोग शामिल हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्थानीय लोगों ने कई बार इस जगह को लेकर शिकायत की थी, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई थी।
लोगों का कहना है कि यहाँ जानवर लाए जाते थे, उन्हें काटा जाता था और उनकी चर्बी, हड्डियों और खाल को पकाकर प्रोसेस किया जाता था। छापे के बाद स्थानीय निवासियों ने सवाल उठाया कि इतनी लंबे समय तक यह काम बिना किसी रोक-टोक के कैसे चलता रहा।
घटना के बाद खंडवा की विधायक कंचन तंवे मौके पर पहुँचीं और इस मामले को बेहद गंभीर बताया। उन्होंने जिला प्रशासन से सख्त कार्रवाई की माँग की और दोषियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की बात कही।
(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
असदुद्दीन ओवैसी की मजहबी पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता आए दिन विवादित बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। कभी मुंब्रा की पार्षद सहर शेख खुलेमंच से पूरे इलाके को ‘हरा रंग‘ में रंगने का ख्वाब बुनती हैं, तो कभी असदु्द्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ‘15 मिनट के लिए पुलिस हटाने‘ की धमकी देती हैं। तो अब ताजा उदाहरण हैं सईदा फलक। ये देश के उच्च पदों पर बैठे नेताओं के लिए ‘गंदी भाषा’ का इस्तेमाल करती हैं।
सईदा फलक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अपमानजनक टिप्पणी की है। मुस्लिम भीड़ को संबोधित करते हुए सईदा फलक अपमानजनक टिप्पणी करते यह वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। लोग सईदा फलक की इन अपमानजनक टिप्पणी के खिलाफ कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।
सईदा फलक ने पीएम मोदी से लेकर सीएम योगी पर की अपमानजनक टिप्पणी
सामने आए वीडियो में AIMIM नेता सईदा फलक सीएम योगी आदित्यनाथ को ‘बंदर’ कहती है। सईदा ने कहा, “ये ‘बंदर’ योगी बंगाल में कहता है कि बंगाल को काबा नहीं बनने देंगे। ये क्या आपके बाप की जागीर है।” वे चेतावनी देते हुए कहती है, “इंशाल्लाह, कयामत तक हम दाढ़ी करेंगे, हिजाब पहनेंगे, टोपी पहनेंगे, अजान पढ़ेंगे, नमाज पढ़ेंगे, शरियत पर चलेंगे।”
असदुद्दीन ओवैसी की हिजाब पहनने वाली महिला को भारत का प्रधानमंत्री बनने वाले बयान का जिक्र करते हुए सईदा फलक ने आगे कहा, “जब ओवैसी ऐसा कहते हैं, तो सब कहते हैं कि ये गजवा-ए-हिंद की बात कर रहे हैं… क्यों नहीं बन सकते? जब कल का तड़ीपार आज होम मिनिस्टर बनकर बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है, जो कल का चायवाला था वो प्राइम मिनिस्टर बनकर देश को बेच रहा है।” सईदा की इस अपमानजनक टिप्पणी पर मुस्लिम भीड़ जोर-जोर से हँस रही है और नारेबाजी कर रही है।
सईदा फलक के खिलाफ लोगों ने कार्रवाई की माँग की
AIMIM नेता सईदा फलक की पीएम मोदी, केंद्रीय मंत्री अमित शाह और सीएम योगी आदित्यनाथ पर की गई अपमानजनक टिप्पणी के खिलाफ लोगों ने कार्रवाई की माँग की है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर लोग यूपी पुलिस, गृह मंत्रालय और योगी कार्यालय को टैग करते हुए कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।
अमिताभ चौधरी नाम के ‘एक्स’ यूजर लिखते हैं, “AIMIM नेता सईदा फलक सीएम योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अमित शाह के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी कर रही है। @Uppolice@myogioffice@AmitShahOffice मामले में दखल दें।”
AIMIM leader Syeda Falak is making derogatory remarks against CM Yogi Adityanath & HM Amit Shah ‼️
‘फाइटर 3.0’ नाम से यूजर कहते हैं, “आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन मर्यादा की सीमा लांघकर की गई टिप्पणी बिल्कुल स्वीकार्य नहीं हो सकती। सईदा फलक द्वारा योगी आदित्यनाथ और अमित शाह पर की गई कथित अपमानजनक टिप्पणियाँ सीधे-सीधे राजनीतिक शालीनता पर सवाल उठाती हैं। सीधा संदेश: असहमति हो सकती है, लेकिन अभद्रता नहीं।”
आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन मर्यादा की सीमा लांघकर की गई टिप्पणी बिल्कुल स्वीकार्य नहीं हो सकती।
Syeda Falak द्वारा Yogi Adityanath और Amit Shah पर की गई कथित अपमानजनक टिप्पणियाँ सीधे-सीधे राजनीतिक शालीनता पर सवाल उठाती हैं।
वे आगे कहते हैं, “राजनीति में स्तर गिराकर नहीं, तर्क और काम के दम पर जवाब दिया जाता है। जरूरत है कि ऐसी भाषा पर कड़ा संज्ञान लिया जाए, ताकि सार्वजनिक विमर्श की गरिमा बनी रहे और कोई भी नेता सीमाएँ पार करने की हिम्मत न करे। @Uppolice@myogioffice@AmitShahOffice“
दीपक शर्मा नाम के यूजर लिखते हैं, “हैलो @Uppolice सईदा फलक हमारे CM योगीजी के लिए बेहद अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रही है। इस खुदीली खातून के खिलाफ कार्यवाही करें।”
हैदराबाद की रहने वाली 31 साल की सईदा फलक कराटे की खिलाड़ी रह चुकी हैं। सईदा ने 20 राष्ट्रीय और 22 अंतरराष्ट्रीय कराटे चैंपियनशिप जीते हैं। वे तेलंगाना की पहली खिलाड़ी हैं जिन्होंने वर्ल्ड कराटे चैंपियनशिप और एशियाई कराटे चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई किया। खिलाड़ी के तौर पर सईदा की सबसे बड़ी उपलब्धि 2016 में यूएस ओपन कराटे चैंपियनिशिप और 2022 में दुबई के शोरिन काई कराटे कप में स्वर्ण पदक जीतकर हासिल की। इसके अलावा सईदा फलक पेशेवर तौर पर एक एडवोकेट भी हैं।
खेल में करियर बनाने के बाद सईदा ने राजनीति ज्वाइन की। साल 2020 में सईदा ने ओवैसी की पार्टी AIMIM का दामन थाम लिया। तभी से वह AIMIM की विचारधारा का प्रचार करते नजर आती हैं। AIMIM ज्वाइन करने के बाद सईदा फलक की एक अलग पहचान बनी। सईदा को बुर्के में भड़काऊ भाषण देते देखा गया, जो सीधे नेताओं को टारगेट कर बोलती हैं, इसीलिए उन्हें ‘लेडी ओवैसी’ भी कहा जाने लगा।
सईदा फलक का हिजाब पर समर्थन और हिंदू देवी-देवताओं का अपमान को लेकर
सईदा फलक एक तरफ हिजाब पहनने का समर्थन करती हैं और दूसरी तरफ महिलाओं की आवाज बुलंद करने के लंबे-लंबे भाषण देती हैं। यही वजह है कि सईदा को उनके ही भाषणों के लिए कई बार घेरा जा चुका है। 4 साल पहले न्यूज 18 की डिबेट में सईदा फलक ने कहा कि ‘मदरसों में लड़कियों को हिजाब की अहमियत समझाई जाएगी’, तब होस्ट अमन चोपड़ा ने उनसे सवाल किया, “आप भी हिजाब नहीं पहनती थी।” तो सईदा ने इसे विकल्प बताया, लेकिन अगली ही लाइन में इसे इस्लाम में जरूरी बताया, जिसके बाद वे टीवी डिबेट में घिरती नजर आईं।
और जब अकबरुद्दीन ओवैसी ने हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करते हुए कहा था, “कई इन लोगों के खुदा हैं। वो क्या-क्यो जो पूजा करते हैं। कितने राम-लक्ष्मण-दुर्गा क्या क्या है? हर 8 दिन में एक नया पैदा हो जाता है। अब हनुमान जयंती आ गई, लक्ष्मू मालूम थी और अब भाग्य लक्ष्मी आ गई।” तब सईदा फलक ने न्यूज 18 के साथ डिबेट में अकबरुद्दीन ओवैसी का बचाव किया था।
पहले भी सीएम योगी पर की अभद्र टिप्पणी, जानिए पुराने विवादित बयान
सईदा फलक को यूँ ही AIMIM में ‘लेडी ओवैसी’ नहीं कहा जाता है बल्कि उनके बयान भी ओवैसी से मिलते जुलते हैं। सईदा फलक कभी-भी मंच से किसी भी नेता को धमकी दे देती हैं, कभी किसी के लिए अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करती हैं।
वे पहले भी सीएम योगी के खिलाफ अभद्र टिप्पणी कर चुकी हैं, “उनका (सीएम योगी) खुद का नाम पहले अजय बिष्ट था, नाम बदलकर योगी आदित्यनाथ रख लिया। तो बेहतर यह होगा कि एक बार फिर से वो अपना नाम बदलकर नाम बदलने वाला बंदर रख लें।”
हाल ही में बिहार चुनाव और मुंबई के BMC चुनावों में भी सईदा फलक के कई विवादित बयान सामने आए थे। किशनगंज में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए सईदा शेख ने पीएम मोदी और सीएम योगी को ‘छोटा शैतान‘ कहा था। वहीं BMC चुनावों में महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस को चुनौती देते हुए सईदा ने कहा था, “सुन लो फडणवीस, अगर अल्लाह ने चाहा तो एक दिन इसी नकाब और हिजाब को पहनकर एक मुस्लिम औरत हिंदुस्तान की प्राइम मिनिस्टर बनेगी।”
AIMIM नेताओं की ‘गलीचपने’ की रही पृष्ठभूमि
अब सईदा शेख की इन अपमानजनक टिप्पणियों को सुनने के बाद ज्यादा हैरानी भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ये उसी पार्टी की नेता हैं, जिसमें सहर शेख और अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे नेता शामिल हैं। और यही AIMIM की पहचान है, कि देश के प्रधानमंत्री और प्रशासन को सीधी ‘गाली’ या ‘धमकी’ देकर चर्चा में आओ और फिर खुद को बड़ा नेता बनाओ। इन सभी नेताओं से ऐसे बयान करने की उम्मीद भी है, क्योंकि इनके मुखिया असदु्द्दीन ओवैसी ही आए दिन हिंदू-विरोधी और कट्टर बयान देते नजर आते हैं और मंच के सामने बैठी कौम इसपर ठहाके मारकर हँसती है।
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन चुका है। बैंकिंग से लेकर शॉपिंग, OTP से लेकर पर्सनल बातचीत सब कुछ इसी एक डिवाइस पर निर्भर है।
लेकिन अब साइबर अपराधियों ने इस भरोसेमंद सिस्टम को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया है। कुछ समय पहले कनाडा में टोरन्टो पुलिस सर्विस ने एक ऐसे हाई-टेक साइबर फ्रॉड का खुलासा किया है, जिसने पूरी दुनिया के एक्सपर्ट्स को चौंका दिया है।
इस मामले में SMS ब्लास्टर नाम की तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जो एक नकली मोबाइल टावर की तरह काम करती है। आरोपित इस डिवाइस को कार में लेकर शहर में घूमते थे और जहाँ भी भीड़ होती, वहाँ यह फर्जी टावर एक्टिव कर देते थे।
जैसे ही आसपास के मोबाइल फोन इस नेटवर्क से जुड़ते है, लोगों को फर्जी SMS मिलने लगते है, जो दिखने में बिल्कुल असली लगते थे जैसे बैंक, सरकारी संस्था या किसी सर्विस प्रोवाइडर के नाम से।
इन मैसेज में दिए लिंक पर क्लिक करते ही यूजर्स का पर्सनल और बैंकिंग डेटा चोरी हो जाता था। पुलिस के मुताबिक, इस ऑपरेशन के दौरान 13 मिलियन से ज्यादा नेटवर्क डिसरप्शन हुए और हजारों लोग प्रभावित हुए।
यह सिर्फ एक देश का मामला नहीं, बल्कि एक ऐसा खतरा है जो तेजी से पूरी दुनिया में फैल रहा है और अब भारत जैसे देशों के लिए भी बड़ा अलार्म बन चुका है।
कनाडा में पहली बार सामने आया SMS ब्लास्टर केस
कनाडा में इस तरह का यह पहला मामला है, जिसने साइबर सिक्योरिटी सिस्टम की कमजोरियों को सामने ला दिया है। पुलिस ने इस पूरे ऑपरेशन को प्रोजेक्ट लाइट्हाउस नाम दिया। जाँच की शुरुआत नवंबर 2025 में हुई, जब अधिकारियों को डाउनटाउन टोरंटो में एक संदिग्ध डिवाइस के बारे में जानकारी मिली।
धीरे-धीरे जाँच आगे बढ़ी तो पता चला कि यह कोई साधारण डिवाइस नहीं, बल्कि एक मोबाइल SMS ब्लास्टर है, जिसे कार के अंदर छिपाकर चलाया जा रहा था। इससे आरोपित आसानी से लोकेशन बदलते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों को निशाना बना रहे थे।
इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनकी उम्र 21 से 27 साल के बीच है। इन पर धोखाधड़ी, कंप्यूटर सिस्टम में हस्तक्षेप और लोगों की जान को खतरे में डालने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। पुलिस का कहना है कि यह एक संगठित साइबर क्राइम था, जो लंबे समय से चल रहा था।
क्या है SMS ब्लास्टर और कैसे करता है काम
अगर आसान भाषा में समझें, तो SMS ब्लास्टर एक नकली मोबाइल टावर है। तकनीकी तौर पर इसे IMSI कैचर भी कहा जाता है। इसका काम असली टावर की तरह सिग्नल देना और आसपास के मोबाइल फोन को अपनी तरफ खींचना होता है।
हमारा फोन हमेशा उसी नेटवर्क से जुड़ता है, जहाँ सिग्नल सबसे ज्यादा मजबूत होता है। स्कैमर्स इसी बात का फायदा उठाते हैं। वे एक ऐसा डिवाइस तैयार करते हैं, जो असली टावर से भी ज्यादा स्ट्रॉन्ग सिग्नल देता है।
SMS ब्लास्टर (सोर्स – CBC)
जैसे ही आपका फोन इस फर्जी टावर से कनेक्ट होता है, वह असली नेटवर्क से कट जाता है और स्कैमर के कंट्रोल में आ जाता है। इसके बाद आपके फोन पर सीधे SMS भेजे जाते हैं। ये मैसेज इतने असली लगते हैं कि यूजर को शक ही नहीं होता।
कैसे हजारों लोगों को बनाया जाता है शिकार
इस स्कैम की सबसे बड़ी ताकत इसका दायरा और तेजी है। यह कोई ऐसा फ्रॉड नहीं है जिसमें एक-एक करके लोगों को कॉल या मैसेज किया जाता है, जैसा हम हर दिन अपने आस-पास देखते है।
फर्जी फोन कॉल जिसमें कभी बैंक अकाउंट बंद होने के नाम पर OTP माँगा जाता है,काभी ATM कार्ड को अनब्लॉक करने के नाम पर OTP के बहाने पैसे ट्रैन्स्फर कर लिए जाते है, जैसा हुमने जामतारा सीरीज में देखा है।
लेकिन अगर बात SMS ब्लास्टर की करे तो यह एक साथ सैकड़ों-हजारों मोबाइल फोन को टारगेट कर सकता है। स्कैमर्स इसके लिए खासतौर पर भीड़भाड़ वाले इलाके चुनते हैं, जैसे मॉल, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, बाजार, धार्मिक स्थल या बड़े इवेंट। वजह साफ है जितनी ज्यादा भीड़, उतने ज्यादा फोन एक साथ उनके जाल में फंस सकते हैं।
ये लोग अपने SMS ब्लास्टर डिवाइस को कार, बैग या किसी बॉक्स में छिपाकर रखते हैं। जैसे ही डिवाइस ऑन होता है, यह आसपास के मोबाइल फोन को अपने नेटवर्क से जोड़ना शुरू कर देता है।
चूँकि फोन हमेशा सबसे मजबूत सिग्नल से जुड़ता है, इसलिए वह असली टावर छोड़कर इस फर्जी टावर से कनेक्ट हो जाता है। इसके बाद स्कैमर्स उन सभी यूजर्स को एक साथ फर्जी SMS भेजते हैं।
टोरंटो केस में सामने आया कि हजारों फोन इस नेटवर्क से जुड़े और 13 मिलियन से ज्यादा बार नेटवर्क को लेकर समस्या का सामना करना पड़ा। इसका मतलब यह है कि एक ही डिवाइस से लंबे समय तक लगातार बड़े पैमाने पर हमला किया जा सकता है। कई बार लोग समझ ही नहीं पाते कि उनके फोन के साथ क्या हो रहा है और अनजाने में वे फ्रॉड का शिकार बन जाते हैं।
2G नेटवर्क कैसे है सबसे बड़ी कमजोरी
इस पूरे फ्रॉड का असली खेल 2G नेटवर्क पर निर्भर करता है। आमतौर पर आजकल ज्यादातर लोग 4G या 5G नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं, जो ज्यादा सुरक्षित होते हैं और इनमें बेहतर एन्क्रिप्शन होता है।
लेकिन SMS ब्लास्टर एक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करता है जिसे ‘साइलन्ट डाउन्ग्रैड 2G’ कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि आपका फोन बिना आपको बताए 4G/5G से हटकर 2G नेटवर्क पर शिफ्ट हो जाता है।
2G नेटवर्क में सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें सिक्योरिटी सिस्टम बहुत पुराना और कमजोर है। इसमें फोन और टावर के बीच मजबूत ऑथेंटिकेशन नहीं होता, जिससे स्कैमर्स आसानी से बीच में घुस सकते हैं। कई मामलों में एन्क्रिप्शन या तो बहुत कमजोर होता है या बिल्कुल नहीं होता, जिसे नल साइफर कहा जाता है।
जब आपका फोन इस 2G नेटवर्क पर आ जाता है, तो स्कैमर्स को आपके डिवाइस से कम्युनिकेशन कंट्रोल करने का मौका मिल जाता है। वे मैसेज भेज सकते हैं, डेटा इंटरसेप्ट कर सकते हैं और आपको पता भी नहीं चलता। यही वजह है कि भले ही आपके पास नया स्मार्टफोन हो लेकिन अगर वो 2G सपोर्ट करता है, तो आप इस फ्रॉड के दायरे में आ सकते हैं।
क्यों इतना खतरनाक है ये फ्रॉड
यह स्कैम बाकी साइबर फ्रॉड से इसलिए अलग और ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह सीधे नेटवर्क लेवल पर काम करता है। आमतौर पर फ्रॉड में यूजर से कोई गलती करवाई जाती है, जैसे लिंक पर क्लिक करना, ऐप डाउनलोड करना या कॉल पर जानकारी देना। लेकिन यहाँ मामला उल्टा है। आपका फोन खुद ही फर्जी नेटवर्क से जुड़ जाता है और आपको पता भी नहीं चलता कि आप खतरे में हैं।
इस फ्रॉड में टेलीकॉम कंपनियाँ भी ज्यादा मदद नहीं कर पातीं, क्योंकि जो मैसेज भेजे जा रहे हैं, वे उनके नेटवर्क से होकर नहीं गुजरते। यानी न तो उन्हें ट्रैक किया जा सकता है और न ही आसानी से ब्लॉक किया जा सकता है।
इसके अलावा ये मैसेज देखने में बिल्कुल असली लगते हैं जैसे बैंक, सरकारी विभाग या किसी बड़ी कंपनी के नाम से। ऐसे में यूजर आसानी से भरोसा कर लेता है और लिंक पर क्लिक कर देता है।
सोर्स – BBC
इसके बाद उसका बैंकिंग डेटा, OTP, पासवर्ड या अन्य पर्सनल जानकारी चोरी हो सकती है। सबसे खतरनाक बात यह है कि ये सब चुपचाप होता है कि यूजर को काफी देर तक पता ही नहीं चलता कि उसके साथ फ्रॉड हो चुका है।
पब्लिक सेफ्टी के लिए भी है बड़ा खतरा
इस तकनीक का खतरा सिर्फ पैसों की ठगी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों की सुरक्षा के लिए भी गंभीर समस्या बन सकता है। जब आपका फोन फर्जी टावर से जुड़ जाता है, तो वह असली मोबाइल नेटवर्क से कट जाता है। इसका सीधा असर यह होता है कि आप कॉल या इंटरनेट का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाते।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस दौरान इमरजेंसी सेवाएँ भी प्रभावित हो सकती हैं। अगर कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति में फंस जाए जहाँ उसे तुरंत पुलिस, एंबुलेंस या फायर ब्रिगेड को कॉल करना हो, तो वह ऐसा नहीं कर पाएगा।
पुलिस के मुताबिक, नेटवर्क डिसरप्शन कुछ सेकंड से लेकर कई मिनट तक हो सकता है। अब सोचिए अगर किसी सड़क दुर्घटना, मेडिकल इमरजेंसी या किसी खतरे के समय आपका फोन नेटवर्क ही काम न करे, तो हालात कितने गंभीर हो सकते हैं। यही वजह है कि इसे सिर्फ साइबर फ्रॉड नहीं, बल्कि पब्लिक सेफ्टी का भी बड़ा खतरा माना जा रहा है।
स्कैमर्स के लिए क्यों फायदेमंद है यह तकनीक
SMS ब्लास्टर स्कैमर्स के लिए एक बेहद प्रभावी और फायदेमंद टूल बन चुका है। सबसे पहली बात, इसमें भेजे गए मैसेज लगभग 100% लोगों तक पहुँचते हैं। क्योंकि ये मैसेज सीधे फोन में जाते हैं, टेलीकॉम नेटवर्क इन्हें ब्लॉक नहीं कर पाता।
दूसरी बड़ी बात, इसकी लागत ज्यादा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऐसे डिवाइस 5000 से 10000 डॉलर यानि (लगभग 4-8 लाख रुपए) में मिल जाते हैं।
तीसरी और सबसे खतरनाक बात यह है कि स्कैमर्स इसमें अपने हिसाब से मैसेज तैयार कर सकते हैं। वे ऐसे मैसेज बनाते हैं जो बिल्कुल असली लगते हैं, जैसे आपका बैंक अकाउंट बंद होने वाला है, KYC अपडेट करें या बिजली बिल बकाया है।
ऐसे मैसेज लोगों में डर और घबराहट का माहौल बनाते हैं, जिससे वे बिना सोचे-समझे लिंक पर क्लिक कर देते हैं। कम लागत, ज्यादा पहुँच और पकड़ में न आने की वजह से यह तकनीक साइबर अपराधियों के लिए एक परफेक्ट हथियार बनती जा रही है।
भारत में क्या है स्थिति और खतरा
भारत में यह खतरा और भी ज्यादा गंभीर हो सकता है, क्योंकि यहाँ कई ऐसे फैक्टर हैं जो इस तरह के स्कैम को आसान बना देते हैं। सबसे पहला कारण है 2G नेटवर्क की मौजूदगी। भले ही शहरों में 4G और 5G आ चुका है, लेकिन देश के कई हिस्सों में अभी भी 2G नेटवर्क चलता है, जो इस तरह के हमले के लिए सबसे कमजोर कड़ी है।
दूसरा बड़ा कारण है भारत की विशाल आबादी और मोबाइल यूजर्स की संख्या। करोड़ों लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं, जिससे स्कैमर्स को एक बड़ा टारगेट बेस मिल जाता है।
तीसरा कारण है डिजिटल पेमेंट का तेजी से बढ़ता चलन। UPI, नेट बैंकिंग और मोबाइल वॉलेट के कारण लोग सीधे अपने फोन से पैसे का लेन-देन करते हैं, जिससे फ्रॉड का खतरा और बढ़ जाता है।
ऐसे में टेलीकॉम रेग्यलटोरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया और साइबर एजेंसियों के सामने यह एक बड़ी चुनौती बन सकती है कि वे इस नई तकनीक से कैसे निपटें।
भारत में सामने आ चुके ऐसे मामले
भारत में भी इस तरह के साइबर फ्रॉड के मामले सामने आने लगे हैं, जो यह दिखाते हैं कि खतरा अब हमारे करीब पहुँच चुका है। हाल के महीनों में दिल्ली, नोएडा और चंडीगढ़ जैसे शहरों में एजेंसियों ने छापेमारी कर ऐसे नेटवर्क पकड़े हैं, जो बड़े पैमाने पर फर्जी SMS भेज रहे थे।
इसी तरह हैदराबाद के साइबराबाद इलाके में पुलिस ने एक बड़े गैंग का पर्दाफाश किया, जिसमें कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। ये लोग विदेशी नेटवर्क से जुड़े थे और लोगों को फर्जी बैंक मैसेज और ट्रेडिंग ऑफर भेजकर ठग रहे थे।
सरकारी आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता को दिखाते हैं। 2024 से 2025 के बीच साइबर फ्रॉड के मामलों में करीब 300% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं 2025 में लोगों को करीब 30000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहा है और SMS ब्लास्टर जैसी तकनीक इसे और खतरनाक बना सकती है।
कैसे पहचानें कि आप टारगेट हो सकते हैं
यह स्कैम काफी एडवांस है, फिर भी कुछ संकेत ऐसे होते हैं जिनसे आप सतर्क हो सकते हैं। सबसे पहला संकेत है आपके फोन का अचानक 4G या 5G से 2G नेटवर्क पर आ जाना। अगर ऐसा बिना किसी वजह के होता है, तो यह एक चेतावनी हो सकती है।
दूसरा संकेत है एक साथ कई संदिग्ध मैसेज आना। अगर आपको लगातार बैंक, बिजली, KYC या डिलीवरी से जुड़े मैसेज मिलने लगें, तो सावधान हो जाना चाहिए।
तीसरा संकेत है मैसेज की भाषा। अगर उसमें जल्दी करने का दबाव हो जैसे अभी क्लिक करें, तुरंत अपडेट करें या वरना अकाउंट बंद हो जाएगा तो यह स्कैम हो सकता है। इन संकेतों को पहचानकर आप खुद को समय रहते बचा सकते हैं।
कैसे रखें खुद को सुरक्षित
इस तरह के खतरे से बचने के लिए सबसे जरूरी है सतर्क रहना। सबसे पहले किसी भी अनजान या संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने से बचें, चाहे वह कितना भी असली क्यों न लगे। दूसरा कभी भी OTP, पासवर्ड या बैंकिंग जानकारी किसी के साथ शेयर न करें। कोई भी असली बैंक या संस्था SMS के जरिए आपसे ऐसी जानकारी नहीं माँगती।
तीसरा अगर आपके फोन में ऑप्शन हो तो 2G नेटवर्क को बंद कर दें। इससे इस तरह के हमले का खतरा कम हो सकता है। इसके अलावा हमेशा किसी भी मैसेज की पुष्टि ऑफिशियल ऐप या वेबसाइट से करें। अगर शक हो, तो सीधे संबंधित कंपनी या बैंक से संपर्क करें।
SMS ब्लास्टर जैसी तकनीक यह साफ दिखाती है कि साइबर अपराध अब एक नए स्तर पर पहुँच चुका है। पहले जहाँ स्कैम सिर्फ कॉल या लिंक तक सीमित था, अब यह सीधे मोबाइल नेटवर्क को निशाना बना रहा है।
बिहार में पुलिस विभाग को लेकर राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) विनय कुमार के एक बयान के बाद सियासी हलचल बढ़ गई है। दरअसल, DGP विनय कुमार ने पूरे पुलिस महकमे को सख्त हिदायत देते हुए कहा है कि ड्यूटी के दौरान वर्दी में माथे पर तिलक, चंदन का टीका या किसी भी तरह के धार्मिक चिह्न लगाने की अनुमति नहीं होगी। उन्होंने इसे पुलिस मैनुअल के खिलाफ बताया है और उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी है।
क्या है DGP का पूरा आदेश?
डीजीपी विनय कुमार ने स्पष्ट किया कि पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के दौरान निर्धारित ड्रेस कोड का सख्ती से पालन करना होगा। उन्होंने कहा कि पुलिस की वर्दी में टोपी और बेल्ट पहनना अनिवार्य है बिना इनके ड्यूटी करने वाले पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई होगी।
इसके साथ ही आदेश में साफ कहा गया कि ड्यूटी के दौरान किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत या धार्मिक पहचान दिखाना अनुशासनहीनता की श्रेणी में आएगा। महिला पुलिसकर्मियों के लिए भी ड्यूटी के दौरान अत्यधिक श्रृंगार पर रोक लगाई गई है। इन निर्देशों का मकसद पुलिस बल में एकरूपता और पेशेवर छवि बनाए रखना बताया गया है।
DGP का एक वीडियो भी सामने आया है जिसमें वह तिलक ना लगाने की बात करते दिख रहे हैं। DGP ने कहा, “वर्दी पहनकर आप टीका चंदन नहीं लगा सकते हैं। यदि आप लगा रहे हैं तो एक सेकेंड के लिए लगाकर उसको हटा दीजिए। वर्दी अगर आपने पहनी है तो आप दसों उँगलियों में अंगूठी नहीं पहन सकते हैं।”
उन्होंने कहा, “वर्दी के साथ किसी भी प्रकार का अलंकरण वर्जित है।” वो बताते हैं कि महिलाओं के लिए जो आदेश निकाला गया था उसमें वर्दी के साथ महिलाओं के आभूषण पहनने पर भी रोक लगाई गई थी।
"चंदन और तिलक लगाकर पुलिस ऑफिसर ड्यूटी में न आए" … बिहार के DGP का फरमान
अब DGP के बयान पर भाजपा नेताओं ने खोला मोर्चा, DGP की मनसा पर उठाए सवाल…
वरिष्ठ भाजपा नेता हरिभूषण ठाकुर बचौल ने कहा: तब कोई बुर्का पहनकर, मूंछ छीलकर दाढ़ी रखकर पुलिस की ड्यूटी में नहीं आयेंगे…… pic.twitter.com/7iDCuXe8Yg
डीजीपी विनय कुमार के इस बयान पर हिंदू संगठन और कई अन्य लोग भड़क गए हैं। विश्वामित्र सेना ने इस आदेश पर कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया। संगठन के राष्ट्रीय संयोजक राजकुमार चौबे ने कहा कि चंदन-तिलक सनातन परंपरा और आस्था का प्रतीक है और इसे वर्दी के साथ जोड़कर प्रतिबंधित करना अनुचित और भेदभावपूर्ण कदम है।
उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहां हर नागरिक को अपनी धार्मिक पहचान और आस्था व्यक्त करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। ऐसे में किसी विशेष धार्मिक प्रतीक पर रोक लगाने का प्रयास संविधान की भावना के विपरीत है। विश्वामित्र सेना ने बिहार सरकार से माँग की है कि इस मामले में तत्काल स्थिति स्पष्ट की जाए। संगठन ने चेतावनी दी कि यदि इन निर्देशों को वापस नहीं लिया गया तो व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।
इस मामले पर सत्तारूढ़ बीजेपी के नेता भी DGP के बयान पर नाराजगी जता रहे हैं। पूर्व विधायक और भाजपा नेता हरिभूषण ठाकुर ‘बचौल’ ने DGP के इस बयान पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे तुष्टिकरण की पराकाष्ठा बताया है। उन्होंने कहा, “DGP ने कहा है कि कोई भी चंदन लगाकर पुलिस की ड्यूटी पर नहीं आएगा। तो फिर कोई भी बुर्का पहनकर, मूँछ छिलाकर या लंबी दाढ़ी रखकर भी पुलिस ड्यूटी में नहीं आना चाहिए। यही लोकतंत्र का असली तकाजा है।”
इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी लोग इस बयान पर नाराजगी जता रहे हैं। एक यूजर ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, ‘क्या बिहार पुलिस की ईमानदारी तिलक से तय होती है? क्या भ्रष्टाचार चंदन लगाकर आता है? क्या अपराधी तिलक देखकर बच जाते हैं?” इसके अलावा भी अन्य यूजर्स ने तीखी सवाल उठाए हैं।
DGP-सरकारी कर्मियों के तिलक पर नया नहीं बिहार में विवाद
यह पहली बार नहीं है जब बिहार में सरकारी वर्दी या दफ्तर में तिलक को लेकर बवाल मचा हो। 2007 में बिहार के कृषि विभाग के उप-निदेशक लक्ष्मण मिश्रा को कार्यालय में माथे पर तिलक लगाने के कारण निलंबन की सिफारिश का सामना करना पड़ा था। उन्होंने कहा था कि वे 30 साल से तिलक लगाते आए हैं और यह उनका धार्मिक अधिकार है। उस समय पूरे कृषि विभाग के कर्मचारी अगले दिन तिलक लगाकर दफ्तर पहुँचे थे और तत्कालीन कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह ने भी कहा था कि किसी को तिलक लगाने के कारण निलंबित नहीं किया जाना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि 2009 में यही विवाद उलटा भी हो चुका है यानी तिलक लगाने वाला खुद DGP था। तब बिहार के पुलिस महानिदेशक आनंद शंकर ड्यूटी के दौरान माथे पर चंदन का तिलक लगाकर दफ्तर आते थे और इसी को लेकर बिहार पुलिसमेन एसोसिएशन ने उन पर निशाना साधा था। एसोसिएशन अध्यक्ष जितेंद्र नारायण सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि DGP का यह आचरण पुलिस मैनुअल की धारा 1061 का उल्लंघन है जो किसी भी पुलिस अधिकारी को ड्यूटी के दौरान तिलक या टीका लगाने से मना करती है।
यानी बिहार में तिलक का यह विवाद न नया है, न एकतरफा। कभी एक कर्मचारी को तिलक लगाने पर निलंबन की धमकी मिली, कभी खुद DGP पर तिलक लगाने के लिए सवाल उठे और अब एक बार फिर DGP ने ही तिलक पर रोक का फरमान जारी किया है। पुलिस मैनुअल की धारा 1061 हर बार बीच में आती है लेकिन उसे लागू करना हमेशा राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता से टकराता रहा है।
2025 में मंगलसूत्र पर भी लगाई गई थी रोक
बिहार पुलिस मुख्यालय के ADG (विधि-व्यवस्था) पंकज दारद ने जुलाई 2025 में एक सर्कुलर जारी कर महिला पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के दौरान झुमका, नथिया, चूड़ियां, कंगन, मंगलसूत्र और अन्य भारी गहने पहनने से पूरी तरह मना किया था। इसके साथ ही चटख रंग का लिप बाम और अत्यधिक मेकअप पर भी रोक लगाई गई थी। यह आदेश सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर स्तर तक की सभी महिला पुलिसकर्मियों पर लागू था।
यह आदेश DGP विनय कुमार की 23 जून 2025 को हुई समीक्षा बैठक के बाद आया था जिसमें उन्होंने पुलिस बल के अनुशासन पर चिंता जताई थी। इसके बाद 27 जून को कार्मिक एवं कल्याण प्रभाग ने आधिकारिक ज्ञापन जारी किया और सभी रेंज आईजी, एसएसपी तथा जिलों के एसपी को इसका सख्ती से पालन कराने की जिम्मेदारी दी गई। नियम तोड़ने पर विभागीय कार्रवाई का प्रावधान रखा गया।
क्या कहते हैं नियम?
बिहार में तैनात एक वरिष्ठ IPS अधिकारी ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि DGP का यह आदेश कोई नया फरमान नहीं है बल्कि यह बिहार पुलिस के 1978 के मैनुअल पर आधारित है। इस मैनुअल में ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मियों के आचरण, वर्दी और धार्मिक चिह्नों को लेकर विस्तृत नियम पहले से दर्ज हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुलिस की ट्रेनिंग के दौरान ही कर्मियों को इन नियमों की जानकारी दे दी जाती है और यह कोई अचानक थोपा गया नियम नहीं है।
मैनुअल के अनुसार ड्यूटी पर तैनात किसी भी पुलिसकर्मी को किसी भी धर्म के चिह्न, प्रतीक या पहनावे को प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं है। इसमें हिंदू धर्म का तिलक या चंदन टीका, मुस्लिम धर्म की दाढ़ी सभी पर समान रूप से रोक लागू होती है। नियम का मूल उद्देश्य यही है कि वर्दी में खड़ा पुलिसकर्मी किसी एक धर्म या समुदाय का प्रतिनिधि नहीं बल्कि राज्य का प्रतिनिधि दिखे। हालाँकि, इस नियम में सिख धर्म को एक विशेष छूट दी गई है।
वो बताते हैं कि बाकी धर्मों में भी पूर्ण प्रतिबंध नहीं है लेकिन उसके लिए पहले अनुमति लेना अनिवार्य है। मसलन, नवरात्रि या किसी हिंदू पर्व पर तिलक लगाना हो या किसी मुस्लिम पुलिसकर्मी को रमजान या किसी खास मजहबी जरूरत के चलते दाढ़ी रखनी हो तो उसके लिए पहले वरिष्ठ अधिकारी से लिखित अनुमति लेनी होती है। बिना अनुमति के यह नियम का उल्लंघन माना जाता है।
भारत में फोटो जर्नलिज्म को एक नई पहचान देने वाले महान फोटोग्राफर और फोटो पत्रकारिता के ‘जनक’ रघु राय का रविवार (26 अप्रैल 2026) को 83 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे राय ने नई दिल्ली के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली।
उनके बेटे नितिन राय के मुताबिक, पिछले करीब दो वर्षों से वे कैंसर से पीड़ित थे, जो बाद में दिमाग तक फैल गया था और उम्र से जुड़ी अन्य जटिलताओं ने उनकी हालत को और गंभीर बना दिया था। उनके निधन की खबर सामने आते ही कला, मीडिया और फोटोग्राफी जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
परिवार ने उनके आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए इस दुखद समाचार की पुष्टि की। उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के लोधी रोड श्मशान घाट में शाम 4 बजे किया जाएगा। उनकी पत्नी गुरमीत राय एक जानी-मानी लेखिका, शिक्षाविद और हेरिटेज कंजर्वेशनिस्ट हैं।
रघु राय का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का निधन नहीं बल्कि उस नजरिए का अंत है जिसने भारत को दुनिया के सामने देखने और समझने का एक अलग तरीका दिया।
जन्म, शुरुआती जीवन और एक ‘संयोग’ से शुरू हुई यात्रा
1942 में अविभाजित भारत के झंग (अब पाकिस्तान) में जन्मे रघु राय का असली नाम रघुनाथ राय चौधरी था। उनका शुरुआती जीवन किसी भी आम भारतीय की तरह बीता और उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उस समय तक फोटोग्राफी उनके जीवन का हिस्सा नहीं थी।
1960 के दशक में जब वे दिल्ली अपने बड़े भाई और प्रसिद्ध फोटोग्राफर एस पॉल से मिलने आए, तभी उनकी जिंदगी ने अप्रत्याशित मोड़ लिया। रघु राय की फोटोग्राफी की शुरुआत भी एक बेहद दिलचस्प और लगभग खेल-खेल में हुई घटना से जुड़ी है। हरियाणा के एक गाँव में उन्होंने पहली बार कैमरा उठाया और एक गधे के बच्चे की तस्वीर लेने की कोशिश की।
इस दौरान एक मजेदार स्थिति बन गई, जैसे ही वे तस्वीर लेने आगे बढ़ते, गधा भागने लगता और रघु राय उसके पीछे दौड़ पड़ते। यह नजारा देखकर आसपास खड़े बच्चे जोर-जोर से हंसने लगे। बच्चों की खुशी और उत्साह को देखकर उन्होंने भी इस पीछा करने वाले खेल को जारी रखा।
आखिरकार जब गधा थककर रुक गया, तब रघु राय को मौका मिला और उन्होंने बिल्कुल करीब से उसकी तस्वीर कैद कर ली। बाद में जब उन्होंने यह फोटो अपने भाई को दिखाई, तो वह इतने प्रभावित हुए कि इसे The Times, London भेज दिया। खास बात यह रही कि यह तस्वीर अखबार में उनके नाम से प्रकाशित भी हुई।
रघु राय द्वारा ली गई पहली तस्वीर (फोटो साभार: NDTV)
इस एक तस्वीर ने उनके भीतर छिपे कलाकार को पहचान दिलाई और यहीं से उन्होंने तय कर लिया कि फोटोग्राफी ही उनका भविष्य होगी। 1962 में उन्होंने The Statesman अखबार के साथ पेशेवर फोटोजर्नलिस्ट के रूप में काम शुरू किया। बाद में वे India Today से जुड़े और 1982 के बाद करीब एक दशक तक वहाँ फोटो एडिटर रहे।
फोटोग्राफी का नजरिया: सिर्फ तस्वीर नहीं, इतिहास का दस्तावेज
रघु राय का मानना था कि तस्वीर उस पल का दस्तावेज है, जिसे दोबारा नहीं लिखा जा सकता। यही सोच उनके पूरे काम में झलकती है। उनकी फोटोग्राफी केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें समाज, राजनीति, संस्कृति और मानवीय भावनाओं की गहराई दिखती थी।
1988 में धर्मशाला में महाभारत धारावाहिक देखते हुए दलाई लामा (फोटो साभार: Raghu Rai, PHOTOINK)
उन्होंने भारत के गाँवों, शहरों, गलियों, घाटों, त्योहारों, संघर्षों और आम लोगों के जीवन को बेहद करीब से देखा और उसे अपने कैमरे में उतारा। उनके लिए कैमरा सिर्फ एक उपकरण नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को समझने और दिखाने का माध्यम था।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी बहू सोनिया गांँधी और पोते-पोतियों प्रियंका और राहुल के साथ, दिल्ली, 1972(फोटो साभार: Raghu Rai, PHOTOINK)
आपातकाल के दौर में जब सेंसरशिप का दबाव था, तब भी उन्होंने प्रतीकों और संकेतों के जरिए सच्चाई को दुनिया तक पहुँचाने के तरीके खोजे, यह उनकी रचनात्मकता और साहस का प्रमाण है।
ऐतिहासिक घटनाओं का जीवंत दस्तावेज: जब तस्वीरें बन गईं सच की आवाज
रघु राय ने अपने करियर में भारत और दुनिया की बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं को कवर किया। उनकी सबसे चर्चित और प्रभावशाली तस्वीरों में ‘भोपाल गैस त्रासदी’ की तस्वीरें शामिल हैं। एक मासूम बच्चे की आधी दबी हुई लाश की तस्वीर ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था। यह सिर्फ एक फोटो नहीं थी बल्कि कॉरपोरेट लापरवाही के खिलाफ एक वैश्विक प्रतीक बन गई।
रघु राय द्वारा ली गई यह तस्वीर भोपाल गैस कांड के दो दिन बाद की है। (फोटो साभार: Mint)
इसके अलावा उन्होंने ‘बांग्लादेश लिबरेशन वॉर’ (Bangladesh Liberation War) के दौरान शरणार्थियों की पीड़ा, ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले अमृतसर के हालात और भारत के सामाजिक-राजनीतिक बदलावों को अपने कैमरे में दर्ज किया। उनकी तस्वीरों में हमेशा एक कहानी होती थी, ऐसी कहानी, जो शब्दों से कहीं ज्यादा असरदार होती थी।
महान हस्तियों के साथ अनूठा रिश्ता और दुर्लभ तस्वीरें
रघु राय का कैमरा सिर्फ घटनाओं तक सीमित नहीं था, उन्होंने भारत और दुनिया की कई महान हस्तियों को भी बेहद करीब से कैद किया। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के साथ लंबे समय तक काम किया और उनके जीवन के कई निजी और सार्वजनिक क्षणों को तस्वीरों में उतारा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी तस्वीरें ली थी। वहीं मदर टेरेसा के साथ उनका जुड़ाव बेहद खास रहा।
रघु राय द्वारा ली गई मदर टेरेसा की तस्वीर (फोटो साभार: नेशनल हेराल्ड)
अंतरराष्ट्रीय पहचान, Magnum Photos और वैश्विक मंच पर भारत की छवि
रघु राय को वैश्विक स्तर पर भी अभूतपूर्व पहचान मिली। महान फ्रांसीसी फोटोग्राफर Henri Cartier-Bresson ने खुद उन्हें प्रतिष्ठित संस्था Magnum Photos के लिए नामांकित किया। यह सम्मान बहुत कम फोटोग्राफरों को मिलता है और किसी भारतीय के लिए यह ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
उन्होंने Time, Life, GEO, The New York Times, Newsweek, The Independent और The New Yorker जैसी दुनिया की प्रमुख पत्रिकाओं के लिए काम किया। उनकी तस्वीरें दुनिया के बड़े शहरों में प्रदर्शित हुईं और भारत की छवि को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान मिली।
वे तीन बार World Press Photo के ज्यूरी सदस्य रहे और दो बार यूनेस्को की अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका निभाई। यह उनके अनुभव और विश्वसनीयता का प्रमाण है।
सम्मान, पुरस्कार और रचनात्मक योगदान
रघु राय को उनके योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। 1972 में उन्हें Padma Shri से सम्मानित किया गया, जो उन्हें बांग्लादेश युद्ध के कवरेज के लिए मिला था। इसके अलावा उन्हें भारत सरकार का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और कई वैश्विक पुरस्कार भी प्राप्त हुए।
उन्होंने अपने जीवन में 18 से अधिक किताबें लिखीं, जिनमें Raghu Rai’s India, Delhi, Picturing Time, Tibet in Exile और Raghu Rai: People जैसी प्रमुख कृतियाँ शामिल हैं। भोपाल गैस त्रासदी पर उनके काम को ‘Exposure: A Corporate Crime’ नाम की किताब और डॉक्यूमेंट्री के रूप में भी प्रस्तुत किया गया, जिसने इस त्रासदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूती से सामने रखा।
फोटोग्राफी से परे: सोच, दर्शन और विरासत
रघु राय का मानना था कि एक अच्छा फोटोग्राफर वही है, जो सिर्फ देखता नहीं बल्कि महसूस भी करता है। उनके अनुसार, कैमरे की कीमत या तकनीक से ज्यादा जरूरी है नजर और संवेदनशीलता। वे कहते थे कि जिंदगी खुद एक किताब है, जो कभी खत्म नहीं होती और हर पल कुछ नया सिखाती है।
यही कारण था कि उनकी तस्वीरों में हमेशा जीवन की सच्चाई, संघर्ष और सुंदरता एक साथ नजर आती थी। उनका पूरा जीवन इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक साधारण शुरुआत से कोई व्यक्ति अपनी दृष्टि और संवेदनशीलता के बल पर दुनिया को देखने का नजरिया बदल सकता है।
रघु राय के निधन के साथ भले ही एक युग समाप्त हो गया हो लेकिन उनकी तस्वीरें हमेशा जिंदा रहेंगी। उनके कैमरे में कैद भारत, उसकी आत्मा, उसकी पीड़ा और उसकी सुंदरता आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर बनी रहेंगी।
पाकिस्तान में एक बार फिर मीडिया सेंसरशिप की बड़ी घटना सामने आई है। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की एक रिपोर्ट को पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन में छपने से रोक दिया गया। यह रिपोर्ट पाकिस्तान के शिया समुदाय के बढ़ते गुस्से पर आधारित थी।
रिपोर्ट का शीर्षक था- ‘Pakistan’s Leaders Try to Contain Rising Anger Over Iran War at Home’ यानी ‘पाकिस्तान के नेता ईरान युद्ध पर घरेलू गुस्से को काबू में करने की कर रहे कोशिश’। इस रिपोर्ट के लेखक हैं पाकिस्तानी फ्रीलांस पत्रकार जिया उर रहमान और ये रिपोर्ट 20 अप्रैल 2026 को न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट और अंतरराष्ट्रीय संस्करण में छपी, लेकिन पाकिस्तान में बिकने वाले प्रिंट संस्करण से पूरी तरह हटा दी गई।
NYT के पाकिस्तान और अफगानिस्तान ब्यूरो चीफ एलियन पेल्टियर ने खुद एक्स पर पोस्ट करके इसकी जानकारी दी। उन्होंने लिखा कि रिपोर्ट अमेरिका और बाकी दुनिया में तो छपी, लेकिन पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन से हटा दी गई। स्थानीय प्रकाशक (एक्सप्रेस ट्रिब्यून या ट्रिब्यून ग्रुप) ने इसे हटाया।
पन्ने पर खाली जगह छोड़ दी गई और नीचे छोटा डिस्क्लेमर छपा- “यह लेख हमारे पाकिस्तानी प्रकाशन साझेदार द्वारा प्रिंट के लिए हटा दिया गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स और इसके संपादकीय स्टाफ की इसमें कोई भूमिका नहीं है।” यह घटना पाकिस्तान में प्रेस की आजादी और धार्मिक संवेदनशीलता पर नई बहस छेड़ गई है।
रिपोर्ट में साफ कहा गया कि पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता का मुख्य बिचौलिया बन गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इस डिप्लोमेसी को लेकर काफी सक्रिय हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी पाकिस्तान की इस भूमिका की तारीफ की है। लेकिन घरेलू स्तर पर हालात बिगड़ रहे हैं।
पाकिस्तान में करीब 3.5 करोड़ (35 मिलियन) शिया मुसलमान रहते हैं। वे ईरान से गहरे आध्यात्मिक संबंध रखते हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और अन्य टॉप क्लेरिक्स की अमेरिकी-इजरायली हमलों में मौत के बाद पाकिस्तान के शिया इलाकों में भारी आक्रोश फैल गया।
दरअसल, 18 मार्च 2026 को आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने खुद शिया मौलानाओं की एक अहम मीटिंग बुलाई। मीटिंग का मकसद शिया समुदाय का गुस्सा शांत करना था ताकि शिया-सुन्नी टकराव न भड़के। मिलिट्री मीडिया विंग के मुताबिक आसिम मुनीर ने शिया मौलानाओं को चेतावनी दी कि किसी दूसरे देश में हुई घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
हालाँकि कुछ शिया मौलानाओं ने मीटिंग को तनावपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि उनकी पाकिस्तान के प्रति वफादारी पर सवाल उठाए गए। कुछ ने दावा किया कि आसिम मुनीर ने कहा कि जो ईरान के प्रति वफादार हैं, उन्हें पाकिस्तान छोड़ देना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया कि शिया समुदाय का गुस्सा बढ़ रहा है। ईरान युद्ध अब पाकिस्तान में ईंधन की महंगाई और बिजली कटौती के बाद दूसरा सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा बन गया है। अधिकारी डर रहे हैं कि यह गुस्सा शिया-सुन्ना हिंसा को फिर भड़का सकता है। शिया अल्पसंख्यक पहले से ही आतंकवादी हमलों का शिकार होते रहे हैं।
Pakistan Army Chief Asim Munir is so scared of the Pakistani Shia community that he censored an article of The New York Times printed in Pakistan today about Pakistani officials scrambling to contain rising domestic Shia anger in Pakistan about the US war and Pak mediation. pic.twitter.com/Dvy5dls06p
रिपोर्ट में आगे लिखा गया कि पाकिस्तान बाहर शांति का दूत बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन घर में आग लगी हुई है। अगर घरेलू स्तर पर ही संप्रदायिक तनाव बढ़ा तो बाहर की डिप्लोमेसी कैसे काम करेगी? यह रिपोर्ट पाकिस्तान की आंतरिक कमजोरियों को उजागर करती है- जहाँ एक तरफ आर्मी चीफ ट्रंप के ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ बनने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ 3.5 करोड़ शियाओं का गुस्सा काबू में करने के लिए मीटिंगें बुलानी पड़ रही हैं।
पहले भी ऐसी हरकतें कर चुका है पाकिस्तान
यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने NYT की रिपोर्ट को सेंसर किया हो। 2017 में मई महीने में पाकिस्तानी पत्रकार मोहम्मद हनीफ ने NYT के पाकिस्तान एडिशन में एक आर्टिकल लिखा था। उसका शीर्षक था ‘Pakistan Triangle of Hate: Taliban, Army and India’। इसमें पाकिस्तानी सेना के भारत विरोधी एजेंडे, तालिबान के साथ गठजोड़ और एहसानुल्लाह एहसान (टीटीपी नेता, जो लाहौर हमले और मलाला यूसुफजई पर हमले का जिम्मेदार था) जैसे आतंकियों से संबंधों का जिक्र था। लोकल पब्लिशर ने इसे छापने के बाद पन्ने से पूरी तरह साफ कर दिया। जगह खाली छोड़ दी गई। नीचे नोट लिखा गया कि NYT का इसमें कोई हाथ नहीं है।
जनवरी में जेन-जी के लिए लेख को हटवाया गया
जनवरी 2026 में एक और बड़ा मामला सामने आया। पाकिस्तानी पीएचडी स्कॉलर जोरैन निजामानी (अमेरिका में पढ़ रहे, अभिनेता फाजिला काजी और कैसर खान निजामानी के बेटे) ने एक्सप्रेस ट्रिब्यून में ‘It Is Over’ नाम का लेख लिखा था। लेख में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की पुरानी पीढ़ी और सत्ता पर काबिज लोग युवाओं (Gen Z) पर अब कोई असर नहीं छोड़ रहे।
उन्होंने लिखा कि जबरन देशभक्ति, भाषण और सेमिनार अब काम नहीं कर रहे। युवा इंटरनेट और जानकारी की वजह से सब समझ रहे हैं। वे बराबरी, अधिकार और सही व्यवस्था चाहते हैं। जो बोलता है उसे चुप करा दिया जाता है, इसलिए कई युवा चुपचाप देश छोड़ रहे हैं।
इस लेख को भी कुछ ही घंटों में वेबसाइट से हटा दिया गया था। हालाँकि इसके बाद इस लेख के स्क्रीनशॉट वायरल हो गए। सोशल मीडिया पर जोरैन को नेशनल हीरो कहा जाने लगा। PTI, मानवाधिकार संगठनों और पत्रकारों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया।
Please read this brilliant article by Zorain Nizamani, a PhD student at the University of Arkansas, in which he bluntly tells Pakistan’s ruling elite that Gen Z is no longer falling for their attempts to manipulate and control narratives.
ये सभी घटनाएँ एक पैटर्न दिखाती हैं कि पाकिस्तान में आर्मी चीफ आसिम मुनीर के नेतृत्व में मीडिया पर सख्त नियंत्रण है। संवेदनशील मुद्दे चाहे सेना की आलोचना हो, युवाओं का असंतोष हो या शिया समुदाय का गुस्सा, इन सबको दबाया जा रहा है।
सरकार का तर्क है कि ऐसी रिपोर्ट्स से संप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह असल में सच्चाई छिपाने की कोशिश है। पाकिस्तान प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों में 158वें स्थान पर है। स्वतंत्र पत्रकारों पर दबाव, बैंक खाते फ्रीज करने, सरकारी विज्ञापन रोकने और झूठी खबर फैलाने के कानून के तहत गिरफ्तारियाँ आम बात हैं।
पाकिस्तान की कथनी और करनी में अंतर, खोल रहा खुद के चैनल
अब सवाल यह है कि पाकिस्तान बाहर दुनिया के सामने ‘शांति का दूत’ और ‘मॉडर्न डिप्लोमेटिक पावर’ का चेहरा दिखाने की कोशिश क्यों कर रहा है, जबकि अंदर मीडिया को इतना कस रहा है?
इस सवाल का जवाब NYT का एक और आर्टिकल देता है जो मार्च 2026 में छपा था- ‘How Pakistan Is Trying to Reshape Its Image Abroad’। इस रिपोर्ट में एलियन पेल्टियर और जिया उर रहमान ने विस्तार से बताया कि पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ विदेशी छवि सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर मीडिया अभियान चला रही हैं।
पाकिस्तान ने इंडिया और अफगानिस्तान के तालिबान सरकार के खिलाफ नई अंग्रेजी न्यूज चैनल शुरू किए हैं। PTV (पाकिस्तान टीवी) को फिर से लॉन्च किया गया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद चैनल के हेडक्वार्टर जाकर कहा कि इसका डिजिटल डिपार्टमेंट विदेशी प्रोपगैंडा का मुकाबला करेगा और पाकिस्तान का मैसेज दुनिया तक पहुँचाएगा। सुरक्षा एजेंसियाँ पत्रकारों से संपर्क करके स्टेट-फ्रेंडली चैनल शुरू करने को कह रही हैं। टैक्स छूट और फंडिंग का लालच दिया जा रहा है।
इन चैनल्स का मुख्य टारगेट भारत और अफगानिस्तान में तालिबान है। वे पाकिस्तानी मिलिट्री की भाषा में खबरें चला रहे हैं, जैसे भारत पर हमले, तालिबान के खिलाफ कार्रवाई आदि। लेकिन स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है। डॉन अखबार की सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। कई पत्रकार गिरफ्तार कि गए। रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान ट्रकी और कतर जैसे देशों की तरह स्टेट-बैक्ड चैनल (TRT, अल जजीरा) की नकल करना चाहता है, लेकिन फंडिंग और विजन की कमी है।
पाकिस्तान में दूर नहीं ‘कयामत’ के दिन!
यह पूरा मामला दिखाता है कि पाकिस्तान दोहरी नीति चला रहा है। बाहर ट्रंप से दोस्ती और शांति की बातें, लेकिन वो अंदर से सेंसरशिप और दबाव की नीति लागू कर रहा है। वैसे, माना ये भी जा सकता है कि कहीं NYT की रिपोर्ट हटाने से शिया समुदाय का गुस्सा और बढ़ गया तो? इतिहास गवाह है कि दबाया हुआ सच एक न एक दिन बाहर आता ही है। पाकिस्तान की मीडिया स्ट्रैटजी कितनी कामयाब होगी, यह भविष्य बताएगा, लेकिन फिलहाल यह साफ है कि आसिम मुनीर की कठपुतली सरकार अभिव्यक्ति की आजादी को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का नाम देकर कुचल रही है।
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के करंडा थाना क्षेत्र के कटरिया गाँव में एक नाबालिग लड़की की संदिग्ध मौत अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है। शुरुआत में इसे गैंगरेप और हत्या का मामला बताया गया, लेकिन पुलिस जाँच, CCTV फुटेज और चैट रिकॉर्ड सामने आने के बाद तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। फिलहाल पुलिस इसे आत्महत्या का मामला मान रही है, जबकि विपक्ष इस पर राजनीतिक रंग देने की कोशिश में लगी हुई हैं।
क्या है पूरा मामला?
बताया जा रहा है कि लड़की (निशा/नेहा विश्वकर्मा) 14 अप्रैल 2026 की देर रात घर से लापता हो गई थी। CCTV फुटेज में वह रात करीब 2 बजे अकेले गंगा पुल की ओर जाती दिखी। जाँच में यह भी सामने आया कि वह अपने दोस्त हरिओम से मिलकर लौटी थी और घरवालों को पता चलने के डर से घबराई हुई थी। हरिओम ने उसे चैट के जरिए वापस घर जाने के लिए कहा, लेकिन उसने जवाब नहीं दिया।
सुबह करीब 5:30 बजे लड़की ने अपने पिता को फोन कर आत्महत्या करने की बात कही। इसके लगभग 10 मिनट बाद उसने गंगा नदी में छलांग लगा दी। पिता ने तुरंत डायल 112 पर कॉल कर पुलिस को सूचना दी। पुलिस कुछ ही मिनटों में मौके पर पहुँच गई और पुल से मोबाइल, चप्पल और दुपट्टा बरामद किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण डूबना बताया गया।
हालाँकि परिजनों ने इसे हत्या बताते हुए दो लोगों के खिलाफ केस दर्ज कराया। एक आरोपित को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया है। इसके बाद मामला धीरे-धीरे राजनीतिक रंग लेने लगा। समाजवादी पार्टी, भीम आर्मी, कॉन्ग्रेस और अन्य संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
गाजीपुर कटरिया कांड: 22 से 25 अप्रैल तक कैसे बढ़ा विवाद, पूरी टाइमलाइन समझिए
गाजीपुर के कटरिया गाँव में नाबालिग की मौत के बाद शुरू हुआ विवाद अब पूरी तरह सियासी टकराव में बदल चुका है। जहाँ एक तरफ पुलिस इसे आत्महत्या का मामला बता रही है, वहीं विपक्ष लगातार गंभीर आरोप लगा रहा है। 22 अप्रैल से 25 अप्रैल के बीच घटनाक्रम तेजी से बदला और मामला स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया।
22 अप्रैल 2026 (बुधवार): विवाद ने लिया हिंसक रूप
इस दिन समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधिमंडल कटरिया गाँव पहुँचा। उनका उद्देश्य पीड़ित परिवार से मिलना था, लेकिन गाँव के कुछ लोगों ने उन्हें गाँव में घुसने से रोक दिया। दोनों पक्षों के बीच पहले तीखी बहस हुई, जो धीरे-धीरे झड़प में बदल गई। देखते ही देखते माहौल बिगड़ गया और पत्थरबाजी शुरू हो गई। इस हिंसा में कई लोग घायल हुए, जिनमें पुलिसकर्मी और सपा के नेता रामआसरे विश्वकर्मा भी शामिल थे। घटना के बाद इलाके में भारी तनाव फैल गया।
23 अप्रैल 2026 (गुरुवार): पुलिस की सख्त कार्रवाई
हिंसा के अगले दिन पुलिस ने कड़ा रुख अपनाया। मामले में 47 लोगों को नामजद करते हुए 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए अब तक करीब 10 लोगों को गिरफ्तार कर लिया, जिनमें कुछ समाजवादी पार्टी से जुड़े लोग भी बताए जा रहे हैं। प्रशासन ने साफ संकेत दिया कि कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
24 अप्रैल 2026 (शुक्रवार): सियासत तेज, प्रशासन सक्रिय
घटना ने इस दिन और ज्यादा तूल पकड़ लिया। विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधा और कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए। वहीं सरकार ने बताया की विपक्ष जानबूझकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहा है। वही प्रशासन नेइस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराने का भरोसा भी दिया।
25 अप्रैल 2026 (शनिवार): राष्ट्रीय स्तर पर गूंजा मामला, आरोप-प्रत्यारोप तेज
इस दिन मामला राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच गया जब कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने इस घटना को लेकर केंद्र और राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि विश्वकर्मा समाज की बेटी के साथ रेप के बाद हत्या की गई और परिवार को FIR दर्ज कराने से रोका गया।
राहुल गाँधी ने यह भी कहा कि अक्सर कमजोर वर्ग के लोगों को ही निशाना बनाया जाता है और अपराधियों को संरक्षण मिलता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जवाब माँगते हुए सरकार की नैतिक जिम्मेदारी पर सवाल उठाए।
हालाँकि गाजीपुर पुलिस ने राहुल गाँधी के इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया। पुलिस का कहना है कि जाँच में अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जो रेप या हत्या की पुष्टि करता हो। पुलिस ने इन दावों को भ्रामक और तथ्यहीन बताया और कहा कि मामले की जाँच तथ्यों के आधार पर ही की जा रही है।
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से एक छोटे लेकिन खास समुदाय के करीब 250 लोग हाल ही में इजरायल पहुँचे हैं। यह कोई सामान्य यात्रा नहीं, बल्कि पहचान, आस्था और इतिहास से जुड़ी एक लंबी कहानी का हिस्सा है। इन लोगों को ‘बनेई मेनाशे’ कहा जाता है, जो खुद को बाइबिल में वर्णित प्राचीन इस्राएली कबीले ‘मेनाशे’ का वंशज मानते हैं।
इजरायल सरकार ने इन्हें बसाने के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया है, जिसके तहत आने वाले वर्षों में हजारों और लोगों को वहाँ लाया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया केवल प्रवासन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापन और ऐतिहासिक जुड़ाव की एक बड़ी कोशिश मानी जा रही है।
कौन हैं बनेई मेनाशे और क्या है उनका दावा?
बनेई मेनाशे समुदाय मुख्य रूप से भारत के मणिपुर और मिजोरम राज्यों में रहता है। इस समुदाय का दावा है कि वे प्राचीन इस्राएल के ‘लॉस्ट ट्राइब्स’ यानी खोई हुई दस जनजातियों में से एक, मेनाशे कबीले के वंशज हैं। धार्मिक कथाओं के अनुसार, करीब 2700 साल पहले असीरियन साम्राज्य ने इन जनजातियों को उनके मूल स्थान से निर्वासित कर दिया था।
इसके बाद ये लोग अलग-अलग दिशाओं में बिखर गए और समय के साथ उनकी पहचान धुंधली होती चली गई। बनेई मेनाशे की मौखिक परंपराएँ बताती हैं कि उनके पूर्वज फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन से होते हुए अंततः भारत के पूर्वोत्तर इलाकों में पहुँचे।
इस लंबे सफर के दौरान उन्होंने कुछ यहूदी धार्मिक परंपराओं, जैसे खतना और कुछ धार्मिक रीति-रिवाजों को बनाए रखा, जिससे उनके दावे को एक आधार मिलता है।
भारत में जीवन और धार्मिक बदलाव
भारत में बसने के बाद यह समुदाय धीरे-धीरे स्थानीय समाज का हिस्सा बन गया। 19वीं सदी में आए ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में इस समुदाय के अधिकांश लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया। इसके बावजूद उनके भीतर अपनी कथित यहूदी जड़ों को लेकर एक अलग पहचान बनी रही।
समय के साथ इस समुदाय के कुछ लोगों ने अपनी पुरानी परंपराओं और इतिहास को फिर से खोजने की कोशिश की। यही कारण है कि 20वीं सदी के अंत तक आते-आते उन्होंने यहूदी धर्म की ओर वापसी का प्रयास शुरू किया और इजरायल से संपर्क स्थापित किया।
इजरायल की मान्यता और लंबी बहस
बनेई मेनाशे को यहूदी मानने को लेकर लंबे समय तक विवाद चलता रहा। कई धार्मिक और सरकारी संस्थाओं ने उनके दावों पर सवाल उठाए। हालाँकि 2005 में एक अहम मोड़ आया, जब इजरायल के सेफारदी मुख्य रब्बी रब्बी श्लोमो अमर (Rabbi Shlomo Amar) ने उन्हें ‘इजरायल के वंशज’ के रूप में मान्यता दी।
इस मान्यता ने उनके इजरायल प्रवास का रास्ता खोल दिया, लेकिन एक शर्त के साथ, शर्त ये थी कि उन्हें औपचारिक रूप से यहूदी धर्म अपनाना होगा। यानी इजरायल पहुँचने के बाद उन्हें धार्मिक रूपांतरण की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, ताकि वे वहाँ की नागरिकता प्राप्त कर सकें।
क्या है ‘ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन’?
इजरायल सरकार ने इस समुदाय को व्यवस्थित तरीके से बसाने के लिए ‘ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन’ नामक एक विशेष अभियान शुरू किया है। इस योजना के तहत आने वाले वर्षों में भारत में रह रहे हजारों बनेई मेनाशे को इजरायल लाया जाएगा। हाल ही में पहुँचे 250 लोग इसी अभियान का पहला जत्था हैं।
सरकार की योजना है कि 2026 के दौरान करीब 1200 और लोगों को इजरायल लाया जाएगा, जबकि कुल मिलाकर लगभग 6000 लोगों को 2030 तक वहाँ बसाने का लक्ष्य है। इस पूरी योजना पर लगभग 90 मिलियन शेकेल (करीब 30 मिलियन डॉलर) खर्च होने का अनुमान है, जिसमें यात्रा, आवास, भाषा प्रशिक्षण और अन्य सुविधाएँ शामिल हैं।
इजरायल में बसने की प्रक्रिया और चुनौतियाँ
इजरायल पहुँचने के बाद इन लोगों को सीधे नागरिकता नहीं मिलती, बल्कि उन्हें एक चरणबद्ध प्रक्रिया से गुजरना होता है। सबसे पहले उन्हें ‘एब्जॉर्प्शन सेंटर’ में रखा जाता है, जहाँ उन्हें हिब्रू भाषा सिखाई जाती है, रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाता है और समाज में घुलने-मिलने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है।
इसके अलावा धार्मिक रूपांतरण भी एक जरूरी प्रक्रिया है, क्योंकि इजरायल के कानून के तहत यहूदी पहचान को आधिकारिक मान्यता देना आवश्यक होता है। यह प्रक्रिया कई बार चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि नए माहौल, भाषा और सांस्कृतिक अंतर के कारण लोगों को खुद को ढालने में समय लगता है।
भावनाएँ, पहचान और नई शुरुआत
इस पूरी कहानी का सबसे भावुक पहलू उन लोगों के अनुभव हैं, जो वर्षों बाद अपने परिवार या समुदाय के सदस्यों से मिलते हैं। एयरपोर्ट पर पहुँचे लोगों का गानों, झंडों और तालियों के साथ जिस तरह स्वागत हुआ, वह इस बात का संकेत है कि यह केवल प्रवासन नहीं, बल्कि ‘घर वापसी’ जैसा अनुभव है।
(फोटो साभार: NDTV)
कई लोग ऐसे भी हैं, जो दशकों पहले इजरायल आ चुके थे और अब अपने पुराने साथियों या रिश्तेदारों से दोबारा मिल रहे हैं। कुछ के लिए यह खुशी का पल है, तो कुछ के लिए बीते समय की यादों से जुड़ा भावनात्मक क्षण।
(फोटो साभार: NDTV)
नई पीढ़ी के सामने एक अलग चुनौती है और वो है अपनी पारंपरिक पहचान को बनाए रखते हुए आधुनिक इजरायली समाज में खुद को स्थापित करना। भाषा, संस्कृति और जीवनशैली के फर्क के बावजूद इस समुदाय के लोग अपने जड़ों से जुड़ने के एहसास को सबसे बड़ा मानते हैं।
एक ऐतिहासिक और सामाजिक प्रयोग
बनेई मेनाशे का इजरायल जाना सिर्फ एक धार्मिक या सामाजिक घटना नहीं है, बल्कि यह एक अनोखा ऐतिहासिक प्रयोग भी है। इसमें हजारों साल पुराने दावों, आधुनिक राजनीति, धार्मिक मान्यताओं और मानवीय भावनाओं का मिश्रण देखने को मिलता है।
इजरायल की नीति हमेशा से दुनिया भर के यहूदियों को एक जगह लाने की रही है और यह अभियान उसी दिशा में एक और कदम है। वहीं बनेई मेनाशे के लिए यह अपने इतिहास को फिर से जीने और एक नई पहचान बनाने का मौका है।
इस तरह पूर्वोत्तर भारत के छोटे-छोटे गाँवों से निकलकर इजरायल तक पहुँचने की यह कहानी सिर्फ दूरी तय करने की नहीं, बल्कि समय, संस्कृति और विश्वास के लंबे सफर की कहानी है।