देश की सबसे मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG 2026 का पेपर लीक मामला अब सिर्फ एक परीक्षा घोटाला नहीं, बल्कि एक बड़े संगठित नेटवर्क का चेहरा बनकर सामने आया है।
राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल और उत्तराखंड तक फैले इस रैकेट ने लाखों छात्रों के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जाँच एजेंसियों के मुताबिक पेपर परीक्षा से पहले व्हाट्सएप, टेलीग्राम और प्रिंट कॉपी के जरिए छात्रों तक पहुँचाया गया। आरोप है कि लाखों रुपए लेकर प्रश्नपत्र बेचे गए और कई छात्रों ने पैसे देकर परीक्षा में फायदा उठाने की कोशिश की।
सबसे ज्यादा चर्चा राजस्थान के बिवाल परिवार को लेकर हो रही है, जहाँ एक ही परिवार के कई सदस्यों के मेडिकल कॉलेज में चयन के बाद अब जाँच एजेंसियाँ पुराने रिजल्ट तक खंगाल रही हैं।
इस पूरे मामले में कई गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं, जिसमें RJD के नेशनल सेक्रेटरी संतोष कुमार जायसवाल को गिरफ्तार किया गया है, जिसे जाँच एजेंसियाँ पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड मान रही हैं। CBI अब यह पता लगाने में जुटी है कि आखिर पेपर सबसे पहले लीक कहाँ से हुआ और इसमें कौन-कौन शामिल था।
30 लाख में हुआ सौदा, परिवार से शुरू हुआ पूरा खेल
जाँच में सामने आया है कि जयपुर के जमवारामगढ़ निवासी दो भाइयों मांगीलाल बिवाल और दिनेश बिवाल ने गुरुग्राम के एक डॉक्टर से करीब 30 लाख में NEET-UG 2026 का पेपर खरीदा था।
आरोप है कि यह पेपर सबसे पहले परिवार के बच्चों को दिया गया और फिर आगे बेचकर करोड़ों का खेल शुरू हुआ। CBI और राजस्थान SOG की जाँच के मुताबिक दिनेश बिवाल ने अपने बेटे ऋषि बिवाल और रिश्तेदारों के लिए पेपर मंगवाया था।
इसके बाद यह पेपर सीकर के कोचिंग नेटवर्क और छात्रों तक पहुँचाया गया। जाँच एजेंसियों का दावा है कि पेपर व्हाट्सएप, PDF, टेलीग्राम चैट और प्रिंट कॉपी के जरिए बड़े स्तर पर फैलाया गया।
सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब जाँच में पता चला कि यह पेपर करीब 700 छात्रों तक पहुँच चुका था। देहरादून से गिरफ्तार आरोपित राकेश मंडवारिया पर आरोप है कि उसने इस पेपर को बड़े पैमाने पर छात्रों में बाँटा।
ऋषि बिवाल की मार्कशीट ने खड़े किए बड़े सवाल
इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा ऋषि बिवाल की मार्कशीट को लेकर हो रही है। जाँच एजेंसियों के हाथ लगी राजस्थान बोर्ड की मार्कशीट के अनुसार ऋषि मुश्किल से 12वीं पास कर पाया था।
मार्कशीट के मुताबिक उसे फिजिक्स थ्योरी में सिर्फ 9 नंबर, केमिस्ट्री में 15 नंबर और बायोलॉजी में 20 नंबर मिले थे। कुल 500 में 254 नंबर लेकर वह ‘ग्रेस मार्क्स द्वारा सेकंड डिवीजन’ से पास हुआ था। जाँच में यह भी सामने आया कि पेपर मिलने के बावजूद ऋषि NEET में सिर्फ 107 नंबर ही ला सका।
क्या 2025 में भी हुआ था यही खेल?
CBI अब सिर्फ 2026 ही नहीं, बल्कि 2025 के NEET रिजल्ट की भी जाँच कर रही है। आरोप है कि बिवाल परिवार ने पिछले साल भी पेपर खरीदकर अपने पाँच बच्चों का मेडिकल कॉलेज में चयन करवाया था।
जाँच के दायरे में विकास बिवाल, प्रगति बिवाल, सानिया बिवाल, पलक बिवाल और गुंजन बिवाल के नाम शामिल हैं। बताया जा रहा है कि इन सभी ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन लिया है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इन छात्रों की तस्वीरें सीकर के ‘दीप कैरियर इंस्टीट्यूट’ के बड़े पोस्टरों में लगाई गई थीं, जिन पर लिखा था सिलेक्शन नहीं तो पैसे वापस। हालाँकि रिजल्ट आने के कुछ समय बाद ही यह कोचिंग संस्थान अचानक बंद हो गया।
सीकर की चर्चित CLC कोचिंग का नाम भी जाँच में सामने आया। लेकिन संस्थान के मैनेजिंग डायरेक्टर श्रवण चौधरी ने दावा किया कि बिवाल परिवार का कोई सदस्य रेगुलर क्लासरूम कोर्स में नहीं पढ़ता था।
उनका कहना है कि सभी छात्रों ने सिर्फ टेस्ट सीरीज जॉइन की थी। उन्होंने साफ कहा कि अगर किसी छात्र के अभिभावक बाहर से पेपर खरीदकर लाते हैं, तो उसमें कोचिंग संस्थान की भूमिका नहीं हो सकती। फिर भी जाँच एजेंसियाँ सीकर के कई कोचिंग संस्थानों और उनके नेटवर्क की जाँच कर रही हैं।
कैसे फैला पेपर? नासिक से गुरुग्राम और फिर पूरे देश तक
जाँच एजेंसियों के मुताबिक पेपर का असली सोर्स महाराष्ट्र के नासिक की एक प्रिंटिंग प्रेस हो सकता है। वहाँ से यह गुरुग्राम के एक डॉक्टर तक पहुँचा और फिर राजस्थान के नेटवर्क में शामिल लोगों के जरिए फैलाया गया। इसके बाद पेपर सीकर, जयपुर, देहरादून, केरल, बिहार, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड तक पहुँचा।
जाँच में सामने आया कि परीक्षा से पहले गेस पेपर के नाम पर 140 से ज्यादा सवाल छात्रों तक पहुँचाए गए थे, जिनमें से बड़ी संख्या असली पेपर से मैच कर गई। बताया जा रहा है कि परीक्षा से दो दिन पहले यह पेपर 5-5 लाख रुपए में बेचा गया, जबकि परीक्षा से एक रात पहले इसे 50-50 हजार रुपए तक में बाँटा गया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों से पैसा कमाया जा सके।
व्हाट्सएप और टेलीग्राम बना पेपर लीक का सबसे बड़ा जरिया
CBI के मुताबिक पेपर सबसे पहले PDF फॉर्म में व्हाट्सएप और टेलीग्राम के जरिए भेजा गया। बाद में इसके प्रिंट निकालकर ऑफलाइन भी बेचे गए। जाँच एजेंसियों को आरोपितों के मोबाइल फोन से कई चैट, PDF और डिजिटल सबूत मिले हैं।
डिलीट किए गए डेटा की भी फोरेंसिक जाँच की जा रही है। CBI अब पैसों के लेन-देन, बैंक अकाउंट, मोबाइल डेटा और सोशल मीडिया चैट खंगाल रही है।
आत्महत्या के मामलों ने बढ़ाई चिंता
NEET परीक्षा रद्द होने के बाद छात्रों पर मानसिक दबाव भी साफ दिखाई दे रहा है। गोवा और उत्तर प्रदेश से दो छात्रों की आत्महत्या की खबरों ने पूरे देश को झकझोर दिया।
गोवा के कर्टोरिम में 17 साल के छात्र ने आत्महत्या कर ली। बताया गया कि वह परीक्षा रद्द होने के बाद बेहद तनाव में था। उसने एक नोट भी छोड़ा जिसमें लिखा था कि वह अब प्रतियोगी परीक्षाएँ नहीं देना चाहता।
वहीं उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में 20 साल के छात्र ने भी आत्महत्या कर ली। परिवार का कहना है कि परीक्षा रद्द होने के बाद वह लगातार मानसिक तनाव में था। यह उसका तीसरा प्रयास था और उसे इस बार चयन की उम्मीद थी।
अब सरकार क्या करने जा रही है?
केंद्र सरकार ने इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने घोषणा की है कि NEET-UG 2026 की री एग्जाम 21 जून 2026 को कराई जाएगी।
उन्होंने कहा कि छात्रों को एडमिट कार्ड 14 जून 2026 तक जारी कर दिए जाएँगे। इस बार छात्रों को अपनी सुविधा के अनुसार परीक्षा शहर चुनने का मौका भी दिया जाएगा। सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि अगले साल से NEET परीक्षा पूरी तरह कंप्यूटर आधारित यानी CBT मोड में कराई जाएगी ताकि पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोका जा सके।
CBI फिलहाल इस पूरे नेटवर्क की तह तक पहुँचने की कोशिश कर रही है। जाँच एजेंसियाँ यह पता लगा रही हैं कि इस रैकेट का असली मास्टरमाइंड कौन है और इसमें कितने लोग शामिल थे।
बॉलीवुड और उसकी कई अभिनेत्रियाँ अक्सर जमीन की हकीकत से कटी हुई नजर आती हैं और कई बार उनके बयान ऐसे होते हैं जो आम लोगों को वास्तविकता से बिल्कुल अलग लगते हैं।
ऐसा ही एक उदाहरण अभिनेत्री पूजा बेदी के उस इंटरव्यू में देखने को मिला, जो उन्होंने सुहासिनी मणिरत्नम के साथ जोस अलुक्कास के यूट्यूब चैनल पर दिया। इस इंटरव्यू में पूजा बेदी ने बताया कि उन्होंने एक्टिंग इसलिए छोड़ दी थी क्योंकि उनके रूढ़िवादी मुस्लिम ससुराल वालों को उनका फिल्मी करियर पसंद नहीं था।
लेकिन इसी दौरान उन्होंने यह भी कहा कि जब उन्होंने अपने मुस्लिम शौहर से निकाह की थी तब देश में सच्चा सेक्युलरिज्म और डेमोक्रेसी थी, जो अब दिखाई नहीं देती।
पूजा बेदी ने कहा कि आज जिस तरह लव जिहाद, हिंदू-मुस्लिम जैसी बातें होती हैं, वह उन्हें बेहद दुखद लगती हैं। उनके मुताबिक जब वह बड़ी हो रही थीं तब समाज ज्यादा सेक्युलर और लोकतांत्रिक था।
हालाँकि उनके अपने ही बयान में एक बड़ा विरोधाभास नजर आता है। एक तरफ वह कहती हैं कि उनके मुस्लिम ससुराल वाले इतने रूढ़िवादी थे कि उन्होंने उनके करियर को स्वीकार नहीं किया, दूसरी तरफ वह उसी दौर को सच्चा सेक्युलर बताती हैं।
इंटरव्यू में पूजा बेदी ने यह भी कहा कि अगर वह अपने ससुराल वालों की इच्छा के खिलाफ जाकर फिल्मों में काम जारी रखतीं तो यह उनके साथ गलत होता। उन्होंने खुद को 100 प्रतिशत अच्छी बहू और बेगम बताते हुए कहा कि उनके ससुराल वालों को उनके काम करने से असहजता होती, इसलिए उन्होंने अपना करियर छोड़ना सही समझा।
यहाँ सवाल यह उठता है कि अगर किसी महिला को अपने पति और ससुराल वालों की धार्मिक सोच के कारण अपना करियर छोड़ना पड़े, तो क्या उसे ही सेक्युलरिज्म और डेमोक्रेसी का उदाहरण माना जाए?
इंडियन एक्सप्रेस ने अपने लेख से हटाया लव जिहाद वाला हिस्सा
दिलचस्प बात यह रही कि इंडियन एक्सप्रेस ने पूजा बेदी के इसी इंटरव्यू पर जो लेख प्रकाशित किया, उसमें उनके लव जिहाद वाले बयान का कोई जिक्र नहीं किया गया।
लेख में यह बताया गया कि पूजा बेदी ने निकाह के बाद अपने ससुराल वालों को खुश रखने के लिए अपना करियर छोड़ दिया, यहाँ तक कि उन्होंने फिल्मों के लिए मिली साइनिंग अमाउंट भी वापस कर दी थी। लेकिन उसी इंटरव्यू में उन्होंने जो आज लव जिहाद की बातें होती हैं वाला बयान दिया था, उसे लेख से गायब रखा गया।
इंडियन एक्सप्रेस ने पूजा बेदी के बयान से लव जिहाद का ज़िक्र हटाया
यह पहली बार नहीं है जब तथाकथित सेक्युलर और लिबरल नैरेटिव को बनाए रखने के लिए लव जिहाद जैसे मुद्दों को नजरअंदाज किया गया हो। आलोचकों का मानना है कि प्रभावशाली लोग, मीडिया संस्थान और राजनीतिक वर्ग लंबे समय से ऐसे मामलों को या तो कम करके दिखाते रहे हैं या पूरी तरह नकारते रहे हैं।
यही वजह है कि यह मुद्दा लगातार विवाद और बहस का विषय बना हुआ है। पूजा बेदी जैसी सफल और प्रसिद्ध अभिनेत्री के लिए लव जिहाद जैसी घटनाओं को केवल राजनीतिक प्रचार बताना कई लोगों को वास्तविक घटनाओं की अनदेखी लगता है।
भारत में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ महिलाओं के साथ झूठी पहचान, शादी, धर्म परिवर्तन या शोषण के आरोप लगे। आलोचकों का कहना है कि जब प्रभावशाली लोग इन मामलों को पूरी तरह खारिज कर देते हैं, तो इससे पीड़ितों की आवाज कमजोर पड़ती है।
सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि राजनीतिक और मीडिया वर्ग ने संवेदनशील मामलों को दबाने की कोशिश की। उदाहरण के तौर पर ब्रिटेन में पाकिस्तानी मूल के कुछ गैंग्स पर नाबालिग लड़कियों के शोषण के आरोप वर्षों तक चर्चा से दूर रहे।
इसी तरह केरल में भी चर्च संगठनों ने ईसाई लड़कियों को निशाना बनाकर धर्म परिवर्तन कराने के आरोप उठाए थे, जिन पर लंबे समय तक राजनीतिक बहस चलती रही। भारत में लव जिहाद शब्द तब ज्यादा चर्चा में आया जब केरल से जुड़े कुछ मामलों में लड़कियों के धर्म परिवर्तन और कट्टरपंथी संगठनों से जुड़ने के आरोप सामने आए।
इसके बाद देशभर में ऐसे कई मामले सामने आए जिनमें महिलाओं ने मुस्लिम युवकों पर झूठी पहचान, शादी और धर्म परिवर्तन के आरोप लगाए। हाल के वर्षों में सामने आए कई चर्चित मामलों को भी इसी बहस से जोड़कर देखा गया। TCS नासिक स्कैंडल ऐसे ही अपराधों की लंबी लिस्ट में नया नाम है, जिसका पूजा बेदी मजाक उड़ाने की कोशिश कर रही हैं।
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला एक बार फिर देश की सबसे बड़ी कानूनी और सांस्कृतिक बहस के केंद्र में आ गई है। अब शुक्रवार (15 मई 2026) को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए धार भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर माना है। इस फैसले के पीछे ASI की रिपोर्ट काफी अहम साबित हुई, जिसमें मंदिर से जुड़े अहम सबूत सामने आए थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, एमपी हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने अपने फैसले में माना है कि MP की भोजशाला वाग्देवी का प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर है। हाई कोर्ट ने 5 याचिकाओं और 3 इंटरवेंशन पर सुनवाई के बाद ये फैसला सुनाया।
बता दें कि हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने साल 2022 में याचिका दायर कर धार्मिक स्वरूप तय करने और हिंदू समाज को पूरा अधिकार देने की माँग की थी। इसके बाद कोर्ट ने ASI को वैज्ञानिक सर्वे का निर्देश दिया था। ASI ने 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वे कर अपनी रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंप दी थी। अब हाई कोर्ट ने सभी पक्षों की जिरह को सुनने के बाद फैसला सुनाया है।
#WATCH | Dhar, Madhya Pradesh | On Dhar-Bhojshala case, advocate Vishnu Shankar Jain says, "The Indore High Court has delivered a historic verdict, partially setting aside the ASI's order dated April 7, 2003. Furthermore, the Court has granted the Hindu side the right to worship… pic.twitter.com/gilTokeGJy
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया है। हालाँकि हाई कोर्ट ने धार की भोजशाला यानी वाग्देवी के मंदिर के रखरखाव का दायित्व ASI को ही दिया है, जो अब तक ये काम करती आ रही है।
हाई कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष से कहा है कि वो मस्जिद बनाने के लिए दूसरी जगह की माँग कर सकते हैं, लेकिन धार की भोजशाला कमाल मौला मस्जिद (जैसा दावा करते हैं) नहीं बल्कि मूल रूप से वाग्देवी का मंदिर है। अब इस जगह पर नमाज नहीं होगी। अभी तक शुक्रवार को ASI के पुराने आदेश के हिसाब से नमाज पढ़ी जाती थी, लेकिन अब सभी पुराने आदेश रद्द हो गए हैं।
बता दें कि पूरे देश की निगाहें इस फैसले पर टिकी हुई थी, क्योंकि यह विवाद केवल मंदिर और मस्जिद तक सीमित नहीं रहा था, बल्कि यह भारतीय इतिहास, पुरातत्व, आस्था, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन चुका था। हालाँकि अब हाई कोर्ट के फैसले के बाद हिंदुओं को बड़ी राहत मिली है।
गौरतलब है कि भोजशाला माँ सरस्वती का प्राचीन मंदिर और शिक्षा का महान केंद्र था, मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। इस पूरे विवाद को नई दिशा तब मिली थी, जब भारतीय पुरात्तव विभाग (ASI) ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद अपनी विस्तृत रिपोर्ट हाई कोर्ट में पेश की और दावा किया कि मौजूदा ढाँचे से पहले यहाँ परमारकालीन विशाल मंदिरनुमा संरचना मौजूद थी।
लगभग दो वर्षों तक चले कानूनी संघर्ष, वैज्ञानिक जाँच, ऐतिहासिक बहस और हजारों दस्तावेजों की पड़ताल के बाद अब अदालत के फैसले ने विवाद का पटाक्षेप कर दिया है।
आखिर क्या है भोजशाला और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
धार की भोजशाला को हिंदू समाज माता सरस्वती के मंदिर और प्राचीन विश्वविद्यालय के रूप में देखता है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इसकी स्थापना 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने की थी। राजा भोज केवल एक शक्तिशाली शासक ही नहीं, बल्कि शिक्षा, साहित्य, दर्शन, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान और संस्कृत के बड़े संरक्षक माने जाते हैं।
उस समय धार उनकी राजधानी थी और भोजशाला ज्ञान तथा शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। यहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे और संगीत, संस्कृत, योग, दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष तथा आयुर्वेद जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थान केवल पूजा का स्थल नहीं था, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का जीवंत प्रतीक था।
भोजशाला परिसर में आज भी ऐसे कई शिलालेख, नक्काशीदार स्तंभ और स्थापत्य अवशेष मौजूद हैं, जिनमें संस्कृत, प्राकृत और प्राचीन नागरी लिपि के चिन्ह दिखाई देते हैं। कई अभिलेखों में ‘ॐ नमः शिवाय’, ‘ॐ सरस्वत्यै नमः’ और परमार राजाओं की प्रशंसा का उल्लेख मिलने का दावा किया गया है।
हिंदू पक्ष यह भी कहता है कि यहाँ स्थापित माँ सरस्वती की मूल प्रतिमा को अंग्रेजों के शासनकाल में लंदन ले जाया गया था और वह आज भी वहाँ संग्रहालय में रखी हुई है। इसी कारण भोजशाला को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में भी देखा जाता है।
कैसे शुरू हुआ भोजशाला विवाद और क्यों बढ़ती गई टकराव की स्थिति?
मुस्लिम पक्ष इस परिसर को कमाल मौला मस्जिद बताता है और दावा करता है कि यहाँ लंबे समय से नमाज अदा की जाती रही है। जबकि सच्चाई ये है कि यह मूल रूप से माता सरस्वती का मंदिर था, जिसे मुस्लिम आक्रमणकारियों ने तोड़कर मस्जिदनुमा ढाँचे में बदल दिया। साल 2003 में इस विवाद को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने एक व्यवस्था लागू की।
इसके तहत हिंदुओं को हर मंगलवार पूजा की अनुमति दी गई, जबकि मुस्लिम पक्ष को हर शुक्रवार नमाज पढ़ने की इजाजत मिली। बाकी दिनों में परिसर को स्मारक और पर्यटन स्थल के रूप में रखा गया। हालाँकि यह व्यवस्था अस्थायी समाधान साबित हुई, क्योंकि दोनों पक्ष लगातार अपने पूर्ण अधिकार की माँग करते रहे।
हिंदू संगठनों का कहना था कि यदि ASI संरक्षित परिसर के भीतर मंदिर के प्रमाण मौजूद हैं, तो हिंदुओं को वहाँ नियमित पूजा का अधिकार मिलना चाहिए। वहीं मुस्लिम पक्ष ने इसे मस्जिद और दरगाह के रूप में संरक्षित रखने की माँग जारी रखी।
2022 से शुरू हुई नई कानूनी लड़ाई और हाई कोर्ट की सुनवाई
भोजशाला विवाद का नया और सबसे महत्वपूर्ण कानूनी अध्याय वर्ष 2022 में शुरू हुआ। हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से रंजना अग्निहोत्री, आशीष गोयल और अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर माँग की कि भोजशाला का वास्तविक धार्मिक स्वरूप तय किया जाए और पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए।
याचिका में यह भी कहा गया कि हिंदू समाज को वहाँ पूर्ण पूजा-अर्चना का अधिकार दिया जाए। हिंदू पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी और अन्य वकीलों ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने दावा किया कि परिसर में मौजूद स्थापत्य, शिलालेख और मूर्तिकला मंदिर स्वरूप की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं।
सुनवाई के बाद 11 मार्च 2024 को हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने ASI को आदेश दिया कि वह ज्ञानवापी की तर्ज पर भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वे करे। इसके बाद 22 मार्च 2024 से ASI ने विस्तृत सर्वेक्षण शुरू किया, जो करीब 98 दिनों तक चला। इस दौरान खुदाई, कार्बन डेटिंग, स्थापत्य विश्लेषण, शिलालेखों की जाँच और संरचनात्मक अध्ययन किया गया।
15 जुलाई 2024 को ASI ने 2000 से अधिक पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट अदालत में पेश की। बाद में फरवरी 2026 में अतिरिक्त वैज्ञानिक रिपोर्ट भी दाखिल की गई।
6 अप्रैल 2026 से इंदौर हाई कोर्ट की डबल बेंच ने इस मामले में नियमित सुनवाई शुरू की, जो 12 मई 2026 तक चली। इस दौरान हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्षों ने हजारों दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड, पुरातात्विक साक्ष्य और धार्मिक दावे अदालत के सामने रखे। सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था और अब अपना फैसला हिंदुओं के पक्ष में सुना दिया है।
ASI रिपोर्ट में क्या-क्या बड़े खुलासे हुए?
ASI की रिपोर्ट इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा बनकर सामने आई। ASI ने दावा किया कि मौजूदा ढाँचे से पहले यहाँ परमारकालीन विशाल संरचना मौजूद थी और वर्तमान निर्माण मंदिर के अवशेषों का उपयोग करके किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, परिसर में मिले स्तंभ, नक्काशीदार पत्थर, शिलालेख और स्थापत्य तत्व मंदिर शैली की ओर संकेत करते हैं।
ASI को परिसर से भगवान गणेश, नरसिंह, भैरव, ब्रह्मा और पशु आकृतियों से जुड़ी कुल 94 मूर्तियाँ और मूर्तिकला के हिस्से मिले। रिपोर्ट में कहा गया कि 106 स्तंभों और 82 पिलास्टर्स पर देवी-देवताओं, मनुष्यों और पशु आकृतियों को जानबूझकर छेनी से विकृत किया गया।
ASI ने यह भी कहा कि मौजूदा मस्जिदनुमा ढाँचे में स्थापत्य संतुलन और समरूपता का अभाव दिखाई देता है, जबकि मूल संरचना में उच्च स्तर की वास्तुकला और कलात्मकता मौजूद थी। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि वर्तमान निर्माण कई सदियों बाद जल्दबाजी में तैयार किया गया और उसमें मंदिर के मूल पत्थरों और स्तंभों का उपयोग हुआ।
ASI को परिसर में संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख मिले, जिनमें राजा नरवर्मन, उदयादित्य और परमार वंश का उल्लेख पाया गया। कुछ अभिलेखों में संस्कृत व्याकरण, वर्णमाला और ‘कर्पूरमंजरी’ नाटक के अंश भी मिले। ASI ने भोजशाला के विकास को तीन चरणों में विभाजित किया। पहले में 10वीं शताब्दी से पहले की प्रारंभिक ईंट संरचना का उल्लेख किया।
दूसरे चरण में 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच राजा भोज और परमार काल के भव्य मंदिर तथा शिक्षा केंद्र का वर्णन किया गया। तीसरे चरण में 14वीं शताब्दी के बाद मस्जिद और दरगाह निर्माण की बात कही गई। ASI ने यह भी कहा कि मूल मंदिर संरचना के कई हिस्सों को तोड़कर इस्लामी स्थापत्य तत्व जोड़े गए।
हिंदू पक्ष ने अदालत में किन दावों और सबूतों के आधार पर लड़ाई लड़ी?
हिंदू पक्ष ने कोर्ट में दावा किया कि भोजशाला मूल रूप से माँ सरस्वती का मंदिर और भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा का केंद्र था। अधिवक्ता विष्णू शंकर जैन और अन्य वकीलों ने कहा कि परिसर में मौजूद मूर्तियाँ, देवी-देवताओं की आकृतियाँ, संस्कृत शिलालेख और मंदिर शैली के स्तंभ किसी मस्जिद का हिस्सा नहीं हो सकते।
उन्होंने अदालत में ब्रिटिशकालीन गजेटियर, इतिहासकारों के दस्तावेज और पुरातात्विक रिकॉर्ड भी पेश किए, जिनमें भोजशाला को सरस्वती मंदिर और शिक्षा केंद्र बताया गया था। हिंदू पक्ष ने यह भी कहा कि यहाँ सदियों से वसंत पंचमी पर पूजा-अर्चना होती रही है और यह परंपरा आज भी जारी है।
याचिकाकर्ताओं का दावा था कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिर को ध्वस्त कर उसके अवशेषों से मस्जिदनुमा ढाँचा तैयार किया। हिंदू संगठनों ने अदालत से माँग की कि हिंदुओं को पूरे परिसर में पूजा का अधिकार दिया जाए और भोजशाला को आधिकारिक रूप से मंदिर घोषित किया जाए।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ASI की रिपोर्ट मंदिर पक्ष को मजबूत करती है, क्योंकि उसमें मिले शिलालेख, मूर्तिकला, स्तंभ और स्थापत्य प्रमाण स्पष्ट रूप से हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप की ओर संकेत करते हैं। अदालत में यह भी कहा गया कि जिस संरचना को मस्जिद बताया जा रहा है, उसमें इस्तेमाल किए गए अधिकांश खंभे और पत्थर मूल मंदिर के थे।
भोजशाला पर इस्लामी आक्रमण, विनाश और सत्ता संघर्ष की पूरी कहानी
भोजशाला पर कई बार इस्लामी आक्रमण हुए। दावा किया जाता है कि 1269 में कमाल मौलाना नाम का एक मुस्लिम फकीर मालवा पहुँचा और बाद में यहाँ इस्लामी प्रभाव बढ़ने लगा। इसके बाद 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर हमला किया और भोजशाला को भारी नुकसान पहुँचाया।
हिंदू पक्ष का दावा है कि उस समय यहाँ अध्ययन कर रहे 1200 से अधिक छात्रों और शिक्षकों को बंदी बनाया गया और इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद 1401 में दिलावर खान ने परिसर के एक हिस्से को दरगाह में बदलने का प्रयास किया।
फिर 1514 में महमूद शाह ने भोजशाला परिसर पर कब्जा मजबूत करने की कोशिश की और कमाल मौला मकबरे का विस्तार किया। हिंदू पक्ष का कहना है कि इन्हीं घटनाओं के आधार पर बाद में इसे मस्जिद और दरगाह बताया जाने लगा। बाद में मेदनी राय ने मुस्लिम शासकों के खिलाफ युद्ध कर क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया।
1703 में मालवा पर मराठों का अधिकार हो गया और मुस्लिम शासन समाप्त हुआ। इसके बाद अंग्रेजों का शासन आया। हिंदू संगठनों का दावा है कि 1902 में लॉर्ड कर्जन भोजशाला से माता सरस्वती की प्रतिमा इंग्लैंड ले गया। आजादी के बाद 1952 में भोजशाला को ASI के अधीन कर दिया गया।
बाद में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, आर्य समाज और हिंदू महासभा जैसे संगठनों ने भोजशाला आंदोलन को आगे बढ़ाया। 1961 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् विष्णु श्रीधर वाकणकर ने लंदन जाकर दावा किया कि वहाँ रखी वाग्देवी की प्रतिमा वास्तव में भोजशाला की है।
बहरहाल, अब इंदौर हाई कोर्ट के फैसले के बाद इस पूरे विवाद का पटाक्षेप हो गया है। धार की भोजशाला मूल रूप से वाग्देवी का मंदिर है और इसमें हिंदुओं को पूजा का अधिकार है। हाई कोर्ट का ये फैसला हिंदुओं के लिए बड़ी जीत की तरह है।
आज के दौर में युद्ध केवल सीमाओं पर टैंकों और मिसाइलों से नहीं लड़े जाते। अब युद्ध लड़े जाते हैं आपके मोबाइल स्क्रीन पर, अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के कवर पेज पर और मानवाधिकारों की आड़ में चलने वाले एनजीओ (NGOs) के दफ्तरों में। इसे ही ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ या ‘एसिमेट्रिक वॉरफेयर’ कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य किसी उभरती हुई शक्ति को अंदरूनी तौर पर इतना उलझा देना है कि वह अपनी पूरी क्षमता से विकास न कर सके।
इसी तरह से जब भी भारत कोई बड़ा प्रोजेक्ट शुरू करता है, चाहे वो कोई न्यूक्लियर प्लांट हो, कोई बड़ा पोर्ट हो या माइनिंग प्रोजेक्ट, अचानक से पूरी दुनिया के ‘मानवाधिकार संगठन’ और ‘पर्यावरण कार्यकर्ता’ जाग क्यों जाते हैं?
आपको लगेगा कि ये लोग तो प्रकृति की रक्षा कर रहे हैं, ये तो सराहनीय काम है। लेकिन क्या ये सिर्फ़ पर्यावरण प्रेम है या फिर इसके पीछे एक बहुत बड़ा जियो-पॉलिटिकल और वैचारिक खेल चल रहा है, जिसका मकसद भारत की उभरती हुई ताकत को कमजोर करना है?
आज हम आपको इसी हाइब्रिड वॉरफेयर के बारे में विस्तार से बताएँगे। यहाँ मिसाइलों या बंदूकों की जगह नैरेटिव, सूचना युद्ध, मिसइनफॉर्मेशन और फेक-न्यूज का इस्तेमाल किया जाता है।
हम बात करेंगे ग्रेट निकोबार इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (GNI) की, जिसे रोकने के लिए 13 देशों के 39 ‘जनसंहार विशेषज्ञों’ (Genocide Experts) ने 2024 में खुला पत्र लिखकर पूरा जोर लगा दिया।
हम कल्चरल मार्क्सिज्म की उस थ्योरी का भी गहरा विश्लेषण करेंगे, जो शिक्षा, मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स के जरिए युवा पीढ़ी के दिमाग में ये बिठा रही है कि विकास का मतलब हमेशा विनाश ही है।
और सबसे महत्वपूर्ण कि हम आपको उन विदेशी एनजीओ और ग्लोबल लॉबीज के बारे में बताएँगे, जो भारत की जीडीपी को सालाना 2-3% की चोट पहुँचा रहे हैं यानी हजारों-लाखों करोड़ रुपए का नुकसान… जो अस्पतालों, स्कूलों, सड़कों और ऊर्जा सुरक्षा पर खर्च हो सकता था।
अमेरिका का ‘Trail of Tears’ vs भारत को लेक्चर
एक देश जिसने अपनी नींव ही मूल निवासियों की ज़मीन छीनकर रखी, आज दुनिया का सबसे बड़ा क्लाइमेट एक्टिविज्म का हब बन गया है। Indian Removal Act 1830 के तहत अमेरिका ने दसियों हज़ार नेटिव अमेरिकंस / रेड इंडियंस को उनकी पैतृक भूमि से जबरन बेदखल कर दिया। Trail of Tears के दौरान अकेले Cherokee और बाक़ी Tribes के करीब 60,000 से 1 लाख लोगों को हटाया गया, जिसमें हजारों की मौत हो गई, भूख, बीमारी और मार्च की भयानक हालत में।
पूरी तस्वीर तो और भी भयानक है, 15वीं सदी से 19वीं सदी के बीच नेटिव अमेरिकन आबादी में भारी गिरावट आई, युद्धों, बीमारियों और ट्राइब्स की इस किस्म की बेदख़ली से। फिर वही अमेरिका NGO संस्कृति का जनक बना, खुद को सुपरपावर नाम दिया और आज क्लाइमेट चेंज का सबसे बड़ा चैंपियन बनकर दुनिया को लेक्चर देता है। जो देश कभी ज़मीनें छीन रहे थे, वो आज NGOs के जरिए हमारी ज़मीन के इस्तेमाल पर लेक्चर दे रहे हैं।
इसी अमेरिका ने जो टर्मिनोलॉजी उछाली हैं, उन्हें ही भाड़े के एक्टिविस्ट अलग अलग देशों में अपनी पहचान बनाकर बेच रहे हैं और इन टर्मिनोलॉजी में सबसे लेटेस्ट एडिशन हैं – हीटवेव, क्लाइमेट एक्टिविज्म एंड ट्राइब्स।
लेकिन सवाल ये है कि ये हिपोक्रेसी कहाँ से शुरू हुई? और क्यों आज भारत में भी यही स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है?
अमेरिका और यूरोप से सीखकर भारत में आज ट्राइब्स और क्लाइमेट के नाम पर एक नया एक्टिविज्म तैयार किया जा रहा है। Forest rights, tribal land, climate justice, ये सब एक्टिविज्म के नाम हैं। लेकिन असल खेल civil society और NGOs के जरिए Cultural Marxism की घुसपैठ का है। जहाँ एक तरफ विकास और राष्ट्र-निर्माण को दमन/शोषण बताया जाता है, वहीं विदेशी फंडिंग से चलने वाले नेटवर्क ट्राइबल कम्युनिटीज को मेनस्ट्रीम से अलग रखने और राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ इस्तेमाल करते हैं। डिवाइड एंड रूल का नया वर्जन यही है लेकिन अब सस्टेनेबिलिटी और ‘इनक्लूजन’ के पैकेजिंग में।
ये वही ताकतें हैं जो कल्चर, ट्रेडिशन और sovereignty को तोड़ने में लगी हैं; ठीक वैसे जैसे पश्चिम ने अपनी गलतियों को मॉरल सुपीरियॉरिटी में बदल लिया।
हाइब्रिड वारफेयर और 2014 की सीक्रेट रिपोर्ट
पहले युद्ध सीमाओं पर लड़े जाते थे। लेकिन अब Asymmetric Warfare का दौर है। यहाँ हथियार हैं सोशल मीडिया, NGO और इंटेलेक्चुअल एक्टिविज्म
साल 2014 में IB ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक ऐसी रिपोर्ट सौंपी जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इस रिपोर्ट में साफ लिखा था कि कुछ विदेशी ताकतें भारत की $5 ट्रिलियन इकोनॉमी बनने की राह में रुकावट डालने के लिए कई टेक्निक अपना रही हैं – जैसे कि एक तरफ से स्थानीय लोगों की शिकायतों को भड़काना और दूसरी तरफ से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को मानव-विरोधी या पर्यावरण-विरोधी बताकर निवेश को रोकना।
IB ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इन आंदोलनों की वजह से भारत की ऊर्जा सुरक्षा और माइनिंग सेक्टर को कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ी है:
परमाणु ऊर्जा (Kudankulam): ‘PMANE’ और ‘ग्रीनपीस’ जैसे संगठनों ने विरोध किया, जिससे भारत की एनर्जी सिक्योरिटी में सालों की देरी हुई
कोयला और माइनिंग (Mahan Coal Block): एक्शनएड और ग्रीनपीस ने वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन का नैरेटिव खड़ा करके निवेश रुकवा दिया।
औद्योगिक केंद्र (POSCO और वेदांता): स्थानीय सक्रियता के नाम पर अरबों डॉलर के FDI का नुकसान हुआ।
कृषि तकनीक (GMO विरोध): ‘ASHA’ और ‘ग्रीनपीस’ ने नई बीजों की तकनीक को रोककर कृषि उत्पादकता को बाधित किया।
और जानते हैं इसका सबसे भयानक नतीजा क्या निकला? IB के अनुसार, इन गतिविधियों की वजह से भारत की वार्षिक जीडीपी ग्रोथ रेट में 2% से 3% की गिरावट आई। ये हज़ारों-लाखों करोड़ रुपये हैं जो आपके और हमारे अस्पताल, स्कूल और सड़कों पर खर्च हो सकते थे।
अब समझने वाली बात ये है कि ये विरोध सिर्फ पेड़ों या पक्षियों तक सीमित नहीं है। असल में Climate Activism आज के दौर का एक Multipolar Ideological War बन चुका है। जिसे हम पर्यावरण की चिंता समझ रहे हैं, वो दरअसल Watermelon Politics है… यानी ऊपर से हरा, लेकिन अंदर से वही पुराना लाल (मार्क्सवादी) एजेंडा।
जब औद्योगिक विकास ने मजदूरों का जीवन सुधारा, तो वामपंथी विचारधारा को नया मोहरा चाहिए था। अब उन्होंने शिक्षित मध्यम वर्ग और छात्रों को निशाना बनाया और डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के खिलाफ मॉरल वॉर छेड़ दी। मकसद साफ है- क्लाइमेट लिटिगेशन के जरिए चुनी हुई सरकार के हाथ बाँधना और देश की संप्रभुता को विदेशी एनजीओ के इशारों पर नचाना।
दिलचस्प बात ये है कि इस नैरेटिव की जड़ें Cold War में छिपी हैं। 1960 के दशक से ही पश्चिमी ताकतों ने आपातकाल और संकट पैदा करने की रणनीति अपनाई है ताकि जनता पर नियंत्रण रखा जा सके। आज जलवायु परिवर्तन को उसी युद्ध जैसी इमरजेंसी के रूप में फ्रेम किया जा रहा है ताकि विकासशील देशों की ऊर्जा और अर्थव्यवस्था को कमज़ोर किया जा सके।
इसीलिए ये पश्चिमी देश, खासकर जर्मनी जैसे यूरोपीय देश, अब Regulatory Imperialism (नियामक साम्राज्यवाद ) का सहारा ले रहे हैं। CBAM जैसे टैक्स लगाकर ये हमारे स्टील और एल्युमीनियम एक्सपोर्ट को महंगा कर रहे हैं ताकि भारत ग्लोबल मार्केट में पिछड़ जाए। ये वही शीतयुद्ध वाली रणनीति है कि संकट पैदा करो, डर फैलाओ और फिर EXPERT बनकर दुनिया को कंट्रोल करो।
हीटवेव: डर का नया नैरेटिव
हमारे देश में गर्मी का क्या लेना-देना इन सबसे? असली कहानी यही है- जब भी भारत में हीटवेव आती है, अंतरराष्ट्रीय मीडिया इसे विनाशकारी संकट बताता है। ‘95% भारतीय शहर खतरे में’, ‘वेट बुल्ब टेम्परेचर’ जैसे शब्द उछाले जाते हैं।
ये डेटा अक्सर साइंटिफिक एक्सागरेशन होता है और ठीक उसी वक्त सामने आता है जब भारत कोई नया माइनिंग प्रोजेक्ट या पावर प्लांट शुरू करता है। मकसद भारत को ‘विक्टिम’ या ‘विलेन’ बनाना है ताकि अंतरराष्ट्रीय दबाव बने कि “देखो, तुम्हारा देश जल रहा है, इसलिए निकोबार या कोई XYZ प्रोजेक्ट रोक दो और हमारे महँगे ग्रीन-टेक खरीद लो।”
ये भारत की आर्थिक स्थिरता पर सवाल उठाने और हमें एक कमज़ोर देश साबित करने की वेल प्लानेंड कोशिश है।
मैं गर्मी से इनकार नहीं कर रहा, लेकिन उस फियर मॉन्गरिंग का विरोध कर रहा हूं, जिससे भारत की एनर्जी सिक्योरिटी (कोयला-गैस) को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि पश्चिम खुद फॉसिल फ्यूल पर टिका है।
लेकिन ये भारत को इस किस्म के मोरल डिलेमा में डालने का प्रयास करने वाली पश्चिमी संस्थाएँ जो आज के दौर में पैदा हुई हैं, शायद नहीं जानती कि भारत को आज किसी पश्चिमी ज्ञान और रेटिंग की ज़रूरत नहीं है। हमारे लिए प्रकृति कोई Product नहीं है, वो हमारे लाइफस्टाइल का जरूरी हिस्सा रहा है…
अथर्ववेद का मंत्र है “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”। यानी धरती हमारी माँ है और हम उसकी संतान। जहाँ पश्चिम प्रकृति पर विजय पाने की सोचता है, वहीं हमारी संस्कृति प्रकृति के साथ जुड़कर रहने की बात करती है। हमें पश्चिमी “वॉटरमेलन” एक्टिविज्म की नहीं, अपनी प्राचीन Dharmic Ecology की ज़रूरत है जो विकास और प्रकृति, दोनों का सम्मान करती है।)
क्या है सिविल सोसायटी और कल्चरल मार्क्सिज्म?
अब सवाल ये उठता है कि ये लोग इतने संगठित कैसे हैं? इनका दिमाग कैसे काम करता है? यहाँ एंट्री होती है Cultural Marxism की।
इतिहास में देखें तो 20वीं सदी की शुरुआत में ‘फ्रैंकफर्ट स्कूल’ के विचारक जैसे मैक्स होर्खाइमर और थियोडोर अडोर्नो ने देखा कि मजदूर क्रांति नहीं कर रहे। तो उन्होंने अपनी रणनीति बदली। उन्होंने कहा कि हथियारों से नहीं, संस्कृति से हमला करो।
इसे कहते हैं क्रिटिकल थ्योरी जिसका मकसद है परिवार, धर्म और राष्ट्रवाद जैसी संस्थाओं को ‘उत्पीड़क’ / Oppressor साबित करना।
और आज यही विचारधारा Eco-Marxism बन चुकी है। कार्ल मार्क्स ने एक सिद्धांत दिया था – ‘मेटाबॉलिक रिफ्ट’ / Metabolic Rift। ये कहता है कि पूंजीवाद मनुष्य और प्रकृति का रिश्ता तोड़ देता है। इसी का फायदा उठाकर आज हर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट को ‘जनसंहार’ यानी Genocide या ‘पारिस्थितिकी-संहार’ / Ecocide का नाम दे दिया जाता है।
Cultural Marxism – इसके तीन फ्रंट हैं-
आर्थिक मार्क्सवाद: ये कहता है कि दुश्मन ‘पूंजीपति’ है, एजेंट ‘मजदूर’ है।
सांस्कृतिक मार्क्सवाद: हमारे दुश्मन ‘पारंपरिक मूल्य’ हैं, या जिसमें ‘संस्कार’ कहकर तंज करने का चलन आता है, और यहाँ एजेंट है ‘हाशिए पर रहने वाले समूह’ हैं / मार्जिनलाइज्ड ग्रुप्स
इको-मार्क्सवाद: इसमें दुश्मन ‘औद्योगिक विकास’ है, और इसके एजेंट पर्यावरण और आदिवासी कार्यकर्ता हैं।
यही वजह है कि आज एक आम नागरिक के मन में ये डाल दिया गया है कि अगर फैक्ट्री लगेगी, तो जंगल खत्म हो जाएंगे, जबकि सच्चाई कुछ और ही होती है।
लेकिन सोचने की बात ये है कि भारत के सांस्कृतिक नॉलेज और हमारे ट्रेडिशन को तोड़ने के लिए सबसे आगे हमेशा कौन रहा है? मार्स्किस्ट और कम्युनिस्ट और बदलते दौर के साथ यही मार्क्सिज्म आज कल्चरल मार्क्सिज्म की शक्ल में हमारे और आपके बीच है -इसी Eco-Marxism के चश्मे से ये लोग भारत के हर बड़े प्रोजेक्ट को देखते हैं। इनके लिए निकोबार प्रोजेक्ट या कोई भी नया इंफ्रास्ट्रक्चर सिर्फ एक निर्माण कार्य नहीं है, बल्कि इनके हिसाब से ये “पूँजीवादी लालच” का वह हिस्सा है जो धरती को तबाह कर रहा है। और यही वो वैचारिक जाल है जिसमें हमारे यूथ को फंसाया जा रहा है
भारत के लिए कितना अहम है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट
अब बात करते हैं उस प्रोजेक्ट की, जो भारत को एक ‘ग्लोबल सुपरपावर’ बना सकता है, और जो इस वक्त इसी कल्चरल मार्क्सिज्म का पीड़ित है – ग्रेट निकोबार द्वीप जिसे लोग GNI प्रोजेक्ट भी नाम दे रहे हैं।
नीति आयोग का विजन है कि 81,000 करोड़ रुपए का निवेश होगा, जिसमें चार बड़ी चीजें होंगी
गैलाथिया खाड़ी में एक मेगा पोर्ट: जो सिंगापुर और कोलंबो को टक्कर देगा।
एक ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट: जो नागरिक और सैन्य दोनों कामों में आएगा।
एक नया पावर प्लांट और पोर्ट सिटी।
लेकिन इस से चीन और उसके सिपाहियों को क्यों डर लग रहा है? दरअसल, निकोबार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य / Strait of Malacca के मुहाने पर बैठा है। दुनिया का अधिकांश तेल और व्यापार यहीं से गुजरता है। इसे ही Malacca Dilemma भी नाम दिया जाता है क्योंकि भारत यहाँ से चीन की एनर्जी सप्लाई लाइन को कभी भी ब्लॉक कर सकता है।
यही वजह है कि INS Baaz हवाई पट्टी का विस्तार भारत के लिए रणनीतिक रूप से अनिवार्य है। लेकिन जैसे ही भारत ने यहाँ काम शुरू किया, विदेशी एनजीओ का ‘इको-मार्क्सवाद’ सक्रिय हो गया।
द एंटी-इंडिया कैबाल / Anti-India Cabal -NGO
हम आपको उन एनजीओ के बारे में बता रहे हैं, जो इस पूरे खेल के पीछे हैं। ये कोई मामूली संस्थाएं नहीं हैं, इनके नेक्सस पश्चिमी देशों की सरकारों और बड़े कॉर्पोरेट फंड्स से जुड़े हैं।
1. सर्वाइवल इंटरनेशनल (Survival International – UK)
इसका हेडक्वार्टर लंदन / UK में है। इसने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को ‘शौम्पेन’ (Shompen) जनजाति के लिए Death Sentence घोषित कर दिया है। साल 2024 में इन्होंने 13 देशों के 39 ‘जनसंहार विशेषज्ञों’ से एक चिट्ठी लिखवाई ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक ‘क्रूर राष्ट्र’ दिखाया जा सके। इनका मकसद आदिवासियों को आधुनिक स्वास्थ्य और शिक्षा से दूर रखकर ‘जैविक संग्रहालय’ / Biological Museums की तरह रखना है।
2. ग्रीनपीस इंडिया (Greenpeace – Netherlands)
यह नीदरलैंड्स बेस्ड संगठन का भारतीय हत्था है। आईबी की रिपोर्ट बताती हैं कि ग्रीनपीस ने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों – जैसे कुडनकुलम और कोयला खदानों के खिलाफ आंदोलन प्रायोजित करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए। इनका Main एजेंडा भारत की एनर्जी के फील्ड में इंडिपेंडेंट होने से रोकना है।
3. एमनेस्टी इंटरनेशनल और एक्शनएड (Amnesty and ActionAid – UK/International)
लंदन बेस्ड इन संस्थाओं को IB ने पश्चिमी सरकारों के Instruments नाम दिया था। ये मानवाधिकारों की आड़ में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और सेंसिटिव क्षेत्रों में माइनिंग जैसे प्रोजेक्ट्स के ख़िलाफ़ जनाक्रोश भड़काते हैं ताकि भारत की निर्भरता नेचुरल रिसोर्सेज के लिए विदेशों पर बनी रहे।
4. सतत संपदा (Satat Sampada) और हरजीत सिंह (India/International)
जनवरी 2026 में ED ने क्लाइमेट एक्टिविस्ट हरजीत सिंह और संजय वशिष्ठ के ठिकानों पर छापेमारी की। यहाँ मामला बहुत गंभीर नजर आता है। ‘सतत संपदा’ नाम की संस्था को ‘क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क’ (CAN) से 6 करोड़ रुपए का संदिग्ध विदेशी धन मिला। ED इस नतीजे पर पहुँचा था कि इस पैसे का इस्तेमाल भारत में ‘फॉसिल फ्यूल नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी’ (FF-NPT) को प्रमोट करने के लिए किया जा रहा था।
लेकिन ये ट्रीटी / संधि क्या है? ये संधि चाहती है कि भारत कोयला, तेल और गैस का इस्तेमाल बंद कर दे। जबकि भारत अपनी 70% बिजली आज भी कोयले से बनाता है। अगर ये सफल हो गए, तो भारत के घरों की बिजली गुल हो जाएगी और फैक्ट्रियाँ बंद हो जाएंगी।
5. स्थानीय नेटवर्क: PUCL, NAPM और नर्मदा बचाओ आंदोलन
विदेशी फंड्स सीधे जमीन पर नहीं आते। ये PUCL और ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ जैसे स्थानीय संगठनों के जरिए काम करते हैं। ये संगठन कानूनी अड़चनें पैदा करते हैं और स्थानीय लोगों को भड़काते हैं ताकि प्रोजेक्ट की लागत बढ़ जाए और देरी हो।
एडवार्ड ग्रिफ़िन अपने एक लेक्चर में बता रहे हैं कि अमेरिका में १९२० में कॉम्युनिस्ट किस तरह से समाज की असंतुष्टि, नस्लवाद, समाजवाद जैसे प्रयोगों से लोगों को भड़का कर “क्या” हासिल करना चाहते थे। कुछ हायपर योद्धा इसी असंतुष्टि पर जीवित हैं, राज्य कोई भी क्यों ना हो! pic.twitter.com/ralLUevNtF
ESG यानी – ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर हाइब्रिड वॉर: विदेशी एनजीओ और कल्चरल मार्क्सिज्म का भारत के विकास को रोकने की साजिश | Environment, Social and Governance को अब एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। यही हरित उपनिवेशवाद (Green Colonialism) है।
विकसित देश, जिन्होंने खुद कोयला जलाकर और जंगलों को काटकर अपनी तरक्की की, अब भारत जैसी उभरती शक्तियों को ‘नैतिक मानदंडों’ के नाम पर रोक रहे हैं।
ग्रेट निकोबार पोर्ट: यहाँ एक्टिविज्म का आधार रेन फारेस्ट / वर्षावन है, लेकिन असली मकसद ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ पर भारतीय नियंत्रण रोकना है।
ओडिशा माइनिंग: यहाँ आधार ‘आदिवासी पहचान’ बनाया है, मकसद भारत को खनिज आयात पर निर्भर रखना है।
केन-बेतवा लिंक: यहाँ आधार ‘पन्ना टाइगर रिजर्व’ है, जबकि असली मकसद कृषि उत्पादकता को रोकना है।
ये एक तरह की ‘ग्रीन कोर्डन’ / Green Cordon स्ट्रेटेजी है ताकि भारत कभी भी ग्लोबल सप्लाई चेन का केंद्र न बन पाए।
राजनीतिक नेक्सस – राहुल गाँधी और चीनी MOU
लेकिन ये सब केवल बाहर से नहीं हो रहा। भारत के भीतर भी इसे राजनीतिक समर्थन मिलता है। और ऐसे में ही ये पूरा इकोसिस्टम एक लूप पूरी करता है –
राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में संपत्ति के पुनर्वितरण यानी Wealth Redistribution जैसी बातें शुरू की हैं, जो सीधे तौर पर मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। राहुल गाँधी और उनके साथियों का एक साझा इतिहास रहा है- चाहे वो वेदांता हो, पॉस्को हो या टाटा नैनो, उन्होंने हर बड़े प्रोजेक्ट का विरोध किया है।
यहाँ एक और फैक्ट है। साल 2008 में कॉन्ग्रेस पार्टी और ‘चीनी कम्युनिस्ट पार्टी’ (CPC) के बीच एक MoU हुआ था। लोग सवाल उठाते हैं कि क्या इस समझौते की वजह से ही विपक्ष उन रणनीतिक परियोजनाओं का विरोध करता है जो चीन के लिए खतरा हैं? जैसे कि ग्रेट निकोबार।
Sabotaging Nicobar isn't saving the planet; it's gifting the Indian Ocean to China on a platter.
From Niyamgiri and POSCO to now the Great Nicobar Project, the strategy is clear: Oppose everything, stall everyone. Who does this 'activism' really benefit?
ये सिर्फ़ राजनीतिक आरोप नहीं है, ये तो एक Pattern है। जब भी कोई ऐसा प्रोजेक्ट आता है जो भारत को चीन के मुकाबले रणनीतिक बढ़त (Strategic Edge) देता है, तभी इंटरनल प्रोटेस्ट की आवाज सबसे तेज़ क्यों हो जाति है? क्या ये सिर्फ़ कोइंसीडेंस होता है या उस MoU का असर होता है, ये हमें सूचना चाहिए
वेनेजुएला vs वियतनाम – दो रास्तों की कहानी
अब आप सोच रहे होंगे कि विकास नहीं हुआ तो क्या हुआ? हम गरीब ही अच्छे हैं। तो इन दो देशों की कहानी देखते हैं। वेनेजुएला और क्यूबा –
वेनेजुएला और क्यूबा: यहाँ कट्टरपंथी समाजवादी नीतियाँ अपनाई गईं। उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हुआ और विकास प्रोजेक्ट्स को रोका गया। नतीजा क्या हुआ? वेनेजुएला की GDP 88% गिर गई और वहाँ 548% Inflation रेट है। इसे कहते हैं ‘दरिद्रता का वितरण’ (Equality of Misery)।
वियतनाम: 1986 में वियतनाम ने ‘दोई मोई’ (Doi Moi) सुधार किए और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था अपनाई। आज वियतनाम 7.1% की दर से बढ़ रहा है और मैन्युफैक्चरिंग का ग्लोबल हब बन गया है।
इन दो उदाहरणों से भारत के लिए सबक साफ है, अगर हम इन विकास-विरोधी नैरेटिव्स के चक्कर में पड़े, तो हमारा हाल भी वेनेजुएला जैसा हो सकता है, जिनकी वामपंथी नीतियों ने वहाँ की जनता को गरीब बनाकर रखा … इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने विकास रोका, वे आज दरिद्रता बाँट रहे हैं..
असली भारतीयपर्यावरणवाद vs ‘एसी रूम’ एक्टिविज्म
एक बहुत ज़रूरी बात। भारत को पर्यावरण बचाना किसी पश्चिमी NGO से सीखने की ज़रूरत नहीं है। हमारी परंपरा में ‘बिश्नोई आंदोलन’ और ‘चिपको आंदोलन’ जैसे उदाहरण हैं, जहाँ लोगों ने अपनी संस्कृति के लिए पेड़ों को गले लगाया। स्वामी ज्ञान स्वरूप संनंद (प्रो. जीडी. अग्रवाल) जैसे असली योद्धाओं ने गंगा के लिए अपने प्राण त्यागे, किसी विदेशी फंडिंग के लिए नहीं।
असली पर्यावरणवाद और पेशेवर एक्टिविस्ट में फर्क है। ये ‘प्रोफेशनल एक्टिविस्ट’ AC कमरों में बैठकर हैशटैग चलाते हैं और उन्हीं सड़कों और बिजली का इस्तेमाल करते हैं जिनका वे विरोध करते हैं। इसका उदाहरण चार धाम यात्रा रूट पर आल वेदर रोड प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ PIL डालने वाली गैंग भी है… इस गैंग में वो लोग शामिल थे जिनकी पत्नी अमेरिका में बराक ओबामा की वोटर है… और ये क्लाइमेट के कैंपेन चलते हैं देहरादून में बैठकर।
वैसे भी भारत को पर्यावरण संरक्षण के लिए पश्चिम के ‘सर्टिफिकेट’ की जरूरत नहीं है। हमारी संस्कृति में भूमि को माता माना गया है।
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्या
हमारा मॉडल ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का है, जहाँ विकास और प्रकृति साथ चलते हैं। सरकार द्वारा 21,000 से अधिक एनजीओ के लाइसेंस रद्द करना इस दिशा में एक कड़ा कदम है, लेकिन यह वैचारिक लड़ाई हमें अपने शिक्षण संस्थानों और सोशल मीडिया पर भी लड़नी होगी। ग्रेट निकोबार और ऐसे ही अन्य प्रोजेक्ट्स का सफल होना इस बात का प्रमाण होगा कि भारत अब बाहरी दबावों के आगे झुकने वाला ‘सॉफ्ट स्टेट’ नहीं रहा।
इसीलिए ग्रेट को निकोबार केवल एक पोर्ट या एयरपोर्ट के रूप में नहीं देखना चाहिए। ये भारत जैसे देश की बढ़ती ताक़त के प्रमाण हैं और जब कोई ताक़तवर होता है तो उसके अड़ोसी पड़ोसी परेशान होते ही हैं – भविष्य में उन्हीं पड़ोसियों को टाइट रखने के लिए निकोबार जैसी जगह पर स्ट्रेटजिक डोमिनेंस का होना बेहद जरूरी भी होता है
यही करण है कि भारत सरकार ने भी अब कड़ा रुख अपनाया है। 2014 से 2026 के बीच 21,000 से अधिक NGO के FCRA लाइसेंस रद्द किए गए हैं। लेकिन ये लड़ाई अभी लंबी है।
हमें यह समझना होगा कि संप्रभुता की रक्षा के लिए-
विदेशी फंडिंग की लगातार निगरानी ज़रूरी है।
हमें विकास की अपनी परिभाषा खुद गढ़नी होगी, जो प्रकृति और प्रगति दोनों को संतुलित करे।
और सबसे ज़रूरी- हमें उस सांस्कृतिक मार्क्सिज्म को पहचानना होगा जो राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को ‘उत्पीड़न’ बताता है।
बहरहाल, क्या भारत एक वैश्विक समुद्री शक्ति बनेगा या विदेशी ताकतों के दबाव में झुक जाएगा? ये फैसला हमारे आज के फैसलों पर निर्भर करेगा।
रात काफी हो चुकी थी। ऑफिस से थकी हुई एक लड़की जल्दी घर पहुँचने के लिए बाइक टैक्सी बुक करती है। रास्ते भर ड्राइवर उससे निजी सवाल पूछता रहता है, ‘घर में कौन है?’, ‘इतनी रात में अकेले क्यों निकली हो?’ लड़की किसी तरह सफर खत्म कर घर पहुँच जाती है।
उसे लगता है कि बात यहीं खत्म हो गई। लेकिन कुछ देर बाद उसी ड्राइवर के कॉल आने शुरू हो जाते हैं। फिर व्हाट्सएप मैसेज, फिर अलग-अलग नंबरों से वीडियो कॉल।
लड़की डर जाती है। नंबर ब्लॉक करती है, लेकिन कॉल बंद नहीं होते। जिस ऐप पर भरोसा करके उसने सफर किया, वही उसके डर की वजह बन जाता है। अक्सर ऐसी हरकतों का फायदा लव जिहादी उठाते दिख रहे हैं, जो हिंदू लड़कियों को निशाना बना रहे हैं। हालाँकि ऐसी हरकतें असामाजिक तत्व भी खूब कर रहे हैं।
बहरहाल, यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि तेजी से सामने आ रही हकीकत है। कभी डिलीवरी एजेंटों पर महिलाओं को परेशान करने के आरोप लगते हैं, तो कभी बाइक टैक्सी राइडर्स पर।
हाल ही में अभिनेत्री रीवा अरोड़ा ने ब्लिंकिट के डिलीवरी एजेंट पर अभद्र व्यवहार का आरोप लगाया। वहीं दिल्ली की शैव्या वशिष्ठा ने रैपिडो राइडर पर लगातार कॉल और वीडियो कॉल कर परेशान करने का दावा किया।
इन घटनाओं ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि डिजिटल सुविधा के इस दौर में क्या हमारा मोबाइल नंबर और निजी जानकारी सच में सुरक्षित है?
मोबाइल रिपेयरिंग शॉप, रिचार्ज काउंटर, कैब सर्विस और डिलीवरी जैसी लोकल और डिजिटल सेवाओं से जुड़े कुछ मामलों में इस्लामी कट्टरपंथी के होने बात अक्सर सामने आई है। जिन पर उत्पीड़न और अनुचित व्यवहार के आरोप लगे हैं।
कई घटनाओं में यह भी शिकायत सामने आई है कि सेवा लेने के बाद महिलाओं के मोबाइल नंबर का गलत इस्तेमाल हुआ और उन्हें अनजान नंबरों से कॉल या मैसेज आने लगे और उन्हे परेशान किया गया। जैसा हमने पुणे केस में देखा।
QR मेनू और UPI से नंबर लीक होने का खतरा?
आजकल ज्यादातर रेस्टोरेंट में मेन्यू देखने और ऑर्डर करने के लिए QR कोड स्कैन कराया जाता है। लोग आसानी से मोबाइल नंबर डालकर खाना ऑर्डर कर देते हैं। लेकिन अब यही सुविधा लोगों की चिंता की वजह बनती दिख रही है।
पुणे में रहने वाली एक महिला ने बताया है कि वह अपने दोस्तों के साथ एक रेस्टोरेंट में खाना खाने गई थीं। वहाँ टेबल पर रखे QR कोड को स्कैन करके उन्होंने मेन्यू देखा और ऑर्डर किया। उस समय उन्हें लगा कि यह एक सामान्य डिजिटल प्रक्रिया है। लेकिन रात में अचानक उनके फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आने लगे।
It's an Islamist again!
Meet Rishika Dutta, she is an influencer. On April 28, she went to a restaurant named "Social" on Ferguson College Road in Pune.
After returning, she received a message from a person named Shaikh Shafi.
महिला के मुताबिक, मैसेज भेजने वाला कोई और नहीं बल्कि उसी रेस्टोरेंट का एक कर्मचारी था। जिसका नाम शेख सैफ है, आरोप है कि कर्मचारी ने QR मेनू सिस्टम से उनका मोबाइल नंबर हासिल किया और फिर देर रात बातचीत करने की कोशिश करने लगा। पहले सामान्य तरीके से बात शुरू की गई, लेकिन बाद में लगातार मैसेज आने लगे, जिससे महिला असहज हो गईं।
महिला ने इस पूरी घटना के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर शेयर किए। इसके बाद मामला तेजी से वायरल हो गया। लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि आखिर ग्राहक का निजी नंबर रेस्टोरेंट स्टाफ तक पहुँचा कैसे? क्या QR मेनू और डिजिटल ऑर्डर सिस्टम में ग्राहकों का डेटा पूरी तरह सुरक्षित नहीं है?
मामला बढ़ने के बाद रेस्टोरेंट प्रबंधन ने कथित तौर पर आरोपित कर्मचारी पर कार्रवाई की बात कही। लेकिन इस घटना ने एक बड़ी बहस छेड़ दी कि आज के डिजिटल दौर में लोग सुविधा के लिए अपना नंबर और निजी जानकारी तो दे रहे हैं, लेकिन उसकी सुरक्षा कितनी मजबूत है, इसका भरोसा शायद अभी भी नहीं है।
डिलीवरी ऐप्स और बाइक टैक्सी में महिलाओं की प्राइवेसी पर सवाल
दिल्ली की रहने वाली शैव्या वशिष्ठा ने सोशल मीडिया पर अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि वह देर रात रैपिडो से दिल्ली से ग्रेटर नोएडा जा रही थीं। उनके मुताबिक, सफर के दौरान ड्राइवर निजी सवाल पूछता रहा और अश्लील गाने बजाता रहा।
शैव्या का आरोप है कि राइड खत्म होने के बाद ड्राइवर ने उन्हें लगातार कॉल करना शुरू कर दिया। उन्होंने नंबर ब्लॉक किया, लेकिन फिर अलग-अलग नंबरों से कॉल और वीडियो कॉल आने लगे। उन्होंने दावा किया कि एक बार ड्राइवर ने बाथरूम से वीडियो कॉल तक कर दिया, जिससे वह बुरी तरह डर गईं।
यह मामला सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो लोगों ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। बाद में रैपिडो ने बयान जारी कर कहा कि कंपनी ऐसे व्यवहार को बर्दाश्त नहीं करती और ग्राहक के नंबर छिपा के रखते है। लेकिन सवाल फिर वही उठा कि अगर नंबर सुरक्षित थे तो ड्राइवर तक पहुँच कैसे हुई?
इसी तरह अभिनेत्री रीवा अरोड़ा ने आरोप लगाया कि ब्लिंकिट का एक डिलीवरी एजेंट उनके घर ऑर्डर लेकर पहुँचा, लेकिन शुरुआत से ही उसका व्यवहार ठीक नहीं था। रिवा के मुताबिक, एजेंट ने उनके परिवार के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और काफी देर तक बहस करता रहा।
रिवा ने कहा कि मामला इतना बढ़ गया कि परिवार को पुलिस बुलानी पड़ी। उन्होंने यह भी कहा कि कंपनियों को सिर्फ डिलीवरी नहीं, बल्कि कर्मचारियों के व्यवहार और ट्रेनिंग पर भी ध्यान देना चाहिए।
क्या ग्राहक डेटा का हो रहा गलत इस्तेमाल?
इन घटनाओं के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ग्राहक का डेटा कितना सुरक्षित है? जब कोई व्यक्ति खाना ऑर्डर करता है या बाइक टैक्सी बुक करता है, तो उसका मोबाइल नंबर, घर का पता और लोकेशन जैसी निजी जानकारी ऐप के जरिए साझा होती है।
लोग पूछ रहे हैं कि क्या डिलीवरी एजेंट और राइडर को जरूरत से ज्यादा जानकारी दिखती है? क्या राइड खत्म होने के बाद भी ग्राहक का नंबर उनके पास रहता है? अगर कंपनियाँ दावा करती हैं कि नंबर मास्क्ड होते हैं, तो फिर कई मामलों में दोबारा कॉल और मैसेज कैसे पहुँच रहे हैं?
साइबर सुरक्षा के लिहाज से देखें तो कंपनियों को अपने सिस्टम को मजबूत करने की जरूरत है। सिर्फ ऐप बनाना काफी नहीं, बल्कि यह भी जरूरी है कि ग्राहक का डेटा सीमित समय के लिए ही दिखे और उसका गलत इस्तेमाल करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो।
ऐसे मामलों से कैसे सुरक्षित रहें?
डिजिटल दौर में ऑनलाइन खाना ऑर्डर करना, बाइक टैक्सी बुक करना और UPI पेमेंट करना हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। लेकिन सुविधा के साथ सावधानी बरतना भी उतना ही जरूरी हो गया है।
जरूरत है कि लोग ऑनलाइन ऑर्डर, डिलीवरी और UPI पेमेंट के लिए अलग मोबाइल नंबर इस्तेमाल करें, ताकि निजी नंबर हर जगह शेयर न हो। या तो फिर आप अपने सेटिंग्स में जाकर नंबर को हाइड कर सकते हैं।
इसके अलावा हर जगह बिना जरूरत मोबाइल नंबर देने से बचना चाहिए। व्हाट्सप्प की प्राइवेसी सेटिंग्स भी मजबूत रखना जरूरी है, ताकि अनजान लोग आपकी प्रोफाइल फोटो, लास्ट सीन और दूसरी निजी जानकारी न देख सकें।
अगर किसी डिलीवरी एजेंट, राइडर या अनजान व्यक्ति की तरफ से लगातार कॉल या मैसेज आने लगें, तो तुरंत नंबर ब्लॉक करना चाहिए और संबंधित ऐप पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए। मामला ज्यादा गंभीर लगे तो पुलिस और साइबर सेल से संपर्क करने में देर नहीं करनी चाहिए।
साइबर एक्सपर्ट यह भी कहते हैं कि किसी भी अनजान QR कोड को स्कैन करने से पहले सावधानी बरतना जरूरी है। वहीं देर रात सफर के दौरान अपनी राइड डिटेल और लाइव लोकेशन परिवार या करीबी लोगों के साथ शेयर करना भी सुरक्षित माना जाता है।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा के चलते चर्चा में है। यहाँ मस्जिद के पास एकत्रित हुई इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने विरोध प्रदर्शन के नाम पर सड़क पर खूब उत्पात मचाया। उन्होंने न केवल पुलिस वाहनों को निशाना बनाया बल्कि सुरक्षाकर्मियों पर पथराव किया और ‘सर तन से जुदा’ जैसे कट्टरपंथी और उत्तेजक नारे भी लगाए।
ऐसी हिंसा के पीछे इस्लामी कट्टरपंथियों का तर्क था कि आखिर हिंदुओं ने क्यों उस मुस्लिम युवक को पीटा जो हिंदू युवती के साथ होटल में मिला था। इसी बात को आधार बताकर इतना बड़े स्तर पर उपद्रव हुआ। खैर, ये कुछ नया नहीं है। ये वही पैटर्न है जो हर बार हर हिंसा को अंजाम देने से पहले ये लोग इस्तेमाल करते हैं।
किसी एक बात को लेकर मुद्दा बनाना और फिर सड़कों पर उतरकर कानून अपने हाथ में लेना। इस बार भी यही हुआ। रही हिंदू संगठनों के मुस्लिम व्यक्ति को पीटने की बात तो वास्तव में, भोपाल में हिंदू संगठनों का आक्रोश अकारण नहीं है, इसके पीछे ‘लव जिहाद’ जैसे वे तमाम मामले हैं, जिनमें पहचान छिपाकर हिंदू युवतियों को प्रेम जाल में फँसाया जाता है।
इसके बाद अश्लील वीडियो या ब्लैकमेलिंग के जरिए उनका मानसिक व शारीरिक शोषण किया जाता है। सिर्फ भोपाल की बात करें तो पिछले कुछ ही महीनों में वहाँ से तमाम ऐसे केस सामने आए हैं। आइए आज इस रिपोर्ट में उन घटनाओं के बारे में जानें और समझें कि अगर हिंदू संगठनों ने किसी कट्टरपंथी को रंगे हाथों पकड़ कर अपना आक्रोश दिखाया भी तो उनके ऐसा करने के पीछे कौन सी घटनाएँ रही हैं।
हिंदू लड़कियों को नशा देकर दरिंदगी करता था भोपाल का ‘मुस्लिम गैंग’, फिर Video बनाकर करता था ब्लैकमेल
अप्रैल 2025 महीने में भोपाल के कोकता थाना क्षेत्र में स्थित एक निजी कॉलेज की हिंदू छात्राओं के साथ हुए एक भयानक अपराध का खुलासा हुआ था। यह गिरोह खासकर कॉलेज की हिंदू छात्राओं को निशाना बनाता था। मुस्लिम गैंग के आरोपित पहले हिंदू लड़कियों से दोस्ती करते और उन्हें अपने प्रेमजाल में फँसाते थे।
फिर लड़कियों को नशीले पदार्थ पिलाकर उनके साथ गैंगरेप किया जाता था। मुस्लिम गैंग के सदस्य पीड़िताओं का रेप करने के लिए उन्हें न केवल गांजा पिलाते थे, बल्कि गले पर छुरी रखकर, पोर्न दिखाकर उनका बलात्कार करते थे। मामले में पुलिस ने केस के मुख्य आरोपित फरहान खान सहित मोहम्मद साद, अरबाज, अयान, शाहरुख, जावेद उर्फ भय्यू, जोया, फैजान, मोहम्मद अली, अबरार खान, हामिद, अरशद और सिराज समेत कई अन्य को गिरफ्तार किया था।
पीड़िताओं पर जबरन धर्मांतरण और उसके बाद निकाह का भी दबाव डाला जाता था। इसके अलावा उन्हें बीफ खाने, रोजा रखने और बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया जाता था। यह पूरा केस महीनों तक चर्चा में था और पीड़िताओं ने बेहद गंभीर खुलासे किए थे कि कैसे उनके साथ दरिंदगी और मारपीट कर इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें हवस का शिकार बनाते थे।
शादी का झाँसा देकर भोपाल से ले गया केरल, धर्मांतरण का डाला दबाव: बैग में मिला- ‘मुसलमान कैसे बनें’ किताब
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की एक हिंदू युवती को शादी का झाँसा देकर बादशाह खान केरल ले गया। वहाँ उस पर इस्लामी धर्मांतरण और कलमा पढ़ने का दबाव बनाने लगा। पुलिस का दबाव बढ़ने पर बादशाह ने जब युवती को भोपाल भेजा तो उसके बैग से ‘मुसलमान कैसे बनें’ जैसी किताबें मिली। बाद में बादशाह खान को गिरफ्तार कर लिया गया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीड़िता भोपाल के अवधपुरी थाना क्षेत्र के अन्ना नगर इलाके में रहती थी। यहीं बादशाह उसका पड़ोसी था। बादशाह और पीड़िता में जान-पहचान हुई जो बाद में प्यार में बदल गई। कुछ दिनों के बाद लड़की का परिवार अवधपुरी क्षेत्र में शिफ्ट हो गया। यहाँ भी बादशाह लड़की से मिलने आया करता था।
यही से वो लड़की को केरल के कोझिकोड ले गया। वापस आकर पुलिस बयान में पीड़िता ने बताया कि केरल में बादशाह उस पर इस्लाम कबूलने का दबाव बनाने लगा था। वह उसे जबरन कलमा पढ़ने के लिए भी मजबूर किया करता था।
अल्तमश-आहत-आहान ने 3 नाबालिग हिंदू लड़कियों का ब्रेनवॉश कर किया निकाह, कई दिनों तक किया रेप
मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले से नाबालिग हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण, निकाह और रेप का गंभीर मामला सामने आया था। पुलिस ने अल्तमश खान, आहान खान और आहत शेख के खिलाफ FIR दर्ज की। हिंदू पीड़िताओं के अनुसार, उन्हें प्रेम जाल में फँसाकर धर्म परिवर्तन कराया गया और उनके साथ 10 से 15 बार जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए।
इन कट्टरपंथियों के चंगुल से किसी तरह निकलकर जब पीड़िताएँ अपने घर पहुँची तो परिजन उन्हें बुर्के में देख कर दंग रह गए। पूछने पर पूरे मामले का खुलासा हुआ। इस मामले में पुलिस ने ‘जस्सी किन्नर’ को भोपाल से गिरफ्तार किया था। जस्सी किन्नर ने ही नाबालिग लड़कियों को अल्तमश खान, आहान खान और आहत शेख से मिलवाया था।
हिन्दू लड़की, होटल का कमरा, 2 मुस्लिम लड़के… बजरंग दल ने दोनों की धुनाई कर पुलिस को सौंपा
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने दो मुस्लिम युवकों को हिन्दू लड़की के साथ पकड़ा। जिसके बाद होटल में जमकर हंगामा खड़ा हो गया। इतना ही नहीं बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने दोनों मुस्लिम लड़कों को होटल से नीचे लाकर बीच सड़क पर जमकर पीटा और पुलिस को सौंप दिया।
मामला भोपाल के एमपी नगर का था। पूछताछ करने पर दोनों मुस्लिम लड़कों ने कार्यकर्ताओं के साथ बहस करना शुरू कर दिया जिसके बाद गुस्साए बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने दोनों को बीच सड़क पर जमकर पीटा।
अयान खान ने दलित लड़की को फँसाया, अपहरण करके 10 दिनों तक किया रेप: पुलिस ने भोपाल से दबोचा
MP के दमोह में दलित लड़की को मुस्लिम लड़के ने 3 साल तक धोखे में रखा। जब राज खुला कि वह अयान खान है, तो लड़की ने रिश्ता तोड़ लिया। शातिर अयान खान ने पीड़िता का अपहरण कर लिया और उसे भोपाल ले जा कर कई दिनों तक यौन शोषण करता रहा।
दलित युवती दमोह से गायब हुई थी और उसे 10 दिनों बाद पुलिस ने भोपाल से बरामद किया। लड़की ने पुलिस को बताया कि अयान खान ने राज नाम रख कर उससे दोस्ती की और 3 साल तक अँधेरे में रखा। जब उसे असली नाम पता चला तो लड़की ने उससे बात बंद कर दी।
इसके बाद अयान उसके घर पहुँचा, बहाने से उसे बाहर बुलाया और जबरदस्ती कार में बिठाया और भोपाल ले गया। शिकायत के बाद पुलिस ने भोपाल जाकर अयान को गिरफ्तार किया।
हिन्दू लड़की से निकाह करने की साजिश में रफीक खान गिरफ्तार
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लव जिहाद का एक मामला सामने आया था, जिसमें रफीक खान नाम का युवक अपनी पहचान छुपा कर एक हिन्दू युवती से शादी करने जा रहा था। इस बात की जानकारी मिलते ही हिन्दूवादी संगठनों ने युवक से पूछताछ कर जब उसका आधार कार्ड देखा, तो पता चला कि उसका आधार कार्ड भी नकली है।
पुलिस ने इस घटना की जानकारी मिलते ही आरोपित रफीक को गिरफ्तार कर लिया। रफीक ने लड़की को अपना नाम रवि यादव बताया था। रफीक खान ने रवि नाम से ही एक फर्जी पहचान पत्र (आधार कार्ड) भी बनवा रखा था। उसने पीड़िता को बहला-फुसलाकर प्रेम जाल में फँसा लिया था।
वह लड़की के घर आकर पूजा पाठ में भी शामिल होता था और मदद भी करता था जिसकी वजह से उन्हें कभी किसी तरह का संदेह नहीं हुआ। रफीक हिन्दू युवती के साथ भोपाल के कोलार स्थित मंदिर में शादी कर ही रहा था कि तभी रायसेन जिला स्थित मंडीदीप के हिन्दू संगठन को इस बात की सूचना मिली। इसके बाद पूरे मामले का खुलासा हुआ।
विरोध प्रदर्शन के नाम पर हर बार हिंसा करने उतरते हैं इस्लामी कट्टरपंथी
ये कुछ मामले आपके और हमारे सामने हैं, लेकिन कुल इतने ही मामले हो ये मानना गलत होगा। कई मामलों में तो परिवार ने लोक-लाज के डर से शायद शिकायत भी ना की हो और कुछ मामले ऐसे भी होंगे, जहाँ इस्लामी कट्टरपंथियों के चंगुल में अब भी कुछ हिंदू लड़कियाँ प्रताड़ित हो रही होंगी।
इतने सब के बावजूद अगर इन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया जाता है तो अपने घटिया उद्देश्य में असफल हो जाने की कुढ़न ये ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाकर, तोड़ फोड़ कर और हिंसा फैलाकर निकालने उतर जाते हैं। कभी ये किसी सोशल मीडिया पोस्ट का हवाला देकर हिंसा करने लगते हैं तो कभी किसी और मुद्दे को अपना आधार बना लेते हैं।
11 अगस्त 2020 की रात पूर्वी बेंगलुरु में दंगे और आगजनी का भीषण नजारा देखने को मिला था। केजी हल्ली, डीजे हल्ली और पुल्केशी नगर इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। 1000 से भी अधिक की इस्लामी कट्टरपंथी भीड़ ने स्थानीय विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के घर को घेर लिया था और तोड़फोड़ शुरू कर दी थी।
इस्लामी भीड़ का कहना था कि विधायक के रिश्तेदार ने पैगम्बर मुहम्मद को लेकर आपत्तिजनक पोस्ट किया है। उन्होंने आसपास कड़ी हिन्दुओं की कई गाड़ियाँ जला दी थीं। घटों तक यह दंगा फसाद चलता रहा था। उन्होंने विधायक की बहन के घर भी हमला किया था। इसके अलावा DJ हल्ली और HJ हल्ली पुलिस थानों को भी आग लगा दी थी।
इस मामले में बाद में हुई जाँच में सामने आया था कि इस्लामी भीड़ का यह दंगा पूर्व प्रायोजित था। इसी तरह पश्चिम बंगाल के कालियाचक में 3 जनवरी 2016 को हजारों लोग इकट्ठा हुए थे। यह भीड़ एक राजनीतिक व्यक्ति कमलेश तिवारी द्वारा की गई विवादित टिप्पणी के विरोध में जुटी थी।
शुरुआत में यह एक सामान्य विरोध प्रदर्शन था, लेकिन जल्द ही स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। भीड़ का एक हिस्सा आक्रामक हो गया, बैरिकेड तोड़ दिए गए और पुलिस व सुरक्षा बलों के साथ झड़प शुरू हो गई। कुछ ही समय में यह विरोध प्रदर्शन पूरी तरह दंगे में बदल गया था।
ऐसे ही मध्य प्रदेश के रतलाम में इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के विरोध में जमकर हंगामा किया था। भीड़ ने चौकी को घेरने की कोशिश की। बाद में पूरी सड़क को जाम कर खूब नारेबाजी की गई। इस दौरान ‘सर तन से जुदा’ जैसे आपत्तिजनक नारे भी लगाए गए और जमकर बवाल काटा गया।
दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग ने हाल ही में पत्रकार करण थापर को दिए इंटरव्यू में भारत में मुसलमानों की स्थिति को लेकर गंभीर टिप्पणी की है। द वायर को दिए इंटरव्यू में नजीब जंग ने कहा कि देश में मुसलमानों की हालत बहुत गंभीर हो गई है और वे दूसरे दर्जे के नागरिक बनने के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।
उनके इस बयान के बाद एक बार फिर वही पुरानी बहस शुरू हो गई है, जो 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से लगातार चलती रही है। थोड़े-थोड़े इंटरवल पर कोई न कोई बड़ा नेता, अभिनेता, प्रोफेसर या रिटायर्ड अधिकारी यह कहता फिरता है कि भारत में मुसलमानों असुरक्षित होते जा रहे हैं।
शब्द बदल जाते हैं, उदाहरण बदल जाते हैं, लेकिन मूल संदेश वही रहता है कि मुसलमान धीरे-धीरे भारत में अपनी जगह खो रहे हैं। लेकिन, अब जब मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल चल रहा है, तो एक बड़ा सवाल यह है कि क्या ये भविष्यवाणी सच में जमीन पर दिखाई देती है?
मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर नजीब जंग की चिंता
इंटरव्यू में नजीब जंग ने कहा कि आज मुसलमान खुद को मुख्यधारा से दूर महसूस कर रहे हैं। उनके मुताबिक समुदाय के भीतर यह भावना बढ़ रही है कि उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं हो रहा और उन्हें देश की प्रगति से अलग किया जा रहा है। जंग ने कहा कि यह सिर्फ आम लोगों की भावना नहीं है, बल्कि राजनीति और संस्थानों में भी दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में, जहाँ मुस्लिम आबादी काफी बड़ी है, वहाँ हालिया चुनावों में बीजेपी ने मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारे। उन्होंने यह भी कहा कि आजादी के बाद पहली बार केंद्र सरकार में कोई मुस्लिम कैबिनेट मंत्री नहीं है और संसद में बीजेपी का कोई मुस्लिम सांसद भी नहीं है।
जंग के मुताबिक, उच्च नौकरशाही, न्यायपालिका और बड़े संस्थानों में भी मुसलमानों की मौजूदगी पहले के मुकाबले कम हुई है। उनका कहना था कि जब लगभग 20 करोड़ की आबादी वाला समुदाय खुद को राजनीतिक रूप से महत्वहीन महसूस करने लगे, तो यह देश के सामाजिक संतुलन के लिए खतरनाक हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ समाज का उदारवादी वर्ग ही इस मुद्दे को लेकर खुलकर चिंता जाहिर करता दिखता है और इसे उन्होंने भारत के लिए विनाशकारी बताया। हालाँकि इस तर्क के आलोचक कहते हैं कि इस तरह की आशंकाएँ वर्षों से जताई जाती रही हैं।
लेकिन इसके बावजूद भारत के मुसलमान चुनाव लड़ रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं, सरकारी नौकरियों में हैं और खुले तौर पर अपने मजहब का पालन कर रहे हैं। उनका कहना है कि किसी एक पार्टी में राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम होना अपने आप में दूसरे दर्जे की नागरिकता साबित नहीं करता।
असहिष्णुता की बहस काफी पहले शुरू हो चुकी थी
नजीब जंग पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिन्होंने मोदी सरकार के दौर में देश की दिशा को लेकर चिंता जताई हो। दरअसल यह बहस मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक साल के भीतर ही राष्ट्रीय मुद्दा बन गई थी। 2015 और फिर 2017 में कई बड़े नामों ने भारत में असहिष्णुता और मुसलमानों में असुरक्षा की भावना की बात कही थी।
इनमें सबसे बड़ा नाम पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का था। अगस्त 2017 में अपना कार्यकाल खत्म होने के करीब उन्होंने कहा था कि देश के कई मुसलमान बेचैन और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने यह मुद्दा प्रधानमंत्री मोदी और सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के सामने उठाया था।
बॉलीवुड में भी मुस्लिमों पर बहस
हामिद अंसारी के बयान से पहले बॉलीवुड के कई बड़े चेहरे भी इस बहस का हिस्सा बन चुके थे। नवंबर 2015 में शाहरुख खान ने भारत में बढ़ती असहिष्णुता की बात कही थी। अपने 50वें जन्मदिन के आसपास दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि समाज में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ रही है। उनका बयान तुरंत राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया।
इसके कुछ समय बाद अभिनेता आमिर खान ने रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार समारोह में इससे भी ज्यादा बड़ा बयान दिया था। आमिर खान ने कहा था कि उनकी पत्नी और फिल्ममेकर किरण राव ने एक समय देश छोड़ने तक की बात कही थी, क्योंकि उन्हें माहौल को लेकर डर महसूस हो रहा था और बच्चों की सुरक्षा की चिंता थी।
आमिर ने कहा था कि उनकी पत्नी रोज अखबार पढ़कर तनाव महसूस करती थीं और समाज में बढ़ते तनाव से परेशान थीं। इस बयान पर जमकर चर्चा हुई। टीवी डिबेट और अखबारों में कई दिनों तक यही मुद्दा छाया रहा।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ये चेतावनियाँ नई नहीं हैं। लगभग एक दशक पहले भी यही बातें कही गई थीं कि मुसलमान असुरक्षित हैं, लोकतंत्र खत्म हो रहा है और देश असहिष्णु बनता जा रहा है, लेकिन भारत की सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर उन भविष्यवाणियों से काफी अलग रही।
बारह साल बाद क्या मुसलमान दूसरे दर्जे के नागरिक बन गए?
यहीं से बहस गंभीर हो जाती है। अगर सिर्फ राजनीतिक भाषणों और टीवी बहसों को देखा जाए, तो ऐसा लग सकता है कि भारत में मुसलमानों ने अपने सारे अधिकार खो दिए हैं, जबकि जमीन की सच्चाई कुछ और कहानी बताती है।
मुसलमान आज भी खुलकर चुनाव में वोट डालते हैं। मुस्लिम नेता और पार्टियाँ अलग-अलग राज्यों में चुनाव लड़ती और जीतती हैं। मुसलमान व्यापार कर रहे हैं, संपत्ति खरीद रहे हैं, बड़े विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं और फिल्मों से लेकर खेल, नौकरशाही और कानून तक हर क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
शाहरुख खान आज भी सुपरहिट फिल्में दे रहे हैं। आमिर खान भी अपने बच्चों के साथ भारत में ही रह रहे हैं, भले ही उनका अपनी पत्नी से तलाक हो चुका हो।
कुल मिलाकर भारत में आज भी मुस्लिम अभिनेता बॉलीवुड पर प्रभाव रखते हैं, मुस्लिम उद्योगपति हैं, मुस्लिम जज हैं, मुस्लिम पत्रकार हैं, मुस्लिम खिलाड़ी हैं और मुस्लिम सिविल सेवक भी हैं। देशभर में मस्जिदें सुरक्षित हैं, ईद-बकरीद राष्ट्रीय स्तर पर मनाई जाती है और इस्लामिक संस्थाएँ कानूनी रूप से काम कर रही हैं।
भारत के मुसलमान उसी तरह जीवन जी रहे हैं जैसे हिंदू, बौद्ध, जैन और ईसाई समुदाय के लोग जीते हैं। लेकिन जब प्रभावशाली लोग बार-बार यह कहते हैं कि मुसलमान जल्द ही दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाएँगे, तो इससे समुदाय के भीतर डर और असुरक्षा की भावना बढ़ती है।
2014 के बाद से यह बात इतनी बार दोहराई गई कि कई लोगों के लिए यह एक राजनीतिक नारा बन गया। यह जमीन पर दिखने वाली वास्तविकता नहीं है। कई लोग यह भी तर्क देते हैं कि अगर सरकार सच में मुसलमानों को पूरी तरह हाशिए पर धकेलना चाहती हैं, तो वह मुस्लिम समुदाय के लिए योजनाएँ और कल्याणकारी कदम नहीं उठाती।
मुसलमानों को लेकर मोदी सरकार की पहल
दिलचस्प बात यह है कि जहाँ आलोचक मोदी सरकार पर मुसलमानों की अनदेखी का आरोप लगाते हैं, वहीं बीजेपी सरकार ने मुस्लिम समुदाय खासकर महिलाओं और गरीब वर्ग के लिए कई कदम भी उठाए हैं।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण तीन तलाक के खिलाफ कानून था। मोदी सरकार ने इंस्टेंट ट्रिपल तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत पर रोक लगाने के लिए कानून बनाया। इस प्रथा में शौहर सिर्फ तीन बार तलाक बोलकर तुरंत अपनी बीवी को तलाक दे सकता था।
1 अगस्त 2019 को लागू हुए मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम के तहत इंस्टेंट ट्रिपल तलाक को अवैध और अमान्य घोषित किया गया। साथ ही इसे आपराधिक अपराध बनाया गया, जिसमें शौहर को तीन साल तक की जेल की सजा का प्रावधान रखा गया।
सरकार के समर्थकों ने इसे मुस्लिम महिलाओं के लिए बड़ा सामाजिक सुधार और लैंगिक न्याय बताया, हालाँकि कई कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध भी किया था, फिर भी बीजेपी सरकार ने यह कानून लागू किया।
इसके अलावा 2025 में ईद से पहले बीजेपी ने सौगात-ए-मोदी अभियान भी शुरू किया था। इस कार्यक्रम के तहत देशभर में करीब 32 लाख गरीब मुस्लिम परिवारों को खाने-पीने और रोजमर्रा की जरूरतों का सामान देने का दावा किया गया।
इन किट्स में सेवइयाँ, खजूर, चीनी, ड्राई फ्रूट्स, कपड़े और ईद से जुड़ी दूसरी चीजें शामिल थीं। महिलाओं को सूट का कपड़ा और पुरुषों को कुर्ता-पायजामा दिया गया। बीजेपी ने इसे गरीब मुस्लिम परिवारों तक सीधे पहुँचने और ईद से पहले सहायता देने की कोशिश बताया।
सरकार समर्थक इसी आधार पर सवाल उठाते हैं कि अगर मुसलमानों को सच में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा होता, तो क्या सरकार मुस्लिम महिलाओं और गरीब मुस्लिम परिवारों के लिए अलग योजनाओं पर इतना राजनीतिक और आर्थिक ध्यान देती?
बारह साल की चेतावनियाँ, लेकिन भारत अब भी वही लोकतंत्र
2014 से अब तक भारत में बार-बार यह कहा गया है कि मुसलमान समाज में अपनी जगह खोने वाले हैं। वामपंथी बुद्धिजीवियों पर आरोप लगता रहा है कि वे मुसलमानों के भीतर खतरे की भावना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, ताकि बीजेपी को सांप्रदायिक पार्टी बताकर मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखा जा सके।
लेकिन पीएम मोदी के करीब 12 साल के शासन के बाद भी भारत के मुसलमानों के पास संवैधानिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, वोट देने का अधिकार और सार्वजनिक जीवन में मौजूदगी बनी हुई है।
इससे कई लोग यह सवाल उठाते हैं कि जब एक दशक से ज्यादा समय तक बार-बार डर की वही भविष्यवाणियाँ दोहराई जाएँ और फिर भी वैसी स्थिति जमीन पर दिखाई न दे, तो क्या डर को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया?
कई विश्लेषकों का मानना है कि शायद इसी वजह से कई वामपंथी दल और खुद को मुसलमानों का रक्षक बताने वाले राजनीतिक समूह हाल के वर्षों में चुनावों में कमजोर होते गए हैं। मुस्लिम मतदाता भी अब डर आधारित राजनीति से बाहर निकलकर अपने हितों को अलग नजरिए से देखने लगे हैं।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
इजरायल के एनजीओ ‘द सिविल कमीशन’ ने ‘साइलेंस्ड नो मोर‘ यानी ‘अब और चुप नहीं’ नाम से एक रिपोर्ट जारी किया है। इसमें 7 अक्टूबर को योजनाबद्ध तरीके से हमास द्वारा रेप और यौन उत्पीड़न के सबूत दिए गए हैं। इसकी टैगलाइन ‘सेक्सुअल टेरर अनवील्ड: 7 अक्टूबर के अनकहे अत्याचार और कैद में बंधकों के खिलाफ’ है।
7 अक्टूबर 2023 इजरायल के इतिहास का सबसे खूनी दिवस था। उस दिन हमास ने नेतृत्व में फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद जैसे संगठनों ने इजरायल के मासूम बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं को अपना निशाना बनाया था। इस हमले में 1200 से ज्यादा लोग मारे गए। हमलावरों ने घरों, सड़कों, बस्तियों, सुरक्षा प्रतिष्ठानों और एक संगीत समारोह में आतंक मचाया। इस दौरान करीब 251 लोगों को अगवा कर गाजा ले जाया गया। घटना का वीडियो बनाकर पूरी दुनिया में इसको प्रसारित किया गया।
इस दौरान इजरायली नागरिकों के साथ अभूतपूर्व यौन हिंसा किया गया। इस दिल दहला देने वाली घटना के गवाहों ने जब दुनिया को जानकारी दी, तो लोग सन्न रह गए।
इजरायल की गैर लाभकारी संगठन ‘द सिविल कमीशन’ ने 12 मई 2026 को ‘साइलेंस्ड नो मोर’ यानी ‘अब और चुप नहीं’ शीर्षक से करीब 300 पेज की रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट का शीर्षक है ‘यौन आतंक का पर्दाफाश: 7 अक्टूबर की अनकही क्रूरताएँ और बंधकों के खिलाफ अत्याचार’।
यौन हिंसा, अपमान और क्रूरता की दास्ताँ
दो साल के रिसर्च के आधार पर आयोग ने जो निष्कर्ष निकाला, उसमें कहा गया है कि यौन और लिंग आधारित हिंसा सुनियोजित, व्यापक और अहम थी। हमास और उसके सहयोगियों ने हमले के दौरान कई जगहों पर और कई फेज में पीड़ितों के साथ यौन शोषण किया और उन्हें यातनाएँ दी। उनका अपहरण, स्थानांतरण किया गया और जेल में डाला गया। इन अपराधों में अत्यधिक क्रूरता और गंभीर मानवीय पीड़ा देखी गई, जिन्हें पीड़ितों को डराने और अपमानित करने के उद्देश्य से अंजाम दिया गया था।
हमले के चश्मदीदों और पीड़ितों के बयान, साक्षात्कार, तस्वीरें, वीडियो, सरकारी दस्तावेज और अन्य प्राथमिक सामग्रियों का उपयोग निष्कर्ष निकालने में किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है, “आयोग द्वारा किए गए डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि पीड़ित 52 अलग-अलग राष्ट्रीयताओं के थे, जो अपराधों के अंतर्राष्ट्रीय दायरे और उनके प्रभाव को रेखांकित करता है।” गाजा में हिरासत में लिए गए लोगों में विदेशी या दोहरी इजरायली और विदेशी नागरिकता वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा था।
इसमें कहा गया है कि सबूतों और सामग्रियों की तुलना और अपराधियों के तौर-तरीकों के विस्तृत विश्लेषण के आधार पर आयोग ने कई स्थानों पर की गई यौन और लिंग आधारित हिंसा की 13 पुनरावृत्तियों की पहचान की। इन पुनरावृत्तियों से पता चलता है कि ये अपराध एक व्यापक और सुनियोजित कार्यप्रणाली का हिस्सा थीं।
जाँच में यह भी पता चला कि आतंकवादियों ने हमले में खुद को दिखा कर और यौन उत्पीड़न को डिजिटल माध्यमों से प्रसार कर हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने हमले, अपमान और हत्या के फुटेज प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया और पीड़ितों की व्यक्तिगत ऑनलाइन प्रोफाइल का दुरुपयोग किया। परिवार के सदस्यों को अपनों की मृत्यु के बारे में सबसे पहले हमलावरों द्वारा कई बार साझा की गई तस्वीरों या वीडियो के माध्यम से पता चला।
आतंकवादियों ने गोप्रो और बॉडी-वियर कैमरे लगा रखे थे या यह सुनिश्चित किया था कि उनके कृत्यों को रिकॉर्ड किया जाए और सार्वजनिक किया जाए। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया कि इसी वजह से सभी साइटों पर वीडियो में सशस्त्र समूहों और फिलिस्तीनी नागरिकों को हमलों का जश्न मनाते हुए, प्रसन्न और उत्साहित दिखाया गया। डिजिटल मीडिया के इस दुरुपयोग ने जघन्य क्राइम को मनोवैज्ञानिक युद्ध के हथियार में बदल दिया। इसका लक्ष्य न केवल पीड़ित थे, बल्कि उनके परिवार और पूरा समाज भी था।
पीड़ितों को गाजा पट्टी में घसीट कर ले जाने के बाद भी उन्हें दंडित करने, अपमानित करने और यौन हिंसा का शिकार बनाया गया। आतंक का यह एक सुनियोजित अभियान था। नवजात बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों को भी नहीं बख्शा गया। महिलाओं और पुरुषों को घोर अपमान और यौन हिंसा का सामना करना पड़ा। परिवारों को अलग कर दिया गया और बुनियादी चिकित्सा उपचार से वंचित कर दिया गया। दरअसल इन कैदियों के तन-मन पर लगे गहरे चोट का इस्तेमाल प्रचार और दबाव के हथियार के रूप में किया गया।
रिपोर्ट में इन कृत्यों को हमले का ‘केन्द्र’ बताया गया है। इसमें कहा गया है, “महिलाओं और लड़कियों, और कई मामलों में पुरुषों और लड़कों को बलात्कार, यौन यातना, अंग-भंग, जबरन नग्नता और शवों के अपमान का शिकार बनाया गया। माता-पिता की उनके बच्चों के सामने हत्या कर दी गई, भाई-बहनों पर एक-दूसरे के सामने हमला किया गया, पीड़ितों को निर्वस्त्र किया गया, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया, उनका वीडियो बनाया गया और प्रदर्शित किया गया। ये आवेश में किए गए अपराध नहीं थे। ये सुनियोजित और योजनाबद्ध तरीके से किए गए थे ताकि यौन प्रकृति के अपराधों की क्रूरता को और भी बढ़ाया जा सके।”
परिजनों के सामने यौन उत्पीड़न, मृतकों को भी नहीं बख्शा- पीड़ित
रिपोर्ट में कहा गया है, “हमास और उसके सहयोगियों ने हमले की व्यापक रणनीति के एक अंतर्निहित हिस्से के रूप में जानबूझकर और व्यवस्थित रूप से यौन और लिंग आधारित हिंसा (एसजीबीवी) का इस्तेमाल किया। महिलाओं और बंधकों को निशाना बनाया। नाबालिगों को भी इस तरह की हिंसा और दुर्व्यवहार का शिकार बनाया गया।” जिहादियों ने लोगों को उनके परिवारों की उपस्थिति में हृदयविदारक रूप से यातना दी।
जांच में पता चला कि पीड़ितों को क्रूरता के इंतहा तक तड़पाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, “पीड़ितों को जलाना, अंग-भंग करना, बलात्कार, बांधना, प्राइवेट पार्ट में जबरन वस्तुएँ डालना, चेहरे और प्राइवेट पार्ट पर गोली मारना, परिवार के सदस्यों के सामने हत्याएँ और दुर्व्यवहार करना और फाँसी देना शामिल थे। कई पीड़ितों को हथकड़ी लगाए हुए और बंधक के रूप में बरामद किया गया था। लंबे समय तक बंधक बनाए गए लोगों के खिलाफ यौन उत्पीड़न आम रहे। इन पीड़ितों में महिलाओं के साथ-साथ पुरुष भी शामिल थे।”
यातनाओं की वजह से जीवित बचे लोगों को गंभीर और दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक और शारीरिक क्षति पहुँची। शवों के पोस्टमार्टम में यौन शोषण, अपमान के सबूत मिले।
जाँच रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ितों को हथकड़ी लगाना, बंधक बनाए हुए दिखाना, महिलाओं और बच्चों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना और परेड कराना। माताओं और बच्चों का अपहरण। परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में यौन हिंसा करना, उसका वीडियो बनाना और डिजिटल प्रसार करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करना शामिल है। जबरन विवाह की धमकियाँ भी दी गई। लड़कों और पुरुषों के अंग-भंग करना, बलात्कार और यौन हिंसा के भी सबूत मिले।
एक ही परिवार के लोगों और खून के रिश्ते वाले पीड़ितों को जानबूझकर आपस में यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया। इसमें एक विशेष मामले का जिक्र जाँच रिपोर्ट में किया गया है। इसके अलावा परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे की उपस्थिति में यौन उत्पीड़न या अपमानित किया गया। इससे पूरा परिवार आतंकित रहता था। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से हमास की कैद के दौरान देखी गई।”
चरमपंथियों ने खुद को कैमरे पर रिकॉर्ड किया और महिलाओं, बच्चों और पूरे परिवारों को पीटते, अपमानित करते, अपहरण करते और उनकी हत्या करते हुए और शवों का अपमान करते हुए वीडियो अपलोड किए। उन्होंने महिलाओं और उनके शवों को युद्ध की लूट के रूप में प्रदर्शित किया। कुछ क्लिप में आतंकवादियों और गाजावासियों को जश्न मनाते हुए दिखाया गया।
इसके अलावा, फुटेज में बेरहमी से क्षत-विक्षत और जलाए गए शव दिखाए गए। रिपोर्ट में कहा गया है, “हमास और उसके सहयोगियों ने घायल महिलाओं, लड़कियों और बुजुर्ग महिलाओं के हिंसक रूप से अपमानित और अपहरण किए जाने के फुटेज भी प्रसारित किए। हमले का समय सुबह-सुबह होने के कारण इनमें से कई पीड़ितों को उनके रात के कपड़ों में ही ले जाया गया, जिससे वे ज्यादा कष्ट महसूस कर रहे थे।”
रिपोर्ट में नोवा संगीत समारोह में बचे एक व्यक्ति का बयान भी शामिल किया गया। उसने बताया कि उन लोगों ने एक महिला को वाहन से बाहर निकाला, उसके कपड़े जबरदस्ती उतार दिए और उसके साथ बलात्कार किया। उन्होंने उसे बार-बार चाकू मारा, जिससे उसकी मौत हो गई। उसकी मृत्यु के बाद भी उन्होंने उसके साथ बलात्कार करना जारी रखा। यह क्रूरता और हिंसा की भयावहता को दर्शाता है।
एक चश्मदीद राज कोहेन ने बताया, “मैंने उन्हें उसके साथ बलात्कार करते देखा। बलात्कार करते समय हमने उसकी चीखें सुनीं। फिर उन्होंने उसकी हत्या कर दी और उसके बेजान हो जाने के बाद भी उसके साथ दोबारा बलात्कार किया। मैंने उन्हें उसके साथ बलात्कार करते देखा।”
यहूदी राज्य को झकझोर देने वाला वह क्रूर हमला
शुरुआती हमलों में दो गर्भवती महिलाएँ, 28 वर्षीय नित्जान रहुम और 23 वर्षीय एस अबू-रशीद भी निशाना बनीं। अबू-रशीद तो बच गईं, लेकिन उनका बच्चा, रहुम और उनका अजन्मा बच्चा, तीनों ही मारे गए। हमले के तुरंत बाद यौन उत्पीड़न के बारे में गवाहों के बयान और विवरण सामने आए।
रिपोर्ट में बताया गया है, “शुरुआती दिनों से ही पीड़ितों, बचाव कर्मियों, चिकित्सा विशेषज्ञों और मुर्दाघर के कर्मचारियों की रिपोर्टों से संकेत मिल रहे थे कि इन हमलों में यौन हिंसा शामिल है। कई पीड़ित को मौत के बाद ही इन अपराधों से मुक्ति मिली। अनेक मामलों में, पीड़ितों की हत्या हमलों के दौरान या बाद में की गई, और उनके शव क्षत-विक्षत, अधजली अवस्था में बरामद किए गए। यह असाधारण क्रूरता से भरी यौन हिंसा के पैटर्न को दर्शाता है।”
रिपोर्ट में एक घटना के बारे में बताया गया है। इसमें कहा गया है, “22 वर्षीय शानी लूक एक पिकअप ट्रक के पीछे मुँह के बल लेटी हुई, आंशिक रूप से नग्न, घायल अवस्था में थी। उसे गाजा की सड़कों पर सशस्त्र अपराधियों ने उसी अवस्था में घुमाया। इस दौरान उसके शरीर पर थूकते और नारे लगाते हुए अपराधी देखे गए।”
हमले के बाद के महीनों में हमास ने अनगिनत वीडियो जारी किए । इनमें निर्दोष बंदी अपनी जान बचाने की गुहार लगाते या शव दिखाते नजर आए। उन्होंने कुछ मामलों में पीड़ितों के परिवार वालों से सीधे संपर्क किया, जिससे उनका दुख और बढ़ गया। इन कार्रवाइयों ने आतंकी हमले के प्रभाव को और बढ़ा दिया, जिससे दर्द और सदमा और भी गहरा गया।
शवों का अंतिम संस्कार करने वाले शेरोन लॉफर के मुताबिक, कई बार इन खूबसूरत युवतियों की आंखों में गोली मारी जाती थी, जिससे उनके चेहरे विकृत हो जाते थे। उनकी मौत इससे नहीं होती थी, बल्कि दिल में गोली लगने से होती थी।
रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र के अनुमान वाले रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। इसमें आतंकवादियों द्वारा किए गए यौन शोषण और हिंसा सहित अपराधों की गंभीरता को रेखांकित किया गया है। इसमें खुलासा किया गया है कि हमास को अगस्त 2025 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव की ब्लैकलिस्ट में शामिल किया गया था, जिसमें उन पक्षों की पहचान की जाती है जिन पर सशस्त्र संघर्ष के दौरान व्यवस्थित बलात्कार और अन्य प्रकार की यौन हिंसा करने या उसके लिए जिम्मेदार होने के पक्के सबूत होते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, “इस सूची में शामिल होने का मतलब यह है कि संयुक्त राष्ट्र ने भी 7 अक्टूबर के हमलों के दौरान और बंधकों के खिलाफ हमास द्वारा किए गए ऐसे उल्लंघनों के पर्याप्त सबूतों की पुष्टि की है।”
आयोग ने अपहरणकर्ताओं को पीड़ितों को नियंत्रित करने, नागरिक क्षेत्रों में घुसपैठ करने और हिब्रू भाषा में निर्देश जारी करने के तरीके बताने वाले विभिन्न सामरिक नियमावली, नोटबुक, चेकलिस्ट, नक्शे, किताबें और दूसरे संसाधनों की जाँच की। इन सामग्रियों में धार्मिक हिंसा और घृणा परोसा गया था।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर डाला गया है कि “इन सामग्रियों में अरबी से हिब्रू में अनुवादित वाक्यांशों की सूचियाँ भी शामिल हैं, जिनमें आदेशात्मक और अपमानजनक निर्देश (उदाहरण के लिए पीड़ितों को अपनी पैंट उतारने या अपने कपड़े उतारने, लेट जाने, अपने पैर फैलाने का आदेश देना) शामिल हैं।”
रिपोर्ट के मुताबिक, “इन वैचारिक सामग्रियों में यहूदी लोगों और इजरायली नागरिकों, जिनमें महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग शामिल हैं, के खिलाफ एक अंतर्निहित अमानवीय कथा शामिल थी, जिन्हें कुछ ग्रंथों और बयानों में हिंसा के वैध शिकार के रूप में दर्शाया गया था।” दरअसल हमास यहूदी समुदाय के खिलाफ हिंसा का समर्थन करता है।
इस नरसंहार और घृणित कृत्यों को न केवल फिल्माया गया, बल्कि धार्मिक अभिव्यक्तियों और जोश के साथ महिमामंडित भी किया गया।
इस्लामी आतंकवाद का भयंकर चेहरा
पीड़ितों और गवाहों ने इस्लामी आतंकवाद की कहानी बयान की। नोवा संगीत समारोह में मौजूद एक प्रत्यक्षदर्शी ने हमले के दौरान सात अन्य लोगों के साथ छिप कर जान बचाई। उसने बताया कि उसने अपने छिपने की जगह के पास तीन अलग-अलग स्थानों से बलात्कार की तीन घटनाओं को देखा।
उन्होंने चीखते-चिल्लाते पीड़ितों को एक-दूसरे को सौंप दिया और फिर उन्हें गोली मारकर हत्या कर दी और फिर जश्न मनाया। चश्मदीद के मुताबिक, “मुझे नहीं पता कि सामान्य बलात्कार क्या होता है, लेकिन वहाँ जो आवाजें सुनाई दे रही थीं, वे वैसी नहीं थीं। वहाँ हँसी-मज़ाक हो रहा था। चुटकुले चल रहे थे। वे एक-दूसरे को चुटकुले सुना रहे थे। यह सब मजे के लिए किया जा रहा था। वे जश्न मना रहे थे। वे सचमुच इस बात का जश्न मना रहे थे,”
उन्होंने आगे बताया, “एक और घटना यह थी कि मैंने किसी को चिल्लाते हुए सुना, ‘उसे मत छुओ, ऐसा मत करो,’ और फिर उन्होंने उसकी प्रेमिका के साथ उसकी आँखों के सामने बलात्कार किया।” इसके बाद उस जोड़े का भी वही हश्र हुआ।
उसने खुद के सुरक्षित बचने के बाद के मंजर को याद करते हुए कई बातें की, जो उसके साथ बचे एक और व्यक्ति ने पुष्टि की। उसने कहा, “वहाँ एक भी शव ऐसा नहीं था, जिसकी मौत सामान्य तरीके से हुई हो। हर एक शव को यातनाएँ दी गई थीं। लोगों को बाँधकर प्रताड़ित किया गया था। आप देख सकते हैं कि वे प्रतिक्रिया देने में असमर्थ थे। कुछ लोगों के सिर के पिछले हिस्से में गोली लगी थी और उन्हें बाँधा गया था। महिलाओं के हाथ पीछे बाँधे गए थे। और यह स्पष्ट था कि उनके साथ यौन दुर्व्यवहार किया गया था। उनके प्राइवेट पार्ट पर खून, घाव और कटे के निशान थे। एक महिला ऐसी थी, मानो उसका पूरा निचला शरीर फट गया हो।”
एक पुरुष ने भी ऐसा ही अनुभव साझा किया। उसके मुताबिक, कम से कम 5 कट्टरपंथियों ने उसके साथ रेप किया और यातनाएँ दीं। पॉलीग्राफ टेस्ट से इसकी पुष्टि हुई। उसने बताया, “हम पर हर तरह का अत्याचार किया गया। उन्होंने हमारे चेहरे पर थूका, हमें अपमानित किया, यहूदियों के बारे में अपशब्द कहे।
एक समय ऐसा आया जब मुझे सिर जमीन की ओर कर उल्टा खड़ा कर दिया गया। पहले तो मैंने विरोध किया, लेकिन फिर मेरे सिर पर इतनी जोर से मारी कि मुझे लगा जैसे मैं अपना आपा खो बैठा हूँ। जितना ज़्यादा मैंने विरोध किया, उतना ही ज़्यादा उन्होंने मुझे पीटा। उन्होंने मेरे प्राइवेट पार्ट को घायल कर दिया। मुझे बेल्ट से पीटा गया। वे मुझ पर हँसे भी। उनमें से एक ने चाकू निकाला और तरह-तरह की बातों पर हँसने लगा। मैंने उसे छोड़ने की भीख माँगी और कहा कि मुझे अकेला छोड़ दो। मुझे नहीं पता कि उन्होंने ऐसा करने से पहले क्या लिया था, वे जानवरों जैसे थे।”
गवाह ने बताया कि उसने अपने पीछे महिलाओं के सामूहिक बलात्कार की चीखें भी सुनीं। उसके सिर पर बंदूक तान दी और जान से मारने की धमकियाँ देने के साथ-साथ प्राइवेट पार्ट काटने की चेतावनी भी दी। यह अमानवीय व्यवहार तब तक जारी रहा जब तक वह बेहोश नहीं हो गया। उसके साथ क्या हुआ था, उसे नहीं पता।
एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी ने बताया जो अपने एक दोस्त को बचाने की कोशिश कर रहा था। उसके मुताबिक, “मुझे जीप याद है, उसमें एक महिला का शव था जिसने काले रंग की पोशाक पहनी हुई थी। उसके गाल में गोली लगी थी और वह उसी स्थिति में जम गई थी। उसके कपड़े ऊपर उठी हुई थी और अंडरगार्मेट नहीं पहना था, इसलिए नहीं कि वह जल गया था, बल्कि उसे उतार दिया गया था। उसके पैर फैले हुए थे और प्राइवेट पार्ट खुले हुए थे। उसके पति का शव कार के दूसरी तरफ था, जाहिर तौर पर वह उसका पति ही था। मुझे उस समय यह पता नहीं था। एक और शव था जो राख में तब्दील हो चुका था। वह अब इंसान जैसा भी नहीं लग रहा था,”
एक अन्य व्यक्ति के मुताबिक, “उन्होंने लोगों को कारों से घसीटकर बाहर निकाला। उन्होंने शवों को बेहद क्रूरता से क्षत-विक्षत किया। उन्होंने हथियारों से लोगों को काटा। औजार उनके शरीरों में धँसे हुए थे। हम शायद 50 मीटर और आगे बढ़े। दोनों तरफ पेड़ थे। सब कुछ जल चुका था। शव सड़क के किनारे पड़े थे और था बहुत सारा सामान”।
रिपोर्ट में कहा गया है, “नोवा संगीत समारोह के कुछ बचे हुए कर्मचारियों ने महिला पीड़ितों को देखने की सूचना दी है जो नग्न या आंशिक रूप से नग्न अवस्था में थीं। कुछ मामलों में बिना अंडरवियर के भी थीं। पीड़ित महिलाएँ पैर फैलाकर लेटी हुई थीं और उनके गुप्तांगों पर चोटों के निशान थे।” शव आधे कटे हुए, बेरहमी से क्षत-विक्षत पाए गए और कुछ विशेष स्थानों पर उन्हें एक साथ ढेर करके जला दिया गया था।
एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया, “जले हुए शव, झुलसे हुए शव, क्षत-विक्षत शव पूरे इलाके में फैले हुए थे। जली हुई गाड़ियाँ इतनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त थीं कि कल्पना भी नहीं की जा सकती,”
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “एक स्वयंसेवक ने नग्न नागरिकों के शवों की बरामदगी के मामलों का वर्णन किया, जिनमें एक महिला पीड़ित भी शामिल थी, जिसके शरीर पर गंभीर चोट के निशान थे। एक पुरुष पीड़ित नग्न अवस्था में मिला था जिसके शरीर पर लंबे समय तक पीड़ा और मृत्यु से पहले दुर्व्यवहार के संकेत थे।”
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आतंकवादियों ने किस तरह निर्दयतापूर्वक बंधकों को सताया, घायल किया और यातनाएँ दी। आयोग और विशेषज्ञों द्वारा कई वीडियो का विश्लेषण किया गया, जो उस दिन की क्रूरता को दर्शाते हैं। इनमें एक उदाहरण ऐसा मिला, जिसमें पीड़ितों को मारने से पहले उनके गुप्तांगों में हथियार डाले गए थे।
रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया, “नोवा स्थल पर यौन हिंसा के सबूत, समीक्षा किए गए गवाहों के बयान और फोटो-वीडियों समेत दूसरे दस्तावेजों के आधार पर कहा जा सकता है कि महिलाओं को असाधारण रूप से क्रूर तरीकों से निशाना बनाया गया। इसमें अत्यधिक यौन हिंसा, अंग-भंग और क्रूरता शामिल है, जो दर्शाता है कि उन पर इसलिए हमला किया गया क्योंकि वे महिलाएं थीं और लिंग-आधारित हिंसा हमलों का अहम हिस्सा था। दस्तावेज यह भी दर्शाते हैं कि पुरुष पीड़ितों को भी यौन हिंसा और अंग-भंग का शिकार बनाया गया, जिसमें कपड़े उतारना और जननांगों को निशाना बनाना शामिल है। उन्हें नपुंसक बनाए गए और अपमानित किया गया।”
कुछ फिलिस्तीनियों ने असाधारण हिंसा में दिया आतंकियों का साथ
आयोग ने जो सबूत जमा किए और गवाहों के बयानों की समीक्षा की, उसमें यह बात भी सामने आया कि कई फिलिस्तीनी नागरिकों ने सशस्त्र आतंकवादियों के साथ किबुत्जिमों पर हमले में भाग लिया, जिससे नरसंहार और विनाश ज्यादा हुआ।
एक व्यक्ति ने 9 अक्टूबर को बे’एरी का दौरा करने के बाद बताया, “जब हम अंदर गए, तो वहाँ एक अस्पताल के बिस्तर पर एक शव था। मुझे समझ आया कि वह एक महिला थी। कमरे में चाकू, स्केलपेल, हथौड़ा, कुल्हाड़ी, स्क्रूड्राइवर, औजार और घरेलू उपकरण बिखरे पड़े थे। ये सभी चीजें शव में धंसी हुई थीं। शव पूरी तरह से क्षत-विक्षत था।”
रिपोर्ट के मुताबिक, “किबुत्ज में अन्य स्थानों की तरह ही, महिला पीड़ितों के शव कमर से नीचे पूरी तरह या आंशिक रूप से नग्न थे। उनके हाथ पीछे बंधे हुए थे और उन्हें गोली मारी गई थी। मिशन टीम ने प्रत्यक्षदर्शियों से जानकारी एकत्र की, जिन्होंने बताया कि उन्हें नग्न अवस्था में, हाथ पीछे बंधे हुए और सिर में गोली के घावों वाली महिलाओं के शव मिले थे,”
इसमें आगे कहा गया है, “हालाँकि इन पीड़ितों के खिलाफ यौन हिंसा की पुष्टि इस समय संभव नहीं है, लेकिन उपलब्ध परिस्थितिजन्य जानकारी, विशेष रूप से बार-बार मिलने वाली महिला पीड़ितों के नग्न अवस्था में, बंधे हुए और गोली मारे जाने की घटना, यह संकेत देती है कि यौन हिंसा, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार की गई थी।” लोगों को उनके निहत्थे परिवारों की उपस्थिति में या तो गोली मारकर हत्या कर दी गई या उनका अपहरण कर लिया गया।
संघर्ष में यौन हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि ने कहा, “यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि किबुत्ज़ रीम में यौन हिंसा हुई, जिसमें बलात्कार भी शामिल है। इसमें किबुत्ज़ रीम के प्रवेश द्वार पर बम शेल्टर के बाहर एक महिला के साथ हुआ बलात्कार भी शामिल है, जिसकी पुष्टि गवाहों के बयानों और डिजिटल सामग्री से हुई है। संयुक्त राष्ट्र के जाँच आयोग (स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय जांच आयोग) ने भी किबुत्ज में कई महिलाओं और पुरुषों के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों को दर्ज किया है।”
इसके अलावा, हमास द्वारा किबुत्ज नाहल ओज पर हमले के बाद जारी किए गए वीडियो में एक युवा छात्र के साथ दुर्व्यवहार और उसके आंशिक रूप से नग्न शरीर को दर्शाया गया था।
लगातार आ रही भयावह दृश्यों ने रोंगटे खड़े किए
हालाँकि मुख्य निशाना इजरायल के नागरिक और यहूदी थे, फिर भी इजरायली सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है, “सैन्य ठिकानों पर हमले में हिंसा चरम पर दिखी। यौन यातना, शवों को जलाना और अपमानित करना, अंग-भंग करना, जननांगों को काटना और सिर धड़ से अलग करना शामिल है।” आयोग ने वीडियो रिकॉर्डिंग और अन्य सामग्री के माध्यम से भी इसकी पुष्टि की।
इसमें बताया गया, “अन्य हमला वाली जगहों की तरह, इन स्थानों पर भी यौन और लिंग आधारित हिंसा और पीड़ितों की हत्या कर दी गई। हालाँकि हमास के अपने दस्तावेजों से मिले साक्ष्य, बचे और रिहा किए गए बंधक, गवाहों के बयान से पता चलता है कि इन स्थलों पर पुरुषों और महिलाओं दोनों के खिलाफ यौन और लिंग आधारित हिंसा की घटनाएँ हुईं।”
गवाहों के बयानों के मुताबिक, प्रत्यक्षदर्शियों ने भयानक दृश्य देखे, जैसे कि महिला पीड़ितों के चेहरे जानबूझकर विकृत और क्षत-विक्षत किए गए थे, शरीर खून से लथपथ थे और महिलाओं के गुप्तांगों में गोलियां मारी गई थीं। रिपोर्ट में कहा गया है, “गवाहों ने मुर्दाघरों में महिला सैनिकों के शवों की स्थिति का भी वर्णन किया, उनके कपड़े और पैंट बुरी तरह फटे हुए थे और शवों पर ऐसे घाव थे, जो मृत्यु से पहले और मृत्यु के बाद दोनों ही समय अत्यधिक हिंसा के संकेत देते थे।”
इमारत के बाहर छिपी एक अधिकारी ने किसी के साथ बलात्कार होने की आवाज सुनने का दावा किया। बाद में बाहर आकर उसने एक महिला सैनिक का नग्न शरीर देखा और उसे ढँक दिया। उसने यह भी कहा कि उसने एक पुरुष का शव देखा जिसका गुप्तांग क्षत-विक्षत था।
संयुक्त राष्ट्र जाँच आयोग ने जो वीडियो जारी किया था, उसमें छह अपराधी एक दीवार के पास खड़े दिखाई दे रहे हैं। फर्श पर चार शव पड़े हैं। एक महिला का शव आंशिक रूप से धुंधला है और ऐसा प्रतीत होता है कि उसे सफेद चादर से ढका गया है। धुंधला होने के बावजूद, शरीर का निचला हिस्सा नग्न दिखाई देता है। एक अन्य वीडियो में अपराधी उसी महिला के ऊपर खड़े होकर ‘ईश्वर महान है’ चिल्ला रहे हैं।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “उनकी फोरेंसिक समीक्षा हत्याओं के पैमाने और पीड़ितों पर किए गए अत्यधिक बर्बरता को रेखांकित करती है। कई शवों की स्थिति यौन विकृति के पैटर्न को बताती हैं साथ ही क्रूरता को उजागर करती है।”
दूसरी ओर गवाहों ने खुलासा किया, “महिला पीड़ित खून से लथपथ, फटे कपड़ों में या आंशिक रूप से नग्न अवस्था में, केवल खून से सने हुए अंडरवियर पहने हुए पहुंचीं,” उन्होंने आगे बताया कि “महिला सैनिकों को गुप्तांग, योनि या स्तन में गोली मारी गई थी। ऐसा प्रतीत होता है कि पीड़ितों के एक ग्रुप का सुनियोजित तरीके से जननांगों को निशाना बनाया गया।”
एक गवाह माना है कि उसने महिला कर्मियों के ऐसे शव देखे थे, जिन पर यौन हिंसा के सबूत थे। कई के गुप्तांगों पर घाव थे और उसने ऐसे शव का वर्णन किया जिन पर यौन शोषण के संकेत थे। इनमें हड्डियों के फ्रैक्चर, शरीर में डाली गई वस्तुएँ, साथ ही ऐसे शव जिनके जननांगों को काटकर अलग किए गए थे, शामिल थे।”
इसमें बताया गया है कि प्रारंभिक बचाव दल ने यह भी बताया कि महिलाओं के शव नग्न अवस्था में अलग-अलग कमरों में रखे गए थे, जिन पर शारीरिक शोषण और यौन हिंसा के निशान थे।”
संयुक्त राष्ट्र जांच आयोग ने भी गवाहों द्वारा बताई गई ऐसी ही घटनाओं को दर्ज किया। एक व्यक्ति ने बताया, “महिलाओं के साथ क्रूरता की गई थी और यह स्पष्ट था कि उनके साथ क्या हुआ था। जब हमने उन्हें पाया तो वे अलग-थलग थीं, उनके कपड़े उतार दिए गए थे और वे आत्मसमर्पण की स्थिति में थीं।”
पैथोलॉटिस्ट ने पाया कि जननांगों में आग लगाने के लिए ज्वलनशील पदार्थों का इस्तेमाल किया गया होगा, क्योंकि कई शवों, जिनमें अधिकतर महिलाएं थीं, के गुप्तांगों पर ‘जलने’ के सबूत थे।
अपहरण के बाद नाबालिग बंधकों को भी यौन शोषण सहना पड़ा
कमीशन की जाँच के मुताबिक, गाजा में बंधक बना कर रखे गए लोगों के साथ भयानक क्रूरता की गई थी। उनके साथ यौन हिंसा का घृणित रूप देखने को मिला। गवाहों के बयान , चिकित्सीय जाँच रिपोर्ट और रिसर्च से पता चलता है कि यौन हिंसा अपहरण के पहले दिन से लेकर उनकी रिहाई या हत्या तक, हर दिन किए गए।
7 अक्टूबर को अगवा किए गए और बाद में रिहा किए गए लगभग सभी बंधकों ने अपनी कैद के दौरान यौन और लिंग आधारित हिंसा की बात कही। बंधकों के बयानों से पता चला कि घरों, टनेल और अन्य ठिकानों पर, जहाँ इन्हें अक्सर रखा जाता था, वहाँ अत्याचार किए जाते थे और यौन उत्पीड़न होता था।
एक पीड़िता ने बताया, “वे मुझे एक कमरे में ले गए। कमरे के दरवाजे पर दो आदमी बंदूकें लिए खड़े थे। एक आदमी ने मेरे सारे कपड़े उतारना शुरू कर दिया। एक ने मेरे जूते उतारे, दूसरे ने मेरी बालियां उतारीं और तीसरे ने मेरे शरीर से गहने निकाल लिए। लगभग 15 लोग एक साथ मुझे छू रहे थे, जब तक कि उन्होंने मेरे सारे कपड़े नहीं काट दिए। और फिर मैं वहां नग्न पड़ी थी, पूरी तरह नग्न। ऐसा लगा जैसे मैं अपने शरीर से बाहर निकल गई हूँ, जैसे मैं सब कुछ ऊपर से देख रही हूँ।”
उसका अपहरणकर्ताओं ने बार-बार यौन उत्पीड़न किया। उसे बताया गया कि इजरायल में उसे मृत मान लिया गया है और वह अपना बाकी जीवन एक यौन दासी के रूप में बिताएगी। गाजा में 482 दिनों तक रहीं एक अन्य पीड़िता ने भी इसी तरह के दर्दनाक अनुभव का वर्णन किया। रिपोर्ट में बताया गया है, “उसने लंबे समय तक अकेली भूखे रहने और शारीरिक शोषण सहने की जानकारी दी। उसने बताया कि बार-बार हुए यौन उत्पीड़न और कैद की स्थितियों के कारण उसने कई बार आत्महत्या करने का प्रयास किया।”
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है, “बंधक बनाए गए पुरुष सदस्यों को भी यौन हिंसा, यौन यातना और यौन अपमान का शिकार होना पड़ा।” इसमें आगे बताया गया है, “वापस लौटे एक ही परिवार के दो नाबालिग बंधकों ने बताया कि उन्हें एक-दूसरे के साथ यौन क्रियाएं करने के लिए मजबूर किया गया था। अपहरणकर्ताओं ने कथित तौर पर उन्हें अपने कपड़े उतारने के लिए मजबूर किया और फिर उनके गुप्तांगों को छुआ और कोड़े मारे।”
रिपोर्ट में आतंकवादियों द्वारा बंधकों के साथ की गई यौन हिंसा और दुर्व्यवहार की भयावह कहानियाँ थीं। उन्हें इतनी बुरी तरह पीटा गया कि वे बेहोश हो गए। इन भयानक कृत्यों को दस्तावेजों में दर्ज किया गया। रिपोर्ट में खुलासा हुआ, “लौट रहे कई बंधकों ने बताया कि कैद के दौरान उन्हें और अन्य कैदियों को रोने या आवाज निकालने की मनाही थी। कुछ मामलों में यौन शोषण किए जाने के बाद महिलाओं को मुस्कुराने और खुश दिखने के लिए कहा गया था।
यह रिपोर्ट हमले की 10000 से अधिक तस्वीरों और वीडियो क्लिप के साथ-साथ पीड़ितों, गवाहों, छुड़ाए गए बंधकों, विशेषज्ञों और परिवार के सदस्यों के साथ 430 से अधिक आधिकारिक और अनौपचारिक साक्षात्कारों, बयानों और मुलाकातों पर आधारित है। अमेरिकी तकनीकी कार्यकारी और समाजसेवी शेरिल सैंडबर्ग, जिन्होंने हमास के दरिंदों द्वारा किए गए यौन शोषण के बारे में दुनिया को बताया है और पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन, दोनों ने इस रिपोर्ट के निष्कर्षों का समर्थन किया है।
आयोग की अध्यक्ष कोचाव एल्कायम-लेवी ने जेरूसलम पोस्ट से बात करते हुए रिपोर्ट को लेकर कहा कि उन्होंने पीड़ितों की वीडियो रिकॉर्डिंग इसलिए की, ताकि दुनिया को पता चले कि क्या हो रहा है। हमें सब कुछ उजागर करना बेहद जरूरी लगा। यह असाधारण क्रूरता, यौन आतंक था, और मुझे लगता है कि इसका एक महत्वपूर्ण पहलू डिजिटल दस्तावेजीकरण था यानी अपराधों का महिमामंडन किया जाना।
कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार अब खुलकर इस्लामी तुष्टिकरण पर उतर आई है। इसके लिए कॉन्ग्रेसी सरकार ने साल 2022 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें शिक्षण संस्थानों में हिजाब-बुर्का जैसे इस्लामी मजहबी पहनावे पर बैन लगा दिया गया था। इसकी जगह कॉन्ग्रेस सरकार ने चुपचाप वो फैसला लागू किया है, जिसमें कलावा, जनेऊ, माला, रुद्राक्ष पहनने की भी अनुमति देने की आड़ ली गई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने साल 2022 के उस ऐतिहासिक फैसले को पलट दिया है, जिसने राज्य के शिक्षण संस्थानों में अनुशासन और एकरूपता लाने के लिए हिजाब और बुर्के जैसे मजहबी पहनावे पर प्रतिबंध लगाया था। सरकार ने बुधवार (13 मई 2026) को जारी अपने नए आदेश के जरिए ‘सीमित पारंपरिक और आस्था-आधारित पहचान चिह्नों’ के नाम पर स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब की राह फिर से खोल दी है।
इस रिपोर्ट के माध्यम से हम आपको बताने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि गिरते हुए वोटबैंक को बचाने के लिए की गई ‘राजनीतिक सौदेबाजी’ है। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा राजनीतिक गणित, गिरता हुआ वोटबैंक और तुष्टीकरण की वह पराकाष्ठा है, जिसने कर्नाटक के शैक्षणिक माहौल को एक बार फिर वैचारिक प्रयोगशाला बना दिया है।
साल 2022 का आदेश क्या था और क्यों जरूरी था?
दरअसल, फरवरी 2022 में बसवराज बोम्मई सरकार ने कर्नाटक शिक्षा अधिनियम के तहत स्पष्ट आदेश दिया था कि जहाँ यूनिफॉर्म निर्धारित है, वहाँ छात्रों को वही (यूनिफॉर्म) पहनना अनिवार्य है। कोई धार्मिक प्रतीक यूनिफॉर्म को बदल या प्रभावित नहीं कर सकता। उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज से शुरू हुआ हिजाब विवाद पूरे राज्य में फैल गया था। मुस्लिम छात्राएँ हिजाब पहनकर क्लास में घुसने की जिद पर अड़ी रहीं। विरोध प्रदर्शन हुए, स्कूल बंद हुए।
कर्नाटक हाई कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने भी साल 2022 में साफ कहा था कि हिजाब कोई जरूरी मजहबी प्रथा नहीं है। यह व्यक्तिगत विश्वास का मुद्दा है, लेकिन स्कूल-कॉलेज जैसे सार्वजनिक संस्थानों में यूनिफॉर्म और अनुशासन पहले आते हैं। कोर्ट ने कहा, शिक्षा संस्थान वैज्ञानिक सोच, समानता और जॉतिवाद-निरपेक्षता सिखाने का केंद्र हैं, धार्मिक पहचान का नहीं। मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। फिर भी सिद्धारमैया सरकार ने बिना कोर्ट का इंतजार किए, चुपके से 2022 का आदेश वापस ले लिया। यह न्यायपालिका का मजाक है।
सीमित प्रतीकों की आड़ में कट्टरपंथ को न्योता
कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा जारी नए सर्कुलर के बिंदु संख्या 3 और 4 को अगर ध्यान से पढ़ा जाए, तो सिद्धारमैया सरकार की मंशा साफ हो जाती है। आदेश में कहा गया है कि छात्र ‘सीमित पारंपरिक और आस्था-आधारित प्रतीकों’ को निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ पहन सकते हैं। इसमें पेटा (पगड़ी), जनेऊ, शिवदारा, रुद्राक्ष और ‘सिर का कपड़ा’ (हिजाब) शामिल हैं।
पहली नजर में यह आदेश सर्वधर्म समभाव जैसा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे की चालाकी को समझना जरूरी है। जनेऊ, रुद्राक्ष या कलावा जैसे प्रतीक सदियों से हिंदू छात्र पहनते आए हैं और ये कभी भी ‘यूनिफॉर्म’ के लिए बाधा नहीं बने। लेकिन इनकी आड़ लेकर हिजाब को स्कूलों में प्रवेश दिलाना सीधे तौर पर उस कट्टरपंथी एजेंडे को खाद-पानी देना है, जिसे 2022 में कोर्ट और तत्कालीन सरकार ने खारिज कर दिया था। यह सशक्तिकरण नहीं है, बल्कि कक्षाओं के भीतर धार्मिक पहचान का संस्थानीकरण (Institutionalization) है। स्कूल वह स्थान हैं जहाँ बच्चों के दिमाग मुक्त, जिज्ञासु और समान होने चाहिए, न कि ऐसी जगह जहाँ राजनीतिक दल वोटबैंक की खातिर अलगाववाद को बढ़ावा दें।
पहचान का संकट, जनेऊ बनाम हिजाब का तर्क
कॉन्ग्रेस सरकार ने इस आदेश को लागू करने के लिए जिस तर्क का सहारा लिया है, वह बेहद चालाकी भरा है। सरकार ने कहा है कि छात्रों को जनेऊ, कलावा, माला और रुद्राक्ष जैसे पारंपरिक चिह्न पहनने की अनुमति दी जाएगी और इसी की आड़ में हिजाब को भी शामिल कर लिया गया। लेकिन यहाँ एक बुनियादी फर्क है जिसे कॉन्ग्रेस सरकार ने जानबूझकर नजरअंदाज किया है।
जनेऊ, कलावा और रुद्राक्ष ऐसे धार्मिक प्रतीक हैं जो व्यक्ति की पहचान को कभी नहीं छिपाते। जनेऊ वस्त्रों के भीतर पहना जाता है, कलावा कलाई पर बंधा एक साधारण धागा होता है और रुद्राक्ष भी गले में कमीज के नीचे रहता है। इनसे न तो छात्र की पहचान संदिग्ध होती है और न ही कक्षा के अनुशासन में कोई बाधा आती है। इसके विपरीत, हिजाब और बुर्का सीधे तौर पर छात्र की पहचान को ढक लेते हैं।
दुनिया के कई विकसित और धर्मनिरपेक्ष देशों जैसे फ्रांस, बेल्जियम और ऑस्ट्रिया में सार्वजनिक स्थानों और स्कूलों में चेहरे को ढकने वाले पहनावे पर प्रतिबंध है। इसका कारण धार्मिक घृणा नहीं, बल्कि ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ (Public Security) और ‘समानता’ है। लेकिन कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने इन वैश्विक मानकों और सुरक्षा चिंताओं को ताक पर रखकर केवल इस्लामी वोटबैंक को खुश करने के लिए यह कदम उठाया है।
जनेऊ और कलावा की आड़ में हिजाब का खेल
इस आदेश के बैकग्राउंड में अप्रैल 2026 की एक घटना के बारे में बताना जरूरी है। दरअसल, कॉन्ग्रेस सरकार ने अप्रैल 2026 में हुई उस घटना का हवाला दिया जिसमें एक हिंदू छात्र का जनेऊ उतरवा लिया गया था। असल में वह घटना ‘हिंदू घृणा’ का सीधा उदाहरण थी, क्योंकि जनेऊ एक पवित्र धागा है जो कपड़ों के नीचे रहता है।
लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने इस जन-आक्रोश का समाधान करने के बजाय, इसे एक अवसर की तरह इस्तेमाल किया। सरकार ने जनेऊ उतरवाने की घटना पर दिखावे का दुख जताया और फिर ‘समानता’ का ढोंग करते हुए हिजाब को भी अनुमति दे दी। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी की उंगली कटने पर मरहम लगाने के बहाने आप उसके दूसरे हाथ को ही काट दें। जनेऊ की आड़ में हिजाब को वैध करना कॉन्ग्रेस की उस ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का सबसे बड़ा प्रमाण है, जिसमें हिंदुओं की भावनाओं को केवल तुष्टीकरण के मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
उस विवाद को ढाल बनाकर सरकार ने हिजाब को स्कूलों में प्रवेश दिला दिया, जो कि विशुद्ध रूप से इस्लामी कट्टरपंथियों को खुश करने की एक कोशिश है।
न्यायपालिका की अवमानना और वैधानिक संकट
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हिजाब का मामला वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष लंबित है। इससे पहले, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपने फैसले में कहा था कि ‘हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice) नहीं है’। जब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में विचाराधीन है, तो आखिर ऐसी क्या जल्दी थी कि सिद्धारमैया सरकार को मई 2026 में ही यह आदेश जारी करना पड़ा?
यह फैसला न केवल न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाता है, बल्कि उस संवैधानिक गरिमा पर भी प्रहार करता है जिसका गुणगान राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के नेता हर मंच से करते हैं। मुख्यमंत्री ने अदालती प्रक्रिया का इंतजार करने के बजाय अपनी कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग कर ध्रुवीकरण का रास्ता चुना है। यह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) द्वारा अपनाए गए उसी खतरनाक रास्ते की तरह है, जहाँ वोट के लिए संस्थानों की शुचिता को दाँव पर लगा दिया जाता है।
चुनावी हार का डर और तुष्टीकरण का सहारा
इस फैसले की टाइमिंग पर गौर करना बेहद जरूरी है। आगामी शनिवार, यानी 16 मई 2026 को बेंगलुरु में मुस्लिम संगठनों और एसडीपीआई (SDPI) की एक बहुत बड़ी रैली होने वाली है। यह रैली किसी और के खिलाफ नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस सरकार के ही खिलाफ आयोजित की गई है। दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में कॉन्ग्रेस की जो दुर्गति हुई, उसने पार्टी आलाकमान की नींद उड़ा दी है।
दरअसल, इस फैसले के पीछे का असली खेल ‘नंबर गेम’ है। दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में कॉन्ग्रेस को जो झटका लगा, उसने सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार की रातों की नींद हराम कर दी है। मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के बावजूद कॉन्ग्रेस उम्मीदवार समर्थ शमनूर मल्लिकार्जुन को मुस्लिम समुदाय का वह समर्थन नहीं मिला जिसकी पार्टी को उम्मीद थी।
वहाँ एसडीपीआई (SDPI) ने भारी सेंधमारी की, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि मुस्लिम मतदाता अब कॉन्ग्रेस को अपनी जागीर नहीं मान रहे हैं। मुस्लिम बहुल सीट होने के बावजूद कॉन्ग्रेस उम्मीदवार की मुश्किल से हुई जीत और एसडीपीआई को मिले भारी वोटों ने यह साफ कर दिया है कि कॉन्ग्रेस का पारंपरिक मुस्लिम वोटबैंक अब उसके हाथ से खिसक रहा है।
कॉन्ग्रेस के लिए सबसे बड़ा डर शनिवार (16 मई 2026) को होने वाली बेंगलुरु की विशाल रैली है। चूँकि अब कॉन्ग्रेस को डर है कि अगर यह रैली सफल हो गई, तो आगामी विधानसभा चुनाव में उसका ‘मुस्लिम वोटबैंक’ पूरी तरह बिखर जाएगा। इसी रैली की हवा निकालने के लिए और कट्टरपंथियों को यह संदेश देने के लिए कि ‘कॉन्ग्रेस उनकी सबसे बड़ी हितैषी है’, यह हिजाब वाला आदेश चुपचाप लागू किया गया। यह एक राजनीतिक ‘रिश्वत’ (Political Bribe) है जो छात्रों के भविष्य की कीमत पर दी गई है।
टीएमसी के बंगाल फॉर्मूले की राह पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार
कॉन्ग्रेस कर्नाटक को उसी रास्ते पर ले जा रही है जिस पर ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल को पहुँचाया है। तुष्टीकरण की यह राजनीति शुरू में तो फायदे का सौदा लगती है, लेकिन अंत में यह राज्य के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर देती है। स्कूलों को धार्मिक पहचान का प्रदर्शन स्थल बनाकर कॉन्ग्रेस आने वाली पीढ़ी के मन में ‘हम’ और ‘वे’ की भावना पैदा कर रही है।
हिंदू छात्रों के प्रतीकों (जनेऊ, कलावा) का उपयोग केवल एक ‘शील्ड’ के रूप में किया जा रहा है ताकि कोई उन पर सीधा आरोप न लगा सके। लेकिन सच्चाई यह है कि हिंदू प्रतीकों को तो स्कूलों में हमेशा से हतोत्साहित किया गया है। सीईटी (CET) परीक्षा के दौरान जिस तरह जनेऊ उतरवाए गए, वह कॉन्ग्रेस की असली मानसिकता को दर्शाता है। एक तरफ हिंदू प्रतीकों के प्रति ‘असहिष्णुता’ और दूसरी तरफ हिजाब के लिए ‘असीम प्रेम’ यह विषमता कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस की राजनीतिक वास्तुकला (Architecture) है।
क्या 2028 में उलट जाएगा दाँव?
कॉन्ग्रेस को उम्मीद है कि हिजाब की वापसी से वह 16 मई की रैली के प्रभाव को कम कर देगी और मुस्लिम मतदाताओं को फिर से रिझा लेगी। लेकिन यह दाँव उल्टा भी पड़ सकता है। कर्नाटक की जनता देख रही है कि किस तरह एक खास समुदाय को खुश करने के लिए शिक्षा के स्तर और स्कूलों के अनुशासन से समझौता किया जा रहा है।
अगर इस फैसले के खिलाफ राज्य का हिंदू समाज एकजुट होता है, तो 2028 के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के हाथ से कर्नाटक भी निकल जाएगा। जनता यह समझ रही है कि जो सरकार बच्चों की शिक्षा को राजनीति का मोहरा बना सकती है, वह राज्य का भला कभी नहीं कर सकती। ‘इव नम्मव’ (यह हमारा है) का नारा देने वाली सरकार ने असल में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपना ली है।
कर्नाटक सरकार का यह आदेश समावेशिता के नाम पर समाज को बाँटने वाला कदम है। शिक्षा के अधिकार और धार्मिक पहचान के बीच संतुलन बनाने का दावा करने वाली कॉन्ग्रेस ने असल में तुष्टीकरण की वेदी पर ‘संवैधानिक समानता’ की बलि चढ़ा दी है। स्कूलों में हिजाब की वापसी केवल एक वस्त्र की वापसी नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता की वापसी है जो आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बजाय मध्यकालीन पहचान को प्राथमिकता देती है। अब देखना यह है कि क्या कर्नाटक की जनता तुष्टीकरण की इस राजनीति को स्वीकार करेगी या 2028 में इसका निर्णायक जवाब देगी।
दिल्ली पुलिस ने बुधवार (13 मई 2026) रात सोशल मीडिया के जाने-माने इन्फ्लुएंसर डॉ नीलम सिंह उर्फ ‘The Skin Doctor’ को गिरफ्तार किया। बताया गया कि ये गिरफ्तारी करिश्मा कपूर के पूर्व पति और उद्योगपति संजय कपूर के निधन से संबंधित ऐसे पोस्ट को लेकर हुई, जिसके खिलाफ दिल्ली के वसंत कुंज थाने में संजय कपूर के परिवार की तरफ से शिकायत दर्ज कराई गई थी।
शिकायत पर कार्रवाई करते हुए दिल्ली पुलिस ने पहले डॉ. नीलम सिंह को तलब किया और पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया। उनकी गिरफ्तारी ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी। लोग उनकी रिहाई की माँग करने लगे। हालाँकि, कुछ देर बाद ही खबर आई कि The Skin Doctor को मजिस्ट्रेट ने 5 घंटे में बेल दे दी। मजिस्ट्रेट ने पुलिस को फटकारते हुए इसे केस को ‘निराधार और तुच्छ मामला’ भी कहा।
कौन है द स्किन डॉक्टर?
डॉ. नीलम सिंह वैसे तो त्वचा विशेषज्ञ हैं। लेकिन जाने वे एक्स समेत अन्य सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर ‘द स्किन डॉक्टर’ नाम से जाते हैं। उनके इस अकाउंट पर 9 लाख से ज्यादा फॉलोवर्स हैं, जिनमें से कुछ BJP के बड़े नेता भी शामिल हैं। उनके ज्यादातर पोस्ट BJP समर्थक और दक्षिणपंथी विचारधारा के होते हैं।
क्यों किया गिरफ्तार?
नीलम सिंह को उनके ‘द स्किन डॉक्टर’ अकाउंट पर संजय कपूर के निधन और उनके परिवार के खिलाफ किए गए कुछ पोस्ट को लेकर गिरफ्तार किया गया था। इन पोस्ट में नीलम सिंह ने संजय कपूर की संपत्ति और उनके मौत के पीछे सामने आए कारणों को लेकर सवाल किए थे। उनके ये पोस्ट ‘एक्स’ पर अब वायरल भी।
A prominent influencer, @theskindoctor13, was arrested by the Delhi Police today on a baseless and frivolous case. When the night magistrate gave him bail within 5 hours at 10 PM tonight, it was made clear by the honorable court that he did not do anything wrong.
एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर डॉ. नीलम सिह उर्फ द स्किन डॉक्टर को दिल्ली पुलिस ने कथित तौर पर संजय कपूर के परिवार के खिलाफ पोस्ट करने को लेकर गिरफ्तार किया गया। एजेंसी ने यह भी बताया कि नीलम सिंह के खिलाफ वसंत कुंज पुलिस थाने में संजय कपूर के परिवार की ओर से शिकायत दर्ज कराई थी।
A social media influencer (Dr Neelam Singh alias The Skin Doctor) has been arrested by Delhi Police for allegedly posting tweets against the Kapur family following the death of businessman Sunjay Kapur. According to sources, a complaint in the matter was lodged at Vasant Kunj…
इसी आधार पर पुलिस ने कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ाया और 13 मई 2026 देर रात उनको गिरफ्तार कर लिया गया। हालाँकि मामला जब कोर्ट पहुँचा तो पाँच घंटे में ही इन्फ्लुएंसर को बेल मिल गई।
वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने अपने पोस्ट में जानकारी दी कि जब ‘द स्किन डॉक्टर’ को कोर्ट में पेश किया गया तो 5 घंटे के भीतर ही उन्हें जमानत दे दी गई, इसका मतलब साफ है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई और पूछा कि गिरफ्तारी करने के लिए उन पर किसने दबाव डाला था?
कौन है संजय कपूर?
संजय कपूर एक भारतीय-अमेरिकी उद्योगपति और सोना कॉमस्टार (Sona Comstar) के चेयरमैन थे, जो ऑटोमोटिव पार्ट्स बनाने वाली एक बड़ी कंपनी है। वे एक्ट्रेस करिश्मा कपूर के पूर्व पति के तौर पर भी जाने जाते थे, दंपति ने 2016 में तलाक ले लिया था। उनके दो बच्चे हैं।
12 जून 2025 को 53 वर्ष में संजय कपूर का लंदन में पोलो खेलते समय दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। मेडिकल रिपोर्ट्स में संजय कपूर की मौत को नैचरुल बताया गया। हालाँकि, ऐसे अस्पष्ट परिस्थितियों में बेटे संजय कपूर की मौत के बाद माँ रानी कपूर ने लंदन में कानूनी कार्रवाई की।