उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुस्लिमों को सड़क पर नमाज नहीं पढ़ने की सलाह दी है। सोमवार (18 मई 2026) को एक कार्यक्रम के दौरान सीएम योगी ने कहा कि सड़क लोगों के चलने के लिए है और इसे तमाशा नहीं बनने देंगे। इसी दौरान सीएम योगी ने मुस्लिम आबादी को लेकर भी चिंता जताई और मुस्लिमों को आबादी कम करने की नसीहत दी।
सीएम आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में कहा, “लोग मुझसे पूछते हैं साहब आपके यहाँ यूपी में क्या सड़कों पर सचमुच नमाज नहीं होती? मैं कहता हूँ कतई नहीं होती है। आप जाकर देख लो नहीं होती है। सड़कें चलने के लिए हैं या कोई भी व्यक्ति आकर के चौराहे पर आकर तमाशा बना देगा। क्या अधिकार है उसको सड़क रोकने का? आवागमन बाधित करने का कौन सा अधिकार है? जहाँ उसका स्थल होगा वहाँ जाकर करें।”
उन्होंने कहा, “उन लोगों ने मुझसे कहा साहब कैसे होगा? हमारी संख्या ज्यादा है। हमने कहा शिफ्ट में कर लो। तुम्हारे घर में रहने की जगह नहीं है तो भाई संख्या नियंत्रित कर लो। और नहीं है सामर्थ्य, तो क्यों बेकार आगे संख्या बढ़ाई जा रही है और ये चाहिए आपको कि अगर आपको सिस्टम के साथ रहना है तो याद करना हम उन नियम और कानून को मानना शुरू करें।”
मुस्लिम आबादी को लेकर सीएम योगी की ओर से दिया गया ये बयान भले ही आपको आक्रामक लगे। लेकिन असल में ये एक फैक्ट है जिसका मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है और कई रिसर्च भी इसको लेकर चिंता जाहिर करती रही हैं।
लगातार बढ़ती रही है मुस्लिमों की आबादी
भारत में 1951, 1971, 1991 और 2011 में जनगणनाएँ हुईं हैं। शुरू से ही जनगणनाओं में धर्म के आधार पर भी डेटा लिए जाते रहे हैं। 1951 की जनगणना में हिंदू आबादी 84 प्रतिशत थी, जबकि मुस्लिम आबादी 9.8 प्रतिशत थी। 1971 तक हिंदू आबादी घटकर 82 प्रतिशत रह गई और मुस्लिम आबादी बढ़कर 11 प्रतिशत हो गई। 1991 में हिंदू आबादी एक फीसदी और घटकर 81 प्रतिशत रह गई और मुस्लिम आबादी बढ़कर 12.2 प्रतिशत हो गई। वहीं, 2011 तक हिंदू आबादी और घटकर 79 प्रतिशत रह गई, जबकि मुस्लिम आबादी 14.2 प्रतिशत तक पहुँच गई।
यानी मुस्लिम आबादी में 24.6 प्रतिशत का इजाफा हुआ है, जबकि हिंदू आबादी में 4.5 प्रतिशत की कमी आई है। वहीं पाकिस्तान में 1951 में हिंदू आबादी 13 प्रतिशत थी जो अब केवल 1.73 प्रतिशत रह गई है। यही हाल बांग्लादेश में भी है जो 22 फीसदी से घटकर 7 प्रतिशत पर रह गई है।
अंतरराष्ट्रीय संस्था की रिपोर्ट भी चौंकाने वाली
अंतरराष्ट्रीय संस्था प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट भी यह बताती है कि भारत में मुस्लिम आबादी आने वाले दशकों में बढ़ेगी। इसके पीछे संस्था ने मुख्य रूप से कम उम्र की आबादी और ज्यादा प्रजनन दर को कारण माना है।
प्यू रिसर्च के मुताबिक भारत 2050 तक दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश बन सकता है। जहां करीब 31 करोड़ मुसलमान होंगे। जो वैश्विक मुस्लिम आबादी का करीब 11 प्रतिशत होगा। भारत में रिपोर्ट में मुस्लिम महिलाओं की औसत प्रजनन दर हिंदू महिलाओं की तुलना में अधिक बताई गई है।
वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ रही मुस्लिम आबादी
प्यू रिसर्च की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार इस्लाम दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला धर्म है। 2015 में दुनिया में मुस्लिम आबादी करीब 1.8 अरब थी, जो 2060 तक 3 अरब के पार पहुँच सकती है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उच्च प्रजनन दर है।
अध्ययन के अनुसार मुस्लिम महिलाओं की वैश्विक प्रजनन दर 3.1 है, जो प्रमुख धार्मिक समूहों में सबसे ज्यादा है। यही वजह है कि आने वाले दशकों में मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर बाकी धर्मों से अधिक रहने का अनुमान है।
सीएम योगी के बयान के मायने समझिए
दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश भारत है। वहीं, राज्य स्तर पर देखें तो उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा आबादी है। संसाधन, सुविधाओं और तमाम बुनियादी जरूरतों के लिए जनसंख्या नियंत्रण जरूरी है। सरकारें इसको लेकर तमाम तरह के कार्यक्रम चलाती रहती हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी… नाम सुनने में भले ही मजाक लगे, लेकिन सोशल मीडिया की दुनिया में यह अब एक ऐसा डिजिटल समूह बन चुका है, जो खुद को ‘बेरोजगार’ और ‘आलसी’ युवाओं की आवाज बताता है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की बेरोजगार युवाओं, वकीलों, पत्रकारों और RTI एक्टिविस्ट पर की गई टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर जो गुस्सा उभरा, उसी माहौल में इस तथाकथित ‘पार्टी’ का जन्म हुआ। शुरुआत मीम और व्यंग्य (सटायर) से हुई, लेकिन देखते ही देखते इसे राजनीतिक एटेंशन मिलने लगी।
फोटो साभार: cockroachjantaparty.org
दिलचस्प बात यह है कि यह कोई आधिकारिक राजनीतिक पार्टी नहीं है। न इसका कोई चुनाव आयोग में पंजीकरण है और न ही कोई औपचारिक संगठनात्मक ढाँचा। इसके बावजूद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इसके तिलचट्टे (फॉलोवर्स) तेजी से बढ़ रहे हैं। पार्टी से जुड़ने वाले लोगों की संख्या 50 हजार तक पहुँच गई।
पहली नजर में इसे युवाओं के गुस्से और सिस्टम से नाराजगी की आवाज की तरह दिखाया गया है, लेकिन थोड़ा गौर करें तो मामला सिर्फ मजाक या मीम तक सीमित नहीं दिखता। सवाल यह है कि क्या यह सच में युवाओं की समस्याओं को उठाने वाला मंच है या फिर इंटरनेट पर बैठे नाराज युवाओं को लगातार सिस्टम के खिलाफ भड़काने का नया तरीका। सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी पोस्ट, मीम्स और तंज के जरिए ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जहाँ हर चीज के लिए सिर्फ सिस्टम को जिम्मेदार बताया जाता है।
कैसे बनी कॉकरोच जनता पार्टी?
कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत किसी राजनीतिक विचारधारा से नहीं, बल्कि इंटरनेट पर उभरे गुस्से, व्यंग्य और नाराजगी से हुई। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की उस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर अचानक बहस छिड़ गई, जिसमें बेरोजगार युवाओं, वकीलों, पत्रकारों और RTI एक्टिविस्ट्स को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि सिस्टम पर कुछ ‘परजीवी’ हमला कर रहे हैं। उन्होंने इसे युवाओं से जोड़ते हुए कहा, “कुछ युवा कॉकरोच जैसे हैं। इन्हें कोई नौकरी नहीं मिलती और पेशे में भी इनकी कोई जगह नहीं होती। इनमें से कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया बन जाते हैं, कुछ RTI एक्टिविस्ट बन जाते हैं, कुछ दूसरे तरह के एक्टिविस्ट बन जाते हैं। और फिर ये सब पर हमला करने लगते हैं।”
CJI Surya Kant says there are "parasites" attacking the system.
"There are youngsters like cockroaches, who don't get any employment and don't have any place in the profession. Some of them become media, some of them become social media, some of them become RTI activists, some… pic.twitter.com/gwwOq8VcaK
देखते ही देखते CJI की इस टिप्पणी पर एक्स, Reddit और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर मीम्स, पोस्ट और कटाक्ष वायरल होने लगे। इसी डिजिटल माहौल में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम सामने आया, जिसे शुरुआत में केवल एक ऑनलाइन मजाक और व्यंग्य माना गया।
लेकिन इंटरनेट पर पैदा होने वाले कई ट्रेंड्स की तरह यह भी धीरे-धीरे एक डिजिटल कम्युनिटी में बदलने लगा। पार्टी ने खुद को उन्हीं युवाओं की आवाज बताना शुरू किया, जिन्हें अक्सर ‘आलसी’, ‘बेरोजगार’ और ‘ज्यादा समय इंटरनेट पर बिताने वाला’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। यही वजह है कि इस पार्टी की एलिजिबिलिटी के लिए भी ‘आलसी’, ‘बेरोजगार’, ‘ज्यादा समय इंटरनेट पर बिताने वाला’ और ‘पेशेवर तरीके से भड़ास निकालने वाले’ जैसी कैटेगरी रखी गईं। ऐसे लोगों को ही पार्टी का ‘योग्य सदस्य’ माना गया।
फोटो साभार: cockroachjantaparty.org
पार्टी का बायो भी इसी नाराजगी और व्यंग्य की राजनीति को आगे बढ़ाता है। इसमें खुद को उन लोगों की पार्टी बताया गया है, जिन्हें सिस्टम ने गिनना ही छोड़ दिया। साथ ही दावा किया गया कि पार्टी की 5 माँगे हैं, कोई स्पॉन्सर नहीं है और यह एक ‘जिद्दी झुंड’ की तरह काम करेगी। पहली नजर में यह व्यवस्था के खिलाफ कटाक्ष जैसा लगता है, लेकिन यही भाषा युवाओं के भीतर ‘सिस्टम ने हमें छोड़ दिया’ वाला भाव मजबूत करती है।
इसका मिशन स्टेटमेंट भी सीधे भावनाओं पर चोट करता है। पार्टी कहती है कि वह उन युवाओं के लिए बनाई गई है, जिन्हें बार-बार आलसी, हर वक्त ऑनलाइन रहने वाला और अब ‘कॉकरोच’ तक कहा जा रहा है। पार्टी के मुताबिक यही उसका मिशन है और बाकी सब केवल व्यंग्य। यानी खुद को मजाक बताकर यह मंच उन युवाओं को जोड़ने की कोशिश करता है, जो पहले से व्यवस्था, नौकरी और राजनीति को लेकर निराश हैं।
फोटो साभार: cockroachjantaparty.org
वहीं पार्टी का विजन केवल नाराजगी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। इसमें कहा गया कि वे कोई नया फंड या टैक्सपेयर्स के पैसों पर विदेश यात्राएँ करने नहीं आए हैं, न ही भ्रष्टाचार को ‘रणनीतिक खर्च’ बताकर पेश करना चाहते हैं। उनका मकसद सिर्फ यह पूछना है कि जनता का पैसा आखिर गया कहाँ। इस तरह का नैरेटिव युवाओं के भीतर पहले से मौजूद असंतोष को और धार देता है।
कॉकरोच जनता पार्टी को मिलने लगा विरोधी पार्टियों का समर्थन
शुरुआत में जिस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को सिर्फ इंटरनेट का मजाक और मीम कल्चर माना जा रहा था, वह धीरे-धीरे विपक्षी नेताओं और सरकार विरोधी चेहरों का ध्यान भी खींचने लगी। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस ट्रेंड को कई विपक्षी नेताओं ने खुलकर समर्थन देना शुरू किया। इससे पार्टी के युवाओं की आवाज बनने के दावे पर सवाल उठने लगे।
तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की नेता महुआ मोइत्रा ने पार्टी में शामिल होने की इच्छा जताई। उन्होंने लिखा, “वह भी कॉकरोच जनता पार्टी में शामिल होना चाहती हैं, वैसे ही जैसे वह पहले से एंटी नेशनल पार्टी की कार्ड होल्डर सदस्य हैं।” और इस न्योते को खुद को पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष बताने वाले अभिजीत दिपके ने स्वागत भी किया।
As the founding President of @CJP_2029, it is my great honour to welcome the brave and fierce @MahuaMoitra to our party.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने भी इस ट्रेंड का समर्थन करते हुए कहा, “कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत CJI की टिप्पणी के बाद मजाक के तौर पर हुई थी, लेकिन केवल दो दिनों में इसे 55 हजार से ज्यादा लोगों का समर्थन मिल गया। यह दिखाता है कि लाखों युवा मौजूदा व्यवस्था और राजनीतिक दलों से परेशान हैं और कुछ नया चाहते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे युवाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए और उन्हें सही दिशा ले जाना चाहिए।”
The Cockroach Janta Party started as a joke after the CJI’s remarks, but has received enormous support & has garnered >55,000 members in just 2 days! Shows that there millions of youth fed up with the present system & parties & want something new. We should encourage them & steer…
इसी के साथ सोशल मीडिया पर सक्रिय तमाम वामपंथी और सरकार विरोधी लॉबी ने भी इस ट्रेंड को जमकर आगे बढ़ाया। मीम पेज, एक्टिविस्ट अकाउंट्स और राजनीतिक हैंडल लगातार इसे प्रमोट करते दिखाई दिए। यही वह मोड़ था, जहाँ एक तथाकथित ‘व्यंग्य पार्टी’ धीरे-धीरे साफ राजनीतिक रंग लेती नजर आने लगी।
सबसे दिलचस्प बात खुद पार्टी के संस्थापक माने जाने वाले अभिजीत दिपके के बयान में दिखी। उन्होंने कहा कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि कोई कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) समाजवादी पार्टी (SP), तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) या किसी और पार्टी से जुड़ा है, सिर्फ सपोर्ट की जरूरत है। यहाँ BJP का नाम गायब था।
It doesn’t matter if you belong to Congress, AAP, SP, TMC, or any other party. What matters is your support to save democracy and strengthening India. 🪳🇮🇳 https://t.co/dIwuLkZdd3
यहीं से सवाल और गहरे हो जाते हैं। अगर यह मंच सच में सिर्फ युवाओं की आवाज होता, तो वह खुद को किसी खास राजनीतिक दिशा से दूर रखता। लेकिन जिस तरह विपक्षी नेताओं, एक्टिविस्ट्स और सरकार विरोधी तत्वों का समर्थन इसे लगातार मिलता गया, उससे यह धारणा मजबूत होने लगी कि कॉकरोच जनता पार्टी युवाओं की समस्याओं से ज्यादा, सरकार विरोधी नैरेटिव को मजबूत करने का नया डिजिटल हथियार के तौर पर सामने आ रही है।
कॉकरोच जनता पार्टी के घोषणा पत्र में विपक्षी पार्टी के प्रोपेगेंडा को हवा दी गई
कॉकरोच जनता पार्टी भले ही सोशल मीडिया पर एक ट्रेंड बन रहा है, लेकिन इसका घोषणा पत्र किसी आधिकारिक राजनीतिक पार्टी की तरह तैयार किया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि इसके ज्यादातर मुद्दे सीधे सरकार, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया और बड़े उद्योगपतियों को निशाने पर लेते दिखाई देते हैं। ये वही मुद्दे हैं जो कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम और उसके सहयोगी आए दिन सरकार के विरोध में उठाते रहते हैं।
घोषणा पत्र में कहा गया है कि अगर कॉकरोच जनता पार्टी कभी सत्ता में आती है, तो किसी भी CJI को रिटायरमेंट के बाद ‘इनाम’ के तौर पर राज्यसभा सीट नहीं दी जाएगी। यानी न्यायपालिका और सरकार के मेल-जोल पर निराधार सीधे सवाल उठाए गए।
इसके बाद चुनाव आयोग को लेकर भी बेहद आक्रामक भाषा इस्तेमाल की गई। घोषणा पत्र में कहा गया कि अगर किसी ‘असली वोट’ को हटाया जाता है, चाहे वह कॉकरोच जनता पार्टी शासित राज्य हो या विपक्षी दलों का राज्य, तो मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) पर UAPA लगाया जाना चाहिए। यहाँ तह कहा गया कि लोगों के वोटिंग अधिकार छीनना ‘आतंकवाद से कम नहीं’ है। यह नैरेटिव पिछले कुछ महीनों से कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और दूसरे विपक्षी दलों द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसे मुद्दों पर लगाए जा रहे आरोपों से काफी मिलता-जुलता दिखाई देता है।
घोषणा पत्र में महिलाओं को संसद और कैबिनेट में 50 प्रतिशत आरक्षण देने की भी बात कही गई है, वह भी संसद की सीटें बढ़ाए बिना। इसे केंद्र सरकार के प्रस्तावित परिसीमन अभ्यास के खिलाफ नैरेटिव के तौर पर भी देखा जा रहा है।
सबसे बड़ा हमला मीडिया और बड़े उद्योगपतियों पर किया गया। घोषणा पत्र में कहा गया कि अंबानी और अडानी के स्वामित्व वाले मीडिया संगठनों के लाइसेंस रद्द कर दिए जाएँगे ताकि ‘वास्तव में स्वतंत्र मीडिया’ को जगह मिल सके। साथ ही तथाकथित ‘गोदी मीडिया’ के एंकर्स के बैंक अकाउंट की भी जाँच कराने की बात कही गई है। यानी यह सीधे उस नैरेटिव को आगे बढ़ाता है, जिसमें बीजेपी सरकार पर बड़े कॉरपोरेट घरानों और मीडिया को नियंत्रित करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं।
इसके अलावा कहा गया कि जो विधायक और सांसद दल-बदल करते हैं उन्हें चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी जाएगी और साथ ही ऐसे सांसद और विधायक के पास 20 वर्षों तक कोई दफ्तर भी नहीं रहेगा।
कुल मिलाकर, ऊपर से मजाक और मीम्स जैसा दिखने वाला यह मंच अपने घोषणा पत्र में लगभग हर उस मुद्दे को उठाता दिखाई देता है, जिसे विपक्षी दल पिछले कुछ समय से सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करते रहे हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी के पीछे का चेहरा अभिजीत दिपके कौन है?
कॉकरोच जनता पार्टी को सोशल मीडिया पर युवाओं की आवाज बनकर पेश किया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे मौजूद चेहरा कोई सामान्य या राजनीति से दूर रहने वाला सोशल मीडिया यूजर नहीं है। इस पूरे डिजिटल कैंपेन के केंद्र में अभिजीत दिपके नाम का वह व्यक्ति है, जिसके तार सीधे आम आदमी पार्टी (AAP) की सोशल मीडिया और चुनावी रणनीतियों से जुड़े दिखाई देते हैं।
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) के रहने वाले अभिजीत दिपके ने बॉस्टन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। लेकिन अभिजीत की पहचान सिर्फ एक पढ़े-लिखे सोशल मीडिया एक्टिविस्ट तक सीमित नहीं रही। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान आई कई मीडिया रिपोर्ट्स में दिपके का नाम उस टीम के हिस्से के तौर पर सामने आया था, जो AAP की सोशल मीडिया छवि को आक्रामक और वायरल अंदाज में तैयार कर रही थी।
उस समय उन्हें पुणे के 23 वर्षीय युवा के तौर पर बताया गया, जो AAP की सोशल मीडिया ट्रांसफॉर्मेशन के पीछे काम कर रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, AAP उस चुनाव में छोटे-छोटे वन लाइनर्स, पैरोडी वीडियो, मीम्स और शॉर्ट क्लिप्स के जरिए अरविंद केजरीवाल की छवि को मजबूत करने और बीजेपी-कॉन्ग्रेस पर हमला करने की रणनीति अपना रही थी।
अभिजीत दिपके खुद इन रिपोर्ट्स में यह समझाते दिखाई दिए थे कि मिलेनियल्स और पहली बार वोट देने वाले युवाओं तक राजनीतिक संदेश पहुँचाने के लिए मीम्स और वीडियो सबसे असरदार तरीका हैं। यानी जिस ‘मीम पॉलिटिक्स’ और इंटरनेट नैरेटिव को आज ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ इस्तेमाल करती दिख रही है, वही तरीका पहले AAP के चुनावी प्रचार में भी इस्तेमाल हो चुका है।
एक दूसरी रिपोर्ट में दिपके को मीडिया स्टडीज ग्रेजुएट बताया गया, जो AAP के कई वायरल मीम्स के पीछे थे। इन मीम्स में बॉलीवुड सीन, एडिटेड तस्वीरें और पॉप कल्चर का इस्तेमाल कर अरविंद केजरीवाल को सकारात्मक तरीके से पेश किया जाता था, जबकि विरोधियों को निशाने पर लाया जाता था।
अभिजीत दिपके का AAP से कनेक्शन
सिर्फ इतना ही नहीं, AAP के ‘वॉर रूम’ से जुड़ी रिपोर्ट्स में भी अभिजीत दिपके का नाम सामने आया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वह पार्टी के नेशनल सोशल मीडिया कोऑर्डिनेशन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। बताया गया कि AAP की सोशल मीडिया टीम अलग-अलग वॉर रूम्स से काम कर रही थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों के जवाब में तुरंत ऑनलाइन नैरेटिव तैयार करती थी।
इसी दौरान दिपके ने यह भी कहा था कि #DelhiwithKejriwal जैसे हैशटैग का मकसद केजरीवाल को ‘अपना बंदा’ और ‘हमारा आदमी’ की छवि में पेश करना था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि AAP की टीम व्हाट्सऐप और फेसबुक पर बहुत ज्यादा फोकस कर रही है और पार्टी के मॉडरेटर्स बीजेपी, कॉन्ग्रेस और दूसरे राजनीतिक हैंडल्स पर नजर रखते थे ताकि पार्टी जिसे ‘फेक न्यूज’ मानती है, उसका जवाब दिया जा सके।
AAP की 2020 की चुनावी रणनीति पर आई एक और रिपोर्ट में अभिजीत दिपके को पार्टी के ‘मीम और पैरोडी ऑफेंसिव’ का अहम चेहरा बताया गया था। यानी फिल्मों, विज्ञापनों और सोशल मीडिया ट्रेंड्स को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर ‘ब्रांड केजरीवाल’ को आगे बढ़ाने की रणनीति में वह प्रमुख भूमिका निभा रहे थे।
यही वजह है कि अब जब वही अभिजीत दिपके ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के पीछे का चेहरा दिखाई देते हैं, तो इसे केवल युवाओं की आवाज के लिए उभरी पार्टी मानना मुश्किल हो जाता है। जिस व्यक्ति का पूरा बैकग्राउंड सोशल मीडिया नैरेटिव, मीम कैंपेन और राजनीतिक डिजिटल प्रचार से जुड़ा रहा हो, उसके नेतृत्व में खड़ा हुआ यह ऑनलाइन कैंपेन अचानक पैदा हुआ मासूम ट्रेंड कम और एक सुनियोजित डिजिटल राजनीतिक कैंपेन ज्यादा नजर आने लगता है।
निष्कर्ष: ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से आखिर हासिल क्या?
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसी चीजें सोशल मीडिया पर पहली नजर में युवाओं की आवाज और सिस्टम के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत जैसी लगती हैं। मीम्स, तंज, वायरल पोस्ट और सरकार विरोधी कंटेंट देखकर कई युवाओं को लगता है कि वे किसी बड़े बदलाव का हिस्सा बन रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे यही चीजें उन्हें असली दुनिया से दूर ले जाने लगती हैं।
पूरा कैंपेन इंटरनेट के गुस्से पर चलता है, जहाँ हर समस्या का जिम्मेदार सिर्फ सिस्टम, सरकार, अदालत, मीडिया या संस्थाओं को बताया जाता है। लगातार ऐसे कंटेंट देखने के बाद कई युवा यह मानने लगते हैं कि इस देश में कुछ ठीक हो ही नहीं सकता। न राजनीति पर भरोसा बचता है, न कानूनी प्रक्रिया पर और न ही लोकतांत्रित संस्थाओं पर।
सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरह के ऑनलाइन ट्रेंड युवाओं को गुस्सा तो देते हैं, लेकिन दिशा नहीं। घंटों सोशल मीडिया पर बहस, ट्रोलिंग और मीम शेयर करने के बाद भी जमीन पर उनकी जिंदगी में कुछ बदलता नहीं। नौकरी, करियर, स्किल या असली राजनीतिक भागीदारी की जगह उनकी दुनिया धीरे-धीरे सिर्फ इंटरनेट तक सिमटने लगती है।
यही वजह है कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को केवल मजाक मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है। क्योंकि मीम्स और व्यंग्य के पीछे लगातार ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जहाँ युवाओं का भरोसा सिस्टम से टूटे और उनका गुस्सा हमेशा जिंदा रहे। इंटरनेट पर यह सब ‘कूल’ और ‘क्रांतिकारी’ जैसा दिख सकता है, लेकिन आखिर में ज्यादातर युवाओं के हाथ सिर्फ ऑनलाइन नाराजगी ही लगती है, कोई असली बदलाव नहीं।
मोदी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में लक्षद्वीप को ‘हाई-वैल्यू इको-टूरिज्म’ डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने की कोशिश की है। खासकर जनवरी 2024 में पीएम मोदी की यात्रा के बाद लक्षद्वीप सुर्खियों में आया। लक्षद्वीप की ‘खूबसूरती’ को दुनिया ने देखा। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए केन्द्र सरकार ने कई नियमों में सुधार किए। इसका असर ये रहा कि लक्षद्वीप हॉट डिस्टिनेशन बन गया है। पीएम मोदी ने विदेशों में छुट्टियाँ बिताने के बदले देश के खूबसूरत पर्यटन स्थल में जाने की लोगों से अपील की थी। इसका असर भी दिख रहा है।
पीएम मोदी की अपील का दिखा असर
जनवरी 2024 में पीएम मोदी ने लक्षद्वीप की तस्वीरें और वीडियो साझा किए थे। इसके बाद इंटरनेट पर ‘Lakshadweep tourism’ ट्रेंड करने लगा। दरअसल लक्षद्वीप को पीएम मोदी ने जैसे ही लक्षद्वीप को प्रोमोट किया। इसका असर मालदीव पर पड़ा। मालदीव ने इसे अपना ‘प्रतिद्वंदी’ मानते हुए कई भारत विरोधी बयान दिए। इससे मालदीव के प्रति भारत में नाराजगी बढ़ी। दरअसल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लक्षद्वीप में टूरिज्म के विकास की बात की थी और फिर पीएम मोदी ने वहाँ का दौरा किया। इस दौरान लक्षद्वीप से जुड़ी तस्वीरों और वीडियो के माध्यम से दुनिया ने इसकी सुंदरता देखी।
इन फोटो को देखकर मालदीव की मुइज्जू सरकार भड़क गई। उसके मंत्रियों ने भारत और पीएम मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की। भारत में इसका विरोध हुआ और ‘मालदीव बायकॉट’ के स्वर भी गूँजे। भारत के लोगों ने महसूस किया कि मुइज्जू सरकार चीन-पाकिस्तान की कठपुतली बन गई है और भारत विरोधी फैसले ले रही है।
(साभार- चैटजीपीटी)
ग्राफ में लक्षद्वीप में कैसे पर्यटक बढ़ रहे हैं ये दिखाया गया है। यहाँ 2000 में 1684 पर्यटक पहुँचे, जबकि 2005 में 7849, 2010 में 9217, 2015 में 18414, 2020 में 3875, 2023 में 46551 और 2024 में 68328 पर्यटक पहुँचे थे।
पीएम मोदी की विजिट के बाद पर्यटन में भारी उछाल
आरटीआई डाटा के मुताबिक, 2020 में जहाँ लक्षद्वीप में मात्र 3875 पर्यटक आए थे, वहीं 4 साल बाद यानी 2024 में यह संख्या बढ़कर 68328 हो गई। ये उछाल खास कर पीएम मोदी के जनवरी 2024 में लक्षद्वीप के दौरे के बाद आया। उन्होंने लक्षद्वीप के खूबसूरत फोटो और वीडियो शेयर किए थे। इससे टूरिज्म को बढ़ावा मिला। 2023 में यहाँ 46551 पर्यटक आए थे जो एक साल बाद 68328 हो गए यानी करीब 47 फीसदी का इजाफा हुआ।
वहीं मालदीव जाने वाले पर्यटकों की संख्या में काफी कमी आई। 2023 में 209193 पर्यटक मालदीव पहुँचे, लेकिन 2024 में इसकी संख्या घट कर 130805 हो गई यानी 37.5 फीसदी की कमी आई। मालदीव की अर्थव्यवस्था में टूरिज्म का बड़ा हाथ है। पर्यटकों की घटती संख्या ने मालदीव को सबक सिखा दिया। यहाँ भारतीय पर्यटकों की संख्या घट कर 41 फीसदी तक रह गई। वहीँ भारतीयों की संख्या लक्षद्वीप में दोगुनी हो गई। यह पीएम मोदी की रणनीति और लक्षद्वीप दौरे का असर था।
मोदी सरकार ने लक्षद्वीप से जुड़े नियम बदले
पर्यटकों को लक्षद्वीप जाने में किसी तरह की दिक्कत न हो इसको देखते हुए से नियमों में बड़ा बदलाव किया गया। लक्षद्वीप प्रशासन ने 29 अप्रैल 2026 को जारी एक सर्कुलर के माध्यम से पर्यटकों के लिए एंट्री परमिट नियमों में सुधार किया है। नए नियमों के बाद अब यहाँ घूमना पहले के मुकाबले काफी आसान हो गया है।
पर्यटकों के लिए लोकल स्पॉन्सर की जरूरत खत्म की गई। पहले स्थानीय व्यक्ति या संस्था का स्पॉन्सर होना जरूरी था। इतना ही नहीं पर्यटकों को पुलिस क्लियरेंस सर्टिफिकेट यानी पीसीसी की जरूरत होती थी। इसे खत्म कर दिया गया यानी अब पुलिस क्लियरेंस की जरूरत भी नहीं रही। नए नियम के मुताबिक सिर्फ 14 दिन पहले आवेदन करना अनिवार्य किया गया। अब सुरक्षा जाँच का काम लक्षद्वीप पुलिस खुद ही आवेदन करने के बाद करेगी।
पर्यटन को लेकर सरकार ने कई बड़े कदम उठाए
केंद्र सरकार ने लक्षद्वीप के विकास पर ₹3600 करोड़ से अधिक के पर्यटन और इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं पर काम शुरू किया, ताकि लक्षद्वीप को टूरिस्ट हब बनाया जा सके। इंटरनेट और डिजिटल कनेक्टिविटी में बड़ा बदलाव किए गए। सबसे बड़ा प्रोजेक्ट Kochi-Lakshadweep Submarine Optical Fibre Cable था। यह केबल लगभग 11 द्वीपों को जोड़ती है और ‘डिजिटल इंडिया’ मिशन के तहत बनाई गई। इससे लक्षद्वीप की इंटरनेट स्पीड लगभग 100 गुना तक बढ़ाई गई। पहले जहाँ लगभग 1.7 Gbps क्षमता थी, उसे बढ़ाकर करीब 200 Gbps किया गया। इससे ऑनलाइन बुकिंग, डिजिटल पेमेंट, होटल या रिसॉर्ट का संचालन आसान हुआ, साथ ही 4G-5G का विस्तार हुआ।
पर्यटक वहाँ तक आसानी से पहुँच सकें, इसके लिए एयर और समुद्री कनेक्टिविटी सुधारने की कोशिश की गई। 2026 में कोच्चि-लक्षद्वीप सी-प्लेन ट्रायल भी शुरू हुए, जिनका उद्देश्य पर्यटन और इमरजेंसी कनेक्टिविटी बढ़ाना है। अगत्ती एयरपोर्ट का विस्तार किया गया। यहाँ रनवे को 336 मीटर तक बढ़ाया गया, ताकि बड़े जहाज आसानी से वहाँ उतर सकें। नया टर्मिनल भवन बनाया गया, जहाँ 150 यात्री एक साथ रुक सकें।
समुद्री रास्तों को आकर्षण बनाने के लिए नए सी- प्लान के तहत जेट्टी और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार किया गया, ताकि बड़े जहाज और क्रूज को लाने में दिक्कत न हो। बीच रिसॉर्ट्स, वॉटर स्पोर्ट्स, स्कूबा डाइविंग, क्रूज टूरिज्म, इको-टूरिज्म को बढ़ावा दिया गया। राजधानी कवाराति में बैटरी बैकअप वाले सोलर पावर प्रोजेक्ट शुरू किए गए, ताकि बिजली की समस्या का निदान हो। पानी की समस्या को भी कम करने की कोशिश हुई। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी काम किए गए।
सरकार लक्षद्वीप को सागरमाला परियोजना के तहत विकसित कर रही है। इसके विकास में लगने वाले फंड को सागरमाला परियोजना के फंड से लिया जाएगा। लक्षद्वीप के विकास के लिए कुल 13 प्रोजेक्ट बनाए गए। इन प्रोजेक्ट के जरिए लक्षद्वीप के 36 द्वीपों की तस्वीर बदली जा रही है।
मोदी सरकार कदामत द्वीप पर सबसे अधिक ₹1034 करोड़ खर्च कर रही है। यह फंड पोर्ट और बीच के विकास में लगाया जा रहा है। इसके अलावा कल्पेनी द्वीप पर ₹804 करोड़ का खर्च किया गया। अन्द्रोथ द्वीप को ₹762 करोड़ से विकसित किया जा रहा है। मिनिकॉय और कवरत्ती द्वीप को भी आधुनिकतम सुख सुविधाओं से लैस किया जा रहा है। कुल मिलाकर पर्यटन की दृष्टि से जितनी सहुलियत दी जा सकती थी, वह मोदी सरकार ने देने की कोशिश की।
मोदी सरकार से पहले लक्षद्वीप अविकसित माना जाता था। यहाँ की 98 फीसदी आबादी मुस्लिम थी। लोगों को सरेआम माँस कटते थे। कपड़ा पहनने पर अघोषित शरिया लागू था। शराब पर अघोषित बैन था और गंदगी काफी थी। ऐसी परिस्थिति में पीएम मोदी ने प्रफुल्ल खोड़ा पटेल को इस केन्द्रशासित प्रदेश का प्रशासक बना कर भेजा और उन्होंने इस स्थल को मालदीव के टक्कर का बनाने के लिए कुछ सुधर योजनाएँ लाई, तब जाकर लोगों को पता चला कि लक्षद्वीप की क्या हालत है।
यहाँ के हालत ऐसे थे कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की प्रतिमा भी नहीं थी। दरअसल इसकी वजह मुस्लिम आबादी का होना था, जिनके लिए ‘बूतपरस्ती हराम’ है। 2010 में यूपीए सरकार यहाँ प्रतिमा लगाना चाहती थी, लेकिन विरोध को देखते हुए उसे पीछे हटना पड़ा था, लेकिन मोदी सरकार ने ये कर दिखाया। यहाँ विकास कार्यों का जमकर विरोध हो रहा था।
लक्षद्वीप में विकास नीतियों का विरोध करने वाले लोगों ने सरकार पर घटिया आरोप भी लगाए। लक्षद्वीप की एक्टर और मॉडल सुल्ताना ने एक मलयालम न्यूज चैनल पर डिबेट में यहाँ तक कह दिया कि केन्द्र सरकार ‘कोविड़-19 का इस्तेमाल हथियार के तौर पर’ स्थानीय लोगों के लिए कर रही है। उसने कहा कि ‘कोरोना को बायो वेपन’ की तरह इस्तेमाल किया गया। दरअसल अभिनेत्री कोरोना की बढ़ती संख्या को केन्द्र सरकार पर हमले की तरह इस्तेमाल किया।
ये बयान विकास की गति को रोकने की एक कोशिश की तरह देखा गया। कोरोना महामारी के वक्त सरकार ने स्थानीय निवासियों की सुरक्षा इंतजाम किए थे। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहाँ कई सेंटर्स बनाए गए थे, जहाँ कोरोना पीड़ितों को रखा गया था यानी विकास के साथ-साथ सरकार ने स्वास्थ्य सुविधाओं का भी पूरा ख्याल रखा।
इस्लामी आबादी हर हाल में लक्षद्वीप को जस का तस रखना चाहती थी, लेकिन प्रशासनिक फैसलों ने इन विरोधों को दरकिनार कर योजनाओं को अमली जामा पहनाया।
लक्षद्वीप की हिन्दू आबादी का हुआ था धर्मांतरण
इन खूबसूरत द्वीपों पर मुस्लिम कैसे आए, इसकी कहानी भी काफी दिलचस्प है। सातवीं शताब्दी में शेख उबैदुल्लाह का, जिसे ‘संत उबैदुल्लाह’ भी कहते हैं, वह यहाँ इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए पहुँचा। शेख उबैदुल्लाह अरब में रहता था और मक्का-मदीना में नमाज पढ़ता था। एक बार मक्का में अल्लाह की इबादत करते समय उसे नींद आ गई और सपने में खुद पैगंबर मुहम्मद आ पहुँचे। सपने में ही उन्हें आदेश मिला कि जेद्दाह (सऊदी अरब का बंदरगाह) जाओ और वहाँ से एक जहाज लेकर इस्लाम को फैलाने के लिए दूर-दूर क्षेत्रों में निकलो।
कहानी में बताया जाता है कि शेख उबैदुल्लाह समुद्र के रास्ते निकल पड़ा। कई महीनों तक समुद्र में भटकने के बाद एक तूफ़ान आया और उसका जहाज अमिनि द्वीप से आ टकराया। इसके बाद उसे फिर से नींद आ गई और वो सो गया। जैसा कि मक्का में हुआ था, पैगंबर मुहम्मद फिर से उसके सपने में आए और कहा कि इसी द्वीप पर इस्लाम का प्रचार-प्रसार करो। इसके बाद उसने आदेश का पालन शुरू कर दिया।
ये कहानी लक्षद्वीप की सरकार वेबसाइट पर द्वीप समूह के इतिहास के वर्णन में भी दी गई है। इसमें लिखा है कि उस समय यहाँ के मुखिया ने उसकी मंशा को भाँप कर उसे बाहर निकाल दिया, लेकिन वो अड़ा रहा। फिर एक सुंदर हिन्दू युवती के उसके प्यार में पड़ने की बात कही जाती है। उसने उसका धर्मांतरण करा के मुस्लिम बनाया और ‘हमीदत बीबी’ नाम रखा। शेख उबैदुल्लाह ने उसके साथ निकाह कर लिया।
इस्लामी नैरेटिव की कहानी के अनुसार, स्थानीय मुखिया ने जब उसे मारने की योजना बनाई और अपने सैनिकों के साथ उसे घेर लिया, तब शेख उबैदुल्लाह ने अल्लाह को याद किया और उसे घेरे उसके सभी विरोधी अंधे हो गए। दोनों भाग निकले और जैसे ही उन्होंने द्वीप छोड़ा, इन लोगों की आँखों की रोशनी वापस आ गई।
इसके बाद शेख उबैदुल्लाह एंड्रोट द्वीप पर पहुँचा, लेकिन वहाँ भी उसका कड़ा विरोध हुआ। लेकिन, किसी तरह उसने लोगों को फुसला कर कइयों का इस्लाम कबूल करवाया। फिर उसने लक्षद्वीप के कई द्वीपों में जाकर इस्लाम का प्रचार-प्रसार किया और धर्मांतरण अभियान चलाया। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वो एंड्रोट लौटा, जहाँ उसे दफनाया गया। आज एंड्रोट में उसका मकबरा है और श्रीलंका से लेकर म्यांमार और मलेशिया तक से मुस्लिम उसके कब्र पर आते हैं।
कहते हैं कि बाद में उसने अमिनी में जाकर भी बड़े पैमाने पर लोगों का धर्मांतरण कराया और इस बारे नए-नए मुस्लिम बने कई स्थानीय लोग उसके साथ थे, इसीलिए उसका विरोध भी कम हुआ। इसी तरह उसने कवरत्ती और अगट्टी में भी बड़े पैमाने पर हिन्दुओं का धर्मांतरण कराया। एंड्रोट के जुमा मस्जिद में उसकी कब्र है, जो उसके समय ही बना था। ये उसके ब्रेनवॉशिंग का कमाल ही था कि आज लक्षद्वीप की 98% आबादी मुस्लिम है।
महाराष्ट्र के नासिक स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (BPO) में जबरन धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न मामले में शुक्रवार (15 मई 2026) को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वी वी कथारे ने POSH कमेटी की सदस्य अश्विनी अशोक चैनानी की जमानत याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने यह फैसला इस आधार पर दिया कि POSH कमेटी की सदस्य होने के बावजूद उन्होंने हिंदू पीड़िता की गंभीर शिकायतों को नजरअंदाज किया। अपनी जिम्मेदारी निभाने और मदद करने की बजाय उन्होंने पीड़िता को ही दोषी ठहराया और आरोपितों को छोड़ देने के लिए दबाव बनाया।
इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपित आसिफ अंसारी, रजा मेमन, तौसीफ अत्तार और शाहरुख कुरैशी की जमानत याचिकाएँ भी खारिज कर दी थीं।
पीड़िता की आपबीती, लगातार उत्पीड़न और चैनानी की संवेदनहीनता
हिंदू पीड़िता TCS में एक एसोसिएट के तौर पर काम करती थी और टीम लीडर रजा मेमन के अधीन थी। मई 2023 में मेमन ने ट्रेनिंग एरिया में अकेली मौजूद पीड़िता से संपर्क किया और निजी सवाल पूछकर उससे नजदीकियाँ बढ़ाने की कोशिश की। वह उसे वर्ड पजल हल करने के लिए देता और कहता कि इसे किसी को न बताए।
उसकी हरकतों से पीड़िता असहज महसूस करने लगी। आरोप है कि मेमन उसे अजीब तरीके से घूरता था, जबरन बातचीत करने की कोशिश करता था और ऑफिस में अकेले होने पर अनुचित तरीके से छूता था। पीड़िता ने मौखिक रूप से क्वालिटी और ट्रेनिंग मैनेजर को इसकी जानकारी दी।
मैनेजर ने उसे सावधान रहने की सलाह दी और कहा कि मेमन अच्छा इंसान नहीं है। एक अन्य टीम लीडर निताली जगजाप ने भी उसे अकेले न रहने और हमेशा ग्रुप में रहने की सलाह दी। जब मेमन को इसकी जानकारी हुई तो उसने बदला लेने के लिए पीड़िता का नाम उसके पुरुष सहकर्मी अभिषेक के साथ जोड़ना शुरू कर दिया।
वह दोनों के अफेयर की अफवाह फैलाने लगा। पिछले नवंबर में पीड़िता की शादी हुई थी। वह लंच के बाद ऑफिस में आराम कर लिया करती थी। तब मेमन उसकी शादीशुदा जिंदगी और निजी संबंधों को लेकर भद्दे सवाल पूछता था। फरवरी में जब पीड़िता ने गोवा जाने के लिए छुट्टी माँगी तो उसने पूछा कि क्या वह शराब पीती है और क्या हनीमून मनाने जा रही है।
पीड़िता ने बताया कि वह उसे सिर से पाँव तक घूरता था और उसकी हरकतें साफ तौर पर यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आती थीं। आरोप यह भी है कि मेमन जानबूझकर उस पर काम का दबाव बढ़ाता था ताकि उसे मानसिक रूप से परेशान किया जा सके। परेशान होकर पीड़िता ने ऑफिस हेड अश्विनी चैनानी से शिकायत की।
आदेश में कहा गया है, “रजा मेमन, दानिश और तौशीफ, जो उसके उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार थे, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने की बजाय चैनानी ने पीड़िता से पूछा कि वह हमेशा ‘हाइलाइट’ में क्यों रहना चाहती है और उसे आरोपितों को छोड़ देने के लिए कहा। कोर्ट ने कहा कि चैनानी के इस रवैये ने आरोपियों का मनोबल बढ़ाया और उनका उत्पीड़न जारी रहा।
19 मार्च को गुड़ी पड़वा के दिन पीड़िता साड़ी पहनकर ऑफिस गई थी। आरोप है कि शाहरुख नामक कर्मचारी ने उसे अश्लीलता से देखा जिससे वह शर्मिंदा महसूस करने लगी। पीड़िता ने पहले भी चैनानी से उसकी शिकायत की थी, लेकिन उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया, जिससे आरोपित और ज्यादा बेखौफ हो गए।
कोर्ट ने चैनानी के बचाव के तर्कों को किया खारिज
चैनानी की ओर से कोर्ट में कहा गया कि उन्हें केवल इसलिए इस मामले में घसीटा गया क्योंकि उन्होंने मौखिक शिकायतों पर उचित प्रतिक्रिया नहीं दी। उनका दावा था कि वे पुणे ऑफिस में तैनात थीं और नासिक ऑफिस का रोजमर्रा का काम उनके सीधे नियंत्रण में नहीं था। इसलिए उन्हें घटनाओं की जानकारी नहीं थी और न ही उन्हें कोई लिखित शिकायत मिली।
उन्होंने यह भी कहा कि वे जाँच में सहयोग कर रही हैं और 26 जून को उनके बेटे की शादी है। वहीं महाराष्ट्र सरकार की ओर से कहा गया कि चैनानी ने पीड़िता की मौखिक शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया, जिसके कारण आरोपितों की हरकतें लगातार जारी रहीं। सरकार ने आशंका जताई कि जमानत मिलने पर वह गवाहों को प्रभावित कर सकती हैं और सबूतों से छेड़छाड़ हो सकती है।
चैनानी ने यह भी सवाल उठाया कि जयेश और निताली जगजाप के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इस पर कोर्ट ने कहा कि दोनों ने पीड़िता को आरोपित से सावधान रहने और अकेले न रहने की सलाह दी थी, जबकि चैनानी ने शिकायत को ही दबाने की कोशिश की। कोर्ट ने साफ कहा कि POSH कमेटी की सदस्य होने के नाते शिकायत मिलने पर कार्रवाई करना चैनानी की जिम्मेदारी थी।
कोर्ट ने मामले की गंभीरता बताते हुए कहा कि आरोपित पीड़िता से निजी सवाल पूछते थे, अश्लील टिप्पणियाँ करते थे और उसकी शादीशुदा जिंदगी, नींद, हनीमून और शराब पीने की आदत तक पर सवाल उठाते थे। FIR के मुताबिक, शाहरुख और मेमन उसे गलत नीयत से सिर से पाँव तक घूरते थे।
उन्होंने उसका पीछा भी किया, गुड़ी पड़वा पर साड़ी पहनने के बाद उसकी खूबसूरती पर भद्दी टिप्पणियाँ भी की गईं। जाँच में सामने आया कि कार्यस्थल के खराब माहौल से परेशान होकर पीड़िता ने मार्च 2026 में नौकरी छोड़ दी, जिसके बाद औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई।
कोर्ट ने कहा कि चैनानी ने POSH कमेटी सदस्य होने के बावजूद पीड़िता की शिकायतों के प्रति असंवेदनशील रवैया अपनाया। उन्होंने न केवल आरोपितों को बचाया बल्कि उन्हें यौन उत्पीड़न जारी रखने के लिए उकसाया भी।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि चैनानी ने हालात बिगड़ने का इंतजार किया लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने आँख और कान बंद कर लिए, जबकि सब कुछ उनके सामने हो रहा था। कोर्ट ने यह भी कहा कि पहली FIR दर्ज होने के बाद भी उन्होंने नासिक ऑफिस जाकर हालात की समीक्षा नहीं की।
कोर्ट ने कहा कि शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी के लिए पीड़िता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसने तुरंत चैनानी को परिस्थितियों के बारे में सूचित कर दिया था।
शिकायत में देरी के पीछे कोर्ट ने मानी उचित वजह
कोर्ट ने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 की धारा 9 के अनुसार यदि महिला लिखित शिकायत नहीं कर पाती तो इंटरनल कमेटी का सदस्य उसकी मदद करेगा। ऐसे में शिकायत लिखित न होने को आधार बनाना गलत है।
कोर्ट ने कहा कि शिकायत उन्हीं लोगों के माध्यम से आगे बढ़नी थी जो खुद आरोपित थे और पीड़िता उन्हीं के अधीन काम करती थी। वह साधारण परिवार से आती है और आर्थिक मजबूरी में नौकरी कर रही थी। ऐसे में अपने वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ शिकायत करने से उसके करियर और नौकरी पर असर पड़ने का डर स्वाभाविक था।
कोर्ट ने यह भी माना कि यौन उत्पीड़न के आरोप सामने आने पर परिवार और पति भी उस पर नौकरी छोड़ने का दबाव डाल सकते थे। इसलिए शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी को परिस्थितियों के अनुसार उचित माना गया। जाँच एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि चैनानी जाँच में सहयोग नहीं कर रही थीं। इसी वजह से उन्हें गिरफ्तार किया गया।
चैनानी ने अपने बचाव में एक पुराने केस का हवाला दिया जिसमें एक प्रिंसिपल के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी गई थी। लेकिन कोर्ट ने कहा कि उस मामले में प्रिंसिपल के खिलाफ आरोपी की मदद या सहयोग करने के सबूत नहीं थे, जबकि इस मामले में चैनानी के खिलाफ स्पष्ट सबूत मौजूद हैं।
कोर्ट ने कहा कि पीड़िता द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत किए जाने के बावजूद POSH कमेटी सदस्य होने के बाद भी चैनानी ने शिकायत को नजरअंदाज किया और पीड़िता पर आरोपितों को छोड़ देने का दबाव बनाया। यह साफ तौर पर आरोपितों की मदद करने जैसा है।
कोर्ट ने कहा कि जाँच अभी शुरुआती चरण में है और आरोपित प्रभावशाली हैं। ऐसे में जमानत मिलने पर गवाहों को प्रभावित करने और सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका है। इसी आधार पर जमानत याचिका खारिज कर दी गई।
NCW की रिपोर्ट में भी सामने आया था कार्यस्थल का खराब माहौल और ‘जीरो POSH अनुपालन’
11 मई को राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने बताया था कि महाराष्ट्र सरकार को इस मामले की जाँच करने वाली फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी गई है। रिपोर्ट में नासिक ऑफिस के माहौल को बेहद जहरीला और परेशान करने वाला बताया गया।
इसमें लगातार बुलिंग, यौन उत्पीड़न, अधिकारों के दुरुपयोग और महिला कर्मचारियों के खिलाफ हिंदू विरोधी टिप्पणियों का जिक्र किया गया। कमेटी ने कहा कि नासिक ऑफिस में POSH कानून का सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक पुणे और नासिक ऑफिस के लिए एक ही इंटरनल कमेटी बनाई गई थी, जो नियमों के खिलाफ है।
इतना ही नहीं, इंटरनल कमेटी के सदस्य कभी नासिक ऑफिस का निरीक्षण करने भी नहीं पहुँचे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ऑफिस में POSH नियमों से जुड़े पोस्टर, बोर्ड या जानकारी तक मौजूद नहीं थी। कर्मचारियों को नियमों और शिकायत प्रक्रिया के बारे में जागरूक करने के लिए कोई अभियान नहीं चलाया गया।
इंटरनल कमेटी के सदस्यों को लेकर भी कोई ट्रेनिंग या जागरूकता कार्यक्रम नहीं था। कमेटी ने निष्कर्ष निकाला कि ऑफिस में POSH कानून का ‘जीरो कंप्लायंस’ था।
कोर्ट के ताजा आदेश ने भी यह दिखा दिया कि कंपनी की व्यवस्था कितनी कमजोर और समझौता करने वाली थी। जिन लोगों पर हिंदू महिला कर्मचारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी, वही उनकी शिकायतों को दबाने और आरोपितों को बचाने में लगे हुए थे।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने एक नया फैमिली लॉ लागू किया है और इस कानून की एक लाइन को लेकर पूरी दुनिया में बहस शुरू हो गई है। इस नए नियम में कहा गया है कि अगर कोई ‘कुँवारी लड़की’ (वर्जिन लड़की) निकाह के प्रस्ताव पर कुछ नहीं बोलती, तो उसकी चुप्पी को ही उसकी मंजूरी यानी कंसेंट माना जाएगा। यही वजह है कि मानवाधिकार संगठन, महिला अधिकार कार्यकर्ता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इसे औरतों और बच्चियों की आजादी पर एक और बड़ा हमला बता रही हैं।
क्या है तालिबान का नया फैमिली लॉ?
तालिबान ने 31 आर्टिकल वाला एक नया फैमिली रेगुलेशन जारी किया है, जिसका नाम ‘प्रिंसिपल्स ऑफ सेपरेशन बिटवीन स्पाउसेस’ रखा गया है। इसे तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने मंजूरी दी है। यह कानून निकाह, तलाक, नाबालिगों का निकाह, मियां-बीवी के अलगाव और पारिवारिक विवादों से जुड़े नियम तय करता है। लेकिन सबसे विवादित हिस्सा वही है, जिसमें ‘कुँवारी लड़की’ की चुप्पी को उसकी मंजूरी माना गया है।
क्या है ‘खियार अल बुलूघ’ का नियम?
इस कानून में ‘खियार अल बुलूघ‘ नाम का एक इस्लामी कानूनी सिद्धांत भी शामिल किया गया है। इसका मतलब है ‘बालिग होने के बाद चुनने का अधिकार।’ इसके तहत अगर किसी बच्चे का निकाह कम उम्र में तय कर दिया गया है, तो वह बालिग होने के बाद उस निकाह को खत्म करने की माँग कर सकता है।
लेकिन यहाँ एक बड़ी शर्त भी रखी गई है। निकाह खत्म करने के लिए मजहबी अदालत की मंजूरी जरूरी होगी। यानी सिर्फ लड़की की इच्छा से निकाह खत्म नहीं होगा, बल्कि तालिबान की अदालत फैसला करेगी कि निकाह रद्द किया जाए या नहीं।
कानून में यह भी कहा गया है कि अगर शौहर निकाह के लिए सही नहीं माना जाता या दहेज को लेकर बहुत ज्यादा फर्क होता है, तो उस निकाह को मान्यता नहीं दी जाएगी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि कौन ‘सही लड़का है’, इसका फैसला भी तालिबान की मजहबी अदालतें ही करेंगी।
नाबालिग बच्चों के निकाह को लेकर क्या कहता है कानून?
इस नए कानून में ‘बाल विवाह’ को लेकर कहा गया है कि कुछ परिस्थितियों में नाबालिग लड़के और लड़कियों के निकाह को मान्यता दी जा सकती है। कानून में अब्बा और दादा को बच्चों का निकाह तय करने का अधिकार दिया गया है। यानी परिवार के बड़े पुरुष यह फैसला कर सकते हैं कि लड़की का निकाह किससे और कब होगा।
कानून में यह भी कहा गया है कि अगर रिश्तेदारों द्वारा तय किए गए निकाह में लड़का ‘सामाजिक रूप से उपयुक्त’ माना जाता है और दहेज भी मजहबी मानकों के मुताबिक है, तो उस निकाह को वैध माना जा सकता है। आसान भाषा में कहें तो अगर परिवार और मजहबी अदालत को रिश्ता सही लगता है, तो कम उम्र में हुए निकाह भी स्वीकार किए जा सकते हैं।
निजी जिंदगी में भी बढ़ेगा तालिबान सरकार का दखल
इस कानून में सिर्फ निकाह ही नहीं बल्कि कई निजी मामलों में भी तालिबान की अदालतों को हस्तक्षेप का अधिकार दिया गया है। अगर किसी औरत पर व्यभिचार यानी अवैध संबंध का आरोप लगाता है, अगर कोई धर्म परिवर्तन करता है, अगर शौहर लंबे समय तक गायब रहता है या ‘जिहार’ जैसी स्थिति बनती है, तो तालिबानी जज फैसला ले सकेंगे।
‘जिहार’ इस्लामी कानून का एक पुराना सिद्धांत है जिसमें शौहर अपनी बीवी की तुलना ऐसी औरत रिश्तेदार से करता है जिससे निकाह करना मजहबी रूप से मना होता है। ऐसे मामलों में अदालत मियां-बीवी को अलग करने, जेल भेजने या दूसरी सजा देने का आदेश भी दे सकती है।
क्यों खतरनाक माना जा रहा कानून?
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि किसी भी निकाह में लड़की की साफ और खुली सहमति जरूरी होती है। लेकिन अफगानिस्तान में औरतों की स्थिति पहले ही बहुत कमजोर हो चुकी है। 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद लड़कियों की पढ़ाई छठी क्लास के बाद बंद कर दी गई। औरतों को यूनिवर्सिटी जाने से रोक दिया गया। कई नौकरियों में औरतों के काम करने पर पाबंदी है और उनके अकेले यात्रा करने पर भी सख्त नियम लागू हैं।
ऐसे माहौल में अगर कोई लड़की डर, दबाव या परिवार की वजह से चुप रहती है, तो उसकी चुप्पी को ‘हाँ’ मान लेना जबरन निकाह का रास्ता खोल सकता है। जिस समाज में औरतों को खुलकर बोलने की आजादी ही नहीं हो, वहाँ ‘चुप्पी ही सहमति है’ जैसा नियम बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
दुनिया भर में हो रही कानून की आलोचना
एमनेस्टी इंटरनेशनल समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस कानून की आलोचना की है। उनका कहना है कि निकाह में सहमति हमेशा साफ, खुली और बिना दबाव के होनी चाहिए। किसी लड़की का डर या मजबूरी में चुप रहना सहमति नहीं माना जा सकता।
कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि तालिबान जिस तरह इन नियमों को मजहबी आधार पर सही ठहराने की कोशिश कर रहा है, वह इस्लाम की आधुनिक और व्यापक व्याख्याओं से मेल नहीं खाता। उनके मुताबिक मजहब के नाम पर औरतों की आवाज दबाना और उन्हें फैसले लेने के अधिकार से दूर रखना मानवाधिकारों के खिलाफ है।
यही कारण है कि तालिबान का यह नया कानून सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि अब इसे दुनिया भर में औरतों की आजादी और अधिकारों से जुड़े बड़े सवाल के तौर पर देखा जा रहा है।
लड़कियों की ‘चुप्पी’ पर तालिबान का कानून, लेकिन लिबरल चेहरे खामोश क्यों?
यह कानून साफ तौर पर महिला विरोधी है। यह लड़कियों से उनका सबसे बुनियादी अधिकारी यानी उनकी शादी पर फैसला लेने का हक तक छीन लेता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि भारत में खुद को लिबरल, प्रोग्रेसिव और महिला अधिकारों का समर्थक बताने वाले कई नामी इस्लामी अकाउंट्स और एक्टिविस्ट इस मुद्दे पर चुप हैं।
ये वही लोग हैं जो भारत में किसी भी मुद्द पर तुरंत ट्वीट करते हैं, लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं और नारीवाद की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। विदेशी मजहबी मुल्कों में मुस्लिमों से जुड़ा कोई भी मामला हो, तो सबसे पहले यही लोग आवाज उठाते नजर आते हैं। लेकिन अफगानिस्तान में लड़कियों की पढ़ाई बंद कर दी जाए, महिलाओं को घरों तक सीमित कर दिया जाए और अब लड़की की चुप्पी को ही शादी की मंजूरी मान लिया जाए, तब इनकी टाइमलाइन लगभग खाली नजर आती है।
न कोई बड़ा कैंपेन दिखता है, न लगातार ट्वीट्स, न रीट्वीट और न ही वैसी नाराजगी, जैसी भारत के मामलों में दिखाई जाती है। कहीं ‘सेव वूमेन’ की बात नहीं होती, कहीं ‘फेमिनिज्म’ की बहस नहीं होती और न ही महिलाओं की आजादी पर लंबे थ्रेड लिखे जाते हैं।
यही दोहरापन सबसे ज्यादा सवाल खड़े करता है। अगर महिलाओं के अधिकार सच में सबसे ऊपर हैं, तो फिर अफगानिस्तान की लड़कियाँ भी उतनी ही अहम होनी चाहिए जितनी भारत की महिलाएँ। लेकिन अक्सर ऐसा लगता है कि कुछ लोगों की एक्टिविज्म और नारीवाद की आवाज सिर्फ चुनिंदा मुद्दों तक सीमित रह जाती है।
भारतीय कैलेंडर केवल त्योहारों की तारीख तय करने का माध्यम नहीं रहा है। हजारों वर्षों से यह समय, ऋतुओं के बदलाव, सूर्य और चंद्रमा की गति और उनके जीवन पर प्रभाव को समझने की एक व्यवस्था भी रहा है। आज दुनिया का बड़ा हिस्सा ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ का उपयोग करता है, लेकिन भारत का पारंपरिक पंचांग समय की गणना का अलग तरीका अपनाता है, जिसमें सूर्य और चंद्रमा दोनों की चाल को महत्व दिया जाता है।
इसी कारण भारतीय पंचांग को ‘लूनीसोलर सिस्टम’ यानी चंद्र-सौर प्रणाली कहा जाता है। इस व्यवस्था का सबसे रोचक हिस्सा है ‘अधिक मास’, जिसे ‘पुरुषोत्तम मास’ भी कहा जाता है। यह एक अतिरिक्त महीना होता है, जो कुछ वर्षों के अंतराल पर कैलेंडर का संतुलन बनाए रखने के लिए जोड़ा जाता है।
इस साल अधिक ज्येष्ठ मास शुरू हुआ है। इसके साथ ही फिर से लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि यह अतिरिक्त महीना क्यों आता है, हर साल क्यों नहीं आता, कभी अधिक ज्येष्ठ तो कभी अधिक श्रावण क्यों बनता है और इसे धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण मानने के बावजूद विवाह जैसे शुभ कार्य इस दौरान क्यों टाले जाते हैं।
इन सवालों का जवाब केवल पौराणिक कथाओं में नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान और गणित में भी छिपा है।
पश्चिमी कैलेंडर से अलग कैसे काम करता है भारतीय पंचांग?
दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला ग्रेगोरियन कैलेंडर केवल सूर्य की गति पर आधारित है। पृथ्वी को सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में लगभग 365 दिन और करीब 6 घंटे लगते हैं। इसी अतिरिक्त समय को संतुलित करने के लिए हर चार साल में एक अतिरिक्त दिन जोड़कर लीप ईयर बनाया जाता है।
भारतीय पंचांग का तरीका अलग है। इसमें सूर्य और चंद्रमा दोनों को महत्व दिया जाता है। महीनों की गणना मुख्य रूप से चंद्रमा की गति से होती है, जबकि सूर्य की चाल कैलेंडर को ऋतुओं से जोड़कर रखती है। यही कारण है कि पंचांग में केवल तारीखें ही नहीं, बल्कि तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण भी शामिल होते हैं, जिन्हें पंचांग के पाँच अंग कहा जाता है।
इस व्यवस्था में चंद्रमा महीनों को तय करता है, जबकि सूर्य ऋतुओं का संतुलन बनाए रखता है। प्राचीन भारतीय विद्वानों ने समझ लिया था कि अगर केवल चंद्र के महीनों के आधार पर कैलेंडर चलाया जाए, तो धीरे-धीरे त्योहार और ऋतुएँ एक-दूसरे से अलग हो जाएँगी। इसलिए एक सुधार प्रणाली की जरूरत थी।
चंद्र और सौर वर्ष के अंतर से पड़ी अधिक मास की जरूरत
चंद्रमा को पूर्णिमा से पूर्णिमा तक एक चक्र पूरा करने में लगभग 29.5 दिन लगते हैं। ऐसे 12 चंद्र मास मिलकर करीब 354 दिनों का एक चंद्र वर्ष बनाते हैं। वहीं सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का होता है। यानी दोनों के बीच हर साल करीब 11 दिनों का अंतर बन जाता है। अगर इस अंतर को ठीक न किया जाए, तो धीरे-धीरे कैलेंडर ऋतुओं से अलग होने लगेगा।
समय के साथ त्योहार अपने तय मौसमों से हट जाएँगे। ऐसा भी हो सकता है कि सर्दियों के त्योहार गर्मियों में आने लगें या फसल से जुड़े पर्व दूसरी ऋतुओं में पहुँच जाएँ। प्राचीन भारतीय खगोलविदों ने इस समस्या को बहुत पहले समझ लिया था और इसका समाधान निकाला। जब यह अंतर काफी बड़ा हो जाता है, तब एक पूरा अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है।
लगभग 32 महीने बाद ही क्यों आता है अधिक मास?
चूँकि चंद्र और सौर वर्ष के बीच हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, इसलिए करीब तीन साल में यह अंतर 33 दिनों के आसपास पहुँच जाता है, जो लगभग एक चंद्र महीने के बराबर है। इसी वजह से लगभग 32 महीने 16 दिन और कुछ घंटों के बाद एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। यही अधिक मास कहलाता है।
यह पश्चिमी लीप ईयर सिस्टम से अलग है। ग्रेगोरियन कैलेंडर में हर चार साल में केवल एक दिन जोड़ा जाता है, जबकि भारतीय पंचांग में पूरा महीना जोड़ा जाता है, क्योंकि यहाँ केवल दिनों का नहीं बल्कि चंद्र और सौर चक्रों के संतुलन का सवाल होता है। यह व्यवस्था प्राचीन भारतीय समय गणना की गहराई को दिखाती है।
आधुनिक उपकरणों के बिना भी विद्वानों ने ऐसा सिस्टम बनाया, जिसने त्योहारों, ऋतुओं और खगोलीय चक्रों को एक साथ जोड़े रखा।
कैसे तय होता है कौन-सा महीना बनेगा अधिक मास?
बहुत से लोग सोचते हैं कि अधिक मास हर तीन साल में आने वाला एक तय अतिरिक्त महीना है, लेकिन इसकी गणना इससे कहीं ज्यादा जटिल होती है। इसे तय करने में संक्रांति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। संक्रांति का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना।
सामान्य रूप से हर चंद्र महीने में सूर्य एक नई राशि में प्रवेश करता है और एक संक्रांति होती है। लेकिन अगर कोई चंद्र मास ऐसा गुजर जाए, जिसमें सूर्य किसी नई राशि में प्रवेश न करे, यानी उस पूरे महीने में कोई संक्रांति न हो, तो वही महीना अधिक मास बन जाता है। यही कारण है कि हर बार अधिक मास का नाम एक जैसा नहीं होता।
अगर यह स्थिति ज्येष्ठ महीने में बने, तो वह अधिक ज्येष्ठ कहलाता है। अगर श्रावण में बने, तो अधिक श्रावण कहा जाता है। इसी तरह अन्य महीने भी अधिक मास बन सकते हैं। इस साल यह स्थिति ज्येष्ठ महीने में बनी है, इसलिए इसे अधिक ज्येष्ठ कहा जा रहा है।
कभी अधिक ज्येष्ठ तो कभी अधिक श्रावण क्यों बनता है?
यह लोगों के बीच सबसे सामान्य सवालों में से एक है, क्योंकि अधिक मास को अक्सर केवल अधिक श्रावण से जोड़कर देखा जाता है। इसका जवाब फिर सूर्य और चंद्रमा की गति में ही छिपा है। चंद्र महीने अपनी गति से चलते रहते हैं, जबकि सूर्य अपनी अलग चाल से राशियों में आगे बढ़ता है।
कभी-कभी ऐसा होता है कि ज्येष्ठ के पूरे चंद्र महीने में सूर्य कोई नई राशि में प्रवेश नहीं करता। तब ज्येष्ठ अधिक ज्येष्ठ बन जाता है। दूसरी बार यही स्थिति श्रावण में बन सकती है, तब वह अधिक श्रावण कहलाएगा। यानी अतिरिक्त महीना किसी एक तय महीने से जुड़ा नहीं होता। यह पूरी तरह खगोलीय गणना और संक्रांति के नियमों पर निर्भर करता है।
इसी कारण कभी लोगों को अधिक ज्येष्ठ देखने को मिलता है और कभी अधिक श्रावण।
लोगों के बीच अधिक श्रावण की ज्यादा चर्चा क्यों होती है?
हालाँकि कोई भी महीना अधिक मास बन सकता है, लेकिन लोगों को अधिक श्रावण ज्यादा याद रहता है। इसकी वजह खगोल विज्ञान से ज्यादा सामाजिक और धार्मिक है। श्रावण या सावन का हिंदू परंपरा में विशेष महत्व है। यह भगवान शिव की उपासना से जुड़ा महीना माना जाता है।
कांवड़ यात्रा, सावन सोमवार, शिव मंदिरों में पूजा और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के कारण यह महीना सार्वजनिक जीवन में बेहद प्रमुख दिखाई देता है। जब अधिक श्रावण आता है, तो सोमवारों और धार्मिक अनुष्ठानों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे लोगों का ध्यान इस ओर ज्यादा जाता है।
उदाहरण के तौर पर अधिक श्रावण के दौरान आठ सावन सोमवार और नौ मंगल गौरी व्रत तक पड़ सकते हैं। इसी वजह से कई लोगों को लगने लगा कि अधिक मास का मतलब हमेशा अतिरिक्त श्रावण ही होता है, जबकि ऐसा नहीं है।
श्रावण, चातुर्मास और विस्तारित पूजा-अर्चना
श्रावण को चातुर्मास का पहला महीना माना जाता है। चातुर्मास में श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक शामिल होते हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए श्रावण महीने में कठोर तप और व्रत किए थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनकी इच्छा स्वीकार की।
इसी कारण श्रावण महीना शिव और पार्वती की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। अधिक श्रावण के दौरान यह महीना लंबा हो जाता है। भक्त भगवान शिव के लिए सोमवार का व्रत रखते हैं और मंगलवार को माता पार्वती की पूजा करते हैं। महिलाएँ परिवार की सुख-समृद्धि और लंबी आयु के लिए मंगल गौरी व्रत करती हैं।
बुधवार भगवान विट्ठल, गुरुवार गुरु, शुक्रवार माता लक्ष्मी और तुलसी, शनिवार शनि देव और रविवार सूर्य देव को समर्पित माना जाता है। इस दौरान भगवान शिव का अभिषेक भी किया जाता है। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से पूजा होती है। बेलपत्र चढ़ाए जाते हैं और महामृत्युंजय मंत्र, गायत्री मंत्र तथा रुद्र गायत्री का जाप किया जाता है।
कई लोग इस समय सात्विक जीवनशैली अपनाते हैं और मांसाहार, शराब व तंबाकू जैसी चीजों से दूरी बनाते हैं।
अलग-अलग कैलेंडर परंपराओं से भी बदलती हैं श्रावण की तारीखें
श्रावण को लेकर भ्रम की एक वजह भारत में मौजूद दो अलग-अलग चंद्र कैलेंडर परंपराएँ भी हैं। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में पूर्णिमांत पंचांग का पालन होता है, जिसमें महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है।
वहीं महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में अमांत प्रणाली ज्यादा प्रचलित है, जिसमें महीना अमावस्या पर समाप्त होता है। इसी अंतर के कारण अलग-अलग राज्यों में श्रावण की तारीखें बदल सकती हैं, हालांकि धार्मिक महत्व लगभग समान रहता है।
मलमास से पुरुषोत्तम मास तक की पौराणिक कथा
अधिक मास का धार्मिक और पौराणिक महत्व भी काफी बड़ा है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में बताया गया है कि पहले इस अतिरिक्त महीने को मलमास कहा जाता था। कथा के अनुसार जब यह अतिरिक्त महीना बना, तब बाकी बारह महीनों ने इसे स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इसका संबंध किसी संक्रांति से नहीं था। इसे उपेक्षित और महत्वहीन माना गया।
यहाँ ‘मल’ शब्द का अर्थ गंदगी नहीं बल्कि उपेक्षित या छोड़ा हुआ था। अपमानित होकर यह महीना भगवान विष्णु के पास पहुँचा और अपना दुःख बताया। तब भगवान विष्णु ने इसे अपनाया और अपना एक पवित्र नाम ‘पुरुषोत्तम’ इसे दे दिया, जिसका अर्थ है सर्वोच्च पुरुष। तभी से मलमास पुरुषोत्तम मास कहलाने लगा और इसे विशेष आध्यात्मिक महत्व प्राप्त हुआ।
यह कथा यह संदेश भी देती है कि जिसे समाज कभी महत्वहीन समझे, वही आगे चलकर सम्मान और आदर प्राप्त कर सकता है।
पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व
पुरुषोत्तम मास का वैष्णव परंपरा में विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और उनके विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। भक्त भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं। कई मंदिरों में कथा, भजन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में चले जाते हैं, जबकि भगवान शिव सृष्टि के कार्यों का संचालन संभालते हैं। इसे पुराने चक्रों के समाप्त होने और नए बदलावों के आने के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।
इस दौरान क्यों टाले जाते हैं विवाह और नए काम?
हालाँकि पुरुषोत्तम मास को पवित्र माना जाता है, लेकिन इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मूर्ति स्थापना और नए व्यापार जैसे शुभ कार्य अक्सर टाल दिए जाते हैं। परंपरागत रूप से इस महीने को आत्मचिंतन और भक्ति का समय माना गया।
इसे वार्षिक चक्र के बीच एक ठहराव की तरह देखा गया, जहाँ सामाजिक उत्सवों की बजाय पूजा, दान, ध्यान और साधना को महत्व दिया गया। यही वजह है कि इस महीने का सम्मान भी किया जाता है और बड़े मांगलिक कार्यों से इसे अलग भी रखा जाता है।
सामाजिक जीवन और खेती-किसानी में भी थी अधिक मास की भूमिका
इतिहास में पंचांग केवल मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं था। यह खेती, यात्रा, त्योहारों और दैनिक जीवन को भी प्रभावित करता था। इसलिए अधिक मास जैसी व्यवस्थाएँ ऋतुओं और सामाजिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद करती थीं।
अलग-अलग क्षेत्रों में इस महीने से जुड़ी अपनी परंपराएँ विकसित हुईं। कहीं दान-पुण्य को महत्व मिला, कहीं भागवत कथा आयोजित की गई, तो कहीं भगवान विष्णु की पूजा पर विशेष जोर दिया गया। इस तरह अधिक मास केवल गणितीय सुधार नहीं बल्कि सांस्कृतिक जीवन का भी हिस्सा बन गया।
अधिक मास- विज्ञान और आस्था के मिलन का प्रतीक
आज के समय में विज्ञान और आस्था को अक्सर एक-दूसरे के विरोध में देखा जाता है, लेकिन अधिक मास एक अलग तस्वीर पेश करता है। इसकी शुरुआत एक खगोलीय समस्या के समाधान के रूप में हुई थी, जहाँ चंद्र और सौर वर्षों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत थी। बाद में इसके साथ धार्मिक मान्यताएँ और सांस्कृतिक परंपराएँ जुड़ती चली गईं।
इसी कारण अधिक मास आज खगोल विज्ञान, कैलेंडर गणना, पौराणिक कथाओं और सामाजिक परंपराओं के संगम का प्रतीक बन चुका है। यह महीना याद दिलाता है कि भारतीय समय गणना केवल दिनों की गिनती तक सीमित नहीं थी। इसमें ग्रहों की चाल, ऋतुएँ, खेती, त्योहार और मानव जीवन, सबको एक साथ जोड़ने की कोशिश की गई थी।
शायद यही वजह है कि हजारों साल पुरानी यह परंपरा आज भी लोगों के जीवन में उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई है।
यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूरोप के चार देशों के दौरे पर हैं। रविवार (17 मई 2026) को वे नीदरलैंड्स पहुँचे, जहाँ उन्होंने प्रधानमंत्री रॉब जेटन से मुलाकात की। इस दौरे के दौरान उन्होंने नीदरलैंड्स में दुनिया भर में मशहूर अफ्सलुइटडिज्क डैम का दौरा किया। इसका सीधा कनेक्शन गुजरात के कल्पसर प्रोजेक्ट से है।
अपने बाढ़ कंट्रोल और फ्रेश वॉटर मैनेजमेंट सिस्टम के लिए दुनिया का ध्यान खींचने वाले डैम का दौरा करने के बाद प्रधानमंत्री ने X पर लिखा, ‘वॉटर रिसोर्स एक ऐसा एरिया है जिसमें नीदरलैंड्स ने बहुत काम किया है। पूरी ग्लोबल कम्युनिटी इस मामले में नीदरलैंड्स से बहुत कुछ सीख सकती है। आज मुझे अफ्सलुइटडिज्क डैम का दौरा करने और इसकी खासियतों के बारे में जानने का मौका मिला।’
Een gebied waarop Nederland baanbrekend werk heeft verricht, is waterbeheer. De hele internationale gemeenschap kan hier veel van leren.
Vanmorgen heb ik de kans gehad om de Afsluitdijk te bezoeken en inzicht te krijgen in de belangrijkste kenmerken van dit project. Ik ben… pic.twitter.com/idjsR9SuJv
उन्होंने कहा कि हम इंडिया में मॉडर्न टेक्नोलॉजी लाने के लिए वचनबद्ध हैं, जिसका मकसद सिंचाई, बाढ़ से बचाव और इनलैंड वॉटरवे नेटवर्क को बढ़ाने में मदद करना है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने कुछ तस्वीरें भी शेयर कीं, जिनमें वे नीदरलैंड के प्रधानमंत्री और दूसरे अधिकारियों के साथ बांध का दौरा करते और उसके बारे में समझते हुए देखे जा सकते हैं।
PM मोदी के विदेश दौरे सिर्फ़ दौरे नहीं होते। ऐसे हर दौरे से देश को फ़ायदा पहुंचाने वाले कई फ़ैसले होते हैं, कई नई पहल होती हैं, और विदेशों में सफल रही टेक्नोलॉजी और पॉलिसी को भारत लाने का रास्ता खुलता है। नीदरलैंड में इस अजीब नाम वाले डैम का प्रधानमंत्री का दौरा भी ऐसे ही दौरों में से एक है और इसका सीधा कनेक्शन गुजरात के कल्पसर प्रोजेक्ट से है, जो अगर लागू हो गया तो यह भारत का सबसे बड़ा वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट होगा।
नीदरलैंड में यह अफस्लुइटडिज्क डैम क्या है?
यह 32 किलोमीटर लंबा डैम, जो नीदरलैंड की पहचान है, नॉर्थ सी और इज़्सेलमीर मीठे पानी की झील को अलग करता है। इंजीनियरिंग का कमाल, यह डैम नीदरलैंड के निचले इलाकों को बाढ़ से भी बचाता है। इसे 1932 में बनाया गया था। उससे पहले, नीदरलैंड मेनलैंड और नॉर्थ सी के बीच का इलाका खुला रहता था और बाढ़ का पानी शहरों में घुस जाता था। 8 दशक पहले बने इस डैम ने इस समस्या का पक्का समाधान दिया है।
हालांकि, इसका काम यहीं तक सीमित नहीं है। इसके बनने से एक नेचुरल झील भी बनी, जिसका पानी इस्तेमाल किया जा सकता है। ट्रांसपोर्ट का रास्ता भी खुल गया है। इसके साथ ही, रिन्यूएबल एनर्जी बनाकर भी फ़ायदा उठाया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट के बाद नई ज़मीन तैयार हुई और वहां खेती शुरू हुई, जो भी एक फ़ायदा है।
आसान शब्दों में कहें तो यह प्रोजेक्ट दुनिया के सबसे सफल वॉटर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट्स में से एक है। अभी इस डैम को मॉडर्न बनाने का काम चल रहा है, जिसमें एडवांस्ड वॉटर डिस्चार्ज सिस्टम, फिश माइग्रेशन कॉरिडोर, स्टॉर्म प्रोटेक्शन सिस्टम वगैरह भी जोड़े जाएंगे। वहां की सरकार का कहना है कि इस सारे काम में 800 मिलियन पाउंड का खर्च आएगा।
PM मोदी के इस डैम पर जाने के पीछे वजह यह है कि भारत सरकार जानना चाहती है कि क्या यह डच वॉटर मैनेजमेंट मॉडल भारत में असरदार होगा और अगर होगा, तो इसका कितना इस्तेमाल किया जा सकता है। नीदरलैंड्स के पास बाढ़ कंट्रोल, समुद्री पानी के मैनेजमेंट, मीठे पानी के स्टोरेज सिस्टम वगैरह में दशकों का अनुभव है।
भारत भी अभी कुछ इलाकों में बाढ़, पानी की कमी, समुद्र का लेवल बढ़ना, क्लाइमेट चेंज वगैरह जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है। सरकार जानना चाहती है कि भविष्य में सरकार इन समस्याओं को हल करने के लिए जो वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स शुरू करेगी, उनमें इस डच मॉडल का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।
कल्पसर प्रोजेक्ट में डच मॉडल काम आ सकता है
ऐसा ही एक प्रोजेक्ट गुजरात में पहले से ही पाइपलाइन में है – कल्पसर प्रोजेक्ट। कल्पसर प्रोजेक्ट के आइडिया के बीज दशकों पहले बोए गए थे। इसका बेसिक आइडिया गुजरात में खंभात की खाड़ी में भावनगर और भरूच के बीच एक डैम बनाकर मीठे पानी का एक नया रिज़र्वॉयर बनाना और समुद्र के पानी को खाड़ी में जाने से रोकना है। यह प्रोजेक्ट सौराष्ट्र और साउथ गुजरात को जोड़ेगा।
इस प्रोजेक्ट के कई मकसद हैं। डैम बनने से मीठे पानी का एक रिजर्व बन जाएगा और अरब सागर में गिरने वाले नदी के पानी को समुद्र में जाने से पहले स्टोर किया जाएगा। डैम से भावनगर और सौराष्ट्र के आस-पास के इलाकों में पानी की कई गंभीर समस्याओं का स्थाई समाधान हो जाएगा। यह पानी कच्छ तक पहुँचाया जा सकता है, जो अभी नर्मदा कैनाल के जरिए किया जाता है। इसके अलावा, इस पानी का इस्तेमाल सौराष्ट्र-दक्षिण गुजरात के इलाकों में खेती और सिंचाई के लिए किया जा सकता है।
यह प्रोजेक्ट बाढ़ कंट्रोल में भी कारगर साबित होगा। इससे पानी के बहाव को कंट्रोल किया जा सकेगा।
इस प्रोजेक्ट में डैम पर 10-लेन का ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर बनाने का भी प्रस्ताव है, जिससे भावनगर और भरूच के बीच 300 किलोमीटर की मौजूदा दूरी कम हो जाएगी और सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात सीधे जुड़ जाएँगे।
कल्पसर प्रोजेक्ट 70 के दशक से ही चर्चा में है। शुरुआत में, इसे टाइडल एनर्जी बनाने की जगह के तौर पर प्रस्तावित किया गया था, लेकिन बाद में बाढ़ कंट्रोल, मीठे पानी के स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट पर ध्यान दिया गया। पिछले कुछ सालों में प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत भी बढ़ी है। इसकी लागत लगभग 85,000 से 90,000 करोड़ रुपए होने का अनुमान है।
प्रोजेक्ट के लिए जमीन पर काम अभी शुरू नहीं हुआ है। सरकार ने हाल ही में हुए विधानसभा में कहा कि कल्पसर प्रोजेक्ट अभी डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट को फाइनल करने के स्टेज में है। DPR के बाद इसे राज्य और केंद्र की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। इस प्रोजेक्ट के लिए इंटरनेशनल एक्सपर्ट्स ने 43 अलग-अलग तकनीकी पहलू से स्टडी की हैं, जिनमें से 25 से ज्यादा स्टडी पूरी हो चुकी हैं।
सरकार का कहना है कि प्रोजेक्ट शुरू होने के लगभग आठ साल में काम पूरा हो जाएगा, लेकिन प्रोजेक्ट के बड़े आकार और चुनौतियों को देखते हुए इसे बनाने में ही 12-15 साल लगेंगे। अनुमान है कि पूरे प्रोजेक्ट के शुरू होने से लेकर इसके पूरा होने तक दो दशक लग जाएँ।
कल्पसर और नीदरलैंड्स के इस डैम में कई समानताएँ हैं। भौगोलिक स्थितियाँ भी एक जैसी हैं। नीदरलैंड्स के डैम को देख और समझकर कल्पसर प्रोजेक्ट में आने वाली चुनौतियों का हल ढूँढा जा रहा है। इसमें डच सरकार और उसके एक्सपर्ट्स का टेक्निकल सपोर्ट भारत और गुजरात के लिए बहुत अहम है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के दौरान भारत और नीदरलैंड्स के बीच एक एग्रीमेंट साइन हुआ है, जिसके तहत नीदरलैंड्स, कल्पसर और ऐसे दूसरे प्रोजेक्ट्स के लिए डैम बनाने, कोस्टल इंजीनियरिंग, फ्लड कंट्रोल सिस्टम, वॉटर मैनेजमेंट और दूसरे तकनीकी जानकारियों से भारत की मदद करेगा।
नीदरलैंड ने दशकों पहले वॉटर मैनेजमेंट के क्षेत्र में काफी काम किया था। भारत भी अब इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है और इसका सेंटर गुजरात बनने जा रहा है। यह पक्का है कि PM मोदी के नीदरलैंड्स दौरे और इस डैम के दौरे के बाद दोनों देशों के बीच साइन हुआ एग्रीमेंट स्वदेशी प्रोजेक्ट को गति देगा। दरअसल पीएम मोदी का दौरा सिर्फ देश के हित को साधने के लिए किया जाता है। इससे भी साफ होता है।
(यह लेख गुजराती में लिखी गई है। मूलरूप को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
स्वीडन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रतिष्ठित ‘रॉयल ऑर्डर ऑफ द पोलर स्टार कमांडर ग्रैंड क्रॉस’ से सम्मानित किया है। यह किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष या सरकार के प्रमुख को दिया जाने वाला स्वीडन का सर्वोच्च शाही सम्मान है। वहीं प्रधानमंत्री मोदी को मिलने वाला यह 31वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मान है। ये सम्मान भारत की 140 करोड़ जनता का भी है, जैसा पीएम अक्सर बोलते हैं। इन सबसे अहम ये है कि पीएम मोदी के इन दौरों ने भारत को कितना फायदा हुआ।
पीएम मोदी के दौरे से देश को फायदा
यूरोपीय देश नीदरलैंड के बाद स्वीडन पहुँचे पीएम मोदी के दौरे पर दुनिया की नजर है। स्वीडन के साथ व्यापार, तकनीक, रक्षा और ग्रीन एनर्जी जैसे कई मुद्दों पर नए समझौते होने की उम्मीद है। यूरोपीय यूनियन के साथ मुक्त व्यापार समझौता हो चुका है। ऐसे में स्वीडन और भारत अगले 5 सालों में द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को दोगुना करने पर सहमत हो गए हैं।
साइबर सुरक्षा, एआई प्रबंधन, सेमीकंडक्टर और संयुक्त नौसेना अभ्यास पर सहमत हैं। यूरोपीय यूनियन के साथ भारत का मदर ऑफ ऑल डील्स को लागू करने पर भी सहमति बन गई है।
यूरोपीय देशों और अमेरिका के संबंधों में हाल में आई कड़वाहट के बाद यूरोपीय देश भारत जैसे देशों से उम्मीद कर रहे हैं। स्वीडन के साथ भारत के संबंध पहले से ही गहरे हैं। ऐसे में ये नई ऊँचाईयों को छू सकता है। यूरोपीय यूनियन के साथ भारत के मुक्त व्यापार डील को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जाता है। इसका स्वीडन पहले से अहम हिस्सा है। इस साल ये लागू होने वाला है।
इसके बाद व्यापार में काफी तरक्की होगी। भारतीय ज्वैलरी, चमड़े, कपड़े से लेकर दूसरे क्षेत्रों में एक बड़ा बाजार मिलने जा रहा है। स्वीडन से टेक्नोलॉजी भारत आएँगे।
हाई टेक्नोलॉजी और इनोवेशन में फायदा– स्वीडन दुनिया के सबसे इनोवेटिव देशों में एक माना जाता है। उसके साथ समझौते से भारत को एआई, साइबर सिक्योरिटी, ऑटोमेशन और डिजिटल टेक्नोलॉजी में सहयोग मिलेगा। भारतीय स्टार्टअप्स और टेक कंपनियों को यूरोपीय बाजार तक पहुँच आसान हो जाएगी।
रक्षा सहयोग- स्वीडन की कंपनियां एडवांस डिफेंस टेक्नोलॉजी में मजबूत हैं। फाइटर जेट, रडार, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और रक्षा निर्माण में सहयोग से भारत को फायदा होगा। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत संयुक्त उत्पादन को लेकर भी पीएम मोदी के यात्रा के दौरान सहमति बन गई है।
ग्रीन एनर्जी और क्लीन टेक- स्वीडन ग्रीन टेक्नोलॉजी में काफी आगे है। भारत के साथ सहयोग से ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, वेस्ट मैनेजमेंट,कार्बन कटौती तकनीक में सहयोग मिल सकता है।
निवेश और रोजगार– स्वीडिश कंपनियाँ भारत में मैन्युफैक्चरिंग और टेक सेक्टर में निवेश बढ़ाएँगी। इससे रोजगार और स्किल डेवलपमेंट को बढ़ावा मिलेगा।
शिक्षा और रिसर्च– भारत में दुनिया की नामी-गिरामी यूनिवर्सिटी अपना ब्रांच खोल रही हैं। ऐसे में भारतीय छात्रों और रिसर्च संस्थानों को स्वीडिश यूनिवर्सिटीज के साथ साझेदारी का भी फायदा मिल सकता है। इससे विज्ञान, हेल्थ सेक्टर और क्लाइमेट रिसर्च में सहयोग बढ़ सकता है।
स्वीडन के साथ मजबूत रिश्ते से भारत की यूरोप में राजनीतिक और आर्थिक स्थिति और मजबूत होती है। यह चीन के प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति का भी हिस्सा माना जा रहा है।
गुटेनबर्ग में पीएम मोदी की बातचीत
गुटेनबर्ग में पीएम मोदी ने भारत-स्वीडन के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी पर जोर दिया। उन्होंने टेक्नोलॉजी, इनोवेशन , हरित विकास और वैश्विक सहयोग को मजबूत करने की बात कही।
My remarks during the CEO Roundtable in Sweden. We are committed to boosting business ties between our nations. https://t.co/LMY6itZufK
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “भारत दुनिया के साथ मिलकर भविष्य की नई साझेदारी को आगे बढ़ाना चाहता है।” दोनों नेताओं ने आपसी व्यापार और निवेश को पांच साल में दोगुना करने का लक्ष्य भी तय किया है।
पीएम मोदी ने कहा कि आज के तनावपूर्ण वैश्विक माहौल में, भारत और स्वीडन जैसे लोकतंत्रों के बीच घनिष्ठ सहयोग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत ने तनाव को सुलझाने और चुनौतियों का सामना करने के साधन के रूप में संवाद और कूटनीति पर लगातार जोर दिया है।
भारत और स्वीडन सहमत हैं कि आतंकवाद पूरी मानवता के लिए गंभीर चुनौती है। पिछले वर्ष पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद स्वीडन के प्रधानमंत्री क्रिस्टर्सन ने भारत के रुख का समर्थन किया था।
पीएम मोदी ने कहा, ” सुरक्षा, रक्षा साझेदारी और मोबिलिटी समझौतों के क्षेत्रों में भी हमारे सहयोग ने एक नई दिशा ली है। इसके अलावा, भारत-EU व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद ने हमारी साझेदारी को और मजबूत किया है। सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत आज एक नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है।”
पीएम मोदी का भव्य स्वागत
स्वीडन पहुँचने पर प्रधानमंत्री मोदी का बेहद भव्य और ऐतिहासिक स्वागत किया गया। उनकी सुरक्षा के लिए स्वीडन के आसमान में स्वीडिश फाइटर जेट्स एस्कॉर्ट कर रहे थे। मोदी 8 साल बाद स्वीडन पहुँचे हैं। इससे पहले उन्होंने 2018 में स्वीडन का दौरा किया था।
Jag tilldelades nyss Nordstjärneorden. Detta är inte bara en ära för mig, utan för hela Indiens 1,4 miljarder människor. Det är också en hyllning till alla våra vänner i Sverige som har stärkt relationerna mellan Indien och Sverige och lagt en stark grund. Må vänskapen mellan… pic.twitter.com/MUjnrTEyTD
प्रधानमंत्री मोदी की अगवानी के लिए स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन खुद हवाई अड्डे पर पहुँचे। होटल पहुँचने पर बांग्ला रीति रिवाज के मुताबिक आरती की गई और रंगारंग कार्यक्रम हुआ।
पीएम मोदी को मिला 31वाँ इंटरनेशनल सम्मान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर भारत का मान बढ़ाते हुए एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है, जो भारतीय इतिहास में अब तक किसी अन्य नेता को नहीं मिला। 2014 में प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी को पहला वैश्विक सम्मान 2016 में मिला था। यह सऊदी अरब ने दिया था, इसके बाद 2026 तक आते-आते उनके लिए सम्मानों की झड़ी लग गई। अब तक उन्हें 31 अंतरराष्ट्रीय सम्मान से नवाजा जा चुका है।
सऊदी अरब: ऑर्डर ऑफ किंग अब्दुल अजीज (3 अप्रैल 2016)
अफगानिस्तान: ऑर्डर ऑफ अमानुल्लाह खान (4 जून 2016)
फिलिस्तीन: ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फिलिस्तीन (10 फरवरी 2018)
संयुक्त अरब अमीरात (UAE): ऑर्डर ऑफ जायद (24 अगस्त 2019)
रूस: ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू (घोषणा 2019, प्राप्त 2024 में किया)
मालदीव: ऑर्डर ऑफ इज्जुद्दीन (8 जून 2019)
बहरीन: किंग हमद ऑर्डर ऑफ द रेनेसां (24 अगस्त 2019)
अमेरिका: लीजन ऑफ मेरिट (21 दिसंबर 2020) – डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रदान किया गया।
भूटान: ऑर्डर ऑफ द ड्रैगन किंग (दिसंबर 2021)
फिजी: कम्पेनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ फिजी (मई 2023)
पापुआ न्यू गिनी: ग्रैंड कम्पेनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ लोगोहू (मई 2023)
मिस्र: ऑर्डर ऑफ द नाइल (जून 2023)
फ्रांस: ग्रैंड क्रॉस ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर (जुलाई 2023)
ग्रीस: ग्रैंड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ ऑनर (अगस्त 2023)
नाइजीरिया: ग्रैंड कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द नाइजर (17 नवंबर 2024)
डोमिनिका: डोमिनिका अवार्ड ऑफ ऑनर (20 नवंबर 2024)
गुयाना: ऑर्डर ऑफ एक्सीलेंस ऑफ गुयाना (20 नवंबर 2024)।
कुवैत: ऑर्डर ऑफ मुबारक द ग्रेट (22 दिसंबर 2024)
बारबाडोस: ऑर्डर ऑफ फ्रीडम ऑफ बारबाडोस (5 मार्च 2025)
मॉरीशस: ऑर्डर ऑफ द स्टार एंड की ऑफ द इंडियन ओशन (11 मार्च 2025)
श्रीलंका: श्रीलंका मित्र विभूषण (5 अप्रैल 2025)
साइप्रस: ऑर्डर ऑफ मकारियोस III (16 जून 2025)
घाना: ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ घाना (2 जुलाई 2025)
त्रिनिदाद और टोबैगो: ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिदाद और टोबैगो (4 जुलाई 2025)
ब्राजील: ऑर्डर ऑफ द साउदर्न क्रॉस (8 जुलाई 2025)
नामीबिया: ऑर्डर ऑफ द वेलवित्सचिया (9 जुलाई 2025)
इथियोपिया: ग्रेट ऑनर निशान ऑफ इथियोपिया (16 दिसंबर 2025)
ओमान: ऑर्डर ऑफ ओमान (18 दिसंबर 2025)
इजरायल: मेडल ऑफ द नेसेट (25 फरवरी 2026)- पीएम मोदी यह सम्मान पाने वाले पहले विश्व नेता बने।
स्वीडन: ‘रॉयल ऑर्डर ऑफ द पोलर स्टार कमांडर ग्रैंड क्रॉस’ सम्मान
इसके अलावा दक्षिण कोरिया का सियोल शांति पुरस्कार), संयुक्त राष्ट्र (चैंपियंस ऑफ द अर्थ) जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक निकायों के सम्मान भी शामिल हैं, जिन्होंने पीएम मोदी के नेतृत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च मान्यता दी है।
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में उपलब्ध पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, ASI की सर्वे रिपोर्ट और कानूनी प्रावधानों को आधार बनाते हुए भोजशाला को माँ वाग्देवी यानी सरस्वती से जुड़ा एक हिंदू धार्मिक स्थल माना है।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया है। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने सरकार को ये निर्देश भी दिए हैं वो लंदन से भोजशाला की माँ वाग्देवी की मूर्ति लाने का प्रयास करें। अब सबसे बड़ा सवाल है कि वाग्देवी की वह प्रतिमा, जिसे भोजशाला की आत्मा माना जाता है वह भारत से निकलकर लंदन तक कैसे पहुँच गई?
राजा भोज और भोजशाला: माँ वाग्देवी और भोजशाला की आध्यात्मिक पहचान
धार की भोजशाला को हिंदू समाज माता सरस्वती के मंदिर और प्राचीन विश्वविद्यालय के रूप में देखता है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इसकी स्थापना 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने की थी। राजा भोज केवल एक शक्तिशाली शासक ही नहीं, बल्कि शिक्षा, साहित्य, दर्शन, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान और संस्कृत के बड़े संरक्षक माने जाते हैं।
उस समय धार उनकी राजधानी थी और भोजशाला ज्ञान तथा शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। यहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे और संगीत, संस्कृत, योग, दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष तथा आयुर्वेद जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थान केवल पूजा का स्थल नहीं था, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का जीवंत प्रतीक था।
भोजशाला परिसर में आज भी ऐसे कई शिलालेख, नक्काशीदार स्तंभ और स्थापत्य अवशेष मौजूद हैं, जिनमें संस्कृत, प्राकृत और प्राचीन नागरी लिपि के चिन्ह दिखाई देते हैं। कई अभिलेखों में ‘ॐ नमः शिवाय’, ‘ॐ सरस्वत्यै नमः’ और परमार राजाओं की प्रशंसा का उल्लेख मिलने का दावा किया गया है।
इसी व्यवस्था के भीतर माँ सरस्वती या वाग्देवी की उपासना का उल्लेख मिलता है, जिन्हें ज्ञान और वाणी की देवी माना जाता है। इसी कारण भोजशाला को ज्ञान और आस्था दोनों का संगम माना गया। भोजशाला से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है, जो माँ वाग्देवी की परंपरा से जुड़ी हुई बताई जाती है।
वाग्देवी यानी सरस्वती को भारतीय संस्कृति में ज्ञान, शिक्षा, संगीत और वाणी की देवी माना जाता है। मान्यता के अनुसार, भोजशाला में एक विशेष वाग्देवी प्रतिमा स्थापित थी, जो पूरे शिक्षा केंद्र का आध्यात्मिक केंद्र बिंदु थी। यह प्रतिमा केवल पूजा की वस्तु नहीं थी, बल्कि उस समय की सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपरा का प्रतीक थी।
यहाँ शिक्षा और भक्ति एक साथ चलते थे। छात्र ज्ञान प्राप्त करने से पहले माँ सरस्वती का आशीर्वाद लेते थे और यही परंपरा भोजशाला की पहचान बन गई।
इतिहास के उतार-चढ़ाव और भोजशाला का बदला स्वरूप
भोजशाला पर कई बार इस्लामी आक्रमण हुए। दावा किया जाता है कि 1269 में कमाल मौलाना नाम का एक मुस्लिम फकीर मालवा पहुँचा और बाद में यहाँ इस्लामी प्रभाव बढ़ने लगा। इसके बाद 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर हमला किया और भोजशाला को भारी नुकसान पहुँचाया।
हिंदू पक्ष का दावा है कि उस समय यहाँ अध्ययन कर रहे 1200 से अधिक छात्रों और शिक्षकों को बंदी बनाया गया और इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद 1401 में दिलावर खान ने परिसर के एक हिस्से को दरगाह में बदलने का प्रयास किया।
फिर 1514 में महमूद शाह ने भोजशाला परिसर पर कब्जा मजबूत करने की कोशिश की और कमाल मौला मकबरे का विस्तार किया। हिंदू पक्ष का कहना है कि इन्हीं घटनाओं के आधार पर बाद में इसे मस्जिद और दरगाह बताया जाने लगा। बाद में मेदनी राय ने मुस्लिम शासकों के खिलाफ युद्ध कर क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया।
1703 में मालवा पर मराठों का अधिकार हो गया और मुस्लिम शासन समाप्त हुआ। इसके बाद अंग्रेजों का शासन आया।
प्रतिमा की विशेषताएँ: परमार काल की कला और शिल्प का उदाहरण
वाग्देवी की यह प्रतिमा परमार काल की उच्च स्तरीय मूर्तिकला का उदाहरण मानी जाती है, जिसे लगभग 11वीं सदी का बताया जाता है। यह प्रतिमा सफेद पत्थर (स्टोन स्कल्पचर) से बनी एक विस्तृत और संतुलित शिल्पकृति है, जिसमें देवी को पारंपरिक स्वरूप में चार भुजाओं के साथ दर्शाया गया है। प्रतिमा में भारतीय मध्यकालीन कला की बारीकी साफ दिखाई देती है।
चेहरे की शांत अभिव्यक्ति, आभूषणों की नक्काशी और शरीर की संतुलित मुद्रा इसे उस दौर की विशिष्ट मूर्तिकला परंपरा से जोड़ती है। ब्रिटिश म्यूजियम के रिकॉर्ड में इस प्रतिमा की पहचान को लेकर भिन्नता भी देखने को मिलती है। कहीं इसे वाग्देवी कहा गया है तो कहीं अम्बिका (जैन परंपरा की देवी) के रूप में दर्ज किया गया है।
लंदन कैसे पहुँची: 1875 की खोज और औपनिवेशिक दौर की भूमिका
इस प्रतिमा का आधुनिक इतिहास 1875 के आसपास ब्रिटिश काल से शुरू होता है। मुगलों के आक्रमण के बाद खंडित हुई इस प्रतिमा को अंग्रेजों ने खुदाई कर 1875 में निकाला था। इसके बाद 117 साल से प्रतिमा लंदन में ही है। साल 1880 में भोपावर के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मेजर किनकेड इस कीमती मूर्ति को अपने साथ समेटकर इंग्लैंड ले गए थे।
लंदन के म्यूजियम में रखी प्रतिमा (फोटो साभार: दैनिक भास्कर)
उन्होंने उस समय क्षेत्र में पुरातात्विक गतिविधियों में भूमिका निभाई थी। उस दौर में भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं को अक्सर ‘study’, ‘preservation’ या ‘collection’ के नाम पर बाहर भेज दिया जाता था। कई बार इन वस्तुओं का स्वामित्व स्पष्ट नहीं होता था और वे औपनिवेशिक संग्रहालयों तक पहुँच जाती थीं।
इसी प्रक्रिया के तहत यह प्रतिमा भी भारत से ब्रिटेन ले जाई गई और बाद में लंदन के संग्रहालय संग्रह का हिस्सा बन गई। समय के साथ यह ब्रिटिश म्यूजियम में भारतीय कला और मध्यकालीन मूर्तिकला के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में दर्ज हुई।
लंदन के म्यूजियम में वर्तमान स्थिति
आज यह प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट में संरक्षित बताई जाती है। इसे संग्रहालय के एशियन आर्ट सेक्शन में रखा गया है, जहाँ भारत और एशिया से संबंधित सैकड़ों प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ मौजूद हैं। यह प्रतिमा 7 से 8 फीट उँचे एक सुरक्षित काँच के डिस्प्ले केस में रखी गई है और इसे आम लोग भी देख सकते हैं।
म्यूजियम में इसे मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में प्रदर्शित किया गया है। हालाँकि इसकी पहचान को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। भारत में इसे स्पष्ट रूप से माँ सरस्वती या वाग्देवी के रूप में पूजा और सम्मान दिया जाता है, जबकि संग्रहालय इसे एक ऐतिहासिक कलाकृति के रूप में वर्गीकृत करता है।
भारत वापसी की संभावना और प्रक्रिया
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रतिमा की वापसी को लेकर बड़ा संकेत देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “माँ वाग्देवी की प्रतिमा को UK से भारत वापस लाने के संबंध में केंद्र सरकार को विचार करने का निर्देश स्वागतयोग्य है। इस दिशा में राज्य सरकार भी आवश्यक प्रयास करेगी।”
माननीय उच्च न्यायालय द्वारा धार की ऐतिहासिक भोजशाला को संरक्षित स्मारक एवं मां वाग्देवी की आराधना स्थली मानते हुए दिया गया निर्णय हमारी सांस्कृतिक विरासत, आस्था और इतिहास के सम्मान का महत्वपूर्ण क्षण है।
ASI के संरक्षण एवं प्रबंधन में भोजशाला की गरिमा और अधिक सुदृढ़ होगी तथा…
उन्होंने आगे लिखा, “हमारी संस्कृति सदैव टसर्वधर्म समभावट, सामाजिक समरसता और भाईचारे की वाहक रही है। हम न्यायालय के निर्णय का पूर्ण सम्मान करते हैं और प्रदेश में सौहार्द, सांस्कृतिक गौरव एवं सामाजिक सद्भाव को और अधिक सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
भारत सरकार इस मुद्दे को ब्रिटेन के सामने UNESCO के 1970 कन्वेंशन का संदर्भ देकर आधिकारिक स्तर पर उठा सकती है। इस अंतरराष्ट्रीय समझौते के अनुसार किसी भी देश से अवैध या बिना अनुमति के बाहर ले जाई गई सांस्कृतिक धरोहरों को उनके मूल देश को वापस लौटाने पर जोर दिया जाता है।
हालाँकि इस प्रक्रिया में कई व्यावहारिक अड़चनें भी हैं, क्योंकि ब्रिटेन का ‘British Museum Act 1963’ बहुत सख्त नियमों के तहत काम करता है, जो सामान्य परिस्थितियों में संग्रहालय की वस्तुओं को स्थायी रूप से देश से बाहर भेजने पर रोक लगाता है।
इसके बावजूद उम्मीद इसलिए बनी हुई है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कूटनीतिक बातचीत और कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए दुनिया के अलग-अलग देशों से अपनी कई प्राचीन मूर्तियाँ और सांस्कृतिक धरोहरें सफलतापूर्वक वापस हासिल की हैं। मोदी सरकार के नेतृत्व में कई देशों से औपनिवेशिक काल की मूर्तियाँ और सांस्कृतिक धरोहरें वापस लाई जा चुकी हैं।
केरलम के मौलाना अब्दुल हमीद फैजी अम्बालाकादावु के महिलाओं के खिलाफ दिए गए विवादित ‘फतवे’ को लेकर बड़ा बवाल शुरू हो गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मौलाना समस्त युवजन संघम (SYS) से जुड़े हुए हैं जो समस्त केरल जम-इय्यतुल उलेमा के अधीन एक युवा संगठन है।
मौलाना अब्दुल हमीद फैजी ने आधुनिक समाज में मुस्लिम महिलाओं की भूमिका को लेकर बेहद सख्त टिप्पणी की है। उन्होंने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में भागीदारी, जैसे नौकरी करना, रिसेप्शनिस्ट बनना, एंकरिंग करना, स्टेज पर प्रदर्शन करना, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना और गैर-महरम पुरुषों से बातचीत या हाथ मिलाने जैसी गतिविधियों को इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ बताया है।
अब्दुल हमीद फैजी ने क्या कहा?
यह विवाद मौलाना अब्दुल हमीद फैजी के एक फेसबुक पोस्ट के बाद शुरू हुआ। यह पोस्ट उनके फेसबुक अकाउंट पर 10 मई 2026 को शेयर किया गया था जिस पर लगातार विवाद छिड़ा हुआ है।
मौलवी अब्दुल हमीद ने अपने पोस्ट में लिखा, “‘लोगों को जमीन निगल जाएगी, इंसानों को बंदरों, सूअरों और दूसरी शक्लों में बदल दिया जाएगा और आसमान से पत्थरों की बारिश होगी…’ जब प्रोफेट मोहम्मद ने अपने साथियों से भविष्य में होने वाली इन बातों के बारे में बताया तो वहाँ मौजूद एक व्यक्ति ने पूछा:- ‘ऐ अल्लाह के रसूल, यह सब कब होगा’? इस पर नबी ने कहा:- ‘जब गाने वाली औरतें, संगीत के उपकरण, मंचीय कार्यक्रम आम हो जाएँगे और शराब पीना हर जगह फैल जाएगा’।”
इसके आगे अब्दुल हमीद ने महिलाओं की आलोचना करते हुए लिखा, “आज हमारी शादियों में गाने-बजाने के कार्यक्रम होते हैं। शादी समारोहों में हमारा स्वागत करने के लिए महिलाएँ हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। गरीब लोगों की किडनी बदलवाने के लिए फंड जुटाने हेतु ‘इशल नाइट’ जैसे कार्यक्रम किए जाते हैं। रिसेप्शनिस्ट बनने के लिए सुंदर किशोर लड़कियों की जरूरत होती है। एंकरिंग के लिए भी महिलाओं की जरूरत पड़ती है।”
उन्होंने आगे लिखा, “स्कूल स्तर से ही हमारी लड़कियों को गाना सिखाया जाता है और उन्हें इसके लिए प्रोत्साहन दिया जाता है। हमारी बेटियाँ यूट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हर जगह दिखाई देती हैं। धार्मिक मंचों पर भी मुस्लिम महिलाएँ गैर-महरम पुरुषों को संबोधित करके भाषण देती हैं। हमारी महिलाओं को गैर-महरम पुरुषों से हाथ मिलाने और उन्हें गले लगाने में भी शर्म महसूस नहीं होती!”
मौलवी ने 50 साल पहले का जिक्र करते हुे कहा, “50 साल पहले, अगर पर्दा नहीं होता था तो महिलाएँ चलते समय हाथ में छाता रखती थीं, और जैसे ही कोई गैर-महरम पुरुष सामने आता था, वे छाते से अपना चेहरा ढक लेती थीं और इस्लाम के हिजाब के नियमों का पालन करती थीं। वही पीढ़ी आज इतने बड़े बदलाव का शिकार हो गई है। इस मामले में धार्मिक प्रमाणों को अपने तरीके से पेश करने वाले मुजाहिद और जमात समूहों की भी बड़ी भूमिका रही है।”
क्या कह रहे हैं आलोचक?
आलोचकों का कहना है कि मौलाना द्वारा महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका को लेकर दी गई राय एक ऐसी सोच को दर्शाते हैं जिसे साफ तौर पर महिला विरोधी और सामाजिक रूप से उन्हें पिछड़ा मानने व पीछे ले जाने की कोशिश है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या मजहबी व्याख्याओं के नाम पर महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों को सीमित किया जा सकता है।
जब महिलाओं के शिक्षा प्राप्त करने, नौकरी करने, सार्वजनिक मंचों पर बोलने, कला और मीडिया में भाग लेने जैसी सामान्य और आधुनिक भूमिकाओं को गलत या अस्वीकार्य बताया जाता है तो यह सीधे तौर पर उनके मौलिक अधिकारों पर ही सवाल उठाना है। आज के समय में जब महिलाएँ किसी भी समाज की प्रगति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं तो ऐसे में उन्हें केवल घर या सीमित सामाजिक दायरे तक बाँध देना निजी स्वतंत्रता से आगे बढ़कर पूरे समाज के विकास को बाधित करने की कोशिश बन जाती है।
आलोचकों का यह भी मानना है कि इस तरह के विचार समाज को आगे ले जाने के बजाय पीछे की ओर धकेलते हैं। इतिहास और आधुनिक विकास दोनों यह दिखाते हैं कि जिन समाजों ने महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और नेतृत्व के अवसर दिए हैं तो वे अधिक प्रगतिशील और आर्थिक रूप से मजबूत बने हैं। इसके उल्ट जहाँ महिलाओं को सीमित दायरे में रखा गया, वहाँ सामाजिक विकास की गति धीमी रही है। इसलिए, महिलाओं की भागीदारी को सीमित करने वाली सोच केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाती है।
आलोचकों का मानना है कि ऐसे बयान एक व्यापक रूढ़िवादी प्रवृत्ति का हिस्सा हैं जो आधुनिक सामाजिक बदलावों को स्वीकार करने के बजाय उन्हें रोकने या सीमित करने की कोशिश करती है। आलोचकों का कहना है कि मजहब और समाज के बीच संतुलन जरूरी है लेकिन अगर किसी व्याख्या के कारण आधी आबादी यानी महिलाओं के अधिकारों पर असर पड़ता है, तो उस पर फिर से विचार किए जाने की आवश्यकता है।
महिला विरोधी फतवों का लंबा इतिहास
हालाँकि, यह कोई पहली बार नहीं है जब महिलाओं के खिलाफ इस तरह का फतवा दिया गया हो। महिला के शरीर, पहचान, पेशा और सार्वजनिक भागीदारी पर नियंत्रण की कोशिश एक सुनियोजित पैटर्न रही है। इसके पीछे हर बाद इस्लाम और परंपराओं को हवाला दिया जाता रहा है।
ससुर ने किया रेप- अब शौहर को मानो ‘बेटा’
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की मुस्लिम महिला इमराना के साथ उसके ससुर अली मोहम्मद ने बलात्कार किया। इसके बाद पंचायत ने फैसला दिया था कि शरिया कानून के तहत वह शौहर के साथ नहीं रह सकती और शौहर को ‘बेटा’ मानना होगा। दारुल उलूम ने फतवा किया कि इमराना का निकाह उसके पति नूर इलाही से ‘बातिल’ हो गया है। बाद में सामाजिक संगठनों ने आवाज उठाई, केस दर्ज हुआ और ससुर को 10 साल की सजा सुनाई गई।
सानिया मिर्जा को स्कर्ट पहनकर टेनिस खेलने से रोकने का फरमान
सुन्नी उलेमा बोर्ड के मौलाना हसीब-उल-हसन सिद्दीकी ने टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा के खिलाफ 2005 में फतवा जारी किया था। मौलाना का कहना था कि सानिया की ड्रेस ‘इस्लाम-विरोधी’ है। उन्हें ईरानी महिला बैडमिंटन खिलाड़ियों की तरह लंबी टुनिक और हिजाब पहनकर खेलने को कहा गया था।
जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद ने धमकी दी कि न मानने पर खेलने से रोका जाएगा। सानिया ने फतवा नकार दिया और खेल जारी रखा।
महिलाओं और पुरुषों का एकसाथ काम करना हराम
मई 2010 में दारुल उलूम देवबंद के उलेमाओं ने फतवा जारी किया कि सरकारी दफ्तरों और कार्यस्थलों पर महिलाएँ और पुरुष एक साथ काम नहीं कर सकते, जब तक कि महिलाएँ पूरी तरह इस्लामी लिबास में ना हों। इस फतवे को महिलाओं के रोजगार और आर्थिक स्वतंत्रता पर सीधे हमले के रूप में देखा गया और बड़े पैमाने पर आलोचना हुई।
महिलाओं की फोटो खींचना और खिंचवाना हराम
2013 में देवबंद के रेक्टर ने फोटोग्राफी को ‘गैर-इस्लामी’ करार दिया। महिलाओं की फोटो खींचना, खिंचवाना सब पर रोक लगा दी गई। हालाँकि, इसमें चालाकी दिखाते हुए इसे केवल पहचान पत्र और पासपोर्ट के लिए जरूरी बताया गया। दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मुफ्ती अब्दुल कासिम नोमानी ने कहा, “फोटोग्राफी करना इस्लाम विरोधी है।” इस फतवे को सोशल मीडिया युग में महिलाओं की हर तरह की डिजिटल पहचान मिटाने की कोशिश बताया गया।
भौंहें बनाना, बाल कटाना और ब्यूटी पार्लर जाना हराम
दारुल इफ्ता के प्रमुख मौलाना एल. सादिक कासमी ने अक्टूबर 2017 में एक फतवा जारी किया कि मुस्लिम महिलाओं के लिए भौंहें बनाना, बाल कटाना और ब्यूटी पार्लर जाना सख्त मना है। मौलाना कासमी ने कहा कि बाल महिला की खूबसूरती हैं और इन्हें कभी नहीं काटना चाहिए। वहीं, मेकअप को भी ‘दूसरे मर्दों को आकर्षित करने’ का जरिया बताकर हराम घोषित किया।
जींस, टाइट सलवार और डिजाइनर बुर्का पहनना हराम
दारुल उलूम देवबंद की इफ्ता समिति ने टाइट सलवार, जींस, स्कर्ट और डिजाइनर बुर्के को हराम घोषित किया। इफ्ता समिति की तरफ से कहा गया, “पैगंबर ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं को बाहरी दुनिया से बचाओ। जरूरत ना हो तो घर से मत निकलो।”
वहीं, तंजीम अब्नाए दारुल उलूम के मुफ्ती याद इलाही ने इस मामले में कहा कि पश्चिमी संस्कृति ने भारत को बरबाद किया है।
महिलाओं का फुटबॉल मैच देखना हराम
जनवरी 2018 में दारुल उलूम देवबंद के मुफ्ती अतहर कासमी ने फतवा दिया कि महिलाओं के लिए पुरुषों का फुटबॉल मैच देखना हराम है क्योंकि खिलाड़ी हाफ-पैंट पहनते हैं।
तीन तलाक के खिलाफ बोली तो किया ‘इस्लाम से बाहर’
बरेली की महिला अधिकार कार्यकर्ता निदा खान ने तीन तलाक का विरोध किया और पति के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई थी। इससे मौलाना परेशान हो गए और 2018 में इसके जवाब में बरेली जामा मस्जिद के इमाम ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर उन्हें इस्लाम से बाहर करने की घोषणा की। निदा ने इसकी आलोचना करते हुए कहा था कि कोई उन्हें इस्लाम से बाहर नहीं कर सकता है।
गैर मर्द से मेंहदी लगवाना हराम
2018 में दारुल उलूम देवबंद ने एक फतवा जारी किया था जिसमें कहा गया कि मुस्लिम महिलाओं का किसी अंजान पुरुष से मेहंदी लगवाना इस्लाम के अनुसार उचित नहीं है। संस्था के अनुसार, मेहंदी लगवाने के लिए किसी गैर-परिचित पुरुष को अपना हाथ देना गैर-इस्लामिक माना जाता है। साथ ही यह भी कहा गया कि इससे महिलाओं की सामाजिक छवि पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है, इसलिए मुस्लिम महिलाओं को ऐसी स्थितियों से बचना चाहिए।
सिंदूर-बिंदी लगाने के खिलाफ फतवा
ऑल इंडिया मुस्लिम जमात (AIMJ) के अध्यक्ष मौलाना शाहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने 2023 में एक फतवा जारी कर कहा कि गैर-मुस्लिम युवकों से शादी के बाद ‘सिंदूर’, ‘कलावा’ और ‘बिंदी’ लगाने वाली मुस्लिम महिलाएँ इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ जा रही हैं। फतवे में यहाँ तक कहा गया कि अगर ऐसा चलता रहा तो उन्हें समुदाय से बहिष्कृत कर दिया जाएगा।
औरतों का मेले में जाने इस्लाम के खिलाफ
जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक और देवबंद के उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को मेलों में जाने से बचना चाहिए क्योंकि यह इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप नहीं है। उनका कहना है कि मेलों में देर रात तक महिलाओं का घूमना-फिरना उनकी सुरक्षा और सम्मान के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि आजकल मेलों में बड़ी संख्या में मुस्लिम युवा शामिल होते हैं और देर रात तक वहाँ मौजूद रहते हैं जो चिंताजनक और अनुचित है। इसहाक गोरा के अनुसार, ऐसी गतिविधियों का नई पीढ़ी के संस्कारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
क्या है फतवा और इसकी कानूनी वैधता?
‘फतवा’ एक अरबी शब्द है। इसका मतलब होता है किसी मजहबी सवाल पर इस्लामी विद्वान (मौलाना या मुफ्ती) द्वारा दी गई राय या व्याख्या। यह किसी व्यक्ति या समुदाय को यह बताने की कोशिश होती है कि किसी विशेष स्थिति में मजहबी दृष्टि से क्या सही माना जाता है और क्या गलत। लेकिन यह समझना जरूरी है कि फतवा कोई कानूनी आदेश नहीं होता। यह सिर्फ एक मजहबी राय होती है। इसका मतलब यह है कि किसी भी व्यक्ति को फतवा मानने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
भारत के संविधान में फतवा को किसी भी तरह की कानूनी मान्यता नहीं दी गई है। इसका कोई कानूनी बल (legal force) नहीं होता। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी 2014 में यह स्पष्ट किया था कि फतवे किसी भी नागरिक पर लागू नहीं किए जा सकते। यानी कोई भी व्यक्ति केवल फतवे के आधार पर किसी को बाध्य नहीं कर सकता या उसके अधिकारों को सीमित नहीं कर सकता।
इसके बावजूद, कई बार फतवे समाज में एक तरह का दबाव बना देते हैं। कुछ जगहों पर लोग इन्हें मजहबी डर या सामाजिक बहिष्कार के कारण गंभीरता से लेते हैं। इस वजह से कई बार लोगों पर मानसिक दबाव, सामाजिक अलगाव या आलोचना जैसी स्थिति बन जाती है।