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सिर्फ सड़क नहीं, ₹36000 करोड़ की वो आर्थिक रीढ़ जो UP के विकास को देगी नई दिशा: पढ़ें- ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ की सारी जानकारी, जिसका PM मोदी 29 अप्रैल को करेंगे उद्घाटन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (29 अप्रैल 2026) को उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले से राज्य के सबसे बड़े एक्सप्रेस-वे ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ का उद्घाटन करेंगे। ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ सिर्फ दूरी कम करने का काम नहीं करेगा बल्कि पूरे राज्य की आर्थिक और तकनीकी तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है।

मेरठ से प्रयागराज तक फैला यह विशाल कॉरिडोर एक साथ सड़क, डिजिटल नेटवर्क, ऊर्जा सप्लाई, सुरक्षा सिस्टम और औद्योगिक विकास का आधार बनने जा रहा है। यही वजह है कि इसे एक ‘नेक्स्ट जेनरेशन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट’ कहा जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश के विकास की रफ्तार को भी तय करेगा।

परियोजना का आकार, लागत और डिजाइन

गंगा एक्सप्रेस-वे की कुल लंबाई 594 किलोमीटर है। इसे छह लेन के एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड हाईवे के रूप में तैयार किया गया है जिसे भविष्य में आठ लेन तक बढ़ाया जा सकता है। इस पूरी परियोजना पर करीब 36,230 करोड़ रुपए की लागत आई है। इसकी डिजाइन स्पीड 120 किमी प्रति घंटा रखी गई है और अधिकांश संरचनाओं को पहले से ही आठ लेन के हिसाब से बनाया गया है ताकि भविष्य में विस्तार आसान हो।

किन जिलों को जोड़ता है यह एक्सप्रेसवे

यह एक्सप्रेस-वे मेरठ के बिजौली गाँव से शुरू होकर प्रयागराज बाईपास तक जाता है। इसके रास्ते में मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा, संभल, बदायूँ, शाहजहाँपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ और प्रयागराज कुल मिलाकर 12 जिले आते हैं। यह कॉरिडोर पश्चिमी, मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश को एक ही हाई-स्पीड मार्ग से जोड़ता है जिससे क्षेत्रीय संतुलन और कनेक्टिविटी मजबूत होगी।

यात्रा समय और कनेक्टिविटी में बड़ा बदलाव

इस एक्सप्रेसवे के शुरू होने के बाद मेरठ से प्रयागराज तक का सफर जो पहले 10 से 12 घंटे का होता था वो अब घटकर लगभग 6 से 7 घंटे रह जाएगा। इससे न केवल आम यात्रियों को राहत मिलेगी बल्कि माल ढुलाई और औद्योगिक परिवहन भी तेज होगा। यह एक्सप्रेसवे नेशनल हाईवे और अन्य प्रमुख सड़कों से कई इंटरचेंज के जरिए जुड़ा है जिससे अलग-अलग शहरों तक सीधी पहुँच आसान होगी।

निर्माण मॉडल और इंजीनियरिंग की खासियत

गंगा एक्सप्रेसवे को 12 पैकेज में बाँटकर बनाया गया है जिनमें से बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र, खासकर अदाणी ग्रुप द्वारा तैयार किया गया है। करीब 464 किलोमीटर हिस्से का निर्माण DBFOT (Design, Build, Finance, Operate and Transfer) मॉडल पर किया गया है, जिसमें निर्माण, फाइनेंस और संचालन की जिम्मेदारी निजी कंपनी के पास रहती है। निर्माण के दौरान बड़े पुल, अंडरपास, फ्लाईओवर, रेल ओवरब्रिज और कई इंटरचेंज बनाए गए हैं। गंगा और रामगंगा जैसी नदियों को पार करने के लिए लंबे पुल भी तैयार किए गए हैं।

पर्यावरण और संसाधनों का संतुलन

इस परियोजना के निर्माण में लाखों टन कचरे का उपयोग किया गया है। इससे निर्माण में रीसाइक्लिंग को बढ़ावा मिला है। इसके साथ ही करीब 18 लाख पेड़ लगाए गए हैं जिससे पर्यावरणीय संतुलन बना रहे। यह दिखाता है कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट भी पर्यावरण के साथ तालमेल बिठाकर बनाए जा सकते हैं।

डिजिटल हाईवे और यूटिलिटी कॉरिडोर

गंगा एक्सप्रेसवे के साथ 2 मीटर चौड़ा यूटिलिटी कॉरिडोर बनाया गया है, जो इसे डिजिटल हाईवे बनाता है। इसके भीतर ऑप्टिकल फाइबर, बिजली की लाइनें और गैस पाइपलाइन बिछाई जा सकती हैं। इस व्यवस्था के कारण सड़क को खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यही नेटवर्क 519 गाँवों तक ब्रॉडबैंड और 5G कनेक्टिविटी पहुँचाने में मदद करेगा और भविष्य में डेटा सेंटर जैसी सुविधाओं के लिए आधार बनेगा।

ऊर्जा कॉरिडोर और गैस सप्लाई

इस एक्सप्रेसवे के साथ ऊर्जा गंगा परियोजना के तहत गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना भी है। इससे रास्ते में आने वाले गाँवों और उद्योगों को PNG और CNG जैसी सस्ती ईंधन सुविधाएँ मिल सकेंगी। इससे न केवल ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ेगी बल्कि औद्योगिक विकास को भी गति मिलेगी।

स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम और सुरक्षा तकनीक

एक्सप्रेसवे पर स्मार्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है जो AI और सेंसर तकनीक पर काम करता है। हर 2-3 किलोमीटर पर लगे कैमरे और सेंसर कंट्रोल रूम से जुड़े हैं। अगर कोई वाहन रुकता है, गलत दिशा में चलता है या कोई हादसा होता है, तो तुरंत अलर्ट भेजा जाता है। इससे एंबुलेंस और पेट्रोलिंग टीम तेजी से मौके पर पहुँच सकती है और हादसों में जान बचाने की संभावना बढ़ती है।

इसके अलावा गंगा एक्सप्रेसवे में रिकॉर्ड 24 घंटे के भीतर 10.3 किलोमीटर लंबा कंक्रीट क्रैश बैरियर बिछाया गया है। इसे गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया है। ये हादसे के वक्त वाहनों की टक्कर को रोकने में सक्षम होते हैं।

3.5 किलोमीटर लंबी एयरस्ट्रिप

शाहजहाँपुर जिले में गंगा एक्सप्रेसवे पर 3.5 किलोमीटर लंबी आपातकालीन लैंडिंग सुविधा (एयरस्ट्रिप) का निर्माण किया गया है। इसे खास तौर पर इस तरह डिजाइन किया गया है कि जरूरत पड़ने पर यहाँ वायुसेना के विमान लैंडिंग और टेक-ऑफ कर सकें। इस एयरस्ट्रिप की उपयोगिता को परखने के लिए भारतीय वायुसेना द्वारा यहां ट्रायल लैंडिंग भी की जा चुकी है।

परियोजना से जुड़े विवरण के अनुसार, इस एयरस्ट्रिप का निर्माण एक्सप्रेसवे के उसी ढाँचे के भीतर किया गया है, लेकिन इसकी सतह को सामान्य सड़क की तुलना में ज्यादा मजबूत बनाया गया है। इसके साथ ही इस एयरस्ट्रिप पर करीब 250 कैमरे लगाए गए हैं, जिससे इसकी निगरानी लगातार की जा सके और इसे एक्सप्रेसवे के समग्र सुरक्षा सिस्टम से जोड़ा जा सके।

टोल सिस्टम और आर्थिक असर

गंगा एक्सप्रेसवे की एक बड़ी खासियत इसकी टोलिंग और ट्रैफिक फ्लो सिस्टम में छिपी है। इसमें ‘क्लोज्ड टोलिंग सिस्टम’ लागू किया गया है यानी वाहन चालक को सिर्फ एंट्री और एग्जिट पर ही रुकना होगा और दूरी के हिसाब से भुगतान करना होगा।

इससे बार-बार ब्रेक लगाने और गति बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी जिससे ईंधन की बचत होगी और सफर ज्यादा स्मूथ बनेगा। इस पूरे कॉरिडोर में 2 मुख्य टोल प्लाजा मेरठ और प्रयागराज में बनाए गए हैं जबकि 19 रैम्प टोल प्लाजा अलग-अलग एंट्री-एग्जिट पॉइंट्स पर होंगे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कार के लिए संभावित टोल दर लगभग 2.55 रुपए प्रति किलोमीटर हो सकती है जिससे पूरे एक्सप्रेसवे का सफर करीब 1500 रुपए में पूरा हो सकता है। हालाँकि, अंतिम दर सरकार तय करेगी। इसके अलावा 18 एक्सेस नोड्स बनाए गए हैं, जहाँ यह एक्सप्रेसवे नेशनल हाईवे, स्टेट हाईवे और प्रमुख जिला सड़कों से जुड़ता है जिससे कनेक्टिविटी का जाल और मजबूत होता है।

इसके अलावा रास्ते में कई लॉजिस्टिक और औद्योगिक कॉरिडोर विकसित किए जाएँगे जिससे रोजगार, निवेश और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। किसानों को भी सीधे बाजार तक पहुँच मिलने से बेहतर कीमत मिल सकेगी।

धर्म पूछकर चाकू मारना था ISIS से जुड़ने का पहला टेस्ट, ATS ने खोली जुबैर के कट्टरपंथी मंसूबों की पोल: जानें- क्या है ‘लोन वुल्फ’ अटैक, जिसे जिहादी ने मुंबई में दिया अंजाम

मुंबई के मीरा रोड इलाके में धर्म पूछकर जैब जुबैर अंसारी ने दो सिक्योरिटी गार्डों सुब्रतो सेन और राजकुमार मिश्रा पर चाकू से हमला कर दिया। जुबैर ने दोनों गार्डों को ‘कलमा’ सुनाने को भी कहा और ऐसा न करने पर उसने जान से मारने की कोशिश की। आरोपित जुबैर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। जाँच एजेंसियाँ इसे ‘लोन वोल्फ’ आतंकी हमले के तौर पर देख रही हैं।

पूरा मामला 27 अप्रैल 2026 को मीरा रोड के नया नगर इलाके स्थित निर्माणाधीन इमारत ‘अस्मिता ग्रांड मैन्सन’ का है, जहाँ सुरक्षा में दो सिक्योरिटी गार्ड सुब्रतो सेन और राजकुमार मिश्रा तैनात थे। पुलिस के मुताबिक, तड़के सुबह 3 बजे आरोपित जुबैर अंसारी ने पहले गार्ड सुब्रतो सेन से मस्जिद का रास्ता पूछा। एक घंटे बाद वापस आया और धर्म पूछने लगा। पुलिस का कहना है कि आरोपित जुबैर ने दूसरे गार्ड राजकुमार मिश्रा से कलमा भी पड़वाया और जब वह कलमा नहीं पढ़ पाए तो चाकू से हमला कर दिया।

हमले में दोनो गार्ड सुब्रतो सेन और राजकुमार मिश्रा गंभीर रूप से घायल हुए है, जिनका इलाज जारी है। डॉक्टर्स के अनुसार, सुब्रतो सेन खतरे से बाहर हैं जबकि राजकुमार मिश्रा की हालत गंभीर बनी हुई है। वहीं पुलिस ने 31 साल के आरोपित जैब जुबैर अंसारी को गिरफ्तार कर लिया है।

पीड़ित गार्ड का बयान

इलाज के बाद खतरे से बाहर गार्ड सुब्रतो सेन ने पुलिस को बयान दिया है। सेन ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि घटना लगभग सुबह 3 बजे की है, जब वह ड्यूटी पर थे। जुबैर अंसारी उनके पास आया और पूछा कि यहाँ कोई मस्जिद है क्या? इस पर सेन ने जवाब दिया कि दाएँ हाथ पर एक मस्जिद है, लेकिन उन्हें नाम नहीं मालूम। जुबैर ने गार्ड सेन से आगे पूछा, “क्या तुम हिंदू हो?” सेन ने हामी भरी। इसके बाद जुबैर वहाँ से चला गया। लेकिन सेन ने बताया कि वह आसपास सड़क पर घूमता रहा।

सेन ने आगे बताया, ” मैं लगभग 4 बजे मैं राजज सिनेमा के पास एक ईरानी चाय की दुकान पर चाय पीने गया। तब वहाँ मुझे वही आदमी (जुबैर अंसारी) दिखा। चाय पीने के बाद मैं 4.30 बजे अपनी ड्यूटी वाली जगह पर वापस आ गया। वही आदमी मेरे पास आया और कहने लगा- तुम हिंदू हो, है न? उसने फिर मेरे दाएँ हाथ को पकड़ा और चाकू से हमला कर दिया। मैंने खुद को बचाने की कोशिश की, लेकिन उसने चाकू मेरी पींठ पर घोंप दिया।”

(फोटो साभार: IANS)

सेन ने आगे बताया, “मैं जैसे-तैसे उसके हमले से बचकर सुपरवाइजर के केबिन में पहुँचा और सारा मामला बताने लगा। तभी जुबैर अंसारी वहाँ पहुँच गया औऱ सुपरवाइजर से भी वही पूछा- तुम भी हिंदू हो, है न? अगर नहीं हो तो कलमा पढ़कर सुनाओ। जब मिश्रा कलमा नहीं पढ़ सके, तो जुबैर ने उनको चाकू से गोद डाला। डर के मारे मैं वहाँ से भाग गया और इमारत के पीछे जाकर छिप गया। 5-7 मिनट बाद जब मुझे कोई हलचल सुनाई नहीं दी, तब मैंने मिश्रा सर को फोन किया। उस समय मिश्रा सर रो रहे थे और उन्होंने मुझसे कहा- मैं मर जाऊँगा। मैं केबिन में पहुँचा तो दो और गार्ड मौके पर मौजूद थे। वे मिश्रा सर और मुझे अस्पताल ले गए।”

90 मिनट के जुबैर गिरफ्तार, फोन में मिला कट्टरपंथी कंटेन्ट

सूचना मिलते ही महाराष्ट्र पुलिस की एक टीम मौके पर पहुँची। पुलिस ने CCTV की मदद से आरोपित जुबैर अंसारी की पहचान की और 90 मिनट के भीतर उसके मीरा रोड ईस्ट के नया नगर इलाके स्थित घर से उसे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद गार्ड सुब्रतो सेन की शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की गई।

पुलिस ने बताया कि आरोपित जुबैर अंसारी मूलरूप से मुंबई के कुर्ला इलाके का रहने वाला था। वह साइंस से ग्रेजुएट है और 2010 से 2019 तक अमेरिका में भी रह चुका है। नौकरी नहीं मिली तो वह वापस भारत लौट आया और मीरा रोड में अकेले रहने लगा। यह भी बताया गया कि वह केमिस्ट्री की ऑनलाइन कोचिंग पढ़ाता था।

महाराष्ट्र ATS ने जुबैर के घर की छापेमारी

मामला गंभीर होने के चलते अब इसकी जाँच महाराष्ट्र ATS को सौंपी गई है। जाँच एजेंसियाँ इस हमले को संभावित ‘लोन वोल्फ’ आतंकी हमले के रूप में देख रही हैं। ATS ने आरोपित जुबैर अंसारी के किराए घर पर छापेमारी की। छापेमारी में जुबैर के घर से हाथ से लिखे गए कुछ नोट्स बरामद हुए। जाँच एजेंसियों के अनुसार, नोट्स में ISIS में भर्ती होने की इच्छा जताई गई थी और गार्ड पर हमले को इस ओर अपना पहला कदम बताया गया था।

जाँच एजेंसियों मान रही हैं कि कि वह एकांतवास में रहता था इसीलिए इंटरनेट कट्टरपंथी विचारधारा का कंटेन्ट देखता था, जिससे प्रभावित होकर उसने यह हमला किया। फिलहाल उसके मोबाइल फोन और लैपटॉप की फोरिंसिक जाँच की जा रही है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि वह किसी विदेशी आतंकी नेटवर्क या हैंडलर के संपर्क में था या नहीं।

क्या है ‘लोन वुल्फ’ हमला?

मुंबई में हिंदू गार्ड पर धर्म पूछकर और कलमा न सुनाने पर चाकू से किए गए इस हमले को जाँच एजेंसियाँ ‘लोन वुल्फ‘ आंतकी हमले के रूप में देख रही हैं। यानी वो आतंकी हमला, जिसमें कोई अकेला व्यक्ति किसी बड़े आतंकी संगठन के सीधे आदेश या मदद के बिना अकेले ही हमला करता है। ऐसा हमलावर अक्सर इंटरनेट, सोशल मीडिया या कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित होकर खुद ही योजना बनाता है और उसे अंजाम देता है।

चूँकि इसमें कोई बड़ा नेटवर्क या कोई बड़ा संगठन शामिल नहीं होता, इसलिए सुरक्षा एजेंसियों के लिए ऐसे हमलों का पहले से पता लगाना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि ‘लोन वुल्फ’ आज दुनिया भर में सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। मुंबई में गार्ड पर हमला भी इसी तरह प्लान किया गया था, यहाँ आरोपित इंटरनेट से कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित था और वह हिंदुओं से नफरत करने लगा इसीलिए उसने पीड़ितों से धर्म पूछकर उनपर हमला किया।

अपर्णा यादव के बहाने सपा में संग्राम: जानिए- क्यों ‘परिवार’ बनाम ‘कंट्रोल’ की लड़ाई में फिर भिड़े अखिलेश-शिवपाल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपर्णा यादव को लेकर उठा ताजा विवाद महज एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी के भीतर वर्षों से सुलग रहे सत्ता संघर्ष की एक और खुली परत है। मामला तब भड़का जब भाजपा के विरोध प्रदर्शन के दौरान अपर्णा यादव भी सड़कों पर उतरीं और सपा-कॉन्ग्रेस के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए उनके झंडे जलाए गए।

यही वह बिंदु था जिसने सपा कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के भीतर आक्रोश पैदा किया और अपर्णा के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया शुरू हुई। लेकिन यहीं से कहानी दिलचस्प मोड़ लेती है – क्योंकि इस विरोध के बीच शिवपाल यादव ने इसे ‘परिवार’ का मामला बताते हुए सार्वजनिक प्रतिक्रिया से बचने की सलाह दी जबकि अखिलेश यादव ने इस लाइन को खारिज कर दिया।

यहीं से साफ हो गया कि यह टकराव अपर्णा के विरोध से ज्यादा उस नियंत्रण की लड़ाई है, जो सपा की राजनीति का स्थायी चरित्र बन चुकी है।

अपर्णा के बहाने फिर उठा पुराना सवाल

अपर्णा यादव का विरोध किसी व्यक्तिगत कारण से नहीं बल्कि उनके राजनीतिक रुख से उपजा। भाजपा के प्रदर्शन में शामिल होकर सपा और कॉन्ग्रेस के खिलाफ नारेबाजी करना और झंडे जलाने जैसी घटनाओं ने सपा के भीतर स्वाभाविक आक्रोश पैदा किया।

यह सिर्फ एक राजनीतिक असहमति नहीं थी बल्कि इसे सपा के खिलाफ ‘खुले मोर्चे’ के रूप में देखा गया। ऐसे में पार्टी के भीतर प्रतिक्रिया आना तय था। लेकिन यहीं पर शिवपाल यादव का ‘परिवार’ वाला तर्क और अखिलेश यादव का ‘पार्टी लाइन’ वाला रुख आमने-सामने आ गया।

यह वही बिंदु है जहाँ सपा के भीतर वर्षों पुराना सवाल फिर खड़ा हो गया है- क्या पार्टी में फैसले रिश्तों के आधार पर होंगे या एक केंद्रीकृत नेतृत्व के हिसाब से?

2012 में सत्ता के साथ बदला संतुलन

अखिलेश और शिवपाल में टकराव काफी पहले से रहा है। 2012 में जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने, तब यह सिर्फ एक राजनीतिक बदलाव नहीं था बल्कि सपा के भीतर शक्ति संतुलन के बदलने की शुरुआत भी थी।

एक ओर युवा चेहरा था, जिसे आगे बढ़ाया गया, वहीं दूसरी ओर संगठन और जमीन पर पकड़ रखने वाले शिवपाल यादव थे। शुरुआत में यह द्वंद्व दबा रहा लेकिन जैसे-जैसे फैसलों पर नियंत्रण का सवाल उठा, यह टकराव खुलने लगा। टिकट वितरण, प्रशासनिक हस्तक्षेप और संगठनात्मक निर्णयों में बढ़ती खींचतान ने दोनों खेमों को अलग-अलग ध्रुवों में बदल दिया।

2016 का विस्फोट: जब चाचा-भतीजे आमने-सामने आ गए

2016 में कौमी एकता दल के विलय को लेकर विवाद ने इस संघर्ष को सार्वजनिक कर दिया। अखिलेश यादव ने इस विलय को सिरे से खारिज किया जबकि शिवपाल यादव इसके समर्थन में थे। इसके बाद घटनाएँ तेजी से बढ़ीं- मंत्रालय छीने गए, पद बदले गए और अंततः बर्खास्तगी तक की नौबत आ गई।

यह टकराव इतना गहरा था कि पार्टी दो हिस्सों में बँटती नजर आई और मामला चुनाव आयोग तक पहुँच गया। 2017 के चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने पार्टी और उसके चुनाव चिह्न पर नियंत्रण स्थापित कर लिया, जिससे साफ हो गया कि अब सपा में अंतिम निर्णय का केंद्र बदल चुका है।

परिवार में दखल का नैरेटिव: प्रतीक-अपर्णा प्रकरण की चर्चा

सपा की राजनीति में यह नैरेटिव भी लंबे समय से चलता रहा है कि प्रतीक यादव और अपर्णा यादव के निजी संबंधों में आई खटास तक में राजनीतिक प्रभाव की भूमिका रही। यह आरोप और चर्चाएँ भले ही आधिकारिक रूप से स्थापित न हों लेकिन यह धारणा जरूर बनी कि सत्ता के समीकरणों का असर परिवार के निजी दायरे तक पहुँच गया था।

यहाँ यह बात महत्वपूर्ण हो जाती है कि जब शिवपाल यादव ‘परिवार’ की मर्यादा की बात करते हैं, तो वह सिर्फ एक रिश्ते की रक्षा नहीं बल्कि उस पूरे ढाँचे की बात कर रहे होते हैं जिसे धीरे-धीरे राजनीतिक नियंत्रण के आगे कमजोर किया गया।

शिवपाल का असंतोष और मुलायम का कड़ा आकलन

शिवपाल यादव का असंतोष कई बार सार्वजनिक रूप से सामने आ चुका है और समय-समय पर उनके बयानों में यह झलकता भी रहा है कि उन्हें पार्टी के भीतर अपेक्षित सम्मान और भूमिका नहीं मिल रही।लेकिन करहल में दिया गया वह चर्चित बयान, जिसमें मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना एक गलती थी, पूरे विवाद को एक अलग ही गंभीरता देता है।

यह महज एक राजनीतिक तंज नहीं बल्कि उस पीढ़ीगत और नेतृत्वगत टकराव का संकेत माना गया, जो वर्षों से सपा के भीतर पनपता रहा है। आज जब शिवपाल खुद को ‘मामूली सिपाही’ बताते हैं, तो यह उसी लंबे असंतोष और हाशिए पर चले जाने की भावना का विस्तार प्रतीत होता है।

‘औरंगजेब’ से तुलना और सत्ता का चरित्र

उल्लेखनीय है कि अमर सिंह ने एक समय दावा किया था कि मुलायम सिंह यादव ने खुद उनसे कहा था कि अखिलेश यादव का व्यवहार औरंगजेब जैसा है। यह आरोप भले ही राजनीतिक विवाद का हिस्सा रहा ह, लेकिन इसने उस धारणा को मजबूत किया कि सपा में सत्ता संघर्ष ने रिश्तों की सीमाओं को कई बार पीछे छोड़ दिया। सार्वजनिक मंचों पर टकराव, माइक को लेकर धक्का-मुक्की जैसी घटनाएँ भी इसी तनाव की झलक देती रही हैं।

मजबूरी की सुलह, मगर दरार कायम: 2022 के बाद अब तक की स्थिति

मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी उपचुनाव ने एक बार फिर परिवार को साथ खड़ा किया लेकिन यह एक भावनात्मक और राजनीतिक मजबूरी ज्यादा लगी। शिवपाल यादव ने समर्थन दिया और सपा में वापसी भी हुई लेकिन घटनाओं की हालिया कड़ी यह दिखाती है कि अंदरूनी दरार खत्म नहीं हुई। अपर्णा यादव के मुद्दे पर सामने आया ताजा टकराव इसी बात की पुष्टि करता है।

चुनावी असर: क्या फिर दोहराएगा इतिहास?

चुनाव नजदीक हैं और ऐसे समय में इस तरह का टकराव सपा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। संगठनात्मक एकता कमजोर पड़ती है, कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा होता है और विपक्ष को हमला करने का मौका मिलता है।

सबसे अहम यह कि जनता के बीच यह संदेश जाता है कि पार्टी अपने ही भीतर संतुलन नहीं बना पा रही।ऐसे में, पूरे घटनाक्रम को अगर एक रेखा में समझा जाए तो स्पष्ट होता है कि अपर्णा यादव इस कहानी का कारण नहीं, बल्कि एक ट्रिगर हैं।

असली कहानी वही पुरानी है- सत्ता, नियंत्रण और वर्चस्व की। एक तरफ शिवपाल यादव हैं, जो परिवार और परंपरा की बात करते हैं, दूसरी तरफ अखिलेश यादव हैं, जो केंद्रीकृत नियंत्रण के साथ पार्टी को चलाना चाहते हैं।

जब तक यह टकराव बना रहेगा, तब तक हर नया विवाद, चाहे वह अपर्णा का हो या किसी और का, सपा के भीतर इस संघर्ष को फिर से सतह पर लाता रहेगा। यही इस पूरी कहानी का सार है, और यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती भी है।

जिन IPS के खौफ से हाजिरी लगा अपराधियों ने किए सरेंडर, उनको घसीटने का ख्वाब देख रही TMC: जानिए- कौन हैं अजय पाल शर्मा, जिन्हें बंगाल में ECI ने बनाया पर्यवेक्षक

एनकाउंटर स्पेशलिस्ट नाम से मशहूर उत्तर प्रदेश के चर्चित IPS अफसर अजय पाल शर्मा को बंगाल चुनाव में पर्यवेक्षक बनाए जाने के बाद सियासी बवाल मच गया है। सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेता उन्हें धमकाने लगे हैं। बंगाल में बुधवार (29 अप्रैल 2026) को दूसरे चरण का विधानसभा चुनाव होना है। जिन इलाकों में दूसरे चरण का चुनाव हो रहा है, उन्हें पारंपरिक रूप से TMC का गढ़ माना जाता रहा है।

इन इलाकों में मतदाताओं पर दबाव की कोशिशें ना हों और चुनाव निष्पक्ष रहे इसके लिए चुनाव आयोग ने सख्त रणनीति अपनाई है और कई सख्त अधिकारियों को पुलिस पर्यवेक्षक के रूप में तैनात किया गया है। इसी कड़ी में अजय पाल शर्मा की भी दक्षिण 24 परगना का ऑब्जर्वर बनाया गया है। हालाँकि, अजय पाल को लेकर विवाद शुरू हो गया है और TMC व समाजवादी पार्टी ने उन पर सवाल उठाए हैं।

जहाँगीर को ‘चेतावनी’ देने पर शुरू हुआ विवाद

अजय पाल शर्मा को लेकर विवाद TMC के उम्मीदवार जहाँगीर को चेतावनी देने से शुरू हुआ। अजय पाल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ जिसमें वह TMC प्रत्याशी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के बेहद करीबी माने जाने वाले जहाँगीर खान के घर पर जाकर उनके ‘गुंडों’ को सख्त चेतावनी देते दिख रहे हैं।

बीजेपी की आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने भी X पर यह वीडियो शेयर किया है। इस वीडियो में अजय पाल कह रहे हैं, “जहाँगीर के घरवाले भी खड़े हैं। उसको बता देना कायदे से, बार-बार जो खबरें आ रही हैं कि उसके लोग धमका रहे हैं। तो फिर अच्छे से खबर लेंगे, बाद में रोना पछताना मत।”

अमित मालवीय ने लिखा, “एनकाउंटर स्पेशलिस्ट और यूपी पुलिस के सिंघम अजय पाल शर्मा को दक्षिण 24 परगना में पुलिस पर्यवेक्षक के तौर पर तैनात किया गया है। उन्होंने तुरंत ही अपना रुख स्पष्ट कर दिया और अभिषेक बनर्जी के करीबी सहयोगी जहाँगीर खान के परिवार को कड़े शब्दों में चेतावनी दी।” मालवीय ने लिखा, “यह साफ संदेश है कि धमकियों और मनमानी का दौर खत्म हो गया है। कानून व्यवस्था कायम रहेगी और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करने वालों को जवाबदेह ठहराया जाएगा।”

बौखला गई TMC

अजय पाल शर्मा की सख्त चेतावनी सुन TMC बौखला गई और अजय पाल शर्मा के लिए अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। TMC के प्रवक्ता रिजू दत्ता ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “साफ-साफ शब्दों में अजय पाल शर्मा को बताना चाहता हूँ। आपके ऊपर हमारी नजर है। आप जो गैर-कानूनी काम कर रहे हैं, रात के अँधेरे में रेड कर रहे हैं। महिलाओं के साथ अश्लील व्यवहार कर रहे हैं।”

रिजू दत्ता ने कहा, “अपने बीजेपी के मालिकों के निर्देश पर जो असंवैधानिक काम आप कर रहे हैं। मैं आपको बता देना चाहता हूँ 4 तारीख को नतीजे आने के बाद आप जहाँ भी भाग जाएँ, आप छिप नहीं पाएँगे।”

रिजू दत्ता ने अजय पाल शर्मा को धमकाते हुए कहा, “आपको ऐसा लगता होगा कि दूसरे राज्य में हमारे बीजेपी के मालिक हमें बचा लेंगे। मैं सीधे तौर पर कहना चाहता हूँ कि आपके खिलाफ FIR होगी, चार्जशीट होगी और आपको घसीटकर कोर्ट में लाया जाएगा, जहाँ पर कानून सख्त-से-सख्त कार्रवाई आपके खिलाफ करेगा। कोई बीजेपी का मालिक आपको बचा नहीं पाएगा।”

TMC की राज्यसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने X पर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए पोस्ट लिखा। महुआ ने लिखा, “मेरे फेयर & लवली बबुआ अजय पाल- हम तो वो लोग हैं जो कायदे से आपके छोटे फैंटा और बड़े फैंटा का भी इलाज कर लेते हैं। हीरो गिरी थोड़ा संभाल कर कीजिए।”

अजय पाल को लेकर बौखलाहट सिर्फ TMC तक ही सीमित नहीं रही बल्कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी बौखला गए और अजय पाल पर आरोप लगाने लगे। उन्होंने X पर IPS अधिकारी का एक वीडियो शेयर कर लिखा, “प. बंगाल में भाजपा ने ऑब्जवर के नाम पर रामपुर व संभल में टेस्ट किये हुए अपने एजेंट भेजे हैं लेकिन इनसे कुछ होने वाला नहीं। दीदी हैं, दीदी रहेंगी!”

अखिलेश ने आगे लिखा, “सही समय आने पर भाजपा और उनके संगी-साथियों के इन जैसे ‘एजेंडों के एजेंटों’ की सारी आपराधिक करतूतों की गहरी जाँच होगी और बेहद सख्त दंडात्मक कार्रवाई भी। ये सब अधिकारी के रूप में अनरजिस्टर्ड लोगों के अनरजिस्टर्ड अंडरग्राउंड सदस्य हैं। हम न इन्हें भागने देंगे, न भूमिगत होने देंगे। ये खोज के लाए जाएँगे, खोद के लाए जाएँगे और अपने कुकृत्यों के लिए कानूनी सजा भी पाएँगे।”

यूँ ही नहीं है TMC की बौखलाहट

TMC की बौखलाहट यूँ ही नहीं है। पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा होना लंबे समय से आम रहा है, नेताओं और उनके समर्थकों द्वारा वोट के लिए लोगों को धमकाना। यहाँ तक की हत्या और बमबाजी की खूब घटनाएँ सामने आती रही हैं। हालाँकि, इस बार चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि वो किसी भी सूरत में चुनावी हिंसा को बर्दाश्त नहीं करेगा। चुनाव आयोग ने बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की है और पुलिस अधिकारियों के भी लगातार तबादले किए हैं।

भयमुक्त चुनाव के लिए बंगाल में करीब 2,400 अर्धसैनिक बलों की कंपनियाँ तैनात की गई हैं जिनमें लगभग 2,40,000 जवान शामिल हैं। चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव भयरहित, हिंसारहित, धमकी रहित, प्रलोभन रहित, छापा रहित, बूथ और सोर्स जामिंग रहित होकर ही रहेंगे। बंगाल में बीजेपी के आक्रामक प्रचार और प्रबंधन के चलते TMC को इस बार सत्ता जाने का डर सता रहा है। इन चुनावों का दूसरा चरण ही TMC को अपने लिए राहत लग रहा है क्योंकि यहीं से उसे अधिक सीटें मिलने की उम्मीद है।

हालाँकि, चुनाव में वोटरों पर किसी भी तरह का दबाव ना बन पाए इसलिए चुनाव आयोग ने बाहरी अधिकारियों को भी पर्यवेक्षक बनाकर तैनात किया है। अजय पाल शर्मा जैसे ये पर्यवेक्षक चुनावों में किसी भी तरह की धमकी-हिंसा को रोकने के लिए जमीन पर लगातार काम कर रहे हैं। TMC से जुड़े लोगों द्वारा किसी भी तरह का दबाव ना बनाया जा सके इसकी पूरी तैयारी की जा रही है। इन अधिकारियों का यही आक्रामक रवैया TMC की आँख की किरकिरी बन गया है। वो अजय पाल पर निजी हमले से लेकर उन्हें धमकाने तक पर उतर आए हैं।

कौन हैं एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अजय पाल शर्मा?

2011 बैच के IPS अधिकारी अजय पाल शर्मा को उत्तर प्रदेश पुलिस में एक सख्त और तेज-तर्रार अधिकारी के रूप में जाना जाता है। उनकी कार्यशैली और अपराधियों के प्रति कड़े रुख के कारण उन्हें अक्सर ‘यूपी का सिंघम’ और ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ कहा जाता है।

26 अक्टूबर 1985 को लुधियाना में जन्मे अजय पाल शर्मा ने 19 दिसंबर 2011 को भारतीय पुलिस सेवा जॉइन की। हाल ही में उन्हें पदोन्नति देकर DIG बनाया गया है और इस समय वे प्रयागराज में जॉइंट पुलिस कमिश्नर के रूप में तैनात हैं। खास बात यह है कि IPS बनने से पहले उन्होंने डेंटल साइंस की पढ़ाई की थी और वह पेशे से डॉक्टर भी रह चुके हैं।

शिक्षा के मामले में भी उनका रिकॉर्ड बेहद मजबूत रहा है। उन्होंने UPSC की तैयारी 2008 में शुरू की थी। 2009 में प्रारंभिक सफलता मिलने के बावजूद इंटरव्यू पार नहीं कर सके लेकिन हार नहीं मानी और बाद में ऑल इंडिया 17वीं रैंक हासिल कर आईपीएस बने। स्कूल के दिनों में भी वह टॉपर रहे और हाईस्कूल में राज्य स्तर पर शीर्ष स्थान हासिल किया। साथ ही हिंदी, अंग्रेजी और गणित में पूरे 100 अंक प्राप्त किए।

उनकी पहली पोस्टिंग सहारनपुर में हुई जिसके बाद उन्होंने मथुरा, नोएडा, जौनपुर सहित कई जिलों में काम किया। 16 मार्च 2018 से 7 जनवरी 2019 तक वह गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) के SSP रहे, जहाँ उन्होंने अपराध के खिलाफ सख्त अभियान चलाया। उनके कार्यकाल में कई इनामी बदमाश इलाके छोड़कर भाग गए। उनके खौफ से अपराधियों ने खुद थाने जाकर सरेंडर करना शुरू कर दिया था। अपराधी तख्ती लटकाकर थाने जाते और सरेंडर कर देते।

साल 2019 में उनका नाम पूरे प्रदेश में तब चर्चित हुआ जब रामपुर में छह साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के आरोपित को मुठभेड़ में गिरफ्तार किया गया। इस कार्रवाई के बाद उनकी छवि और भी सख्त अधिकारी के रूप में स्थापित हुई। इसके अलावा कैराना पलायन से जुड़े आरोपित की गिरफ्तारी भी उनके कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है।

अजय पाल शर्मा ने अपने करियर में 5 हजार से लेकर 1 लाख रुपए तक के कई इनामी अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की और कई को मुठभेड़ों में ढेर किया। खनन माफिया पर एनएसए लगाने जैसे कड़े कदम भी उठाए। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी नीति भी स्पष्ट रही, उन्होंने 63 से अधिक पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करवाई, यहाँ तक कि नोएडा में एक इंस्पेक्टर पर उसी के थाने में केस दर्ज कराया।

कुल मिलाकर अजय पाल शर्मा की पहचान एक ऐसे पुलिस अधिकारी की है जो फिटनेस, अनुशासन और अपराध के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के लिए जाने जाते हैं। उनकी यही नीति अब बंगाल में TMC के लिए सिरदर्द बन रही है।

कश्मीर के जिस मदरसे से तालीम लेकर निकल रहे थे बड़े-बड़े आतंकी, उस पर लगा ताला: जानिए ‘सिराज-उल-उलूम’ का पुलवामा हमले से कैसे था कनेक्शन

जम्मू-कश्मीर के इमाम साहिब शोपियां स्थित राज्य के सबसे बड़ा मदरसा ‘दारुल उलूम जामिया सिराज-उल-उलूम’ पर आतंकी गतिविधियों के चलते ताला लग गया है। मदरसे को प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी ने खड़ा किया था, जिससे कई आतंकी निकले थे। पुलवामा हमले का आतंकी सज्जाद अहमद भट ने भी इसी मदरसे से तालीम ली थी।

मदरसे पर जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने गैर कानूनी गतिविधियों के चलते UAPA एक्ट, 1967 के तहत कारवाई की है। प्रशासन का कहना है कि मदरसे से आतंकी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए फंडिंग की जा रही थी। प्रशासन को मदरसे की फंडिंग और खर्च में बड़ा अंतर मिला, जिसके कारण मदरसे को सील कर दिया गया।

वहीं पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की चीफ महबूबा मुफ्ती ने मदरसे पर सील लगाने को लेकर विरोध किया है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर महबूबा मुफ्ती ने लिखा, “दारुल उलूम जामिया सिराज उल उलूम को UAPA के तहत गैरकानूनी संगठन घोषित करना बेहद अन्यायपूर्ण फैसला है। इस संस्थान ने ऐसे कई डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य पेशेवर तैयार किए हैं, जिन्होंने देश की ईमानदारी और समर्पण के साथ सेवा की है।”

15 एकड़ की जमीन पर फैला मदरसा 25 साल पुराना

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दारुल उलूम जामिया सिराज-उल-उलूम नाम से यह मदरसा लगभग 25 साल पुराना है, जिसे जमात-ए-इस्लामी ने विदेशी फंडिंग जुटाकर खड़ा किया था। यह मदरसा 15 एकड़ की जमीन पर फैला हुआ है और इसके साथ 5 एकड़ का एक बाग भी है। मदरसे को सील करने से पहले इसमें लगभग 500 छात्र-छात्राएँ पढ़ते थे।

मदरसे पर आतंकी गतिविधियों से जुड़े होने के आरोप लगे। विभिन्न राष्ट्रीय जाँच एजेंसियों ने इन आरोपों की जाँच की तो सही पाया। मदरसे के कई मौलवियों को भी गिरफ्तार किया जा चुका है। अब मदरसे में ताला लगा हुआ है। मदरसे के दरवाजे पर सील के पोस्टर लगे हैं और बाहर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती है।

मदरसे से तालीम लेकर निकला पुलवामा का आतंकी सज्जाद भट्ट

मदरसे को सील करने की वजह इसके आतंकी गतिविधियों से जुड़ा होना है। ये वही मदरसा है जहाँ से 2019 के पुलवामा आतंकी हमले का आरोपित सज्जाद भट ने भी तालीम ली थी, इस हमले में CRPF के 40 जवानों ने बलिदान दिया था।

फिर जब इस हमले की जाँच हुई, तो मदरसे ने खुद कबूला कि इस मदरसे से 11 छात्र आतंकी बने हैं। इनमें PhD आतंकी के नाम से कुख्यात मोहम्मद शफी बट और कुख्यात आदिल अहमद भी शामिल थे। हालाँकि, ये सभी एनकाउंटर में मारे गए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस मदरसे के अधिकतर छात्र पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े थे।

मदरसे के मौलवी भी निकले आतंकी और OGW

इतना ही नहीं इस मदरसे से आतंकी की मदद करने वाले ओवर ग्राउंड वर्कर यानी OGW भी निकले हैं। साल 2020 में ही जम्मू-कश्मीर पुलिस ने शोपियां से 3 ओवर ग्राउंड वर्कर गिरफ्तार किए थे। तब पूछताछ में सामने आया था कि ये तीनों जमात-ए-इस्लामी के लिए काम करते थे और शोपियां के इसी मदरसे से पढ़कर निकले थे।

इस मदरसे के न सिर्फ छात्र बल्कि पढ़ाने वाले मौलवी भी आतंकी गतिविधियों में शामिल रह चुके हैं। इसी मदरसे में पढ़ाने वाला शौकत अहमद शेख LeT से जुड़ा था और लश्कर के लिए आतंकियों की भर्ती करता था। शौकत को NIA ने गिरफ्तार किया था। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, शौकत ने 20 छात्रों का ब्रेनवॉश कर उन्हें आतंकी बनाया था।

मदरसे पर कार्रवाई

आतंकी गतिविधियों में लिप्त मदरसे पर कश्मीर के मंडलायुक्त अंशुल गर्ग ने UAPA अधिनियम की धारा 8(1) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इसे प्रतिबंधित संस्थान घोषित किया है। उन्होंने यह कार्रवाई शोपियां के SSP द्वारा जारी किए गए डोजियर और मदरसे पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के साक्ष्यों के आधार पर की है।

SSP के डोजियर में साफ कहा गया कि मदरसा बाहर से मजहबी तालीम की जगह लगता है। लेकिन इसके कामकाज और पैसों के हिसाब में बड़ी गड़बड़ियाँ हैं। यह कई गैरकानूनी कामों में भी शामिल है। इसका रजिस्ट्रेशन नहीं है। इसने सरकारी जमीन पर कब्जा भी किया है। और कानून से बचने के लिए यह तरह-तरह के तरीके अपनाता है।

देवगुड़ी गायब, चर्च-कब्रिस्तान-क्रॉस उगे… बस्तर से सरगुजा तक सैकड़ों गाँवों में गिनती के बचे हिंदू: जानिए छत्तीसगढ़ में डेमोग्राफी बदलने के लिए कहाँ से आ रहा पैसा, कौन भेज रहा

छत्तीसगढ़ के जनजातीय इलाकों से धर्मांतरण को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और विस्तृत जानकारी सामने आई है। जानकारी के अनुसार, राज्य के जशपुर, बस्तर और अंबिकापुर जैसे क्षेत्रों में धर्मांतरण की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अब यहाँ कई गाँवों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जाँच में यह भी पता चला है कि इस पूरे खेल के पीछे अमेरिका से आने वाली करोड़ों रुपए की विदेशी फंडिंग काम कर रही है। मिशनरीज ने सेवा के नाम पर अपना नेटवर्क इतना फैला लिया है कि अब आदिवासियों की सदियों पुरानी परंपराएँ भी बदलने लगी हैं।

गाँव के गाँव ने बदला धर्म: मंदिर गायब, चर्च की भरमार

छत्तीसगढ़ के जनजातीय जिलों जैसे जशपुर, अंबिकापुर और रायगढ़ में स्थिति बहुत बदल चुकी है। मीडिया रिपोर्ट्स बताती है कि यहाँ के सैकड़ों गाँवों में अब एक भी मंदिर नहीं बचा है, जबकि हर गाँव में 3 से 4 चर्च का होना एक सामान्य बात हो गई है।

जशपुर जिला तो लंबे समय से इन गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहाँ के गाँवों में अब लोग अपनी परंपरा के उलट शवों को जला नहीं रहे हैं, बल्कि उन्हें दफना रहे हैं। इन कब्रों पर अब हिंदू प्रतीकों की जगह क्रॉस के निशान बने हुए दिखाई देते हैं। जनजातीयों की संस्कृति धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है और उनकी जगह ईसाई रीतियों ने ले ली है।

मिशनरी के निशाने पर कौन? उरांव के बाद अब अन्य जनजातियाँ

मिशनरीज ने बहुत सोच-समझकर अपनी रणनीति बनाई है। उनका मुख्य निशाना समाज के वे लोग हैं जो गरीब हैं, बीमार हैं या खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं। पहले उनका ध्यान ‘उरांव’ जनजाति पर था, लेकिन अब उन्होंने मांझी, भुईंया और पहाड़ी कोरवा जैसी जनजातियों को भी अपने दायरे में ले लिया है।

इन लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं होता, इसलिए मिशनरी इनके दुख-तकलीफ में खड़े होने का नाटक करते हैं। वे गाँवों में स्कूल खोल रहे हैं और मुफ्त इलाज का लालच देकर लोगों को अपने धर्म की ओर खींच रहे हैं। गाँवों में तैनात पादरी लोगों की मदद करने के बहाने उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

75 प्रतिशत ईसाई, हिंदू अल्पसंख्यक

अंबिकापुर के पास सलाईनगर गाँव की स्थिति बहुत डराने वाली है। यह गाँव तीन हिस्सों में बँटा है, जिसमें से दो बस्तियाँ पूरी तरह ईसाई हो चुकी हैं और केवल बीच की बस्ती में कुछ हिंदू बचे हैं। गाँव के 75 प्रतिशत लोग ईसाई बन चुके हैं। यहाँ 4 चर्च हैं पर एक भी मंदिर नहीं।

इसी तरह भैंसाखार गाँव में अब केवल एक ही हिंदू परिवार बचा है। रायगढ़ के नौनयजोर गाँव में तो स्थिति और भी अलग है। यहाँ के सभी 250 परिवार ईसाई बन चुके हैं। गाँव के हर घर पर सफेद झंडे लगे हैं जिन पर क्रॉस का निशान है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब यहाँ कोई हिंदू परिवार नहीं रहता।

प्रार्थना सभाओं और ‘चंगाई’ का खेल

बेलजौरा गाँव की कहानी भी ऐसी ही है। यहाँ 60 प्रतिशत लोग धर्मांतरित हो चुके हैं। लोग बताते हैं कि जब घर में कोई बीमार होता है, तो पादरी उनके घर पहुँच जाते हैं और प्रार्थना करने लगते हैं। इसे ‘चंगाई सभा’ कहा जाता है।

धर्म परिवर्तन के बाद सबसे पहले घर से हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और तस्वीरें हटवाई जाती हैं। घर का तथाकथित ‘शुद्धिकरण’ किया जाता है और नाम न बदलने की शर्त पर उन्हें ईसाई बना दिया जाता है। मिशनरीज का मुख्य निशाना महिलाएँ हैं, जिन्हें बहला-फुसलाकर प्रार्थना सभाओं में लाया जाता है।

अमेरिका से छत्तीसगढ़ तक: करोड़ों की विदेशी फंडिंग का खुलासा

धर्मांतरण का यह खेल केवल स्थानीय स्तर पर नहीं चल रहा है, बल्कि इसके तार सात समंदर पार अमेरिका से जुड़े हैं। जाँच में ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ (TTI) नामक एक अमेरिकी संगठन का नाम सामने आया है। इस संगठन की वेबसाइट भारत में प्रतिबंधित है। यह संस्था दुनिया भर से फंड जुटाती है और भारत में प्रति चर्च हर महीने लगभग 3,205 रुपए भेजती है।

इनका एकमात्र उद्देश्य ‘हर गाँव में एक चर्च’ बनाना है। ED की जाँच में पता चला है कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच करीब 95 करोड़ रुपए विदेशी डेबिट कार्ड के जरिए भारत लाए गए। इसमें से 6.5 करोड़ रुपए केवल छत्तीसगढ़ के बस्तर और धमतरी जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में खर्च किए गए।

ED की बड़ी कार्रवाई: 24 विदेशी डेबिट कार्ड बरामद

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस मामले में कार्रवाई की है। जाँच के दौरान माइक मार्क नामक व्यक्ति के पास से 24 विदेशी डेबिट कार्ड मिले हैं। उसे बेंगलुरु एयरपोर्ट पर पकड़ा गया था। इन कार्डों का इस्तेमाल छत्तीसगढ़ के अंदरूनी इलाकों में ATM से कैश निकालने के लिए किया जा रहा था।

ED का मानना है कि यह एक संगठित नेटवर्क है जो देश की सुरक्षा और वित्तीय व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा है। राजनाँदगाँव जिले में गिरफ्तार पादरी डेविड चाको भी इसी अमेरिकी संगठन से जुड़ा था। वह राज्य भर में ‘स्लीपर सेल’ तैयार कर रहा था, जो लोगों को धर्मांतरण का प्रशिक्षण देते थे।

बस्तर में बदलता स्वरूप: देवगुड़ी की जगह पक्के चर्च

बस्तर के जंगलों और गाँवों में एक बहुत गहरा बदलाव दिख रहा है। जहाँ पहले जनजातीय संस्कृति का प्रतीक ‘देवगुड़ी’ (पूजा स्थल) हुआ करती थी, वहाँ अब सुसज्जित और पक्के चर्च खड़े हो गए हैं।

कच्चे घरों वाले गाँवों के बीच ये पक्के चर्च इस बात का सबूत हैं कि विदेशी पैसा कहाँ खर्च हो रहा है। पिछले 10 से 15 सालों में बस्तर में 3,000 से अधिक चर्च बन चुके हैं। करंजी और मोरठपाल जैसे गाँवों में पुराने आदिवासी पूजा स्थलों की सामाजिक भूमिका अब खत्म सी हो गई है और सड़क किनारे बने चर्च गाँवों की नई पहचान बन गए हैं।

सामाजिक तनाव और संस्कृति को बचाने की जंग

धर्मांतरण की इस रफ्तार ने गाँवों को दो हिस्सों में बाँट दिया है। जो लोग ईसाई बन चुके हैं, वे अब अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों और देवगुड़ी में नहीं जाते। इससे गाँवों में आपसी टकराव बढ़ गया है।

जनजातीय समाज के नेता राजाराम तोड़ेम का कहना है कि यह बस्तर की संस्कृति को खत्म करने की एक बड़ी साजिश है। हालाँकि, अब कुछ वर्षों से जनजातीय समुदाय अपनी संस्कृति को बचाने के लिए जागरूक भी हुआ है। जशपुर में हाल ही में रामकथा और जागरण कार्यक्रमों के जरिए लगभग 1,200 परिवारों ने वापस अपने मूल धर्म में वापसी की है।

सरकार का कड़ा रुख: नया कानून और सख्त जाँच

छत्तीसगढ़ सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ पेश किया है। इस कानून का उद्देश्य बल, प्रलोभन या धोखे से होने वाले धर्मांतरण पर कड़ी रोक लगाना है। भाजपा नेताओं का कहना है कि ED की जाँच ने साफ कर दिया है कि विदेशी फंडिंग के जरिए देश विरोधी गतिविधियाँ चलाई जा रही थीं। पुलिस अब चंगाई सभाओं पर भी नजर रख रही है।

छत्तीसगढ़ के जनजातीय अंचलों में धर्मांतरण एक गंभीर चुनौती बन चुका है। एक तरफ सेवा और चंगाई के नाम पर लोगों की आस्था बदली जा रही है, तो दूसरी तरफ विदेशी फंड की मदद से पक्के चर्चों का जाल बिछाया जा रहा है। यह केवल धर्म परिवर्तन का मामला नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की प्राचीन जनजातीय संस्कृति और देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन चुका है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर सोनिया और राहुल गाँधी के विरोध से छिड़ी नई बहस, क्या राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर राजनीति कर रही है कॉन्ग्रेस?: जानें चीन का कनेक्शन

देश में चुनावी माहौल के बीच राहुल गाँधी के अंडमान-निकोबार दौरे और ग्रेट निकोबार इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना पर उनके रुख ने एक बार फिर विकास, पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ऐसे समय पर द्वीपसमूह पहुँचे हैं जब इस बहुचर्चित परियोजना को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) से मंजूरी मिल चुकी है और केंद्र सरकार इसे भारत के लिए एक बड़े आर्थिक और सामरिक गेमचेंजर के रूप में पेश कर रही है।

कॉन्ग्रेस नेता इस परियोजना को लेकर स्थानीय जनजातीय समुदायों खासतौर पर शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों के अधिकारों, विस्थापन की आशंका और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित असर को मुद्दा बना रहे हैं।

वहीं सरकार का दावा है कि यह परियोजना न सिर्फ भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार में नई पहचान दिलाएगी, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का रणनीतिक जवाब भी साबित होगी।

ऐसे में राहुल गाँधी का यह दौरा सिर्फ एक क्षेत्रीय दौरा नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक, पर्यावरणीय और रणनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया है। जहाँ एक तरफ विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पर जोर है, तो दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अस्तित्व को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं।

राहुल गाँधी के दौरे का क्या है मकसद?

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी दो दिवसीय दौरे पर अंडमान-निकोबार पहुँचे हैं। उनका कहना है कि वे ग्रेट निकोबार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के जमीनी हालात समझना चाहते हैं। इससे पहले उन्होंने जनजातीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर उनके अधिकारों की रक्षा का भरोसा भी दिया था।

दौरे के दौरान राहुल गाँधी ने साफ कहा कि विकास के नाम पर स्थानीय लोगों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए और किसी भी परियोजना का लाभ सबसे पहले द्वीपवासियों को मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बड़े कॉर्पोरेट समूह इस क्षेत्र में रुचि दिखा रहे हैं, जिससे स्थानीय हितों पर असर पड़ सकता है।

सोनिया गाँधी का भी विरोध

इससे पहले सोनिया गाँधी भी इस परियोजना का खुलकर विरोध कर चुकी हैं। उन्होंने अपने लेख में इसे पर्यावरणीय आपदा बताते हुए कहा था कि इससे निकोबारी और शोम्पेन जनजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

उन्होंने द हिंदू में 8 सितंबर 2025 को प्रकाशित अपने लेख ‘द मेकिंग ऑफ एन इकोलॉजिकल डिजास्टर इन द निकोबार’ में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को 72000 करोड़ रुपए की योजन को ‘पूरी तरह बेकार और खर्चीली’ योजना करार दिया।

उन्होंने कहा कि यह परियोजना निकोबार आइलैंड के जनजातीय समुदायों के अस्तित्व के लिए खतरा है और क्षेत्र की अनोखी जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुँचा सकती है। सोनिया गाँधी ने नरेंद्र मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि वह जनजातियों के अधिकारों की अनदेखी कर रही है और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं कर रही है।

उनके अनुसार यह परियोजना आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर संकट खड़ा कर सकती है। जानकारी के मुताबिक, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इस परियोजना को मंजूरी दे दी है। कोलकाता स्थित ईस्टर्न जोनल बेंच ने इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताते हुए हरी झंडी दी, लेकिन साथ ही पर्यावरण संरक्षण के कड़े उपाय अपनाने की शर्त भी लगाई है। NGT का मानना है कि परियोजना जरूरी है, लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट?

सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण भारत का दक्षिणी छोर पर इंफ्रा प्रोजक्ट बनने जा रहा है। ये स्ट्रेट ऑफ मलक्का स्ट्रेट से करीब 900 किमी दूर होगा। मलक्का  स्ट्रेट वह समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया की 30-40 फीसदी समुद्री व्यापार होता है।

यह इंग्लिश चैनल के बाद दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग है, जहाँ से जापान, चीन, दक्षिण कोरिया और पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया से यूरोप तक शिप और कंटेनर गुजरता है। इसे हिन्द महासागर के ‘चोक प्वाइंट पॉलिटिक्स’ का केंद्र भी माना जाता है।

इस प्रोजेक्ट के कई आयाम है। 166 वर्ग मीटर के पूरे क्षेत्र में तीन क्षेत्रों में काम किया जाएगा। इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, जहाँ बड़े बड़े जहाज आकर रुक सकें। ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट यानी आमलोगों की आवाजाही और सेना के इस्तेमाल के लिए एयरपोर्ट।

पावर प्लांट जो करीब 450 मेगावॉट का होगा और ऊर्जा की जरूरतों को पूरा कर सके। नई टाउनशिप, जहाँ लाखों लोग बसाए जा सकें। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के तहत ग्रेट निकोबार में एक नए अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण की योजना तैयार की गई है, जिसे देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास दोनों के लिए अहम माना जा रहा है।

ग्रेट निकोबार आइलैंड पर बनने वाला यह एयरपोर्ट सैन्य और असैन्य दोनों तरह के उपयोग के लिए विकसित किया जाएगा। इसके एयरसाइड और हवाई यातायात नियंत्रण (एटीसी) की जिम्मेदारी इंडियन नेवी के पास रहेगी, जबकि यात्रियों से जुड़ी सुविधाएँ, पार्किंग और टर्मिनल संचालन एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) संभालेगा।

यह हवाई अड्डा पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ रणनीतिक दृष्टि से भी भारत की स्थिति को मजबूत करेगा, खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में निगरानी और त्वरित सैन्य तैनाती के लिहाज से। योजना के अनुसार 2050 तक द्वीप की आबादी लगभग 6.5 लाख तक पहुँचने का अनुमान है, जबकि वर्तमान में यहाँ करीब 6500 लोग ही रहते हैं।

क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट?

मलक्का स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है, जहाँ से 30-40% वैश्विक व्यापार गुजरता है। इस मार्ग के करीब मौजूदगी भारत को वैश्विक व्यापार में बड़ी भूमिका निभाने का अवसर देती है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को भारत की अर्थव्यवस्था, समुद्री व्यापार और रणनीतिक ताकत के लिहाज से एक गेमचेंजर परियोजना के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का मानना है कि इसके जरिए भारत एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड हब बन सकता है, जिससे लाखों नौकरियाँ पैदा होंगी।

अभी हाई लॉजिस्टिक्स लागत भारत के निर्यात और व्यापार को प्रभावित करती है, लेकिन ग्रेट निकोबार आइलैंड में आधुनिक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनने से कंटेनर सीधे यहाँ पहुँच सकेंगे, जिससे समय और लागत दोनों में कमी आएगी। साथ ही विदेशी जहाजों की आवाजाही बढ़ेगी और भारत की समुद्री व्यापार में हिस्सेदारी मजबूत होगी।

इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 90000 से 92000 करोड़ रुपए है और इसे नरेंद्र मोदी सरकार के तहत विकसित किया जा रहा है। साल 2024 में गलाथिया बे को ‘प्रमुख बंदरगाह’ घोषित किया गया, जिसे चार चरणों में विकसित किया जाएगा।

पहला चरण 2028 तक पूरा होने का लक्ष्य है, जिसमें 40 लाख TEU कंटेनर हैंडलिंग क्षमता होगी, जबकि 2058 तक यह बढ़कर 1.6 करोड़ TEU तक पहुँच सकती है।

रणनीतिक दृष्टि से भी यह प्रोजेक्ट बेहद अहम है। चीन ने हंबनटोटा पोर्ट, क्याउकप्यू पोर्ट और ग्वादर पोर्ट जैसे बंदरगाहों में निवेश कर हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है, जिसे भारत के लिए चुनौती माना जाता है। ऐसे में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से भारत की निगरानी क्षमता, सैन्य तैनाती और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक पकड़ मजबूत होगी।

यह परियोजना भारत की समुद्री कमजोरियों को दूर करने का प्रयास भी जारी है। वर्तमान में भारत के पूर्वी तट के कई बंदरगाहों की गहराई 8 से 12 मीटर है, जो बड़े जहाजों के लिए पर्याप्त नहीं है, जबकि वैश्विक स्तर पर बड़े बंदरगाह 12 से 20 मीटर गहरे होते हैं।

इसी वजह से भारत का लगभग 25% कार्गो कोलंबो पोर्ट, सिंगापुर पोर्ट और पोर्ट क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों के जरिए ट्रांसशिप होता है। इससे हर साल करीब 1500 करोड़ रुपए का सीधा नुकसान और कुल मिलाकर 3000 से 4500 करोड़ रुपए तक का आर्थिक प्रभाव पड़ता है।

चीन को टक्कर देने की रणनीति

चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करने के लिए श्रीलंका, पाकिस्तान और म्यांमार में कई बंदरगाह विकसित किए हैं। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह अपनी सामरिक स्थिति को मजबूत करे।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के जरिए भारत समुद्री निगरानी बढ़ा सकता है, सैन्य तैनाती को आसान बना सकता है और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत कर सकता है।

पर्यावरण बनाम विकास की बहस

इस परियोजना को लेकर सबसे बड़ी बहस पर्यावरण को लेकर है। विरोध करने वालों का कहना है कि इससे जैव विविधता को नुकसान होगा, जंगलों की कटाई बढ़ेगी और आदिवासी समुदायों का विस्थापन हो सकता है।

वहीं सरकार ने बताया है कि परियोजना सभी पर्यावरणीय नियमों के तहत बनाई जा रही है और नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त उपाय किए जाएँगे। इस मुद्दे पर देश में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है।

राहुल गाँधी का विरोध ऐसे समय में सामने आया है जब सरकार इस परियोजना को भारत के भविष्य के आर्थिक और रणनीतिक केंद्र के रूप में पेश कर रही है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह विरोध पूरी तरह पर्यावरणीय चिंताओं पर आधारित है या इसमें राजनीतिक पहलू भी शामिल है।

कॉन्ग्रेस के मुखपत्र National Herald ने भारत के लोकतंत्र को फिर दिखाया नीचा, उस बांग्लादेश के ‘निष्पक्ष चुनाव’ की दे रहा दुहाई जहाँ विपक्ष को बोलने की आजादी तक नहीं

बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद पूरे देश में हिंसा फैली, जो आज भी जारी है खासकर हिंदुओं के खिलाफ। फिर शेख हसीना की सरकार गिरने के लगभग 1.5 साल बाद बांग्लादेश में आम चुनाव हुए। इन चुनावों में भी हिंसा की कई खबरें सामने आईं। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ का मानना है कि ‘भारत को बांग्लादेश से सीखने की जरूरत है।’

दरअसल, खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकार’ बताने वाले सौरभ सेन ने नेशनल हेराल्ड के लिए एक आर्टिकल लिखा है। इस आर्टिकल को सौरभ सेन ने स्वीडन के मीडिया आउटलेट ‘नेत्र न्यूज’ के ऑडिट के हवाले से लिखा है, जो दावा कर रहा है कि बांग्लादेश में आम चुनाव 2026 में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई और उन दावों को खारिज किया जो बांग्लादेश के विपक्षी दल कहते आ रहे हैं कि चुनाव में धाँधली हुई है।

कॉन्ग्रेस की आवाज बनकर नैरेटिव गढ़ने वाले ‘नेशनल हेराल्ड’ ने राहुल गाँधी के ही स्वर में अपनी बात रखी है। आर्टिकल में भारत के चुनाव आयोग पर सवाल उठाए गए, सरकार पर तंज कसा गया और यहाँ तक कि संसद में महिला आरक्षण बिल पास न होने का ठीकरा भी सरकार पर ही फोड़ डाला।

नेशनल हेराल्ड के आर्टिकल की हेडलाइन- बांग्लादेश में हुए ‘ऑडिट’ से भारत के लिए सबक, से ही भारत-विरोधी स्वर गूँज रहे हैं। यहाँ लेखक सौरभ सेन दावा करते हैं कि बांग्लादेश तो भारत से कहीं आगे और बेहतर देश है और भारत को उससे कुछ सीखना चाहिए, जबकि हकीकत से इससे कहीं परे है। यहाँ खासतौर से हाल ही में बांग्लादेश के आम चुनाव 2026 को ‘पारदर्शी’ बताने का दावा कर भारत को सबक लेनी की बात कही जा रही है।

यहाँ नेशनल हेराल्ड उस देश के चुनावों में ‘पारदर्शी’ की बात कर रहा है, जहाँ कई सालों तक सत्ता में रही शेख हसीना की पार्टी ‘आवामी लीग’ को ही चुनाव लड़ने से रोका गया। पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इतना ही नहीं बांग्लादेश में हाल ही में हुए चुनाव पर कई सवाल खड़े हुए, जब चुनावों में हिंसा और हेराफेरी की खबरे सामने आईं।

सच: बांग्लादेश में चुनावी हिंसा और भारत में सख्त नियम

नेशनल हेराल्ड ने अपने आर्टिकल में लिखा- भारत का चुनाव आयोग चाहे तो चुनाव और नतीजों की जाँच को और ज्यादा पारदर्शी, स्वतंत्र और भरोसेमंद बना सकता है।

जबकि सच क्या है, यह सबके सामने आ चुका है। कैसे बांग्लादेश में चुनावों में हिंसा की घटनाएँ सामने आईं। कहीं मतदान केंद्र पर बम धमाका हुआ, तो कहीं गोलीबारी हुई, कई मतदान केंद्रों पर राजनीतिक दलों की आपसी झड़प में माहौल गरमाया। मानवाधिकार संगठन ओधिकार के अनुसार, 13 फरवरी से 28 फरवरी के बीच 104 हिंसक घटनाएँ दर्ज की गईं। इन घटनाओं में 10 लोगों की मौत हुई और 476 से ज्यादा लोग घायल हुए।

रही पारदर्शी की बात, तो बांग्लादेश चुनावों में जीत दर्ज करने वाली पार्टी BNP के नेताओं ने ही वोटिंग प्रक्रिया में ‘हेराफेरी‘ के आरोप लगाए। ऐसे ही चुनावों से पहले हवा बनाने वाली जमात-ए-इस्लामी ने भी यही आरोप लगाए।

तो यहाँ भारत को क्या सीखने की जरूरत है? वोटिंग प्रक्रिया में हेराफेरी या मतदाताओं पर हिंसा? क्योंकि हाल ही में बंगाल चुनाव देख लीजिए। पिछले बंगाल चुनाव 2021 में मिली सभी शिकायतों का चुनाव आयोग ने हल ढूँढा। भारत के चुनाव आयोग ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए। जिस बंगाल में साल 2021 के चुनाव परिणामों के बाद हिंसा फैली, उससे सबक लेकर चुनाव आयोग ने मतदान के दौरान देशभर से आए भारी सुरक्षाबल को तैनात किया।

यानी अगर कोई प्रदेश हिंसा के लिए जाना भी जा रहा है, तो चुनाव आयोग अपनी तरफ से कायदे-कानून बनाने में कमी नहीं कर रहा है। जहाँ नेशनल हेराल्ड बांग्लादेश में बैलट पेपर पर हुए चुनावों की वाहवाही करते नहीं थक रहा है, वहीं भारत में EVM से ‘पारदर्शिता’ के साथ चुनाव संपन्न हो रहे हैं। और अब तो चुनाव आयोग EVM से छेड़छाड़ की घटना पर भी सख्त हो गया है।

तो इससे पता लगता है कि भारत का चुनाव आयोग चाहता नहीं, करके दिखाता है कि कैसे भारत में चुनाव पारदर्शी, स्वतंत्र और भरोसेमंद होते हैं।

सच: बांग्लादेश में ‘नाम’ का महिला आरक्षण और भारत में महिला आरक्षण पर सरकार ‘गंभीर’

आर्टिकल में यह भी लिखा गया, “भारत में बीजेपी ने महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में तेजी से पेश किया। पार्टी को पता था कि उसके पास इसे पारित कराने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं है, फिर भी उसने ऐसा किया। इसका मकसद तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी के चुनावों से पहले महिलाओं के बीच अपनी छवि मजबूत करना था।”

यहाँ नेशनल हेराल्ड महिलाओं को आधार बनाकर बांग्लादेश की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा है। बांग्लादेश की संसद ‘जातीय संगद’ में उन 50 सीटों पर महिला आरक्षण की बात हो रही है, जो 2011 में खुद एक महिला प्रधानमंत्री रह चुकीं शेख हसीना की सरकार में दिया गया था।

यहाँ नेशनल हेराल्ड महिलाओं को आधार बनाकर बांग्लादेश की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा है। बांग्लादेश की संसद ‘जातीय संगद’ में उन 50 सीटों पर महिला आरक्षण की बात हो रही है, जो 2011 में खुद एक महिला प्रधानमंत्री रह चुकीं शेख हसीना की सरकार में दिया गया था।

ये जो नेशनल हेराल्ड बांग्लादेश में महिलाओं के आरक्षण पर बात करता है, क्या इन्होंने कभी बांग्लादेश में महिालओं के हालात पर मुद्दा उठाया है। बांग्लादेश में महिलाओं की हालत क्या है? यह सबको पता है। आए दिन गैंगरेप की घटनाएँ और मारपीट की घटनाओं से साफ पता लगता है कि बांग्लादेश में महिलाओं को कितनी स्वतंत्रता है।

खासकर हिंदू महिलाएँ, जो घर के भीतर भी सुरक्षित नहीं है, क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें घर में भी सुरक्षित नहीं छोड़ते हैं। महिलाओं को आरक्षण देने वाला बांग्लादेश ही है, जिसे महिला का शक्ति रूप ‘माँ दुर्गा’ की पूजा से दिक्कत है। हर साल दुर्गा पूजा में हिंसा की खबरें सामने आती हैं, कहीं देवी की मूर्ति तोड़ी जाती है, कहीं पत्थरबाजी होती है।

और बांग्लादेश में महिला आरक्षण पर बात करने वाला नेशनल हेराल्ड कॉन्ग्रेस की ही आवाज है, जिसने भारत की संसद में महिला आरक्षण कानून का विरोध किया। तो कहना बिल्कुल शोा नहीं देता कि भारत को यह सीखने की जरूरत है कि महिलाओं का कैसे सम्मान करना है?

‘नेशनल हेराल्ड’ चलाने वाली कॉन्ग्रेस को बांग्लादेश से ‘प्रेम’, पर भारत का ‘विरोध’

नेशनल हेराल्ड ने अपने आर्टिकल में भारत को बांग्लादेश से जो भी सीख लेने की बात कही, वह सीख अगर भारत ने ले ली तो उसकी भी हालत बांग्लादेश जैसी ही होगी। वही बांग्लादेश, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है, विरोध प्रदर्शनों को बल से दबाया जाता है, विपक्षी दलों को प्रतिबंध कर दिया जाता है और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं।

एक ओर कॉन्ग्रेस है, जो संसद में रोजाना लोकतंत्र और संविधान की बात कर लगातार सरकार पर हमलावर रहती है, और दूसरी ओर उसी का मुखपत्र जो लोकतंत्र के नाम पर डूबे हुए बांग्लादेश से भारत को सबक लेने की सीख दे रहा है। असल में कॉन्ग्रेस सिर्फ भारत-विरोधी बात करना जानती है, चाहे उसे भारत से कमतर देश से ही क्यों न भारत की तुलना करनी पड़े।

कॉन्ग्रेस पार्टी बुद्धीजीवी बनकर अपने समाचार पत्र में महिलाओं के आरक्षम की बात करती है, लेकिन जब महिलाओं के अधिकारों की बात आती है तो पीछे हट जाती है। इसका ताजा उदाहरण लोकसभा में देखने को मिला, जब सरकार महिला आरक्षण कानून लेकर आई और कॉन्ग्रेस ने इसका जमकर विरोध किया।

तो कॉन्ग्रेस को नहीं बोलना चाहिए कि भारत को क्या और किससे सीखने की जरूरत है। ये वही लोग हैं जो वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं, EVM की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं, लेकिन बैलेट पेपर की निष्पक्षता उन्हें अच्छी लगती है। ये वही लोग हैं, जो भारत के हित में एक बात कहने में हिचकते हैं, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों की वाहवाही करते नहीं थकते।

बंगाल चुनाव में BJP के लिए 2021 से 2026 तक में क्या बदला, क्यों जीत को लेकर आश्वस्त है पार्टी? समझें मतदान का दूसरा चरण ही सबसे बड़ी चुनौती क्यों

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे चरण के लिए प्रचार का शोर सोमवार (27 अप्रैल 2026) की शाम थम गया। इस चरण में राज्य की महत्वपूर्ण सीटों पर मतदान होना है, जिसके नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएँगे। 2021 की तुलना में 2026 का यह चुनाव न केवल समीकरणों के लिहाज से अलग है, बल्कि बीजेपी की आक्रामकता और टीएमसी की रक्षात्मक मुद्रा ने इसे भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे दिलचस्प मुकाबला बना दिया है।

शोर-शराबे, तीखे नारों और भारी सुरक्षा के बीच बंगाल की राजनीति उस मुहाने पर खड़ी है, जहाँ से राज्य की दशा और दिशा दोनों तय होनी है। 2021 के चुनावों में ‘अबकी बार 200 पार’ का नारा देने वाली बीजेपी ने इस बार अपनी रणनीति में जमीन-आसमान का अंतर पैदा किया है। जहाँ 2021 में एक ‘हवा’ बनाने की कोशिश थी, वहीं 2026 में बीजेपी एक सोची-समझी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तर्ज पर चुनावी मैदान में है।

चुनाव प्रचार का शोर थमने के बाद पर्दे के पीछे की उन रणनीतियों पर चर्चा शुरू हो चुकी होगी, जिन्होंने तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के अभेद्य किले में सेंध लगाने की कोशिश की है। आखिर साल 2021 से 2026 के बीच बीजेपी में क्या बदला? अमित शाह के 15 दिनों के प्रवास से लेकर पीएम मोदी की ’15 गारंटी’ तक और संदेशखाली से लेकर आरजी कर कांड के आक्रोश तक, यहाँ हर उस पहलू का विश्लेषण है जो इस चुनाव को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे दिलचस्प मुकाबला बना रहा है।

साल 2021 से 2026 तक, बीजेपी के लिए क्या बदला?

साल 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी एक ‘उभरती हुई शक्ति’ थी, जिसके पास उत्साह तो था लेकिन संगठन की वैसी गहराई नहीं थी जो टीएमसी के दशकों पुराने कैडर का मुकाबला कर सके। 2021 में बीजेपी का नारा ‘अबकी बार 200 पार’ एक मनोवैज्ञानिक युद्ध था, लेकिन 2026 में पार्टी ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ पर उतर आई है। पिछले पाँच वर्षों में बीजेपी ने बूथ स्तर पर अपने ‘पन्ना प्रमुखों’ की फौज खड़ी की है और टीएमसी के ‘सिंडिकेट राज’ के खिलाफ जमीनी स्तर पर प्रतिरोध तैयार किया है।

सबसे बड़ा बदलाव ‘साख’ का है। 2021 में बीजेपी को ‘बाहरी लोगों की पार्टी’ के रूप में पेश करने में ममता बनर्जी सफल रही थीं। लेकिन 2026 में, सुवेंदु अधिकारी जैसे स्थानीय चेहरों की मजबूती और मतुआ समुदाय के साथ-साथ उत्तर बंगाल में बढ़ते जनाधार ने बीजेपी को ‘बंगाल की अपनी पार्टी’ के रूप में स्थापित कर दिया है। अब बीजेपी केवल रैलियों की पार्टी नहीं रही, बल्कि वह हर पंचायत और हर ब्लॉक में टीएमसी को सीधी टक्कर दे रही है।

तीसरा मुख्य बदलाव विपक्ष की शून्यता है। 2021 तक वामदल और कॉन्ग्रेस के पास फिर भी कुछ उम्मीदें थीं, लेकिन 2026 तक आते-आते ये दल लगभग अप्रासंगिक हो चुके हैं। इसका सीधा लाभ बीजेपी को मिला है, क्योंकि जो मतदाता टीएमसी से नाराज है, उसके पास बीजेपी के अलावा कोई दूसरा व्यावहारिक विकल्प नहीं बचा है। राजनीति के इस ध्रुवीकरण ने बीजेपी को एक ‘प्राकृतिक विकल्प’ बना दिया है।

स्विंग वोटर का मनोविज्ञान, संदेशखाली से लेकर आरजी कर केस तक का प्रभाव

आम तौर पर चुनावों के समय दो तरह के मतदाता होते हैं। पहले वे जो विचारधारा या पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं (कैडर वोट), जो लगभग 20-30% होते हैं। लेकिन असली खेल शेष 70-80% ‘स्विंग वोटर्स’ का होता है। 2026 के चुनाव में यह स्विंग वोटर पूरी तरह से बदल चुका है। संदेशखाली में महिलाओं के साथ हुए अत्याचार और आरजी कर मेडिकल कॉलेज की हृदयविदारक घटना ने बंगाल के मध्यम वर्ग और ग्रामीण महिलाओं की आत्मा को झकझोर दिया है।

आरजी कर कांड ने विशेष रूप से शहरी और शिक्षित मतदाताओं को टीएमसी के खिलाफ खड़ा कर दिया है। जो महिलाएँ कभी ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं की वजह से ममता बनर्जी की मुरीद थीं, आज वे अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। संदेशखाली की घटना ने यह संदेश दिया कि स्थानीय स्तर पर टीएमसी के नेता ‘सामंत’ बन चुके हैं जो कानून से ऊपर हैं। इस आक्रोश ने उन मतदाताओं को बीजेपी की ओर धकेल दिया है जो पहले तटस्थ थे।

बीजेपी ने इस ‘भावना’ को कुशलता से वोट में बदलने का प्रयास किया है। पार्टी ने यह नैरेटिव सेट किया है कि यदि आप अपनी बहू-बेटियों की सुरक्षा चाहते हैं, तो ‘परिवर्तन’ अनिवार्य है। चूँकि वामदल और कॉन्ग्रेस इन मुद्दों पर केवल प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित रहे, इसलिए जनता ने बीजेपी की आक्रामक सड़कों वाली लड़ाई को अधिक विश्वसनीय माना। यही कारण है कि यह विशाल ‘स्विंग वोटर’ इस बार बीजेपी के पक्ष में एक मूक क्रांति (Silent Revolution) की ओर बढ़ रहा है।

ममता सरकार के भ्रष्टाचार पर सीधा प्रहार

ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार इस चुनाव का सबसे बड़ा और ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी हर रैली में टीएमसी को ‘भ्रष्टाचार की जननी’ के रूप में चित्रित किया है। बीजेपी का आरोप है कि टीएमसी के शासन में ‘कट-मनी’ एक आधिकारिक कर बन चुका है। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से शिक्षक भर्ती घोटाले (SSC Scam) और राशन घोटाले का जिक्र करते हुए कहा कि दीदी ने बंगाल के मेधावी युवाओं का भविष्य बेच दिया है।

अमित शाह ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को तिजोरी से निकालकर जनता के बीच पहुँचाया। उन्होंने ईडी (ED) और सीबीआई (CBI) द्वारा जब्त किए गए नोटों के पहाड़ों का जिक्र करते हुए पूछा कि “क्या यह पैसा बंगाल की जनता का नहीं है?” बीजेपी ने डेटा साझा करते हुए बताया कि कैसे केंद्र सरकार द्वारा भेजी गई ‘अम्फान’ और ‘यस’ चक्रवात की राहत राशि टीएमसी के स्थानीय नेताओं की जेबों में चली गई। भ्रष्टाचार के इस मुद्दे ने टीएमसी के ‘ईमानदार छवि’ वाले दावों को तार-तार कर दिया है।

भ्रष्टाचार के इस चक्रव्यूह में बीजेपी ने सिंडिकेट राज को भी निशाना बनाया है। घर बनाने के लिए बालू-मिट्टी से लेकर सरकारी ठेकों तक, हर जगह टीएमसी के बिचौलियों का कब्जा होने की बात कही गई है। मोदी-शाह की जोड़ी ने यह वादा किया है कि बीजेपी की सरकार बनते ही एक विशेष कार्यबल (STF) गठित किया जाएगा जो इन भ्रष्ट नेताओं की संपत्तियों को कुर्क कर गरीबों में बाँटेगा। यह संदेश उन युवाओं के बीच बहुत प्रभावी रहा है जो बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं।

ममता बनर्जी को घेरने की ‘दोहरी चक्रव्यूह’ रणनीति

बीजेपी ने इस बार ममता बनर्जी को उनके ही घर में घेरने के लिए एक विशेष रणनीति अपनाई है। 2021 में नंदीग्राम की लड़ाई ने ममता को अपनी सीट बदलने पर मजबूर किया था, लेकिन 2026 में बीजेपी ने उन्हें दो ऐसी सीटों पर उलझा दिया है जहाँ से उनका जीतना साख का सवाल बन गया है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह है कि ममता बनर्जी पूरे बंगाल में चुनाव प्रचार करने के बजाय अपनी खुद की सीटों को बचाने में अधिक समय खर्च करें।

बीजेपी के वरिष्ठ रणनीतिकारों का मानना है कि यदि मुख्यमंत्री को उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र में ‘असुरक्षित’ महसूस कराया जाए, तो इसका मनोवैज्ञानिक असर पूरे राज्य के कार्यकर्ताओं पर पड़ता है। जब ममता बनर्जी एक ही क्षेत्र में बार-बार रैलियाँ करती हैं, तो बीजेपी इसे “ममता की घबराहट” के रूप में प्रचारित करती है। इससे न केवल टीएमसी का कैडर हतोत्साहित होता है, बल्कि निष्पक्ष मतदाताओं को भी लगता है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन की लहर चल रही है।

इस ‘घेराबंदी’ की रणनीति के तहत बीजेपी ने उन सीटों पर भारी भरकम केंद्रीय मंत्रियों और अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों की फौज उतार दी है। इसका मकसद ममता बनर्जी को यह संदेश देना है कि इस बार लड़ाई केवल विपक्षी दल से नहीं, बल्कि एक संगठित राष्ट्रीय शक्ति से है। बीजेपी का मानना है कि यदि ममता बनर्जी अपनी सीट पर कम अंतर से भी जीतती हैं या कड़े मुकाबले में फंसती हैं, तो यह टीएमसी की नैतिक हार होगी, जिसका फायदा बीजेपी को बाकी के चरणों में मिलेगा।

टीएमसी की राजनीतिक हिंसा, ‘खेला’ बनाम ‘सुरक्षा’

बंगाल की राजनीति में हिंसा एक स्थायी तत्व रही है, लेकिन 2021 के बाद हुई चुनाव बाद की हिंसा (Post-poll violence) ने जनता के मन में गहरा डर पैदा किया था। बीजेपी ने 2026 के चुनाव में इस ‘डर’ को ही अपना हथियार बनाया है। पार्टी का आरोप है कि टीएमसी चुनाव नहीं लड़ती, बल्कि वह प्रशासनिक मशीनरी और अपने ‘गुंडों’ के दम पर चुनाव को ‘हाईजैक’ करती है। बीजेपी ने टीएमसी के ‘खेला होबे’ नारे को हिंसा का प्रतीक बताकर उसके खिलाफ शांति और सुरक्षा’ का विकल्प रखा है।

टीएमसी नेताओं की हिंसा का जिक्र करते हुए बीजेपी ने बताया कि कैसे विपक्षी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जाता है, उनके घर जलाए जाते हैं और उन्हें आर्थिक रूप से सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा है कि “बंगाल में बम और बारूद का कारखाना नहीं, बल्कि उद्योगों का जाल बिछना चाहिए।” हिंसा के मुद्दे पर बीजेपी ने चुनाव आयोग पर भी दबाव बनाया कि संवेदनशील बूथों पर केवल केंद्रीय बलों की तैनाती की जाए, ताकि मतदाता निडर होकर वोट डाल सकें।

बाहरी बनाम भीतर की लड़ाई में बीजेपी की बदली हुई आक्रामक रणनीति

साल 2021 के चुनावों में बीजेपी का पूरा फोकस ‘बाहरी’ बनाम ‘भीतरी’ की लड़ाई को संभालने और एक लहर पैदा करने पर था। उस समय बीजेपी ने टीएमसी के बागियों पर अधिक भरोसा किया था, लेकिन 2026 में रणनीति पूरी तरह बदल चुकी है। अब बीजेपी ने अपने कैडर को तैयार किया है और ‘सॉफ्ट’ के बजाय ‘अनपोलोजेटिक’ (बिना किसी हिचक के) राजनीति का रास्ता चुना है। पार्टी ने इस बार यह समझ लिया है कि बंगाल में केवल जय श्री राम का नारा काफी नहीं है, बल्कि प्रशासनिक भ्रष्टाचार और स्थानीय आक्रोश को संगठन की शक्ति से जोड़ना होगा।

बीजेपी के प्रचार का तरीका अब केवल रैलियों तक सीमित नहीं है। अमित शाह और नितिन नबीन के नेतृत्व में इस बार बूथ स्तर पर ‘पन्ना प्रमुखों’ की सक्रियता 2021 के मुकाबले तीन गुना अधिक देखी जा रही है। 2021 में बीजेपी पर आरोप लगा था कि वह चुनाव के अंत में थक गई थी, लेकिन 2026 के दूसरे चरण तक आते-आते बीजेपी की ऊर्जा कम होने के बजाय बढ़ती दिख रही है। पार्टी ने इस बार टीएमसी के ‘खेला होबे’ का जवाब ‘सेवा और न्याय’ के नैरेटिव से दिया है।

तीसरा बड़ा बदलाव उम्मीदवारों के चयन में है। 2021 में जहाँ दलबदलुओं की भीड़ थी, वहीं 2026 में बीजेपी ने अपने पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को तरजीह दी है। इससे पार्टी के भीतर का असंतोष कम हुआ है। साथ ही चुनाव प्रचार की भाषा में भी तीखापन बढ़ा है। अब बीजेपी रक्षात्मक नहीं है, बल्कि वह टीएमसी के गढ़ में घुसकर सवाल पूछ रही है। यह आक्रामकता केवल भाषणों में नहीं, बल्कि कानूनी लड़ाइयों और सड़क पर होने वाले प्रदर्शनों में भी साफ झलक रही है।

‘घुसपैठिया बनाम भारतीय’ को बनाया राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा

पश्चिम बंगाल में टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत मुस्लिम समर्थन रहा है, जो राज्य की आबादी का लगभग 27-30% है। हालाँकि पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा हमेशा से गरम रहा है, लेकिन 2026 में बीजेपी ने इसे ‘भारतीय बनाम बाहरी’ के एक नए फ्रेम में पेश किया है।

बीजेपी का सीधा आरोप है कि टीएमसी ने अपनी वोट बैंक की राजनीति के लिए राज्य की जनसांख्यिकी (Demography) को बदल दिया है। इस बार बीजेपी ने केवल ‘घुसपैठ’ की बात नहीं की, बल्कि आधार कार्ड के अवैध वितरण और मतदाता सूची में फर्जी नामों के शामिल होने को लेकर चुनाव आयोग में भी कड़ी घेराबंदी की है।

अमित शाह ने अपनी रैलियों में स्पष्ट रूप से कहा है कि घुसपैठ बंगाल के युवाओं के रोजगार और यहाँ के संसाधनों पर डाका डाल रही है। बीजेपी ने सीएए (CAA) के कार्यान्वयन को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया है, जिससे मतुआ समुदाय जैसे शरणार्थी समूहों में उसकी पकड़ और मजबूत हुई है। इसके साथ ही, पार्टी ने यह नैरेटिव सेट किया है कि टीएमसी ‘घुसपैठियों की संरक्षक’ है, जबकि बीजेपी ‘धरती के पुत्रों’ की रक्षक है।

इस रणनीति का एक और पहलू ‘आंतरिक सुरक्षा’ से जुड़ा है। बीजेपी ने सीमावर्ती जिलों में बढ़ते अपराधों और तस्करी को सीधे तौर पर घुसपैठ से जोड़कर स्थानीय लोगों में असुरक्षा की भावना को संबोधित किया है। बीजेपी का तर्क है कि यदि बंगाल को ‘सोनार बांग्ला’ बनाना है, तो सबसे पहले इसकी सीमाओं को सुरक्षित करना होगा। यह मुद्दा विशेष रूप से उत्तर बंगाल और सीमावर्ती दक्षिण बंगाल में बीजेपी के पक्ष में ध्रुवीकरण करने में सहायक सिद्ध हो रहा है।

हालाँकि बीजेपी को भारी मात्रा में मुस्लिम वोट मिलने की उम्मीद नहीं है, लेकिन यदि वह टीएमसी के वोट बैंक में 5-10% की भी सेंध लगा पाती है या उन्हें वोट देने से रोक पाती है, तो यह बीजेपी के लिए बड़ी जीत होगी। यह रणनीति विशेष रूप से उन जिलों में महत्वपूर्ण है जहाँ मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है।

अमित शाह का 15 दिवसीय ‘बंगाल डेरा’

2026 के चुनाव में सबसे चौंकाने वाली बात केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बंगाल में लगातार 15 दिनों तक रुकना है। आमतौर पर राष्ट्रीय नेता रैलियाँ करके लौट जाते हैं, लेकिन शाह ने कोलकाता को अपना अस्थायी मुख्यालय बना लिया है। यह कदम दर्शाता है कि बीजेपी के लिए बंगाल की जीत कितनी महत्वपूर्ण है। शाह का यहाँ रुकना केवल प्रचार के लिए नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर फीडबैक लेने और रणनीति को वास्तविक समय (Real-time) में बदलने के लिए है।

अमित शाह की मौजूदगी ने स्थानीय कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा भर दी है। जब देश का गृह मंत्री स्वयं गलियों में पदयात्रा करता है और छोटे-छोटे समूहों के साथ बैठकें करता है, तो इसका संदेश बहुत गहरा जाता है। शाह ने इस दौरान उन ‘साइलेंट’ मतदाताओं से संपर्क साधने की कोशिश की है जो टीएमसी के डर से खुलकर सामने नहीं आते थे। उनके इस 15 दिवसीय प्रवास ने टीएमसी के उस तंत्र को चुनौती दी है जो प्रशासन के दम पर चुनावों को प्रभावित करने का आरोप झेलता रहा है।

शाह ने इस दौरान ‘डैमेज कंट्रोल’ पर भी ध्यान दिया है। यदि किसी क्षेत्र में टिकट वितरण को लेकर नाराजगी थी, तो उन्होंने स्वयं उसे सुलझाया। इसके अलावा, उन्होंने बंगाल के बुद्धिजीवियों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ बैठकें करके बीजेपी की छवि को ‘बंगाल विरोधी’ होने से बचाया है। शाह का यह ‘मैराथन प्रवास’ टीएमसी के लिए एक बड़ी सिरदर्दी बन गया है, क्योंकि उन्हें अब हर दिन शाह द्वारा उठाए गए नए मुद्दों का जवाब देना पड़ रहा है।

योगी-हिमंता और 6 मुख्यमंत्रियों का ‘हिंदुत्व मोर्चा’

बीजेपी ने इस बार अपने प्रचार को धार देने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा सहित 6 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मैदान में उतारा है। योगी आदित्यनाथ की रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ यह बताने के लिए काफी है कि बंगाल में ‘कठोर शासन’ और ‘हिंदुत्व’ के मॉडल की कितनी मांग है। हिमंता बिस्वा सरमा ने विशेष रूप से घुसपैठ और ‘मिया मुस्लिम’ की राजनीति पर टीएमसी को घेरा है, जो असम के अनुभवों से मेल खाता है।

योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषणों में ‘एंटी-रोमियो स्क्वाड’ और ‘बुलडोजर मॉडल’ का जिक्र कर बंगाल की कानून-व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया है। उनका संदेश साफ है- “जो उत्तर प्रदेश में हो सकता है, वह बंगाल में क्यों नहीं?” यह नैरेटिव उन मतदाताओं को आकर्षित कर रहा है जो राज्य में बढ़ती हिंसा और सिंडिकेट कल्चर से परेशान हैं। अन्य मुख्यमंत्रियों ने अपने राज्यों की विकास गाथाओं को बंगाल के सामने रखकर यह बताने की कोशिश की है कि बीजेपी शासित राज्य विकास की दौड़ में बंगाल से आगे निकल चुके हैं।

इन मुख्यमंत्रियों की तैनाती से बीजेपी ने एक और लक्ष्य साधा है, वो है ‘पैन-इंडिया’ (अखिल भारतीय) उपस्थिति का अहसास कराना। यह दिखाना कि बंगाल की लड़ाई में पूरा भारत बीजेपी के साथ खड़ा है। हिमंता बिस्वा सरमा का आक्रामक अंदाज टीएमसी के अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के दावों की हवा निकाल रहा है, जबकि योगी आदित्यनाथ का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बंगाल के पारंपरिक हिंदू मतदाताओं को एकजुट कर रहा है।

बिना झिझक हिंदुत्व, अमित शाह का ‘बाबरी’ वाला बयान

इस चुनाव में बीजेपी ने अपनी हिंदुत्ववादी छवि को छिपाने की कोशिश नहीं की है। अमित शाह का एक हालिया बयान चर्चा का विषय बना हुआ है जिसमें उन्होंने कहा कि “जब तक बीजेपी का एक भी कार्यकर्ता जीवित है, बंगाल में कोई बाबरी मस्जिद नहीं बनने दी जाएगी।” यहाँ ‘बाबरी मस्जिद’ एक रूपक (Metaphor) है, जिसका उपयोग शाह ने तुष्टिकरण और धार्मिक अतिक्रमण के खिलाफ एक मजबूत स्टैंड लेने के लिए किया है।

यह बयान सीधे तौर पर उन इलाकों को टारगेट करता है जहाँ हिंदुओं को अपनी धार्मिक पहचान और पूजा-पाठ में बाधा आने की शिकायत रहती है। 2021 में बीजेपी जहाँ ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात अधिक कर रही थी, वहीं 2026 में वह ‘हिंदू हितों की रक्षा’ की बात अधिक मुखरता से कर रही है। अमित शाह के इस बयान ने ध्रुवीकरण को चरम पर पहुँचा दिया है, जिससे बीजेपी का कोर वोटर रिचार्ज हो गया है।

बीजेपी ने राम मंदिर निर्माण और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने जैसी उपलब्धियों को बंगाल के गाँव-गाँव तक पहुँचाया है। पार्टी का तर्क है कि यदि केंद्र में बीजेपी हिंदुओं के गौरव को वापस ला सकती है, तो वह बंगाल में भी दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा को ‘बिना किसी डर’ के आयोजित करने का वातावरण सुनिश्चित करेगी। यह आक्रामक हिंदुत्व ही है जो बीजेपी को टीएमसी के ‘इमाम भत्ता’ जैसे तुष्टिकरण के कदमों के खिलाफ एक मजबूत विकल्प के रूप में खड़ा करता है।

बीजेपी के 15 संकल्प: विकास का रोडमैप

बीजेपी ने इस चुनाव के लिए एक विस्तृत घोषणापत्र जारी किया है जिसे ’15 संकल्प’ का नाम दिया गया है। इसमें राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और उद्योग-धंधों को पुनर्जीवित करने का वादा किया गया है। 2021 के मुकाबले यह संकल्प पत्र अधिक शोध-आधारित और बंगाल की विशिष्ट समस्याओं (जैसे जूट उद्योग का पतन, चाय बागान श्रमिकों की समस्या) को संबोधित करने वाला है।

प्रमुख संकल्पों में राज्य कर्मचारियों के लिए 7वें वेतन आयोग को तुरंत लागू करना, किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि के बकाया के साथ अतिरिक्त लाभ देना और ‘सिंडिकेट राज’ को खत्म करने के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन शामिल है। बीजेपी ने वादा किया है कि वह बंगाल को फिर से विनिर्माण (Manufacturing) का केंद्र बनाएगी ताकि यहाँ के युवाओं को काम के लिए बेंगलुरु या पुणे न जाना पड़े।

इसके साथ ही बीजेपी ने आयुष्मान भारत योजना को राज्य में लागू करने का संकल्प लिया है, जिसे ममता सरकार ने अब तक रोक रखा था। इन 15 संकल्पों के माध्यम से बीजेपी ने यह दिखाने की कोशिश की है कि उसके पास केवल ‘नारे’ नहीं, बल्कि बंगाल के पुनर्निर्माण का एक ठोस ‘ब्लूप्रिंट’ भी है। यह विकासवादी चेहरा उन मध्यमवर्गीय और शहरी मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए है जो राजनीति में बदलाव के साथ-साथ स्थिरता भी चाहते हैं।

पीएम मोदी की 15 गारंटी में ‘आधी आबादी’ पर फोकस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार बंगाल की महिलाओं (जिन्हें टीएमसी का पारंपरिक समर्थक माना जाता है) के लिए ’15 गारंटी’ की घोषणा की है। ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना (जिसमें महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाती है) का मुकाबला करने के लिए मोदी ने इस राशि को बढ़ाकर 3000 रुपए करने और सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 33% आरक्षण देने की गारंटी दी है।

पीएम मोदी ने अपनी रैलियों में “मेरी माताओं और बहनों” को संबोधित करते हुए यह याद दिलाया है कि केंद्र की उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन और मुफ्त राशन का सबसे अधिक लाभ उन्हें ही मिला है। मोदी की गारंटी का मतलब है – भरोसा। बीजेपी का मानना है कि बंगाल की महिलाएँ अब केवल नकद सहायता से संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि वे अपने बच्चों के लिए सुरक्षा और रोजगार भी चाहती हैं।

इस बार ‘साइलेंट वोटर’ यानी महिलाओं का रुझान बीजेपी की ओर बढ़ा है। इसके पीछे का एक बड़ा कारण राशन वितरण में भ्रष्टाचार और स्थानीय टीएमसी नेताओं का व्यवहार भी है। मोदी ने महिलाओं के सशक्तिकरण को अपनी प्राथमिकता बताकर ममता बनर्जी के ‘महिला मुख्यमंत्री’ होने के भावनात्मक लाभ को कम करने का प्रयास किया है। अगर इस चुनाव में महिला मतदाताओं का 10-15% हिस्सा भी बीजेपी की ओर झुकता है, तो नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं।

आरजी कर कांड के बाद से महिला सुरक्षा का मुद्दा

अगस्त 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुई वीभत्स घटना ने पूरे बंगाल को हिलाकर रख दिया था। 2026 के चुनाव में यह मुद्दा एक बड़ा चुनावी हथियार बनकर उभरा है। बीजेपी ने इसे केवल एक अपराध के रूप में नहीं, बल्कि ‘सिस्टम की विफलता’ और ‘अपराधियों के संरक्षण’ के रूप में पेश किया है। इस कांड के बाद हुए बड़े-बड़े नागरिक प्रदर्शनों और ‘रेक्लेम द नाइट’ जैसे अभियानों ने टीएमसी सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुँचाया है।

बीजेपी का आरोप है कि ममता सरकार ने सबूतों को मिटाने और दोषियों को बचाने की कोशिश की। रैलियों में आरजी कर की पीड़िता का जिक्र कर बीजेपी महिला मतदाताओं को यह एहसास करा रही है कि “दीदी के राज में कोई सुरक्षित नहीं है।” यह मुद्दा शहरी और शिक्षित क्षेत्रों में टीएमसी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है, जहाँ लोग शासन में जवाबदेही और सुरक्षा की माँग कर रहे हैं।

इस घटना ने डॉक्टरों, छात्रों और बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग को सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया है। बीजेपी ने इस आक्रोश को चुनावी मोड में बदलते हुए वादा किया है कि वह राज्य में ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ और महिला सुरक्षा के लिए ‘पैनिक बटन’ जैसी व्यवस्था लागू करेगी। आरजी कर कांड केवल एक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह टीएमसी के ‘कानून के शासन’ के दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न बन गया है।

संदेशखाली में हिंदू-मुस्लिम समीकरण और TMC के स्थानीय मुस्लिम नेताओं का अत्याचार

उत्तर 24 परगना का संदेशखाली इलाका 2026 के चुनाव का एक और केंद्र बिंदु है। यहाँ की महिलाओं द्वारा टीएमसी नेताओं (जैसे शाहजहाँ शेख) पर लगाए गए यौन उत्पीड़न और जमीन हड़पने के आरोपों ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया था। बीजेपी ने इस मुद्दे को ‘हिंदू पीड़ित बनाम कट्टरपंथी मुस्लिम समर्थक’ के रूप में फ्रेम किया है। संदेशखाली की घटनाओं ने यह संदेश दिया कि टीएमसी के स्थानीय नेता किस हद तक निरंकुश हो चुके हैं। शेख शाहजहाँ के खिलाफ 700 मामले दर्ज हो चुके हैं।

संदेशखाली की लड़ाई ने हिंदू मतदाताओं के भीतर के उस डर को जगाया है जो लंबे समय से दबा हुआ था। बीजेपी ने यहाँ की पीड़ित महिलाओं को सम्मान देने और उन्हें इंसाफ दिलाने का वादा करके पूरे राज्य में एक संदेश भेजा है। यह मुद्दा केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने बंगाल के ग्रामीण इलाकों में टीएमसी के खिलाफ एक माहौल तैयार किया है।

बीजेपी का तर्क है कि संदेशखाली की घटना टीएमसी के ‘वोट बैंक’ मॉडल का नतीजा है, जहाँ अपराधियों को धर्म और राजनीति का संरक्षण मिलता है। इस नैरेटिव ने उन इलाकों में बीजेपी को फायदा पहुँचाया है जहाँ डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। संदेशखाली ने हिंदू समाज के विभिन्न वर्गों को, जाति से ऊपर उठकर, अपनी सुरक्षा के लिए एकजुट होने का एक साझा मंच प्रदान किया है।

TMC की राजनीतिक हिंसा यानी ‘बम और बारूद’ की राजनीति पर घेराबंदी

पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा एक दुखद वास्तविकता रही है, जिसे बीजेपी ने इस बार अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया है। बीजेपी नेतृत्व का आरोप है कि टीएमसी चुनाव जीतने के लिए लोकतांत्रिक तरीकों के बजाय ‘बम, गोली और डराने-धमकाने’ की राजनीति पर भरोसा करती है। संदेशखाली से लेकर वीरभूम तक, हिंसा के पैटर्न को बीजेपी ने ‘स्टेट स्पॉन्सर्ड’ (राज्य द्वारा प्रायोजित) बताया है। अमित शाह ने स्पष्ट कहा है कि बंगाल में ‘खेला होबे’ का असली अर्थ विपक्षी कार्यकर्ताओं की हत्या और उनके घरों को जलाना बन गया है।

दूसरे चरण के मतदान से पहले, बीजेपी ने उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है जहाँ ‘बाहुबलियों’ का दबदबा है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि टीएमसी के स्थानीय नेता मतदाताओं को डरा रहे हैं ताकि वे बूथ तक न पहुँचें। इस हिंसा के खिलाफ बीजेपी ने ‘सुरक्षा और लोकतंत्र की बहाली’ का नारा दिया है। पार्टी का तर्क है कि जब तक टीएमसी का ‘डर का साम्राज्य’ खत्म नहीं होगा, तब तक बंगाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं। आरजी कर कांड के बाद पुलिस प्रशासन की भूमिका पर उठे सवालों ने बीजेपी के इस आरोप को और बल दिया है कि शासन और अपराधी अब एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं।

मतदान का दूसरा चरण बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्यों?

बंगाल चुनाव का दूसरा चरण बीजेपी और टीएमसी दोनों के लिए अग्निपरीक्षा है। इस चरण में जिन सीटों पर मतदान होना है, उनमें से कई ‘मुस्लिम बाहुल्य’ क्षेत्र हैं जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर। ऐतिहासिक रूप से ये इलाके टीएमसी और कांग्रेस के गढ़ रहे हैं। यहाँ बीजेपी के लिए जीत हासिल करना पहाड़ चढ़ने जैसा है, लेकिन इस बार समीकरण थोड़े अलग हैं।

इन क्षेत्रों में टीएमसी को इस बार ‘त्रिकोणीय’ और ‘चतुष्कोणीय’ मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है। असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और हुमायूँ कबीर जैसे नेताओं की सक्रियता ने मुस्लिम वोट बैंक में बिखराव की स्थिति पैदा कर दी है। इसके अलावा इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) भी अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। बीजेपी को उम्मीद है कि यदि मुस्लिम वोट बंटते हैं, तो वह ध्रुवीकरण के सहारे इन ‘अभेद्य’ सीटों पर भी कमल खिला सकती है।

दूसरा चरण इसलिए भी कठिन है क्योंकि यहाँ चुनावी हिंसा की संभावना सबसे अधिक रहती है। इन क्षेत्रों में बूथ कैप्चरिंग और डराने-धमकाने की खबरें अक्सर आती हैं। बीजेपी ने चुनाव आयोग से इन इलाकों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की माँग की है। बीजेपी जानती है कि यदि उसने दूसरे चरण के ‘मुस्लिम बेल्ट’ में अपनी स्थिति सुधार ली, तो आगे की राह बहुत आसान हो जाएगी।

ऑपइंडिया का विश्लेषण समझाता है बदलते हुए मुस्लिम वोटिंग के पैटर्न को

ऑपइंडिया के एक लेख में हमने एक महत्वपूर्ण पैटर्न की ओर इशारा किया है। पहले मुस्लिम वोट बैंक का एकमात्र लक्ष्य ‘बीजेपी को हराना’ होता था, जिसके लिए वे सबसे मजबूत गैर-बीजेपी पार्टी (अक्सर टीएमसी) को एकमुश्त वोट देते थे। लेकिन अब रुझान बदल रहा है। महाराष्ट्र और बिहार की तरह बंगाल में भी मुस्लिम मतदाता अब अपनी ‘स्वयं की पहचान’ वाली कट्टरपंथी इस्लामी पार्टियों (जैसे AIMIM या ISF) की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

इस बदलाव के दो मुख्य कारण हैं: पहला, टीएमसी द्वारा किए गए वादों और हकीकत के बीच का अंतर। दूसरा, मुस्लिम युवाओं के भीतर यह भावना कि मुख्यधारा की पार्टियाँ केवल उनका इस्तेमाल करती हैं और उन्हें वास्तविक नेतृत्व नहीं देतीं। यदि बंगाल के मुस्लिम मतदाता टीएमसी को छोड़कर ओवैसी या हुमायूँ कबीर की ओर झुकते हैं, तो यह सीधे तौर पर बीजेपी को फायदा पहुँचाएगा क्योंकि इससे टीएमसी का ‘विनिंग कॉम्बिनेशन’ टूट जाएगा।

बीजेपी इस बिखराव का चुपचाप इंतजार कर रही है। उसे पता है कि उसे इन वोटों को पाने की जरूरत नहीं है, बस इनका टीएमसी से दूर होना ही उसकी जीत का रास्ता साफ कर देगा। यह वही पैटर्न है जिसने यूपी में सपा-बसपा और बिहार में महागठबंधन को नुकसान पहुँचाया था। यदि दूसरे चरण में यह पैटर्न जमीन पर उतरता है, तो टीएमसी का सबसे मजबूत किला ढह सकता है।

फिलहाल नतीजों का इंतजार

बंगाल चुनाव 2026 का दूसरा चरण केवल सीटों का चुनाव नहीं है, बल्कि यह इस बात का फैसला करेगा कि बंगाल ‘तुष्टिकरण और हिंसा’ के रास्ते पर चलेगा या ‘विकास और सुरक्षा’ के। बीजेपी ने 2021 की गलतियों से सीखकर एक ऐसा ‘चक्रव्यूह’ रचा है जिसमें टीएमसी फंसी हुई नजर आ रही है।

वैसे भी पश्चिम बंगाल के इस महासमर का दूसरा चरण बीजेपी के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति है। जहाँ टीएमसी अपनी सत्ता बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है, वहीं बीजेपी एक नए, विकसित और सुरक्षित बंगाल का सपना दिखाकर लोगों को साथ जोड़ रही है। आरजी कर कांड का गुस्सा, संदेशखाली का दर्द और मोदी की गारंटी बनाम ममता की लक्ष्मी भंडार इन सबके बीच बंगाल का आम आदमी खड़ा है।

क्या अमित शाह का 15 दिन का संघर्ष रंग लाएगा? क्या योगी-हिमंता का हिंदुत्व मॉडल बंगालियों को पसंद आएगा? या फिर ममता बनर्जी एक बार फिर अपने ‘फाइटर’ अंदाज से सबको चौंका देंगी? इन सभी सवालों के जवाब 4 मई को ईवीएम खुलने के साथ मिलेंगे। लेकिन एक बात साफ है कि साल 2026 का यह चुनाव केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि बंगाल की आत्मा को फिर से परिभाषित करने की लड़ाई है।

भारत-न्यूजीलैंड FTA साइन, एक्सपोर्ट पर टैक्स खत्म-युवाओं को स्पेशल वीजा: जानें भारतीयों को होंगे इससे क्या-क्या फायदे

भारत और न्यूजीलैंड के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर सोमवार (27 अप्रैल 2026) को औपचारिक हस्ताक्षर हो गए हैं। दोनों देशों ने मार्च 2025 में इस समझौते पर बातचीत शुरू करने की घोषणा की थी और कई दौर की गहन वार्ताओं के बाद आखिरकार यह डील अंतिम रूप तक पहुँची। यह समझौता भारत की इंडो-पैसिफिक व्यापार रणनीति को मजबूत करेगा, वहीं न्यूजीलैंड के लिए दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित करेगा।

इस FTA समझौते पर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और न्यूजीलैंड के व्यापार और निवेश मंत्री टॉड मैकले की मौजूदगी में औपचारिक हस्ताक्षर होंगे। इससे पहले रविवार (26 अप्रैल 2026) को मंत्री पीयूष गोयल ने समझौते के बारे में बताते हुए कहा, “ये FTA दरवाजे और सोच दोनों खोलता है। उद्योग को सामान्य से परे सोचना होगा और समझौते के पूरे दायरे का उपयोग करना होगा।”

उन्होंने यह भी बताया कि इस FTA से दोनों देशों के व्यापार, निवेश और रोजगार को बड़ा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। भारत के निर्यातकों को न्यूजीलैंड के बाजार में कई उत्पादों पर शुल्क-मुक्त पहुँच मिलेगी, जिससे कृषि, वस्त्र, फार्मा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र को फायदा होगा। वहीं न्यूजीलैंड की कंपनियों को भारत के विशाल उपभोक्ताओं वाले बाजार में बेहतर अवसर मिलेंगे।

10 सालों में हुआ भारत-न्यूजीलैंड के बीच FTA

दरअसल, भारत और न्यूजीलैंड के बीच इस FTA की नींव असल में 2010 में रखी गई थी, 9 दौर की बातचीत के बाद 2015 में इस बातचीत पर लगाम लग गई थी। फिर मार्च 2025 में FTA पर बातचीत को दोबारा शुरू किया गया, जब दोनों देशों ने औपचारिक रूप से FTA वार्ता शुरू करने की घोषणा की। इसके बाद कई चरणों में बातचीत हुई, जिसमें वस्तुओं, सेवाओं, निवेश, डिजिटल व्यापार और पेशेवरों की आवाजाही जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। 10 महीने की लंबी बातचीत के बाद 22 दिसंबर 2025 में दोनों पक्ष प्रमुख शर्तों पर सहमत हुए और समझौते को अंतिम रूप दिया गया।

भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, यह समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई दिशा देगा और द्विपक्षीय व्यापार को बेहतर तरीके से बढ़ाएगा। फिलहाल भारत और न्यूजीलैंड के बीच द्विपक्षीय व्यापार 1.7 अरब डॉलर (लगभग ₹14,100 करोड़) के आसपास है, जिसे आने वाले वर्षों में कई गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। न्यूजीलैंड सरकार ने भी इसे अपने निर्यातकों, निवेशकों और सेवा क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक अवसर बताया है।

समझौते से भारत को क्या होगा फायदा?

भारत-न्यूजीलैंड के बीच यह समझौता भारतीय कारोबार, निवेश और रोजगार के लिए बड़ा अवसर लेकर आया है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि समझौता लागू होते ही भारत के सभी 8,284 निर्यात उत्पादों को न्यूजीलैंड के बाजार में 100 प्रतिशत ड्यूटी-फ्री पहुँच मिल जाएगी। पहले भारतीय सामान पर औसतन 2.2 प्रतिशत शुल्क लगता था, जबकि करीब 450 उत्पादों पर यह 10 प्रतिशत तक पहुँच जाता था। अब यह पूरी तरह खत्म हो जाएगा, जिससे भारतीय उत्पाद वहाँ और सस्ते और प्रतिस्पर्धी बनेंगे।

इसका सीधा लाभ टेक्सटाइल, रेडीमेड गारमेंट्स, लेदर, फुटवियर, इंजीनियरिंग गुड्स, केमिकल्स, इलेक्ट्रिकल्स, फूड प्रोसेसिंग और कृषि उत्पादों को मिलेगा। खासतौर पर आगरा के चमड़ा उद्योग को बड़ी राहत मिलेगा, क्योंकि यहाँ देश के करीब 75 प्रतिशत लेदर फुटवियर का उत्पादन होता है। लेदर और फुटवियर पर लगने वाला 5 प्रतिशत शुल्क अब शून्य हो जाएगा। वस्त्र, होम टेक्सटाइल, हैंडलूम और मैन-मेड फाइबर को भी तुरंत ड्यूटी-फ्री एंट्री मिलेगी।

फार्मा और मेडिकल डिवाइस सेक्टर के लिए भी यह समझौता बेहद अहम है। न्यूजीलैंड अब भारतीय कंपनियों के GMP और GCP प्रमाणन को मान्यता देगा। इससे बार-बार होने वाले निरीक्षण खत्म होंगे, लागत घटेगी और भारतीय दवाओं व मेडिकल उपकरणों को वहाँ तेजी से मंजूरी मिल सकेगी। इसके अलावा AYUSH- जैसे आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी को भी इस समझौते में विशेष मान्यता दी गई है।

साथ ही भारतीय पेशेवरों के लिए विशेष वीजा व्यवस्था की गई है। शुरुआती तीन वर्षों के लिए हर साल 1,667 अस्थायी रोजगार वीजा जारी किए जाएँगे और कुल 5000 भारतीय पेशेवर एक समय में इस योजना का लाभ उठा सकेंगे।

समझौते से न्यूजीलैंड को क्या होगा फायदा?

भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता न्यूजीलैंड के लिए बहुत बड़ा मौका है। इस समझौते के तहत भारत, न्यूजीलैंड से आने वाले करीब 95% सामान पर आयात शुल्क कम करेगा या पूरी तरह हटा देगा। इसमें कीवीफ्रूट, चेरी, ब्लूबेरी, एवोकाडो, वाइन, ऊन, लकड़ी, समुद्री उत्पाद, मनुका हनी और कोयला जैसे प्रमुख उत्पाद शामिल हैं। इनमें से कई उत्पादों को समझौता लागू होते ही भारत में बिना किसी शुल्क के प्रवेश मिल जाएगा। इससे न्यूजीलैंड की कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में कारोबार करना आसान और सस्ता हो जाएगा।

भारत दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता बड़ा उपभोक्ता बाजार है। ऐसे में न्यूजीलैंड के किसानों, बागवानी कारोबारियों और खाद्य कंपनियों को 140 करोड़ से ज्यादा उपभोक्ताओं तक पहुँच मिलेगी। न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने इसे ‘पीढ़ियों में एक बार मिलने वाला अवसर’ बताया है। उनका कहना है कि इस समझौते से देश के कृषि, बागवानी, वाइन, समुद्री खाद्य और फूड प्रोसेसिंग सेक्टर को बड़ा फायदा होगा।

इसके अलावा, न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में 20 अरब डॉलर (लगभग ₹1,88,397 करोड़) निवेश करने की योजना बनाई है। यह निवेश बुनियादी ढाँचे, विनिर्माण, कृषि तकनीक, शिक्षा, पर्यटन और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है। इससे न्यूजीलैंड की कंपनियों को भारत में लंबे समय तक कारोबार बढ़ाने का मौका मिलेगा। कुल मिलाकर, यह समझौता न्यूजीलैंड के निर्यात, निवेश और रोजगार को नई रफ्तार देने वाला साबित हो सकता है।