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केजरीवाल ने गुजरात में AAP अध्यक्ष समेत कई नेताओं पर दर्ज FIR को बताया राजनीतिक लेकिन हकीकत छिपाई: मिस्टर अरविंद, ये मामले वसूली-मारपीट-किडनैपिंग के हैं

द्वारका में अप्रैल महीने के पहले ही दिन आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेताओं ने ऐसा हंगामा काटा कि वो जेल पहुँच गए। जानकारी के मुताबिक, जाम खंभालिया पुलिस स्टेशन में हंगामा करने के आरोप में आम आदमी पार्टी के गुजरात प्रदेश अध्यक्ष येसुदान गढ़वी और उनके 17 समर्थकों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

इस घटना के बाद आम आदमी पार्टी के गुजरात और केंद्रीय नेतृत्व ने इसे लेकर राजनीतिक बयानबाजी शुरू कर दी है। बिना पूरी सच्चाई सामने लाए सिर्फ आरोप लगाकर माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। इसी बीच AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने भी इस मामले पर बयान दिया और दावा किया कि गुजरात में भाजपा सरकार राजनीतिक बदले की भावना से काम कर रही है।

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पिछले तीन महीनों में आम आदमी पार्टी के नेताओं के खिलाफ 145 FIR दर्ज की गई हैं और 160 से ज्यादा कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया है। केजरीवाल ने खास तौर पर येसुदान गढ़वी की गिरफ्तारी का जिक्र करते हुए इसे तानाशाही बताया, हालाँकि उनके ये दावे वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाते।

अरविंद केजरीवाल का यह दावा काफी बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया लगता है। उन्होंने यह साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया कि 145 FIR दर्ज हुई हैं और 160 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आम आदमी पार्टी की ओर से भी ऐसी कोई आधिकारिक सूची सामने नहीं आई है, जिससे इन आंकड़ों की पुष्टि हो सके।

केजरीवाल यह भी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि गुजरात में आम आदमी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ राजनीतिक वजहों से केस दर्ज किए जा रहे हैं। हालाँकि, हकीकत यह है कि गुजरात में समय-समय पर AAP नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज होते रहे हैं, लेकिन वे सीधे तौर पर राजनीति से जुड़े नहीं हैं।

कुछ मामलों में नेताओं पर शराब से जुड़े आरोप लगे हैं, जबकि कुछ अपहरण जैसे गंभीर मामलों में जेल भी जा चुके हैं। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी के कुछ कार्यकर्ता मारपीट और जबरन वसूली जैसे मामलों में भी फंसे हैं।

येसुदास गढ़वी का मामला: आखिर हुआ क्या था?

अरविंद केजरीवाल द्वारा जिस मामले का जिक्र किया गया है, वह देवभूमि द्वारका जिले के जाम खंभालिया पुलिस स्टेशन से जुड़ा है। बुधवार (1 अप्रैल 2026) को आम आदमी पार्टी (AAP) के गुजरात प्रदेश अध्यक्ष येसुदान गढ़वी समेत 30 से ज्यादा कार्यकर्ता वहाँ पहुँचे और थाने में हंगामा किया।

यह पूरा मामला AAP कार्यकर्ता दीपक के खिलाफ दर्ज चेन छीनने के केस को लेकर था। पुलिस के मुताबिक, दीपक जो मूल रूप से बिहार का रहने वाला है, उसके खिलाफ मंगलवार (31 मार्च 2026) को लूट का मामला दर्ज किया गया था।

AAP नेताओं का कहना था कि यह केस झूठा है, इसलिए येसुदान गढ़वी, द्वारका जिला अध्यक्ष रामजी परमार और अन्य कार्यकर्ता सुबह पुलिस स्टेशन पहुँचे और माँग करने लगे कि दीपक पर दर्ज केस हटाया जाए और किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज किया जाए।

जब पुलिस ने उनकी माँग मानने से इनकार कर दिया, तो कार्यकर्ताओं ने थाने के अंदर हंगामा शुरू कर दिया। उन्होंने पुलिस के काम में बाधा डाली, पुलिसकर्मियों से धक्का-मुक्की की, बहस की और वहाँ की लाइव रिकॉर्डिंग भी की। इतना ही नहीं, उन्होंने पुलिस रजिस्टर देखने की भी माँग की जिससे माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो गया।

स्थिति बिगड़ने पर पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी। पुलिस ने येसुदान गढ़वी समेत 18 लोगों को हिरासत में लिया और कुल 30 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया, जिनमें 18 नामजद और बाकी अज्ञात शामिल हैं।

इन पर दंगा करने, सरकारी काम में बाधा डालने, गैरकानूनी तरीके से भीड़ इकट्ठा करने जैसे आरोप लगाए गए हैं। पुलिस उपाधीक्षक विस्मय मनसेटा के अनुसार, आरोपियों ने पुलिस पर दबाव बनाने और लोक सेवकों को धमकाने की भी कोशिश की।

घटना सामने आने के बाद अरविंद केजरीवाल समेत आम आदमी पार्टी के कई नेताओं ने पुलिस कार्रवाई को राजनीतिक बदले की भावना और भाजपा की साजिश बताया। केजरीवाल ने कहा कि गुजरात में AAP कार्यकर्ताओं पर राजनीतिक दबाव बढ़ाया जा रहा है।

वहीं AAP नेता गोपाल इटालिया और चैतर वासावा ने भी विरोध जताते हुए इस कार्रवाई को धमकी और दमन करार दिया। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना था कि वे सिर्फ अपने साथी से मिलने और कथित झूठे मामले के खिलाफ अपनी बात रखने के लिए थाने गए थे।

वहीं पुलिस ने साफ किया कि यह कोई सामान्य या शांतिपूर्ण विरोध नहीं था, बल्कि उनके काम में सीधा हस्तक्षेप किया गया। पुलिस के अनुसार, कार्यकर्ताओं ने थाने में हंगामा किया और कानून-व्यवस्था को बिगाड़ा। हालात को संभालने के लिए DSP, LCB और SOG की टीमें भी मौके पर पहुँचीं।

इसके बाद येसुदान गढ़वी समेत अन्य लोगों को हिरासत में लिया गया। बाद में सभी को जमानत मिल गई, लेकिन मामला अभी भी जारी है और जाँच चल रही है।

आप नेताओं का पहले भी रहा है आपराधिक इतिहास

युवराज सिंह घोटाला : आम आदमी पार्टी के नेता युवराज सिंह जडेजा को प्रतियोगी परीक्षाओं में हुए ‘डमी घोटाले’ के मामले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी छात्रों के नाम उजागर करने की धमकी देकर दो लोगों से करीब 1 करोड़ रुपए की उगाही की।

जाँच के दौरान सबूतों में सहयोग न करने के कारण उन्हें जेल भेज दिया गया था। हालाँकि बाद में अदालत ने उनकी जमानत याचिका मंजूर कर ली। जमानत मिलने के बाद उन्हें कुछ सख्त शर्तों का पालन करना होगा, जैसे अपना पासपोर्ट जमा करना, जाँच एजेंसी के साथ पूरा सहयोग करना, किसी गवाह को धमकाना नहीं और कोर्ट की अनुमति के बिना गुजरात से बाहर नहीं जाना।

स्कूल में नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ के आरोपी AAP नेता : राजकोट के कोठारिया रोड स्थित सरस्वती एजुकेशनल कॉम्प्लेक्स स्कूल में 2024 में प्रिंसिपल राकेश  सोरथिया के साथ उनके ही स्कूल में पढ़ने वाली 11 से 14 साल की चार नाबालिग लड़कियों से छेड़छाड़ का मामला सामने आया।

अभिभावकों द्वारा शिकायत दर्ज कराने के बाद, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि आरोपित ने छात्राओं को अपने कार्यालय में बुलाया और उनसे शारीरिक संपर्क और अश्लील माँगें रखीं, भक्तिनगर पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने पहले ही छेड़छाड़ के आरोपों में शामिल इस नेता के खिलाफ IPC और POCSO के तहत मामला दर्ज किया गया था।

आम आदमी पार्टी के पार्षद पर जबरन वसूली का मामला दर्ज : सूरत के मोटा वराछा इलाके में एक स्टेशनरी दुकानदार को धमकाकर उससे 1 लाख रुपए की फिरौती माँगने के मामले में आम आदमी पार्टी के पार्षद राजेश मोर्डिया और उनके साथी पंकज पटेल को उतरन पुलिस ने गिरफ्तार किया।

आरोप है कि दोनों ने दुकानदार को काम बंद कराने की धमकी दी और उसे डराने-धमकाने के लिए हथियार (पैडल) भी दिखाया। इसके अलावा, इन पर एक किसान से 50000 रुपए की जबरन वसूली करने का भी आरोप लगा है।

इस मामले के सामने आने के बाद विरोध बढ़ा, जिसके चलते आम आदमी पार्टी ने कार्रवाई करते हुए राजेश मोर्डिया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया।

महिला कर्मचारी का अपहरण और जान से मारने की धमकी : हाल ही में गाँधीनगर के सेक्टर-25 GIDC में स्थित HBC लाइफ साइंसेज कंपनी से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया। कंपनी के मालिक और आम आदमी पार्टी के राज्य उपाध्यक्ष हसमुख पटेल को एक महिला लेखाकार के अपहरण और मारपीट के आरोप में गिरफ्तार किया गया।

बताया गया कि कंपनी में 80 से 85 लाख रुपए के संदिग्ध लेनदेन और गुमनाम खातों का पता लगाने के बाद इस महिला कर्मचारी को निशाना बनाया गया। आरोप है कि हसमुख पटेल के इशारे पर उसे जबरन अगवा किया गया और चलती गाड़ी में उसके साथ मारपीट की गई, साथ ही जान से मारने की धमकी भी दी गई।

जब पीड़िता ने मदद माँगने की कोशिश की, तो उस पर पुलिस में शिकायत न करने का दबाव भी बनाया गया। हालाँकि, बाद में सेक्टर-21 पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया और हसमुख पटेल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई।

अहमदाबाद में आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष पर धोखाधड़ी और धमकी का आरोप : घाटलोडिया पुलिस ने आम आदमी पार्टी के शहर उपाध्यक्ष और साबरमती विधानसभा प्रभारी अमित पंचाल और उनके पिता को गिरफ्तार किया है। उन पर एक राजमिस्त्री का 43 लाख रुपए का बकाया मजदूरी भुगतान न करने और जान से मारने की धमकी देने का आरोप है।

मेमनगर निवासी धनपाल यादव की शिकायत के अनुसार, अमित पंचाल ने उनके घर के प्लास्टर के काम के बदले करीब 5 लाख रुपए का सीमेंट का सामान भी ले लिया था। जब राजमिस्त्री अपने पैसे लेने गया, तो उसे नहर में फेंकने की धमकी दी गई।

इस मामले में पुलिस ने पहले ही धमकी और अन्य आरोपों को लेकर अलग-अलग धाराओं में केस दर्ज किया था और अब कानूनी कार्रवाई करते हुए दोनों को गिरफ्तार कर लिया है।

चैतर वासवा पर महिला पंचायत अध्यक्ष के साथ अभद्र व्यवहार का आरोप : डेडियापाड़ा पुलिस ने आम आदमी पार्टी के शहर उपाध्यक्ष और साबरमती विधानसभा प्रभारी अमित पंचाल और उनके पिता को गिरफ्तार किया है। उन पर एक राजमिस्त्री का 43 लाख रुपए का बकाया मजदूरी भुगतान न करने और जान से मारने की धमकी देने का आरोप है।

जब महिला ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो उन्होंने भाजपा नेता पर मोबाइल फोन और पानी का गिलास फेंककर हमला कर दिया ।

मेमनगर निवासी धनपाल यादव की शिकायत के अनुसार, अमित पंचाल ने उनके घर के प्लास्टर के काम के बदले करीब 5 लाख रुपए का सीमेंट का सामान भी ले लिया था। जब राजमिस्त्री अपने पैसे लेने गया, तो उसे नहर में फेंकने की धमकी दी गई।

इसके अलावा, वासवा पर वन विभाग के एक कर्मचारी को अपने घर बुलाकर धमकाने और उसकी पिटाई करने का भी आरोप है। इस मामले में पुलिस ने पहले ही धमकी और अन्य आरोपों को लेकर अलग-अलग धाराओं में केस दर्ज किया था और अब कानूनी कार्रवाई करते हुए दोनों को गिरफ्तार कर लिया है।

इसके अलावा, जूनागढ़ पुलिस ने महिला PSI एस एन सोनारा पर अश्लील टिप्पणी करने के आरोप में पाँच AAP समर्थकों को गिरफ्तार किया। महिसागर जिले में AAP अध्यक्ष बाबू दामोर को सरकारी जमीन पर मकान बनाने के आरोप में पकड़ा गया। वहीं सूरत के पार्षद जीतू कछड़िया पर पार्किंग ठेकेदार से 10 लाख रुपए की रिश्वत माँगने का आरोप लगा।

अस्पताल कर्मचारी ने जान से मारने की धमकी दी : सूरत के स्मेर अस्पताल में आयुष्मान कार्ड विभाग के एक कर्मचारी को गाली देने और थप्पड़ मारने के आरोप में आम आदमी पार्टी के पार्षद विपुल सुहागिया को वराछा पुलिस ने गिरफ्तार किया।

शिकायत के अनुसार, जब खिड़की पर भीड़ थी, तब वह केबिन में घुस आए और फोन क्यों नहीं उठा रहे हो? कहते हुए झगड़ा शुरू कर दिया। गुस्से में उन्होंने कर्मचारी को थप्पड़ मारा और जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद पुलिस ने सरकारी काम में बाधा डालने और मारपीट जैसी धाराओं में केस दर्ज किया।

इन घटनाओं को देखने पर अरविंद केजरीवाल के उस दावे पर सवाल खड़े होते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि गुजरात में AAP नेताओं पर कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से हो रही है। 145 Fir वाले उनके दावे की जाँच करने पर यह सामने आता है कि कई मामले व्यक्तिगत और गंभीर अपराधों से जुड़े हैं, न कि किसी जन आंदोलन या राजनीतिक विरोध से।

द्वारका में येसुदान गढ़वी और अन्य कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी भी इसी बात की ओर इशारा करती है कि पुलिस थाने जैसे संवेदनशील स्थानों पर दबाव बनाने और कानूनी प्रक्रिया में दखल देने की कोशिश की गई। थाने में हंगामा करना और अपराध में पकड़े गए लोगों को छुड़ाने के लिए दबाव बनाना लोकतांत्रिक विरोध नहीं, बल्कि अराजकता फैलाने जैसा है।

केजरीवाल जिस तानाशाही की बात करते हैं, उसमें सामने आए मामलों में जबरन वसूली, अपहरण, मारपीट और रिश्वत जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। युवराज सिंह जडेजा का मामला हो या सूरत के पार्षदों पर लगे आरोप ये सभी सीधे आम लोगों से जुड़े अपराध हैं।

अस्पताल कर्मचारियों या सरकारी कर्मचारियों के साथ मारपीट और धमकी की घटनाएँ भी सामने आई हैं। सूरत के आम आदमी पार्टी पार्षद जीतू कछड़िया पर पार्किंग ठेकेदार से 10 लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप भी लगा ।

पुलिस के अनुसार, इन मामलों में शिकायतकर्ताओं के बयान और सबूत मौजूद हैं। अगर ये मामले पूरी तरह झूठे होते, तो अदालतें इन्हें खारिज कर देतीं। लेकिन कई मामलों में जमानत सख्त शर्तों के साथ मिली या शुरुआती स्तर पर आरोप गंभीर पाए गए, जिससे यह संकेत मिलता है कि इन मामलों में पहली नजर में आरोप बनते हैं।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।



जन विश्वास विधेयक 2026 पास, छोटे अपराधों के लिए जेल नहीं बल्कि जुर्माना: समझें आम लोगों-कारोबारियों की जिंदगी को कैसे आसान बना रही मोदी सरकार

भारत की संसद ने हाल ही में एक ऐसा विधेयक पारित किया है, जिसे देश के कानूनी ढाँचे में बड़े बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह है जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2026। यह विधेयक गजट नोटिफिकेशन के बाद कानून का रूप ले लेगा और इसके लागू होते ही आम नागरिकों और व्यवसायों से जुड़े कई पुराने, कठोर और अप्रासंगिक प्रावधानों में बदलाव आ जाएगा।

सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाना और व्यापारिक गतिविधियों को सरल करना है। इस विधेयक के जरिए छोटे और तकनीकी अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की कोशिश की गई है, ताकि अनजाने में हुई गलतियों के लिए लोगों को आपराधिक सजा का सामना न करना पड़े।

इसे एक ऐसे बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जो ‘भय आधारित शासन’ से ‘विश्वास आधारित शासन’ की ओर देश को ले जाने की कोशिश करता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने X पर इस विधेयक के पास होने पर खुशी जताते हुए लिखा,” ‘ईज ऑफ लिविंग’ और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बड़ा बढ़ावा। यह बहुत खुशी की बात है कि संसद ने जन विश्वास (संशोधन प्रावधान) विधेयक 2026 को पारित कर दिया है। यह विधेयक भरोसे पर आधारित व्यवस्था को मजबूत करता है, जो नागरिकों को सशक्त बनाती है।”

विधेयक की मूल सोच: डर नहीं, भरोसे पर आधारित व्यवस्था

इस विधेयक की सबसे अहम बात इसकी सोच है। अब तक भारतीय कानूनों में कई ऐसे प्रावधान थे, जिनमें मामूली या तकनीकी गलती पर भी आपराधिक सजा का प्रावधान था। इससे आम लोगों और छोटे व्यवसायों में एक तरह का डर बना रहता था कि कहीं छोटी सी चूक उन्हें कानूनी मुसीबत में न डाल दे।

इस विधेयक के जरिए सरकार ने यह संकेत दिया है कि हर गलती को अपराध मानना जरूरी नहीं है। नई व्यवस्था में यह माना गया है कि यदि कोई व्यक्ति पहली बार गलती करता है, तो उसे सुधार का मौका मिलना चाहिए। इसीलिए कई जगहों पर सलाह, चेतावनी और फिर जुर्माने का क्रम तय किया गया है।

यह पूरी व्यवस्था इस विचार पर आधारित है कि नागरिकों को भरोसे के साथ काम करने दिया जाए और केवल गंभीर या जानबूझकर किए गए उल्लंघनों पर ही सख्ती की जाए।

बड़े पैमाने पर संशोधन: कितने कानून और प्रावधान बदले?

यह विधेयक केवल एक-दो कानूनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सुधार है। इसके तहत 23 मंत्रालयों द्वारा संचालित 79 केंद्रीय कानूनों में संशोधन किया गया है। कुल 784 प्रावधानों में बदलाव किए गए हैं, जिनमें से 717 प्रावधान व्यापार को आसान बनाने के लिए बदले गए हैं, जबकि 67 प्रावधान सीधे आम नागरिकों की सुविधा को ध्यान में रखकर संशोधित किए गए हैं।

यानी इस विधेयक के जरिए 1000 से अधिक अपराधों को या तो खत्म किया गया है या उन्हें तर्कसंगत बनाया गया है। इसका सीधा असर यह होगा कि कई ऐसे मामले, जो पहले अदालतों में जाते थे, अब या तो वहीं खत्म हो जाएँगे या उन्हें प्रशासनिक स्तर पर ही निपटा लिया जाएगा। इससे न्यायालयों पर बोझ भी कम होगा।

किन-किन छोटे अपराधों में मिला राहत का दायरा?

विधेयक के सबसे चर्चित पहलुओं में से एक यह है कि इसमें कई ऐसे रोजमर्रा के मामलों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया है, जो सीधे आम लोगों की जिंदगी से जुड़े हैं। उदाहरण के तौर पर अब ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता खत्म होने के बाद भी 30 दिनों तक उसे वैध माना जाएगा। पहले ऐसा नहीं था और थोड़ी सी देरी भी परेशानी का कारण बन सकती थी।

इसी तरह राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम करने जैसे मामलों में पहले जेल की सजा का प्रावधान था, जिसे अब हटाकर केवल जुर्माने तक सीमित कर दिया गया है। आग का झूठा अलार्म देना, जन्म या मृत्यु की सूचना न देना, या कॉपीराइट रजिस्टर में गलत प्रविष्टि करना, ये सभी अब अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिए गए हैं।

इसके अलावा आवारा मवेशियों से फसल को नुकसान पहुँचने जैसे मामलों में भी सजा की जगह केवल जुर्माने का प्रावधान किया गया है। बिजली से जुड़े कुछ उल्लंघनों और कॉस्मेटिक्स के नियमों के उल्लंघन में भी जेल की सजा हटाकर आर्थिक दंड लागू किया गया है। इन बदलावों से साफ है कि सरकार ने छोटे मामलों में सख्ती कम करने का निर्णय लिया है।

सजा की जगह नया सिस्टम: चेतावनी, सलाह और जुर्माना

इस विधेयक में सजा के तरीके को भी पूरी तरह से बदलने की कोशिश की गई है। अब हर गलती पर सीधे सजा नहीं दी जाएगी, बल्कि एक क्रमबद्ध प्रक्रिया अपनाई जाएगी। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई व्यक्ति पहली बार नियम का उल्लंघन करता है, तो उसे सलाह दी जाएगी। दूसरी बार गलती करने पर चेतावनी दी जाएगी और यदि इसके बाद भी वही गलती दोहराई जाती है, तभी उस पर जुर्माना लगाया जाएगा।

यह व्यवस्था खासतौर पर अप्रेंटिस अधिनियम जैसे कानूनों में लागू की गई है, जहाँ पहले सीधे दंड का प्रावधान था। अब इसमें सुधार का मौका देने पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही कई कानूनों में कारावास के प्रावधान को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है या उसकी अवधि कम कर दी गई है।

यह बदलाव इस बात को दर्शाता है कि सरकार अब दंडात्मक दृष्टिकोण के बजाय सुधारात्मक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना चाहती है।

जुर्माने का नया ढाँचा और समय-समय पर संशोधन

इस विधेयक में जुर्माने को भी अधिक व्यवस्थित और तर्कसंगत बनाया गया है। अब जुर्माने की राशि अपराध की गंभीरता के अनुसार तय की जाएगी, ताकि छोटे उल्लंघनों पर अत्यधिक सजा न हो और गंभीर मामलों में उचित दंड दिया जा सके।

इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी जोड़ा गया है कि जुर्माने और दंड की राशि हर तीन साल में कम से कम 10 प्रतिशत बढ़ाई जाएगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि समय के साथ जुर्माने का प्रभाव बना रहे और वह अप्रासंगिक न हो जाए।

कुछ मामलों में जुर्माने की राशि काफी अधिक भी रखी गई है, जैसे राजमार्ग जाम करने के मामलों में, ताकि गंभीर उल्लंघनों को रोका जा सके। इस तरह यह कानून संतुलन बनाने की कोशिश करता है, यानी जहाँ जरूरत हो वहाँ सख्ती और जहाँ संभव हो वहाँ राहत।

न्याय व्यवस्था में सुधार और मामलों का तेज निपटारा

इस विधेयक का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह केवल अपराधों को कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि न्याय प्रक्रिया को भी सरल और तेज बनाने की दिशा में काम करता है। इसके तहत न्यायनिर्णय अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है, जो मामलों की जांच और दंड निर्धारण करेंगे।

इसके अलावा अपीलीय प्राधिकरणों की भी व्यवस्था की गई है, ताकि यदि कोई व्यक्ति निर्णय से संतुष्ट न हो, तो वह अपील कर सके। इससे मामलों को अदालतों में जाने की जरूरत कम होगी और उनका निपटारा जल्दी हो सकेगा।

‘इम्प्रूवमेंट नोटिस’ जैसी व्यवस्था भी लाई गई है, जिसमें पहली बार गलती करने पर व्यक्ति को सुधार का मौका दिया जाएगा। इन सभी उपायों का उद्देश्य यह है कि न्याय प्रक्रिया अधिक प्रभावी, पारदर्शी और समयबद्ध हो सके।

मोटर वाहन, नगर निगम और अन्य कानूनों में अहम बदलाव

इस विधेयक में कई ऐसे बदलाव भी शामिल हैं, जो सीधे नागरिकों के रोजमर्रा के अनुभव को प्रभावित करेंगे। मोटर वाहन अधिनियम में किए गए संशोधनों के तहत वाहन पंजीकरण को अधिक लचीला बनाया गया है और ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़े नियमों को सरल किया गया है।

लाइसेंस के नवीनीकरण को अब उसकी समाप्ति तिथि के बजाय नवीनीकरण की तारीख से प्रभावी माना जाएगा, जिससे लोगों को नुकसान नहीं होगा। नई दिल्ली नगर परिषद अधिनियम में भी बदलाव किए गए हैं, जिनमें संपत्ति कर को व्यवस्थित करना, मूल्य निर्धारण के लिए समितियों का गठन और शिकायतों के समाधान के लिए अलग तंत्र बनाना शामिल है।

इसके अलावा विज्ञापन कर को हटाने का भी प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही RBI अधिनियम, बीमा अधिनियम और पेंशन से जुड़े कानूनों में भी संशोधन किए गए हैं, ताकि वित्तीय और व्यावसायिक प्रक्रियाओं को सरल बनाया जा सके।

आम आदमी और कारोबार के लिए क्या बदलेगा?

जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2026 एक ऐसा प्रयास है, जो भारत के कानूनी ढाँचे को आधुनिक, सरल और व्यवहारिक बनाने की दिशा में उठाया गया है। यह कानून यह संदेश देता है कि सरकार नागरिकों को शक की नजर से नहीं, बल्कि भरोसे के साथ देखना चाहती है।

इससे आम लोगों को छोटी-छोटी गलतियों के लिए जेल जाने का डर कम होगा, वहीं व्यवसायों को भी अनावश्यक कानूनी अड़चनों से राहत मिलेगी। न्यायालयों पर बोझ कम होगा, मामलों का निपटारा तेजी से होगा और एक संतुलित, पारदर्शी और भरोसेमंद व्यवस्था विकसित होने की संभावना बनेगी।

अगर इस कानून का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन किया जाता है, तो यह वास्तव में भारत में आसान जीवन और आसान व्यापार के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

बंगाली और गैर-बंगाली वाली राजनीति करने में ‘नीचता’ पर उतरी TMC, शाकाहारी अमित शाह से किया ‘नॉनवेज’ वाला मजाक: पढ़िए क्यों ये हरकत मानसिक कंगाली से अधिक कुछ भी नहीं

बंगाल चुनाव 2026 करीब है, लेकिन दुख की बात यह है कि राजनीति अब विकास और मुद्दों को छोड़कर लोगों के खाने की थाली तक जा पहुँची है। अमित शाह बंगाल के 15 दिनों के दौरे पर आ रखें हैं, तो TMC ने उनके स्वागत में ‘नॉन-वेज’ खाने की एक लिस्ट जारी पेश कर दी है। यह सिर्फ एक मजाक नहीं, बल्कि बंगाल की उस पुरानी परंपरा का अपमान है जहाँ मेहमान को भगवान माना जाता है।

सोचिए, जो इंसान पूरी तरह शाकाहारी है, उसे जानबूझकर मांस-मछली की लिस्ट दिखाकर चिढ़ाना कैसी राजनीति है? क्या TMC के पास अब जनता को गिनाने के लिए अपने कांड नहीं बचे, जो उन्हें खाने-पीने जैसी निजी चीजों का सहारा लेना पड़ रहा है?

बंगाल की संस्कृति में शाकाहारी खाने की भी उतनी ही अहमियत और शान है, जितनी मछली की। ‘आलू पोस्तो’ और ‘नोलन गुड़ का पायश’ भी यहाँ की पहचान हैं। किसी के खानपान का मजाक उड़ाना सिर्फ उनकी राजनीतिक हताशा को दिखाता है। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन मेहमाननवाज़ी में इस तरह की नीचा दिखाने वाली हरकतें केवल TMC ही कर सकती है। असली मुकाबला काम और नीतियों पर होना चाहिए, न कि इस बात पर कि कौन अपनी थाली में क्या रखता है।

शाकाहार का अपमान और बंगाल की असल पहचान

TMC ने सोशल मीडिया पर माछ-भात और चिंगरी मलाई करी की एक लिस्ट पोस्ट की। इस लिस्ट का जिक्र करके यह दिखाने की कोशिश की कि बंगाल में केवल मांसाहार ही श्रेष्ठ है। लेकिन क्या टीएमसी भूल गई कि बंगाल की शाकाहारी रसोई भी दुनिया भर में अपनी एक अलग ‘शान’ रखती है? ‘आलू पोस्तो’, ‘शुक्तो’, ‘लूची-छोलार दाल’, ‘धोकार डालना’ और ‘भापा पनीर’ जैसे व्यंजन बंगाल की पहचान का उतना ही बड़ा हिस्सा हैं जितनी कि मछली।

एक शाकाहारी व्यक्ति (अमित शाह) को नीचा दिखाने की कोशिश करना TMC की उस ‘विभाजनकारी’ मानसिकता को उजागर करता है, जहाँ वे बंगाल को एक संकुचित दायरे में बाँधना चाहते हैं। भाजपा का विरोध किसी के खाने से नहीं, बल्कि उस ‘मानसिकता’ से है जो मेहमान का स्वागत अपमान के साथ करती है। बंगाल की संस्कृति समावेशी रही है, लेकिन TMC इसे केवल ‘नॉन-वेज’ बनाम ‘वेज’ की लड़ाई बनाकर लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रही है।

फरवरी से जारी ‘भय और झूठ’ का नैरेटिव

TMC की यह ‘फिश पॉलिटिक्स’ अचानक शुरू नहीं हुई। फरवरी से ही यह नैरेटिव गढ़ा जा रहा है कि भाजपा सत्ता में आई तो मछली-मांस बंद कर देगी। यह पूरी तरह से सफेद झूठ है। भाजपा का रुख हमेशा स्पष्ट रहा है कि व्यक्ति जो चाहे वह खा सकता है, विरोध केवल ‘अवैध बूचड़खानों’ और ‘धार्मिक स्थलों के पास खुले में मांस बिक्री’ से है। TMC इस मुद्दे को ‘बंगाली अस्मिता’ से जोड़कर केवल अल्पसंख्यक और विशेष समुदायों का तुष्टिकरण करना चाहती है।

दूसरे राज्यों में भाजपा: संस्कृति का सम्मान और स्थानीय स्वाद

TMC का आरोप है कि भाजपा ‘बाहरी’ है और यहाँ की संस्कृति नहीं जानती। लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा जिन भी राज्यों में सत्ता में है, वहाँ उसने वहाँ की संस्कृति और खानपान को पूरे सम्मान के साथ अपनाया है। भाजपा के नेता जिस राज्य में जाते हैं, वहाँ के स्थानीय शाकाहारी व्यंजनों को न केवल चखते हैं बल्कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट भी करते हैं।

राजस्थान की ‘दाल-बाटी-चूरमा’ और ‘गट्टे की सब्जी’ को भाजपा ने अपनी संस्कृति का हिस्सा बनाया। गुजरात की ‘ढोकला’, ‘खांडवी’ और ‘फाफड़ा’ जैसे व्यंजनों को भाजपा नेताओं ने वैश्विक पहचान दिलाई। उत्तर प्रदेश की ‘कचौरी-सब्जी’ और ‘बनारसी थाली’ भाजपा के आयोजनों की शान होती है। मध्य प्रदेश का ‘पोहा-जलेबी’ और ‘भुट्टे की कीस’ जैसे शाकाहारी पकवानों को भाजपा ने हमेशा तरजीह दी है। इन राज्यों में भी संस्कृति बहुत गहरी है, और भाजपा ने बिना किसी विवाद के वहाँ की शाकाहारी परंपराओं को गौरव के साथ अपनाया है। बंगाल में भी अमित शाह ने हमेशा यही किया है।

अमित शाह और बंगाल का पुराना रिश्ता: जब जमीन पर बैठकर चखा स्वाद

TMC जिसे ‘नॉन-वेज’ का पाठ पढ़ा रही है, उसी अमित शाह ने कई बार बंगाल के आम नागरिकों के घर जाकर उनकी सादगी को अपनाया है। 2017 में नक्सलबाड़ी दौरा के दौरान शाह ने एक जनजातीय परिवार (राजू महाली) के घर जमीन पर बैठकर केले के पत्ते पर भोजन किया था। वहाँ उन्होंने चावल, दाल और परवल फ्राई जैसे ‘शाकाहारी बंगाली भोजन’ का स्वाद लिया था।

2020 में मतुआ परिवार दौरा में बागुईहाटी में नबीन बिस्वास के घर अमित शाह ने ‘शुक्तो’ और ‘नोलन गुरेर पायश’ जैसे ठेठ बंगाली शाकाहारी व्यंजनों का लुत्फ उठाया था। इन घटनाओं से साफ है कि अमित शाह ने हमेशा बंगाल की मिट्टी और वहाँ के लोगों के साथ जुड़ने की कोशिश की है। उन्हें किसी ‘नॉन-वेज लिस्ट’ की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे बंगाल के उस ‘शाकाहारी स्वाद’ को जानते हैं जिसे TMC अब राजनीति के चक्कर में दरकिनार कर रही है।

अमित शाह के 15 दिनों के प्रवास से TMC के खेमे में मची खलबली अब साफ दिख रही है। मेहमान का मजाक उड़ाना और उनकी जीवनशैली पर टिप्पणी करना राजनीतिक शिष्टाचार के खिलाफ है। TMC की यह ‘भोजन आधारित राजनीति’ उनकी हार की हताशा दिखाती है।

केरल में वामपंथी-कॉन्ग्रेसी नेता ही नहीं पूरा इकोसिस्टम लड़ रहा चुनाव, गुरुवायुर पर पढ़ें न्यूज मिनट का एंटी हिंदू प्रोपेगेंडा: समझें- कैसे हिंदुओं पर बना जा रहा मनोवैज्ञानिक दबाव

केरल में विधानसभा चुनाव हैं। सभी पार्टियों ने अपना पूरा दम खम झोंका हुआ है। सभी अपने-अपने तरीके से जनता से कनेक्ट कर रहे हैं। इस बीच, केरल की धार्मिक नगरी गुरुवायूर में बीजेपी प्रत्याशी भी जनता से कनेक्ट कर रहे हैं। हालाँकि इस चुनाव में राजनीतिक पार्टियाँ अलग-अलग फ्रंट से चुनाव लड़ रही हैं, जिसमें प्रोपेगेंडा वाली मीडिया (पीत पत्रकारिता) भी अपना काम करने में जुटी हुई हैं। इसी कड़ी में न्यूज मिनट नाम की प्रोपेगेंडा वेबसाइट ने एक ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित की है, जो जनता से जुड़ाव की कोशिशों को सांप्रदायिक घोषित करने पर तुली है।

इस मामले में आगे बढ़ें, इससे पहले देख लीजिए न्यूज मिनट की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट। इसका शीर्षक है- ‘Why no Hindu MLA: Guruvayur becomes BJP’s laboratory for a new pitch in Kerala

न्यूज मिनट का यह लेख साफ-साफ एंटी हिंदू और एंटी भाजपा है। यह हिंदुओं के सही सवाल को सांप्रदायिक का ठप्पा लगाकर दबाने की कोशिश कर रहा है। गुरुवायुर जैसे मशहूर श्री कृष्ण मंदिर के शहर में पिछले पचास साल से मुस्लिम विधायक का राज चल रहा है। भाजपा के उम्मीदवार बी गोपालकृष्णन ने बड़ा फ्लेक्स बोर्ड लगाकर सीधा सवाल पूछा- ‘क्या तुम यह नहीं देख रहे?’ उसमें 1977 से 2021 तक के मुस्लिम विधायकों की पूरी सूची दिखाई।

न्यूज मिनट इसे नया प्रयोग और आक्रामक हिंदू प्रतीकवाद बता रहा है। लेकिन असल बात यह है कि गुरुवायुर श्री कृष्ण मंदिर का दिल है। लाखों हिंदू तीर्थयात्री हर साल वहाँ आते हैं। मंदिर की अर्थव्यवस्था चलती है। भक्तों की आस्था जुड़ी है। फिर वहाँ पचास साल तक हिंदू विधायक न चुनना विकास की अनदेखी और आस्था की उपेक्षा नहीं तो और क्या है? न्यूज मिनट जानबूझकर इस सवाल को घुमा रहा है ताकि हिंदू खुद को गलत महसूस करें और चुप हो जाएँ। यह हिंदुओं पर मानसिक दबाव बनाने का तरीका है।

लेख की शुरुआत ही देख लें। न्यूज मिनट कहता है कि सोशल मीडिया पर एक फ्लेक्स बोर्ड घूम रहा है। उसमें भाजपा उम्मीदवार के साथ मुस्लिम विधायकों की सूची है और सवाल है- ‘क्या तुम नहीं देख रहे?’ वह इसे ‘पचास साल की उपेक्षा’ बताते हुए एनडीए उम्मीदवार को चुनने का आह्वान बता रहा है। लेकिन न्यूज मिनट यह नहीं बताता कि गुरुवायुर केरल का सबसे बड़ा तीर्थ स्थान है। यहाँ बाल कृष्ण यानी गुरुवायुरप्पन की मूर्ति है। लाखों हिंदू भक्त यहाँ आते हैं। 1977 से 2021 तक के चुनावों में ज्यादातर विधायक मुस्लिम रहे- जैसे कम्युनिस्ट पार्टी के एनके अकबर। क्या यह संयोग है? या वोट बैंक की राजनीति का नतीजा? लेख इसे प्रतिनिधित्व का सवाल बनाकर नहीं देखता। बल्कि ‘हिंदू विधायक’ शब्द को ही विवादास्पद बना देता है। गोपालकृष्णन ने चुनावी भाषणों में कहा कि गुरुवायुरप्पन ने उन्हें बुलाया है और इलाके को बचाना है। न्यूज मिनट इसे धार्मिक तस्वीर कहकर उड़ा देता है।

अरे, मंदिर के शहर में आस्था का जिक्र करना गलत कैसे? क्या मुस्लिम उम्मीदवार मस्जिद के पास चुनाव लड़ते हुए अपनी आस्था नहीं दिखाते? लेकिन न्यूज मिनट का दोहरा मापदंड यहीं से शुरू होता है।

लेख आगे कहता है कि केरल में भाजपा की बात पहले सीमित रहती थी। लेकिन इस बार गोपालकृष्णन ने शुरुआत से ही ‘हिंदू विधायक’ का मुद्दा उठाया। वे विकास के मुद्दे भी उठा रहे हैं – गंदा पीने का पानी, खराब श्मशान घाट, बंद स्वास्थ्य केंद्र, भ्रष्टाचार। लेकिन न्यूज मिनट का पूरा ध्यान सिर्फ धार्मिक मोड़ पर है। लेखक अपने साथी के साथ गोपालकृष्णन के घर गया और उनसे बात की। वहाँ गोपालकृष्णन ने विकास के मुद्दों पर विस्तार से बताया। लेकिन जब ‘हिंदू विधायक’ का सवाल आया तो न्यूज मिनट का लेखक कहता है कि स्वर बदल गए। गोपालकृष्णन ने पूछा- “तुम लोग ये असली मुद्दे क्यों नहीं दिखाते? मैंने प्रेस कॉन्फ्रेंस की, गंदा पानी दिखाया, लेकिन मीडिया ने अनदेखा कर दिया।”

न्यूज मिनट इसे जवाब दिए बिना जवाब देना बता रहा है। लेकिन असल में यही सच्चाई है। न्यूज मिनट जैसे मीडिया विकास को छोड़कर सिर्फ सांप्रदायिक कोण पर अटक जाता है। गोपालकृष्णन ने साफ कहा कि चुने गए विधायक मंदिर में आस्था नहीं रखते। कुछ उम्मीदवारों ने खुलकर कहा कि मंदिर में दीप जलाना हराम है और मूर्ति पूजा उनके विश्वास के खिलाफ है। अगर गुरुवायुर जैसी जगह पर उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा है तो कम से कम मंदिर का सम्मान तो करे।

यहाँ न्यूज मिनट ने गोपालकृष्णन पर आरोप लगाया कि उन्होंने मौजूदा विधायक एनके अकबर पर कोई खास उदाहरण या सही बयान नहीं दिया। लेखक लिखता है कि अकबर ने कभी सार्वजनिक रूप से कहा नहीं कि मंदिर में दीप जलाना हराम है। लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है? इस्लाम के धर्म ग्रंथ में मूर्ति पूजा को सबसे बड़ा पाप माना जाता है। केरल में कई मुस्लिम नेता मंदिर की परंपराओं पर सवाल उठा चुके हैं। विधायक बनकर मंदिर के शहर में रहते हुए अगर कोई मंदिर की भावना का सम्मान नहीं करता तो विकास कैसे होगा? लेख कहता है कि गोपालकृष्णन ने मंदिर के कामकाज में दखल का सबूत नहीं दिया। लेकिन क्या दखल की जरूरत है? अगर विधायक का मन मंदिर से नहीं जुड़ा तो वह मंदिर की समस्याओं को प्राथमिकता नहीं देगा। यही मानसिक दबाव है – हिंदू सवाल पूछे तो ‘कोई सबूत नहीं’ कहकर खारिज कर दो।

बातचीत में गोपालकृष्णन ने तुष्टीकरण की राजनीति का मुद्दा उठाया। उन्होंने पास के चवक्काड में कंठापुरम अबूबकर मुसलियार की बड़ी रैली का उदाहरण दिया। वहाँ विधायक और नेता मौलवी के आने का इंतजार करते रहे। लेकिन दो किलोमीटर दूर कुंभ मेला जैसे हिंदू धार्मिक आयोजन में कोई नहीं गया। गोपालकृष्णन ने कहा, “मुझे कोई समस्या नहीं, यह उनकी आजादी है। लेकिन सच्चे सेकुलर होने के लिए दोनों आयोजनों में जाना चाहिए।”

न्यूज मिनट इसे पुराना तरीका बता रहा है। खास दावे से बड़े कथन में ले जाना। लेकिन यह बड़ा कथन ही सच्चाई है। केरल में राजनीतिक पार्टियाँ मुस्लिम वोट बैंक के लिए हिंदू आयोजनों से दूर रहती हैं। यही तुष्टीकरण है जो हिंदू मंदिरों पर हमले, लव जिहाद और मंदिर की जमीन पर कब्जे को बढ़ावा देता है। लेख गोपालकृष्णन के विकास और आस्था वाले तर्क को घुमावदार कहता है, “विकास की कमी इसलिए क्योंकि आस्था नहीं, इसलिए हिंदू विधायक चाहिए।” लेकिन क्या यह गलत है? मंदिर शहर में अगर विधायक मंदिर की आस्था से नहीं जुड़ा तो तीर्थयात्रा की अर्थव्यवस्था, सफाई, सड़कें कैसे सुधरेंगी? लाखों भक्त आते हैं लेकिन बुनियादी सुविधाएँ खराब। यही सवाल हिंदू पूछ रहे हैं।

असल बात यह है कि हिंदू अब जाग रहे हैं। पचपन प्रतिशत हिंदू आबादी वाले केरल में मंदिर शहर में गैर हिंदू विधायक का पचास साल का पैटर्न हिंदू पहचान पर हमला है। भाजपा नरम रहकर भी जमीन नहीं बना पा रही थी इसलिए अब अपनी असली विचारधारा दिखा रही है। लेख इसे पार्टी के अंदरूनी झगड़े कहकर भाजपा को बाँटने की कोशिश कर रहा है।

न्यूज मिनट केरल में लगातार ऐसा प्रोपेगेंडा चला रहा है। भाजपा को जमीन नहीं मिल रही इसलिए वह हिंदू मतदाता को जागरूक कर रही है। लेकिन न्यूज मिनट इसे नया प्रयोगशाला बता रहा है जैसे भाजपा हिंदुओं पर प्रयोग कर रही हो। केरल में लेफ्ट और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का बारी बारी से राज चलता है। 1980 के दशक से मुस्लिम उम्मीदवार चुने जाते रहे। गुरुवायुर में तीर्थयात्रा की अर्थव्यवस्था पर ध्यान है लेकिन शासन की असफलताएँ आस्था की कमी से जुड़ी हैं।

लेख गोपालकृष्णन के पोस्टर, भगवा कपड़ों को उछालता है लेकिन मुस्लिम उम्मीदवारों के हरे झंडे और इस्लामी नारों को सेकुलर मान लेता है। यह दोहरा मापदंड हिंदुओं को शर्मिंदा करने के लिए है। सोशल मीडिया पर अच्छी टिप्पणियों को भी दक्षिणपंथी कहकर नजरअंदाज कर देता है। हिंदू अपना मंदिर शहर में अपना विधायक माँगे तो यह नई आक्रामक शैली। लेकिन केरल की हकीकत देखो- मंदिरों पर हमले, हिंदू त्योहारों में दखल, अल्पसंख्यक तुष्टीकरण। यही मानसिक दबाव है कि हिंदू खुद को दोषी महसूस करें।

यह नई बात नहीं। न्यूज मिनट ने कर्नाटक के धर्मस्थला मामले में भी ठीक ऐसी ही भ्रामक खबरें दी थीं। 2025 में न्यूज मिनट ने श्री क्षेत्र धर्मस्थला मंजुनाथ स्वामी मंदिर पर दो दर्जन से ज्यादा खबरें छापीं। एक ‘मास्क्ड म’” (पूर्व सफाई कर्मचारी) के दावों पर, जिसमें दावा किया गया था कि सैकड़ों हत्याएँ, बलात्कार, सामूहिक कब्र, मंदिर प्रशासन (वीरेंद्र हेगड़े, भाजपा राज्यसभा सांसद) ने छुपाया।

उस समय न्यूज मिनट की रिपोर्ट्स की हेडलाइन्स थी- ‘धर्मस्थला हॉरर’, ‘सूत्र विशेष’, ‘मास बरीअल केस’। उसने इस झूठों को बीबीसी और अल जजीरा तक पहुँचाया और हिंदू मंदिर को हत्या का अड्डा दिखाया। आस्था पर सवाल उठाए। हिंदू संस्थान को बदनाम करने की पूरी कोशिश की। लाखों हिंदू भक्तों की भावना को ठेस पहुँचाई। लेकिन एसआईटी जाँच में सच्चाई सामने आ गई। हालाँकि न्यूज मिनट ने तब भी इन मामलों की सच्चाई सामने रखने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

धर्मस्थल मामले की याद इसलिए दिलाई गई, क्योंकि धर्मस्थल केस में भी केरल जैसा ही तरीका था, हिंदू मंदिर को निशाना, भ्रामक दावे, देश और विदेश के मीडिया में फैलाना, फिर सच्चाई आने पर चुप्पी। गुरुवायुर में भी यही हो रहा है। गोपालकृष्णन के विकास वाले इंटरव्यू को छिपाकर सिर्फ धार्मिक मोड़ पर ध्यान दिया जा रहा है। लेख का अंत सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक संदेश का रोना रोता है। लेकिन हिंदू अगर अपना मंदिर बचाने के लिए आवाज उठाए तो उसे ये प्रोपेगेंडा दिखता है, सच्चाई नहीं।

खैर, इस रिपोर्ट पर ही नजर डालें, तो ये रिपोर्ट भले ही लक्ष्मी प्रिया ने लिखा हो, लेकिन इसका संपादन खुद न्यूज मिनट की संपादक धन्या राजेंद्रन ने किया है। धन्या राजेंद्रन एंटी हिंदू और हिट जॉब वाली पत्रकारिता के लिए बदनाम रही हैं और इसके लिए उन्हें प्रोपेगेंडा फैलाने वाले संगठनों की तरफ से सम्मानित भी किया जा चुका है।

बहरहाल, केरल में हिंदू आबादी करीब पचपन प्रतिशत है। मंदिर शहर में पचास साल का मुस्लिम विधायक पैटर्न विकास और आस्था दोनों की अनदेखी है। भाजपा अगर हिंदू प्रतिनिधित्व की बात करे तो न्यूज मिनट जैसे पोर्टल नया तरीका कहेंगे। लेकिन यह पोर्टल लेफ्ट और कॉन्ग्रेस की एजेंडा का प्रचार कर रहा है।

ऐसे में जरूरत है कि केरल के हिंदू भाई बहन इस प्रोपेगेंडा को पहचानें, क्योंकि न्यूज मिनट का यह लेख हिंदू एकता तोड़ने की साफ तौर पर साजिश है। ऐसे में आप अपना वोट, अपनी आवाज अपनी सोच के हिसाब से इस्तेमाल करें।

अंत में सवाल यही है कि क्या मीडिया का काम केवल विवाद को उभारना है या फिर हर पक्ष को संतुलित तरीके से सामने लाना? अगर किसी क्षेत्र में हिंदू समाज अपने प्रतिनिधित्व की बात करता है, तो उसे तुरंत ‘ध्रुवीकरण’ का टैग देना क्या सही पत्रकारिता है? केरल जैसे संवेदनशील और विविधतापूर्ण राज्य में इस तरह की रिपोर्टिंग न केवल राजनीतिक बहस को प्रभावित करती है, बल्कि समाज में अविश्वास भी बढ़ा सकती है। इसलिए जरूरत है कि मीडिया संस्थान आत्ममंथन करें और खबरों को संतुलित, तथ्यों पर आधारित और सभी पक्षों के प्रति निष्पक्ष तरीके से पेश करें।

FSSAI डायरेक्टर ने सोशल मीडिया यूजर्स पर ‘बदनाम’ करने का आरोप लगाकर FIR दर्ज कराई, दिल्ली पुलिस ने X को नोटिस भेजकर अकाउंट्स की डिटेल्स माँगी: पढ़ें क्या हुआ

FSSAI के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सोशल मीडिया पर कथित तौर पर ‘बदनाम’ करने, मानहानि और झूठी खबरें फैलाने के मामले में कई सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ कार्रवाई की है। इनपर एफआईआर दर्ज किया गया है। दिल्ली पुलिस ने इनलोगों को नोटिस भेजा है।

दिल्ली पुलिस ने 1 अप्रैल, 2026 को X को नोटिस जारी कर कुछ X अकाउंट्स की डिटेल्स माँगी है। इसमें अकाउंट रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबर, IP लॉग्स, एक्सेस किए गए पोर्ट्स और रिकवरी ईमेल IDs शामिल हैं। दिल्ली पुलिस ने इन X अकाउंट्स के बारे में डिटेल्स माँगी उनमें @khurpenchh, @gemsofbabus_, @YTKDIndia, @NalinisKitchen, और @IamTheStory_ शामिल हैं।

यह नोटिस फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) की डायरेक्टर स्वीटी बेहरा की शिकायत पर माँगी गई है। उन्होंने 24 मार्च 2026 को FIR दर्ज करवाई थी।

लेटर में क्या लिखा है?

दिल्ली पुलिस के X को लिखे लेटर के मुताबिक, बेहरा ने अपनी FIR में आरोप लगाया कि इन हैंडल्स ने X पर कुछ पोस्ट्स ‘उन्हें बदनाम करने और समाज में उनकी रेप्युटेशन को नुकसान पहुँचाने के गलत इरादे’ से पब्लिश किए थे। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि उनसे जुड़ी अति गोपनीय डिटेल्स भी कुछ जगहों से चुराई गई थीं।

पुलिस के मुताबिक, सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ BNS के सेक्शन 316(4) (क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट) और 3(5) (कॉमन इंटेंशन) और IT एक्ट के सेक्शन 72A (पर्सनल जानकारी का खुलासा) के तहत केस दर्ज किया गया है। इस केस की जाँच सेंट्रल दिल्ली के IP एस्टेट पुलिस स्टेशन में की जा रही है।

लेटर में लिखा है, “इस केस में पीड़ित का आरोप है कि उसे बदनाम करने और समाज में उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने के गलत इरादे से कई हैंडल्स से ट्विटर पर कुछ पोस्ट पब्लिश किए गए थे, जिससे जनता में अफरा-तफरी मच गई। उसने आगे आरोप लगाया कि कुछ जानकारी अति गोपनीय थे, जिसे कुछ जगहों से चुराई गई।

लेटर में उन X पोस्ट्स का जिक्र है जिनके बारे में केस फाइल किया गया है। वे सभी पोस्ट्स FSSAI डायरेक्टर स्वीटी बेहरा के अपॉइंटमेंट से जुड़े हैं। उनपर करप्शन और गड़बड़ियों का आरोप लगाया गया है।

X अकाउंट्स ने क्या कहा?

FIR इन हैंडल्स द्वारा X पर किए गए अलग-अलग पोस्ट्स से जुड़ी है, जिसमें बेहरा के FSSAI डायरेक्टर के तौर पर अपॉइंटमेंट पर सवाल उठाए गए हैं। X अकाउंट्स में आरोप लगाया गया कि बेहरा ने FSSAI डायरेक्टर के तौर पर अपॉइंटमेंट के लिए जरूरी शर्तें पूरी नहीं कीं। X अकाउंट्स के मुताबिक, बेहरा ने 2006-2020 तक नेस्ले इंडिया में काम करने का अपना अनुभव दिखाया, जबकि रिकॉर्ड से पता चला कि वह 2007 में नेस्ले इंडिया में शामिल हुई थीं।

उन्होंने आरोप लगाया कि बेहरा ने एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया के तहत ज़रूरी 5 साल के सुपरवाइज़री एक्सपीरियंस का कोई प्रूफ़ जमा नहीं किया था। इसके अलावा, बेहरा के डॉक्यूमेंट्स में कथित तौर पर एक साल के लिए ₹18L CTC दिखाया गया है, जबकि कम से कम दो साल की दिखानी थी।

X अकाउंट्स ने आरोप लगाया कि FSSAI डायरेक्टर के तौर पर उनके अपॉइंटमेंट का रास्ता साफ करने के लिए एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया में ढील दी गई थी। उन्होंने दावा किया कि रिक्रूटमेंट रूल्स 2018 का उल्लंघन करते हुए बेहरा को CTC में ढील दी गई थी। यह भी आरोप है कि उनके अपॉइंटमेंट को यह कहकर सही ठहराया गया कि कोई सही कैंडिडेट उपलब्ध नहीं था, जबकि शेड्यूल्ड क्लास कैटेगरी के तीन और कैंडिडेट इंटरव्यू के लिए आए थे।

दिल्ली पुलिस ने X को जो लेटर लिखा है, उसमें @khurpenchh, @gemsofbabus_, और @YTKDIndia के X पर किए गए कई पोस्ट के URL का जिक्र है, जिससे FSSAI में बेहेरा के अपॉइंटमेंट पर शक पैदा होता है।

नलिनी उनागर (@NalinisKitchen) के दो पोस्ट का भी जिक्र है, लेकिन उन्हें अब डिलीट कर दिया गया है। इसलिए, यह पता चल गया है कि उन्होंने क्या आपत्तिजनक कंटेंट पोस्ट किया था। उन्होंने कन्फर्म किया कि FIR में उनका नाम है।

ऑपइंडिया ने FIR और नोटिस के बारे में डिटेल्स जानने के लिए IP एस्टेट पुलिस स्टेशन के SHO, इंस्पेक्टर घनश्याम किशोर से कॉन्टैक्ट किया, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए कोई भी डिटेल्स देने से मना कर दिया कि उन्हें बोलने का अधिकार नहीं है। इसके अलावा 24 मार्च को दर्ज की गई FIR अभी तक अपलोड नहीं की गई है। इसलिए, मामले की सही डिटेल्स पता नहीं चल सकीं।

लेकिन लेटर के कंटेंट और बताए गए X पोस्ट्स को देखते हुए, यह कन्फर्म किया जा सकता है कि मामला FSSAI डायरेक्टर स्वीटी बेहरा की नियुक्ति में गड़बड़ी के आरोपों से जुड़ा है, और FIR उनकी शिकायत पर दर्ज की गई थी।

सोशल मीडिया यूजर्स ने उनकी नियुक्ति से जुड़े इंटरनल डॉक्यूमेंट्स पोस्ट किए, जिससे BNS और IT एक्ट के क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट और पर्सनल जानकारी के खुलासे से जुड़े सेक्शन्स लागू हो गए। यह पता नहीं है कि X यूजर्स को ऐसे इंटरनल डॉक्यूमेंट्स कैसे मिले।

डॉक्यूमेंट्स पोस्ट करने वाले एक यूजर अकाउंट @YTKDIndia ने FIR दर्ज होने के बाद दावा किया कि कंटेंट पूरी तरह से डायरेक्टर पर ‘FSSAI की वेरिफाइड इंटरनल जाँच रिपोर्ट’ से लिया गया था।

अकाउंट में आगे कहा गया, “यह साफ है कि हमने न तो खुद जाँच की और न ही इसके कंटेंट में कोई बदलाव, बदलाव या पर्सनल मतलब निकाला। रिपोर्टिंग पूरी तरह से रिपोर्ट में मौजूद मटीरियल पर आधारित थी, इसे सही तरीके से पेश किया गया था और किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को धुमिल करने का उनका कोई इरादा नहीं था। संविधान में कोई कॉन्स्टिट्यूशनैलिटी नहीं है, सेक्शन 72A IT एक्ट नहीं बनता।”

(यह मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

होर्मुज स्ट्रेट बायपास करके मिडिल ईस्ट से लाया जा सकेगा तेल? इजरायल के PM नेतन्याहू ने सुझाया फॉर्मूला: समझें कैसे पाइपलाइन्स कर सकेंगी ईरान को साइडलाइन

इजरायल के पीएम नेतन्याहू ने सुझाया है कि क्यों न होर्मुज के विकल्प के तौर पर जमीन का रास्ता चुना जाए। उनका कहना है कि सऊदी अरब की जमीन पर पाइपलाइन बिछा कर गैस और तेल को खाड़ी देश लाल सागर तक भेजें, वहाँ से भूमध्यसागर से होते हुए तेल की सप्लाई यूरोप और दुनिया के दूसरे महादेशों तक किया जाए। लेकिन ये समाधान आकर्षक तो है, पर इतना आसान नहीं है।

ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट रूट पर ईरानी कब्जे की वजह से दुनिया के ज्यादातर देश गैस-तेल की संकट का सामना कर रहे हैं। इन देशों को होर्मुज स्ट्रेट से होकर सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, ईरान, ओमान आदि देशों से कच्चे तेल-गैस की सप्लाई होती थी। अमेरिका और इजरायल ने जब ईरान पर हमला किया तो ईरान ने सामरिक महत्व के इस रूट को बंद कर दिया है

क्या कहा इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सोमवार (2 अप्रैल 2026) को कहा कि होर्मुज स्ट्रटे में संकट का हमेशा के लिए समाधान किया जा सकता है। इसके लिए पाइपलाइनों का निर्माण होगा, जो खाड़ी देशों के तेल और गैस को भूमध्य सागर तक ले जाएगी।

अमेरिकी मीडिया आउटलेट Newsmax के साथ एक इंटरव्यू में नेतन्याहू ने समझाया, “दीर्घकालिक समाधानों में ऊर्जा पाइपलाइनों का रास्ता बदलकर उन्हें पश्चिम की ओर, सऊदी अरब से होते हुए लाल सागर और भूमध्य सागर तक ले जाना शामिल है, जिससे ईरान के चोक प्वाइंट (choke point) से बचा जा सकता है।”

फिलहाल, दुनिया का 20 फीसदी तेल और गैस की सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरती है। इस पर ईरान का कब्जा है और इससे गुजरने के लिए उसकी अनुमति जरूरी है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने की कोशिश छोड़ने की बात कही है। उनका कहना है कि अमेरिका को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल-गैस की जरूरत नहीं है क्योंकि अमेरिका के पास तेल गैस का विशाल भंडार है। इसलिए जिन देशों को मिडिल ईस्ट देशों से गैस तेल मँगवाना है और होर्मुज स्ट्रेट पर जो निर्भर हैं, वे देश इसे खुलवाएँ, अमेरिका उनकी मदद कर सकता है। इसको देखते हुए इजरायल के पीएम के सुझाव की ओर गंभीरता से विचार किया जा सकता है। इससे ईरान और होर्मुज पर कई देशों की निर्भरता खत्म होगी और ईरानी दादागिरी से मुक्ति भी मिलेगी।

हालाँकि होर्मुज स्ट्रेट सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान का भी क्षेत्रीय जल क्षेत्र है, लेकिन होर्मुज के दूसरी तरफ ईरान की मौजूदगी ने इसे संवेदनशील बना दिया है। ईरान होर्मुज से गुजरने वाले वैसे जहाजों पर हमला कर रहा है, जो उसकी अनुमति से नहीं निकले हैं। भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान जैसे देशों के तेल और गैस से भरे टैंकर यहाँ से सुरक्षित बाहर निकल रहे हैं क्योंकि ईरान इन देशों को ‘मित्र राष्ट्र’ मानता है।

मौजूदा युद्ध के दौरान ईरान की रणनीति होर्मुज पर नियंत्रण के साथ-साथ इजरायल और दूसरे खाड़ी देशों के अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमला रहा है। पीएम नेतन्याहू का मानना है कि युद्ध खत्म होने के बाद ये रास्ता पूरी तरह से खुल सकता है लेकिन इससे स्थाई समाधान नहीं निकल सकता। इसलिए एक ऐसे समझौते की जरूरत है जिससे होर्मुज का महत्व ही खत्म हो जाए और ईरान दुनिया को ब्लैकमेल न कर सके। जो इस जलडमरूमध्य के रणनीतिक महत्व को ही खत्म कर दे, वह दीर्घकालिक रूप से सबसे बेहतर रास्ता हो सकता है।

क्या है नए रूट की चुनौतियाँ

नए रूट के लिए सबसे जरूरी है सऊदी अरब की सहमति, क्योंकि ये रूट मध्यपूर्व देशों से तेल लेकर सऊदी अरब से गुजरने वाली पाइपलाइन के माध्यम से लाल सागर तक पहुँचेगी। इसके लिए सऊदी अरब एक छोड़ से दूसरे छोड़ तक पाइपलाइन बिछाना होगा। इस लंबे रूट को बनाने में अरबों डॉलर का खर्च आएगा। साथ ही रूट की सुरक्षा भी बड़ी जिम्मेदारी होगी। इसका खर्च कौन उठाएगा, यह बड़ी चुनौती है।

इसके अलावा इजरायल और अरब देशों के बीच तनातनी वाले रिश्ते रहे हैं। ऐसे में इजरायल और सऊदी अरब दोनों मिलकर इस पर काम करेंगे यह भी एक बड़ा सवाल है। ये रूट जमीन से होकर गुजरेगा, इसलिए इस पर आतंकी हमले और युद्ध के वक्त विध्वंस का भी खतरा रहेगा। कुल मिलाकर सुरक्षा बहुत बड़ा सवाल है।

योजना लागू होने पर बदल जाएगी तस्वीर

अगर नेतन्याहू की योजना जमीन पर उतरती है, तो दुनिया का ऊर्जा मैप बदल जाएगा। समुद्री रास्तों के बजाए पाइपलाइन नेटवर्क काफी अहम हो जाएगी। तेल की कीमतें स्थिर रहेंगे। इनमें उतार-चढ़ाव में कमी आएगी। सबसे अहम बात है कि मिडिल ईस्ट में पावर बैलेंस बदल जाएगा। ईरान का प्रभाव कम होगा, वहीं सऊदी अरब का महत्व काफी बढ़ जाएगा।

दरअसल होर्मुज संकट सिर्फ जंग और तेल संकट से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह संकरा रास्ता कभी भी बंद किया जा सकता है और दुनियाभर में अफरा-तफरी मचाया जा सकता है। ईरान और होर्मुज स्ट्रेट का सामरिक महत्व इसलिए है। इजरायल की मंशा राजनीतिक और रणनीतिक तौर पर ईरान को किनारे करने की है और इसके लिए एनर्जी शिफ्ट करना जरूरी है।

लाल सागर और स्वेज नहर से होकर आता रहा है भारत तक तेल और गैस

भारत की बात की जाए तो लाल सागर और स्वेज नहर से होकर रूस से आने वाला कच्चा तेल भारत के पश्चिमी तटों तक आज भी पहुँचता है। रूसी कच्चा तेल काला सागर या बाल्टिक सागर पर लोड होता है। इसके बाद तुर्की जलडमरूमध्य पार करते हुए भूमध्यसागर में जाता है।

यहाँ से स्वेज नहर और लाल सागर के पतले रास्तों से होता हुआ अरब सागर में जाता है और फिर भारतीय पोर्ट तक पहुँचता है। यानी भारत के लिहाज से सोचा जाए तो सऊदी अरब में पाइपलाइन बिछाना ही सबसे अहम है, ताकि कच्चा तेल लाल सागर तक पहुँच सके और फिर अपने नियमित रास्तों से होता हुआ भारत के बंदरगाहों तक आ जाए।

इस रूट में लाल सागर के दक्षिणी छोर पर मौजूद संकरा रास्ता बाब अल मंडेब स्ट्रेट का भी काफी महत्व है, जिससे होकर स्वेज नहर से आने वाले जहाज अरब सागर तक जाते हैं। 1869 में स्वेज नहर के खुलने के बाद इस स्ट्रेट का सामरिक महत्व काफी बढ़ गया क्योंकि यूरोप और एशिया के बीच के हजारों किलोमीटर की दूरी को इसने खत्म कर दिया। हालाँकि इसे आँसुओं का द्वार भी कहा जाता है, क्योंकि इससे गुजरना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। इसके अलावा यमन के हूतियों ने आक्रमण का खतरा भी यहाँ रहता है।

बहरहाल, संकट में भी अवसर छिपे हैं। नेतन्याहू ने जो फॉर्मूला दिया, वह अगर जमीन पर उतरा तो मध्यपूर्व की राजनीति और दुनिया की ऊर्जा सप्लाई हमेशा के लिए बदल जाएगी। फिलहाल दुनिया इंतजार कर रही है- युद्ध कब खत्म होगा और पाइपलाइन की बात कब अमल में आएगी।

‘इस्लाम की रोशनी’ पर ज्ञान देने से नहीं चला ओझा ‘सर’ का काम, अब देश में क्रांति के नाम पर कर रहे ‘मारने-काटने’ की बात: पढ़िए कैसे पूर्व AAP नेता का आतंकियों के बखान का रहा है इतिहास

जो न राजनीति में टिका, न शिक्षक के रूप में उसने आज तक ढंग की कोई बात कही। वह अब चला है देश का भविष्य तय करने। तो ये हैं हमारे UPSC एजुकेटर अवध प्रताप ओझा उर्फ ओझा सर। जिन्होंने फेमस होने के लिए, हिंदुओं के खिलाफ टिप्पणी भी की, इस्लाम की सराहना भी की, क्लासेज में सेक्सी-सेक्सी बातें भी कीं और यहाँ तक की आतंकवादी का बखान भी इन्होंने किया। लेकिन इतने विवादों के बाद भी करियर किसी क्षेत्र में सफल नहीं हुआ।

इन सारे विवादित बयानों के बाद उन्होंने आम आदमी पार्टी (AAP) के टिकट पर दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में हाथ आजमाया, यह सोचकर कि विवादों में ही सही, फेमस तो हुआ हूँ, लोग वोट कर ही देंगे। लेकिन लोगों को उनकी देश-विरोधी और हिंदू विरोधी बयानों की सच्चाई पता थी, तभी वह चुनाव हार गए। और अब दोबारा निकल पड़े हैं देश की तबाही की राह खोजने।

तो हाल ही में ओझा सर ने सॉल्ट बाय लुटियंस को इंटरव्यू दिया। इस इंटरव्यू का एक वीडियो क्लिप काफी चर्चा का विषय बना। वीडियो में ओझा सर ने US-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग का हवाला देते हुए भारत में ‘मार-काट’ होने की भविष्यवाणी कर दी। और बोला कि ऐसे में वह खुद चीन भाग जाएँगे।

ओझा सर के ‘मारकाट’ वाले बयान का संदर्भ

ओझा सर यह बात किस संदर्भ में कहते हैं उसे भी पहले जान लेना जरूरी है, क्योंकि यह बात एक शिक्षक की जुबान से सुनना काफी अटपटा लगता है। भारत में शिक्षा व्यवस्था को खराब बताते हुए ओझा कहते हैं, “यहाँ शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त है। मेरी बेटियों के टीचर्स मुझसे शिकायत करते हैं कि पढ़ती नहीं हैं। हमने कहा कि क्या करोगे इतना पढ़ाकर… इंजीनियर, डॉक्टर हमें बनाना नहीं… हमें बनाना है नेता।”

यह बात वाकई में एक शिक्षक के जुबान से सुननी अटपटी लगती हैं। एक शिक्षक, जो छात्रों को बेहतर शिक्षा देकर एक बेहतर समाज तैयार करता है। अगर वह कहे कि पढ़ाई की क्या जरूरत, नेता बन जाओ। जैसे नेता तो पढ़े-लिखे होते ही नहीं, और अगर कुछ धारणाएँ और हकीकत ऐसी हैं भी। तो क्या इसे बदलना एक शिक्षक का कर्तव्य नहीं, या बच्चों के मन में ये भरना कि पढ़ो मत, नेता बन जाना। क्या इससे देश में कोई बदलाव आएगा?

ओझा सर शायद ही ऐसा सोच पाएँ, क्योंकि वह ठान कर बैठे हैं कि भारत माता को जय करने वाला हमारा देश एक ‘जंगल’ है। वह कहते हैं कि इस जंगल में या तो ‘शिकारी’ या फिर ‘शेर’ रहते हैं। एक शिक्षक की ऐसी भाषा न सिर्फ आक्रामक है, बल्कि पूरी व्यवस्था और समाज को नकारने वाली भी है। अगर एक शिक्षक ही देश के बारे में ऐसी सोच रखता है, तो वह छात्रों को क्या दिशा देगा।

अब ओझा सर की विशेष भविष्यवाणी

और बस यहीं ओझा सर क्रांति की बात शुरू करते हैं। भविष्यवाणी करते हैं कि शिक्षा व्यवस्था को ठीक करने के लिए एक क्रांति होगी। ओझा कहते हैं, “एक क्रांति होने जा रही है, भयंकर मार-काट होगी… इस देश में। इकोनॉमी और बैंकों का पतन होगा।”

इसके बाद खुद को दुनिया की राजनीति का ‘फर्जी’ एक्सपर्ट दिखाते हुए आगे कहते हैं, “ये ईरान और अमेरिका वाला युद्ध बढ़ जाए और गैस सिलेंडर की सप्लाई बंद हो जाए। तो ये दिल्ली, मुंबई, कोलकाता… यहाँ भूखा आदमी मरने से पहले मारेगा।”

ओझा सर ने यह तुलना फ्रांस और रूस की क्रांतियों से की, जब पहले विश्व युद्ध के दौरान 1917 में रूस में भूखमरी और खाद्यान्न की भारी कमी के कारण जनता ने विद्रोह किया था। ये ओझा सर की भविष्यवाणी कम और बददुआ ज्यादा नजर आती है। पहली बात तो भारत की स्थिति को उसी तराजू में रखना पूरी तरह गलत है, दूसरी बात ओझा सर को अंदाजा भी नहीं है कि ऐसी बातों से लोगों में कितना डर पैदा हो सकती है, जिनका कोई ठोस आधार तक नहीं है।

लेकिन ओझा सर ने ऐसे डर पैदा करने वाले बयान जानबूझ कर दिए हैं। यहाँ भी दो पहलू हो सकते हैं। पहली बात की वो फेमस होने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उनकी बात करते हैं, उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि ये बातें आलोचना हो या तारीफ। दूसरी बात कि यहाँ ओझा सर की भारत के खिलाफ घृणा साफ झलकती है, जो कि सिर्फ झलकने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस देश को ‘तबाह’ करने की सोची-समझी मंशा है।

क्योंकि खुद तो वह चीन भागने की तैयारी में हैं। वह खुद कहते हैं, “मैं तो चीन निकल जाऊँगा, मेरा तो अपना है सारा व्यापार। दोस्त हैं, शोरूम हैं… वहाँ निकल जाएँगे।” यहाँ पूरे देशवासियों में डर पैदा करके ओझा सर ने अपना इंतजाम कर लिया है। भागने की बात कर रहे हैं, वो भी एक ऐसे देश में, जिसके साथ भारत की दुश्मनी है। ये तो वही हो गया, विजय माल्या ने देशवासियों के पैसे लूटे और बस गया ‘अंग्रेजों’ के बीच, जिन्होंने भारत पर 200 साल राज किया।

ये सभी लोग देश को बर्बाद करने के ख्वाब बुनते हैं और खुद विदेशी सहयोग के सहारे बैठे रहते हैं। कोई चौंकने वाली बात नहीं होगी, जब कल को ओझा सर का कोई विदेशी लिंक सामने आएगा, जिसमें कहा जाएगा कि ओझा सर को विदेशी फंडिंग मिल रही थी ये सब बेतुके और भद्दे बयान देने के लिए।

ओझा सर के इस्लाम और आतंकियों के बखान में प्रवचन

देश में ‘मार-काट’ हो जाने जैसा भारत-विरोधी और ‘आतंकी’ विचारधारा वाला बयान ओझा सर ने कोई पहली बार नहीं दिया है। ये वही ओझा सर हैं, जिनके इस्लाम और आतंकियों का बखान करते वीडियो वायरल होते हैं। और हिंदू धर्म के देवी-देवताओं को गाली देने में भी इनका नाम कुख्यात की लिस्ट में आता है।

कभी ये आतंकवादी ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका में किए 9/11 हमले को महान उपलब्धि ठहरा देते हैं और उसके बहादुरी के किस्से छात्रों को सुनाते हैं। कभी इस्लाम की बड़ाई में चूर रहते हैं और कहते हैं कि इस्लाम ही पूरी दुनिया में रोशनी लेकर आया, इससे पहले तो अँधेरा था।

वहीं हिंदुओं की बात आती है तो अवध ओझा कड़वाहट के बोल निकालने शुरू कर देते हैं। श्रीकृष्ण पर लांछन लगाते हैं औऱ दावा करते हैं कि यादव लोग एक बार भगवान को मिलकर मारने वाले थे। इतना ही नहीं श्रीकृष्ण के चरित्र पर भी सरेआण बोलते हैं कि वे तो यादव की बीवियों के साथ नाचते थे।

और ऐसा नहीं है कि छात्र जानते नहीं है अवध ओझा की सच्चाई को। ओझा की क्लासेज अटेंड करने वाले छात्र कहते हैं कि ओझा सर कच्छा पहनकर क्लास में आते हैं और सेक्स की बातें करते हैं। कहने को ये UPSC एस्पिरेंट को पढ़ाने वाले शिक्षक हैं।

अगर ऐसी घटिया मानसिकता वाले शिक्षक से छात्र पड़ेगा, तो लाजमी है कि कल को परीक्षा में सफल होकर कोई छात्र देश के बड़े उच्च पदों पर बैठेगा, तो उसके विचार क्या होंगे? वो देश को किस नजरिए से देखेगा? और देश की तरक्की में योगदान देने के बजाए क्या वह भी ओझा सर की तरह चीन चला जाएगा?

ओझा सर खुद तो राजनीति में टिक नहीं पाए, और शिक्षक के तौर पर भी उनका करियर सफल हो नहीं सका। तो अब वे ऐसे भविष्य तैयार करने में निकल पड़े हैं, जो उनकी मानसिकता को पूरे देश में फैलाए। तो इसीलिए छात्र को समझना होगा कि ऐसे शिक्षक केवल देश को तबाह करने के बारे में सोचते हैं, न कि देश की तरक्की के बारे में।

देश का नागरिक बनाकर दिया सम्मान, जमीन पर भी दिलाया अधिकार: UP में 6 दशक बाद 2500+ बांग्लादेशी हिंदू परिवारों का इंतजार खत्म, पढ़िए योगी सरकार के फैसले से कैसे सुधरी डेमोग्राफी

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान कहे जाने वाले बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों के लिए एक बीड़ा उठाया है। सीएम योगी ने इन शरणार्थियों के लिए जो काम शुरू किया है, वह सिर्फ पुनर्वास की सामान्य सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक लंबी ऐतिहासिक त्रासदी का देर से मिला न्याय है।

1960 के दशक से लेकर 1975 तक, पूर्वी पाकिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न, दंगों और असुरक्षा से भागकर कई हिंदू परिवार भारत के उत्तर प्रदेश के जिलों पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर, रामपुर आदि में आकर बस गए थे। वे दशकों से जिस जमीन पर घर और खेत बनाकर रह रहे हैं, उस पर अब जाकर कानूनी मालिकाना हक की प्रक्रिया तेज हुई है। इसके कारण हिंदू डेमोग्राफी में भी अहम बदलाव देखने को मिल रहे हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: विभाजन के बाद भी खत्म न हुआ पलायन

1947 के विभाजन के बाद भी पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू समुदाय के लिए हालात सहज नहीं हुए। अलग- अलग दौर में सांप्रदायिक हिंसा, धार्मिक भेदभाव, संपत्तियों पर कब्जे, मंदिरों पर हमले और स्थानीय स्तर पर संगठित उत्पीड़न की वजह से वहाँ से हिंदुओं का पलायन लगातार जारी रहा।

1960 से 1975 के बीच यह पलायन उत्तर भारत के कई हिस्सों तक पहुँचा, जिनमें उत्तर प्रदेश भी शामिल था। इन्हीं वर्षों में हजारों बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थी परिवारों को भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने अलग- अलग जिलों में पुनर्वासित किया।

पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर जैसे जिलों में इन परिवारों को कुछ गाँवों में बसाया गया। उन्हें रहने के लिए जगह और खेती के लिए जमीन दी गई, लेकिन उस समय की कानूनी संरचना, रिकॉर्ड की गड़बड़ियों और बाद के बदलावों के कारण ज्यादातर मामलों में जमीन पर उनका मालिकाना हक पूरी तरह से उन्हें नहीं मिल पाया।

बांग्लादेश से आए ये परिवार भारत में बस गए, उनकी पीढ़ियाँ यहीं बीत गईं। वोटर कार्ड से लेकर राशन कार्ड तक हर जगह उनका नाम आया, पर जमीनों के रिकॉर्ड में वे या तो ‘राज्य सरकार की भूमि’ पर बसे दिखे या किसी अधूरी प्रविष्टि के साथ दर्ज रहे।

योगी सरकार का निर्णय: प्रशासनिक आदेश नहीं, नैतिक घोषणा

जुलाई 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उच्चस्तरीय बैठक में यह निर्देश दिया कि पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को जमीन का मालिकाना हक दिया जाए।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस बैठक में सीएम ने साफ कहा कि इसे सिर्फ पुनर्वास का मामला नहीं, बल्कि ‘सामाजिक न्याय, मानवता और राष्ट्रीय जिम्मेदारी’ के रूप में देखा जाना चाहिए।

सीएम के निर्देशों के मुख्य बिंदुओं में कुछ बातें साफ तौर से शामिल की गई थी। पहला, 1960 से 1975 के बीच विस्थापित होकर आए लगभग 10,000 परिवारों को पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर में बसाया गया था, उनके जमीन के मामलों की समीक्षा की जाए।

दूसरा, जिन परिवारों को आवास और खेती के लिए जमीन दी गई थी, वहाँ कानूनी विसंगतियों और रिकॉर्ड की समस्याओं की वजह से भूमि अधिकार लंबित हैं, उन्हें सुलझाया जाए।

तीसरा, अगर किसी जगह पर जमीन उपलब्ध नहीं है, या कानूनी रूप से देना संभव नहीं, तो वैकल्पिक भूमि आवंटित की जाए। चौथा, पुराने सरकारी अनुदान (Government Grants Act) खत्म होने के बाद जो कानूनी शून्य बना, उसे किसी वैकल्पिक व्यवस्था से भरकर इन परिवारों को अधिकार दिया जाए।

सीएम ने अधिकारियों को साफ तौर पर ये कहा कि ‘कानून जनता की सेवा के लिए है, उन्हें पीड़ा में फंसाने के लिए नहीं’। पीलीभीत के लिए ये निर्णय पहले किए गए। उन फैसलों को राज्य सरकार ने इसे सिर्फ कागजी घोषणा तक सीमित नहीं रहने दिया। वहाँ लगभग 2,196 परिवारों के लिए जमीन के मालिकाना हक की प्रक्रिया शुरू की गई।

25 गाँवों में बसाए गए हिंदू शरणार्थी परिवारों के मामलों में सत्यापन रिपोर्टों को राज्य सरकार को भेजा गया और औपचारिक दिशानिर्देश मिलते ही अंतिम दस्तावेज सौंपने की योजना बनाई गई। इसी मॉडल को लखीमपुर खीरी और अन्य जिलों में भी लागू करने की दिशा में काम हो रहा है।

लखीमपुर खीरी की बदलती तस्वीर- 331 परिवार, 4 गाँव, 3 तहसीलें

आधिकारिक आँकड़ों से लखीमपुर खीरी की स्थिति बहुत साफ होकर सामने आती है। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, कुल 331 परिवार पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से विस्थापित होकर लखीमपुर खीरी जिले में पुनर्वासित किए गए हैं।

ये परिवार 3 तहसीलों गोला, धौरहरा और मोहम्मदी में बसाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन 331 परिवारों का बंटवारा करने के लिए तहसील धौरहरा के गाँव सुतकुईया में 97 परिवार बसाए गए। तहसील गोला के ग्राम संख्या-3 में 37 परिवारों को जगह मिली। इसके अलावा तहसील मोहम्मदी के गाँव मोहनगंज (कॉलोनी) में 41 परिवारों की बसाहट की गई।

इसके अलावा लखीमपुर खीरी में बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों की सबसे बड़ी बस्ती मोहम्मदी तहसील के फैयानगर में है, जहाँ अकेले 156 परिवार बसाए गए हैं। कुल मिलाकर यह चार बस्तियाँ बिखरी हुई सही, पर एक साझा ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ी हुई हैं।

परिवारों की संरचना: तीन पीढ़ियों की जीवन-कथा

रिपोर्ट में यह भी शामिल किया गया है कि हर परिवार सदस्यों की औसत संख्या कितनी है। यह आँकड़ा ‘जनसंख्या’ के वास्तविक पैमाने को भी सामने लाता है। तहसील गोला में एक परिवार में लगभग 1 से 8 सदस्य हैं। तहसील धौरहरा में एक परिवार में लगभग 1 से 6 सदस्य हैं। तहसील मोहम्मदी में एक परिवार में लगभग 1 से 10 सदस्य तक हैं।

​इस लिहाज से अगर देखा जाए तो 331 परिवारों की कुल आबादी लगभग 1500 से 1800 के आसपास है। इसमें अब दूसरी- तीसरी पीढ़ी की मिश्रित आबादी है। पहली पीढ़ी वे थे जिन्होंने सीमाएँ पार कीं, दूसरी पीढ़ी ने अस्थिर पुनर्वास में जीवन बिताया और तीसरी पीढ़ी अब उसी जमीन पर अपने कानूनी हक की प्रतीक्षा कर रही है।

जमीन को लेकर लखीमपुर खीरी का माइक्रोडेटा

जारी हुई आधिकारिक रिपोर्ट में प्रति परिवार आवासीय/कृषि भूमि का लेखाजोखा भी शामिल है। तहसील गोला के 37 परिवारों को प्रति परिवार औसतन 3 बीघा (कृषि भूमि) आवंटित की गई है।

वहीं, तहसील धौरहरा के सुतकुईया गाँव में 60 परिवारों को प्रति परिवार लगभग 1.620 बीघा कृषि भूमि दी गई। तहसील मोहम्मदी ग्राम मोहनगंज (कॉलोनी) में15 परिवारों को प्रति परिवार 3 बीघा भूमि मिली। वहीं, 9 परिवारों को प्रति परिवार 7 बीघा भूमि आवंटित की गई। इसके अलावा 17 परिवारों को प्रति परिवार 5 बीघा भूमि दी गई।

इनके अलावा तहसील मोहम्मदी के फैयानगर गाँव में बसे 156 परिवारों को खेली के लिए प्रति परिवार लगभग 4.75 बीघा कृषि भूमि आवंटित की गई।

इन आँकड़ों से ये तो साफ है कि लखीमपुर खीरी के बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थी न तो बिल्कुल भूमिहीन हैं पर न ही बड़े जमींदार। वे छोटे और मझोले किसान हैं, जिनकी आजीविका 1-7 बीघा की जमीन पर टिकी है।

असल में समस्या यह नहीं कि जमीन नहीं मिली, समस्या यह रही कि जिस जमीन पर वे पीढ़ियों से काम कर रहे हैं, उसका पूर्ण कानूनी दस्तावेज अब तक उनके नाम नहीं था।

पीलीभीत के 2,196 परिवार और 62 साल का इंतजार

पीलीभीत की स्थिति उत्तर प्रदेश के इस बड़े फैसले का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम दिखाती है। पीलीभीत जिले में लगभग 2,196 परिवार पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों के रूप में दर्ज हैं, जो 25 गाँवों में बसे हुए हैं।

इन्हें 1960 के दशक में आवास और खेती के लिए जमीन दी गई थी, पर कानूनी मालिकाना हक नहीं मिला। रिकॉर्ड में कहीं जमीन वन विभाग के अधीन दर्ज हो गई, कहीं म्यूटेशन (नामांतरण) नहीं हुआ, कहीं पुराने सरकारी अनुदान अधिनियम के खत्म होने के बाद कानूनी रास्ता ही नहीं बचा।

सीएम योगी के हस्तक्षेप के बाद पीलीभीत के जिलाधिकारी ने बताया कि 2,196 में से 1,466 परिवारों की सत्यापन रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी जा चुकी है और अंतिम दिशानिर्देश मिलते ही उन्हें कागज देने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। यह प्रक्रिया केवल पीलीभीत तक सीमित नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के उन सभी जिलों में लागू की जा रही है, जहाँ ऐसे शरणार्थी बसाए गए थे।

एक बड़ा तकनीकी पक्ष यह है कि इन जमीनों को शुरू में ‘गवर्नमेंट ग्रांट्स एक्ट’ के तहत आवंटित किया गया था। 2018 में इस अधिनियम को समाप्त कर दिया गया, जिसके बाद पुराने अनुदानों को वैध करने का सीधा कानूनी रास्ता स्पष्ट नहीं बचा।

अधिकारियों ने सीएम योगी को बताया कि यही वजह थी कि वैध शरणार्थी परिवारों को भी मालिकाना हक देने की प्रक्रिया तेज नहीं हो पा रही थी, क्योंकि किसी के नाम पर म्यूटेशन करने के लिए साफ कानूनी प्रावधान नहीं था। इस पर सीएम का जवाब था- “कानून लोगों को पीड़ा में फँसाने के लिए नहीं, बल्कि उनकी सेवा के लिए है।” इस आधार पर अधिकारियों को वैकल्पिक कानूनी रास्ता निकालने को कहा गया।

लखीमपुर खीरी के दस्तावेज से पता चलता है कि राज्य सरकार ने इन परिवारों को अन्य कल्याणकारी योजनाओं से बाहर नहीं रखा। रिपोर्ट के मुताबिक, इन शरणार्थी परिवारों को नियमों के अनुसार पात्रता के आधार पर कई योजनाओं का लाभ मिलता रहा है।

इन योजनाओं में प्रधानमंत्री किसान दुर्घटना कल्याण योजना, फसल बीमा से जुड़ी योजनाएँ, प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री किसान सम्मान योजनाएँ, वृद्धावस्था, विधवा और दिव्यांग पेंशन योजनाएँ, विवाह अनुदान/ मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह जैसी योजनाएँ, शिक्षा सहायता, छात्रवृत्ति और स्कूल–संबंधी लाभ, स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ी योजनाएँ, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत राशन स्वच्छ भारत मिशन, ग्राम सड़क योजनाएँ, ग्रामीण रोजगार और आजीविका योजनाएँ आदि भी शामिल रही हैं।

सीएम योगी आदित्यनाथ की पहल और सरकार के प्रयासों से इन्हें ‘नागरिक’ की तरह सम्मान मिलना शुरू हुआ। जमीन के सवाल पर वे पहले ‘अधूरे शरणार्थी’ बने रहे थे। योगी सरकार की मौजूदा पहल में कल्याणकारी योजनाओं के लाभ के साथ इन्हें अब भूमि अधिकार को जोड़ा जा रहा है, ताकि उनका आर्थिक आधार मजबूत हो सके।

उत्तर प्रदेश सरकार की पहल दिखाती है कि राज्य स्तर पर शरणार्थियों के दस्तावेज तैयार करने और जमीन के अधिकार देने की प्रक्रिया एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि पूरक हैं।

उत्तर प्रदेश मॉडल बना शरणार्थियों के कल्याण की एक मिसाल

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के संदर्भ में कई स्तरों पर काम आगे बढ़ाया है। उन्हें ऐतिहासिक स्वीकृति मिली। सरकार ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया कि ये परिवार दशकों से यहाँ हैं। इन्हें उस समय जमीन दी गई, पर मालिकाना हक नहीं मिला। इस गलती को योगी सरकार ने ठीक किया।

इसके बाद उन्हें कानूनी समाधान मिला। Government Grants Act खत्म होने के बाद बने कानूनी शून्य को पाटने के लिए वैकल्पिक रास्ते अब भी खोजे जा रहे हैं, जिससे पुराने आवंटन को वैध करके इन परिवारों को भू- स्वामी अधिकार दिया जा सके।

इसके अलावा प्रशासनिक क्रियान्वयन को बढ़ाया गया। जिलेवार रिपोर्टें मंगवाकर (जैसे पीलीभीत में 2,196 परिवार, लखीमपुर खीरी में 331 परिवार), हर परिवार का सत्यापन, प्रति परिवार भूमि का माप और उसके आधार पर दस्तावेज तैयार कराने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

इसके साथ ही योगी सरकार की ओर से शरणार्थियों की सूची केंद्र को भेजकर उन्हें CAA के दायरे में लाने की कोशिश, कल्याणकारी योजनाओं में उनकी निरंतर भागीदारी और ‘शरणार्थी’ से आगे बढ़कर ‘स्थिर नागरिक-किसान’ के रूप में स्थापित करने की राजनीतिक इच्छा दिखती है।

इस लिहाज से कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश वर्तमान परिदृश्य में बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के कल्याण, सम्मान और भूमि अधिकार के प्रश्न पर एक सक्रिय मॉडल प्रस्तुत कर रहा है, जहाँ केवल राहत नहीं, बल्कि अधिकार–आधारित समाधान की ओर कदम बढ़ाए जा रहे हैं।

यह कहना कि ‘उत्तर प्रदेश की योगी सरकार बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के कल्याण के लिए कार्य कर रही है’ महज एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की जमीन, घर और पहचान से जुड़ा एक ठोस, ऐतिहासिक और कानूनी प्रयास खड़ा दिखता है। पीलीभीत की 2,196 बस्तियाँ हों या लखीमपुर खीरी के 331 परिवारों के छोटे–छोटे खेत, सब इस बदलती कहानी के गवाह हैं।

पवनपुत्र का नाम आते ही क्यों होती है संवाद, संयम और साहस की बात? वाल्मीकि रामायण के प्रसंग से जानिए कैसे हैं रामदूत हनुमान और बचपन में कैसे निगल गए सूर्य

हनुमान जयंती/जन्मोत्सव सनातनियों के लिए केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उस अद्वितीय व्यक्तित्व को समझने का अवसर है, जिसमें बल, बुद्धि, विनम्रता और संवाद की असाधारण क्षमता एक साथ समाहित है। पवनपुत्र हनुमान का चरित्र जितनी वीरता से भरा है, उतनी ही गहराई से ज्ञान और संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।

वाल्मीकि रामायण में उनका जो चित्रण मिलता है, वह हमें यह समझाता है कि वे केवल बलशाली नहीं, बल्कि अत्यंत सूझबूझ वाले और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे।

जब भगवान राम से पहली भेंट में ही वाणी से जीत लिया मन

वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में सीता हरण के बाद श्रीराम और लक्ष्मण की हनुमान जी से भेंट होती है। जब श्रीराम और लक्ष्मण की पहली मुलाकात हनुमान जी से होती है, तब वे ब्राह्मण के रूप में उनके सामने आते हैं। लेकिन उनके शब्दों की शक्ति ही उनकी असली पहचान बनती है।

उन्होंने इतनी मधुर, सुसंगत और शुद्ध भाषा में संवाद किया कि श्रीराम तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। श्रीराम ने लक्ष्मण से उनके बारे में कहते हुए जो विश्लेषण किया, वह केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि एक गहन अवलोकन था।

उन्होंने यह समझ लिया कि हनुमान जी केवल बोल नहीं रहे, बल्कि हर शब्द सोच-समझकर, संतुलन के साथ और सामने वाले के मन को ध्यान में रखकर कह रहे हैं। उनकी वाणी में कोई अशुद्धि नहीं थी, कोई कटुता नहीं थी और कोई अनावश्यक विस्तार नहीं था।

श्रीराम तो यहाँ तक कहते हैं कि हृदय, कंठ और मूर्धा (मुँह के अंदर का तालु और ऊपर के दाँतों के पीछे सिर की तरफ का भाग जिसे जीभ का अगला भाग ट्, ठ्, ड्, ढ्, और ण वर्ण का उच्चारण करते समय उलटकर छूता है) के सटीक प्रयोग से बोली गई इस वाणी से तलवार उठाए हुए शत्रु का भी हृदय परिवर्तित हो जाए।

यह केवल वाणी की प्रशंसा नहीं, बल्कि उस आत्मिक शक्ति का वर्णन है जो हनुमान जी के भीतर थी। श्रीराम यहाँ सुग्रीव को भाग्यशाली मानते हैं कि उनके पास हनुमान जैसे दूत हैं। इतना ही नहीं हनुमान जी ने उसी वार्ता के दौरान संधि का प्रस्ताव भी रख दिया और वह तुरंत स्वीकार भी हो गया।

यह उनकी बुद्धिमत्ता, समय की समझ और संवाद की दक्षता का सर्वोच्च उदाहरण है।

शब्द, भाव और शरीर, तीनों का अद्भुत संतुलन

हनुमान जी की विशेषता केवल यह नहीं थी कि वे अच्छा बोलते थे, बल्कि यह थी कि उनके शब्द, भाव और शरीर, तीनों में अद्भुत सामंजस्य था। जब वे बोलते थे, तो उनकी भौहें, नेत्र, मुख और ललाट सभी उनके शब्दों के अनुरूप भाव प्रकट करते थे।

उनकी वाणी न बहुत तेज होती थी, न बहुत धीमी, बल्कि इतनी संतुलित और मधुर होती थी कि सुनने वाला सहज ही प्रभावित हो जाता था। वे कहीं रुकते नहीं थे, न ही ऐसा लगता था कि वे कुछ भूल गए हैं। उनके शब्द सीधे और स्पष्ट होते थे, जिनमें कोई बनावट या दिखावा नहीं होता था।

इसी कारण श्रीराम ने उन्हें ‘वाक्यज्ञ’ कहा यानी ऐसा व्यक्ति जो केवल शब्दों का ही नहीं, बल्कि उनके अर्थ, प्रभाव और समय का भी ज्ञान रखता है। सामने वाला क्या बोल रहा है और जवाब में क्या बोलना चाहिए, इसकी उन्हें समझ थी।

श्रीराम कहते हैं कि जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली, जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया और जो सामवेद का विद्वान नहीं, वो इस तरह बातें नहीं कर सकता। अर्थात श्रीराम ने हनुमान जी की बातों से ही अंदाजा लगा लिया कि वो तीनों प्रमुख वेदों के ज्ञाता हैं।

रावण के दरबार में भी अडिग संयम और ज्ञान का परिचय

हनुमान जी का असली तेज तब और भी स्पष्ट होता है जब वे रावण के दरबार में पहुँचते हैं। वहाँ उन्हें अपमानित किया जाता है, बार-बार अपशब्द कहे जाते हैं, लेकिन उनकी वाणी में कोई परिवर्तन नहीं आता। तुलसीदास कृत रामचरितमानस में भी उनके रावण के साथ बहस की चर्चा है, लेकिन वहाँ भी वो रावण को ज्ञान ही दे रहे हैं, उसे समझा रहे हैं।

“उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥” – रावण द्वारा हनुमान जी के लिए बार-बार अपशब्दों का प्रयोग किए जाने के बावजूद भी उन्होंने यही समझाया कि तुम्हारे मन में भ्रम है। रावण के दरबार में उन्होंने श्रीराम की महिमा का बखान किया।

उन्होंने उलटी-सीधी बातें नहीं की। “जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥” – उन्होंने शत्रु के सामने बंदी बन कर भी दुश्मन के ही हित की बात की।

बाल लीला, ज्ञान और निर्भीक जिज्ञासा

इसके अलावा हनुमान जी की बाल लीला के तौर पर सूर्य को निगलने वाला प्रसंग भी बहुत चर्चित रहता है। सनातन परंपरा में सूर्य को सिर्फ आकाश में चमकने वाला ग्रह नहीं माना गया, बल्कि उसे समस्त ज्ञान और चेतना का प्रतीक कहा गया है।

वेदों में सूर्य को ब्रह्म का नेत्र बताया गया है। अर्थात वह शक्ति जो पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशमान करती है। ऐसे में जब बाल रूप में हनुमान जी उदित होते सूर्य को देखकर उसे निगलने के लिए दौड़ पड़ते हैं, तो इसका संकेत यह है कि उनमें ज्ञान को तुरंत प्राप्त कर लेने की तीव्र इच्छा थी।

जैसे किसी साधक को आत्मज्ञान की पहली झलक मिलते ही वह उसे पूर्ण रूप से पाने के लिए आतुर हो उठता है। वेदांत में ब्रह्म को उस प्रकाश के समान बताया गया है, जो सूर्य की तरह उदित होता है। सूर्योदय हमें शांत और सुंदर दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर अपार ऊर्जा और अग्नि छिपी होती है।

ठीक इसी प्रकार ज्ञान भी बाहर से आकर्षक लगता है, परंतु उसकी गहराई अथाह होती है। उसे पाने के लिए धैर्य, साधना और क्रमबद्ध प्रयास आवश्यक होते हैं, कोई भी व्यक्ति एक ही क्षण में पूर्ण ज्ञानी नहीं बन सकता। हनुमान जी की इस यात्रा में वायु देव का विशेष महत्व है। वायु यहाँ केवल हवा नहीं, बल्कि जीवन की वह अदृश्य शक्ति है जो साधक को सहारा देती है।

यह संकेत देता है कि जब कोई व्यक्ति सच्चे उद्देश्य से ज्ञान की ओर बढ़ता है, तो प्रकृति स्वयं उसकी सहायता करती है। हमारी श्वास भी उसी वायु का रूप है, जो शरीर और आत्मा के बीच एक सेतु का काम करती है। इसी कारण हनुमान जी को पवनपुत्र कहा गया है। वे हर परिस्थिति में सुरक्षित रहते हैं, चाहे वह लंका की अग्नि हो या आकाश की ऊँचाइयाँ।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि हनुमान जी सूर्य के पास पहुँचकर भी जलते नहीं। इसका अर्थ है कि सच्चा ज्ञान किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता, बल्कि उसे शुद्ध करता है। भगवद्गीता में भी कहा गया है कि ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र वस्तु नहीं है। चाहे साधक पूरी तरह तैयार न भी हो, फिर भी सत्य उसे हानि नहीं पहुँचाता बल्कि धीरे-धीरे उसे परिष्कृत करता है।

इसी कथा में राहु का प्रसंग भी आता है, जो सूर्य को ग्रसने आता है लेकिन हनुमान के सामने टिक नहीं पाता। राहु यहाँ माया, भ्रम और भय का प्रतीक है। जब मन में साहस और पवित्रता होती है, तो ये नकारात्मक शक्तियाँ स्वतः दूर हो जाती हैं। जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता है, वैसे-वैसे भ्रम के बादल छँटने लगते हैं। लेकिन यदि मन अस्थिर हो जाए, तो वही माया ज्ञान के मार्ग में बाधा बन सकती है।

इसके बाद इंद्र द्वारा हनुमान जी पर वज्र प्रहार करने की घटना आती है। यह दर्शाती है कि ज्ञान के मार्ग में केवल आकर्षण ही नहीं, परीक्षाएँ भी आती हैं। इंद्र यहाँ व्यवस्था, अनुशासन और दैवी नियमों के प्रतीक हैं। साधक को आगे बढ़ने के लिए इन परीक्षाओं से गुजरना ही पड़ता है। ये कष्ट दंड नहीं, बल्कि व्यक्ति को और मजबूत बनाने का माध्यम होते हैं।

जब हनुमान जी को चोट लगती है, तो वायु देव क्रोधित होकर समस्त संसार से प्राणवायु खींच लेते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि सृष्टि की हर चीज एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। कोई भी घटना अलग-थलग नहीं होती, हर क्रिया का प्रभाव पूरे ब्रह्मांड पर पड़ता है।

अंततः देवताओं को हनुमान जी की महत्ता स्वीकार करनी पड़ती है और वे उन्हें वरदान देते हैं। यह दर्शाता है कि जो साधक अपने मार्ग पर अडिग रहता है, अंत में वही उच्चतम ज्ञान को प्राप्त करता है।

कभी बॉलीवुड तो कभी लेफ्ट लिबरल गैंग उठाता रहा है सवाल लेकिन आप जानिए भगवान हनुमान के जीवन का सच्चा संदेश

भगवान हनुमान को लेकर कभी लेफ्ट लिबरल गैंग सवाल उठाता है कि उन्होंने सूर्य को फल समझकर कैसे निगल लिया तो कभी आदिपुरुष जैसी फिल्मों में उनकी भूमिका निभा रहे कलाकार को तीखे संवाद दे कर उनके व्यक्तित्व को अलग तरह से पेश कर दिया जाता है। कोशिश यह रहती है कि सनातन देवी-देवताओं का गलत चित्रण कैसे पेश किया जाए।

किसी ऐतिहासिक घटना को अलग-अलग स्तर के लोग अलग-अलग तरीके से समझते हैं, विशेषज्ञ उसे गहराई से अध्ययन करते हैं, विद्यार्थी उसे पुस्तकों से सीखते हैं और बच्चों को वही बात सरल कहानियों में समझाई जाती है। वैसे ही सनातन धर्म की कथाएँ भी अलग-अलग स्तरों पर अर्थ प्रदान करती हैं।

जिस व्यक्ति की समझ जितनी होती है, वह उसी अनुसार इन कथाओं का अर्थ ग्रहण करता है। इस प्रकार हनुमान जी की कथाएँ केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना, साहस और आत्मविकास की एक गहरी आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है।

पवनपुत्र हनुमान का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची महानता केवल बल में नहीं, बल्कि उस संतुलन में है जहाँ ज्ञान, विनम्रता, संयम और भक्ति एक साथ उपस्थित हों। हनुमान का चरित्र हमें यह समझाता है कि वाणी में मधुरता, व्यवहार में सरलता, विचारों में स्पष्टता और लक्ष्य में दृढ़ता, ये सभी गुण मिलकर ही किसी व्यक्ति को महान बनाते हैं।

वे केवल पूजनीय नहीं हैं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में अपनाने योग्य एक आदर्श हैं। उनकी कथा हमें यह सिखाती है कि सही शब्द, सही सोच और सही उद्देश्य के साथ कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को ऊँचाई तक ले जा सकता है।

15 साल बाद, पहली बार पूरी तरह डिजिटल… 1 अप्रैल से शुरू हुई दुनिया की सबसे बड़ी जनगणना, जातियों की भी होगी सटीक गिनती: पूरी प्रक्रिया के बारे में जानिए

जनगणना 2027 देश की 16वीं और स्वतंत्रता के बाद की 8वीं जनगणना है। 1 अप्रैल 2026 से शुरू हुई ये जनगणना पूरी तरह डिजिटल है। पंद्रह वर्षों के अंतराल के बाद जनगणना करवाई जा रही है, जो देश की पहली पूरी तरह से डिजिटल जनगणना है। इतना ही नहीं, ये दुनिया की पहली इतनी बड़ी डिजिटल जनगणना भी है।

भारत में जनगणना सिर्फ सांख्यिकीय डेटा इकट्ठा करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह देश की सामाजिक-आर्थिक योजना का एक मजबूत स्तंभ भी है। भारत में व्यवस्थित जनगणना की शुरुआत 1872 में ब्रिटिश काल के दौरान हुई थी। हर दस साल में जनगणना कराने की परंपरा 1881 से लगातार चली आ रही है। इस क्रम में आखिरी जनगणना 2011 में हुई।

यह देश की 15वीं जनगणना थी, जिसने उस समय के डेटा के अनुसार भारत की जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति की एक साफ तस्वीर पेश की।

भारत में जनगणना, जनगणना अधिनियम 1948 और 1990 के प्रावधानों के मुताबिक की जाती है। हालाँकि इसमें समय-समय पर संशोधन किए गए हैं। नियमों के अनुसार, 16वीं जनगणना वर्ष 2021 में होनी चाहिए थी। लेकिन, 2020 में दुनिया भर में फैले कोविड-19 महामारी और इसके कारण लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से इस प्रक्रिया को अनिश्चित काल के लिए टालना पड़ा। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली बार था जब दस साल के अंतराल पर होने वाली जनगणना में देरी हुई।

जनगणना 2027 में पेपर वर्क के बजाय सारी जानकारी मोबाइल ऐप और ‘सेल्फ़ एन्यूमरेशन’ यानी स्वगणना पोर्टल के जरिए इकट्ठा की जाएगी। यह आधुनिक भारत के डिजिटल बदलाव को दर्शाता है। केंद्र सरकार ने हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग जनगणना (HLO) के लिए 33 सवालों की एक सूची जारी की है और पोर्टल पर 33 FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल) भी उपलब्ध कराए हैं।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 16वीं जनगणना के लिए कुल ₹11,718.24 करोड़ के बजट को मंजूरी दी है। इस राशि का उपयोग मुख्य रूप से जनगणना कार्य से जुड़े कर्मचारियों के मानदेय और उनके गहन प्रशिक्षण के लिए किया जाएगा। इसके अलावा चूँकि इस बार जनगणना पहली बार डिजिटल माध्यम से हो रही है, इसलिए बजट में एक मजबूत IT इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने, डेटा सेंटर बनाने और आवश्यक लॉजिस्टिक्स सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए भी पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं।

जनगणना की तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं

यह सुनिश्चित करने के लिए कि जनगणना 2027 पूरी तरह से त्रुटिरहित हो, नवंबर 2025 में पूरे देश के 5000 ब्लॉकों में एक पूर्ण ‘प्री-टेस्ट’ (रिहर्सल) आयोजित किया गया था, जिसमें नियुक्ति से लेकर डेटा प्रोसेसिंग तक की सभी डिजिटल प्रक्रियाओं का परीक्षण किया गया। इस गणना में सटीकता सुनिश्चित करने के लिए, देश के सभी 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों के 7092 जिलों, तालुकों और करीब 6.39 लाख गाँवों की प्रशासनिक सीमाओं को 1 जनवरी 2026 से मार्च 2027 तक के लिए ‘सख्त’ कर दिया गया है, ताकि गणना के दौरान कोई भी भौगोलिक बदलाव बाधा न बने।

इस राष्ट्रीय अभियान के लिए एक सुदृढ़ त्रि-स्तरीय प्रशिक्षण ढाँचा तैयार किया गया है, जिसमें 100 राष्ट्रीय प्रशिक्षक और 2000 मास्टर प्रशिक्षक हैं, जिन्होंने 45000 फील्ड प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित किया। ये फील्ड प्रशिक्षक पूरे देश में लगभग 31 लाख गणना करने वालों और पर्यवेक्षकों को 80 हजार बैच में बाँट कर प्रशिक्षण दिया। इन प्रशिक्षुओं को सभी प्रशिक्षण सामग्री उनकी क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराई गई, ताकि वे बिना किसी परेशानी के समय पर लोगों से सही जानकारी ले सकें। आपको बता दें कि इस बार जनगणना 2 चरणों में आयोजित की जा रही है।

पहला चरण 1 अप्रैल से शुरू

भारत की 16वीं जनगणना का पहला चरण आधिकारिक तौर पर 1 अप्रैल, 2026 से शुरू हो गया है। यह 30 सितंबर 2026 तक जारी रहेगा। भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RGI) मृत्युंजय कुमार नारायण के अनुसार, क्षेत्रीय कार्य (फील्ड ऑपरेशन) विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा निर्धारित अलग-अलग कार्यक्रमानुसार संपन्न किया जाएगा। देश के कुछ हिस्सों में यह कार्य अप्रैल में शुरू हो गई है। अन्य हिस्सों में भौगोलिक और प्रशासनिक सुविधा के अनुसार, यह प्रक्रिया जून, जुलाई या अगस्त में पूरी की जाएगी।

जनगणना का पहला चरण यानी ‘हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग जनगणना’ (HLO) को अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच पूरा किया जाएगा। हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपनी सुविधा के अनुसार, इन छह महीनों में से कोई भी 30 दिन निर्धारित करके पूरा करेगा। इस चरण की खासियत है कि गणना करने वाले व्यक्ति के आपके घर आने से ठीक 15 दिन पहले ‘स्व-गणना’ (self-enumeration) का एक विकल्प दिया जाएगा। इसके जरिए आप ऑनलाइन माध्यम से खुद ही अपनी जानकारी भर सकेंगे।

पहले चरण का मकसद आपके घरों की स्थिति और परिवारों की जीवनशैली के बारे में जानना है। इसमें मुख्य रूप से यह जानकारी इकट्ठा की जाएगी कि घर किस तरह का है, परिवार को पीने का पानी, बिजली और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हैं या नहीं। घर में टीवी, गाड़ी या इंटरनेट जैसी सुविधा मौजूद है या नहीं। इस प्रक्रिया के लिए पूछे जाने वाले सवालों की एक सूची भी कुछ दिन पहले जारी कर दी गई थी।

जनगणना देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग चरणों में शुरू होगा। पहले समूह में अंडमान और निकोबार, दिल्ली (NDMC और छावनी), गोवा, कर्नाटक, लक्षद्वीप, मिजोरम, ओडिशा और सिक्किम शामिल हैं। इन राज्यों के नागरिक 1 अप्रैल से 15 अप्रैल, 2026 तक ऑनलाइन ‘स्व-गणना’ कर सकेंगे, जबकि 16 अप्रैल से 15 मई तक गणना करने वाले घर-घर जाकर घरों की जानकारी दर्ज करेंगे।

दूसरे समूह में मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे राज्य शामिल हैं। इन राज्यों में स्व-गणना के लिए 16 अप्रैल से 30 अप्रैल, 2026 तक का समय तय किया गया है, जिसके बाद 1 मई से 30 मई तक घरों की सूची बनाने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। बाकी सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का विस्तृत कार्यक्रम सरकार द्वारा जारी किए गए परिशिष्ट में दिया गया है।

यह प्रक्रिया कैसे पूरी होगी?

जनगणना 2027 भारत की पहली पूरी तरह से डिजिटल जनगणना होगी। इस प्रक्रिया में गणना करने वाले लोग पेन और पेपर के बजाय अपने स्मार्टफोन और एक खास मोबाइल ऐप का इस्तेमाल करेंगे। वे घर-घर जाकर जो जानकारी इकट्ठा करेंगे, उसे सीधे ऐप के जरिए ऑनलाइन जमा करेंगे। इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए मोबाइल ऐप और ‘सेल्फ-एन्यूमरेशन’ पोर्टल कुल 19 भाषाओं में उपलब्ध कराए जाएँगे। इनमें गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी भी शामिल हैं, ताकि बिना किसी रुकावट के सटीक जानकारी इकट्ठा की जा सके।

इस बार नागरिकों के लिए ‘स्वयं-गणना’ (self-enumeration) की सुविधा एक महत्वपूर्ण पहलू है। लोग ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर स्वयं ही अपने परिवारों का विवरण भर सकेंगे। इसके अलावा, इस पूरे अभियान के प्रबंधन के लिए एक अत्याधुनिक केंद्रीय पोर्टल भी बनाया गया है।

यह पोर्टल गणना करने वालों की नियुक्ति, उनके ID कार्ड बनाने, उन्हें काम सौंपने और उनके प्रशिक्षण के प्रबंधन का काम संभालेगा। यह डिजिटल सिस्टम इस बात की भी रियल-टाइम निगरानी करने में मदद करेगा कि गणना का काम किस हद तक पूरा हो चुका है।

प्रशासनिक स्तर पर सटीकता लाने के लिए इस बार ‘वेब मैपिंग एप्लिकेशन’ का इस्तेमाल करके ‘हाउस लिस्टिंग ब्लॉक’ (HLBs) तैयार किए जाएँगे, ताकि जनगणना में कोई भी घर या इलाका छूट न जाए। एक डिजिटल माध्यम होने के नाते, लोगों की निजी जानकारी की सुरक्षा को लेकर भी पूरी सावधानी बरती गई है। डेटा सुरक्षा के लिए बेहद मजबूत प्रोटोकॉल लागू किए गए हैं। इसका मकसद नागरिकों का डेटा पूरी तरह से सुरक्षित और गोपनीय रखना है।

सेल्फ-एन्यूमरेशन (स्वयं-गणना) कैसे किया जा सकता है?

जनगणना 2027 में, नागरिकों को एक विशेष सुविधा दी गई है, जिसके ज़रिए वे गणना करने वाले के उनके घर आने से पहले ही अपनी जानकारी ऑनलाइन भर सकेंगे। इसके लिए उन्हें अपने मोबाइल नंबर का इस्तेमाल करके आधिकारिक SE पोर्टल (se.census.gov.in) पर लॉग इन करना होगा। यह प्रक्रिया अपनी सुविधा के अनुसार, कभी भी और कहीं से भी पूरी की जा सकती है।

पोर्टल पर लॉग इन करने के बाद, व्यक्ति को मैप पर अपने घर की सही जगह बतानी होगी और परिवार की जरूरी जानकारी भरनी होगी। सारी जानकारी भरने के बाद, जब फॉर्म सबमिट किया जाएगा, तो सिस्टम से एक 16-अंकों की ‘सेल्फ-एन्यूमरेशन ID’ (SE ID) बनेगी। यह ID बहुत जरूरी है, क्योंकि जब जनगणना स्टाफ खुद घर आएगा, तो उन्हें बस यही SE ID देनी होगी।

खास बात यह है कि सेल्फ-एन्यूमरेशन नागरिकों को दी गई एक और वैकल्पिक सुविधा है। अगर कोई व्यक्ति ऑनलाइन जानकारी नहीं भर पाता है, तब भी जनगणना करने वाले खुद घर आकर जानकारी इकट्ठा करेंगे, ठीक वैसे ही जैसे पिछली जनगणना में किया था। स्टाफ उन लोगों के घरों पर भी जाएगा, जिन्होंने ऑनलाइन जानकारी भरी है, ताकि उसकी जाँच हो सके। लेकिन उनसे दोबारा सारी जानकारी माँगने के बजाय, डेटा की पुष्टि सिर्फ SE ID के जरिए की जाएगी और उस व्यक्ति को जनगणना में शामिल कर लिया जाएगा।

दूसरा चरण जनगणना का अहम हिस्सा है। इस चरण को‘जनसंख्या जनगणना’ कहा जाता है। यह फरवरी 2027 में होगा। हालाँकि, लद्दाख, जम्मू और कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे बर्फीले प्रदेशों में यह प्रक्रिया सितंबर 2026 में ही पूरी कर ली जाएगी। इस चरण की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जनसंख्या जनगणना के साथ-साथ जाति-आधारित जनगणना भी की जाएगी। इससे सामाजिक आँकड़े इकट्ठा करने में मदद मिलेगी।

दूसरे चरण में देश के हर नागरिक के बारे में निजी और पूरी जानकारी जमा की जाएगी। इसमें व्यक्ति की शिक्षा, सामाजिक और आर्थिक स्थिति, रहने की जगह में बदलाव जैसे अहम पहलू शामिल हैं। इस चरण के लिए कौन से सवाल पूछे जाएँगे और इसकी सही तारीखें क्या होंगी, इसकी आधिकारिक घोषणा सरकार जल्द ही करेगी।

पहले चरण में कौन से सवाल (FAQs) पूछे जा रहे हैं?

जनगणना के पहले चरण के दौरान नागरिकों से 33 सवाल पूछे जा रहे हैं। इस सवालों की सूची 30 मार्च 2026 को जारी की गई है। इन 33 सवालों का मकसद नागरिकों के रहन-सहन के स्तर, घर की सुविधाओं, परिवार और तकनीकी उपकरणों के इस्तेमाल के बारे में सही जानकारी इकट्ठा करना है। अब, आइए जानते हैं कि वे 33 सवाल कौन से हैं, जिनका जवाब हर घर में देना होगा।

भवन और आवास का विवरण

  1. भवन संख्या: नगरपालिका, स्थानीय निकाय या जनगणना द्वारा दी गई एक संख्या।
  2. गणना गृह संख्या: घर की विशिष्ट पहचान के लिए एक संख्या।
  3. घर का फर्श : घर के फर्श बनाने में इस्तेमाल होने वाली मुख्य सामग्री (टाइलें, सीमेंट, लकड़ी, आदि)।
  4. दीवार की सामग्री: घर की दीवारें बनाने में इस्तेमाल होने वाली मुख्य सामग्री (ईंट, पत्थर, कंक्रीट, आदि)।
  5. छत की सामग्री: घर की छत किस सामग्री से बनी है (फूस, पाइप, शीट, ईंट आदि)?
  6. घर का उपयोग: घर का उपयोग रहने के लिए, दुकान के लिए या किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया जाता है, इसका विवरण।
  7. घर की स्थिति: घर की वर्तमान स्थिति (नया, पुराना या जर्जर)।

परिवार और मुखिया का विवरण:

  1. परिवारों की संख्या: एक घर में रहने वाले परिवारों की संख्या।
  2. व्यक्तियों की कुल संख्या: आमतौर पर घर में रहने वाले सदस्यों की कुल संख्या।
  3. घर के मुखिया का नाम: घर के मुखिया का नाम।
  4. मुखिया का लिंग: क्या मुखिया पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर है?
  5. सामाजिक वर्ग: परिवार के सदस्य अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) या अन्य वर्गों से संबंधित हैं?
  6. स्वामित्व की स्थिति: क्या आवास अपना है या किराए का?

आवास सुविधाएं:

  1. कमरों की संख्या: परिवार के पास रहने के लिए कितने कमरे हैं?
  2. विवाहित जोड़े: घर में रहने वाले विवाहित जोड़ों की संख्या।
  3. पीने के पानी का स्रोत: पानी कहाँ से प्राप्त होता है (नल, हैंडपंप, कुआँ, आदि)?
  4. पानी की उपलब्धता: क्या पीने का पानी घर के परिसर के भीतर उपलब्ध है, या इसे बाहर से लाना पड़ता है?
  5. प्रकाश का स्रोत: घर में प्रकाश का मुख्य स्रोत (बिजली, सौर ऊर्जा, मिट्टी का तेल, आदि)।
    स्वच्छता और खाना पकाने की व्यवस्था: कहाँ और कैसी चुल्हे का इस्तेमाल किया जाता है
  6. शौचालय की सुविधा: क्या घर में शौचालय है या नहीं?
  7. शौचालय का प्रकार: यह किस प्रकार का शौचालय है (फ्लश वाला, इंडियन टॉयलेट या गड्ढे वाला, आदि)?
  8. अपशिष्ट जल का निपटान: जल निकासी या सीवेज प्रणाली का विवरण। 22. नहाने की सुविधाएँ: क्या घर में नहाने के लिए कोई अलग जगह या बाथरूम है या नहीं?
  9. रसोई और गैस कनेक्शन: क्या घर में अलग रसोई और LPG/PNG कनेक्शन की सुविधा है या नहीं?
  10. खाना पकाने का ईंधन: खाना पकाने के लिए मुख्य रूप से किस ईंधन का उपयोग किया जाता है (गैस, लकड़ी, बिजली, आदि)?

संपत्ति और संसाधन:

  1. रेडियो/ट्रांजिस्टर: क्या यह उपकरण घर में उपलब्ध है या नहीं?
  2. टेलीविजन (TV): क्या घर में TV की सुविधा है या नहीं?
  3. इंटरनेट सुविधा: क्या घर में इंटरनेट एक्सेस की सुविधा है या नहीं?
  4. लैपटॉप/कंप्यूटर: क्या घर में कंप्यूटर या लैपटॉप है या नहीं?
  5. फोन सुविधा: लैंडलाइन, मोबाइल या स्मार्टफोन की उपलब्धता।
  6. दो-पहिया वाहन: चाहे वह साइकिल हो, स्कूटर हो या मोटरसाइकिल।
  7. चार-पहिया वाहन: कार, जीप या वैन जैसे वाहन की उपलब्धता।

अन्य विवरण:

  1. मुख्य अनाज: परिवार मुख्य रूप से भोजन में किस अनाज (गेहूँ, चावल, बाजरा, आदि) का उपयोग करता है?
  2. मोबाइल नंबर: भविष्य में संपर्क और सत्यापन के लिए परिवार का मोबाइल नंबर।

वर्तमान गणना पद्धति में बदलाव

पिछली जनगणना और जनगणना 2027 के बीच सबसे बड़ा अंतर इसकी कार्यप्रणाली में है। जहाँ ब्रिटिश काल से लेकर 2011 तक पूरी प्रक्रिया पेन और पेपर से होती थी। वहीं 2027 की जनगणना भारत की पहली ‘पूरी तरह से डिजिटल’ जनगणना होगी। इस बार गणना करने वाले कर्मचारी एक मोबाइल ऐप का उपयोग करेंगे, और नागरिकों को 16 भाषाओं में ‘स्वयं-गणना’ (self-enumeration) की एक नई सुविधा मिलेगी। इससे डेटा प्रोसेसिंग का समय वर्षों से घटकर केवल 6-9 महीने रह जाएगा। तकनीकी स्तर पर GPS टैगिंग और जियोफेंसिंग के माध्यम से प्रत्येक घर की सटीक स्थिति निर्धारित करके ‘रियल-टाइम मॉनिटरिंग’ की जाएगी।

समय और चरणों के मामले में, पिछली जनगणना एक साथ की गई थी, जबकि 2027 में दो स्पष्ट चरण तय किए गए हैं। पहला चरण (अप्रैल-सितंबर 2026) घरों और सुविधाओं की सूची बनाने के लिए होगा, और दूसरा चरण (फरवरी-मार्च 2027) व्यक्तिगत विवरणों के लिए होगा। प्रश्नावली में भी महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। इसमें बैंकिंग से जुड़े सवालों को हटा दिया गया है और डिजिटल युग के अनुसार इंटरनेट, स्मार्टफोन और मोबाइल नंबर जैसी नई जानकारियों को जोड़ा गया है। इस बार प्रवासन (migration) से जुड़े सवालों को भी अधिक विस्तृत रखा गया है।

सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण से एक ऐतिहासिक बदलाव ‘जाति जनगणना’ है; 2011 में केवल SC/ST की गिनती की गई थी, लेकिन 2027 में सभी समुदायों के लिए जाति जनगणना की जाएगी। आजादी के बाद पहली बार सबकी जाति की गणना की जाएगी, चाहे वह किसी जाति का हो। केंद्र सरकार ने इस विशाल डिजिटल बुनियादी ढाँचे के लिए ₹11718 करोड़ का बजट आवंटित किया है। इस राशि का एक बड़ा हिस्सा 31 लाख कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने और एक मजबूत IT बुनियादी ढाँचा तैयार करने के लिए किया जाएगा।

पिछली जनगणना पारंपरिक और अपेक्षाकृत धीमी थी, जबकि 2027 की जनगणना अधिक पारदर्शी तेज और समावेशी होगी। डिजिटल माध्यमों से डेटा सुरक्षा और गोपनीयता के लिए नए प्रोटोकॉल के साथ, यह जनगणना देश की बदलती भौगोलिक और सामाजिक स्थिति की एक सही तस्वीर पेश करेगी। इसके आधार पर आने वाले दशक के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसी कल्याणकारी योजनाओं के नीति निर्माण में काफी मदद मिलेगी।

(मूलरूप से यह लेख गुजराती में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)