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धार भोजशाला में सरस्वती मंदिर का इतिहास, कैसे लंदन पहुँची 11वीं शताब्दी में बनी माँ वाग्देवी की प्रतिमा: जानें मोदी सरकार के पास उसे वापस लाने के क्या हैं रास्ते

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में उपलब्ध पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, ASI की सर्वे रिपोर्ट और कानूनी प्रावधानों को आधार बनाते हुए भोजशाला को माँ वाग्देवी यानी सरस्वती से जुड़ा एक हिंदू धार्मिक स्थल माना है।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया है। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने सरकार को ये निर्देश भी दिए हैं वो लंदन से भोजशाला की माँ वाग्देवी की मूर्ति लाने का प्रयास करें। अब सबसे बड़ा सवाल है कि वाग्देवी की वह प्रतिमा, जिसे भोजशाला की आत्मा माना जाता है वह भारत से निकलकर लंदन तक कैसे पहुँच गई?

राजा भोज और भोजशाला: माँ वाग्देवी और भोजशाला की आध्यात्मिक पहचान

धार की भोजशाला को हिंदू समाज माता सरस्वती के मंदिर और प्राचीन विश्वविद्यालय के रूप में देखता है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इसकी स्थापना 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने की थी। राजा भोज केवल एक शक्तिशाली शासक ही नहीं, बल्कि शिक्षा, साहित्य, दर्शन, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान और संस्कृत के बड़े संरक्षक माने जाते हैं।

उस समय धार उनकी राजधानी थी और भोजशाला ज्ञान तथा शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। यहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे और संगीत, संस्कृत, योग, दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष तथा आयुर्वेद जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थान केवल पूजा का स्थल नहीं था, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का जीवंत प्रतीक था।

भोजशाला परिसर में आज भी ऐसे कई शिलालेख, नक्काशीदार स्तंभ और स्थापत्य अवशेष मौजूद हैं, जिनमें संस्कृत, प्राकृत और प्राचीन नागरी लिपि के चिन्ह दिखाई देते हैं। कई अभिलेखों में ‘ॐ नमः शिवाय’, ‘ॐ सरस्वत्यै नमः’ और परमार राजाओं की प्रशंसा का उल्लेख मिलने का दावा किया गया है।

इसी व्यवस्था के भीतर माँ सरस्वती या वाग्देवी की उपासना का उल्लेख मिलता है, जिन्हें ज्ञान और वाणी की देवी माना जाता है। इसी कारण भोजशाला को ज्ञान और आस्था दोनों का संगम माना गया। भोजशाला से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है, जो माँ वाग्देवी की परंपरा से जुड़ी हुई बताई जाती है।

वाग्देवी यानी सरस्वती को भारतीय संस्कृति में ज्ञान, शिक्षा, संगीत और वाणी की देवी माना जाता है। मान्यता के अनुसार, भोजशाला में एक विशेष वाग्देवी प्रतिमा स्थापित थी, जो पूरे शिक्षा केंद्र का आध्यात्मिक केंद्र बिंदु थी। यह प्रतिमा केवल पूजा की वस्तु नहीं थी, बल्कि उस समय की सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपरा का प्रतीक थी।

यहाँ शिक्षा और भक्ति एक साथ चलते थे। छात्र ज्ञान प्राप्त करने से पहले माँ सरस्वती का आशीर्वाद लेते थे और यही परंपरा भोजशाला की पहचान बन गई।

इतिहास के उतार-चढ़ाव और भोजशाला का बदला स्वरूप

भोजशाला पर कई बार इस्लामी आक्रमण हुए। दावा किया जाता है कि 1269 में कमाल मौलाना नाम का एक मुस्लिम फकीर मालवा पहुँचा और बाद में यहाँ इस्लामी प्रभाव बढ़ने लगा। इसके बाद 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर हमला किया और भोजशाला को भारी नुकसान पहुँचाया।

हिंदू पक्ष का दावा है कि उस समय यहाँ अध्ययन कर रहे 1200 से अधिक छात्रों और शिक्षकों को बंदी बनाया गया और इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद 1401 में दिलावर खान ने परिसर के एक हिस्से को दरगाह में बदलने का प्रयास किया।

फिर 1514 में महमूद शाह ने भोजशाला परिसर पर कब्जा मजबूत करने की कोशिश की और कमाल मौला मकबरे का विस्तार किया। हिंदू पक्ष का कहना है कि इन्हीं घटनाओं के आधार पर बाद में इसे मस्जिद और दरगाह बताया जाने लगा। बाद में मेदनी राय ने मुस्लिम शासकों के खिलाफ युद्ध कर क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया।

1703 में मालवा पर मराठों का अधिकार हो गया और मुस्लिम शासन समाप्त हुआ। इसके बाद अंग्रेजों का शासन आया। 

प्रतिमा की विशेषताएँ: परमार काल की कला और शिल्प का उदाहरण

वाग्देवी की यह प्रतिमा परमार काल की उच्च स्तरीय मूर्तिकला का उदाहरण मानी जाती है, जिसे लगभग 11वीं सदी का बताया जाता है। यह प्रतिमा सफेद पत्थर (स्टोन स्कल्पचर) से बनी एक विस्तृत और संतुलित शिल्पकृति है, जिसमें देवी को पारंपरिक स्वरूप में चार भुजाओं के साथ दर्शाया गया है। प्रतिमा में भारतीय मध्यकालीन कला की बारीकी साफ दिखाई देती है।

चेहरे की शांत अभिव्यक्ति, आभूषणों की नक्काशी और शरीर की संतुलित मुद्रा इसे उस दौर की विशिष्ट मूर्तिकला परंपरा से जोड़ती है। ब्रिटिश म्यूजियम के रिकॉर्ड में इस प्रतिमा की पहचान को लेकर भिन्नता भी देखने को मिलती है। कहीं इसे वाग्देवी कहा गया है तो कहीं अम्बिका (जैन परंपरा की देवी) के रूप में दर्ज किया गया है।

लंदन कैसे पहुँची: 1875 की खोज और औपनिवेशिक दौर की भूमिका

इस प्रतिमा का आधुनिक इतिहास 1875 के आसपास ब्रिटिश काल से शुरू होता है। मुगलों के आक्रमण के बाद खंडित हुई इस प्रतिमा को अंग्रेजों ने खुदाई कर 1875 में निकाला था। इसके बाद 117 साल से प्रतिमा लंदन में ही है। साल 1880 में भोपावर के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मेजर किनकेड इस कीमती मूर्ति को अपने साथ समेटकर इंग्लैंड ले गए थे।

लंदन के म्यूजियम में रखी प्रतिमा (फोटो साभार: दैनिक भास्कर)

उन्होंने उस समय क्षेत्र में पुरातात्विक गतिविधियों में भूमिका निभाई थी। उस दौर में भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं को अक्सर ‘study’, ‘preservation’ या ‘collection’ के नाम पर बाहर भेज दिया जाता था। कई बार इन वस्तुओं का स्वामित्व स्पष्ट नहीं होता था और वे औपनिवेशिक संग्रहालयों तक पहुँच जाती थीं।

इसी प्रक्रिया के तहत यह प्रतिमा भी भारत से ब्रिटेन ले जाई गई और बाद में लंदन के संग्रहालय संग्रह का हिस्सा बन गई। समय के साथ यह ब्रिटिश म्यूजियम में भारतीय कला और मध्यकालीन मूर्तिकला के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में दर्ज हुई।

लंदन के म्यूजियम में वर्तमान स्थिति

आज यह प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट में संरक्षित बताई जाती है। इसे संग्रहालय के एशियन आर्ट सेक्शन में रखा गया है, जहाँ भारत और एशिया से संबंधित सैकड़ों प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ मौजूद हैं। यह प्रतिमा 7 से 8 फीट उँचे एक सुरक्षित काँच के डिस्प्ले केस में रखी गई है और इसे आम लोग भी देख सकते हैं।

म्यूजियम में इसे मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में प्रदर्शित किया गया है। हालाँकि इसकी पहचान को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। भारत में इसे स्पष्ट रूप से माँ सरस्वती या वाग्देवी के रूप में पूजा और सम्मान दिया जाता है, जबकि संग्रहालय इसे एक ऐतिहासिक कलाकृति के रूप में वर्गीकृत करता है।

भारत वापसी की संभावना और प्रक्रिया

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रतिमा की वापसी को लेकर बड़ा संकेत देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “माँ वाग्देवी की प्रतिमा को UK से भारत वापस लाने के संबंध में केंद्र सरकार को विचार करने का निर्देश स्वागतयोग्य है। इस दिशा में राज्य सरकार भी आवश्यक प्रयास करेगी।”

उन्होंने आगे लिखा, “हमारी संस्कृति सदैव टसर्वधर्म समभावट, सामाजिक समरसता और भाईचारे की वाहक रही है। हम न्यायालय के निर्णय का पूर्ण सम्मान करते हैं और प्रदेश में सौहार्द, सांस्कृतिक गौरव एवं सामाजिक सद्भाव को और अधिक सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

भारत सरकार इस मुद्दे को ब्रिटेन के सामने UNESCO के 1970 कन्वेंशन का संदर्भ देकर आधिकारिक स्तर पर उठा सकती है। इस अंतरराष्ट्रीय समझौते के अनुसार किसी भी देश से अवैध या बिना अनुमति के बाहर ले जाई गई सांस्कृतिक धरोहरों को उनके मूल देश को वापस लौटाने पर जोर दिया जाता है।

हालाँकि इस प्रक्रिया में कई व्यावहारिक अड़चनें भी हैं, क्योंकि ब्रिटेन का ‘British Museum Act 1963’ बहुत सख्त नियमों के तहत काम करता है, जो सामान्य परिस्थितियों में संग्रहालय की वस्तुओं को स्थायी रूप से देश से बाहर भेजने पर रोक लगाता है।

इसके बावजूद उम्मीद इसलिए बनी हुई है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कूटनीतिक बातचीत और कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए दुनिया के अलग-अलग देशों से अपनी कई प्राचीन मूर्तियाँ और सांस्कृतिक धरोहरें सफलतापूर्वक वापस हासिल की हैं। मोदी सरकार के नेतृत्व में कई देशों से औपनिवेशिक काल की मूर्तियाँ और सांस्कृतिक धरोहरें वापस लाई जा चुकी हैं।

सूअर बनेंगे इंसान, आसमान से बरसेंगे पत्थर… लड़कियों का सोशल मीडिया चलाना भी ‘इस्लाम विरोधी’: औरत विरोधी फतवों में केरलम के मौलाना ने जोड़ा नया अध्याय

केरलम के मौलाना अब्दुल हमीद फैजी अम्बालाकादावु के महिलाओं के खिलाफ दिए गए विवादित ‘फतवे’ को लेकर बड़ा बवाल शुरू हो गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मौलाना समस्त युवजन संघम (SYS) से जुड़े हुए हैं जो समस्त केरल जम-इय्यतुल उलेमा के अधीन एक युवा संगठन है।

मौलाना अब्दुल हमीद फैजी ने आधुनिक समाज में मुस्लिम महिलाओं की भूमिका को लेकर बेहद सख्त टिप्पणी की है। उन्होंने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में भागीदारी, जैसे नौकरी करना, रिसेप्शनिस्ट बनना, एंकरिंग करना, स्टेज पर प्रदर्शन करना, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना और गैर-महरम पुरुषों से बातचीत या हाथ मिलाने जैसी गतिविधियों को इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ बताया है।

अब्दुल हमीद फैजी ने क्या कहा?

यह विवाद मौलाना अब्दुल हमीद फैजी के एक फेसबुक पोस्ट के बाद शुरू हुआ। यह पोस्ट उनके फेसबुक अकाउंट पर 10 मई 2026 को शेयर किया गया था जिस पर लगातार विवाद छिड़ा हुआ है।

मौलवी अब्दुल हमीद ने अपने पोस्ट में लिखा, “‘लोगों को जमीन निगल जाएगी, इंसानों को बंदरों, सूअरों और दूसरी शक्लों में बदल दिया जाएगा और आसमान से पत्थरों की बारिश होगी…’ जब प्रोफेट मोहम्मद ने अपने साथियों से भविष्य में होने वाली इन बातों के बारे में बताया तो वहाँ मौजूद एक व्यक्ति ने पूछा:- ‘ऐ अल्लाह के रसूल, यह सब कब होगा’? इस पर नबी ने कहा:- ‘जब गाने वाली औरतें, संगीत के उपकरण, मंचीय कार्यक्रम आम हो जाएँगे और शराब पीना हर जगह फैल जाएगा’।”

इसके आगे अब्दुल हमीद ने महिलाओं की आलोचना करते हुए लिखा, “आज हमारी शादियों में गाने-बजाने के कार्यक्रम होते हैं। शादी समारोहों में हमारा स्वागत करने के लिए महिलाएँ हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। गरीब लोगों की किडनी बदलवाने के लिए फंड जुटाने हेतु ‘इशल नाइट’ जैसे कार्यक्रम किए जाते हैं। रिसेप्शनिस्ट बनने के लिए सुंदर किशोर लड़कियों की जरूरत होती है। एंकरिंग के लिए भी महिलाओं की जरूरत पड़ती है।”

उन्होंने आगे लिखा, “स्कूल स्तर से ही हमारी लड़कियों को गाना सिखाया जाता है और उन्हें इसके लिए प्रोत्साहन दिया जाता है। हमारी बेटियाँ यूट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हर जगह दिखाई देती हैं। धार्मिक मंचों पर भी मुस्लिम महिलाएँ गैर-महरम पुरुषों को संबोधित करके भाषण देती हैं। हमारी महिलाओं को गैर-महरम पुरुषों से हाथ मिलाने और उन्हें गले लगाने में भी शर्म महसूस नहीं होती!”

मौलवी ने 50 साल पहले का जिक्र करते हुे कहा, “50 साल पहले, अगर पर्दा नहीं होता था तो महिलाएँ चलते समय हाथ में छाता रखती थीं, और जैसे ही कोई गैर-महरम पुरुष सामने आता था, वे छाते से अपना चेहरा ढक लेती थीं और इस्लाम के हिजाब के नियमों का पालन करती थीं। वही पीढ़ी आज इतने बड़े बदलाव का शिकार हो गई है। इस मामले में धार्मिक प्रमाणों को अपने तरीके से पेश करने वाले मुजाहिद और जमात समूहों की भी बड़ी भूमिका रही है।”

क्या कह रहे हैं आलोचक?

आलोचकों का कहना है कि मौलाना द्वारा महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका को लेकर दी गई राय एक ऐसी सोच को दर्शाते हैं जिसे साफ तौर पर महिला विरोधी और सामाजिक रूप से उन्हें पिछड़ा मानने व पीछे ले जाने की कोशिश है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या मजहबी व्याख्याओं के नाम पर महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों को सीमित किया जा सकता है।

जब महिलाओं के शिक्षा प्राप्त करने, नौकरी करने, सार्वजनिक मंचों पर बोलने, कला और मीडिया में भाग लेने जैसी सामान्य और आधुनिक भूमिकाओं को गलत या अस्वीकार्य बताया जाता है तो यह सीधे तौर पर उनके मौलिक अधिकारों पर ही सवाल उठाना है। आज के समय में जब महिलाएँ किसी भी समाज की प्रगति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं तो ऐसे में उन्हें केवल घर या सीमित सामाजिक दायरे तक बाँध देना निजी स्वतंत्रता से आगे बढ़कर पूरे समाज के विकास को बाधित करने की कोशिश बन जाती है।

आलोचकों का यह भी मानना है कि इस तरह के विचार समाज को आगे ले जाने के बजाय पीछे की ओर धकेलते हैं। इतिहास और आधुनिक विकास दोनों यह दिखाते हैं कि जिन समाजों ने महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और नेतृत्व के अवसर दिए हैं तो वे अधिक प्रगतिशील और आर्थिक रूप से मजबूत बने हैं। इसके उल्ट जहाँ महिलाओं को सीमित दायरे में रखा गया, वहाँ सामाजिक विकास की गति धीमी रही है। इसलिए, महिलाओं की भागीदारी को सीमित करने वाली सोच केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाती है।

आलोचकों का मानना है कि ऐसे बयान एक व्यापक रूढ़िवादी प्रवृत्ति का हिस्सा हैं जो आधुनिक सामाजिक बदलावों को स्वीकार करने के बजाय उन्हें रोकने या सीमित करने की कोशिश करती है। आलोचकों का कहना है कि मजहब और समाज के बीच संतुलन जरूरी है लेकिन अगर किसी व्याख्या के कारण आधी आबादी यानी महिलाओं के अधिकारों पर असर पड़ता है, तो उस पर फिर से विचार किए जाने की आवश्यकता है।

महिला विरोधी फतवों का लंबा इतिहास

हालाँकि, यह कोई पहली बार नहीं है जब महिलाओं के खिलाफ इस तरह का फतवा दिया गया हो। महिला के शरीर, पहचान, पेशा और सार्वजनिक भागीदारी पर नियंत्रण की कोशिश एक सुनियोजित पैटर्न रही है। इसके पीछे हर बाद इस्लाम और परंपराओं को हवाला दिया जाता रहा है।

ससुर ने किया रेप- अब शौहर को मानो ‘बेटा’

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की मुस्लिम महिला इमराना के साथ उसके ससुर अली मोहम्मद ने बलात्कार किया। इसके बाद पंचायत ने फैसला दिया था कि शरिया कानून के तहत वह शौहर के साथ नहीं रह सकती और शौहर को ‘बेटा’ मानना होगा। दारुल उलूम ने फतवा किया कि इमराना का निकाह उसके पति नूर इलाही से ‘बातिल’ हो गया है। बाद में सामाजिक संगठनों ने आवाज उठाई, केस दर्ज हुआ और ससुर को 10 साल की सजा सुनाई गई।

सानिया मिर्जा को स्कर्ट पहनकर टेनिस खेलने से रोकने का फरमान

सुन्नी उलेमा बोर्ड के मौलाना हसीब-उल-हसन सिद्दीकी ने टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा के खिलाफ 2005 में फतवा जारी किया था। मौलाना का कहना था कि सानिया की ड्रेस ‘इस्लाम-विरोधी’ है। उन्हें ईरानी महिला बैडमिंटन खिलाड़ियों की तरह लंबी टुनिक और हिजाब पहनकर खेलने को कहा गया था।

जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद ने धमकी दी कि न मानने पर खेलने से रोका जाएगा। सानिया ने फतवा नकार दिया और खेल जारी रखा।

महिलाओं और पुरुषों का एकसाथ काम करना हराम

मई 2010 में दारुल उलूम देवबंद के उलेमाओं ने फतवा जारी किया कि सरकारी दफ्तरों और कार्यस्थलों पर महिलाएँ और पुरुष एक साथ काम नहीं कर सकते, जब तक कि महिलाएँ पूरी तरह इस्लामी लिबास में ना हों। इस फतवे को महिलाओं के रोजगार और आर्थिक स्वतंत्रता पर सीधे हमले के रूप में देखा गया और बड़े पैमाने पर आलोचना हुई।

महिलाओं की फोटो खींचना और खिंचवाना हराम

2013 में देवबंद के रेक्टर ने फोटोग्राफी को ‘गैर-इस्लामी’ करार दिया। महिलाओं की फोटो खींचना, खिंचवाना सब पर रोक लगा दी गई। हालाँकि, इसमें चालाकी दिखाते हुए इसे केवल पहचान पत्र और पासपोर्ट के लिए जरूरी बताया गया। दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मुफ्ती अब्दुल कासिम नोमानी ने कहा, “फोटोग्राफी करना इस्लाम विरोधी है।” इस फतवे को सोशल मीडिया युग में महिलाओं की हर तरह की डिजिटल पहचान मिटाने की कोशिश बताया गया।

भौंहें बनाना, बाल कटाना और ब्यूटी पार्लर जाना हराम

दारुल इफ्ता के प्रमुख मौलाना एल. सादिक कासमी ने अक्टूबर 2017 में एक फतवा जारी किया कि मुस्लिम महिलाओं के लिए भौंहें बनाना, बाल कटाना और ब्यूटी पार्लर जाना सख्त मना है। मौलाना कासमी ने कहा कि बाल महिला की खूबसूरती हैं और इन्हें कभी नहीं काटना चाहिए। वहीं, मेकअप को भी ‘दूसरे मर्दों को आकर्षित करने’ का जरिया बताकर हराम घोषित किया।

जींस, टाइट सलवार और डिजाइनर बुर्का पहनना हराम

दारुल उलूम देवबंद की इफ्ता समिति ने टाइट सलवार, जींस, स्कर्ट और डिजाइनर बुर्के को हराम घोषित किया। इफ्ता समिति की तरफ से कहा गया, “पैगंबर ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं को बाहरी दुनिया से बचाओ। जरूरत ना हो तो घर से मत निकलो।”

वहीं, तंजीम अब्नाए दारुल उलूम के मुफ्ती याद इलाही ने इस मामले में कहा कि पश्चिमी संस्कृति ने भारत को बरबाद किया है।

महिलाओं का फुटबॉल मैच देखना हराम

जनवरी 2018 में दारुल उलूम देवबंद के मुफ्ती अतहर कासमी ने फतवा दिया कि महिलाओं के लिए पुरुषों का फुटबॉल मैच देखना हराम है क्योंकि खिलाड़ी हाफ-पैंट पहनते हैं।

तीन तलाक के खिलाफ बोली तो किया ‘इस्लाम से बाहर’

बरेली की महिला अधिकार कार्यकर्ता निदा खान ने तीन तलाक का विरोध किया और पति के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई थी। इससे मौलाना परेशान हो गए और 2018 में इसके जवाब में बरेली जामा मस्जिद के इमाम ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर उन्हें इस्लाम से बाहर करने की घोषणा की। निदा ने इसकी आलोचना करते हुए कहा था कि कोई उन्हें इस्लाम से बाहर नहीं कर सकता है।

गैर मर्द से मेंहदी लगवाना हराम

2018 में दारुल उलूम देवबंद ने एक फतवा जारी किया था जिसमें कहा गया कि मुस्लिम महिलाओं का किसी अंजान पुरुष से मेहंदी लगवाना इस्लाम के अनुसार उचित नहीं है। संस्था के अनुसार, मेहंदी लगवाने के लिए किसी गैर-परिचित पुरुष को अपना हाथ देना गैर-इस्लामिक माना जाता है। साथ ही यह भी कहा गया कि इससे महिलाओं की सामाजिक छवि पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है, इसलिए मुस्लिम महिलाओं को ऐसी स्थितियों से बचना चाहिए।

सिंदूर-बिंदी लगाने के खिलाफ फतवा

ऑल इंडिया मुस्लिम जमात (AIMJ) के अध्यक्ष मौलाना शाहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने 2023 में एक फतवा जारी कर कहा कि गैर-मुस्लिम युवकों से शादी के बाद ‘सिंदूर’, ‘कलावा’ और ‘बिंदी’ लगाने वाली मुस्लिम महिलाएँ इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ जा रही हैं। फतवे में यहाँ तक कहा गया कि अगर ऐसा चलता रहा तो उन्हें समुदाय से बहिष्कृत कर दिया जाएगा।

औरतों का मेले में जाने इस्लाम के खिलाफ

जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक और देवबंद के उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को मेलों में जाने से बचना चाहिए क्योंकि यह इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप नहीं है। उनका कहना है कि मेलों में देर रात तक महिलाओं का घूमना-फिरना उनकी सुरक्षा और सम्मान के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि आजकल मेलों में बड़ी संख्या में मुस्लिम युवा शामिल होते हैं और देर रात तक वहाँ मौजूद रहते हैं जो चिंताजनक और अनुचित है। इसहाक गोरा के अनुसार, ऐसी गतिविधियों का नई पीढ़ी के संस्कारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

क्या है फतवा और इसकी कानूनी वैधता?

‘फतवा’ एक अरबी शब्द है। इसका मतलब होता है किसी मजहबी सवाल पर इस्लामी विद्वान (मौलाना या मुफ्ती) द्वारा दी गई राय या व्याख्या। यह किसी व्यक्ति या समुदाय को यह बताने की कोशिश होती है कि किसी विशेष स्थिति में मजहबी दृष्टि से क्या सही माना जाता है और क्या गलत। लेकिन यह समझना जरूरी है कि फतवा कोई कानूनी आदेश नहीं होता। यह सिर्फ एक मजहबी राय होती है। इसका मतलब यह है कि किसी भी व्यक्ति को फतवा मानने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

भारत के संविधान में फतवा को किसी भी तरह की कानूनी मान्यता नहीं दी गई है। इसका कोई कानूनी बल (legal force) नहीं होता। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी 2014 में यह स्पष्ट किया था कि फतवे किसी भी नागरिक पर लागू नहीं किए जा सकते। यानी कोई भी व्यक्ति केवल फतवे के आधार पर किसी को बाध्य नहीं कर सकता या उसके अधिकारों को सीमित नहीं कर सकता।

इसके बावजूद, कई बार फतवे समाज में एक तरह का दबाव बना देते हैं। कुछ जगहों पर लोग इन्हें मजहबी डर या सामाजिक बहिष्कार के कारण गंभीरता से लेते हैं। इस वजह से कई बार लोगों पर मानसिक दबाव, सामाजिक अलगाव या आलोचना जैसी स्थिति बन जाती है।

आंध्र प्रदेश में तीसरे-चौथे बच्चे के जन्म पर मिलेंगे ₹70000, CM चंद्रबाबू नायडू ने किया ऐलान: जानिए किसे मिलेगा फायदा और सरकार को क्यों उठाना पड़ा ये कदम

दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले भारत के दक्षिणी राज्य आंध्रप्रदेश को आबादी कम होने की चिंता सताने लगी है। मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए सरकार की कोशिश के तहत तीसरे बच्चे के लिए ₹30000 और चौथे बच्चे के पैदा होने पर ₹40000 ‘इनाम’ देने की घोषणा की है। दूसरा बच्चा होने पर ₹25000 देने की घोषणा वे पहले ही विधानसभा में कर चुके हैं।

अब सवाल यह उठाता है कि आंध्रप्रदेश को ऐसा क्यों करना पड़ा, तो इसकी वजह राज्य में घट रहा जन्मदर है। राज्य को इससे ‘नुकसान’ होने की चिंता सता रही है। हालाँकि राज्य की जनसंख्या अभी घटी नहीं है, बल्कि राज्य में प्रजनन दर यानी टोटस फर्टिलिटी रेट घट कर 1.5 हो गया है।

किसी भी जगह में जनसंख्या स्थिर रखने के लिए टीएफआर 2.1 होना चाहिए, हालाँकि देश में टीएफआर 1.9 है। इससे पता चलता है कि देश में भी जन्मदर घट रहा है। इसकी तुलना में आंध्र प्रदेश की आबादी घट रही है, हालाँकि जन्मदर का घटना राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के साथ-साथ न्यूक्लियर फैमिली के बढ़ते चलन को भी दर्शाता है।

क्या कहा सीएम नायडू ने

घटते जन्मदर को देखते हुए आंध्र प्रदेश में ‘पॉपुलेशन पॉलिसी’ बनाई गई है। इसका मकसद इंसेंटिव, हेल्थकेयर सुधार और वर्कफोर्स उपायों के जरिए ज्यादा फर्टिलिटी को बढ़ावा देना है, ताकि घटती जन्म दर और ज्यादा बूढ़ी हो रही आबादी से निपटा जा सके।

नायडू सरकार को चिंता है कि जन्म दर में गिरावट से काम करने की उम्र वाली आबादी (18-60) कम हो जाएगी, जबकि बुज़ुर्ग आबादी बढ़ जाएगी। इससे आर्थिक विकास धीमा हो सकता है और सरकारी वेलफेयर सिस्टम पर दबाव बढ़ सकता है।

मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने शनिवार को श्रीकाकुलम जिले के नरसन्नापेटा में ‘स्वर्ण आंध्र – स्वच्छ आंध्र’ प्रोग्राम को संबोधित करते हुए कहा, “आबादी ही भविष्य की असली दौलत है। ये इंसेंटिव नई पॉपुलेशन मैनेजमेंट पॉलिसी का हिस्सा है, जिसका मकसद पॉपुलेशन ग्रोथ को बढ़ावा देना है, क्योंकि राज्य का विकास सिर्फ ह्यूमन रिसोर्स से ही मुमकिन है।”

किस राज्य में कितनी फर्टिलिटी रेट

  1. आंध्र प्रदेश में 2003 में टीएफआर 2.2 थी जो 2023 में घट कर 1.5 हो गई।
  2. तेलंगाना, कर्नाटक, केरल में भी टीएफआर करीब 1.5 है, जबकि तमिल नाडु में 1.3 है।
  3. उत्तर के राज्यों की बात की जाए, तो बिहार का टीएफआर 2.8 है। उत्तर प्रदेश का 2.6 है।
  4. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान आदि राज्यों में फर्टिलिटी रेट नेशनल लेवल यानी 1.9 से ज्यादा है।

क्यों गिरा आंध्र प्रदेश का फर्टिलिटी रेट

1970 के दशक में जनसंख्या नियंत्रण पर पूरे देश में जोर दिया गया था। जबरदस्ती नसबंदी कराई गई थी। ‘हम दो हमारे दो’ का नारा बुलंद किया गया। जनसंख्या नियंत्रण में दक्षिणी राज्य ज्यादा सफल रहे। 2026 आते आते हालात ऐसे बन गए हैं कि दक्षिणी राज्यों में जन्मदर काफी कम हो गई है।

आंध्र प्रदेश इस खौफ में जी रहा है कि निकट भविष्य में बुजुर्गों की आबादी युवाओं से ज्यादा हो जाएगी। इससे ‘काम करने वाले हाथ’ कम हो जाएँगे, जबकि पेंशन और दूसरी सरकारी सुविधाओं के सहारे जीने वाली आबादी काफी बढ़ जाएगी। बुजुर्गों वाला राज्य बन कर रह जाएगा आंध्रप्रदेश।

राज्य में यूँ भी युवा आबादी बेहतर रोजगार के लिए दूसरी जगह पलायन कर रही है। इनकी संख्या और कम हो जाएगी। इससे राज्य में कामगारों की कमी और स्थानीय जनसंख्या के ढाँचे में बदलवा आ जाएगा।

आबादी घटने का राजनीतिक असर पड़ सकता है

अगर परिसीमन में जनसंख्या को मुख्य आधार बनाया गया, तो दक्षिणी राज्यों में फर्टिलिटी में गिरावट से संसद में उनके प्रतिनिधि तुलनात्मक रूप से कम हो सकते हैं। हालाँकि पीएम मोदी ने संसद में परिसीमन संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान दक्षिणी राज्यों से वादा किया है कि तुलनात्मक रूप से उनकी पार्लियामेंट में हिस्सेदारी में कोई कमी नहीं आएगी।

दक्षिणी राज्यों का कहना है कि संसदीय चुनाव क्षेत्र आबादी के आधार पर बाँटे जाते हैं, इसलिए जिन राज्यों में आबादी धीमी गति से बढ़ती है, वहाँ उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे ज्यादा आबादी वाले राज्यों की तुलना में उनके प्रतिनिधित्व में कमी आ सकती है।

परिसीमन की प्रक्रिया भी शुरू होने वाली है। ये प्रक्रिया 50 सालों से रुकी हुई थी, लेकिन परिसीमन कराने की मोदी सरकार की पहल के बाद ये मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया और दक्षिण के राज्य एक्टिव हो गए।

नायडू सरकार भविष्य की ओर देख रही है। आगे आने वाले समय में काम करने वाले युवाओं की कमी न हो, उद्योगों को मजदूर और प्रोफेशनल मिलते रहें, टैक्स देने वाली आबादी घटे नहीं और बुजुर्गों की देखभाल का बोझ बहुत ज्यादा न बढ़े, ताकि राज्य के विकास की गाड़ी सरपट दौड़ती रहे।

इसी सोच के तहत 3 या अधिक बच्चों वाले परिवारों को प्रोत्साहन, सरकारी योजनाओं में लाभ और स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़े नियमों में ढील दिए जाने की बात भी सामने आ रही है।

नायडू के अपील का पूरे देश पर पड़ेगा असर

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नायडू की ‘ज्यादा बच्चे पैदा करने’ की अपील का असर केवल आंध्रप्रदेश तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भारत में जनसंख्या, राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी असर डालेगा।

दुनिया में जनसंख्या के मामले पर नंबर वन देश में एक बार फिर जनसंख्या बढ़ाने की होड़ लग सकती है। हालाँकि इसका तुरंत बड़ा प्रभाव दिखने की उम्मीद कम है, लेकिन राजनीतिक और वैचारिक असर जरूर दिख सकता है।

पार्टियों की राजनीति फिर ‘जनसंख्या बढ़ाने’ पर टिक सकती है। जरूरत जनसंख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि ऐसा ढाँचा तैयार करने की है, जहाँ कम आबादी होने पर ‘अन्याय’ न हो और ज्यादा आबादी वालों को रेबड़ियाँ न बाँटी जाए।

महाराष्ट्र के प्रस्तावित देवस्थान इनाम निरसन अधिनियम का विरोध, CM फडणवीस से हस्तक्षेप की माँग: जानिए वक्फ छूट से क्यों खफा हुए हिंदू

महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग द्वारा प्रस्तावित ‘देवस्थान इनाम निरसन अधिनियम, 2026’ के मसौदे को लेकर राज्य में विवाद गहरा गया है। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर इस विधेयक के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया और एक ज्ञापन सौंपा। हिंदू संगठनों का आरोप है कि इस कानून के जरिए मंदिरों की ऐतिहासिक जमीनों पर अवैध कब्जों को वैध करने और उन्हें निजी हाथों में सौंपने की साजिश रची जा रही है। इस विवाद का सबसे बड़ा कारण वक्फ संपत्तियों को इस अधिनियम से बाहर रखना है।

प्रस्तावित मसौदे के तहत वर्ष 2011 से पहले के अवैध कब्जों को वैध बनाने और कब्जाधारियों को मालिकाना हक देने का प्रावधान है, जिसे महासंघ ने भू-माफिया को फायदा पहुँचाने वाला बताया है। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने चेतावनी दी है कि अगर इसे इसी रूप में लागू किया गया तो पूरे राज्य में आंदोलन किया जाएगा।

यह ड्राफ्ट महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें देवस्थान इनाम यानी मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को ऐतिहासिक रूप से दी गई जमीनों को खत्म करने और उनके स्वामित्व, कब्जा अधिकार, हस्तांतरण, अतिक्रमण और किरायेदारी से जुड़े मामलों के लिए नया कानूनी ढाँचा बनाने की बात कही गई है।

देवस्थान इनाम जमीन क्या हैं?

देवस्थान इनाम जमीनें वे भूमि हैं जो पहले के समय में राजाओं द्वारा मंदिरों, धार्मिक संस्थानों और चैरिटेबल संस्थाओं को दी गई थीं। इन पर अक्सर लगान में छूट भी मिलती थी। मसौदे में इन्हें ऐसी भूमि बताया गया है जो गाँव या गाँव का कोई हिस्सा, भूमि राजस्व या टैक्स छूट के रूप में धार्मिक संस्थानों को दी गई हो।

इस विधेयक में साफ तौर पर 1954 के हैदराबाद इनाम निरसन अधिनियम, 1952 के आतियत कानून और 1995 के वक्फ अधिनियम के तहत आने वाली जमीनों को बाहर रखा गया है। इसी वक्फ छूट को लेकर विवाद सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है।

विधेयक का विरोध क्यों हो रहा है?

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ का आरोप है कि यह कानून मंदिरों की जमीनों को किरायेदारों, कब्जाधारियों और निजी लोगों को ट्रांसफर कराने का रास्ता खोल देगा। संगठन का कहना है कि मंदिर की संपत्ति देवता की होती है और उसे न तो ट्रस्टी बेच सकते हैं और न ही सरकार ट्रांसफर कर सकती है।

महासंघ के राष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील घनवट ने तीन मुख्य आपत्तियाँ बताई हैं। पहली यह कि सरकार के पास देवस्थान जमीनों का स्वामित्व ही नहीं है, इसलिए वह इनके हस्तांतरण का कानून नहीं बना सकती। उनका कहना है कि पहले के कानून सिर्फ जमीन को सुरक्षित रखने के लिए थे, न कि उसे निजी हाथों में देने के लिए।

दूसरी आपत्ति यह है कि ये जमीनें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं और कई जमीनें छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे मराठा शासकों या पुराने राजवंशों द्वारा दी गई थीं। ऐसे में इन्हें निजी हाथों में जाने देना मंदिर व्यवस्था को कमजोर करेगा।

तीसरी आपत्ति वक्फ जमीनों को छूट देने को लेकर है। संगठन का कहना है कि कानून में वक्फ संपत्तियों को बचाया गया है लेकिन हिंदू मंदिरों की जमीनों पर ही नियम लागू किए जा रहे हैं, जो असमान व्यवहार है।

संगठन का आरोप है कि यह कानून मंदिरों के स्वामित्व को कमजोर करेगा, अतिक्रमण को वैध बनाएगा, बिल्डरों और जमीन माफिया को फायदा देगा और मंदिरों की आर्थिक स्वतंत्रता को नुकसान पहुँचाएगा।

ड्राफ्ट कानून के मुख्य प्रावधान

देवस्थान इनाम समाप्त करना
धारा 3 के तहत सभी देवस्थान इनाम समाप्त कर दिए जाएँगे, केवल नकद अनुदान को छोड़कर। इससे मंदिरों की जमीनों पर पुराने कानूनी अधिकार खत्म हो जाएँगे।

कब्जाधारियों को अधिकार देना

धारा 4 के तहत खेती करने वाले किरायेदारों, मिरासदारों और अन्य धारकों को कब्जे के अधिकार दिए जाएँगे और उन्हें ऑक्यूपेंट क्लास-1 का दर्जा मिलेगा। इससे मंदिरों की जमीनों पर मजबूत मालिकाना अधिकार जैसा प्रभाव पड़ेगा।

2011 से पहले के कब्जे को वैध करना

मसौदे में कहा गया है कि 1 जनवरी 2011 से पहले जो लोग जमीन पर कब्जे में हैं, अगर कुछ शर्तें पूरी करते हैं तो उन्हें जमीन का अधिकार दिया जा सकता है। इसमें बाजार मूल्य का भुगतान और आर्थिक सीमा की शर्त भी शामिल हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में 2011 से पहले रहने वालों को बिना शुल्क के भी अधिकार दिए जा सकते हैं। आलोचकों का कहना है कि यह अतिक्रमण को वैध बनाने जैसा है।

अवैध कब्जे पर सख्त कार्रवाई

इसी कानून में अवैध कब्जे पर 2 से 5 साल की सजा, भारी जुर्माना और तत्काल बेदखली का प्रावधान भी है। सरकार पुराने कब्जों को वैध और नए कब्जों पर सख्ती दोनों कर रही है, लेकिन संगठन का कहना है कि इससे गलत संदेश जाएगा।

वक्फ छूट विवाद क्यों बढ़ा?

महासंघ ने वक्फ संपत्तियों को कानून से बाहर रखने पर कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि अगर वक्फ जमीनों को सुरक्षा दी जा सकती है तो मंदिरों की जमीनों को क्यों नहीं। इस मुद्दे ने अब जमीन सुधार से आगे बढ़कर धार्मिक संस्थानों के साथ असमान व्यवहार और मंदिर स्वायत्तता की बहस का रूप ले लिया है।

संवैधानिक चिंताएँ

महासंघ का कहना है कि यह कानून अनुच्छेद 25, 26 और 300A का उल्लंघन करता है। उनका तर्क है कि मंदिरों की जमीनें पूजा-पाठ, प्रशासन, दान कार्य, पुजारियों के वेतन और धार्मिक गतिविधियों के लिए जरूरी हैं।

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ की माँगें

संगठन ने एक मेमोरेंडम दिया जिसमें ड्राफ्ट एक्ट को तुरंत वापस लेने, लैंड रिकॉर्ड में देवस्थान की ज़मीन को साफ़ तौर पर नॉन-ट्रांसफरेबल स्टेटस देने, मंदिर की जमीन के लिए एक सख़्त एंटी-लैंड ग्रैबिंग कानून बनाने, पिछले कब्जों और जाली रिकॉर्ड की SIT जाँच कराने और मंदिर की जमीन के झगड़ों को छह महीने के अंदर सुलझाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने की मांग की गई।

महासंघ ने चेतावनी दी कि अगर सरकार इस कानून पर आगे बढ़ती है, तो वह मंदिर ट्रस्ट, भक्तों और हिंदू संगठनों को शामिल करके पूरे राज्य में आंदोलन शुरू कर सकता है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के नेशनल ऑर्गेनाइजर सुनील घनवत की लीडरशिप में एक डेलीगेशन ने MLA प्रताप अडसद और प्रताप पचपुते के साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलकर प्रपोज़्ड कानून के खिलाफ एक मेमोरेंडम दिया।

घनवत ने बाद में कहा कि मुख्यमंत्री ने मामले की गंभीरता को माना और अधिकारियों को संबंधित विभाग और मंत्रियों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया।

आगे क्या होगा?

यह मसौदा अभी जनता के सुझाव और आपत्तियों के लिए रखा गया है। 5 जून 2026 तक लोग अपनी राय दे सकते हैं। सरकार अब इसमें संशोधन, बदलाव या इसे विधानसभा में पेश करने का फैसला ले सकती है।

लेकिन मंदिर संगठनों के विरोध और वक्फ तुलना के कारण यह मामला आने वाले समय में महाराष्ट्र की बड़ी राजनीतिक और धार्मिक बहस बन सकता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

₹182 करोड़ की ‘जिहादी ड्रग’ कैप्टागॉन भारत में पहली बार जब्त, होता है बेहद खतरनाक: जानें इसका मिडिल ईस्ट कनेक्शन और कैसे पड़ा ये नाम

भारत में पहली बार कैप्टागॉन  नाम की खतरनाक सिंथेटिक ड्रग की इतनी बड़ी खेप पकड़ी गई है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने ऑपरेशन रेजपिल के तहत करीब 182 करोड़ रुपए कीमत की कैप्टागॉन ड्रग्स जब्त की है।

इस मामले में एक सीरियाई नागरिक को भी गिरफ्तार किया गया है। जाँच एजेंसियों के मुताबिक यह खेप मिडिल ईस्ट भेजी जानी थी और भारत का इस्तेमाल ट्रांजिट रूट यानी रास्ते के तौर पर किया जा रहा था।

गृह मंत्री अमित शाह ने इसे भारत की जीरो टॉलरेंस नीति की बड़ी सफलता बताया है। कैप्टागॉन को दुनिया भर में ‘जिहादी ड्रग’ और ‘गरीबों का कोकीन’ जैसे नामों से भी जाना जाता है। आइए जानते है कि आखिर यह ड्रग क्या है, इसका इस्तेमाल कौन करता है, इसे इतना खतरनाक क्यों माना जाता है और भारत से इसका क्या कनेक्शन निकला।

क्या है कैप्टागॉन?

कैप्टागॉन एक सिंथेटिक स्टिमुलेंट ड्रग है। इसका असली नाम फेनेथिलीन है। इसे 1960 के दशक में दवा के तौर पर बनाया गया था। शुरुआत में इसका इस्तेमाल ध्यान संबंधी समस्याओं, डिप्रेशन और नार्कोलेप्सी जैसी बीमारी के इलाज में किया जाता था।

लेकिन धीरे-धीरे यह सामने आया कि इस दवा की लत बहुत तेजी से लगती है और इसका गलत इस्तेमाल बढ़ रहा है। इसके बाद दुनिया के कई देशों में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। हालाँकि आज अवैध बाजार में जो कैप्टागॉन बिकता है, वह असली मेडिकल दवा नहीं है।

इसे लैब में तैयार किया जाता है और इसमें एम्फेटामाइन, मेथाम्फेटामाइन, कैफीन और दूसरे खतरनाक केमिकल मिलाए जाते हैं। यही वजह है कि इसका असर बेहद तेज और खतरनाक माना जाता है।

शरीर और दिमाग पर कैसे असर करती है यह ड्रग?

कैप्टागॉन लेने के बाद इंसान को अचानक बहुत ज्यादा ऊर्जा महसूस होती है। उसे लंबे समय तक नींद नहीं आती, थकान कम लगती है और डर का एहसास भी कम हो जाता है। कई लोग इसे लेने के बाद खुद को ज्यादा ताकतवर और आत्मविश्वासी महसूस करते हैं।

जाँच एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक इस ड्रग का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति घंटों तक जाग सकता है। भूख कम लगती है और शरीर दर्द को भी कम महसूस करता है। लेकिन इसके साथ ही यह इंसान को आक्रामक, हिंसक और लापरवाह भी बना सकता है।

लंबे समय तक इस्तेमाल करने के कारण कई प्रकार की समस्या हो सकती है जैसे मानसिक बीमारी, हार्ट प्रॉब्लम, तनाव, डिप्रेशन और गंभीर एडिक्शन जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। ड्रग एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह सिर्फ नशा नहीं बल्कि मानसिक नियंत्रण को कमजोर करने वाला खतरनाक सिंथेटिक पदार्थ है।

क्यों कहा जाता है जिहादी ड्रग?

कैप्टागॉन का वैज्ञानिक नाम ‘जिहादी ड्रग’ नहीं है। यह शब्द मीडिया और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। इसे यह नाम इसलिए मिला क्योंकि कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि मिडिल ईस्ट के युद्धग्रस्त इलाकों और कट्टरपंथी संगठनों के लड़ाके इसका इस्तेमाल करते रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक इस ड्रग को लेने के बाद लड़ाकों को डर कम लगता था, थकान महसूस नहीं होती थी और वे लंबे समय तक जागकर लड़ाई कर सकते थे। यही वजह है कि इसे युद्ध और हिंसक गतिविधियों से जोड़कर देखा जाने लगा।

सीरिया से जुड़ी कई डॉक्यूमेंट्री और रिपोर्ट्स में पूर्व लड़ाकों ने बताया कि युद्ध के दौरान उन्हें यह गोली दी जाती थी ताकि वे लगातार लड़ सकें। कुछ रिपोर्ट्स में ISIS और दूसरे उग्रवादी संगठनों के साथ भी इसका नाम जोड़ा गया है।

हालाँकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि हर उपयोगकर्ता आतंकी नहीं होता। मिडिल ईस्ट के कई देशों में आम लोग भी इसे पार्टी ड्रग या स्टिमुलेंट के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

मिडिल ईस्ट में क्यों फैला इसका नेटवर्क?

कैप्टागॉन का सबसे बड़ा अवैध बाजार मिडिल ईस्ट माना जाता है। खासकर सऊदी अरब, कतर, UAE और कुवैत जैसे देशों में इसकी बड़ी माँग बताई जाती है। कई जगह शराब पर सख्त पाबंदियाँ होने के कारण युवा वर्ग और पार्टी कल्चर से जुड़े लोग इस ड्रग की तरफ आकर्षित होते हैं।

संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक अरब देशों में हर साल करोड़ों कैप्टागॉन गोलियाँ पकड़ी जाती हैं। इसे ‘गरीबों का कोकीन’ भी कहा जाता है क्योंकि यह कोकीन से सस्ती पड़ती है, लेकिन असर काफी तेज होता है।

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इसकी तस्करी से अरबों रुपए कमाए जाते हैं। यह पैसा संगठित अपराध, हथियारों की तस्करी और कुछ मामलों में चरमपंथी नेटवर्क तक भी पहुँच सकता है।

भारत में कैसे पकड़ी गई इतनी बड़ी खेप?

पूरे मामले का खुलासा एक विदेशी एजेंसी से मिले इनपुट के बाद हुआ। जानकारी मिली थी कि भारत का इस्तेमाल कैप्टागॉन की तस्करी के लिए ट्रांजिट रूट के रूप में किया जा रहा है। इसके बाद NCB ने दिल्ली के नेब सराय इलाके में एक मकान की पहचान की।

11 मई 2026 को यहाँ छापा मारा गया। तलाशी के दौरान एक चपाती कटिंग मशीन में छिपाकर रखी गई करीब 31.5 किलो कैप्टागॉन टैबलेट बरामद हुई। जाँच में पता चला कि यह खेप सऊदी अरब के जेद्दा भेजी जानी थी।

पूछताछ के बाद 14 मई को गुजरात के मुंद्रा पोर्ट स्थित कंटेनर फैसिलिटेशन स्टेशन में एक और बड़ा खुलासा हुआ। वहाँ एक कंटेनर से करीब 196 किलो कैप्टागॉन पाउडर बरामद किया गया। कंटेनर को ‘भेड़ की ऊन’ बताकर सीरिया से भारत लाया गया था।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक ड्रग्स को छिपाने के लिए हाईटेक तरीके इस्तेमाल किए जा रहे थे। कहीं चाय की पत्तियों के डिब्बे तो कहीं मशीनों और कार्गो कंटेनर का इस्तेमाल किया गया।

कौन है गिरफ्तार आरोपित और क्या है विदेशी कनेक्शन?

इस मामले में गिरफ्तार आरोपित सीरिया का नागरिक बताया जा रहा है। जाँच में सामने आया कि वह करीब डेढ़ साल पहले भारत पर्यटक वीजा पर आया था लेकिन वीजा खत्म होने के बाद भी अवैध रूप से भारत में रह रहा था।

एजेंसियाँ अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि उसके संबंध किन अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट से थे। जाँच में हवाला नेटवर्क, समुद्री तस्करी, फर्जी ट्रेड डॉक्यूमेंट और विदेशी हैंडलर्स के एंगल भी देखे जा रहे हैं। NCB को शक है कि भारत का इस्तेमाल सिर्फ ट्रांजिट पॉइंट की तरह किया जा रहा था और असली बाजार मिडिल ईस्ट के देश थे।

क्यों बढ़ रही है चिंता?

सुरक्षा एजेंसियों के लिए कैप्टागॉन सिर्फ एक ड्रग नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बड़ा खतरा बन चुका है। इसकी वजह है कि यह बहुत तेजी से लत लगाता है, हिंसक व्यवहार बढ़ा सकता है, मानसिक संतुलन बिगाड़ सकता है और इसका कनेक्शन अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क से भी जोड़ा जाता है।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक ड्रग्स तस्करी में अब हवाला नेटवर्क, फर्जी दस्तावेज, समुद्री रास्ते और कंटेनर कारोबार का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। भारत में हाल के वर्षों में ड्रग्स तस्करी के कई बड़े मामले सामने आए हैं। एजेंसियों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट अब भारत के बंदरगाहों और व्यापारिक रूट्स का इस्तेमाल बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

सरकार का क्या कहना है?

गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा है कि भारत में ड्रग्स के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति लागू है। उन्होंने कहा कि देश में आने वाले या भारत की जमीन का इस्तेमाल करके बाहर भेजे जाने वाले हर ड्रग्स पर कार्रवाई होगी।

सरकार ने 2047 तक ‘ड्रग-फ्री इंडिया’ का लक्ष्य रखा है। इसी के तहत NCB, कोस्ट गार्ड, कस्टम और दूसरी एजेंसियाँ समुद्री रास्तों, एयर कार्गो और कंटेनर नेटवर्क पर निगरानी बढ़ा रही हैं।

ऑपरेशन रेजपिल को इसी अभियान की बड़ी सफलता माना जा रहा है। पहली बार भारत में इतनी बड़ी मात्रा में कैप्टागॉन पकड़े जाने से यह साफ हो गया है कि अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट अब भारत को भी अपने नेटवर्क में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसे में एजेंसियों के सामने चुनौती सिर्फ नशे को रोकने की नहीं बल्कि संगठित अपराध और विदेशी नेटवर्क पर भी शिकंजा कसने की है।

मोदी सरकार ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता पर शुरू किया ऐसा काम, देखती रह जाएगी दुनिया: होर्मुज से नहीं पड़ेगा फर्क, जानें किस मिशन पर निकले भारतीय वैज्ञानिक

भारत अब ऊर्जा के क्षेत्र में ऐसी तैयारी कर रहा है, जिसे आने वाले वर्षों में देश की सबसे बड़ी रणनीतिक परियोजनाओं में गिना जा सकता है। मोदी सरकार ने बंगाल की खाड़ी और पूर्वी समुद्री तट के विशाल हिस्सों में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज के लिए बड़े स्तर पर समुद्री सर्वे अभियान शुरू करने की तैयारी की है।

इसका मकसद सिर्फ नए तेल और गैस भंडार तलाशना नहीं, बल्कि भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाना भी है। जब भी युद्ध के चलते तेल संकट जैसी स्थितियाँ बनती हैं, तो भारत पर भी उसका असर पड़ता है क्योंकि देश अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। अब भारत इसी निर्भरता को कम करने के मिशन पर निकल चुका है।

आखिर क्या है यह पूरा मिशन और क्यों है इतना अहम?

न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, इस परियोजना को तकनीकी तौर पर ‘2D ब्रॉडबैंड मरीन सीस्मिक और ग्रैविटी-मैग्नेटिक डेटा सर्वे’ कहा जा रहा है। आसान भाषा में समझें तो वैज्ञानिक समुद्र की सतह के नीचे कई किलोमीटर गहराई तक छिपी चट्टानों और परतों का स्कैन करेंगे, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहाँ तेल और गैस के बड़े भंडार मौजूद हो सकते हैं।

इसके लिए डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स ने बड़े स्तर पर योजना तैयार की है। इस मिशन के तहत बंगाल-पूर्णिया बेसिन, महानदी बेसिन, कृष्णा-गोदावरी बेसिन, कावेरी बेसिन और अंडमान समुद्री क्षेत्र में सर्वे किया जाएगा। केवल बंगाल-पूर्णिया और महानदी क्षेत्र में ही लगभग 45 हजार लाइन किलोमीटर सर्वे होना है।

अंडमान और कृष्णा-गोदावरी क्षेत्रों में करीब 43-43 हजार लाइन किलोमीटर और कावेरी क्षेत्र में लगभग 30 हजार लाइन किलोमीटर तक समुद्री अध्ययन किया जाएगा। यह पूरा अभियान करीब दो साल तक चल सकता है।

समुद्र के नीचे आखिर कैसे खोजा जाएगा तेल और गैस?

इस मिशन में अत्याधुनिक सर्वे जहाजों का इस्तेमाल किया जाएगा। ये जहाज अपने पीछे लंबे केबलनुमा उपकरण खींचेंगे, जिन्हें ‘स्ट्रीमर’ कहा जाता है। ये उपकरण समुद्र की तह में शक्तिशाली ध्वनि तरंगें भेजेंगे। जब ये तरंगें नीचे मौजूद चट्टानों से टकराकर वापस लौटेंगी, तो वैज्ञानिक उनके आधार पर समुद्र के नीचे की संरचना का नक्शा तैयार करेंगे।

इसी डेटा से यह समझा जाएगा कि कहाँ ऐसी भूगर्भीय संरचनाएँ मौजूद हैं, जिनमें तेल या प्राकृतिक गैस फंसी हो सकती है। वैज्ञानिक टेक्टॉनिक गतिविधियों, चट्टानी संरचनाओं और करोड़ों साल पुरानी तलछटी परतों का अध्ययन करेंगे। यानी जैसे डॉक्टर शरीर के अंदर देखने के लिए स्कैन करते हैं वैसे ही यहाँ समुद्र की गहराइयों का स्कैन होगा।

किन इलाकों में सबसे ज्यादा उम्मीद और कितना बड़ा हो सकता है खजाना?

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत के पूर्वी समुद्री क्षेत्र में अब भी बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडार छिपे हो सकते हैं। बंगाल ऑफशोर क्षेत्र में 10 किलोमीटर से ज्यादा मोटी तलछटी परतें पाई गई हैं, जिन्हें तेल और गैस के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहाँ मायोसीन और ईओसीन काल की चट्टानों में हाइड्रोकार्बन मिलने की संभावना जताई जा रही है।

कई स्थानों पर गैस के शुरुआती संकेत भी मिले हैं। महानदी बेसिन को भी भविष्य का बड़ा ऊर्जा क्षेत्र माना जा रहा है। यहाँ गहरे समुद्री गैस भंडार और जैविक गैस सिस्टम मिलने की संभावना है। वहीं कृष्णा-गोदावरी बेसिन पहले से भारत के बड़े गैस उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है, लेकिन अब उम्मीद है कि इसके गहरे समुद्री हिस्सों में और भी बड़े भंडार हो सकते हैं।

सबसे ज्यादा रणनीतिक महत्व अंडमान बेसिन को दिया जा रहा है। इसकी भूगर्भीय संरचना म्यांमार और इंडोनेशिया के गैस क्षेत्रों से काफी मिलती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अंडमान समुद्री क्षेत्र में भारी मात्रा में प्राकृतिक गैस मौजूद हो सकती है। यहाँ ‘गैस हाइड्रेट्स’ मिलने की भी संभावना है।

यह समुद्र के नीचे जमी हुई मीथेन गैस होती है, जिसे भविष्य का ऊर्जा स्रोत माना जा रहा है। कावेरी बेसिन में पहले से तेल उत्पादन होता रहा है, लेकिन अब वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इसके गहरे समुद्री क्षेत्रों और जुरासिक काल की परतों में बड़े भंडार अब भी मौजूद हो सकते हैं।

बॉम्बे हाई से क्या सीखा भारत और अभी कैसे निकलता है समुद्र से तेल?

भारत पहले से समुद्र से तेल निकालता रहा है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण Bombay High है। यह क्षेत्र मुंबई तट से दूर अरब सागर में स्थित है और 1970 के दशक में यहाँ बड़े तेल भंडार मिलने के बाद भारत की ऊर्जा तस्वीर बदल गई थी। आज भी भारत के समुद्री तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा बॉम्बे हाई से आता है।

समुद्र से तेल निकालने के लिए बड़े ऑफशोर प्लेटफॉर्म लगाए जाते हैं। समुद्र के नीचे ड्रिलिंग कर पाइपलाइन के जरिए तेल और गैस को सतह तक लाया जाता है। फिर इन्हें जहाजों या पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए रिफाइनरियों तक पहुँचाया जाता है। लेकिन पूर्वी तट के गहरे समुद्री हिस्से अभी पश्चिमी तट की तुलना में कम खोजे गए हैं। इसी वजह से सरकार अब आधुनिक तकनीक के जरिए इन इलाकों की विस्तृत मैपिंग कर रही है।

इस मिशन पर क्यों रहेगी दुनिया की नजर?

यह परियोजना सिर्फ तेल और गैस खोजने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ी है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने यह दिखा दिया कि ऊर्जा के लिए विदेशों पर ज्यादा निर्भर रहना कितना जोखिम भरा हो सकता है। भारत फिलहाल अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है।

अगर घरेलू उत्पादन बढ़ता है, तो भारत वैश्विक संकटों के असर से काफी हद तक बच सकता है। यही वजह है कि मोदी सरकार इस मिशन को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में सबसे बड़ा कदम मान रही है। बंगाल की खाड़ी और अंडमान के नीचे छिपे संभावित ऊर्जा भंडार अगर उम्मीद के मुताबिक मिले, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा खुद पूरा कर सकेगा, बल्कि एशिया की ऊर्जा राजनीति में भी उसकी स्थिति और मजबूत हो सकती है।

होर्मुज संकट के बीच भारत ने मजबूत किया अपना तेल भंडार, PM मोदी की UAE यात्रा पर पेट्रोल-डीजल से LNG-PNG तक मिला सुरक्षा कवच: जानें सब कुछ

भारत और UAE के बीच हुआ नया ऊर्जा समझौता सिर्फ एक कारोबारी डील नहीं, बल्कि आने वाले समय में भारत की एनर्जी सिक्योरिटी को मजबूत करने वाला बड़ा रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की UAE यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच यह समझौता हुआ, जिसके तहत UAE की सरकारी तेल कंपनी ADNOC भारत के स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व में 30 मिलियन बैरल तक कच्चा तेल स्टोर करेगी।

इस समझौते का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अगर दुनिया में युद्ध, तनाव या सप्लाई संकट पैदा हो जाए, तब भी भारत के पास तेल का पर्याप्त बैकअप मौजूद रहे।

क्या है पूरा समझौता?

भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अगर किसी वजह से तेल की सप्लाई रुक जाए तो देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है। इसी खतरे को कम करने के लिए भारत ने जमीन के नीचे बड़े-बड़े तेल भंडार यानी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) बनाए हैं।

अब UAE की कंपनी ADNOC भारत के इन रिजर्व में अपना तेल रखेगी। यह स्टोरेज मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम और कर्नाटक के पादुर व मैंगलोर जैसे केंद्रों में होगा। भविष्य में ओडिशा के चाँदी खोल प्रोजेक्ट में भी UAE की भागीदारी हो सकती है।

इस समझौते के तहत सिर्फ कच्चे तेल पर ही नहीं, बल्कि LPG और LNG स्टोरेज को लेकर भी सहयोग बढ़ाने की बात हुई है। दोनों देशों ने लंबे समय तक LPG सप्लाई जारी रखने को लेकर भी करार किया है।

स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व क्या होता है?

आसान भाषा में समझें तो स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व यानी आपातकालीन तेल भंडार। जिस तरह घरों में लोग मुश्किल समय के लिए राशन जमा करके रखते हैं, उसी तरह देश भी संकट के वक्त इस्तेमाल के लिए तेल जमा करके रखते हैं।

अगर युद्ध हो जाए, समुद्री रास्ते बंद हो जाएँ या अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की भारी कमी आ जाए, तब यही रिजर्व देश की जरूरतें पूरी करते हैं। भारत के पास फिलहाल करीब 5.3 मिलियन टन का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व है, जो विशाखापत्तनम, मैंगलोर और पादुर में मौजूद है।

अब UAE के 30 मिलियन बैरल तेल स्टोर होने से यह क्षमता करीब 70 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। सरकार पहले ही ओडिशा के चाँदी खोल और पादुर में नए रिजर्व बनाने की मंजूरी दे चुकी है। यानी आने वाले सालों में भारत का तेल बैकअप और मजबूत होने वाला है।

भारत को इससे क्या फायदा होगा?

इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा। अगर पश्चिम एशिया में युद्ध या तनाव बढ़ता है और तेल सप्लाई प्रभावित होती है, तब भी भारत के पास पहले से जमा तेल मौजूद रहेगा। इससे देश में पेट्रोल-डीजल की भारी कमी या कीमतों में अचानक उछाल जैसी स्थिति को काफी हद तक रोका जा सकेगा।

दूसरा बड़ा फायदा यह है कि भारत को तेल की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित होगी। UAE पहले से भारत के सबसे बड़े तेल सप्लायर देशों में शामिल है। अब भारत की जमीन पर ही उसका तेल स्टोर होने से सप्लाई और ज्यादा भरोसेमंद हो जाएगी।

तीसरा फायदा रणनीतिक स्तर पर है। अगर किसी संकट के दौरान पड़ोसी देशों को मदद की जरूरत पड़े, तो भारत उनके लिए भी सप्लाई सपोर्ट देने की स्थिति में आ सकता है। इससे क्षेत्र में भारत की ताकत और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे।

होर्मुज संकट के बीच भारत के लिए राहत

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहे तनाव की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर खतरा बना हुआ है। दुनिया का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से तेल सप्लाई करता है। अगर यहाँ संकट बढ़ता है तो पूरी दुनिया में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।

इसी खतरे को देखते हुए UAE ने फुजैराह तक अपनी नई पाइपलाइन परियोजना को तेजी से पूरा करने का फैसला किया है ताकि तेल निर्यात के लिए होर्मुज पर निर्भरता कम की जा सके।

भारत के लिए राहत की बात यह है कि अब उसका बड़ा तेल स्टॉक पहले से ही देश के भीतर मौजूद रहेगा। यानी समुद्री रास्ते प्रभावित होने पर भी भारत के पास बैकअप तैयार रहेगा।

सिर्फ तेल नहीं, निवेश और रक्षा साझेदारी भी मजबूत

पीएम मोदी और UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मुलाकात में सिर्फ ऊर्जा सहयोग ही नहीं, बल्कि रक्षा, निवेश, टेक्नोलॉजी और व्यापार को लेकर भी कई अहम समझौते हुए।

UAE ने भारत में 5 अरब डॉलर के निवेश का ऐलान किया है। इसमें बैंकिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और फाइनेंस सेक्टर में बड़े निवेश शामिल हैं। इसके अलावा दोनों देशों ने रक्षा सहयोग, साइबर सिक्योरिटी और समुद्री सुरक्षा बढ़ाने पर भी सहमति जताई।

जिस जमीन पर कब्जा कर बनाई दुकानें, अब वहाँ मुस्लिम करते हैं हिंदू लड़कियों से अश्लीलता: पहले भी 9 लोग कर चुके हैं नाबालिग से गैंगरेप, गुजरात के खेड़ा का मामला

गुजरात के खेड़ा जिले के चांदणा गाँव में अवैध कब्जा और हिंदू महिलाओं के साथ अभद्रता किए जाने का मामला सामने आया है। गाँव के बीचों-बीच खाली पड़ी जमीन पर मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों द्वारा कब्जा कर लिया गया है और वहाँ अवैध रूप से दुकानें बना दी गई हैं। हिंदू समाज के लोगों का आरोप है कि इन दुकानों पर मुस्लिम युवकों के समूह इकट्ठा होते हैं और वहाँ से गुजरने वाली हिंदू महिलाओं और युवतियों को देखकर अश्लील इशारे और अभद्र टिप्पणियाँ करते हैं। स्थानीय हिंदुओं ने इस मामले में कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर अवैध कब्जा हटाने की माँग की है।

ग्रामीणों ने माँग की है कि इन अवैध कब्जों को तुरंत हटाया जाए और गाँव में सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। आवेदन पत्र की एक कॉपी ऑपइंडिया के पास भी मौजूद है। आवेदन में कहा गया है कि गाँव के मध्य स्थित खाली जमीन पर मुस्लिम समाज द्वारा पिछले कई वर्षों से अवैध कब्जा कर निर्माण कर दिया गया है। वहीं, व्यापार-व्यवसाय के नाम पर कई दुकानें भी खड़ी कर दी गई हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि इन दुकानों के पास से गुजरने वाले सार्वजनिक रास्ते से सुबह-शाम हिंदू समाज की महिलाएँ और लड़कियाँ आती-जाती हैं। इसी दौरान वहाँ कुछ मुस्लिम युवक इकट्ठा होते हैं और अश्लील भाषा का प्रयोग करते हुए अभद्र टिप्पणियाँ और इशारे करते हैं। दुकानों के पास हिंदू समाज के कई मंदिर और चबूतरा चौक भी स्थित हैं। यहाँ नवरात्रि गरबा, भाठीजी महाराज के गरबा, रामधून और रामदेवजी के भजन जैसे धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

आरोप है कि इन धार्मिक आयोजनों के दौरान भी मुस्लिम युवक देर रात तक दुकानें खुली रखते हैं और वहाँ आने-जाने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हुए अभद्र टिप्पणियाँ करते हैं। हिंदू समाज के लोगों ने पहले हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि नवरात्रि के दौरान गरबा खेलने आने वाली महिलाओं, बहनों और लड़कियों के छिपकर वीडियो और फोटो भी बनाए जाते हैं जिसके चलते पहले भी तनाव और विवाद की स्थिति पैदा हो चुकी है।

ग्रामीणों का कहना है कि अब यह जगह एक तरह का ‘हब’ बन चुकी है, जहाँ गाँव में आने-जाने वाली हिंदू महिलाओं और लड़कियों को गलत नजर से देखा जाता है, उन पर अभद्र टिप्पणियाँ की जाती हैं। जब वे आसपास की दुकानों पर सामान लेने जाती हैं तो उनका पीछा करने जैसी घटनाएँ भी आए दिन सामने आ रही हैं।

प्रशासन ने नोटिस लगाकर माँगे दस्तावेज: स्थानीय हिंदू

ऑपइंडिया से बातचीत में स्थानीय हिंदू संगठन के पदाधिकारी धवलसिंह झाला ने बताया कि पिछले 3 वर्षों से आरोपित हिंदू लड़कियों और महिलाओं को परेशान कर रहे थे। उनका कहना था कि गाँव के बीचों-बीच जमीन पर कब्जा कर वहाँ अवैध निर्माण कर दिए गए थे। उन्होंने बताया कि तीन साल पहले नवरात्रि के दौरान भी इस मुद्दे को लेकर तनाव की स्थिति बनी थी। वहीं इस बार नवरात्रि में मुस्लिम युवक बाइक लेकर कार्यक्रम स्थल के बीच से गुजरते थे, तेज आवाज में बाइक चलाते थे और अश्लील हरकतें करते थे।

उन्होंने आगे कहा कि हाल ही में गाँव में एक हिंदू नाबालिग लड़की के साथ कई मुस्लिम युवकों द्वारा सामूहिक दुष्कर्म किए जाने की घटना भी सामने आई थी। इस घटना के बाद गाँव के हिंदू समाज ने पूरे मामले की गहराई से जाँच की और दस्तावेजों की पड़ताल की। जाँच के दौरान आधिकारिक रूप से यह सामने आया कि मुस्लिम समुदाय के लोगों ने गाँव की खाली पड़ी जमीन पर कब्जा कर अवैध निर्माण कर लिए हैं।

उन्होंने आगे जानकारी देते हुए बताया कि फिलहाल प्रशासन ने सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया है। इसके अलावा जिला प्रशासन ने अवैध दुकानों पर नोटिस चस्पा कर संबंधित लोगों को तुरंत दस्तावेज और सबूत पेश करने का आदेश दिया है। कहा गया है कि यदि वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए तो जिला प्रशासन की ओर से कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

नाबालिग हिंदू के साथ हाल ही में हुआ गैंगरेप

गौरतलब है कि हाल ही में इसी गाँव में एक 17 वर्षीय हिंदू नाबालिग के साथ तीन साल तक गैंगरेप और ब्लैकमेलिंग का एक मामला सामने आया। पीड़िता की माँ की शिकायत के आधार पर खेड़ा टाउन पुलिस स्टेशन में 9 मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। पुलिस के अनुसार, मुख्य आरोपित परवेज पठान ने पहले नाबालिग को अपने जाल में फँसाया, उसकी अश्लील तस्वीरें और वीडियो बनाए और फिर उसे धमकाकर बार-बार उसके साथ रेप किया। शिकायत के अनुसार, परवेज ने नाबालिग को अपने अन्य मुस्लिम दोस्तों के हवाले भी कर दिया था और 2023 से 2025 के बीच अलग-अलग लोगों ने उसके साथ रेप किया।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि आरोपितों ने नाबालिग को बार-बार धमकी दी कि अगर उसने उनकी बात नहीं मानी, तो वे उसकी तस्वीरें और वीडियो वायरल कर देंगे और उसे बदनाम कर देंगे। आखिरकार पीड़िता परेशान हो गई और उसने आत्महत्या करने की बात कही जिसके बाद यह पूरा मामला परिवार के सामने आया। इसके बाद, 17 अप्रैल 2026 को एक शिकायत दर्ज की गई थी।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

ट्रंप ने कचरे में फेंके चीनी गिफ्ट, फोन भी तोड़कर किए नष्ट: लैपटॉप तक बीजिंग नहीं ले गए अधिकारी, पढ़ें- जासूसी के डर और ‘डिजिटल लॉकडाउन’ की पूरी कहानी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौरे पर चीन की राजधानी बीजिंग पहुँचे थे। यह दौरा 2 दिन का था। इस ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन में ट्रंप के साथ अमेरिका के सबसे बड़े बिजनेस लीडर्स और शीर्ष अधिकारी मौजूद थे। लेकिन कैमरे के सामने दिखने वाली दोस्ती के पर्दे के पीछे एक डिजिटल जंग चल रही थी।

चीन दौरे पर जासूसी और हैकिंग का बहुत बड़ा डर देखने को मिला। इसी डर की वजह से अमेरिकी टीम के लिए एक सख्त ‘डिजिटल लॉकडाउन’ लागू कर दिया था। चीन से वापस लौटते समय अमेरिकी अधिकारियों और पत्रकारों को मिले सभी तोहफे, बैज और पिन विमान पर चढ़ने से पहले ही एयरपोर्ट पर एक कचरे के डिब्बे में फेंकने पड़े।

इसके अलावा, अमेरिकी टीम का कोई भी सदस्य अपना पर्सनल मोबाइल या लैपटॉप चीन लेकर ही नहीं गया था। वहाँ बातचीत के लिए सिर्फ कुछ समय वाले अस्थाई ‘बर्नर फोन’ इस्तेमाल किए गए थे, जिन्हें बाद में पूरी तरह नष्ट करने का आदेश दिया गया। साफ-साफ कहें तो अमेरिका को डर था कि चीन इन गिफ्ट्स और फोन के जरिए उनकी खुफिया बातें सुन सकता है या उनका डेटा चोरी कर सकता है।

एयरपोर्ट पर सीढ़ियों के पास रखा गया डस्टबिन, ‘नो चाइना आइटम’ रूल

विमान पर चढ़ने से पहले सभी अमेरिकी अधिकारियों और पत्रकारों को साफ कह दिया गया था कि वे चीन से मिला कोई भी सामान प्लेन के अंदर नहीं ले जा सकते। सुरक्षा नियमों के कारण पूरी टीम को चीन की तरफ से मिले तोहफे, पास और कोट पर लगाने वाले सरकारी पिन वहीं रखे एक डिब्बे में फेंकने पड़े।

चीन में कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, एप्पल के मालिक टिम कुक और एनवीडिया के प्रमुख जेन्सेन हुआंग जैसे बड़े दिग्गज ये पिन लगाए हुए दिखे थे, लेकिन जासूसी के डर से बाद में इन सभी चीजों को कूड़ेदान में डाल दिया गया।

पर्सनल फोन-लैपटॉप घर छोड़े, सिर्फ ‘बर्नर फोन’ का हुआ इस्तेमाल

साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीन में मोबाइल और लैपटॉप से डेटा चोरी करना या उनमें वायरस डालना बहुत आसान है। वहाँ फोन बंद होने पर भी हैक किया जा सकता है। इसी बड़ी खतरे से बचने के लिए अमेरिकी टीम अपने असली फोन और लैपटॉप घर पर ही छोड़ गई थी।

चीन में काम चलाने के लिए उन्होंने सिर्फ कुछ दिनों के लिए अस्थाई ‘बर्नर फोन’ का इस्तेमाल किया था। बाद में इन फोन्स को भी पूरी तरह नष्ट करने का आदेश दिया गया ताकि चीन भविष्य में भी उनकी बातें न सुन सके और जासूसी का कोई खतरा न रहे।

चीन में हर चीज पर नजर, होटल के Wi-Fi और चार्जर से भी दूरी

अमेरिका के सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन एक ‘मास सर्विलांस स्टेट’ है यानी वहाँ हर एक गतिविधि पर सरकार की नजर रहती है। सुरक्षा अधिकारियों ने डेलिगेशन को साफ चेतावनी दी थी कि चीन में कोई भी इलेक्ट्रॉनिक बातचीत सुरक्षित नहीं है। अधिकारियों को होटल के वाई-फाई नेटवर्क से कनेक्ट करने या किसी भी सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन का इस्तेमाल करने से मना किया गया था।

ऐसा ‘जूस जैकिंग’ के खतरे को देखते हुए किया गया, जिसमें चार्जिंग पोर्ट के जरिए फोन का डेटा चोरी कर लिया जाता है। अमेरिकी दल केवल अमेरिका से साथ लाए गए सरकारी प्रमाणित चार्जर और पावर बैंक का ही इस्तेमाल कर रहा था। इस डिजिटल लॉकडाउन के कारण अधिकारियों के रोजमर्रा के काम भी प्रभावित हुए क्योंकि वे क्लाउड स्टोरेज या अपने निजी अकाउंट्स का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। कई बेहद संवेदनशील संदेशों को डिजिटल रूप से भेजने के बजाय अधिकारियों ने आपस में आमने-सामने (इन-पर्सन) बात करके साझा किया।

बंद दरवाजों के पीछे तीखी बहस और सुरक्षा पर टकराव

बाहर से देखने पर भले ही ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात बहुत अच्छी लग रही थी, लेकिन दोनों देशों के सुरक्षा अधिकारियों के बीच अंदर ही अंदर भारी तनाव चल रहा था। जब वे बीजिंग के मशहूर ‘टेंपल ऑफ हीवन’ देखने गए, तो चीनी अधिकारियों ने अमेरिका के एक सुरक्षा एजेंट को अंदर जाने से रोक दिया क्योंकि उसके पास नियम के मुताबिक हथियार था।

इस बात पर दोनों पक्षों में करीब डेढ़ घंटे तक तीखी बहस हुई, जिससे वहाँ मौजूद मीडिया का काम भी देर से शुरू हुआ। यही नहीं, जब ट्रंप वापस लौटने लगे तब भी चीनी सुरक्षाकर्मियों ने अमेरिकी पत्रकारों की गाड़ियों को राष्ट्रपति के काफिले में शामिल होने से रोक दिया था, जिसके बाद अमेरिकी अफसरों को बीच-बचाव करके रास्ता साफ कराना पड़ा।

‘हम भी उन पर जमकर जासूसी करते हैं’- ट्रंप का बयान

चीन से वापसी के दौरान जब एयर फोर्स वन विमान हवा में था, तब पत्रकारों ने डोनाल्ड ट्रंप से पूछा कि क्या उन्होंने शी जिनपिंग के सामने साइबर हमलों का मुद्दा उठाया था? इस पर ट्रंप ने स्वीकार किया कि दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ जासूसी अभियानों में लगे हुए हैं। ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा, “शी जिनपिंग ने उन साइबर हमलों के बारे में बात की जो हमने चीन में किए थे। जो वे करते हैं, वही हम भी करते हैं। हम भी उन पर जमकर जासूसी करते हैं।”

ट्रंप ने आगे दावा किया कि उन्होंने शी जिनपिंग से आमने-सामने कहा, “हम आपके खिलाफ ऐसी बहुत सी चीजें करते हैं जिनके बारे में आपको भनक तक नहीं है।” हालाँकि, अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ चीन के ‘वोल्ट टाइफून’ और ‘साल्ट टाइफून’ जैसे हैकिंग समूहों पर अमेरिकी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने का आरोप लगाती रही हैं, जबकि चीन ने हमेशा इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि वह कानूनन डेटा प्राइवेसी का सम्मान करता है।

पेट्रोल पर मोदी सरकार को कोस रही कॉन्ग्रेस, लेकिन UPA सरकार की नीतियाँ मौजूदा वैश्विक हालात में लाती बर्बादी: जानें तेल बांड से घाटा छिपाना कैसे पड़ता देश पर भारी

पश्चिम एशिया संकट और हॉर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी की वजह से ईंधन की कीमतों पर भारी दबाव पड़ रहा है। ऐसे में मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में सिर्फ ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। हालाँकि दुनिया के अन्य देशों की तुलना में ये बढ़ोतरी नाममात्र की है, लेकिन इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेता लगातार मोदी सरकार को निशाना बना रही है।

कॉन्ग्रेस पार्टी का आरोप है कि पीएम मोदी ने जनता पर कोड़ा बरसा दिया है। कॉन्ग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि यह फैसला जानबूझकर विधानसभा चुनाव खत्म होने तक टाल दिया गया था।

राहुल गाँधी ने कहा, “जनता मोदी सरकार की गलती की कीमत चुकाएगी। तीन रुपए का झटका तो आ गया, बाकी रिकवरी किस्तों में होगी।” इससे पहले 28 अप्रैल को उन्होंने कहा था, “चुनावी राहत खत्म, महंगाई की आग आने वाली है! 29 अप्रैल के बाद सावधान- पेट्रोल, डीजल, सब महँगा हो जाएगा।” उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि जब तेल सस्ता था तब मुनाफा कमाया और अब बोझ जनता पर डाल दिया।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इसे ‘मोदी सरकार द्वारा निर्मित संकट’ बताते हुए नेतृत्व की कमी और अक्षमता को जिम्मेदार ठहराया। कॉन्ग्रेस के अन्य नेता भी इसी सुर में सुर मिला रहे हैं।

विपक्षी पार्टी के ऐसे हमले इतिहास को सुविधानुसार भुला देते हैं। इस संदर्भ में यूपीए काल की वित्तीय चालाकी को दोबारा याद करना जरूरी है, जिसने देश पर लाखों करोड़ की टाली गई जिम्मेदारी (Deferred Liability) को थोपकर घाटे को छिपाया गया।

UPA के दौर में तेल बांड से छिपाया जाता था वित्तीय घाटा

विपक्ष के ये हमले इतिहास को बड़ी सफाई से नजरअंदाज कर रहे हैं। इस संदर्भ में यूपीए (UPA) काल की उस “वित्तीय जालसाजी” को याद करना जरूरी है, जिसने देश पर लाखों करोड़ रुपये का बोझ लाद दिया था।

ऑयल बॉन्ड को बनाया था राजकोषीय घाटा छिपाने का हथियार

यूपीए सरकार ने पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और एलपीजी पर सब्सिडी देने के लिए तेल कंपनियों को विशेष ‘ऑयल बॉन्ड’ जारी किए थे। बजट से सब्सिडी देने के बजाय, डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को ये बॉन्ड थमा दिए, जो बाद में देश के लिए एक महँगा कर्ज बन गए।

उपभोक्ताओं को राहत देने के बजाय, यूपीए के इन ऑयल बॉन्ड ने अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुँचाया और कर्ज चुकाने का सारा बोझ आने वाली सरकार पर डाल दिया। इसके विपरीत, मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर फिर से अंधाधुंध सब्सिडी देने से इनकार कर दिया, जो वित्तीय अनुशासन का एक मॉडल है, खासकर तब जब पूरी दुनिया वैश्विक संकट से जूझ रही है।

भविष्य की पीढ़ी पर लादा ₹3 लाख करोड़ का बोझ

साल 2005 से 2010 के बीच, यूपीए सरकार ने तेल कंपनियों को लगभग ₹1.48 लाख करोड़ के ऑयल बॉन्ड जारी किए। ये साधारण कर्ज नहीं थे। बजट से नकद सब्सिडी देने के बजाय, सरकार ने लंबी अवधि की प्रतिभूतियां (Sovereign Securities) जारी कीं।

इन बॉन्डों की अवधि 15 से 20 वर्ष थी और ब्याज दर 7 से 8.4 प्रतिशत तक थी। कागजों पर तो राजकोषीय घाटा कम दिखा, क्योंकि सब्सिडी बजट का हिस्सा नहीं थी, लेकिन हकीकत में यह भविष्य के करदाताओं के साथ धोखा था।

यूपीए सरकार के इस रवैये ने अर्थव्यवस्था को कई मोर्चों पर चोट पहुँचाई, जिसमें-

  • वित्तीय भ्रम: यूपीए ने घाटे को छिपाकर लक्ष्यों को पूरा करने का दिखावा किया, जबकि कच्चा तेल 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गया था। केवल ब्याज भुगतान ने ही दो दशकों में ₹1.70 लाख करोड़ जोड़ दिए, जिससे कुल भुगतान (मूलधन + ब्याज) ₹3 लाख करोड़ से ऊपर निकल गया।
  • विकास कार्यों में कटौती: सरकार को हर साल सिर्फ ब्याज चुकाने के लिए ₹10,000 करोड़ अलग रखने पड़े। यह पैसा बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य या शिक्षा पर खर्च हो सकता था।
  • तेल कंपनियों की बदहाली: तेल कंपनियों के पास नकदी के बजाय ऐसे बॉन्ड रह गए जिन्हें वे भुना नहीं सकती थीं। इससे रिफाइनिंग क्षमता और विस्तार में उनकी निवेश क्षमता घट गई।

सब्सिडी के बावजूद आसमान छूती थीं कीमतें

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन बॉन्डों से आम जनता को कोई खास राहत नहीं मिली। यूपीए के 10 सालों में कीमतें लगातार बढ़ती रहीं। 2004 में दिल्ली में पेट्रोल ₹34 प्रति लीटर था, जो 2014 तक ₹72 पार कर गया (118% की वृद्धि)। डीजल ₹22 से बढ़कर ₹55 हो गया (155% से अधिक की वृद्धि)। 2012 में तो एक ही झटके में पेट्रोल के दाम 8 रुपए बढ़ा दिए गए थे।

मोदी सरकार ने चुकाया यूपीए का ‘क्रेडिट कार्ड’ बिल

यूपीए द्वारा जारी किए गए ज्यादातर ऑयल बॉन्ड 2014 के बाद परिपक्व (Mature) हुए। असली भुगतान का भारी बोझ (सालाना हजारों करोड़ रुपये) मोदी सरकार के कंधों पर आया। इस साल मार्च तक, मोदी सरकार ने इन बॉन्डों की आखिरी किश्तें चुकाकर लगभग ₹3.20 लाख करोड़ का कुल दायित्व खत्म कर दिया है।

जहाँ यूपीए ने ₹1.48 लाख करोड़ के बॉन्ड जारी किए और मूलधन के रूप में केवल ₹13,764 करोड़ चुकाए, वहीं डॉ. मनमोहन सिंह सरकार ने 2014 तक ब्याज के तौर पर ₹68,750 करोड़ का भारी भुगतान किया।

कुल मिलाकर, ₹1.48 लाख करोड़ के बॉन्ड के लिए सरकारी खजाने से ₹1.71 लाख करोड़ का केवल ब्याज चुकाया गया है। 2014 से 2026 के बीच मोदी सरकार ने कुल ₹2.36 लाख करोड़ (मूलधन + ब्याज) का भुगतान किया है।

यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी। जब वैश्विक तेल कीमतें कम थीं, तब भी सरकार ने एक्साइज ड्यूटी कम नहीं की और उस राजस्व का उपयोग यूपीए के इन पुराने घावों (ऑयल बॉन्ड) को भरने के लिए किया।

मौजूदा समय की चुनौतियाँ और जमीनी वैश्विक हकीकत

दिल्ली में पेट्रोल ₹97.77 और डीजल ₹90.67 प्रति लीटर है। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर पार कर 126 डॉलर तक पहुँच चुका है। पश्चिम एशिया के तनाव ने दुनिया के समुद्री तेल व्यापार के एक चौथाई हिस्से को बाधित कर दिया है। यूरोप से लेकर चीन और जापान तक, हर देश इसकी मार झेल रहा है। भारत, जो अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल आयात करता है, इस वैश्विक हकीकत से अछूता नहीं रह सकता।

मोदी सरकार का फैसला कि वह फिर से सब्सिडी के जाल में नहीं फंसेगी, आर्थिक रूप से सही कदम है। 2014 और 2016 में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को बाजार से जोड़ने के कारण अब स्वचालित समायोजन (Automatic Adjustment) होता है, जिससे तेल कंपनियों को घाटा नहीं होता।

कॉन्ग्रेस की रणनीति न दोहराने से देश को फायदा है। यूपीए का अनुभव बताता है कि वित्तीय देनदारियों को टालना कोई राहत नहीं है, बल्कि यह ब्याज के साथ आने वाला ‘विलंबित दर्द’ है। कॉन्ग्रेस अपनी याददाश्त खोकर राजनीतिक लाभ खोज सकती है, लेकिन रिकॉर्ड साफ है कि यूपीए ने जो बिल उधार छोड़ा था, उसे मोदी सरकार ने चुकाया। देश को आज के संकट का सामना आज ही करना होगा, इसे भविष्य के लिए टाला नहीं जा सकता।

(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)