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भारत में बैन हुए चाइनीज CCTV कैमरे, पहले से देसी कंपनियाँ बना चुकी हैं 80% पर कब्जा: जानें- इजरायल की ईरान पर हमले के बाद कैसे ‘कनेक्टेड आँखें’ बनी नेशनल सिक्योरिटी का मुद्दा

भारत में निगरानी व्यवस्था यानी सर्विलांस सिस्टम में अब बड़ा बदलाव होने जा रहा है। 01 अप्रैल 2026 से सरकार नए सख्त नियम लागू करने जा रही है, जिसके बाद चीन की कई सीसीटीवी कंपनियाँ जैसे टीपी लिंक, हिकवीजन और दहुआ भारतीय बाजार से लगभग बाहर हो जाएँगी। सरकार ने साफ कर दिया है कि अब इंटरनेट से जुड़ी वही कैमरा डिवाइस भारत में बिक सकेंगी, जिनके पास जरूरी सुरक्षा सर्टिफिकेट होगा। यह सर्टिफिकेट STQC यानी सरकारी जाँच प्रक्रिया के तहत मिलता है। जिन कंपनियों ने यह सर्टिफिकेट नहीं लिया है, वे अब अपने प्रोडक्ट भारत में नहीं बेच पाएँगी।

इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह देश की सुरक्षा मानी जा रही है। सरकार चाहती है कि भारत में इस्तेमाल होने वाले सभी निगरानी उपकरण सुरक्षित हों और उनका डेटा देश के लिए खतरा न बने। इसके साथ ही सरकार भरोसेमंद सप्लाई चेन और डेटा की सुरक्षा यानी डेटा संप्रभुता पर भी जोर दे रही है।

बाजार में क्या हो रहा है?

नए सर्टिफिकेशन नियमों का असर भारत के सीसीटीवी बाजार में तुरंत दिखाई देने लगा है। जो चीनी ब्रांड कुछ समय पहले तक बाजार का लगभग एक तिहाई हिस्सा रखते थे, अब वे या तो बाहर हो रहे हैं या अपने काम करने का तरीका पूरी तरह बदल रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब भारतीय कंपनियाँ जैसे सीपी प्लस, क्यूबो, प्रामा, मैट्रिक्स और स्पार्श मिलकर बाजार के 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर कब्जा कर चुकी हैं। वहीं बॉश और हनीवेल जैसी विदेशी कंपनियों ने प्रीमियम सेगमेंट में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है। दूसरी तरफ चीनी और छोटे खिलाड़ी नियमों का पालन न कर पाने की वजह से बाजार से गायब होते जा रहे हैं।

जो कंपनियाँ ज्यादा हद तक चीनी चिपसेट और सॉफ्टवेयर पर निर्भर थीं, उन्हें नए नियमों को पूरा करने में काफी परेशानी हो रही है। हिकविजन जैसी बड़ी कंपनियों को अब भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी करने और चीनी सप्लाई चेन से दूर जाने के रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं, क्योंकि भारत सरकार के नियम सख्त हो गए हैं। वहीं दहुआ की मौजूदगी बाजार में लगभग 80 प्रतिशत तक घट चुकी है।

चीन से जुड़ी कंपनियाँ जैसे शाओमी और रियलमी, जो स्मार्ट होम कैमरा सेगमेंट में काफी मजबूत मानी जाती थीं, उन्होंने भी नए नियमों को पूरा करने में दिक्कत के कारण इस बाजार से दूरी बना ली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बदलाव की वजह से लागत में करीब 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि अब लोकल स्तर पर चीजें तैयार करनी पड़ रही हैं और दूसरे स्रोतों से सामान लेना पड़ रहा है। हालाँकि बाजार के बड़े खिलाड़ियों ने निचले सेगमेंट में कीमतों को काफी हद तक संतुलित रखा है।

यह पूरा बदलाव अप्रैल 2024 में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा लागू किए गए नए नियमों से शुरू हुआ था। इन नियमों के तहत किसी भी प्रोडक्ट को भारत में बेचने से पहले उसकी सुरक्षा जाँच, उसमें इस्तेमाल हाने वाले पार्ट्स का स्रोत बताना और उसकी कमजोरियों की जाँच करना जरूरी कर दिया गया है।

नई नीति की पूरी व्यवस्था को समझिए

04 फरवरी 2026 को भारत सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया, जिसमें बाजार में हो रहे बदलावों के पीछे की नीति को साफ तौर पर समझाया गया। इस सर्कुलर में बताया गया कि अब सीसीटीवी कैमरों की सुरक्षा से जुड़ी जाँच एक ही तरीके से होगी और इसके लिए STQC यानी मानक परीक्षण औऱ गुणवत्ता सर्टिफिकेशन की जाँच को जरूरी बनाया गया है, जो आवश्यक आवश्यकताओं के ढाँचे के तहत होगी।

सरकार ने दो अहम नियमों को आपस में जोड़ दिया है। पहला है अनिवार्य पंजीकरण आदेश और दूसरा है मेक इन इंडिया के तहत सरकारी खरीद में प्राथमिकता देने वाला नियम। अब इन दोनों के लिए अलग-अलग प्रक्रिया की जरूरत नहीं होगी। एक ही STQC की सुरक्षा जाँच रिपोर्ट दोनों नियमों का पालन करने के लिए काफी होगी। इस फैसले से पहले जो भ्रम की स्थिति थी, वह अब खत्म हो जाएगी और नियमों को लागू करना भी ज्यादा सख्त और आसान हो जाएगा।

यह बात समझना बहुत जरूरी है कि इस सर्कुलर में साफ कर दिया गया है कि सुरक्षा सर्टिफिकेशन का संबंध मेक इन इंडिया के तहत होनो वाली वैल्यू एडिशन यानी स्थानीय हिस्सेदारी की शर्तों से अलग है। आसान शब्दों में कहें तो अगर कोई उत्पाद लोकलाइजेशन यानी देश में बनने के मानकों को पूरा भी करता है, तब भी यह सुरक्षा जाँच से बच नहीं सकता।

यहाँ इंटरनेट से जुड़े उपकरणों के लिए बनने वाली सर्टिफिकेशन योजना यानी IoT सिस्टम सर्टिफिकेशन स्कीम की अहम भूमिका होती है। सीसीटीवी कैमरे भी IoT डिवाइस माने जाते हैं, यानी ये इंटरनेट से जुड़े उपकरण हैं। इसलिए इनकी जाँच सिर्फ हार्डवेयर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि साइबर सुरक्षा के लिए नजरिए से भी इनकी कड़ी जाँच होती है। इस व्यवस्था के तहत ऐसे उपकरणों को कई सख्त मानकों पर खरा उतरना होता है, जैसे संरक्षित संचार प्रणाली, डाटा को सुरक्षित रखने के लिए एन्क्रिप्शन, छेड़छाड़ से बचाव और हार्डवेयर तक पहुँच को नियंत्रित रखना।

IoT से जुड़े नियमों में यह भी साफ किया गया है कि SQTC सर्टिफिकेट सभी ऐसे उपकरणों पर एक समान तरीके से लागू होगा। इसका मतलब यह है कि कोई भी निर्माता अलग-अलग नियमों का फायदा उठाकर जाँच से बच नहीं सकता। इससे सरकार को भी अलग-अलग क्षेत्रों में जाँच की प्रक्रिया और सर्टिफिकेशन के तरीके को एक जैसा बनाने में मदद मिलेगी।

सरकार ने उन कंपनियों के नाम भी सार्वजनिक कर दिए हैं जिन्हें यह क्लियरेंस सर्टिफिकेट मिल चुका है। इसके साथ ही हर कंपनी का प्रमाणपत्र PDF के रूप में वेबसाइट पर भी जारी किया गया है, जिसे लोग आसानी से देख सकते हैं।

2025 में सरकार ने सर्टिफिकेशन की समय सीमा बढ़ाने से किया इनकार

साल 2025 में सरकार ने सर्टिफिकेशन की समय सीमा बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया था और यहीं से बाजार में आ रहे मौजूदा बदलाव की नींव पड़ी। उसी समय सरकार ने सीसीटीवी कैमरों की जाँच का दायरा बढ़ाकर सिर्फ हार्डवेयर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सॉफ्टवेयर और यहाँ तक कि सोर्स कोड स्तर तक की जाँच को भी इसमें शामिल कर लिया।

जैसा कि मई 2025 में ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया था, निर्माताओं को अपने उपकरणों को सरकारी लैब में गहनता से सुरक्षा जाँच के लिए जमा करना अनिवार्य कर दिया गया था। इस जाँच में फर्मवेयर का विश्लेषण, एन्क्रिप्शन यानी डाटा को सुरक्षित रखने के तरीके की पड़ताल और उन संभावित कमजोरियों की पहचान शामिल थी, जिनके जरिए कोई दूर से सिस्टम तक पहुँच बना सकता है या डाटा चोरी कर सकता है।

उस समय कई निर्माताओं ने इस फैसले पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि इससे प्रक्रिया में देरी होगी, जाँच का बोझ बढ़ेगा और उनके गोपनीय सोर्स कोड पर भी खतरा आ सकता है। उद्योग से जुड़े संगठनों ने यह भी चेतावनी दी थी कि इससे आर्थिक नुकसान हो सकता है और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर भी असर पड़ेगा। लेकिन सरकार ने इन नियमों में किसी तरह की ढील देने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि यह कदम देश की सुरक्षा से जुड़े एक गंभीर मुद्दे को ध्यान में रखकर उठाया गया है।

इन नियमों के तहत अधिकारियों को यह अधिकार भी दिया गया कि वे जरूरत पड़ने पर भारत के बाहर स्थित निर्माण इकाइयों का भी निरीक्षण कर सकते हैं। साथ ही कंपनियों के लिए यह जरूरी कर दिया गया कि वे अपने उपकरणों में मजबूत सुरक्षा फीचर्स शामिल करें, जैसे डाटा को सुरक्षित रखने के लिए एन्क्रिप्शन, मालवेयर यानी हानिकार सॉफ्टवेयर की पहचान और उसे रोकने की व्यवस्था और सुरक्षित संचार प्रणाली।

सरकार ने सीसीटीवी इकोसिस्टम में मौजूद कमजोरियों को लेकर जताई चिंता

सीसीटीवी से जुड़े डाटा की सुरक्षा को लेकर चिंता कोई नई बात नहीं है। साल 2021 में लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने पहले ही विदेशी कंपनियों के सर्विलांस सिस्टम से जुड़ी कमजोरियों की ओर इशारा किया था। इससे साफ होता है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार लंबे समय से सीसीटीवी सिस्टम के जरिए होने वाले संभावित डाटा लीक को रोकने की कोशिश कर रही है।

सरकार ने यह भी बताया था कि सरकारी संस्थानों में लगे करीब 10 लाख सीसीटीवी कैमरे चीनी कंपनियों से खरीदे गए थे। सरकार ने माना कि इन उपकरणों के जरिए रिकॉर्ड किया गया वीडियो डाटा विदेशों में मौजूद सर्वर तक भेजा जा सकता है, जिससे सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं।

सरकार ने उस समय सिस्टम में मौजूद कमियों की ओर इशारा करते हुए कहा था कि जोखिम को कम करने के लिए कुछ कदम उठाए गए हैं, जैसे संदिग्ध URL और IP एड्रेस को फिल्टर करना। इसके अलावा मौजूदा कानूनों के तहत आयात को नियंत्रित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए भी उपाय किए गए कि सभी उपकरण भारतीय सुरक्षा मानकों का पालन करें।

इन शुरुआती चेतावनियों ने आगे चलकर नियमों को सख्त बनाने की नींव रखी। इससे यह साफ संकेत मिला कि सरकार लंबे समय से ऐसी नीति पर काम कर रही है, जिसका मकसद निगरानी से जुड़े ढाँचे को ज्यादा सुरक्षित बनाना है।

गैजेट में जारी अधिसूचना, जिसने सीसीटीवी सिस्टम को हमेशा के लिए बदला

मौजूदा नियमों की पूरी व्यवस्था की कानूनी नींव 9 अप्रैल 2024 को जारी किए गए गैजेट के नोटिफिकेशन पर टिकी हुई है। इस नोटिफिकेशन के जरिए सरकार ने औपचारिक रूप से सीसीटीवी कैमरों को अनिवार्य पंजीकरण व्यवस्था के तहत शामिल कर लिया।

इस अधिसूचना में इलेक्ट्रॉनिक्स और IT उपकरणों से जुड़े आदेश में बदलाव किया गया और सीसीटीवी कैमरों को ऐसी श्रेणी में रखा गया, जिनकी बिक्री से पहले जरूरी सर्टिफिकेशन लेना अनिवार्य होगा। इसके तहत भारतीय सुरक्षा मानकों का पालन करना और नए लागू किए गए जरूरी सुरक्षा नियमों को मानना भी जरूरी कर दिया गया।

इसका मुख्य मकसद यह है कि सीसीटीवी सिस्टम हर स्तर पर सुरक्षित हों। इसमें हार्डवेयर, फर्मवेयर, नेटवर्क और सप्लाई चेन सभी शामिल हैं। ये नियम सिर्फ सामान्य गुणवत्ता जाँच तक सीमित नहीं हैं, बल्कि साइबर सुरक्षा को मजबूत बनाने पर खास ध्यान देते हैं।

निर्माताओं के लिए यह जरूरी कर दिया गया है कि वे अपने उपकरणों में मजबूत फिजिकल सुरक्षा सुनिश्चित करें। इसका मतलब है कि डिवाइस का ढाँचा ऐसा हो जो आसानी से खोला या छेड़ा न जा सके, ताकि कोई भी व्यक्ति अंदर के हिस्सों तक बिना अनुमति पहुँच न बना सके। सॉफ्टवेयर के स्तर पर भी सख्त नियम लागू किए गए हैं, जैसे मजबूत लॉगिन सिस्टम, अलग-अलग लोगों के लिए सीमित और तय पहुँच और समय-समय पर अपडेट देना।

सबसे अहम बात डाटा की सुरक्षा से जुड़ी है। कैमरों से भेजा जाने वाला वीडियो डाटा एन्क्रिप्शन यानी सुरक्षित तरीके से भेजा जाना जरूरी है, ताकि कोई बीच में उसे देख या बदल न सके। इसके अलावा डिवाइस को इस तरह तैयार करना होगा कि वह साइबर हमलों का सामना कर सके। इसके लिए पहले से जाँच की जाती है, जिसमें सिस्टम की कमजोरियों को परखा जाता है।

सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया में कंपनियों को अपने उत्पाद से जुड़ी पूरी तकनीकी जानकारी देनी होती है। इसमें सिस्टम का ढाँचा कैसे काम करता है, फर्मवेयर की जानकारी और सुरक्षा से जुड़े नियम शामिल होते हैं। साथ ही यह भी साबित करना होता है कि डिवाइस सुरक्षित तरीके से शुरू होता है, उसके सॉफ्टवेयर के साथ छेड़छाड़ नहीं हो सकती और किसी तरह का छिपा हुआ बैकडोर एक्सेस मौजूद नहीं है।

एक और अहम शर्त सप्लाई चेन की पारदर्शिता से जुड़ी है। निर्माताओं को यह बताना जरूरी है कि उनके उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले जरूरी पुर्जे, जैसे चिपसेट, कहाँ से आए हैं और यह भी साबित करना होगा कि वे भरोसेमंद स्रोतों से लिए गए हैं। खासकर चीनी पुर्जों को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच यह नियम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

नोटिफिकेशन में डिवाइस की पूरी लाइफ साइकिल की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है। इसका मतलब है कि उपकरणों में सुरक्षित तरीके से फर्मवेयर अपडेट होने चाहिए, पुराने और कमजोर वर्जन पर वापस जाने की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए और सॉफ्टवेयर से जुड़ी सभी जानकारियों और कमजोरियों का रिकॉर्ड भी रखा जाना जरूरी है।

जाँच की प्रक्रिया उन मान्यता प्राप्त लैब में होती है, जिन्हें भारतीय मानक ब्यूरो ने मंजूरी दी होती है। किसी भी उत्पाद को तब तक सर्टिफिकेशन नहीं मिलता, जब तक वह इन सभी परीक्षणों में सफल नहीं हो जाता। इसके बाद ही उसे भारतीय बाजार में बेचने की अनुमति दी जाती है।

कुल मिलाकर, इस अधिसूचना ने सीसीटीवी कैमरों को सिर्फ निगरानी करने वाले साधारण उपकरण से आगे बढ़ाकर एक सख्त नियमों के तहत आने वाले डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बना दिया है, जहाँ सुरक्षा, पारदर्शिता और पूरी जानकारी देना अनिवार्य हो गया है।

बिना निगरानी वाले सीसीटीवी नेटवर्क राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा क्यों पैदा करते हैं?

खतरे की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में केंद्रीय एजेंसियों ने देशभर के बड़े शहरों में लगे सीसीटीवी नेटवर्क का ऑडिट कराने का आदेश दिया है। यह निर्देश उस समय जारी किया गया जब पाकिस्तान से जुड़े एक जासूसी गिरोह का पर्दाफाश हुआ। न्यूज 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं थी। जाँच में सामने आया कि इस जासूसी नेटवर्क ने सिर्फ पहले से लगे कैमरों का फायदा ही नहीं उठाया, बल्कि संवेदनशील जगहों पर अपने गुप्त कैमरे भी लगा दिए थे, जिनमें दिल्ली कैंट रेलवे स्टेशन और सोनीपत रेलवे स्टेशन जैसे इलाके शामिल हैं।

इनमें से कुछ कैमरों में सोलर पावर सिस्टम भी लगाया गया था. ताकि बिना रुके लगातार लाइव फुटेज मिलती रहे। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, यह फुटेज सीमा पार बैठे ISI से जुड़े लोगों तक भेजी जा रही थी। इसके बाद केंद्रीय एजेंसियों ने पुलिस और अन्य सुरक्षा इकाइयों को निर्देश दिया है कि वे खुद मौके पर जाकर जाँच करें, बिना अनुमति लगे कैमरों की पहचान करें और यह भी देखें कि मौजूद सिस्टम में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम हैं या नहीं।

दरअसल, सीसीटवी कैमरे सिर्फ अपराध रोकने के साधन नहीं होते। अगर इनसे समझौता हो जाए। तो यही कैमरे दुश्मन के लिए खुफिया जानकारी जुटा का जरिया बन सकते हैं। अलग-अलग एजेंसियों, ठेकेदारों और स्थानीय निकायों द्वारा बिना एक समान निगरानी व्यवस्था के लगाए गए कैमरों का बिखरा हुआ नेटवर्क कई ऐसी कमजोरियाँ पैदा करता है, जिनका फायदा दुश्मन देश, आतंकी संगठन या जासूसी करने वाले लोग उठा सकते हैं।

निगरानी से जुड़े ढाँचे में अगर सेंध लग जाए तो उसका खतरा सिर्फ कल्पना तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया में इसके खतरनाक उदाहरण सामने आ चुके हैं। ऑपइंडिया की पहले की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल ने कई सालों तक ईरान के ट्रैफिक कैमरा नेटवर्क और मोबाइल सिस्टम में घुसपैठ कर वहाँ के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई और उनकी सुरक्षा टीम की गतिविधियों पर नजर रखी थी, उस हमले से पहले जिसमें उनकी मौत हुई बताई जाती है।

बताया जाता है कि इस निगरानी के जरिए इजरायली एजेंसियों ने सुरक्षाकर्मियों, ड्राइवरों और बडे़ अधिकारियों की हरकतों को ट्रैक किया। उन्होंने यह भी समझ लिया कि सुरक्षित परिसर के अंदर गाड़ियाँ कहाँ और कैसे खड़ी होती हैं, लोग किन रास्तों से आते जाते हैं और सुरक्षा में लगे लोगों की दिनचर्या क्या है। इन सब जानकारियों को इकट्ठा करके एक तरह से पूरा डाटा तैयार किया गया।

रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि ट्रैफिक कैमरों से मिलने वाला डाटा सुरक्षित करके इजरायल के सर्वर तक भेजा गया, जबकि आसपास के मोबाइल नेटवर्क में भी दखल देकर किसी तरह की चेतावनी को देर से पहुँचाने या रोकने की कोशिश की गई।

यह उदाहरण दिखाता है कि अगर कैमरों में सेंध लग जाए, तो वे जंग के स्तर की खुफिया जानकारी जुटाने का साधन बन सकते हैं। इससे लोगों की आदतें, उनकी दिनचर्या, कमजोरियाँ और सही अहम बातें पता चल जाती हैं। जब इसे सिग्नल इंटरेस्पशन, डाटा एनालिसिस और मानव खुफिया जानकारी के साथ जोड़ा जाता है, तो दुश्मन के लिए निशाना तय करना और सटीक हमला करना आसान हो जाता है।

इसलिए भारत के लिए यह सिर्फ तकनीकी नियमों का पालन करने या कागजी प्रक्रिया भर का मामला नहीं है। यह देश की संप्रभुता, जासूसी के खिलाफ सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंबीर मुद्दा है। अगर निगरानी का नेटवर्क सुरक्षित नहीं है या उसकी सही तरीके से जाँच नहीं होती, तो यह सिर्फ एक छोटी सी चूक नहीं बल्कि दुश्मन के लिए एक बड़ा मौका बन सकता है।

सिर्फ बाजार में बदलाव नहीं, बल्कि पूरे ढाँचे में बड़ा परिवर्तन

पिछले कुछ सालों में सरकार द्वारा लिए गए फैसलों का असर अब साफ तौर पर दिखने लगा है और इसी वजह से भारत के निगरानी सिस्टम में एक बड़ा ढाँचागत बदलाव आ गया है। जो शुरुआत में सिर्फ डाटा सुरक्षा की चिंता से शुरू हुआ था, वह अब पूरे नियमों के मजबूत ढाँते में बदल चुका है। यह ढाँचा सप्लाई चेन को नया रूप दे रहा है, देश में निर्माण को बढ़ावा दे रहा है और बिना जाँची परखी विदेशी तकनीक पर रोक लगा रहा है।

हालाँकि, इस बदलाव के कारण शुरुआत में लागत बढ़ी है और कुछ समय के लिए दिक्कतें भी आई हैं, लेकिन इसके साथ ही भारतीय कंपनियों के लिए बड़े मौके भी पैदा हुए हैं। आने वाले सालों में इस बाजार के तेजी से बढ़ने की उम्मीद है, जिसमें घरेलू निर्माता मजबूत पकड़ बना सकते हैं।

(यह रिपोर्ट मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

असम में फिर ‘कमल’ की मजबूत आहट, HM अमित शाह के गुवाहाटी रोड शो ने दिए नतीजों के संकेत

असम की राजनीति में 2026 विधानसभा चुनाव से पहले गुवाहाटी में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का रोड शो एक साधारण राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनादेश की दिशा का संकेत बनकर उभरा है। सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब यह स्पष्ट करता है कि असम की जनता विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता के उस मॉडल को पुनः स्वीकार करने के लिए तैयार है, जिसे मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बीते सालों स्थापित किया है।

यह रोड शो केवल भीड़ का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक सशक्त राजनीतिक संदेश था असम में NDA की वापसी लगभग तय है। अमित शाह द्वारा 90 से अधिक सीटों का दावा किसी अतिशयोक्ति से अधिक एक जमीनी सच्चाई का प्रतिबिंब प्रतीत होता है।

हिमंता मॉडल: विकास और राष्ट्रवाद का संतुलन

असम में भाजपा की सफलता का सबसे बड़ा आधार ‘हिमंता मॉडल’ है। यह मॉडल केवल सड़कों, पुलों और बुनियादी ढाँचे के विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कानून-व्यवस्था की मजबूती, घुसपैठ के खिलाफ कठोर कार्रवाई और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा भी शामिल है।

हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में असम ने शिक्षा, स्वास्थ्य और निवेश के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। मेडिकल कॉलेजों की संख्या में वृद्धि, इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार और उद्योगों को आकर्षित करने की नीतियां राज्य को एक नई दिशा दे रही हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा सरकार ने वर्षों से चले आ रहे ‘अवैध घुसपैठ’ के मुद्दे को राजनीतिक साहस के साथ उठाया। यह वही मुद्दा था जिसे पूर्ववर्ती सरकारें वोट बैंक की राजनीति के कारण नजरअंदाज करती रहीं। आज NDA सरकार इस चुनौती का समाधान करने के लिए प्रतिबद्ध दिखती है।

अमित शाह का स्पष्ट संदेश: नेतृत्व में कोई भ्रम नहीं

भारतीय राजनीति में अक्सर यह देखा गया है कि चुनावों के समय पार्टियाँ मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर असमंजस में रहती हैं। लेकिन भाजपा ने इस मामले में स्पष्टता दिखाई है। अमित शाह ने साफ कहा कि हिमंता बिस्वा सरमा ही अगली बार भी मुख्यमंत्री होंगे।

यह स्पष्टता मतदाताओं में विश्वास पैदा करती है। जनता जानती है कि वह किसे चुन रही है और किसके नेतृत्व में राज्य आगे बढ़ेगा। यही भाजपा की चुनावी रणनीति की सबसे बड़ी ताकत है।

विपक्ष की कमजोर स्थिति

असम में विपक्ष विशेषकर कॉन्ग्रेस आज पूरी तरह दिशाहीन नजर आती है। न तो उनके पास कोई मजबूत नेतृत्व है और न ही कोई स्पष्ट एजेंडा। आंतरिक कलह और लगातार हो रहे दलबदल ने कॉन्ग्रेस को और कमजोर कर दिया है।

जहाँ भाजपा ‘विकास + सुरक्षा + अस्मिता’ का स्पष्ट नैरेटिव लेकर मैदान में है, वहीं विपक्ष केवल आलोचना तक सीमित है। जनता अब केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि ठोस परिणाम चाहती है और यह परिणाम NDA सरकार ने देकर दिखाए हैं।

भीड़ नहीं, जनसमर्थन का संकेत

गुवाहाटी रोड शो में उमड़ी भीड़ को केवल ‘इवेंट मैनेजमेंट’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। असम जैसे राज्य में जहाँ राजनीतिक जागरूकता काफी गहरी है, वहाँ इस तरह की स्वतःस्फूर्त भागीदारी जनता के मनोभाव को दर्शाती है।

यह भीड़ उस विश्वास का प्रतीक है जो लोगों ने भाजपा और उसके नेतृत्व में जताया है। यह वही विश्वास है जो 2021 में सत्ता दिलाकर लाया था और अब 2026 में उसे और मजबूत करने की दिशा में अग्रसर है।

असम: NDA की पूर्वोत्तर रणनीति का केंद्र

असम केवल एक राज्य नहीं, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत की राजनीति का केंद्र है। यहां की जीत का सीधा असर अरुणाचल, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय जैसे राज्यों पर पड़ता है।

अमित शाह का रोड शो इस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जहाँ भाजपा पूर्वोत्तर को विकास और राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ने के अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की अवधारणा को जमीन पर उतारने में असम की भूमिका निर्णायक है।

निष्कर्ष: जनता का झुकाव स्पष्ट

गुवाहाटी रोड शो ने यह स्पष्ट कर दिया है कि असम की जनता अब स्थिरता, विकास और मजबूत नेतृत्व के पक्ष में खड़ी है। भाजपा और NDA ने जो वादे किए थे, उन्हें काफी हद तक पूरा किया है और यही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है।

अमित शाह का आत्मविश्वास, हिमंता बिस्वा सरमा की लोकप्रियता और संगठन की मजबूती इन तीनों का संयोजन भाजपा को एक बार फिर सत्ता तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त दिखाई देता है।

यदि वर्तमान रुझान कायम रहता है, तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 2026 में असम में फिर एक बार ‘कमल’ पूरी मजबूती के साथ खिलेगा और यह केवल राजनीतिक जीत नहीं, बल्कि विकास और राष्ट्रवाद के मॉडल की पुनः पुष्टि होगी।

इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए हिंदू महिलाओं से रेप करना ‘जन्नत’ का रास्ता, दीन के नाम पर घटिया से घटिया अपराध करने को तैयार: MP के इस मामले से समझिए इनकी मानसिकता

हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को ‘गालिब’ ये खयाल अच्छा है

याने भले ही जन्नत की सच्चाई कुछ भी हो, लेकिन इंसान को खुश रहने के लिए किसी न किसी उम्मीद की जरूरत होती है। मिर्जा गालिब का ये शेर ‘जन्नत’ के अस्तित्व का सच जाहिर कर रहा है। वह कहते हैं कि जन्नत का यह ‘खयाल’ एक सुंदर भ्रम है जो दिल को तसल्ली देता है।

लेकिन इस्लामी कट्टरपंथी ‘जन्नत’ शब्द को इस्लाम की दीन मानते हैं, जहाँ हर उस ‘अपराध’ को जगह मिली है जिससे जन्नत नसीब हो। इसी चाहत में इस्लामी कट्टरपंथी अलग-अलग ‘अपराधों’ में शामिल होने से नहीं कतराते। इसमें सबसे पहले हिंदू लड़कियों से रेप को सबाब माना गया, पकड़े गए मुस्लिम अपराधियों का कहना था कि ‘अगर हम हिंदू लड़कियों का बलात्कार करेंगे, तो अल्लाह हमें जन्नत देगा।’

तो इसी ‘जन्नत’ को नसीब करने के चक्कर में कोई अल्लाह के नाम पर, तो कोई कुरान के नाम पर, जिसमें हिंदुओं को ‘काफिर’ कहा गया है, लग जाता है ‘अपराध’ करने। अगर हिंदू लड़की से रेप करने वाले को जन्नत नसीब होगी, तो उसकी बहन और सहेली या फिर उसके अम्मी-अब्बू भी अपनी जन्नत के टिकट मिलने से पीछे नहीं हटेंगे, वो भी लग जाएँगे किसी न किसी तरीके से उसकी मदद करने में।

ताजे मामले में मध्य प्रदेश के गुना में ब्यूटी पार्लर चलाने वाली यास्मीन खान अपने शौहर शरीफ खान के लिए हिंदू लड़कियों का बंदोबस्त करती थी। कोर्स सिखाने के बहाने घर बुलाती थी, कोल्ड ड्रिंक में नशीली दवा मिलाकर खिलाती और सौंप देती अपने शौहर को, जो उनके साथ घंटों-घंटों तक बलात्कार करता।

जब शरीफ खान बलात्कार करता था, तो बीवी यास्मीन खान गेट पर पहरा देती थी, लड़कियों का इंतजाम भी वही करवाती थी। यहाँ तक कि शरीफ खान का भाई मुवीन खान भी इसमें शामिल था। सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि यास्मीन खान और उसके शौहर ने ‘जन्नत’ नसीब करने के लिए हिंदू लड़कियों का बलात्कार किया।

‘जन्नत’ के लिए हिंदू लड़किया रेप करने वाले मुस्लिम

ऐसा कहने के पीछे वजह भी है। क्योंकि इससे पहले भी ऐसे ही मामलों में कई अपराधी कबूल चुके हैं कि उनकी इस्लामी दीन के मुताबिक, यह गलत नहीं है और ऐसा करने से उन्हें जन्नत नसीब होगी।

बैंगलोर में ताहा राजी ने हिंदू बनकर हिंदू युवती को फँसाया और उसका रेप किया। और इस अपराध को कुरान की कई आयतों का हवाला देकर सही ठहराया, जिसमें लिखा है, “अगर किसी मुस्लिम को किसी काफिर और मू्र्तिपूजक को सही रास्ते पर लाने और उसका धर्म परिवर्तन कराने के लिए उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी पड़े, तो इस तरह का दुर्व्यवहार या प्रताड़ना गलत नहीं माना जाएगा।”

साल 2022 में मध्य प्रदेश की एक हिंदू युवती का अफजल और उसके दोस्त प्रिंस रेप किया। जब युवती ने बताया कि वह 6 महीने की प्रेग्नेंट है, तब अफजल ने कहा कि उनके मजहब में चलता है और कहा कि ‘हिंदू महिलाओं संग यौन संबंध बनाने से उन्हें जन्नत नसीब’ होगी।

साल 2023 में इंदौर में तीन मुस्लिम युवकों ने 13 साल की नाबालिग लड़की का गैंगरेप किया। और जब पुलिस ने इसकी वजह पूछी तो, उनमें से एक आरोपित शेरूखान ने कहा, “अगर वह हिंदू लड़की के साथ संबंध बनाएगा तो उसे जन्नत नसीब होगी।”

पिछले साल 2025 में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया। जहाँ मुरादाबाद में 14 साल की दलित बच्ची का अपहरण कर 2 महीने तक करने वाले मुस्लिमों ने कबूल किया कि उन्हें इस इस्लामी जिहाद के लिए पैसा मिलता था और इससे जन्नत मिलेगी।

अपराधियों को परिवार का संरक्षण, भाई-बहन-दोस्तों का साथ

इन अपराधियों को परिवार का भी पूरा संरक्षण मिलता है। कई मामले सामने आते हैं, जिसमें मुस्लिम युवक हिंदू लड़कियों को लव जिहाद में फँसाकर घर ले आता है और घर में उसके अम्मी-अब्बू और भाई-बहन उस हिंदू लड़की को जबरन गोमांस खिलाते हैं, उसके साथ मारपीट करते हैं और यहाँ तक कि रेप भी करते हैं। ऐसे कई मामलों में पीड़िता की कोई सहेली या परिचित भी अपराधियों से मिले होते हैं।

साल 2021 में सामने आए लव जिहाद और धर्मांतरण के मामले में आरोपित मोनिश कुरैशी ने एमए की छात्रा को अपने झाँसे में लेकर उसे किसी रिश्तेदार के घर ले गया। यहाँ मोनिश की तीन बहनों और बहनोई ने मिलकर हिंदू छात्रा का उत्पीड़न किया।

लखनऊ से सामने आए मामले में हिंदू पीड़िता की दोस्त शाकिबा ने उसका रेप करवाया। शाकिबा ने पीड़िता को किसी बहाने से अपने फ्लैट बुलाया और अपने लिव इन पार्टनर अली से रेप करवाया। इस दौरान दोस्त शाकिबा ने उसका वीडियो बनाया।

वहीं साल 2025 में लखनऊ में भी यही बात सामने आई। जहाँ हिंदू लड़की को उसकी मुस्लिम सहेली रीना बानो ने अपने जाल में फँसाया। दोस्ती गहरी करने के बाद रीना ने हिंदू लड़की को अपने घर बुलाया और ससुराल के रिश्तेदार हैदर नाम के आदमी को सौंप दिया। हैदर ने तमंचे की नोक पर हिंदू लड़की से रेप किया। फिर रीना बानो और हैदर ने पीड़ितो को जाने से मारने की धमकी दी।

ये कुछ गिने-चुने मामले हैं। जहाँ इस्लामी कट्टरपंथी ‘जन्नत’ की चाहत और कुरान का हवाला देकर हिंदू लड़कियों का रेप करते हैं और इस अपराध में उनके घरवाले और दोस्त उनका साथ देकर इसे सबाब का काम मानते हैं।

इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए ‘जन्नत’ मिलने के मायने

इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए ‘जन्नत’ का खयाल लाहिजा एक भ्रम जैसा ही है। उनका मानना है कि जन्नत सबसे अच्छी जगह है, जहाँ 72 हूरें मिलेंगी। मौलवी भी यही बताते हैं कि हूरें इतनी खूबसूरत होती हैं कि चमक के आगे सूरज भी फेल होता है। यह भी दावा किया जाता है कि हूर को शौच-पेशाब तक नहीं लगता। वे जन्नत पाने वालों के साथ हमबिस्तरी करती हैं।

जन्नत मिलने के इसी जुनून में वे सारे काम करने को तैयार होते हैं, जो उन्हें इन 72 हूरों से मिलवा सकता है। यानी लक्ष्य एक यही है- महिलाओं के साथ यौन संबंध बनाना। यहाँ जन्नत के ख्वाब देखते हुए भी वे हिंदू लड़कियों से रेप करते हैं और ख्वाब भी सिर्फ हूरों के साथ हमबिस्तर होने के देखते हैं।

‘जन्नत’ की हकीकत सामने रख दो, तो भी नहीं मानेंगे

दरअसल, इस्लाम की दीन में ही ‘जन्नत’ और ’72 हूरों’ का जिक्र होने का दावा किया जाता है। और यही दीन लेकर मुस्लिम जन्नत जाने का जुनून सवार कर लेते हैं। हिंदुओं को काफिर मानने लगते हैं और जन्नत जाने के लिए ये लोग घटिया से घटिया काम करने के लिए भी तैयार रहते हैं।

इन्हें नहीं परवाह क्राइम रेट की, न इन्हें परवाह इंसानियत की, इनके लिए मजहब से ऊपर कुछ नहीं है। जन्नत मिलेगी कहकर काफिरों के खिलाफ कुछ भी करो। हिंदुओं के खिलाफ बद से बदतर हिंसा भी इन्हें अपराध नहीं लगता है, उल्टा पकड़ने पर मजहब का हवाला देते हैं। फिर भी कुछ सेकुलर लोग मानने को तैयार नहीं कि दोष मजहब में है।

मिर्जा गालिब बहुत पहले ही समझ चुके हैं कि ये इस्लामी कट्टरपंथ भ्रम में जीते हैं। इनके लिए जन्नत की हकीकत सामने लाकर रख दो, तो भी ये नहीं मानेंगे। क्योंकि इनके लिए गैर मजहबी महिलाओं के खिलाफ हिंसा और हमबिस्तर होना जन्नत का रास्ता है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा ईरान भेज रहा 20 बड़े ऑयल टैंकर, पाकिस्तान कर रहा इतने ही जहाज को हॉर्मुज स्ट्रेट से निकलवाने का दावा: क्या US के लिए तेल निकाल रहा आतंकिस्तान?

ईरान और इजरायल-अमेरिका युद्ध के बाद से होर्मुज स्ट्रेट से तेल और गैस आने में दिक्कत आ रही है। इस बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान अमेरिका को 20 तेल टैंकर भेज रहा है। उनके मुताबिक, ये टैंकर सोमवार (30 मार्च 2026) सुबह से होर्मुज के रास्ते गुजरना शुरू करेंगे और हर दिन दो टैंकर यहाँ से निकलेंगे। कुछ ऐसा ही दावा पाकिस्तान ने भी किया है।


पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने भी पाकिस्तान के झंडे तले 20 ऑयल टैंकर के होर्मुज स्ट्रेट से निकालने पर ईरान की मंजूरी की बात कही है। अब सवाल ये उठता है कि ये पाकिस्तान के झंडे लगे तेल टैंकर अमेरिका के हैं या पाकिस्तान के, जिसका दावा राष्ट्रपति ट्रंप कर रहे हैं।

इससे पहले भी राष्ट्रपति ट्रंप दावा कर चुके हैं कि पाकिस्तानी झंडे वाले जहाजों के जरिए उन्होंने 10 टैंकर तेल होर्मुज स्ट्रेट से निकलवाया है। इस पर ईरान ने कड़ी आपत्ति दर्ज की थी।

20 पाकिस्तानी झंडे वाला टैंकर होर्मुज स्ट्रेट से निकलेंगे- डाक

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा है कि ईरान ने 20 और पाकिस्तानी झंडे लगे जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की इजाजत दे दी है। एक्स पर उन्होंने पोस्ट शेयर करते हुए इसे ‘शांति का संकेत’ कहा।

खास बात है कि पाक विदेश मंत्री ने पोस्ट को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विदेश मंत्री मार्को रुबियो, अमेरिकी राजदूत स्टीव विटकॉफ और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची को भी टैग किया है। इस पोस्ट को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया ट्रूथ पर शेयर भी किया है।

पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डाक ने अपने पोस्ट में लिखा है कि उन्हें ये खबर शेयर करते हुए बेहद खुशी हो रही है कि ईरान सरकार ने पाकिस्तानी झंडे वाले 20 और जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने की इजाजत दे दी है। इसके तहत 2 पाकिस्तानी जहाजें यहाँ से हर दिन गुजरेंगी।

पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने ईरान के कदम का स्वागत करते हुए इसे उपयोगी और सराहनीय कहा। साथ ही इसे शांति का एक संकेत बताया, जो पश्चिम एशिया में स्थिरता लाएगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान का ‘गिफ्ट’ कहा

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान ने अमेरिका को तेल से लदे 20 जहाज होर्मुज स्ट्रेट से भेजे हैं। उन्होंने कहा कि वह इस कदम को परिभाषित तो नहीं कर सकते, लेकिन उन्हें लगता है कि सम्मान के रूप में ईरान ने 20 ऑयल टैंकर भेजे हैं। ये जहाज सोमवार (30 मार्च 2026) की सुबह से निकलना शुरू कर रहा है। ये कुछ दिनों तक चलेगा।

अब पाकिस्तान के विदेश मंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की बात को एक साथ देखा जाए, तो ये पता चलता है कि 20 ऑयल से लदे जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से निकलना शुरू हो गए हैं। लेकिन सवाल यही है कि पाकिस्तानी झंडे तले निकल रहा ये जहाज वाकई पाकिस्तान का है या सचमुच ईरान ने अमेरिका को ‘गिफ्ट’ भेजा है। ये भी हो सकता है कि पिछली बार की तरह अमेरिका का तेल पाकिस्तान अपना बता कर ईरान से मंजूरी ले ली हो और ये ऑयल टैंकर होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित निकाल रहा हो। वैसे पाकिस्तान इस युद्ध को खत्म करने में मध्यस्थता के नाम पर दलाल की भूमिका ही निभा रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप के ‘Kissing My A**’ बयान पर बवाल, भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों की प्रतिक्रिया से क्यों छिड़ी ‘उम्मा बनाम राष्ट्र’ की बहस?

मिडिल ईस्ट की जटिल राजनीति में एक और बड़ा मोड़ तब आया, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ने कुछ बेहद खुलकर और विवादित बयान दिए। फ्लोरिडा में आयोजित फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए ट्रंप ने सऊदी अरब के वास्तविक शासक और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के साथ अपने रिश्तों को लेकर तीखी टिप्पणी की। उनका एक बयान वायरल हो गया, जिसमें उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में सऊदी नेता ‘Kissing my a**’ कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल में अमेरिका की वापसी को लेकर एक बातचीत का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि MBS को इतनी मजबूत अमेरिकी वापसी की उम्मीद नहीं थी। ट्रंप ने कहा, “उसे नहीं लगा था कि ऐसा होगा… उसे नहीं लगा था कि वो मेरी खुशामद करेगा… उसे लगा था कि मैं भी एक कमजोर अमेरिकी राष्ट्रपति ही रहूँगा… लेकिन अब उसे मेरे साथ अच्छा व्यवहार करना पड़ रहा है।” हालाँकि इन तीखे शब्दों के साथ ट्रंप ने MBS की तारीफ भी की और उन्हें ‘शानदार इंसान’ और ‘योद्धा’ बताया।

ये बयान ऐसे समय में आए हैं जब अमेरिका और इज़राइल, 28 फरवरी से ईरान के खिलाफ एक बड़े सैन्य अभियान में लगे हुए हैं। The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार, अंदरखाने MBS ट्रंप को इस युद्ध को जारी रखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और इसे ईरान को कमजोर करने का ‘ऐतिहासिक मौका’ बता रहे हैं। हालांकि, सार्वजनिक तौर पर सऊदी अरब ने शांति की बात की है और अपने सीमाओं की सुरक्षा पर ध्यान दिया है। इसके बावजूद ट्रंप के इस बयान ने खासकर भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम समुदाय में नाराजगी पैदा कर दी।

भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों की प्रतिक्रिया

भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों की प्रतिक्रिया तेज रही और ‘उम्मा’ (वैश्विक मुस्लिम समुदाय) की भावना से जुड़ी हुई दिखी। पत्रकार सबा नकवी ने 28 मार्च को X पर एक लंबा पोस्ट लिखा। उन्होंने अपने पोस्ट में अल-कायदा आतंकी ओसामा बिन लादेन का जिक्र किया और सऊदी शासकों को ‘मक्का और मदीना के दो पाक मस्जिदों का संरक्षक’ कहा।

उन्होंने लिखा, “ओसामा बिन लादेन सऊदी अरब से निकला था, पहले सोवियत संघ के खिलाफ जिहाद के लिए और बाद में अपने ही देश के अमेरिका के करीब होने के खिलाफ। 9/11 हमले में कई सऊदी शामिल थे।” 9/11 जैसे आतंकी हमले को ‘ऑपरेशन’ कहना इस घटना को वैध ठहराने जैसा माना गया।

नक़वी यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने सऊदी शाही परिवार के भारत दौरे का जिक्र करते हुए कहा कि वे अक्सर गाँधी समाधि या सूफी दरगाहों पर नहीं जाते। लेकिन उनका मुख्य सवाल था, “क्या दो पाक मस्जिदों के संरक्षक इस अपमान को नजरअंदाज कर सकते हैं?” उनके शब्दों से ऐसा लगा कि वे धार्मिक आधार पर प्रतिक्रिया भड़काने की कोशिश कर रही हैं।

यह नाराजगी तेजी से फैली। X पर सक्रिय सानिया सैयद ने लिखा, “शर्मनाक और घटिया! ट्रंप सऊदी क्राउन प्रिंस के लिए बेहद अपमानजनक भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या आप अपने सबसे बड़े सहयोगी देश के नेता के लिए ऐसे बोलते हैं?” इस तरह की प्रतिक्रियाओं में सऊदी नेता का अपमान, पूरी मुस्लिम दुनिया का अपमान माना गया।

पाकिस्तान में भी प्रतिक्रिया तेज रही। एक पाकिस्तानी पत्रकार ने ट्रंप का वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने कहा, “उसे नहीं लगा था कि वो मेरी खुशामद करेगा… अब उसे मेरे साथ अच्छा रहना होगा।” इस वीडियो को साझा करने का मकसद सऊदी नेतृत्व के कथित अपमान को दिखाना था।

पाकिस्तानी यूजर फैसल राँझा ने आर्थिक पहलू उठाते हुए कहा कि सऊदी अरब ने अमेरिका में भारी निवेश किया है, फिर भी ट्रंप उनका मजाक उड़ा रहे हैं। उन्होंने लिखा, “उम्मा को इससे सीख लेनी चाहिए और इस तरह की बदतमीजी से आगे बढ़ना चाहिए।” इस बयान में ‘उम्मा’ को प्राथमिकता दी गई।

खामेनेई के लिए शोक यानी सीमाओं से परे वफादारी

यह रुझान तब और साफ दिखा जब ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की मौत के बाद भारत के कुछ हिस्सों में शोक मनाया गया। खामेनेई अक्सर भारत की आलोचना करते थे, लेकिन उनकी मौत पर जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और मुंबई में शोक प्रदर्शन हुए।

कश्मीर के लाल चौक में प्रदर्शनकारियों ने उन्हें ‘शेर’ बताया और कहा कि उनके जैसे और लोग पैदा होंगे। इमामबाड़ों पर काले झंडे लगाए गए, जो आमतौर पर करबला जैसी बड़ी धार्मिक त्रासदी में ही किया जाता है।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्रों ने ग़ायबाना नमाज-ए-जनाजा पढ़ी। एक्टिविस्ट एसएम ताहिर हुसैन ने कहा कि कई लोगों के लिए खामेनेई सिर्फ शिया नेता नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम समुदाय का प्रतीक थे। यह दिखाता है कि ‘उम्मा’ से जुड़े नेताओं के लिए भावनात्मक प्रतिक्रिया काफी मजबूत होती है।

ईरान के लिए जकात और पहलगाम पर चुप्पी

‘उम्मा’ को प्राथमिकता देने का एक और उदाहरण कश्मीर में देखा गया, जहाँ ईरान के समर्थन में लोग घर-घर जाकर चंदा जुटा रहे हैं। लोगों ने सोना, पैसा और यहाँ तक कि मवेशी तक जकात (दान) में दे दिए। एक महिला ने 30 साल से रखा सोना दान कर दिया, जबकि गांदरबल के एक युवक ने अपनी Royal Enfield बाइक बेच दी।

एक स्थानीय निवासी ने कहा, “ईरान पर इस युद्ध से भारी तबाही हुई है, दुनिया को कम से कम मदद तो करनी चाहिए।”

हालाँकि यही उत्साह घरेलू घटनाओं में नहीं दिखा। पिछले साल 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए लोगों के लिए इस तरह का कोई चंदा अभियान या बड़ी मदद नहीं देखी गई।

वफादारी का सवाल

डोनाल्ड ट्रंप के MBS पर बयान, खामेनेई के लिए शोक और ईरान को दिए गए जकात… इन सभी घटनाओं में एक समान पैटर्न दिखता है। सबा नकवी जैसे लोगों के लिए उनकी प्राथमिक निष्ठा ‘उम्मा’ के साथ दिखती है, न कि अपने देश के साथ।

जब सऊदी या ईरान के नेताओं का अपमान होता है, तो इसे मजहबी स्तर पर लिया जाता है। लेकिन जब अपने ही देश में आतंकी हमले होते हैं, तो वैसी प्रतिक्रिया नहीं दिखती। इससे यह सवाल उठता है कि क्या धार्मिक पहचान और ‘उम्मा’ की भावना राष्ट्रीय एकता से ऊपर रखी जा रही है।

(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

भविष्य की लड़ाइयों के लिए तैयार है भारत, रूस से मँगाए ड्रोन किलर: जानें- तुंगुस्का सिस्टम के बारे में, जो S-400 के साथ मिलकर भारत की हवाई सुरक्षा को बनाएगा अभेद्य

चाहे मिडिल ईस्ट का मौजूदा संकट हो या कुछ समय पहले भारत द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ‘आपरेशन सिंदूर’। इन हमलों-युद्धों से एक बात को साफ नजर आ रही है कि आधुनिक युद्ध की प्रकृति बदल गई है, भारी टैंकों-सैनिकों की जगह हल्के ड्रोन ने लेनी शुरू कर दी है। खासकर सस्ते और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले ड्रोन अब किसी भी देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं।

दुश्मन देश अब ‘ड्रोन स्वार्म’ यानी एक साथ हजारों ड्रोन भेजकर डिफेंस सिस्टम को भेदने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत ने अपनी वायु रक्षा क्षमता को और मजबूत करने के लिए एक अहम फैसला लिया है।

भारत के रक्षा मंत्रालय ने रूस की सरकारी रक्षा निर्यात कंपनी JSC रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के साथ 445 करोड़ रुपए का समझौता किया है जिसके तहत भारतीय सेना के लिए 2K22M तुंगुस्का एयर डिफेंस सिस्टम (Tunguska Air Defence System) खरीदा जाएगा। यह सौदा न केवल स्ट्रैटेजिक दृष्टि से अहम है बल्कि यह डिफेंस सेक्टर में भारत-रूस के सहयोग की निरंतरता को भी दिखाता है।

बदलते युद्ध में ड्रोन बना सबसे बड़ा खतरा

अब छोटे, सस्ते और आसानी से बनाए जाने वाले ड्रोन सबसे बड़ा खतरा बनकर सामने आए हैं। ये ड्रोन बहुत कम ऊँचाई पर उड़ते हैं और अक्सर रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आते। इसी वजह से पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इन्हें पहचानना और समय रहते रोकना मुश्किल हो जाता है।

भले ही भारत के पास S-400 जैसा आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है, जो दूर से आने वाले तेज और बड़े लक्ष्यों को मार गिराने में बेहद सक्षम है लेकिन छोटे आकार और धीमी गति वाले ड्रोन इसके लिए चुनौती बन सकते हैं। ऐसे ड्रोन अचानक हमला करते हैं और संख्या में ज्यादा होने पर डिफेंस सिस्टम को भ्रम में डाल सकते हैं।

इसी समस्या को देखते हुए अब सेना अपना फोकस उन प्रणालियों पर बढ़ा रही है जो कम ऊँचाई पर उड़ने वाले खतरों को खत्म करने में माहिर हों। यानी ऐसे सिस्टम जो तेजी से प्रतिक्रिया दे सकें और छोटे लक्ष्यों को भी सटीकता से निशाना बना सकें।

तुंगुस्का इसी तरह की एक खास प्रणाली है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह ड्रोन, हेलीकॉप्टर और क्रूज मिसाइल जैसे खतरों को आसानी से पहचानकर तुरंत नष्ट कर सके। खास बात यह है कि यह नजदीकी दूरी पर भी बेहद प्रभावी तरीके से काम करती है।

तुंगुस्का: मिसाइल और गन का घातक मिक्स

तुंगुस्का प्रणाली की सबसे बड़ी ताकत इसका अनोखा ‘हाइब्रिड’ डिजाइन है। आसान शब्दों में समझें तो यह एक ही प्लेटफॉर्म पर दो तरह के हथियारों का इस्तेमाल करती है- मिसाइल और तेज रफ्तार गन। यही वजह है कि यह अलग-अलग दूरी और परिस्थितियों से आने वाले खतरों से एकसाथ निपट सकती है।

इसमें इस्तेमाल होने वाली 9M311 श्रेणी की मिसाइलें करीब 8 से 10 किलोमीटर तक दूर मौजूद लक्ष्य को मार सकती हैं और लगभग 3500 मीटर की ऊँचाई तक उड़ रहे खतरों को भी खत्म कर सकती हैं। यानी अगर कोई दुश्मन हेलीकॉप्टर, ड्रोन या क्रूज मिसाइल थोड़ी दूरी से हमला करने की कोशिश करता है तो ये मिसाइलें उसे रास्ते में ही रोक सकती हैं।

इसके अलावा, इसमें लगी दो 30 मिमी की ऑटोमैटिक गन इसकी ताकत को और बढ़ा देती हैं। ये गन इतनी तेज हैं कि एक मिनट में लगभग 5000 गोलियाँ दाग सकती हैं। इसका मतलब है कि अगर कोई छोटा या तेज लक्ष्य बहुत करीब आ जाए जैसे ड्रोन या लो-फ्लाइंग मिसाइल तो यह सिस्टम तुरंत फायरिंग करके उसे नष्ट कर सकता है।

कुल मिलाकर तुंगुस्का को ऐसे समझा जा सकता है जैसे सुरक्षा की आखिरी ढाल। जब दूर की मिसाइलें काम कर चुकी होती हैं और खतरा नजदीक पहुँच जाता है, तब यह सिस्टम तेजी से प्रतिक्रिया देकर दुश्मन के हमले को वहीं खत्म कर देता है। यही वजह है कि इसे ‘क्लोज-इन वेपन सिस्टम’ कहा जाता है और मौजूदा वक्त के युद्ध के बदलते हालातो में इसकी भूमिका और अहम हो जाती है।

रडार, ट्रैकिंग के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में बढ़त

तुंगुस्का में 360 डिग्री कवरेज वाला अत्याधुनिक रडार सिस्टम लगा होता है जो करीब 18 किलोमीटर की दूरी तक हवाई लक्ष्यों का पता लगा सकता है। इसके साथ डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम जुड़ा होता है और यह लक्ष्य को सटीकता के साथ ट्रैक कर उसे नष्ट करने में मदद करता है।

इसकी एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग की स्थिति में भी काम कर सकता है। यदि दुश्मन रडार सिस्टम को बाधित करने की कोशिश करता है तो यह ऑप्टिकल ट्रैकिंग के जरिए लक्ष्य पर निशाना साध सकता है। यह क्षमता आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के माहौल में इसे और अधिक विश्वसनीय बनाती है।

युद्धक्षेत्र में गतिशीलता और रणनीतिक उपयोग

तुंगुस्का को ट्रैक्ड आर्मर्ड चेसिस पर लगाया गया है जिससे यह टैंक और अन्य बख्तरबंद वाहनों के साथ कठिन इलाकों में भी आसानी से चल सकता है। यह प्रणाली युद्धक्षेत्र में लगातार मूव करती सेना के साथ तालमेल बनाए रखते हुए उन्हें हवाई खतरों से सुरक्षा प्रदान करती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रणाली भारत के मल्टी लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम में एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करेगी। यह न केवल अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों की रक्षा करेगी बल्कि बड़े एयर डिफेंस सिस्टम और महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को भी सुरक्षा प्रदान करेगी।

सैन्य आधुनिकीकरण का हिस्सा

यह सौदा ऐसे समय में हुआ है जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद ने करीब 2.38 लाख करोड़ रुपए के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी है। प्रस्तावों में सिर्फ एयर डिफेंस सिस्टम ही नहीं बल्कि टैंक के लिए आधुनिक गोला-बारूद, उन्नत संचार नेटवर्क, धनुष तोप और ऐसी निगरानी प्रणालियाँ भी शामिल हैं जो बिना रनवे के काम कर सकती हैं। साफ है कि सेना को हर मोर्चे पर मजबूत करने की व्यापक तैयारी चल रही है।

तुंगुस्का प्रणाली की खरीद को सिर्फ एक साधारण रक्षा सौदे के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह इस बात का संकेत है कि भारत अब युद्ध के बदलते रूप को समझते हुए अपनी रणनीति को अपडेट कर रहा है। पहले जहाँ युद्ध बड़े टैंकों, लड़ाकू विमानों और पारंपरिक हथियारों पर आधारित होते थे तो वहीं अब तकनीक और ड्रोन के असीमित खतरों का दौर है।

भारत पर हमले की प्लानिंग, जम्मू-कश्मीर पर कब्जे की चाहत: US कॉन्ग्रेस की रिपोर्ट में पाकिस्तान बेस्ड टेरर इकोसिस्टम के एजेंडे का भंडाफोड़

अमेरिकी कॉन्ग्रेस में 25 मार्च 2026 को एक रिपोर्ट पेश की गई, जिसने एक बार फिर पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियों के हब होने की भूमिका को उजागर किया गया है। रिपोर्ट में पाकिस्तान की जमीन से चलने वाले कई आतंकवादी संगठनों की पहचान की गई है, जो भारत को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं और उनका साफ लक्ष्य है जम्मू-कश्मीर को हथियाने की कोशिश।

रिपोर्ट का नाम ‘पाकिस्तान में आतंकवादी और अन्य मिलिटेंट ग्रुप्स’ था, इसमें पाकिस्तान के अंदर चल रहे आतंक पारिस्थितिकी तंत्र का स्ट्रक्चर्ड आकलन दिया गया और उन्हें उनके काम के फोकस और विचारधारा के आधार पर कैटेगरी में बाँटा गया।

कॉन्ग्रेस रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान कई गैर-राजकीय मिलिटेंट ग्रुप्स के लिए बेस भी था और टारगेट भी था, जिनमें से कई 1980 के दशक से सक्रिय थे। इसमें आगे कहा गया कि लगातार सैन्य अभियानों और काउंटर टेरर ऑपरेशन्स के बावजूद ये आतंकवादी संगठन काफी क्षमता के साथ काम करते रहे।

पाकिस्तान से चलने वाले आतंकवादी ग्रुप्स की पाँच कैटेगरी

रिपोर्ट ने पाकिस्तान से जुड़े आतंकवादी संगठनों को पाँच बड़ी कैटेगरी में बाँटा, जैसे ग्लोबली ओरिएंटेड ग्रुप्स, अफगानिस्तान ओरिएंटेड मिलिटेंट्स, भारत और कश्मीर फोकस्ड संगठन, घरेलू ओरिएंटेड ग्रुप्स और शिया कम्युनिटी को निशाना बनाने वाले अलग-अलग ग्रुप्स।

रिपोर्ट में 15 ग्रुप्स की जाँच की गई, जिनमें से 12 को अमेरिकी कानून के तहत फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन्स घोषित किया जा चुका था। इस क्लासिफिकेशन से पाकिस्तान से चलने वाले आतंकवादी संगठनों के स्केल और विविधता का पता चला। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पाकिस्तान खुद 2003 से आतंकवाद से काफी प्रभावित रहा, जिसमें मौतें 2009 में सबसे ज्यादा हुईं। लेकिन थोड़े समय की गिरावट के बाद आतंकवाद से जुड़ी मौतें फिर बढ़ गईं और 2025 में 4001 तक पहुंच गईं, जो पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा थीं।

आतंक नेटवर्क को खत्म करने में फौजी अभियानों की नाकामी

रिपोर्ट में की गई एक मुख्य बात यह थी कि पाकिस्तान के फौजी ऑपरेशन्स का आतंकवादी संगठनों के खिलाफ सीमित प्रभाव पड़ा। इसमें दावा किया गया कि बड़े-बड़े अभियान, एयर स्ट्राइक्स और बड़े पैमाने पर इंटेलिजेंस आधारित ऑपरेशन्स ने भी इन नेटवर्क को तोड़ने में नाकाम रहे।

रिपोर्ट में आगे कहा गया कि लाखों-लाख ऐसे ऑपरेशन्स किए गए। फिर भी अमेरिका और यूएन द्वारा नामित आतंकवादी संगठन पाकिस्तानी इलाके से काम करते रहे। इस निष्कर्ष ने इस्लामाबाद द्वारा किए गए काउंटर टेरर उपायों के इरादे और प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

खास बात यह कि मई 2025 में जब भारत ने पहलगाम आतंकवादी हमले के जवाब में ऑपरेशन सिंदूर के तहत आतंकवादी संगठनों के कई हबों को नष्ट किया, तो पाकिस्तानी सेना ने न सिर्फ भारतीय शहरों पर हमला करने की कोशिश की बल्कि भारतीय ऑपरेशन्स में मारे गए आतंकियों के फ्यूनरल प्रोसेसन में भी हिस्सा लिया।

इसके अलावा रिपोर्ट्स में सुझाव दिया गया कि पाकिस्तान आतंकवादी आउटफिट्स को भारतीय स्ट्राइक्स में नष्ट हुए इंफ्रास्ट्रक्चर को फिर से बनाने में मदद कर रहा था। जबकि अमेरिकी कॉन्ग्रेस की रिपोर्ट ने पाकिस्तान द्वारा आतंकवादी संगठनों को स्पॉन्सर करने की भूमिका को स्पष्ट रूप से विस्तार से नहीं बताया, लेकिन पिछले एक साल में जो हुआ उससे पहले से भी ज्यादा साफ हो गया कि पाकिस्तानी अधिकारी खुद देश में बढ़ते आतंकवादी समस्या के लिए जिम्मेदार थे।

भारत और कश्मीर फोकस्ड आतंकवादी ग्रुप्स

रिपोर्ट ने भारत को निशाना बनाने वाले आतंकवादी संगठनों पर काफी जोर दिया। रिपोर्ट में नाम लिए गए सबसे प्रमुख ग्रुप्स में लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन, हरकत-उल-मुजाहिदीन और हरकत-उल-जिहाद इस्लामी शामिल थे।

लश्कर-ए-तैयबा, जिसके नेता हाफिज सईद हैं, को एक बड़ी और अच्छी तरह से संगठित संस्था बताया गया जिसमें कई हजार आतंकवादी थे। यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत और पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर में आधारित था और प्रतिबंधों से बचने के लिए अपना नाम बदलकर जमात-उद-दावा कर लिया था। रिपोर्ट ने 2008 के मुंबई आतंकवादी हमलों में इसकी भूमिका और कई अन्य बड़े हमलों को याद किया।

जैश-ए-मोहम्मद, जिसकी स्थापना 2000 में मसूद अजहर ने की, को जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की कोशिश करने वाला एक और मुख्य ग्रुप बताया गया। करीब 500 हथियारबंद आतंकियों के साथ यह ग्रुप भारत, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में काम करता था। 2001 में भारतीय संसद पर हमले में इसकी भूमिका भी बताई गई।

पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के शहरी केंद्रों से काम करने वाले हरकत-उल-मुजाहिदीन को 1999 में इंडियन एयरलाइंस फ्लाइट आईसी 814 के हाइजैकिंग से जोड़ा गया। इस घटना ने आखिरकार मसूद अजहर की रिहाई का रास्ता खोला, जिसने बाद में जैश-ए-मोहम्मद की स्थापना की।

हिजबुल मुजाहिदीन को जम्मू-कश्मीर में काम करने वाले सबसे पुराने मिलिटेंट ग्रुप्स में से एक बताया गया, जिसमें 1500 तक कैडर थे। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इसके सदस्य मुख्य रूप से ‘एथनिक कश्मीरी’ थे जो या तो आजादी चाहते थे या पाकिस्तान में शामिल होना चाहते थे।

हालाँकि भारतीय सुरक्षा विश्लेषकों ने ऐसे चरित्रणों का बार-बार विरोध किया, उन्होंने बताया कि जम्मू-कश्मीर ऑपरेशन्स में निष्क्रिय किए गए काफी संख्या में आतंकियों की जड़ें मुख्य भूमि पाकिस्तान में थीं, खासकर पंजाब से।

रिपोर्ट में तथ्यात्मक गलतियाँ भी हैं

रिपोर्ट ने विस्तृत ओवरव्यू दिया, लेकिन कुछ विवरणों ने सटीकता पर सवाल खड़े किए। उदाहरण के लिए, जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर को ‘कश्मीरी मिलिटेंट लीडर’ बताया गया, जबकि वे पाकिस्तान के पंजाबी मूल के माने जाते हैं।

इसी तरह हिजबुल मुजाहिदीन के कैडर्स को मुख्य रूप से ‘एथनिक कश्मीरी’ बताना कश्मीर में काउंटर टेरर ऑपरेशन्स की जमीनी हकीकत से पूरी तरह मेल नहीं खाता। ऐसी असंगतियां बाहरी आकलनों की सीमाओं को उजागर करती हैं जो पुरानी या अधूरी जानकारी पर निर्भर हो सकते हैं।

ग्लोबली ओरिएंटेड आतंकवादी ग्रुप्स और क्षेत्रीय लिंकेज

रिपोर्ट ने पाकिस्तान से चलने वाले ग्लोबली ओरिएंटेड मिलिटेंट संगठनों की भी जाँच की, जिसमें अल कायदा और उसके सहयोगी शामिल थे। अल कायदा, जिसकी स्थापना 1988 में हुई, सालों तक काफी कमजोर होने के बावजूद कई पाकिस्तान आधारित ग्रुप्स से लिंकेज बनाए रखे हुए था।

इसका क्षेत्रीय सहयोगी 2014 में बना अल कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट पाकिस्तान के अंदर हमलों और सैन्य संपत्तियों के खिलाफ प्रयासों में शामिल पाया गया।

एक और बड़ा इकाई जिस पर जोर दिया गया वह इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रांत था, जो मुख्य रूप से अफगानिस्तान में काम करता है लेकिन पाकिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के पूर्व सदस्यों और अन्य मिलिटेंट गुटों के जरिए मौजूदगी बनाए रखता है।

अफगानिस्तान ओरिएंटेड नेटवर्क और सेफ हेवन की चिंताएँ

रिपोर्ट ने पाकिस्तानी इलाके से चलने वाले अफगानिस्तान फोकस्ड मिलिटेंट ग्रुप्स की लंबे समय से मौजूदगी का जिक्र किया। अफगान तालिबान, जिसने 2021 में अफगानिस्तान में सत्ता वापस हासिल की, को ऐतिहासिक रूप से क्वेटा, कराची और पेशावर जैसे शहरों से काम करते बताया गया।

एक और मुख्य ग्रुप हक्कानी नेटवर्क को पाक-अफगान बॉर्डर के पास ऑपरेशनल लिंकेज वाला बताया गया और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से जुड़ा माना गया, जिसका इस्लामाबाद ने इनकार किया।

आतंकियों को पालने-पोसने वाली नीतियाँ भी उजागर

रिपोर्ट ने घरेलू ओरिएंटेड आतंकवादी ग्रुप्स जैसे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को भी उजागर किया, जिसे पाकिस्तान के अंदर काम करने वाला सबसे घातक मिलिटेंट संगठन बताया गया। 2500 से 5000 लड़ाकों की अनुमानित ताकत के साथ यह ग्रुप पाकिस्तानी राज्य को उखाड़ फेंकने और शरिया कानून लागू करने की कोशिश कर रहा था।

इसके अलावा बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और जैश अल-अदल जैसे एथनिक सेपरेटिस्ट ग्रुप्स और लश्कर-ए-जहंगवी और सिपाह-ए-सहाबा पाकिस्तान जैसे सेक्टेरियन आउटफिट्स को भी नाम दिया गया, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से शिया कम्युनिटी को निशाना बनाया।

वैश्विक जाँच के केंद्र में पाकिस्तान

रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान अपने काउंटर टेरर रिकॉर्ड के लिए अंतरराष्ट्रीय जाँच के दायरे में बना रहा। इसमें कहा गया कि देश को 2018 में इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम एक्ट के तहत ‘कंट्री ऑफ पार्टिकुलर कंसर्न’ घोषित किया गया था और तब से हर साल इसे बनाए रखा गया।

इसने अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की 2023 की कंट्री रिपोर्ट्स ऑन टेररिज्म का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान ने आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए कुछ कदम उठाए, लेकिन कुछ मदरसों के जरिए उग्रवादी विचारधारा को बढ़ावा देने वाली कट्टरता को लेकर चिंताएँ बनी रहीं।

अमेरिकी कॉन्ग्रेस द्वारा पेश की गई रिपोर्ट ने लंबे समय से चली आ रही वैश्विक आकलन को मजबूत किया कि पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों की एक बड़ी रेंज को होस्ट और सपोर्ट करता है, जिनमें से कई सीधे भारत को निशाना बनाते हैं और जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीय बदलाव की कोशिश करते हैं।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

47 देशों की 140 फिल्में… दिल्ली का सिनेमाई महोत्सव राजधानी को बनाएगा ‘ग्लोबल फिल्म हब’, IFFD से पर्यटन-कारोबार-अर्थव्यवस्था को मिलेगी रफ्तार

दिल्ली हमेशा से ही सिनेमा का गवाह रही है। लुटियंस दिल्ली की चौड़ी सड़कें, चांदनी चौक की चहल-पहल और पुरानी दिल्ली की संकरी गलियाँ-हर जगह कहानियाँ बसी हैं। अब राजधानी इस रिश्ते को और गहरा बनाने जा रही है। 25 से 31 मार्च 2026 तक दिल्ली सरकार मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और कला-संस्कृति विभाग की महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत International Film Festival Delhi (IFFD) 2026 का आयोजन कर रही है। भारत मंडपम सहित शहर के कई स्थानों पर यह उत्सव चल रहा है।

यह महोत्सव सिर्फ फिल्में दिखाने तक सीमित नहीं है। यह दिल्ली को वैश्विक सिनेमा का केंद्र बनाने का प्रयास है। देश-विदेश के अभिनेता, निर्देशक, निर्माता और फिल्म प्रेमी एक मंच पर आ रहे हैं। इससे न सिर्फ फिल्म निर्माण को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि दिल्ली का पर्यटन भी नई ऊँचाइयों को छू सकेगा।

उद्घाटन समारोह: क्या रहा अनुभव?

25 मार्च को भारत मंडपम में लाल कालीन बिछाई गई। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने उत्सव का उद्घाटन किया। हेमामालिनी, शर्मिला टैगोर, कंगना रानौत, अर्जुन कपूर, निमरत कौर, विक्की कौशल, भूमि पेडनेकर जैसी कई हस्तियाँ मौजूद रहीं। उद्घाटन समारोह की पहली फिल्म ‘सिरात’ (Sirât) थी।

मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए, ऑडियो-विजुअल प्रस्तुति ने भारतीय सिनेमा की यात्रा दिखाई। लेकिन उद्घाटन सत्र पूरी तरह जादू नहीं बिखेर पाया। एंकर के टेलीप्रॉम्प्टर में गड़बड़ी हुई, माइक अचानक बंद हो गया। दर्शकों की संख्या भी कम थी। बड़े मंच पर कलाकारों का प्रदर्शन प्रभावित हुआ। तालियाँ और दर्शकों की प्रतिक्रिया किसी भी कलाकार के उत्साह को दोगुना कर देती है, लेकिन वहाँ यह कमी महसूस हुई।

ये गलतियाँ पहला प्रयास होने के कारण स्वाभाविक हो सकती हैं। लेकिन इतने बड़े आयोजन में ऐसी कमियाँ नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं। जो एजेंसी इस उत्सव को संभाल रही है, अगर उसमें कोई कमी रही हो तो दिल्ली सरकार को अगले दिनों में उसके साथ बेहतर समन्वय करना चाहिए। गलतियों को सुधारने का पूरा मौका मिलना चाहिए।

उत्सव की खासियत और कार्यक्रम

IFFD 2026 में 47 देशों की 140 से अधिक फिल्में दिखाई जा रही हैं। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्में, डॉक्यूमेंट्री, शॉर्ट फिल्में, एनिमेशन और हाइब्रिड फॉर्मेट शामिल हैं। भारत मंडपम, पीवीआर-आईनॉक्स थिएटर, पब्लिक स्पेस, आउटडोर लोकेशन और मोबाइल एलईडी यूनिट्स पर स्क्रीनिंग हो रही हैं।

सभी कार्यक्रम मुफ्त हैं, लेकिन जगह की सीमा के कारण पहले से रजिस्ट्रेशन जरूरी है। वेबसाइट https://www.iffdelhi.com/ पर रजिस्ट्रेशन चल रहा है।

मुख्य आकर्षण

  • CineXchange: फिल्म मार्केट जहां फिल्मकार अपनी परियोजनाएँ पिच कर सकते हैं, डील हो सकती है।
  • मास्टरक्लास और पैनल चर्चाएँ: मनोज बाजपेयी, अनुपम खेर, बोमन ईरानी, इम्तियाज अली, शेखर कपूर, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, भूमि पेडनेकर जैसी हस्तियाँ शामिल हैं।
  • क्लासिक फिल्में: गुरु दत्त की जन्म शताब्दी पर ‘प्यासा’ की 4K रिस्टोर्ड वर्जन सहित कई पुरानी फिल्में दिखाई जा रही हैं। शोले की रिस्टोर्ड प्रिंट भी स्क्रीन पर लौट रही है।
  • महिला फिल्मकारों पर फोकस: ‘Her Lens’ जैसी पहल से महिलाओं की फिल्मों को जगह मिल रही है।
  • सांस्कृतिक संध्या: सोनम कालरा, अशीष विद्यार्थी, रिकी केज जैसी कलाकारों के कार्यक्रम।

असम की कई फिल्में भी चयनित हुई हैं, जैसे ‘मोरोमोर देउता’, ‘गनाराग’ आदि। इससे क्षेत्रीय सिनेमा को बढ़ावा मिल रहा है।

दिल्ली के लिए क्यों जरूरी है यह उत्सव?

दिल्ली लंबे समय से राजनीति और प्रशासन का केंद्र रही है। अब वह कला और संस्कृति का भी केंद्र बनना चाहती है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा, “सिनेमा भाषा और सीमाओं से परे लोगों को जोड़ता है। इस उत्सव के माध्यम से दिल्ली मुंबई, पुणे और गोवा के साथ कदम मिलाकर चलना चाहती है।”

कला, संस्कृति और पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने इसे ‘ऐतिहासिक पहल’ बताया। उन्होंने कहा कि दिल्ली अब सिर्फ प्रशासनिक राजधानी नहीं, बल्कि रचनात्मकता का केंद्र बन रही है। यह उत्सव दिल्ली फिल्म पॉलिसी का प्रमुख हिस्सा है। इससे स्थानीय व्यवसायों, होटलों, परिवहन और पर्यटन को फायदा होगा। फिल्मकारों, आलोचकों और दर्शकों की आमद से दिल्ली की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। साथ ही, नए फिल्मकारों और युवा प्रतिभाओं को मंच मिलेगा।

चुनौतियाँ और भविष्य की राह

पहले दिन की कुछ कमियाँ सामने आईं। लेकिन अब अगले पाँच दिन तय करेंगे कि यह उत्सव भारत के बेहतरीन फिल्म महोत्सवों में शुमार होगा या नहीं। आंतरिक तैयारी को मजबूत करने की जरूरत है। दर्शकों की संख्या बढ़ानी होगी, तकनीकी गड़बड़ियों पर नियंत्रण रखना होगा और कार्यक्रमों को और आकर्षक बनाना होगा।

यह आयोजन अब हर साल होना है। पहली बार की गलतियों से सबक लेकर अगली बार इन्हें दोहराया नहीं जाना चाहिए। दिल्ली सरकार और संबंधित एजेंसियों को बेहतर समन्वय से काम करना होगा।

अगर यह उत्सव सफल रहा तो दिल्ली ग्लोबल फिल्म हब बन सकती है। दुनिया भर के फिल्मकार यहाँ आना पसंद करेंगे। कहानियाँ बनेगी, सहयोग बढ़ेगा और दिल्ली एनसीआर की सिनेमाई पहचान मजबूत होगी।

एक सुनहरा अवसर

IFFD 2026 दिल्ली के लिए सिर्फ एक फिल्म उत्सव नहीं, बल्कि एक सपने की शुरुआत है। फिल्मी चमक, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पर्यटकों की भीड़ से राजधानी सिनेमाई धमाके का गवाह बनेगी।

गलतियाँ होंगी, लेकिन उनकी चर्चा इसलिए जरूरी है ताकि भविष्य में सुधार हो और यह उत्सव हर साल और भव्य रूप ले। दिल्ली को विश्व स्तर का फिल्म केंद्र बनाने का यह सुनहरा मौका है। इसे सही दिशा में ले जाना हम सबकी जिम्मेदारी है।

आयोजन 31 मार्च तक जारी रहेगा। आइए, दिल्ली वाले मिलकर इसे सफल बनाने में अपना योगदान दें। दिल्ली अब सिनेमा की नई राजधानी बनने की ओर बढ़ रही है।

सड़कों पर लाखों लोग, व्हाइट हाउस में भिड़े अधिकारी और गिरती अप्रूवल रेटिंग: जानें- ईरान युद्ध कैसे बन रहा ट्रंप के गले की फाँस

ईरान युद्ध में फँसे ट्रंप अब अपने देश में भी घिरते नजर आ रहे हैं। उनकी नीतियों के खिलाफ अमेरिका के कई शहरों में जोरदार प्रदर्शन हो रहा है। प्रदर्शनकारियों ने इसे ‘नो किंग्स’ विरोध कहा है।

‘नो किंग्स’ का मतलब क्या है

अमेरिका में ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन का यह तीसरा दौर है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का विरोध कर रहे हैं। इन नीतियों में ईरान के साथ युद्ध, संघीय इमीग्रेशन कानून, फ्यूल की बढ़ती कीमत के साथ साथ देश में बढ़ रही महँगाई हैं।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप हम पर एक तानाशाह की तरह राज करना चाहते हैं, लेकिन यह अमेरिका है। यहाँ असली ताकत आम लोगों के हाथों में है, न कि उन लोगों के हाथों में जो खुद को राजा समझना चाहते हैं और न ही उनके अरबपति साथियों के हाथों में है।

अमेरिका के न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन DC और लॉस एंजिल्स सहित हर बड़े शहर में ट्रंप विरोधी प्रदर्शन हुए हैं।

28 मार्च 2026 को राजधानी वॉशिंगटन DC के डाउनटाउन की सड़कों पर मार्च निकाला गया। प्रदर्शनकारियों ने लिंकन मेमोरियल की सीढ़ियों पर कतार लगा कर खड़े हुए और ट्रंप की नीतियों का विरोध किया।

राष्ट्रपति ट्रंप, जेडी वेंस समेत कई लोगों की गिरफ्तारी की माँग

प्रदर्शनकारियों ने ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस समेत कई प्रशासनिक अधिकारियों के पुतले लहराए और उन्हें पद से हटाने के साथ-साथ गिरफ्तार करने की माँग की।

‘नो किंग्स’ विरोध प्रदर्शनों का असर सबसे ज्यादा मिनेसोटा में दिखा, जहाँ जनवरी में फेडरल इमिग्रेशन एजेंट्स ने रेनी निकोल गुड और एलेक्स प्रेटी नाम के दो अमेरिकी नागरिकों की हत्या कर दी थी। उनकी मौत से लोगों में भारी गुस्सा भड़का और ट्रंप प्रशासन की इमिग्रेशन नीतियों का पूरे देश में विरोध शुरू हुआ।

देश विदेश में हो रहे प्रदर्शनों को व्हाइट हाउस ने जनता की आवाज मानने से इनकार कर दिया। इनका कहना है कि यह वामपंथी फंडिंग का नेटवर्क है। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता के मुताबिक, यह ‘ट्रंप डेरेजमेंट थेरेपी सेशंस’ (ट्रंप-विरोधी पागलपन के सत्र) है। उन्होंने कहा कि इन प्रदर्शनों की परवाह सिर्फ वे रिपोर्टर करते हैं, जिन्हें इन्हें कवर करने के लिए पैसे मिलते हैं।

ट्रंप की रेटिंग में आ रही गिरावट

अमेरिका में ट्रंप की लोकप्रियता और रेटिंग लगातार गिर रही है। हालाँकि कई सर्वे अलग अलग रेटिंग दे रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, अमेरिका में एप्रूवल रेटिंग वैश्विक घटनाओं के लेकर घरेलू मुद्दों तक की वजह से होती है, जो हमेशा बदलती रहती है। हालाँकि अमेरिका में बढ़ती महँगाई, फ्यूल की कमी आम लोगों को काफी परेशान कर रही है। इसका असर रेटिंग पर पड़ा है।

सिल्वर बुलेट के मुताबिक, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का अभी सबसे खराब रेटिंग है। ईरान युद्ध , व्यापार, टैरिफ और इमिग्रेशन से लेकर महँगाई को लेकर जनता राष्ट्रपति ट्रंप से नाराज है।

रॉयटर्स या इप्सोस सर्वे के मुताबिक, अमेरिका में मात्र 37 फीसदी लोग ही युद्ध का समर्थन कर रहे हैं जबकि 59 फीसदी इसके खिलाफ हैं। खास बात है कि डेमोक्रेट और स्वतंत्र वोटर तो इसका विरोध कर ही रहे हैं। 5 में से 1 रिपब्लिकन भी युद्ध के विरोध में हैं। ईरान में अमेरिका सेना भेजने के खिलाफ जनता का मत है।

व्हाइट हाउस में फूट पड़ा

इस सब के बीच व्हाइट हाउस में ईरान युद्ध को लेकर सिरफुटव्वल है। जानकारी के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप की अपनी टीम में ही इस समय दो गुट बन गए हैं और दोनों के बीच जबरदस्त खींचतान चल रही है।

एक गुट उन लोगों का है जो देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति को संभालते हैं। इनका कहना है कि अगर यह युद्ध और लंबा खिंचा, तो पेट्रोल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। उन्हें डर है कि अगर आम जनता को महँगा पेट्रोल खरीदना पड़ा, तो वे ट्रंप के खिलाफ हो जाएँगे और उनका समर्थन करना बंद कर देंगे। इसलिए, ये सलाहकार ट्रंप को समझा रहे हैं कि हमें अब युद्ध रोक देना चाहिए और दुनिया से कह देना चाहिए कि हमने अपना काम पूरा कर लिया है।

वहीं दूसरी तरफ, ट्रंप की टीम में कुछ ऐसे नेता भी हैं जो युद्ध को जारी रखने के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि अगर अभी हमला रोक दिया गया, तो ईरान इसे अपनी जीत समझेगा और बहुत जल्द परमाणु बम बना लेगा। उन्हें डर है कि अधूरा छोड़ा गया काम आगे चलकर अमेरिकी सैनिकों के लिए और भी बड़ा खतरा बन सकता है। उनका तर्क है कि ईरान को अभी पूरी तरह कमजोर करना जरूरी है।

अब राष्ट्रपति ट्रंप इन दोनों गुटों के बीच बुरी तरह फँसे हुए हैं। वे एक तरफ अपने उन समर्थकों को खुश रखना चाहते हैं जिन्होंने उन्हें इसलिए वोट दिया था क्योंकि उन्होंने दावा किया था कि वे अमेरिका को किसी नई जंग में नहीं फँसाएँगे। लेकिन दूसरी तरफ, वे दुनिया को यह भी दिखाना चाहते हैं कि वे एक मजबूत नेता है और दुश्मनों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। इसी दुविधा की वजह से वे कोई एक ठोस फैसला नहीं ले पा रहे हैं।

ईरान युद्ध में फँसे ट्रंप

दरअसल ईरान को हल्के में लेकर राष्ट्रपति ट्रंप फँस गए हैं। उन्हें अंदाजा नहीं था कि ईरान इतने दिनों तक युद्ध खींचेगा। इतना ही नहीं वह हॉर्मुज स्ट्रेट को बंद कर देगा और अमेरिका उसे खुलवाने में नाटो से मदद माँगेगा। नाटो देश अमेरिका की मदद करने से इनकार कर देंगे। यह सब अमेरिका के लिए पहली बार हुआ है, जब ब्रिटेन, फ्राँस जैसा सहयोगी देश उसकी मदद से परहेज कर रहा है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने 5 दिनों के लिए ईरानी पॉवर प्लांट पर आक्रमण नहीं करने की बात कही, लेकिन अब न तो इजरायल रुकने को तैयार है और न ही ईरान। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान युद्ध में जीत के दावे भी कर दिए। इसके जवाब में ईरान क्लस्टर मिसाइल मार रहा है। होर्मुज स्ट्रेट को रोक रखा है। अब अमेरिका के लिए युद्ध से वापस निकलने का रास्ता दिख नहीं रहा। अगर अमेरिका जमीनी कार्रवाई करता है तो उसका विरोध अमेरिका के लोग और जोर-शोर से करेंगे। एयरस्ट्राइक से बात बन नहीं रही है। ईरान के बड़े बड़े नेताओं की मौत के बाद भी युद्ध की धार कमजोर नहीं पड़ रही है, अमेरिका के लिए यही चिंता का कारण है।

ST-OBC के लिए भी हो SC जैसी स्पष्ट रेखा, इसके बिना पूरा नहीं होगा ‘सामाजिक न्याय’

अनुसूचित जाति (Scheduled Castes/SC) के लोगों के धर्मांतरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण स्पष्टता स्थापित की है। इसके अनुसार हिंदू, बौद्ध और सिख ही SC हो सकते हैं।

दुर्भाग्य से ऐसी कोई स्पष्टता अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes/ST) और अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) को लेकर नहीं है। यह दुर्भाग्य केवल धर्मांतरण तक ही सीमित नहीं है। आरक्षण जैसी उस व्यवस्था को भी खोखला कर रही है जो कथित जातीय उत्पीड़न की शिकार हिंदुओं को संरक्षण देने के नाम पर लाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा है उसका सीधा-सरल अर्थ यह है कि यदि शेड्यूल कास्ट का कोई व्यक्ति धर्म से बाहर जाता है तो उसे SC श्रेणी के लाभ मिलते नहीं रह सकते। ‘घर वापसी’ की स्थिति में भी वह कुछ शर्तों को पूरा करने के बाद ही इन लाभों का योग्य माना जाएगा।

अनुसूचित जाति के धर्मांतरित व्यक्ति को SC दर्जा फिर से पाने के लिए 3 शर्तें पूरी करनी होगी;

  • स्पष्ट साक्ष्य जो यह बताता हो कि वह व्यक्ति मूल रूप से संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत अधिसूचित जाति से संबंधित था।
  • मूल धर्म में पुन: वापसी के विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य देने होंगे। ईसाइयत या इस्लाम पूरी तरह छोड़ने का प्रमाण देना होगा। अपनी मूल जाति के रीति-रिवाज, परंपराओं और धार्मिक प्रथाओं को स्वीकार करना होगा।
  • साक्ष्य देना होगा कि उसे मूल जाति के लोग पूरी तरह स्वीकार कर चुके हैं। केवल स्वयं का दावा पर्याप्त नहीं होगा। जाति की स्वीकृति आवश्यक होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि ये तीनों शर्तें अनिवार्य है। इन्हें पूरी तरह प्रमाणित करने का दायित्व ‘घर वापसी’ करने वाले शेड्यूल कास्ट के उस व्यक्ति की ही होगी। यदि इनमें से एक भी शर्त प्रमाणित नहीं होती है तो ‘घर वापसी’ मान्य नहीं होगी।

यहीं से यह प्रश्न खड़ा होता है कि इतनी स्पष्ट शर्तें और मानदंड ST और OBC पर क्यों लागू नहीं होते? इस जवाब के अस्पष्ट उत्तर से ही ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन (Crypto Christian)’ पैदा होते हैं। इस अस्पष्टता के कारण ही OBC सूची में मुस्लिम घुसपैठ बढ़ती जा रही है। इतना ही नहीं, धर्म से बाहर जाने के बाद भी ST और OBC दर्जे का बना रहना आरक्षण के आधार में भी विकृति पैदा करती है।

परतंत्र भारत में कोल्हापुर, त्रावणकोर और मैसूर जैसी रियासतों में आरक्षण की व्यवस्था इसी नाम पर लाई गई थी कि इसके जरिए हिंदुओं की ​कथित उत्पीड़ित जातियों को संरक्षण मिलेगा। वर्तमान में जो आरक्षण की व्यवस्था है, उसका महत्वपूर्ण आधार 1932 का ‘पूना पैक्ट’ है। यह समझौता गाँधी और अंबेडकर के बीच तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेमसे मैकडॉनल्ड की साजिश को रोकने के लिए हुआ था।

हिंदुओं को विभाजित करने के उद्देश्य से मैकडॉनल्ड ने दलितों को अलग संप्रदाय की पहचान और उनके लिए अलग निर्वाचक मंडल का प्रस्ताव दिया था। लेकिन ‘पूना पैक्ट’ से यह सुनिश्चित हुआ कि अलग निर्वाचन क्षेत्र की जगह​ आरक्षित सीटों का प्रावधान किया जाए।

यह भी ध्यान रखने योग्य है कि शुरुआत में SC की परिभाषा को केवल हिंदुओं तक ही सीमित रखा गया था। बाद में इसे सिख (1956) और बौद्ध (1990) तक विस्तारित किया गया। आज भी मुस्लिम और ईसाई बने दलितों को SC का दर्जा नहीं मिलता है। इसका आधार यह है कि SC आरक्षण ‘हिंदू सामाजिक संरचना में अस्पृश्यता’ से जुड़ा है।

ऐसे में ST और OBC वर्ग में ईसाइयों और मुस्लिमों की घुसपैठ ‘पूना पैक्ट’ की मूल आत्मा पर प्रहार है। इस घुसपैठ के समर्थकों का कहना है कि ST पहचान धर्म की जगह, जनजातीय, भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं से जुड़ा हुआ है। OBC की पहचान को सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन पर आधारित बताया जाता है। 1979 के ‘मंडल कमीशन’ ने भी इसे ही अधार बनाया था।

पर यह आरक्षण की मूल भावना की ‘विकृत व्याख्या’ है और धर्म से बाहर जाने वालों के लिए दोहरे लाभ (धर्म बदलने की स्वतंत्रता+आरक्षण का लाभ) की स्थिति बनाती है। जब आरक्षण की व्यवस्था का मूल उद्देश्य हिंदू समाज के भीतर के कथित जातीय भेदभाव को खत्म करना है (आज भी इस व्यवस्था को इसी कथित आधार पर पोषित किया जा रहा है) तो फिर धर्मांतरण के बाद इस ढाँचे से बाहर जाने वाले को इसका लाभ क्यों मिलना चाहिए?

ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि अदालतें और सरकारें SC वर्ग जैसी सुरक्षा, ST और OBC वर्ग के लोगों को भी प्रदान करें या फिर जाति के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था बंद कर, उसकी जगह आरक्षण की ऐसी राष्ट्रीय नीति लाए, जिसका आधार आर्थिक और सामाजिक मानदंड ही हों। धर्म-मजहब-जाति की सीमाओं से परे।

यदि ऐसा नहीं होता है तो आरक्षण के ​जरिए ‘समावेशी सामाजिक न्याय’ का ढाँचा कभी खड़ा नहीं हो पाएगा। भले ही SC, ST और OBC के लिए अलग-अलग मानदंड, ऐतिहासिक रूप से विकसित हुए हैं, पर सत्य यही है कि आज वे अप्रासंगिक हो चुके हैं।

सामाजिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों के बीच संतुलन के मानदंड अब अलग-अलग नहीं चल सकते। उन्हें एक ही करने होंगे, क्योंकि आज के समाज में आरक्षण की बहस ‘पात्रता’ से आगे बढ़कर ‘दर्शन’ पर पहुँच चुकी है।