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केरल में मुख्यमंत्री चुनने से डर रही है कॉन्ग्रेस: जानें- मुस्लिम-ईसाई वोट बैंक, हिंदू समीकरण और बीजेपी के बढ़ते असर ने कैसे बढ़ाया दबाव

केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे आए आज 11 दिन बीत चुके हैं लेकिन राज्य में सरकार गठन को लेकर तस्वीर अब तक साफ नहीं हो पाई है। चुनाव जीतने वाला कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) अभी तक मुख्यमंत्री के चेहरे पर अंतिम फैसला नहीं कर सका है।

आमतौर पर स्पष्ट जनादेश मिलने के बाद राजनीतिक दल तेजी से नेतृत्व तय कर लेते हैं ताकि जनता के बीच स्थिरता और आत्मविश्वास का संदेश जाए। लेकिन केरल में कॉन्ग्रेस की स्थिति अलग दिखाई दे रही है।

यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में लगातार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है जिसके कारण कॉन्ग्रेस मुख्यमंत्री के नाम पर सहमति नहीं बना पा रही। इस लेख में हम आपको वो वजह बताने की कोशिश करेंगे जिसकी वजह से कॉन्ग्रेस इतने कन्फ्यूजन या कहें तो दबाव में है।

केरल की राजनीति में सामाजिक संतुलन और कॉन्ग्रेस की चुनौती

केरलम उन राज्यों में है जहाँ राजनीति सीधे सामाजिक समीकरणों से जुड़ी हुई है। यही सामाजिक समीकरण कॉन्ग्रेस का सिर दर्द बने हुए हैं। कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग ने जो केरल चुनाव जीती है वो मुस्लिमों और ईसाइयों के दम पर जीता है। इसे आँकड़ों से भी समझने की कोशिश करते हैं।

अगर आँकड़ों की बात करें तो 140 सदस्यीय केरलम विधानसभा में इस बार कुल 35 मुस्लिम विधायक चुने गए हैं, जो लगभग 25 प्रतिशत है। इनमें सबसे ज्यादा हिस्सा UDF गठबंधन के पास है, जिसमें कॉन्ग्रेस और IUML मिलाकर कुल 30 मुस्लिम विधायक हैं, यानी करीब 85.7 प्रतिशत।

अकेले IUML के 22 और कॉन्ग्रेस के 8 विधायक इस आँकड़े में शामिल हैं। दूसरी तरफ LDF गठबंधन के पास कुल 5 मुस्लिम विधायक हैं, जिनमें CPI(M) के 4 और CPI का 1 विधायक शामिल है, यानी करीब 14.3 प्रतिशत।

अगर पार्टीवार देखें तो कॉन्ग्रेस के कुल 63 विधायकों में 8 मुस्लिम विधायक हैं, जो लगभग 12.7 प्रतिशत है। IUML के सभी 22 विधायक मुस्लिम हैं, जबकि CPI(M) के 4 और CPI का 1 विधायक मुस्लिम समुदाय से आते हैं।

यहाँ हिंदू आबादी लगभग 54 प्रतिशत, मुस्लिम आबादी करीब 26 प्रतिशत और ईसाई आबादी लगभग 18 प्रतिशत मानी जाती है। ये आँकड़े जनगणना और विभिन्न आधिकारिक रिपोर्ट्स के आधार पर सामने आते रहे हैं।

अब कॉन्ग्रेस के सामने इसी समीकरण को साधना सबसे बड़ी चुनौती है। यानी वो चुनाव मुस्लिम और ईसाइयों के दम पर जीती है तो ऐसे में ये गुट अपने समुदाय का मुख्यमंत्री होने को लेकर जोर लगा रहे हैं और कॉन्ग्रेस भी इनसे दबाव में है। लेकिन वो अंतिम फैसला नहीं ले पा रही है। क्योंकि अगर वो मुस्लिम मुख्यमंत्री चुनती है तो उसके लिए राज्य के सबसे बड़े समुदाय यानी हिंदुओं को साधना मुश्किल हो जाएगा।

वहीं, अगर वो हिंदू मुख्यमंत्री चुनती है, जो शायद वो चुने भी तो फिर अल्पसंख्यकों का भरोसा कॉन्ग्रेस से एक बार फिर उठता दिखेगा और वो भी फिर CPM की और जा सकते हैं। वोटों की इस लड़ाई में बीजेपी का एक अहम खिलाड़ी बनते जाना कॉन्ग्रेस की चुनौतियों को और बढ़ा रहा है।

बीजेपी की बढ़ती मौजूदगी ने कॉन्ग्रेस की चिंता बढ़ाई

कई सालों तक केरलम को ऐसा राज्य माना जाता रहा जहाँ बीजेपी चुनावी तौर पर सीमित प्रभाव वाली पार्टी थी। लेकिन पिछले एक दशक में तस्वीर धीरे-धीरे बदली है। बीजेपी का वोट शेयर लगातार बढ़ा है।

2019 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद के चुनावों में पार्टी ने कई सीटों पर अपनी मौजूदगी मजबूत की। भले ही सीटों के हिसाब से बीजेपी को बड़ी सफलता नहीं मिली हो, लेकिन वोट प्रतिशत और संगठनात्मक विस्तार ने बाकी दलों को सतर्क जरूर किया है।

इसके पीछे RSS की लंबे समय से चली आ रही जमीनी मौजूदगी को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। केरलम उन राज्यों में रहा है जहाँ RSS ने दशकों तक कैडर आधारित नेटवर्क तैयार किया।

यही नेटवर्क अब बीजेपी के राजनीतिक विस्तार में मददगार माना जाता है। बीजेपी फिलहाल सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रही बल्कि वह खुद को कॉन्ग्रेस और वाम दलों के बीच तीसरे विकल्प से मुख्य विपक्षी ताकत में बदलने की कोशिश कर रही है।

यही कारण है कि कॉन्ग्रेस कोई ऐसा राजनीतिक संदेश नहीं देना चाहती जिससे बीजेपी को नए वोटरों के बीच जगह बनाने का मौका मिले। और ऐसे वक्त में कॉन्ग्रेस अगर किसी ईसाई या मुस्लिम चेहरे को आगे बढ़ाती है तो BJP का यह नैरेटिव और मजबूत होगा कि कॉन्ग्रेस हिंदुओं को प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से ज्यादा कुछ नहीं देना चाहती। ये बीजेपी के विस्तार से लिए एक फर्टाइल जमीन तैयार करना होगा।

पश्चिम बंगाल का उदाहरण कॉन्ग्रेस को क्यों परेशान करता है

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की बंपर विजय भी कॉन्ग्रेस को परेशान कर रही हैं। इसे पीछे एक खास वजह भी है, वो है 3 का आँकड़ा। इस चुनाव में बीजेपी ने केरल में 3 सीटें जीते हैं, ये उतनी ही सीटें हैं जितनी BJP ने 2016 के बंगाल चुनाव में जीती थीं। 10 सालों में BJP में अपनी तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। इस बार बीजेपी ने बंगाल में 293 में से 207 सीटें जीती हैं।

कॉन्ग्रेस का CM चुनने का कन्फ्यूजन बीजेपी की बढ़ती ताकत से और अधिक गंभीर हो रहा है। कॉन्ग्रेस ऐसा कोई मौका BJP या वामपंथियों को नहीं देना चाहती है जिससे उसके लिए संकट आए लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा होना लगभग असंभव है।

अब केरल में कॉन्ग्रेस के सामने एक तरफ पारंपरिक अल्पसंख्यक समर्थन को बनाए रखने की चुनौती है, दूसरी तरफ हिंदू वोटरों के बीच अपनी स्वीकार्यता मजबूत रखने की जरूरत है। इसके साथ बीजेपी का बढ़ता राजनीतिक विस्तार और बदलता चुनावी माहौल कॉन्ग्रेस की मुश्किल को और बढ़ा रहा है।

आने वाले समय में कॉन्ग्रेस किस चेहरे पर भरोसा करती है, यह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन का फैसला नहीं होगा। यह तय करेगा कि पार्टी अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को कितनी मजबूती से बचा पाती है और बदलती भारतीय राजनीति में खुद को किस तरह ढालती है। अगर देखा जाए तो कॉन्ग्रेस के सामने असली परीक्षा सिर्फ मुख्यमंत्री चुनने की नहीं बल्कि अपने पूरे सामाजिक गठबंधन को एकजुट बनाए रखने की है।

चले थे UP के आम ब्राह्मणों को बरगलाने, अब ‘सपा के ब्राह्मण’ बचाने भी हुए मुश्किल: चुनावों से पहले जो मायाजाल रच रहे थे अखिलेश यादव, राजकुमार भाटी ने उसे तोड़ा

समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने वामपंथियों के एक कार्यक्रम में ब्राह्मणों को वेश्याओं से भी बदतर बताया, खूब ठहाके लगे और वो खुद भी खिलखिलाकर हँसते दिखे। वीडियो वायरल हुआ तो चिंता वोट की हुई और फिर मासूम बनने का दिखावा करते हुए उन्होंने माफी माँग ली। अब उन्हें ब्राह्मणों की कितनी चिंता है, कितना सम्मान है, ये तो उस वीडियो और उसके रिएक्शन से साफ हो गया।

हाँ, इतना जरुर है कि सपा को और अखिलेश यादव को ब्राह्मण वोटों की तो चिंता है। फिर इसी चिंता में, या कहें तो डर में उन्हें माफी माँगने वाली वीडियो बनानी पड़ी। हालाँकि, यह माफी का वीडियो कितनी किस हद तक प्रोपेगेंडा है इसे आप हमारी इस रिपोर्ट में पढ़ सकते हैं। भाटी की इस वीडियो को अगर गहराई से समझें तो इसने सपा के उस एजेंडा को ध्वस्त कर दिया है जो पार्टी ब्राह्मण हितैषी बनने का ढोंग कर वर्षों से चला रही थी।

सपा और अखिलेश यादव लंबे समय से उत्तर प्रदेश में यह नैरेटिव गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली राज्य की सरकार ब्राह्मण विरोधी है और सपा ही ब्राह्मणों की हितैषी है। इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में सपा ने कई बार परशुराम जयंती से लेकर भगवान परशुराम की प्रतिमा और प्रबुद्ध या ब्राह्मण सम्मेलनों जैसे कार्यक्रमों का सहारा लिया। पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह ब्राह्मण समाज की झंडाबरदार है। लेकिन राजकुमार भाटी के बयान ने इस पूरे दिखावे की परतें खोलकर रख दी हैं।

खुद सपा के ब्राह्मण नेता भी भाटी के इस बयान से नाराज हैं। सपा के एक और प्रवक्ता व पूर्व मंत्री पवन पांडे ने भाटी की इस टिप्पणी पर नाराजगी जताते हुए इसे ‘ दुर्भाग्यपूर्ण और अक्षम्य’ बताया है। पवन पांडे ने लिखा, “इस प्रकार की अमर्यादित बयानबाजी न केवल राजनीतिक मर्यादाओं का उल्लंघन है बल्कि समाज में वैमनस्य फैलाने का कार्य भी करती है।” उन्होंने लिखा, “मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि ब्राह्मण समाज ने सदैव राष्ट्र, संस्कृति और समाज को दिशा देने का कार्य किया है, ऐसे समाज के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किए जा सकते।”

सपा के एक विधायक अमिताभ बाजपेई ने भी भाटी को खरी-खोटी सुनाई है। विधायक ने कहा, “भाटी बड़बोलापन कर गए, ऐसे कई नेता आते और जाते हैं!” पवन पांडे या विधायक अमिताभ की नाराजगी कोई इकलौती नहीं है, भाटी की इस टिप्पणी के खिलाफ देशभर में ब्राह्मण समाज गुस्से में है और उनके खिलाफ FIR तक कराई गई हैं। कल तक जो अलंकार अग्निहोत्री सपा और अखिलेश यादव के ‘ब्लू आइड बॉय’ थे वो आज भाटी के खिलाफ धरने पर बैठे हैं। अलंकार अग्निहोत्री अपने समर्थकों के साथ लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे और खूब हंगामा किया।

सपा के ये ब्राह्मण विरोधी चरित्र भी कोई आज का या नया नहीं है। ब्राह्मण नेता और ऊँचाहार से विधायक मनोज पांडे को योगी कैबिनेट में जगह मिली है। वो भी अखिलेश यादव के करीबी थे, उनके एक बड़े ब्राह्मण नेता के तौर पर देखा जाता था लेकिन वो अखिलेश यादव से सनातन का विरोध करने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य पर भिड़ गए। अखिलेश ने अंत साथ दिया सनातन विरोधी स्वामी प्रसाद का और मनोज पांडे को सपा छोड़नी पड़ी। एक ब्राह्मण नेता को करीब 2 साल पहले अखिलेश का यही रुख था और पार्टी की यही पॉलिसी थी जो आज तक भी जारी है।

अखिलेश यादव के कथित ब्राह्मण प्रेम के इतिहास का एक खूनी सिरा कन्नौज के नीरज मिश्रा से भी जुड़ता है। नीरज ने कभी अखिलेश यादव से टक्कर ली और 24 घंटों के भीतर उनकी सिर कटी लाश मिली थी। नीरज के भाई मुनीष मिश्रा ने इसका आरोप अखिलेश यादव पर ही लगाया था। मुनीष ने बताया था कि उनके भाई का सिर काटकर ब्रीफकेस में रख के अखिलेश यादव के पास लखनऊ भेजा गया था।

अब जाहिर है कि राजकुमार भाटी के बयान ने एक बार फिर सपा का असली चेहरा तो दिखाया ही है और उसके साथ-साथ सपा में भी आपसी फूट शुरू हो गई है। सपा के पूर्व मंत्री-प्रवक्ता से लेकर विधायक तक उनके विरोध में आ गए हैं। अब हालत यह हो गई है कि सपा को सिर्फ जनता के गुस्से का ही नहीं बल्कि अपने ही नेताओं की नाराजगी का सामना भी करना पड़ रहा है।

कहानी उस बेटी की जो NEET पेपर लीक की भोग रही ‘सजा’, बता रही खुद उसकी माँ

बचपन का सपना और दो साल की मेहनत के बाद वक्त आया NEET की परीक्षा देने का, एक बच्ची पूरी तैयारी के साथ परीक्षा देती है और सकारात्मक सोच के साथ इंतजार करती है रिजल्ट का। रिजल्ट आता है और साथ ही आता है ‘पेपर लीक’ होने की खबर। दरअसल पेपर लीक ने उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। 720 में 600 नंबर लाने वालों को भी सरकारी मेडिकल कॉलेज मिलने की उम्मीद नहीं दिख रही थी। उसे तो 550 मार्क्स आए थे। वह घोर निराशा में चली गई। उसे एमबीबीएस से कम मंजूर नहीं था इसलिए उसने काउंसलिंग में जाना भी स्वीकार नहीं किया।

यह कहानी किसी और की नहीं, बल्कि मेरी बेटी की है। दो साल पहले NEET 2024 में भी पेपर लीक हुआ था। उसके तार देश के कोने-कोने से जुड़े मिले। आश्चर्य तो इस बात पर हुआ कि एक साथ 27 बच्चे टॉप कर गए थे, जिनका परीक्षा सेंटर एक था। लगभग एक जैसे रोल नंबर थे। इसे देख कर बेटी का रोना रुक नहीं रहा था। रियल कटऑफ मार्क्स यानी जिस नंबर में सरकारी कॉलेज मिल सकता है, वह नंबर ऐतिहासिक रूप से हाई था। पेरेंट्स के तौर पर बेटी को संभालना हमारी पहली जिम्मेदारी थी।

हमने उसके दोस्तों से बात की। सिर्फ एक दोस्त का नंबर 670 था, जिसकी उम्मीद थी कि उसे कोई सरकारी कॉलेज मिल जाएगा। बाकी सारे दोस्त काफी निराश और दुखी थे। बेटी के दर्द को मैंने महसूस किया। अपने मार्क्स पर उसे कोई शिकायत नहीं थी। शिकायत थी तो उस पेपर लीक से, जिसकी वजह से उसे सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं मिल सकते थे।

मैंने उसे विदेश में पढ़ने के लिए कहा, क्योंकि विदेश का खर्च भारत के प्राइवेट कॉलेज से कम पड़ता है, लेकिन उसने इनकार कर दिया और सीयूईटी के जरिए बायोटेक में एडमिशन ले लिया। यह उसका ‘प्लान बी’ नहीं था, लेकिन पेपर लीक की खबरों से वह इतना परेशान हो चुकी थी कि उसने फिर से NEET की परीक्षा नहीं देने का फैसला किया। उसके अंदर निराशा, गुस्सा और सिस्टम के प्रति अविश्वास भर गई थी। वह आज भी प्रतियोगी परीक्षाओं को ‘शक’ की नजर से देखती है।

मेडिकल में जाना उसका सपना था। उसने दो साल तक एलेन में कोचिंग ली और स्कूल में भी पढ़ाई की। दो साल बाद ये रिजल्ट होगा। अगर इसका अनुमान उसे होता तो शायद वह प्लानिंग पहले ही बदल लेती। NEET और मेडिकल का नाम भी अब वह नहीं सुनना चाहती।

मैंने उसका मनोबल टूटते हुए देखा। उसे संभालना काफी मुश्किल था। उसने कई दिनों तक खुद को चारदिवारी में बंद रखा। खाने-पीने से दूरी बना ली। मुझे लगा कि कई डिप्रेशन न चली जाए। मैंने चुपके से एक साइक्राटिस्ट से संपर्क किया। सारी बातें बताई तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं दो चार दिनों में अगर नॉर्मल नहीं होती है, तो आप मेरे पास ले आना। भगवान का शुक्र है कि वह कुछ दिनों में सामान्य हो गई और जीवन में आगे बढ़ गई।

आज NEET 2026 पेपर लीक ने हमें दो साल पहले की बेबसी और लाचारी की याद दिला गई। हालाँकि इस बार NTA ने पेपर रद्द करने की घोषणा कर जल्द ही पेपर कराने की बात कह दी है। कई शिक्षण संस्थान रडार पर हैं। केरल से गुरुग्राम तक लोगों की गिरफ्तारी हो रही है। एक बार फिर NTA को रद्द करने की माँग उठ रही है। विपक्ष इस मुद्दे पर देश के Gen Z से सड़कों पर उतरने की अपील कर रहा है।

NTA सवालों के घेरे में है। देश की शिक्षा व्यवस्था पर एक और काला दाग लग गया है। दरअसल ‘पेपर लीक’ देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। छात्र-छात्राएँ खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहते हैं।

NEET 2024 में पेपर लीक की खबरों के बीच रिजल्ट आ गया था। बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स सड़कों पर उतरे। सबका बस एक ही सवाल था कि सरकारी कॉलेज का कटऑफ इतना कैसे हो सकता है। जिस नंबर पर आराम से नामी-गिरानी सरकारी मेडिकल कॉलेज आसानी से मिल जाते थे, अब दूर-दराज के मेडिकल कॉलेज भी पहुँच से दूर हो गए थे। प्राइवेट कॉलेज में करोड़ों रुपए देकर मेडिकल की पढ़ाई करवाना ज्यादातर लोगों के बूते के बाहर था।

मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। कोर्ट ने NTA को लताड़ा। सीबीआई जाँच हुई और कई खुलासे हुए। कोर्ट ने फैसला दिया कि सिर्फ उन जगहों पर फिर से परीक्षा होगी, जहाँ लीक के सबूत मिले। इसके बाद रिजल्ट रद्द कर फिर से रिजल्ट घोषित किया गया। इसका बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। ‘रियल कट ऑफ’ ऐतिहासिक था। छात्रों की बड़ी संख्या नाखुश थी। उनका कहना था कि आखिर नेट पर जब पेपर आ चुका है, तो ‘लीक क्षेत्रीय’ कैसे रह गई।

छात्रों को उम्मीद थी कि कोर्ट रिएग्जाम की बात करेगा, ताकि स्टूडेंट्स को फिर से एग्जाम देने का मौका मिले। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रिएग्जाम की उम्मीद में कई कोचिंग संस्थानों ने छात्रों की पढ़ाई जारी रखी। छात्रों को भी उम्मीद थी कि उनके साथ ‘न्याय’ होगा और रिएग्जाम होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कई छात्रों ने दूसरे कोर्स में एडमिशन ले लिया तो कई छात्र-छात्राओं ने फिर से एक साल तैयारी करने की बात कही। लेकिन मन में वही डर था कि क्या अगले साल पेपर लीक नहीं होगा?

ये सिर्फ NEET का मामला नहीं है। देश में दूसरी परीक्षाओं के पेपर भी लीक हुए हैं। यूजीसी-नेट परीक्षा 2024 को सरकार ने परीक्षा के अगले ही दिन रद्द कर दिया था। आरोप था कि प्रश्नपत्र डार्क वेब और मैसेजिंग नेटवर्क पर लीक हुआ।

उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद परीक्षा रद्द करनी पड़ी। इससे लगभग 48 लाख अभ्यर्थी प्रभावित हुए। मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला भारत के सबसे बड़े परीक्षा और भर्ती घोटालों में माना जाता है। इसमें मेडिकल एडमिशन, सरकारी नौकरियों और कई भर्ती परीक्षाओं में फर्जी उम्मीदवार, रिश्वत और पेपर लीक का नेटवर्क सामने आया।

राजस्थान शिक्षक भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद राज्यभर में विरोध प्रदर्शन हुए और कई गिरफ्तारियां हुईं। परीक्षा दोबारा आयोजित करनी पड़ी। CBSE के 10वीं गणित और 12वीं अर्थशास्त्र के पेपर लीक होने के बाद दोबारा परीक्षा लेनी पड़ी थी। इससे लाखों छात्र प्रभावित हुए। उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (UPTET) का पेपर व्हाट्सऐप पर वायरल होने के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई थी।

बिहार टीईटी परीक्षा में पेपर लीक के आरोपों के बाद कई गिरफ्तारियां हुईं और परीक्षा प्रक्रिया सवालों में आई। राजस्थान पुलिस भर्ती परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होने के बाद राज्य सरकार को परीक्षा रद्द करनी पड़ी।

इन परीक्षाओं के पेपर लीक होने से यह पता चलता है कि पेपर लीक के नेक्सेस पूरे देश में फैले हुए हैं। हर परीक्षा पर उनकी नजर है। जरूरी है ऐसा सिस्टम विकसित करने की ताकि परीक्षा देते वक्त अभ्यर्थी ये मान कर दे कि उसके साथ अन्याय नहीं होगा। इसमें सबसे ज्यादा गरीब और ग्रामीण छात्र फँसते हैं। पूरा परिवार इस उम्मीद में होता है कि अभ्यर्थी इस बार पास कर नौकरी पा लेगा और उनकी माली हालत सुधर जाएगी। लेकिन परीक्षा का पेपर लीक होते ही उनकी उम्मीद टूट जाती है।

न सिर्फ अभ्यर्थी बल्कि पूरा परिवार घोर निराशा में चला जाता है। पार्टियाँ कुछ दिनों तक पेपर लीक का विरोध करती हैं और कोर्ट में भी मामला जाता है। लेकिन इस समस्या का हल नहीं निकलता। धीरे धीरे सब शांत हो जाते हैं। कुछ दिनों बाद फिर किसी दूसरे परीक्षा का पेपर लीक होता है। भारत की शिक्षा व्यवस्था की यह त्रासदी है।

टिमोथी इनिशिएटिव के भीतर की कहानी: संस्थापक डेविड नेल्म्स के भारत दौरों और धर्मांतरण के सुरागों की पड़ताल, जानें- मिशनरी कैसे बनाते हैं समाज में पैठ

18 और 19 अप्रैल को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने द टिमोथी इनिशिएटिव (टीटीआई) नामक ईसाई मिशनरी संगठन से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की । जाँच एजेंसी के मुताबिक, टीटीआई ने महज 6 महीनों में अलग-अलग राज्यों में विदेशी बैंकों के डेबिट कार्डों का इस्तेमाल करके 95 करोड़ रुपए निकाले।

इसमें छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से निकाले गए 6.5 करोड़ रुपए भी शामिल हैं। ऐसा करते हुए टीटीआई ने एफसीआरए नियमों का उल्लंघन किया। गौरतलब है कि यह संगठन एफसीआरए के तहत पंजीकृत नहीं है। इसका मतलब है कि कानूनी रूप से इस संगठन को विदेशी फंडिंग की अनुमति नहीं है।

शुरुआत में इसे ‘प्रोजेक्ट इंडिया’ के नाम से जाना जाता था। इसकी शुरुआत भारत में हुई थी। यह संगठन 2007 से भारत में सक्रिय है, लेकिन देश में इसका इतिहास 1992 से शुरू होता है। इसके संस्थापक डेविड नेल्म्स अपने सहयोगी के साथ भारत आए और ईसायत का प्रचार करने के लिए देशभर के गाँवों में चर्च स्थापित करने का फैसला किया। ऑप इंडिया टीटीआई के कामकाज पर रिपोर्टों की एक सीरीज प्रकाशित कर रहा है।

(स्रोत-टीटीआई)

हमारे रिसर्च के दौरान हमने पाया कि टीटीआई का न केवल भारत और दूसरे देशों में अपना नेटवर्क है, बल्कि यह अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए अन्य चर्चों के साथ भी सहयोग करता है। अपनी पिछली रिपोर्ट में हमने बताया था टीटीआई की नियमावली, किस प्रकार चर्च संस्थापकों को हिंदू बहुल गाँवों में प्रवेश करने, हिंदुओं से संपर्क करने, संदेह से बचने और जातिगत नेताओं का इस्तेमाल कर देश में ईसाइयत का प्रचार करना था।

इस रिपोर्ट में हम टीटीआई की उत्पत्ति के इतिहास और अन्य चर्चों के साथ इसके कामकाज का पता लगाएँगे। टीटीआई का उद्देश्य हिंदुओं और दूसरे धर्म को माननेवालों को ईसाइयत में परिवर्तित करना था। इसका मकसद देश के हर गाँव में कम से कम एक चर्च स्थापित करना है। ईडी की कार्रवाई के बाद भारत में बहुत सारी सामग्री या तो ब्लॉक कर दी गई है या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटा दी गई है। हालाँकि अभी भी बहुत से सुराग हैं, जिनका पता लगाना अभी भी बाकी है।

(साभार- फेसबुक)

डेविड नेल्म्स की भारत यात्रा के सबूत

जनवरी 2023 में डैन बुरेल नामक ईसाई के प्रचारक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर एक पोस्ट साझा किया। इसमें उन्होंने 1992 में टीटीआई के संस्थापक डेविड नेल्म्स के साथ भारत की अपनी यात्रा के बारे में बताया।

(साभार- टीटीआई ग्लोबल)

अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा कि 1992 की भारत और थाईलैंड की यात्रा उनके जीवन को बदल देने वाली एक मिशन यात्रा थी। उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि 30 वर्षों से अधिक समय से वे और डेविड धर्मांतरण के कार्य में लगे हुए हैं। संभव है कि यही वह यात्रा हो जिसका उल्लेख टीटीआई की वेबसाइट पर किया गया है, जहाँ नेल्म्स भारत में केवल मंदिर और मस्जिदें देखकर ‘दुखी’ दिख रहे थे, क्योंकि वहाँ चर्च नहीं थे। वेबसाइट के अनुसार, इसी यात्रा से टीटीआई की स्थापना का विचार उनके मन में आया।

(बाएँ में डेविड नेल्म्स, साभार- फेसबुक)

यह पोस्ट डेविड की भारत यात्रा और धर्म परिवर्तन की गतिविधियों में उनकी भागीदारी का सबसे पुराना प्रमाण है। इस पोस्ट में डैन और डेविड दोनों की धुंधली तस्वीर थी, जिसे हमने एआई का इस्तेमाल करके स्पष्ट करने की कोशिश की है।

टीटीआई से जुड़े अहम सुराग

संगठन की वेबसाइट भारत में प्रतिबंधित है। इस वेबसाइट के मुताबिक, इसकी स्थापना 2007 में हुई थी। 2009 में टोनी आर्मर ने फेसबुक पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उसने डेविड नेल्म्स को टैग किया था और वीडियो का स्थान बेंगलुरु बताया था। वीडियो का शीर्षक था ‘इंडिया 2009’। वीडियो में दिखाई देने वाली पहली तस्वीर में संभावित भारतीय चर्च संस्थापक डेविड नेल्म्स के साथ खुशी-खुशी एक समूह तस्वीर के लिए बैठे हुए थे।

वीडियो में नेल्म्स और अन्य विदेशी एक उपनगरीय इलाके में घूमते हुए, कमजोर परिवारों से मिलते हुए और बच्चों के साथ काफी समय बिताते हुए दिखाई दिए। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने धर्मांतरण के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए परिवारों के साथ मेलजोल बढ़ाया। इसके लिए पहले परिवार के बच्चों से दोस्ती की।

खास बात यह है कि अंत में टोनी आर्मर को कर्नाटक के उद्यमी यूबी भट के साथ देखा गया, जो IC814 इंडियन एयरलाइंस अपहरण के पीड़ितों में से एक थे। एक किताब में , टीटीआई ने चर्च संस्थापकों से कहा कि वे स्थानीय लोगों से मेलजोल बढ़ाने के लिए जातिगत नेताओं का इस्तेमाल करें ताकि उन्हें धर्म परिवर्तन कराया जा सके। ऐसा लगता है कि उन्होंने न केवल जातिगत नेताओं का इस्तेमाल किया, बल्कि प्रमुख हस्तियों का भी इस्तेमाल करने की कोशिश की। चाहे वे धर्म परिवर्तन में शामिल हों या नहीं, भारतीयों के बीच टीटीआई की प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए इस्तेमाल किया।

2013 में, डेविड नेल्म्स ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि वह 11 से 18 सितंबर तक भारत में रहेंगे और लोगों को आमंत्रित किया कि वे आएँ और देखें कि टीटीआई ने भारत, नेपाल और पाकिस्तान में क्या काम किया है।

(साभार-फेसबुक)

जुलाई 2016 में डेविड ने फेसबुक के माध्यम से यह बताया कि वह भारत जाने वाला है।

डेविड ने जनवरी 2017 में फेसबुक पर एक तस्वीर पोस्ट की। इसका कैप्शन लिखा था, ‘अपने पंजाबी दोस्तों के साथ खूब मस्ती कर रहा हूँ!’ गौरतलब है कि पंजाब उन राज्यों में से शामिल है, जहाँ ईसाइयत का प्रचार तेजी से हुआ है। पंजाब में पिछले कुछ वर्षों में लाखों हिंदू और सिख अनुयायियों ने धर्मांतरण किया है।

फरवरी 2017 में डेविड नेल्म्स ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि वह अमेरिका लौट आए हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि ‘भारत/नेपाल दोनों ही शानदार रहे’। इससे इतना तो अंदाजा लगाया जा ही सकता है कि उन्होंने भारत और नेपाल का दौरा किया था।

डेविड के बेटे जेरेड नेल्म्स वर्तमान में टीटीआई के अध्यक्ष हैं। टीटीआई ने लिंक्डइन पर उनके बारे में एक पोस्ट किया था। पोस्ट में उल्लेख किया गया था कि जेरेड और उनकी पत्नी एम्बर करीब पाँच वर्षों तक भारत में मिशनरी के रूप में सेवा की। पोस्ट से यह संकेत मिलता है कि जेरेड भारत में चर्चों के निर्माण के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पाँच वर्षों तक रहे।

डेविड नेल्म्स की भारत यात्राओं के बारे में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी बहुत कम है। मुख्य रूप से कुछ फेसबुक पोस्ट, एक पुराना टैग किया हुआ वीडियो और कुछ ऐसे संदर्भ हैं जिन्हें सावधानीपूर्वक खोजबीन के बाद ही जोड़ा जा सकता है।

यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि टीटीआई की अधिकांश ऑनलाइन सामग्री भारत में बैन कर दी गई है या सार्वजनिक प्लेटफार्मों से हटा दी गई है। इसलिए, भले ही उपलब्ध रिकॉर्ड छोटा हो, फिर भी यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि भारत नेल्म्स के लिए एक बार की यात्रा नहीं थी, बल्कि टीटीआई की गतिविधियों का एक नियमित और महत्वपूर्ण हिस्सा था।

इन छोटी-छोटी जानकारियों के आधार पर ये पता चलता है कि डेविड नेल्म्स ने कुछ ही सालों के अंदर कई बार भारत का दौरा किया। उनका बेटा जेरेड नेल्म्स भारत में काफी वक्त तक रहा।

खुद टीटीआई ने कहा कि जेरेड और उनकी पत्नी एम्बर ने लगभग पाँच वर्षों तक भारत में मिशनरी के सदस्य के रूप में सेवा की। ये लोग लगातार 5 साल तक भारत में रहे या कई बार भारत आए और गए, यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। लेकिन, इससे यह बात को पूरी तरह साफ है कि नेल्म्स परिवार मिशनरी कार्य को लेकर भारत में लंबे वक्त तक रहा है।

यह मामला तब और भी गंभीर हो जाता है, जब इसे टीटीआई के दावों को जोड़ कर देखा जाता है। अपने ‘किंगडम इम्पैक्ट’ दस्तावेज में उसने दावा किया है कि 2007 से अब तक भारत सहित 50 देशों में उसने 268750 से अधिक चर्च बना दिए हैं और 201954 विधवाओं और अनाथों सहित 2392427 लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित किया है। अगली रिपोर्ट में हम यह पता लगाएँगे कि भारत में चर्चों ने पिछले कुछ सालों में टीटीआई की किस तरह मदद की।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जब ईंधन संकट देख दुनिया भर के देश बढ़ा रहे कीमतें, तब भारत ने 55% बढ़ाया LPG का उत्पादन: 60 दिनों का तेल भंडार भी, फिर भी बचत के लिए कहना PM मोदी की दूरदर्शिता

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच तनाव के चलते मिडिल ईस्ट में संकट बना हुआ है और अब इसका असर दुनिया भर में दिख रहा है। इसी बीच ईंधन संकट से निपटने और अर्थव्यवस्था में मजबूती बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से पेट्रोल-डीजल और विदेशी मुद्रा बचाने की अपील की है। उन्होंने खुद इसकी पहल भी की है और अपने काफिले को 50% तक छोटा करने का निर्देश दिया है। कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी इस पर अमल किया है।

संकट के बीच सतर्कता बरतना किसी भी देश के लिए, लोगों के लिए सबसे जरूरी है लेकिन ये भी विपक्ष को नहीं पच रहा है। विपक्ष के नेता राहुल गाँधी से लेकर अन्य विपक्षी दलों के नेता पीएम मोदी की अपील के बाद यह माहौल बनाने में लगे हैं कि देश में सामान का संकट हो गया है। हालाँकि, यही वह झूठ है जिसे परोसने की कोशिश की जा रही है क्योंकि प्रधानमंत्री ने जो कहा-किया है वो सतर्कता बरतने की कोशिश है, ना कि भारत किसी संकट से घिर गया है।

आर्थिक इमरजेंसी की आहट?: भ्रम फैला रहा विपक्ष

विपक्ष ने PM मोदी की अपील के बाद ही इसे लेकर भ्रम फैलाना शुरू कर दिया है। राहुल गाँधी ने X पर लिखा, “मोदी जी ने कल जनता से त्याग माँगे – सोना मत खरीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और खाने का तेल कम करो, मेट्रो में चलो, घर से काम करो। ये उपदेश नहीं – ये नाकामी के सबूत हैं।”

राहुल गाँधी ने लिखा, “12 साल में देश को इस मुक़ाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है – क्या खरीदे, क्या न खरीदे, कहाँ जाए, कहाँ न जाए। हर बार जिम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि खुद जवाबदेही से बच निकलें।”

अरविंद केजरीवाल ने भी ऐसा ही भ्रम फैलाने की कोशिश की है। केजरीवाल ने X पर लिखा, “पीएम ने देश के सभी नागरिकों को खाने-पीने में कटौती करने की सलाह दी है, घूमने-फिरने और विदेश यात्राओं में कटौती करने की सलाह दी है, तथा सोना और अन्य कीमती चीजें खरीदने में भी कटौती करने की सलाह दी है।”

उन्होंने आगे लिखा, “क्या यह आर्थिक इमरजेंसी की आहट है? क्या देश भारी आर्थिक संकट में फँस गया है? ऐसा तो देश में पहले कभी नहीं हुआ। प्रधानमंत्री जी को देश के सामने सच्चाई रखनी चाहिए। आखिर देश की असली आर्थिक हालत क्या है?”

राहुल गाँधी के करीबी और कॉन्ग्रेस के बड़े नेता केसी वेणुगोपाल ने भी यही किया। उन्होंने X पर लिखा, “ईरान-अमेरिका युद्ध को शुरू हुए 3 महीने हो चुके हैं और PM मोदी अब तक भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में पूरी तरह असमर्थ दिखाई दे रहे हैं।”

उन्होंने लिखा, “यह बेहद शर्मनाक, लापरवाही भरा और पूरी तरह से गलत है कि प्रधानमंत्री आम नागरिकों को परेशानियों की ओर धकेल रहे हैं, बजाय इसके कि वे वैश्विक संकट से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए पहले से योजना बनाएँ। जब चुनाव और छोटे राजनीतिक हित ही प्रधानमंत्री की प्राथमिकता बन जाते हैं, तो उसका परिणाम एक संभावित आर्थिक संकट के रूप में सामने आता है।”

भारत में नहीं है कोई कमी: पेट्रोलियम मंत्री ने दिखाया आईना

भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि राहुल गाँधी और विपक्ष के अन्य नेता जो भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं वो पूरी तरह झूठ है। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्पष्ट किया है कि देश में किसी भी पेट्रोलियम उत्पाद की कमी नहीं है। उन्होंने X पर एक पोस्ट में लिखा, “भारत के पास 60 दिनों का कच्चा तेल, 60 दिनों की LNG और 45 दिनों का LPG भंडार उपलब्‍ध है।”

पुरी ने आगे लिखा, “पश्चिम एशिया में तनाव के बीच निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भारत ने अपने दैनिक LPG उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि (35,000 टन से बढ़ाकर 54,000 टन) की है। इस दौरान कई सारे देशों में तेल के दाम व उपलब्धता को लेकर उतार-चढ़ाव आए लेकिन भारत में कोई असर नहीं पड़ा।”

पुरी ने चेताया, “कुछ लोगों ने कालाबाजारी की, अफवाह फैलाने की पूरी कोशिश की लेकिन PM मोदी के मार्गदर्शन में हमारे प्रयासों से देश में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कहीं कोई कमी नई आई।” एक अन्य पोस्ट में पुरी ने बताया, “पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान देश ने अपनी दैनिक एलपीजी उत्पादन में लगभग 55% की वृद्धि की है।”

हालाँकि, भारत में हालात सही दिख रहे हैं लेकिन दुनिया में संकट का असर दिख रहा है। भारत के पड़ोसी देशों में भी यह संकट नजर आने लगा है।

दुनिया भर में संकट से बिगड़ते हालात

मिडिल ईस्ट विवाद के केंद्र में रहे होर्मुज जलडमरूमध्य में रूकावट ने अप्रैल के अंत और मई की शुरुआत में ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतों को कई वर्षों के उच्च स्तर तक पहुँचा दिया था और यह 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर चला गया। इस जगह से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 25% हिस्सा गुजरता है। इससे दुनिया भर में महँगाई बढ़ी और ऊर्जा की लागत में भारी उछाल आया।

द इंडियन मैट्रिक्स ने दावा किया है कि फरवरी 2026 से 11 मई 2026 के बीच US में तेल की कीमतें 59% बढ़ी हैं। वहीं, कनाडा में ये 43%, साउथ अफ्रीका में 31%, अर्जेंटीना में 30% कीमतें बढ़ी है। इसमें बताया गया है कि UK से लेकर चीन और रूस तक दुनियाभर में तेल की कीमतें बढ़ी हैं लेकिन भारत में ये स्थिर बनी हुई हैं।

इस तनाव के चलते भारत के पड़ोसी देशों में भी हालात बिगड़ रहे हैं। तेल और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ीं और कई देशों में ईंधन की कमी और आर्थिक दबाव पैदा हुआ। इसका असर खासकर उन देशों पर पड़ा जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।

मालदीव और श्रीलंका जैसे देशों की अर्थव्यवस्था पहले से ही पर्यटन और ऊर्जा आयात पर निर्भर थी लेकिन पर्यटन में गिरावट और बढ़ती ईंधन कीमतों ने उनकी स्थिति और खराब कर दी। मालदीव में पर्यटन लगभग 20% तक गिर गया और कर्ज चुकाने का दबाव बढ़ गया जिसके चलते उसने भारत से पेट्रोलियम आपूर्ति की माँग की है।

पाकिस्तान में ईंधन की भारी कमी और बढ़ती कीमतों के कारण सरकार को कई सख्त कदम उठाने पड़े। स्कूलों की छुट्टियाँ बढ़ाई गईं, सरकारी दफ्तरों में काम के घंटे कम किए गए, कई जगह बाजार जल्दी बंद करने के आदेश दिए गए और सार्वजनिक सेवाओं में भी कटौती करनी पड़ी।

बांग्लादेश ने भी ऊर्जा बचाने के लिए सख्त नियम लागू किए जैसे कार्यालय समय कम करना, बिजली की खपत घटाना, अनावश्यक यात्रा पर रोक लगाना और कई सार्वजनिक गतिविधियों को सीमित करना। उसने भी ऊर्जा आपूर्ति को लेकर भारत से मदद की माँग की।

श्रीलंका और नेपाल में भी इसी तरह की स्थिति बनी रही। श्रीलंका ने ऊर्जा बचाने के लिए कामकाजी दिनों में कटौती, बिजली और ईंधन पर प्रतिबंध लगाए और भारत से ईंधन सहायता ली है। नेपाल ने भी कामकाजी सप्ताहों को घटाया, ईंधन कोटा कम किया और भारत से LPG और अन्य ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाने का अनुरोध किया है। यानि दुनियाभर में इस संकट का असर काफी समय से दिखाई दे रहा है। लेकिन भारत में स्थितियाँ फिलहाल बेहतर हैं।

भारत को सुरक्षित कर रहा दूरदर्शी नेतृत्व

भारत की स्थिति आज इसलिए मजबूत दिखाई दे रही है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में देश ने केवल तत्काल समस्याओं पर नहीं बल्कि भविष्य के खतरों को ध्यान में रखकर भी तैयारी की है। जब दुनिया के कई देश अचानक बढ़े ऊर्जा संकट से घबराकर सख्त प्रतिबंध लगाने लगे, तब भारत में न तो पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें दिखीं और न ही आम लोगों के बीच किसी बड़े डर का माहौल बना। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि भारत ने समय रहते ऊर्जा सुरक्षा, वैकल्पिक आपूर्ति और रणनीतिक भंडारण पर लगातार काम किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने केवल एक देश पर निर्भर रहने की नीति से बाहर निकलकर कई देशों के साथ ऊर्जा संबंध मजबूत किए। यही कारण है कि वैश्विक तनाव बढ़ने के बावजूद भारत अपनी जरूरतों के हिसाब से तेल और गैस की आपूर्ति को संतुलित रखने में सफल रहा। सरकार ने संकट को हल्के में लेने के बजाय लोगों से सतर्कता बरतने की अपील की ताकि भविष्य में किसी भी बड़ी चुनौती का सामना बिना घबराहट के किया जा सके। यह अपील किसी डर या कमी का संकेत नहीं बल्कि जिम्मेदार नेतृत्व का उदाहरण मानी जा रही है।

दुनिया के कई देशों में सरकारों को अचानक स्कूल बंद करने पड़े, बाजारों के समय घटाने पड़े और ईंधन पर प्रतिबंध लगाने पड़े। लेकिन भारत में हालात नियंत्रण में बने रहे। इसका कारण केवल भंडार या आपूर्ति नहीं बल्कि वह भरोसा भी है जो सरकार ने लगातार व्यवस्था बनाए रखकर पैदा किया है। संकट के समय सबसे बड़ी चुनौती केवल संसाधनों की नहीं होती बल्कि लोगों के मन में भरोसा बनाए रखने की होती है। भारत इस मोर्चे पर मजबूत दिखाई दिया है।

आज जब विपक्ष सरकार पर सवाल उठा रहा है तब यह भी देखना जरूरी है कि दुनिया के दूसरे देशों में हालात कितने गंभीर हो चुके हैं। भारत में लोगों से संयम और सावधानी की अपील की गई है लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी सामान्य तरीके से चल रही है। यही अंतर बताता है कि दूरदर्शी तैयारी और समय पर लिए गए फैसले किसी भी संकट को कितना नियंत्रित कर सकते हैं। पीएम मोदी की अपील भी इन्हें दूरदर्शी फैसलों की कड़ी का एक हिस्सा है ताकि संकट के समय में भारत मजबूत बना रहे।

सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर नहीं, संस्कृति का केंद्र है: जानिए उन आचार्यों और राजाओं को, जिन्होंने हर आक्रमण के बाद भी यहाँ जीवित रखी शैव परंपरा

भारत में कुछ स्थान केवल धार्मिक स्थल भर नहीं हैं। वे देश की सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा के प्रतीक बन जाते हैं। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित प्राचीन सोमनाथ मंदिर ऐसा ही एक स्थान है।

सदियों से सोमनाथ केवल भगवान शिव का मंदिर नहीं रहा, बल्कि आस्था, संघर्ष, ज्ञान, भक्ति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।

हाल ही में स्वतंत्र भारत में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने पर आयोजित सोमनाथ प्राणप्रतिष्ठा अमृत महोत्सव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंदिर के लंबे और निरंतर इतिहास का उल्लेख किया।

उन्होंने बताया कि अलग-अलग समय में संतों, राजाओं, विद्वानों, योद्धाओं और भक्तों ने मंदिर पर आए हर संकट के बाद उसे फिर से खड़ा किया और उसकी परंपरा को जीवित रखा। उनके भाषण में सोमनाथ को केवल कई बार पुनर्निर्मित हुए मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि हर चुनौती के बावजूद जीवित रही एक सतत सभ्यतागत परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया।

सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर से कहीं ज्यादा

सोमनाथ की कहानी केवल आक्रमणों और राजनीतिक संघर्षों तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें प्राचीन भारत तक जाती हैं, जब प्रभास शैव दर्शन और आध्यात्मिक शिक्षा का बड़ा केंद्र बन चुका था। इतिहास में हुए हमलों से बहुत पहले ही सोमनाथ पश्चिम भारत का प्रमुख पूजा, तपस्या और दार्शनिक चर्चाओं का केंद्र बन गया था।

प्राचीन ऋषियों और आचार्यों ने इस क्षेत्र को शैव धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया। समय के साथ सोमनाथ का संबंध भारत के सबसे पुराने शैव संप्रदायों में से एक पाशुपत परंपरा से जुड़ गया।

मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं था, बल्कि यहाँ विद्वान दर्शन पर चर्चा करते थे, योगी तपस्या करते थे और गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान देते थे। इसी आध्यात्मिक और बौद्धिक वातावरण ने सोमनाथ को पूरे भारत में प्रसिद्ध बना दिया।

देश के अलग-अलग हिस्सों से यात्री, संत, व्यापारी और साधक प्रभास आने लगे और यह स्थान एक बड़ा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र बन गया।

सोम शर्मा और प्रभास का उदय

सोमनाथ के आध्यात्मिक इतिहास से जुड़े शुरुआती नामों में सोम शर्मा का विशेष महत्व है। शैव परंपराओं के अनुसार उन्हें रुद्र का 27वाँ अवतार माना जाता है और प्रभास में पाशुपत परंपरा की नींव रखने वाले प्रमुख ऋषियों में गिना जाता है।

पारंपरिक कथाओं में यह भी कहा जाता है कि सोम शर्मा ने सोमनाथ में भगवान शिव का पहला स्वर्ण मंदिर बनवाया था। लेकिन उनका महत्व केवल मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं था। उस समय भारत में कई धार्मिक विचारधाराएँ विकसित हो रही थीं और सोम शर्मा ने प्रभास की आध्यात्मिक पहचान को मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।

उनसे जुड़ी शैव विचारधारा ने बाद में पूरे पश्चिम भारत को गहराई से प्रभावित किया। उनसे जुड़ी परंपराओं में सोम सिद्धांत का भी उल्लेख मिलता है, जिसने शैव साधना और आध्यात्मिक अनुशासन को दार्शनिक दिशा दी। इसी कारण प्रभास धीरे-धीरे केवल तीर्थ स्थल नहीं, बल्कि शिक्षा और ध्यान का केंद्र भी बन गया।

लकुलीश और पाशुपत परंपरा

सोम शर्मा के बाद पश्चिम भारत के शैव इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण नाम लकुलीश का माना जाता है। वर्तमान गुजरात के कायावरोहण में जन्मे लकुलीश को रुद्र का 28वाँ अवतार माना जाता है। उन्हें पाशुपत संप्रदाय को संगठित रूप देने वाला महान आचार्य कहा जाता है।

लकुलीश नाम लकुट शब्द से बना है, जिसका अर्थ डंडा या छड़ी होता है। मूर्तियों और चित्रों में उन्हें योग मुद्रा में हाथ में दंड लिए दिखाया जाता है, जो तपस्या, अनुशासन और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

परंपराओं के अनुसार लकुलीश का जन्म विश्वरूप और सुदर्शना के घर हुआ था। उनके बचपन और आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी कई कहानियाँ आज भी गुजरात में प्रसिद्ध हैं। कायावरोहण, देवखात झील और ब्रह्मेश्वर शिव मंदिर जैसे स्थान उनकी परंपरा से जुड़े हुए हैं।

इतिहासकारों को शिलालेखों में भी लकुलीश का उल्लेख मिलता है। लगभग 380-381 ईस्वी के मथुरा शिलालेख में उनके शिष्य कुशिक की दसवीं पीढ़ी का जिक्र मिलता है। इससे कई विद्वान मानते हैं कि लकुलीश दूसरी शताब्दी ईस्वी में हुए होंगे।

लकुलीश की शिक्षाएँ उनके चार प्रमुख शिष्यों कुशिक, गर्ग, मित्र और कौरुष के माध्यम से फैलीं। उनके अनुयायियों ने पाशुपत परंपरा को पश्चिम भारत के अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुँचाया। कौशिक शाखा मेवाड़ में गर्ग शाखा गुजरात में मैत्रक शाखा सौराष्ट्र में और कौरुष शाखा आसपास के क्षेत्रों में प्रभावशाली बनी। इसी विस्तार के कारण प्रभास और कायावरोहण शैव शिक्षा और पूजा के बड़े केंद्र बन गए।

परंपरा को जीवित रखने वाले आचार्य

सोमनाथ का विकास केवल राजाओं के संरक्षण से संभव नहीं हुआ। आध्यात्मिक गुरुओं और पाशुपत आचार्यों ने लगातार मंदिर से जुड़ी धार्मिक और बौद्धिक परंपराओं को मजबूत किया।

ऐसे ही एक महत्वपूर्ण नाम भाव बृहस्पति का है, जिनका उल्लेख प्रधानमंत्री मोदी ने भी किया। आज आम लोगों में उनका नाम ज्यादा प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन उन्होंने सोमनाथ को पूजा और ज्ञान दोनों के केंद्र के रूप में स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।

प्राचीन भारत में मंदिर विश्वविद्यालयों की तरह काम करते थे। मंदिर परिसरों में दर्शन, व्याकरण, शास्त्र, योग और आध्यात्मिक साधनाओं पर चर्चा होती थी। सोमनाथ भी इसी परंपरा का हिस्सा था। भाव बृहस्पति जैसे विद्वानों ने यह सुनिश्चित किया कि मंदिर शिक्षा और आध्यात्मिक चिंतन से जुड़ा रहे।

पाशुपत आचार्य केवल पुजारी नहीं थे। वे दार्शनिक, योगी, शिक्षक और मार्गदर्शक भी थे। उनकी वजह से कठिन राजनीतिक दौर में भी सोमनाथ आध्यात्मिक रूप से जीवित बना रहा।

राजाओं का संरक्षण और प्राचीन पुनर्निर्माण

सोमनाथ की निरंतरता को कई शासकों ने भी सदियों तक सुरक्षित रखा। मंदिर के शुरुआती पुनर्निर्माण से जुड़े राजाओं में मैत्रक वंश के चक्रवर्ती महाराजा धारसेन का नाम प्रमुख है।

उनका योगदान इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे पता चलता है कि सोमनाथ का इतिहास मध्यकालीन संघर्षों से भी कहीं पुराना है। मैत्रक काल में वल्लभी पश्चिम भारत का बड़ा शिक्षा और संस्कृति केंद्र बन गया था। इस दौर में शैव परंपराओं को भी राजकीय संरक्षण मिला।

धारसेन के पुनर्निर्माण ने प्रभास की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को फिर मजबूत किया। प्राचीन भारत में मंदिर केवल धार्मिक केंद्र नहीं होते थे, बल्कि व्यापार, यात्रा, शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों का भी केंद्र होते थे। समुद्री व्यापार मार्गों के पास होने के कारण सोमनाथ का प्रभाव गुजरात से बहुत दूर तक फैला।

महमूद गजनवी का हमला और पुनर्जीवन

सोमनाथ के इतिहास का सबसे चर्चित अध्याय 11वीं शताब्दी में महमूद गजनी के हमले से जुड़ा है। लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि मंदिर और उसकी परंपराओं को बाद में फिर से कैसे जीवित किया गया।

गजनवी के हमले के बाद गुजरात कठिन राजनीतिक और धार्मिक स्थिति से गुजर रहा था। उस समय सोलंकी शासक भीमदेव प्रथम सोमनाथ के पुनर्निर्माण और पुनर्जीवन से जुड़े प्रमुख शासक बनकर सामने आए। भीमदेव केवल राजनीतिक शासक नहीं थे, बल्कि गुजरात की सांस्कृतिक पहचान को बचाने वाले राजा भी थे।

ऐतिहासिक विवरणों में बताया गया है कि उन्होंने मंदिर के पुनर्निर्माण और धार्मिक परंपराओं को फिर से स्थापित करने में सहयोग दिया। बाद में सोलंकी काल गुजरात के सबसे समृद्ध सांस्कृतिक दौरों में गिना गया।

इस समय मंदिर वास्तुकला, व्यापार, जल प्रबंधन, मूर्तिकला और साहित्य का तेज विकास हुआ। सोमनाथ का पुनर्जीवन इसी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का हिस्सा बन गया।

आक्रमणों के खिलाफ व्यापक संघर्ष

सोमनाथ का इतिहास उत्तर-पश्चिम भारत में हुए बड़े संघर्षों से भी जुड़ा हुआ है। हिंदू शाही शासक जयपाल और आनंदपाल को तुर्क और गजनवी सेनाओं के खिलाफ लंबे समय तक संघर्ष करने के लिए याद किया जाता है।

हालाँकि उनका सीधा संबंध सोमनाथ के प्रशासन से नहीं था, लेकिन उनके युद्ध भारतीय राज्यों और परंपराओं की रक्षा के बड़े संघर्ष का हिस्सा थे। जयपाल ने सबुक्तगीन और बाद में महमूद गजनवी के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

उनके पुत्र आनंदपाल ने भी यह संघर्ष जारी रखा। इन शासकों का उल्लेख यह दिखाता है कि सोमनाथ की कहानी केवल गुजरात तक सीमित नहीं थी। उस समय भारत के अलग-अलग हिस्सों के शासक राजनीतिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे।

महाराजा भोज और सांस्कृतिक गौरव

सोमनाथ के पुनर्जीवन से जुड़े प्रमुख शासकों में मालवा के महाराजा भोज का नाम भी आता है। उन्हें केवल शक्तिशाली राजा ही नहीं, बल्कि विद्वान, कवि, वास्तुकार और संस्कृति के संरक्षक के रूप में भी याद किया जाता है।

ऐतिहासिक परंपराओं में माना जाता है कि भोज ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण में योगदान दिया। उनके लिए मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं थे, बल्कि राज्य की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्ति के प्रतीक थे।

भोज का समर्थन इस विचार को दिखाता है कि मंदिरों को बचाना भारत की ज्ञान परंपरा, कला और सभ्यतागत स्मृति को बचाने जैसा था।

सोलंकी राजा और गुजरात का स्वर्णकाल

बार-बार हुए हमलों और राजनीतिक संकटों के बाद भी सोमनाथ को जीवित रखने में सोलंकी वंश की सबसे बड़ी भूमिका रही। कर्णदेव सोलंकी ने उस समय गुजरात को राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत किया, जब पश्चिम भारत में यह क्षेत्र बड़ी शक्ति बन रहा था।

सोलंकी शासन में मंदिर निर्माण, शहरों का विकास, जल प्रबंधन और व्यापार तेजी से बढ़ा। सोलंकियों के लिए मंदिर समृद्धि और गौरव के प्रतीक थे। उनके संरक्षण से सोमनाथ फिर से एक प्रतिष्ठित तीर्थ स्थल बन सका।

बाद में सिद्धराज जयसिंह ने गुजरात की सांस्कृतिक शक्ति को और आगे बढ़ाया। उनके शासन में शिक्षा संस्थान, झीलें, मंदिर और नगरों का विकास हुआ। उनका काल गुजरात के स्वर्ण युगों में गिना जाता है।

सिद्धराज ने केवल सैन्य शक्ति ही नहीं बढ़ाई, बल्कि उन धार्मिक संस्थानों को भी संरक्षण दिया जिन्होंने गुजरात की सांस्कृतिक पहचान बनाई। सोमनाथ इसी पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक बना रहा है।

कुमारपाल सोलंकी ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया। हालाँकि उन्हें जैन आचार्य हेमचंद्र से संबंध के लिए ज्यादा याद किया जाता है, लेकिन उन्होंने शैव परंपराओं को भी संरक्षण दिया।

उनके समय में मंदिरों, तीर्थ स्थलों और शिक्षा केंद्रों को मजबूत समर्थन मिला। भाव बृहस्पति का नाम अक्सर कुमारपाल के साथ लिया जाता है, क्योंकि दोनों ने मिलकर सोमनाथ की धार्मिक और बौद्धिक परंपराओं को मजबूत किया।

वाघेला शासक और आध्यात्मिक संरक्षण

सोलंकी वंश के बाद गुजरात में वाघेला वंश उभरा। हालाँकि इस समय राजनीतिक परिस्थितियाँ कठिन होती जा रही थीं, फिर भी सोमनाथ की परंपराओं को बचाने के प्रयास जारी रहे।

विशालदेव वाघेला उन शासकों में गिने जाते हैं जिन्होंने गुजरात की सांस्कृतिक और धार्मिक संस्थाओं की रक्षा करने की कोशिश की। प्रधानमंत्री मोदी ने त्रिपुरांतक का भी उल्लेख किया, जिन्हें शैव परंपराओं में आध्यात्मिक ज्ञान का रक्षक माना जाता है।

इन लोगों का महत्व इसलिए है क्योंकि सोमनाथ केवल युद्धों से नहीं बचा, बल्कि लोगों ने उसकी परंपराओं, शिक्षाओं और स्मृतियों को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा।

इस्लामी आक्रमणों के बाद पुनर्जीवन

बार-बार हुए आक्रमणों से सोमनाथ कई बार क्षतिग्रस्त हुआ। कुछ समय ऐसे भी आए जब स्थानीय लोग खुले रूप से मंदिर जाने से डरने लगे। फिर भी इसकी परंपरा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

जूनागढ़ के चूड़ासमा शासकों ने कठिन समय में सोमनाथ में पूजा-पाठ को फिर से शुरू कराने में बड़ी भूमिका निभाई। महिपाल चूड़ासमा और रा’ खेंगार को मंदिर की धार्मिक परंपराओं को फिर से जीवित करने के लिए याद किया जाता है।

इन शासकों के लिए सोमनाथ सौराष्ट्र की पहचान और गौरव का प्रतीक था। राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद उन्होंने पूजा और तीर्थ यात्रा को जारी रखा।

अहिल्याबाई होल्कर का योगदान

कई सदियों बाद महारानी अहिल्याबाई होल्कर भारत के सबसे बड़े तीर्थ स्थलों की संरक्षक बनकर सामने आईं। उनका नाम काशी विश्वनाथ और सोमनाथ सहित कई प्रमुख मंदिरों के पुनर्निर्माण और संरक्षण से जुड़ा है।

जब राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता के कारण कई प्राचीन तीर्थ स्थल कमजोर पड़ रहे थे, तब अहिल्याबाई ने धार्मिक परंपराओं को जीवित रखने का काम किया। उनके प्रयासों से कठिन समय में भी सोमनाथ पूजा और भक्ति से जुड़ा रहा।

गायकवाड़ और तीर्थ यात्रियों की सुरक्षा

बड़ौदा के गायकवाड़ शासकों ने भी सोमनाथ और तीर्थ यात्रियों की सुरक्षा में योगदान दिया। हालाँकि उनके योगदान की चर्चा कम होती है, लेकिन ब्रिटिश प्रभाव बढ़ने के समय उन्होंने तीर्थ परंपरा को बनाए रखने में मदद की।

औपनिवेशिक शासन के दौरान मंदिरों की पुरानी परंपराओं को बचाए रखना आसान नहीं था। फिर भी गायकवाड़ शासकों ने यह सुनिश्चित किया कि सोमनाथ आध्यात्मिक रूप से सक्रिय बना रहे।

सोमनाथ के भूले-बिसरे नायक

सोमनाथ का इतिहास केवल राजाओं और संतों की कहानी नहीं है। यह उन साधारण योद्धाओं और स्थानीय नायकों की भी कहानी है जिन्होंने मंदिर के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

सौराष्ट्र की लोक स्मृतियों में सबसे ज्यादा याद किए जाने वाले नामों में हमीरजी गोहिल और वेगड़ाजी भील शामिल हैं। हमीरजी की वीरता पर आज भी लोकगीत गाए जाते हैं। उन्हें उस युवा योद्धा के रूप में याद किया जाता है जिसने सोमनाथ की रक्षा करते हुए अपने प्राण दे दिए।

वेगड़ाजी भील को भी बलिदान और संघर्ष के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उनकी कहानियाँ दिखाती हैं कि सोमनाथ स्थानीय समाज की भावनाओं और पहचान से कितनी गहराई से जुड़ा था।

आधुनिक भारत में सोमनाथ का पुनर्निर्माण

आधुनिक दौर में सोमनाथ की नई यात्रा भारत की स्वतंत्रता के बाद शुरू हुई। जूनागढ़ के भारत में विलय के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल प्रभास पाटन पहुँचे और घोषणा की कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण किया जाएगा।

इस निर्णय को केवल मंदिर निर्माण नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में देखा गया। के एम मुंशी ने इस सपने को साकार करने में बड़ी भूमिका निभाई। नवानगर के जाम साहब दिग्विजय सिंह और कई अन्य लोगों ने भी इस प्रयास में सहयोग दिया।

आखिरकार 1951 में पुनर्निर्मित मंदिर का उद्घाटन भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ। हालाँकि जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रपति के समारोह में शामिल होने के पक्ष में नहीं थे, फिर भी राजेंद्र प्रसाद कार्यक्रम में पहुँचे और सोमनाथ को भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बताया।

एक अखंड सभ्यतागत यात्रा

सोमनाथ की कहानी सदियों तक फैली हुई है और इसमें ऋषि, संत, राजा, योद्धा और साधारण भक्त सभी जुड़े हुए हैं। सोम शर्मा और लकुलीश से लेकर भाव बृहस्पति तक, भीमदेव और भोज से लेकर अहिल्याबाई होल्कर तक, हमीरजी गोहिल से लेकर सरदार पटेल तक हर पीढ़ी ने सोमनाथ की रक्षा और पुनर्जीवन में अपना योगदान दिया।

सोमनाथ पर कई बार हमले हुए, लेकिन उसकी परंपराएँ कभी खत्म नहीं हुईं। यही निरंतरता सोमनाथ को खास बनाती है। यह मंदिर केवल पत्थरों से नहीं बचा, बल्कि लोगों की सांस्कृतिक स्मृतियों और आस्था में जीवित रहा। आज भी सोमनाथ केवल एक तीर्थ स्थल नहीं है। यह भारत की निरंतरता, संघर्षशक्ति और सभ्यतागत आत्मविश्वास का प्रतीक बनकर खड़ा है।

(नोट: मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित की गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

जिस अपर्णा यादव का उजड़ा सुहाग, उसे ही बदनाम कर रहे सपा समर्थक: किसी ने प्रतीक यादव की मौत को बताया ‘नीला ड्रम कांड’, कोई पूछ रहा- पति को छोड़ क्यों गई असम?

समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के छोटे भाई 38 साल के प्रतीक यादव का बुधवार (13 मई 2026) तड़के निधन हो गया। बताया जा रहा है कि प्रतीक यादव लंबे समय से बीमार चल रहे थे। एक तरफ जहाँ प्रतीक यादव के निधन के बाद उनकी पत्नी और BJP नेता अपर्णा यादव का सुहाग उजड़ गया, वहीं सोशल मीडिया पर समाजवादी इकोसिस्टम उन्हें ही बदनाम करने में लग गया है।

दरअसल, BJP नेता अपर्णा यादव अपने पति प्रतीक यादव के निधन के वक्त असम में थीं, उन्हें लखनऊ आते-आते दोपहर के 2 बज गए। इस पर समाजवादी इकोसिस्टम उन्हें घेरने में लगा हुआ है कि पति के बीमार होने के बावजूद वह असम गईं और अब निधन पर भी वे देरी से आ रही हैं। इसी के साथ कुछ समय पहले ही अपर्णा यादव और प्रतीक यादव के तलाक की भी खबरें सामने आई थीं, लेकिन बाद में प्रतीक यादव ने सबके सामने आकर बताया था कि दंपति के बीच सब कुछ ठीक चल रहा है।

सोशल मीडिया पर समाजवादी इकोसिस्टम ने फैलाया अपर्णा यादव के खिलाफ प्रोपेगेंडा

प्रतीक यादव की मौत के बाद सोशल मीडिया पर समाजवादी इकोसिस्टम ने अपर्णा यादव के खिलाफ प्रोपेगेंडा चला रखा है। लोग उन्हें प्रतीक यादव की मौत को उनकी पत्नी अपर्णा यादव के साथ पुरानी अनबन संग जोड़कर खयाली पुलाव पका रहे हैं। कोई अखिलेश यादव की फुर्ती में अस्पताल पहुँचने की तारीफ करते नहीं थक रहा है। यानी कि सोशल मीडिया पर पूरा समाजवादी नैरेटिव आगे बढ़ाया जा रहा है।

परमाननंद आजमगढ़ी नाम के ‘एक्स’ यूजर कहते हैं कि कुछ दिनों पहले ही अपर्णा यादव की सोशल मीडिया पर पोस्ट वायरल हुई थी, जिसमें प्रतीक ने अपनी पत्नी BJP महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव को परिवार तोड़ने वाला बताया था। उन्होंने आगे लिखा, “प्रतीक ने यह भी कहा था कि वह जल्द से जल्द अपर्णा यादव को तलाक देने जा रहे हैं। ऐसे में प्रतीक की संदिग्ध मौत की खबर आना तमाम विवादों को जन्म देता है।”

अविनाश लिखते हैं कि प्रतीक यादव की मौत मामले में उनकी पत्नी अपर्णा यादव से भी पूछताछ होनी चाहिए, पति की बीमारी के समय वो असम में क्या कर रही थी और अपर्णा यादव और प्रतीक का कई महीनों से झगड़ा चल रहा था क्या यह साजिश हो सकती है नीले ड्रम कांड की तरह।

‘गौरव’ ने भी दंपति के बीच पुराने विवाद को जड़ बनाकर कहा, “क्या कल रात प्रतीक यादव और अपर्णा बिष्ट के बीच कुछ भयानक विवाद हुआ था? ये सब पुलिस जाँच में सामने आएगा।”

डॉ. विष्णु यादव ने एंबुलेंस में प्रतीक यादव के शव का वीडियो पोस्ट कर दावा किया, “यह प्रतीक यादव का शव है। यहाँ पर कोई भी करीबी नहीं दिख रहा है। खासकर अपर्णा यादव भी नहीं।”

खुद को समाजवादी बताने वाले श्याम यादव का सवाल है कि प्रतीक यादव की तबीयत लंबे समय से ठीक नहीं थी, ऐसे में अपर्णा यादव असम क्यों गई थीं? उन्होंने सपा प्रमुख अखिलेश यादव की तारीफ करते हुए कहा कि वे अपने छोटे भाई की खबर मिलते ही तुरंत पहुँच गए।

मनीष यादव लिखते हैं, “आखिरकार भाई भाई ही होता है… प्रतीक यादव को सबसे पहले देखने अखिलेश यादव जी ही पहुँचे हैं। जबकि अभी तक अपर्णा यादव नहीं दिखी हैं?”

रिस्की यादव लिखते हैं, “पत्नी अपर्णा यादव से कलह और अखिलेश यादव से बिछड़कर अलग रहना प्रतीक यादव को काफी दुख देता था। अपर्णा यादव की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने परिवार को खत्म कर दिया।”

प्रतीक यादव की मौत की वजह अपर्णा यादव?

सोशल मीडिया पर समाजवादी इकोसिस्टम जिस तरह अपर्णा यादव के खिलाफ प्रोपेगेंडा चला रहा है, उससे अमूमन अपर्णा यादव को प्रतीक यादव की मौत का संदिग्ध ठहराया जा चुका है। लेकिन अब तक जाँच में ऐसा कुछ सामने नहीं आया है। बताया जा रहा है कि वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। वहीं उनके बड़े भाई अखिलेश यादव ने कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे के फैसले लेने की बात कही है।

उधर, प्रतीक यादव की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भी मौत की असली वजह अब तक पता नहीं लगी है। डॉक्टरों को प्रतीक के शरीर पर कोई बाहरी चोट के निशान भी नहीं मिले हैं। इसीलिए डॉक्टरों ने आगे की जाँच के लिए विसरा सुरक्षित रख लिया है। साथ ही हार्ट को भी रख लिया गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर दोबारा जाँच की जा सके।

प्रिय मीडिया कब तक बेचते रहोगे किसानों की ये दुखांत कहानियाँ, उन्हें क्यों नही बताते उनको ही ‘मंडी-दलालों’ से मुक्त कराने के लिए मोदी लेकर आए थे कृषि कानून

एक किसान जब खेती करता है तो उसकी फसल से सिर्फ आमदनी नहीं, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। वह सोचता है कि फसल उचित दाम पर बिकेगी तो पुराने कर्ज चुकेंगे, घर का खर्च चलेगा और बच्चों के भविष्य के लिए कुछ बचत हो पाएगी। लेकिन सोचिए, अगर वही किसान अपनी मेहनत की फसल लेकर मंडी पहुँचे और वहाँ उसे दाम की जगह घाटे का सौदा झेलना पड़े, तो उस पर क्या बीतती होगी।

यह कोई काल्पनिक बातें नहीं हैं, बल्कि मीडिया में बताई जा रही महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजी नगर जिले के किसान की आपबीती है जिसे भावुक शब्दों के साथ पाठकों को परोसा जा रहा है।

मीडिया में बताई जा रही किसान की आपबीती

पैठण तालुका के वरुडी गाँव के एक किसान प्रकाश गलधर तीन महीने की मेहनत के बाद 1262 किलो प्याज 25 बोरे में भरकर मंडी तक लेकर आए, लेकिन यहाँ उन्हें बताया गया कि 100 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिलेगा इससे एक रुपया ज्यादा नहीं… यानी लगभग 1 रुपए प्रति किलो।

कुल बिक्री से उनकी जेब में सिर्फ 1262 रुपए आए। ये रकम किसान का प्रॉफिट नहीं थी बल्कि उनकी तीन महीने की कीमत थी। असली धक्का तो तब लगा जब घर से मंडी तक माल पहुँचाने की कुल कीमत को जोड़ा गया।

रिपोर्ट बताती हैं कि किसान को प्याज की तुलाई, भराई, मजदूरी, परिवहन में कुल खर्च 1263 रुपए आए। यानी जो दाम मंडी से मिला उससे एक रुपए ज्यादा लगाकर तो किसान अपनी फसल को मंडी तक पहुँचाकर ही आया था। तीन महीने की मेहनत, खेती में आई लागत और बचत का तो छोड़ दीजिए उलटा इस सौदे से किसान का नुकसान ही हुआ।

मीडिया का खेल

यह समस्या सिर्फ एक किसान की नहीं है। देश के लाखों किसान आज भी अपनी उपज बेचने के लिए मंडियों और बिचौलियों पर निर्भर हैं। मीडिया अक्सर ऐसी खबरों को भावनात्मक अंदाज में पेश करता है, जिससे आम आदमी या खबर पढ़ने वाले पाठक का गुस्सा सीधे सरकार और प्रशासन पर जाता है।

ये गुस्सा भी उचित होता है क्योंकि ये मीडिया हमें ऐसी खबरें परोसते वक्त खबर का दूसरा पहलू नहीं बताता। इस खबर में भी यही हुआ। यहाँ ये तो बताया गया कि किसान कितना दुखी है लेकिन ये नहीं बताया कि किसानों को ऐसी स्थिति से निकालने के लिए मोदी सरकार आज से 6 साल पहले ही कदम उठा चुकी थी, लेकिन कुछ आंदोलनजीवियों के चलते वह फैसला वापस हो गया।

मोदी सरकार का कृषि कानून और उसका विरोध

आज से करीब 6 साल पहले केंद्र सरकार तीन कृषि कानून लेकर आई थी। उन कानूनों का मूल उद्देश्य यही था कि किसान मंडियों और बिचौलियों के चंगुल से निकलकर अपनी फसल सीधे बाजार में कहीं भी बेच सके। लेकिन उस समय कुछ लोगों ने अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए ऐसे विरोध प्रदर्शन किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा आ पड़ा और आखिर में देश हित देखते हुए सरकार ने कानून वापस ले लिया।

वे कानून किसान विरोधी नहीं थे, लेकिन कुछ ‘आंदोलनजीवियों’ और स्वघोषित किसान नेताओं ने आम किसानों को ऐसे भड़काया था कि जिन्हें फायदा दिख भी रहा था वो भी उस पर संदेह करने लगे थे। उस दौरान सड़कों को ब्लॉक कर ऐसा माहौल बनाया गया जैसे इन कानूनों से ज्यादा किसान के लिए कुछ खतरनाक नहीं हो सकता।

उस समय जब कुछ मीडिया संस्थानों ने इन कानूनों के फायदे समझाने की कोशिश की, तो उन्हें ‘गोदी मीडिया’ कहकर खारिज कर दिया गया। तथ्यों की जगह भ्रम को स्थापित किया गया।

मीडिया में चल रही खबरें

प्रधानमंत्री मोदी ने खुद बताए थे फायदे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इन रिफॉर्म्स के दूरगामी परिणाम समझाए थे। उन्होंने मन की बात से लेकर अलग-अलग प्लैटफॉर्म पर आकर ये समझाया था कि कैसे इन सुधारों के बाद किसानों को नए बाजार और विकल्प मिलेंगे, आधुनिक टेक्नोलॉजी और बेहतर कोल्ड स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ मिलेगा। इससे कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा और किसान मंडियों के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी अपने उत्पाद बेच सकेंगे।

शुरुआत में कई किसान संगठन इसके समर्थन में थे, लेकिन राकेश टिकैत जैसे चेहरों और अवसरवादी राजनीति ने दुष्प्रचार का सहारा लिया। धीरे-धीरे खबरें आई कि अगर ये सब चलता रहा तो इससे राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ भी समझौता हो सकता है। सरकार ने हर पहलू को देखा और अंत में यह कहते हुए कानून वापस लिया कि वे जनता को इसके लाभ समझाने में असफल रहे।

क्या होता अगर लागू होते कानून

आज जब स्थिति बदहाल है किसान परेशान हैं, अपने माल के उचित दाम के लिए जिरह कर रहे हैं, तो 2020-21 में हुई राजनीति, हिंसा को याद रखना जरूरी है। साथ ही ये याद रखना भी जरूरी है आज जो मीडिया इन किसानों के दर्द को अ्पनी हेडलाइंस बनाकर दिखा रहा है, अगर उस समय वह मीडिया किसान हित पर कायम रहता तो ये स्थिति नहीं आती। दुर्भाग्य यह है कि ये आज भी स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पा रहे कि कृषि कानूनों पर फैलाया गया भ्रम ही आज की इस स्थिति का एक बड़ा कारण है।

यदि वे कानून लागू होते, तो शायद प्रकाश गलधर को अपना प्याज 1 रुपए किलो बेचने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। शायद किसानों को मीडिया के सामने आकर मदद की गुहार नहीं लगानी पड़ती या परिवार की बदहाली देख आत्महत्या का विचार नहीं लाना पड़ता।

राजकुमार भाटी की माफी भले लगे मासूम, पर ‘ब्राह्मण घृणा’ दिखाते समय सपा नेता की हँसी नहीं थी मासूम: जानिए जवाहर भवन में ‘जाति’ के नाम पर क्यों जुटे वामपंथी

समाजवादी पार्टी के नेता राजकुमार भाटी की यह कहानी शुरू होती है दिल्ली के एक ऐसे मंच से, जहाँ उन्होंने ‘समाजवाद’ का मुखौटा पहनकर हिंदू समाज के विरुद्ध नफरत की पटकथा लिखी। वामपंथियों और कट्टरपंथियों के जमावड़े के बीच खड़े होकर समाजवादी पार्टी के नेता राजकुमार भाटी ने जब ब्राह्मणों की तुलना वेश्याओं से की और उन्हें उनसे भी बदतर बताया, तो उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं बल्कि एक जहरीली ‘खिलखिलाहट’ थी। मंच पर गूँजते ठहाके और भाटी साहब की घृणा भरी मुस्कान गवाही दे रही थी कि यह सिर्फ एक मुहावरा नहीं, बल्कि उनके भीतर गहरे पैठी सनातन विरोधी सोच का प्रदर्शन था।

लेकिन जैसे ही कानून का शिकंजा कसा और गिरफ्तारी की आहट सुनाई दी, भाटी साहब ने तुरंत हाथ जोड़कर ‘बिना शर्त माफी’ का ढोंग शुरू कर दिया। हालाँकि, खुद उनके द्वारा साझा किया गया Video उनकी इस मजबूरी वाली माफी की पोल खोल देता है, जिसमें वे नफरत भरे बोल पढ़ते हुए आज भी मुस्कुरा रहे हैं और पीछे से उनके समर्थक इस अपमान के ‘पोस्टर’ लगवाने की माँग कर रहे हैं। चलिए, नफरत, चालाकी और चुनावी डर से बुनी इस पूरी कहानी को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

नफरत का वह मंच जहाँ ब्राह्मणों की तुलना वेश्याओं से की

कहानी शुरू होती है 5 मई 2026 को। दिल्ली का जवाहर भवन, जो सोनिया गाँधी परिवार के ‘राजीव गाँधी फाउंडेशन’ से जुड़ा है, वहाँ एक किताब के विमोचन का कार्यक्रम चल रहा था। किताब का नाम था- ‘जाति और साम्प्रदायिकता के विषाणु’। विडंबना देखिए, किताब लिखने वाले दो मुस्लिम लेखक (डॉ रफरफ शकील अंसारी और जावेद अनवर) अपने समाज की कुरीतियों जैसे हलाला या तीन तलाक पर नहीं, बल्कि हिंदू समाज की जातियों पर जहर उगलने के लिए कलम चला रहे थे।

इसी मंच पर राजकुमार भाटी ने अपना भाषण शुरू किया। उन्होंने एक पुराना दोहा सुनाया, “ब्राह्मण भला न वेश्या, इनमें भला न कोय! और कोई-कोई वेश्या तो भली, ब्राह्मण भला न कोय।” इसका सीधा मतलब यह था कि उनके लिए ब्राह्मण वेश्याओं से भी गए-गुजरे हैं।

वामपंथियों का साथ और वह जहरीली खिलखिलाहट

इस मंच पर भाटी साहब अकेले नहीं थे। उनके साथ योगेंद्र यादव, प्रोफेसर रतन लाल, आशुतोष और शीबा असलम फहमी जैसे लोग बैठे थे, जिनका इतिहास ही हिंदू धर्म पर विवादित बयान देने का रहा है। जब राजकुमार भाटी ब्राह्मण समाज का अपमान कर रहे थे, तो उनके चेहरे पर एक अजीब सी नफरत भरी मुस्कुराहट थी। पूरे भाषण के दौरान वे कभी इतना नहीं हँसे होंगे, जितना ब्राह्मणों पर भद्दी टिप्पणी को बोलते हुए खिलखिला रहे थे।

हैरानी की बात यह है कि वहाँ बैठा ‘बुद्धिजीवी’ समाज इस अपमान पर तालियाँ बजा रहा था। भीड़ के बीच से तो किसी ने यहाँ तक कह दिया, “भाटी जी, इसका पोस्टर लगवा दीजिए!” यह साबित करता है कि वहाँ जुटे लोग किसी चर्चा के लिए नहीं, बल्कि एक खास समाज को नीचा दिखाने के लिए इकट्ठा हुए थे।

माफी का ढोंग: जब चुनाव और जेल का डर सताया

जैसे ही भाटी साहब का ब्राह्मणों के प्रति नफरत का Video वायरल हुआ, लोगों में गुस्सा फूट पड़ा। जैसे ही गाजियाबाद में FIR दर्ज हुई, तो भाटी साहब तुरंत बैकफुट पर आ गए। इसके बाद उन्होंने 5 मिनट का एक Video डाला और खुद को उसमें बेचारा दिखाते हुए बोले, “7 सेकंड की क्लिप काटकर मुझे बदनाम किया जा रहा है।” उन्होंने खुद को बचाने के लिए ‘गुर्जर-यादव’ वाले मुहावरों का भी सहारा लिया, लेकिन हकीकत यह है कि उनका पूरा निशाना ब्राह्मण ही थे।

वीडियो में वे हाथ तो जोड़ रहे हैं, लेकिन उनकी आँखों में पछतावा नहीं, बल्कि चालाकी दिख रही है। फेसबुक पर शेयर की गई उस Video में साफ-साफ दिखाई देता है कि भाटी साहब पहले से ही ब्राह्मणों के खिलाफ लिखकर लाए थे और फिर कागज से पढ़कर लोगों को मुहावरे सुनाकर बीचों-बीच ठहाके मारकर हँस रहे थे। एक तरह से भाटी साहब वहाँ पुस्तक विमोचन करने नहीं, बल्कि वामपंथियों का मनोरंजन करने गए थे।

माफी माँगने वाली Video में भाटी साहब ने यह भी कह दिया कि ‘कुछ भोले-भाले लोग BJP के बहकावे में आकर उनके खिलाफ अभियान चलाने लग जाते हैं।’ मगर सच तो यह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और ब्राह्मणों की नाराजगी कहीं वोटों का खेल न बिगाड़ दे, इसलिए यह ‘माफी का ढोंग’ रचा गया।

आदतन हिंदू विरोधी हैं भाटी साहब

सपा नेता राजकुमार भाटी की ये बातें कोई नई नहीं हैं, वे पहले भी कई बार हिंदू धर्म और परंपराओं के खिलाफ जहर उगल चुके हैं। उन्होंने भगवान राम तक पर टिप्पणी करने से परहेज नहीं किया। एक बार उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि अगर वे राम होते, तो ब्राह्मणों को पाखंड छोड़ने की सलाह देते।

राजकुमार भाटी के लिए हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ भी कोई खास मायने नहीं रखते। वे मनुस्मृति को ‘घटिया’ बताते हैं और रामचरितमानस जैसी महान रचना को भगवान का ग्रंथ मानने के बजाय सिर्फ एक ‘साधारण कविता’ कहते हैं।

यही नहीं, भगवान के अस्तित्व पर भी उनके विचार काफी अजीब हैं। वे कहते हैं कि उन्हें मंदिर जाने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती, क्योंकि वे अभी इस बात पर ‘रिसर्च’ कर रहे हैं कि दुनिया में भगवान है भी या नहीं। लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जहाँ एक तरफ वे हिंदू देवी-देवताओं पर सवाल उठाते हैं, वहीं दूसरी तरफ TV पर खुलेआम यह कहते हैं कि वे मोहम्मद साहब से बड़ा महापुरुष किसी और को नहीं मानते।

उनकी ये बातें साफ दिखाती हैं कि उनकी सोच एकतरफा और सनातन धर्म के प्रति नफरत से भरी हुई है। इसके अलावा, राजकुमार भाटी ने पुराने ट्वीट में ब्राह्मणवाद को ‘वायरस’ कहा था और इसकी वैक्सीन खोजने की बात कही थी।

असली चेहरा बनाम समाजवादी मुखौटा

आज जब सपा नेता राजकुमार भाटी अपनी किए पर माफी माँग रहे हैं, तो यह उनके दिल की आवाज नहीं है, बल्कि गिरफ्तारी और राजनीतिक नुकसान का डर उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर रहा है। उनके फेसबुक Video की भाव-भंगिमा, पीछे से आती समर्थकों की आवाजें और उनकी खिलखिलाहट चीख-चीख कर कह रही है कि उनके मन में हिंदुओं के प्रति कितनी नफरत भरी है।

‘संत’ की यात्रा से ‘सनातन’ ही गायब, सपा-कॉन्ग्रेस ने किया हाइजैक: UP में विपक्ष का प्रोपेगेंडा टूल तो नहीं बन रहे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, ‘गविष्टि यात्रा’ की टाइमिंग-रूट को लेकर भी सवाल

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 3 मई 2026 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से गायों के संरक्षण और गोवंश से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए 81 दिवसीय ‘गविष्टि (गोरक्षार्थ-धर्मयुद्ध) यात्रा’ की शुरुआत की थी। इस यात्रा का घोषित उद्देश्य गायों के संरक्षण को बढ़ावा देना और गाय माता को राष्ट्र माता का दर्जा दिए जाने जैसे मुद्दों पर समाज को जागरूक करना था। शुरुआत में इसे पूरी तरह धार्मिक और सामाजिक अभियान के तौर पर पेश किया गया। यह संदेश दिया गया कि यह यात्रा भारतीय परंपरा, धर्म और संस्कृति से जुड़े एक संवेदनशील विषय को लेकर जनजागरण की कोशिश है।

उम्मीद जताई जा रही थी कि यह अभियान गाँवों और कस्बों तक पहुँचकर लोगों में गो संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी का भाव पैदा करेगा। लेकिन जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ रही है उसका स्वरूप बदलता हुआ दिखाई देने लगा है। अब इस यात्रा में विपक्षी दलों के नेताओं की सक्रिय मौजूदगी चर्चा का विषय बन गई है। खासतौर पर समाजवादी पार्टी (सपा) और कॉन्ग्रेस से जुड़े कई नेता यात्रा के मंचों पर नजर आने लगे हैं।

यह यात्रा जिस-जिस विधानसभा से होकर गुजर रही है, वहाँ पर सपा और कॉन्ग्रेस जैसे दलों के नेता इस यात्रा को अपना समर्थन दे रहे हैं और आगे बढ़कर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का स्वागत सत्कार कर रहे हैं। यात्रा की शुरुआत से ही इसकी कमान सपा के नेताओं के हाथों में दिख रही है। कुशीनगर पहुँचने पर सपा के नेता और पूर्व मंत्री राधे श्याम सिंह ने इसका स्वागत किया। देवरिया में सपा के पूर्व प्रत्याशी मुरली मनोहर जायसवाल यात्रा में सक्रिय दिखे। बलिया में सपा और कॉन्ग्रेस के नेताओं की भरमार रही। अभी हाल ही में सोनभद्र पहुँचने पर सपा सांसद छोटेलाल खरवार इस यात्रा में प्रमुख रूप से नजर आए।

जाहिर है कि धार्मिक यात्राओं में नेताओं का शामिल होना कोई नई बात नहीं है और कई जगहों पर इस यात्रा में बीजेपी के नेता भी शामिल हुए हैं। लेकिन जिस तरह का पैटर्न इस यात्रा में दिख रहा है उससे इस यात्रा को लेकर कई सवाल उठने शुरू हो गए हैं। भले ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शंकराचार्य होने को लेकर विवाद हो लेकिन उनके घोर से घोर विरोधी भी उनके संत होने पर सवाल नहीं उठा सकते हैं। संतों से जो उम्मीदें हैं, वहीं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से भी हैं।

कहीं विपक्ष का राजनीतिक हथियार तो नहीं बन रही गविष्टि यात्रा?

संतों की यात्राओं को हमेशा समाज को जोड़ने, लोगों में धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना पैदा करने और सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता फैलाने के माध्यम के तौर पर देखा जाता रहा है। इसी कारण जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ‘गविष्टि यात्रा’ शुरू हुई तो इसे भी एक धार्मिक और सामाजिक अभियान माना गया। अब जिस तरह से इस यात्रा में सपा और कॉन्ग्रेस के नेताओं की सक्रिय भूमिका लगातार सामने आ रही है उससे यह सवाल उठने लगो हैं कि कहीं यह यात्रा धीरे-धीरे राजनीतिक रंग तो नहीं ले रही।

सपा-कॉन्ग्रेस के नेताओं की सक्रिय भागीदारी को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या विपक्षी दलों ने इस यात्रा को अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की व्यक्तिगत मंशा पर भले सवाल न हों लेकिन जिस तरह का माहौल यात्रा के आसपास बनता दिखाई दे रहा है उसमें उन्हें यह जरूर देखना चाहिए कि जिन उद्देश्यों को लेकर यह यात्रा शुरू की गई थी क्या वे वास्तव में पूरे हो रहे हैं या नहीं।

लोगों के मन में यह सवाल भी है कि अगर यह यात्रा पूरी तरह समाज और धर्म से जुड़ा अभियान है तो फिर आम हिंदू समाज की उतनी बड़ी भागीदारी क्यों नहीं दिखाई दे रही। यात्रा में सनातन को लेकर बातें होने से ज्यादा राजनीतिक बातें हो रही हैं। कई जगहों पर राजनीतिक चेहरों की मौजूदगी भी खूब दिखाई दे रही है जबकि आम हिंदू समाज या सामाजिक संगठनों की सक्रियता उतने बडे़ स्तर पर नहीं नजर आ रही हैं। इन्हीं सबके चलते अब यह धारणा भी बन रही है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि यह यात्रा विपक्ष के लिए राजनीति का एक हथियार बनती जा रही हो। सवाल और भी हैं।

विधानसभाओं पर आधारित रूट और यात्रा की टाइमिंग पर सवाल

यह यात्रा 81 दिनों तक चलने वाली है और गोरखपुर से शुरू होकर उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरने वाली है। इसी बात को लेकर भी अब बातें होने लगी हैं। लोग ये पूछ रहे हैं कि भई अगर यह यात्रा पूरी तरह धार्मिक और सामाजिक उद्देश्य से निकाली गई है तो फिर इसका रूट विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से क्यों डिजाइन किया गया।

आमतौर पर विधानसभा पर आधारित प्लानिंग राजनीतिक अभियानों या चुनावी रणनीतियों में ही नजर आती है, राजनीतिक दल अपनी विधानसभाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से इस तरह के कार्यक्रम डिजाइन करते हैं। रही बात धार्मिक यात्राओं की तो वे आम तौर पर तीर्थस्थलों, धार्मिक केंद्रों या सामाजिक जरूरत वाले क्षेत्रों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। इस यात्रा के रूट डिजाइन ने भी राजनीतिक चर्चाओं को और बढ़ा दिया है।

इसके साथ ही सवाल इस यात्रा की टाइमिंग को लेकर भी हैं। क्योंकि यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल धीरे-धीरे बनने लगता है। अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने प्रस्तावित हैं। ऐसे में विपक्षी दलों की मौजूदगी और विधानसभाओं वाले रूट जैसी चीजों को लोग आपस में जोड़कर देख रहे हैं। यही वजह है कि अब यह यात्रा केवल गो संरक्षण तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि इसके राजनीतिक हाईजैक होने की आशंका और इसके पीछे की रणनीति को लेकर भी लगातार बहस बढ़ती जा रही है।