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अमेरिका में चीनी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए झोंके ₹5000 करोड़, US मीडिया ने खोला नेविल का चिट्ठा: CCP के प्यादे ने भारत में भी हर्ष मंदर-तीस्ता सीतलवाड़ जैसों को बनाया हथियार

पश्चिमी मीडिया अब आखिरकार उस सच्चाई को मानने लगा है, जिसे ऑपइंडिया काफी सालों से बता रहा है। यह पूरा मामला दुनिया भर में फैले उन एनजीओ (NGO), एक्टिविस्ट ग्रुप और मीडिया हाउस से जुड़ा है, जो असल में चीन की सरकार के लिए प्रचार (प्रोपेगेंडा) करने वाली मशीन की तरह काम कर रहे हैं। हाल ही में फॉक्स न्यूज (FOX NEWS) ने एक बड़ी पड़ताल की है, जिसमें नेविल रॉय सिंघम के चीन-समर्थक नेटवर्क का पर्दाफाश किया गया है।

अमेरिका के रहने वाले नेविल रॉय सिंघम एक बड़े बिजनेसमैन हैं, जिन्होंने 2017 में अपनी कंपनी लगभग 6,500 करोड़ रुपए ($785 मिलियन) में बेची थी और फिर चीन के शंघाई जाकर बस गए। अब यह साफ हो रहा है कि वे कैसे पैसों के दम पर खबरों का एक जाल बुनकर दुनिया भर में चीन की छवि चमकाने का खेल चला रहे हैं।

फॉक्स न्यूज की इस पाँच पार्ट वाली सीरीज की तीन रिपोर्ट से पता चलता है कि नेविल रॉय सिंघम का संगठन बड़ी चालाकी से खबरों का एक ऐसा जाल बुन रहा है, जहाँ मामूली विरोध-प्रदर्शनों को भी ‘बड़ा मुद्दा’ बनाकर पेश किया जाता है। सिंघम के पैसों से चलने वाला यह नेटवर्क इस तरह की खबरों को पूरी दुनिया में फैलाता है। इनका असली मकसद अमेरिका और भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में झगड़े और फूट पैदा करना है। साथ ही, ये चीन को एक ऐसे ‘नेक’ देश के रूप में दिखाते हैं जो दुनिया को अमेरिका के असर से बचा रहा है। क्यूबा में चल रहे वामपंथी आंदोलन में यह खेल साफ-साफ देखा जा सकता है।

इनके काम करने का तरीका बहुत सीधा है, ये किसी भी तरह दुनिया को यह यकीन दिलाना चाहते हैं कि चीन की ‘मार्क्सवादी-नक्सलवादी’ सोच ही सबसे बढ़िया और भली है। दूसरी तरफ, ये अमेरिका और उसकी व्यापारिक नीतियों को दुनिया की हर मुसीबत की जड़ और सबसे बड़ी बुराई के रूप में दिखाते हैं।

नेविल रॉय सिंघम का ‘चीन प्रेम’: प्रोपेगेंडा के दम पर दुश्मन देशों को बर्बाद करने वाली सैकड़ों संस्थाओं का खुलासा

मार्च 2026 की शुरुआत में, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और नेविल रॉय सिंघम के संगठन ‘हाउस ऑफ सिंघम’ के बीच संदिग्ध रिश्तों की सरकारी जाँच शुरू हो गई है। अमेरिका के अधिकारी अब इस बात की गहराई से छानबीन कर रहे हैं कि सिंघम को चीन से कितना पैसा मिल रहा है, मीडिया और राजनीति में उनकी कितनी पकड़ है और उनके इन कामों से अमेरिका के हितों को कितना नुकसान पहुँच रहा है।

चाहे अमेरिका में फिलिस्तीन के समर्थन में होने वाले प्रदर्शन हों, क्यूबा में वामपंथी कार्यकर्ताओं का जमावड़ा हो या ईरान युद्ध के खिलाफ उठने वाली आवाजें, ऊपर से देखने में ये सब आम लोगों का गुस्सा लग सकते हैं, लेकिन असलियत कुछ और ही है। ये प्रदर्शन असल में एक बहुत बड़ी और सोची-समझी साजिश का हिस्सा हैं, जिन्हें मोटी फंडिंग और खास राजनीतिक मकसद के साथ चलाया जा रहा है। इन सबकी डोर नेविल सिंघम के उस नेटवर्क से जुड़ी है, जिसमें एनजीओ (NGO), मीडिया हाउस, बड़े-बड़े बुद्धिजीवी और मशहूर हस्तियाँ शामिल हैं।

फॉक्स न्यूज ने इस सच को सामने लाने के लिए हजारों टैक्स कागजात, संगठनों के रिकॉर्ड, पैसों के लेन-देन और सोशल मीडिया पोस्ट की जाँच की है। इस बड़ी पड़ताल के लिए आधुनिक एआई (AI) तकनीक और खुले सोर्स से मिली जानकारियों का इस्तेमाल किया गया है, जिससे सिंघम के इस नेटवर्क की एक-एक परत खुल गई है।

फॉक्स न्यूज की एक बड़ी रिपोर्ट, जिसका नाम ‘तबाही मचाने वाला जोड़ा’ (Power Couple of Chaos) है, उसने नेविल रॉय सिंघम और उनकी पत्नी इवांस के काले कारनामों की पोल खोल दी है। जाँच में पता चला है कि 2017 से अब तक सिंघम ने चीन के समर्थन में माहौल बनाने के लिए सीधे तौर पर 2300 करोड़ रुपए फूँक दिए हैं। अगर 2025 तक के पूरे लेनदेन को देखें, तो यह आँकड़ा करीब 5000 करोड़ रुपए तक पहुँच जाता है। यह भारी-भरकम पैसा दुनिया भर की 1000 से ज्यादा संस्थाओं में बाँटा गया। इनमें से लगभग 200 संगठन तो ऐसे हैं जिनका काम ही सिर्फ चीन की तारीफ करना और अमेरिका व अन्य लोकतांत्रिक देशों की बुराई करना है।

रिपोर्ट के मुताबिक, सिंघम और उनकी पत्नी इवांस ने पूरी दुनिया में करीब 2000 कट्टर वामपंथी संगठनों का एक ऐसा जाल बिछा दिया है, जो चीन, रूस, ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया जैसे तानाशाह देशों का पक्ष लेते हैं। एक्टिविस्टों के बीच ऐसे लोगों को ‘टैंकी’ (Tankies) कहा जाता है, यानी वो लोग जो अपनी ही लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ जाकर तानाशाही सरकारों का गुणगान करते हैं। इस समय सिंघम के नेटवर्क से जुड़े कई बड़े नेता क्यूबा में बैठकर कम्युनिस्टों के लिए अभियान चला रहे हैं।

नेविल रॉय सिंघम पर आरोप है कि उन्होंने टैक्स बचाने और पैसा घुमाने के लिए फर्जी कंपनियों (शेल कंपनियों) का एक जाल बिछाया था। उन्होंने गोल्डमैन साच्स जैसी बड़ी संस्था से जुड़े एक खास फंड का इस्तेमाल किया ताकि करोड़ों रुपए बिना किसी रोक-टोक के इधर-उधर भेजे जा सकें। हालाँकि, मामला संदिग्ध लगने पर गोल्डमैन साच्स ने फरवरी 2024 में सिंघम के इस खाते को पूरी तरह बंद कर दिया।

चीन के समर्थन में काम करने वाले इस पूरे नेटवर्क की शुरुआत साल 2017 में हुई, जब नेविल सिंघम ने जोडी इवांस (Jodie Evans) से जमैका में शादी की। जोडी खुद एक एक्टिविस्ट ग्रुप की मालकिन हैं। इस शादी में दुनिया भर के 80 से ज्यादा बड़े वामपंथी नेता शामिल हुए थे, जिनमें विजय प्रसाद नाम के एक नक्सलवादी पत्रकार भी थे।

विजय प्रसाद ने बाद में सिंघम के इस नेटवर्क को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई और कई फर्जी कंपनियों के बोर्ड मेंबर बने। फॉक्स न्यूज की जाँच में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। सिंघम के ये ज्यादातर संगठन किसी बड़े दफ्तर के बजाय साधारण होटलों या कूरियर दुकानों (UPS Store) के पते पर रजिस्टर्ड हैं। ऐसा इसलिए किया गया ताकि पैसों के लेन-देन को छिपाया जा सके और किसी को कानों-कान खबर न हो कि ये पैसा कहाँ से आ रहा है और कहाँ जा रहा है।

जाँच में सामने आया है कि इस पूरे खेल के पीछे अमेरिका की 11 संस्थाएँ (NGOs) मुख्य केंद्र के रूप में काम कर रही हैं। इनका काम बहुत व्यवस्थित है। ये पैसा बाँटते हैं, विरोध-प्रदर्शनों की प्लानिंग करते हैं, खबरें और Video बनवाते हैं और लोगों को एक खास राजनीतिक विचारधारा की ट्रेनिंग देते हैं। इन्होंने ‘लिबरेशन सेंटर’ (मुक्ति केंद्र) भी खोले हैं, जो बिल्कुल पुराने चीनी नेता माओ जे़दोंग की ‘यूनाइटेड फ्रंट’ रणनीति जैसे हैं।

इस रणनीति का मतलब है कि अपने ‘खास लोगों’ को समाज के हर हिस्से, ‘जैसे मीडिया, मजदूर संगठनों और स्कूलों’ में इस तरह घुसा दो कि वे ऊपर से तो स्वतंत्र लगें, लेकिन अंदर ही अंदर अपने ही देश की सरकार और उसकी साख को दीमक की तरह खोखला करते रहें।

अगर पैसों की बात करें, तो नेविल रॉय सिंघम ने बड़ी ही चालाकी से पैसा घुमाया है। उन्होंने गोल्डमैन साच्स के एक फंड और दो फर्जी (शेल) कंपनियों का इस्तेमाल करके करीब 2,300 करोड़ रुपए छह अलग-अलग एनजीओ में डाले। यह भारी-भरकम रकम ही उस मशीनरी को चलाने के लिए पेट्रोल का काम कर रही है, जिसका इकलौता मकसद चीन की तारीफ करना और विरोधी देशों को कमजोर करना है।

जाँच से पता चला है कि नेविल रॉय सिंघम ने कई संस्थाओं (NGOs) को मालामाल कर दिया है। उन्होंने ‘पीपुल्स फोरम’ को करीब 185 करोड़ रुपए, ‘पीपुल्स सपोर्ट फाउंडेशन’ को लगभग 1400 करोड़ रुपए और ‘जस्टिस एंड एजुकेशन फंड’ को 570 करोड़ रुपए दिए। इस खेल में ‘ब्रेकथ्रू मीडिया’ और ‘कोडपिंक’ जैसे संगठन भी शामिल हैं (कोडपिंक की मालिक सिंघम की पत्नी जोडी इवांस ही हैं)। साथ ही, विजय प्रसाद नाम के पत्रकार की कंपनी ‘ट्राईकॉन्टिनेंटल’ को भी इस नेटवर्क से मोटी फंडिंग मिली है।

इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब सितंबर 2025 में अमेरिकी संसद की एक बड़ी कमेटी ने ‘द पीपुल्स फोरम’ के कागजात खंगालने शुरू किए। इस संस्था पर गंभीर आरोप हैं कि इसका सीधा रिश्ता चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से है। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि यह संगठन एक तरफ तो अमेरिका में ‘NGO’ बनकर टैक्स बचाने का फायदा उठा रहा था, और दूसरी तरफ चोरी-छिपे चीन के करीबी नेविल सिंघम से करोड़ों रुपए ले रहा था।

अमेरिकी सांसद जेसन स्मिथ की रिपोर्ट ने ‘द पीपुल्स फोरम’ नाम के संगठन की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। इस संगठन ने न केवल इजरायल में हमास के आतंकी हमले को सही ठहराया, बल्कि अमेरिका के कॉलेजों में दंगे और हिंसा भड़काने का काम भी किया। खुद इस संस्था ने माना है कि उसे नेविल रॉय सिंघम से 165 करोड़ रुपए से ज्यादा की फंडिंग मिली है। असल में यह संगठन पढ़ाई के नाम पर ऐसे कोर्स चलाता है, जिनका मकसद सिर्फ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रचार करना है।

जाँच में सामने आया कि 2017 से 2022 के बीच सिंघम और उनकी पत्नी ने बड़ी चालाकी से फर्जी (शेल) कंपनियों के जरिए इस संगठन को पैसा पहुँचाया। यह अब पूरी तरह साफ हो चुका है कि ‘द पीपुल्स फोरम’ कोई स्वतंत्र संस्था नहीं, बल्कि सिंघम के उस नेटवर्क का हिस्सा है जो सिर्फ चीन के इशारे पर काम करता है।

नेविल रॉय सिंघम का रिकॉर्ड काफी पुराना और संदिग्ध है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1974 में ही FBI ने उनके खिलाफ जाँच शुरू कर दी थी क्योंकि वे उन गुटों से जुड़े थे जो अमेरिका के दुश्मन माने जाते थे। इतना ही नहीं, सिंघम ने सालों तक विवादित चीनी कंपनी हुवावे (Huawei) के लिए भी काम किया। बता दें कि हुवावे के रिश्ते चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से इतने गहरे हैं कि कंपनी ने खुद माना था कि उनके ऑफिस के अंदर चीन की सरकारी ‘पार्टी कमेटी’ बैठती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि नेविल सिंघम का यह पूरा तामझाम असल में ‘खबरों की हेराफेरी’ (Information Laundering) करने का एक अड्डा है। इसका एक ही मकसद है ‘पूरी दुनिया में चीन की तारीफ करवाना और अमेरिका के भीतर झगड़े पैदा करना’।

हैरानी की बात यह है कि जो विरोध-प्रदर्शन देखने में आम जनता का गुस्सा लगते हैं, (जैसे ईरान युद्ध का विरोध या क्यूबा की सरकार का समर्थन) वे असल में पूरी तरह से स्क्रिप्टेड होते हैं। सिंघम के मीडिया चैनल (जैसे ‘ब्रेकथ्रू न्यूज’) इन प्रदर्शनों की प्रोफेशनल तरीके से शूटिंग करते हैं, उन्हें शानदार वीडियो और कमेंट्री के साथ तैयार करते हैं और फिर Social Media पर फैला देते हैं। यह सब इसलिए किया जाता है ताकि दुनिया को लगे कि ये कोई बहुत बड़ा ‘जन-आंदोलन’ है, जबकि हकीकत में यह एक सोची-समझी साजिश होती है।

इसी साल फरवरी में विशेषज्ञ एडम सोहन ने अमेरिकी संसद में इस जाल की पोल खोलते हुए कहा, “यह कोई आम जनता का विरोध नहीं है। यह एक ऐसा सेट सिस्टम है जिसे जब चाहे, जहाँ चाहे, अमेरिका के काम-काज को रोकने (जाम करने) के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।”

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल के लिए पैसा अमेरिका के ही टैक्स कानूनों (NGO के जरिए मिलने वाली छूट) से आ रहा है, लेकिन इसका रिमोट कंट्रोल एक दुश्मन देश (चीन) के हाथ में है। सोहन ने चेतावनी दी कि यह हमारे देश की सुरक्षा में एक ऐसा छेद है जिसे हमें तुरंत बंद करना होगा।

हाउस कमेटी की वेबसाइट से लिया गया प्रासंगिक अंश

रॉय सिंघम और PSL से जुड़ा जिहादी ढेर: 2025 में अमेरिकी इजराइली दूतावास पर किया था हमला

रॉय सिंघम का नेटवर्क सिर्फ भाषण देने या विरोध-प्रदर्शन करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अब इसके तार हत्या और आतंक से भी जुड़ चुके हैं। मई 2025 में वॉशिंगटन डीसी (अमेरिका) में ‘एलियास रोड्रिगेज’ नाम के एक कट्टरपंथी ने ‘फ्री फिलिस्तीन’ के नारे लगाते हुए इजराइली दूतावास के दो कर्मचारियों का कत्ल कर दिया था। जब जाँच हुई, तो पता चला कि यह हत्यारा ‘पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन’ (PSL) नाम के एक कम्युनिस्ट ग्रुप से जुड़ा था। चौंकाने वाली बात यह है कि इस ग्रुप को चीन का प्रोपेगेंडा फैलाने वाले नेविल रॉय सिंघम और उनकी पत्नी मोटी फंडिंग देते हैं।

इतना ही नहीं, यह कातिल ‘ANSWER कोअलिशन’ जैसे कट्टरपंथी समूहों का भी हिस्सा रहा है और उनके लिए चंदा इकट्ठा करता था। रिपोर्टों से साफ हुआ है कि ये सभी संगठन ‘पीपुल्स फोरम’ नाम की संस्था से जुड़े हैं, जिसका सीधा कनेक्शन रॉय सिंघम के जरिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से है। इससे यह साफ हो जाता है कि चीन से आने वाला यह पैसा केवल राजनीति के लिए नहीं, बल्कि दुनिया भर में हिंसा और दहशत फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

चीन से पैसा पाने वाला संगठन ‘पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन’ (PSL) लगातार भारत की मोदी सरकार को निशाना बना रहा है। इस ग्रुप ने भारत को बदनाम करने के लिए गुजरात दंगों से लेकर किसान कानूनों और बेरोजगारी जैसे छह बड़े मुद्दों को अपना हथियार बना रखा है। इस संगठन की पोल तब खुली जब इसने ‘न्यूज़क्लिक’ (NewsClick) का बचाव करना शुरू किया। जब भारत सरकार ने चीन का प्रोपेगेंडा फैलाने के आरोप में न्यूजक्लिक पर एक्शन लिया, तो PSL ने इसे सरकार की तानाशाही बताकर शोर मचाना शुरू कर दिया।

हैरानी की बात तो यह है कि जब मशहूर अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स‘ ने न्यूजक्लिक और उसके एडिटर प्रबीर पुरकायस्थ के चीन से जुड़े रिश्तों का पर्दाफाश किया, तो PSL ने उस अखबार के दफ्तर के बाहर ही विरोध प्रदर्शन कर दिया। इस संगठन का कहना है कि मोदी सरकार जानबूझकर वामपंथी विचारकों को ‘देशद्रोही’ बताकर उनकी आवाज दबा रही है। साफ़ है कि यह पूरा ग्रुप चीन के इशारे पर भारत की छवि खराब करने और चीनी एजेंटों को बचाने की एक बड़ी मशीन की तरह काम कर रहा है।

ब्रेकथ्रू न्यूज: सिंघम के पैसे से चलने वाली चीन की ‘प्रोपेगेंडा मशीन’

2019 में शुरू हुआ ‘ब्रेकथ्रू न्यूज‘ (BreakThrough News) कहने को तो एक न्यूज चैनल है, लेकिन असल में यह चीन के इशारे पर काम करता है। रिकॉर्ड बताते हैं कि नेविल रॉय सिंघम ने इस चैनल को ‘समाज सेवा’ के नाम पर करीब 9 करोड़ रुपए का मोटा चंदा दिया। यह चैनल एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है जिसका काम ही दुनिया भर में चीन की तारीफ करना और उसके विरोधियों को बदनाम करना है। इसकी हर खबर, चाहे वो इजरायल के खिलाफ हो या क्यूबा के समर्थन में, हमेशा चीन की पसंद के हिसाब से ही बनाई जाती है।

फॉक्स न्यूज की एक रिपोर्ट ‘शंघाई सेबोटेज’ ने खुलासा किया है कि यह नेटवर्क अमेरिका को नीचा दिखाने के लिए पूरी प्लानिंग और स्क्रिप्ट के साथ काम करता है। मिसाल के तौर पर, क्यूबा में हुए एक प्रदर्शन को इस चैनल ने बड़े क्रांतिकारी अंदाज में दिखाया और इसे अमेरिकी सरकार के खिलाफ एक बड़ी बगावत बता दिया। इसके बाद, दुनिया भर के कम्युनिस्ट मीडिया संगठनों ने इस वीडियो को फैलाया ताकि लोगों के मन में कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति सहानुभूति पैदा की जा सके और चीन का नैरेटिव सेट हो सके।

आसान शब्दों में कहें तो, ये विरोध प्रदर्शन असल में एक सोची-समझी स्क्रिप्ट (नाटक) की तरह होते हैं। होता यह है कि रॉय सिंघम के नेटवर्क से जुड़े लोग पहले एक प्रदर्शन आयोजित करते हैं, फिर उनके ही नेटवर्क के मीडिया चैनल उसे ‘सच्चा आंदोलन’ बताकर कवर करते हैं। बाद में इसे दुनिया भर में फैलाया जाता है ताकि लोगों की सहानुभूति जीती जा सके और सरकारों पर दबाव बनाया जा सके। इसका असली मकसद सिर्फ एक है, कम्युनिस्ट विचारधारा को फैलाना और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के लिए समर्थन जुटाना।

फॉक्स न्यूज की एक रिपोर्ट ने इस बड़े जाल का खुलासा किया है। सिंघम का यह नेटवर्क अमेरिका में इजरायल विरोधी प्रदर्शन कराने से लेकर भारत में प्रोपेगेंडा फैलाने और दक्षिण अफ्रीका की लेबर यूनियनों को अपने कब्जे में लेने तक फैला हुआ है। यह एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय खेल है, जो कई मुखौटा कंपनियों और एक ही पते के पीछे छिपा है। इनका एकमात्र मिशन दुनिया भर में मार्क्सवाद फैलाना और चीन को अमेरिका के मुकाबले दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनाना है।

हैरानी की बात यह है कि नेविल रॉय सिंघम का परिवार विदेशी राजनीति को अपने हिसाब से चलाने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहा है। रॉय सिंघम की बहन शांति सिंघम और उनके पति डेनियल गुडविन ने न्यूयॉर्क के मेयर चुनाव में एक खास राजनीतिक गुट को मोटा चंदा दिया। दिलचस्प बात यह है कि डेनियल पहले रॉय सिंघम की ही कंपनी ‘थॉटवर्क्स’ में बड़े पद पर काम कर चुके हैं। इससे साफ होता है कि यह परिवार सिर्फ बिजनेस ही नहीं, बल्कि विदेशों में राजनीतिक जोड़-तोड़ में भी लगा हुआ है।

चीन के कट्टर समर्थक रॉय सिंघम खुलेआम चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तारीफ करते हैं। वे दुनिया में चल रहे मौजूदा नियमों को ‘झूठ’ बताते हैं और कहते हैं कि पूरी दुनिया को माओ ज़ेदोंग के दिखाए रास्ते पर चलना चाहिए। वे अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों के सख्त खिलाफ हैं और चाहते हैं कि दुनिया चीन के हिसाब से चले।

सिंघम ने अपने एक भाषण में पश्चिमी देशों पर हमला करते हुए कहा कि ये देश लोकतंत्र की रक्षा का सिर्फ दिखावा करते हैं। उन्होंने दावा किया कि असल में सोवियत संघ और चीन के लोगों ने ही अपने बलिदान से मानवता को बचाया है। सिंघम का मानना है कि केवल समाजवादी सोच ही दुनिया की बड़ी ताकतों को हरा सकती है। कुल मिलाकर, वे चीन की ताकत और उसकी सोच को पूरी दुनिया पर थोपना चाहते हैं।

नेविल रॉय सिंघम का असली मकसद अब सबके सामने है। उन्होंने साफ कहा है कि अगर दुनिया को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी के हिसाब से चलाना है, तो हमें इतिहास की उन पुरानी बातों को बदलना होगा जिन्हें दुनिया अब तक सच मानती आई है। सिंघम चाहते हैं कि दुनिया वैसी ही दिखे और सोचे, जैसा चीन चाहता है।

हैरानी की बात यह है कि इस काम के लिए सिंघम ने अमेरिका के ही पैसे का इस्तेमाल किया है। ‘फॉक्स न्यूज’ की रिपोर्ट ने एक ऐसी ‘सीक्रेट पाइपलाइन’ का पर्दाफाश किया है, जिसके जरिए अमेरिका की तीन बड़ी संस्थाओं (NGOs) ने 2021 से अब तक करीब 75 करोड़ रुपए ($91 लाख) चीन भेजे हैं। यह पैसा सात बार में ‘शंघाई माकु कल्चरल कम्युनिकेशंस’ नाम की एक कंपनी को दिया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह कंपनी खुद सिंघम की ही एक आलीशान बिल्डिंग के पते पर चल रही है और इसका इकलौता काम इंटरनेट पर चीन के पक्ष में झूठा प्रचार (प्रोपेगेंडा) फैलाना है।

(सोर्स: फॉक्स न्यूज)

विजय प्रसाद, न्यूज़क्लिक और सिंघम: भारत में चीनी प्रोपेगेंडा का ‘तिगड़ा’

फॉक्स न्यूज की जाँच ने खुलासा किया है कि नेविल रॉय सिंघम ने भारत के खिलाफ एक बड़ा जाल बिछा रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, सिंघम की संस्था ने दिल्ली के न्यूज़ पोर्टल ‘न्यूजक्लिक’ (NewsClick) को लगभग 87 करोड़ रुपए (10.5 मिलियन डॉलर) का भारी-भरकम चंदा दिया। इसी वजह से भारत सरकार ने सिंघम के खिलाफ समन जारी किया है। उन पर भारत के चुनावों में दखल देने, पैसों की हेराफेरी (मनी लॉन्ड्रिंग) और अशांति फैलाने की साजिश रचने जैसे गंभीर आरोप हैं।

इस पूरे खेल में विजय प्रसाद एक मुख्य खिलाड़ी के रूप में सामने आए हैं। वे ‘ट्राइकॉटिनेंटल’ (TriContinental) नाम की संस्था से जुड़े हैं, जो सिंघम के नेटवर्क का एक खास हिस्सा है। न्यूजक्लिक और विजय प्रसाद की भारत विरोधी हरकतों का खुलासा पहले भी होता रहा है।

सिंघम खुद ‘ट्राइकॉटिनेंटल’ के सलाहकार बोर्ड में शामिल हैं और इसे चलाने के लिए मोटी फंडिंग देते हैं। आरोप है कि सिंघम अमेरिका की संस्थाओं का इस्तेमाल करके चीन का प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए पैसा पहुँचा रहे हैं। इतना ही नहीं, सिंघम ‘लेफ्ट वर्ड बुक्स’ और ‘ग्लोबट्रॉटर’ जैसी संस्थाओं के जरिए भी इस पूरे नैरेटिव को कंट्रोल करते हैं ताकि दुनिया भर में चीन की बात रखी जा सके।

विजय प्रसाद का मामला सिर्फ विचारधारा का नहीं है, बल्कि इनके तार सीधे भारत की राजनीति से जुड़े हैं। विजय प्रसाद माकपा (CPI-M) की बड़ी नेता वृंदा करात के भतीजे हैं। वृंदा करात के पति और दिग्गज नेता प्रकाश करात के कुछ ईमेल भी सामने आए थे, जिनसे पता चला कि उनके नेविल रॉय सिंघम के साथ बहुत करीबी रिश्ते हैं और वे न्यूजक्लिक के चीनी फंडिंग मामले में शामिल थे।

न्यूजक्लिक का नाम पहली बार 2021 में तब उछला जब ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने इसकी जाँच शुरू की। इस पोर्टल पर आरोप है कि इसने गलत तरीके से विदेश से करीब 38 करोड़ रुपए मँगाए। जब 2023 में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने रॉय सिंघम और चीन के इस पूरे खेल का पर्दाफाश किया, तो विजय प्रसाद ने इसे सरकार की साजिश बताकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की।

विजय प्रसाद ‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ नाम के एक अंतरराष्ट्रीय ग्रुप के बड़े सदस्य भी हैं। यह ग्रुप दुनिया भर के वामपंथी कार्यकर्ताओं को एक साथ लाता है। यह संगठन लगातार मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए ऐसे लेख छापता है जिनसे भारत की छवि खराब हो। इस मंच पर हर्ष मंदर जैसे लोगों के भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी लेख भरे पड़े हैं। इस ग्रुप में जयती घोष और ब्रिटेन के नेता जेरेमी कॉर्बिन जैसे लोग भी शामिल हैं, जो अक्सर भारत के खिलाफ बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं।

‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ का जाल सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार विवादित ‘टाइडस फाउंडेशन’ (Tides Foundation) से भी जुड़े हैं। यह फाउंडेशन हमास का समर्थन करने वाले संगठनों को पैसा देता है। चौंकाने वाली बात यह है कि इसी टाइडस फाउंडेशन का सीधा कनेक्शन नेविल रॉय सिंघम और न्यूजक्लिक (NewsClick) से भी पाया गया है।

टाइडस फाउंडेशन भारत और हिंदू-विरोधी गुटों को पैसा पहुँचाने के लिए बदनाम है। इसने ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) जैसे संगठनों को बड़ी मदद दी है, जिनके तार कट्टरपंथियों और खालिस्तानियों से जुड़े हैं। इस संस्था को बनाने के पीछे भी उन्हीं लोगों का हाथ था जो अमेरिका में बैठकर भारत के खिलाफ माहौल बनाते हैं।

इतना ही नहीं, टाइडस फाउंडेशन ने ‘अमन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट’ (AMAN) को भी पैसा दिया है। यह वही ट्रस्ट है जिसका नाम न्यूजक्लिक-चीन फंडिंग घोटाले में सामने आया था। आरोप है कि चीन ने न्यूजक्लिक के जरिए भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचाने के लिए करोड़ों रुपए भेजे थे।

चीन के एजेंट रॉय सिंघम ने ‘पीपुल्स डिस्पैच’ जैसे कई विदेशी न्यूज पोर्टल्स में करोड़ों रुपए लगाए हैं। इन्हीं मंचों का इस्तेमाल करके विजय प्रसाद जैसे लोग लगातार भारत के खिलाफ लेख लिखते हैं और चीन के एजेंडे को बढ़ावा देते हैं।

‘पीपुल्स डिस्पैच’ नाम का पोर्टल खुद को जनता की आवाज कहता है, लेकिन असल में इसका इस्तेमाल खास एजेंडा चलाने के लिए होता है। उदाहरण के लिए, जनवरी 2020 में विजय प्रसाद ने इस पोर्टल पर जेएनयू (JNU) के प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया था और मोदी सरकार के खिलाफ जमकर निशाना साधा था। इससे साफ पता चलता है कि यह पोर्टल किस तरह की सोच को बढ़ावा देता है।

नेविल रॉय सिंघम ने अपनी बड़ी टीम में कुछ भारतीयों को भी जोड़ा था, जो ‘ट्राइकॉटिनेंटल’ जैसे एनजीओ के लिए काम करते थे। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ये संस्थाएँ चीन के एजेंडे को फैलाने का काम कर रही थीं। सिंघम की इस टीम में प्रबीर पुरकायस्थ, सृजना, प्रशांत और विजय प्रसाद जैसे मुख्य नाम शामिल थे, जो भारत में बैठकर चीन के पक्ष में माहौल तैयार कर रहे थे।

इतना ही नहीं, विजय प्रसाद के रिश्ते पी साईनाथ से भी काफी करीबी रहे हैं। पी साईनाथ के पोर्टल ‘पारी’ (PARI) का नाम भी तब उछला जब सिंघम और चीन के प्रोपेगेंडा नेटवर्क का सच सबके सामने आया। जैसे ही यह विवाद बढ़ा, ‘पारी’ ने तुरंत अपने पोर्टल से सिंघम से जुड़ी सारी जानकारियाँ हटा दीं ताकि उनकी पोल न खुल जाए।

न्यूजक्लिक (NewsClick) का हिंदू-विरोधी रवैया तो पुराना है, लेकिन अब इसके चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से रिश्तों की परतें खुल रही हैं। 2023 में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया कि नेविल रॉय सिंघम के नेतृत्व में संस्थाओं और फर्जी कंपनियों का एक ऐसा जाल बिछाया गया है, जिसका सीधा कंट्रोल चीन के पास है। 2024 में दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में बताया कि इस पूरे खेल का ‘असली मालिक और पैसा देने वाला’ चीन ही है। आरोप है कि चीनी फंड का इस्तेमाल कश्मीर और किसान आंदोलन जैसे मुद्दों पर भारत के खिलाफ झूठ फैलाने के लिए किया गया। यह मामला अभी अदालत में चल रहा है।

2021 में ही ‘ऑपइंडिया‘ ने न्यूजक्लिक के कनेक्शनों की जाँच की थी, जिसमें उन चेहरों का पर्दाफाश हुआ था जो लगातार भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। इसमें ‘अर्बन नक्सल’ से लेकर तीस्ता सीतलवाड़ और अभिसार शर्मा जैसे लोगों के नाम शामिल हैं। इससे साफ है कि न्यूजक्लिक एक न्यूज पोर्टल नहीं, बल्कि भारत विरोधी एजेंडा चलाने का एक अड्डा बन चुका है।

सीधी बात यह है कि नेविल रॉय सिंघम का यह काम कोई ‘समाज सेवा’ नहीं, बल्कि चीन की एक सोची-समझी साजिश है। यह नेटवर्क एनजीओ और डिजिटल मीडिया का सहारा लेकर ‘स्वतंत्र न्यूज’ के नाम पर चीन की बातों को दुनिया में फैलाता है। जैसे अमेरिका अपनी ताकत का इस्तेमाल करता है, वैसे ही चीन ने भारत और अमेरिका जैसे देशों के भीतर अपने ‘बौद्धिक मोहरे’ (Intellectual Assets) तैयार कर लिए हैं, जो अंदर ही अंदर लोकतंत्र को कमजोर करने में लगे हैं।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

मिडिल ईस्ट वॉर, फ्यूल संकट और ‘लॉकडाउन’ की राजनीति: डर फैलाकर वोट बटोरने की जुगत में ममता बनर्जी, जानें पहले कब-कब फैलाई अफवाह

पश्चिम एशिया में जारी तनाव, खासकर ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावित होने की खबरों ने वैश्विक तेल और गैस सप्लाई को लेकर आशंकाएँ बढ़ा दी हैं। भारत जैसे देश जो बड़े पैमाने पर तेल आयात पर निर्भर हैं, स्वाभाविक रूप से सतर्क हो गए हैं।

इसी बीच देश के भीतर एक अलग ही बहस छिड़ गई कि क्या भारत में फिर से लॉकडाउन लग सकता है? क्योंकि ममता बनर्जी ने लॉकडाउन लगने की अफवाहों को फैलाना का काम जोरदार तरीके से किया। हालाँकि केंद्र सरकार ने उनकी इन हरकतो के सफल होने से पहले ही जनता तक संदेश पहुँचा दिया है कि लोग अफवाहों पर ध्यान न दें।

ममता बनर्जी का लॉकडाउन बयान: आशंका या सियासत?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया कि केंद्र सरकार फ्यूल संकट के बहाने देश में लॉकडाउन लगा सकती है।

ममता बनर्जी ने गुरुवार (26 मार्च 2026) को पश्चिम बर्धमान के पांडवेश्वर में चुनाव प्रचार करते हुए कहा, “वे (केंद्र सरकार) लॉकडाउन लगा सकते हैं। लोग घरों में बंद रहेंगे। 2021 में लॉकडाउन के समय मैंने लड़ाई लड़ी थी, अब भी लड़ सकती हूँ।” उन्होंने LPG सिलेंडर की बुकिंग 25-35 दिन बाद मिलने की बात कही। उन्होंने कहा कि घरेलू सिलेंडर के दाम बढ़ गए। पेट्रोल की कीमत बढ़ गई। क्या केंद्र सरकार फिर लॉकडाउन की तैयारी कर रही है?

केंद्र सरकार के मंत्रियों ने खारिज किए अफवाह

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने एक्स पर लिखा, “लॉकडाउन की अफवाहें पूरी तरह झूठी हैं। सरकार के पास ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं। हम ऊर्जा, सप्लाई चेन और जरूरी चीजों पर नजर रख रहे हैं। लोग शांत रहें, जिम्मेदार रहें।”

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कहा, “मैं लोगों को भरोसा दिलाना चाहती हूँ कि कोई लॉकडाउन नहीं होगा। कुछ नेता बेबुनियाद बातें कर रहे हैं। कोविड जैसा लॉकडाउन कभी नहीं होगा।”

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी अफवाहों को खारिज करते हुए कहा कि पीएम मोदी ने खुद पैनिक न करने को कहा है। जमाखोरी पर चेतावनी दी गई है। राज्य सरकारें होर्डिंग न करें। पूरी स्थिति केंद्र के नियंत्रण में है।

तो फिर डर क्यों फैला रही हैं ममता बनर्जी?

राजनीतिक फायदा उठाने के चक्कर में ममता डर फैला रही हैं। ममता बनर्जी जानती हैं कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ईंधन संकट का मुद्दा उनके लिए सोने का अंडा साबित हो रहा है। वे लोगों में डर पैदा करके कह रही हैं कि केंद्र सरकार लॉकडाउन लगा रही है, LPG 25 दिन बाद मिलेगा, खाना कैसे पकाएँगे, ट्रांसपोर्ट कैसे चलेगा।

लेकिन असल में केंद्र सरकार पहले से ही एक्शन ले रही है, जिसमें एक्साइज ड्यूटी कम की, एक्सपोर्ट पर ड्यूटी लगाई, सप्लाई चेन को मजबूत किया।

दरअसल, ममता का मकसद साफ है, वो है- आम जनता को भड़काना, मोदी सरकार को बदनाम करना और टीएमसी के वोट बैंक को मजबूत करना। वे जानती हैं कि डर का माहौल बन गया तो लोग सोचेंगे ‘मोदी सरकार फेल हो गई’।

दरअसल, ममता खुद के राज्य में LPG और पेट्रोल की सप्लाई सुधारने में कुछ नहीं कर रही। सिर्फ आरोप लगा रही हैं। चुनावी फायदे के लिए लोगों को अनावश्यक चिंता में डालना गलत है। आम आदमी पहले से परेशान है, उस पर ममता का ये डर और बढ़ा रहा है।

ममता बनर्जी ने पहले भी लोगों को भड़काया, वो हैबिचुएल ऑफेंडर

ममता बनर्जी का ये तरीका नया नहीं। वे हर मुद्दे को राजनीति बना लेती हैं। वो डर की राजनीति करती रही हैं शुरुआत से। कभी वामपंथ का डर दिखाकर, कभी कॉन्ग्रेस का डर दिखाकर, कभी बीजेपी का डर दिखाकर, तो कभी हिंदुओं का डर दिखाकर। देखें- कैसे लोगों को भड़काकर वोट बटोरती रही हैं ममता बनर्जी-

सीएए के नाम पर: जब नागरिकता संशोधन कानून आया तो ममता ने पूरे बंगाल में हंगामा मचा दिया। ममता बनर्जी ने कहा कि मुसलमानों के अधिकार छिन जाएँगे। उन्होंने पूरे बंगाल में शाहीन बाग स्टाइल में प्रदर्शन तक करवाए। लेकिन सच्चाई सामने आ गई कि सीएए किसी की नागरिकता नहीं छीनता, बल्कि पड़ोसी देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देता है। इसके बावजूद ममता ने सिर्फ वोट बैंक बचाने के लिए भ्रम फैलाया और अब तक वो इस मुद्दे पर भ्रम ही फैला रही हैं।

एसआईआर के नाम पर: एसआईआर के दौरान जब कुछ जाँच एजेंसियाँ सक्रिय हुईं तो ममता ने इसे भी साजिश बताया। उन्होंने कहा कि आम मुसलमानों के वोट काटे जा रहे हैं। ममता ने इसे राजनीतिक हथियार बनाते हुए चुनाव आयोग के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया और दिल्ली तक प्रदर्शन कर डाले।

कोरोना के नाम पर: बता दें कि साल 2021 के चुनाव के समय आंशिक लॉकडाउन चल रहा था। चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने दावा करते हुए कहा कि केंद्र ने कुछ नहीं किया, सिर्फ टीएमसी लड़ रही है। लेकिन असल में केंद्र ने वैक्सीन, ऑक्सीजन, फंड सब दिया। ममता ने इसका इस्तेमाल सिर्फ अपनी छवि चमकाने के लिए किया।

केंद्रीय योजनाओं के नाम पर: पीएम आवास योजना, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत जैसी स्कीमों पर ममता हमेशा हमला करती हैं। कहती हैं केंद्र कुछ नहीं दे रहा। लेकिन हकीकत ये है कि बंगाल में लाखों लोग इन योजनाओं से फायदा ले रहे हैं। ममता सिर्फ क्रेडिट लेने के चक्कर में विरोध करती हैं।

इस तरह ममता हर बार डर और भ्रम फैलाकर वोट बटोरती हैं।

ममता की ये राजनीति आम आदमी को पहुँचा रही है नुकसान

आज ईंधन संकट है तो हर राज्य प्रभावित है। केरल, तमिलनाडु, असम के मुख्यमंत्री भी चिंतित हैं। लेकिन वे मीटिंग में समाधान ढूँढ रहे हैं। ममता अकेली हैं जो लॉकडाउन का डर दिखा रही हैं। उनका बयान सुनकर लोग पैनिक खरीदारी कर रहे हैं। LPG सिलेंडर की होर्डिंग बढ़ रही है। छोटे दुकानदार, ट्रांसपोर्ट वाले, गरीब परिवार सबसे ज्यादा परेशान हो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल के लोग जानते हैं कि ममता का रिकॉर्ड क्या है- संदेशखाली, टीएमसी के गुंडागर्दी, भर्ती घोटाले। अब ईंधन संकट को भी वोट में बदलने की कोशिश। लेकिन इस बार लोग समझ रहे हैं।

ममता का डर लोगों को नहीं, खुद को बचाने का है

ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार पर हमला कर रही हैं क्योंकि चुनाव आ रहे हैं। लेकिन असल में बंगाल की जनता महँगाई, बेरोजगारी, अपराध से परेशान है। ईंधन संकट राष्ट्रीय समस्या है। इसमें सबको साथ मिलकर लड़ना चाहिए। ममता अगर सच में चिंतित हैं तो राज्य में होर्डिंग रोकें, सप्लाई सुधारें, केंद्र के साथ मिलकर काम करें। लेकिन नहीं, वे तो बस डर फैलाकर वोट माँग रही हैं।

आम जनता के लिए सबसे जरूरी है कि वह अफवाहों से दूर रहे और केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करे। क्योंकि संकट के समय घबराहट नहीं, बल्कि समझदारी ही सबसे बड़ा हथियार होती है। वैसे भी, ममता बनर्जी की हरकतों को पूरा देश देख रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता भी देख रही है। डर की राजनीति अब पुरानी हो गई है। अब विकास और समाधान की राजनीति चाहिए। मोदी सरकार पहले की तरह इस संकट से भी देश को निकाल लेगी। ममता का डर सिर्फ चुनावी चाल है। लोग अब समझ चुके हैं।

विधायक या मिशनरियों का एजेंट? BJP MLA मोहन कोंकणी पर ‘कन्वर्जन’ के गंभीर आरोप: ‘गृह प्रवेश’ में चर्च वाला कर्मकांड और कन्वर्जन के खेल पर ST समाज में रोष

दक्षिण गुजरात के शांत जनजातीय इलाकों में इन दिनों धर्म को लेकर एक बड़ी जंग छिड़ गई है। यह मामला कोई मामूली झगड़ा नहीं है, बल्कि उस ‘रक्षक’ पर सवाल उठ रहे हैं जिसे अपनी ही संस्कृति को खत्म करने का दोषी माना जा रहा है। तापी से BJP विधायक मोहन कोंकणी, जिन्हें जनजातीय समाज की आवाज उठाने के लिए चुना गया था, आज खुद धर्मांतरण (कन्वर्जन) के आरोपों में घिरे हैं। तापी और डांग जिलों में हजारों लोगों का गुपचुप तरीके से धर्मांतरण और विधायक के निजी जीवन में ईसाई रीति-रिवाजों का आना, पूरे गुजरात में चर्चा का विषय बन गया है।

ऑपइंडिया की जाँच और स्थानीय देव बिरसा सेना के खुलासे बताते हैं कि यह कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है। तापी जिले में पिछले कुछ सालों में 1500 से ज्यादा अवैध चर्च बना दिए गए हैं। हैरानी की बात यह है कि सरकारी कागजों में आज भी कोई ‘ईसाई’ नहीं बना है, फिर भी गाँव-गाँव पादरी घूम रहे हैं। यह दोहरा खेल इसलिए खेला जा रहा है ताकि धर्म बदलने के बाद भी जनजातीय स्टेटस और आरक्षण का फायदा मिलता रहे और धीरे-धीरे पूरे समाज की पहचान बदल दी जाए।

विधायक के ‘गृह प्रवेश’ में पादरियों का जमावड़ा

विवाद की सबसे बड़ी और हाल ही की वजह BJP विधायक मोहन कोंकणी का अपना ‘गृह प्रवेश’ कार्यक्रम है। यह कार्यक्रम गाँधीनगर में विधायकों के लिए बने नए सरकारी आवास (MLA Quarters) के आवंटन के बाद आयोजित किया गया था। एक जनजातीय नेता को आवंटित सरकारी घर पर जहाँ पारंपरिक रीति-रिवाजों, मंत्रों की गूंज और शंख की आवाज होनी चाहिए थी, वहाँ ईसाई पादरियों की भीड़ जमा थी। पादरियों ने अपने धर्म के हिसाब से पूजा-पाठ कराया और अब विधायक इसे अपनी ‘निजी पसंद’ बताकर लोगों का मुँह बंद करने की कोशिश कर रहे हैं।

इस पर सामाजिक कार्यकर्ता काजल हिंदुस्तानी ने कड़ा सवाल उठाया और लिखा, “विधायक जी, जनता के प्रतिनिधि के लिए कुछ भी ‘निजी’ नहीं होता, जब आप जनजातीय समाज के लिए सुरक्षित सीट से चुनाव जीतकर आए हैं, तो आप पूरे समाज के जिम्मेदार हैं। गाँधीनगर के सरकारी क्वार्टर में पादरियों को बुलाकर यह कार्यक्रम करना दरअसल गाँव के अन्य जनजातीय लोगों को यह संदेश देने जैसा था कि ‘देखो, जब स्वयं विधायक अपनी परंपरा बदल सकते हैं, तो तुम क्यों नहीं?'”

मंच से पादरियों जैसी भाषा और ‘मसीही’ गुणगान

BJP विधायक कोंकणी का एक Video भी खूब वायरल हो रहा है। इसमें वे किसी ईसाई सभा में बिल्कुल एक ‘पेशेवर पादरी’ की तरह ‘ईसा मसीह’ और ‘माता मरियम’ की तारीफें कर रहे हैं। वे मंच पर खड़े होकर बाइबल की बातें पढ़ रहे हैं और वहाँ मौजूद लोगों को उकसा रहे हैं कि ‘अगली बार अकेले मत आना, अपने साथ और लोगों को भी लेकर आना।’

देव बिरसा सेना के नेताओं का साफ कहना है कि बीजेपी विधायक जी सिर्फ कागजों पर जनजातीय बने हुए हैं, जबकि उनके काम और उनकी बातें पूरी तरह ईसाइयत वाली हैं। यह उस जनजातीय समाज के साथ सबसे बड़ा धोखा है, जिसने भगवान बिरसा मुंडा के आदर्शों को मानकर उन्हें अपना नेता चुना था।

BJP विधायक मोहन कोंकणी की सफाई: ‘सबूत है तो कार्रवाई करो’

जब ऑपइंडिया ने इस पूरे विवाद पर BJP विधायक मोहन कोंकणी से सवाल किए, तो उन्होंने धर्मांतरण को बढ़ावा देने के आरोपों से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर वे ऐसा कुछ कर रहे हैं, तो इसके सबूत दिए जाने चाहिए और उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।

जब BJP विधायक से पूछा गया कि उन्होंने ईसाई सभा में जाकर जनजातीय समाज के लोगों से यह क्यों कहा कि ‘आप भी आइए और अपने साथ दूसरों को भी लाइए,’ तो उन्होंने इसे राजनीति से जोड़ दिया। विधायक का कहना था कि एक जनता के प्रतिनिधि (नेता) होने के नाते उन्हें ऐसे कार्यक्रमों में जाना पड़ता है और वहाँ अच्छी बातें कहनी पड़ती हैं।

जब उनसे अगला सवाल किया और पूछा कि तापी इलाके में जब कोई कागजी तौर पर ईसाई नहीं है, तो वहाँ देश भर से बड़े-बड़े पादरी सभा करने क्यों आते हैं? इसपर BJP विधायक ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि देश में हर कोई कहीं भी सभा करने के लिए आजाद है। उन्होंने कहा कि अगर पुलिस ने इसकी इजाजत दी है, तो यह सवाल पुलिस से ही पूछना चाहिए।

विधायक ने यह भी दावा किया कि उनके पास इस विवाद को लेकर कोई लिखित शिकायत नहीं आई है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वे अंदर ही अंदर ईसाई धर्म को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन विधायक बार-बार यही कहते रहे कि ‘अगर ऐसा है तो सबूत लाओ।’ यहाँ तक कि जब देव बिरसा सेना (जो जनजातीय हितों के लिए लड़ रही है) का जिक्र हुआ, तो विधायक ने साफ कह दिया कि वे ऐसी किसी संस्था को जानते ही नहीं हैं।

आस्था पर प्रहार: कुलदेवी के पहाड़ों पर चर्च का कब्जा और ‘नो-एंट्री’

धर्मांतरण की यह बीमारी अब जनजातीय समाज की आस्था के पुराने केंद्रों को खत्म कर रही है। सोनगढ़ का ‘गीधमाड़ी आया’ पहाड़, जो बरसों से जनजातीय समाज की कुलदेवी का पवित्र स्थान था, वहाँ अब हालात बदल चुके हैं। वहाँ से हिंदू धर्म के प्रतीकों और निशानों को हटाकर ईसाई मिशनरियों ने ‘मरियम माता’ का कब्जा जमा लिया है।

हैरानी की बात यह है कि आज वहाँ असली जनजातीय लोगों को अपनी ही कुलदेवी की पूजा करने से रोका जा रहा है। आरोप तो यह भी है कि BJP विधायक के अपने गाँव हरिपुरा के पास वाले पहाड़ पर भी एक अवैध चर्च खड़ा कर दिया गया है, जिसे प्रशासन की भी चुप्पी (मूक सहमति) हासिल है। सवाल यह उठता है कि जब रक्षक ही पादरियों के स्वागत में पलकें बिछाएगा, तो जनजातीय समाज की परंपराओं की रक्षा कौन करेगा?

आरक्षण और स्टेटस का ‘डबल गेम’: कागजों पर हिंदू, दिल से ईसाई

इस पूरे मामले का सबसे खतरनाक हिस्सा यह है कि धर्मांतरण पर कोई सख्त कानून न होने की वजह से पादरियों को खुली छूट मिल गई है। लोग ईसाई धर्म अपना रहे हैं, चर्च जा रहे हैं और पादरियों की बातें मान रहे हैं, लेकिन सरकारी कागजों में वे आज भी खुद को ‘हिंदू जनजातीय’ ही दिखाते हैं।

यह सब एक सोची-समझी चाल के तहत हो रहा है। ऐसा करने से न तो उनका सरकारी आरक्षण छिनता है और न ही उनकी राजनीतिक ताकत (Status) कम होती है। यही वजह है कि हिंदू संगठन अब पुरजोर माँग कर रहे हैं कि ऐसे ‘नकली जनजातीय’ लोगों को तुरंत लिस्ट से बाहर (डिलिस्ट) किया जाए। मशहूर कथावाचक मोरारी बापू ने भी हाल ही में अपनी कथा में इस बड़े खतरे की ओर इशारा किया था, लेकिन BJP विधायक कोंकणी ने उनके जैसे संत की बात को भी झुठलाने की हिम्मत दिखाई।

दक्षिण गुजरात में जनजातीय समाज पर धर्मांतरण का खतरा: मंदिर तोड़कर चर्च बनाने तक पहुँचा खेल

दक्षिण गुजरात के तापी और डांग जैसे जनजातीय इलाकों में गुपचुप तरीके से धर्म बदलवाने का खेल लंबे समय से चल रहा है। दिसंबर 2022 में तापी के जराली गाँव में एक हिंदू मंदिर को हटाकर वहाँ चर्च बना दिया गया। आज वहाँ के जनजातीय लोग अपनी ही जगह पर पूजा करने से डर रहे हैं क्योंकि उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं। तापी में एक ही परिवार के 5 लोगों की गिरफ्तारी और सरकारी स्कूलों में गुरु पूर्णिमा पर बाइबल पढ़ाने जैसी घटनाओं ने साफ कर दिया है कि यहाँ जनजातीय संस्कृति को मिटाने की बड़ी साजिश चल रही है।

धर्मांतरण का यह जाल केवल तापी या डांग तक सीमित नहीं है, बल्कि नवसारी, वलसाड और सूरत तक फैल चुका है। नवसारी में हिंदू धर्म का अपमान करने वाले ईसाई शिक्षक दंपतियों की गिरफ्तारी हुई है, तो वलसाड के धरमपुर-कपराड़ा की पहाड़ियों पर अवैध रूप से बड़े-बड़े क्रॉस और ईसाई बस्तियाँ बसाई जा रही हैं। जनजातीय कार्यकर्ता रवि नायका का कहना है कि गाँवों में यह खेल बड़े पैमाने पर चल रहा है, लेकिन मीडिया में इसकी चर्चा नहीं होती।

सूरत जैसे शहरों की हिंदू सोसायटियों में भी बिना वजह चर्च खड़े किए जा रहे हैं। हिंदू संगठनों ने चेतावनी दी है कि ये तो सिर्फ वो मामले हैं जो सामने आए हैं, असली संख्या इससे कहीं ज्यादा बड़ी है। अगर जल्द ही सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो जनजातीय समाज की सदियों पुरानी पहचान और संस्कृति पूरी तरह खत्म हो सकती है।

अस्तित्व की पुकार: जनजातीय समाज को सरकार से क्या उम्मीद है?

देव बिरसा सेना के नेता अरविंद वसावा ने ऑपइंडिया के जरिए सरकार से गुहार लगाई है कि दक्षिण गुजरात में चल रहे धर्मांतरण के इस खेल को तुरंत रोका जाए और जो अवैध चर्च या ढांचे खड़े किए गए हैं, उन्हें हटाया जाए। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि सरकार को हमारी संस्कृति बचाने के लिए आगे आना चाहिए और हमारी पीड़ा सुननी चाहिए।

अरविंद वसावा की चेतावनी डराने वाली है। उन्होंने कहा, “हमारी जनजातीय संस्कृति, हमारी परंपरा, भाषा और हमारा वजूद बचा रहे, इसके लिए सरकार और समाज को साथ देना होगा। आज हालात इतने बुरे हैं कि कई गाँवों में केवल 10 असली जनजातीय लोग बचे हैं, बाकी सब ने अपने पूर्वजों की परंपरा और अपनी कुलदेवी को छोड़ दिया है।”

उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि जनजातीय संस्कृति को खत्म करने के लिए विदेशी ताकतों के साथ अब हमारे अपने लोग भी मिल गए हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “सरकार से हमारी कोई बड़ी माँग नहीं है, हमें धन-दौलत नहीं चाहिए। हम बस इतना चाहते हैं कि हमारे पूर्वजों के रीति-रिवाज, हमारी विरासत और हमारी पहचान बची रहे। हम सरकार से खुली अपील करते हैं कि वह इस मुश्किल वक्त में हमारा साथ दे और हमारी जड़ों को कटने से बचाए।”

जनजातीय समाज के साथ बड़ा धोखा और विश्वासघात

BJP विधायक मोहन कोंकणी का यह कहना कि ‘मैं अपने घर किसे बुलाता हूँ, यह मेरा निजी मामला है’, पूरी तरह से गलत और जिम्मेदारी से भागने जैसा है। विधायक जी, आपने उस जनजातीय समाज का अपमान किया है जिसने आपको अपनी पहचान और संस्कृति बचाने के भरोसे पर चुना था। ब्राह्मणों को छोड़कर पादरियों से घर की पूजा करवाना यह साफ दिखाता है कि आपकी वफादारी भारत की मिट्टी और परंपराओं के प्रति नहीं है। बल्कि आप उन ताकतों के साथ खड़े हैं जो जनजातीय समाज का नामो-निशान मिटाना चाहती हैं।

यह सिर्फ एक छोटा सा कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है। जिस ईसाई धर्म के खिलाफ भगवान बिरसा मुंडा ने ‘उलगुलान’ (बड़ा विद्रोह) किया था, आज उसी को आप अपने घर में बढ़ावा दे रहे हैं। पुलिस-प्रशासन का चुप रहना और एक विधायक का पादरियों के एजेंट की तरह काम करना एक बहुत बड़े खतरे की घंटी है। अगर आज जनजातीय समाज ने इस ‘सफेदपोश धर्मांतरण’ के खिलाफ आवाज नहीं उठाई, तो कल उनके पवित्र पहाड़, उनकी अनोखी संस्कृति और उनकी पहचान, सब कुछ पादरियों के कब्जे में होगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती भाषा में लिखी है। गुजराती की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

विकिपीडिया पर ‘धुरंधर’ को ‘प्रोपेगेंडा’ बताने वाला कौन? मणिपुर के ‘हिंदू-विरोधी’ संपादन का आया ‘हाथ’: ध्रुव राठी को ‘सोर्स’ बता चिपकाया ‘Propaganda’ टैग

खुद को ‘ज्ञान का भंडार’ बताने वाला विकिपीडिया, हिंदी फिल्म ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर: द रिवेंज’ को लेकर एक खास तरह की इमेज बनाने में जुटा है। वह बार-बार इन फिल्मों को ‘प्रोपेगेंडा’ (प्रचार वाली फिल्म) साबित करने की कोशिश कर रहा है। रणवीर सिंह की इन फिल्मों के चर्चा वाले पेज (टॉक पेज) को देखने से पता चलता है कि कुछ संपादक जानबूझकर लेख में राजनीति से जुड़े शब्द डाल रहे हैं।

वहीं, कुछ दूसरे संपादकों ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि जानकारी को अपनी पसंद से चुन-चुनकर (चेरी-पिकिंग) एकतरफा कहानी थोपी जा रही है। सबसे हैरानी की बात तो यह है कि फिल्म को बुरा बताने के लिए यूट्यूबर ध्रुव राठी की बातों को एक ‘पक्के सबूत’ की तरह इस्तेमाल किया गया है। इससे विकिपीडिया के काम करने के तरीके पर बड़े सवाल खड़े होते हैं। विवाद इतना बढ़ गया है कि फिलहाल इन पेजों पर कोई बदलाव न हो सके, इसलिए इन्हें ‘लॉक’ कर दिया गया है।

विकिपीडिया पर ‘प्रोपेगेंडा’ नैरेटिव की साजिश

विकिपीडिया पर फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ को ‘प्रोपेगेंडा’ (प्रचार वाली फिल्म) बताने का फैसला सबकी मर्जी से नहीं लिया गया था। असल में, यह एक बहुत बड़ा विवाद था जिसका कई संपादकों ने जमकर विरोध किया। फिल्म के चर्चा वाले पेज (टॉक पेज) को देखकर साफ पता चलता है कि कैसे एक तरफा कहानी थोपने की कोशिश को रोकने की पूरी कोशिश की गई थी। [आर्काइव लिंक 1] [आर्काइव लिंक 2]

एक संपादक ‘KabirDH’ ने तो इस पक्षपात की पोल ही खोल दी। उन्होंने साफ कहा कि भले ही फिल्म का कुछ हिस्सा किसी पार्टी के पक्ष में लग सकता है, लेकिन इसे गलत साबित करने के लिए जो ‘सबूत’ (Sources) दिए जा रहे हैं, वे नफरत और पक्षपात से भरे हैं। उन्होंने इन सबूतों पर सवाल उठाते हुए कहा, “यह साफ दिख रहा है कि ये बातें एक ऐसी वेबसाइट या व्यक्ति (जैसे कलकत्ता टेलीग्राफ) की ओर से आ रही हैं जो एक खास पार्टी का समर्थक है और दूसरी पार्टी का विरोधी, और वह बस अपने निजी विचारों को फैला रहा है।”

सोर्स: विकिपीडिया

यह मामला सिर्फ भेदभाव तक ही सीमित नहीं था, बल्कि यहाँ विकिपीडिया के अपने नियमों की भी धज्जियाँ उड़ाई गईं। संपादक ‘KabirDH’ ने साफ चेतावनी देते हुए कहा, “सिर्फ एक ही खबर या सोर्स के भरोसे पूरी फिल्म की कैटेगरी बदल देना और शुरुआत में ही उसे ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ लिख देना विकिपीडिया के ही कायदे-कानूनों (जैसे WP:NPOV, WP:DUE और WP:OR) के खिलाफ है।” उनका कहना था कि बिना ठोस आधार के इतना बड़ा दावा करना नियमों का पूरी तरह उल्लंघन है।

सोर्स: विकिपीडिया

एक और संपादक, UnpetitproleX ने भी इस बात को पूरी तरह गलत बताया कि भरोसेमंद खबरों ने फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ (प्रचार वाली फिल्म) मान लिया है। उन्होंने साफ किया, “सच्चाई तो यह है कि ‘द इंडिपेंडेंट’ (The Independent) जैसे बड़े अखबार ने अपनी रिपोर्ट में कहीं भी इस फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ नहीं कहा है।”

उन्होंने दोनों पक्षों की बात रखने पर जोर देते हुए कहा, “हमारे पास ऐसी ढेर सारी खबरें और सबूत मौजूद हैं जो इस फिल्म को प्रोपेगेंडा नहीं मानते… हम उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते। विकिपीडिया के नियमों (WP:DUE weight) के मुताबिक, किसी भी नतीजे पर पहुँचने के लिए हमें सभी तरह की भरोसेमंद खबरों को ध्यान में रखना होगा, न कि सिर्फ अपनी पसंद की।”

सोर्स: विकिपीडिया

विवाद की गहराई समझाते हुए UnpetitproleX ने आगे कहा, “मुद्दा यह है कि फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ कहने पर पहले से ही झगड़ा चल रहा है। ऐसे में विकिपीडिया का अपनी तरफ से इसे एक ‘सच’ (Fact) की तरह लिखना, इस विवाद में किसी एक पक्ष का साथ देने जैसा होगा। जबकि विकिपीडिया का नियम (निष्पक्षता नीति) हमें साफ तौर पर कहता है कि ‘हमें विवाद के बारे में बताना चाहिए, न कि खुद उस विवाद का हिस्सा बनना चाहिए।'”

सोर्स: विकिपीडिया

फिल्म पर बार-बार ‘प्रोपेगेंडा’ का ठप्पा लगाने की कोशिशों से दूसरे संपादक काफी नाराज थे। संपादक KabirDH ने तंज कसते हुए कहा, “बिना किसी आपसी सहमति के फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ बताया जा रहा है। अब यह सब देखकर बहुत निराशा होती है।”

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संपादकों के बीच कोई एक राय नहीं बनी है। उन्होंने आगे कहा, “जब सब एक बात पर सहमत नहीं हैं, तो लेख की पहली ही लाइन में ‘प्रोपेगेंडा’ शब्द जोड़ देना विकिपीडिया के नियमों और पुरानी परंपराओं का सीधा उल्लंघन है।”

सोर्स: विकिपीडिया

खबरों और सबूतों के सही होने पर भी बड़े सवाल उठाए गए। संपादक ARandomName123 ने साफ तौर पर कहा, “‘ग्रैंड पिनेकल ट्रिब्यून’ की खबरें AI (कंप्यूटर प्रोग्राम) द्वारा लिखी गई हैं। विकिपीडिया के नियमों के मुताबिक, ऐसी खबरों को भरोसेमंद सबूत नहीं माना जा सकता।”

सोर्स: विकिपीडिया

कुल मिलाकर, इस पूरी बहस से यह साफ है कि फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ (प्रचार वाली फिल्म) कहना कोई पक्का सच नहीं था, बल्कि एक विवादित दावा था। कई संपादकों ने इस बात का जमकर विरोध किया। उन्होंने साफ कहा कि यह भेदभाव है, खबरों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और विकिपीडिया के निष्पक्ष होने के नियमों को तोड़ा जा रहा है।

धुरंधर केस: विवादों के केंद्र में कौटिल्य3

बिल्कुल यही खेल फिल्म के पहले भाग में भी खेला गया था। फिल्म ‘धुरंधर’ के पुराने चर्चा वाले पेजों (Talk Pages) से साफ है कि इसे ‘प्रोपेगेंडा’ बताने की साजिश बहुत पहले ही शुरू कर दी गई थी। इस पूरी कहानी को गढ़ने और हवा देने में विवादित संपादक ‘कौटिल्य3’ का सबसे बड़ा हाथ था। [Archive Link 1] [Archive Link 2]

फिल्म के पहले भाग पर चर्चा के दौरान, कौटिल्य3 ने सिर्फ आलोचकों की बातों का ही सहारा नहीं लिया, बल्कि फिल्म के मतलब को अपनी निजी सोच के हिसाब से पेश किया। उन्होंने एक कड़वी टिप्पणी करते हुए लिखा कि यह फिल्म सीधे तौर पर मोदी सरकार की आतंकवाद-विरोधी नीतियों का प्रचार (प्रोपेगेंडा) करती है।

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उन्होंने इसे किसी और की राय बताकर पेश नहीं किया, बल्कि फिल्म को देखने के अपने निजी नजरिए और चुनिंदा स्रोतों के आधार पर खुद एक नतीजा निकाल लिया। अपनी बात को और विस्तार से समझाते हुए, उन्होंने ‘प्रोपेगेंडा’ शब्द के इस्तेमाल को सही ठहराने की कोशिश की। उन्होंने तर्क दिया, “प्रोपेगेंडा का मतलब है… ‘ऐसी जानकारी, जो विशेष रूप से पक्षपाती या भ्रामक हो और जिसका इस्तेमाल किसी खास मकसद को बढ़ावा देने के लिए किया जाए…’… और इस मामले में, हमारे पास [सोर्स] मौजूद हैं।”

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एक अन्य टिप्पणी में, उन्होंने अपने इरादे और भी साफ कर दिए। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ दावा किया, “मेरा टेक्स्ट… यह कहता है कि यह फिल्म मोदी सरकार की नीतियों का ‘प्रचार’ (प्रोपेगेंडा) करती है। और यह एक सच्चाई है कि यह ऐसा करती भी है।”

इस तरह के बयान साफ तौर पर दिखाते हैं कि कैसे केवल आलोचना को रिपोर्ट करने के बजाय, एक खास विचारधारा वाली व्याख्या को ‘तथ्य’ (Fact) बनाकर पेश करने की कोशिश की गई। इस रवैये को कई अन्य संपादकों ने तुरंत चुनौती भी दी।

बाकी योगदानकर्ताओं ने इस नैरेटिव की बड़ी खामियों को उजागर किया। एक संपादक ने टाइमलाइन (समय-सीमा) पर ही सीधा सवाल उठाते हुए पूछा, “यह फिल्म मोदी सरकार का प्रचार कैसे कर सकती है, जबकि 2008-09 में तो वह सत्ता में थे ही नहीं?”

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एक अन्य संपादक ने स्रोतों के चयन में असंतुलन और नैरेटिव गढ़ने के तरीके पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया, “विशेष रूप से 3-4 चुनिंदा स्रोतों का ही हवाला दिया जा रहा है… आपने बिना किसी चर्चा के सचमुच एक पूरा निबंध लिख डाला है, जैसे कि आप जानबूझकर इस पेज को नकारात्मक रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हों।”

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विवाद केवल बयानों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि ‘तथ्यात्मक सटीकता और राजनीतिक संदेश’ (Factual accuracy and political messaging) नाम से एक पूरा सेक्शन बनाने पर भी बार-बार आपत्तियाँ जताई गईं। कई संपादकों का मानना था कि यह सेक्शन जानबूझकर कुछ गिने-चुने आलोचनात्मक नजरियों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए बनाया गया था। एक संपादक ने तो स्पष्ट माँग की, “‘प्रोपेगेंडा’ शब्द को हटाओ और ‘तथ्यात्मक सटीकता और राजनीतिक संदेश’ वाले इस निबंधनुमा सब-हेडर को भी खत्म करो।”

यह विरोध केवल कंटेंट तक सीमित नहीं था, बल्कि संपादक के व्यवहार पर भी सवाल उठे। कौटिल्य3 पर आरोप लगा कि वे अन्य संपादकों के सुधारों को बार-बार हटा रहे थे (Reverting edits) और विरोध के बावजूद अपना ही नैरेटिव थोप रहे थे। एक संपादक ने तीखी टिप्पणी की, “उन्होंने बिना किसी चर्चा के अकेले ही सब कुछ लिख डाला और पेज पर किसी दूसरे को कुछ भी नहीं करने दे रहे हैं।”

एक अन्य संपादक ने उन पर अपनी पसंद की जानकारी चुनकर (Cherry-picking) एक खास नजरिया थोपने का आरोप लगाया और कहा कि वे ‘चुनिंदा सोर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और अनुचित तरीके से तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रोपेगेंडा फैला रहे हैं।’

इन तमाम आपत्तियों के बावजूद, कौटिल्य3 ने विकिपीडिया की नीतियों ‘विशेष रूप से विश्वसनीय स्रोतों और तटस्थता (Neutrality) से जुड़े नियमों’ का हवाला देते हुए लगातार अपने रवैये का बचाव किया। एक जवाब में उन्होंने कहा, “विकिपीडिया पर चर्चाएँ व्यक्तिगत विचारों के आधार पर नहीं, बल्कि WP:V (सत्यापन योग्यता) और WP:NPOV (तटस्थ दृष्टिकोण) के आधार पर चलती हैं।”

हालाँकि, अन्य संपादकों ने तर्क दिया कि इसी ढाँचे (Framework) का इस्तेमाल ‘चुनिंदा’ तरीके से किया जा रहा था, ताकि कुछ खास विचारों को हावी होने दिया जाए और बाकी को ‘अविश्वसनीय’ या ‘अप्रासंगिक’ बताकर खारिज कर दिया जाए।

इस चर्चा से यह भी उजागर हुआ कि कैसे अप्रत्यक्ष स्रोतों के जरिए विवादित रायों को ऊपर उठाया जा रहा था। एक बार फिर ध्रुव राठी की आलोचना का संदर्भ सामने आया, जिस पर कई संपादकों ने सवाल उठाया कि उनके विचारों को इतनी अहमियत क्यों दी जा रही है। एक संपादक ने सीधे तौर पर पूछा, “ध्रुव राठी की राजनीतिक बयानबाजी एक स्पष्ट सोर्स कैसे हो सकती है?”

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एक अन्य संपादक ने तंज कसते हुए कहा, “आपने फिल्म ‘धुरंधर’ पर ध्रुव राठी की राय को बतौर सबूत पेश किया है…वाह!”

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दिलचस्प बात यह है कि जहाँ अन्य संपादक ध्रुव राठी के विचारों पर सवाल उठा रहे थे, वहीं कौटिल्य3 ने उन्हें एक ‘उल्लेखनीय सोर्स’ (Notable Source) करार दिया।

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फिर भी, जैसा कि इसके सीक्वल (दूसरे भाग) की चर्चा में भी देखा गया, एक बार जब इन व्यक्तिगत रायों को मीडिया आउटलेट्स द्वारा रिपोर्ट कर दिया गया, तो उन्हें विकिपीडिया के ‘सोर्सिंग’ नियमों के तहत वैध बताकर उनका बचाव किया गया।

फिल्म के पहले भाग के ‘टॉक पेज’ से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि ‘धुरंधर’ को ‘प्रोपेगेंडा’ के रूप में पेश करने की कोशिश कोई आपसी सहमति का नतीजा नहीं थी। इसके बजाय, यह एक सोची-समझी संपादकीय जिद, तथ्यों की चुनिंदा व्याख्या और कुछ गिने-चुने सोर्स पर बार-बार निर्भरता का परिणाम था।

वही तर्क, वही विरोध और विवाद का वही पुराना पैटर्न बाद में फिल्म के सीक्वल (दूसरे भाग) की चर्चाओं में भी फिर से दिखाई दिया। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि एक खास दिशा में नैरेटिव गढ़ने की कोशिशें लगातार जारी थीं।

गौरतलब है कि उदय रेड्डी, जो ब्रिटेन (UK) स्थित विकिपीडिया संपादक कौटिल्य3 है, उनपर 2024 में मणिपुर पुलिस द्वारा मामला दर्ज किया गया था। उन पर मणिपुर में समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और ‘मैतेई’ समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने का आरोप है।

ऑपइंडिया का खुलासा: विकिपीडिया का पक्षपात और ‘धुरंधर’ कनेक्शन

विकिपीडिया के पक्षपात पर ऑपइंडिया (OpIndia) की रिपोर्ट (डोजियर) ने पहले ही यह साफ कर दिया था कि यह तथाकथित ‘विश्वकोश’ केवल जानकारी दर्ज नहीं कर रहा, बल्कि संपादकों के एक नेटवर्क, चुनिंदा सोर्स और ‘पॉलिसी’ की आड़ में जानबूझकर नैरेटिव गढ़ रहा है। डोजियर में बताया गया है कि कैसे संपादकों का एक छोटा सा समूह अक्सर पेजों पर कब्जा कर लेता है, केवल अपने पसंदीदा ‘स्वीकार्य’ प्रकाशनों के भरोसे रहता है, और विकिपीडिया के आंतरिक नियमों का इस्तेमाल अपनी खास विचारधारा थोपने के लिए करता है।

फिल्म ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर: द रिवेंज’ से जुड़े घटनाक्रम ठीक उसी पैटर्न में फिट बैठते हैं जिसका जिक्र उस डोजियर में किया गया था। जैसा कि ‘टॉक पेज’ की चर्चाओं से साफ है, फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ बताने की जिद किसी व्यापक आपसी सहमति से नहीं उपजी थी। इसके बजाय, यह कुछ खास संपादकों द्वारा गिने-चुने आलोचनात्मक विचारों को एक ‘तय नैरेटिव’ बनाने की बार-बार की गई कोशिशों का नतीजा था।

अन्य संपादकों द्वारा जताया गया विरोध, जिन्होंने यह साफ कहा था, “कुछ चुनिंदा लेखों को चुनकर उन्हें सामान्य बयान बना देना बेहद संदिग्ध (Fishy) लगता है” और “गिने-चुने अखबारों की 3-4 राय पूरी फिल्म का आधार नहीं बन सकतीं”, सीधे तौर पर ऑपइंडिया (OpIndia) के निष्कर्षों में जताई गई चिंताओं की पुष्टि करता है।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट (डोजियर) में खास तौर पर बताया गया था कि विकिपीडिया कैसे सिर्फ गिने-चुने ‘भरोसेमंद सूत्रों’ (Reliable Sources) के सहारे चलता है, जिससे एकतरफा बातों को जरूरत से ज्यादा बढ़ावा मिलता है। फिल्म ‘धुरंधर’ के मामले में भी यही खेल दिखा। यहाँ मुट्ठी भर अखबारों और ध्रुव राठी जैसे लोगों की नकारात्मक बातों को बार-बार लेख में डालने का दबाव बनाया गया, जबकि फिल्म की तारीफ करने वालों और दूसरे नजरिए रखने वालों की बातों को या तो अनसुना कर दिया गया या पूरी तरह हटा दिया गया।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट से एक और बड़ी बात सामने आई थी। वह यह कि विकिपीडिया पर कुछ ‘रसूखदार’ संपादक ही अपनी मर्जी चलाते हैं। फिल्म ‘धुरंधर’ के मामले में भी संपादक कौटिल्य3 पर बिल्कुल यही आरोप लगे। एक दूसरे संपादक ने तो यहाँ तक कह दिया कि ‘इन्होंने बिना किसी से पूछे अकेले ही सब कुछ लिख डाला और दूसरे किसी को पेज पर कुछ करने ही नहीं दे रहे।’ एक और व्यक्ति ने उन पर आरोप लगाया कि वे ‘सिर्फ अपनी पसंद की खबरें चुन रहे हैं और गलत तरीके से अपनी बात थोप रहे हैं।’

यह ऑपइंडिया के उस दावे को सच साबित करता है कि विकिपीडिया कहने को तो सबके लिए खुला है, लेकिन असलियत में यहाँ नियमों की आड़ लेकर कुछ मुट्ठी भर संपादक ही राज करते हैं। ये लोग आम लेखकों के मुकाबले पूरी कहानी (नैरेटिव) को अपने कब्जे में रखने में कहीं ज्यादा माहिर होते हैं।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट ने यह भी साफ किया था कि कैसे घुमा-फिराकर बाहरी और विवादित बातों को विकिपीडिया के लेखों में डाल दिया जाता है। ध्रुव राठी की बातों को आधार बनाना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। विकिपीडिया के ‘टॉक पेज’ पर दूसरे संपादकों ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए पूछा था, “ध्रुव राठी की राजनीतिक बयानबाजी को सही जानकारी (Source) कैसे माना जा सकता है?” और “किसी यूट्यूबर की राय पर भला कैसे भरोसा किया जा सकता है?” इसके बावजूद, यह दलील दी गई कि चूंकि कुछ मीडिया घरानों ने उन बातों को छापा है, इसलिए उन्हें विकिपीडिया पर रखा जा सकता है।

साफ है कि फिल्म ‘धुरंधर’ के साथ जो हुआ, वह कोई इकलौता मामला नहीं है। यह उसी पुरानी समस्या को दोहराता है जिसका खुलासा ऑपइंडिया पहले ही कर चुका है। इससे पता चलता है कि विकिपीडिया का काम करने का तरीका पूरी तरह निष्पक्ष नहीं है, बल्कि नियमों का बहाना बनाकर इसका इस्तेमाल किसी खास एजेंडे या सोच को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है।

ज्ञान का भंडार या नैरेटिव गढ़ने का औजार?

अगर हम फिल्म ‘धुरंधर’ के विवाद और ऑपइंडिया की रिपोर्ट को साथ मिलाकर देखें, तो विकिपीडिया की साख पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। जिसे दुनिया ‘सबकी जानकारी वाला’ एनसाइक्लोपीडिया मानती है, वह असल में एक ऐसी जगह बनता जा रहा है जहाँ जानकारियों को काट-छाँटकर एक खास दिशा में मोड़ा जाता है।

फिल्म ‘धुरंधर’ को ‘प्रोपेगेंडा’ बताने की जो बार-बार कोशिश हुई, भले ही दूसरे संपादक इसके खिलाफ थे और ठोस सबूत भी नहीं थे, उससे साफ है कि कैसे नियमों का फायदा उठाकर अपनी बात थोपी जा सकती है। जब कोई संपादक यह दावा करता है कि ‘यह फिल्म मोदी सरकार की नीतियों का प्रचार करती है’ और इसे ‘एक सच’ बताता है, तो वह निष्पक्ष जानकारी देने के बजाय अपनी निजी राय को सच बनाकर पेश करने लगता है।

इसके अलावा, जो लोग इन बातों का विरोध करते हैं, उन्हें विकिपीडिया के नियमों के जाल में फँसाकर चुप करा दिया जाता है। उनकी सही बातों को भी ‘निजी राय’ या ‘बिना सबूत की बात’ कहकर खारिज कर दिया जाता है, भले ही वे तथ्यों की कमी उजागर कर रहे हों। इसका नतीजा यह होता है कि ‘निष्पक्षता’ अपने आप नहीं आती, बल्कि वे लोग इसे अपनी मर्जी से तय करते हैं जो विकिपीडिया के सिस्टम को चलाना जानते हैं।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट ने पहले ही आगाह किया था कि विकिपीडिया का सिर्फ गिने-चुने अखबारों या वेबसाइटों को ही ‘भरोसेमंद’ मानना, असल में एक खास सोच को थोपने का तरीका है। फिल्म ‘धुरंधर’ के मामले में यही खेल खुलकर दिखा। एक बार जब कोई बात इस खास दायरे (जैसे चुनिंदा लेख या रिव्यू) में आ जाती है, तो उसे विकिपीडिया के पेज पर एक ‘बड़ी सच्चाई’ के रूप में डाल दिया जाता है, फिर चाहे उस दायरे के बाहर उस बात पर कितना भी विवाद क्यों न हो।

यह पूरा मामला लोगों की सोच को प्रभावित करने में विकिपीडिया की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े करता है। जब लाखों लोगों द्वारा पढ़े जाने वाले पेज किसी एकतरफा या विवादित राय को ‘बड़े सच’ की तरह दिखाने लगते हैं, तो इसका असर सिर्फ विकिपीडिया तक नहीं रहता। इससे यह तय होता है कि आम जनता किसी भी मुद्दे को कैसे समझेगी और उस पर क्या राय बनाएगी।

अब सवाल यह नहीं रह गया है कि क्या विकिपीडिया पक्षपाती (Biased) है, बल्कि सवाल यह है कि यह पक्षपात होता कैसे है। ऑपइंडिया की रिपोर्ट और फिल्म ‘धुरंधर’ के विवाद से जवाब साफ है, यह सब दबंग संपादकों, अपनी पसंद की खबरों को चुनने और नियमों का बहाना बनाकर अपनी बात थोपने का एक मिला-जुला खेल है।

भले ही विकिपीडिया खुद को निष्पक्ष होने का दावा करे, लेकिन उसके खिलाफ अब काफी सबूत हैं। हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद गूगल (Google) जैसा बड़ा सर्च इंजन आज भी किसी भी विषय (जैसे हिंदी फिल्म ‘धुरंधर’) की जानकारी और सारांश दिखाने के लिए सबसे ज्यादा विकिपीडिया पर ही भरोसा करता है।

(यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जबरन धर्मांतरण कराने वालों के लिए खतरनाक: केंद्र सरकार ने संसद में रखा FCRA अमेंडमेंट बिल, पढ़ें- NGOs के लिए क्या कुछ बदल जाएगा

मोदी सरकार ने बुधवार (25 मार्च 2026) को लोकसभा में विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA को बदलने वाला विधेयक पेश किया। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने यह विधेयक पेश किया। उन्होंने कहा कि इसका मकसद विदेश से मिले पैसे की पारदर्शिता बढ़ाना और उसका सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना है।

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि यह विधेयक ‘खतरनाक’ तो है, लेकिन उन लोगों के लिए खतरनाक है जो इस पैसे का गलत इस्तेमाल करके धर्म परिवर्तन कराते हैं और अपना फायदा उठाते हैं।

उन्होंने चेतावनी दी, “मोदी सरकार विदेशी फंडिंग के किसी भी दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं करेगी और ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी।”

बता दें कि किसी गैर सरकारी संगठन यानी एनजीओ को विदेश से आर्थिक मदद लेने के लिए FCRA के तहत रजिस्ट्रेशन जरूरी है। साल 2010 का मूल कानून इसमें बनी संपत्ति के लिए कोई कानूनी ढाँचा नहीं देता था, सिर्फ पैसे के आने-जाने को नियंत्रित करने का एक प्रावधान था।

कौन होता है Key Functionary?

विधेयक ने एनजीओ में ‘KEY फंक्शनरी’ की परिभाषा को बढ़ा दिया है। अब इसमें ऑफिस बियरर या डायरेक्टर ही नहीं, बल्कि डायरेक्टर, पार्टनर, ट्रस्टी और हिंदू अविभक्त परिवार के कर्ता के साथ-साथ सोसाइटी, ट्रस्ट, ट्रेड यूनियन या एसोसिएशन की गवर्निंग बॉडी या मैनेजिंग कमेटी के ऑफिस बियरर या सदस्य और कोई भी व्यक्ति जो संगठन के कामकाज या मामलों पर नियंत्रण रखता हो या उसके लिए जवाबदेह हो, शामिल हो गए हैं।

एनजीओ को विदेशी योगदान से बनी किसी भी संपत्ति को बेचने, गिरवी रखने या किसी अन्य तरीके से इस्तेमाल करने से पहले केंद्र सरकार की पहले से अनुमति लेनी होगी।

इसके अलावा अगर वे यह साबित नहीं कर पाते कि उन्हें जानकारी नहीं थी या उचित सावधानी बरती थी, तो संशोधन बड़े कर्मचारियों को FCRA उल्लंघन के लिए जवाबदेह ठहराएगा।

नए प्रावधानों के तहत अगर रिन्यूअल आवेदन जमा नहीं किया गया, केंद्र सरकार ने अस्वीकार कर दिया या समय से पहले रिन्यू नहीं किया तो प्रमाणपत्र की वैधता खत्म होते ही उसे समाप्त माना जाएगा। विधेयक में कहा गया है, “जिस व्यक्ति का प्रमाणपत्र समाप्त हो गया है, वह विदेशी योगदान न तो प्राप्त करेगा और न ही इस्तेमाल करेगा जब तक प्रमाणपत्र रिन्यू न हो जाए।”

‘नियुक्त प्राधिकारी’ की भूमिका को बनाया गया अहम

विधेयक की एक मुख्य विशेषता यह है कि जब किसी संगठन का FCRA रजिस्ट्रेशन निलंबित, समाप्त, समर्पित या किसी अन्य कारण से खत्म हो जाता है तो विदेशी दान से बनी संपत्तियों को सीधे संभालने के लिए एक समयबद्ध और व्यापक व्यवस्था बनाई गई है। एक ‘डिजाइनेटेड अथॉरिटी’ नियुक्त की गई है जो इन संपत्तियों का नियंत्रण लेगी, रिकॉर्ड और इन्वेंटरी रखेगी, उनकी स्थिति सुरक्षित रखेगी और उनका वैध इस्तेमाल या निपटान सुनिश्चित करेगी।

यह स्थायी रूप से हस्तांतरित संपत्तियों को सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर सकती है, जैसे उन्हें केंद्र सरकार या राज्य सरकार के किसी मंत्रालय, विभाग, प्राधिकरण या एजेंसी या किसी स्थानीय निकाय को ट्रांसफर करना या उन्हें बेचना और प्राप्त राशि को ‘भारत की संचित निधि’ में जमा करना और विदेश से बचे हुए किसी भी सहायता को भी।

अगर ‘डिजाइनेटेड अथॉरिटी’ में स्थायी रूप से हस्तांतरित संपत्ति या उसका कोई हिस्सा पूजा स्थल है तो उसकी धार्मिक प्रकृति को बनाए रखना होगा और उसे चुने गए व्यक्ति को प्रबंधन या संचालन सौंपा जाएगा, साथ ही वे शर्तें जो निर्धारित की जा सकें। इसके फैसले को केवल अदालत में चुनौती दी जा सकती है।

अगर कोई व्यक्ति जिसे विदेशी सहायता लेने की अनुमति दी गई थी, अब अस्तित्व में नहीं है या निष्क्रिय या बंद घोषित कर दिया गया है, तो बचे हुए मुख्य कार्यकर्ताओं को केंद्र सरकार को निर्धारित प्रारूप, तरीके और समय-सीमा में सूचित करना होगा। ‘डिजाइनेटेड अथॉरिटी’ उनके फंड और बनी संपत्तियों का स्थायी स्वामित्व रखेगी।

विधेयक में कहा गया है, “डिजाइनेटेड अथॉरिटी और प्रशासक को इस अधिनियम के तहत अपने कार्यों को पूरा करने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के तहत सिविल कोर्ट की सभी शक्तियाँ होंगी, जैसे किसी व्यक्ति को समन करना और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना, शपथ पर उसकी जांच करना, दस्तावेजों की खोज और उत्पादन की माँग करना, हलफनामे पर सबूत लेना, कमीशन जारी करना और ऐसी अन्य बातें जो निर्धारित की जा सकें।” आदेश के खिलाफ जिला न्यायाधीश की अदालत में जाने के लिए 90 दिन की अवधि दी गई है।

दोषियों के लिए जेल की सजा

विधेयक ने सजाओं को तर्कसंगत बनाने का सुझाव दिया है और FCRA उल्लंघन के लिए अधिकतम सजा को पहले के 5 साल से घटाकर 1 साल, जुर्माना या दोनों कर दिया है, किसी भी व्यक्ति के लिए जो किसी प्रावधान या नियम का उल्लंघन करके किसी व्यक्ति, राजनीतिक दल या समूह को विदेशी स्रोत से कोई योगदान, मुद्रा या सुरक्षा लेने या मदद करने में शामिल हो।

मूल अधिनियम की धारा 43 को भी बदल दिया गया है, जिसमें किसी भी कानून प्रवर्तन एजेंसी या राज्य सरकार को FCRA से संबंधित आरोपों की जाँच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की पहले से मंजूरी लेनी होगी।

अगर इस अधिनियम, किसी नियम या आदेश का उल्लंघन किसी व्यक्ति के अलावा किसी इकाई द्वारा किया गया है, तो उस समय का हर मुख्य कार्यकर्ता जो व्यापार के संचालन का प्रभारी और जवाबदेह था, अपराधी माना जाएगा और उसके अनुसार मुकदमा चलाया जाएगा और सजा दी जाएगी।

सरकार के इस कदम का मकसद

आधिकारिक दस्तावेज में कहा गया है, “विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम, 2010 विदेशी योगदान और विदेशी आतिथ्य के स्वीकार और उपयोग को नियंत्रित करता है ताकि यह राष्ट्रीय हित, सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले। यह अधिनियम 1 मई 2011 को लागू हुआ था और 2016, 2018 और 2020 में संशोधित किया गया था। वर्तमान में इस अधिनियम के तहत लगभग 16,000 संगठन रजिस्टर्ड हैं और सालाना लगभग 22,000 करोड़ रुपए प्राप्त करते हैं।”

हालाँकि कई परिचालन और कानूनी कमियाँ पाई गई थीं, खासकर विदेशी योगदान और उनसे बनी संपत्तियों के संचालन के मामले में जब रजिस्ट्रेशन रद्द, सौंप दिया गया या अन्यथा रोक दिया गया हो। इसमें बताया गया, “इसके अलावा, जाँचों की बहुलता, सजाओं में असंगति, उपयोग के लिए समय-सीमा की कमी, रजिस्ट्रेशन समाप्ति के लिए स्पष्ट प्रावधान की कमी और निलंबन के दौरान संपत्तियों के उपचार को लेकर अस्पष्टता के कारण कार्यान्वयन में चुनौतियाँ आई हैं।”

इसलिए नया विधेयक विदेशी योगदान और संपत्तियों के वेस्टिंग, निगरानी, प्रबंधन और निपटान के लिए एक व्यापक ढाँचा बनाने का लक्ष्य रखता है, जिसमें अस्थायी और स्थायी वेस्टिंग शामिल है, साथ ही रजिस्ट्रेशन निलंबन के दौरान संपत्तियों के संचालन को नियंत्रित करना, प्रमाणपत्र की समाप्ति, रिन्युअल न होने या अस्वीकार होने पर प्रमाणपत्र की समाप्ति और सजा को तर्कसंगत बनाना तथा जाँच शुरू करने के लिए केंद्र सरकार की पहले से मंजूरी लेना।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

ईरान में ‘आसमानी आफत’ 82nd एयरबोर्न की एंट्री, जानें- सबसे घातक ‘ऑल अमेरिकन’ फोर्स का इतिहास जो 18 घंटे में पलट देती है जंग का रुख

कल्पना कीजिए एक ऐसी रात की, जहाँ चारों तरफ सन्नाटा हो, लेकिन अचानक आसमान से हजारों सफेद छतरियाँ (पैराशूट) नीचे आने लगें। रडार को कानो-कान खबर न हो और देखते ही देखते दुश्मन के सबसे सुरक्षित किले, उसके हवाई अड्डे और उसके संचार केंद्र कब्जे में ले लिए जाएँ। यह किसी हॉलीवुड फिल्म का सीन नहीं, बल्कि अमेरिकी सेना की उस ‘घातक चाल’ का हिस्सा है जिसे दुनिया ’82nd एयरबोर्न डिवीजन’ के नाम से जानती है।

मिडिल ईस्ट में पिछले तीन हफ्तों से बारूद की गंध फैली हुई है। इजरायल और ईरान के बीच मिसाइलों का आदान-प्रदान अब एक बड़े जमीनी युद्ध की आहट दे रहा है। इसी बीच खबर आती है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी सबसे भरोसेमंद और ‘इमीडिएट रिस्पॉन्स फोर्स’ (IRF) को एक्टिव कर दिया है। पेंटागन के गलियारों से छनकर आ रही खबरें बता रही हैं कि करीब 3,000 जांबाज सैनिक किसी भी वक्त ईरान की सीमाओं के करीब लैंड कर सकते हैं।

यह वो सैनिक हैं जिन्हें न सड़क चाहिए, न बंदरगाह और न ही किसी देश की अनुमति। इन्हें बस एक आदेश चाहिए और अगले 18 घंटों के भीतर ये दुनिया के किसी भी कोने में जंग का रुख पलटने की ताकत रखते हैं। आखिर क्या है इस फोर्स का रहस्य? क्यों ईरान जैसा देश भी इस नाम से सतर्क हो जाता है? आइए, इस ‘आसमानी सेना’ के इतिहास, ताकत और भविष्य की रणनीति को विस्तार से समझते हैं।

82nd एयरबोर्न: वो ‘ऑल अमेरिकन’ योद्धा जो हवा से करते हैं वार

82nd एयरबोर्न डिवीजन अमेरिकी सेना की कोई सामान्य पैदल सेना नहीं है। इन्हें ‘All American’ (AA) कहा जाता है क्योंकि इसकी स्थापना के समय इसमें अमेरिका के हर राज्य के सैनिक शामिल थे। इनकी सबसे बड़ी ताकत इनकी गति और हमला करने का तरीका है। जहाँ सामान्य सेना को युद्ध के मैदान तक पहुँचने के लिए टैंकों, ट्रकों और जहाजों के बेड़े की जरूरत होती है, वहीं ये सैनिक आसमान से सीधे दुश्मन की छाती पर उतरते हैं।

पेंटागन ने इन्हें ‘इमीडिएट रिस्पॉन्स फोर्स’ का दर्जा दिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आज रात व्हाइट हाउस से आदेश निकलता है, तो कल दोपहर तक ये सैनिक साजो-सामान के साथ ईरान के किसी भी रणनीतिक ठिकाने पर मौजूद होंगे। ये सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-130 हरक्यूलिस जैसे विशाल विमानों से हजारों फीट की ऊंचाई से कूदते हैं। इनके पास हल्के लेकिन बेहद आधुनिक हथियार होते हैं जो इन्हें तेजी से मूव करने की आजादी देते हैं। इनका मुख्य काम होता है ‘शॉक एंड ऑ’ (Shock and Awe) यानी दुश्मन को हैरान और परेशान कर देना।

ये यूनिट आमतौर पर मुख्य सेना के आने से पहले रास्ता साफ करती है। इनका लक्ष्य होता है दुश्मन के एयरफील्ड्स पर कब्जा करना, ताकि बाद में अमेरिका के भारी टैंक और हजारों की संख्या में अन्य सैनिक वहाँ आसानी से लैंड कर सकें। इनके पैराट्रूपर्स रात के घने अंधेरे में भी जीपीएस और नाइट विजन की मदद से सटीक लैंडिंग करने में माहिर होते हैं, जो इन्हें दुनिया की सबसे प्रोफेशनल पैराशूट यूनिट बनाता है।

इतिहास के पन्नों में दर्ज खूनी दास्ताँ: जब हिटलर की सेना के छूटे थे पसीने

82nd एयरबोर्न का इतिहास वीरता और बलिदान की मिसालों से भरा पड़ा है। इस डिवीजन की असली पहचान द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बनी। 6 जून 1944, जिसे दुनिया ‘D-Day’ के नाम से जानती है, उस दिन जब मित्र देशों की सेनाएँ समुद्र के रास्ते फ्रांस के नॉर्मंडी तट पर उतरने वाली थीं, उससे ठीक 5 घंटे पहले 12,000 पैराट्रूपर्स ने दुश्मन की लाइनों के पीछे छलांग लगा दी थी।

उनका मकसद था हिटलर की नाजी सेना की सप्लाई लाइन काट देना और पुलों पर कब्जा करना। बिना किसी अतिरिक्त मदद के, इन जांबाजों ने 33 दिनों तक लगातार खूनी संघर्ष किया और यूरोप की आजादी की नींव रखी। इसके बाद 1991 के खाड़ी युद्ध में जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर कब्जा किया, तब इसी डिवीजन ने ‘डेजर्ट शील्ड’ ऑपरेशन के तहत सबसे पहले सऊदी अरब पहुँचकर मोर्चा संभाला था।

2003 के इराक युद्ध में भी इनकी भूमिका निर्णायक रही। सिर्फ 100 घंटों की जमीनी लड़ाई में इन्होंने इराक के बड़े शहरों पर नियंत्रण कर लिया था। हालाँकि, इनका इतिहास सिर्फ जीत का ही नहीं रहा है। वियतनाम और हाल के वर्षों में अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका की लंबी खिंचती जंग ने इस एलीट फोर्स की साख पर सवाल भी उठाए। आलोचकों का मानना है कि ये फोर्स हमला करने में तो माहिर है, लेकिन किसी देश पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखने के लिए इन्हें काफी संघर्ष करना पड़ता है।

मिडिल ईस्ट में तैनाती के मायने: ट्रंप की शांति नीति या युद्ध का नया अध्याय?

वर्तमान में मिडिल ईस्ट के हालात किसी जलते हुए ज्वालामुखी जैसे हैं। एक तरफ ट्रंप प्रशासन सार्वजनिक रूप से शांति और समझौतों की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ 3,000 से 4,000 सैनिकों की यह तैनाती कुछ और ही इशारा कर रही है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, नॉर्थ कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग से इन सैनिकों की रवानगी का मतलब है कि अमेरिका अब ‘वेट एंड वॉच’ की नीति से आगे निकल चुका है।

यह तैनाती केवल ईरान को डराने के लिए नहीं है, बल्कि यह इजरायल को एक सुरक्षा कवच देने की कोशिश भी है। अगर ईरान या उसके समर्थित गुट (जैसे हिजबुल्लाह या हूती) इजरायल पर कोई बड़ा जमीनी हमला करते हैं, तो 82nd एयरबोर्न वो पहली दीवार होगी जिसे उन्हें पार करना होगा। इसके अलावा, हाल ही में यूएसएस बॉक्सर और मरीन एक्सपीडिशनरी यूनिट की तैनाती ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका ‘जल, थल और नभ’ तीनों मोर्चों पर ईरान को घेरने की तैयारी कर चुका है।

ईरान भी इस खतरे से अनजान नहीं है। पिछले 20 सालों से ईरान ने अपनी सेना को इसी तरह के ‘एसिमेट्रिक वॉरफेयर’ (Asymmetric Warfare) के लिए तैयार किया है। ईरान के पास दुनिया का सबसे बड़ा मिसाइल प्रोग्राम और ड्रोन नेटवर्क है। अगर 82nd एयरबोर्न के सैनिक जमीन पर उतरते हैं, तो उन्हें ईरान की ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ (IRGC) से कड़ी टक्कर मिल सकती है, जो गुरिल्ला युद्ध में माहिर माने जाते हैं।

काबुल से तेहरान तक: क्या दोहराया जाएगा इतिहास?

अगस्त 2021 का वो मंजर पूरी दुनिया को याद है, जब अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना वापस जा रही थी और काबुल एयरपोर्ट पर हजारों लोगों की भीड़ अपनी जान बचाने के लिए भाग रही थी। उस अफरातफरी के माहौल में हामिद करजई इंटरनेशनल एयरपोर्ट को सुरक्षित रखने और रेस्क्यू ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा करने का जिम्मा इसी 82nd एयरबोर्न डिवीजन के पास था। उन्होंने सबसे कठिन परिस्थितियों में वहाँ से हजारों लोगों को निकाला।

लेकिन आज चुनौती अलग है। अफगानिस्तान में वे जा रहे थे, लेकिन ईरान में उन्हें शायद ‘घुसना’ पड़े। 82वीं एयरबोर्न की सबसे बड़ी परीक्षा उनकी ‘क्विक रिएक्शन’ क्षमता की होगी। क्या वे ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देकर लैंड कर पाएँगे? क्या वे बिना भारी नुकसान के अपने लक्ष्यों को हासिल कर पाएँगे? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब पेंटागन के पास भी शायद पूरी तरह नहीं है।

पेंटागन के अधिकारियों का कहना है कि हर सैनिक को विशेष ट्रेनिंग दी गई है ताकि वे शहरी इलाकों से लेकर रेगिस्तान तक, हर जगह लड़ सकें। उनके पास अब पहले से कहीं अधिक एडवांस्ड ड्रोन, प्रिसीजन गाइडेड हथियार और जैमिंग डिवाइसेस हैं। यह तकनीक उन्हें दुश्मन के रडार से बचने और सीधे उनके कमांड सेंटर पर वार करने की शक्ति देती है।

क्या यह तीसरे विश्व युद्ध की दस्तक है?

डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य रणनीति हमेशा से अनिश्चित रही है। एक तरफ वे अमेरिकी सैनिकों को ‘अंतहीन युद्धों’ से वापस लाने का वादा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ इस तरह की आक्रामक तैनाती उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ और ‘स्ट्रेंथ थ्रू पीस’ (शक्ति के जरिए शांति) के नारे को पुख्ता करती है। 82nd एयरबोर्न का मैदान में उतरना इस बात का संकेत है कि अगर बातचीत विफल हुई, तो अमेरिका अपनी पूरी सैन्य ताकत का इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा।

अगर ये 3,000 सैनिक मिडिल ईस्ट की धरती पर कदम रखते हैं, तो यह जंग केवल दो देशों के बीच नहीं रह जाएगी। यह दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति और एक क्षेत्रीय शक्ति के बीच के वजूद की लड़ाई बन जाएगी। दुनिया की नजरें अब उन 18 घंटों पर टिकी हैं, जो किसी भी वक्त आदेश मिलते ही शुरू हो सकते हैं।

बिहार के रोहतास में हिंदू महिला के साथ लव जिहाद, अली असगर ने गोमांस खिलाने की कोशिश में तोड़े दाँत: कहा- जो मजा हिंदू लड़की में, वो मुस्लिम में कहाँ Ground Report

‘जो मजा हिंदू की लड़की में है वो मुस्लिम की लड़की में कहाँ?’ ये शब्द थे अली असगर अंसारी के, जिसने बिहार के रोहतास में हिंदू महिला के साथ लव जिहाद किया। पीड़िता ने कहा, “केरल फाइल्स में जो हुआ, वो मेरे साथ नहीं हुआ, बल्कि वो मेरी ही कहानी है, मुझ पर ही लिखी गई है।” उसने कहा कि उसे जबरन गोमांस खिलाने की कोशिश हुई, कितनी बार रेप किया गया, बच्चों के घर में रहने के दौरान किचन में उसके साथ रेप किया गया। पुलिस के आने की खबर मिलते आरोपित अंडरवियर में ही भाग निकला।

पीड़िता ने बताया कि अली असगर ने खुद को पड्डू सरदार बताकर, कलावा और रुद्राक्ष पहनकर घर में आना-जाना शुरू किया। जब सामने आया कि वह हिंदू नहीं मुस्लिम है तो बीवी की बुराई करते हुए पीड़िता से साथ रहने कहा, इतनी धमकियाँ दी कि वो पीड़िता के पति के सामने घर आता तो उसका पति बाहर चला जाता और उसके जाने के बाद वो पीड़िता के साथ सोने के लिए जाता।

आरोपित अली असगर अंसारी

ऑपइंडिया की रिपोर्टर से बात करते हुए पीड़िता ने कहा कि 2022 की बात है, वह बिहार के देहरी में इन्वर्टर की बैटरी खरीदने गई थी। वहाँ अली असगर ने पीड़िता और उसके पिता का नाम पूछा, नाम बताने पर कहने लगा वह उसके पिता को जानता है। उसने कहा कि नंबर दे दीजिए, बैटरी घर पहुँचा दी जाएगी। बैटरी चेक करने के बहाने वो घर आया।

पीड़िता से उसके पति का भी नंबर ले लिया, पति से भी बात करने लगा और जल्दी ही सबसे घुल मिल गया, घर आने-जाने लगा। अपने लड़के की दोस्ती पीड़िता के लड़के से करा दी। दोनों साथ घूमने लगे। एक दिन वो सुबह-सुबह घर आया और बच्चों से पूछा कि मम्मी कहाँ है तो बच्चों ने बताया कि मम्मी को टायफाइड है, वो आराम कर रही हैं।

इतना सुनते ही वो सीधा कमरे में आ गया और कहा, “हम बनारस जा रहे हैं, आप भी चलिए, आपको दिखा आते हैं।” पीड़िता ने कहा कि उसका पति घर में नहीं है इसलिए वो नहीं जा सकती। पीड़िता के बच्चों ने उससे कहा कि मम्मी अंकल तो अच्छे हैं, आप जाओ डॉक्टर को दिखा आओ।

होटल में की दरिंदगी, वीडियो के सहारे बनाने लगा संबंध

पीड़िता ने कहा, “हम बनारस आए। हम थक गए थे। उसने कहा जूस लेकर आते हैं। और वह जूस लेने चला गया। उसने एक दवा दी और कहा कि दवा खा लो, बुखार की है, आराम हो जाएगा और मैंने जूस पी लिया, दवा खा ली। मुझे पाँच मिनट के बाद पसीना आने लगा। उल्टी आने लगी, मन अजीब होने लगा। हम रोने लगे तो बोला पास में होटल है, वहीं चल कर आप आराम कर लीजिए।”

पीड़िता ने कहा, “होटल के काउंटर तक गए हैं, हमको उतना ही याद है, आगे का कुछ याद नहीं है। हम ऊपर के रुम में गए या नीचे ही किसी रुम में थे, हमको कुछ याद नहीं। शाम को होश आया तो उसने कहा, चलिए शाम हो गया है, घर चलते हैं। वहाँ से आने के बाद हमको चक्कर आता था, कमजोरी महसूस होता था, हम सोचे तबियत खराब है इसलिए ऐसा हो रहा है।”

वो पहले की ही तरह घर आता रहा। उसी बीच पीड़िता के पति ने बाईक लेने की सोची तो अली असगर ने अपने नाम पर लेने की बात करने लगा, उसने गाड़ी देने वाले से भी बात कर ली थी। गाड़ी भी घर आ गई। इन सब के 15 दिन बाद आरोपित घर आया और कहने लगा, “मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ।”

पीड़िता ने कहा, “इतना सुनते ही मेरे होश उड़ गए। उसने कहा, जब से आपको दुकान पे देखे थे, तभी से आप बहुत अच्छी लगती थी। आपके बिना जी नहीं सकते, मर जाएँगे। कहने लगा, मेरी बीवी बहुत खराब है। मेरे भाई के साथ उसका अफेयर चलता है। मेरा कोई शौक पूरा नहीं करती है। मैंने कहा मियाँ बीवी का बात है, आप लोग आपस में समझ लीजिए। फिर उसने मुझे होटल में बनाई मेरी वीडियो दिखाई, इतना गंदा वीडियो दिखाया, कि मेरे होश उड़ गए। मैं उसके पैर पकड़कर रोने लगी।”

पीड़िता से उसने कहा, “आपका दिल दुखाने के लिए वीडियो नहीं बनाए थे। ऐसे तो आप हमसे प्यार करती नहीं, ये आपको दिखाने के लिए था, आप ऐसे ही हमसे प्यार करिए।” इतना कहकर उसने पीड़िता की माँग में सिंदूर डाल दिया। लेकिन जब पीड़िता ने इस रिश्ते को मानने से इंकार किया तो परिवार को जान से मारने की धमकी देने लगा। इसके बाद वो जैसे कहने लगा, पीड़िता वैसा करने लगी।

अली असगर ने पीड़ित महिला से कहा- जो मजा हिंदू की लड़की में है वो मुस्लिम में कहाँ?

आरोपित घर आने लगा, उसके पति के साथ मारपीट कर, धमकी देकर उसे भी ऐसा डराया कि वो उसके आने के बाद घर से बाहर चला जाता था। एक दिन पीड़ित महिला ने उसका आधार कार्ड देख लिया और चौंक गई। उसने कहा कि वह मुस्लिम है फिर उसके घर में टीका लगाकर, कलावा और रुद्राक्ष पहनकर क्यों आता रहा।

पीड़िता ने कहा, “आप हिंदू बनकर क्यों आते रहे, उसने कहा इससे क्या होता है। जो मजा हिंदू की लड़की में है वो मुस्लिम की लड़की में कहाँ। मैंने बोला ये बहुत गलत चीज है। जब मैं बगावत करने लगी तो उसने मेरे साथ मारपीट भी शुरू कर दी। उसने कहा कि मेरे परिवार से मिल लो, मैंने सोचा इसके परिवार से मिल लेते हैं बीवी से भी मिल लेंगे, समझाएँगे तो शायद ये साइड हो जाएगा। लेकिन जाते समय देहरी में एक पुल है, जहाँ गाड़ी रोक दी गई, वहाँ इसके भाई जिसका नाम लड्डू था, वो और उसके चाचा का लड़का था।”

पीड़िता ने आगे कहा, “ उन लोगों ने मुझे पकड़ लिया, मैंने कहा छोड़िए हमको, तब तक उन लोगों ने गाय का मांस निकाला और कहा कि इसे खालो, मेरी जाति में आ जाओ, मैंने उनके हाथ पर दाँत काटकर उन्हें हटाया और गौमांस नीचे गिर गया। इन लोगों ने इसके बाद उनलोगों ने मेरा दाँत तोड़ा और मुझे जबरन जहर पिला दिया। कहा मेरी नहीं होगी तो किसी की भी नहीं होगी।”

पीड़िता को छोड़कर वे भाग गए, जहाँ से कुछ लोगों ने ले जाकर पीड़िता को अस्पताल में भर्ती कराया। वहाँ भी ये लोग पहुँच गए। डॉक्टर को भी आरोपितों ने पैसे दे दिए और ICU के अंदर आकर भी धमकी दी। ठीक हो कर महिला घर आई तो बच्चों के सामने धमकी देकर गया। बच्चे भी डरने लगे।

एक दिन फिर उसने पीड़िता को दिल्ली के एक होटल में ले जाकर खाने में नशे की दवा मिलाकर खिला दी और अगले दिन उसकी आपत्तिजनक वीडियो दिखाकर हँसने लगा। पीड़िता ने कहा, “इतना गंदा वीडियो था, मैं पड़ी हुई हूँ और वो मेरे साथ सेक्स कर रहा है।”

पीड़िता ने कहा, “वह मुझे एक मुस्लिम के साथ मस्जिद ले गया, वहाँ बैठाकर पता नहीं क्या-क्या करवाया। करवाने के बाद उसने कहा तुमसे निकाह कर लिए हैं। इसके बाद मैं अपने घर आई। घर आने के बाद मैं अपने पति के साथ दिल्ली गई, वहाँ से आई तो उसने मुझे बहुत मारा, सिगरेट से मेरा सीना जला दिया। मैंने रोते हुए अपनी एक सहेली को फोन किया। उसको घर बुलाकर सब बताया, उसने कहा कि तुम अपने बच्चों को कहीं भेज दो और थाने में जाकर केस करो, मैं थाने गई, FIR  कराया 76 धारा लगा।”

पीड़िता द्वारा उपलब्ध कराई गई पहली बार दर्ज हुई FIR की कॉपी

उसने कहा कि उसने गिरफ्तारी से पहले ही अपना बेल भी करवा लिया। पीड़िता का कहना है कि उसने जज को पैसे दिए और गिरफ्तारी रुक गई। पीड़िता ने कहा कि उसका धमकाने और घर आने-जाने का सिलसिला चलता रहा और 2024 में एक दिन वह मास्क पहने 3 अन्य लोगों के साथ उसके घर आया। बंदूक और चाकू के दम पर उनलोगों ने पीड़ित महिला से चार लाख रुपए, चार-पाँच लाख रुपए के गहने भी ले लिए।

आरोपित ने बाकियों से गहने भेजवा दिए और खुद रुक गया। उसने पीड़ित महिला के बच्चों के सामने किचन में उससे रेप किया। महिला डिप्रेशन की दवा खा ली, बच्चे हॉस्पिटल के चक्कर काटने लगे। सासराम के सरकारी अस्पताल में पीड़िता ने पुलिस को अपना बयान दिया।

उसने पैसे के बल पर खुद को हर जगह बचाए रखा और अस्पताल से पीड़िता को अपने साथ उसके घर ले आया। उसने धमकी दी कि वह उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। उसने कहा कि देहरी में थाने में उसकी बहुत चलती है।

उसकी आपत्तिजनक वीडियो से वह उसे ब्लैकमेल करता रहा। इतना ही नहीं उसने अपने किसी दोस्त से भी उसे ब्लैकमेल करवाया। उसकी भी शिकायत पीड़ित महिला ने दर्ज करवाई। उसके दुकान का मैनजर भी महिला के साथ बद्तमीजी करता था।

बच्चों के सामने किचन में किया रेप, पुलिस के आने की बात सुन अंडरवियर में भागा अली असगर

28 फरवरी 2026 को उसने घर के बाहर आकर फोन किया और कहा कि दरवाजा खोलो। महिला ने कहा वह किराए के घर में रहती है, तमाशे के डर से उसने दरवाजा खोल दिया। वह एक और आदमी के साथ कट्टा लेकर आता है। कहता है खाना बनाओ। महिला कहती है घर में कुछ नहीं है।

इसके बाद उसने मारपीट शुरू कर दी, महिला को किचन में ही पटककर उसने बच्चों के सामने रेप किया। जब कट्टा लेकर बैठा दूसरा आदमी वहाँ से भाग गया, तब महिला के बेटे ने ताले से आरोपित के सिर पर मारा और महिला ने उसके आँख में मिर्च पाउडर डाल दिया।

महिला की बेटी ने पुलिस को फोन कर दिया तो उसने धमकी दी कि वह उसकी बेटी को भी बेच देगा। इसके बाद पुलिस के आने के डर से वह अंडरवियर में ही भाग गया। पुलिस ने पीड़िता के घर से उसके कपड़े और फोन भी बरामद किए और उसे थाने बुलाया गया। पीड़िता का आरोप है कि उसे रातभर थाने में बैठाया गया। SP के कहने के बाद रिपोर्ट लिखी गई।

पीड़िता द्वारा उपलब्ध कराई गई FIR कॉपी

पीड़ित महिला के अनुसार, अब तक आरोपित के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया गया है। वह पूरी तरह से थक चुकी है, जिंदगी से हार चुकी है और आरोपित अब भी आजाद घूम रहा है। पीड़िता का कहना है कि वो सलाखों के पीछे होता तो शायद वह इतनी बार रेप का शिकार ना हुई होती।

पीड़िता का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन आरोपित अली असगर अंसारी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। महिला के पास वीडियो और फोटो के रूप में पुख्ता सबूत होने के बावजूद आरोपित खुलेआम घूम रहा है। महिला ने गुहार लगाई है कि उसे इंसाफ दिया जाए ताकि कोई और हिंदू बेटी या महिला इस तरह के ‘लव जिहाद’ के जाल में न फँसे।

(पीड़िता से बात करने के बाद हमने संबंधित थाने से संपर्क करने की कोशिश की, हालाँकि थाने में बात नहीं हो सकी। अगर हमारी बात होती है, तो खबर को अपडेट कर दिया जाएगा।)

AI तस्वीरों के जरिए सपा-कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम ने फैलाई अफवाह, ग्रामीण पेट्रोल पंपों पर दिखने लगा असर: समझें आम लोगों को डरा क्या पाना चाहते हैं अखिलेश यादव

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों पेट्रोल पंपों पर लंबी-लंबी लाइनें लग रही हैं। लोग घंटों खड़े होकर तेल भरवा रहे हैं। रसोई गैस के सिलेंडर के लिए भी एजेंसियों पर भीड़ उमड़ रही है। लेकिन क्या ये असली किल्लत है? या फिर एक सोची-समझी साजिश?

तथ्य बता रहे हैं कि ये पैनिक समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने फैलाया है। नेहा सिंह राठौर और सूर्य समाजवादी जैसे चेले AI जनरेटेड फोटो और वीडियो शेयर कर अफवाहें उड़ाईं। इसके बाद अखिलेश यादव ने इसे राजनीतिक हथियार बना लिया। कॉन्ग्रेस और वामपंथी इकोसिस्टम ने भी इसे बढ़ावा दिया। जबकि योगी आदित्यनाथ सरकार और तेल कंपनियाँ साफ कह रही हैं न पेट्रोल की कमी है, न डीजल की, न गैस की। पर्याप्त स्टॉक है, पैनिक मत फैलाओ, फिर भी ये आम लोगों को भड़काने से बाज नहीं आ रहे।

कैसे फैलाया गया पैनिक, समझें इकोसिस्टम का पूरा खेल

इस खेल के मोहरों में से एक है नेहा सिंह राठौर। खुद को लोकगायिका बताने वाली इस इकोसिस्टम की प्यादी ने बुधवार (25 मार्च 2026) को एक फोटो पोस्ट की। फोटो में पेट्रोल पंप पर लंबी लाइन दिख रही थी। इसका कैप्शन था, “सिलेंडर मिल गया तो पेट्रोल पंप की लाइन में लग जाओ लेकिन एपिस्टीन फाइल्स का नाम मत लो। असली मुद्दा एपिस्टीन फ़ाइल्स है बाक़ी सब उसे दबाने की साज़िश है।”

ध्यान से देखने पर ये फोटो AI जनरेटेड पाई गई। उसी के ट्वीट के जवाब में Gemini का वॉटरमार्क दिखाने लिखे। इसके बावजूद वो सुधरी नहीं।

नेहा सिंह राठौर ने अगले ही दिन यानी गुरुवार (26 मार्च 2026) को फिर से दूसरी AI फोटो पोस्ट की। उसने लिखा, “गैस और तेल के चक्कर में एपिस्टीन फाइल्स भूल गए न! यही तो है उनका मास्टरस्ट्रोक!” असल में ये Epstein files वाली साजिश वाली थ्योरी से जोड़कर पैनिक फैलाने की कोशिश थी।

इससे पहले 15 मार्च को भी नेहा ने एक वीडियो शेयर किया था। गैस एजेंसी पर लाइन दिखाते हुए लिखा, “ये रही ज़मीनी सच्चाई… रसोई गैस की क़िल्लत से लोग परेशान हैं।” लेकिन वीडियो में खुद महिला कह रही थी कि कुछ लोग ज्यादा सिलेंडर जमा कर रहे हैं, किल्लत नहीं है। नेहा ने आधा सच दिखाकर पूरा झूठ फैलाया।

सूर्या समाजवादी नाम के एक्स हैंडल से भी ऐसी ही अफवाहें लगातार फैलाई गई। उसने बुधवार (25 मार्च 2026) को अयोध्या का वीडियो होने का दावा करते हुए एक वीडियो शेयर किया और लिखा कि पेट्रोल पंपों पर भारी भीड़ उमड़ रही है। उसने कैप्शन में लिखा, “बीजेपी ने पूरे देश को लाइन में लगा दिया।”

सोशल मीडिया पर भी इसी तरह के ट्रेंड चलाने की कोशिश की गई। जल्दी ही यूपी के गाँव-गाँव में अफवाह फैल गई। सिद्धार्थनगर में पेट्रोल पंप पर लाइन लगी, वहाँ मारपीट भी हुई। ये वीडियो सपा के पीडीए पर आधारित एक्स हैंडल के माध्यम से फैलाया जा रहा है।

ऐसे ही वीडियो लखनऊ व अन्य जगहों के नाम पर भी वायरल किए जा रहे हैं। फोटो और वीडियो में बताया जा रहा है कि लखनऊ के पेट्रोल पंपों पर भारी भीड़ जमा है और लोग सुबह से ही लाइनों में खड़े हैं।

अखिलेश यादव भी पैनिक फैलाने में शामिल, साफ दिख रही राजनीतिक अकांक्षा

एलपीजी के बाद अब पेट्रोल-डीजल की कमी के नाम पर अफवाह फैलाने वालों में खुद सपा मुखिया अखिलेश यादव भी शामिल हो चुके हैं। अखिलेश यादव ने गुरुवार (26 मार्च 2026) को एक वीडियो शेयर किया और लिखा, “भाजपा राज में लाइन के सिवा जनता को मिला क्या?”

हालाँकि कुछ लोग ऐसे भी दिखे, तो इस पूरी साजिश की पोल खोलते नजर आए। मुजी सिंह राँगी नाम के एक्स हैंडल ने दावा किया कि एआई जेनरेटेड फोटो और वीडियो से ग्रामीण इलाकों में पैनिक फैलाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने एक सैंपल भी पोस्ट किया।

सख्त हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

इस पूरे मामले पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सख्त और साफ-साफ बयान दिया है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग जानबूझकर अफवाहें फैलाकर माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। आमजन को सतर्क रहना चाहिए और जरूरत पड़ने पर ही पेट्रोल-डीजल खरीदना चाहिए। अनावश्यक खरीदारी से बचें। सीएम योगी ने स्पष्ट किया कि अगर ईरान-इजराइल युद्ध लंबा खिंचता है तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। ऐसे में हमें मानसिक रूप से तैयार रहना होगा और अफवाहों से पूरी तरह दूर रहना होगा।

मुख्यमंत्री ने रसोई गैस को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने बताया कि पहले एक सिलेंडर पूरे महीने चलता था, लेकिन अब लोग कुछ ही दिनों में नया सिलिंडर लेने पहुँच रहे हैं, जो बिल्कुल उचित नहीं है। उन्होंने घर-घर गैस की होम डिलीवरी की सुविधा अपनाने की सलाह दी ताकि लोगों को लंबी लाइनों में खड़े होने की जरूरत न पड़े। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि देश के हित में सरकार ने जो भी कदम उठाया है, उसके लिए हमें खुद को तैयार करना चाहिए।

बता दें कि सरकार और तेल कंपनियाँ लगातार पर्याप्त स्टॉक की बात कर रही हैं, फिर भी समाजवादी पार्टी, कॉन्ग्रेस और वामपंथी इकोसिस्टम की साजिश जारी है। AI इमेज, पुरानी वीडियो और Epstein files वाली बेतुकी थ्योरी से पैनिक फैलाकर योगी सरकार को बदनाम करने का खेल चल रहा है। लेकिन जनता अब जागरूक हो चुकी है। अफवाहों पर भरोसा नहीं कर रही।

गौरतलब है कि एलपीजी सिलेंडर को लेकर फैले पैनिक के बीच यूपी सरकार ने सख्त कदम उठाए थे। इस दौरान कालाबाजारी और जमाखोरी करने वाले कई लोगों में कार्रवाई हुई थी, जिसमें हापुड़ से लेकर लखनऊ तक समाजवादी पार्टी के नेता शामिल पाए गए। यूपी सरकार ने उन्हें जेल भी भेजा। सबकुछ जनता के सामने होते हुए भी समाजवादी पार्टी और उसके आईटी से जुड़े लोग अब भी जनता को भ्रमित कर रहे हैं, ताकि राज्य में अव्यवस्था फैले और लोग पैनिक के चक्कर में बवाल करने सड़कों पर उतर आए। फिलहाल तो सपा मुखिया के भी ट्वीट्स से यही सामने आ रहा है।

पाकिस्तान में सिखों की पगड़ी उछलने पर सिल लेते हैं मुँह, ‘धुरंधर-2’ की कामयाबी से पेट में उठ रहीं मरोड़: जानें कैसे AI से ईशनिंदा का प्रोपेगेंडा फैला रहा वामपंथी गिरोह

फिल्म ‘धुरंधर-2: द रिवेंज’ ने पर्दे पर आते ही कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं और ₹1000 करोड़ का जादुई आँकड़ा पार कर लिया है। एक तरफ दुनिया भर के लोग इस फिल्म को सिर आँखों पर बैठा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ वामपंथी और कट्टरपंथी लोग इस कामयाबी को हजम नहीं कर पा रहे हैं। इस फिल्म को नीचा दिखाने और बदनाम करने के लिए अब गंदी चालें चली जा रही हैं।

फिल्म के खिलाफ माहौल बनाने के लिए AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का सहारा लेकर झूठे वीडियो और फोटो फैलाए जा रहे हैं। साजिश यह है कि किसी तरह सिखों की धार्मिक भावनाओं को भड़काया जाए और भाईचारे में जहर घोला जाए। यह सिर्फ एक फिल्म का विरोध नहीं है, बल्कि सच्चाई को दबाने की एक बड़ी कोशिश है, ताकि लोग फिल्म के जरिए दिखाए गए असल मुद्दों से भटक जाएँ। वहीं, असल में जो जुल्म और हमले सिखों पर होते है उन पर चुप्पी साध लेते है और उन खबरों को दबा दिया जाता है।

‘फेक’ सिगरेट वाली तस्वीर और ईशनिंदा के नाम पर उत्पीड़न

फिल्म में रणवीर सिंह ने ‘हमजा’ उर्फ ‘जसकिरत सिंह’ का किरदार निभाया है। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो और तस्वीरें वायरल हुईं, जिसमें रणवीर सिंह को पगड़ी पहने हुए सिगरेट पीते दिखाया गया है। हालाँकि, फिल्म के डायरेक्टर आदित्य धर ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह से AI द्वारा निर्मित फेक कंटेंट है।

आदित्य धर ने चेतावनी देते हुए कहा, “एक झूठी तस्वीर में गलत तरीके से दिखाया गया है कि जसकिरत पगड़ी पहनकर सिगरेट पी रहा है। यह हमारे फिल्म या किसी आधिकारिक प्रचार सामग्री का हिस्सा नहीं है। यह जानबूझकर बनाया गया झूठ है, जिसे फसाद फैलाने के लिए फैलाया जा रहा है।”

आदित्य धर ने साफ किया कि फिल्म में सिख समुदाय का सर्वोच्च सम्मान किया गया है और प्रोपेगेंडा फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

फिल्म ‘धुरंधर-2’ ने उस सच पर से पर्दा उठाया है जिस पर अक्सर वामपंथी और कट्टरपंथी चुप्पी साधे रहते हैं। फिल्म के एक सीन में दिखाया गया है कि कैसे एक सिख व्यक्ति पर कुरान जलाने का झूठा आरोप लगाकर उसे ‘ईशनिंदा’ (Blasphemy) के जाल में फँसा दिया जाता है। यह कोई फिल्मी कल्पना नहीं, बल्कि पाकिस्तान की कड़वी सच्चाई है। पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों का इस्तेमाल अक्सर हिंदू और सिख अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने, उनकी जमीनें हड़पने या उन्हें मौत के घाट उतारने के लिए किया जाता है।

पगड़ी उछालना और जबरन धर्मांतरण: गायब है ‘लिबरल’ गिरोह

फिल्म ‘धुरंधर’ को बदनाम करने के वाले यह तत्व पाकिस्तान में सिखों पर हो रहे असली जुल्मों पर एक शब्द नहीं बोलते हैं। पाकिस्तान के फैसलाबाद में एक सिख छात्रा के साथ स्कूल में मारपीट की गई और उसकी पगड़ी जबरन उतार दी गई। छात्रा को पेट में लात मारी गई, जबकि वह अस्थमा की मरीज थी।

इसी तरह, खैबर पख्तूनख्वा और नानकाना साहिब में सिख लड़कियों और महिलाओं का अपहरण कर जबरन इस्लाम में धर्मांतरण कराना एक धंधा बन गया है। आँकड़े बताते हैं कि बँटवारे के वक्त पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी 14-15 प्रतिशत थी, जो आज घटकर महज 2-3 प्रतिशत रह गई है।

हर साल लगभग 1000 हिंदू, सिख और ईसाई लड़कियों का अपहरण कर जबरन निकाह कराया जाता है। अमेरिका तक ने पाकिस्तान को ‘विशेष चिंता वाला देश’ घोषित किया है, लेकिन ‘धुरंधर’ फिल्म को बदनाम करने वाले लोग इन असली ‘नरसंहारों’ पर मौन साधे रहते हैं।

FAKE न्यूज के पीछे का असली एजेंडा

‘धुरंधर-2’ जैसी फिल्में जब सच को बड़े पर्दे पर लाती हैं, तो फेक क्लिप और फेक न्यूज का बाजार गर्म होना तय है। जो लोग फिल्म में एक काल्पनिक सीन को ‘मजहबी अपमान’ बताने के लिए फेक AI वीडियो बना रहे हैं, क्या उनके पास उन सिख लड़कियों के आंसू पोंछने के लिए वक्त है जिनकी पगड़ी पाकिस्तान के फैसलाबाद में उछाली जा रही है?

वामपंथी और कट्टरपंथी संगठनों का यह गठबंधन असल में ‘विचारधारा’ की लड़ाई नहीं, बल्कि ‘सच को दबाने’ की साजिश है। उन्हें रणवीर सिंह के पगड़ी पहनने से दिक्कत नहीं है, उन्हें दिक्कत इस बात से है कि फिल्म ने पाकिस्तान के उस खौफनाक चेहरे को बेनकाब कर दिया है, जिसे वे सालों से ‘भाईचारे’ की चादर में लपेटकर छिपाते आए हैं।

सिखों की धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल कर फिल्म को बैन कराने की कोशिश करना इन कट्टरपंथियों का नया हथियार है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि सिख धर्म और उसके प्रतीकों का सम्मान जितना भारतीय सिनेमा और समाज करता है, उतना पाकिस्तान जैसे मुल्कों में कभी नहीं हुआ। फिल्म ‘धुरंधर-2’ ने केवल मनोरंजन नहीं किया, बल्कि उन हजारों मूक चीखों को आवाज दी है जिन्हें पाकिस्तान की बंद कोठरियों में जबरन धर्मांतरण और ईशनिंदा के नाम पर दबा दिया गया।

हमें समझना होगा कि जब भी कोई फिल्म ‘असुविधाजनक सच’ दिखाएगी, तो उसे बदनाम करने के लिए ‘फेक नैरेटिव’ का सहारा लिया जाएगा। दर्शक अब जागरूक हैं, वे जानते हैं कि असली अपमान पगड़ी पहनने वाले किरदार का नहीं, बल्कि उन लोगों का है जो सिखों के अधिकारों पर पाकिस्तान में खामोश रहकर भारत में हिंसा भड़काने की साजिश रचते हैं।

सुहेल ने कलावा बाँध छिपाई पहचान, ईरम ने ‘महक’ नाम रखकर किया आकाओं के लिए काम: समझिए भारत में ISI कैसे खेल रहा जासूसी वाला खेल, वामपंथी सिर्फ हिंदुओं को बदनाम करने में जुटे

गाजियाबाद से सामने आया जासूसी नेटवर्क सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस नैरेटिव पर भी सीधा निशाना है जो एक खास दिशा में गढ़ा जाता रहा है। यह मामला बताता है कि सच्चाई कितनी परतों में छिपी होती है और कैसे उसे चुन-चुनकर तोड़ा-मरोड़ा जाता है।

कौशांबी और साहिबाबाद से पकड़े गए इस गिरोह के तार सीधे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से जुड़े मिले। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं थी कि ये लोग जासूसी कर रहे थे, बल्कि यह थी कि ये सब हिंदू नाम और पहचान की आड़ लेकर भारत के खिलाफ काम कर रहे थे। सरफराज ने खुद को जोरा सिंह बना लिया, शहजाद ने भट्टी और वकार ने विक्की जट नाम रख लिया। कौशांबी से पकड़े गए सुहेल ने खुद का नाम रोमियो, नौशाद ने लालू, समीर ने शूटर और एक औरत साने इरम बन गई महक।

यह सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं था। सुहेल कलावा बाँधता था, गले में रुद्राक्ष पहनता था, माथे पर टीका लगाता था। नौशाद और समीर भी इसी तरह की हिंदू पहचान लेकर घूमते थे। यानी साजिश यह थी कि हिंदू बनकर जासूसी करो और हिंदुओं का भरोसा जीतो और फिर उनसे भी जासूसी करवाओ। क्योंकि इस गिरोह में युवक गणेश और महिला मीरा का भी नाम सामने आया।

अब जब गाजियाबाद का पूरा नेटवर्क खुलकर सामने आ चुका है और साफ दिख रहा है कि किस तरह हिंदू नाम और पहचान को ढाल बनाकर जासूसी की जा रही थी, तब वे लोग कहाँ चले गए जो हर बार हिंदू नाम देखते ही उछल पड़ते हैं? वही लोग जो किसी एक नाम के आधार पर पूरी चर्चा का रुख मोड़ देते हैं, इस संगठित साजिश पर चुप रहे। न तो मजहब के आधार पर हेडलाइन बनी, न कोई किसी मजगब को निशाना बनाया गया और यहाँ तक कि देश हित में भी सवाल नहीं पूछे गए। यही बताता है कि समस्या नजरिए की है।

राजस्थान का ही मामला सामने रखिए। एयरफोर्स में काम करने वाला प्राइवेट कर्मचारी सुमित कुमार जासूसी के आरोप में पकड़ा गया। रिपोर्ट्स में साफ बताया गया कि उसका ब्रेनवॉश पाकिस्तानी हैंडलर्स ने किया था और उसे इसलिए चुना गया क्योंकि वह हिंदू था। उससे सत्संग और धार्मिक कार्यक्रमों के जरिए दूसरे हिंदुओं को ब्रेनवॉश करवाने की योजना बनाई गई। यानी यहाँ भी एक बड़ी साजिश थी, जिसमें हिंदू पहचान का इस्तेमाल एक औजार की तरह किया जा रहा था।

लेकिन जैसे ही सुमित कुमार का नाम सामने आया, मीडिया और सोशल मीडिया पर वामपंथी अकाउंट्स ने बिना देर किए हेडलाइन बना दी- हिंदू निकला पाकिस्तानी जासूस। न कोई गहराई देखी गई, न कोई सोर्स जाँचा गया, न यह सवाल कि उसके पीछे कौन है? बस नाम देखा और हिंदुओं को बदनाम करने का पूरा नैरेटिव सेट कर दिया।

ये दो मामले सामने रखकर देखा जाए तो यही दोहरा रवैया सामने आ जाता है। जब गाजियाबाद में पूरा जासूसी नेटवर्क हिंदू नाम की आड़ में काम करता पकड़ा गया, तब यह बात नहीं उठती कि यह हिंदुओं को बदनाम करने की साजिश है। तब यह नहीं कहा जाता कि देखो कैसे हिंदू पहचान का इस्तेमाल ढाल की तरह किया जा रहा है। लेकिन जैसे ही ऐसे मामलों में एक व्यक्ति का नाम हिंदू निकलता है, पूरी कहानी उसी पर टिक जाती है।

क्या कभी यह सवाल उठाया जाएगा कि जिन पाकिस्तानी आकाओं के इशारों पर ये सारे लोग काम कर रहे थे, उनकी मजहबी पहचान क्या है? क्या तब भी उतनी ही तेजी से हेडलाइन बनेगी? या फिर वहाँ चुप्पी ही साध ली जाएगी?

समस्या यह है कि कुछ लोगों के लिए सच्चाई मायने नहीं रखती, उन्हें सिर्फ मौका चाहिए। मौका हिंदुओं को घेरने का, उन्हें कटघरे में खड़ा करने का। और जैसे ही ऐसा कोई मौका दिखता है, पूरा इकोसिस्टम एक्टिव हो जाता है। तथ्यों की जाँच बाद में होती है, पहले फैसला सुना दिया जाता है।

गाजियाबाद का मामला इस पूरे खेल को उजागर करता है। यह दिखाता है कि कैसे दुश्मन ताकतें सिर्फ सीमापार पर ही नहीं, बल्कि भारत की धार्मिक समाज के भीतर घुसकर भी काम कर रही हैं। और उससे भी ज्यादा खतरनाक यह है कि उनके इस खेल में देश की गिनी-चुनी मीडिया और वामपंथी लोग अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

गाजियाबाद की घटना एक चेतावनी है, हिंदुओं के लिए। यह उस सोच के लिए भी जो हर बार एक ही दिशा में देखने की आदत डाल चुकी है। अग अब भी यह नहीं समझा गया, तो अगली बार कोई और ‘हिंदू नाम’ फिर से इस्तेमाल होगा और कहानी फिर से उसी तरह मोड़ी जाएगी।