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हम ‘लव जिहाद’ कहें तो हो जाते हैं महिला विरोधी, तुम्हारे भाईजान गैर मुस्लिम लड़कियों को नोंच-खसोट लें तो भी न हो चर्चा… आरफा जी बढ़िया है आपकी ‘स्ट्रेटजी’

आरफा ने 'लव जिहाद' को सीधे-सीधे हिंदू महिलाओं का अपमान बता दिया। मतलब जो भी इस मुद्दे पर सवाल उठा रहा है, वो महिलाओं को नासमझ मान रहा है, यहाँ यही बताने की कोशिश की गई। लेकिन आरफा, बात इतनी सीधी नहीं है जितनी आप बना रही हैं।

आरफा खानुम शेरवानी खुद को मुस्लिमों का ‘मुन्जी’ समझती हैं। जहाँ वो हर बार किसी मुस्लिम पहचान वाले अपराधी के मामले को उठाती हैं, और एकतरफा पक्ष लेकर सोशल मीडिया पर मुखर हो जाती हैं। लेकिन आरफा को जमीन पर क्या हो रहा है उससे कोई मतलब नहीं होता, उससे ज्यादा उन्हें अपने तय नैरेटिव को आगे बढ़ाने की जल्दी रहती है। यही वजह है कि विवादित मुद्दों पर बोलते हुए वह फैक्ट्स मिस कर देती हैं और नतीजतन उनके ‘विचार’ लड़खड़ा जाते हैं।

अब उनके इस नए बयान को ही देख लीजिए। आरफा ने ‘लव जिहाद‘ को सीधे-सीधे हिंदू महिलाओं का अपमान बता दिया। मतलब जो भी इस मुद्दे पर सवाल उठा रहा है, वो महिलाओं को नासमझ मान रहा है, यहाँ यही बताने की कोशिश की गई। लेकिन आरफा, बात इतनी सीधी नहीं है जितनी आप बना रही हैं। हर चीज को एक लाइन में समेट देना आसान होता है, लेकिन क्या इससे सच भी उतना ही आसान हो जाता है?

आरफा बार-बार ‘लव जिहाद‘ को महिलाओं की आजादी का मुद्दा बताकर पूरी बहस को वहीं खत्म करना चाहती हैं। लेकिन क्या जो लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं, उनके पास कोई वजह नहीं है? आरफा, क्या आप ‘महिला की स्वतंत्रता’ की बात कहकर आगे बढ़ जाएँगी? असली बात ये है कि आप सवालों का जवाब देने के बजाए सवाल उठाने को ही कठघरे में खड़ा कर देती हैं और यही तरीका इस पूरे मुद्दे को और उलझा देता है।

कभी हिंदुओं को दोषी ठहरा देती हैं, कभी हिंदू संगठनों को निशाने पर लेती हैं। तो अब ‘महिला स्वतंत्रता’ के नाम पर ‘लव जिहाद’ जैसे बड़ी साजिश पर ही पर्दा डालने की कोशिश शुरू कर दी। लेकिन आरफा, अगर आप सच में थोड़ा पीछे जाकर देखें, तो आपको पता चलेगा कि यह शब्द अचानक से हवा में नहीं बना था।

इसकी शुरुआत ही केरल से हुई थी और वो भी तब, जब वहाँ के सबसे बड़े चर्च ‘साइरो मालाबार‘ ने खुद सामने आकर यह चिंता जताई थी कि किस तरह ईसाई लड़कियों को टारगेट किया जा रहा है। उस समय चर्च ने खुलकर कहा था कि सुनियोजित तरीके से लड़कियों को फँसाया जा रहा है, उन्हें ब्रेनवॉश किया जा रहा है और फिर इस्लामी कट्टरपंथी नेटवर्क के जरिए उन्हें सीरिया और अफगानिस्तान भेजा जा रहा है।

ये कोई सोशल मीडिया की अफवाह नहीं थी, बल्कि चर्च की अपनी रिपोर्ट्स और बयान थे, जिनमें साफ तौर पर बताया गया कि कैसे बड़ी संख्या में लड़कियाँ इस जाल में फँसी और बाद में उनका कोई अता-पता तक नहीं चला। अब सवाल ये है आरफा, क्या उस वक्त भी ये ‘महिला की स्वतंत्रता’ ही थी या फिर उस समय सच्चाई कुछ और थी, जिसे आप नजरअंदाज कर रही हैं?

और अगर आपको लगता है कि ये सिर्फ भारत तक सीमित कोई ‘कहानी’ है, तो जरा नजर बाहरी देशों पर भी डाल लीजिए। ब्रिटेन के रोदरहैम जैसे मामलों में क्या हुआ, ये पूरी दुनिया जानती है, जहाँ संगठित ग्रूमिंग गैंग्स ने नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाया, उन्हें फँसाया और सालों तक उनका शोषण किया गया।

भारत में अजमेर का मामला भी कोई छुपा नहीं है, जहाँ नाबालिग लड़कियों को लव जिहाद के जाल में फँसाकर उनके साथ अपराध किए गए। अब क्या इन सब मामलों को भी आप सिर्फ ‘महिला की स्वतंत्रता’ कहकर टाल देंगी या फिर मानेंगी कि यहाँ कुछ ऐसा हो रहा था जिसे नजरअंदाज करना आपके लिए आसान तो है, लेकिन सही नहीं?

यही नहीं, आरफा, इस पूरे मुद्दे पर सिर्फ आप ही नहीं हैं जो इसे मात्र ‘विचार’ बताकर खारिज कर देती हैं। वामपंथी इकोसिस्टम और इस्लामी कट्टरपंथी भी सालों से यही लाइन दोहरा रहे हैं कि ‘लव जिहाद जैसा कुछ होता ही नहीं है।’

कई मामलों में अदालतों ने भी पहचान छुपाकर धर्मांतरण कराने के मामलो को ‘देश के लिए खतरा’ बताया है, लेकिन उस पर बात करने के बजाए पूरा ध्यान इस बात पर लगा दिया जाता है कि ‘नैरेटिव’ कैसे बचाया जाए। वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी, दोनों ही इस मुद्दे पर एक ही सुर में बोलते दिखते हैं और यही सबसे बड़ा संकेत है कि यहाँ अपनी तय सोच बचाने की कोशिश हो रही है।

निष्कर्ष सीधा है। जब तकइस्लामी कट्टरपंथी लव जिहाद को नकारते रहेंगे और वामपंथी उसी हवा में बहते रहेंगे, तब तक सच्चाई को दबाने की कोशिश चलती रहेगी। लेकिन जमीन पर जो हो रहा है, उसे हमेशा के लिए छुपाया नहीं जा सकता। TCS नासिक धर्मांतरण कांड यूँ ही सामने नहीं आते, ये उसी सोच का नतीजा है जहाँ इस तरह के अपराधों को अपराध मानने से इनकार कर दिया जाता है और सच बाहर आता है तो बचाव में पूरा तंत्र खड़ा हो जाता है।

आपकी असली समस्या भी यही है, आरफा। आप हर अपराध को एक ही नजरिए से देखती हैं। इसलिए ‘महिलाओं की स्वतंत्रता और अपमान’ की बातें करने से पहले यह समझना जरूरी है कि हकीकत क्या है, क्योंकि रिकॉर्ड में जो दर्ज है, उसे सिर्फ इसलिए झुठलाया नहीं जा सकता क्योंकि वो आपके बनाए नैरेटिव में फिट नहीं बैठता।

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पूजा राणा
पूजा राणाhttps://hindi.opindia.com/
एक मामूली लड़की! असलियत से वाकिफ होने की खोज में

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