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सड़कों पर लाखों लोग, व्हाइट हाउस में भिड़े अधिकारी और गिरती अप्रूवल रेटिंग: जानें- ईरान युद्ध कैसे बन रहा ट्रंप के गले की फाँस

ईरान युद्ध में फँसे ट्रंप अब अपने देश में भी घिरते नजर आ रहे हैं। उनकी नीतियों के खिलाफ अमेरिका के कई शहरों में जोरदार प्रदर्शन हो रहा है। प्रदर्शनकारियों ने इसे ‘नो किंग्स’ विरोध कहा है।

‘नो किंग्स’ का मतलब क्या है

अमेरिका में ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन का यह तीसरा दौर है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का विरोध कर रहे हैं। इन नीतियों में ईरान के साथ युद्ध, संघीय इमीग्रेशन कानून, फ्यूल की बढ़ती कीमत के साथ साथ देश में बढ़ रही महँगाई हैं।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप हम पर एक तानाशाह की तरह राज करना चाहते हैं, लेकिन यह अमेरिका है। यहाँ असली ताकत आम लोगों के हाथों में है, न कि उन लोगों के हाथों में जो खुद को राजा समझना चाहते हैं और न ही उनके अरबपति साथियों के हाथों में है।

अमेरिका के न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन DC और लॉस एंजिल्स सहित हर बड़े शहर में ट्रंप विरोधी प्रदर्शन हुए हैं।

28 मार्च 2026 को राजधानी वॉशिंगटन DC के डाउनटाउन की सड़कों पर मार्च निकाला गया। प्रदर्शनकारियों ने लिंकन मेमोरियल की सीढ़ियों पर कतार लगा कर खड़े हुए और ट्रंप की नीतियों का विरोध किया।

राष्ट्रपति ट्रंप, जेडी वेंस समेत कई लोगों की गिरफ्तारी की माँग

प्रदर्शनकारियों ने ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस समेत कई प्रशासनिक अधिकारियों के पुतले लहराए और उन्हें पद से हटाने के साथ-साथ गिरफ्तार करने की माँग की।

‘नो किंग्स’ विरोध प्रदर्शनों का असर सबसे ज्यादा मिनेसोटा में दिखा, जहाँ जनवरी में फेडरल इमिग्रेशन एजेंट्स ने रेनी निकोल गुड और एलेक्स प्रेटी नाम के दो अमेरिकी नागरिकों की हत्या कर दी थी। उनकी मौत से लोगों में भारी गुस्सा भड़का और ट्रंप प्रशासन की इमिग्रेशन नीतियों का पूरे देश में विरोध शुरू हुआ।

देश विदेश में हो रहे प्रदर्शनों को व्हाइट हाउस ने जनता की आवाज मानने से इनकार कर दिया। इनका कहना है कि यह वामपंथी फंडिंग का नेटवर्क है। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता के मुताबिक, यह ‘ट्रंप डेरेजमेंट थेरेपी सेशंस’ (ट्रंप-विरोधी पागलपन के सत्र) है। उन्होंने कहा कि इन प्रदर्शनों की परवाह सिर्फ वे रिपोर्टर करते हैं, जिन्हें इन्हें कवर करने के लिए पैसे मिलते हैं।

ट्रंप की रेटिंग में आ रही गिरावट

अमेरिका में ट्रंप की लोकप्रियता और रेटिंग लगातार गिर रही है। हालाँकि कई सर्वे अलग अलग रेटिंग दे रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, अमेरिका में एप्रूवल रेटिंग वैश्विक घटनाओं के लेकर घरेलू मुद्दों तक की वजह से होती है, जो हमेशा बदलती रहती है। हालाँकि अमेरिका में बढ़ती महँगाई, फ्यूल की कमी आम लोगों को काफी परेशान कर रही है। इसका असर रेटिंग पर पड़ा है।

सिल्वर बुलेट के मुताबिक, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का अभी सबसे खराब रेटिंग है। ईरान युद्ध , व्यापार, टैरिफ और इमिग्रेशन से लेकर महँगाई को लेकर जनता राष्ट्रपति ट्रंप से नाराज है।

रॉयटर्स या इप्सोस सर्वे के मुताबिक, अमेरिका में मात्र 37 फीसदी लोग ही युद्ध का समर्थन कर रहे हैं जबकि 59 फीसदी इसके खिलाफ हैं। खास बात है कि डेमोक्रेट और स्वतंत्र वोटर तो इसका विरोध कर ही रहे हैं। 5 में से 1 रिपब्लिकन भी युद्ध के विरोध में हैं। ईरान में अमेरिका सेना भेजने के खिलाफ जनता का मत है।

व्हाइट हाउस में फूट पड़ा

इस सब के बीच व्हाइट हाउस में ईरान युद्ध को लेकर सिरफुटव्वल है। जानकारी के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप की अपनी टीम में ही इस समय दो गुट बन गए हैं और दोनों के बीच जबरदस्त खींचतान चल रही है।

एक गुट उन लोगों का है जो देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति को संभालते हैं। इनका कहना है कि अगर यह युद्ध और लंबा खिंचा, तो पेट्रोल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। उन्हें डर है कि अगर आम जनता को महँगा पेट्रोल खरीदना पड़ा, तो वे ट्रंप के खिलाफ हो जाएँगे और उनका समर्थन करना बंद कर देंगे। इसलिए, ये सलाहकार ट्रंप को समझा रहे हैं कि हमें अब युद्ध रोक देना चाहिए और दुनिया से कह देना चाहिए कि हमने अपना काम पूरा कर लिया है।

वहीं दूसरी तरफ, ट्रंप की टीम में कुछ ऐसे नेता भी हैं जो युद्ध को जारी रखने के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि अगर अभी हमला रोक दिया गया, तो ईरान इसे अपनी जीत समझेगा और बहुत जल्द परमाणु बम बना लेगा। उन्हें डर है कि अधूरा छोड़ा गया काम आगे चलकर अमेरिकी सैनिकों के लिए और भी बड़ा खतरा बन सकता है। उनका तर्क है कि ईरान को अभी पूरी तरह कमजोर करना जरूरी है।

अब राष्ट्रपति ट्रंप इन दोनों गुटों के बीच बुरी तरह फँसे हुए हैं। वे एक तरफ अपने उन समर्थकों को खुश रखना चाहते हैं जिन्होंने उन्हें इसलिए वोट दिया था क्योंकि उन्होंने दावा किया था कि वे अमेरिका को किसी नई जंग में नहीं फँसाएँगे। लेकिन दूसरी तरफ, वे दुनिया को यह भी दिखाना चाहते हैं कि वे एक मजबूत नेता है और दुश्मनों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। इसी दुविधा की वजह से वे कोई एक ठोस फैसला नहीं ले पा रहे हैं।

ईरान युद्ध में फँसे ट्रंप

दरअसल ईरान को हल्के में लेकर राष्ट्रपति ट्रंप फँस गए हैं। उन्हें अंदाजा नहीं था कि ईरान इतने दिनों तक युद्ध खींचेगा। इतना ही नहीं वह हॉर्मुज स्ट्रेट को बंद कर देगा और अमेरिका उसे खुलवाने में नाटो से मदद माँगेगा। नाटो देश अमेरिका की मदद करने से इनकार कर देंगे। यह सब अमेरिका के लिए पहली बार हुआ है, जब ब्रिटेन, फ्राँस जैसा सहयोगी देश उसकी मदद से परहेज कर रहा है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने 5 दिनों के लिए ईरानी पॉवर प्लांट पर आक्रमण नहीं करने की बात कही, लेकिन अब न तो इजरायल रुकने को तैयार है और न ही ईरान। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान युद्ध में जीत के दावे भी कर दिए। इसके जवाब में ईरान क्लस्टर मिसाइल मार रहा है। होर्मुज स्ट्रेट को रोक रखा है। अब अमेरिका के लिए युद्ध से वापस निकलने का रास्ता दिख नहीं रहा। अगर अमेरिका जमीनी कार्रवाई करता है तो उसका विरोध अमेरिका के लोग और जोर-शोर से करेंगे। एयरस्ट्राइक से बात बन नहीं रही है। ईरान के बड़े बड़े नेताओं की मौत के बाद भी युद्ध की धार कमजोर नहीं पड़ रही है, अमेरिका के लिए यही चिंता का कारण है।

ST-OBC के लिए भी हो SC जैसी स्पष्ट रेखा, इसके बिना पूरा नहीं होगा ‘सामाजिक न्याय’

अनुसूचित जाति (Scheduled Castes/SC) के लोगों के धर्मांतरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण स्पष्टता स्थापित की है। इसके अनुसार हिंदू, बौद्ध और सिख ही SC हो सकते हैं।

दुर्भाग्य से ऐसी कोई स्पष्टता अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes/ST) और अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) को लेकर नहीं है। यह दुर्भाग्य केवल धर्मांतरण तक ही सीमित नहीं है। आरक्षण जैसी उस व्यवस्था को भी खोखला कर रही है जो कथित जातीय उत्पीड़न की शिकार हिंदुओं को संरक्षण देने के नाम पर लाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा है उसका सीधा-सरल अर्थ यह है कि यदि शेड्यूल कास्ट का कोई व्यक्ति धर्म से बाहर जाता है तो उसे SC श्रेणी के लाभ मिलते नहीं रह सकते। ‘घर वापसी’ की स्थिति में भी वह कुछ शर्तों को पूरा करने के बाद ही इन लाभों का योग्य माना जाएगा।

अनुसूचित जाति के धर्मांतरित व्यक्ति को SC दर्जा फिर से पाने के लिए 3 शर्तें पूरी करनी होगी;

  • स्पष्ट साक्ष्य जो यह बताता हो कि वह व्यक्ति मूल रूप से संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत अधिसूचित जाति से संबंधित था।
  • मूल धर्म में पुन: वापसी के विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य देने होंगे। ईसाइयत या इस्लाम पूरी तरह छोड़ने का प्रमाण देना होगा। अपनी मूल जाति के रीति-रिवाज, परंपराओं और धार्मिक प्रथाओं को स्वीकार करना होगा।
  • साक्ष्य देना होगा कि उसे मूल जाति के लोग पूरी तरह स्वीकार कर चुके हैं। केवल स्वयं का दावा पर्याप्त नहीं होगा। जाति की स्वीकृति आवश्यक होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि ये तीनों शर्तें अनिवार्य है। इन्हें पूरी तरह प्रमाणित करने का दायित्व ‘घर वापसी’ करने वाले शेड्यूल कास्ट के उस व्यक्ति की ही होगी। यदि इनमें से एक भी शर्त प्रमाणित नहीं होती है तो ‘घर वापसी’ मान्य नहीं होगी।

यहीं से यह प्रश्न खड़ा होता है कि इतनी स्पष्ट शर्तें और मानदंड ST और OBC पर क्यों लागू नहीं होते? इस जवाब के अस्पष्ट उत्तर से ही ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन (Crypto Christian)’ पैदा होते हैं। इस अस्पष्टता के कारण ही OBC सूची में मुस्लिम घुसपैठ बढ़ती जा रही है। इतना ही नहीं, धर्म से बाहर जाने के बाद भी ST और OBC दर्जे का बना रहना आरक्षण के आधार में भी विकृति पैदा करती है।

परतंत्र भारत में कोल्हापुर, त्रावणकोर और मैसूर जैसी रियासतों में आरक्षण की व्यवस्था इसी नाम पर लाई गई थी कि इसके जरिए हिंदुओं की ​कथित उत्पीड़ित जातियों को संरक्षण मिलेगा। वर्तमान में जो आरक्षण की व्यवस्था है, उसका महत्वपूर्ण आधार 1932 का ‘पूना पैक्ट’ है। यह समझौता गाँधी और अंबेडकर के बीच तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेमसे मैकडॉनल्ड की साजिश को रोकने के लिए हुआ था।

हिंदुओं को विभाजित करने के उद्देश्य से मैकडॉनल्ड ने दलितों को अलग संप्रदाय की पहचान और उनके लिए अलग निर्वाचक मंडल का प्रस्ताव दिया था। लेकिन ‘पूना पैक्ट’ से यह सुनिश्चित हुआ कि अलग निर्वाचन क्षेत्र की जगह​ आरक्षित सीटों का प्रावधान किया जाए।

यह भी ध्यान रखने योग्य है कि शुरुआत में SC की परिभाषा को केवल हिंदुओं तक ही सीमित रखा गया था। बाद में इसे सिख (1956) और बौद्ध (1990) तक विस्तारित किया गया। आज भी मुस्लिम और ईसाई बने दलितों को SC का दर्जा नहीं मिलता है। इसका आधार यह है कि SC आरक्षण ‘हिंदू सामाजिक संरचना में अस्पृश्यता’ से जुड़ा है।

ऐसे में ST और OBC वर्ग में ईसाइयों और मुस्लिमों की घुसपैठ ‘पूना पैक्ट’ की मूल आत्मा पर प्रहार है। इस घुसपैठ के समर्थकों का कहना है कि ST पहचान धर्म की जगह, जनजातीय, भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं से जुड़ा हुआ है। OBC की पहचान को सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन पर आधारित बताया जाता है। 1979 के ‘मंडल कमीशन’ ने भी इसे ही अधार बनाया था।

पर यह आरक्षण की मूल भावना की ‘विकृत व्याख्या’ है और धर्म से बाहर जाने वालों के लिए दोहरे लाभ (धर्म बदलने की स्वतंत्रता+आरक्षण का लाभ) की स्थिति बनाती है। जब आरक्षण की व्यवस्था का मूल उद्देश्य हिंदू समाज के भीतर के कथित जातीय भेदभाव को खत्म करना है (आज भी इस व्यवस्था को इसी कथित आधार पर पोषित किया जा रहा है) तो फिर धर्मांतरण के बाद इस ढाँचे से बाहर जाने वाले को इसका लाभ क्यों मिलना चाहिए?

ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि अदालतें और सरकारें SC वर्ग जैसी सुरक्षा, ST और OBC वर्ग के लोगों को भी प्रदान करें या फिर जाति के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था बंद कर, उसकी जगह आरक्षण की ऐसी राष्ट्रीय नीति लाए, जिसका आधार आर्थिक और सामाजिक मानदंड ही हों। धर्म-मजहब-जाति की सीमाओं से परे।

यदि ऐसा नहीं होता है तो आरक्षण के ​जरिए ‘समावेशी सामाजिक न्याय’ का ढाँचा कभी खड़ा नहीं हो पाएगा। भले ही SC, ST और OBC के लिए अलग-अलग मानदंड, ऐतिहासिक रूप से विकसित हुए हैं, पर सत्य यही है कि आज वे अप्रासंगिक हो चुके हैं।

सामाजिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों के बीच संतुलन के मानदंड अब अलग-अलग नहीं चल सकते। उन्हें एक ही करने होंगे, क्योंकि आज के समाज में आरक्षण की बहस ‘पात्रता’ से आगे बढ़कर ‘दर्शन’ पर पहुँच चुकी है।

नेविल रॉय सिंघम के चीनी प्रोपेगेंडा फैलाने वाला ‘मास्टरमाइंड’ होने का Fox News ने किया खुलासा, किए करोड़ों डॉलर खर्च: जानें- भारत में न्यूजक्लिक समेत कौन से 3 संगठन करते रहे भारत विरोधी काम

फॉक्स न्यूज की एक खोजी रिपोर्ट से पता चला है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्यादे नेविल रॉय सिंघम ने अपने चीन-समर्थक सूचना और नैरेटिव लॉन्ड्रिंग नेटवर्क में लगभग $600 मिलियन यानी 5692 करोड़ रुपए का निवेश किया है, जो पाँच महाद्वीपों में फैला हुआ है। सिंघम कई ऐसे संगठनों को फंडिंग दे रहा है, जो भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं।

सिंघम का नेटवर्क को ‘हाउस ऑफ सिंघम’ कहा जाता है। एक ‘सूचना लॉन्ड्रिंग’ या ‘नैरेटिव लॉन्ड्रिंग’ मशीनरी चला रहा है। यह मशीनरी कुछ खास मुद्दों को उठाती है और उसे प्रोपेगैंडा में बदल देती है। इसका मकसद अमेरिका, भारत और दूसरे बड़े लोकतंत्रिक देशों में फूट डालना है। वहीं दूसरी तरफ चीन की छवि को ‘साम्राज्यवाद’ और ‘फासीवाद’ से बाहर निकालना और दूसरों की मदद करने वाला ‘परोपकारी’ देश के रूप में प्रचार करना है।

नेविल रॉय सिंघम के नेतृत्व वाला यह चीन-समर्थक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क एनजीओ, एक्टिविस्ट ग्रुपों, थिंक टैंक और मीडिया आउटलेट्स से मिलकर बना है, जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की प्रोपेगैंडा मशीनरी के तौर पर काम करते हैं। सिंघम के कई संगठन भारत में लगातार भारत-विरोधी और चीन-समर्थक नैरेटिव को बढ़ावा दे रहे हैं।

TriContinental:सिंघम फंडिंग करता है, प्रोपेगैंडा मशीनरी उसे फैलाती है।

TriContinental मैसाचुसेट्स स्थित एक मार्क्सवादी थिंक टैंक है। ‘पत्रकार’ विजय प्रसाद इसके संस्थापक हैं, इसे नेविल रॉय सिंघम से फंडिंग मिलती है। यह चीनी प्रोपेगैंडा को बढ़ावा देता है। नेविल रॉय सिंघम इस थिंक टैंक के अंतरराष्ट्रीय सलाहकार बोर्ड में शामिल हैं। इन पर अमेरिकी गैर-लाभकारी संगठनों का इस्तेमाल करके चीनी प्रोपेगैंडा को आगे बढ़ाने का आरोप है। वह Left Word Books के संपादक और Globetrotter के मुख्य संवाददाता भी हैं।

TriContinental अपने लेखों और न्यूजलेटर्स के जरिए लगातार चीन-समर्थक और भारत-विरोधी बातें फैला रहा है। ईरान और अमेरिका-इजरायल के संयुक्त मोर्चे के बीच चल रहे युद्ध के दौरान TriContinental ने मोदी सरकार की विदेश नीति की आलोचना की। उसने हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत IRIS Dena के डूबने के बाद भारत की कथित चुप्पी को ‘खुद की कराई बेइज्जती’ बताया। अर्थशास्त्री बोडापति सृजना ने एक लेख में PM मोदी की इजरायल यात्रा पर भी खूब हंगामा मचाया।

TriContinental ने हिंद महासागर में IRIS Dena के डूबने को भारत की ‘नाकामी’ के तौर पर पेश किया। उसने कहा कि भारत उस ईरानी युद्धपोत की रक्षा नहीं कर पाया, जिसने भारत के मिलन 2026 नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लिया था। यह चौंकाने वाली गलतबयानी तब की गई, जब वह जहाज गाले से लगभग 20 नॉटिकल मील पश्चिम में, श्रीलंका की ज़िम्मेदारी वाले SAR क्षेत्र में जा चुका था।

अमेरिका ने जब हमला किया, तो वह भारत के समुद्री क्षेत्र के आस-पास भी नहीं था। भारत ने IRIS Dena को पनाह देने की पेशकश भी की थी। सिर्फ इसलिए कि IRIS Dena ने एक भारतीय नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लिया था, भारतीय नौसेना की यह कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी कि वह उस ईरानी युद्धपोत को उसके घर तक सुरक्षित पहुँचाए। भारत सिर्फ मानवीय आधार पर खोज और बचाव में मदद कर सकता था, जो भारतीय नौसेना पहले से ही कर रही थी।

इस संगठन की वेबसाइट चीनी कम्युनिस्ट इतिहास और तकनीकी विकास की तारीफ करने वाले लेखों से भरी पड़ी है। इससे ऐसा लगता है कि कम्युनिस्ट शासन के तहत चीन एक ऐसी ‘आदर्श देश’ है, जिसकी नकल बाकी दुनिया को भी करनी चाहिए।

TriContinental को जनवरी 1966 में क्यूबा में हुई Tricontinental Conference से प्रेरणा मिलती है। इससे ‘राष्ट्रीय मुक्ति मार्क्सवाद’ का जन्म हुआ था। एक अंतर-क्षेत्रीय कार्यालय के अलावा TriContinental के ऑफिस अर्जेंटीना, ब्राज़ील, भारत और दक्षिण अफ्रीका में भी हैं। कार्ल मार्क्स और उनके विचार ही इस संगठन की प्रेरणा हैं।

साल 2024 में TriContinental ने कुल $857,945 का राजस्व दर्ज किया, जबकि इसका खर्च लगभग $3,745,069 रहा। इसके कोषाध्यक्ष विजय प्रशांत हैं।

चीन समर्थक ‘पीपल्स डिस्पैच’ भारत विरोधी प्रोपेगैंडा फैला रहा है

नेविल रॉय सिंघम ने चीन समर्थक और भारत विरोधी प्रोपेगैंडा फैलाने वाले कई अलग-अलग माध्यमों में लाखों डॉलर लगाए हैं। इनमें ‘पीपल्स डिस्पैच’ भी शामिल है। यहाँ विजय प्रसाद ने कई लेख लिखे हैं। ‘पीपल्स डिस्पैच’ एक मीडिया पोर्टल है, जो खुद को एक ‘अंतरराष्ट्रीय मीडिया प्रोजेक्ट’ बताता है। इसका मकसद ‘पूरी दुनिया में लोगों के आंदोलनों और संगठनों की आवाज को दुनिया के सामने लाना’ है। जनवरी 2020 के एक लेख में, प्रसाद ने JNU के प्रदर्शनकारियों के प्रति सहानुभूति जताई थी और मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की थी।

जून 2025 में ‘पीपल्स डिस्पैच’ ने एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें भारत की विदेश नीति को ‘शर्मनाक’ करार दिया गया। भारत ने गाजा में तत्काल युद्धविराम की माँग करने वाले स्पेन के UN प्रस्ताव पर वोटिंग से खुद को अलग कर लिया था। इसको लेकर लेख लिखा गया, जिसमें मार्क्सवादी प्रोपेगैंडा लेखक डॉ. जोसेफिन वर्गीस और वर्गी पराक्कल ने भारत की आलोचना की। उनलोगों ने फिलिस्तीन और इजरायल के प्रति भारत की नीति में आए इस कथित बदलाव का कारण तथाकथित ‘हिंदुत्व-जायोनी’ गठबंधन को बताया था।

भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी प्रोपेगैंडा के अलावा ‘पीपल्स डिस्पैच’ फर्जी खबरें भी फैलाता है। फरवरी 2026 में मार्क्सवादी प्रोपेगैंडा आउटलेट ने एक लेख प्रकाशित किया था। इसका शीर्षक था- ‘भारत में एक ऐतिहासिक राष्ट्रीय हड़ताल में 30 करोड़ लोग सड़कों पर’। इसमें दावा किया गया था कि करोड़ों लोग नए श्रम कानूनों और अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के विरोध में सड़कों पर उतरे थे।

हालाँकि आंदोलन हुआ था, लेकिन ’30 करोड़’ लोगों के शामिल होने का दावा बिल्कुल गलत है। इसे वाम-उदारवादी गुट ने भी खूब प्रचारित किया था। इस तरह के बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए आँकड़ों को अक्सर अराजकता फैलाने वाले ग्रुप, वैचारिक संकट के रूप में प्रचार प्रसार करते हैं। भारत की आबादी 140 करोड़ से भी ज्यादा है। इतने बड़े देश में, बड़े-बड़े जन-आंदोलन भी बिना पूरे देश को ठप किए हो सकते हैं।

हर विरोध प्रदर्शन को ‘अभूतपूर्व’ कहना या उसे व्यवस्था के ढहने का सबूत बताना, लोगों को गुमराह करना है। छिटपुट कुछ विरोध प्रदर्शनों के बावजूद ज्यादातर राज्यों में सामान्य जनजीवन पर कोई असर नहीं पड़ा था।

‘पीपल्स डिस्पैच’ ने कई मौकों पर हिंदुओं के प्रति अपनी खुली अवमानना ​​दिखाई है। यह प्रोपेगैंडा आउटलेट नरेंद्र दाभोलकर, गौरी लंकेश, गोविंद पानसरे, कलबुर्गी और अन्य जैसे कट्टर वामपंथियों के प्रति सहानुभूति भी रखता है और उनका महिमामंडन भी करता है।


पीपुल्स डिस्पैच ने भारत और इजरायल के रिश्तों पर भी जमकर अपनी भड़ास निकाली थी।

‘द डिस्पैच’ इजराइल को ‘नरसंहार करने वाला’ बताकर उसे खलनायक के रूप में पेश करता रहा है, लेकिन हमास ने 7 अक्टूबर को इजरायल में नरसंहार किया, उसकी कभी भी खुलकर निंदा नहीं करता। इतना ही नहीं हैदराबाद में अडानी और एल्बिट के ड्रोन निर्माण से जुड़े संयुक्त उद्यम, टाटा के ‘प्रोजेक्ट निम्बस’ सिस्टम और इजरायल में रिलायंस जियो की साझेदारियों से बने उपक्रम को फिलिस्तीनियों के ‘नरसंहार’ से जोड़ कर भारतीय कंपनियों को बदनाश करने की कोशिश करता है।

यह प्रोपेगैंडा लेख विजय प्रसाद और सुधनवा देशपांडे के नाम से लिखा गया था। इसमें अडानी-एल्बिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग वेंचर के बारे में सरासर झूठ फैलाया गया था। हालाँकि यह सच था कि इजरायल ने गाजा में अपने ऑपरेशन्स में हेमर्स 900 ड्रोन का इस्तेमाल किया था, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं है कि भारत ने ईरान के खिलाफ इस्तेमाल के लिए इजराइल को हेमर्स 900 ड्रोन या कोई मिसाइल एक्सपोर्ट की है। यह पूरा दावा कि हैदराबाद में अडानी-एल्बिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट ईरान के खिलाफ इजरायल के युद्ध के लिए ड्रोन बना रही है, पूरी तरह से एक प्रोपेगैंडा है।

ज्यादातर इस्लामो-वामपंथी प्रोपेगैंडा पोर्टल की तरह पीपुल्स डिस्पैच ने 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों को दबे-कुचले, पीड़ित मुस्लिम ‘अल्पसंख्यकों’ के खिलाफ ‘हिंदुत्व’ हिंसा के रूप में पेश करता है। जबकि, यह हिंदुओं के खिलाफ एक पहले से सोची-समझी इस्लामी साजिश थी।

यह उमर खालिद, खालिद सैफी, शरजील इमाम और गुलफिशा फातिमा जैसे इस्लामी कट्टरपंथियों को भी ‘पीड़ित’ के रूप में दिखाता है, जिन पर CAA-विरोधी प्रदर्शनों की आड़ में दंगों की साजिश रचने और उन्हें भड़काने का आरोप है।

एक लेख में पीपुल्स डिस्पैच दंगों के आरोपी मास्टरमाइंड उमर खालिद की सुनवाई में हो रही देरी पर अफसोस जताता है और इसका दोष अदालतों द्वारा बेल की सुनवाई टालने को देता है।

इस्लामी-वामपंथी प्रोपेगैंडा गुट द्वारा फैलाए जा रहे ‘पीड़ित होने’ के नैरेटिव के विपरीत, उमर खालिद का इतने लंबे समय तक जेल में रहना उसी के अपने किए का नतीजा है। OpIndia ने पहले भी रिपोर्ट किया है कि 2023 और 2024 में हुई 14 सुनवाइयों में से, 7 बार सुनवाई में देरी या उसे टालने की गुजारिश खुद उमर खालिद ने ही की थी। इससे साफ हो जाता है कि बेल याचिका वापस लेने की वजह निश्चित रूप से सुनवाई में होने वाली तथाकथित ‘देरी’ नहीं थी। जहाँ एक ओर इस्लामी-वामपंथी इकोसिस्टम लगातार ‘अन्याय’ का रोना रो रहा है, वहीं दूसरी ओर आरोपी के वकील ‘फोरम शॉपिंग’ यानी अपनी पसंद की अदालत या जज चुनने में लगे रहे। इसमें हो रही देरी की वजह से खालिद इतने लंबे समय से जेल में सड़ रहा है।

OpIndia के इस विश्लेषण की पुष्टि पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ के उस बयान से भी होती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि असली समस्या कुछ वकीलों और राजनीतिक समूहों की मानसिकता में है, जो चाहते हैं कि उनके मामलों की सुनवाई केवल कुछ खास जजों द्वारा ही की जाए।
OpIndia द्वारा कई बार रिपोर्ट की गई बात को दोहराते हुए पूर्व CJI ने कहा कि अदालत के रिकॉर्ड से पता चलता है कि सिब्बल के नेतृत्व वाली खालिद की कानूनी टीम ने फरवरी 2024 में ज़मानत याचिका को वापस लेने से पहले, कम से कम सात बार सुनवाई टालने की गुजारिश की थी।इसके बाद याचिका वापस लेते समय ‘परिस्थितियों में बदलाव’ का हवाला दिया था।

NewsClick नेविल रॉय सिंघम की फंडिंग से चलने वाला मीडिया आउटलेट, चीन-समर्थक प्रोपेगैंडा फैलाने के कारण लगातार निगरानी में रहा

नेविल रॉय सिंघम के ‘जस्टिस एंड एजुकेशन फंड’ ने दिल्ली स्थित चीन-समर्थक प्रोपेगैंडा आउटलेट न्यूजक्लिक को 10.5 मिलियन डॉलर का दान दिया था। विजय प्रसाद ने न्यूजक्लिक के लिए कई प्रोपेगैंडा लेख लिखे हैं। सीपीएम नेता वृंदा करात के भतीजे विजय प्रसाद हैं। वृंदा करात पूर्व सीपीएम ने जेनरल सेक्रेटरी प्रकाश करात की पत्नी हैं। न्यूजक्लिक को चीनी फंडिंग मिलने से जुड़े घोटाले के दौरान वृंदा करात और नेविल रॉय सिंघम के बीच हुए ईमेल आदान-प्रदान से उनके बीच के गहरे संबंधों का खुलासा पहले ही हो चुका है।

न्यूजक्लिक पहली बार तब सुर्खियों में आया, जब 2021 में यह प्रवर्तन निदेशालय की नजर उस पर पड़ी। खबरों के मुताबिक, इस पोर्टल पर धोखाधड़ी से करीब 38 करोड़ रुपए का विदेशी फंड लेने का आरोप लगा था। जब 2023 में न्यूयॉर्क टाइम्स की एक खोजी रिपोर्ट में सिंघम के नेटवर्क को कथित तौर पर चीन से मिलने वाली फंडिंग और उसके प्रोपेगैंडा का खुलासा हुआ, तो विजय प्रसाद ने इसे बकवास करार दिया।

विजय प्रसाद ‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ के काउंसिल सदस्य भी रहे हैं। यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो दुनिया भर में वामपंथी कार्यकर्ताओं और समूहों को लामबंद करता है। OpIndia ने पहले ही इस बात को उजागर किया था कि कैसे यह संगठन लगातार ऐसे प्रोपेगैंडा लेख और बयान प्रकाशित करता है, जो मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए मुसलमानों को पीड़ित दिखाने वाले खतरनाक नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं। प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल अपने मंच पर भारत-विरोधी, खासकर हिंदू-विरोधी प्रोपेगैंडा वाले दर्जनों लेखों को जगह देता है। ये लेख हर्ष मंदर जैसे कुख्यात हिंदू-विरोधी और इस्लामी आतंकवाद के पैरोकारों द्वारा लिखे जाते हैं। प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की काउंसिल में जयति घोष और लेबर पार्टी के पूर्व सांसद जेरेमी कॉर्बिन जैसे इस्लामी-वामपंथी समर्थक भी शामिल हैं।

प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल का ‘टाइड्स फाउंडेशन’ से भी जुड़ाव है। इस संगठन का एक सदस्य ‘अरब रिसोर्स एंड ऑर्गनाइजिंग सेंटर’ (AROC) है। यह हमास का समर्थन करता है और जिसे टाइड्स फाउंडेशन से फंडिंग मिलती है। टाइड्स फाउंडेशन का न्यूजक्लिक से भी सीधा रिश्ता सामने आया है।

टाइड्स फाउंडेशन कई हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी संगठनों को फंडिंग करता है। इस फाउंडेशन ने ‘हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) को भी फंड दी है। इस संगठन के तार इस्लामी कट्टरपंथियों और खालिस्तानियों से जुड़े हैं। HfHR की स्थापना 2019 में दो इस्लामी कट्टरपंथी समूह ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) और ‘ऑर्गनाइजेशन फॉर माइनॉरिटीज ऑफ इंडिया’ (OFMI) ने मिलकर की थी।

टाइड्स फाउंडेशन ने ‘अमन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट’ (AMAN) को भी फंडिंग दी थी। इस ट्रस्ट का संबंध न्यूजक्लिक-चीन फंडिंग घोटाले से है। इस घोटाले में आरोप है कि चीनी संस्थाओं ने भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुँचाने के मकसद से न्यूजक्लिक को फंडिंग की थी।

नेविल रॉय सिंघम ने अपनी बड़ी टीम में जिन भारतीयों को शामिल किया था और जिन्होंने ‘ट्राइकंटिनेंटल’ (Tricontinental) जैसे गैर-लाभकारी संगठनों के साथ काम किया था, उनके बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स ने कहा था कि वे चीन के एजेंडे को आगे बढ़ाने में शामिल थे। इनमें प्रबीर पुरकायस्थ, सृजना, प्रशांत और विजय प्रसाद प्रमुख थे। प्रसाद के अर्बन नक्सल पी. साईनाथ से भी गहरे संबंध हैं। साईनाथ के प्रोपेगैंडा पोर्टल PARI ने हाल ही में सिंघम के साथ संबंधों का खुलासा होने के बाद, सिंघम से जुड़े सभी संदर्भ हटा दिए थे।

न्यूजक्लिक का हिंदू-विरोधी रवैया किसी से छिपा नहीं है। इसके अलावा न्यूजक्लिक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ कथित संबंधों को लेकर भी जाँच चल रही है। 2023 में द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक जाँच में एक्टिविस्ट संगठनों, गैर-लाभकारी संस्थाओं और शेल कंपनियों का एक ऐसा नेटवर्क सामने आया, जिनके चीन और चीनी प्रोपेगैंडा के साथ गहरे संबंध थे।

इस पूरे नेटवर्क की कमान नेविल रॉय सिंगहम के हाथों में थी। 2024 में दिल्ली पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट में चीनी सरकार को ‘अंतिम वित्तपोषक’ (ultimate paymaster) बताया गया था। चार्जशीट के अनुसार, भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए इन संगठनों को फंड भेजा गया था। खासकर कश्मीर और किसानों के विरोध प्रदर्शनों के दौरान फंडिंग का पता चला था। यह मामला अभी भी अदालत में विचाराधीन है।

2021 में OpIndia ने न्यूजक्लिक के लिंक्स की डिटेल में जाँच की और पता लगाया कि यह कैसे कई ऐसे लोगों से जुड़ा था, जो नियमित रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। अर्बन नक्सल से लेकर तीस्ता सीतलवाड़, अभिसार शर्मा और कई दूसरे लोग। OpIndia की वह जाँच यहाँ पढ़ी जा सकती है।

‘पीपुल्स फोरम’ में कश्मीर अलगाववाद, हिंदू विरोधी बातें और केरल के ‘कम्युनिस्ट’ मॉडल का जुनून था

फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट ने पब्लिक में मौजूद रिकॉर्ड के जरिए हाउस ऑफ सिंघम के फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन फ्लो का एनालिसिस किया और पाया कि ‘पीपल्स फोरम’ को नेविल रॉय सिंघम से $22.4 मिलियन यानी 212.49 करोड़ रुपए दिए थे।

GS डोनर्स एडवाइज़्ड फिलैंथ्रॉपी फंड फॉर वेल्थ मैनेजमेंट इंक और दो शेल कंपनियों के माध्यम से सिंघम ने कथित तौर पर छह नॉन-प्रॉफिट्स में $278 मिलियन यानी 2637 करोड़ रुपए से अधिक डाले, जिनमें से एक पीपल्स फोरम भी है।

अक्टूबर 2023 से अमेरिका में इजरायल-विरोधी प्रदर्शनों को भड़काने वाले मुख्य संगठनों में से एक पीपल्स फोरम रहा है। कोडपिंक की सह-संस्थापक और नेविल रॉय सिंघम की पत्नी जोडी इवांस ने 2017 और 2022 के बीच इस संगठन को $20.4 मिलियन यानी 24 करोड़ से ज़्यादा का दान दिया। हालाँकि, पीपल्स फोरम की प्रोपेगैंडा फैलाने वाली गतिविधियाँ सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि ये भारत तक फैली हुई हैं। यह संगठन 2019 से ही भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दे रहा है।

पिछले कुछ सालों में ‘द पीपल्स फोरम’ अपने वैश्विक दर्शकों के बीच जम्मू और कश्मीर की एक गलत तस्वीर पेश करने के लिए सेमिनार और फिल्म स्क्रीनिंग करता रहा है।

इससे पहले चीन-समर्थक प्रोपेगैंडा संगठन ने जम्मू और कश्मीर के अभिन्न अंग को भारत से अलग करने की माँग की थी और ‘आज़ादी’ की माँग करने वाले चरमपंथियों को अपना समर्थन दिया था। 18 मार्च 2019 को इस संगठन ने 1 घंटे 50 मिनट का एक सेशन आयोजित किया, जिसमें भारत को जम्मू और कश्मीर में एक ‘कब्जा करने वाली’ ताकत के तौर पर पेश किया गया। यह फोरम भारतीय क्षेत्र के इस अभिन्न अंग को ‘भारत के कब्जे वाला’ इलाका बताता है। असल में जम्मू और कश्मीर का एकमात्र हिस्सा जिस पर गैर-कानूनी कब्जा है। वह है पीओके यानी पाकिस्तान के कब्जे वाला जम्मू और कश्मीर।

इस संगठन का एक इतिहास यह भी रहा है कि यह भारत से नफरत करने वाले कट्टर लोगों और पाकिस्तान की ISI से जुड़े तत्वों को मंच देता रहा है, ताकि भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दिया जा सके। ऐसा ही एक महिला हैं हफ्सा कंजवाल। उसने ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ में लिखे एक लेख में पुलवामा आतंकी हमले की गंभीरता को कम करके दिखाने की कोशिश की थी।

2019 में कंजवाल पीपल्स फोरम द्वारा आयोजित एक सेमिनार में एक प्रशिक्षक के तौर पर शामिल हुई थीं। कंजवाल ने अपने संगठन ‘स्टैंड विद कश्मीर’ के जरिए ISI के एजेंट गुलाम नबी फई के साथ करीबी रिश्ते बनाए रखे हैं। वह एक कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और ‘द पीपल्स फोरम’ के कई कार्यक्रमों में शामिल होती रही हैं।

14 सितंबर 2019 को नेविल रॉय सिंघम से पैसा पाने वाले एक संगठन ने एक कार्यक्रम आयोजित किया। इसका नाम ‘कश्मीर में आत्मनिर्णय और एकजुटता’ रखा गया था। भारत-विरोधी इस कार्यक्रम को ‘कोडपिंक’ जैसे संगठनों ने स्पॉन्सर किया था, जिसकी स्थापना नेविल रॉय सिंघम की पत्नी, जोडी इवांस ने की थी।

यह सेशन कश्मीरी और फिलिस्तीन आंदोलनों को एकजुटता करने पर केंद्रित था। इसमें कश्मीर के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करते हुए इसके इतिहास को बताया गया। भारत और इजरायल के संबंधों का विश्लेषण किया गया, साथ ही फिलिस्तीनी और कश्मीरी एकजुटता पर जोर दिया गया।

मार्च 2023 में हफ्सा कंजवाल को उनकी किताब ‘Hostile Homelands: The New Alliance between India and Israel’ के प्रचार के लिए द पीपुल्स फोरम ने मंच दिया।

पीपल्स फोरम ने भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर पर बनी उनकी प्रोपेगैंडा फ़िल्म,‘आउट ऑफ साइट’ का भी प्रचार किया।

2019 के लोकसभा चुनावों से पहले, ‘द पीपल्स फोरम’ ने कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े ‘स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया’ (SFI) के नेता वी. श्रीनिवास राव के साथ मिलकर एक सेमिनार आयोजित किया।

इस कार्यक्रम का शीर्षक था ‘जमीन को गर्व महसूस कराएं: भारत के किसान संघर्ष और 2019 के चुनाव’। इसका मकसद मोदी सरकार के प्रति किसानों में बढ़ रहे असंतोष का फायदा उठाना और चुनावों के नतीजों पर असर डालना था।

सेमिनार के विवरण से ही इस भारत-विरोधी संगठन का नापाक एजेंडा जाहिर हो गया था

इसमें कहा गया, “इस साल (2019) की शुरुआत में, भारत में 16 करोड़ से ज्यादा किसानों और मजदूरों ने हड़ताल की। ​​पिछले कुछ सालों में भारत में किसान संघर्षों में जबरदस्त तेजी देखी गई, क्योंकि मोदी के शासन में भारतीय राजनीति ‘अति-दक्षिणपंथ’ की ओर झुक गई है। यह दुनिया की सबसे बड़ी आम हड़तालों में से एक थी।

लगभग तीन दशकों की नव-उदारवादी नीतियों और अपने अधिकारों पर हो रहे हमलों से थक-हारकर मजदूर सड़कों पर उतर आए। वे बेहतर आजीविका और कार्यस्थल पर लोकतंत्र की अपनी माँगों को लेकर आवाज उठा रहे थे। भारत सरकार की नीतियों के कारण, कृषि संकट बहुत गहरा गया है। मोदी सरकार के दौरान हर साल औसतन 12000 किसानों ने आत्महत्या की है।”

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि नेविल रॉय सिंघम द्वारा वित्तपोषित यह चीन-समर्थक और कम्युनिस्ट-समर्थक प्रचार संगठन ने ‘केरल मॉडल’ से जुड़ी ‘अच्छाईयों’ को फैलाता रहा है।

अप्रैल 2020 में आयोजित एक कार्यक्रम में, ‘द पीपल्स फोरम’ ने यह दावा किया, “जहाँ एक ओर भारत के प्रधानमंत्री मोदी दुनिया भर के नव-उदारवादी ‘कट्टर नेताओं’ की मिसाल पर चलते हुए, महामारी से लोगों की जान बचाने में नाकाम रहे हैं और संकट की गंभीरता को कम करके आँक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केरल एक बिल्कुल अलग मिसाल पेश करता है।”

इसमें कहा गया, “वामपंथी और कम्युनिस्ट पार्टियों के गठबंधन के नेतृत्व वाला केरल राज्य, अपने लोगों की भलाई के लिए सफल टेस्टिंग, संक्रमण की रोकथाम और ‘सामाजिककृत देखभाल’ के मामले में एक नया मानक स्थापित किया है। केरल में यह सब कैसे संभव हो पाया? और हम इस अनुभव से क्या सीख सकते हैं? इस चर्चा में शामिल होने के लिए शोधकर्ता सुबिन डेनिस और पत्रकार प्रशांत आर. के साथ जुड़ें।”

अक्टूबर 2019 में, नेविल रॉय सिंघम द्वारा वित्तपोषित संगठन ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी पर एक सेमिनार आयोजित किया और ‘हिंदुत्व’ की निंदा करने की आड़ में हिंदू धर्म पर हमला बोला।

इस कार्यक्रम का सारांश कुछ इस प्रकार था।

“गाँधी, जो स्वयं एक हिंदू थे, प्रेम को एक बुनियादी मानवीय भावना और आचरण मानते थे और सभी मनुष्यों तथा समस्त सृष्टि के प्रति इस प्रेम को अपने सभी विश्वासों, सिद्धांतों और व्यवहारों में पिरोने में सफल रहे। गाँधी का हिंदू धर्म न तो संकीर्ण था और न ही किसी को बाहर करने वाला और न ही वह किसी ‘अन्य’ की पहचान करता था। गाँधी के हिंदू धर्म और आज के ‘हिंदुत्व’ के बीच अंतर करना अत्यंत आवश्यक है।”

इस्लामी-वामपंथियों के लिए हिंदुत्व शब्द का इस्तेमाल करके हिंदू धर्म पर हमला करना एक आसान तरीका बन गया है। खास बात यह है कि कार्यक्रम को ‘हिंदूज़ फ़ॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) ने भी मिलकर प्रायोजित किया था।

इससे पहले, HfHR को ‘डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ नाम के हिंदू-विरोधी कार्यक्रम का भी समर्थन करते देखा गया था। OSINT हैंडल ‘Disinfo Lab’ के अनुसार, HfHR का गठन साल 2019 में ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) और ‘ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइनॉरिटीज ऑफ इंडिया’ (OFMI) ने मिलकर किया था।

‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ ने भी साल 2019 में ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन’ (NRC) को लेकर भारतीय मुसलमानों के बीच डर और अफरा-तफरी फैलाने की कोशिश की थी।

उन्होंने दावा किया, “हम कश्मीर के लोगों के हालिया बुरे अनुभव से और भारत के उन 19 लाख लोगों की स्थिति से खास तौर पर बहुत दुखी हैं, जो ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन’ जैसी बेतुकी चीज को थोपे जाने की वजह से बेघर हो गए हैं।”

सुनीता विश्वनाथ ‘Women for Afghan Women’ नाम के एक संगठन की सह-संस्थापक भी हैं, जिसे जॉर्ज सोरोस के Open Society Foundations (OSF)/ Open Society Institute (OSI) से फंडिंग मिलती है। अक्टूबर 2023 में, भारत में HfHr के एक्स (पहले Twitter) अकाउंट को रोक दिया गया था।

अपने Open Society Foundation के जरिए जॉर्ज सोरोस ने भारत में अशांति फैलाने की पूरी कोशिश की है। सोरोस से जुड़े संगठन भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए भारत-विरोधी तत्वों को समर्थन देते हैं और यह सब वे इसे ‘मजबूत’ करने के नाम पर करते हैं।

2023 में, विश्वनाथ ने Stanford University के National Press Club में एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जहाँ कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी भी मौजूद थे।

सुनीता विश्वनाथ ने NYC मेयर चुनाव प्रचार के दौरान जोहरान ममदानी का समर्थन किया था। ममदानी एक डेमोक्रेट सोशलिस्ट, लगातार झूठ बोलने वाला और हिंदू-विरोधी व्यक्ति है। ममदानी ने एक बार हिंदुओं को ‘हरामी’ कहा था। उसने 2002 के गुजरात दंगों के बारे में खुलेआम झूठ फैलाया और गुजरात के मुसलमानों के काल्पनिक रूप से मिटाए जाने का दावा किया। उसे CAIR और IAMC जैसे भारत-विरोधी इस्लामी संगठनों से आर्थिक समर्थन मिला।

विश्वनाथ के संगठन HfHR की स्थापना वर्ष 2019 में दो इस्लामी समर्थक समूहों द्वारा की गई थी, जिनके नाम Indian American Muslim Council (IAMC) और Organisation for Minorities of India (OFMI) हैं।

दिलचस्प बात यह है कि नेविल रॉय सिंघम की बहन शांति सिंघम ने ‘New Yorkers for Lower Cost’ नाम की Parliamentary Action Committee (PAC) में आर्थिक योगदान दिया था। इस PAC ने पिछले New York City मेयर चुनावों के दौरान डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट जोहरान ममदानी का समर्थन किया था। शांति सिंघम ने जून 2025 में लगभग $1,000 का योगदान दिया, जबकि उनके पति, डैनियल गुडविन ने $3,500 दान किए। गुडविन पहले नेविल रॉय सिंघम के स्वामित्व वाली Thoughtworks सॉफ्टवेयर कंपनी में एग्जीक्यूटिव के तौर पर काम कर चुके हैं।

शांति मैरी सिंघम शंघाई में CCP से जुड़े East China Normal University में एक अहम पद पर हैं। वह अपने भाई की राजनीतिक विचारधारा को मानती हैं और बताया जाता है कि इस विचारधारा को आगे बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका है। नेविल रॉय सिंघम ने CCP की मदद से जो नेटवर्क तैयार किया है, वह एक मार्क्सवादी-माओवादी अंतरराष्ट्रीय तंत्र है।

इसे प्रतिद्वंद्वी देशों को कमजोर करने, नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करने और भू-राजनीतिक बढ़त हासिल करने के उद्देश्य से, विभिन्न मुद्दों, गैर-लाभकारी कानूनों, डिजिटल मीडिया के माध्यम से एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह आधुनिक विध्वंस का ही एक रूप है। स्याही और रक्त—दोनों से पोषित, यह एक सूक्ष्म, परिष्कृत और प्रभावी गठजोड़ है। इसके जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि दुश्मन देश को CCP द्वारा पाली-पोसी गई दीमक ही भीतर से चाट जाएँ।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

CM योगी के विजन से सिर्फ 8 साल बन गया नोएडा का इंटरनेशनल एयरपोर्ट, UP बनेगा वैश्विक एविएशन हब: जानें कैसे ये सपना बना हकीकत, समझें हर एक बात

आठ वर्षों के अथक प्रयास और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नियमित निगरानी से नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट सपने से हकीकत में तब्दील हो गया है। मार्च 2026 में एयरोड्रम लाइसेंस मिलने और शनिवार (28 मार्च 2026) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फेज-1 के लोकार्पण के बाद यह एयरपोर्ट पूरी तरह संचालन के लिए तैयार है। उत्तर प्रदेश को वैश्विक एविएशन हब बनाने की दिशा में मुख्यमंत्री योगी के विजन का यह सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मेगा प्रोजेक्ट को शुरू से ही अपनी प्राथमिकता दी। उनके कुशल नेतृत्व और समयबद्ध फैसलों की वजह से 2017 में शुरू हुआ सपना 2026 में पूरा हो गया। सीएम योगी ने हर कदम पर विभागों के बीच समन्वय सुनिश्चित किया और नियमित समीक्षा बैठकें कर प्रगति की निगरानी की।

परियोजना की शुरुआत 2017 में हुई जब जुलाई में साइट क्लीयरेंस और अक्टूबर में गृह मंत्रालय से एनओसी प्राप्त हुई। इसी वर्ष जेवर को विश्व स्तर के एयरपोर्ट के रूप में विकसित करने की नींव रखी गई। 2018 में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड का गठन कर परियोजना को संस्थागत रूप दिया गया। मुख्यमंत्री योगी ने इस दौरान भूमि अधिग्रहण से लेकर पर्यावरणीय मंजूरी तक हर प्रक्रिया को तेजी से पूरा कराया।

2020 में ज्यूरिख एयरपोर्ट इंटरनेशनल एजी को कंसेशनायर चुना गया और कंसेशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए। सीएम योगी के निर्देश पर सभी औपचारिकताएं समय पर पूरी की गईं। अगस्त 2021 में फाइनेंशियल क्लोजर हो गया और मास्टर प्लान को मंजूरी मिली। अक्टूबर 2021 में अपॉइंटेड डेट घोषित कर निर्माण का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया।

मार्च 2022 में निर्माण कार्य शुरू हुआ और टाटा प्रोजेक्ट्स को ईपीसी कॉन्ट्रैक्टर नियुक्त किया गया। 2022 से 2024 तक सभी महत्वपूर्ण टास्क समयबद्ध तरीके से पूरे किए गए। इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई बार साइट का निरीक्षण किया और अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। उनकी सक्रियता के कारण कोई भी बाधा लंबे समय तक नहीं टिक सकी।

अक्टूबर 2025 में कैलिब्रेशन फ्लाइट सफल रही और मार्च 2026 में एयरोड्रम लाइसेंस प्राप्त हो गया। सीएम योगी ने इस पूरे सफर में कभी भी लक्ष्य से समझौता नहीं किया। उन्होंने एयरपोर्ट को केवल उड़ान भरने का स्थान नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के औद्योगिक लॉजिस्टिक्स और निवेश केंद्र के रूप में विकसित करने की रणनीति बनाई।

यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में अब तेजी से औद्योगिक विकास हो रहा है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट लाखों रोजगार सृजित करेगा। यह निर्यात लॉजिस्टिक्स पर्यटन और निवेश को नई गति देगा। मुख्यमंत्री योगी के विजन के कारण उत्तर प्रदेश अब वैश्विक कनेक्टिविटी के नए युग में प्रवेश कर रहा है।

एयरपोर्ट के आगे का विकास मॉडल भी तैयार है। आसपास के क्षेत्रों में होटल शॉपिंग मॉल और मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट हब विकसित किए जा रहे हैं। सीएम योगी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यह एयरपोर्ट यूपी की आर्थिक शक्ति को और मजबूत करेगा।

इस उपलब्धि पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट यूपी की प्रगति का प्रतीक है। उनके अनुसार यह प्रोजेक्ट केवल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं बल्कि युवाओं के सपनों को उड़ान देने का माध्यम है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फेज-1 के लोकार्पण के बाद एयरपोर्ट से नियमित उड़ानें शुरू हो जाएँगी। यह यूपी को दिल्ली एनसीआर के अलावा पूरे उत्तर भारत के लिए नया एविएशन हब बनाएगा।

मुख्यमंत्री योगी की कोशिशों से पूरा प्रोजेक्ट निर्धारित समय से पहले पूरा हो गया। आठ वर्षों का यह सफर अब नई उड़ान की शुरुआत है। यूपी सरकार का यह मॉडल पूरे देश के लिए उदाहरण बनेगा।

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट अब एविएशन इंडस्ट्री के फलक पर चमकने को तैयार है। सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यूपी विकास की नई ऊँचाइयों को छू रहा है।

‘द वायर’ में सूरज येंगडे का ‘दलित पोर्न’ वाला लेख, संस्थापक-संपादक ने बताया ‘फर्जी’: जानें- कैसे वायरल स्क्रीनशॉट से छिड़ा विवाद

इस्लामी-वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ के नाम से एक कथित लेख का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वायरल स्क्रीनशॉट में दावा किया गया है कि ‘बहुजन’ कंटेंट क्रिएटर्स को पोर्न इंडस्ट्री पर ‘कब्जा’ करने की वकालत की गई है जिसे लेखक सूरज येंगड़े ने ‘आखिरी किला’ बताया है।

वायरल स्क्रीनशॉट के अनुसार, दलित अधिकार कार्यकर्ता ने तर्क दिया है कि अंबेडकरवादी विचारधारा को फैलाने के लिए पोर्नोग्राफी जैसे ‘फ्रंटियर’ में भी प्रवेश करना जरूरी है और इसके लिए ब्राह्मण महिलाओं को निशाना बनाया जाना चाहिए। हालाँकि, यह स्क्रीनशॉट भले ही येंगड़े और ‘द वायर’ के सवर्ण विरोधी रुख के कारण भरोसेमंद लगता हो लेकिन यह पूरी तरह से फर्जी और व्यंग्य के रूप में बनाया गया है।

इस वायरल स्क्रीनशॉट में जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ है। इस कथित लेख की हेडलाइन “The Case for Dalit ‘Porn’ – Why Bahujan Content Creators Must Conquer this Last Frontier” लिखी गई है।

वहीं, इसकी समरी में लिखा है, “हर विचारधारा को विस्तार के लिए पॉप-कल्चर के साधनों की जरूरत होती है। जहाँ अंबेडकरवादी विचारधारा के पास ऑटो-ट्यून गाने और रील्स जैसे माध्यम मौजूद हैं लेकिन हम पोर्नोग्राफी के क्षेत्र में पीछे हैं जो सबसे ज्यादा देखे जाने वाला कंटेंट है। भले ही यह सुनने में आपत्तिजनक लगे लेकिन बहुजन कंटेंट क्रिएटर्स को इस दिशा में काम करना चाहिए जैसे कि एक ब्राह्मण या यादव हाउस वाइफ को शौचालय साफ करने आए एक सफाईकर्मी के साथ सेक्स करते दिखाना।

ऑपइंडिया ने द वायर की वेबसाइट और उसके सोशल मीडिया हैंडल्स की जाँच की जिससे यह पता लगाया जा सके कि वायरल स्क्रीनशॉट में दिखाया गया लेख कभी प्रकाशित हुआ था, उसमें कोई बदलाव किया गया था या उसे हटाया गया था। पता चला कि सुरज येंगड़े द्वारा ऐसा कोई एंटी-ब्राह्मण लेख न तो लिखा गया था और न ही द वायर ने उसे प्रकाशित किया था। हमारी रिसर्च के अनुसार, वायरल स्क्रीनशॉट के फर्जी होने की पूरी संभावना है।

द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने 27 मार्च को X (ट्विटर) पर एक पोस्ट कर इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ‘जातिवादी और हिंदुत्व से प्रभावित हिंदुओं’ को यह फर्जी स्क्रीनशॉट बनाने और फैलाने का जिम्मेदार बताया। उनका दावा है कि इन लोगों ने एक झूठी कहानी गढ़ी और उसे ‘सम्मानित स्कॉलर’ सुरज येंगड़े और द वायर से जोड़ने की कोशिश की।

फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को क्यों लगा असली?

भले ही सिद्धार्थ वरदराजन ने इस मामले में तुरंत ‘जातिवादी’ हिंदुओं और हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहराया और सुरज येंगड़े को ‘सम्मानित स्कॉलर’ बताया लेकिन यह फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को इसलिए असली लगा क्योंकि यह येंगड़े की पहले से चली आ रही एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी और द वायर की कथित एंटी-हिंदू लाइन के पैटर्न से मेल खाता हुआ दिखा।

येंगड़े ने पहले भी ‘ब्राह्मणिकल पैट्रियार्की’ जैसे विषयों पर कई लेख लिखे हैं जिनमें ब्राह्मण महिलाओं पर खास फोकस देखा गया है। उनके लेखों और सोशल मीडिया पोस्ट्स में अक्सर ऊँची जाति के हिंदुओं को इस बात के लिए निशाना बनाया जाता है कि वे ‘जाति शुद्धता’ के कारण अपनी बेटियों की शादी दलितों से नहीं करते। इसी तरह के पुराने बयानों और विचारों के कारण यह फर्जी स्क्रीनशॉट कई लोगों को पहली नजर में असली और भरोसेमंद लगा।

सुरज येंगड़े की एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी केवल अकादमिक टिप्पणी तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई बार खुले तौर पर महिलाओं के प्रति अपमानजनक और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने वाली भाषा तक पहुँच जाती है जैसा कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स में देखने को मिलता है। ऐसे ही एक पोस्ट में येंगड़े ने लिखा था, “ब्राह्मण लड़कियाँ दलित पुरुषों के लिए लालायित रहती हैं। मुझसे पूछो।”

एक पोस्ट में सुरज येंगड़े ने एक ब्राह्मण की पोस्ट का जवाब देते हुए ब्राह्मण समुदाय से कहा कि वे अपनी बेटियों को दलितों को ‘दे दें’ जैसे वे कोई वस्तु हों। उन्होंने इसे इस तरह पेश किया मानो अपने ‘विशेषाधिकार’ (प्रिविलेज) को दलितों के साथ साझा करना चाहिए और इसके लिए महिलाओं को ऐसी चीज समझा जाए जिसे आपस में बाँटा जा सकता है।

येगड़े पर यह आरोप भी रहा है कि वो एंटी-ब्राह्मण बातों को आगे बढ़ाने के लिए हिंदू इतिहास और शास्त्रों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है।

ब्राह्मण महिलाओं को लेकर की गई आपत्तिजनक बातें और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने के अलावा येंगड़े उनके प्रति साफ तौर पर नफरत भी दिखाता है। उसने उन्हें ‘ध्यान भटकाने का हथियार’ बताते हुए कहा कि उनके लिए उसे कोई सहानुभूति नहीं है।

इस तरह की जातीय बदले की सोच और अतिवादी कल्पनाओं के कारण पोर्न इंडस्ट्री को ‘आखिरी किला’ बताने जैसे दावे भी लोगों को सच लगने लगते हैं। कई मौकों पर कुछ दलित ‘सामाजिक न्याय’ कार्यकर्ताओं द्वारा ऊँची जाति की महिलाओं को मानो इतिहास का बदला लेने के प्रतीक या ट्रॉफी की तरह ‘हासिल’ करने की बात भी कही गई है।

भारत में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहाँ कुछ दलित कार्यकर्ताओं और एक्टिविस्ट ने खुले तौर पर सामान्य (जनरल) वर्ग की महिलाओं को वस्तु की तरह पेश किया है। सिर्फ राजनेता ही नहीं बल्कि कुछ IAS अधिकारियों तक के ऐसे बयान सामने आए हैं जिनमें यह कहा गया कि सामान्य वर्ग की महिलाएँ मानो कोई ट्रॉफी या वस्तु हैं जिन्हें ‘सामाजिक न्याय’ के एजेंडे को सफल बनाने के लिए दलितों के साथ शेयर किया जाना चाहिए।

साथ ही, पश्चिमी लिबरल विचारधारा के प्रभाव में जहाँ खाने, संगीत और साहित्य जैसी चीजों को भी गलत और सीमित श्रेणियों में बाँटने की प्रवृत्ति है, उसी तरह भारतीय लिबरल वर्ग के कुछ लोग भी इन विचारों को कॉपी-पेस्ट करके भारत में लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। यह तरीका मूल रूप से गलत माना जाता है क्योंकि भारतीय सांस्कृतिक विविधता और उसके पहलू पश्चिमी समाज से अलग हैं और उसका विकास अलग परिस्थितियों में हुआ है। ऐसे में पश्चिमी ढाँचे में उन्हें फिट करने की कोशिश सही नहीं बैठती।

वाइस के एक आर्टिकल का स्क्रीनशॉट

दलित भोजन, दलित संगीत, दलित ‘देवता’, दलित परंपराएँ जैसे विषयों पर कई लेख और किताबें सामने आई हैं। इनमें कुछ भारतीय लेफ्ट-लिबरल समूह पश्चिम की ‘सोशल जस्टिस’ विचारधारा से प्रभावित होकर भारत के समाज और संस्कृति को दलित बनाम ऊँची जाति जैसे सीमित खाँचों में बाँटने की कोशिश करते हैं। कई बार ये चर्चाएँ अजीब तुलना और गलत दावों तक पहुँच जाती हैं।

पोर्न को ‘कलंक खत्म करने के हथियार’ के रूप में सही ठहराने वाले एक लेख का स्क्रीनशॉट

इन्हीं बहसों के धीरे-धीरे आम हो जाने की वजह से वह वायरल स्क्रीनशॉट भी लोगों को काफी हद तक सच जैसा लगा। व्यंग्य (सटायर) समाज में चल रही चीजों को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाने का एक तरीका होता है। यह तथ्य कि एक अलग ‘दलित पहचान’ की चीजों को वाम-उदारवादी ‘यौन स्वतंत्रता’ के सामान्य विचारों के साथ मिलाकर वह व्यंग्यात्मक स्क्रीनशॉट बनाया गया और वह कई लोगों को ‘सच’ लगा…यह अपने आप में भी एक तरह का व्यंग्य है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

भारत में सिर्फ 5 दिन का तेल भंडार?: कैसे गुमराह करने वाली हेडलाइन से भ्रम फैला रहा BBC, जानें- क्या है ‘ब्रिटिश प्रोपेगेंडा’ की हकीकत

भारत के पास पर्याप्त तेल भंडार है। संसद के अंदर और बाहर सरकार कई बार साफ बता चुकी है कि देश में तेल और गैस की कोई कमी नहीं है। सरकार ने कालाबाजारी करने वालों को भी चेताया है। प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में भी इसे साफ किया है।

इसके बावजूद देश विरोधी ताकतें लगातार भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही हैं कि भारत में तेल-गैस का भंडार कम है। कोई कह रहा है कि 5 दिनों का रणनीतिक भंडार बचा है, तो कोई 9 दिनों का रणनीतिक भंडार होने का दावा कर रहा है। बीबीसी की हेडलाइन भारत विरोधी प्रोपेगेंडा को साफ जाहिर करता है।

बीबीसी फैला रहा झूठ

बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि भारत के पास मात्र 5 दिनों का तेल भंडार है। रिपोर्ट में कैग के हवाले से बताया गया है कि भारत की कुल भंडारण क्षमता करीब 74 दिनों की है, लेकिन सीएजी की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, इन भंडारण सुविधाओं का सालों से पूरा इस्तेमाल नहीं है।

दरअसल रिपोर्ट में ये बताया गया है कि सरकार ने 74 दिनों के स्टॉक की बात कही है और लोगों को पैनिक नहीं होने के लिए कहा है। लेकिन लेख का शीर्षक ऐसे लिखा गया है, जैसे 5 दिनों के बाद भारत में तेल-गैस का हाहाकार मच जाएगा। ऐसी खबरें लोगों को गुमराह करती हैं।

खबर के अंदर बताया गया है कि सरकार ने पिछले साल राज्यसभा को बताया था कि तेल विपणन कंपनियों के पास 64.5 दिन की माँग के बराबर स्टॉक है। आईएसपीआरएल की कुल 9.5 दिनों की क्षमता को जोड़ने के बाद ये 74 दिनों का हो जाता है। ये बताने के बावजूद लोगों को भ्रम में डालने के लिए हेडलाइन में सिर्फ 5 दिनों के स्टॉक की बात कही गई है।

ऐसी स्थिति में जब दुनिया के ज्यादातर देशों में पेट्रोल-गैस के दाम बढ़ चुके हैं। कई देशों में पेट्रोल पंप खाली पड़े हैं। भारत की रणनीति ही है, जिससे हमारे पास 74 दिनों का स्टॉक होने के बावजूद सरकार लगातार कई देशों से ऑयल मँगा रही है। पहले भारत जहाँ 27 देशों से ऑयल मँगाती थी, वहीं अब 40 देशों से ऑयल मँगाया जा रहा है।

ईरान हमले और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल टैंकरों के आने में बाधा होने के बावजूद ये सरकार की रणनीति की वजह से ही संभव हो पाया है कि हमारे तेल- गैस टैंकर एक के बाद एक सुरक्षित होर्मुज को पार कर देश पहुँच रहे हैं। भारत में रूस से भी तेल आ रहा है और अमेरिका से भी। इतना ही नहीं ईरान से भी एलपीजी से भरा टैंकर भारत आया है।

गैस-तेल का कोई संकट नहीं

एलपीजी की बात करें तो देश में रिफाइनरी उत्पादन में 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। दैनिक एलपीजी उत्पादन 50 टीएमटी तक पहुँच गया है, जबकि कुछ दैनिक जरूरत 80 टीएमटी है। यानी कुल 30 टीएमटी दैनिक एलपीजी की कमी है इसे पूरा करने के लिए लगातार आयात किया जा रहा है। कहने का मतलब है कि देश में एलपीजी का उत्पादन अभी भी आयात से ज्यादा है।

घर में पाइप से आने वाले गैस यानी पीएनजी के लिए दूसरों पर निर्भरता यूँ भी काफी कम है। भारत पहले से ही 191 प्रतिदिन मिलियन मीट्रिक मानक घन मीटर की दैनिक आवश्यकता में से 92 प्रतिदिन मिलियन मीट्रिक मानक घन मीटर प्राकृतिक गैस का घरेलू उत्पादन करता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति के बावजूद, भारत को आज दुनिया भर के अपने 41 से अधिक आपूर्तिकर्ता देशों से पहले की तुलना में अधिक कच्चा तेल मिल रहा है। भारत की सभी रिफाइनरियाँ 100 प्रतिशत से अधिक क्षमता पर चल रही हैं। इंडियन ऑयल कंपनियों ने अगले 60 दिनों के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति पहले ही सुनिश्चित कर ली है। आपूर्ति में कोई कमी नहीं है।

भारत में कई बार तेल-गैस के पर्याप्त भंडार हैं, ये बातें कही गई है। दरअसल लोगों के पैनिक होने पर रेग्युलर सप्लाई के बावजूद कई जगहों पर लाइन इस वजह से लगी है कि आम दिनों से ज्यादा पेट्रोल लेने की कोशिश की जा रही है। इससे दिक्कत आई है। लेकिन यह उतना बड़ा मामला नहीं है। लोगों को पेट्रोल- डीजल और गैस नियमित तौर पर मिल रही हैं, इसे कोई नहीं झुठला सकता।

इसके बावजूद गलत तरीके से खबरों को पेश कर लोगों में भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है। न तो पीएम मोदी के आश्वासन पर भरोसा है और न ही पेट्रोलियम मंत्रालय पर। यहाँ तक कि संसद में ही पीएम मोदी ने कहा कि भारत के पास कच्चे तेल का पर्याप्त भंडारण है. उन्होंने कहा कि भारत ने कच्चे तेल के आयात को विविध बनाया है और संकट से निपटने के लिए भंडारण को प्राथमिकता दी है। देश में तेल और गैस की कमी नहीं है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर भी झूठ फैलाया जा रहा है। इसको लेकर पेट्रोलियम मंत्रालय ने नाराजगी जाहिर करते हुए भ्रम फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही है।

मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित भ्रामक वीडियो और पोस्टों पर चिंता जताते हुए कहा कि दूसरे देशों में तेल गैस की आपूर्ति की कमी के फुटेज को भारत का बता कर प्रसारित किया गया और भारत में लॉकडाउन की झूठी खबर फैलाई गई। मंत्रालय ने फर्जी और मनगढ़ंत दावों को लेकर एक्शन लेने की बात भी कही है।

मंत्रालय ने साफ कहा है कि कुछ पोस्टों में जानबूझकर सरकारी आदेशों को संकट का संकेत बताते हुए प्रचारित किया गया है।

यही वजह है कि मंत्रालय ने साफ कहा है कि ईंधन और गैस की उपलब्धता संबंधी जानकारी के लिए केवल सरकारी सूचनाओं पर ही भरोसा करें। आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता के संबंध में गलत जानकारी फैलाना मौजूदा कानूनों के तहत अपराध है, लेकिन भ्रम फैलाने से देश विरोधी ताकतें बाज नहीं आ रही हैं। बीबीसी का लेख की हेडलाइन भी लोगों को बरगलाने वाली है। अंदर लेख में साफ बताया जा रहा है कि भारत में पर्याप्त भंडार है लेकिन हेडलाइन ऐसी, जिससे लोगों में भ्रम पैदा हो, ये पत्रकारिता की छवि को धुमिल करने वाली है।

PM मोदी को गोली मारने वाले, इजरायल को उड़ाने वाले ‘Time Bomb’ नहीं लेकिन CM योगी को खिलौना देने वाली बच्ची ‘हिंदू आतंकी’: क्यों वामपंथी-इस्लामी कट्टरपंथियों का निशाना बनी यशस्विनी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और एक 5 साल की बच्ची यशस्विनी के बीच की मासूम बातचीत ने सोशल मीडिया पर ‘लिबरल ब्रिगेड’ के पेट में दर्द कर दिया है। जहाँ एक ओर सीएम योगी ने उस बच्ची को खिलौने के रूप में छोटा सा बुलडोजर वापस कर पढ़ाई पर ध्यान देने की प्रेरणा दी, वहीं दूसरी ओर आरफा खानुम जैसी प्रोपेगेंडाई पत्रकार और उनके वामपंथी समर्थकों ने इसे ‘हिंदू कट्टरपंथ’ का नाम दे दिया। यह उस दोहरे मापदंड का पर्दाफाश करती है जो खिलौने में तो ‘आतंकवाद’ देख लेता है, लेकिन वास्तविक घृणा और अश्लीलता पर आँखें मूँद लेता है।

बुलडोजर से ‘शिक्षा’ की सीख: जब योगी ने नन्ही यशस्विनी को चॉकलेट और संस्कार दिए

गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर से एक बेहद भावुक और प्रेरक Video सामने आया। कानपुर की 5 साल की बच्ची यशस्विनी अपने परिवार के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुँची थी। वह अपने साथ उपहार स्वरूप एक छोटा सा ‘खिलौना बुलडोजर’ लेकर आई थी। मुख्यमंत्री ने बड़ी आत्मीयता से बच्ची का स्वागत किया, उसे चॉकलेट दी और खिलौना हाथ में लिया। लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई… सीएम योगी ने वह बुलडोजर बच्ची को वापस लौटाते हुए बड़े प्रेम से कहा, “इसे अपने पास रखो, इससे खेलो और खूब मन लगाकर पढ़ाई करो।”

मुख्यमंत्री का यह संदेश साफ था। कानून व्यवस्था के प्रतीक बुलडोजर को खिलौने के तौर पर स्वीकारना अलग बात है, लेकिन एक बच्चे के लिए उसका भविष्य उसकी ‘शिक्षा’ में है। योगी जी ने उस बच्ची को कट्टरपंथी बनाने के बजाय एक जिम्मेदार नागरिक बनने और पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया। यह Video देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और लोगों ने मुख्यमंत्री के इस सहज और अभिभावक वाले रूप की जमकर तारीफ की।

आरफा खानुम का जहरीला एजेंडा: खिलौने में खोज लिया ‘हिंदू आतंकवाद’

लेकिन जहाँ दुनिया को इस Video में मासूमियत और सकारात्मकता दिखी, वहीं आरफा खानुम और उनके वामपंथी सहयोगियों को इसमें ‘खतरा’ नजर आया। आरफा ने इस Video को शेयर करते हुए लिखा, “इस तरह वे हिंदू बच्चों की पूरी पीढ़ी को कट्टरपंथी बना रहे हैं। वह भी मासूम छोटी लड़कियों को। हृदयविदारक और अत्यंत खतरनाक।”

आरफा के इस जहर के बाद उनके वामपंथी समर्थकों ने भी सुर में सुर मिलाया। यासिर कलाम ने लिखा, “वे बच्चों का ब्रेनवॉश कर रहे हैं और उन्हें भविष्य के लिए हिंदू आतंकवादी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, यह इस सरकार की नीति है। अद्भुत।”

वहीं, जावेद भट ने उपहास करते हुए लिखा, “सनातनियों का बहुत कम उम्र से ब्रेनवॉश हो रहा है।”

एक अन्य हैंडलर फरहान खान ने तो माता-पिता पर ही निशाना साधते हुए कहा, “इन बच्चों को क्या हो गया है, माता-पिता को शर्म आनी चाहिए है।”

इन टिप्पणियों से साफ है कि एक मासूम खिलौना और मुख्यमंत्री की ‘पढ़ने’ की सलाह इन लोगों के लिए ‘आतंकवाद’ है, जबकि असली कट्टरपंथ में इनको ‘शांति’ दिखती है।

जब कट्टरपंथ की असली तस्वीर पर प्रोपेगेंडाई क्वीन आरफा आँख मूँद लेती हैं

ऑर्गेनाइजर की एक रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है कि कैसे कट्टरपंथ की असली जड़ों को छोटी उम्र से ही सीजा जाता है। रिपोर्ट बताती है कि कैसे छोटे बच्चों को ‘हम बनाम वे’ और ‘काफिर बनाम मोमिन’ के चश्मे से दुनिया देखना सिखाया जाता है। उन्हें आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा से दूर रखकर मदरसों में ऐसी जिहादी सोच वाली शिक्षा दी जाती है जो उनके दिमाग को केवल मजहबी दायरे तक सीमित कर देती है।

यही कारण है कि जब वे बड़े होते हैं, तो वे एक अच्छे नागरिक बनने बजाय एक कट्टरपंथी सोच के साथ विकसित होते हैं। इनका पहला प्रेम देश नहीं बल्कि मजहब होता है। यह वही मानसिकता है जो स्पेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी ‘पत्थरबाजी’ और अस्थिरता का कारण बन रही है।

आरफ़ा खानुम की ‘चुनिंदा’ चुप्पी और मासूमियत की आड़ में कट्टरपंथ का जहर

सोशल मीडिया पर वायरल हुए ये दो Video सोचने को मजबूर कर देते हैं कि इस उम्र में इस तरह की सोच और बोली कैसे पैदा हो सकती है। और तथाकथित लिबरल पत्रकारों, विशेषकर आरफा खानुम शेरवानी के दोहरे मापदंडों की पोल खोलते हैं। जब एक मुस्लिम बच्चा हाथ में खिलौने की जगह नफरत की भाषा और सीने में चक्कू घोंपने की बात करता है, जब वह अपने देश के प्रधानमंत्री से ज्यादा दूसरे मुल्क के मजहबी नेता खामेनेई के लिए आँसू बहाता है, तो यह स्पष्ट है कि इन मुस्लिम बच्चों के दिमाग में बचपन से ही ‘राष्ट्रवाद’ के बजाय ‘मजहबी कट्टरपंथ’ का जहर घोल दिया जाता है।

आरफा खानुम, जो अक्सर मानवाधिकारों और लोकतंत्र की दुहाई देकर सरकार को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़तीं, इन Video पर अपनी आँखें मूंद लेती हैं। उनकी ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता को तब लकवा मार जाता है जब मुस्लिम बच्चे सरेआम योगी आदित्यनाथ को धमकी देते हैं और राम मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने या पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं। यह चुप्पी न केवल खतरनाक है, बल्कि उन ताकतों को शह देती है जो भारत की अगली पीढ़ी को मुख्यधारा से काटकर नफरत की भट्टी में झोंक रही हैं। सवाल यह है कि क्या आरफ़ा खानुम में इतनी हिम्मत है कि वे इस ‘कट्टरपंथी परवरिश’ पर सवाल उठा सकें।

बरेली का शर्मनाक सच: गाँधी प्रतिमा के साथ अश्लीलता और आरफा का ‘चुनिंदा मौन’

आरफा खानुम के कट्टरपंथ वाले दावे की पोल तब खुलती है जब हम बरेली (उत्तर प्रदेश) में ईद के दौरान हुई घटना को देखते हैं। ईद के मौके पर कुछ मुस्लिम युवकों और बच्चों का एक Video Viral हुआ, जिसमें वे महात्मा गाँधी की प्रतिमा के साथ अत्यंत घृणित और अश्लील हरकतें करते हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे ये बच्चे प्रतिमा के मुँह में उँगलियाँ डाल रहे थे, उन्हें थप्पड़ मार रहे थे और और गुप्तांगों से जुड़ी अश्लील हरकतें कर रहे हैं।

यह घटना उस नफरत का जीवंत प्रमाण है जो बच्चों के दिमाग में महापुरुषों और देश के प्रतीकों के खिलाफ भरी जा रही है। लेखक रतन शारदा ने इस पर सटीक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह गाँधी जी को कट्टरपंथियों की ‘श्रद्धांजलि’ है, जिन्होंने उन्हें भारत में बनाए रखने के लिए संघर्ष किया था। लेकिन आरफा खानुम इस Video पर चुप क्यों हैं? क्या महात्मा गाँधी की प्रतिमा का अपमान ‘कट्टरपंथ’ की श्रेणी में नहीं आता? क्या अश्लीलता कर रहे उन मुस्लिम बच्चों के अम्मी-अब्बू को शर्मिंदा करने के लिए आरफा ने कोई ट्वीट किया था?

आरफा खानुम, अपनी कुंठा का इलाज कराइए

आरफा खानुम की पत्रकारिता नहीं, बल्कि यह ‘एजेंडा’ की दुकान है। सीएम योगी ने उस बच्ची को पढ़ाई की प्रेरणा दी, जो राष्ट्र निर्माण का काम है। लेकिन आरफा को इसमें ‘आतंक’ नजर आया क्योंकि खानुम की अपनी सोच घटिया, कुंठित और नफरत से भरी हुई है। जब मुस्लिम बच्चे देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ जहर उगलते हैं, भारत में रहकर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं, मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाने की बात करते हैं, गाँधी जी की मूर्ति का अपमान करते हैं या हाथ में पत्थर उठाते हैं, तब खानुम का ‘हृदयविदारक’ दर्द कहीं गायब हो जाता है, तब मुँह से ना तो एक शब्द निकलता है और ना ही पोस्ट की जाती है।

आरफा जैसे लोग ही समाज के असली दुश्मन हैं, जो एक तरफ तो हिंदू प्रतीकों को गाली देते हैं और दूसरी तरफ अपनी कौम की बुराइयों को ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ के नाम पर छुपाते हैं। योगी जी ने बच्ची को ‘किताब’ पकड़ने को कहा, जो खानुम को चुभ गया। असल में आरफा खानुम जैसे वामपंथियों को डर है कि अगर बच्चे पढ़-लिख गए तो इन जैसों की नफरत की दुकान बंद हो जाएगी। आपकी ये जमात है, जो एक मासूम खिलौने पर तो चिल्लाती है, लेकिन असली जिहाद और अश्लीलता पर मुँह में दही जमाकर बैठ जाती है।

ईद पर हिंदू बरसा रहे थे फूल, बदले में शोभायात्राओं पर चले पत्थर: महाराष्ट्र से बंगाल-बिहार तक, पढ़ें- देशभर में रामनवमी पर कट्टरपंथियों ने कहाँ-कहाँ रामभक्तों पर किया हमला

हिंदुओं के त्योहारों को निशाना बनाना इस्लामी कट्टरपंथियों का नया ‘जुनून’ बनता जा रहा है। कुछ दिनों पहले जब ईद हुई तो देश में कई जगहों से तस्वीरें सामने आईं जहाँ हिंदू मुस्लिमों पर फूल बरसा रहे थे। उन्होंने उम्मीद थी कि शायद बदले में फूल ही मिलेंगे लेकिन कुछ दिनों बाद आई राम नवमी पर हिंदुओं को फूलों के बदले पत्थर मिले।

कट्टरपंथियों ने श्रद्धालुओं पर पत्थर फेंके, जिसके बाद कही पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा तो कही इस्लामी भीड़ को काबू में करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। इन हमलों में पुलिसकर्मियों समेत कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। अभी कुछ दिन पहले होली के अवसर पर भी इन कट्टरपंथियों ने जगह-जगह बवाल किया था।

झारखंड में रामनवमी पर इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं पर किया पथराव, गढ़वा में रामभक्तों को महावीर पताका लगाने से रोका

झारखंड के गढ़वा जिले के रमकंडा प्रखंड मुख्यालय में रामनवमी से ठीक पहले शुरू हुआ विवाद गुरुवार (26 मार्च 2026) को हिंसक झड़प में बदल गया। धार्मिक जुलूस के मार्ग, डीजे और महावीरी झंडा लगाने को लेकर मुस्लिम पक्ष ने जमकर बवाल किया। पत्थरबाजी के दौरान स्थिति को काबू में करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।

बुधवार (25 मार्च 2026) की देर शाम रमकंडा के बिचला टोला स्थित कौआखोह शिव चबूतरा के पास महावीर पताका स्थापित करने जा रहे रामभक्तों को त्रिवेणी चौक के पास मुस्लिमों ने रोक लिया। इसके बाद डीजे बजाने को लेकर भी भीड़ ने विवाद शुरू कर दिया। बहस करते-करते भीड़ नारेबाजी भी करने लगी और माहौल हिंसक हो गया।

देखते ही देखते विवाद बढ़ गया और दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। गुरुवार (26 मार्च 2026) को हालात और बिगड़ गए जब बड़ी संख्या इस्लामी भीड़ सड़कों पर उतर आई और पत्थरबाजी करने लगी, जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और बाजार की दुकानें बंद होने लगीं।

हालात तब और गंभीर हो गए जब इस्लामी भीड़ की ओर से पुलिस बल पर भी पथराव की घटनाएँ सामने आईं। पुलिस की मौजूदगी में बाद में रामभक्तों ने कौआखोह शिव चबूतरा के पास महावीर पताका स्थापित किया। स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस ने पहले समझाने की कोशिश की, लेकिन हालात बिगड़ने पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए।

रामनवमी को लेकर थाने में आयोजित शांति समिति की बैठक के बावजूद मुस्लिमों ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की। बैठक में दोनों पक्षों की ओर से शांतिपूर्ण तरीके से रामनवमी ओर रमजान मनाने पर सहमती बनी थी। हालाँकि रामनवमी पर मुस्लिम पक्ष ने न सिर्फ बवाल किया बल्कि पुलिस पर भी पत्थर फेंके।

मुंबई के मालवणी में रामनवमी पर भगवा पताका देख बिदकी खातून, ‘रामभक्त’ पर किया हमला

मुंबई के मालवणी (मलाड) इलाके में रामनवमी की तैयारियों के दौरान सांप्रदायिक तनाव की खबर सामने आई। रामभक्त जब इलाके में भगवा झंडे और पताके लगा रहे थे, तभी कट्टरपंथियों के एक गुट ने उनका विरोध किया और हमला करने की कोशिश की। हमले का Video भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

वीडियो में देख सकते हैं कि एक मुस्लिम महिला दूसरी तरफ से साजिश के तहत आती है और रामभक्त पर हमला कर माहौल बिगाड़ती है। इसके बाद भारी भीड़ जमा हो जाती है। घटना उस वक्त शुरू हुई जब हिंदू संगठन के कार्यकर्ता रामनवमी के स्वागत के लिए सड़क पर झंडे लगा रहे थे।

जैसे ही वे एक मस्जिद के सामने वाली सड़क पर पहुँचे, वहाँ मौजूद इस्लामी पक्ष के लोगों ने विरोध शुरू कर दिया। देखते ही देखते दोनों गुट आमने-सामने आ गए और अफरा-तफरी मच गई। यह एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा लग रहा था क्योंकि विरोध के तुरंत बाद बड़ी संख्या में लोग वहाँ इकट्ठा हो गए और भक्तों को धमकाना शुरू कर दिया।

महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में रामनवमी जुलूस के दौरान मस्जिद के पीछे से पत्थरबाजी

महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के श्रीरामपुर शहर में रामनवमी के अवसर पर निकाले जा रहे जुलूस के दौरान इस्लामी भीड़ की ओर से पथराव किया गया। मस्जिद के पास से गुजरने के दौरान हुई घटना में तीन लोग घायल हो गए, जिनमें से एक की हालत गंभीर है। पुलिस ने मस्जिद के मौलाना सहित 10 से 12 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर जाँच शुरू की है।

घटना गुरुवार (26 मार्च 2026) की शाम करीब चार बजे की है, जब रामनवमी का जुलूस पूरे उत्साह के साथ श्रीरामपुर के सय्यद बाबा चौक से गुजर रहा था। जुलूस में शामिल लोग भजन-कीर्तन करते आगे बढ़ रहे थे। इसी दौरान जब जुलूस एक स्थानीय मस्जिद के सामने पहुँचा, तभी अचानक मस्जिद के पीछे की ओर से अज्ञात लोगों ने पत्थर फेंकने शुरू कर दिए।

इसका वीडियो भी सामने आया है, जिसमें मस्जिद के पीछे से पत्थर आते साफ देखा जा सकता है। अचानक हुए इस पथराव से जुलूस में अफरा-तफरी मच गई और लोग इधर-उधर भागने लगे। इस दौरान तीन लोग पत्थरों की चपेट में आकर घायल हो गए। मामले में मस्जिद के मौलाना समेत 10 से 12 लोगों के खिलाफ श्रीरामपुर थाने में मामला दर्ज किया।

बंगाल में हिंदुओं पर हमला, मुर्शिदाबाद और पुरुलिया में रामनवमी शोभायात्रा पर उपद्रवियों ने फेंके पत्थर

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और पुरुलिया में रामनवमी के पावन पर्व पर हिंदुओं पर हमला हुआ। शुक्रवार (27 मार्च 2026) शाम रामनवमी शोभायात्राओं के दौरान उपद्रवियों ने जमकर पत्थरबाजी, तोड़फोड़ और आगजनी की, जिससे कई लोग घायल हो गए। हालात को काबू में करने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

DIG अजीत सिंह यादव ने बताया कि कई दंगाइयों को हिरासत में लिया जा चुका है। मुर्शिदाबाद के जंगीपुर में शोभायात्रा जैसे ही मैकेंजी पार्क से निकलकर फुलतला मोड़ पहुँची, उपद्रवियों ने ईंट और पत्थरों से हमला बोल दिया। आरोप है कि यह हमला सुनियोजित था और शोभायात्रा के आगे बढ़ने पर दोबारा पत्थर फेंके गए।

ठीक ऐसी ही हिंसक तस्वीरें पुरुलिया के पारा इलाके से भी सामने आईं, जहाँ शांतिपूर्वक निकल रही रैली को दंगाइयों ने निशाना बनाया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी के दावों के मुताबिक, उपद्रवियों ने पवित्र भगवा ध्वज को अपमानजनक तरीके से नीचे खींचकर फेंक दिया।

बीजेपी ने इस हिंसा के लिए ममता सरकार की तुष्टीकरण की राजनीति को जिम्मेदार ठहराया है। शुभेंदु अधिकारी ने पूछा कि क्या अपने ही राज्य में भगवा ध्वज फहराना अपराध है? फिलहाल, मुर्शिदाबाद और पुरुलिया में सुरक्षा एजेंसियाँ चप्पे-चप्पे पर नजर रख रही हैं ताकि कोई और अनहोनी न हो।

झारखंड के धनबाद में राम नवमी जुलूस के बीच पत्थरबाजी से 6 लोग घायल

झारखंड के धनबाद जिले के भिकराजपुर में शुक्रवार (27 मार्च 2026) की शाम रामनवमी के अवसर पर निकाली जा रही शोभायात्रा के दौरान अचानक तनाव की स्थिति पैदा हो गई। जुलूस अपने तय मार्ग से गुजर रहा था, तभी दो पक्षों के बीच किसी बात को लेकर कहासुनी शुरू हो गई। पुलिस के अनुसार, दूसरे समुदाय के कुछ लोगों ने पथराव शुरू कर दिया।

पत्थरबाजी के कारण मौके पर अफरा-तफरी मच गई और भगदड़ जैसी स्थिति बन गई। इस घटना में करीब छह लोग घायल हुए, जिन्हें तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाया गया। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रभात कुमार ने बताया कि यह विवाद दो समुदायों के किशोरों के बीच शुरू हुआ था, जो अचानक बढ़ गया।

हालात को देखते हुए बलियापुर के भिकराजपुर समेत आसपास के कई इलाकों में निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है। इसके अलावा पुलिस ने 6 लोगों को हिरासत में भी लिया है। पुलिस ने कहा है कि घटना की जाँच जारी है, उपद्रव में शामिल असामाजिक तत्वों की पहचान कर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

राजस्थान में रामनवमी की शोभायात्रा पर पथराव

राजस्थान में रामनवमी के अवसर पर निकलने वाली शोभायात्रा पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने हमला किया। जानकारी के मुताबिक, शोभायात्रा शांतिपूर्वक निकाली जा रही थी, इसी दौरान हिंदू श्रद्धालुओं पर पत्थरबाजी की गई। श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन को क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा।

इसके अलावा जोधपुर में शुक्रवार (27 मार्च 2026) की रात गणगौर पर्व के दौरान निकाली जा रही ‘भोलावनी’ शोभायात्रा पर भी अचानक पथराव किए जाने की घटना सामने आई। यहाँ मकराना मोहल्ला स्थित एक संकरी गली में परंपरागत रूप से शांतिपूर्ण ढंग से निकल रही शोभायात्रा अचानक हिंसा की चपेट में आ गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शोभायात्रा जब गली के पास पहुँची तो कुछ लोगों ने रास्ते से गुजर रहे ट्रैक्टर को रोकने की कोशिश की और देखते ही देखते पथराव शुरू कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उपद्रवियों ने न केवल शोभायात्रा को निशाना बनाया, बल्कि आसपास खड़े ऑटो-रिक्शा और मोटरसाइकिलों में भी तोड़फोड़ की, जिसमें कई लोग घायल हुए।

घटना की सूचना मिलते ही भारी संख्या में पुलिस बल मौके पर पहुँचा। इस दौरान कुछ संदिग्धों को हिरासत में भी लिया गया है। अधिकारियों के अनुसार, CCTV फुटेज के आधार पर आरोपितों की पहचान कर आगे की कार्रवाई की जा रही है।

केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने एक्स पर लिखा, “जोधपुर ही नहीं देश के किसी भी शहर में संस्कृति और परम्परा से खिलवाड़ करना और उसे सांप्रदायिक रूप देकर सामाजिकता पर चोट करने की कुचेष्टा नहीं चलेगी, यह साफ है। जिसे भी यह लगता है कि वह ऐसा कर अपने षड्यंत्र में सफल होगा, उसे ऐसा सबक मिलना चाहिए कि जो इस तरह की मानसिकता वाले दूसरों के लिए भी उदाहरण बने। “

उन्होंने आगे लिखा, “हमें शांति के दुश्मनों के खिलाफ लोकतांत्रिक ‘शक्ति’ के प्रयोग से परहेज नहीं है। सज्जन शक्ति का संगठित संचय ही सुरक्षित भविष्य का एकमात्र मार्ग है।जानकारी मिलने के समय कल रात्रि से ही जिला और पुलिस प्रशासन से संपर्क में हूँ। निष्पक्ष जाँच कर दोषियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।”

बिहार में राम नवमी के अवसर पर सांप्रदायिक तनाव

राम नवमी के दौरान बिहार के कुछ इलाकों से भी तनाव की खबरें सामने आई। इस पर राज्य के डीजीपी ने कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी देते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था खराब करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि CCTV फुटेज की मदद से उपद्रव करने वाले लोगों की पहचान की जा रही है और उन्हें जल्द पकड़ लिया जाएगा।

भारत अपने पारंपरिक उत्सवों और त्योहारों के लिए जाना जाता है, लेकिन इस्लामी कट्टरपंथी हमेशा इसी ताक में रहते हैं कि कब कोई त्योहार आए और बवाल करने में लग जाएँ। होली के अवसर पर देश के अलग-अलग हिस्सों से हिंसा और सांप्रदायिक तनाव की खबरें सामने आई। कहीं होली का त्योहार मना रहे हिंदुओं से मारपीट की गई तो कहीं मस्जिद की दीवारों पर रंग के छीटें पड़ जाने को लेकर इस्लामी कट्टरपंथियों ने बवाल किया। एक त्योहार बीता ही था तब तक इन कट्टरपंथियों ने रामनवमी पर भी हिंसा फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

अमेरिका में चीनी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए झोंके ₹5000 करोड़, US मीडिया ने खोला नेविल का चिट्ठा: CCP के प्यादे ने भारत में भी हर्ष मंदर-तीस्ता सीतलवाड़ जैसों को बनाया हथियार

पश्चिमी मीडिया अब आखिरकार उस सच्चाई को मानने लगा है, जिसे ऑपइंडिया काफी सालों से बता रहा है। यह पूरा मामला दुनिया भर में फैले उन एनजीओ (NGO), एक्टिविस्ट ग्रुप और मीडिया हाउस से जुड़ा है, जो असल में चीन की सरकार के लिए प्रचार (प्रोपेगेंडा) करने वाली मशीन की तरह काम कर रहे हैं। हाल ही में फॉक्स न्यूज (FOX NEWS) ने एक बड़ी पड़ताल की है, जिसमें नेविल रॉय सिंघम के चीन-समर्थक नेटवर्क का पर्दाफाश किया गया है।

अमेरिका के रहने वाले नेविल रॉय सिंघम एक बड़े बिजनेसमैन हैं, जिन्होंने 2017 में अपनी कंपनी लगभग 6,500 करोड़ रुपए ($785 मिलियन) में बेची थी और फिर चीन के शंघाई जाकर बस गए। अब यह साफ हो रहा है कि वे कैसे पैसों के दम पर खबरों का एक जाल बुनकर दुनिया भर में चीन की छवि चमकाने का खेल चला रहे हैं।

फॉक्स न्यूज की इस पाँच पार्ट वाली सीरीज की तीन रिपोर्ट से पता चलता है कि नेविल रॉय सिंघम का संगठन बड़ी चालाकी से खबरों का एक ऐसा जाल बुन रहा है, जहाँ मामूली विरोध-प्रदर्शनों को भी ‘बड़ा मुद्दा’ बनाकर पेश किया जाता है। सिंघम के पैसों से चलने वाला यह नेटवर्क इस तरह की खबरों को पूरी दुनिया में फैलाता है। इनका असली मकसद अमेरिका और भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में झगड़े और फूट पैदा करना है। साथ ही, ये चीन को एक ऐसे ‘नेक’ देश के रूप में दिखाते हैं जो दुनिया को अमेरिका के असर से बचा रहा है। क्यूबा में चल रहे वामपंथी आंदोलन में यह खेल साफ-साफ देखा जा सकता है।

इनके काम करने का तरीका बहुत सीधा है, ये किसी भी तरह दुनिया को यह यकीन दिलाना चाहते हैं कि चीन की ‘मार्क्सवादी-नक्सलवादी’ सोच ही सबसे बढ़िया और भली है। दूसरी तरफ, ये अमेरिका और उसकी व्यापारिक नीतियों को दुनिया की हर मुसीबत की जड़ और सबसे बड़ी बुराई के रूप में दिखाते हैं।

नेविल रॉय सिंघम का ‘चीन प्रेम’: प्रोपेगेंडा के दम पर दुश्मन देशों को बर्बाद करने वाली सैकड़ों संस्थाओं का खुलासा

मार्च 2026 की शुरुआत में, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और नेविल रॉय सिंघम के संगठन ‘हाउस ऑफ सिंघम’ के बीच संदिग्ध रिश्तों की सरकारी जाँच शुरू हो गई है। अमेरिका के अधिकारी अब इस बात की गहराई से छानबीन कर रहे हैं कि सिंघम को चीन से कितना पैसा मिल रहा है, मीडिया और राजनीति में उनकी कितनी पकड़ है और उनके इन कामों से अमेरिका के हितों को कितना नुकसान पहुँच रहा है।

चाहे अमेरिका में फिलिस्तीन के समर्थन में होने वाले प्रदर्शन हों, क्यूबा में वामपंथी कार्यकर्ताओं का जमावड़ा हो या ईरान युद्ध के खिलाफ उठने वाली आवाजें, ऊपर से देखने में ये सब आम लोगों का गुस्सा लग सकते हैं, लेकिन असलियत कुछ और ही है। ये प्रदर्शन असल में एक बहुत बड़ी और सोची-समझी साजिश का हिस्सा हैं, जिन्हें मोटी फंडिंग और खास राजनीतिक मकसद के साथ चलाया जा रहा है। इन सबकी डोर नेविल सिंघम के उस नेटवर्क से जुड़ी है, जिसमें एनजीओ (NGO), मीडिया हाउस, बड़े-बड़े बुद्धिजीवी और मशहूर हस्तियाँ शामिल हैं।

फॉक्स न्यूज ने इस सच को सामने लाने के लिए हजारों टैक्स कागजात, संगठनों के रिकॉर्ड, पैसों के लेन-देन और सोशल मीडिया पोस्ट की जाँच की है। इस बड़ी पड़ताल के लिए आधुनिक एआई (AI) तकनीक और खुले सोर्स से मिली जानकारियों का इस्तेमाल किया गया है, जिससे सिंघम के इस नेटवर्क की एक-एक परत खुल गई है।

फॉक्स न्यूज की एक बड़ी रिपोर्ट, जिसका नाम ‘तबाही मचाने वाला जोड़ा’ (Power Couple of Chaos) है, उसने नेविल रॉय सिंघम और उनकी पत्नी इवांस के काले कारनामों की पोल खोल दी है। जाँच में पता चला है कि 2017 से अब तक सिंघम ने चीन के समर्थन में माहौल बनाने के लिए सीधे तौर पर 2300 करोड़ रुपए फूँक दिए हैं। अगर 2025 तक के पूरे लेनदेन को देखें, तो यह आँकड़ा करीब 5000 करोड़ रुपए तक पहुँच जाता है। यह भारी-भरकम पैसा दुनिया भर की 1000 से ज्यादा संस्थाओं में बाँटा गया। इनमें से लगभग 200 संगठन तो ऐसे हैं जिनका काम ही सिर्फ चीन की तारीफ करना और अमेरिका व अन्य लोकतांत्रिक देशों की बुराई करना है।

रिपोर्ट के मुताबिक, सिंघम और उनकी पत्नी इवांस ने पूरी दुनिया में करीब 2000 कट्टर वामपंथी संगठनों का एक ऐसा जाल बिछा दिया है, जो चीन, रूस, ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया जैसे तानाशाह देशों का पक्ष लेते हैं। एक्टिविस्टों के बीच ऐसे लोगों को ‘टैंकी’ (Tankies) कहा जाता है, यानी वो लोग जो अपनी ही लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ जाकर तानाशाही सरकारों का गुणगान करते हैं। इस समय सिंघम के नेटवर्क से जुड़े कई बड़े नेता क्यूबा में बैठकर कम्युनिस्टों के लिए अभियान चला रहे हैं।

नेविल रॉय सिंघम पर आरोप है कि उन्होंने टैक्स बचाने और पैसा घुमाने के लिए फर्जी कंपनियों (शेल कंपनियों) का एक जाल बिछाया था। उन्होंने गोल्डमैन साच्स जैसी बड़ी संस्था से जुड़े एक खास फंड का इस्तेमाल किया ताकि करोड़ों रुपए बिना किसी रोक-टोक के इधर-उधर भेजे जा सकें। हालाँकि, मामला संदिग्ध लगने पर गोल्डमैन साच्स ने फरवरी 2024 में सिंघम के इस खाते को पूरी तरह बंद कर दिया।

चीन के समर्थन में काम करने वाले इस पूरे नेटवर्क की शुरुआत साल 2017 में हुई, जब नेविल सिंघम ने जोडी इवांस (Jodie Evans) से जमैका में शादी की। जोडी खुद एक एक्टिविस्ट ग्रुप की मालकिन हैं। इस शादी में दुनिया भर के 80 से ज्यादा बड़े वामपंथी नेता शामिल हुए थे, जिनमें विजय प्रसाद नाम के एक नक्सलवादी पत्रकार भी थे।

विजय प्रसाद ने बाद में सिंघम के इस नेटवर्क को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई और कई फर्जी कंपनियों के बोर्ड मेंबर बने। फॉक्स न्यूज की जाँच में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। सिंघम के ये ज्यादातर संगठन किसी बड़े दफ्तर के बजाय साधारण होटलों या कूरियर दुकानों (UPS Store) के पते पर रजिस्टर्ड हैं। ऐसा इसलिए किया गया ताकि पैसों के लेन-देन को छिपाया जा सके और किसी को कानों-कान खबर न हो कि ये पैसा कहाँ से आ रहा है और कहाँ जा रहा है।

जाँच में सामने आया है कि इस पूरे खेल के पीछे अमेरिका की 11 संस्थाएँ (NGOs) मुख्य केंद्र के रूप में काम कर रही हैं। इनका काम बहुत व्यवस्थित है। ये पैसा बाँटते हैं, विरोध-प्रदर्शनों की प्लानिंग करते हैं, खबरें और Video बनवाते हैं और लोगों को एक खास राजनीतिक विचारधारा की ट्रेनिंग देते हैं। इन्होंने ‘लिबरेशन सेंटर’ (मुक्ति केंद्र) भी खोले हैं, जो बिल्कुल पुराने चीनी नेता माओ जे़दोंग की ‘यूनाइटेड फ्रंट’ रणनीति जैसे हैं।

इस रणनीति का मतलब है कि अपने ‘खास लोगों’ को समाज के हर हिस्से, ‘जैसे मीडिया, मजदूर संगठनों और स्कूलों’ में इस तरह घुसा दो कि वे ऊपर से तो स्वतंत्र लगें, लेकिन अंदर ही अंदर अपने ही देश की सरकार और उसकी साख को दीमक की तरह खोखला करते रहें।

अगर पैसों की बात करें, तो नेविल रॉय सिंघम ने बड़ी ही चालाकी से पैसा घुमाया है। उन्होंने गोल्डमैन साच्स के एक फंड और दो फर्जी (शेल) कंपनियों का इस्तेमाल करके करीब 2,300 करोड़ रुपए छह अलग-अलग एनजीओ में डाले। यह भारी-भरकम रकम ही उस मशीनरी को चलाने के लिए पेट्रोल का काम कर रही है, जिसका इकलौता मकसद चीन की तारीफ करना और विरोधी देशों को कमजोर करना है।

जाँच से पता चला है कि नेविल रॉय सिंघम ने कई संस्थाओं (NGOs) को मालामाल कर दिया है। उन्होंने ‘पीपुल्स फोरम’ को करीब 185 करोड़ रुपए, ‘पीपुल्स सपोर्ट फाउंडेशन’ को लगभग 1400 करोड़ रुपए और ‘जस्टिस एंड एजुकेशन फंड’ को 570 करोड़ रुपए दिए। इस खेल में ‘ब्रेकथ्रू मीडिया’ और ‘कोडपिंक’ जैसे संगठन भी शामिल हैं (कोडपिंक की मालिक सिंघम की पत्नी जोडी इवांस ही हैं)। साथ ही, विजय प्रसाद नाम के पत्रकार की कंपनी ‘ट्राईकॉन्टिनेंटल’ को भी इस नेटवर्क से मोटी फंडिंग मिली है।

इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब सितंबर 2025 में अमेरिकी संसद की एक बड़ी कमेटी ने ‘द पीपुल्स फोरम’ के कागजात खंगालने शुरू किए। इस संस्था पर गंभीर आरोप हैं कि इसका सीधा रिश्ता चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से है। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि यह संगठन एक तरफ तो अमेरिका में ‘NGO’ बनकर टैक्स बचाने का फायदा उठा रहा था, और दूसरी तरफ चोरी-छिपे चीन के करीबी नेविल सिंघम से करोड़ों रुपए ले रहा था।

अमेरिकी सांसद जेसन स्मिथ की रिपोर्ट ने ‘द पीपुल्स फोरम’ नाम के संगठन की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। इस संगठन ने न केवल इजरायल में हमास के आतंकी हमले को सही ठहराया, बल्कि अमेरिका के कॉलेजों में दंगे और हिंसा भड़काने का काम भी किया। खुद इस संस्था ने माना है कि उसे नेविल रॉय सिंघम से 165 करोड़ रुपए से ज्यादा की फंडिंग मिली है। असल में यह संगठन पढ़ाई के नाम पर ऐसे कोर्स चलाता है, जिनका मकसद सिर्फ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रचार करना है।

जाँच में सामने आया कि 2017 से 2022 के बीच सिंघम और उनकी पत्नी ने बड़ी चालाकी से फर्जी (शेल) कंपनियों के जरिए इस संगठन को पैसा पहुँचाया। यह अब पूरी तरह साफ हो चुका है कि ‘द पीपुल्स फोरम’ कोई स्वतंत्र संस्था नहीं, बल्कि सिंघम के उस नेटवर्क का हिस्सा है जो सिर्फ चीन के इशारे पर काम करता है।

नेविल रॉय सिंघम का रिकॉर्ड काफी पुराना और संदिग्ध है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1974 में ही FBI ने उनके खिलाफ जाँच शुरू कर दी थी क्योंकि वे उन गुटों से जुड़े थे जो अमेरिका के दुश्मन माने जाते थे। इतना ही नहीं, सिंघम ने सालों तक विवादित चीनी कंपनी हुवावे (Huawei) के लिए भी काम किया। बता दें कि हुवावे के रिश्ते चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से इतने गहरे हैं कि कंपनी ने खुद माना था कि उनके ऑफिस के अंदर चीन की सरकारी ‘पार्टी कमेटी’ बैठती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि नेविल सिंघम का यह पूरा तामझाम असल में ‘खबरों की हेराफेरी’ (Information Laundering) करने का एक अड्डा है। इसका एक ही मकसद है ‘पूरी दुनिया में चीन की तारीफ करवाना और अमेरिका के भीतर झगड़े पैदा करना’।

हैरानी की बात यह है कि जो विरोध-प्रदर्शन देखने में आम जनता का गुस्सा लगते हैं, (जैसे ईरान युद्ध का विरोध या क्यूबा की सरकार का समर्थन) वे असल में पूरी तरह से स्क्रिप्टेड होते हैं। सिंघम के मीडिया चैनल (जैसे ‘ब्रेकथ्रू न्यूज’) इन प्रदर्शनों की प्रोफेशनल तरीके से शूटिंग करते हैं, उन्हें शानदार वीडियो और कमेंट्री के साथ तैयार करते हैं और फिर Social Media पर फैला देते हैं। यह सब इसलिए किया जाता है ताकि दुनिया को लगे कि ये कोई बहुत बड़ा ‘जन-आंदोलन’ है, जबकि हकीकत में यह एक सोची-समझी साजिश होती है।

इसी साल फरवरी में विशेषज्ञ एडम सोहन ने अमेरिकी संसद में इस जाल की पोल खोलते हुए कहा, “यह कोई आम जनता का विरोध नहीं है। यह एक ऐसा सेट सिस्टम है जिसे जब चाहे, जहाँ चाहे, अमेरिका के काम-काज को रोकने (जाम करने) के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।”

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल के लिए पैसा अमेरिका के ही टैक्स कानूनों (NGO के जरिए मिलने वाली छूट) से आ रहा है, लेकिन इसका रिमोट कंट्रोल एक दुश्मन देश (चीन) के हाथ में है। सोहन ने चेतावनी दी कि यह हमारे देश की सुरक्षा में एक ऐसा छेद है जिसे हमें तुरंत बंद करना होगा।

हाउस कमेटी की वेबसाइट से लिया गया प्रासंगिक अंश

रॉय सिंघम और PSL से जुड़ा जिहादी ढेर: 2025 में अमेरिकी इजराइली दूतावास पर किया था हमला

रॉय सिंघम का नेटवर्क सिर्फ भाषण देने या विरोध-प्रदर्शन करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अब इसके तार हत्या और आतंक से भी जुड़ चुके हैं। मई 2025 में वॉशिंगटन डीसी (अमेरिका) में ‘एलियास रोड्रिगेज’ नाम के एक कट्टरपंथी ने ‘फ्री फिलिस्तीन’ के नारे लगाते हुए इजराइली दूतावास के दो कर्मचारियों का कत्ल कर दिया था। जब जाँच हुई, तो पता चला कि यह हत्यारा ‘पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन’ (PSL) नाम के एक कम्युनिस्ट ग्रुप से जुड़ा था। चौंकाने वाली बात यह है कि इस ग्रुप को चीन का प्रोपेगेंडा फैलाने वाले नेविल रॉय सिंघम और उनकी पत्नी मोटी फंडिंग देते हैं।

इतना ही नहीं, यह कातिल ‘ANSWER कोअलिशन’ जैसे कट्टरपंथी समूहों का भी हिस्सा रहा है और उनके लिए चंदा इकट्ठा करता था। रिपोर्टों से साफ हुआ है कि ये सभी संगठन ‘पीपुल्स फोरम’ नाम की संस्था से जुड़े हैं, जिसका सीधा कनेक्शन रॉय सिंघम के जरिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से है। इससे यह साफ हो जाता है कि चीन से आने वाला यह पैसा केवल राजनीति के लिए नहीं, बल्कि दुनिया भर में हिंसा और दहशत फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

चीन से पैसा पाने वाला संगठन ‘पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन’ (PSL) लगातार भारत की मोदी सरकार को निशाना बना रहा है। इस ग्रुप ने भारत को बदनाम करने के लिए गुजरात दंगों से लेकर किसान कानूनों और बेरोजगारी जैसे छह बड़े मुद्दों को अपना हथियार बना रखा है। इस संगठन की पोल तब खुली जब इसने ‘न्यूज़क्लिक’ (NewsClick) का बचाव करना शुरू किया। जब भारत सरकार ने चीन का प्रोपेगेंडा फैलाने के आरोप में न्यूजक्लिक पर एक्शन लिया, तो PSL ने इसे सरकार की तानाशाही बताकर शोर मचाना शुरू कर दिया।

हैरानी की बात तो यह है कि जब मशहूर अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स‘ ने न्यूजक्लिक और उसके एडिटर प्रबीर पुरकायस्थ के चीन से जुड़े रिश्तों का पर्दाफाश किया, तो PSL ने उस अखबार के दफ्तर के बाहर ही विरोध प्रदर्शन कर दिया। इस संगठन का कहना है कि मोदी सरकार जानबूझकर वामपंथी विचारकों को ‘देशद्रोही’ बताकर उनकी आवाज दबा रही है। साफ़ है कि यह पूरा ग्रुप चीन के इशारे पर भारत की छवि खराब करने और चीनी एजेंटों को बचाने की एक बड़ी मशीन की तरह काम कर रहा है।

ब्रेकथ्रू न्यूज: सिंघम के पैसे से चलने वाली चीन की ‘प्रोपेगेंडा मशीन’

2019 में शुरू हुआ ‘ब्रेकथ्रू न्यूज‘ (BreakThrough News) कहने को तो एक न्यूज चैनल है, लेकिन असल में यह चीन के इशारे पर काम करता है। रिकॉर्ड बताते हैं कि नेविल रॉय सिंघम ने इस चैनल को ‘समाज सेवा’ के नाम पर करीब 9 करोड़ रुपए का मोटा चंदा दिया। यह चैनल एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है जिसका काम ही दुनिया भर में चीन की तारीफ करना और उसके विरोधियों को बदनाम करना है। इसकी हर खबर, चाहे वो इजरायल के खिलाफ हो या क्यूबा के समर्थन में, हमेशा चीन की पसंद के हिसाब से ही बनाई जाती है।

फॉक्स न्यूज की एक रिपोर्ट ‘शंघाई सेबोटेज’ ने खुलासा किया है कि यह नेटवर्क अमेरिका को नीचा दिखाने के लिए पूरी प्लानिंग और स्क्रिप्ट के साथ काम करता है। मिसाल के तौर पर, क्यूबा में हुए एक प्रदर्शन को इस चैनल ने बड़े क्रांतिकारी अंदाज में दिखाया और इसे अमेरिकी सरकार के खिलाफ एक बड़ी बगावत बता दिया। इसके बाद, दुनिया भर के कम्युनिस्ट मीडिया संगठनों ने इस वीडियो को फैलाया ताकि लोगों के मन में कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति सहानुभूति पैदा की जा सके और चीन का नैरेटिव सेट हो सके।

आसान शब्दों में कहें तो, ये विरोध प्रदर्शन असल में एक सोची-समझी स्क्रिप्ट (नाटक) की तरह होते हैं। होता यह है कि रॉय सिंघम के नेटवर्क से जुड़े लोग पहले एक प्रदर्शन आयोजित करते हैं, फिर उनके ही नेटवर्क के मीडिया चैनल उसे ‘सच्चा आंदोलन’ बताकर कवर करते हैं। बाद में इसे दुनिया भर में फैलाया जाता है ताकि लोगों की सहानुभूति जीती जा सके और सरकारों पर दबाव बनाया जा सके। इसका असली मकसद सिर्फ एक है, कम्युनिस्ट विचारधारा को फैलाना और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के लिए समर्थन जुटाना।

फॉक्स न्यूज की एक रिपोर्ट ने इस बड़े जाल का खुलासा किया है। सिंघम का यह नेटवर्क अमेरिका में इजरायल विरोधी प्रदर्शन कराने से लेकर भारत में प्रोपेगेंडा फैलाने और दक्षिण अफ्रीका की लेबर यूनियनों को अपने कब्जे में लेने तक फैला हुआ है। यह एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय खेल है, जो कई मुखौटा कंपनियों और एक ही पते के पीछे छिपा है। इनका एकमात्र मिशन दुनिया भर में मार्क्सवाद फैलाना और चीन को अमेरिका के मुकाबले दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनाना है।

हैरानी की बात यह है कि नेविल रॉय सिंघम का परिवार विदेशी राजनीति को अपने हिसाब से चलाने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहा है। रॉय सिंघम की बहन शांति सिंघम और उनके पति डेनियल गुडविन ने न्यूयॉर्क के मेयर चुनाव में एक खास राजनीतिक गुट को मोटा चंदा दिया। दिलचस्प बात यह है कि डेनियल पहले रॉय सिंघम की ही कंपनी ‘थॉटवर्क्स’ में बड़े पद पर काम कर चुके हैं। इससे साफ होता है कि यह परिवार सिर्फ बिजनेस ही नहीं, बल्कि विदेशों में राजनीतिक जोड़-तोड़ में भी लगा हुआ है।

चीन के कट्टर समर्थक रॉय सिंघम खुलेआम चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तारीफ करते हैं। वे दुनिया में चल रहे मौजूदा नियमों को ‘झूठ’ बताते हैं और कहते हैं कि पूरी दुनिया को माओ ज़ेदोंग के दिखाए रास्ते पर चलना चाहिए। वे अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों के सख्त खिलाफ हैं और चाहते हैं कि दुनिया चीन के हिसाब से चले।

सिंघम ने अपने एक भाषण में पश्चिमी देशों पर हमला करते हुए कहा कि ये देश लोकतंत्र की रक्षा का सिर्फ दिखावा करते हैं। उन्होंने दावा किया कि असल में सोवियत संघ और चीन के लोगों ने ही अपने बलिदान से मानवता को बचाया है। सिंघम का मानना है कि केवल समाजवादी सोच ही दुनिया की बड़ी ताकतों को हरा सकती है। कुल मिलाकर, वे चीन की ताकत और उसकी सोच को पूरी दुनिया पर थोपना चाहते हैं।

नेविल रॉय सिंघम का असली मकसद अब सबके सामने है। उन्होंने साफ कहा है कि अगर दुनिया को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी के हिसाब से चलाना है, तो हमें इतिहास की उन पुरानी बातों को बदलना होगा जिन्हें दुनिया अब तक सच मानती आई है। सिंघम चाहते हैं कि दुनिया वैसी ही दिखे और सोचे, जैसा चीन चाहता है।

हैरानी की बात यह है कि इस काम के लिए सिंघम ने अमेरिका के ही पैसे का इस्तेमाल किया है। ‘फॉक्स न्यूज’ की रिपोर्ट ने एक ऐसी ‘सीक्रेट पाइपलाइन’ का पर्दाफाश किया है, जिसके जरिए अमेरिका की तीन बड़ी संस्थाओं (NGOs) ने 2021 से अब तक करीब 75 करोड़ रुपए ($91 लाख) चीन भेजे हैं। यह पैसा सात बार में ‘शंघाई माकु कल्चरल कम्युनिकेशंस’ नाम की एक कंपनी को दिया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह कंपनी खुद सिंघम की ही एक आलीशान बिल्डिंग के पते पर चल रही है और इसका इकलौता काम इंटरनेट पर चीन के पक्ष में झूठा प्रचार (प्रोपेगेंडा) फैलाना है।

(सोर्स: फॉक्स न्यूज)

विजय प्रसाद, न्यूज़क्लिक और सिंघम: भारत में चीनी प्रोपेगेंडा का ‘तिगड़ा’

फॉक्स न्यूज की जाँच ने खुलासा किया है कि नेविल रॉय सिंघम ने भारत के खिलाफ एक बड़ा जाल बिछा रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, सिंघम की संस्था ने दिल्ली के न्यूज़ पोर्टल ‘न्यूजक्लिक’ (NewsClick) को लगभग 87 करोड़ रुपए (10.5 मिलियन डॉलर) का भारी-भरकम चंदा दिया। इसी वजह से भारत सरकार ने सिंघम के खिलाफ समन जारी किया है। उन पर भारत के चुनावों में दखल देने, पैसों की हेराफेरी (मनी लॉन्ड्रिंग) और अशांति फैलाने की साजिश रचने जैसे गंभीर आरोप हैं।

इस पूरे खेल में विजय प्रसाद एक मुख्य खिलाड़ी के रूप में सामने आए हैं। वे ‘ट्राइकॉटिनेंटल’ (TriContinental) नाम की संस्था से जुड़े हैं, जो सिंघम के नेटवर्क का एक खास हिस्सा है। न्यूजक्लिक और विजय प्रसाद की भारत विरोधी हरकतों का खुलासा पहले भी होता रहा है।

सिंघम खुद ‘ट्राइकॉटिनेंटल’ के सलाहकार बोर्ड में शामिल हैं और इसे चलाने के लिए मोटी फंडिंग देते हैं। आरोप है कि सिंघम अमेरिका की संस्थाओं का इस्तेमाल करके चीन का प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए पैसा पहुँचा रहे हैं। इतना ही नहीं, सिंघम ‘लेफ्ट वर्ड बुक्स’ और ‘ग्लोबट्रॉटर’ जैसी संस्थाओं के जरिए भी इस पूरे नैरेटिव को कंट्रोल करते हैं ताकि दुनिया भर में चीन की बात रखी जा सके।

विजय प्रसाद का मामला सिर्फ विचारधारा का नहीं है, बल्कि इनके तार सीधे भारत की राजनीति से जुड़े हैं। विजय प्रसाद माकपा (CPI-M) की बड़ी नेता वृंदा करात के भतीजे हैं। वृंदा करात के पति और दिग्गज नेता प्रकाश करात के कुछ ईमेल भी सामने आए थे, जिनसे पता चला कि उनके नेविल रॉय सिंघम के साथ बहुत करीबी रिश्ते हैं और वे न्यूजक्लिक के चीनी फंडिंग मामले में शामिल थे।

न्यूजक्लिक का नाम पहली बार 2021 में तब उछला जब ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने इसकी जाँच शुरू की। इस पोर्टल पर आरोप है कि इसने गलत तरीके से विदेश से करीब 38 करोड़ रुपए मँगाए। जब 2023 में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने रॉय सिंघम और चीन के इस पूरे खेल का पर्दाफाश किया, तो विजय प्रसाद ने इसे सरकार की साजिश बताकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की।

विजय प्रसाद ‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ नाम के एक अंतरराष्ट्रीय ग्रुप के बड़े सदस्य भी हैं। यह ग्रुप दुनिया भर के वामपंथी कार्यकर्ताओं को एक साथ लाता है। यह संगठन लगातार मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए ऐसे लेख छापता है जिनसे भारत की छवि खराब हो। इस मंच पर हर्ष मंदर जैसे लोगों के भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी लेख भरे पड़े हैं। इस ग्रुप में जयती घोष और ब्रिटेन के नेता जेरेमी कॉर्बिन जैसे लोग भी शामिल हैं, जो अक्सर भारत के खिलाफ बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं।

‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ का जाल सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार विवादित ‘टाइडस फाउंडेशन’ (Tides Foundation) से भी जुड़े हैं। यह फाउंडेशन हमास का समर्थन करने वाले संगठनों को पैसा देता है। चौंकाने वाली बात यह है कि इसी टाइडस फाउंडेशन का सीधा कनेक्शन नेविल रॉय सिंघम और न्यूजक्लिक (NewsClick) से भी पाया गया है।

टाइडस फाउंडेशन भारत और हिंदू-विरोधी गुटों को पैसा पहुँचाने के लिए बदनाम है। इसने ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) जैसे संगठनों को बड़ी मदद दी है, जिनके तार कट्टरपंथियों और खालिस्तानियों से जुड़े हैं। इस संस्था को बनाने के पीछे भी उन्हीं लोगों का हाथ था जो अमेरिका में बैठकर भारत के खिलाफ माहौल बनाते हैं।

इतना ही नहीं, टाइडस फाउंडेशन ने ‘अमन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट’ (AMAN) को भी पैसा दिया है। यह वही ट्रस्ट है जिसका नाम न्यूजक्लिक-चीन फंडिंग घोटाले में सामने आया था। आरोप है कि चीन ने न्यूजक्लिक के जरिए भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचाने के लिए करोड़ों रुपए भेजे थे।

चीन के एजेंट रॉय सिंघम ने ‘पीपुल्स डिस्पैच’ जैसे कई विदेशी न्यूज पोर्टल्स में करोड़ों रुपए लगाए हैं। इन्हीं मंचों का इस्तेमाल करके विजय प्रसाद जैसे लोग लगातार भारत के खिलाफ लेख लिखते हैं और चीन के एजेंडे को बढ़ावा देते हैं।

‘पीपुल्स डिस्पैच’ नाम का पोर्टल खुद को जनता की आवाज कहता है, लेकिन असल में इसका इस्तेमाल खास एजेंडा चलाने के लिए होता है। उदाहरण के लिए, जनवरी 2020 में विजय प्रसाद ने इस पोर्टल पर जेएनयू (JNU) के प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया था और मोदी सरकार के खिलाफ जमकर निशाना साधा था। इससे साफ पता चलता है कि यह पोर्टल किस तरह की सोच को बढ़ावा देता है।

नेविल रॉय सिंघम ने अपनी बड़ी टीम में कुछ भारतीयों को भी जोड़ा था, जो ‘ट्राइकॉटिनेंटल’ जैसे एनजीओ के लिए काम करते थे। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ये संस्थाएँ चीन के एजेंडे को फैलाने का काम कर रही थीं। सिंघम की इस टीम में प्रबीर पुरकायस्थ, सृजना, प्रशांत और विजय प्रसाद जैसे मुख्य नाम शामिल थे, जो भारत में बैठकर चीन के पक्ष में माहौल तैयार कर रहे थे।

इतना ही नहीं, विजय प्रसाद के रिश्ते पी साईनाथ से भी काफी करीबी रहे हैं। पी साईनाथ के पोर्टल ‘पारी’ (PARI) का नाम भी तब उछला जब सिंघम और चीन के प्रोपेगेंडा नेटवर्क का सच सबके सामने आया। जैसे ही यह विवाद बढ़ा, ‘पारी’ ने तुरंत अपने पोर्टल से सिंघम से जुड़ी सारी जानकारियाँ हटा दीं ताकि उनकी पोल न खुल जाए।

न्यूजक्लिक (NewsClick) का हिंदू-विरोधी रवैया तो पुराना है, लेकिन अब इसके चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से रिश्तों की परतें खुल रही हैं। 2023 में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया कि नेविल रॉय सिंघम के नेतृत्व में संस्थाओं और फर्जी कंपनियों का एक ऐसा जाल बिछाया गया है, जिसका सीधा कंट्रोल चीन के पास है। 2024 में दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में बताया कि इस पूरे खेल का ‘असली मालिक और पैसा देने वाला’ चीन ही है। आरोप है कि चीनी फंड का इस्तेमाल कश्मीर और किसान आंदोलन जैसे मुद्दों पर भारत के खिलाफ झूठ फैलाने के लिए किया गया। यह मामला अभी अदालत में चल रहा है।

2021 में ही ‘ऑपइंडिया‘ ने न्यूजक्लिक के कनेक्शनों की जाँच की थी, जिसमें उन चेहरों का पर्दाफाश हुआ था जो लगातार भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। इसमें ‘अर्बन नक्सल’ से लेकर तीस्ता सीतलवाड़ और अभिसार शर्मा जैसे लोगों के नाम शामिल हैं। इससे साफ है कि न्यूजक्लिक एक न्यूज पोर्टल नहीं, बल्कि भारत विरोधी एजेंडा चलाने का एक अड्डा बन चुका है।

सीधी बात यह है कि नेविल रॉय सिंघम का यह काम कोई ‘समाज सेवा’ नहीं, बल्कि चीन की एक सोची-समझी साजिश है। यह नेटवर्क एनजीओ और डिजिटल मीडिया का सहारा लेकर ‘स्वतंत्र न्यूज’ के नाम पर चीन की बातों को दुनिया में फैलाता है। जैसे अमेरिका अपनी ताकत का इस्तेमाल करता है, वैसे ही चीन ने भारत और अमेरिका जैसे देशों के भीतर अपने ‘बौद्धिक मोहरे’ (Intellectual Assets) तैयार कर लिए हैं, जो अंदर ही अंदर लोकतंत्र को कमजोर करने में लगे हैं।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

मिडिल ईस्ट वॉर, फ्यूल संकट और ‘लॉकडाउन’ की राजनीति: डर फैलाकर वोट बटोरने की जुगत में ममता बनर्जी, जानें पहले कब-कब फैलाई अफवाह

पश्चिम एशिया में जारी तनाव, खासकर ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावित होने की खबरों ने वैश्विक तेल और गैस सप्लाई को लेकर आशंकाएँ बढ़ा दी हैं। भारत जैसे देश जो बड़े पैमाने पर तेल आयात पर निर्भर हैं, स्वाभाविक रूप से सतर्क हो गए हैं।

इसी बीच देश के भीतर एक अलग ही बहस छिड़ गई कि क्या भारत में फिर से लॉकडाउन लग सकता है? क्योंकि ममता बनर्जी ने लॉकडाउन लगने की अफवाहों को फैलाना का काम जोरदार तरीके से किया। हालाँकि केंद्र सरकार ने उनकी इन हरकतो के सफल होने से पहले ही जनता तक संदेश पहुँचा दिया है कि लोग अफवाहों पर ध्यान न दें।

ममता बनर्जी का लॉकडाउन बयान: आशंका या सियासत?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया कि केंद्र सरकार फ्यूल संकट के बहाने देश में लॉकडाउन लगा सकती है।

ममता बनर्जी ने गुरुवार (26 मार्च 2026) को पश्चिम बर्धमान के पांडवेश्वर में चुनाव प्रचार करते हुए कहा, “वे (केंद्र सरकार) लॉकडाउन लगा सकते हैं। लोग घरों में बंद रहेंगे। 2021 में लॉकडाउन के समय मैंने लड़ाई लड़ी थी, अब भी लड़ सकती हूँ।” उन्होंने LPG सिलेंडर की बुकिंग 25-35 दिन बाद मिलने की बात कही। उन्होंने कहा कि घरेलू सिलेंडर के दाम बढ़ गए। पेट्रोल की कीमत बढ़ गई। क्या केंद्र सरकार फिर लॉकडाउन की तैयारी कर रही है?

केंद्र सरकार के मंत्रियों ने खारिज किए अफवाह

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने एक्स पर लिखा, “लॉकडाउन की अफवाहें पूरी तरह झूठी हैं। सरकार के पास ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं। हम ऊर्जा, सप्लाई चेन और जरूरी चीजों पर नजर रख रहे हैं। लोग शांत रहें, जिम्मेदार रहें।”

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कहा, “मैं लोगों को भरोसा दिलाना चाहती हूँ कि कोई लॉकडाउन नहीं होगा। कुछ नेता बेबुनियाद बातें कर रहे हैं। कोविड जैसा लॉकडाउन कभी नहीं होगा।”

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी अफवाहों को खारिज करते हुए कहा कि पीएम मोदी ने खुद पैनिक न करने को कहा है। जमाखोरी पर चेतावनी दी गई है। राज्य सरकारें होर्डिंग न करें। पूरी स्थिति केंद्र के नियंत्रण में है।

तो फिर डर क्यों फैला रही हैं ममता बनर्जी?

राजनीतिक फायदा उठाने के चक्कर में ममता डर फैला रही हैं। ममता बनर्जी जानती हैं कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ईंधन संकट का मुद्दा उनके लिए सोने का अंडा साबित हो रहा है। वे लोगों में डर पैदा करके कह रही हैं कि केंद्र सरकार लॉकडाउन लगा रही है, LPG 25 दिन बाद मिलेगा, खाना कैसे पकाएँगे, ट्रांसपोर्ट कैसे चलेगा।

लेकिन असल में केंद्र सरकार पहले से ही एक्शन ले रही है, जिसमें एक्साइज ड्यूटी कम की, एक्सपोर्ट पर ड्यूटी लगाई, सप्लाई चेन को मजबूत किया।

दरअसल, ममता का मकसद साफ है, वो है- आम जनता को भड़काना, मोदी सरकार को बदनाम करना और टीएमसी के वोट बैंक को मजबूत करना। वे जानती हैं कि डर का माहौल बन गया तो लोग सोचेंगे ‘मोदी सरकार फेल हो गई’।

दरअसल, ममता खुद के राज्य में LPG और पेट्रोल की सप्लाई सुधारने में कुछ नहीं कर रही। सिर्फ आरोप लगा रही हैं। चुनावी फायदे के लिए लोगों को अनावश्यक चिंता में डालना गलत है। आम आदमी पहले से परेशान है, उस पर ममता का ये डर और बढ़ा रहा है।

ममता बनर्जी ने पहले भी लोगों को भड़काया, वो हैबिचुएल ऑफेंडर

ममता बनर्जी का ये तरीका नया नहीं। वे हर मुद्दे को राजनीति बना लेती हैं। वो डर की राजनीति करती रही हैं शुरुआत से। कभी वामपंथ का डर दिखाकर, कभी कॉन्ग्रेस का डर दिखाकर, कभी बीजेपी का डर दिखाकर, तो कभी हिंदुओं का डर दिखाकर। देखें- कैसे लोगों को भड़काकर वोट बटोरती रही हैं ममता बनर्जी-

सीएए के नाम पर: जब नागरिकता संशोधन कानून आया तो ममता ने पूरे बंगाल में हंगामा मचा दिया। ममता बनर्जी ने कहा कि मुसलमानों के अधिकार छिन जाएँगे। उन्होंने पूरे बंगाल में शाहीन बाग स्टाइल में प्रदर्शन तक करवाए। लेकिन सच्चाई सामने आ गई कि सीएए किसी की नागरिकता नहीं छीनता, बल्कि पड़ोसी देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देता है। इसके बावजूद ममता ने सिर्फ वोट बैंक बचाने के लिए भ्रम फैलाया और अब तक वो इस मुद्दे पर भ्रम ही फैला रही हैं।

एसआईआर के नाम पर: एसआईआर के दौरान जब कुछ जाँच एजेंसियाँ सक्रिय हुईं तो ममता ने इसे भी साजिश बताया। उन्होंने कहा कि आम मुसलमानों के वोट काटे जा रहे हैं। ममता ने इसे राजनीतिक हथियार बनाते हुए चुनाव आयोग के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया और दिल्ली तक प्रदर्शन कर डाले।

कोरोना के नाम पर: बता दें कि साल 2021 के चुनाव के समय आंशिक लॉकडाउन चल रहा था। चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने दावा करते हुए कहा कि केंद्र ने कुछ नहीं किया, सिर्फ टीएमसी लड़ रही है। लेकिन असल में केंद्र ने वैक्सीन, ऑक्सीजन, फंड सब दिया। ममता ने इसका इस्तेमाल सिर्फ अपनी छवि चमकाने के लिए किया।

केंद्रीय योजनाओं के नाम पर: पीएम आवास योजना, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत जैसी स्कीमों पर ममता हमेशा हमला करती हैं। कहती हैं केंद्र कुछ नहीं दे रहा। लेकिन हकीकत ये है कि बंगाल में लाखों लोग इन योजनाओं से फायदा ले रहे हैं। ममता सिर्फ क्रेडिट लेने के चक्कर में विरोध करती हैं।

इस तरह ममता हर बार डर और भ्रम फैलाकर वोट बटोरती हैं।

ममता की ये राजनीति आम आदमी को पहुँचा रही है नुकसान

आज ईंधन संकट है तो हर राज्य प्रभावित है। केरल, तमिलनाडु, असम के मुख्यमंत्री भी चिंतित हैं। लेकिन वे मीटिंग में समाधान ढूँढ रहे हैं। ममता अकेली हैं जो लॉकडाउन का डर दिखा रही हैं। उनका बयान सुनकर लोग पैनिक खरीदारी कर रहे हैं। LPG सिलेंडर की होर्डिंग बढ़ रही है। छोटे दुकानदार, ट्रांसपोर्ट वाले, गरीब परिवार सबसे ज्यादा परेशान हो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल के लोग जानते हैं कि ममता का रिकॉर्ड क्या है- संदेशखाली, टीएमसी के गुंडागर्दी, भर्ती घोटाले। अब ईंधन संकट को भी वोट में बदलने की कोशिश। लेकिन इस बार लोग समझ रहे हैं।

ममता का डर लोगों को नहीं, खुद को बचाने का है

ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार पर हमला कर रही हैं क्योंकि चुनाव आ रहे हैं। लेकिन असल में बंगाल की जनता महँगाई, बेरोजगारी, अपराध से परेशान है। ईंधन संकट राष्ट्रीय समस्या है। इसमें सबको साथ मिलकर लड़ना चाहिए। ममता अगर सच में चिंतित हैं तो राज्य में होर्डिंग रोकें, सप्लाई सुधारें, केंद्र के साथ मिलकर काम करें। लेकिन नहीं, वे तो बस डर फैलाकर वोट माँग रही हैं।

आम जनता के लिए सबसे जरूरी है कि वह अफवाहों से दूर रहे और केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करे। क्योंकि संकट के समय घबराहट नहीं, बल्कि समझदारी ही सबसे बड़ा हथियार होती है। वैसे भी, ममता बनर्जी की हरकतों को पूरा देश देख रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता भी देख रही है। डर की राजनीति अब पुरानी हो गई है। अब विकास और समाधान की राजनीति चाहिए। मोदी सरकार पहले की तरह इस संकट से भी देश को निकाल लेगी। ममता का डर सिर्फ चुनावी चाल है। लोग अब समझ चुके हैं।