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126 सीटों पर थमा प्रचार, 9 अप्रैल को मतदान, 4 मई को नतीजे: जानिए असम चुनाव के कौन से रहे मुद्दे, क्यों जीत की हैट्रिक की तरफ बढ़ती दिख रही BJP

असम में 9 अप्रैल 2026 को चुनाव को देखते हुए 7 अप्रैल की शाम 5 बजे चुनाव प्रचार थम गया। राज्य की सभी 126 सीटों पर गुरुवार को एक ही चरण में मतदान होगा। इस चुनाव में असमिया पहचान से लेकर मियाँ तक का मुद्दा राजनीति के केन्द्र में रहा।

राज्य में 2023 में हुए परिसीमन के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव हो रहा है। परिसीमन के बाद मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 29 से घट कर 22 रह गई है। इसका असर भी चुनाव में दिखेगा।

2021 विधानसभा चुनाव में एनडीए को 75 और कॉन्ग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थी। उस वक्त बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट कॉन्ग्रेस गठबंधन में शामिल थी, लेकिन इस बार अलग चुनाव लड़ रही है।

असम चुनाव में ‘मियाँ’ बना मुद्दा

असम चुनाव में मियाँ शब्द को लेकर जबरदस्त घमासान मचा। इस शब्द की गूँज कोर्ट में भी सुनाई दी। मुस्लिमों के खिलाफ अभियान चलाने का आरोप लगा कर सीएम हिमंता बिस्वा सरमा को कोर्ट में घसीटा गया। दिल्ली से लेकर असम तक एफआईआर दर्ज करवाई गई।

असम में मियाँ बंगाली मुस्लिम को कहते हैं, जो 150-200 साल पहले अंग्रेजों द्वारा लाकर यहाँ बसाए गए। ये लोग हिन्दू बहुल क्षेत्रों में बस गए और वहाँ की डेमोग्राफी बदल दी। सीएम हिमंता ने चुनाव में मियाँ को बाहर निकालने की अपील की। उन्होंने साफ कहा कि मियाँ लोगों को राज्य से बाहर करना उनका मकसद है। इस पर विपक्ष ने कड़ा विरोध जताया।

घुसपैठ और पहचान का मुद्दा

असम में बांग्लादेश से अवैध घुसपैठियों का मुद्दा भी अहम रहा है। यह राज्य में सबसे अधिक भावनात्मक रूप से संवेदनशील और राजनीतिक मुद्दों में से एक है। पीएम मोदी, गृहमंत्री शाह, सीएम हिमंता के साथ-साथ बीजेपी के दूसरे नेताओं ने चुनाव में घुसपैठियों के खिलाफ आवाज बुलंद की। बांग्लादेश से सीमा पार कर आने वाले लोगों की पहचान करना और उन्हें वापस भेजना बहुत बड़ा मुद्दा है। इसके कारण ही 1985 में असम समझौता हुआ था।

डेमोग्राफी में बदलाव के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने की जद्दोजहद कर रहे असम के मूलनिवासियों को इस मुद्दे ने आकर्षित किया है। जमीन पर इसका असर दिख रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी असम में ये मुद्दा बना था।

एनआरसी और सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा

असम के मूल निवासियों का सबसे बड़ा डर भाषाई और सांस्कृतिक अस्तित्व को बचाना है। इसके लिए एनआरसी को अंतिम रूप देना और अवैध प्रवासियों को बाहर निकालना जरूरी है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने 2025 में विधानसभा में बताया था कि राज्य में 2017 के बाद से 40 हजार से अधिक विदेशी नागरिकों की पहचान हुई है।

इसी पहचान के सवाल को सुलझाने के लिए असम में एनआरसी की प्रक्रिया शुरू हुई जो अभी तक पूरी नहीं हुई है।नागरिकता का सवाल भी सिर्फ कानूनी नहीं रह गया है, यह असम की राजनीति की धुरी बन गया।

भौगोलिक रूप से ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर और दक्षिण में बँटा असम राजनीतिक रूप से अपर असम, मिडिल असम, लोअर असम और बराक घाटी में विभाजित है।

बराक घाटी के मुसलमान, असमिया मुसलमान और लोअर असम के बांग्लाभाषी मुसलमानों की सामाजिक और राजनीतिक पहचान अलग-अलग है। बीजेपी ने मियाँ शब्द का इस्तेमाल कर बांग्लाभाषी मुसलमानों पर जमकर हमला किया है।

असम में सरकारी जमीनों से मुस्लिम प्रवासियों को बड़े पैमाने पर बेदखल किया गया है। इनमें से ज्यादातर बांग्लादेशी मुस्लिम बताए जाते हैं। इसका असर भी चुनाव में दिखेगा।

विकास का मुद्दा

असम चुनाव में विकास अहम मुद्दा है। केन्द्र की सहायता से राज्य में डबल इंजन सरकार काम कर रही है। विकसित असम के विजन को सरकार ने पेश किया है। राज्य की अर्थव्यवस्था काफी तेजी से आगे बढ़ी है। राज्य में सड़कों, पूलों, बुनियादी परियोजनाओं पर काफी खर्च किया गया है। जागीरोड में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स द्वारा लगभग ₹27,000 करोड़ के निवेश से सेमीकंडक्टर परियोजना शुरू की गई है यानी राज्य में सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह की परियोजनाएँ वोटरों को आकर्षित करेंगी।

असम की पारंपरिक ‘गमोचा’ को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलवाई। अहोम सेनापति लचित बोरफुकन की विरासत का सम्मान किया। राज्य में शिक्षा सुधार के तहत 402 मदरसों को प्राथमिक स्कूल में बदला गया और राज्य में बहुविवाह पर रोक लगाया गया

सीएम हिमंता और सीएम चेहरा गौरव गोगोई और उनकी पत्नियों से जुड़ा मुद्दा

कॉन्ग्रेस के सीएम पद का चेहरा और सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी पर बीजेपी ने पाकिस्तान से कनेक्शन के आरोप लगाए। गौरव गोगोई के पाकिस्तान यात्रा पर बीजेपी ने सवाल पूछे और उनकी पत्नी के पाकिस्तानी फर्म में काम करने और आईएसआई से कनेक्शन का आरोप भी लगाया।

इसके जवाब में चुनाव की तारीख नजदीक आते-आते कॉन्ग्रेस के नेता सीएम हिमंता सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयाँ सरमा पर तीन पासपोर्ट रखने का आरोप लगा दिया। कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर तीन देशों का पासपोर्ट रखने की बात कही। इसको लेकर हिमंता दंपति ने शिकायत दर्ज कराई। इसपर पवन खेड़ा के दिल्ली स्थित आवास पर असम पुलिस पूछताछ के लिए पहुँची। लेकिन पवन खेड़ा घर पर मौजूद नहीं थे।

चुनाव प्रचार थमने तक निजी आरोपों की झड़ी लग गई और कॉन्ग्रेस-बीजेपी के नेता एक-दूसरे पर आरोप लगाते दिखे। पिछले साल सिंगापुर में राज्य के मशहूर गायक जुबीन गर्ग की रहस्यमय हालात में मौत भी इस बार प्रमुख मुद्दा है।

ऑपिनियन पोल में बीजेपी को प्रचंड जीत

असम चुनाव को लेकर दो सर्वे की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है। इसमें मैट्रिज और चाणक्य स्ट्रैटजी शामिल हैं। मैट्रिज सर्वे के अनुसार, बीजेपी गठबंधन को वोट शेयर और सीटों दोनों बढ़त मिल रही है। वहीं कॉन्ग्रेस गठबंधन पीछे है, जबकि छोटे दलों का वोट कम है।

वोट शेयर

BJP: 46%
कॉन्ग्रेस: 36%
अन्य: 18%

सीट

BJP: 92-102
कॉन्ग्रेस: 22-32
अन्य: 4-7

चाणक्य के सर्वे के अनुसार, BJP गठबंधन बढ़त बनाता दिख रहा है। वहीं BJP गठबंधन के मुकाबले कॉन्ग्रेस आधी सीटें भी नहीं जीत पा रही है, जबकि छोटे दलों की सीटें इस सर्वे में भी कम ही हैं।

BJP: 83-90 सीटें
कॉन्ग्रेस: 30-36 सीटें
अन्य: 3-6 सीटें

इसके आधार पर कहा जा सकता है कि असम में सीएम हिमंता के नेतृत्व में तीसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ बीजेपी गठबंधन सरकार बनाने जा रही है, लेकिन इसका पता 5 मई 2026 को चलेगा, जब नतीजे आएँगे।

ब्राह्मण मुक्त तमिलनाडु: DMK-कॉन्ग्रेस-AIADMK-बीजेपी… किसी बड़ी पार्टी ने नहीं दिया टिकट, जानिए मद्रास प्रेसीडेंसी को पहला CM देने वाला समाज कैसे हाशिए पर पहुँचा

तमिलनाडु की राजनीति में आज एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। यहाँ के चुनाव में एक पूरा समुदाय यानी ब्राह्मण समाज पूरी तरह किनारे कर दिया गया है। 2026 के विधानसभा चुनाव (23 अप्रैल) के लिए जब पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की, तो एक हैरान करने वाली बात सामने आई। राज्य की बड़ी पार्टियाँ जैसे DMK और AIADMK, कॉन्ग्रेस तो छोड़िए, खुद को हिंदू धर्म का रक्षक बताने वाली भाजपा ने भी एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है।

यह सिर्फ चुनाव जीतने की कोई चाल नहीं है, बल्कि उस ‘द्रविड़ विचारधारा’ का असर है जो पिछले 100 सालों से तमिलनाडु में चल रही है। इस सोच ने वहाँ के समाज और राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है, जिससे अब ब्राह्मणों के लिए चुनाव लड़ना लगभग नामुमकिन सा हो गया है।

खत्म होती भागीदारी: राजनीति से क्यों गायब हुए ब्राह्मण?

तमिलनाडु की कुल आबादी में ब्राह्मणों का हिस्सा मात्र 3% के करीब है। भले ही इनकी संख्या कम रही हो, लेकिन आजादी के बाद के शुरुआती सालों में सरकारी दफ्तरों, अदालतों और राजनीति में इनका काफी दबदबा हुआ करता था। साल 1952 में मद्रास प्रेसीडेंसी के पहले मुख्यमंत्री सी राजगोपालाचारी (राजाजी) खुद एक ब्राह्मण थे। लेकिन धीरे-धीरे कामराज जैसे पिछड़े वर्गों के बड़े नेताओं के आने से राजनीति का रुख बदल गया और ब्राह्मणों का असर कम होने लगा।

एआईएडीएमके (AIADMK) की कमान जब तक जयललिता के हाथों में थी, तब तक ब्राह्मण समाज को राजनीति में अपनी जगह की उम्मीद रहती थी। जयललिता खुद एक तमिल ब्राह्मण परिवार से थीं। हालाँकि, उन्होंने अपनी पार्टी को पिछड़ी जातियों (OBC) के सहारे खड़ा किया, लेकिन वे समय-समय पर अपनी टीम में ब्राह्मण चेहरों को भी जगह देती थीं। वे कभी उन्हें चुनाव लड़ाती थीं तो कभी राज्यसभा भेजती थीं, जिससे इस समाज का प्रतिनिधित्व बना रहता था।

जयललिता के निधन के बाद अब समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। पिछले 35 सालों में यह पहली बार हुआ है कि AIADMK ने एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि भाजपा, जिसे आमतौर पर ब्राह्मणों की समर्थक पार्टी माना जाता है, उसने भी अपने हिस्से की 27 सीटों में से किसी पर भी इस समुदाय के व्यक्ति को मौका नहीं दिया। आज स्थिति यह है कि तमिलनाडु की मुख्य राजनीति में ब्राह्मण समाज का दखल लगभग खत्म हो गया है।

टिकट कटने की बड़ी वजह: पेरियार की ‘द्रविड़’ राजनीति का असर

तमिलनाडु की राजनीति से ब्राह्मणों के बाहर होने के पीछे कोई एक वजह नहीं है, बल्कि यह दशकों से चली आ रही एक सोच का नतीजा है। इसकी शुरुआत ईवी रामास्वामी ‘पेरियार’ के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ से हुई थी। पेरियार ने ब्राह्मणवाद और उत्तर भारत के प्रभाव को तमिल पहचान का दुश्मन बताया। उनकी इस सोच ने पिछड़ी जातियों (OBC) और दलित समाज में एक नई राजनीतिक चेतना पैदा कर दी, जिससे धीरे-धीरे सत्ता की चाबी इन वर्गों के हाथ में चली गई।

तमिलनाडु में आज 69% आरक्षण लागू है, जो देश में सबसे ज्यादा है। यहाँ की बड़ी पार्टियों (DMK और AIADMK) ने अपनी पूरी राजनीति पिछड़ी जातियों (जैसे वन्नियार, थेवर और गौंडर) को मजबूत करने पर टिका दी है। आज हालत यह है कि कोई भी पार्टी किसी ब्राह्मण को टिकट देने का रिस्क नहीं लेना चाहती। उन्हें डर लगता है कि अगर उन्होंने ऐसा किया, तो उनका मुख्य वोट बैंक (OBC और SC) नाराज हो जाएगा और संदेश जाएगा कि वे फिर से ‘ऊँची जाति’ को बढ़ावा दे रहे हैं।

जब राजनीति में जगह मिलना बंद हो गई, तो पिछले 30 सालों में बड़ी संख्या में ब्राह्मणों ने तमिलनाडु छोड़ दिया। इस समाज के लोग अब राजनीति के बजाय आईटी (IT), बैंकिंग और बड़े बिजनेस की ओर मुड़ गए हैं। बहुत से लोग बेंगलुरु, मुंबई या सीधे अमेरिका और यूरोप चले गए। उनके पुराने घर और इलाके (जिन्हें अग्रहारम कहा जाता था) अब बदल चुके हैं। आबादी कम होने और लोगों के बाहर चले जाने से अब वे एक बड़े ‘वोट बैंक’ के रूप में भी नहीं देखे जाते, जिससे पार्टियों के लिए उन्हें नजरअंदाज करना और आसान हो गया है।

‘सनातन’ पर छिड़ा संग्राम: ब्राह्मणों को ‘बाहरी’ बताने का खेल

तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मणों को अक्सर ‘आर्य’ या ‘बाहरी’ बताकर पेश किया जाता है, जबकि बाकी समुदायों को ‘असली द्रविड़’ (वहाँ का मूल निवासी) कहा जाता है। यह सोच वहाँ इतनी गहरी हो चुकी है कि ‘सनातन धर्म’ के खिलाफ बोलना अब राजनीति में एक बड़े हथियार की तरह इस्तेमाल होता है। पिछले कुछ सालों में डीएमके (DMK) के बड़े नेताओं ने सनातन धर्म को लेकर जो तीखे बयान दिए, उसने समाज के बीच की दूरी को और ज्यादा बढ़ा दिया है। द्रविड़ पार्टियाँ चाहती हैं कि लोग खुद को ‘हिंदू’ से ज्यादा अपनी ‘जाति’ (जैसे वन्नियार या थेवर) से जोड़कर देखें, ताकि भाजपा की हिंदुत्व वाली राजनीति वहाँ काम न कर सके।

तमिलनाडु में भाजपा ने भी एक कड़वी हकीकत को स्वीकार कर लिया है। उन्हें समझ आ गया है कि अगर वे केवल ‘ब्राह्मणों की पार्टी’ बनकर रहे, तो वहाँ कभी चुनाव नहीं जीत पाएँगे। इसीलिए भाजपा ने अब अन्नामलाई (जो पिछड़ी जाति गौंडर से आते हैं) जैसे नेताओं को आगे कर दिया है। पार्टी अब ब्राह्मणों को टिकट देने से परहेज कर रही है ताकि वह खुद को ‘द्रविड़ पहचान’ और पिछड़ों के करीब दिखा सके।

आज के दौर में तमिलनाडु का ब्राह्मण समाज एक अजीब और मुश्किल स्थिति में फँस गया है। उनके लिए यह ‘दोहरी मार’ जैसा है। एक तरफ DMK जैसी द्रविड़ पार्टियाँ उन्हें अपना पुराना ‘वैचारिक दुश्मन’ मानती हैं और उन्हें मुख्यधारा से बाहर रखना चाहती हैं। दूसरी तरफ BJP, जो कभी उनकी सबसे बड़ी समर्थक मानी जाती थी, अब उन्हें ‘चुनावी बोझ’ समझने लगी है। BJP को लगता है कि ब्राह्मणों को ज्यादा तवज्जो देने से उनका पिछड़ी जातियों का वोट बैंक खिसक सकता है। नतीजा यह है कि आज कोई भी बड़ी पार्टी उनके साथ खड़ी होने को तैयार नहीं है।

छोटी पार्टियों की ‘ब्राह्मण’ रणनीति

जहाँ तमिलनाडु की बड़ी पार्टियाँ जैसे DMK, AIADMK और यहाँ तक कि BJP ने भी ब्राह्मणों से दूरी बना ली है, वहीं कुछ नई और छोटी पार्टियाँ एक अलग रास्ता चुन रही हैं। इन पार्टियों को लगता है कि अगर बड़े दल ब्राह्मणों को टिकट नहीं दे रहे, तो वे इस समाज को अपने पाले में लाकर एक नया समीकरण बना सकते हैं। इसी सोच के साथ अभिनेता विजय और नेता सीमन ने अपनी-अपनी पार्टियों से ब्राह्मणों को चुनावी मैदान में उतारा है।

राजनीति में आए सुपरस्टार विजय की पार्टी ‘TVK’ ने दो ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाया है। विजय का मकसद यह संदेश देना है कि उनकी पार्टी किसी खास समुदाय के खिलाफ नहीं है, भले ही वे पेरियार की विचारधारा को मानते हों। दूसरी तरफ, तमिल राष्ट्रवादी नेता सीमन की पार्टी ‘NTK’ ने सबको चौंकाते हुए 6 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया है। सीमन ने श्रीरंगम और मायलापुर जैसी जगहों को चुना है जहाँ ब्राह्मण वोट काफी मायने रखते हैं।

सीमन की राजनीति पेरियार की ‘द्रविड़’ सोच के खिलाफ है। उनका कहना है कि वे ‘द्रविड़ दीवार’ को गिराने के लिए ‘ब्राह्मण कडाप्परई’ (यानी लोहे की एक मजबूत छड़ या सब्बल) का इस्तेमाल करेंगे। सीमन का मानना है कि तमिलनाडु में रहने वाला हर व्यक्ति पहले ‘तमिल’ है, चाहे उसकी जाति कुछ भी हो। यह राज्य की राजनीति में एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि जिस ब्राह्मण समुदाय को द्रविड़ आंदोलन ने दशकों पहले किनारे कर दिया था, आज एक तमिल राष्ट्रवादी नेता उन्हें अपनी पहचान का हिस्सा बताकर गले लगा रहा है।

क्या ब्राह्मण केवल ‘वोटर’ बनकर रह जाएँगे?

तमिलनाडु की आज की राजनीति को देखकर साफ लगता है कि 3% आबादी वाला ब्राह्मण समाज अब ‘सत्ता चलाने’ के बजाय केवल एक ‘खामोश वोटर’ बनकर रह गया है। जहाँ कभी इस समाज के बड़े नेता राज्य की किस्मत तय करते थे, वहीं आज 160 से ज्यादा बड़े उम्मीदवारों में से केवल 3-4 ब्राह्मणों का होना यह बताता है कि उन्हें चुनावी रेस से लगभग बाहर कर दिया गया है। यह एक तरह का ‘राजनीतिक वनवास’ है, जहाँ उनकी आवाज अब विधानसभा में सुनाई देना बहुत मुश्किल हो गया है।

राज्य की बड़ी पार्टियों का यह रवैया साफ कर देता है कि अब तमिलनाडु में चुनाव जीतने के लिए योग्यता से ज्यादा ‘जाति की संख्या’ और ‘द्रविड़ पहचान’ मायने रखती है। वन्नियार, थेवर और गौंडर जैसी बड़ी जातियों के भारी वोट बैंक के सामने ब्राह्मणों की कम संख्या उन्हें राजनीतिक रूप से ‘कमजोर’ बना देती है। पार्टियों को लगता है कि इन्हें टिकट देने से कोई बड़ा फायदा नहीं होगा, बल्कि दूसरी बड़ी और प्रभावशाली जातियाँ नाराज हो सकती हैं।

तमिलनाडु का यह ‘ब्राह्मण मुक्त’ चुनावी मॉडल भारत के बाकी राज्यों के लिए भी एक बहुत बड़ा उदाहरण या चेतावनी है। यह दिखाता है कि कैसे जातियों को एकजुट करके किसी एक वर्ग को पूरी तरह किनारे लगाया जा सकता है। अगर यही तरीका देश के दूसरे राज्यों में भी फैल गया, तो भविष्य में चुनाव विकास या काम पर नहीं, बल्कि केवल जातियों के सिर गिनने और एक-दूसरे के विरोध पर टिक जाएँगे।

घर में लोगों को जमा कर नहीं पढ़ सकते नमाज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूँ हीं नहीं दिया फैसला, जानिए- इसके खतरे कितने बड़े?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में निजी संपत्ति में भीड़ जुटाकर नमाज अदा करने पर रोक लगा दी है। जस्टिस गरिमा प्रसाद और जस्टिस सरल श्रीवास्तव की बेंच ने 25 मार्च 2026 को यह फैसला दिया। यह मामला बरेली में एक मुस्लिम शख्स द्वारा अपने घर में नमाज के लिए भीड़ जुटाने से जुड़ा था और याचिकाकर्ता ने कोर्ट में कहा कि वह निजी संपत्ति में नमाज के लिए बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा नहीं करेगा।

हाईकोर्ट के इस फैसले को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि खाली जगह पर नमाज पढ़ने या प्रेयर करने की आड़ में धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने का एक पैटर्न रहा है। हाईकोर्ट का यह फैसला अगर नजीर की तरह लिया जाता है और देशभर में इस पर अमल किया जाता है तो यह डेमोग्राफी में बदलाव और धर्मांतरण से जुड़ी कई समस्याओं पर लगाम लग सकती है।

‘शांति-व्यवस्था को खतरा’: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?

आरोपित अपने घर में दर्जनों लोगों को बुलाकर नमाज पढ़वा रहा था और इससे कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो गई थी। इसके बाद पुलिस की कार्रवाई हुई और यह मामला कोर्ट में पहुँच गया। इस मामले के याचिकाकर्ता का कहना था कि पुलिस की कार्रवाई सही नहीं है। वहीं पुलिस ने इस कार्रवाई को कानून-व्यवस्था के लिए जरूरी बताया।

25 मार्च को हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने वचन दिया कि वह इस मामले से जुड़ी संपत्ति पर नमाज पढ़ने के लिए बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा नहीं करेगा। वहीं, इस मामले में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वचन का उल्लंघन करने पर पुलिस को कार्रवाई करने की छूट दी।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “अगर याचिकाकर्ता इस वचन का उल्लंघन करता है और बड़ी संख्या में लोगों को वहाँ नमाज के लिए इकट्ठा करता है, जिससे इलाके में शांति और व्यवस्था बिगड़ने का खतरा होता है तो संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे।”

वहीं, कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार के अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता और अन्य लोगों के खिलाफ जारी चालान वापस लिया जाए। साथ ही, अवमानना (कंटेम्प्ट) के जो नोटिस जारी किए गए थे उन्हें भी कोर्ट ने समाप्त कर दिया है। याचिकाकर्ता की सुरक्षा को वापस लेते हुए कोर्ट ने यह याचिका निस्तारित कर दी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

क्या है यह पूरा मामला?

इस मामले की शुरुआत 16 जनवरी 2026 को बिशारतगंज थाना क्षेत्र के मोहम्मदगंज गाँव से हुई। वहाँ एक निजी खाली घर में सामूहिक नमाज पढ़े जाने से जुड़े कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए और पुलिस ने शिकायत के आधार पर कार्रवाई करनी शुरू की। पुलिस ने इसे बाद 18 जनवरी 2026 को नमाज अदा करने के आरोप में 12 मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में लिया।

इसके बाद सोशल मीडिया पर बहस शुरु हो गई। लेफ्ट-लिबरल गिरोह ने सोशल मीडिया पर यह दावा करना शुरू कर दिया कि इन लोगों को नमाज पढ़ने के लिए गिरफ्तार किया गया है। दावा किया जाने लगा कि पुलिस अब घरों के अंदर इबादत करने वाले नागरिकों को परेशान कर रही है। मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने के लिए ‘विक्टिमहुड’ का एजेंडा सोशल मीडिया पर चलाया जाने लगा। हालाँकि, अधूरा सच और प्रोपेगेंडा था।

पुलिस ने बताया कि इन लोगों को गिरफ्तार नहीं किया गया है बल्कि एहतियाती तौर पर हिरासत में लिया गया है। एसपी अंशिका वर्मा ने स्पष्ट किया कि संदिग्ध मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में लेना केवल एहतियातन उठाया गया कदम था। यह कार्रवाई उस समय की गई जब पुलिस को मोहम्मदगंज गाँव के निवासियों से जानकारी मिली कि पिछले कुछ हफ्तों से एक खाली पड़े घर का उपयोग मदरसे के रूप में किया जा रहा है। ग्रामीणों ने यह भी शिकायत की थी कि बिना प्रशासनिक अनुमति के वहाँ नियमित रूप से सामूहिक नमाज अदा की जा रही थी।

‘अवैध मदरसे’ से परेशान थे ग्रामीण

पुलिस ने यह कार्रवाई ऐसे ही नहीं कर दी थी। पुलिस ने ग्रामीणों की लगातार चिंता पर यह कदम उठाया था। ग्रामीणों ने इस मामले में पुलिस-प्रशासन को 29 दिसंबर 2025 को ग्रामीणों ने उप-जिलाधिकारी को दी शिकायत में बताया कि मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अवैध रूप से मदरसा का निर्माण करा लिया है जो गलता है क्योंकि इसके लिए किसी से कोई अनुमित नहीं ली गई है। ग्रामीणों ने शिकायत में कहा कि उन्हें धमकाया भी जा रहा है और उन्होंने इसकी जाँच कराए जाने की माँग की।

29 दिसंबर 2025 को दिया गया पत्र

ग्रामीणों ने 8 जनवरी 2026 को बरेली के SSP को भी पत्र लिखा था। ग्रामीणों ने अवैध मदरसे का निर्माण कराए जाने पर कार्रवाई करने की माँग की थी। इसमें कहा गया कि मुस्लिम लोगों ने गाँव में मकान का बहाना बनाकर मदरसा का निर्माण करा दिया है।

8 जनवरी 2026 को SSP को लिखा गया पत्र

16 जनवरी को नमाज पढ़े जाने के बाद भी उसके अगले दिन यानी 17 जनवरी 2026 को ग्रामीणों ने पत्र लिखकर कार्रवाई की माँग की। ग्रामीणों ने उप-जिलाधिकारी को लिखे पत्र में कहा, “मुस्लिम समुदाय के लोगों ने गाँव में मदरसा का निर्माण करा लिया है जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोग नमाज अदा करते हैं और किसी से कोई अनुमति नहीं ली गई है।”

उन्होंने आगे लिखा, “विरोध करने पर हनीफ के मकान में अवैध रूप से नमाज अदा करते हुए पकड़े गए हैं। 15 लोगों को पुलिस ने पकड़ा है और कई भाग गए हैं। मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा अवैध रूप से नमाज अदा की जा रही है, उसे रुकवाया जाए और अवैध रूप से बने मदरसे को ध्वस्त किया जाए।”

17 जनवरी को उप-जिलाधिकारी को दिया गया पत्र

तारिक खान नामक शख्स ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका डाली थी। जिसेक बाद अदालत ने बरेली के जिलाधिकारी अविनाश सिंह और SSP अनुराग आर्य के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। कोर्ट ने इस मामले में यूपी सरकार को फटकार भी लगाई और अब जुर्माना भी लगाया है। हालाँकि, यूपी सरकार ने कोर्ट में दावा किया है कि उस जगह पर नमाज पढ़ने पर रोक नहीं लगाई गई है।

घरों में नमाज-प्रेयर: मस्जिद-चर्च की नींव

इस विषय पर तर्क रखें उससे पहले जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश उदाहरणों के जरिए करते हैं। दिल्ली के ब्रह्मपुरी में एक मस्जिद है ना है अल-मतीन। यह मस्जिद बनने की प्रक्रिया इस साजिश को दिखाने के लिए काफी है। 2013 में यहाँ मुस्लिमों ने एक फ्लैट खरीदा, धीरे-धीरे वहाँ लोग नमाज पढ़ने आने लगे जैसा बरेली में हो रहा है। बाद में यह मस्जिद बन गई और कुछ समय बाद यह मस्जिद 4 मंजिला बना दी गई। कुछ वर्षों बाद बगल के प्लाट को खरीदकर इसे विस्तार देने और मंदिर के ठीक सामने इसका गेट बनाने की कोशिशें शुरू हो गईं। ये कहानी राष्ट्रीय राजधानी की है लेकिन देशभर में हालात यहीं है।

गुजरात के सूरत में 2022 में एक ऐसा ही मामला सामने आया था। वहाँ ‘शिव शक्ति सोसाइटी’ में कुछ प्लॉट्स मुस्लिमों ने खरीदे और वहाँ भी यही सिलसिला शुरू हुआ। लोग आते, नमाज पढ़ते और बात आगे बढ़ती रही। बाद में जब स्थानीय लोगों ने इस पर आपत्ति जताई तो मुस्लिमों ने दावा किया गया कि यह जमीन वक्फ बोर्ड की है और यहाँ अब मस्जिद-मदरसा है। यह प्लॉट की जमीन मुस्लिमों के लिए पवित्र हो गई। इस जमीन को वक्फ को मिली असीम ताकत के जरिए मस्जिद बना दिया गया और शिकायत करने वालों के लिए मुँह ताकते के अलावा कोई चारा नहीं बचा था।

ऐसा ही मामला हिमाचल प्रदेश के शिमला से भी सामने आया। मोहम्मद सलीम नाम का एक व्यक्ति 1990 में संजौली आया। उसने उस सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया, जहाँ पहले एक स्कूल था जिसे बाद में कहीं और स्थानांतरित कर दिया गया था। उसने वहाँ एक मंजिला ढाँचा बनाया, जो धीरे-धीरे कई मंजिलों की इमारत में बदल गया। बाद में उसने इसे मस्जिद का रूप दे दिया और वक्फ बोर्ड से NOC भी हासिल कर ली। यह एक मंजिला ढाँचा बढ़कर 5 मंजिला मस्जिद बन गया और नमाज पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी। इसके साथ ही टकराव भी शुरू हो गया।

ईसाइयों में भी यह ट्रेंड देखने को मिलता है। वहाँ भी घरों में प्रार्थना सभाओं और उनकी आड़ में धर्मांतरण के खूब मामले सामने आते हैं। शुरुआत अक्सर बहुत साधारण तरीके से होती है।

किसी व्यक्ति के घर में कुछ लोग इकट्ठा होकर प्रार्थना करते हैं। यह आयोजन छोटा होता है और स्थानीय स्तर पर ज्यादा ध्यान नहीं खींचता। धीरे-धीरे इसमें शामिल होने वालों की संख्या बढ़ने लगती है। नियमित तौर पर लोग जुटने लगते हैं और वहाँ लाउडस्पीकर, कुर्सियां, बैनर और अन्य व्यवस्थाएँ होने लगती हैं, जिससे वह स्थान एक चर्च का रूप ले लेता है। उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा और छत्तीसगढ़ तक ऐसे हजारों मामले सामने आए हैं।

क्यों खतरनाक है घरों में नमाज-प्रेयर का ट्रेंड?

आपने उदाहरण देखे हैं कि किस तरह घर से शुरू होने वाली ये मजहबी गतिविधियाँ धीरे-धीरे स्थायी मजहबी ढाँचों में बदल जाती हैं। यह बहस आस्था से आगे बढ़कर कानून से लेकर डेमोग्राफी के संतुलन और धर्मांतरण की भी है।

शुरुआत अक्सर बेहद सामान्य दिखती है। किसी घर में कुछ लोग इकट्ठा होकर नमाज पढ़ते हैं या प्रार्थना सभा करते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है तो इन सभाओं का स्वरूप बदलने लगता है। लोगों की संख्या बढ़ती है और यह नियमित होने लगता है। धीरे-धीरे घर मजहबी स्थल बन जाता है। इसके बाद अगला चरण आता है और फिर बाहर से मौलवियों-उलेमाओं या पादरियों का आना शुरू हो जाता है। फिर तकरीरों और प्रवचनों का दौर शुरू होता है।

जैसे जैसे यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो डेमोग्राफी असंतुलन की कोशिशें शुरू हो जाती हैं। पहले मस्जिद या चर्च के आस-पास मुस्लिमों और ईसाइयों को बसाया जाता है और फिर वहाँ रहने वालें हिंदुओं के साथ टकराव होने लगता है। धीरे-धीरे वहाँ पर अल्पसंख्यक हो गए हिंदू समुदाय को परेशान किया जाता है और फिर मजबूर कर दिया जाता है कि वो वहाँ से चले जाएँ। या अपना मजहब बदल लें। लालच देकर और ताकत के जरिए मतांतरण की खूब कोशिशें होती हैं। मकानों के बाहर बिक्री के पोस्टर लगाए जाने से जुड़ी खूब खबरें आपने पढ़ी होंगी।

हिंदुओं के हितों को देखना भी अदालत की जिम्मेदारी

अदालत के सामने यह सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं है बल्कि भारत के सामाजिक संतुलन और हिंदुओं के अधिकारों से जुड़ा सवाल भी था। इस फैसले से लगता है कि कोर्ट को जमीनी वास्तविकताओं का शायद अंदाजा रहा होगा। कोर्ट सिर्फ कानून की व्याख्या नहीं करती बल्कि उस फैसले का सीधा असर आम लोगों के जीवन, उनकी सुरक्षा, उनकी आस्था और उनके अधिकारों पर पड़ता है।

दिल्ली, गुजरात और हिमाचल प्रदेश के उदाहरण बताते हैं कि समस्या वास्तविक है। इस समस्या की शुरुआत में ही अगर हिंदू समाज प्रशासन के पास जाता है तो उसे कह दिया जाता है कि अभी कोई जमीनी परिवर्तन नहीं दिख रहा है तो अभी खतरा भी नहीं है।

वहीं, जब वही गतिविधियाँ आगे चलकर स्थायी हो जाती हैं और तब अगर कोई शिकायत करने जाता है तो कहा जाता है कि एक स्थापित चर्च, मस्जिद है या वक्फ संपत्ति है तो इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। यह एक तरह का ‘कानूनी चक्रव्यूह’ बन जाता है जिसमें आम हिंदू समाज फँस जाता है। यदि किसी विशेष इलाके में हिंदू समुदाय खुद के लिए खतरा देखता है, खुद को असुरक्षित नजर पाता है तो यह भी अदालत का ही काम है कि उसे सुरक्षित महसूस हो। उसके साथ न्याय हो।

कॉन्ग्रेस से जुड़े वकील मोहम्मद अली खान ने X यूजर्स से डिलीट करवाए पोस्ट: जानिए क्यों कोर्ट को नहीं देना चाहिए था यह आदेश

ऑपइंडिया ने 6 अप्रैल को मेटा इंडिया की पब्लिक पॉलिसी टीम के बारे में प्रकाशित अपना लेख हटा दिया है। यह कदम लॉ फर्म शेरगिल, होडा एंड नासिर द्वारा उनके मुवक्किलों-कॉन्ग्रेस से जुड़े अधिवक्ता मोहम्मद अली खान और उनकी बीवी प्रियंका राव खान (मेटा की पूर्व कर्मचारी) की ओर से दायर मुकदमे के बाद उठाए गए कानूनी कदमों के तहत उठाया गया है।दिल्ली उच्च न्यायालय ने 15 अप्रैल 2026 को इस मामले CS(OS) 318/2026 में एक अंतरिम रोक का आदेश जारी किया था।

हम यह लेख इसलिए नहीं हटा रहे हैं कि हमें अपनी रिपोर्टिंग के सही होने पर कोई शक है, बल्कि इसलिए हटा रहे हैं क्योंकि हम अदालत के आदेशों और कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करते हैं (जो आदेश तीसरे पक्षों पर भी लागू होते हैं)। हालाँकि, हम अपने पाठकों को अदालत के आदेशों और अपने लेख के उन बुनियादी तथ्यों के बारे में बताना चाहते हैं, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों पर आधारित थे और आज भी वो सच हैं।

मुकदमे की पृष्ठभूमि

भारत के सर्वोच्च न्यायालय में लगभग दो दशकों के अनुभव वाले कॉन्ग्रेस से जुड़े एक अधिवक्ता मोहम्मद अली खान और उनकी बीवी, वादी संख्या 2, जो मेटा इंडिया में एक पूर्व पब्लिक पॉलिसी मैनेजर थीं और जिन्होंने 20 जनवरी 2026 को इस्तीफा दे दिया था (प्रियंका राव-खान), ने माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष यह मुकदमा दायर किया।

केस में X कॉर्प, @Jhunjhunuwalaऔर@mujifren` हैंडल का उपयोग करने वाले दो अनाम सोशल मीडिया अकाउंट, और अज्ञात व्यक्तियों या बॉट्स का प्रतिनिधित्व करने वाले ‘जॉन डो’ को प्रतिवादी बनाया गया है। वादियों का कहना है कि उनके खिलाफ एक सुनियोजित, संगठित और ‘सांप्रदायिक रूप से भड़काने वाला’ मानहानि अभियान चलाया गया है। उन्होंने इसके लिए हर्जाने की माँग की है, साथ ही X Corp. से इन पोस्टों को हटाने और इन अनाम अकाउंट्स के पीछे के लोगों की पहचान उजागर करने के लिए अनिवार्य आदेशों की माँग की है।

15 अप्रैल 2026 को, माननीय न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने प्रतिवादियों को सूचित किए बिना पूरी तरह से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से तत्काल अंतरिम राहत के आवेदन पर सुनवाई की। कानून में इस प्रक्रिया को एकतरफा सुनवाई (ex-parte hearing) कहा जाता है। विवादित ट्वीट्स की समीक्षा करने के बाद, अदालत ने पाया कि वे प्रथम दृष्टया ‘अश्लील, अपमानजनक और सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ’ थे।

अदालत ने एक व्यापक अंतरिम रोक जारी की, जिसमें न केवल सूचीबद्ध प्रतिवादियों, बल्कि किसी भी तीसरे पक्ष को विवादित सामग्री को प्रसारित करने से प्रतिबंधित कर दिया गया। इसी क्रम में OpIndia, जिसका शिकायत में नाम नहीं था, जिसे सुना नहीं गया था, और जिसे अदालत के समक्ष अपना संपादकीय तर्क प्रस्तुत करने का अवसर नहीं दिया गया था, को आदेश पारित होने के कुछ ही दिनों के भीतर हमारे लेख को हटाने का अनुरोध करने वाला एक कानूनी नोटिस प्राप्त हुआ।

संदर्भ के लिए, यद्यपि कानूनी पाबंदी के कारण विवादित ट्वीट्स को यहाँ दोबारा नहीं छापा जा सकता, लेकिन X पर मुख्य चर्चा यह थी कि मेटा (फेसबुक/इंस्टाग्राम) भाजपा समर्थकों और हिंदू अधिकारों की बात करने वालों के खिलाफ भेदभाव या पक्षपात करता है।

विवादित ट्वीट्स को कानूनी कारणों से यहाँ दोबारा नहीं छापा जा सकता, लेकिन X (ट्विटर) पर चल रही मुख्य चर्चा का सार यह था कि मेटा (META) भाजपा समर्थकों और हिंदू अधिकारों के मुद्दे पर पोस्ट करने वाले लोगों के खिलाफ भेदभाव या पक्षपात कर रहा था।

X पर कई लोगों ने यह आरोप लगाया था कि यह पक्षपात मेटा की पूर्व अधिकारी प्रियंका राव-खान और उनके पति मोहम्मद अली खान (जो कांग्रेस से जुड़े हैं) के प्रभाव के कारण हो रहा था। इस बात की पुष्टि मोहम्मद अली खान के उस ट्वीट से भी होती है जो आज भी उनके X अकाउंट पर मौजूद है। हालांकि, यह साफ नहीं है कि खान को X पर लिखी गई वे बातें (जो अब हटा दी गई हैं) मानहानिकारक क्यों लगीं।

यदि अदालत में सुनवाई का मौका दिया जाता, तो X पर हुई इस पूरी बातचीत को एक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप माना जा सकता था, जिसका अदालत में कानूनी बचाव किया जा सकता था। दिलचस्प बात यह है कि कॉन्ग्रेस पार्टी खुद भी पहले कई बार मेटा (फेसबुक) पर भेदभाव और पक्षपात करने के आरोप लगा चुकी है। ऐसे में यह बात समझ से बिल्कुल परे है कि कॉन्ग्रेस से जुड़ा एक वकील उन्हीं आरोपों को अपने खिलाफ लगाए जाने पर न केवल ‘मानहानिकारक’ (बदनामी करने वाला) मान रहा है, बल्कि उसे ‘सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील’ भी बता रहा है।

कोर्ट ने वास्तविकता में क्या कहा

प्रथम दृष्टया, न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद का आदेश एक Ex-parte Ad-interim Injunction है। इसका मतलब है कि यह एक अस्थायी रोक है जो आपात स्थिति में दूसरे पक्ष को सुने बिना दी जाती है। भारतीय कानून में यह प्रक्रिया तय है और इसका मकसद पूरी सुनवाई होने तक किसी का नुकसान होने से रोकना होता है।

यहाँ अदालत के क्षेत्राधिकार के प्रयोग की आलोचना करने का कोई इरादा नहीं है; यह एक अच्छी तरह से स्थापित प्रक्रियात्मक व्यवस्था है। फिर भी, भारतीय न्यायशास्त्र में यह भी भली-भांति स्थापित है कि एकतरफा आदेश दोषसिद्धि का फैसला या अंतिम तथ्यात्मक निर्धारण नहीं होता है। पूरी सुनवाई का इंतजार करते समय अपूरणीय क्षति से बचने के लिए, यह एक जरूरी और शुरुआती (prima facie) मूल्यांकन होता है।

अदालत ने अपने आदेश के पैराग्राफ 16 में लिखा-“इस कोर्ट की प्रथम दृष्टया राय में”। इसका कानूनी मतलब यह है कि यह अदालत का शुरुआती और अनंतिम विचार है, अंतिम फैसला नहीं। अभी तक प्रतिवादियों को सुना नहीं गया है, सबूतों की जाँच या गवाहों की जिरह नहीं हुई है। इस मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई 2026 को तय है।

इस मामले में यह ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है कि प्रतिवादियों और ‘उनकी ओर से काम करने वाले’ किसी भी व्यक्ति को पैराग्राफ 21 के तहत निषेधाज्ञा (injunction) द्वारा कथित तौर पर मानहानिकारक सामग्री वितरित करने से प्रतिबंधित किया गया है। पैराग्राफ 24 में, इसे ‘जनता के किसी भी सदस्य’ को शामिल करने के लिए विस्तारित किया गया है।

ऐसे अनाम तीसरे पक्ष (जैसे पत्रकार या मीडिया संस्थान) जिन्हें अदालत में कभी सुना ही नहीं गया, उन पर इस तरह का व्यापक प्रतिबंध लगाना प्रक्रियात्मक न्याय के खिलाफ सवाल खड़ा करता है। इस तरह के व्यापक प्रतिबंध, विशेष रूप से वे जो पत्रकारिता की रिपोर्टिंग को प्रतिबंधित करते हैं, ऐतिहासिक रूप से उच्च अदालतों की आलोचना का शिकार हुए हैं, और भारत का प्रेस पर पूर्व प्रतिबंध कानूनअभी भी एक विकासशील और विवादास्पद क्षेत्र है।

OpIndia इस मामले में कोई पक्षकार (party) नहीं है। हमें अदालत को अपनी संपादकीय प्रक्रिया पेश करने का मौका नहीं दिया गया, न ही हमें कोई नोटिस दिया गया या सुना गया। वादियों के कानूनी वकील ने इस रोक के आदेश का उपयोग 17 अप्रैल 2026 को जारी कानूनी नोटिस में लेख हटाने का अनुरोध करने के औचित्य के रूप में किया। उस अनिवार्यता को हम गंभीरता से लेते हैं। हालाँकि, हम सम्मानपूर्वक यह भी बताते हैं कि क्या किसी ऐसे मीडिया आउटलेट पर स्थगनादेश लागू किया जाना चाहिए जिसने स्वतंत्र रूप से रिपोर्ट की और जो मुकदमे में प्रतिवादी नहीं था, यह विषय अभी भी बहस का मुद्दा है।

क्या हैं तथ्य

हमारा मूल लेख काफी हद तक उन तथ्यों पर आधारित था जिन्हें आसानी से जाँचा जा सकता था, साथ ही उन सोशल मीडिया पोस्टों पर जो आम जनता के लिए उपलब्ध थीं-जिसमें कांग्रेस से जुड़े वकील मोहम्मद अली खान का अपना ट्वीट भी शामिल है। हम ध्यान दिलाते हैं कि दो मुख्य स्रोत, X अकाउंट्स @Jhunjhunuwala_ और @mujifren, इस मुकदमे में प्रतिवादी के रूप में दर्ज हैं और अदालत ने स्पष्ट रूप से उन पोस्टों को हटाने का आदेश दिया है।

चूँकि वे ट्वीट्स हटा दिए गए हैं, इसलिए ऑपइंडिया (OpIndia) भी उन ट्वीट्स पर आधारित सामग्री को हटाने के लिए कानूनी रूप से अदालत के आदेश से बंधा हुआ था। हालाँकि, हमारी रिपोर्ट की कुछ जानकारियाँ प्रकाशन के समय सार्वजनिक रिकॉर्ड पर आधारित थीं और वे केवल उन अनाम अकाउंट्स पर निर्भर नहीं थीं। हम उन्हें यहाँ रिकॉर्ड के तौर पर रखते हैं

पहला तथ्य यह है कि मोहम्मद अली खान (पहले वादी) भारत के सर्वोच्च न्यायालय में वकील हैं, जो अपने X पेज पर सार्वजनिक रूप से खुद को भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की मीडिया टीम का सदस्य लिखते हैं। यह उनका अपना घोषित जुड़ाव है, न कि आलोचकों द्वारा उन पर लगाया गया कोई ठप्पा।

दूसरा तथ्य अदालत के अपने आदेश के पैराग्राफ 2 से आता है, जिसके अनुसार वादी संख्या 2 (प्रियंका राव-खान) ने 20 जनवरी 2026 को मेटा इंडिया की पब्लिक पॉलिसी टीम छोड़ दी थी। अदालत के शब्दों में, वे ’20 जनवरी 2026 को अपने इस्तीफे तक मेटा इंडिया की पब्लिक पॉलिसी टीम (विशेष रूप से ऑनलाइन महिला और बाल सुरक्षा नीति) से जुड़ी हुई थीं।’

तीसरा तथ्य यह है कि अदालत के आदेश के पैराग्राफ 2 में ही यह भी पुष्टि की गई है कि दोनों वादी आपस में पति-पत्नी हैं। इसलिए, किसी अनाम ट्वीट के बजाय दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष वादियों की अपनी दलीलें ही इस बात को साबित करती हैं। यह जानकारी किसी नीतिगत और प्रभाव वाले पद पर रहते हुए संभावित ‘हितों के टकराव’ (Conflict of Interest) के संदर्भ में लिखे गए हमारे लेख का मुख्य हिस्सा थी।

मूल रूप से, यह जानना पूरी तरह से जनहित का विषय है कि क्या किसी बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कार्यरत एक पब्लिक पॉलिसी मैनेजर- जिसका करोड़ों भारतीय उपयोगकर्ताओं को प्रभावित करने वाले नियमों व फैसलों पर महत्वपूर्ण प्रभाव होता है- का अपने जीवनसाथी की सक्रिय राजनीतिक भूमिका के कारण कोई संभावित ‘हितों का टकराव’ है या नहीं।

यह एक ऐसा सवाल है जिसे एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नियामक, निगरानी संस्थाएं और आम नागरिक उन संस्थानों से नियमित और सही रूप से पूछते हैं जिनका सार्वजनिक चर्चाओं पर प्रभाव होता है। यह सवाल उठाना मानहानि नहीं है, इसी को जवाबदेह पत्रकारिता (Accountability Journalism) कहा जाता है।

मोहम्मद अली खान द्वारा अस्पष्ट विक्टिम-कार्ड खेलना

अदालत ने अपनी समझ और बुद्धिमत्ता से इस मामले की सुनवाई चलने के दौरान पोस्ट्स को हटाने का एकतरफा अंतरिम आदेश (ex-parte injunction) देना उचित समझा। हालाँकि, यहाँ सबसे अधिक चिंताजनक बात मोहम्मद अली खान द्वारा किए गए दावे हैं, जिन्हें आखिरकार अदालत ने भी स्वीकार कर लिया।

X (ट्विटर) पर चल रही पूरी चर्चा इस बात के इर्द-गिर्द थी कि कैसे कॉन्ग्रेस से जुड़े एक वकील और उनकी पत्नी संभवतः META को अपने वैचारिक विरोधियों के खिलाफ पक्षपाती बनाने में भूमिका निभा रहे थे। ये आरोप उन आरोपों से अलग नहीं हैं जो कॉन्ग्रेस पार्टी खुद अतीत में मेटा पर लगा चुकी है। इसलिए, यह बात समझ से परे है कि जब वही आरोप मोहम्मद अली खान के खिलाफ लगाए जाते हैं, तो उन्हें ‘सांप्रदायिक’ मान लिया जाता है, जबकि जब खान की अपनी पार्टी (कॉन्ग्रेस) यही आरोप लगाती है, तो उसे महज एक ‘संदेह’ माना जाता है।

इसलिए, यह स्पष्ट रूप से खान द्वारा अपनी मजहबी पहचान का दुरुपयोग करने जैसा है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनकी बीवी (मेटा की पूर्व कर्मचारी) और वे खुद (उनके कॉन्ग्रेस से संबंध रखने वाले) के बारे में आम जनता कोई सवाल न उठा सके।

मूल रूप से, पीड़ित कार्ड (victim-playing) खेलकर कानूनी व न्यायिक प्रक्रिया को भटकाने के लिए धार्मिक पहचान का इस्तेमाल करना कोई नई बात नहीं है। लेकिन जहाँ तक सार्वजनिक आलोचना का सवाल है, अदालत ने इस आदेश के ज़रिए एक खतरनाक मिसाल पर अपनी मुहर लगा दी है, जिसका इस्तेमाल भविष्य में अन्य गलत इरादे वाले लोग भी कर सकते हैं।

हमें इसमें कोई हैरानी नहीं होगी अगर X पर संबंधित हैंडल द्वारा की गई अन्य असंबंधित पोस्टों का इस्तेमाल खान द्वारा अपने खिलाफ धार्मिक पूर्वाग्रह का आरोप लगाने के लिए किया गया हो, और अदालत को अपने पक्ष में यह विवादित आदेश पारित करने के लिए आश्वस्त करने हेतु खुद को पीड़ित के रूप में पेश किया गया हो।

अंतिम बात

अगर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी छापने पर भी किसी समाचार संगठन पर ऐसा प्रतिबंध लगा दिया जाता है, जिसे वह चुनौती भी न दे सका हो, तो स्वतंत्र प्रेस काम नहीं कर सकती। स्वतंत्र सार्वजनिक चर्चा ही लोकतंत्र की असली नींव है, और हर सार्वजनिक व्यक्ति की जाँच-परख हो सकती है-जिसमें खान और उनकी पत्नी भी शामिल हैं।

आज, हम कानून का पालन करते हुए इस आदेश को मान रहे हैं। लेकिन कानून के दायरे में रहते हुए, हम जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग जारी रखने और कानूनी रास्ते अपनाने का अपना अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

संस्थागत ‘हितों के टकराव’, राजनीतिक संबंधों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म चलाने से जुड़ी यह कहानी खत्म होने वाली नहीं है। यह एक ऐसी कहानी है जिसे सावधानी से, निष्पक्षता से और सभी लोगों के अधिकारों का पूरा ध्यान रखते हुए बार-बार बताया जाना चाहिए और बताया जाएगा।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

UP के Gen-Z का ‘यूथ अगेंस्ट माफिया’, अखिलेश यादव को ‘रहमान डकैत’ दिखाया: पूछा- ‘ल्यारी राज’ चाहिए या ‘धुरंधर CM’, जानिए संगठन के बारे में सबकुछ

‘धुरंधर-2’ जहाँ बॉक्स ऑफिस पर एक के बाद एक रिकॉर्ड ध्वस्त करती जा रही है तो वहीं उसके किरदार देश की राजनीति में भी तहलका मचाए हुए हैं। कुछ दिनों पहले माफिया अतीक अहमद से मिलते जुलते किरदार को लेकर उत्तर प्रदेश में खूब सियासी बवाल हुआ तो अब अखिलेश यादव की ‘धुरंधर तस्वीरों’ को लेकर हंगामा मचा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, सीतापुर, नोएडा और अमेठी समेत 10 जिलों में अखिलेश यादव के खिलाफ होर्डिंग्स लगाए गए हैं।

होर्डिंग्स में लिखा ‘अखिलेश यादव का ल्यारी राज’

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ (YAM) नाम की संस्था द्वारा लगाए गए इन होर्डिंग में एक तरफ अखिलेश यादव तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की तस्वीरें हैं। अखिलेश यादव की तस्वीर को धुरंधर के विलेन रहमान डकैत की तरह बनाया गया है और उनकी तस्वीर के नीचे लिखा है- ‘अखिलेश का ल्यारी राज’। वहीं, होर्डिंग में दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी की तस्वीर लगी है जिसमें वह कन्या पूजन करते नजर आ रहे हैं और उनकी तस्वीर पर लिखा है- धुरंधर CM। इस होर्डिंग के बीच में बड़े अक्षरों में पूछा गया है-‘आपको क्या चाहिए?’।

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ द्वारा लगाए गए होर्डिंग

इन होर्डिंग में कुछ अखबारों की खबरों की कटिंग भी लगाई गई हैं। इनमें अखिलेश यादव की तस्वीरों के नीचे ‘हिंसा जारी, अब तक 38 मरे’, ‘हिंसा जारी, 17 और मरे’, ‘मरेठ पहुँची दंगों की आग’ और ‘शामली में खूनी संघर्ष: राज्य में बढ़ रहा सांप्रदायिक तनाव’ जैसी खबरें हैं। तो दूसरी तरफ CM योगी आदित्यनाथ की तस्वीर के नीचे ‘अपराधियों को पालती है सपा, माफिया को मिट्टी में मिला देंगे’, ‘मुख्तार की मौत’ और ‘अतीक और अशरफ भी मारे गए’ जैसी खबरों की कटिंग लगी हैं।

साथ ही, होर्डिंग पर ‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ के पदाधिकारियों की तस्वीरें भी लगी हैं। कार्यकारी अध्यक्ष आशुतोष सिंह, महामंत्री अभिनव तिवारी, उपाध्यक्ष शिवानी पांडेय जैसे कई पदाधिकारियों की फोटो लगी हैं।

सपा की करतूतों से युवाओं को अवगत कराना मकसद: यूथ अगेंस्ट माफिया

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ के पदाधिकारियों ने ये होर्डिंग लगाए जाने की वजहों पर भी बात की है। संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष आशुतोष सिंह ने कहा, “हमें जेन-जी को संदेश देना है, उन्हें साथ जोड़ना है और उनको यह बताना है कि जब वो व्यस्क नहीं हुए थे तब प्रदेश में क्या चल रहा था, वो उन्हें नहीं भूलनी चाहिए। हम नई पीढ़ी को समझाएँगे और यह बताएँगे कि AI के दौर में जाति-बिरादरी में फँसे रहना कितनी दिक्कत दे सकती है।”

वहीं, संगठन के महामंत्री अभिनव तिवारी ने कहा, “इसका मकसद यही था कि हम जेन-जी में जागरूकता फैलाना चाहते थे। ताकि वो जान सकें कि पहले UP ने एक दौर देखा था और एक दौर अब है, एक समय यहाँ मुजफ्फरनगर-शामली जैसे दंगे होते थे और एक आज का समय है।” साथ ही, अभिनव का कहना है कि यह संस्था छात्रों द्वारा चलाई जा रही है और इसका किसी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है।

क्या है होर्डिंग्स लगाने वाला ‘यूथ अगेंस्ट माफिया’?

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ की वेबसाइट पर संगठन को ‘उत्तर प्रदेश को डर और माफिया के दौर में वापस जाने से रोकने के लिए नागरिकों द्वारा शुरू किया गया एक मंच’ बताया गया है।

वेबसाइट पर कहा गया है, “‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ एक सामाजिक संगठन है, जिसका उद्देश्य है लोगों को जागरूक करना, खासकर युवाओं को शिक्षित करना, अपराध के नुकसान को समझाना और उत्तर प्रदेश को सुरक्षित और विकास की राह पर आगे बढ़ाने के लिए लोगों का समर्थन जुटाना।”

यह संगठन पुराने रिकॉर्ड, अपराध से जुड़ी घटनाओं की टाइमलाइन, निवेश पर पड़े असर, अलग-अलग जिलों के ट्रेंड और लोगों को जागरूक करने वाला कंटेंट तैयार करता है। साथ ही, कॉलेजों में ग्रुप बनाने, वॉलंटियर अभियान चलाने और युवाओं से संकल्प लेने जैसे कार्यों से युवाओं को संगठन से जोड़ा जाता है।

यह संगठन सिर्फ जानकारी ही नहीं देता बल्कि एक ऐसी सोच बनाना चाहता है जो अपराध के खिलाफ हो। इसके लिए म्यूजिक, रैप, ग्राफिक्स, प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सहारा लिया जाता है।

यूथ अगेंस्ट माफिया द्वारा बनाया गया कंटेंट

ऊपर तस्वीर में दिखाया गया कंटेंट ‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ द्वारा बनाए जाने वाले कंटेंट का उदाहरण है। इन इन्फोग्राफिक के जरिए दिखाया गया है कि कैसे अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले सपा के शासन में 2012 से 2017 के बीच उत्तर प्रदेश में अराजकता का दौर था। इस अवधि में 1 लाख से अधिक नौकरियाँ खत्म हुईं और करीब 27000 करोड़ रुपए के निवेश का नुकसान हुआ जिसके चलते युवाओं के भविष्य और राज्य के विकास पर नकारात्मक असर पड़ा।

वहीं, 2017 के बाद योगी आदित्यनाथ के राज में कैसे प्रदेश की तस्वीर बदली उसकी कहानी भी इसके जरिए दिखाई गई है। इसमें बताया गया है कि 2017 के बाद कानून-व्यवस्था का दौर लौटने से प्रदेश में 7 लाख से अधिक नौकरियाँ पैदा हुईं और 4 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश आया है।

YAM का कहना है कि उत्तर प्रदेश एक समृद्ध भविष्य नहीं बना सकता अगर लोग अपने अतीत को भूल जाएँ। वेबसाइट पर लिखा गया है, “संगठित अपराध, डर, हिंसा और कमजोर कानून-व्यवस्था का दौर सिर्फ उस समय के पीड़ितों को ही नुकसान नहीं पहुँचाता बल्कि यह निवेश के भरोसे को भी कम करता है, लोगों को व्यापार शुरू करने से रोकता है, स्थानीय अर्थव्यवस्था को कमजोर करता है, रोजगार के अवसर घटाता है और पूरी एक पीढ़ी के सपनों को नुकसान पहुँचाता है।”

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ का मकसद इसी याद को एक जिम्मेदार नागरिक पहल में बदलना है। यह संस्था अतीत को बुरे दौर को दर्ज करेगी, वर्तमान को जागरूक करेगी और एक ऐसा भविष्य बनाने में मदद करेगी जहाँ युवा खुद आगे बढ़कर उत्तर प्रदेश को सुरक्षित और अवसरों से भरा राज्य बनाए रखें।

भारत में बनेगा परमाणु ईंधन का अकूत भंडार, थोरियम से बनेगी बिजली: जानें- क्या है प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर? जिसकी सफलता पर PM मोदी ने दी बधाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यूक्लियर प्रोग्राम के दूसरे चरण लगभग पूरे होने की जानकारी दी। उन्होंने भारत को प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने पर वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई दी। उन्नत रिएक्टर की विशेषताओं पर बात करते हुए प्रधानमंत्री ने भारत के लिए इसे गौरवपूर्ण पल बताया।

सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देर रात 9.40 बजे एक पोस्ट में लिखा, “आज भारत ने अपने सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम में एक अहम और ऐतिहासिक कदम उठाया है। देश ने अपने परमाणु ऊर्जा मिशन के दूसरे चरण में बड़ी प्रगति हासिल की है। कलपक्कम में स्वेदशी तकनीक से तैयार किया गया प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अब सफलतापूर्वक क्रिटिकल हो गया है।”

रिएक्टर की विशेषता बताते हुए पीएम ने कहा, “यह एक उन्नत प्रकार का रिएक्टर है, जो जितना ईंधन इस्तेमाल करता है, उससे ज्यादा ईंधन पैदा करने की क्षमता रखता है। यह उपलब्धि भारत के वैज्ञानिकों की गहरी समझ और हमारे इंजानियरों की मजबूत तकनीकी क्षमता को दिखाती है।”

इसी के साथ प्रधानमंत्री ने न्यूक्लियर प्रोग्राम के तीसरे चरण की ओर बढ़ने की भी बात कही। उन्होंने कहा, “साथ ही, यह हमारे न्यूक्लियर प्रोग्राम के तीसरे चरण की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम है, जहाँ भारत अपने विशाल थोरियम भंडार का बेहतर उपयोग कर सकेगा। यह देश के लिए गर्व का क्षण है। हमारे सभी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को इस बड़ी सफलता के लिए हार्दिक बधाई।”

आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहाँ किस रिएक्टर की बात कर रहे हैं, जिसमें कई साइंस के शब्द हैं। आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर है क्या ये प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर? इस रिएक्टर का काम क्या है? इसके ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने का क्या मतलब है? और क्या वाकई भारत न्यूक्लियर प्रोग्राम के तीसरे चरण में पहुँच गया है?

क्या है प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर?

प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) एक बेहद उन्नत किस्म का न्यूक्लियर रिएक्टर है, जिसे भारत ने अपनी खास जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया है। ‘फास्ट’ का मतलब है कि इसमें तेज गति वाले न्यूट्रॉन का इस्तेमाल होता है और ‘ब्रीडर’ का मतलब है कि यह रिएक्टर जितना परमाणु ईंधन खर्च करता है, उससे ज्यादा नया ईंधन खुद बना लेता है।

आम न्यूक्लियर रिएक्टर जहाँ यूरेनियम का उपयोग करके ऊर्जा पैदा करते हैं, वहीं PFBR यूरेनियम और प्लूटोनियम के साथ-साथ भविष्य के लिए नया ईंधन भी तैयार करता है, जिससे ईंधन की कमी का खतरा कम हो जाता है। भारत के लिए यह बहुत अहम है, क्योंकि हमारे पास यूरेनियम सीमित है लेकिन थोरियम का भंडार काफी ज्यादा है।

यह रिएक्टर उसी दिशा में एक मजबूत कदम है, जिससे आगे चलकर थोरियम आधारित ऊर्जा को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकेगा। तमिलनाडु के कलपक्कम में बना यह रिएक्टर पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार किया गया है, जो भारत की वैज्ञानिक ताकत और इंजनीयरिंग क्षमता को दिखाता है। आसान शब्दों में कहें तो यह सिर्फ बिजली बनाने वाली मशीन नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए ‘ईंधन बनाने वाली फैक्ट्री’ भी है, जो भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

रिएक्टर के ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने से क्या मतलब है?

प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने का मतलब यह है कि अब रिएक्टर के भीतर परमाणु प्रतिक्रिया (न्यूक्लियर फिशन) अपने आप लगातार और नियंत्रिति तरीके से चलने लगी है। आसान भाषा में कहें तो जब एक परमाणु टूटता है और उससे निकलने वाले न्यूट्रॉन ठीक उतनी ही संख्या में दूसरे परमाणुओं को तोड़ते रहते हैं, जिससे यह प्रक्रिया बिना रुके चलती रहे, उसी स्थिति को ‘क्रिटिकल’ कहा जाता है।

इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के अनुसार, क्रिटिकलिटी वह स्थिति है जब परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया (chain reaction) स्थिर रूप से खुद चलती रहती है, यानी हर फिशन से उतने ही न्यूट्रॉन पैदा होते हैं जितने अगले फिशन को जारी रखने के लिए जरूरी होते हैं।

यह किसी खतरे का संकेत नहीं होता, बल्कि यह दिखाता है कि रिएक्टर सही तरीके से शुरू हो चुका है और अब वह स्थिर रूप से ऊर्जा पैदा करने के लिए तैयार है। इस चरण के बाद वैज्ञानिक धीरे-धीरे इसकी क्षमता बढ़ाते हैं और इसे बिजली उत्पादन के लिए पूरी तरह तैयार करते हैं।

क्या वाकई भारत न्यूक्लियर प्रोग्राम के तीसरे चरण में पहुँच गया

भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम तीन चरणों में बनाया गया है, जिसे होमी जे भाभा ने तैयार किया था। अभी जो प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने ‘क्रिटिकलिटी’ हासिल की है, वह दूसरे चरण की एक बड़ी उपलब्धि जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पूरी तरह तीसरे चरण में पहुँच गया है। असल में, भारत अभी दूसरे और तीसरे चरण के बीच के संक्रमण (Transition) दौर में है।

दूसरे चरण का मकसद फास्ट ब्रडर रिएक्टर के जरिए प्लूटोनियम का इस्तेमाल करके ज्यादा ईंधन तैयार करना और आगे के लिए जरूरी सामग्री जुटाना है। PFBR का सफल होना दिखाता है कि यह तकनीक अब काम कर रही है, लेकिन पूरे देश में इस तरह के और रिएक्टर लगने औऱ स्थिर रूप से चलने के बाद ही कहा जा सकता है कि दूसरा चरण पूरी तरह सफल हुआ है।

तीसरे चरण में भारत का फोकस थोरियम पर आधारित रिएक्टरों पर होगा, क्योंकि भारत के पास थोरियम का बहुत बड़ा भंडार है। इसके लिए पहले पर्याप्त मात्रा में यू-233 जैसे ईंधन का उत्पादन जरूरी है, जो दूसरे चरण से ही मिलेगा। डिपार्टमेंट ऑप एटॉमिक एनर्जी के अनुसार, यह एक लंबी और चरणबद्ध प्रक्रिया है, जिसमें हर स्टेज अगले स्टेज के लिए आधार तैयार करता है।

चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने कब्रिस्तानों को लेकर बनाए नए नियम, यहाँ ‘दफनाना’ बहुत महँगा: जानें- क्या हैं ‘बोन एश अपार्टमेंट’, जिन पर लगा बैन

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश चीन इनदिनों एक अलग तरह की समस्या से जूझ रहा है। यहाँ अंतिम संस्कार के लिए कब्रिस्तान की भारी कमी हो गई है। हालात यह है कि घर सस्ते हैं, लेकिन कब्रिस्तान में जगह मिलना कई गुणा महँगा।

नतीजा यह है कि चीनी छोटे-छोटे फ्लैट खरीद कर उन्हें मुर्दे रखने की जगह में तब्दील कर रहे हैं। इस पर अंकुश लगाने के लिए चीन ने 30 मार्च को नया कानून लागू किया है। इसके तहत रिहायशी इलाकों के घरों में मुर्दों को या उनकी अस्थियों को रखना गैरकानूनी करार दिया गया है।

रिहायशी इलाकों में बना ‘बोन एश अपार्टमेंट’

चीन के कई रिहायशी इलाकों में छोटे छोटे फ्लैट्स मिले हैं, जहाँ अंतिम संस्कार के लिए रखी गई अस्थियाँ और कब्र मिले हैं। इन घरों की खिड़कियाँ और दरवाजे बंद हैं। खिड़कियों में पर्दे लगे मिले, ताकि कोई अंदर का दृश्य नहीं दिख सके। फिर भी पड़ोसियों ने जब मेहनत कर अंदर झाँका तो नजारा काफी डरावना लगा। कमरे में मोमबत्तियाँ जल रही थी। काली फोटो के सामने एक ताबूत रखा हुआ था। इसमें हड्डियाँ थी। कब्रिस्तान के खर्च से बचने के लिए खाली फ्लैट्स को ‘हड्डियों वाला घर’ बना दिया गया था।

चीन में मुर्दों पर महँगाई की मार

शंघाई जैसे बड़े शहर में भी रियल स्टेट की कीमत गिरी है, लेकिन कब्रिस्तान में जगह कई गुणा ज्यादा महँगा हो गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक,2020 में एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार का खर्च औसत सैलरी वाले व्यक्ति के 6 महीने की कमाई के बराबर थी। आखिर आम आदमी इसे कैसे वहन करे। इसलिए शहर से बाहर बने सस्ते फ्लैट्स को मुर्दों के ताबूत को रखने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या है नया नियम

चीन के अंतिम संस्कार से जुड़े नए नियम में साफ किया गया है कि इंसानी अवशेषों या मुर्दों को सिर्फ तय सरकारी कब्रिस्तानों पर ही दफनाया जा सकता है। अब फ्लैट या किसी भी दूसरे घरों को ताबूत रखने या अस्थियों को रखने के लिए बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

अंतिम संस्कार के नए नियम के मुताबिक, अंतिम संस्कार को एक सामाजिक कार्य के तौर पर परिभाषित किया गया है। बेसिक और सप्लीमेंट्री, दोनों सर्विसेज के लिए एक ‘टू-टियर कैटलॉग’ सिस्टम शुरू करने की बात कही गई है। नए नियमों के कैटलॉग में जरूरी चीजों की फीस लिखी गई है। इसके अलावा किसी भी एक्स्ट्रा आइटम या फीस लेने पर रोक है। इसमें किसी भी कमर्शियल कब्रिस्तान की मनाही है। नए नियम में जिंदगी का आखिरी सफर इज्जतदार और सही तरीके से हो, इस पर ध्यान दिया गया है।

दरअसल चीन में जन्मदर काफी घट गया है और यह बुजुर्गों का देश बन गया है। इसलिए मौतों की संख्या भी काफी बढ़ गई है। ऐसी स्थिति में कब्रिस्तान में जगह कम पड़ गए हैं। इसलिए डिमांड ज्यादा है। कीमतों पर कंट्रोल करने के लिए सरकार ने नए नियम बनाए हैं। चीनी अधिकारियों ने रेजिडेंशियल फ्लैट के अंदर दाह संस्कार की राख रखने पर बैन लगा दिया है, क्योंकि दफ़नाने के बढ़ते खर्च की वजह से कुछ परिवारों को दूसरे इंतज़ाम करने पड़े हैं।

चीनी समाज में सही तरीके से दफनाना एक जरूरी जिम्मेदारी मानी जाती है। यह पुरखों के प्रति सम्मान दिखाता है और कल्चरल वैल्यू से भी जुड़ा है। हालाँकि तेजी से हो रहे शहरी विकास और बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी की वजह से मौजूद जमीन पर दबाव बढ़ गया है, जिससे चीनी समाज जूझ रहा है।

अब जमीन पर पेड़ों के नीचे और समुद्र में दफनाने को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 6 फीसदी से ज्यादा अंतिम संस्कार इस तरीके से हो रहा है।

हिंदू घृणा से ‘गाजी’ बना सैयद सालार, महाराजा सुहेलदेव ने भेजा जहन्नुम: सत्य यही है ओवैसी के ‘गुलाम’, बिलबिलाने से योगी राज में नहीं होगा इतिहास का ‘तुष्टिकरण’

मुस्लिम आक्रांता सैयद सालार ने हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण कराया। जिसने भी इनकार किया उनके सिर काट दिए। हिंदू घृणा उसमें इतने भरी थी कि इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए वह ‘गाजी’ बन गया। 1034 ईस्वी में महाराजा सुहेलदेव ने उसे पराजित कर भारत और हिंदुओं को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई।

5 अप्रैल 2026 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान महाराजा सुहेलदेव की इसी वीरगाथा का जिक्र किया। यह सुनते ही असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के यूपी प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली का मजहब बिलबिलाने लगा।

इस बिलबिलाहट में एक्स पर एक पोस्ट करते हुए उसने सैयद सालार को ‘अमन पसंद’ बताते हुए महाराजा सुहेलदेव को अपमानित करने की कोशिश की। पूर्व में वह महाराजा सुहेलदेव को ‘लुटेरा’ भी कह चुका है।

शौकत अली ने एक्स पर लिखा, “सालार मसूद गाजी A.R के बारे में गलत इतिहास बता रहे हैं हमारे मुख्यमन्त्री जी, अगर सालार मसूद ग़ाज़ी, लुटेरे होते अक्रान्ता होते, तो भारत के मुसलमानों के साथ साथ बड़ी तादाद में हमारे हिन्दू भाईयों की उनके प्रति आस्था ना होती, राजा सुहैल देव का भारत की आज़ादी, या भारत के निर्माण में कोई योगदान नहीं था यही सच्चाई है।”

इससे पहले वो सितंबर 2025 में महाराजा सुहैल देव को लुटेरा और सालार मसूद को ‘अमन पसंद‘ बता चुका है। तब शौकत अली के खिलाफ लखनऊ के हजरतगंज थाने में FIR दर्ज हुई थी।  

शौकत अली ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उन बयानों के पलटवार में ये विवादित टिप्पणी की, जिनमें सीएम ने सालार मसूद गाजी को विदेशी आक्रांता और माफिया बताते हुए कहा था कि महाराजा सुहेलदेव ने उसे मौत के घाट उतार दिया था।

बता दें कि सीएम योगी ने 5 अप्रैल 2026 को लखनऊ भारतेंदु नाट्य अकादमी के 50 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित समारोह में कहा था, “जो माफिया अभी मिट्टी में मिले हैं, उन्हीं का एक रूप था सालार मसूद। उसने सोमनाथ मंदिर तोड़ा, अयोध्या की राम जन्मभूमि को भी क्षति पहुँचाई। महाराजा सुहेलदेव ने उसे न सिर्फ हराया, बल्कि ऐसी मौत दी जिसे इस्लाम में सबसे बुरी, जहन्नुम‑गारंटी वाली मौत माना जाता है।”

शौकत अली के बयान पर भड़का राजभर समाज

शौकत अली के इस बयान पर खास तौर पर राजभर समाज और हिंदू संगठनों में रोष देखने को मिल रहा है। राजभर कार्यकर्ता इसे केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि एक समग्र जातीय‑सांस्कृतिक संवेदना को चोट पहुँचाने की कोशिश मानते हैं।

इसी वजह से उन्होंने न सिर्फ आक्रोश जताया बल्कि शौकत के खिलाफ कानूनी और आंदोलनात्मक प्रतिक्रिया की धमकी भी दी है।

उत्तर प्रदेश के पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने महाराज सुहेलदेव पर एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली के विवादित बयान पर कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने कहा कि अगर शौकत ने माफी नहीं माँगी तो प्रदेश भर में आंदोलन होगा।

मंत्री राजभर ने कहा कि शौकत अली को इतिहास की पुस्तकें पढ़नी चाहिए। AIMIM के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओवैसी से कहूँगा कि अपने प्रदेश अध्यक्ष को माफी माँगने के लिए कहें, नहीं तो प्रदेशव्यापी आंदोलन होगा। आपका निकलना दूभर हो जाएगा।

मंत्री राजभर ने कहा कि यह सोची समझी रणनीति के तहत है क्योंकि आने वाले 10 जून को बहराइच में मेला लगने जा रहा है जो 10 दिन चलेगा। पहले लुटेरे गाजी का मेला लगता था।

मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने कहा कि अब देश के वीरों का मेला, जिन्होंने देश को गुलाम होने से बचाया, देश को लुटने से बचाया, जिन्होंने देश की संपत्ति को बचाया, ऐसे देश के राष्ट्रीय वीर राजभर महाराज सुहेलदेव जी का मेला लगने लगने जा रहा है।

गौरतलब है कि संभल में सैयद सालार मसूद गाजी के नाम पर हर साल नेजा मेला लगाया जाता था। योगी सरकार ने 2025 में यह कहते हुए इसे रोक दिया कि विदेशी आक्रांताओं के नाम पर कोई मेला नहीं लगने दिया जाएगा। गाजी के नाम पर हर साल बहराइच शहर के दरगाह शरीफ में कई दशकों से मेला लगता आ रहा था।

राजभर समाज के लिए राजा सुहेलदेव की अहमियत

महाराजा सुहेलदेव को राजभर समाज का ‘कुलपुरुष’ माना जाता है। उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र ने भी उन्हें राष्ट्रीय वीरता‑परंपरा का हिस्सा मानकर उनके नाम पर स्मारक, मेडिकल कॉलेज, ट्रेन और डाक टिकट आदि जैसे ठोस सम्मान दिए हैं।

सुहेलदेव को मुस्लिम आक्रमणकारी सालार मसूद पर विजय प्राप्त करने वाले योद्धा के रूप में देखा जाता है। ऐसे में उनके खिलाफ अपमानजनक शब्द बोलना राजभर समाज की ऐतिहासिक स्मृति और गौरव को ठेस पहुँचाना माना गया।

उत्तर प्रदेश में सुहेल देव को मानने वाले राजभर समुदाय की संख्या लाखों में है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में करीब 18 फीसद राजभर हैं और बहराइच से लेकर वाराणसी तक के 15 जिलों में 60 विधानसभा सीटों पर राजभर समुदाय प्रभुत्व काफी अधिक है।

ऐतिहासिक‑सांस्कृतिक चर्चाओं के अनुसार, सुहेलदेव 11वीं शताब्दी के एक क्षेत्रीय राजा और शासक माने जाते हैं, जिनका राज्य श्रावस्ती‑बहराइच के इलाके में बताया जाता है।

कहा जाता है कि उन्होंने बहराइच के पास सालार मसूद गाजी के खिलाफ स्थानीय राजाओं का गठबंधन तैयार किया और सालार मसूद की सेना को 1034 ईस्वी में पराजित कर दिया। इसके बाद मसूद की मौत हुई और उसे बहराइच में दफन किया गया।

राजभर समाज के दृष्टिकोण से यह लड़ाई छोटे और आम लोगों के खिलाफ विदेशी आक्रांता की पराजय का प्रतीक है, जिसमें राजभर आधार‑समूह के रूप में दिखते हैं।

चुनावी राजनीति में सुहेलदेव का नाम बार-बार उभरता है, क्योंकि राजभर समाज उन्हें अपने अधिकारों और प्रतिनिधित्व की लड़ाई से जोड़ता है। वर्तमान में सुभासपा जैसी राजभर केंद्रित पार्टियाँ महाराजा सुहेलदेव को अपना आधार मानती हैं। राजभर नेता उन्हें दलित‑शोषित‑किसान वर्ग का राष्ट्रीय वीर कहते हैं।

शौकत अली की टिप्पणी राजभर समाज के लिए केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं बल्कि उनके पूरे इतिहास और गौरव पर चोट है। महाराजा सुहेलदेव राजभर समाज के लिए सम्मान, संघर्ष और आत्मगौरव का प्रतीक हैं।

सालार मसूद गाजी: ‘वॉरियर संत’ या आक्रांता?

सालार मसूद गाजी के बारे में जो प्रमुख विवरण मिलता है, वह 17वीं सदी की किताब मिरात‑ए‑मसूदी से आता है, जो घटनाओं के करीब 600 साल बाद लिखी गई। वह गजनी के सुल्तान महमूद का भतीजा माना जाता है। खुद इतिहासकार मानते हैं कि यह ग्रंथ सूफी परंपरा और लोककथाओं से प्रभावित है, न कि ठोस ऐतिहासिक प्रमाणों से।

मिरात‑ए‑मसूदी के अनुसार, सालार मसूद गाजी को गाजी मियाँ भी कहा जाता था। गजनी के साथ मिलकर उसने भारत में इस्लाम फैलाने और गजनवी प्रभाव बढ़ाने के लिए अभियान चलाया। लेकिन महाराजा सुहेलदेव के सामने ये अभियान टिक न सका और मसूद को करारी हार मिली।

इस लिहाज से कहा जा सकता है कि मसूद की छवि एक ‘वॉरियर संत’ या योद्धा के तौर पर जबरन गढ़ी गई। इसमें इतिहास से ज्यादा आस्था और परंपरा को शामिल करने की कोशिश की गई।

असल में मिरात‑ए‑मसूदी किताब सालार मसूद को एक मजहबी योद्धा और संत के रूप में महिमामंडित करती है, जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से वह गजनवी आक्रमण का हिस्सा था।

कुल मिलाकर शौकत अली का बयान सिर्फ उनके ‘अपने’ लोगों को बरगलाने के काम आ सकता है लेकिन दुनिया के सामने कुछ भी कह देने से इतिहास को वह नहीं बदल पाएँगे।

महिला आरक्षण बिल पर अब ‘जल्दीबाजी’ का रोना रो रहा विपक्ष, पहले तुरंत लागू करने के लिए बना रहा था दबाव: सामने आया कॉन्ग्रेस का ‘दोगलापन’

महिला आरक्षण बिल पर विपक्ष का रुख विरोधाभाषी है। कॉन्ग्रेस पहले तुरंत लागू करने की माँग कर रही थी, लेकिन अब प्रोसेस से जुड़ी आपत्तियाँ उठा रही है। वहीं कई विपक्षी पार्टियाँ ‘लागू करने के समय’ पर सवाल उठा रही हैं। इसके विपरीत सरकार का कहना है कि वह सही सलाह-मशविरा करके आगे बढ़ रही है और बड़े पैमाने पर आम सहमति बनाना चाहती है।

केंद्रीय संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने 3 अप्रैल 2026 (शुक्रवार) को बताया कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम यानी महिला आरक्षण बिल पर 16 से 18 अप्रैल तक संसद के विशेष सेशन में चर्चा होगी। उन्होंने कहा, “हम 16 अप्रैल को संसद बुला रहे हैं। हम तब महिला आरक्षण बिल पर चर्चा करेंगे। महिलाओं को मजबूत बनाना हमारा वादा है। हमें महिलाओं को मजबूत बनाने के लिए एक साथ आना चाहिए, राजनीति नहीं करनी चाहिए।” इस घोषणा पर विपक्षी पार्टियों की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया आई।

विपक्ष ने चुनौती दी और सरकार ने जवाब दिया

इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस ने आदर्श आचार संहिता के संभावित उल्लंघन की शिकायत की और केंद्र पर विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक फायदा उठाने का आरोप लगाया। राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि उन्होंने 29 अप्रैल के बाद दो बार ऑल-पार्टी मीटिंग की माँग की।

उन्होंने आरोप लगाया, “हम महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। हम इसे लाने वाले लोग हैं। यह हमारे समर्थन से ही सर्वसम्मति से बना है। ये लोग जब चाहें क्रेडिट ले लेते हैं। सब सहमत हैं, लेकिन किस समय, कैसे लाना है और कैसे करना है। इस पर राजनीति मत करो। अगर आपको यह करना ही था, तो आप इसे इस सत्र की शुरुआत में क्यों नहीं लाए? हमने तीन दिन तक ग्रामीण विकास पर चर्चा की। क्या हम इस पर चर्चा नहीं कर सकते थे? आप राज्यों में चुनाव के बाद सत्र बुलाएँ। हम सहयोग करेंगे। चुनाव से पहले क्रेडिट मत लो।”

खड़गे के सवाल का जवाब केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने दिया। उन्होंने कहा, “आप इसे 30 साल में पास नहीं कर पाए। हम पहले ही इसका क्रेडिट ले चुके हैं। आप हमेशा हर चीज को राजनीति के नजरिए से देखते हैं, इंसानियत के नजरिए से नहीं।”

राज्यसभा MP जयराम रमेश ने भी जोर देकर कहा, “खड़गे ने तब माँग की थी कि इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए। उस वक्त आपको जनगणना और परिसीमन की याद आ रही थी। लेकिन अब बगैर जनगणना के भी लागू करने में दिक्कत नहीं है। 30 महीने तक सोते रहे। इस स्पेशल सेशन का एकमात्र मकसद पॉलिटिकल फायदा उठाना और तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के चुनावों पर असर डालना है। क्या इसे 15 दिन बाद नहीं बुलाया जा सकता था?”

हालाँकि रिजिजू ने बताया कि इस जरूरी मुद्दे पर 80% से ज्यादा पार्टियों के साथ पहले ही चर्चा हो चुकी है। इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस ने सरकार को लिखकर विधानसभा चुनावों के बाद पार्लियामेंट सेशन बुलाने के लिए कहा था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरकार सभी पार्टियों और सांसदों से सलाह-मशविरा कर रही है। मंत्री ने जोर देकर कहा कि उन्होंने मनमाने तरीके से इसे लागू करने के लिए कदम नहीं बढ़ाया है, बल्कि आरक्षण को सर्वसम्मति से संसद की मंजूरी मिलनी चाहिए।

उन्होंने कहा, “हमारे लिए, इसका किसी खास राज्य के चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है। हमें प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा, क्योंकि वक्त बीता जा रहा है। मुख्य विपक्षी पार्टी ने हमें लिखकर आग्रह किया है कि 29 अप्रैल के बाद मीटिंग बुलाएँ, हमें दिक्कत नहीं है।”

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने सरकार के महिला आरक्षण को लेकर की जा रही कवायद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वेपन्स ऑफ मास डायवर्जन’ का एक और हिस्सा बताया। उनका कहना है कि मोदी सरकार की विदेश नीति की नाकामियों की वजह से देश को LPG (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) और एनर्जी संकट का देश को सामना करना पड़ रहा है।”

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 5 अप्रैल को कहा कि प्रस्तावित बिल का आधार ही ‘निराधार’ है, क्योंकि यह 15 साल पहले इकट्ठा किए गए डेटा पर आधारित है। उन्होंने आगे कहा कि सही प्रतिनिधित्व पाने के लिए सही आबादी का पता चलना चाहिए, जो जनगणना के आधार पर ही पता चलेगा। जब महिलाओं की जनसंख्या के लिए 2011 के पुराने आँकड़ों को आधार बनाएँगे, तो महिला आरक्षण की आधार भूमि ही गलत होगी।

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “जब गिनती ही गलत है, तो आरक्षण सही कैसे हो सकता है? जब नेक इरादों की बात हो तो शक नहीं होना चाहिए।”

यादव ने कहा, “इसीलिए हमारी सबसे बड़ी आपत्ति यही है कि पहले जनगणना कराई जाए फिर महिला आरक्षण की बात उठाई जाए। जो सरकार महिलाओं को गिनना नहीं चाहती है, वो भला उन्हें आरक्षण क्या देगी। महिलाओं के साथ भाजपा और उनके संगी-साथी जो धोखा करना चाहते हैं, महिलाओं के साथ वो छलावा हम नहीं होने देंगे। कुल मिलाकर सरकार से हमारा ये कहना है कि जब तक जनगणना नहीं, तब तक महिला आरक्षण पर बहस करना नहीं!”

लोकसभा में कॉन्ग्रेस के व्हिप और तमिलनाडु के विरुधुनगर से सांसद मणिकम टैगोर ने जोर देकर कहा कि भारतीय जनता पार्टी का इरादा महिला कोटे में OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) को आरक्षण देने से मना करना है। उन्होंने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए आरोप लगाया, “क्योंकि जाति-आधारित जनगणना से OBC आबादी पर साफ डेटा मिलेगा, इससे महिला कोटे में OBC के सही प्रतिनिधित्व की माँग उठेगी। BJP का छिपा हुआ एजेंडा OBC महिलाओं को आरक्षण देने से रोकना है, इसलिए प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है।”

उन्होंने आगे कहा कि निचले सदन की सीटों में अनुमानित 50% की बढ़ोतरी से प्रतिनिधित्व में असमानता आ सकती है। इसके पीछे उनका तर्क है कि हालाँकि दक्षिणी राज्यों को ज्यादा सदस्य मिल सकते हैं, लेकिन संसद में उनकी तुलनात्मक ताकत उत्तरी राज्यों की तुलना में कम हो सकती है। खास बात यह है कि PM मोदी पहले ही भरोसा दिला चुके हैं कि आने वाले परिसीमन की प्रक्रिया में दक्षिणी राज्यों को कोई सीट नहीं गँवानी पड़ेगी।

जल्दी लागू करने की चाह से लेकर विरोध करने तक: विपक्ष के कई यू-टर्न

देश की सबसे पुरानी पार्टी की अगुवाई वाले विपक्ष ने लोगों में भय फैलाना शुरू कर दिया है कि कई राज्यों, खासकर दक्षिण, उत्तर-पूर्व और उत्तर-पश्चिम के राज्यों के परिसीमन और आरक्षण के लिए संविधान में बदलाव की कोशिश काफी ‘जल्दबाजी’ में की जा रही है। इसके ‘खतरनाक नतीजे’ सामने आ सकते हैं।

बिल का क्रेडिट लेने के लिए सत्ताधारी पार्टी पर हमला करने वाली कॉन्ग्रेस ने इसे अपना आइडिया करार दिया। पार्टी ने 2023 में इसे पास होने के तुरंत बाद लागू न करने के लिए सरकार की भी आलोचना की। दिलचस्प बात यह है कि पार्टी फिलहाल सरकार पर हमला करने के लिए रणनीति बनाने में बिजी है। पार्टी कह रही है कि परिसीमन और जनगणना से पहले आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता। हालाँकि कॉन्ग्रेस पहले परिसीमन, जनगणना की बात न कर, तुरंत महिला आरक्षण लागू करने की बात कही थी।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने कहा कि बिल अगली सुबह पास हो सकता है, क्योंकि सभी पार्टियों में आम सहमति है।” आपको बस इतना बताना है कि लोकसभा और विधानसभा दोनों में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित होंगी। यह बहुत सीधा है। इसके अलावा कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर BJP सच में इसके लिए कमिटेड होती, तो वे इसे लागू करते। महिलाओं को रिज़र्वेशन देने और जनगणना या डिलिमिटेशन के बीच कोई रिश्ता नहीं है। तीनों जुड़े हुए नहीं हैं।

उन्होंने परिसीमना और जनगणना के नाम पर महिला आरक्षण कानून को बेवजह 10 साल तक बढ़ाने के लिए सरकार पर आरोप लगाए। दूसरे नेताओं ने भी यही बात कही।

ऑल इंडिया महिला कॉन्ग्रेस अध्यक्ष अलका लांबा ने कहा, “हम माँग करते हैं कि हाल ही में पास हुआ महिला आरक्षण बिल 2024 के चुनाव से लागू हो। BJP सरकार ने जो भी रुकावटें डाली हैं, पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन होगा और फिर आरक्षण लागू होगा। हम चाहते हैं कि ये शर्तें हटाई जाएँ। हम चाहते हैं कि बिल तुरंत लागू हो।” उन्होंने उस समय कहा, “हम चाहते हैं कि जनगणना हो, लेकिन जनगणना को महिला रिजर्वेशन से जोड़ना अन्याय है।”

पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और सांसद सोनिया गाँधी ने कहा कि देश की महिलाएँ पिछले 13 सालों से अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का इंतजार कर रही हैं, और सरकार उन्हें सालों इंतजार करने के लिए कह रही है। उन्होंने कहा, “वे और कितने साल यह सब सहेंगी? क्या भारतीय महिलाओं के साथ ऐसा बर्ताव सही है? कॉन्ग्रेस बिल को तुरंत लागू करने की माँग करती है।”

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने भी इसी तरह जोर देते हुए कहा कि सरकार बिल का क्रेडिट ले रही है, लेकिन कम से कम दस साल तक इसे लागू करने का उसका कोई इरादा नहीं है। उन्होंने कहा था, “हम, भारत की महिलाओं के पास अब और समय बर्बाद करने के लिए नहीं है। राजनीतिक प्रक्रिया में हिस्सा लेना हमारा अधिकार है। मैं माँग करती हूँ कि हमारे काम की तारीफ और सम्मान किया जाए।”

पार्टी ने कहा, “हम अपनी माँग से पीछे नहीं हटेंगे। बिल को तुरंत लागू किया जाए, जिसमें OBC महिलाओं के लिए रिज़र्वेशन का प्रावधान हो।” इस मामले में ‘मोदी सरकार को एक्सपोज करने के लिए 15 शहरों में 15 प्रेस कॉन्फ्रेंस’ करने का दावा किया।

कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि जनगणना और परिसीमन की वजह से यह बिल 2029 तक लागू नहीं होगा और यह “जुमला” 2024 के आम चुनाव में हारने के डर से दिया गया है।

दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ भी सरकार पर ऐसे ही आरोप लगा रही थीं, उनका कहना था कि वह महिलाओं को उनका हक नहीं दे रही है। AAP के राज्यसभा सांसद और दिल्ली एक्साइज पॉलिसी स्कैम में आरोपी संजय सिंह के मुताबिक, रिज़र्वेशन एक दिखावा है, क्योंकि सरकार हमेशा अपने वादों से पीछे रही है।

उन्होंने कहा, “इस बार महिलाओं को उन्होंने गुमराह किया है। यह उनका नया जुमला है। हमें यह भी नहीं पता कि बिल पास होने में कितना समय लगेगा, या यह कभी अप्रूव होगा भी या नहीं।” AAP की एक और नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री, आतिशी मार्लेना ने इस बिल को महिलाओं को बेवकूफ बनाने का एक तरीका बताया, क्योंकि यह आरक्षण 2024 के आम चुनाव के लिए नहीं था, बल्कि यह जनगणना और डिलिमिटेशन पर निर्भर करेगा। इसलिए, यह कम से कम अगले कुछ सालों तक लागू नहीं होगा।

ऑल इंडिया तृणमूल कॉन्ग्रेस की लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने भी बिल को ‘जुमला’ बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि जनगणना और परिसीमन की तारीखें तय नहीं थीं। इसलिए बिल 2029 तक भी लागू नहीं हो सका। उन्होंने मजाक उड़ाया कि यह ‘महिला रिज़र्वेशन रीशेड्यूलिंग बिल’ है और इसका नाम उसी के अनुसार होना चाहिए।

विपक्ष हर मुद्दे पर सरकार का विरोध करती है। इस ट्रैक रिकॉर्ड के साथ विपक्ष अपनी हरकतें फिर से शुरू कर दी हैं। उन्होंने सरकार पर आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़कर महिलाओं को गुमराह करने का आरोप लगाया है। अब सरकार ने वह घोषणा कर दी है, जिसकी माँग की जा रही थी। लेकिन, अब विपक्ष को दिक्कत महसूस हो रही है। पहले तुरंत लागू करने की जिद करने वाली विपक्षी पार्टियाँ अब असेंबली इलेक्शन का रोना रो रही है।

भारत एक बहुत बड़ा देश है और हर साल अलग-अलग राज्यों में इलेक्शन होते हैं। इसलिए जरूरी फैसलों को देश के किसी हिस्से में हो रहे विधानसभा चुनाव का बंधक नहीं बनाया जा सकता। विपक्षी पार्टियाँ एक तरह ‘एक देश, एक इलेक्शन’ का विरोध करती हैं। इनका मानना है कि इससे बीजेपी को फायदा होगा। इसलिए सच में विपक्ष के पास महिला आरक्षण बिल को टालने का कोई तर्क नहीं है। सिर्फ राजनीतिक चालों के लिए विरोध हो रहा है।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

भारत को इस्लामी मुल्क बनाने के लिए महिलाओं का दस्ता तैयार कर रही थी हैदराबाद की सईदा बेगम, ISIS-अलकायदा से मिले अल-मलिक के लिंक: सीरिया तक फैला है नेटवर्क

आंध्र प्रदेश में देशभर में फैले एक संगठित कट्टरपंथी और आतंकी नेटवर्क का खुलासा हुआ है। विजयवाड़ा पुलिस और आंध्र प्रदेश काउंटर-इंटेलिजेंस की अगुवाई में चले इस ऑपरेशन में अब तक 6 राज्यों से 12 संदिग्धों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसके तार ISIS और अलकायदा जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों से जुड़े होने की आशंका है। इस गिरोह का नाम अल मलिक इस्लामिक यूथ बताया जा रहा है।

यह गिरोह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ओसामा बिन लादेन, जाकिर नाइक, इसरार अहमद शेख और अनवर अल-अवलाकी जैसे व्यक्तियों के वीडियो शेयर करता था, ताकि मुस्लिम युवाओं को जिहाद और उग्र विचारधारा की ओर आकर्षित किया जा सके। नेटवर्क के मास्टरमाइंड मोहम्मद रहमतुल्लाह शरीफ को 24 मार्च 2026 को विजयवाड़ा से अरेस्ट किया गया था।

उसके साथ मोहम्मद दानिश और मिर्जा सोहेल बेग को भी पकड़ा गया। जाँच में सामने आया है कि यह नेटवर्क भारत में युवाओं को कट्टरपंथी बनाने, विदेशी हैंडलर्स से संपर्क रखने, साइबर आतंकवाद को बढ़ावा देने और भविष्य में आतंकी हमलों की साजिश रचने में सक्रिय था।

इन शुरुआती गिरफ्तारियों के बाद जाँच का दायरा तेजी से बढ़ा और आंध्र प्रदेश पुलिस ने आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, बिहार और राजस्थान में टीमें भेजीं। इसके बाद विभिन्न राज्यों से अन्य संदिग्धों की पहचान की गई और कुल 12 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

इनमें अल-हकीम शुकूर, मोहम्मद हुजैफा, निंजा, हेमरॉक्सी, अबू मुहरिब, अबू बलुशी और सईदा बेगम जैसे नाम सामने आए हैं।

‘खवातीन’ महिला विंग: हैदराबाद की सईदा बेगम हेड

इस जाँच का सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘खवातीन’ नाम की महिला विंग का खुलासा है। यह एक अलग यूनिट थी, जिसे खास तौर पर महिलाओं की भर्ती और नेटवर्क विस्तार के लिए तैयार किया गया था। हैदराबाद की सईदा बेगम को इस महिला विंग की प्रमुख बताई गई है।

जाँच में सामने आया है कि सईदा बेगम पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर में सक्रिय लोगों के संपर्क में थी और जिहादी गतिविधियों के समन्वय की योजना बना रही थी। एजेंसियों का मानना है कि इस महिला विंग के जरिए नेटवर्क समाज के एक नए वर्ग तक पहुँच बनाने की कोशिश कर रहा था।

विंग में शामिल महिलाओं को प्रचार, कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने और नए सदस्यों को जोड़ने की जिम्मेदारी दी गई थी।

डिजिटल प्लेटफॉर्म से कट्टरपंथ: 40+ अकाउंट से इस्लामिक राष्ट्र बनाने की तैयारी

जाँच में यह भी सामने आया कि इस नेटवर्क ने सोशल मीडिया को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया हुआ था। 40 से अधिक इंस्टाग्राम अकाउंट और कई एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए यह समूह सक्रिय रूप से कट्टरपंथी सामग्री फैला रहा था।

इन प्लेटफॉर्म्स के जरिए ओसामा बिन लादेन, जाकिर नाइक, इसरार अहमद शेख और अनवर अल-अवलाकी जैसे व्यक्तियों के वीडियो शेयर किए जाते थे, ताकि मुस्लिम युवाओं को जिहाद और उग्र विचारधारा की ओर आकर्षित किया जा सके।

सदस्य मास्क पहनकर ISIS के झंडे के साथ तस्वीरें पोस्ट करते थे और ‘वन उम्माह’ जैसे नारे लगाते थे, जिससे एक वैश्विक इस्लामिक राज्य यानी ‘खिलाफत’ की मंशा जाहिर होती थी। समूह ने आपत्तिजनक और भड़काऊ सामग्री भी शेयर की थी, जिसमें राष्ट्रगान का अपमान करते हुए गाली-गलौज के साथ गाने और राष्ट्रीय ध्वज को जलाने जैसे वीडियो शामिल थे।

विदेशी हैंडलर्स, ‘हिजरत’ और आतंक प्रशिक्षण का प्लान

जाँच एजेंसियों के मुताबिक इस नेटवर्क के सीधे संपर्क पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, बांग्लादेश और UAE में बैठे विदेशी हैंडलर्स से थे। इन हैंडलर्स के नाम अल-हकीम शुकूर, अबू बलुशी और अन्य उपनामों से सामने आए हैं। इन विदेशी संपर्कों के जरिए युवाओं को ‘हिजरत’ यानी भारत छोड़कर बाहर जाने के लिए प्रेरित किया जा रहा था।

वहाँ पहले मजहबी तालीम और फिर आतंकी प्रशिक्षण देने का वादा किया गया था। प्रशिक्षण में स्नाइपर राइफल का इस्तेमाल, हथियार चलाना और IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) बनाना शामिल था। जाँच में ऐसे डिजिटल दस्तावेज और वीडियो बरामद हुए हैं, जिनमें ‘ब्लैक पाउडर’ और बम बनाने की विस्तृत जानकारी दी गई थी।

हैंडलर्स ने यह भी आश्वासन दिया था कि भारत में संभावित हमलों के लिए हथियार पाकिस्तान और अफगानिस्तान से उपलब्ध कराए जाएँगे। एजेंसियों को शक है कि इस नेटवर्क से जुड़े कुछ लोग पहले से ही विदेशों के मदरसों में कथित प्रशिक्षण ले रहे थे।

साइबर आतंकवाद, हैकिंग और तकनीकी साजिश, आतंकी साजिश का बड़ा मकसद: ‘खिलाफत’ की स्थापना

यह नेटवर्क केवल वैचारिक प्रचार तक सीमित नहीं था, बल्कि साइबर आतंकवाद की दिशा में भी सक्रिय था। जाँच में सामने आया कि समूह के सदस्य सरकारी वेबसाइटों को हैक करने और साइबर हमले करने की योजना बना रहे थे। डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए ऐसे कंटेंट भी साझा किए गए, जिनमें साइबर अटैक को अंजाम देने के तरीके बताए गए थे।

इससे साफ होता है कि यह नेटवर्क तकनीकी रूप से भी सक्षम बनने की कोशिश कर रहा था और केवल भौतिक हमलों तक सीमित नहीं था। जाँच एजेंसियों के अनुसार इस पूरे नेटवर्क का अंतिम उद्देश्य भारत में एक इस्लामिक राज्य या ‘खिलाफत’ स्थापित करना था।

‘वन उम्माह’ जैसे नारों और ISIS के प्रतीकों के इस्तेमाल से यह इरादा स्पष्ट होता है कि यह समूह एक वैश्विक कट्टरपंथी विचारधारा से प्रेरित था। एजेंसियों का मानना है कि यह नेटवर्क भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है, जो विचारधारा, प्रशिक्षण और संसाधनों के स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

फंडिंग, जाँच और आगे की कार्रवाई

सुरक्षा एजेंसियाँ अब इस नेटवर्क की फंडिंग के स्रोतों का पता लगाने में जुटी हैं। यह भी जाँच की जा रही है कि विदेशी हैंडलर्स से पैसे किस माध्यम से भारत में भेजे जा रहे थे और किन-किन लोगों तक यह फंडिंग पहुँची। इसके अलावा एजेंसियाँ उन युवाओं की पहचान करने की कोशिश कर रही हैं, जिन्हें इस नेटवर्क ने निशाना बनाया था या जो इसके संपर्क में आए थे।

संभावना है कि आने वाले समय में और गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं। फिलहाल जाँच एजेंसियाँ इस नेटवर्क की हर कड़ी को जोड़ने, इसके पूरे तंत्र को समझने और इसे पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए देशभर में व्यापक स्तर पर कार्रवाई कर रही हैं।