Home Blog Page 86

भोजशाला पर ASI रिपोर्ट का विश्लेषण: जानें कैसे कॉन्ग्रेस सरकार ने मंदिर के हिस्से में शुरू कराई थी नमाज, जो आज बन गई है गले की फाँस

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला मंदिर, जो कि माता सरस्वती का मंदिर माना जाता है, एक बार फिर से चर्चा में है। इस मंदिर के एक हिस्से में मुस्लिम एक दरगाह बनाकर नमाज पढ़ते थे। इस बात को लेकर 2022 में हिंदू पक्ष ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में अपील की और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से इस मंदिर की जाँच कराने की माँग की।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एएसआई को यह आदेश दिया कि वह इस भोजशाला की जाँच करें और यह पता करें कि यह स्थान वाकई में मंदिर है या मस्जिद है। एएसआई ने अपनी जाँच पूरी की और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सबूत के साथ यह तथ्य रखा, कि भोजशाला कोई मस्जिद नहीं बल्कि एक मंदिर है।

ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार 1034 इस्वी में यानी 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज ने इस मंदिर की स्थापना की थी। यह मंदिर चूँकि माता सरस्वती का मंदिर था, इसलिए यह पूजा के स्थान होने के साथ-साथ पढ़ने लिखने वाला स्थान भी था। ऐसा माना जाता है, कि इस स्थान पर माता सरस्वती प्रकट भी हुई थीं।

जब भारत के उत्तरी हिस्से में मुस्लिम राजवंशों का शासन शुरू हुआ तो स्वाभाविक रूप से उन्होंने हिंदू मंदिरों को नष्ट करने की शुरुआत की। इसी क्रम में 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने इस मंदिर पर आक्रमण करके, यहां पर अध्ययन कर रहे 1200 से अधिक हिंदू छात्रों को बंदी बना लिया था और उन्हें इस्लाम कबूलने से मना करने पर मार दिया था। 

खिलजी के बाद एक और मुस्लिम आक्रांता दिलावर खान ने 1401 ईस्वी में सरस्वती मंदिर भोजशाला के एक हिस्से को दरगाह में बदल दिया। जिस हिस्से को दरगाह में बदला गया था वह हिस्सा विजय मंदिर कहलाता था। और उसी विजय मंदिर को कमाल मौला मस्जिद नामक दरगाह में बदलकर मुस्लिमों ने इसमें नमाज पढ़ना शुरू कर दिया। 

इस तरह से एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में इस स्थल के विकास को 3 स्पष्ट चरणों में विभाजित किया है, जो इसके क्रमिक अतिक्रमण और परिवर्तन को दर्शाता है ।

  1. प्रथम चरण 10वीं-11वीं शताब्दी के बीच का है जब ईंटों से बनी शुरुआती संरचना मिलती है, जो शायद महाराजा भोज से भी पहले की हो सकती है।
  2. द्वितीय चरण महाराजा भोज के समय का है, 11वीं-13वीं शताब्दी का, यानी परमार काल के दौरान बेसाल्ट पत्थरों से निर्मित भव्य मंदिर और विश्वविद्यालय। इसी काल में नक्काशीदार स्तंभ और संस्कृत शिलालेख बनाए गए थे। 
  3. तृतीय चरण में 14वीं शताब्दी के बाद का दौर आता है, जब मंदिर की जगह मस्जिद और दरगाह का निर्माण किया गया। इस चरण में मंदिर को तोड़ा गया, मूर्तियों को विखंडित किया गया और चूना पत्थर का उपयोग करके मेहराब, गुंबद और मीनारें जोड़ी गईं। 

जब अंग्रेजों का शासन आया तो कर्जन ने भोजशाला मंदिर से सरस्वती माता की मूर्ति निकाल कर लंदन भेज दिया। 

आजादी के बाद भी लगातार, इस्लामिक कट्टरपंथी इस मंदिर में नमाज पढ़ने की कोशिश करने लगे, लेकिन पहले तो आर्य समाज फिर संघ के लोगों ने उनको ऐसा करने से रोका। 

मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने 90 के दशक में मुसलमानों को मंदिर में नमाज पढ़ने की इजाजत दे दी थी। बाद में 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मध्य प्रदेश की सरकार को यह निर्देश भिजवाया कि हिंदुओं के लिए भी भोजशाला मंदिर के दरवाजे खुलवाए जाए। अटल बिहारी वाजपेयी के निर्देश के बाद भोजशाला मंदिर को खुलवाया गया।

बहरहाल साल 2022 में हिंदू पक्ष की तरफ से हरिशंकर जैन, विष्णु शंकर जैन और विनय जोशी ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई। याचिका में यह मांग की गई कि इस मंदिर का पुरातात्विक सर्वेक्षण कराया जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए। 

हिन्दु याचिकाकर्ताओं ने यह भी माँग की, कि इस मंदिर में हिंदुओं को पूजा की अनुमति दी जाए। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एएसआई को एक टीम गठित करने का आदेश दिया। एएसआई की तरफ से आठ लोगों की एक टीम गठित की गई थी, जो भोजशाला की जांच कर रहे थे और उन आठ लोगों में से तीन मुस्लिम थे। 

एएसआई ने अपनी डिटेल रिपोर्ट में साफ लिखा है कि अभी जो स्ट्रक्चर बना है यानी कि जो मस्जिद बनी है, वह एक पहले से मौजूद स्ट्रक्चर के ऊपर बनी है। वह बेसिक स्ट्रक्चर अभी भी मौजूद है और उसके ऊपर सिर्फ बेसाल्ट की एक मोटी परत बिछाकर मस्जिद का निर्माण किया गया है। कार्बन डेटिंग के आधार पर एएसआई ने कहा कि बेसिक स्ट्रक्चर 10वीं और 11वीं शताब्दी के आसपास का है। यहाँ तक कि मंदिर में जो सिक्के मिले हैं, उनमें सबसे प्राचीन सिक्का जो है, वह भी 10वीं शताब्दी का ही है। स्वाभाविक है, कि दसवीं शताब्दी तक तो इस्लाम मध्य प्रदेश तक पहुँचा ही नहीं था। 

एएसआई ने यह बताया है कि दसवीं शताब्दी के अनेक ऐसे अभिलेख मिले हैं, जिसमें पारिजात मंजरी लिखी गई है, और उसमें शारदा सदन लिखा है। शारदा सदन यानी माता सरस्वती का घर। मुसलमान कब से अरबी छोड़कर संस्कृत और प्राकृत में ‘शारदा सदन’ का गुणगान करने लगे?

एएसआई ने यह भी बताया है, कि मंदिर के ढांचे पर जो अवैध मस्जिद बनाई गई है, वह इतनी जल्दबाजी में बनाई गई है कि उसमें किसी भी सिमेट्री, डिजाइन और मटेरियल पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया है। ऐसा लग रहा है, जैसे केवल चूना पत्थर पोत कर कुछ कब्ज़ा करने की कोशिश की जा रही है। जबकि इसके ठीक दूसरी ओर जो पुराना मंदिर है, उसमें सिमेट्री, डिजाइन और मटेरियल हर चीज का ध्यान रखा गया है। कलाकृतियाँ भी की गई है, कमल के फूल बनाए गए हैं।  

आगे बढ़ते हुए एएसआई ने यह भी खुलासा किया है कि अवैध मस्जिद को बनाने में जिन खम्भों का इस्तेमाल किया गया है, वह मूल रूप से मंदिर के खम्भे थे। मंदिर में जो पत्थरों के शिलालेख मिले हैं उस पर भगवान गणेश, और भगवान नरसिंह के अलावा अनेक देवी-देवताओं की मनुष्यों की और पशुओं की चित्रकारी भी की गई है। यह अपने आप में एक सबूत है, क्योंकि दुनिया की किसी भी मस्जिद में किसी पशु की या किसी मनुष्य की चित्रकारी नहीं होती। 

इसके आगे एएसआई एक ऐसी बात बताता है जिसे सुनकर आपकी भी हंसी छूट आएगी. आमतौर पर हिंदू मंदिरों में नक्काशी की जाती है और उसमें पत्थरों पर कुछ लिखा जाता है। आप सबने अपने आसपास के मंदिरों में देखा होगा। भोजशाला मंदिर में भी पत्थर पर नक्काशी की गई है। ठीक उसी तर्ज पर अवैध मस्जिद में भी मुस्लिमों के द्वारा कुछ लिखा गया था। जब एएसआई ने उस लिखावट का अध्ययन किया, तो यह पता चला है कि अवैध मस्जिद में फारसी और अरबी में जो कविताएँ लिखी गई हैं, वह पत्थर को खोदकर नहीं लिखी गयी थीं, बल्कि उसको स्याही से लिखा गया था।

एएसआई ने यह भी बताया, कि अवैध मस्जिद के निर्माण में, मंदिर के जिन पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था, उन पत्थरों पर से संस्कृत श्लोक और देवी- देवताओं की आकृतियों को जानबूझकर छेनी से तराश कर मिटाया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, 106 स्तंभों और 82 पिलास्टर्स पर उकेरी गई देवी-देवताओं और मनुष्यों की आकृतियों को मस्जिद की आवश्यकताओं के अनुरूप जानबूझकर छेनी से काटकर विरूपित किया गया था।

इसके अलावा अनेक अभिलेख ऐसे मिले हैं, जिसमें प्राकृत भाषा में कविताएँ लिखी गई है। महाराजाधिराज परमेश्वर भोज देव को संबोधित करते हुए कविताएँ लिखी गई है, जो कि स्वाभाविक तौर पर इस मंदिर को परमार वंश के राजाओं द्वारा निर्मित बताती है। कई अभिलेख पर ओम नमः शिवाय और ॐ सरस्वती नमः भी लिखा मिला है। 

कुल मिलाकर इस मंदिर में वह सब कुछ है, जिन्हें इस्लाम हराम मानता है। एएसआई की यह रिपोर्ट केवल कागजों का एक पुलिंदा नहीं है, बल्कि यह उन हजारों सालों के इतिहास का  इकबालिया बयान है, जिसे मिट्टी और चूने के नीचे दफनाने की कोशिश की गई थी। विडंबना देखिए, कि जिसे मिटाने के लिए छेनी और हथौड़े चलाए गए, वही निशान आज सनातनी होने का सबसे बड़ा प्रमाण बन गए। एएसआई की इस रिपोर्ट के बाद मुस्लिम पक्ष का क्या आधार होगा और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट आगे इस मुद्दे पर क्या फैसला सुनाता है, यह देखने वाली बात होगी। 

हिजाब- नमाज और रमजान: ‘मुस्लिम पार्टनर’ से जुड़कर यही रह जाती है हिंदू महिला इन्फ्लुएंसर्स की पहचान? पढ़ें फेमस वड़ा पाव गर्ल तक क्यों है इन 12 की लिस्ट में

रमजान का महीना शुरू हो चुका है, सोशल मीडिया पर हर तरफ मुस्लिम लोग इसको लेकर वीडियो पोस्ट कर रहे हैं। वहीं सोशल मीडिया पर कुछ ऐसी भी तस्वीरें है, जिनमें हिंदू महिला एंफ्लुएंसर्स से लेकर फिल्म एक्ट्रेस तक भी रमजान मनाते नजर आती हैं। ये सभी मुस्लिम पार्टनर के साथ रिश्ते में हैं।

इनमें से कई महिलाओं ने निकाह के बाद इस्लाम कबूल किया, तो कोई उससे पहले ही मुस्लिम तौर-तरीकों को अपनाने लगा है। ये महिलाएँ रमजान के दौरान रोजा रखती हैं, नमाज अदा करती हैं और हिजाब में अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करती हैं। इनमें चर्चित इंफ्लुएंसर कनिका शर्मा, टीवी एक्ट्रेस जैस्मीन भसीन, फिल्म एक्ट्रेस सोनाक्षी सिन्हा, फिल्म एक्ट्रेस स्वरा भास्कर जैसे नाम शामिल हैं।

कनिका शर्मा

इनमें सबसे पहला नाम कनिका शर्मा का है। कनिका शर्मा ब्राह्मण हैं, वे अपने मुस्लिम बॉयफ्रेंड के साथ यूट्यूब वीडियो बनाती हैं, जिसमें वे इस्लाम को एंब्रेस करती नजर आती है। बुर्का पहनकर वीडियो बनाती हैं। यहाँ तक की रोजा और नमाज पढ़ते हुए भी उनकी वीडियो सामने आते हैं। इस साल कनिका ने रोजा भी रखा है, एक वीडियो में कनिका ‘कलमा’, ‘अल्हम्दुलिल्लाह’ और ‘बिस्मिल्लाह’ जैसी इस्लामी दीन सीखती नजर आ रही हैं।

कनिका और साकिब दोनों लिव-इन में रहते हैं। हाल ही में उन्होंने एक घर भी खरीदा है, उसके ‘हाउस टूर’ वीडियो पर काफी बवाल भी मचा था। वीडियो में कनिका घर का मंदिर दिखाते हुए कहती हैं कि वो इसमें कुरान या भगवद गीता भी रखे सकते हैं, क्योंकि उन्हें किसी भी धर्म से कोई आपत्ति नहीं है। तभी पीछे से साकिब कहता है कि उन्हें दिक्कत है, क्योंकि वे सिर्फ मुस्लिम मजहब मानते हैं।

एक और वीडियो में कनिका अपने फॉलोवर्स से पूछती हैं कि वो हिंदू हैं और साकिब मुस्लिम हैं, तो क्या उन्हें शादी करनी चाहिए। वीडियो में साकिब कहता है कि उनके ‘मकसद’ बहुत बड़े हैं।

शिल्पा खतवानी

सिंधी हिंदू परिवार से ताल्लुक रखने वाली इंफ्लुएंसर शिल्पा खतवानी ने साजिद शाहिद नाम के इंफ्लुएंसर से निकाह किया है। दोनों जामिया मिलिया इस्लामिया से मास्टर्स करने के दौरान मिले थे। दोनों के दो बच्चे हैं, जिनके नाम सहर शाहिद और साहिर शाहिद हैं।

(फोटो साभार: Instagram)

दोनों सोशल मीडिया पर कॉमेडी वीडियो बनाते हैं। वीडियो में साजिद अपनी बीवी का मजाक बनाते दिखते हैं। वही साजिद से निकाह के बाद शिल्पा अक्सर मुस्लिम तौर-तरीकों को निभाती हैं। वे रमजान और ईद मनाती हैं। रोजा रखते हुए और अल्लाह पर भी वीडियो पोस्ट करती हैं।

चंद्रिका दीक्षित

‘वड़ा पाव गर्ल’ नाम से फेमस चंद्रिका दीक्षित अपने पति युगम गेरा को छोड़कर एक अजनबी व्यक्ति के साथ वीडियोज बनाना शुरू किया है। ये कौन है, किसी को नहीं पता। सोशल मीडिया पर इसका ‘मिस्ट्रीमैन‘ नाम से अकाउंट है। लेकिन लोग अंदाजा यही लगाते हैं कि ये मुस्लिम है क्योंकि इससे जुड़ने के बाद चंद्रिका दीक्षित अचानक से हिजाब पहनकर वीडियो बनाती दिखी हैं।

चंद्रिका ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शब-ए-बरात जैसे वीडियो पोस्ट की है। इस वीडियो को रमजान से एक दिन पहले बनाया गया है। इससे पहले कभी चंद्रिका ने रमजान या ईद को लेकर कोई वीडियो नहीं बनाई है। वहीं रिपोर्ट्स के अनुसार चंद्रिका का अपने पति के रिश्ता बिगड़ गया है, जिसमें तलाक की नौब तक आ गई है।

शालिनी सूर्यवंशी

टिकटॉक से फेमस हुई इंफ्लुएंसर शालिनी सूर्यवंशी ने मुस्लिम इंफ्लुएंसर शादाब खान से निकाह किया है। शादाब खान वही है, जिसने पहले इंफ्लुएंसर मुस्कान शर्मा को फँसाया और कई सालों तक डेट करने के बाद छोड़ दिया। शालिनी ने निकाह के बाद इस्लाम के तौर-तरीकों को अपनाया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, शालिनी ने नाम बदलकर एलिना खान रख लिया है। हालाँकि, उनके इंस्टाग्राम अकाउंट पर अब भी उनका नाम शालिनी सूर्यवंशी ही है।

(फोटो साभार: Instagram)

यूट्यूब पर वीडियोज में शालिनी अपने व्लॉग्स में रमजान और ईद मनाते नजर आती हैं। शादाब से निकाह के कुछ समय बाद तक उनके सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट में उन्हें हिजाब और बुर्का पहने भी देखा गया। ब्राह्मण शालिनी अपने वीडियो में नॉन-वेज को भी प्रमोट करती हैं।

मुस्कान शर्मा

इंफ्लुएंसर मुस्कान शर्मा हिंदू होने के बावजूद अपने जीवन में इस्लाम तौर-तरीकों को अपनाती हैं। ऐसा तब से हुआ, जब से इंफ्लुएंसर शादाब खान के साथ उनका रिलेशनशिप सामने आया था। शादाब खान के साथ मुस्कान अक्सर इस्लाम को प्रमोट करते हुए वीडियोज बनाती थीं। हालाँकि, 8-10 के रिलेशन के बाद दोनों का ब्रेकअप हो गया।

इसके बाद मुस्कान अबू धाबी शिफ्ट हो गईं। रिपोर्ट के अनुसार, वह घर पर मेकअप आर्टिस्ट बनने के बहाना बताकर गई थीं, लेकिन वहाँ जाने के बाद अपने हिंदू परिवार से दूरी बना ली। अबू धाबी में मुस्कान हिजाब पहनकर घूमते हुए फोटो-वीडियो पोस्ट करती हैं।

पिछले साल 2025 में खबर आई थी कि मुस्कान शर्मा ने सैयद मोहसिन नाम के मुस्लिम व्यक्ति से गुप्त निकाह कर लिया है, जो अबु धाबी का ही रहने वाला है। इस्लामी तौर-तरीके से हुए इस निकाह की तस्वीरें भी सामने आई थीं, जिसमें मुस्कान को सफेद फूलों की चादर, ऑफ-व्हाइट शरारा में देखा गया था। यह भी खबरें हैं कि मुस्कान के घरवाले इस निकाह के खिलाफ हैं।

जैस्मीन भसीन

सिख धर्म से ताल्लुक रखने वाली टीवी सीरियल की एक्ट्रेस और बिग बॉस 14 फेम जैस्मीन भसीन साल 2020 से अली गोनी को डेट कर रही हैं। वह साल 2025 से अपने मुस्लिम बॉयफ्रेंड के साथ लिव-इन में रह रही हैं। दोनों का रिलेशनशिप अक्सर विवादों में घिरा रहता है।

हाल ही में गणेश विसर्जन के दौरान अली गोनी और जैस्मीन भसीन का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें जैस्मीन ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयकारे लगा रही हैं, जबकि फ्रेम में साथ दिख रहे अली गोनी च्विंगम चबा रहे हैं। बाद में अली गोनी कहते हैं कि उनके मजहब में पूजा करने की इजाजत नहीं है, ट्रोलर्स को धमकी दी कि उनकी गर्दन काट दूँगा।

वहीं दूसरी तरफ जैस्मीन भसीन इस्लाम को एंब्रेस करती नजर आती हैं। 2023 में जैस्मीन की तस्वीरें सामने आई, जिसमें वे अबु धाबी की शेख जैयद मस्जिद में अबाया पहने दिखती हैं। इन फोटो को शेयर करते हुए जैस्मीन ने लिखा, “स्वर्ग का एक बगीचा।”

करीना कपूर

फिल्म एक्ट्रेस करीना कपूर जो पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखती हैं। करीना ने बॉलीवुड के जाने-माने एक्टर सैफ अली खान से शादी की है, जो उनकी दूसरी बीवी है। इससे पहले भी सैफ अली खान ने हिंदू एक्ट्रेस अमृता सिंह से शादी की थी, जिससे उनके दो बच्चे सारा अली खान और इब्राहिम अली खान हैं।

(फोटो साभार: Masala.com)

करीना कपूर और सैफ अली खान के भी दो बच्चे हैं। इन दोनों के नाम मुगल शासकों के नाम पर रखे गए हैं। पहले बेटे का नाम तैमूर अली खान और दूसरे बेटे का नाम जहाँगीर अली खान है। करीना कपूर को अक्सर सैफ अली खान के साथ हिजाब पहने मक्का मदीना जाते देखा गया है। हालाँकि वह कई इंटरव्यू में कहती आई हैं कि वे रोजा नहीं रखती हैं, वही सैफ अली खान भी कह चुके हैं कि वो कभी नहीं चाहेंगे कि करीना अपना धर्म बदलें।

सोनाक्षी सिन्हा

बॉलीवुड के दिग्गज एक्टर और TMC के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा की स्टार बेटी सोनाक्षी सिन्हा ने साल 2024 में जहीर इकबाल से स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत कोर्ट मैरिज की। दोनों की शादी पर कई सवाल उठे, लेकिन हर बार सोनाक्षी सिन्हा ने धर्म पर बयान देने से पर्दा किया है।

हालाँकि, सोशल मीडिया पर सोनाक्षी सिन्हा के फोटो-वीडियो कुछ और कहानी बयाँ करते हैं। शादी के बाद सोनाक्षी सिन्हा अपने पति जहीर इकबाल के साथ अबू धाबी के शेख जायद ग्रैड मस्जिद पहुँचती है। इसकी फोटो शेयर करते हुए सोनाक्षी कहती हैं, “यहाँ सुकून मिला।” कुछ रिपोर्ट्स का यह भी कहना है कि बेटी की शादी से उनके पिता शत्रुघ्न खुश नहीं है।

स्वरा भास्कर

फिल्म एक्ट्रेस स्वरा भास्कर ने फरवरी 2023 में समाजवादी पार्टी के नेता फहद अहमद से कोर्ट मैरिज की। उनके निकाह को बरेली के मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने ‘गैर जायज’ ठहराते हुए कहा कि पहले इस्लाम कबूर करे, तभी निकाह जायज होगा।

ऐसा देखा भी गया कि निकाह के बाद स्वरा भास्कर ने इस्लाम के तौर-तरीके अपनाए। वे सोशल मीडिया पर इफ्तार की तस्वीरें साझा करती हैं। वहीं वे मौलाना सज्जाद नौमानी से भी मिल चुकी है, जिसमें उन्होंने दुपट्टे से सिर ढका हुआ था। नेटिजन्स ने इस पर निकाह के बाद बदले पहनावे को लेकर सवाल किए थे। स्वरा ने अपनी बेटी का भी मुस्लिम नाम ‘राबिया’ रखा है।

वहीं स्वरा के शौहर फहद हिंदू रीति-रिवाजों और त्योहारों से परहेज करते हैं। पिछले साल होली की तस्वीरों में फहद को बेरंग देखा गया था, जबकि स्वरा और उनकी बेटी राबिया ने गुलाल लगाया हुआ था। इस पर नेटिजन्स ने खूब सवाल किए थे।

स्वरा भास्कर का फिल्म करियर खत्म हो चुका है। लेकिन फिर भी वह आए दिन चर्चा में बनी रहती हैं। निकाह से पहले हिंदू रहीं स्वरा भास्कर अब निकाह के बाद हिंदुओं के खिलाफ बयानबाजी और मुस्लिमों के हित में बयान देती भी नजर आती है। उन्होंने RSS को ‘संघी कीड़ा‘ तक कहा था।

दीपिका कक्कड़

टीवी सीरियल ‘ससुराल सिमर का’ से घर-घर में लोकप्रियता हासिल करने वाली दीपिका कक्कड़ ने साल 2018 में को-एक्टर शोएब इब्राहिम से मुस्लिम तौर-तरीके से निकाह किया। निकाह के बाद दीपिका कक्कड़ ने धर्म परिवर्तन कर फैजा बन गईं। दोनों का निकाह का कार्ड खूब वायरल हुआ था, जिसमें दीपिका का नाम ‘फैजा‘ लिखा हुआ था।

(फोटो साभार: ABP)

हालाँकि, दीपिका ने भी सार्वजनिक तौर पर कहा है कि वे इस्लाम कबूल चुकी हैं और यह उनके लिए गर्व की बात है। कुछ लोगों ने इसे लव जिहाद बताया था। बिग बॉस सीजन 12 की ट्रॉफी जीतने के बाद भी दीपिका सबसे पहले अजमेर शरीफ गईं। निकाह के बाद से ही दीपिका ने मुस्लिम तौर-तरीकों को पूरी तरह अपनाया भी है, यह उनके यूट्यूब चैनल पर पोस्ट किए गए व्लॉग में साफ दिखता है।

दीपिका ने नमाज पढ़ते हुए वीडियो शेयर की हैं। यहाँ तक कि रमजान के महीने को वह काफी उत्साह के साथ मनाती दिखती हैं। वे अक्सर बुर्के और हिजाब में अपनी फोटो शेयर करती रहती हैं। दूसरी तरफ, जब भी दीपिका हिंदू त्योहार मनाती हैं, तो सोशल मीडिया पर बैठे इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें ट्रोल करने आ जाते हैं।

ऋचा चड्ढा

पंजाबी समाज से आने वाली फिल्म एक्ट्रेस ऋचा चड्ढा ने साल 2020 में एक्टर अली फजल से कोविड के दौरान स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत कोर्ट मैरिज की थी। इस मैरिज को दो साल तक गुप्त रखा गया था। साल 2024 में ऋचा ने बेटी को जन्म दिया, जिसका नाम जुनैरा इदा फजल रखा।

ऋचा चड्ढा पर्सनल लाइफ सोशल मीडिया पर शेयर नहीं करती हैं। हालाँकि, वे अपने राजनीतिक टिप्पणी को लेकर अक्सर विवादों में रहती हैं। 2022 में गलवान घाटी पर उन्होंने अपमानजनक टिप्पणी की थी। उन्होंने सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा था- “Galwan Says hi” बाद में इसके लिए ऋचा को माफी तक माँगनी पड़ी। इसके अलावा उन्होंने 2020 में JNU में देश-विरोधी प्रदर्शन का भी समर्थन किया था।

देवोलीना भट्टाचार्य

टीवी सीरियल एक्ट्रेस देवोलीना भट्टाचार्य ने दिसंबर 2022 में शहनवाज शेख से शादी की। शहनवाज मुस्लिम हैं, जबकि देवोलीना बंगाली हिंदू परिवार से असम की हैं। देवोलीना के बिग बॉस 15 में शामिल होने से पहले से ही दोनों करीब थे। साल 2022 में दोनों ने कोर्ट मैरिज की। देवीलीना कहती हैं कि उनका परिवार इस शादी से खुश नहीं था।

देवोलीना अपनी पर्सनल लाइफ को सोशल मीडिया पर शेयर नहीं करती हैं। लेकिन शहनवाज के साथ शादी के बाद उन्होंने तस्वीरे साझा की थी, जिसके बाद उनके फैंस ने लव जिहाद का शिकार होने को लेकर चिंता जताई। हालाँकि, शादी के बाद भी देवोलीना अक्सर हिंदू रीति-रिवाज और त्योहारों को मनाते तस्वीरें शेयर करती रहती हैं।

ये ‘चर्चित’ महिलाओं के समाज को क्या दे रही संदेश?

ये वही महिलाएँ हैं, जिन्हें करोड़ों लोग फॉलो करते हैं। कोई इनके जैसा बनना चाहता होगा, तो कोई इन्हें देखकर अपना जीवन सुधारना चाहता होगा। लेकिन अगर यही इंफ्लुएंसर और फिल्म एक्ट्रेस मुस्लिम से शादी कर इस्लाम को एंब्रेस करने में लगी हुई हैं। तो आखिर उन हिंदू लड़कियों का क्या, जो इन्हें देखकर मुस्लिम से दोस्ती करती हैं और नतीजा लव जिहाद, धर्मांतरण, रेप और अंत में सुसाइड तक बात पहुँच जाती है।

अंत में यही कहना जरूरी है कि किसी के निजी जीवन में क्या हो रहा है, वह उसका अपना फैसला होता है और उससे हमें व्यक्तिगत तौर पर कोई मतलब नहीं होना चाहिए। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि ये वही महिलाएँ हैं, जिन्हें करोड़ो लोग सोशल मीडिया पर फॉलो करते हैं। कोई इनके जैसा बनना चाहता है, तो कोई इनके लाइफस्टाइल, सोच और फैसलों से प्रेरणा लेता है। ऐसे में इनकी हर बात, हर तस्वीर और हर फैसला केवल निजी नहीं रह जाता, बल्कि एक बड़े वर्ग तक संदेश पहुँचाता है।

जब कोई चर्चित चेहरा किसी मुस्लिम आदमी से निकाह करने का फैसला करता है, तो उसका प्रभाव उसके फॉलोवर्स पर पड़ता है। वही सोशल मीडिया फॉलोवर्स, जिनमें 18-25 उम्र की लड़कियाँ भी हैं, जो अभी समाज के भीतर बैठे कलंक को नहीं समझती हैं। वे लड़कियाँ इन चर्चित चेहरों से प्रेरणा लेती हैं।

बिना पूरी समझ और परिपक्वता के सिर्फ प्रभावित होकर वे भी मुस्लिम से दोस्ती करती हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर लड़कियों का यह फैसला उनके जीवन का सबसे गलत फैसला साबित होता है। फिर सामने आते हैं लव जिहाद, जबरन धर्मांतरण, बलात्कार जैसे मामले। रिपोर्ट्स में भी साफ है कि इनमें अधिकतर पीड़िताओं की उम्र 18-25 उम्र के बीच की होती है।

आखिर में यही कहना होगा कि किसी भी रिश्ते या धर्म से जुड़ा फैसला भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि समझ और सतर्कता के साथ लिया जाना चाहिए, क्योंकि आप ‘पब्लिक फेस’ हैं और आपके हर कदम का असर समाज पर पड़ता है। उस युवा पीढ़ी पर पड़ता है, जो सबसे पहले अपना भविष्य सँवारना चाहेगी। न कि किसी ‘अब्दुल’ के साथ निकाह कर इन चर्चित चेहरो का जीवन जीना चाहेगी।

DJ पर जातिगत गाने की वजह से विवाद, अलीगढ़ में तनाव की पुलिस ने बताई सच्चाई: सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे भ्रम को लेकर किया सचेत

अलीगढ़ के जवां क्षेत्र में जाटव और ठाकुर समाज के लोगों के बीच तनाव का माहौल है। दोनों तरफ से मारपीट के बाद पहुँची पुलिस ने मामले को शांत कराया। ये झगड़ा डीजे पर बजाए गए जातिगत गाने की वजह से हुआ। इस मामले में किसी के घायल होने की खबर नहीं है। पुलिस ने विवाह कार्यक्रम वैसे ही जारी रखवाया और शांति कायम करवाई।

क्या था मामला

जाटव समाज के एक परिवार में बारात आ रही थी, वह जब ठाकुर बहुल क्षेत्र से आगे बढ़ी, तो ‘छोरा जाटव को ले जाएगी’ गाना डीजे पर बजाया गया। बारात हरियाणा के पलवल से आई थी। रात करीब 9.15 बजे बारात ठाकुर बहुल क्षेत्र से गुजर रही थी, तभी जातिगत उद्देश्य से ये गाना बजाया गया था। इसका ठाकुर समुदाय ने विरोध किया।

दोनों तरफ से कहासुनी शुरू हो गई और पत्थरबाजी तक जा पहुँची। मौके पर पहुँची पुलिस ने दोनों समुदायों को समझा-बुझाकर शांत कराया। बारात आगे बढ़ी और शादी संपन्न हुई। पुलिस का कहना है कि बारातियों ने जातिगत उद्देश्य से गाना बजा दिया था। इसका स्थानीय लोगों ने विरोध किया।

मौके पर पहुँची पुलिस से सभी को समझाया और मामले को शांत कराया। बारात को गंतव्य तक पहुँचा दिया गया और शादी धूमधाम से संपन्न हुई। पुलिस का कहना है कि जिन लोगों ने माहौल खराब करने की कोशिस की, उन्हें चिन्हित किया जा रहा है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

सोशल मीडिया पर भ्रम फैलाए जा रहे हैं

ठाकुर और दलित समुदाय के बीच हुए झगड़े का जो वीडियो वायरल हो रहा है उसमें कहा जा रहा है कि बारात पर पथराव किया गया और बारात को जाने नहीं दिया जा रहा था। इस मुद्दे को जातिगत उन्माद फैलाया जा रहा है।

इस पर पुलिस का कहना है कि दोनों समुदायों के बीच झगड़ा बढ़ाने के उद्देश्य से जिसने भी सोशल मीडिया पर गलत तरीके से घटना को पेश किया है, उसे चिन्हित किया जा रहा है। उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल गाँव में हालात सामान्य हो गए हैं और पुलिस पूरी सतर्कता बरत रही है।

एटा में भी आया था ऐसा ही मामला

कुछ दिन पहले एटा का भी एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें जाटव समाज की बारात को रोकने और हमला करने का आरोप लगाया गया था। इसमें शाक्य समाज पर आरोप लगा था कि उन्होंने जाटव समुदाय के बारात को रोका और दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया। जबकि हकीकत ये थी कि जाटव समुदाय के लोग शाक्य समुदाय के कार्यक्रम में पहुँच गए थे और डीजे पर डांस के दौरान विवाद हुआ था।

पुलिस ने भी बताया था कि यह घटना एकतरफा हमले का नहीं था, बल्कि दलितों द्वारा ओबीसी समुदाय में आने वाले शाक्यों पर बिना उकसावे के हमला किया। ये लोग ही शाक्यों के कार्यक्रम में बगैर बुलावे के पहुँच गए थे।

इसके बावजूद सोशल मीडिया पर जाति व्यवस्था पर तंज कसते हुए योगी सरकार के खिलाफ जहर उगले गए थे। इस बार भी योगी सरकार को ठाकुरों को साथ देने का आरोप लगा कर समाज को बाँटने की कोशिश की जा रही है। हिन्दुओं के बीच नफरत का बीज बोया जा रहा है।

स्वरा भास्कर की रसोई में दिखा नेस्ले ब्रांड का प्रोडक्ट, तो इस्लामी कट्टरपंथियों ने लताड़ा: गाली पड़ने के बाद नया Video बनाकर ‘Free Palestine’ के ढोंग में लिबिर-लिबिर करने लगी अभिनेत्री, बोली- अभी सीख रही हूँ

देखिए, दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे जो किसी ना किसी खास मसले पर अपनी राय देकर सुर्खियों के सैलाब में सराबोर हो जाया करते हैं और दूसरे वे, जो हर मसले पर अपनी टाँग अड़ाकर सुर्खियों के सैलाब में नहीं, बल्कि विवादों की दरिया में गोता लगाने के आदी हो जाते हैं। इसी दूसरे किस्म के लोगों में नाम आता है अभिनेत्री स्वरा भास्कर का।

स्वरा भास्कर अपनी अदाकारी से ज्यादा अपनी ‘सेलेक्टिव एक्टिविज्म’ के लिए जानी जाती हैं। स्वरा का एक नया वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है, जिसमें उनके पाखंड की सारी परतें खुल गई हैं। भारत की तरक्की और हिंदू हितों पर चुप्पी साधने वाली स्वरा, फिलिस्तीन के मुद्दे पर इतनी सक्रिय हैं कि अब वे ब्रांड्स के ‘सर्टिफिकेट’ बाँटने लगी हैं। लेकिन जैसे ही इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें गाली दी और लताड़ लगाई तो तुरंत भिगी बिल्ली बन गई।

इफ्तार, फ्रूट क्रीम और नेस्ले का विवाद: कैसे शुरू हुआ पाखंड का खेल?

हाल ही में स्वरा भास्कर ने सोशल मीडिया पर अपनी ‘इफ़्तार’ की तैयारियों का एक वीडियो साझा किया था, जिसे अब डिलीट कर दिया गया है। वीडियो में वे बड़े चाव से ‘फ्रूट क्रीम’ बनाती नजर आ रही थीं। लेकिन इस ‘फ्रूट क्रीम’ ने उनके लिए कड़वाहट पैदा कर दी। वीडियो में उन्होंने ‘नेस्ले मिल्कमेड’ (Nestle Milkmaid) का इस्तेमाल किया था। जैसे ही यह वीडियो वायरल हुआ, इस्लामी कट्टरपंथियों और फिलिस्तीन समर्थकों ने स्वरा को आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया।

दरअसल, इजरायल-फिलिस्तीन विवाद के चलते इस्लामी कट्टरपंथी गुट नेस्ले जैसे ब्रांड्स के बहिष्कार (Boycott) की माँग करते हैं। स्वरा, जो खुद को BDS (Boycott, Divestment and Sanctions) आंदोलन का स्वघोषित ब्रांड एंबेसडर मानती हैं, उन्हें उनके ही ‘ईको-चेंबर’ ने गालियाँ देना और पाखंडी कहना शुरू कर दिया। अपनों से मिली इस लताड़ ने स्वरा को इतना डरा दिया कि वे तुरंत सफाई देने के लिए कैमरे के सामने आ गईं।

‘मैं अभी सीख रही हूँ’: भीगी बिल्ली बनकर दी सफाई

अपने नए ‘गेट रेडी विद मी’ (GRWM) वीडियो में स्वरा तैयार होते हुए सफाई देती नजर आईं। वीडियो में स्वरा भास्कर ने जो कहा, वह उनके दोहरे चरित्र का जीता-जागता प्रमाण है। स्वरा ने सफाई देते हुए कहा, “नमस्ते दोस्तों, कल मैंने इफ्तार की तैयारी की कुछ स्टोरी डाली थीं। फ्रूट क्रीम बनाना ही इकलौती चीज है जो मुझे आती है। मैंने आप लोगों के कमेंट्स देखे और नोटिस किया कि आपमें से बहुत से लोगों ने बताया कि नेस्ले बहिष्कार (Boycott) की लिस्ट में है क्योंकि उनका जायोनी (Zionist) कनेक्शन है। सच कहूँ तो मुझे याद नहीं रहा और उस वक्त मेरा दिमाग इस तरफ नहीं गया।”

स्वरा यहीं नहीं रुकीं। खुद को कट्टरपंथियों की नजरों में ‘सही’ साबित करने के लिए उन्होंने आगे कहा, “मैं BDS की बड़ी पैरोकार हूँ और पूरी कोशिश करती हूँ कि इसे अपनी ज़िंदगी में अपनाऊँ। मैंने हाल ही में अपने बच्चे के डायपर भी बदल दिए क्योंकि ‘पैम्पर्स’ भी बॉयकॉट लिस्ट में था। यह एक प्रोसेस है और मैं अभी भी सीख रही हूँ। याद दिलाने के लिए शुक्रिया, मैं अब और ज्यादा सावधान रहूँगी। ढेर सारा प्यार और ‘फ्री फिलिस्तीन’।”

स्वरा का यह कहना कि ‘यह एक प्रोसेस है और मैं अभी सीख रही हूँ,’ यह दर्शाता है कि उनका एक्टिविज्म केवल कैमरे के लिए है, न कि किसी ठोस विचारधारा के लिए।

नेटिजन्स ने जमकर उतारा पाखंड का बुखार: ‘सब कुछ कैमरे के लिए’

स्वरा के इस वीडियो पर सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें बुरी तरह ट्रोल किया है। इंटरनेट पर लोग उनके इस ‘क्रिंज’ (Cringe) व्यवहार पर मजे ले रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “रमजान के दौरान स्वरा सिर्फ दिखावे के लिए ‘फ्री फिलिस्तीन’ चिल्लाती हैं, लेकिन असल में उन्हीं प्रोडक्ट्स का आनंद लेती हैं। कैमरे के लिए एक्टिविज्म और मुनाफे के लिए सब जायज है।”

एक अन्य यूजर ने तंज कसते हुए कहा, “बनियान पहनकर ‘आई सपोर्ट हिजाब’ और ‘फ्री फिलिस्तीन’ सिर्फ स्वरा जैसी लो आईक्यू (Low IQ) वाली ही कर सकती है।” वहीं एक और कमेंट ने स्वरा के ज्ञान पर सवाल उठाते हुए लिखा, “स्वरा इंस्टाग्राम पर नेस्ले के बहिष्कार का ज्ञान दे रही हैं, जबकि इंस्टाग्राम खुद एक यहूदी (मार्क जुकरबर्ग) की कंपनी है। इनके पास कोई तर्क नहीं होता।”

भारत के मुद्दों पर चुप्पी और कट्टरपंथियों के आगे समर्पण

स्वरा भास्कर का दोहरा व्यवहार तब सबसे ज्यादा खटकता है जब बात भारत की आती है। भारत की उपलब्धियों, देशहित की बड़ी खबरों या हिंदुओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर स्वरा के होंठ सिल जाते हैं। भारत से जुड़ी अच्छी चीजों पर वे कभी स्टैंड नहीं लेतीं, लेकिन जैसे ही सरहद पार या सात समंदर पार फिलिस्तीन का मुद्दा आता है, वे तुरंत गला फाड़कर सामने आ जाती हैं।

यही स्वरा हैं जो हिंदू हितों या हिंदू भावनाओं को आहत करने वाले बयानों पर माफी माँगने के बजाय खुद को ‘बेचारा’ और ‘पीड़ित’ (Victim Card) दिखाने की कोशिश करती हैं। लेकिन जैसे ही उनके अपने ‘इको-चेंबर’ के कट्टरपंथी उन्हें डाँटते हैं, वे तुरंत घुटनों पर आ जाती हैं। यह साफ दिखाता है कि उनका डर और उनकी वफादारी किसके प्रति है।

प्रोपेगेंडा की राजनीति और स्वरा का सच

स्वरा भास्कर का ‘एक्टिविज्म’ केवल अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने का एक जरिया है। वे एक ऐसी ‘सेलेब्रिटी’ हैं जो केवल उसी तरफ झुकती हैं जहाँ से उन्हें समर्थन या चर्चा मिले। कट्टरपंथियों की डाँट पड़ते ही उनके ‘लर्निंग प्रोसेस’ का शुरू होना यह साबित करता है कि वे किसी विचार के प्रति ईमानदार नहीं हैं, बल्कि केवल एक खास वर्ग को खुश रखने की कोशिश कर रही हैं।

भारत के मुद्दों पर चुप्पी और विदेशी मामलों पर झूठा विलाप उनके दोहरे मापदंडों का सबसे बड़ा प्रमाण है। हिंदुओं के खिलाफ अपशब्द कहना और विदेशी प्रोपेगेंडा के सामने नतमस्तक होना, यही स्वरा भास्कर की असली पहचान बन चुकी है। यह वीडियो उनके ‘लव-हेट’ रिलेशनशिप की पोल खोलता है जहाँ वे अपने ही बुने हुए जाल में फँस गई हैं।

माँ की मौत के बाद फँसाया, रणजीत निकला रकीबुल: नेशनल शूटर तारा ने सुनाई ‘लव जिहाद’ की आपबीती, बोली- कुत्तों से कटवाकर बीफ खिलाने की हुई कोशिश

‘लव जिहाद’ आतंकवाद से कम नहीं है। परिवार द्वारा तय की गई शादी में लड़की कैसे ‘लव जिहाद’ का शिकार हो जाती है, ये नेशनल शूटर रहीं तारा शाहदेव से जानिए। 12वीं पास तारा को 9 साल बाद न्याय मिली है, धोखा देने वाला पति और उसकी माँ सलाखों के पीछे हैं। उन्होंने अपनी झकझोरने वाली आपबीती फिल्म ‘द केरला स्टोरी 2- गोज बियॉन्ड’के मंच पर बताई।

फिल्म को प्रोपेगेंडा कहने वालों के मुँह पर तमाचा जड़ते हुए फिल्म मेकर ने ऐसी 55 महिलाओं को मंच दिया, जिन्होंने अपनी सच्चाई दुनिया को बताई। हकीकत से रूबरू कराने के लिए दिल्ली में सोमवार (27 फरवरी 2026) को एक विशेष संवाद का कार्यक्रम रखा गया था। चाहे दिल्ली की हो या केरल की, भोपाल की हो या फरीदाबाद की, हर महिला के साथ किस-किस तरह की साजिश हुई, इसका पता चला।

लोगों की आँखे नम हो गईं जब इन महिलाओं में एक तारा शाहदेव ने बताया कि उसने किस तरह से 40 दिनों तक दरिंदगी झेली और 9 साल तक न्याय का इंतजार किया। उन्होंने कहा कि वो चाहती हैं कि हिन्दू बेटियाँ सतर्क रहें और परिवार हर हाल में अपनी बेटी का साथ न छोड़े। अगर परिवार ने उसे ठुकराया तो बेबस, बेसहारा लव जिहाद की शिकार महिलाओं के सामने खुदकुशी के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता।

तारा की दर्द भरी दास्ताँ

तारा बताती है कि वह नेशनल शूटर रही हैं। 2014 में एक इंसान से मिली थी तो पुलिस अधिकारी था। शादी का रिश्ता एक मुस्लिम जज लेकर आया था। मम्मी की डेथ हो चुकी थी और पापा काफी बीमार थे। खुद को संभालना मुश्किल हो रहा था। इस परिस्थिति का फायदा उठाते हुए उसे फँसाया गया। तारा कहती हैं कि उनलोगों ने जानबूझकर ऐसा वक्त चुना, जब इमोशनली वीक थी वो। जज ने पिता के सामने कहा कि लड़का की माँ है सिर्फ जो माँ का प्यार देगी। पापा और भैया ने लड़के के बारे में पता भी लगाया और उन्हें सबकुछ ठीक लगा। ऐसे में 7 जुलाई 2014 को उसकी रांची के रेडिशन ब्लू होटल में पुलिस अधिकारी रंजीत कुमार कोहली के साथ शादी कर दी गई।

‘डबल आइडेंटिटी’ का दूसरे दिन चला पता

तारा कहती हैं कि पापा और भैया से सबने कहा कि लड़के के बारे में पहले पता क्यों नहीं किया। लेकिन उन्होंने पता किया था। तारा के मुताबिक, शादी में हिन्दू पहचान के साथ वे लोग थे। उनके दोस्त अधिकारी रेंज के लोग थे। यहाँ तक कि सगाई में उसे लड़के के घर भी ले जाया गया। वहाँ उन्होंने भगवान की फोटो दीवार पर टँगी देखी थी। बिल्कुल आम हिन्दू घरों की तरह लगा था। सबकुछ सही चल रहा था।

7 जुलाई को शादी हुई और वह ससुराल पहुँची। अगले दिन सुबह जब आँख खुली तो देखा तो वह घर मक्का-मदीना का फोटो, अल्लाह लिखी तस्वीरों से अटा पड़ा था। जब लड़के की माँ से उसने पूछा तो उन्होंने धक्का देकर कहा कि यही सच्चाई है।

पिता और भाई को बताना चाहा। जिस जज ने शादी करवाई थी, उसने कहा कि पापा- भैया को बुलाएँगे तो घबरा जाएँगे, क्योंकि कल ही शादी हुई है।

जज ने कहा कि जिस व्यक्ति से शादी हुई थी उसका नाम रकीबुल हसन है, रणजीत सिंह कोहली नहीं। तारा कहती है कि उसे कहा गया कि अब जो कहा जा रहा है, वह करो वरना पापा और भैया की फँसा देंगे और जीवन भर के लिए जेल में डलवा देंगे। तारा ने कभी भी ‘लव जिहाद’ शब्द नहीं सुना था, इसलिए उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।

पति के साथ-साथ शादी कराने वाला जज भी धमकी दे रहा था। उसने कहा, “तुम्हारे भाई को झूठे रेप केस में फँसा देंगे। पापा को आर्म्स केस में फँसा देंगे। आज निकाह कर लो वरना मुश्किल में पड़ जाओगी।”

डीएसपी पति भी लगातार जज के साथ धमकियाँ दे रहा था। इससे परेशान होकर तारा ने कहा कि आप चाहते क्या हो। धोखा देने वाले रकीबूल हसन ने कहा कि जब कहा जाएगा तो तीन बार ‘कबूल है’ बोल देना। तारा कहती है कि दूसरे दिन उसका निकाह होने जा रहा था। इसमें काजी समेत बड़े- बड़े लोग आए थे।

उसे कहा गया कि कबूल है तीन बार बोलो। शाहा परवीन हो आज से और निकाहनामे पर साइन कर दो। इसके बाद तारा ने ‘कबूल है’ तो कह दिया, लेकिन नए नाम के साथ निकाहनामे पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया। उसे तरह-तरह की धमकियाँ दी जाने लगी। उसे कहा गया कि अगर बात नहीं मानी तो बेच दी जाओगी। तुम न तो पहली हो और न ही आखिरी हो। तुम्हारे जैसे कई आई और बहुत सी इस रास्ते पर चल रही हैं।

तारा कहती हैं कि वह अपने घरवालों से बात करना चाहती थीं, लेकिन फोन छीन लिया गया। जब भी फोन आता तो झूठ बोल देते कि नई शादी हुई है, घूमने गए हैं। पापा-भाई को कुछ न हो, इसलिए तारा सब कुछ बर्दाश्त करती रही।

40 दिन बाद भागने में सफल रही तारा

40 दिन बाद उसे घर से भागने का मौका मिला। दरअसल उस पर हमेशा पहरा रहता था। घर के नीचे पुलिस वाले होते थे और घर पर हसन की अम्मी की नजर होती थी। उसका लगातार शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना हो रहा था। उसे कुत्ते से कटवाया गया। यहाँ तक कि एक दिन जज के घर पर उसे बीफ खिलाने की कोशिश की गई।

तारा कहती हैं कि हसन और उसके साथी आतंकवादी लोग हैं। घर पर सेटेलाइट फोन थे। कई सिम्स थे। ये आम लोग नहीं है। तारा के मुताबिक, ये आम लोग नहीं है बल्कि साजिश कर आम हिन्दू लड़कियों को फँसा कर धर्म परिवर्तन कराते हैं। कई लड़कियाँ थी जिसे झाँसा देते थे कि उनका 12वीं के बाद अच्छे कॉलेज में एडमिशन करवा देंगे। ऐसी लड़कियाँ आती थी। ये लोग लड़कियों की कमजोरी का फायदा उठाना बखूबी जानते हैं।

फरार होने में नौकरानी ने मदद की

घर पर कोर्ट से पेपर आते थे। जज और पुलिस अधिकारी के रहते इन्हें कानून का डर नहीं था। फ्लैट के नीचे पुलिस तैनात रहती थी। तारा को नौकरानी ने हिम्मत दी। फरार होने वाले दिन भी हसन ने उसे बहुत पीटा था और फ्लाइट पकड़ने घर से निकला था। उसने हिम्मत कर नौकरानी से फोन किया और भैया को 8 बजे आने के लिए कहा। साथ में पुलिस भी लाने को कहा। पिता-भाई को पुलिस के साथ आने में 9.15 हो गए। इसके बाद वे पहुँचे।

पुलिस के घर पर पहुँचते ही जज साहब भी आ गए और दूसरे लोग भी आ गए। उनलोगों ने पति-पत्नी का ‘मामूली झगड़ा’ बताया। लेकिन, एक महिला पुलिस ने उसकी हालत देख कर कहा कि उसे हर हाल में अपने साथ लेकर जाएगी। दरअसल तारा ने पुलिस से कहा कि अगर उसे इस हालत में यहाँ छोड़ा गया, तो वह खुदकुशी कर लेगी।

तारा बताती हैं कि महिला पुलिस ने कहा कि मैं इसे अकेला नहीं छोड़ूँगी। इसे पुलिस लॉकअप में रखूँगी। तारा को सदर अस्पताल से एम्स रेफर कर दिया। इस तरह से उसे दरिंदगी से मुक्ति मिली।

तारा ने मीडिया का भी शुक्रिया कहा जिसने उसकी स्टोरी बताई और उसके साथ क्या हुआ, ये दुनिया को पता चला। इस दौरान सरकारी तंत्र हसन के साथ खड़ा दिखा, लेकिन 9 साल की लड़ाई रंग लाई और हसन को हरियाणा बॉर्डर पर गिरफ्तार कर लिया गया। उसके कारनामों का पता चलने के बाद उसे आजीवन कारावास की सजा मिली।

पूरी घटना को याद करते वक्त तारा की आवाज कई बार भर्रा गई, लेकिन उनका संदेश स्पष्ट था ‘यह कल्पना नहीं, जीती-जागती सच्चाई है।’

RSS से जुड़े कार्यक्रम में कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन का हंगामा, NSUI ने गुजरात यूनिवर्सिटी में महापुरुषों की तस्वीरों से की अभद्रता: एडमिशन कैंसिल, कैंपस में एंट्री बैन

अहमदाबाद स्थित गुजरात यूनिवर्सिटी में हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान हंगामा हो गया। यह प्रदर्शन कार्यक्रम एक RSS से जुड़े एक थिंक टैंक और गुजरात यूनिवर्सिटी के द्वारा आयोजित किया गया था। कार्यक्रम के दौरान कॉन्ग्रेस की छात्र इकाई NSUI के करीब 10-15 कार्यकर्ता वहाँ पहुँचे और हंगामा शुरू कर दिया। आरोप है कि उन्होंने प्रदर्शनी में लगे पोस्टर फाड़ दिए और महापुरुषों का अपमान किया। इतना ही नहीं, NSUI गुजरात ने इस घटना के वीडियो और तस्वीरें अपने सोशल मीडिया पेज पर भी साझा किए। इस मामले में खुद गुजरात यूनिवर्सिटी ने शिकायतकर्ता के रूप में FIR दर्ज कराई है।

यह मामला सोमवार (23 फरवरी 2026) का है। गुजरात यूनिवर्सिटी में RSS से जुड़े एक थिंक टैंक और विश्वविद्यालय ने मिलकर ‘राष्ट्रीय संगोष्ठी- भारत की ग्लोबल भूमिका’ शीर्षक से एक प्रदर्शनी का आयोजन किया था। इस प्रदर्शनी में RSS से जुड़ी कई बातों को शोध और साक्ष्यों के आधार पर प्रस्तुत किया गया था। प्रदर्शनी में पोस्टरों के माध्यम से संघ और बाबासाहेब अंबेडकर के संबंध, सरदार पटेल के साथ संबंध और महात्मा गाँधी के संघ को लेकर विचारों को दर्शाया गया था।

वहाँ पोस्टर, स्लाइड्स और प्रमाणों के जरिए पूरी जानकारी प्रदर्शित की गई थी। इस प्रदर्शनी को देखने के लिए करीब 400 से 500 लोग पहुँचे थे। इसी दौरान करीब दोपहर 12:15 बजे NSUI के कार्यकर्ता अचानक वहाँ पहुँचे और नारेबाजी करते हुए हंगामा शुरू कर दिया। आरोप है कि उन्होंने पोस्टर फाड़ दिए और प्रदर्शनी को रुकवा दिया। स्थिति बिगड़ने पर पुलिस मौके पर पहुँची और सभी को हिरासत में ले लिया। मामले में आगे की कार्रवाई जारी है।

‘भारत माता और महापुरुषों का भी अपमान किया गया’: ABVP

ऑपइंडिया से बातचीत में ABVP के कर्णावती महानगर के मंत्री ध्रुमिल अखानी ने कहा कि प्रदर्शनी में लगाए गए सभी पोस्टर रिसर्च पर आधारित थे और सबूत भी लगाए गए थे। यानी जो भी सबूत और डॉक्यूमेंट्स मिले, उनका इस्तेमाल करके एक एग्जिबिशन लगाई गई थी। जैसे जब बाबासाहेब अंबेडकर ने चुनाव लड़ा तो संघ का क्या सहयोग था, संघ के लिए उनके क्या विचार थे, गाँधी के संघ के लिए क्या विचार थे और सरदार पटेल के क्या विचार थे, इन सभी बातों की स्लाइड्स बनाई गई थीं।

सरदार पटेल और पूर्व सरसंघचालक गुरु गोलवलकर के बीच हुए पत्राचार को भी दिखाया गया था। यह पूरा प्रोग्राम भारत की ग्लोबल भूमिका पर विचार-विमर्श के लिए था लेकिन फिर भी NSUI के कार्यकर्ता वहाँ आए और हंगामा किया और सभी पोस्टर फाड़ दिए।

ABVP के मंत्री ने कहा कि उनके नेता हाथों में संविधान की कॉपी लेकर चलते हैं लेकिन वे संविधान बनाने वाले का अपमान करते हैं। प्रदर्शन में NSUI कार्यकर्ताओं ने बाबा साहेब पर ब्लेड फेंके थे, इसी तरह गाँधी और सरदार पटेल पर भी ब्लेड फेंके गए। परिषद ने कहा कि आरोपितों ने इंडिया लिखा हुआ एक होर्डिंग भी फाड़ दिया। उन्होंने इस पूरी घटना को भारत की एकता और अखंडता को तोड़ने की साजिश बताया है।

आरोपितों ने वहाँ वीर सावरकर का अपमान भी किया। उन्हें ‘माफी माँगने वाला’ कहा गया और बार-बार विवादित नारे लगाए गए। इसके अलावा उन्होंने संघ पर भी हमला किया और दावा किया कि देश के विकास और आजादी में संघ का कोई रोल नहीं है।

गौरतलब है कि NSUI ने संघ पर समाज में गलत जानकारी फैलाने और यूनिवर्सिटी में अपनी सोच का प्रचार करने का आरोप लगाया था। यह भी आरोप लगाया गया था कि अंबेडकर और सरदार पटेल के बारे में सिर्फ कुछ खास जानकारी ही दिखाई गई। ABVP ने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने के आरोपों को खारिज कर कहा कि यह प्रदर्शनी रिसर्च और सबूतों पर आधारित थी। NSUI कार्यकर्ताओं के हंगामे के विरोध में ABVP ने भी विरोध प्रदर्शन किया था और सख्त कार्रवाई की माँग की।

अब पता चला है कि गुजरात यूनिवर्सिटी ने खुद कई NSUI कार्यकर्ताओं, जिनमें नमजोग और दूसरे लोग शामिल हैं, के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है और इस घटना में शामिल सभी छात्रों पर बैन भी लगा दिया गया है और उनके एडमिशन भी कैंसिल कर दिए गए हैं। पुलिस ने इस मामले में FIR दर्ज कर ली है और आगे की कार्रवाई की जा रही है।

गुजरात यूनिवर्सिटी का कहना है कि यह घटना भारत माता, बाबासाहेब अंबेडकर, वीर सावरकर और अन्य महापुरुषों का अपमान है। विश्वविद्यालय ने यह भी तर्क दिया कि इस घटना से करोड़ों हिंदुओं की भावनाएँ आहत हुई हैं। फिलहाल आरोपितों की स्थिति को लेकर जानकारी सामने नहीं आई है लेकिन FIR दर्ज कर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी गई है। जिन आरोपितों की पहचान हुई है, उनमें आरोपितों की पहचान चिराज दर्जी, नारायण भरवाड़, यशराज सिंह खेर, शिवराज सिंह बराड़, संजय सोलंकी, मीत पनारा, कशिश डामोर, हर्ष चौहान और पृथ्वी देसाई सहित अन्य लोग शामिल हैं।

इस घटना को लेकर ABVP ने भी कड़ी आलोचना की है। परिषद का आरोप है कि NSUI बार-बार इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रही है, जिससे देश को नुकसान पहुँचता है। परिषद ने हाल ही में दिल्ली में AI समिट के दौरान यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए ‘नग्न प्रदर्शन’ का भी जिक्र किया और कहा कि इस प्रकार की घटनाएँ एक जिम्मेदार लोकतंत्र पर धब्बा हैं।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

जॉर्ज सोरोस की फंडिंग, पक्षपाती पैनल और ‘हिंदुत्व’ विरोध का पूरा अध्याय: लीसेस्टर हिंसा में हिंदुओं को दोषी ठहराने वाली SOAS रिपोर्ट की खुली पोल, हिंदू संगठनों ने बताया भ्रामक

लंदन के लीसेस्टर (Leicester) में साल 2022 में हुई हिंसा को लेकर हाल ही में SOAS (स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज) यूनिवर्सिटी द्वारा जारी एक रिपोर्ट ‘बेटर टुगेदर’ (Better Together) ने नए विवाद को जन्म दे दिया है। रिपोर्ट में 2022 की हिंसा के लिए हिंदुओं और ‘हिंदुत्व’ को जिम्मेदार ठहराया गया है, जबकि जमीनी हकीकत और पुलिस के रिकॉर्ड इसके बिल्कुल उलट हैं। इस रिपोर्ट को लीसेस्टर के हिंदू समुदाय और ‘हिंदू कम्युनिटी ऑर्गनाइजेशन ग्रुप’ (HCOG) ने सिरे से खारिज कर दिया है।

50,000 से अधिक हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करने वाले इस समूह HCOG का आरोप है कि यह रिपोर्ट तथ्यों पर आधारित नहीं है, बल्कि हिंदुओं को निशाना बनाने के उद्देश्य से लिखी गई है। जमीनी हकीकत यह थी कि लीसेस्टर में हिंदुओं के घरों, मंदिरों और व्यक्तियों पर कट्टरपंथी भीड़ ने सुनियोजित हमले किए थे, लेकिन इस रिपोर्ट ने सारा दोष हिंदू पीड़ितों पर ही मढ़ दिया है।

जॉर्ज सोरोस की फंडिंग और पक्षपाती पैनल: निष्पक्षता पर बड़ा सवाल

हिंदू संगठनों ने सबसे बड़ा हमला इस रिपोर्ट की फंडिंग और इसकी संरचना पर किया है। रिपोर्ट खुद स्वीकार करती है कि इसे ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस’ से फंडिंग मिली है। HCOG के अनुसार, इस जाँच के लिए £620,000 (लगभग 6.5 करोड़ रुपए) का अनुदान जॉर्ज सोरोस की संस्था से आया है।

जॉर्ज सोरोस को दुनिया भर में भारत और हिंदू विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। जब पैसा ही ऐसे स्रोत से आए, तो जाँच की निष्पक्षता का दावा करना अपने आप में हास्यास्पद लगता है। लीसेस्टर के हिंदू समुदाय ने इसीलिए इस ‘कमीशन’ का बहिष्कार किया था, क्योंकि इसका नतीजा पहले से तय लग रहा था।

इसके अलावा, इस जाँच के लिए जो पैनल बनाया गया, उसमें शामिल लोगों का ट्रैक रिकॉर्ड हिंदू-विरोधी गतिविधियों से भरा रहा है। सुरेश ग्रोवर और चेतन भट्ट जैसे लोग इस पैनल का हिस्सा थे, जिन्होंने जाँच शुरू होने से पहले ही सार्वजनिक तौर पर हिंदुओं को दोषी ठहरा दिया था।

सुरेश ग्रोवर ने तो हिंदू धर्म के पवित्र प्रतीक ‘ॐ’ (Aum) को नाजी चिन्ह के साथ जोड़कर अपमानित करने का प्रयास किया था। वहीं पैनल के प्रमुख जुआन मेंडेज हमेशा भारत के खिलाफ खड़े रहे हैं, लेकिन पड़ोसी देशों में हिंदुओं पर होने वाले जुल्मों पर कभी कुछ नहीं बोलते। ऐसे पूर्वाग्रही लोगों द्वारा तैयार रिपोर्ट कभी भी सच नहीं दिखा सकती।

हिंदू घरों और मंदिरों पर हमले को किया गया नजरअंदाज

SOAS की रिपोर्ट ने सबसे बड़ी चालाकी यह की है कि उसने हिंदुओं पर हुए सुनियोजित हमलों को बहुत छोटा करके दिखाया है या पूरी तरह दबा दिया है। सितंबर 2022 में लगातार तीन रातों तक लीसेस्टर में हिंदू घरों, कारों और व्यक्तियों को निशाना बनाया गया था। एक हिंदू मंदिर के ऊपर से झंडा उतारने और मंदिर में तोड़फोड़ की घटना पूरी दुनिया ने देखी थी।

हिंदू युवाओं को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। लेकिन रिपोर्ट इन घटनाओं पर चुप्पी साधे हुए है और सारा दोष ‘हिंदुत्व’ के मत्थे मढ़ रही है। इसमें एक पूरा चैप्टर हिंदुत्व पर लिखा गया है ताकि यह साबित किया जा सके कि हिंदू ही आक्रामक थे।

यह रिपोर्ट उन दावों को भी हवा देती है कि लंदन से बसों में भर-भर के हिंदू लीसेस्टर आए थे। जबकि कोच ऑपरेटर ने अपने जीपीएस डेटा के साथ साबित कर दिया था कि उसकी कोई भी बस उस सप्ताहांत लीसेस्टर नहीं गई थी। रिपोर्ट ने कट्टरपंथी भीड़ द्वारा फैलाई गई हिंसा को तो ‘प्रतिक्रिया’ बताया, लेकिन हिंदुओं के शांतिपूर्ण बचाव को ‘चरमपंथ’ का नाम दे दिया। यह दोहरा मापदंड ही इस रिपोर्ट की असलियत बताता है।

झूठे दावों और मजीद फ्रीमैन का प्रोपेगेंडा

2022 की लीसेस्टर हिंसा के दौरान और उसके बाद हिंदू समुदाय को बदनाम करने के लिए कई तरह की झूठी कहानियाँ गढ़ी गईं और कैसे कट्टरपंथी तत्वों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर हिंदुओं को अपराधी साबित करने की कोशिश की।

एक घटना क्रिकेट मैच के बाद की बताई गई, जिसमें दावा किया गया कि हिंदू क्रिकेट प्रेमियों ने मुसलमानों पर हमला किया। जबकि हकीकत यह थी कि वह एक निजी झगड़ा था जो शराब के नशे में एक भारतीय मूल के व्यक्ति और क्रिकेट प्रशंसकों के बीच हुआ था, जिसमें धर्म का कोई लेना-देना नहीं था और किसी भी मुसलमान को निशाना नहीं बनाया गया था। इसी तरह मजीद फ्रीमैन जैसे कट्टरपंथियों ने सोशल मीडिया पर चिल्ला-चिल्लाकर कहा कि ‘मुसलमानों को मौत’ के नारे लगाए गए। पुलिस ने पूरी जाँच के बाद स्पष्ट किया कि ऐसे किसी भी नारे का कोई सबूत नहीं मिला, फिर भी इस रिपोर्ट ने इन अफवाहों को तवज्जो दी।

एक और भयानक झूठ यह फैलाया गया कि तीन भारतीय पुरुषों ने एक 15 साल की मुस्लिम लड़की के अपहरण की कोशिश की। इस खबर ने शहर में भारी तनाव पैदा कर दिया था। पुलिस ने जब इसकी तहकीकात की, तो पता चला कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं थी। जिस हिंदू युवक पर आरोप लगाया गया था, वह तो उस समय ब्रिटेन में था भी नहीं। इसी तरह, मस्जिदों पर हमले की खबरें फैलाई गईं, जिन्हें पुलिस ने मौके पर जाकर गलत पाया। इन सभी घटनाओं को जानबूझकर इसलिए हवा दी गई ताकि दुनिया की नजरों में हिंदुओं को ‘आक्रामक’ दिखाया जा सके और कट्टरपंथियों द्वारा की गई वास्तविक हिंसा को छुपाया जा सके। लेकिन SOAS की रिपोर्ट इन पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज कर वही पुराना और फर्जी नैरेटिव दोबारा जिंदा करने की कोशिश कर रही है।

सुनियोजित प्रोपेगेंडा और फर्जी दावों की लंबी फेहरिस्त

हिंदुओं के खिलाफ केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर दुष्प्रचार किया गया। एक झूठा दावा यह भी किया गया कि लंदन से बसों में भरकर हिंदू गुंडे लीसेस्टर आ रहे हैं। इस खबर के कारण कई हिंदू बस ऑपरेटरों को धमकियाँ तक मिलीं। बाद में जब बस ऑपरेटरों ने अपने जीपीएस डेटा और रिकॉर्ड पेश किए, तो साबित हो गया कि उस दौरान उनकी कोई भी बस लीसेस्टर नहीं गई थी। यह केवल हिंदुओं के प्रति नफरत भड़काने की एक चाल थी।

इसके अलावा, एक ट्रैफिक वार्डन ने दावा किया कि ड्यूटी के दौरान हिंदुओं ने उस पर हमला किया। पुलिस जाँच में यह मामला पूरी तरह फर्जी निकला और वार्डन ने खुद स्वीकार किया कि उसने गलत रिपोर्ट दर्ज कराई थी। मजीद फ्रीमैन जैसे कट्टरपंथी लोगों ने यह तक दावा किया कि हिंदुओं ने कई मुसलमानों को चाकू मार दिया है। सच्चाई यह थी कि उस रात चाकूबाजी की कोई घटना हुई ही नहीं थी और न ही किसी हिंदू के पास हथियार होने का कोई सबूत मिला। फिर भी SOAS की रिपोर्ट ने इन पुलिस द्वारा खारिज किए गए दावों को ‘हिंदू उग्रवाद’ के अध्याय में जगह दी, जो यह बताता है कि यह रिपोर्ट केवल हिंदुओं को बदनाम करने के लिए लिखी गई थी।

मंदिरों पर हमले और असली हिंसा को दबाने का प्रयास

2022 की हिंसा का सबसे काला पक्ष वह था जिसे इस रिपोर्ट ने पूरी तरह अनदेखा कर दिया। लीसेस्टर में लगातार तीन रातों तक हिंदू घरों, कारों और मंदिरों को निशाना बनाया गया। कट्टरपंथी भीड़ ने एक हिंदू मंदिर की दीवार फाँदकर उसके ऊपर से पवित्र ध्वज को नीचे गिरा दिया और तोड़फोड़ की। हिंदू युवाओं को उनके धर्म के कारण सड़कों पर पीटा गया। लेकिन SOAS की इस रिपोर्ट में इन घटनाओं को बहुत छोटा करके दिखाया गया है।

हैरानी की बात यह है कि रिपोर्ट ने सारा दोष ‘हिंदुत्व’ के मत्थे मढ़ने के लिए एक अलग अध्याय समर्पित कर दिया। रिपोर्ट में हिंदुत्व को राजनीतिक इस्लामवाद के बराबर खतरनाक बताने की सिफारिश की गई है। यह उन हिंदुओं के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है जो खुद हिंसा के शिकार हुए थे। ब्रिटिश सरकार की आधिकारिक जाँच और हेनरी जैक्सन सोसाइटी की रिपोर्ट में हिंदुओं के खिलाफ हुए इन सुनियोजित हमलों का जिक्र है, लेकिन SOAS की रिपोर्ट ने केवल एकतरफा नैरेटिव को बढ़ावा दिया है।

सच को दबाने की अंतरराष्ट्रीय साजिश

SOAS की यह रिपोर्ट केवल एक अकादमिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह हिंदुओं को वैश्विक स्तर पर अपराधी बनाने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। जब ब्रिटिश सरकार खुद एक आधिकारिक जाँच कर रही थी, तब SOAS ने जॉर्ज सोरोस के पैसों पर अपनी अलग जाँच क्यों बिठाई? इसका सीधा जवाब है- सरकारी जाँच में तथ्यों और पुलिस रिकॉर्ड को देखा जाता है, जबकि इस प्राइवेट जाँच का मकसद केवल ‘हिंदू फोबिया’ को बढ़ावा देना था।

मजीद फ्रीमैन जैसे कट्टरपंथियों को ‘शांतिदूत’ की तरह पेश करने की कोशिश की गई है, असल में वही लोग थे जिन्होंने आग में घी डालने का काम किया था। लीसेस्टर की पुलिस ने बार-बार इन अफवाहों का खंडन किया, लेकिन SOAS ने पुलिस की बातों से ज्यादा महत्व कट्टरपंथी दावों को दिया। यह रिपोर्ट हिंदुओं के मानवाधिकारों का हनन है क्योंकि यह असली पीड़ितों को ही कटघरे में खड़ा करती है। हिंदू समुदाय ने इसे खारिज करके यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अब अपनी बदनामी को और बर्दाश्त नहीं करेंगे।

किसी तो दिए ड्रग्स तो किसी का वर्षों तक किया रेप: दर्जनों पीड़िताओं ने बताया कैसे फँसाते हैं ‘लव जिहादी’, कहा- द केरला स्टोरी-2 जैसी फिल्में हैं जरूरी

‘लव जिहाद’ सिर्फ शब्द नहीं बल्कि एक लड़की की जिंदगी के जहन्नुम बनने का नाम है। इसका असर न सिर्फ लड़की पर पड़ता है, बल्कि पूरा परिवार इसकी जद में होता है। ‘लव जिहाद’ के बेस पर बनी फिल्म द केरला स्टोरी 2- गोज बियॉन्ड’ 27 फरवरी 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। इसमें दिखाई गई तीन ‘लव जिहाद’ की घटनाओं को लेकर जब सवाल उठाए गए तो फिल्म प्रोड्यूसर ने इसको लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया और इसमें ऐसी पीड़िताओं को मिलवाया, जिसकी आपबीती हर दिल को झकझोरने के लिए काफी है।

योजनाबद्ध तरीके से लड़कियों को फँसाना

‘लव जिहादी’ पहले लड़की को टारगेट करते हैं। ज्यादातर मामलों में ‘लव जिहादी’ अपना नाम बदलते हैं और हिन्दू लड़कियों के साथ प्यार का इजहार करते हैं। उन्हें प्रेम जाल में फँसा कर उसे पहले परिवार से दूर करते हैं। उसपर इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाया जाता है। मजबूरी में अगर लड़की ने हाँ कह दिया, तो नाम बदलकर उसका धर्मांतरण कर निकाह कर लेते हैं। उसे बीफ खाने पर मजबूर किया जाता है और उसे इस तरह तोड़ दिया जाता है कि मजबूर लड़की अपनी आवाज नहीं उठा सके।

भावनात्मक रूप से टूटने पर सहारा देने का नाटक

लड़कियों को तब फँसाया जाता है, जब वह भावनात्मक रूप से कमजोर हो। ‘लव जिहाद’ की पीड़िता नेशनल शूटर तारा सहदेव का कहना है कि उनकी माँ की मौत हो जाने और पिता के बीमार होने के वक्त उसे शादी का ऑफर आया। पिता और भाई ने पता लगाया और पूरी जाँच परख कर उसकी शादी पुलिस अधिकारी रंजीत कुमार से हुई। लेकिन शादी के अगले दिन ही उसे घर में भगवान की फोटो की जगह मक्का-मदीना की तस्वीर लगी मिली।

रंजीत कुमार बना नकीबुल हसन का असली चेहरा सामने आ गया। सवाल पूछने पर उसकी अम्मी ने थप्पड़ जड़ दिए। उसके घर पर काजी और कई सरकारी मुस्लिम अधिकारी आ गए। वह जज भी आया जिसने उसके रिश्ते की बात की थी। ऐसी परिस्थिति में उसे निकाह करने के लिए सिर्फ तीन बार ‘कबूल है’ कहने के लिए दबाव बनाया गया। लेकिन उसे अपना नाम बदलना गवारा नहीं था, इसलिए तारा सहदेव से शाहा परवीन बनने से इनकार करते हुए निकाहनामा पर दस्तखत करने के इनकार कर दिया और उसने हर तरह से लड़ाई लड़ी। 40 दिन दरिंदों के चंगुल से छूटने से लेकर 9 साल तक न्याय पाने की लड़ाई।

लड़कियों को किस तरह से फँसाया जाता है, इसे समझने के लिए तारा सहदेव की आपबीती सुन कर समझा जा सकता है। फिल्म की स्टोरी को लेकर कई जगहों पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। मीडिया का एक वर्ग प्रोपेगेंडा बता रहा है, उन्हें ऐसी महिलाओं से ‘सच’ जानना चाहिए।

डबल आइडेंटिटी लेकर समाज में हिन्दू लड़कियों को फँसाने का जाल देशभर में चल रहा है। यही वजह है कि फिल्म ‘द केरला स्टोरी 2- गोज बियॉन्ड’ के मंच पर आनेवाली पीड़ित हिन्दू महिलाएँ बंगाल, बिहार, जम्मू, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड, दिल्ली-एनसीआर, यूपी हर जगह की थी। इन ‘लव जिहाद’ की 49 पीड़िताओं और उनके परिवार के सदस्य में मंच पर आए और अपनी बात रखी।

‘लव जिहाद’ पीड़िताओं ने क्या-क्या कहा

सनातन धर्म को समझाना- पीड़िताओं का मानना है कि सिर्फ बेटी को पढाओ बोलकर स्कूली शिक्षा देने से कुछ नहीं होगा। बचपन से ही उसे सनातन धर्म को समझाना जरूरी है। बेटी को एजुकेशन देकर आर्थिक तौर पर हम खड़े कर रहे हैं, उन्हें सामाजिक तौर पर खड़ा करने के लिए साजिशों से आगाह करना बेहद जरूरी है। समाज में किस तरह से लड़कियों को टारगेट किया जाता है, क्यों किया जाता है, किस तरह से दोस्ती के नाम पर धोखा, प्यार के नाम पर साजिश और शादी के नाम पर निकाह करने के लिए मजबूर करना, चाहे रेप कर उसका वीडियो बना ब्लैकमेल किया जाए या सहमति से संबंध बना उसे धर्मपरिवर्तन के लिए मजबूर किया जाए।

पीड़िता इन लव जिहादियों को आतंकवादियों से कम नहीं मानती। इनका कहना है कि कई फोन, सिम्स का इस्तेमाल कर लड़कियों को फँसाना, एक साथ कई लड़कियों को इस्लाम कबूलने के लिए मजबूर करना और निकाह कर फिर ‘नए शिकार’ की तलाश में लग जाना।

मंच पर मौजूद एक और पीड़िता गौरी सैला का कहना है कि 16 साल की उम्र में उनके साथ ‘लव जिहाद’ हुआ। अब वह लॉ की छात्रा हैं। उनसे प्रेम करने का नाटक किया गया। नाम बदल कर दोस्ती की थी। उसे अकेला मजार पर ले जाकर वशीकरण किया, एक ग्लास कड़वा पानी पिलाया।

ड्रग्स दिए गए और नशे की हालत में ब्रांदा कोर्ट में गोरी की जगह पलक लिखा कर निकाह रजिस्ट्रेशन कराया दिया। उसका धर्मांतरण कब हुआ उसे पता भी नहीं चला। उसे प्रताड़ित किया जाने लगा। उसने खुदकुशी करने की कोशिश भी की। अंत में हिम्मत कर वह वहाँ से निकल पाई। महाराष्ट्र की रहने वाली इस पीड़िता का कहना है कि अगर ऐसी स्थिति में बच्ची फँस जाए तो कभी भी उसे अकेला मत छोडिए। उसे संभालिए वरना उसका बचना मुश्किल है।

समाज ऐसी बच्चियों के चरित्र पर सवाल उठाने के बजाए उसकी मदद करे। उसे फिर से जीवन जीने के लिए नई ताकत दे और प्रशासन ‘लव जिहाद’ के मामलों को संजीदगी से ले और जाँच के बाद दोषियों को सजा हो, इसकी व्यवस्था करे। तभी ‘लड़की बचाओ, लड़की पढ़ाओ’ जैसे नारे का कोई मतलब बनेगा।

पीड़िताओं का मत है कि सनातन समाज को बचपन से ही बच्चों में धर्म के प्रति आस्था, शिष्टाचार की शिक्षा दी जानी चाहिए। बच्चे स्कूल में तो किताबी शिक्षा ले लेते हैं, लेकिन आजकल धार्मिक ज्ञान नहीं मिल पाता। इसलिए इन बच्चों को बरगलाकर ‘लव जिहाद’ के चंगुल में फँसाया जा रहा है।

ऑपइंडिया ने ‘लव जिहाद’ के सैकड़ों मामले को अपने प्लेटफॉर्म पर जगह दी। 2022 में डेढ़ सौ से ज्यादा मामले हमने उठाए और पीड़िताओं की आवाज बनी। 2023 में 153 केस पर रिपोर्ट प्रकाशित की और 2024 में भी ऐसे सैकड़ों मामलों को उजागर कर बताया कि कैसे हिन्दू लड़कियों को ‘लव जिहाद’ में फँसाया गया। ज्यादातर मामलों में पीड़िता को हिन्दू पहचान बता कर दोस्ती करना, फिर प्रेमजाल में फँसाना।

इसमें सोशल मीडिया काफी मदद कर रहा है। इसके जरिए आसानी से अपना नाम छिपा कर दूसरी पहचान के साथ सामने आने में मदद मिलती है। फिर समाज और परिवार से दूर करना, ताकि जब उसे मदद की जरूरत पड़े तो कोई भी उसे सहारा देनेवाला न हो। लड़की का जबरन धर्म परिवर्तन करवाना। इसके लिए वीडियो बना कर ब्लैकमेल करने से भी ये लोग पीछे नहीं हटते। फिर निकाह कर उसे ऐसे रास्ते पर ले जाना, जहाँ से वापसी संभव न हो।

सेक्स के बाद कुंडली न मिलने का बहाना देकर शादी से मुकरना अपराध: दिल्ली HC ने खारिज की याचिका, पढ़ें कोर्ट ने फैसले में क्या कहा

शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाने और बाद में कुंडली न मिलने का हवाला देकर विवाह से इनकार करना कानून की नजर में गंभीर अपराध होगा। दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी शख्स ने पहले शादी का भरोसा दिलाकर संबंध बनाए हों और बाद में ‘कुंडली न मिलने’ का बहाना बनाकर मुकर जाए तो यह BNS की धारा 69 के तहत धोखे से यौन संबंध बनाने या झूठे विवाह-प्रलोभन का मामला माना जा सकता है।

बार ऐंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, 17 फरवरी 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णाकांत शर्मा की बेंच ने इस मामले में फैसला दिया है। अदालत एक ऐसे आरोपित की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिस पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत बलात्कार का मामला दर्ज है। साथ ही उस पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 भी लगाई गई है। अदालत ने आरोपी की जमानत अर्जी खारिज कर दी।

क्या है मामला?

27 साल की एक महिला ने 3 जनवरी 2026 को दिल्ली के केशव पुरम थाने में शिकायत दर्ज कराई कि एक युवक ने शादी का झूठा वादा करके कई सालों तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में कुंडली न मिलने का बहाना बनाकर शादी से इनकार कर दिया।

महिला का कहना है कि वह आरोपित और उसके परिवार को 2018 से जानती थी। आरोपी ने जुलाई 2019 में पहली बार अपनी कार में उससे शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद उसके घर, द गोल्डन कीज होटल (अशोक विहार) और अन्य जगहों पर भी संबंध बनाए गए। महिला के अनुसार आखिरी बार 12 सितंबर 2025 को दिल्ली के शक्ति नगर में संबंध बनाए गए।

महिला ने पहले भी लिखित शिकायत दी थी लेकिन आरोपित और उसके परिवार ने शादी का भरोसा दिलाया, जिस पर उसने शिकायत वापस ले ली। बाद में जब शादी नहीं हुई तो उसने फिर से शिकायत दी। इसके बाद आईपीसी की धारा 376 (रेप) और बीएनएस की धारा 69 के तहत FIR दर्ज की गई।

पीड़िता ने जाँच के दौरान दावा किया कि आरोपित ने उसकी तस्वीरें लीक करने की धमकी दी थी। न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पीड़िता ने बताया कि आरोपित उसे बार-बार शादी का भरोसा देता था और इसी भरोसे पर कई बार शारीरिक संबंध बने। आरोपित ने उसे अपने परिवार और रिश्तेदारों से होने वाली पत्नी के रूप में मिलवाया गया था और वह पारिवारिक कार्यक्रमों में भी शामिल हुई।

पीड़िता के अनुसार, मई 2025 से आवेदक उससे दूर होने लगा और जून 2025 में कुंडली न मिलने का कारण बताकर शादी से मना कर दिया। बाद में उसने फिर शादी का भरोसा दिया और सितंबर 2025 तक कई बार शारीरिक संबंध बनाए। उसने यह भी आरोप लगाया कि कुछ मौकों पर उस पर दबाव डाला गया और फोटो लीक करने की धमकी दी गई।

कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि पहले शादी का आश्वासन देने और बाद में कुंडली न मिलने का आधार लेकर विवाह से इनकार करना प्रथम दृष्टया (prima facie) इस बात पर प्रश्न खड़ा करता है कि आरोपित द्वारा किया गया वादा कितना ईमानदार था।

जस्टिस शर्मा ने कहा, “रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से यह संकेत मिलता है कि बार-बार पीड़िता को यह भरोसा दिलाया गया कि उनकी शादी में कोई भी बाधा नहीं है। यहाँ तक कि आरोपित ने कुंडली मिलाए जाने को लेकर में भी आश्वासन दिया और कहा कि दोनों की कुंडलियाँ पहले ही मिल चुकी हैं।”

जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में लिखा है कि आरोपित ने चैट में शादी करने की बात कही थी। शर्मा ने लिखा, “कोर्ट के ध्यान में यह भी लाया गया है कि 14 सितंबर 2023 को एक चेट में आरोपित ने लिखा था, ‘kal hi shaadi kar rahe hain hum’ (कल ही शादी कर रहे हैं हम)। पहली नजर में इससे साफ पता चलता है कि कुंडली मिलान का मुद्दा पहले ही सुलझा लिया गया था।”

दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश का एक हिस्सा

न्यायालय ने उन अन्य चैट्स के स्क्रीनशॉट भी देखे हैं जिन्हें पीड़िता ने जाँच अधिकारी को दिया था। ये चैट्स 2022 से 2025 के बीच की हैं जिनमें आवेदक ने पीड़िता को आश्वासन दिया था कि कुंडली मिलान का मुद्दा सुलझा लिया जाएगा और उनकी शादी में कोई बाधा नहीं है।

कोर्ट ने कहा, “इन्हीं आश्वासनों के आधार पर दोनों के बीच एक अवधि तक शारीरिक संबंध बनाए गए। बाद में आवेदक ने कुंडली न मिलने का कारण बताकर शादी से इंकार कर दिया। इस तरह का व्यवहार पहली नजर में यह सवाल खड़ा करता है कि आवेदक द्वारा किया गया शादी का वादा कितना सच्चा और वास्तविक था। ऐसा आचरण भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत अपराध की श्रेणी में आ सकता है। यह धारा विशेष रूप से उन मामलों से संबंधित है, जहाँ शादी का झूठा वादा या धोखे से शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं।”

कोर्ट ने खारिज की जमानत याचिका

कोर्ट ने माना कि आरोपित का यह कहना कि शादी केवल कुंडली न मिलने के कारण नहीं हो सकी उसके अपने ही व्यवहार और कई वर्षों तक दिए गए आश्वासनों से मेल नहीं खाता। कोर्ट ने कहा कि अगर कुंडली मिलान का मुद्दा आरोपित और उसके परिवार के लिए इतना महत्वपूर्ण था तो इसे शारीरिक संबंध बनाने से पहले ही इस विषय को स्पष्ट रूप से सुलझा लिया जाना चाहिए था।

कोर्ट ने आरोपित की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा, “आरोपों की प्रकृति, अब तक की जाँच में मिली चीजें और इस तथ्य को देखते हुए कि मामले में अभी चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है कोर्ट जमानत नहीं देगा।”

अब उथले पानी में भी नहीं बच पाएँगी दुश्मन की पनडुब्बियाँ, नौसेना को मिलेगा ‘डॉल्फिन हंटर’: जानें- क्या हैं ‘अंजदीप’ युद्धपोत की खासियत

भारतीय नौसेना अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा ताकत को और मजबूत करने जा रही है। इसी दिशा में एक अहम कदम है ‘अंजदीप’ (Anjadip) युद्धपोत का कमीशन होना। अंजदीप, 8 जहाजों की उस विशेष परियोजना का तीसरा पोत है जिसे एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट (ASW-SWC) परियोजना के तहत तैयार किया गया है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य समुद्र के उथले इलाकों (कम गहरे पानी) में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें नष्ट करना है।

आज के समय में समुद्री सुरक्षा केवल सतह पर दिखने वाले जहाजों तक सीमित नहीं है बल्कि असली चुनौती समुद्र के भीतर छिपी पनडुब्बियों से होती है। ऐसे में ‘अंजदीप’ जैसे अत्याधुनिक युद्धपोत भारतीय नौसेना की ताकत को नई ऊँचाई देंगे। यह पोत तटीय क्षेत्रों में निगरानी, दुश्मन की गतिविधियों का पता लगाने और जरूरत पड़ने पर तेज कार्रवाई करने में सक्षम होगा।

‘अंजदीप’ के नौसेना में शामिल होने से न केवल भारत की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा मजबूत होगी बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सामरिक उपस्थिति भी और प्रभावशाली बनेगी। यह कदम देश की रक्षा तैयारियों को आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। अंजदीप को 27 फरवरी 2026 को चेन्नई बंदरगाह पर पूर्वी नौसेना कमान में औपचारिक रूप से शामिल किया जाएगा।

कहाँ से आया यह नाम?

‘अंजदीप’ नाम कर्नाटक के कारवार तट के पास स्थित अंजदीप द्वीप के नाम पर रखा गया है। गोवा से करीब 2 किलोमीटर दूर इस द्वीप को सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। साथ ही, यह नाम पहले के युद्धपोत ‘INS अंजदीप’ की याद को भी दोबारा जीवित करता है। वह जहाज भारतीय नौसेना में अपनी सेवा दे चुका था लेकिन उसे साल 2003 में सेवा से हटा दिया गया था। यह पेट्या श्रेणी का युद्धपोत था। ‘अंजदीप’ अपने नाम के जरिए एक पुराने गौरवशाली युद्धपोत और भारत के समुद्री इतिहास दोनों को सम्मान देता है।

क्या हैं ‘अंजदीप’ की विशेषताएँ?

यह युद्धपोत भारतीय नौसेना के लिए खास तौर पर पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए तैयार किया गया है। इसे ‘डॉल्फिन हंटर’ कहा जा रहा है क्योंकि इसका मुख्य काम समुद्र के भीतर छिपी दुश्मन की पनडुब्बियों को ढूँढना, उनका पीछा करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें निष्क्रिय करना है। खासतौर पर तटीय इलाकों में यह पोत बेहद अहम भूमिका निभाएगा जहाँ उथले पानी में पनडुब्बियों का पता लगाना आसान नहीं होता।

यह पोत लगभग 77 मीटर लंबा है और भारतीय नौसेना के उन सबसे बड़े युद्धपोतों में शामिल है जिन्हें वाटर-जेट प्रोपल्शन प्रणाली से चलाया जाता है। वाटर-जेट तकनीक इसे तेज रफ्तार और बेहतर नियंत्रण देती है। इसकी अधिकतम गति 25 समुद्री मील तक है जिससे यह किसी भी आपात स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया दे सकता है और लगातार संचालन कर सकता है। इसकी फुर्ती इसे तटीय क्षेत्रों में और अधिक प्रभावी बनाती है।

इस जहाज में अत्याधुनिक और स्वदेशी तकनीकों का उपयोग किया गया है। इसमें हल माउंटेड सोनार ‘अभय’ लगाया गया है, जो उथले पानी में पनडुब्बियों का पता लगाने में मदद करता है। इसके अलावा इसमें हल्के टॉरपीडो और स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए पनडुब्बी रोधी रॉकेट लगाए गए हैं। ये हथियार समुद्र के भीतर छिपे खतरों से निपटने में सक्षम हैं। इस तरह यह पोत पानी के नीचे मौजूद दुश्मन की गतिविधियों का प्रभावी ढंग से पता लगा सकता है और उन पर कार्रवाई कर सकता है।

हालाँकि, इसका मुख्य कार्य पनडुब्बी रोधी अभियान है लेकिन यह पोत अन्य भूमिकाएँ भी निभा सकता है। यह तटीय निगरानी, कम तीव्रता वाले समुद्री अभियान (LIMO), खोज व बचाव अभियान और माइन बिछाने जैसे कार्यों में भी सक्षम है। इसके आने से नौसेना की समग्र क्षमता मजबूत होगी और समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और भी प्रभावी बनेगी।

आत्मनिर्भर भारत का उदाहरण है ‘अंजदीप’

इन जहाजों का डिजाइन और निर्माण भारतीय रजिस्टर ऑफ शिपिंग (IRS) के नियमों के अनुसार किया गया है। इनका निर्माण पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत हुआ है, जिसमें गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) ने एम/एस एलएंडटी शिपयार्ड (कट्टुपल्ली) के साथ मिलकर काम किया। यह सहयोगी रक्षा निर्माण का एक सफल उदाहरण है जो दिखाता है कि सरकारी और निजी क्षेत्र मिलकर आधुनिक रक्षा उपकरण तैयार कर सकते हैं।

इस पोत की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें 80% से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। यह सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के दृष्टिकोण को भी दिखाता है। इसका निर्माण भारत में ही हुआ है जिससे घरेलू रक्षा निर्माण उद्योग को मजबूती मिलती है और आयात पर निर्भरता कम होती दिख रही है।