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कोलकाता में 2 महीने लागू रहेगी धारा-144, धार्मिक-राजनीतिक सभाओं की नहीं होगी अनुमति : कमिश्नर ने जारी किया आदेश, खास इनपुट के बाद फैसला

कोलकाता में 28 मई से अगले 2 माह के लिए धारा-144 लागू की जा रही है। सुरक्षा से जुड़े खास इनपुट के बाद कमिश्नर ने ये फैसला लिया है। कोलकाता में 28 मई से 26 जुलाई तक धारा 144 लागू रहेगी। इस आदेश के लागू होने के बाद कोलकाता की सड़कों पर बिना इजाजत किसी तरह की सभा, जुलूस, रोड शो या कोई अन्य सभा आयोजित नहीं की जा सकेगी।

सीपी विनीत गोयल ने एक नोटिस जारी कर यह जानकारी दी है। नोटिस के मुताबिक, कोलकाता में हिंसक कार्यक्रमों का दौर चल रहा है। इससे कोलकाता की सड़कों पर हिंसा की घटनाएं बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में हिंसक घटनाओं को रोकने के लिये 144 धारा लागू की जा रही है। नोटिस में यह भी कहा गया है कि धारा 144 लागू होने के दौरान कोलकाता की सड़कों पर पांच या उससे अधिक लोग इकट्ठा नहीं हो सकते हैं।

इस दिशानिर्देश के मुताबिक 28 मई से 26 जुलाई तक हेयर स्ट्रीट पुलिस स्टेशन, बहूबाजार पुलिस स्टेशन और कोलकाता ट्रैफिक गार्ड मुख्यालय के तहत केसी दास क्रॉसिंग, विक्टोरिया हाउस और उसके आसपास के इलाकों में धारा 144 लागू रहेगा। इन इलाकों में कहीं भी पांच से अधिक लोग इकट्ठा नहीं हो सकेंगे। पुलिस के मुताबिक इन इलाकों में मतदान से पहले अशांति की आशंका है। इसी वजह से कोलकाता पुलिस ने ये फैसला लिया है।

बता दें कि कोलकाता में पीएम मोदी भी एक रोड शो करेंगे। उससे पहले धारा 144 लागू करने पर बीजेपी ने ममता सरकार पर हमला बोला है। बीजेपी ने कहा है कि कोलकाता पुलिस ने ममता बनर्जी सरकार के दबाव में ये फैसला लिया है, ताकी बीजेपी की चुनावी गतिविधियों को प्रभावित किया जा सके।

पाकिस्तानी पत्रकार को महँगा पड़ा ‘Mr. IPL’ से पंगा लेना, शाहिद अफरीदी को वर्ल्ड कप का ब्रांड एम्बेस्डर बनाए जाने के बाद उछल रहा था

भारत और पाकिस्तान के बीच हर मामले में मुकाबला कड़ा ही होता है। बात क्रिकेट की करें और खासकर विश्वकप मुकाबलों की, तो भारत हमेशा पाकिस्तान पर भारी ही पड़ा है। इस बीच, आईसीसी ने पाकिस्तान के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी को अगले महीने से वेस्टइंडीज और अमेरिका में होने जा रहे टी-20 विश्वकप के लिए ब्रैंड एंबेसडर बनाया है। इसके बाद एक पाकिस्तानी पत्रकार ने भारत के स्टार क्रिकेटर रहे सुरेश रैना से पंगा ले लिया, जिसके बाद सुरेश रैना ने पूरे पाकिस्तान को उसकी ‘औकात’ याद दिला दी।

दरअसल, इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) ने पाकिस्तान के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी को टी20 वर्ल्ड कप 2024 का एम्बैसडर चुना है। अफरीदी से पहले युवराज सिंह, क्रिस गेल और उसेन बोल्ट को आईसीसी टी20 वर्ल्ड कप 2024 के लिए ब्रांड एंबेसडर बना चुका है। आफरीदी का नाम सबसे आखिर में जुड़ा है। लेकिन जैसे ही अफरीदी को ब्रैंड एंबेसडर बनाए जाने की घोषणा हुई, वैसे ही एक पाकिस्तानी पत्रकार इमरान सिद्दीकी ने सुरेश रैना को टैग कर तंज कसने की कोशिश की, लेकिन उसका ये दाँव उल्टा पड़ गया।

इमरान सिद्दिकी एक्स पर सुरेश रैना को टैग करते हुए लिखा, ‘आईसीसी ने शाहिद अफरीदी को आईसीसी टी20 वर्ल्ड कप 2024 का एम्बैसडर चुना है। हेलो सुरेश रैना।’ इमरान ने इस पोस्ट के साथ अफरीदी को फोटो के साथ-साथ रैना की भी एक फोटो शेयर की, जिसमें वो कॉमेंट्री करते हुए नजर आ रहे हैं। उसके इस तंज पर सुरेश रैना ने ऐसा जवाब दिया, कि सभी लाजवाब हो गए।

सुरेश रैना ने इमरान सिद्दीकी के पोस्ट को कोट करते हुए लिखा, ‘मैं आईसीसी एंबेसडर नहीं हूँ, लेकिन मेरे घर में 2011 आईसीसी वर्ल्ड कप है, तुमको मोहाली का वो मैच याद है? उम्मीद करता हूँ इससे तुम्हारी कई न भूलने वाली यादें ताजा हो गई होंगी।’

बता दें कि भारत ने साल 2011 का क्रिकेट विश्वकप जीता था। उस विश्वकप के सेमीफाइनल में भारतीय टीम ने मोहाली में पाकिस्तानी टीम को बुरी तरह से मात दी थी। भारत ने उस मैच में पाकिस्तान को 29 रनों से धोया था। मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर मैन ऑफ द मैच रहे थे, जिन्होंने 85 रनों की धाँसू पारी खेली थी। सुरेश रैना ने उस मैच में 39 गेंदों पर नॉटआउट 36 रनों की पारी खेलते हुए भारत को 260 रनों के स्कोर तक पहुँचाया था। उस पाकिस्तानी टीम के कप्तान शाहिद अफरीदी ही थे और बाद में भारतीय टीम ने फाइनल मुकाबले में श्रीलंका को हराया था और 50 ओवरों के विश्वकप को दूसरी बार जीता था। वहीं, पाकिस्तानी टीम का प्रदर्शन उसके बाद के हर विश्वकप में बेहद खराब रहा है, जबकि भारतीय टीम 2015 में सेमीफाइनल तक पहुँची थी, तो 2019 और 2023 में भारतीय टीम फाइनल में हारी थी।

‘ईसाई धर्मांतरण और सेक्स करने के लिए दबाव बनाती है महिला टीचर’: जिस छात्र ने लगाया आरोप हाईकोर्ट ने उसके खिलाफ जाँच का दिया आदेश, स्कूल बोला – डांस के दौरान…

इलाहाबाद उच्च-न्यायालय ने हाल ही में उस छात्र के खिलाफ जाँच का आदेश दिया, जिसने अपने शिक्षिका पर इसे धर्मांतरण के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया था। उक्त छात्र ने ये भी आरोप लगाया था कि शिक्षिका उसके साथ यौन संबंध बनाने का भी दबाव दे रही थी। जस्टिस अरविंद सिंह सांगवान और राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने ये आदेश दिया। हाईकोर्ट को एक स्वतंत्र जाँच के बारे में सूचना मिली थी, जिसमें दावा किया गया था कि छात्र की कुछ करतूतों को छिपाने के लिए शिक्षिका पर ये आरोप लगाए गए हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में उक्त छात्र के किरदार की जाँच आवश्यक है, क्योंकि इस स्वतंत्र जाँच में निकले निष्कर्षों की पुष्टि होती है तो उक्त छात्र और उसके पिता के खिलाफ आपराधिक मामला चलाया जा सकता है। छात्र के पिता ने ही इस मामले में FIR दर्ज करवाई थी। कानपुर के पुलिस कमिश्नर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि वो साइबर सेल को इस मामले की जाँच सौंपे, जो पता लगाएगी कि कहीं छात्र ने शिक्षिका के नाम से कोई फेक सोशल मीडिया आईडी तो नहीं बनाई थी।

कानपुर के उक्त स्कूल के प्रिंसिपल ने इस संबंध में याचिका दायर की थी। छात्र के पिता की शिकायत पर जुडिशल मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद इस मामले की FIR दर्ज की गई थी। पिता ने दावा किया था कि 30 सितंबर, 2023 को जब उन्होंने अपने नाबालिग बेटे का मोबाइल फोन चेक किया तो उसमें शिक्षिका के मैसेज मिले, जिसमें वो सेक्स करने के लिए दबाव बना रही थी। चाइल्ड वेलफेयर कमिटी के पास भी इसकी शिकायत दर्ज है। आरोपों के बाद महिला टीचर को नौकरी से निकाल दिया गया था।

स्कूल ने एक स्थानीय रिटायर्ड सिविल सेवा अधिकारी, एक अन्य स्कूल के प्रिंसिपल और एक स्कूल के कर्मचारी का पैनल बनाते हुए उन्हें इस मामले की जाँच की जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके निष्कर्ष में बताया गया कि एक डांस प्रतियोगिता के दौरान छात्र ने शिक्षिका का मोबाइल फोन लेकर उसके नाम से फेक आईडी बना ली थी। इसके बाद उसने उस फेक आईडी का इस्तेमाल कर के चैटिंग करना और उस पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। स्कूल का कहना है कि छात्र के आरोप बेबुनियाद हैं।

‘नाम खराब करने के लिए दुर्भावनापूर्ण हरकत’: कोर्ट ने मेधा पाटकर को ठहराया दोषी, दिल्ली LG से जुड़ा है मामला

दिल्ली की साकेत कोर्ट ने शुक्रवार (24 मई) को सामाजिक कार्यकर्ता और नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर को मानहानि मामले में दोषी ठहराया है। उनके खिलाफ तत्कालीन केवीआईसी अध्यक्ष वीके सक्सेना (अब दिल्ली एलजी) की ओर से याचिका दायर की गई थी। इस मामले में अब मेधा पाटकर को जेल और जुर्माना, दोनों ही तरह की सजा मिल सकती है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये केस 21 साल पुराना था। साल 2000 से ही वीके सक्सेना और मेधा पाटकर कोर्ट की लड़ाई में उलझे थे। साल 2000 में मेधा पाटकर ने अपने खिलाफ आपत्तिजनक ऐड छापने के मामले में वीके सक्सेना पर केस दर्ज कराया था। इसके जवाब में वीके सक्सेना, जो उस समय केवीआईसी के अध्यक्ष थे, उन्होंने मेधा पाटकर पर 2 केस दर्ज कराए थे। जिस केस में मेधा पाटकर दोषी पाई गई हैं, वो साल 2003 में दर्ज कराया गया था।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, साकेत कोर्ट के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने मेधा पाटकर को आपराधिक मानहानि का दोषी पाया है। कानून के मुताबिक, उन्हें सजा के तौर पर दो साल की जेल या जुर्माना या फिर दोनों मिल सकते हैं।

कोर्ट ने कहा कि, मेधा पाटकर ने आईपीसी की धारा 500 के तहत दंडनीय अपराध किया है। उसे इसके लिए दोषी ठहराया जाता है। उनकी हरकतें जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण थीं, जिसका उद्देश्य शिकायतकर्ता के अच्छे नाम को खराब करना था। उनके कार्यों ने वास्तव में जनता की नजर में उसकी प्रतिष्ठा और साख को काफी नुकसान पहुँचाया है।

कोर्ट ने पाया कि पाटकर ने अपने बयान में सक्सेना को कायर कहा और हवाला लेनदेन में उनकी संलिप्तता का आरोप लगाया था, ये न केवल मानहानिकारक थे, बल्कि नकारात्मक धारणाओं को भड़काने के लिए भी तैयार किए गए थे। यह आरोप कि सक्सेना गुजरात के लोगों और उनके संसाधनों को विदेशी हितों के लिए गिरवी रख रहे थे, उनकी ईमानदारी और सार्वजनिक सेवा पर सीधा हमला था।

जानकारी के मुताबिक, साल 2000 में मेधा पाटकर और वीके सक्सेना के बीच तनातनी हुई थी। उस समय वीके सक्सेना अहमदाबाद बेस्ड एनडीए नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के अध्यक्ष थे। उन्होंने अपने खिलाफ टीवी पर आपत्तिजनक बयानबाजी को लेकर 2 केस दर्ज कराए थे। मेधा पाटकर ने उनके खिलाफ प्रेस में भी बयान जारी किया था।

राजीव गाँधी की हत्या के बाद चुनाव आगे बढ़ाने से कॉन्ग्रेस को ऐसे हुआ था फायदा, चुनाव आयुक्त रहे TN शेषन को आडवाणी के खिलाफ मिला टिकट: कहानी 1991 की

अब जब लोकसभा चुनाव 2024 अपने अंतिम चरण में है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धुआँधार प्रचार अभियान अब भी जारी है। गुरुवार (23 मई, 2024) को इंडिया टीवी के कार्यक्रम ‘सलाम इंडिया’ में रजत शर्मा ने उनका इंटरव्यू लिया। ये कार्यक्रम ‘भारत मंडपम’ में आयोजित किया गया था। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई मुद्दों पर बात की, जिसमें से एक चुनाव आयोग की निष्पक्षता का भी था। विपक्षी दल अक्सर आरोप लगाते रहे हैं कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है।

PM मोदी ने याद दिलाया 33 साल पुराना इतिहास

डेढ़ घंटे के इस वीडियो में 55:20 के बाद का हिस्सा आप देखेंगे तो पाएँगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बात की है कि कैसे विपक्ष के लोग चुनाव आयोग को गाली देते हैं। इसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस को आईना दिखाने के लिए इतिहास का सहारा लिया। उन्होंने नियम समझाया कि हमारे देश की चुनावी व्यवस्था कहती है कि मतदान से पहले किसी उम्मीदवार की मृत्यु हो जाए तो उस सीट पर चुनाव स्थगित होता है और उसकी तारीख़ बाद में आई है।

इसके बाद उन्होंने कहा, “कोई मुझे बताए कि राजीव गाँधी नाम का एक व्यक्ति संसदीय चुनाव का उम्मीदवार था। आतंकवाद में उनकी हत्या हो गई। उनकी सीट पर चुनाव रुकनी चाहिए थी। लेकिन, उस समय के चुनाव आयोग ने पूरे देश का चुनाव रोक दिया। कोई लॉजिक नहीं था। करीब 21-22 दिन दिए गए। उनकी अस्थियाँ लेकर देश भर में यात्रा निकाली गई और फिर चुनाव हुआ। देश के इलेक्शन कमिश्नर, बाद में उन्होंने खुद कॉन्ग्रेस प्रत्याशी बन कर लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव लड़ा।”

बता दें कि विपक्षी नेता अक्सर ‘Level Playing Field’ न होने की बात करते हैं और कहते हैं कि भाजपा सरकारी मशीनरी अपने पक्ष में होने के कारण फायदे में है। इसी का जवाब देते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने इस घटना को याद किया और पूछा कि ये कौन सा ‘लेवल प्लेयिंग फिल्ड’ था? कुछ भी हो, 33 वर्ष पहले हुई इस घटना की याद दिला कर प्रधानमंत्री ने एक नई चर्चा तो छेड़ ही दी है। आइए, जानते हैं 1991 के उस चुनावी घटनाक्रम के दौरान क्या हुआ था।

चंद्रशेखर सरकार का गिरना और राजीव गाँधी की हत्या

उस समय TN शेषन देश के मुख्य चुनाव आयुक्त हुआ करते थे। राजीव गाँधी ने ही तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार पर दबाव डाल कर दिसंबर 1990 में उन्हें ये पद दिलवाया था। उस सरकार को बाहर से कॉन्ग्रेस का समर्थन था। तत्कालीन कानून मंत्री सुब्रमण्यन स्वामी ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई थी। सुब्रमण्यन स्वामी ने ही मई 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिराने के लिए सोनिया गाँधी और AIADMK की जयललिता की बैठक करवाई थी। आज भी वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भला-बुरा कहते रहते हैं।

1991 में मध्यावधि चुनाव हुए थे। उससे पहले चंद्रशेखर की सरकार गिर गई थी, क्योंकि कॉन्ग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया था। मार्च 1991 में हरियाणा के 2 पुलिसकर्मियों को राजीव गाँधी के आवास के बार चाय पीते हुए पाया गया। पार्टी ने आरोप लगाया था कि ये दोनों CID से हैं और राजीव गाँधी की जासूसी कर रहे थे। उस समय 197 सीटों वाली कॉन्ग्रेस सत्ता से बाहर थी, लेकिन उसने VP सिंह की सरकार गिरने के बाद चंद्रशेखर को समर्थन दिया था, जिन्होंने 64 सांसद तोड़ते हुए ‘समाजवादी जनता पार्टी’ बनाई थी

उस समय हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला की सरकार थी, जो चंद्रशेखर की पार्टी का अहम हिस्सा थे। गुस्साए राजीव गाँधी ने चंद्रशेखर की सरकार गिरा दी। 6 मार्च, 1991 को चंद्रशेखर बहुमत साबित करने में नाकाम रहे और मई में चुनावों की घोषणा हो गई। 20 मई को पहला चरण संपन्न हुआ। इसके अगले ही दिन तमिलनाडु के श्रीपेरूम्बदुर में राजीव गाँधी की श्रीलंका के उग्रवादी संगठन LTTE ने हत्या कर दी। चुनाव स्थगित कर दिया गया। इसके बाद 12 और 15 जून को चुनाव हुए।

राजीव गाँधी की हत्या के बाद चुनाव क्यों स्थगित हुआ, इसका कोई स्पष्ट कारण नज़र नहीं आता। राजीव गाँधी अमेठी से चुनाव लड़ रहे थे, जहाँ उनकी हत्या से 1 दिन पहले ही वोट डाले जा चुके थे। जब बाद में परिणाम जारी हुए तो राजीव गाँधी ने 53.13% मत पाकर जीत दर्ज की थी। उन्हें 1.87 लाख वोट प्राप्त हुए थे, जबकि भाजपा के रवींद्र प्रताप 75,000 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे। बाद में अमेठी में उपचुनाव हुआ, जिसमें कॉन्ग्रेस के सतीश शर्मा विजयी रहे।

दिल्ली में यमुना नदी के किनारे उनकी माँ इंदिरा गाँधी की समाधि के नज़दीक ही राजीव गाँधी का भी अंतिम संस्कार 24 मई, 1991 को हुआ। उससे पहले उनके शव को लेकर तीन मूर्ति भवन से लेकर शक्ति स्थल तक ये यात्रा निकाली गई। 33 सैनिकों की 5 पलटन आगे और 5 पलटन पीछे इस दौरान चल रही थी। राजीव गाँधी के अंतिम संस्कार के लिए 10 क्विंटल लकड़ी का इस्तेमाल किया गया था, जिसमें 4 क्विंटल चन्दन की लकड़ी थी।

जो TN शेषन चुनाव स्थगित किए जाने के समय मुख्य चुनाव आयुक्त थे, उन्होंने 1999 के लोकसभा चुनाव के दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी के टिकट पर भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण अडवाणी के खिलाफ चुनाव लड़ा। वो 1.89 लाख वोटों से चुनाव हार गए। इससे पहले वो 1997 में भारत के राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ चुके थे, लेकिन कॉन्ग्रेस की तरफ से उतारे गए KR नारायणन से हार गए थे। TN शेषन को मात्र 5% वोट ही प्राप्त हुआ था।

राजीव गाँधी की हत्या के बाद कॉन्ग्रेस को फायदा

राजीव गाँधी की हत्या के बाद हुए एग्जिट पोल से स्पष्ट पता चला था कि कॉन्ग्रेस पार्टी को चुनाव में इसका फायदा मिल रहा है। उनकी हत्या से पहले हुए एग्जिट पोल में कॉन्ग्रेस को 190 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया था जबकि हत्या के बाद 265. कॉन्ग्रेस ने 244 सीटें जीती भी। ग्रामीण इलाकों में, और मुस्लिम समुदायों द्वारा कॉन्ग्रेस के पक्ष में मतदान बढ़ा। राजीव गाँधी की हत्या से पहले 211 सीटों पर मतदान हुआ था, जबकि हत्या के बाद 332 सीटों पर।

हत्या से पहले जहाँ-जहाँ चुनाव हुए वहाँ कॉन्ग्रेस पार्टी को 5.7% नुकसान हुआ, जबकि हत्या के बाद जिन सीटों पर चुनाव हुए वहाँ कॉन्ग्रेस को 1.6% का फायदा हुआ। वोटर टर्नआउट भी बढ़ा था। हत्या से पहले बिहार में ये 56% था, हत्या के बाद 63% हो गया। बिहार में पहले कॉन्ग्रेस 6% वोटों के घाटे में थी, राजीव गाँधी की हत्या के बाद 1.8% के फायदे में आ गई। सबसे अधिक बदलाव तो कॉन्ग्रेस के पक्ष में राजस्थान में हुआ था।

वहाँ पार्टी पार्टी को 2% वोटों का फायदा हो रहा था, लेकिन राजीव गाँधी की हत्या के बाद हुए चुनावों में पार्टी को 14% वोटों का फायदा हुआ। वोटर टर्नआउट भी 5% बढ़ा। आंध्र प्रदेश में TDP को 9% वोटों का नुकसान हुआ। बिहार और राजस्थान में भाजपा को घाटा हुआ। राजीव गाँधी की हत्या को कॉन्ग्रेस ने अपने पक्ष में जम कर भुनाया, चुनाव आयोग ने किसके इशारे पर ये सब किया होगा ये बताने की ज़रूरत नहीं है। तभी TN शेषन को आगे चल कर प्रत्याशी बनाया गया।

उम्मीदवार की मौत हो जाए तो… क्या कहता है नियम?

आइए, अब आपको बताते हैं कि किसी उम्मीदवार की मौत होने की स्थिति में चुनाव का क्या होता है। 1951 के लोक प्रतिनिधित्व कानून (Representation of Peoples Act) में कहा गया है कि अगर चुनाव के दौरान किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के प्रत्याशी की मौत हो जाती है तो धारा-52 के तहत उक्त सीट पर मतदान स्थगित किया जा सकता है। नामांकन की आखिरी तारीख़ को सुबह 11 बजे से लेकर मतदान शुरू होने तक की अवधि के बीच में अगर उम्मीदवार की मौत होती है तो ये नियम लागू होता है।

इसके बाद RO (रिटर्निंग ऑफिसर) को चुनाव आयोग को तथ्यों से अवगत कराना होता है। फिर चुनाव आयोग संबंधित राजनीतिक को किसी अन्य प्रत्याशी को नामांकित करने के लिए कहता है। इसके लिए एक सप्ताह का समय दिया जाता है। अगर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की सूची पहले ही तैयार की जा चुकी है तो उसे रद्द कर के नई सूची तैयार की जाती है। प्रकाशित की गई नई सूची में मृत उम्मीदवार की जगह नए नामांकित उम्मीदवार का नाम होता है।

लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान भी ऐसी घटना हुई है। मुरादाबाद में चुनाव संपन्न होने के 1 दिन बाद ही भाजपा प्रत्याशी कुँवर सर्वेश सिंह का निधन हो गया। वो बीमार थे। उनका निधन मतदान के बाद हुआ है, इसीलिए इस स्थिति में मतगणना तक रुका जा सकता है। क्योंकि, अगर किसी और प्रत्याशी की जीत हुई तो उपचुनाव की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी, लेकिन अगर कुँवर सर्वेश सिंह मरणोपरांत विजयी होते हैं तो चुनाव रद्द कर उपचुनाव कराया जाएगा।

ताज़ा उदाहरण हम मध्य प्रदेश के बैतूल का भी ले सकते हैं। यहाँ BSP उम्मीदवार अशोक भलावी की हार्ट अटैक के कारण मौत हो गई थी। इस सीट पर दूसरे चरण में मतदान होना था, लेकिन इसे तीसरे चरण तक के लिए टाल दिया गया। व्यवस्था दी गई कि अगर नया उमीदवार बसपा उतारती है तो उसे नामांकन दाखिल करना होगा, पूर्व से नामांकित उम्मीदवारों की स्थिति ज्यों की त्यों रहेगी। किसी एक सीट पर ऐसी घटना होने के कारण पूरे देश में चुनाव रद्द नहीं किया जाता।

हिंदुओं ने संत कनक दास की प्रतिमा स्थापित की तो मुस्लिमों ने जबरन हटाया, 22 मई को होना था लोकार्पण

तेलंगाना के गट्टू मंडल में हिंदुओं ने भक्त संत कनक हरिदास की प्रतिमा स्थापित की थी, लेकिन मुस्लिमों ने उसे जबरन हटा दिया। भक्त संत कनक हरिदास की इस मूर्ति का 22 मई 2024 को अनावरण किया जाना था, लेकिन मुस्लिमों के विरोध की वजह से न सिर्फ मूर्ति को हटाना पड़ा, बल्कि इस कार्यक्रम को ही रद्द करना पड़ा। पीड़ितों का आरोप है कि तेलंगाना की कॉन्ग्रेस सरकार और पुलिस आरोपितों का ही साथ दे रही है और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रही।

ऑर्गनाइजर की रिपोर्ट के मुताबिक, ये मामला जोगुलंबा गडवाल जिले के गट्टू मंडल में आने वाले गोरलाखंखोड्डी का है। जहाँ कुरुवा समुदाय के लोग संत कनकदास को अपने कुलदेवता के रूप में पूजते हैं। 22 मई 2024 की सुबह पूरा समुदाय सुबह 4 बजे से ही पूजा-पाठ कर रहा था, लेकिन सुबह 7 बजे के आसपास स्थानीय मुस्लिम मौके पर पहुँच गए और संत कनकदास की प्रतिमा को जबरन वहाँ से हटा दिया, जबकि जिस जगह पर संत कनकदास की मूर्ति स्थापित की जानी थी, वो जमीन निजी थी और हिंदुओं की ही है।

स्थानीय हिंदुओं का कहना है कि मूर्ति को एक निजी जमीन पर स्थापित किया गया था, जिसके सभी उचित दस्तावेज और स्वामित्व के कागजात मौजूद थे। लेकिन गाँव के कुछ मुस्लिम परिवारों ने इसका विरोध किया। मुस्लिमों ने कहा कि मूर्ति की वजह से रास्ते में रुकावट आएगी। हिंदुओं का कहना है कि मूस्लिमों के घरों के लिए जाने के लिए 2 तरफ से सड़क हैं, लेकिन वो मूर्ति नहीं लगाने दे रहे। बाद में मुस्लिमों ने ये कहा कि वो मूर्ति ही नहीं लगाने देंगे, क्योंकि उनके घर पास में ही हैं। इस मामले में हिंदुओं ने मोहम्मद, मबूसाब, इमाम, रंजू और नवाब को आरोपित बनाते हुए पुलिस को शिकायत दी है।

स्थानीय हिंदुओं ने यह भी आरोप लगाया है कि प्रशासन आश्चर्यजनक रूप से इस मुद्दे पर मुसलमानों का पक्ष ले रहा है। ऑर्गनाइजर की रिपोर्ट के अनुसार, गाँव में 20-25 मुस्लिम परिवार रहते हैं, साथ ही 800 अन्य परिवार भी रहते हैं।

तेलंगाना विहिप के संयुक्त सचिव डॉ शशिधर ने मुस्लिमों के इस काम की निंदा की है। उन्होंने कहा, ‘गोरलाखंखोड्डी में जो मुस्लिमों ने किया, वो बेहद गलत है। तेलंगाना पुलिस को उन्हें गिरफ्तार करना चाहिए। हिंदुओं के खिलाप अपराध लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन तेलंगाना की कॉन्ग्रेस सरकार मुस्लिम कट्टरपंथियों का समर्थन कर रही है।’

बता दें कि भक्त संत कनकदास को थिमप्पा नायक के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म कर्नाटक के विजयनगर साम्राज्य में हुए था। वो 16वीं शताब्दी में भक्ति आंदोलन के संतों में एक प्रमुख व्यक्ति थे। उन्हें दक्षिण के कई राज्यों में पूजा जाता है।

अरविंद केजरीवाल के PA विभव कुमार को नहीं मिली राहत, दिल्ली की कोर्ट ने भेजा जेल: सांसद स्वाति मालीवाल की CM के घर में की थी पिटाई

स्वाति मालीवाल के साथ बदसलूकी मामले में आरोपित विभव कुमार को पुलिस हिरासत की अवधि खत्म होने के बाद न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। यह फैसला दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने सुनाया है। अब विभव 28 मई तक जेल में रहेंगे।

सुनवाई के दौरान कोर्ट में विभव के वकील ने एकबार फिर इस केस में गिरफ्तारी की जरूरत पर सवाल खड़ा किया। इसके अलावा ये भी कहा कि न्यायिक हिरासत या पुलिस हिरासत दोनों ही आरोपित की स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं, किसी भी चीज की माँग उचित होनी चाहिए।

इस सुनवाई के दौरान विभव ने कोर्ट में एक एप्लीकेशन में डाली जिसमें माँग थी कि जाँच के दौरान जो भी डीवीआर मिले हैं उन्हें संरक्षित किया जाए और रिकॉर्ड पर रखा जाए। हालाँकि पब्लिक प्रोजिक्यूटर ने इस एप्लीकेशन का विरोध किया और कहा कि ये बात कहने के लिए ये मंच नहीं है। इस माँग को खारिज किया जाए।

वहीं कोर्ट द्वारा न्यायिक हिरासत मिलने के बाद उन्होंने दिल्ली पुलिस ने कहा कि अदालत के निर्देशों के अनुसार उन्होंने विभव कुमार के परिवार के सदस्यों और वकील को विभव से मिलने की अनुमति दी थी।

बता दें कि इससे पहले खबर आई थी विभव कुमार पुलिस हिरासत में थे जहाँ कहा जा रहा था कि वो जाँच में सहयोग नहीं कर रहे । इसके अलावा उनके ऊपर अपना फोन फॉर्मेट करने का भी आरोप लगा था। पुलिस ने उनके घर से बरामद सभी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स को फॉरेंसिक जाँच के लिए भेजा गया है।

स्वाति मालीवाल का इंटरव्यू

उल्लेखनीय है कि स्वाति मालीवाल के इस पूरे मामले में एक ओर जहाँ दर्ज शिकायत के बाद पुलिस अपनी कार्रवाई कर रही है तो वहीं स्वाति मालीवाल का एक इंटरव्यू सामने आया था। उन्होंने ANI पॉडकास्ट पर स्मिता प्रकाश को कहा था, “अगर मेरी राज्यसभा सीट उनको वापस चाहिए थी, तो अगर प्यार से माँगते तो मैं जान भी दे देती, राज्यसभा सीट तो बहुत छोटी चीज है।”

उन्होंने कहा था, “मैंने कभी भी पद की लालसा नहीं दिखाई, मैं 2006 में तब जुड़ी थी जब कोई किसी को जानता नहीं था। मैंने जमीन से जुड़ कर काम किया है। 2006 से 2012 तक सारे ऑपरेशन चलाए हैं। मैं 3-4 लोगों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति थी।”

गौरतलब है कि AAP की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल के साथ 13 मई, 2024 को दिल्ली CM के आधिकारिक आवास पर मारपीट हुई थी। उनके साथ यह मारपीट दिल्ली CM केजरीवाल के पूर्व PS विभव कुमार ने की थी। इस घटना को लेकर स्वाति मालीवाल ने FIR भी दर्ज करवाई थी। उन्होंने एफआईआर में कई आरोप लगाए थे जिसके बाद पुलिस ने विभव को गिरफ्तार किया। पहले विभव को पुलिस हिरासत में भेजा गया और न्यायिक हिरासत में।

बंगाल की OBC लिस्ट में 179 जाति, इनमें 117 मुस्लिम: ज्योति बसु ने की शुरुआत, ममता बनर्जी ने किया मनमाना तुष्टिकरण; हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देगी TMC सरकार

कलकत्ता हाई कोर्ट ने बुधवार (22 मई, 2024) को अपने एक फैसले में पश्चिम बंगाल में 2010 के बाद से जारी किए गए सभी OBC प्रमाण पत्र को रद्द करने का आदेश दिया था। हाई कोर्ट ने अब तक जारी किए गए लगभग 5 लाख प्रमाण पत्र रद्द करने का आदेश दिया था। यह प्रमाण पत्र 77 जातियों को OBC मान कर दिए गए थे, इनमें से अधिकांश मुस्लिम थीं। पश्चिम बंगाल की CM ममता बनर्जी ने पहले यह निर्णय मानने से मना कर दिया था। अब उनका कहना है कि वह इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएँगी।

CM ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना में आयोजित एक रैली में कहा, “हम ओबीसी प्रमाणपत्रों को रद्द करने के फैसले को स्वीकार नहीं करते हैं। हम गर्मी की छुट्टियों के बाद इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।” इससे पहले उन्होंने साफ़ रूप से कहा था कि वह हाई कोर्ट के फैसले को स्वीकार नहीं करती और राज्य में OBC आरक्षण पहले की तरह चलेगा।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने मुस्लिमों को OBC के अंतर्गत जोड़ने को वोटबैंक की राजनीति बताया था। कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिम जातियों को यह आरक्षण मजहबी आधार पर दिया गया लगता है। कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिमों का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे की वस्तु की तरह हुआ है।

कोर्ट ने कहा, ” ऐसा लगता है कि इस समुदाय (मुस्लिम) का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए वस्तु की तरह किया गया है। यह बात उन घटनाओं के क्रम से साफ हो जाती है जिसके कारण 77 जातियों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करने के लिए OBC में डाला गया।”

वहीं बंगाल के पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा दी गई जानकारी से साफ़ हुआ है कि पश्चिम बंगाल की वामपंथी और ममता सरकार, दोनों ने ही मुस्लिम जातियों को OBC वर्ग में शामिल किया। पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण का लाभ पाने वालों में हिन्दुओं से अधिक मुस्लिम जातियाँ हैं।

बंगाल के OBC सूची में हिन्दू से अधिक मुस्लिम जातियाँ

पश्चिम बंगाल के पिछड़ा विभाग की वेबसाइट पर दी गई जानकारी दिखाती है कि 1994 में पहली बार वामपंथी सरकार ने किसी मुस्लिम जाति को OBC में शामिल करके आरक्षण दिया था। दिसम्बर 1994 में मुस्लिमों की जोलाह (अंसारी-मोमिन) जाति को OBC में शामिल किया गया था। 1995 तक राज्य में कुल 26 जातियों को OBC आरक्षण का लाभ मिलता था।

धीमे धीमे OBC आरक्षण में हिन्दुओं का हिस्सा घटने लगा। वामपंथी सरकार ने 1996 में 1 और मुस्लिम जाति फ़कीर/सेन को OBC आरक्षण दे दिया। इसके बाद 1997 में 4, 1999 में 2 और मुस्लिम जातियों को OBC का दर्जा दे दिया गया। इसके बाद यह सिलसिला तेजी से चालू हो गया। 2002 में 2 और 2009 में 2 और मुस्लिम जातियों को आरक्षण दिया गया।

2010 में वामपंथी सरकार ने 41 मुस्लिम जातियों को OBC में शामिल कर दिया। जहाँ 1994 में 26 में से 1 OBC जाति मुस्लिम थी, वहीं 2010 आते-आते कुल 108 OBC जातियों में से 53 मुस्लिम हो गईं। 2010 के बाद वामपंथी सरकार पश्चिम बंगाल की सत्ता से बेदखल हो गई और ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस की राज्य में सत्ता बनी।

मुस्लिमों को OBC में शामिल किए जाने के रवैये में फिर भी कोई बदलाव नहीं आया। ममता सरकार ने भी यही नीति जारी रखी। ममता सरकार ने 2011 से लेकर 2013 तक 33 और मुस्लिम जातियों को OBC में शामिल कर दिया। इसके बाद राज्य की OBC सूची में शामिल कुल जातियों की संख्या 143 हो गई, इनमें से 86 मुस्लिम थीं।

यह सिलसिला इसके बाद भी जारी रहा। 2014 से लेकर 2022 तक ममता सरकार ने 36 और जातियों को OBC में शामिल किया। इनमें से 32 मुस्लिम जातियाँ थी। वर्तमान में पश्चिम बंगाल में 179 जातियों को OBC आरक्षण मिलता है, इनमें से 117 जातियाँ मुस्लिम हैं।

कलकत्ता हाई कोर्ट के निर्णय में 2010 के बाद से दिए गए आरक्षण को लेकर कई प्रश्न खड़े गए किए गए हैं। हाई कोर्ट ने कहा है कि यह आरक्षण मजहबी आधार पर दिया गया और इससे पहले ही ममता बनर्जी मुस्लिमों को 10% आरक्षण का वादा कर चुकी थीं।

नाम – कृष्णा मोहिनी, जगह – द्वारका, एजेंडा – प्राइड मार्च वाला: Colors के सीरियल में LGBTQIA+ प्रोपेगंडा के लिए बच्चे का इस्तेमाल, लड़का से लड़की और लड़की से लड़का बनने की सीख

Viacom18 के मालिकाना हक़ वाले चैनल Colors TV ने अब सीरियल ‘कृष्णा मोहिनी’ के जरिए LGBTQIA+ प्रोपेगंडा को आगे बढ़ाया है। चैनल पर इस सीरियल के डिस्क्रिप्शन में लिखा हुआ है कि पवित्र भूमि द्वारका में इसकी कहानी सेट है, और इसमें 21 साल की कृष्णा की कहानी दिखाई गई है। वो गायिका हैं और अपने घर की एकमात्र कमाने वाली व्यक्ति। वहीं उसके भाई मोहन के बारे में बताया गया है कि वो ‘लैंगिक पहचान’ (Gender Identity) की समस्या से जूझ रहा है।

शो का विवरण देते हुए चैनल का कहना है कि कृष्णा को अपने परिजनों की रक्षा करने के लिए सामाजिक मानदंडों और पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ रहा है। इस सीरियल के थीम के रूप में पहचान, परिवार और चुनौतियों के खिलाफ संघर्ष को बताया गया है। साथ ही चैनल दावा करता है कि ये सीरियल ट्रांसजेंडर समुदाय की समस्याओं को दिखाता है, उनके द्वारा सामना किए जाने वाले मुद्दों को दिखा रहा है। हालाँकि, इसके लिए बच्चों का इस्तेमाल किया गया है।

इस सीरियल के एक दृश्य में दिखाया गया है कि कैसे एक बचे का सामना LGBTQIA+ रैली से होता है और वो फिर उसी धुन में मगन हो जाता है। साथ ही एक ‘प्राइड मार्च’ भी दिखाया गया है, जिसमें समलैंगिक समुदाय के कई लोग नाचते रहते हैं। इनके हाथों में पोस्टर होते हैं। बता दें कि पश्चिमी देशों में ‘प्राइड मार्च’ के नाम पर नग्न प्रदर्शन भी हो चुके हैं। सीरियल में जब बच्चा पूछता है कि ‘प्राइड मार्च’ क्या होता है, तो एक शख्स समझाता है कि वो लड़की पैदा हुई थी लेकिन उसे लड़के जैसा रहना पसंद है तो उसने खुद को लड़का बना दिया।

वो लोग बताते हैं कि वो दुनिया को बता रहे हैं कि उन्हें पूरा हक़ है अपने-आप को बदलने का, उस हिसाब से जो वो अंदर से महसूस करते हैं। वहीं एक समलैंगिक शख्स कहता है कि उस बच्चे के अंदर भी एक लड़ाई चल रही है, वो भी इसमें शामिल हो सकता है, अपनी सच्चाई को स्वीकार करते हुए अपने अंदर के डर को निकाल सकता है। ये लोग कहते हैं कि घर वाले उन्हें नहीं समझते, बहुत बोलते हैं। फ्लैशबैक में दृश्य दिखाए गए हैं जब उसके दोस्त उसे ‘मोहनिया’ कह कर चिढ़ाते हैं, उसके पिता लड़कियों वाले कपड़े पहनने पर उसकी पिटाई करते हैं।

वहीं एक दृश्य में उसके शिक्षक उसकी बहन से कहते हैं कि तुम्हारा भाई अजीब है, दूसरे लड़कों से अलग है। वही एक व्यक्ति समलैंगिकों के बारे में कहता है कि ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए, ऐसे लोग ठीक नहीं होते हैं। वो बच्चा सोचता है कि उसके भीतर एक लड़की है और कोई उसे नहीं समझता। फहमान खान, सेजल जायसवाल और देबात्तमा साहा इसमें मुख्य किरदारों में हैं। हालाँकि, इसमें भगवान श्रीकृष्ण का नाम और उनकी धरती को कहानी से क्यों जोड़ा गया है ये समझ से परे है।

भारत में समलैंगिक समाज का हमेशा से सम्मान किया जाता रहा है, जो प्राकृतिक रूप से ऐसे हैं। विवाह से लेकर बच्चे के जन्म जैसे शुभ अवसरों पर उन्हें सम्मान दिया जाता है, उपहारों से नवाजा जाता है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है। भगवान विष्णु ने भी दानवों से अमृत लेने के लिए ‘मोहिनी’ का रूप लिया था, वहीं शिव और पार्वती मिल कर अर्धनारीश्वर बनते हैं। लेकिन, पश्चिमी देशों से ये चलन आया है कि किसी भी उम्र में कोई कुछ भी महसूस कर लेता है और फिर उस हिसाब से चाल-ढाल बदल लेता है।

पहले दोस्ती की, फिर फ्लैट में ले गई… MP अनवारुल अजीम की हत्या में शिलांती रहमान पकड़ी गई, कसाई से कटवाया फिर हल्दी लगाकर शव के टुकड़े करवाए पैक

बांग्लादेशी सांसद अनवारुल अजीम अनार की हत्या के मामले में एक महिला को ढाका में हिरासत में लिया गया है। महिला की पहचान शिलांती रहमान के तौर पर हुई है। आरोप है कि शिलांती ने ही बांग्लादेशी सांसद को अपने हनीट्रैप के जाल में फँसाया। असल में वो हत्या के मास्टरमाइंड कहे जा रहे अख्तरुज्जमान की गर्लफ्रेंड है।

ये सारा खुलासा इंडिया टुडे ने बांग्लादेश पुलिस के सूत्रों के हवाले से किया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि शिलांती हत्या के वक्त कोलकाता में थी और हत्या के आरोपित अमानुल्लाह अमन के साथ 15 मई 2024 को बांग्लादेश लौट आई थी। उसे अख्तरुज्जमान ने हनी ट्रैप में फँसाने का काम दिया था। पुलिस उससे पूछताछ कर रही है। इस बीच उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हैं।

बता दें कि बांग्लादेशी सांसद की निर्मम हत्या के इस पूरे केस में अब तक कई खुलासे हो चुके हैं। पुलिस ने भले आधिकारिक बयान नहीं दिया लेकिन मीडिया में खबरें आ रही हैं कि सांसद अनवारुल अजीम अनार और संदिग्ध अख्तरुज्जमान मिलकर सोने की तस्करी का काम करते थे, मगर पैसों को लेकर दोनों के बीच मतभेद हुआ और अख्तारुज्जमान ने पूरी हत्या की साजिश रची।

इस हत्या को अंजाम देने का काम मुंबई के कसाई को मिला था। कसाई का नाम जिहाद हवलदार है। उसे भी कोलकाता पुलिस ने पकड़ लिया है। आरोप है कि उसने अन्य साथियों के साथ मिलकर सांसद की हत्या फ्लैट में की। इसके बाद उनकी पहचान मिटाने के लिए शव से खाल उतारी और शव से मांस छोटे-छोटे टुकड़ों में काट उसे कीमा जैसा बनाया, फिर उसमें हल्दी मिलाई ताकि वो बदबू न करे। इसके बाद उसे अलग-अलग पैकेट में भरा गया। बाद में सारे पैकेट कोलकाता की अलग-अलग जगहों पर फेंक दिए गए। कुछ अंगों को रेफ्रिज्रेटर में भी रखा गया।

बताया जा रहा है कि जाँच में कोलकाता की सीआईडी ने न्यू टाउन फ्लैट के अंदर खून के धब्बे पाए हैं। यहाँ कई प्लास्टिक बैग भी बरामद हुए थे। अनुमान है कि सबूत मिटाने के लिए ग्लव्स को पहनकर इस अपराध को अंजाम दिया गया होगा। अभी तक खंगाली गई सीसीटीवी फुटेज में राजनेता को दो लोगों के साथ फ्लैट में जाते देखा गया था। बाद में दोनों बाहर आ गए, मगर एमपी अंदर ही रहे। इसके बाद अगले दिन वो दो लोग फिर फ्लैट में आए और अपने साथ बड़े ट्रॉली सूटकेस लेकर गए।