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‘तुम (हिंदू) 30%, हम (मुस्लिम) 70%… 2 घंटे में भागीरथी में बहा दूँगा’: TMC विधायक हुमायूँ कबीर ने चुनाव प्रचार के दौरान धमकाया, BJP ने ममता बनर्जी पर उठाए सवाल

लोकसभा चुनाव 2024 के तीसरे चरण के लिए मतदान की तैयारियों के बीच पश्चिम बंगाल के तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) विधायक हुमायूँ कबीर ने हिंदुओं को धमकी दी है। चुनाव प्रचार करने के दौरान हुमायूँ कबीर ने कहा है कि वह हिंदुओं को दो घंटे में भागीरथी नदी (गंगा) में डूबो देंगे। कबीर के इस बयान की जमकर आलोचना हो रही है।

हुमायूँ कबीर भरतपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं। भरतपुर मुर्शिदाबाद जिले में आता है। बीते दिनों उन्होंने बहरामपुर से TMC के उम्मीदवार यूसुफ पठान के लिए भी चुनाव प्रचार किया था। इसके अलावा, वे पार्टी के कई उम्मीदवारों के प्रचार में शामिल हुए। एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने यह विवादित टिप्पणी की है। इसका वीडियो भी वायरल हो रहा है।

चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए हुमायूँ कबीर ने कहा, “तुम लोग (हिंदू) 70 फीसदी हो और हम लोग भी 30 फीसदी हैं। यहाँ पर तुम काजीपाड़ा का मस्जिद तोड़ोगे और बाकी मुसलमान हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहेंगे, यह कभी नहीं होगा। भाजपा को मैं यह बता देना चाहता हूँ कि यह कभी भी नहीं होगा। अगर 2 घंटे के अंदर भागीरथी नदी में बहा न दिया तो मैं राजनीति छोड़ दूँगा।”

बता दें कि पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी TMC ने लोकसभा चुनाव के लिए क्रिकेटर यूसुफ पठान को बहरामपुर से अपना उम्मीदवार बनाया है। इसके बाद हुमायूँ कबीर ने कहा था कि अगर पार्टी ने उम्मीदवार नहीं बदला तो वह बहरामपुर से निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे। कबीर ने कहा था कि दूसरे राज्य से किसी को लाकर कॉन्ग्रेस के अधीर रंजन चौधरी को नहीं हराया जा सकता है। 

मुर्शिदाबाद जिला मुस्लिम बहुल है। यहाँ की कुल जनसंख्या में लगभग 75 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। यहाँ की अधिकांश आबादी बीड़ी बनाने के व्यवसाय से जुड़ी हुई है। मुर्शिदाबाद कभी बंगाल की राजधानी भी रही थी। यहाँ का हजारद्वारी महल इसके गौरवशाली अतीत का आईना है, फिर भी अधिकांश लोग गरीबी में जीने को मजबूर हैं।

इसको लेकर भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने बंगाल सरकार पर हमला बोला है। शक्तिपुर में बूथ कार्यकर्ता सम्मेलन में कबीर की टिप्पणी पर उन्होंने सोशल मीडिया साइट X पर लिखा, “मुर्शिदाबाद में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। सिर्फ 28 प्रतिशत। अब यह उनके साथ किया जा रहा है। कल्पना कीजिए, अगर हिंदू बंगाल के बाकी हिस्सों में अल्पसंख्यक हो जाएँ तो क्या होगा।”

उन्होंने आगे कहा, “पश्चिम बंगाल में तुष्टीकरण की राजनीति नए निचले स्तर पर पहुँच गई है। ममता बनर्जी को धन्यवाद। बंगाल में हिंदू अब दोयम दर्जे के नागरिकों से भी बदतर हैं। क्या वह इस विधायक को पार्टी से बाहर निकालने की हिम्मत करेगी? क्या वे बुद्धिजीवी, जो नियमित रूप से हिंदुओं के खिलाफ जहर फैलाते हैं, एक शब्द भी बोलने का साहस कर सकते हैं?”

 

‘GB रोड की रं$’: महिला को नहीं भाया रणबीर कपूर का ‘रामायण’ लुक तो फैंस देने लगे गाली, गंदे वीडियो में चेहरा लगाकर कर रहे वायरल

बॉलीवुड अभिनेता रणवीर कपूर की आने वाली फिल्म ‘रामायण’ का लुक पिछले दिनों इंटरनेट पर खूब वायरल हुआ तो हर किसी ने इस पर प्रतिक्रिया दी। किसी ने कुछ अच्छा कहा तो किसी ने कुछ बुरा। ऐसे में अभिनेता ने इस पर कुछ रिएक्ट नहीं किया, लेकिन उनके फैन्स नेगेटिव प्रतिक्रिया देख भड़क गए और इस नीचता पर उतर आए कि उन्होंने रणवीर कपूर की बुराई करने वाली एक मध्य प्रदेश की महिला को बदनाम करने की कोशिशें शुरू कर दीं।

महिला ने अपने साथ हो रही हरकतों की जानकारी एक्स पर दी। उन्होंने बताया कि उनके अकॉउंट से पर्सनल फोटोज निकालकर, उसे एडिट करके उसे लीक करने का काम हो रहा है। उन्होंने कहा, “ये लोग मेरा लगातार शोषण कर रहे हैं और मेरी फोटो एडिट करके उसे अश्लील वीडियो से जोड़कर शेयर कर रहे हैं। मैंने इन्हें ऐसा करने से मना भी किया लेकिन ये लोग नहीं रुक रहे और मेरा लगातार शोषण किए जा रहे हैं।”

ट्वीट पर महिला ने बताया कि उन्होंने मध्यप्रदेश स्टेट साइबर पुलिस हेडक्वार्टर में शिकायत कराई है और कहा है कि वो इस मामले की जाँच में उनका तत्काल हस्तक्षेप का अनुरोध करती हैं। उन्होंने कुछ स्क्रीनशॉट अपने ट्वीट में साझा करते हुए ये भी बताया कि ये स्क्रीनशॉट और एडिटिड फोटोज के लिंक भी उन्होंने अपनी शिकायत के साथ पुलिस को दिए हैं। साझा कंटेंट में महिला के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग हुआ है। उनकी फोटो जॉनी सिन्स के साथ जोड़ दी गई है। उनकी फोटो तस्वीर पर एडिट करके लिख दिया गया है- GB रोड की र$#।

महिला ने पुलिस से निवेदन किया है कि पुलिस बस कैसे भी उनकी ऐसी फोटोज और वीडियोज को बनाने वालों पर कार्रवाई कर ले, इसके लिए वह कैसी भी जानकारी और सहायता देने के लिए तैयार हैं। महिला ने अपनी शिकायत की कॉपी भी ट्वीट में शेयर की है।

जिसे कॉन्ग्रेस ने बनाया ‘पिंजरे में बंद तोता’, वो CBI मोदी राज में सरकारी नियंत्रण से मुक्त: सुप्रीम कोर्ट को केंद्र ने बताया, बंगाल सरकार ने दायर की थी याचिका

भ्रष्टाचार और अपराध पर जीरो टोलरेंस की नीति अपनाने वाली केंद्र की मोदी सरकार पर केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करने का आरोप अक्सर विपक्षी दल लगाते रहते हैं। हालाँकि, केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि केंद्र के नियंत्रण में काम नहीं करतीं। केंद्र सरकार ने गुरुवार (2 मई 2024) को सुप्रीम कोर्ट को कहा कि सीबीआई उसके ‘नियंत्रण’ में नहीं है।

दरअसल, पश्चिम बंगाल सरकार ने एक मुकदमे में आपत्ति उठाई थी और कहा था कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) कई मामलों में राज्य सरकार उसकी अनुमति लिए बिना ही अपनी जाँच को आगे बढ़ा रही है। इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने यह बात कही।

पश्चिम बंगाल सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत केंद्र के खिलाफ शीर्ष अदालत में एक मूल मुकदमा दायर किया है। अनुच्छेद 131 केंद्र और एक या अधिक राज्यों के बीच विवाद में सर्वोच्च न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार से संबंधित है। इसमें आरोप लगाया गया है कि राज्य द्वारा संघीय एजेंसी को दी गई सहमति वापस लेने के बावजूद CBI एफआईआर दर्ज कर रही है और जाँच कर रही है।

केंद्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ को बताया कि संविधान का अनुच्छेद 131 सुप्रीम कोर्ट को प्रदत्त ‘सबसे पवित्र’ क्षेत्राधिकारों में से एक है और इस प्रावधान को दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य के मुकदमे में संदर्भित मामले भारत संघ द्वारा दायर नहीं किए गए हैं।

तुषार मेहता ने कहा, “भारत संघ ने कोई मामला दर्ज नहीं किया है। इसे सीबीआई ने दर्ज किया है। सीबीआई भारत संघ के नियंत्रण में नहीं है।” बताते चलें कि 16 नवंबर 2018 को पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी की सरकार ने राज्य में जाँच करने या छापेमारी करने के लिए CBI को दी गई ‘सामान्य सहमति’ वापस ले ली थी।

दरअसल, सीबीआई भ्रष्टाचार एवं अन्य अपराध के मामलों की जाँच कर रही है। ऐसे में विपक्षी दल केंद्र पर सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि सीबीआई और ईडी के जरिए केंद्र सरकार विपक्षी दलों को डरा-धमका रही है। हालाँकि, केंद्र ने कई बार स्पष्ट किया है कि केंद्रीय एजेंसी सिर्फ अपना काम कर रही है।

इन आरोपों के आधार पर विपक्षी दलों की सरकार वाली राज्य सरकारों ने अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में मामलों की जाँच के लिए सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली है। जिन राज्यों ने ऐसा किया है, उनमें 10 राज्य शामिल हैं। ये राज्य हैं- पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, तेलंगाना, पंजाब, झारखंड, केरल, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम, और मेघालय।

दिसंबर 2023 को केंद्र की ओर से कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा को सूचित किया गया था इन दस राज्यों ने सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली है। दरअसल, दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (डीएसपीई) अधिनियम 1946 की धारा 6 के अनुसार सीबीआई को अपने अधिकार क्षेत्र में जाँच करने के लिए संबंधित राज्य सरकारों से सहमति की आवश्यकता होती है।

बताते चलें कि इसी सीबीआई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में कड़ी टिप्पणी की थी और उसे पिंजरे का तोता बताया था। दरअसल, यूपीए सरकार में हुए कोयला घोटाले पर सीबीआई की स्‍टेटस रिपोर्ट में तत्कालीन कानून मंत्री अश्विनी कुमार और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के हस्‍तक्षेप को लेकर सुप्रीम कोर्ट भड़क गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने था कि सीबीआई के कई मास्‍टर हैं और जाँच एजेंसी एक तोते की तरह है। कोर्ट ने कहा था, “सीबीआई वो तोता है जो पिंजरे में कैद है। इस तोते को आजाद करना जरूरी है। सीबीआई एक स्‍वायत्त संस्‍था है और उसे अपनी स्‍वायत्तता बरकरार रखनी चाहिए। सीबीआई को एक तोते की तरह अपने मास्‍टर की बातें नहीं दोहरानी चाहिए।”

वक्फ बोर्ड की तरह दिल्ली महिला आयोग में भी भर्ती घोटाला? LG ने 223 कर्मचारियों को निकाला, 40 ही थे पद फिर भी स्वाति मालीवाल ने की बहाली

दिल्ली के उप राज्यपाल वीके सक्सेना ने दिल्ली महिला आयोग के 223 कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया है। इनकी नियुक्तियाँ दिल्ली महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने गलत तरीके से की थी। दिल्ली महिला आयोग के पास सिर्फ 40 कर्मचारियों का कोटा है, लेकिन स्वाति मालीवाल ने नियमों को अनदेखा करते हुए बिना उपयुक्त मंजूरी के ही इनकी नियुक्ति की थी।

इस मामले का खुलासा वेतन देते समय हुआ था, जब एक महिला कर्मचारी ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर अपना वेतन माँगा था। अब एलजी ने जाँच के बाद इस पर एक्शन लिया है और गलत तरीके से की गई सभी भर्तियों को रद्द कर दिया है। इस भर्ती घोटाले का समय 2016 का है, जब दिल्ली के वक्फ बोर्ड में भर्ती घोटाले को अंजाम दिया गया था। उस मामले में वक्फ बोर्ड के दो बार अध्यक्ष रहे ओखला से आम आदमी पार्टी विधायक अमानतुल्लाह खान को जेल भी जाना पड़ा था। वक्फ बोर्ड में 2016 में फर्जी नियुक्तियों के बाद 2019 में भी अवैध तरीके से 32 नियुक्तियाँ की गई थी।

वहीं, दिल्ली महिला आयोग में 223 लोगों को अवैध तरीके से भर्तियाँ की गई थी, जिन्हें दिल्ली के एलजी ने नौकरी से निकाल दिया है। दिल्ली प्रशासन द्वारा जारी एलजी के आदेश पत्र में सभी बिंदुओं को विस्तार से बताया गया है। इन कर्मचारियों को स्वाति मालीवाल द्वारा वित्त विभाग/दिल्ली एलजी की मंजूरी के बिना नियुक्त किया गया था। यही नहीं, दिल्ली महिला आयोग के पास इन 223 लोगों को संविदा कर्मचारियों के रूप में नियुक्त करने की शक्ति भी नहीं थी, और न ही इतनी नियुक्तियों की जगह ही थी। दिल्ली महिला आयोग अधिनियम द्वारा इस विभाग में 40 पदों का ही सृजन किया गया था। ऐसे में स्वाति मालीवाल ने नियमों को अनदेखा कर इनकी नियुक्तियाँ की थी।

इस मामले में दिल्ली महिला आयोग के जुड़े सचिव ने उन्हें चेताया भी था और स्वाति मालीवाल को बताया भी था कि वो बिना वित्त विभाग की मंजूरी के नियुक्तियाँ नहीं कर सकती। पहले इसके लिए पद का सृजन होना चाहिए। लेकिन स्वाति मालीवाल ने सलाह को दरकिनार करते हुए ये भर्तियाँ की। इन भर्तियों की शिकायत सचिव ने की थी, साथ ही ये मामला दिल्ली हाई कोर्ट में भी गया था, जब वेतन न मिलने पर एक महिला कर्मचारी ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

बता दें कि स्वाति मालीवाल साल 2015 में दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बनी थी और अगले ही साल उन्होंने ये नियुक्तियाँ की थी। दिल्ली महिला आयोग नें 223 नियुक्तियों के बाद से वेतन का मामला लगातार उठता रहा था और कर्मचारियों को हाई कोर्ट की शरण में जाने के बाद वेतन मिल रहा था। इस मामले की जाँच के बाद ही अब एलजी ने ये कदम उठाया है। कुछ लोग इस मामले में भ्रष्टाचार का अंदेशा भी जता रहे हैं कि कहीं इन नियुक्तियों की आड़ में दिल्ली वक्फ बोर्ड की तरह भ्रष्टाचार तो नहीं किया गया।

वक्फ बोर्ड घोटाला क्या है?

बता दें कि जिस समय स्वाति मालीवाल ने दिल्ली महिला आयोग में भर्तियाँ की, ठीक उसी समय दिल्ली वक्फ बोर्ड के पहली बार अध्यक्ष रहे आप नेता और ओखला से विधायक अमनातुल्लाह खान ने वक्फ बोर्ड में नियुक्तियाँ की थी। उस मामले में सीबीआई की जाँच चल रही है। वहीं, साल 2018 में वक्फ बोर्ड का दोबारा अध्यक्ष बनने के बाद अमानतुल्लाह खान की अगुवाई में 32 लोगों की भर्तियाँ वक्फ बोर्ड में की गई। इन भर्तियों में अमानतुल्लाह खान के करीबी रिश्तेदार और ओखला से ही 24 लोगों को चुना गया। यही नहीं, अमानतुल्लाह के पैतृक गाँव से जुड़े लोगों को भी नौकरियाँ दी गई थी। कॉन्ग्रेस ने बाकायदा इन भर्तियों को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस भी किया था।

अमानतुल्लाह खान को इस मामले में सीबीआई ने गिरफ्तार भी किया था और उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। यही नहीं, वित्त विभाग ने पत्र जारी कर अमानतुल्लाह खान पर गंभीर आरोप लगाए थे, जिसके बाद अमानतुल्ला खान को वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष का पद भी छोड़ना पड़ा था। अमानतुल्लाह खान ने वक्फ बोर्ड का अध्यक्ष रहते और भी कई गंभीर आपराधिक कामों को अंजाम दिया, जिसमें उन्होंने वक्फ की संपत्तियों को अवैध तरीके से किराए पर देकर पैसे कमाए। वहीं, भर्तियों के माध्यम से भी उन पर पैसे बनाकर रियल इस्टेट में निवेश का आरोप है। सीबीआई के बाद अब ईडी ने अमानतुल्लाह खान को समन जारी किया है।

प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ लुकआउट नोटिस, भारत आते ही होंगे गिरफ्तार: कर्नाटक सेक्स स्कैंडल में SIT ने जल्द पेश होने को कहा

यौन शोषण सांसद प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ यौन शोषण मामले की जाँच कर रही SIT ने उन्हें लुकआउट नोटिस जारी किया है। इससे पहले SIT ने उनको पूछताछ के लिए नोटिस भेजा था। प्रज्वल रेवन्ना वर्तमान में विदेश में हैं।

जानकारी के अनुसार, महिला आयोग के पत्र के बाद यौन शोषण के आरोपों पर बनाई गई SIT ने देश के सभी एयरपोर्ट, समुद्री पोर्ट और सीमाओं पर उनकी तलाश के लिए यह लुकआउट नोटिस जारी किया है।

SIT ने उन्हें यौन शोषण के मामले में पूछताछ के लिए पेश होने को कहा था। हालाँकि, उन्होंने इसका जवाब एक पत्र से दिया था कहा था कि वह अपना बचाव अपने वकील के माध्यम से करेंगे। उनके वकील ने SIT से सात दिन का समय माँगा था।

गौरतलब है कि कर्नाटक के हासन से जेडीएस के सांसद और 2024 लोकसभा चुनावों के लिए प्रत्याशी प्रज्वल रेवन्ना के आपत्तिजनक वीडियो कथित तौर पर सामने आए हैं। इन वीडियो में उनके महिलाओं से दुराचार करने का आरोप है। उन पर महिलाओं को धमकाने और प्रताड़ित करने का भी आरोप है। उनके खिलाफ इस मामले में एक शिकायत भी दर्ज करवाई गई है।

प्रज्वल रेवन्ना हासन में मतदान के बाद बेंगलुरु से जर्मनी चले गए थे। इस मुद्दे के तूल पकड़ने के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने इस मामले में SIT जाँच के आदेश दिए थे। जेडीएस ने भी प्रज्वल को पार्टी से निलंबित कर दिया है। प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ जाँच के लिए महिला आयोग ने भी पत्र लिखा था।

प्रज्वल रेवन्ना मामले में कॉन्ग्रेस पर ढिलाई बरतने के आरोप भी लगे हैं। प्रज्वल के पूर्व ड्राइवर ने एक मीडिया संस्थान को बताया था कि उसने प्रज्वल की यह वीडियो कई महीने पहले कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को दी थी लेकिन इस पर कार्रवाई नहीं की गई और अब मामला सामने आया है।

‘कुछ लोग स्नैक्स खाने पार्टी दफ्तर आ जाते हैं’: पप्पू यादव ने प्रियंका गाँधी का चुनाव प्रचार करने का दिया ऑफर तो बोली कॉन्ग्रेस, कहा- वे पार्टी के सदस्य नहीं

बिहार के बाहुबली नेता पप्पू यादव ने लोकसभा चुनाव 2024 की घोषणा के तुरंत बाद 20 मार्च को अपनी जन अधिकार पार्टी का कॉन्ग्रेस में विलय कर दिया और खुद कॉन्ग्रेस की सदस्यता ले ली थी। अब कॉन्ग्रेस ने पप्पू यादव को स्नैक्स खाने के लिए कॉन्ग्रेस दफ्तर में आने वाला नेता बता दिया है। कॉन्ग्रेस ने कहा है कि पप्पू यादव ने कॉन्ग्रेस की कभी सदस्यता ली ही है। पार्टी ने पप्पू यादव से सदस्यता पर्ची दिखाने की माँग की है।

कॉन्ग्रेस के इस रूख से पप्पू यादव की स्थिति ‘न घर के ना घाट के’ वाली हो गई। उनकी पार्टी और पार्टी के नेताओं का कॉन्ग्रेस में विलय हो गया और अब कॉन्ग्रेस उन्हें पहचानने से इनकार कर रही है। दरअसल, पार्टी का विलय करते हुए पप्पू यादव ने पूर्णिया से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी। हालाँकि, INDI गठबंधन में यह सीट राजद के खाते में चला गया।

लालू यादव की पार्टी राजद ने यहाँ से बीमा भारती को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। वहीं, कॉन्ग्रेस से बगावत करके पप्पू यादव ने पूर्णिया सीट से निर्दलीय लड़ने की घोषणा कर दी। इसके बाद बिहार कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह ने पप्पू से अपना नामांकन पत्र वापस लेने के लिए कहा था। उन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस अपने सदस्यों को निर्दलीय के रूप में लड़ने की अनुमति नहीं देती है।

निर्दलीय चुनाव लड़ने के बावजूद पप्पू यादव ने खुद को कॉन्ग्रेस, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा का सिपाही कहते हैं। बता दें कि पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन कॉन्ग्रेस की राज्यसभा सदस्य हैं और वह खुद को ‘आखिरी साँस तक कॉन्ग्रेस, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी का सिपाही’ बताती रही हैं। राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के समर्थन में पप्पू यादव ने सोशल मीडिया साइट X पर ट्वीट भी किया।

पप्पू ने मंगलवार (30 अप्रैल 2024) को पोस्ट किया, “अमेठी रायबरेली से राहुल गाँधी जी और प्रियंका गाँधी जी चुनाव लड़ेंगे तो मैं अपनी पूरी टीम के साथ अपने संसाधन से चुनाव प्रचार करने जाऊँगा। पाँच लाख से अधिक मतों से उनकी विराट विजय सुनिश्चित है। इस रावणराज के विनाश में एक गिलहरी के रूप में अपनी भूमिका निभाऊँगा।”

हालाँकि, पप्पू यादव ने कॉन्ग्रेस की बात नहीं मानी और वे अपना चुनाव प्रचार जारी रखे हुए हैं। इसके बाद कॉन्ग्रेस ने बुधवार (1 मई 2024) को आधिकारिक तौर पर कह दिया है कि पप्पू यादव ने ना ही पार्टी की सदस्यता ली है और ना ही अपनी पार्टी का कॉन्ग्रेस में विलय किया है। कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता आलोक शर्मा ने तो पप्पू यादव पर तंज भी कस दिया।

आलोक शर्मा ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि पप्पू ने अपनी पार्टी का कॉन्ग्रेस में विलय किया है। उन्होंने पटना में सदस्यता पर्ची भी नहीं ली, जो बिहार से पार्टी में शामिल होने वाले किसी भी व्यक्ति को लेनी पड़ती है।” उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि बहुत से लोग प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्नैक्स लेने (नाश्ता करने) आते हैं। उन्होंने कहा, “मैं जो कहना चाह रहा हूँ वह यह है कि प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।”

बता दें कि कॉन्ग्रेस के बिहार प्रभारी मोहन प्रकाश और मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा की उपस्थिति में पप्पू यादव ने 20 मार्च 2024 को अपनी पार्टी का कॉन्ग्रेस में विलय किया था। इसके साथ ही उन्होंने कॉन्ग्रेस की सदस्यता की घोषणा की थी। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पप्पू यादव का पार्टी में स्वागत किया गया था और उनकी जन अधिकार पार्टी के विलय की घोषणा की गई थी।

दरअसल, बिहार में 40 लोकसभा सीटें हैं। इनमें से 23 सीट पर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) चुनाव लड़ रही है। कॉन्ग्रेस नौ सीटों पर, सीपीआई (एमएल) और विकासशील इंसान पार्टी तीन-तीन सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वहीं, सीपीआई और सीपीआई (एम) एक-एक सीट पर चुनाव लड़ रही है। ये सभी बिहार में महागबंधन का हिस्सा हैं।

पाकिस्तान ‘शहजादे’ को PM बनाने के लिए उतावला: कॉन्ग्रेस के ‘पाक प्रेम’ पर बरसे PM मोदी, पड़ोसी मुल्क के नेता को राहुल गाँधी में दिखा है ‘फायर’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज (2 अप्रैल 2024) गुजरात आणंद में विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी की क्लास लगा दी। इस रैली में उन्होंने कॉन्ग्रेस पर निशाना तो साधा ही। साथ में पाकिस्तान से जो राहुल गाँधी को सपोर्ट मिल रहा है, उस पर भी खूब हमला बोला। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस सत्ता में लौटे इसके लिए पाकिस्तान में दुआ हो रही है और शहजादे को पीएम बनाने के लिए पाकिस्तान उतावला हुआ जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “कॉन्ग्रेस के शहजादे आजकल माथे पर संविधान रखकर नाच रहे हैं। लेकिन, कॉन्ग्रेस ये जवाब दे कि जिस संविधान को आज माथे पर रखकर नाच रहे हो, क्यों 75 साल तक हिंदुस्तान के सभी हिस्सों पर ये संविधान लागू नहीं होता था।”

उन्होंने कहा, “मोदी के आने से पहले इस देश में 2 संविधान, 2 झंडे थे। शहजादे की पार्टी कॉन्ग्रेस ने, इनके परिजनों ने देश में संविधान लागू नहीं होने दिया था। कश्मीर में हिंदुस्तान का संविधान लागू नहीं होता था। धारा 370 दीवार बनकर बैठी थी। सरदार पटेल की भूमि से आए इस बेटे ने उस 370 को जमींदोज कर दिया और सरदार साहब को श्रद्धांजलि दी। कॉन्ग्रेस की कमजोर सरकार आतंक के आकाओं को डोजियर देती थी। लेकिन, मोदी की मजबूत सरकार आतंकियों को घर में घुसकर मारती है।”

पीएम मोदी ने इस बात पर गौर करवाया- “संयोग देखिए, आज भारत में कॉन्ग्रेस कमजोर हो रही है। मजा ये है कि यहाँ कॉन्ग्रेस मर रही है और वहाँ पाकिस्तान रो रहा है। कॉन्ग्रेस के लिए अब पाकिस्तानी नेता दुआ कर रहे हैं। शहजादे को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पाकिस्तान उतावला है। और कॉन्ग्रेस तो पाकिस्तान की मुरीद है ही। पाकिस्तान और कॉन्ग्रेस की ये पार्टनरशिप अब पूरी तरह एक्सपोज हो गई है।”

बता दें कि पीएम मोदी ने राहुल गाँधी पर यह ताना इसलिए कसा है क्योंकि हाल में पाकिस्तान के पूर्व मंत्री फवाद चौधरी ने राहुल गाँधी के भाषण की तारीफ करते हुए कहा था- Rahul on Fire… अब भाजपा ने पाकिस्तान की इसी पसंद पर सवाल खड़े किए हैं।

भारत में शरिया शासन चाहता है CNN, मुखालफत करने वालों को बताता है इस्लाम विरोधी: हिंदू घृणा से भरा अमेरिकी मीडिया का लेख पढ़ा आपने

भारत में लोकसभा चुनावों के दौर के बीच पश्चिमी मीडिया पूरी तरह से इस प्रयास में लगा हुआ है कि कैसे भारतीय वोटर पीएम मोदी की सरकार के विरोध में आ जाएँ। पश्चिमी मीडिया में लगातार ऐसे लेख प्रकाशित हो रहे हैं जिनमें दावा किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिन्दू हार्डलाइनर हैं और उनका तीसरा कार्यकाल भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाएगा। भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी नैरेटिव चलाने के चक्कर में लगातार यह मीडिया हाउस लगातर झूठ परोस रहे हैं। हाल ही में CNN ने ऐसा ही एक लेख प्रकाशित किया।

1 मई, 2024 को अमेरिकी मीडिया संस्थान CNN ने ‘भारत के पवित्र शहर में बढ़ते हिंदू राष्ट्रवाद से मुसलमान डरे हुए हैं’ (Rising Hindu nationalism leaves Muslims fearful in India’s holy city) शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया। शीर्षक से ही पता चलता है कि इस लेख के जरिए वाराणसी (काशी) में मुस्लिम डरे हुए हैं कि कहीं पीएम मोदी को तीसरा कार्यकाल ना मिला जाए।

CNN का दावा: मुस्लिमों को निशाने पर लेने के लिए हिन्दुओं को ऊँचे पदों पर बिठाया जा रहा

ऐश्वर्या एस अय्यर, रिया मोगुल, कुणाल सहगल और विल रिप्ले द्वारा लिखे गए इस लेख में इस बात पर समस्या जताई गई है कि मोदी के भारत में कैसे ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ को सरकारी संस्थानों में ऊँचे पदों पर नियुक्त किया जा रहा है। अपने दावे को मजबूती देने के लिए, CNN ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक रिपोर्ट लिंक कर दी। हालाँकि, CNN ने साफ रूप से CM योगी का नाम नहीं लिया, लेकिन इसने साफ रूप से यह कहा कि बड़े पदों पर हिन्दुओं को इसलिए बैठाया जा रहा है ताकि वह मुस्लिमों को निशाना बना सकें।

CNN को अनुच्छेद 370 और CAA से दिक्कत

CNN के लेख में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाए जाने को लेकर भी प्रलाप किया गया है। इसमें दावा गया कि कि मोदी सरकार ने भारत के अकेले मुस्लिम बहुल राज्य की स्वायत्तता छीन ली। हालाँकि, CNN ने यह नहीं बताया कि आतंक, देश विरोधी प्रदर्शनों और भारतीय सुरक्षाबलों पर पथराव से त्रस्त एक अस्थिर क्षेत्र अब विकास के रास्ते पर चल दिया है। मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर में बुनियादी इन्फ्रा, शिक्षा, पर्यटन और विकास में बड़ा निवेश किया है।

इसके अलावा CNN ने 2019 में लाए गए नागरिकता क़ानून का भी जिक्र क्या। CNN ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने वाले कानून को मुस्लिम विरोधी बताने का प्रयास दिया। इसका आधार CNN ने इस कानून के विरोध में हुए दंगों को बता दिया और कहा कि यह कानून मुस्लिमों को नागरिकता के बाहर करता है।

CNN ने इसमें यह छुपाया कि यह दंगे इस पर फैलाई गई अफवाह के चलते हुए थे। क़ानून किसी भी मुस्लिम को नागरिकता ने बाहर नहीं करता और कोई भी मुस्लिम इस कानून के बाद भी भारत की नागरिकता के लिए आवेदन दे सकता है। CAA कानून केवल इन देशों में रहने वाले अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए लाया गया है।

2020 के दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों को मुस्लिमों पर हमला मानता है CNN

CNN ने 2020 के दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों के एक पीड़ित नासिर अली का उदाहरण दिया। इसमें दावा किया गया कि नासिर को मुस्लिम होने के कारण आँख में गोली मारी गई। CNN का यह प्रोपेगेंडा पुराना है और हिन्दू विरोधी वामपंथी लम्बे समय से यही करते आए हैं कि मुस्लिमों के खिलाफ हुई हिंसा को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जाए। हालाँकि, CNN ने इसी के साथ IB अफसर अंकित शर्मा का नाम नहीं लिया, जिनकी लाश एक नाले से बरामद हुई थी। इस दंगे में 53 लोग मारे गए थे और 200 से ज्यादा घायल हुए थे।

CNN ने एक कश्मीरी मुस्लिम के लिए प्रलाप किया जिसको कथित तौर पर उसकी मुस्लिम पहचान के कारण राजस्थान में हफ़्तों तक कमरा नहीं मिला। CNN के लिए यह बात अधिक गंभीर है कि एक व्यक्ति को कमरा नहीं मिला बजाय कि दंगों में गरीब हिन्दू मारे गए। CNN अपराध को तब ज्यादा खतरनाक घोषित करता है जब वह मुस्लिमों के खिलाफ हों। CNN ने अपने दावों को मजबूती के लिए एमनेस्टी और ह्यूमन राइट्स वाच जैसी संस्थाओं का नाम लिया जो पहले ही हिन्दू विरोधी रवैये के लिए कुख्यात हैं।

CNN में पीएम मोदी पर फैलाया झूठ

CNN ने पीएम मोदी को लेकर विपक्षी दलों के प्रोपेगेंडा पर काम किया और उसे बढ़ाने का प्रयास किया। इसने दावा किया कि पीएम मोदी ने एक रैली में मुस्लिमों को घुसपैठिया बताया। बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश करते हुए CNN ने इसे मुस्लिम विरोधी बताया। हालाँकि, सच्चाई यह थी कि पीएम मोदी ने मुस्लिमों को घुसपैठिया ना कह कर उन पर हमला किया था जो अवैध रूप से देश में प्रवेश करते हैं।

CNN नहीं चाहता ज्ञानवापी वापस ले हिन्दू, इससे खराब सेक्यूलर होने पर होगा असर

CNN यह भी चाहता है कि हिन्दू काशी के ज्ञानवापी ढांचे पर से अपना दावा छोड़ दें ताकि देश सेक्यूलरिज्म की रक्षा हो सके। CNN का कहना है कि हिन्दुओं का ज्ञानवापी पर दावा लोगों के विश्वास पर ज्यादा टिका है ना कि असल सबूतों पर। हाल ही में आई ASI सर्वे की रिपोर्ट इसी तरफ इशारा करती है। इसके लिए एक स्थानीय मुस्लिम का बयान भी CNN लगाता है। यह मुस्लिम कहता है कि उसे अब न्यायपालिका और पुलिस पर कोई भरोसा नहीं रहा।

राम मंदिर को लेकर भी CNN प्रलाप किया, उसने बताया कि राम मंदिर के निर्माण से देश के सेक्युलर फैब्रिक को नुकसान पहुँचा है। ऐसे में यह सोचा जा सकता है कि यदि हिन्दू अपने अधिकारों के लिए इस लिए ना लड़ें कि इससे सेक्युलर फैब्रिक खतरे में आएगी तो आखिर फिर यह एक छलावा ही है।

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‘साइड इफेक्ट का पता चलते ही मोदी ने अपनी फोटो हटवाई’: कोविड वैक्सीन सर्टिफिकेट से PM की तस्वीर हटते ही झूठ फैलाने लगा गैंग, जानिए सच्चाई

लोकसभा चुनावों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ फर्जी जानकारी फैलाने का काम जारी है। इस दौरान मोदी विरोधी लोग फैला रहे हैं कि जब से कोविशील्ड के बारे में जानकारी आई है उसके बाद वैक्सीन सर्टिफिकेट से उनकी तस्वीर गायब हो गई है।

देख सकते हैं कि कैसे स्क्रीनशॉट लेकर पीएम मोदी पर उंगली उठाई जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने भी इसे शेयर किया हुआ है। अपने ट्वीट में उन्होंने दावा किया है कि जैसे ही कोविड वैक्सीन के घातक परिणामों के बारे में पता चला, मोदी ने अपनी फोटो वैक्सीन सर्टिफिकेट से हटवा ली है। आगे प्रशांत भूषण लिखते हैं- ये मोदी का कमाल है।

अब हकीकत क्या है? क्या सच में नरेंद्र मोदी ने कोविशील्ड पर जानकारी आने के बाद अपनी फोटो हटवाई है और उनके ऊपर उठाई जा रही उंगलियाँ सही है या फिर ये एक प्रोपगेंडा का हिस्सा है जिसे लोकसभा चुनावों में चलाया जा रहा है।

हमारी पड़ताल में सामने आया है कि वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट से पीएम मोदी की तस्वीर इसलिए हटाई गई है, क्योंकि लोकसभा चुनाव को लेकर आदर्श आचार संहिता लागू है। यानी, हकीकत यह है कि पीएम मोदी ने या भाजपा ने इस फोटो को नहीं हटवाया है बल्कि आचार संहिता लागू होने के कारण यह तस्वीर हटाई गई है।

दिलचस्प बात ये है कि ये तस्वीर पहली बार कोविड वैक्सीन से नहीं रिमूव हुई है। साल 2022 में भी ऐसा हो चुका है। 2022 में गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड, पंजाब और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भी प्रधानमंत्री की तस्वीर सर्टिफिकेट से हटा दी गई थी।

जो है बच्चों के हत्यारों/ बलात्कारियों की समर्थक, जिसके लिए हिंदू हैं भिखमंगा… उस परवीन शेख के लिए जागा इंडियन एक्सप्रेस का मजहब

मुंबई के सबसे नामी स्कूलों में से एक सोमैया स्कूल की प्रिंसिपल पर ऑपइंडिया ने पिछले दिनों रिपोर्ट करके बताया था कि कैसे वो हिंदू घृणा से सनी हुई हैं और अभिव्यक्ति व्यक्त करने के नाम पर हमास आतंकी संगठन का समर्थक करती हैं… हमारी उस रिपोर्ट के बाद अब खबर है कि स्कूल प्रशासन ने परवीन शेख की एक्टिविटीज को देखते हुए उनसे इस्तीफा माँगा है, लेकिन परवीन शेख इसे देने से मना करने लगीं… इस संबंध में कई मीडिया संस्थानों ने अपनी रिपोर्ट की है, मगर इन सारी रिपोर्टों में जिसने सबसे ज्यादा तथ्यों को छिपाया है वो इंडियन एक्सप्रेस की खबर है।

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में दिखाया है जैसे स्कूल प्रशासन सिर्फ फिलीस्तीन और हमास-इजरायल के बीच तनाव पर प्रतिक्रिया देने के कारण परवीन शेख से इस्तीफा माँग रहा है। रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि परवीन के साथ ऐसा तब हो रहा है जब वो सोमैया स्कूल से 12 साल से जुड़ीं हैं और 7 साल से प्रिंसिपल भी हैं। रिपोर्ट में शेख का पक्ष डालते हुए कहा गया कि 26 अप्रैल को प्रशासन ने मुझे बुलाकर कहा था कि उनके (प्रशासन के) ऊपर दबाव बनाया जा रहा है कि वो मुझसे रिजाइन माँगें इसलिए मुझे रिजाइन देना ही होगा।”

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में प्रकाशित रिपोर्ट

आगे परवीन शेख द्वारा लोकतांत्रिक देश में रहने का हवाला दिया गया है और विचार व्यक्त करने की आजादी जैसी बातें की गई हैं। शायद ऐसा कहते हुए और इंडियन एक्सप्रेस उनका ये पक्ष छापते हुए भूल गए कि इसी लोकतांत्रिक देश में वो हिंदू भी रहते हैं जिनके प्रति खुद को काबिल प्रिंसिपल कहने वाली मास्टरनी के मन में अथाह घृणा है। परवीन शेख के एक्स अकॉउंट पर रिप्लाई और लाइक देख पता चलता है कि वो मुस्लिमों द्वारा किए गए अपराधों को कैसे जस्टिफाई करने में विश्वास रखती हैं और समय-समय पर हिंदुओं का मजाक बनाने से नहीं चूँकती।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट्स में मास्टरनी का सारा पक्ष डाला गया है लेकिन ये जानकारी नहीं डाली गई कि आखिर क्यों उनकी निष्ठा पर सवाल उठे हैं। उन्होंने कैसे पोस्टों को लाइक किया है और कैसे विचारों को प्रसारित करने का काम करती आई हैं। कहने को कोई भी कह सकता है कि ये सारे विचार निजी होते हैं और इनका इतना बवाल नहीं बनाया जाना चाहिए… पर एक बार इस पक्ष को सोचकर देखिए कि सबसे बड़े स्कूलों में से एक की प्रिंसिपल होने के नाते, जिनके आचार-विचार पर हजारों बच्चों का भविष्य टिका है उनके द्वारा इस तरह की बातें किया जाना क्या देश के भविष्य के लिए, यहाँ के लोकतंत्र के लिए सुरक्षित हो सकता है?

टीचर के विचारों से छात्रों का प्रभावित होना कोई ऑपइंडिया द्वारा गढ़ी हुई बात नहीं है। अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजते इसीलिए हैं ताकि टीचरों से ज्ञान ले सकें। अब ऐसे में अगर ज्ञान ये दिया जाएगा कि हमास ने जो 7 अक्तूबर को किया वो एक विरोध मात्र था कोई आतंकी हमला नहीं… तो क्या हम अपेक्षा कर सकते हैं कि बच्चे ये समझें कि दुनिया में आतंक की परिभाषा क्या है और उससे लड़ने कैसे होगा, उस मानसिकता से बचना कैसे होगा।

परवीन शेख द्वारा लाइक पोस्ट

आतंकी संगठन के लिए संवेदना जाहिर कर छात्रों को ऐसी शिक्षा देना कि हमास द्वारा 7 अक्टूबर को किया गया इजरायल में हमला (जिसमें बच्चे मरे और महिलाओं से रेप किया गया) एक विरोध का तरीका हो सकता है… तो ये कितना सही है इस पर आप खुद फैसला कीजिए।

इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट को बैलेंस दिखाने के लिए उन लोगों का पक्ष भी छापा है जो कह रहे हैं परवीन शेख एक अच्छी प्रिंसिपल हैं और उनके निजी विचारों को देखते हुए उनके इस्तीफा नहीं माँगा जाना चाहिए। हकीकत जबकि ये है कि इस मामले में एक पक्ष वो भी है जो साफ कह रहा है कि परवीन शेख के विचार स्कूल के छात्रों के लिए घातक हो सकते हैं क्योंकि वो एक टीचर हैं और उनकी दी शिक्षा से बच्चे अपनी सोच बनाएँगे।

टाइम्स नाऊ में प्रकाशित अभिभावक का पक्ष

आज के समय में पोस्ट लाइक करना आपकी सोच को समझने का एक तरीका बन गया है। ऐसे में जब परवीन की लाइक वाली लिस्ट में ऐसे हिंदू घृणा से सने तमाम ट्वीटों को लाइक होते देखा जाए, पीएम मोदी को गाली देने का काम किया जाए, छात्रों को हिजाब पहनकर शिक्षा लेने देने की पैरवी की जाए, मंदिर जाने का विरोध किया जाए… तो इससे क्या संदेश जाएगा?

इतना ही नहीं आप अगर उनके ट्वीट देखेंगे तो पता चलेगा कि वो अपने ट्वीट में मीम के माध्यम से हिंदुओं को मजाक बनाती आई हैं। एक मीम शेयर किया था जिसमें दिखाया गया था कि हिंदू भारत में रहकर मुस्लिम बॉयकॉट का नारा लगाते हैं और मिडल ईस्ट में भीख माँगते हैं।

आपको क्या लगता है कि ये सोच लोकतंत्र के दायरे में आती है या फिर हिंदू घृणा में? ऐसे ही हिंदुओं को काफिर-काफिर बताने वाले जाकिर नाइक के प्रति झुकाव क्या दर्शाता है?

इस पूरे मामले में एक सबसे बड़ी बात ये ध्यान देने वाली है कि भले ही परवीन शेख के समर्थन में इंडियन एक्प्रेस जैसे संस्थान एकतरफा पक्ष चला दें, लेकिन सच तो ये है कि ऑपइंडिया की रिपोर्ट पर उसके आलोचक भी ये मान रहे हैं कि परवीन शेख के विचार स्कूल के लिए घातक हैं।

ऑपइंडिया के आलोचक भी कर रहे परवीन शेख की सोच का विरोध

एक यूजर की प्रतिक्रिया से समझ सकते हैं कि वो भले ऑपइंडिया के विचारों से नहीं जुड़ता लेकिन उसे पता चल रहा है कि हमास आतंकी संगठन ने 7 अक्तूबर को इजरायल में जो किया उसे कोई विरोध नहीं कह सकता। लोग नरसंहार के विरोधी और इजरायल विरोधी हो सकते हैं, मगर उसके लिए उन्हें आतंकी संगठन का समर्थन करने की जरूरत नहीं। पर, परवीन शेख ने जो किया वो खुले तौर पर आतंकी संगठन की सोच को बढ़ावा देने वाला है।

इस मामले में जैसे एक धड़ा यह बताने में लगा है कि परवीन शेख अच्छी प्रिंसिपल हैं और निजी विचारों पर न ध्यान दिया जाए। दूसरा पक्ष ये भी है जो मानता है कि मुंबई जैसे शहर के स्कूल की प्रिंसिपल की यह सोच व्यापक स्तर पर प्रभाव डाल सकती है क्योंकि मुंबई ही वो शहर है जिसने 26/11 के रूप में सबसे बड़ा आतंकी हमला झेला हुआ है।