आज केजरीवाल को यूपी-बिहार, बंगाल और राजस्थान से आए लोगो से नफरत है। इसके उलट उन्हें बांग्लादेश और म्यांमार से आए घुसपैठियों से मोहब्बत है। देशद्रोही, नक्सली और टुकड़े-टुकड़े गैंग की राजनीति करने वाले केजरीवाल अपने वोट बैंक को एक साफ सन्देश दे रहे हैं- "दिल्ली में NRC लागू नहीं होने दूँगा और टुकड़े-टुकड़े गैंग को बचाऊँगा।"
रवीश कुमार आईटी सेल के लड़कों के बारे में तो बता दिए, तालियाँ भी लूट गए लेकिन... उन लड़कियों को तीन तलाक, हलाला, मदरसे की हकीकत, बलात्कारी मौलवियों, कौशाम्बी जैसी घटनाओं के बारे में बताना भूल गए। इनके शब्दों के भ्रमजाल में फँसने से बचना लड़कियो!
शक्ति की आराधना का पर्व शुरू हो गया है। ऐसे में बुद्ध-महावीर की धरती से इस वीडियो का सामने आना और इसमें पीड़िता द्वारा गिड़गिड़ाते हुए कही गई 2 पंक्तियाँ पूरे देश-समाज को झकझोड़ देने वाली है। सवाल है कि एक ग़रीब मजदूर अपनी बेटी के लिए न्याय माँगते हुए कहाँ-कहाँ भटकेगा?
मैं जब इस समाज का हिस्सा होने के कारण सोचने लगता हूँ तो पाता हूँ कि ये चलता रहेगा क्योंकि मर्दों के दम्भ की सीढ़ी की अंतिम लकड़ी स्त्री पर अपने लिंग के प्रहार के रूप में ही परिणत होती है। पितृसत्ता का विकृत रूप यही है कि लड़की इस क्रूरतम हिंसा के विरोध में इस तरह से अपनी आत्मा को मार चुकी है कि जो करना है कर लो, पर वीडियो मत बनाओ।
आस्था नितांत निजी विषय है। सार्वजनिक जीवन और समाज जिस तर्क और भौतिक नियम से चालित होते हैं, उनसे आस्था समेत निजी विषयों के नियम-कानून नहीं बन सकते। नियम सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए होते हैं जो समाज और सार्वजनिक क्षेत्र में लागू होते हैं।
यह प्रश्नवाचक चिह्न रह जाता है कि भगत सिंह का नव-जागृत हिन्दू धर्म के साथ कैसा रिश्ता होता। शायद वे तब भी नास्तिक रहते, लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि न भी रहते!
एक ही तरह के पोस्ट पर दो नीति अपनाने का अर्थ यह हुआ कि किसी खास संस्था पर इनका काँटा ज्यादा संवेदनशील हो जाता है, और वो भी शायद तब जब किसी खास पहचान वाले लोग एक साथ ऐसी खबरों को रिपोर्ट करते हैं।
अनैतिक मार्केटिंग के तीन “सी” (Convince, Confuse और Corrupt) का इस्तेमाल करने की पुरजोर कोशिश की गई और किसी तरह से Howdy Modi से कुछ अच्छा न निकल जाए, ये प्रयास हुआ। थोड़ी सी फजीहत पर जो मान जाए वो लिबटार्ड कैसा? इसलिए इतनी बेइज्जती पर उनका मन नहीं भरा।
क्योंकि चुनाव आने में अभी थोड़ा समय है और बलात्कारी जब अपने ही जात-बिरादरी के हों, तो उनके बारे में लिखने पर क्या पता नरक-वरक जाना पड़ जाए, या कोई पूछ ले कि क्या इसी दिन के लिए अवार्ड दिया था? क्या इसी दिन के लिए तुम्हें भीड़ दे कर खड़ा किया था, तुम्हें नेता बनाया था?