आज बिहार लाचार है। बिहार के ग़रीब परिवारों के सामने उनके बच्चों की जानें जा रही हैं और सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं। आज बिहार के इन ग़रीबों की सुनने वाला कोई नहीं है। अस्पताल के अधिकारी भी इन्हें फटकार रहे हैं। 93 मौतों वाली भयंकर त्रासदी।
मुझे अच्छी तरह याद है 1992 का मुकाबला जब पहली बार भारत पाकिस्तान विश्वकप में भिड़े थे। यह भारत बनाम पाकिस्तान, सचिन तेंदुलकर और मेरा, तीनों का पहला विश्व कप था। वह विश्व कप जिसकी वजह से क्रिकेट मेरे लिए धर्म बन गया।
कुल मिलाकर 'Self-Styled godman' शब्द हमेशा हिन्दू धर्मगुरुओं के लिए इस्तेमाल होता है, यह मीडिया का आम सत्य है। लेकिन इंडिया टुडे समेत पत्रकारिता का समुदाय विशेष इस शब्द का इस्तेमाल उस हेडलाइन में करता है, जिसमें खबर आज़म नामक मौलवी द्वारा हैदराबाद में एक किशोरी के साथ बलात्कार की है।
यह इकोसिस्टम कुतर्क में उस्ताद है। बंगाल की हर हिंसा में तृणमूल के साथ बराबर का भागीदार भाजपा को बना देता है। सांप्रदायिकता में भी यही रवैया अपनाता है।
सवाल ज्यों का त्यों है, क्या उनकी सरकार डॉक्टरों के काम करने हेतु सुरक्षित माहौल दे सकेगी? क्या बंगाल में बीजेपी कार्यकर्ताओं की नृशंष हत्या का सिलसिला रुकेगा या राजनीतिक जंग के नाम पर बुरे से बुरे और बर्बर कृत्य को भी जायज ठहराने का सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा? यह वक्त ही बताएगा।
ये भीड़ इतनी जल्दी कैसे आती है, कहाँ हमला करती है और किधर गायब हो जाती है? क्या पुलिस ने नहीं देखा इन्हें? क्या हॉस्पिटल में सुरक्षा के लिए पुलिस आदि नहीं होती या फिर इस पहचानहीन भीड़ का सामूहिक चेहरा ममता की पुलिस ने पहचान लिया और उन्हें वो करने दिया जो वो कर गए?
पथराव शुरू हुआ, डॉक्टरों पर जानलेवा हमले हुए तो पुलिस ने क्यों नहीं रोका? क्यों डॉक्टरों की जान बचाने के लिए दंगाईयों पर नियंत्रण के लिए कड़ी कार्रवाई नहीं की गई? जवाब हम सब को पता है।
एक-एक सेकंड का विलम्ब घातक है। अर्धसैनिक बल भेजे जाएँ, उच्च स्तरीय जाँच कमिटी गठित की जाए, अच्छे वकील खड़े कर कार्यकर्ताओं को न्याय दिलाई जाए? भाजपा अब 'बेचारी' नहीं है और उसे न ही ऐसा दिखावा करने का अधिकार है। कार्यकर्ताओं को चाहिए- न्याय।
ओवैसी ने वायु सेना के इस घोषणा पर कहा कि मोदी से पूछ लेते क्योंकि उनको तो रडार की बहुत जानकारी है, और वो तो दुश्मनों के इलाके तक में जहाज़ भेज कर एयर स्ट्राइक करते हैं। वायु सेना को तो मोदी को फोन कर लेना चाहिए था, उनके पाँच लाख बच जाते।
आज़म खान की पहचान ही इस बात से है कि वो निहायत ही घटिया बातें बोलते हैं। वो अगर बेहूदगी न करें तो देश को पता भी न चले कि खुद को समुदाय विशेष का ज़हीन नेता मानने वाला, और प्रोजेक्ट करने वाला, ये आदमी किस दर्जे का धूर्त है।