विचार

सोशल मीडिया पोस्ट के लिए पत्रकारों (या आम नागरिकों) की गिरफ़्तारी पर कहाँ खड़े हैं आप?

क्या हमारे पास इतना समय है कि ऐसे सड़कछाप पत्रकारों के ट्वीट पर उसके घर दो पुलिस वाले को भेज कर उठवा लिया जाए जबकि हर मिनट बलात्कार हो रहे हैं? क्या सरकारों की पुलिस या कोर्ट जैसी संस्थाओं को पास ऐसी बातों को लिए समय है जबकि करोड़ से अधिक गंभीर केस लंबित पड़े हैं?

विरोध के लिए त्रिशूल पर कंडोम देखकर खुश होने वाले लिबरल्स आपत्ति करने का खो चुके हैं हक़

राणा अय्यूब जैसे लोग हों या फिर स्क्रॉल जैसे मीडिया गिरोह, अलीगढ़ काण्ड में अपराधियों के नाम असलम और जाहिद होने के कारण उन सबका रोना यही है कि अपराध को साम्प्रदायिक रंग दिया जा रहा है। उन्हें समझना होगा कि यह सांप्रदायिक रंग नहीं दिया जा रहा है, बल्कि जो जहर उन लोगों ने बोया था, ये उसी के रुझान देखने को मिल रहे हैं।

दलित और गोमूत्र से घृणा करने वाला द वायर का हिन्दूफोबिक मीडिया ट्रोल इसलिए अपराधी नहीं हो सकता

...लेकिन इस बार भी यही होना है। दलितों की तुलना जानवरों से करने वाले द वायर के इस पत्रकार को जनता फिर से अपना नायक बना देगी और उसके लिए यही उपलब्धि काफी होगी। हो सकता है अगले चुनाव में प्रशांत कनोजिया भी किसी सड़क पर चंदा माँगता हुआ नजर आए।

अलीगढ़ और रवीश: शाह ने नोचा इंटरनेट का तार, मोदी ने तोड़ा टावर, नहीं हो रहा दुखों का अंत

अलीगढ़ मुद्दे के साम्प्रदायिक न होने की वजह से अब भारत का समुदाय विशेष शर्मिंदा नहीं हैं, न ही बॉलीवुड की लम्पट हस्तियाँ शर्मिंदगी के बोझ से मेकअप पिघला पा रही हैं, न ही पत्रकारों में वो मुखरता देखने को मिल रही है कि वो अपनी बेटी से नज़रें नहीं मिला पा रहे कि वो उनके लिए कैसा समाज छोड़े जा रहे हैं।

क्या रोजगार-शिक्षा में नैतिकता और मूल्य पिछले जमाने की बात हो चुकी हैं?

जो विद्यार्थी गलत तरीके से पैसे देकर शिक्षक की नौकरी पा भी लें तो वे क्या पढ़ाएँगे और क्या नीति की बातें सिखाएँगे? बात सिर्फ शिक्षकों की नहीं है। धाँधली करके प्राप्त की गई किसी भी नौकरी के किसी भी पर पहुँचा अधिकारी क्या उस पद के साथ ईमानदार रह पाएगा? क्या वह आगे भी रिश्वतखोरी नहीं करेगा?

कठुआ और अलीगढ़ का अंतर हमारे कथित लिबरल बिना बोले बताते हैं, इन्हें छोड़िए मत

इनकी बिलों में हाथ डालना पड़े तो बेशक डालिए, ये चिंचियाते रहें, इन्हें पूँछ पकड़ कर बाहर निकालिए और इनसे पूछिए कि वो जो ट्वीट तुमने लिखा है कि हमें इसका राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए, वो तुम्हारे उसी बाप ने लिख कर दिया है जिसके नाम के कारण तुम हीरो और हीरोईन बने फिरते हो, या किसी पेड़ के नीचे नया ज्ञान प्राप्त हुआ है।

हाशिए पर खड़े लुटियंस-खान मार्केट गिरोह बने ‘प्राउड’ हिंदुस्तानी, इन्हें सत्ता की मलाई चाहिए

यह गैंग न होने का कैसा सबूत है कि पिता खान मार्केट बँगले में रहे, पति भी उसी सर्विस, उसी सर्किल में, और उसके बाद आपके दामाद की तैनाती बैंक की खान मार्केट शाखा में ?

हिंदीभाषियों के विशाल हृदय का सबूत है दक्षिण की फिल्मों का व्यापक बाज़ार

हिंदीभाषियों ने दक्षिण भारतीय भाषाओं की फ़िल्मों को एक ऐसा मार्केट दिया है, जिसकी व्यापकता देख कर हिंदी का विरोध करने वाले बेहोश हो जाएँ। बंधन प्यार से बनता है। जब वो टूटता है, तो विदेशी चीजें हमें अपना गुलाम बनाती हैं। इसे तोड़ने वालों, सावधान!

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए 7 प्राथमिकताएँ, जिन पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को खरे उतरना है

सेना के साथ-साथ सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण का कार्य रक्षा मंत्री की प्राथमिकता होनी चाहिए। क्योंकि भाजपा को जो स्पष्ट जनादेश मिला है, वो राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दे पर मिला है।

हिन्दुओं पर Scroll एक कदम आगे, 3 कदम पीछे: आक्रांताओं को इस्लामी माना, लेकिन हिन्दुओं का दानवीकरण जारी

"हिन्दुओं पर इस्लामी आक्रांताओं के क्रूर अत्याचारों को रोमिला थापर जैसे इतिहासकारों ने निष्ठुरता से झुठला दिया, ताकि आधुनिक हिन्दुओं को अपने पूर्वजों के साथ हुए अत्याचारों की याद से दूर रख उन्हें हिन्दू राष्ट्र की (न्यायोचित, प्राकृतिक) माँग करने से रोका जा सके।" - लेखक ने यह माना लेकिन हिंदुओं के प्रति जहर...

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