सत्ता में बने रहने के लिए ममता बनर्जी राहुल या अन्य विपक्षी पार्टियों का साथ चाह रही हैं जबकि वे सत्ता में आने के लिए। ऐसे में चुनाव बाद समीकरण किसके पक्ष में होगा, कौन किसको आँखें दिखाएगा - कहना मुश्किल है।
जिस तरह से डिप्टी पुलिस कमिश्नर मिराज ख़ालिद के नेतृत्व में पुलिस ने CBI अधिकारियों को पकड़ कर गाड़ी के अंदर डाला और उन्हें थाने तक ले गई, उसे देख कर तानाशाही भी शरमा जाए।
राज्यों में चुनाव जीतने से पहले राहुल यह वादा करते थे कि अगर वो चुनाव जीतते हैं तो 10 दिन के भीतर किसानों का कर्ज माफ़ कराएँगे। लेकिन चुनाव के तुरंत बाद राहुल जनता को समझाते नज़र आए कि यह इतना आसान काम नहीं हैं।
तीनों लोकों में प्रसिद्धि पाने की अपनी चाहत को संतुष्ट करने के लिए उन्होंने अपनी तंत्रिकाओं में लोकतंत्र नामक करंट दौड़ाया है, ताकि 420 वाल्ट के शॉक से उन्हें यह याद आ जाए कि उन्हें आज तक कोई अवार्ड मिला भी है या नहीं।
पहली बात तो यह है कि किसी भी सेंसिबल व्यक्ति को लालू या लालूनंदन को साथी मानकर बिहार में उसकी बदहाली पर लेक्चर तो देना ही नहीं चाहिए, और दे भी रहे हैं तो ये तो मत ही कहिए कि लालू जी और तेजस्वी जी के साथ मिलकर आप बिहार की तस्वीर बदल देंगे।
राहुल जी की रैली थी तो जैसा कि हमेशा होता है राफेल का जिक्र हुआ। उन्हें आज भी सही आंकड़ा याद नहीं था। 7 दिन पहले का 45,000 करोड़ आज 1 हजार लाख करोड़ हो गया (अंक में लिखना पड़ा क्योंकि मुझे 1 हजार लाख करोड़ लिखना नहीं आता)।
Nike वाला डिज़ाइनर हिजाब किसी विशेष धर्म की कुरीतियों को बढ़ावा देना नहीं तो और क्या है कि अब दौड़ के मैदान में भी एक लड़की 'खिलाड़ी' बनकर नहीं बल्की 'मुस्लिम खिलाड़ी' बनकर दौड़ेगी।
इंडिया टुडे जैसे प्रकाशनों से शुरू हुई ये व्यवस्था प्रचलित अखबार टाइम्स ऑफ़ इंडिया में आई। अब तो इसमें “द हिन्दू”, जनसत्ता और “इंडियन एक्सप्रेस” जैसे तथाकथित विचारधारा वाले अखबार भी शामिल हैं।
गौपालन प्रोत्साहन पर सरकार ने ज़ोर दिया है। निर्धन व कम भूमि वाले किसानों को आर्थिक मदद मिलेगी। मत्स्यपालन के लिए अलग विभाग बनाने का निर्णय लिया गया। कृषकों को सस्ता ऋण।
ग़रीबों को सस्ता अनाज के लिए आवंटन दोगुना। मनरेगा का बजट हुआ तिगुना। बस्तियों में सड़कों का बिछा जाल। घर-घर में पहुँची बिजली। 10 लाख लोगों ने उठाया मुफ़्त चिकित्सा का लाभ। आर्थिक आधार पर आरक्षण।