सामाजिक मुद्दे

पालघर साधु लिंचिंग: हिंदुओं को ‘आतंकी’ कहने वाले अनुराग और लिबरल गैंग अब पढ़ा रहे इंसानियत का पाठ

इस बार मरने वालों में भगवा वेशधारी साधू हैं। हिंदुओं को 'आतंकी' कहने वाले पालघर साधु लिंचिंग पर चुप नहीं बल्कि इंसानियत जैसे शब्दों के साथ...

कोरोना जैसे संकटों को लाइलाज बना सकती है बेहिसाब जनसंख्या

भारत की बेहिसाब जनसंख्या में कोरोना जैसी वैश्विक महामारी अलग तरह की चुनौती पेश करती है। स्वास्थ्य-सुविधाओं और साधनों की भारी कमी के कारण...

पालघर में संतों को किसने मारा: अजीत भारती का सवाल | Ajeet Bharti on Palghar Sadhus Mob Lynching

महाराष्ट्र के पालघर में 2 साधुओं समेत 3 लोगों की हत्या कर दी जाती है। लगभग 200 लोगों की भीड़ से घिरा साधु पुलिस मदद के लिए जाता है, लेकिन...

आतंकवाद का कोई मजहब नहीं… लेकिन भूख का धर्म होता है! पाकिस्तान-बांग्लादेश में हिन्दुओं की अनदेखी और साजिश

पाकिस्तान-बांग्लादेश में हिंदुओं की दुर्दशा को दुनिया अनदेखा कर रही। शर्मनाक यह कि भारत के करोड़ों हिंदुओं को भी इससे कोई लेना देना नहीं!

तबलीगी जमात का थूक साफ कर रहे लिबरल मूर्खों से पाला पड़े तो क्या करें?

जाहिल और दिमाग से पैदल ऐसे लोग आपको फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप जैसी जगहों पर आसानी से दिख जाएँगे।

अरुंधति रॉय जैसे ‘विचारकों’ का इतिहास Google सर्च में कैद है, आपने सर्च किया ये की-वर्ड?

गूगल में अरुंधति रॉय सर्च करते ही एक 'अर्बन नक्सल विचारक' के गैरकानूनी कामों की टाइमलाइन तैयार हो जाती है।

सिर्फ सेहत के सहारे जिन्दगी कटती नहीं, क्योंकि बिरियानी में बोटियाँ तलाशते रहते हैं टुकड़ाखोर

बिरियानी में बोटियाँ तलाशते टुकड़ाखोर किसी "फोबिया" शब्द को बिलकुल वैसे ही पत्थरों की तरह चलाते हैं, जैसे अभी-अभी यूपी के किसी जिले में स्वास्थ्यकर्मियों पर चलाए गए। गोएबल्स की ये औलादें गाँधीवादी नहीं हैं। आपको ये भी पता है कि नाज़ियों से किसी गाँधीवादी तरीके से निपटा नहीं गया था।

पतित वामपंथी चीन की वैश्विक विषाणुता (विषता) का एक मात्र सार्थक समाधान है वैष्णव मार्ग

मार्क्स या माओ के जीवन दर्शन की राह पर चलने वाले वामपंथी अतिवादी बौद्धिक जैव विषाणुओं से अधिक हिंसक हैं। इस नरपिपासु वर्ग ने ही कोरोना जैसे विषाणुओं का आविष्कार करके दुनिया को अभूतपूर्व त्रासदी की स्थिति तक पहुँचा दिया है।

तबलीगियों के अंदर की सिर्फ एक जमात, इसके कारनामों को छुपाने की आवश्यकता क्यों?

जब डेरा सच्चा सौदा के मुखिया की गिरफ्तारी को लेकर हिंसा हुई तो किसी ने उसे पूरे हिन्दू समाज से नहीं जोड़ा। पटियाला में कुछ सिरफिरे निहंगों ने पुलिस वालों पर हमला लिया तो किसी ने उसे पूरे सिख समाज से नहीं जोड़ा। तो फिर तबलीगी जमात का नाम लेने पर उसे सारे समुदाय को निशाना बनाना कैसे और क्यों माना जा रहा है?

‘क्रीमी लेयर’ और सामाजिक न्याय का अपहरण

अगर आरक्षण के प्रावधानों से पिछड़ों-दलितों-वंचितों का सशक्तीकरण होता है, तो उन लाभार्थियों की भावी पीढ़ियों को क्रीमी लेयर में शामिल करके भविष्य में आरक्षण लाभ से वंचित क्यों नहीं किया जाना चाहिए? ऐसा करने से ही आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान का लाभ त्वरित गति से नीचे तक पहुँचेगा और आरक्षण के क्षेत्र में भी 'ट्रिकल डाउन' की सैद्धान्तिकी सचमुच फलीभूत होगी।

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