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इस्लामी हिंसा ने शरणार्थी बनाया, मिशनरी ताक़तों ने मार डाला… जब त्रिपुरा के बागबेर में हुआ हिन्दुओं का नरसंहार, चर्चों के पैसे से पलता था NLFT

बागबेर नरसंहार में मारे गए 25 लोगों में महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे। वे सभी बंगाली हिंदू थे, जो पहले से ही हिंसा से पीड़ित थे और शरणार्थी शिविर में शरण लिए हुए थे। उनकी कहानियाँ त्रासदी, पीड़ा और अन्याय की गवाह हैं।

सभ्यताओं की कहानियाँ केवल उनके भव्य स्थापत्य, वैज्ञानिक आविष्कारों या सांस्कृतिक उपलब्धियों से नहीं बनतीं, बल्कि वे उन जख्मों से भी आकार लेती हैं, जो समय ने उनके शरीर और आत्मा पर छोड़े। वे उन पीड़ाओं से भी लिखी जाती हैं, जो पीढ़ियों ने सहन कीं। उन अत्याचारों से भी गढ़ी जाती हैं, जिन पर उन्होंने मौन रखा, और उस सहिष्णुता की अग्नि से भी तपती हैं, जो बार-बार परीक्षा की वेदी पर चढ़ाई जाती है।

हिन्दू संस्कृति की गाथा भी उन्हीं पीड़ाओं और अत्याचारों से भरी हुई है। ऐसी ही अनेकों अनकही पीड़ाओं की श्रृंखला में एक त्रासदी आती है—बागबेर नरसंहार। 

समृद्ध त्रिपुरा के दामन पर लगा वो घाव

त्रिपुरा एक समय एक समृद्ध राजशाही था। भारतीय उपमहाद्वीप में सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक माना जाता था। लेकिन, 1949 में भारत में विलय के बाद वहाँ की जनसांख्यिकी में बड़ा परिवर्तन हुआ। स्वतंत्रता के पश्चात पूर्वी पाकिस्तान से आए लाखों बंगाली हिंदुओं ने त्रिपुरा में शरण ली। इन प्रवासियों के बसने से जनसंख्या अनुपात में भारी बदलाव आया और स्थानीय ईसाई समुदायों के भीतर असुरक्षा की भावना पनपी। धीरे-धीरे इस असुरक्षा को संगठित रूप से भुनाया गया और राजनीतिक-सांस्कृतिक आंदोलन शुरू हुए।

इन्हीं आंदोलनों के चरम रूप के रूप में NLFT (नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा) जैसे उग्रवादी संगठनों का जन्म हुआ, जो इस सांस्कृतिक बदलाव को हिंसा के जरिए पलटना चाहते थे। यह केवल उग्रवाद नहीं था, यह एक छटपटाती अस्मिता की मजहबी उन्माद में बदल चुकी प्रतिक्रिया थी, जिसका सबसे बड़ा शिकार वे लोग बने, जो सबसे कम दोषी थे।

20 मई, 2000 को त्रिपुरा के पश्चिमी हिस्से में स्थित बागबेर गाँव में एक भयावह त्रासदी घटित हुई। नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (NLFT) के लगभग 60 सशस्त्र उग्रवादियों ने बागबेर गाँव पर हमला किया, जिसमें 25 निर्दोष बंगाली हिंदू मारे गए। 

बागबेर नरसंहार में मारे गए 25 लोगों में महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे। वे सभी बंगाली हिंदू थे, जो पहले से ही हिंसा से पीड़ित थे और शरणार्थी शिविर में शरण लिए हुए थे। उनकी कहानियाँ त्रासदी, पीड़ा और अन्याय की गवाह हैं। उनकी मौतें न केवल उनकी व्यक्तिगत हानि थीं, बल्कि एक समुदाय की सामूहिक पीड़ा का प्रतीक थीं। इस नरसंहार ने त्रिपुरा में लंबे समय से चल रहे जातीय संघर्ष और उग्रवाद की भयावहता को उजागर किया। संख्याएँ कभी भी पूरी सच्चाई नहीं कहतीं। ‘25 लोग मारे गए’— यह वाक्य एक कागज पर लिखी गई एक पंक्ति हो सकती है, लेकिन उसके पीछे की पीड़ा समुद्र से भी गहरी है। जो 25 लोग मरे, वो कोई गुंडे या फिर आतंकवादी नहीं थे, वो सिर्फ हिन्दू थे, जिनका ‘धर्म’ गलत समय, गलत जगह पर था।

चर्च और विदेशी मिशनरियों की छतरी तले पला-बढ़ा NLFT

बागबेर नरसंहार केवल एक हिंसक घटना नहीं थी; यह एक संस्कृति पर हमला था। यह एक प्रकार का लक्षित नरसंहार था, जिसे हिन्दुओं को लक्षित करके अंजाम दिया गया। जिन हिन्दुओं को मारा गया, वे कोई हथियारबंद सैनिक नहीं थे, न ही किसी ‘विचारधारा’ के प्रचारक थे। वे आम लोग थे, बच्चे थे, महिलाएँ थीं, मजदूर थे। उन्हें सिर्फ और सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि वे हिंदू थे। हिन्दुओं को लक्षित करके सिर्फ सरकार को ही नहीं बल्कि हिन्दू पहचान को भी NLFT द्वारा संदेश भेजा गया।

NLFT एक ईसाई उग्रवादी संगठन था। इसका समर्थन कई चर्चों और विदेशी मिशनरी नेटवर्क से होता था। वे त्रिपुरा को एक स्वतंत्र ईसाई मुल्क बनाना चाहते थे। NLFT की विचारधारा ईसाई कट्टरवाद और हिंदू विरोध पर आधारित थी। उनका उद्देश्य त्रिपुरा को एक ऐसा स्वतंत्र ईसाई राष्ट्र बनाना था, जिसमें बंगाली हिंदुओं के लिए कोई स्थान नहीं था। उन्होंने जबरन धर्मांतरण, हिंसा और आतंक के माध्यम से अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया। बागबेर नरसंहार उसी विचारधारा का एक क्रूर उदाहरण था। बागबेर में उनकी ‘मजहबी आकांक्षा’ निर्दोष हिंदुओं की हत्या के रूप में प्रकट हुई।

कई पोर्टल्स पर इस बात को उल्लेखित किया गया है कि बागबेर नरसंहार के दौरान, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के जवान गाँव के पास ही तैनात थे, लेकिन उन्होंने हमले के दौरान कोई हस्तक्षेप नहीं किया। यह निष्क्रियता राज्य की विफलता को दर्शाती है, जो अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में असमर्थ था। यह घटना हिन्दू समाज के लंबे समय से चले आ रहे उस प्रश्न को भी मुखर करती है, कि क्या हिन्दुओं को आत्मरक्षा की ओर मुड़ जाना चाहिए?

बागबेर नरसंहार के बाद, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस घटना को अपेक्षित कवरेज नहीं मिला। यह चुप्पी पीड़ितों के प्रति एक पूरे इकोसिस्टम की उदासीनता को दर्शाती है। जब किसी समुदाय की पीड़ा को नजरअंदाज किया जाता है, तो यह अन्याय को और बढ़ावा देता है। इस घटना ने मीडिया की भूमिका और उसकी जिम्मेदारियों पर भी सवाल उठाए। 

त्रिपुरा का बागबेर नरसंहार: अन्यायों को भुलाइए मत

बागबेर का सबसे बड़ा अपमान यह नहीं था कि वहाँ निर्दोष मारे गए, बल्कि यह था कि उस त्रासदी को राष्ट्रीय स्मृति से ही विस्थापित कर दिया गया। वह घटना जिसे इतिहास में दर्ज होना चाहिए था, एक पूरे समुदाय की चेतना का हिस्सा बनना चाहिए था, उसे या तो जानबूझकर दबा दिया गया या चुप्पी की चादर ओढ़ा दी गई। बागबेर केवल एक गाँव नहीं था, वह एक घाव था, जो धार्मिक हिंसा के प्रति ‘सलेक्टिव सेंसिटिविटी’ का शिकार होता रहा है।

बागबेर नरसंहार हमें केवल अतीत की एक घटना नहीं बताता, वह हमें वर्तमान की आत्मा पर लगे उस धब्बे की ओर भी इंगित करता है जिसे हम अनदेखा करते आए हैं। इतिहास गवाह है कि जिन अन्यायों को भुला दिया गया, वे लौटे—और हर बार अधिक क्रूर रूप में लौटे।

इसलिए, बागबेर को केवल याद करना ही पर्याप्त नहीं है, उसे जिम्मेदारी के साथ स्मरण करना होगा। पीड़ितों की स्मृति को जीवित रखना केवल एक मानवीय कर्तव्य नहीं है, यह सभ्यता की आत्मरक्षा भी है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी घटनाएँ भविष्य में न दोहराई जाएँ—ना विचारधारा के नाम पर, ना पहचान के नाम पर, और ना ही मजहब के नाम पर।

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रोहित पांडेय
रोहित पांडेय
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