ऑपइंडिया पहला ऐसा संस्थान था जिसने 2020 की शुरुआत में CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हुई भीड़ की हिंसा को ‘हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगे’ कहा था।
छह सालों तक ऑपइंडिया ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट्स, विश्लेषण और घटनाक्रम व इसके इस्लामी योजनाकारों की जाँच के माध्यम से यह साबित किया कि जिसे मुख्यधारा का मीडिया ‘CAA-विरोधी हिंसा’ कह रहा था और वामपंथी प्रचारक ‘मुस्लिम-विरोधी दंगे’ व ‘राज्य-प्रायोजित साजिश’ बता रहे थे।
वह वास्तव में हिंदुओं के खिलाफ एक सुनियोजित इस्लामी नरसंहार था। अंकित शर्मा हत्याकांड में आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन की दोषसिद्धि के साथ ही, ऑपइंडिया का यह रुख सही साबित हुआ है।
IB कर्मी अंकित शर्मा की हत्या से ताहिर को सजा मिलने तक: 6 साल बाद न्याय पर भरोसा फिर से जगा
नई दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने खुफिया ब्यूरो (IB) के कर्मी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में 13 जुलाई 2026 को आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया।
हुसैन जिसने पहले स्वीकार किया था कि वह ‘हिंदुओं को सबक सिखाना’ चाहता था, उसको IPC की धारा 188 (लोक व्यवस्था की अवज्ञा), 153A (समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 147, 148, 149 (दंगा और गैरकानूनी सभा), 365 (अपहरण/व्यहरण), और 302 (हत्या) के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है। ताहिर हुसैन के साथ ही पाँच अन्य जिहादियों को भी दोषी ठहराया गया है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने पर्याप्त सबूत न होने के कारण हुसैन को IPC की धारा 120B और 129 (अपराधिक साजिश) के तहत आरोपों से बरी कर दिया।
25 फरवरी 2020 को, उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों के दौरान 26 वर्षीय खुफिया ब्यूरो के कर्मचारी अंकित शर्मा की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ प्रदर्शनों के बाद इलाके में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के बीच शर्मा लापता हो गए थे।
उनका शव अगले दिन चांद बाग इलाके के एक नाले से बरामद किया गया था, जिस पर कम से कम 51 से 52 बार चाकू घोंपे जाने के निशान थे। एक दिन बाद, मृतक अंकित शर्मा के पिता रविंदर कुमार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि चांद बाग पुलिया, मुख्य करावल नगर रोड पर CAA-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान पथराव, ईंट-रोड़ेबाजी, आगजनी, गोलीबारी और तोड़फोड़ की घटनाएँ हुई थीं।
उन्होंने आरोप लगाया था कि तत्कालीन आप (AAP) नेता ताहिर हुसैन का कार्यालय उसी इलाके में स्थित था और वहाँ कई गुंडे छिपे हुए थे। मुस्लिम भीड़ ने ताहिर हुसैन के कार्यालय की छत से पथराव किया, पेट्रोल बम फेंके थे तथा गोलियाँ चलाई थीं और उसने जनता के बीच डर का माहौल पैदा कर दिया था। 25 फरवरी को अंकित शर्मा कार्यालय से वापस आने के बाद घर का कुछ सामान खरीदने बाहर गए थे और वापस नहीं लौटे।
रविंदर कुमार ने अगले दिन गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। फिर उन्हें पता चला कि एक व्यक्ति की हत्या करने के बाद उसे चांद बाग पुलिया की मस्जिद से खजूरी खास नाले में फेंक दिया गया था। इसके बाद अंकित शर्मा का शव खजूरी खास नाले से बरामद किया गया। उनके अंडरवियर को छोड़कर बाकी सारे कपड़े गायब थे।

अंकित शर्मा के सिर, चेहरे, छाती, पीठ और कमर पर धारदार हथियारों के गहरे जख्म थे। उनकी पहचान छिपाने के लिए उनके चेहरे और शरीर के अन्य हिस्सों को तेजाब से जला दिया गया था। अपनी चार्जशीट में दिल्ली पुलिस ने एक गहरी साजिश का आरोप लगाया था और कहा था कि अंकित शर्मा को विशेष रूप से ताहिर हुसैन के नेतृत्व वाली भीड़ द्वारा निशाना बनाया गया था।
अंततः दिल्ली की अदालत ने ताहिर हुसैन और उसके जिहादी सहयोगियों को अंकित शर्मा की इस भयानक हत्या के लिए दोषी ठहराया है। दोषियों को सजा सुनाया जाना अभी बाकी है।
इस्लामो-लेफ्टिस्ट्स ने ताहिर हुसैन को सिर्फ उसकी मुस्लिम पहचान की वजह से विक्टिम बनाया: विक्टिम होने का मोनोपॉली
ताहिर हुसैन की दोषसिद्धि न केवल अंकित शर्मा के लिए न्याय सुनिश्चित करने के बारे में है बल्कि यह उस बात की भी पुष्टि करती है जो ऑपइंडिया सालों से कहता आ रहा है, कि 2020 के दिल्ली दंगे कोई अचानक भड़की हिंसा नहीं थे बल्कि यह इस्लामी-वामपंथियों द्वारा रची गई एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थे।
उमर खालिद, शर्जील इमाम से लेकर अब दोषी ठहराए जा चुके ताहिर हुसैन तक, भारतीय और विदेशी इस्लामी-वामपंथी मीडिया ने हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों के आरोपित मुस्लिमों को पीड़ितों के रूप में दिखाया और विपरीत सबूतों के बावजूद वे आज तक उन्हें हीरो बनाने में लगे हुए हैं।
अंकित शर्मा की हत्या के कुछ दिनों बाद, कुख्यात हिंदू-द्वेषियों प्रतीक सिन्हा और मोहम्मद जुबैर द्वारा सह-स्थापित वामपंथी प्रचार साइट ऑल्टन्यूज ने ताहिर हुसैन को क्लीन चिट दे दी थी।
यह तब किया गया, जब दंगों के बाद ताहिर की इमारत से पत्थर, पेट्रोल बम, एसिड पैकेट और पेट्रोल बम फेंकने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले देशी गुलेल आदि बरामद किए गए थे और ऐसे वीडियो सामने आए थे जिनमें सैकड़ों लोग इमारत की छत से पत्थर और पेट्रोल बम फेंक रहे थे और ताहिर खुद उन हमलों की निगरानी कर रहा था।
अब प्रतिबंधित हो चुके इस्लामी आतंकवादी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) ने ताहिर हुसैन को अपना समर्थन दिया था और यहाँ तक दावा किया था कि वह ‘घिनौनी राजनीति’ का शिकार हुआ है। PFI, जो 2047 तक भारत को एक इस्लामी राष्ट्र बनाना चाहता था, उसने दिल्ली दंगों के लिए सीधे तौर पर मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया था।
इंटरनेट पर कट्टर इस्लामवादियों ने ताहिर हुसैन का बचाव किया था और दावा किया था कि ताहिर हुसैन की छत पर पाए गए पेट्रोल बम और पत्थर आत्मरक्षा के लिए थे।
बॉलीवुड गीतकार जावेद अख्तर, निर्देशक अनुराग कश्यप, मनोरंजनकर्ता स्वरा भास्कर, गायक विशाल ददलानी और राना अय्यूब व साक्षी जोशी जैसी कई इस्लामी-वामपंथी पत्रकारों ने ताहिर हुसैन का समर्थन किया और उसे एक ऐसे पीड़ित के रूप में पेश किया जिसे उसकी मुस्लिम पहचान के कारण ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ मोदी सरकार द्वारा जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा था।

‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने तो यहाँ तक किया कि अंकित शर्मा के भाई के नाम पर झूठा दावा मढ़ दिया कि ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने वाली भीड़ ने उनकी हत्या की थी। ताहिर हुसैन के नेतृत्व वाली मुस्लिम भीड़ द्वारा अंकित शर्मा की हिंदू-घृणा से प्रेरित हत्या को छिपाने के उनके इस प्रयास की पोल खोलते हुए, अंकित के भाई को एक बयान जारी करना पड़ा था और कहना पड़ा था कि WSJ झूठ बोल रहा था।
जमात-ए-इस्लामी ने हुसैन को ‘बेगुनाह‘ घोषित किया, दावा किया कि उसे फंसाया जा रहा है और उसके कामों को आत्मरक्षा बताया। उन्होंने हुसैन के आत्मसमर्पण को इस बात के ‘सबूत’ के रूप में पेश किया कि वह दोषी नहीं हो सकता।
इसी तरह AAP विधायक अमानतुल्ला खान ने दावा किया कि हुसैन को केवल इसलिए जेल में डाला गया क्योंकि वह मुस्लिम था। खान ने यह भी सुझाव दिया था कि सरकार किसी न किसी तरह ऐसे झूठे सबूत तैयार करेगी जिससे यह लगे कि दिल्ली हिंसा की साजिश हुसैन ने रची थी।
नवंबर 2020 में, ‘द वायर’ ने हुसैन को उन कार्यकर्ताओं, विद्वानों और लेखकों में शामिल किया जिन्हें न्यायपालिका के भरोसे छोड़ दिया गया था। इस इस्लामी-वामपंथी मुख पत्र ने दंगे और हत्या के आरोपित ताहिर हुसैन को राजनीतिक दोषारोपण के खेल के एक पीड़ित के रूप में दिखाया।
ऑपइंडिया ने उस समय भी इस बात को रेखांकित किया था कि कैसे ‘द वायर‘ ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की उस मनगढ़ंत कहानी का इस्तेमाल किया था, जिसमें उन्होंने अंकित शर्मा के भाई के हवाले से यह दावा किया था कि उनकी हत्या ‘हिंदू दंगाइयों’ द्वारा की गई थी।
ग्राउंड रिपोर्ट, सबूतों का एनालिसिस, चार्जशीट का एनालिसिस और भी बहुत कुछ: कैसे ऑपइंडिया ने दिल्ली एंटी-हिंदू दंगों की कवरेज में ऐसी कहानियाँ बताईं जिन्हें किसी और ने दबाने की कोशिश की
24 और 25 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगे हुए थे। यह हिंसा CAA-विरोधी प्रदर्शनों के बीच भड़की थी। जल्द ही यह कई इलाकों में फैल गई। इसमें 53 लोगों की जान चली गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए।
मृतकों में हेड कांस्टेबल रतन लाल, IB के कर्मी अंकित शर्मा, दिलबर नेगी, राहुल सोलंकी, विनोद कुमार और कई अन्य शामिल थे। हिंसा के दौरान 1500 से अधिक सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया था। घरों, दुकानों, वाहनों, धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे पर हमले किए गए थे।
इन दंगों के कारण उत्तर-पूर्वी दिल्ली का एक बड़ा हिस्सा दिनों तक डर के साए में रहा, जिसके बाद स्थिति सामान्य हो सकी। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने हिंसा के पीछे की बड़ी साजिश की जाँच के लिए प्राथमिकी (FIR) संख्या 52/2020 दर्ज की थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, ये दंगे अचानक नहीं भड़के थे, बल्कि CAA और NRC के खिलाफ प्रदर्शनों की आड़ में रची गई एक गहरी साजिश का हिस्सा थे।
इस FIR में उमर खालिद, शर्जील इमाम, ताहिर हुसैन, खालिद सैफी, इशरत जहाँ, गुलफिशा फातिमा, नताशा नरवाल, देवांगना कलिता, अतहर खान, सफूरा जरगर और अन्य को नामजद किया गया था।
जब इस्लामी-वामपंथी ‘इस्लामोफोबिया’ का हवाला देने, वीडियो साक्ष्यों पर विवाद खड़ा करने, पुलिस की कार्रवाई को सांप्रदायिक रंग देने और गवाहों व जाँचकर्ताओं को जो मिला उसे कमतर आंकने की अपनी सामान्य रणनीति के माध्यम से ताहिर हुसैन के हिंदू-विरोधी अपराधों पर पर्दा डालते हुए अपना पीड़ित होने का दुष्प्रचार फैला रहे थे।
तब ऑपइंडिया ने अंकित शर्मा की हत्या के पीछे की जिहादी सच्चाई और उस व्यापक इस्लामी साजिश को सामने लाने का काम किया, जो खुद ताहिर हुसैन के शब्दों में ‘हिंदुओं को सबक सिखाना’ था।
ऑपइंडिया ने अंकित शर्मा के भाई का इंटरव्यू लिया
ऑपइंडिया ने अंकित शर्मा के भाई अंकुर शर्मा का 27 फरवरी 2020 को एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू प्रकाशित किया था। ऑपइंडिया की एडिटर-इन-चीफ नूपुर जे शर्मा के साथ हुई इस बातचीत में अंकुर ने विस्तार से बताया था कि कैसे अंकित चांद बाग, मूँगा नगर इलाके में हिंसा को शांत कराने के लिए अपने घर से निकले थे।
अंकित ने अपने परिवार से कहा था कि हिंदू और मुस्लिम दोनों ही उन्हें जानते हैं और उनकी बात मानेंगे। अंकित ने अपनी IB अधिकारी की पहचान पर जोर दिया था, क्योंकि उनका मानना था कि इससे लोग उन पर बेहतर तरीके से भरोसा कर पाएँगे।

अंकुर ने ऑपइंडिया को बताया, “उसने कहा मैं इन लोगों को जानता हूँ, ये मेरी बात सुन लेंगे।” जहाँ हिंदुओं ने उनकी बात मानी और वे पीछे हट गए, वहीं मुस्लिम भीड़ यह जानकर और भड़क गई कि शर्मा एक IB अधिकारी थे, उन्होंने तुरंत उन्हें दबोच लिया और खींचते हुए ताहिर हुसैन के 4-मंजिला मकान की तरफ ले गए। इस पूरे समय के दौरान, पत्थर, पेट्रोल बम और गोलियाँ बरस रही थीं।
अंकुर ने कहा, “दीदी, ताहिर हुसैन ने ही उसे (अंकित शर्मा) को मारा है। वह यहाँ के दंगों का सरगना है। वह दंगे करवा रहा है। वह उन मुसलमानों को निर्देश दे रहा था जिन्होंने उसे घर के अंदर खींचा। अरविंद केजरीवाल मेरे भाई को एक दंगाई के रूप में दिखा देंगे। वह कोई दंगाई नहीं था।
वह एक सरकारी अधिकारी था जो वहाँ लोगों को लड़ाई रोकने के लिए समझाने गया था। वह दोनों पक्षों के लोगों को जानता था,” अंकुर ने यह भी अनुरोध किया कि अंकित शर्मा को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए एक अभियान चलाया जाना चाहिए।
एक ऐसे समय में जब विदेशी और भारतीय वामपंथी मीडिया हिंदुओं को दिल्ली दंगों के मुख्य योजनाकार के रूप में दिखने की कोशिश की और ताहिर हुसैन को बिल्कुल पाक-साफ दिखाने के लिए दिन-रात काम कर रहा था, अंकित शर्मा के भाई के साथ ऑपइंडिया के एक इंटरव्यू ने तत्कालीन AAP पार्षद के असली जिहादी चेहरे को बेनकाब कर दिया था।
ऑपइंडिया ने उस लड़के से बात की जिसने मुस्लिम भीड़ को अंकित शर्मा को ताहिर हुसैन की बिल्डिंग के अंदर घसीटते हुए देखा था
ऑपइंडिया के एक रिपोर्टर ने 28 फरवरी 2020 को एक हिंदू नाबालिग लड़के से बात की थी जो एक हिंसक मुस्लिम भीड़ के हाथों दर्दनाक मौत से चमत्कारिक रूप से बचने में सफल रहा था।
खुद को सुरक्षित बचाने में सफल रहे इस नाबालिग लड़के ने अब निष्कासित हो चुके AAP नेता ताहिर हुसैन की इमारत के भीतर पनाह लिए हुए मुस्लिम भीड़ द्वारा मचाई गई तबाही के बारे में रोंगटे खड़े कर देने वाले बाते बताई।
लड़के ने कांपती आवाज में उन तीन लोगों (जिनमें अंकित शर्मा भी शामिल थे) का जिक्र करते हुए कहा, जिन्हें हत्यारी भीड़ द्वारा ताहिर हुसैन की इमारत के अंदर खींचा गया था, “वे हमें इमारत के अंदर खींच रहे थे। मैं किसी तरह उनकी पकड़ से छूटा और खुद को बाहर निकाला। लेकिन जब मैंने पीछे मुड़कर देखा, तो वे तीनों गायब थे।”
लड़के ने यह भी खुलासा किया कि मुस्लिम भीड़ ने चांद बाग में एक शिव मंदिर पर भी हमला किया था।
दिल्ली दंगों के विकिपीडिया पेज पर इस्लामो-लेफ्टिस्ट नैरेटिव के दखल की जाँच
मार्च 2020 की शुरुआत में, ऑपइंडिया ने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें इस बात को रेखांकित किया गया था कि कैसे ‘2020 दिल्ली दंगे’ या ‘उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगे‘ शीर्षक से एक विकिपीडिया लेख 25 फरवरी को एक वरिष्ठ विकिपीडिया संपादक द्वारा बनाया गया था, जो ‘DBigXray‘ यूजरनेम का उपयोग करता है।
इस पेज ने मुस्लिम पीड़ित होने के एकतरफा हौवे को बढ़ावा दिया। हालाँकि इस पेज में अब सालों के दौरान कई बदलाव हुए हैं, लेकिन शुरुआत में इसमें दंगों की छवि के बजाय भाजपा नेता कपिल मिश्रा की तस्वीर लगाई गई थी।
लेख में कपिल मिश्रा को ‘उकसावे’ शीर्षक से एक अलग खंड दिया गया है, जहाँ उन पर दंगे भड़काने का आरोप लगाया गया है। इस पेज ने या तो इस्लामी दंगाइयों की भूमिका को कमतर आंका या फिर महत्वपूर्ण जानकारियों को छिपा लिया।
इस लेख में अशोक नगर में एक मस्जिद पर हुए हमले और भीड़ द्वारा ‘जय श्री राम’ व ‘हिंदुओं का हिंदुस्तान’ के नारे लगाने का उल्लेख तो किया गया था, लेकिन मुस्लिमों और CAA-विरोधी भीड़ द्वारा किए गए किसी भी हमले का कोई संदर्भ नहीं दिया गया।
दूसरी ओर जबकि ऐसे वीडियो मौजूद हैं जिनमें भीड़ को ‘नारा-ए-तकबीर’ और ‘अल्लाहू अकबर’ के नारे लगाते हुए दिखाया गया है, उन्हें इस पेज पर कोई जगह नहीं मिली।
ऑपइंडिया की जाँच ने पुष्टि की कि दिल्ली दंगे के पेज पर इस तरह के पक्षपातपूर्ण संपादन करने वाला संपादक DBigXray, दरअसल दीपेश राज नाम का व्यक्ति था। लेख में अशोक नगर में एक मस्जिद पर हुए हमले और भीड़ द्वारा ‘जय श्री राम’ व ‘हिंदुओं का हिंदुस्तान’ के नारे लगाने का उल्लेख तो किया गया था, लेकिन मुस्लिमों और CAA-विरोधी भीड़ द्वारा किए गए किसी भी हमले का बिल्कुल कोई संदर्भ नहीं है।
दूसरी ओर जबकि ऐसे वीडियो मौजूद हैं जिनमें भीड़ को ‘नारा-ए-तकबीर’ और ‘अल्लाहू अकबर’ के नारे लगाते हुए दिखाया गया है, उन्हें इस पेज पर कोई जगह नहीं मिली।
20 साल के दिलबर सिंह नेगी के दुखी परिवार से मुलाकात
जब दिल्ली में हिंसा भड़की, तो 24 फरवरी की शाम को 20 साल के दिलबर सिंह नेगी को इस्लामी दंगाइयों ने एक तलवार से उनके हाथ-पैर बेरहमी से काटने के बाद जिंदा जला दिया था। खून की प्यासी भीड़ द्वारा उनके शरीर के बाकी हिस्से को मांस के टुकड़े की तरह आग में फेंक दिया गया था।
दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों, जहाँ एक मुस्लिम भीड़ द्वारा उनकी हत्या कर दी गई थी, उसके ठीक बाद जुलाई 2020 में ऑपइंडिया ने उनके परिवार से मुलाकात की थी। दिलबर के छोटे भाई, देवेंद्र ने बताया कि उन्होंने समय के साथ समझौता कर लिया है, लेकिन उनके माता-पिता अभी भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि दिलबर कभी घर नहीं लौटेगा।
हर त्योहार से पहले जब बेटे घर लौटते हैं, तो उनकी आँखें इस उम्मीद में चमकने लगती हैं कि दिलबर भी वापस आएगा। वे ‘थौलू-त्यार’ त्योहार के दौरान अपने बेटे को फिर से देखने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन उनकी उम्मीदें तब टूट गईं जब उनका पार्थिव शरीर घर आया।
मुस्लिम भीड़ ने जानबूझकर हिंदू दुकानों को निशाना बनाया
दंगों के बाद 27 फरवरी 2020 को ऑपइण्डिया ने दिल्ली के चांद बाग इलाके का दौरा किया था, जो देश की राजधानी के कई अन्य इलाकों की तरह ही सुलग रहा था।
क्योंकि इस्लामवादी वहाँ बेकाबू होकर उत्पाद मचा रहे थे और पथराव, आगजनी व तोड़फोड़ का सहारा ले रहे थे, जिससे बाद में मचे इस कोहराम में करोड़ों रुपए की सार्वजनिक संपत्तियों को नष्ट कर दिया गया और पुलिसकर्मियों व नागरिकों को चोटें आईं।
स्थानीय लोगों ने बताया कि मुस्लिम दंगाइयों ने यह तय करने से पहले कि किस दुकान को जलाना है और किसे छोड़ना है, दुकानों के नाम वाले साइनबोर्ड पढ़े थे। जहाँ हिंदुओं की दुकानों को बर्बाद कर दिया गया, लूटा गया और जला दिया गया, वहीं मुस्लिमों की दुकानों को अछूता छोड़ दिया गया। इसका सीधा सा मतलब यह था कि इन मुस्लिम दंगाइयों ने पहले से ही चांद बाग में रहने वाले हिंदुओं के बारे में विस्तृत जानकारी जुटा ली थी।
ताहिर हुसैन की बिल्डिंग में हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए करीब 3,000 जिहादी दंगाई, पेट्रोल बम और दूसरे हथियार रखे गए थे
मुसलमानों की एक भीड़, जिसमें अधिकांश युवा थे, दिल्ली के मुस्तफाबाद की तरफ से आगे बढ़ी। वे सभी चांद बाग के पुल पर इकट्ठा हुए। वहाँ से वे आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन की इमारत पर पहुँचे।
वे छत पर चले गए, जहाँ से उन्होंने पत्थर और पेट्रोल बम फेंकना शुरू कर दिया। 26-27 फरवरी 2020 की हमारी ग्राउंड रिपोर्टिंग में, हमें बताया गया था कि ताहिर हुसैन की इमारत में 3000 से अधिक मुस्लिम दंगाई मौजूद थे।
यहाँ यह नोट करना बेहद जरूरी हो जाता है कि ताहिर हुसैन वही AAP नेता है जिसकी छत से न केवल पेट्रोल बम, बल्कि ईंटों के टुकड़ों से भरी बोरियाँ, पत्थर, एसिड पैकेट और यहाँ तक कि पत्थरों व पेट्रोल बमों को फेंकने के लिए बड़े गुलेल भी बरामद किए गए थे।
इसके अलावा, यह बात सामने आई है कि मारे गए IB अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या से पहले उन्हें ताहिर हुसैन के घर के भीतर खींचा गया था, और उनका शव हुसैन के घर के पीछे एक नाले में मिला था।
उस समय, स्थानीय लोगों ने ऑपइण्डिया के सामने यह खुलासा किया था कि कैसे IB अधिकारी अंकित शर्मा को इस्लामवादियों द्वारा खींचकर ताहिर हुसैन की इमारत के अंदर ले जाया गया था।
जब इस्लामो-लेफ्टिस्ट मीडिया और नेता दिल्ली दंगों के लिए हिंदुओं को विलेन बता रहे थे, तब ऑपइंडिया ने दिखाया कि कैसे एक इस्लामी भीड़ ने शिव मंदिर पर ज़बरदस्ती कब्जा कर लिया
जबकि इस्लामी-वामपंथी गुट ने 2020 के दिल्ली दंगों के सूत्रधार और खलनायक के रूप में हिंदुओं को और पीड़ितों के रूप में मुस्लिमों को चित्रित करने के लिए आधे-अधूरे सच और अपनी उपजाऊ कल्पना का सहारा लिया।
वहीं ऑपइंडिया ने इस बात के रोंगटे खड़े कर देने वाले विवरण सामने रखे कि कैसे उन्मादी इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदू घरों, दुकानों और पूजा स्थलों पर हमले किए जा रहे थे, उन्हें आग के हवाले किया जा रहा था और तोड़फोड़ की जा रही थी, जिन्होंने देश की राजधानी में CAA-विरोधी प्रदर्शनों को हिंदू-विरोधी दंगों में बदल दिया था।
कई हिंदुओं की जान लेने के अलावा, इस्लामी दंगाइयों ने हिंदुओं के दुकानों और कई मंदिरों में भी तोड़फोड़ की और उन्हें आग लगा दी। दिल्ली के चांद बाग इलाके में स्थित ऐसा ही एक शिव मंदिर, जिसका ऑपइंडिया ने दौरा किया था, वह भी इन दंगों का गवाह था।
मुसलमानों को दंगों के लिए तैयार किया गया था, महिलाओं और बच्चों को हिंदुओं पर हमला करने के लिए हथियारबंद किया गया था: चश्मदीद ने ऑपइंडिया को बताया
2020 के दिल्ली हिंदू-विरोधी दंगों के कुछ ही घंटों बाद ऑपइंडिया ने जिन भी चश्मदीदों से संपर्क किया, उनमें से अधिकांश ने यह खुलासा किया कि इस्लामवादी सीएए-विरोधी प्रदर्शन के बहाने काफी समय से इन हिंदू-विरोधी दंगों की तैयारी कर रहे थे।
सोनिया विहार में किराए के मकान में रहने वाली एक हिंदू महिला ने नाम न छापने की शर्त पर ऑपइंडिया को बताया, “सभी इस्लामी दंगाइयों ने पहले से ही अपने-अपने घरों के भीतर ईंटें और पत्थर जमा कर रखे थे। वे लगातार वहाँ से ईंट-पत्थर बाहर निकाल कर ला रहे थे। यह सब देखकर मैं इतनी डर गई थी कि पूरी रात सो भी नहीं सकी। हम जिस इलाके में रहते हैं, वह मुख्य रूप से मुस्लिमों का है और हमारी ही एकमात्र ऐसी बस्ती है जहाँ हिंदू रहते हैं।”
शिव विहार ग्राउंड रिपोर्ट: ऑपइंडिया ने बताया कि कैसे मुस्लिमों का राजधानी स्कूल जिहादी दंगाइयों का गढ़ बन गया
जब दिल्ली में दंगे भड़क रहे थे, ऑपइंडिया ने कई ऐसी ग्राउंड रिपोर्ट्स प्रकाशित कीं, जिन्होंने हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी आक्रामकता को दिखाया। ऐसी ही एक रिपोर्ट उत्तर-पूर्वी दिल्ली के करावल नगर में स्थित शिव विहार से थी, जहाँ हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिमों द्वारा बड़े पैमाने पर दंगे देखे गए।
शिव विहार में दो स्कूल हैं। एक है राजधानी पब्लिक स्कूल और दूसरा है DRP पब्लिक स्कूल। जहाँ राजधानी स्कूल एक मुस्लिम का है, वहीं DRP स्कूल के मालिक एक शर्मा जी हैं।
हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों के दौरान, इनमें से एक स्कूल पूरी तरह तबाह हो गया और दूसरे को हिंसा फैलाने का अड्डा बना दिया गया। यह अनुमान लगाने के लिए बहुत ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है कि किस स्कूल का क्या हश्र हुआ।
राजधानी स्कूल, जो एक मुस्लिम के स्वामित्व में है, उसे एक किले में तब्दील कर दिया गया था, जहाँ से इस्लामवादियों ने इलाके में हमले शुरू किए। उस स्कूल में दंगाइयों को सुरक्षा और पनाह दी गई थी।
इसी स्कूल से पत्थर बरसाए गए, गोलियाँ चलाई गईं और पेट्रोल बम फेंके गए। इस स्कूल की छत पर हमारे रिपोर्टर को कई ऐसे बड़े गुलेल मिले जिनका इस्तेमाल भारी पत्थर और पेट्रोल बम फेंकने के लिए किया गया था।
जब ऑपइंडिया के रिपोर्टर राजधानी स्कूल की छत पर पहुँचे, तो यह साफ जाहिर था कि दंगों के लिए जो सामग्रियाँ वहाँ जमा की गई थीं, उन्हें एक या दो दिन में इकट्ठा नहीं किया जा सकता था।
मीडिया ने राजधानी स्कूल में हुई तोड़फोड़ पर बड़े पैमाने पर ध्यान केंद्रित किया, शायद इसलिए क्योंकि वह स्कूल एक मुस्लिम का है, लेकिन उन्होंने यह उजागर नहीं किया कि वह तोड़फोड़ वास्तव में इस्लामवादियों द्वारा किया गया महज एक नाटक था। हकीकत यह है कि राजधानी स्कूल में मामूली तोड़फोड़ हुई थी जबकि DRP स्कूल को पूरी तरह से खाक कर दिया गया था।
मुस्लिम दंगाइयों ने एक तरफ हिंदुओं से नफरत की वजह से हिंदुओं पर हमला किया, और खुद को पीड़ित बताने के लिए अपनी दुकानों में तोड़फोड़ की
दिल्ली में हुई हिंसा के एक हफ्ते बाद, हमने बृजपुरी में दंगा पीड़ितों से मुलाकात की थी। इस दौरान, हमें एक चौंकाने वाली जानकारी मिली। यह जानकारी उस व्यक्ति से मिली जो हीरो शोरूम के पास दुकान चलाता है और दिन में 12 घंटे दुकान पर ही रहता है व आसपास की हर गतिविधि पर नजर रखता है।
चश्मदीद के अनुसार, “मुस्लिम महिलाओं ने रविवार को CAA विरोध के नाम पर प्रदर्शन शुरू किया था। इसके बाद सबने तैयारियाँ शुरू कर दीं। सोमवार को चांद बाग से हिंसा भड़क उठी। मुस्लिम पहले हिंदुओं की दुकानों को लूट रहे थे और फिर उन्हें आग के हवाले कर रहे थे।”
बृजपुरी में रहने वाले चश्मदीदों ने आगे बताया, “इतना ही नहीं, इन लोगों (मुस्लिमों) को सब पता था कि आगे क्या होने वाला है। इलाके में इकलौता मुस्लिम बाइक शोरूम, जहाँ बिक्री के लिए सैकड़ों बाइकें खड़ी रहती थीं, उसने 26 फरवरी की सुबह 5 बजे इलाके में हिंसा भड़कने से ठीक पहले अपनी सभी बाइकों को शोरूम से निकालकर किसी सुरक्षित जगह पर पहुँचा दिया था। इसके बाद, दंगाइयों ने खुद को पीड़ित दिखाने के लिए पहले शोरूम में तोड़फोड़ की और फिर शोरूम से काउंटर को बाहर निकालकर उसमें आग लगा दी।”
ऑपइंडिया ने दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों में मारे गए एक दलित हिंदू के भाई से बात की
दिनेश कुमार खटीक उन लोगों में से एक थे जो दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों में मारे गए थे। ऑपइंडिया ने दिनेश कुमार खटीक के भाई सुरेश से बातचीत की थी और उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि उनके भाई की जान जिहाद ने ली है।
इस्लामी कट्टरपंथियों का जिहाद। उन्होंने कहा कि पूरे मुस्तफाबाद ने मिलकर उनके भाई की हत्या की है। मुस्तफाबाद से उनका तात्पर्य एक मुस्लिम बहुल इलाके से था। इस प्रकार इस भीषण हत्याकांड को अंजाम दिया गया था।
चांद बाग की महिलाओं ने ऑपइंडिया को बताया कि ‘दंगाइयों ने हमारी लड़कियों के कपड़े उतार दिए, उन्हें नंगा करके वापस भेज दिया’
साल 2020 में, ऑपइंडिया ने कई हिंदू पीड़ितों से बातचीत की थी, जिनमें से कुछ ने हमें बताया था कि कैसे दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में कोहराम मचाने वाले इस्लामवादियों ने हिंदू महिलाओं और लड़कियों के साथ बदसलूकी की थी।
एक महिला ने नाम न छापने की शर्त पर ऑपइंडिया को बताया, “हम तीन दिनों में पहली बार अपने घरों से बाहर निकले हैं। इन लोगों (इलाके के मुस्लिमों) ने हमारे साथ जो कुछ भी किया, उसके बारे में तो बताया जा रहा है, लेकिन इन्होंने ट्यूशन से लौट रही हमारी बेटियों तक को नहीं छोड़ा। उन्होंने उनके कपड़े उतार दिए और उन्हें हमारे पास निर्वस्त्र भेज दिया। हमारी बेटियों के सामने, दंगाइयों ने अपने खुद के कपड़े उतारे और अश्लील इशारे किए। हम अपने पड़ोसियों को मारने के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकते, लेकिन उनकी तैयारी से यह साफ जाहिर है कि वे उस दिन हम सभी को खत्म कर देना चाहते थे।”
ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली दंगों के बाद हिंदुओं को कैसे अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है
दिल्ली दंगों पर अपनी व्यापक रिपोर्टिंग में, ऑपइंडिया ने दिसंबर 2019 से हिंदुओं पर हुए अत्याचारों की भयावहता को उजागर किया है, जो अंततः फरवरी 2020 में दिल्ली में हुए भीषण दंगों के रूप में सामने आई।
अगस्त 2020 में, ऑपइंडिया की एक ग्राउंड रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि कैसे मौजपुर के तीन मुस्लिम बहुल इलाकों सुभाष मोहल्ला, मधुबन मोहल्ला और मोहनपुरी क्षेत्र की तीन गलियों में केंद्रित लगभग 150-200 हिंदू परिवारों ने अपने घरों के बाहर ‘ मुस्लिमों के डर से यह मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर लगा दिए थे, क्योंकि उन्हें इलाके के मुस्लिम निवासियों द्वारा डराया-धमकाया जा रहा था।
हिंदू पीड़ित हमारे संवाददाता को मौजपुर के मोहनपुरी इलाके की उन गलियों और कूचों में ले गए, जो मुस्लिम अतिक्रमण से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में से एक थे। लगभग उन सभी हिंदू दुकानों और मकानों पर, जिन पर महीनों पहले हमला किया गया था, लूटा गया था या जिन्हें जला दिया गया था, उनकी दीवारों पर पोस्टर लगे थे जिन पर लिखा था ‘यह मकान बिकाऊ है।’
ऑपइंडिया ने 2020 के दिल्ली दंगों के पीछे इस्लामी साजिश के बड़े लिंक का पर्दाफाश किया
ऑपइंडिया निर्विवाद रूप से पहला ऐसा संस्थान था जिसने उमर खालिद, खालिद सैफी, ताहिर हुसैन, शरजील इमाम, योगेंद्र यादव से जुड़े संबंधों और चक्का जाम व अन्य साजिशी विवरणों को लेकर बदनाम वकील प्रशांत भूषण द्वारा आयोजित की गईं शुरुआती बैठकों के बारे में विस्तार से रिपोर्ट की थी।

ऑपइंडिया ने भारतीय और विदेशी मीडिया द्वारा ‘ब्राउन सिपाहियों’ (गुलाम मानसिकता वाले भारतीयों) का इस्तेमाल करके हिंदू-विरोधी दंगों के जिहादी दंगाइयों और साजिशकर्ताओं को ‘असंतोष के नायक’, ‘लोकतंत्र के योद्धा’, ‘धर्मनिरपेक्षता के रक्षक’ आदि के रूप में चित्रित करने के प्रयासों का लगातार मुकाबला किया।
द गार्जियन, द न्यूयॉर्क टाइम्स, द वाशिंगटन पोस्ट से लेकर द वायर, स्क्रॉल और अन्य भारतीय वामपंथी अखबारों तक, ये समय-समय पर आरोपी दंगाइयों, विशेष रूप से उमर खालिद और शरजील इमाम का मानवीकरण करने वाले लेख प्रकाशित करते रहते हैं। ऑपइंडिया इस हिंदू-विरोधी वैश्विक इस्लामी-वामपंथी दुष्प्रचार कारखाने का मुकाबला करने में सबसे आगे रहा है।
ताहिर हुसैन दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों का मुख्य भड़काने वाला था, उसने अपनी इस्लामिस्ट कट्टरता वाली भूमिका कबूल की, और फिर भी उसे अपने ही धर्म के लोगों से इनाम मिला
दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के अनुसार, ताहिर हुसैन ने 8 जनवरी को शाहीन बाग में एक बैठक के दौरान उमर खालिद और खालिद सैफी के साथ दंगों की योजना बनाई थी। फर्जी (शेल) कंपनियों से हुए कई लेन-देन संदिग्ध पाए गए थे।
चार्जशीट में ताहिर हुसैन के खाते से हुए ऐसे कई लेन-देनों का विवरण दिया गया है जो दर्शाते हैं कि उसे दंगों को आयोजित करने के लिए पैसे मिलने शुरू हो गए थे। इनमें से कुछ पैसे फर्जी कंपनियों के माध्यम से भी भेजे गए थे। पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि उमर खालिद ने ताहिर हुसैन को आश्वासन दिया था कि वित्तीय रूप से, इस्लामी संगठन PFI (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) दंगों के आयोजन में मदद के लिए तैयार है।
हुसैन ने दिल्ली दंगों के भड़कने से ठीक कुछ दिन पहले पुलिस के पास जमा अपनी 100 कारतूसों वाली लाइसेंसी पिस्तौल वापस छुड़वा ली थी। गिरफ्तारी के बाद वह बचे हुए 14 जिंदा कारतूसों और 22 खाली/चले हुए कारतूसों के बारे में संतोषजनक जवाब देने में विफल रहा।
ताहिर हुसैन ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि दंगों में उसकी संलिप्तता का पता न चले, झांसा देने के रूप में कई PCR कॉल किए। उसने यह सुनिश्चित किया कि CCTV कैमरे बंद कर दिए जाएँ ताकि सबूत रिकॉर्ड न हो सकें।
उदाहरण के लिए, चार्जशीट संख्या 114/20 में हिंदुओं की दुकानों को जलाने और हिंदुओं पर हमला करने के लिए मुस्लिम भीड़ को भड़काने में उसकी भूमिका स्पष्ट रूप से सिद्ध होती है।

ताहिर हुसैन द्वारा 5 मई 2020 को हस्ताक्षरित प्रकटीकरण बयानों में से एक में, वह खुलासा करता है कि कैसे उसने ‘काफिरों को सबक सिखाने’ के लिए दंगों की योजना बनाई थी।
ताहिर हुसैन ने कबूल किया कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान, उसे सूचना मिली थी कि सीएए के समर्थन में कुछ रैलियाँ आयोजित करने की योजना बनाई गई है। यह जानकारी मिलने के बाद, उसने दूसरों के साथ मुलाकात की और उन्हें सबक सिखाने की साजिश रची।
इसके अलावा, ताहिर हुसैन ने खुलासे में कबूल किया कि अपनी रची गई इस साजिश के अनुसार, उसने दंगों के लॉन्चपैड के रूप में अपने खुद के घर को चुना क्योंकि वह उस इलाके में एक ऊँची इमारत थी।
हुसैन ने यह भी स्वीकार किया कि दंगों के दौरान वह अपने भाइयों शाह आलम, अरशद, आबिद, शाहिद, इरशाद और कई अन्य लोगों के साथ अपने आवास पर मौजूद था। उसने यह भी स्वीकार किया कि 24 फरवरी 2020 की दोपहर को उसकी भीड़ ने ‘अल्लाह हू अकबर’ और ‘मारो मारो काफिरों को मारो’ के नारे लगाने शुरू कर दिए थे और उसने विशेष रूप से हिंदू घरों को निशाना बनाने के लिए उनकी निगरानी की थी।
ताहिर हुसैन की हिंदू-नफरत और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़काने में स्पष्ट भूमिका और IB अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के नग्न सच के बावजूद, ताहिर हुसैन को अपने सह-धर्मियों और वैचारिक रूप से अधीन रहने वाले मीडिया से समर्थन मिला।
हिंदुओं को मारने की साजिश का नेतृत्व करने के लिए अपने सर्वोच्च पुरस्कार को प्राप्त करते हुए, ताहिर हुसैन को पिछले साल असदुद्दीन ओवैसी की मुस्लिम पार्टी AIMIM द्वारा मुस्तफाबाद विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया गया था।
हुसैन को केवल अपनी एक झलक पाने के लिए भारी संख्या में उमड़े मुसलमानों के बारे में डींगें हांकते हुए देखा गया था, जिसमें कुछ लोग तो यह भी कह रहे थे कि अल्लाह ने ताहिर हुसैन को ‘बड़ी कामयाबी’ दी है।
निश्चिंत रहें, अंकित शर्मा हत्याकांड में दोषी ठहराए जाने के बावजूद, ताहिर हुसैन के सह-धर्मियों के लिए वह अपनी मुस्लिम पहचान के कारण हिंदुत्व सरकार द्वारा ‘फंसाया गया’ एक निर्दोष व्यक्ति ही बना हुआ है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि पीड़ित होने (विक्टिमहुड) पर मुस्लिमों का एकाधिकार है। हालाँकि ऑपइंडिया ने यह सुनिश्चित करने में अपनी विनम्र भूमिका निभाई कि मुस्लिम विक्टिमहुड का दुष्प्रचार सच को मिटा न सके, और उम्मीद करता है कि हिंदुओं को अपनी ही मातृभूमि में न्याय से वंचित नहीं होना पड़ेगा।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


