Friday, April 3, 2026
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भारत भवन के घड़े में BLF के बखेड़े

मध्य प्रदेश की साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं को यह संदेश बिल्कुल नहीं जाना चाहिए कि भारत भवन में किसी भी संस्था विशेष या आयोजन विशेष के पक्ष में निर्णय लेने की अलग और मनमानी नीति है।

पहले से विवादों में रहे भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल ने इस बार खुद को बचाने के लिए एक लेखक और उनकी किताब को ढाल बनाने की कोशिश की। मगर इस बार भी भारत भवन को बेवजह विवादों में घसीट ही दिया। क्या आठ साल बाद अब BLF का भारत भवन पर एकाधिकार खत्म होगा?

मैं पिछले दिनों कोलकाता-दिल्ली में था। भारत भवन का न्यासी होने के नाते अनेक मित्रों ने दिल्ली में रूबरू और फोन पर एक ही तरह के सवाल किए- “आपके भारत भवन में यह क्या चलता रहता है?” लौटकर मीडिया और सोशल मीडिया पर वही दुखी करने वाले एक जैसे विवाद बिखरे हुए देखे, जो बीते वर्षों में होते रहे।

दो कारणों से मेरा सरोकार केवल भारत भवन से है। पहला, मैं यहाँ का न्यासी हूँ और दूसरा, पिछले तीस सालों में अपने पत्रकारीय जीवन के आरंभ से देश के इस प्रतिष्ठित बहुकला केंद्र से एक श्रोता-दर्शक के रूप में जुड़ा ही रहा हूँ।

भारत भवन में होने वाले BLF का विवादों और सवालों से चोली-दामन का साथ उसी दिन से है, जब से भारत भवन के दरवाजे इनके लिए खोले गए। दो साल पहले भी ऐसे ही किसी विषय पर बवाल हो चुका है। तब तत्कालीन संस्कृति मंत्री ने काफी सख्त रुख दिखाया था। मध्य प्रदेश की साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं के यह सवाल ध्यान देने योग्य हैं कि जब किसी और निजी संस्था को भारत भवन उपलब्ध नहीं है तो BLF को क्यों वंदनवार सजते हैं और वह भी ‘अज्ञात कारणों’ से हर साल मोटी सरकारी आर्थिक मदद सहित।

2021 में शासन की ओर से मुझे न्यास मंडल में सम्मिलित किया गया। साल-डेढ़ साल में होने वाली दो-तीन औपचारिक बैठकों में मैं उपस्थित भी रहा। आखिरी बार 2024 में कभी बैठक हुई थी। मुझे नहीं पता था कि न्यास अभी कार्यशील है या उसका कार्यकाल पूरा हो गया है। ताजा विवाद पर जब मीडिया के मित्रों ने प्रश्न किए तो मैंने सबसे पहले भारत भवन के प्रशासनिक अधिकारी प्रेमशंकर शुक्ला से इसकी जानकारी ली। मुझे बताया गया कि न्यास का अस्तित्व अभी है। कहा गया, “जब तक आपको सूचना न मिले कि आप नहीं हैं, तब तक मानकर चलें कि आप हैं।’

जब न्यास का पुनर्गठन हुआ तो ऐसी अनेक संस्थाओं ने हमसे संपर्क किया और चाहा कि या तो सभी संस्थाओं को यह महत्वपूर्ण कला केंद्र उपलब्ध होना चाहिए या एक ही नीति पर सबके साथ अमल होना चाहिए। यह पक्षपात क्यों? BLF के आयोजन में भारत भवन के कौन से या किसके हित जुड़े हैं जबकि इतने वर्षों में भी भोपाल के लेखक, दर्शक और श्रोताओं से उसका कोई तारतम्य तक नहीं बन पाया है और लिटरेचर फेस्टिवलों में उमड़ने वाली भीड़ आश्चर्यजनक रूप से यहाँ गायब रही है।

मुझे याद है कि न्यास मंडल की आरंभिक बैठकों में प्रसिद्ध रंगकर्मी राजीव वर्मा ने यह विषय बहुत प्रमुखता से उठाया था कि भारत भवन में बाहरी आयोजनों को लेकर हमारी नीति ‘एक और स्पष्ट’ होनी चाहिए। भारत भवन या तो सभी को उपलब्ध कराएँ या किसी को भी नहीं। बाकी न्यासियों को भी पहली ही बार पता चला था कि भोपाल की किसी एक संस्था के लिए भारत भवन में स्वागत द्वार सजते हैं और बाकियों के लिए ‘नो एंट्री’ का साइनबोर्ड है। स्वाभाविक रूप से सभी सहमत थे कि यह अनुचित है।

संभव है कि जनता से जुड़ाव न होने के कारण ही जानबूझकर ऐसे विषय और सत्र रखे जाते हों, जिनसे अनावश्यक भ्रम पैदा हो और विवाद खड़े हों। भीड़ जुटाने के लिए आयोजकों की ओर से प्रचार की यह एक सुनियोजित नीति के तहत किया जाता हो। मैं प्रसंगवश इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल (ILF) को याद करना चाहूँगा। 11 साल से इंदौर में वह लोकप्रिय आयोजन के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है, जहाँ इंदौर से बाहर के अनेक साहित्य और संस्कृतिप्रेमी केवल श्रोता के रूप में तीन दिन आकर शामिल होते हैं। हर सत्र में विषय से जुड़े श्रोताओं का एक समर्पित वर्ग इस आयोजन ने बना लिया है। बीते वर्षों में तारेक फतह और तसलीमा नसरीन जैसे चर्चित लेखक भी अनेक बार शामिल हुए हैं और कभी किसी विषय या पुस्तक को लेकर विवाद की एक लकीर नहीं देखी गई। तब लगता है कि BLF भारत भवन के लिए एक अपशगुन क्यों बना?

जो भी हो, यह स्पष्ट है कि भारत भवन को साधन संपन्न सरकारी प्रायोजक संस्थाओं से लैस शक्तिशाली BLF के आयोजकों ने विवादों का एक मैदान बना दिया गया है। इससे प्रचार या दुष्प्रचार BLF को जो भी मिला हो मगर भारत भवन की साख अनावश्यक ही चौपट हुई। एक न्यासी के रूप में मेरी चिंता केवल भारत भवन को लेकर है, जो हमारी पीढ़ी को विरासत में मिला है। वह हमने बनाया नहीं है। अगर हम उसको बहुकलाओं का एक निरंतर सक्रिय और जनता से जुड़ा हुआ केंद्र नहीं बना सकते तो कम से कम उसकी छवि को धूमिल करने वाले ऐसे विवादों के अवसर तो पैदा न करें। समय रहते संभलें। नीतियों और निर्णयों पर पुनर्विचार करें। यह जाँच का भी विषय है कि लगातार इतनी बदनामियों के बावजूद BLF को ढोने में दिलचस्पी किसकी है?

मेरा विनम्र सुझाव है कि हर साल पैदा होने वाले ऐसे कटुतापूर्ण प्रसंग का अब पटाक्षेप हो जाना चाहिए। शासन को निर्णय करना चाहिए कि अगले वर्ष से BLF के लिए भारत भवन उपलब्ध नहीं है। लाखों की मदद उन्हें शासन देता ही है। वे चाहें किसी भी बड़े होटल या रिसॉर्ट या धर्मशाला में यह आयोजन कर सकते हैं। भोपाल में जम्बूरी मैदान से लेकर लाल परेड ग्राउंड तक असीमित स्थान हैं। समाज में नेरेटिव बनाने के लिए जैसे भी विषय उन्हें चुनने हों, वे स्वतंत्र हैं, अभिव्यक्ति की अपार स्वतंत्रता अबाधित है और वे धन-साधन संपन्न तो हैं ही। किंतु भारत भवन को बचाना जरूरी है। यह भारत भवन के सभी पाँच प्रभागों को रिस्ट्रक्चर करने का बिल्कुल सही समय है।

मध्य प्रदेश भारत का ह्दय प्रदेश है। यहाँ भारत केंद्रित और स्थानीय प्रासंगिक विषयों की क्या कमी है? मध्य प्रदेश की सामाजिक, सांस्कृतिक विरासत, राजा भोज, विक्रमादित्य, रानी कमलापति, भीम बैठका और हाल ही में देश भर की चर्चा में आए विदिशा के ऐतिहासिक उदयपुर जैसे विषय अनेक हैं, जिन पर विमर्श किया जा सकता था। इनकी जगह पर बाबर जैसे आक्रांता की चर्चा भोपाल में समझ के परे है जबकि अयोध्या आस्था और विकास के मार्ग पर उजाले से भर रही है। नई शिक्षा नीति में इतिहास के पाठ्यक्रमों से भी बाबर-औरंगजेब समेटे जा रहे हैं। तब हम क्यों इतिहास के इन प्रेतों को अपने विमर्श में जिंदा रखना चाहते हैं? यह समय रामायण से राष्ट्रीय पुनर्जागरण तक भारत की अपनी महान गाथाएँ कहने का है। स्वयं प्रधानमंत्री बार-बार यही दोहरा रहे हैं।

मुझे लगता है, ऐसे संवेदनशील और ऊर्जा से भरे अनुकूल समय में बाबर जैसे आक्रमणकारी को विमर्श–केंद्र में लाना न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि भारत की आत्मा के वर्तमान प्रवाह के बिल्कुल विपरीत भी। कम से कम शासन के प्रांगण में शासन की सहायता से होने वाले वैचारिक अनुष्ठान को इनसे बचा जाना ही उचित था मगर अत्यंत दुख की बात है कि एक कर्कश विवाद एक बार फिर भारत भवन से जुड़ गया। BLF ने एक लेखक और उसकी किताब को अपनी ढाल बनाकर यह खेल भारत भवन के पवित्र परिसर से किया। यह असहनीय है।

मैं स्वयं लेखक हूँ और भारत में इस्लाम के फैलाव पर दो किताबें मेरी हैं। मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि किसी किताब या किसी लेखक से न्यास का कोई विरोध नहीं है। किंतु मध्य प्रदेश की साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं को यह संदेश बिल्कुल नहीं जाना चाहिए कि भारत भवन में किसी भी संस्था विशेष या आयोजन विशेष के पक्ष में निर्णय लेने की अलग और मनमानी नीति है। आठ साल से यह एक परंपरा ही बन गई है। BLF की ओर से प्रस्तुत ताजा कटु प्रसंग यह बता रहा है कि घड़ा भर चुका है।

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विजय मनोहर तिवारी
विजय मनोहर तिवारी
25 साल मीडिया में रहे। प्रिंट और टीवी दोनों में काम। 11 किताबें प्रकाशित। पांच साल तक भारत की लगातार आठ यात्राएँ की हैं। वर्तमान में भारत में इस्लाम के फैलाव पर शोध और लेखन जारी। गरुड़ प्रकाशन से पहला भाग छपा है।

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