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कभी भारत का तीसरा सबसे अमीर राज्य था पश्चिम बंगाल, आज ‘आर्थिक तबाही’ की कगार पर खड़ा: समझें- कैसे वामपंथियों और TMC की नीतियों ने अर्थव्यवस्था की ध्वस्त

पश्चिम बंगाल की गिरावट पिछले 60 सालों की है, जब दूसरे पिछड़े राज्य तेजी से आगे बढ़ रहे थे। कम्युनिस्ट राज की वैचारिक जिद और ममता बनर्जी की टीएमसी सरकार की नीतियाँ इस बर्बादी की मुख्य वजह हैं।

कभी भारत की आर्थिक ताकत का प्रतीक पश्चिम बंगाल आज अभूतपूर्व गिरावट का शिकार हो चुका है। 1960 में यह देश के सबसे अमीर राज्यों में तीसरे नंबर पर था, लेकिन आज 24वें स्थान पर लुढ़क गया है। राज्य की जीडीपी में हिस्सेदारी 10.5 प्रतिशत से घटकर 5.6 प्रतिशत रह गई है, जबकि प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 28 प्रतिशत ज्यादा से 16.3 प्रतिशत कम हो गई है।

यह गिरावट पिछले 60 सालों की है, जब दूसरे पिछड़े राज्य तेजी से आगे बढ़ रहे थे। कम्युनिस्ट राज की वैचारिक जिद और ममता बनर्जी की टीएमसी सरकार की नीतियाँ इस बर्बादी की मुख्य वजह हैं।

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) के डेटा से साफ होता है कि कैसे राज्य ने खुद अपनी संरचनात्मक गिरावट को अंजाम दिया। इस रिपोर्ट में हम टाइमलाइन के जरिए देखेंगे कि कैसे कम्युनिस्टों की मिलिटेंट यूनियनिज्म और ममता राज की उद्योग-विरोधी नीतियों ने बंगाल को आर्थिक रूप से तबाह कर दिया।

कभी देश का आर्थिक लीडर था बंगाल

1960 के दशक की शुरुआत में पश्चिम बंगाल सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि भारत का औद्योगिक केंद्र था। 1960-61 में यहां की सापेक्ष प्रति व्यक्ति आय 127.5 प्रतिशत थी, यानी औसत बंगाली राष्ट्रीय औसत से 28 प्रतिशत ज्यादा कमाता था। कलकत्ता बंदरगाह, जूट उद्योग की एकाधिकार स्थिति और जेसप, ब्रेथवेट जैसी इंजीनियरिंग कंपनियां यहां की ताकत थीं। महाराष्ट्र और दिल्ली के साथ यह राज्य निवेशकों का पहला विकल्प था।

भारत में क्षमता निर्माण के लिए कोई भी पूँजी यहीं आती थी। लेकिन यह दौर ज्यादा नहीं चला। 1967 में कॉन्ग्रेस सरकार गिरने के बाद राज्य में अस्थिरता आई। नक्सलवाद के संघर्ष ने कंपनियों को मजदूरों की छंटनी करने या भागने पर मजबूर किया। बेरोजगारी बढ़ी और अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी। 1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम मोर्चा सरकार बनी, जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नियंत्रण में थी। शुरू में राज्य शांत था, लेकिन कम्युनिस्टों की प्रो-लेबर नीतियाँ जल्दी ही मिलिटेंट बन गईं।

कम्युनिस्ट राज में उग्र यूनियनिज्म और पूँजी का पलायन से ‘डेथ क्रॉस’

पश्चिम बंगाल की इंडस्ट्रियल गिरावट कोई दुर्घटना नहीं थी। दरअसल, 1960 के अंत से बंगाल की समृद्धि का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा। 1980-81 तक सापेक्ष आय 96.9 प्रतिशत रह गई। यह वह ‘डेथ क्रॉस’ था जब औसत बंगाली औसत भारतीय से गरीब हो गया। कुछ वामपंथी इतिहासकार फ्रेट इक्वलाइजेशन पॉलिसी जैसे बाहरी कारणों को दोष देते हैं, लेकिन मुख्य जख्म खुद का लगाया हुआ था।

कम्युनिस्ट राज में उग्र ट्रेड यूनियनवाद का उदय हुआ। ‘घेराव’ को हथियार बनाकर उद्योगों को बंधक बनाया गया। मुनाफे को ‘पाप’ माना गया और उद्योगपतियों को अपमानित किया गया। पूँजी ने भागना शुरू कर दिया। नवाचार के लिए जरूरी ‘एनिमल स्पिरिट्स’ कोलकाता से निकलकर मुंबई और गुजरात चले गए। 1970 में 678 स्ट्राइक्स और 128 लॉकआउट्स हुए, लेकिन 2003 तक स्ट्राइक्स घटकर 32 रह गईं जबकि लॉकआउट्स 400 हो गए। इससे 2.56 करोड़ मैन-डे लॉकआउट्स में खो गए।

कम्युनिस्टों ने छोटे उद्योगों पर फोकस किया, लेकिन मल्टीनेशनल निवेश रोक दिया गया। साल 1994 की नीति में विदेशी निवेश का स्वागत किया गया, लेकिन हल्दिया पेट्रोकेमिकल जैसे प्रोजेक्ट्स में भी देरी हुई। परिणामस्वरूप 1950-51 में राष्ट्रीय उत्पादन में 27 प्रतिशत हिस्सा 2007-08 तक 3.9 प्रतिशत रह गया। राजनीतिक हिंसा और बंद की वजह से स्थिति बिगड़ती गई। कम्युनिस्टों की पार्टी पर सरकारी नियंत्रण ने नौकरशाही को जकड़ लिया।

वैचारिक जाल में फंसा बंगाल छूट गया पीछे

साल 1991 में भारत ने लाइसेंस राज तोड़ा, तो दक्षिणी राज्य जैसे कर्नाटक और आंध्र प्रदेश ने आईटी पार्क बनाए और ग्लोबल सप्लाई चेन को आकर्षित किया। लेकिन बंगाल ‘वैचारिक समय जाल’ में फँसा रहा। 70 के दशक का ट्रॉमा बना रहा। उग्रता कम हुई, लेकिन पूँजी के प्रति दुश्मनी की छवि बनी रही। कर्नाटक, आंध्र ने संपदा बढ़ाई, जबकि बंगाल कृषि आधारित कम विकास में फँस गया। इससे 1990 से 2010 तक रैंकिंग 15 से 21वें नंबर पर गिर गई।

निवेश डेटा बताता है कि 1991-2003 में बंगाल को 4,542 लेटर्स ऑफ इंटेंट मिले, लेकिन सिर्फ 14.6 प्रतिशत लागू हुए, जबकि गुजरात में 16 प्रतिशत। प्रति व्यक्ति निजी निवेश बंगाल में 1,952 रुपए था, गुजरात में 20,725 रुपए। इंफ्रास्ट्रक्चर में बंगाल 1980-81 में 9वें स्थान से 1990-91 में नीचे गिर गया। बिजनेस शुरू करने में 258 दिन लगते थे, जबकि अहमदाबाद में 144। कम्युनिस्ट राज की ये नीतियाँ राज्य को पिछड़ा बनाती रहीं।

ममता राज में डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन 2.0, सिंगुर स्टैंडऑफ बना टर्निंग प्वॉइंट

इंडस्ट्री का डेटा पश्चिम बंगाल की इस त्रासदी का कंकाल है, तो सिंगुर उसका दिल। 2008 में रतन टाटा का सिंगुर में नैनो प्लांट लगाने का फैसला एक मोड़ था। लेकिन ममता बनर्जी के नेतृत्व में विपक्षी आंदोलन ने टाटा को सानंद, गुजरात जाने पर मजबूर कर दिया। इससे ग्लोबल निवेशकों में संदेश गया कि बंगाल में जमीन अधिग्रहण राजनीतिक जोखिम से भरा है। ऐसे में बंगाल को दूसरी बार डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन झेलना पड़ा।

कम्युनिस्टों की तरह टीएमसी ने भी बंदों और राजनीतिक हिंसा को जारी रखा। साल 2011-2025 में 6,600 कंपनियाँ भागने को मजबूर हुईं, जिनमें 110 लिस्टेड कंपनियाँ भी शामिल हैं। राज्य में एफडीआई सिर्फ 2,534 करोड़ रुपए आई और वो टॉप 10 में भी जगह नहीं बना पाई।

2024-25 का ऑडिट बताता है बर्बादी का हाल

आज के समय का डाटा डराने वाला है। साल 1960 में रैंक 3 वाला राज्य 2024 में रैंक 24 पर आ चुका है। औसत बंगाली औसत भारतीय से 16.3 प्रतिशत कम कमाता है। तमिलनाडु, जो शुरू में नीचे था, सापेक्ष आय 150 प्रतिशत से ऊपर पहुँच गया, जबकि बंगाल पूरी तरह से उलटफेर झेल रहा है।

फिस्कल डेफिसिट 38 प्रतिशत जीएसडीपी है, डेट-टू-जीएसडीपी 37.08 प्रतिशत। टैक्स कलेक्शन सुस्त (5.45 प्रतिशत जीएसडीपी), क्योंकि बड़ा अनौपचारिक सेक्टर है। सोशल ट्रांसफर्स 90.7 प्रतिशत तक पहुँच गए, लेकिन चुनावों से पहले बढ़ाए गए, जो वोटबैंक पॉलिटिक्स लगते हैं।

साल 2025 में ममता सरकार द्वारा लाए ‘रिवोकेशन ऑफ वेस्ट बंगाल इंसेंटिव स्कीम्स’ बिल से 1993 से दिए जा रहे इंसेंटिव्स वापस ले लिए गए। इससे डालमिया और बिड़ला ग्रुप को 430 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। हालाँकि ममता सरकार का ये कदम प्रॉमिसरी एस्टॉपल और आर्टिकल 14, 19 का उल्लंघन भी है।

कम्युनिस्ट-ममता राज ने विरासत में छोड़ी बर्बाद इंडस्ट्री

पश्चिम बंगाल की यह आर्थिक गिरावट छह दशकों की नीतियों का नतीजा है, जहाँ राजनीतिक एकजुटता को पूंजी संचय से ऊपर रखा गया। कम्युनिस्टों ने क्लास एनेमी बनाकर उद्योगों को तबाह किया, जबकि ममता ने सिंगुर जैसे आंदोलनों से निवेश रोका। आज बंगाल अनौपचारिक सेक्टर पर निर्भर है, जहाँ रिटेल, हॉस्पिटैलिटी, कंस्ट्रक्शन और कृषि में रोजगार है, लेकिन टैक्स कम मिलता है।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या पश्चिम बंगाल की स्थिति सुधर सकती है? क्योंकि अगर बंगाल आज बर्बाद हो चुका है, तो इसके पीछे कम्युनिस्ट-ममता राज की जिम्मेदारी साफ दिख रही है। ऐसे में अब जनता को भी ये सोचना होगा कि वो ऐसी पार्टी की सरकार बनाए, जो राज्य को आगे लेकर जाए, न कि 60 साल से बर्बादी की गर्त में जाते राज्य को और भी बर्बाद करे। बहरहाल, इसका निर्णय बंगाल की जनता को इसी साल यानी विधानसभा चुनाव में ही करना भी होगा।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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