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हिन्दुओं की लिंचिंग से हिन्दुओं को ही फर्क नहीं पड़ता तो 49 सेलिब्रिटीज़ से सवाल क्यों?

जगना ज़रूरी है क्योंकि हमारी लड़ाई कोई और नहीं लड़ेगा। हमारी लड़ाई दूसरों से नहीं है, हमारी लड़ाई इस बात को लेकर है कि वैचारिक दोगलापन नैरेटिव से बाहर जाए और हेट क्राइम पर चर्चा मजहब और धर्म से परे हो कर हो।

हत्या क्या है? हत्या एक अपराध है, अगर मरने वाला हिन्दू न हो तो। साम्प्रदायिक या कम्यूनल होना क्या है? जब आप विशेष मजहब के खिलाफ सामान्य बातें भी आलोचनात्मक रवैये के साथ लिखें। हालाँकि, जब हिन्दुओं के धार्मिक प्रतीकों, देवताओं, देवियों, मंदिरों, परम्पराओं आदि पर सीधे तौर पर हमले हों, और हमलावर सम्प्रदाय विशेष से या ईसाई हो, तो उसे साम्प्रदायिक नहीं माना जाता क्योंकि पीड़ित हिन्दू या हिन्दू धर्म है। यही आजकल की परिभाषा है, आपको जितना रोना-गाना है कर लीजिए, फर्क नहीं पड़ता।

जब तबरेज या अखलाख की हत्या होती है तो वो आंदोलन बन जाता है। ऐसा आंदोलन बन जाता है कि घटनास्थल से सैकड़ों किलोमीटर दूर मजहबी भीड़ लाख की संख्या में कैंडल लेकर निकल पड़ती है। या झारखंड से दूर गुजरात के सूरत में पुलिस की परमिशन न मिलने के बाद भी इस्लामी भीड़ निकलती है, उत्पात मचाती है और बताती है कि वो तबरेज की लिंचिंग के खिलाफ है।

अब कुछ घटनाएँ देखिए जो हाल ही की हैं जहाँ हिन्दुओं को कट्टरपंथियों ने मार डाला, लेकिन वो खबरें आप तक मेनस्ट्रीम मीडिया ले कर नहीं आती। सारी घटनाओं में मजहब ही केन्द्र में है, और कुछ भी नहीं।

गोपाल गौ रक्षक दल से जुड़े हुए थे। वह पहले भी कई गायों को तस्करों की पकड़ से छुड़ा चुके थे। उन्हें सोमवार (जुलाई 29, 2019) को किसी ने सूचना दी थी कि कुछ लोग गाय की तस्करी कर रहे हैं। जिसके बाद अपनी बाइक लेकर निहत्थे ही वे गायों को बचाने के लिए तस्करों का पीछा करने लगे। परिणामस्वरुप रास्ते का रोड़ा बनता देख गो तस्करों ने उन्हें गोली मार दी और वहीं उनकी मौत हो गई।

जनवरी 2019 में, इम्तियाज़ अहमद फ़ैयाज़ (19) और मोहम्मद रज़ा अब्दुल क़ुरैशी (20) गाय चुराकर ले जा रहे थे, कॉन्स्टेबल पेट्रोलिंग कर रहे थे। गाय लेकर जा रहे ट्रक से अब्दुल और क़ुरैशी ने कॉन्सटेबल प्रकाश मेशराम को कुचल दिया, जिससे उनकी वहीं पर मृत्यु हो गई। इससे पहले अप्रैल 2016 में रेवाड़ी में गो-तस्करों ने गाड़ी से कुचल कर एक सिपाही की हत्या कर दी थी।

राजस्थान के अलवर जिले में गो तस्करों ने ग्रामीणों पर फायरिंग की। हमले में जीतनराम नाम के ग्रामीण के सीने में गोली लगी। उनका भतीजा रामजीत भी घायल हो गया। इसके बाद अन्य ग्रामीणों ने एक तस्कर को पकड़ लिया और उसकी जमकर पिटाई की। 2 अन्य तस्कर फरार हो गए। तस्कर की पहचान सलीम खान के रूप में हुई है।

हरियाणा के नूंह शहर के भूतेश्वर मंदिर में कल काँवड़ चढ़ाने के दौरान ‘शांतिप्रिय’ समुदाय के युवकों द्वारा लड़कियों को छेड़ने का मामला सामने आया। जानकारी के मुताबिक जब लड़कियों के परिजनों ने इसका विरोध किया तो आसिफ, हुसैन, नोमान, इसराइल, जुबैर, सुब्बे, नईम और हाशिम ने उनसे मारपीट की।

बिहार के मुजफ्फरपुर में बरुराज थाना क्षेत्र में सावन के दूसरे सोमवार को जल भरने जा रही तकरीबन 500 से भी ज्यादा महिला और बच्चियों पर, मस्जिद के पास से गुजरते समय कुछ अराजक तत्वों द्वारा पथराव किया गया। जब बीच-बचाव के लिए पुलिस आई तो उनके साथ भी दुर्व्यवहार हुआ।

प्रयागराज में गौ तस्करी के आरोपी को गिरफ़्तार करने गई यूपी पुलिस पर गाँव वालों ने हमला कर दिया। हमला भी ऐसा-वैसा नहीं, बाकायदा पुलिस पर फायरिंग। इसके चलते आरोपित भागने में सफल रहा और 7 पुलिस वाले घायल भी हो गए।

ये चंद वैसी घटनाएँ हैं जो एक सीधे सर्च से सामने दिख गईं। इसके अलावा आपने दसियों नाम सुने होंगे जिसमें ध्रुव त्यागी, डॉक्टर नारंग, ई-रिक्शा चालक रवीन्द्र, अंकित सक्सेना आदि शामिल हैं जिन्हें मजहबी भीड़ ने अपनी घृणा का शिकार बनाया। इन सब पर न तो किसी जगह पर एक लाख हिन्दुओं ने कैंडल मार्च किया, न ही प्रधानमंत्री को इन घटनाओं पर बोलने को मजबूर किया, न ही किसी दूसरे राज्य में इनकी लिंचिंग के विरोध में सद्भावना रैली निकली।

ये सब नहीं हुआ क्योंकि आपको लगता है कि आपके बदले कोई सेलिब्रिटी कहीं से बैठ कर लेटर साइन करेगा, और आपका काम हो जाएगा। आपका काम नहीं हो पाएगा, क्योंकि आपको फर्क नहीं पड़ता। आप और हम सिर्फ़ ट्विटर-फेसबुक पर ही सारी लड़ाई लड़ लेते हैं। आप बस इस बात से खुश हो जाते हैं कि कश्मीर से ये धारा अब खत्म हो जाएगी, जबकि सामने से एक मजहबी उन्माद से उबलती भीड़ नारा-ए-तदबीर अदरक-लहसुन करती आती है, और आपके दुर्गा मंदिर को तोड़ कर चली जाती है।

क्या मैं, पिछली घटनाओं को आधार मानकर, ये सवाल न पूछूँ कि मजहब विशेष के लोगों को गाय काटकर खाने की ऐसी भी क्या चुल्ल मचती है कि वो पुलिस कॉन्स्टेबल की हत्या करने पर आमादा हो जाते हैं? कानून के लिए कितनी इज़्ज़त है कि बुलंदशहर में भी इसी तरह गायों के काटे जाने की ख़बर की परिणति एक पुलिस अफसर और एक नवयुवक की मौत के रूप में हुई?

आखिर ‘शान्तिप्रियों’ को काँवड़ ले जाते काँवड़ियों से क्या समस्या है कि वो रात के एक बजे छत पर बैठ कर उनके गुजरने का इतंजार करते हैं और पत्थरबाजी करते हैं? रामनवमी के जुलूस पर पत्थरबाजी, दुर्गा विसर्जन करने जा रहे लोगों पर पत्थरबाजी, सैनिकों पर पत्थरबाजी, अपराधियों और आतंकियों को बचाने को लिए पत्थरबाजी…आखिर ऐसा भी क्या प्रेम है पत्थरों से?

आख़िर बवाल तब ही क्यों होता है जब गायों की चोरी करते हुए अपराधियों को कुछ हिन्दू गौरक्षक घेरकर पीटते हैं, या कभी-कभी पिटाई के कारण उनकी मौत हो जाती है? अगर मोदी इन गौरक्षकों को फोन करके गाय चोरी करनेवालों को पीटने कहता है, तो फिर इन समुदाय विशेष के लड़कों को पुलिस के ऊपर गाड़ी चढ़ाने के लिए कौन फोन करता है? उनको भी तो कहीं से फोन आता होगा उस हिसाब से?

जब गौरक्षक कानून हाथ में लेते हैं तो पूरा हिन्दू समाज असहिष्णु हो जाता है, फिर इन कट्टरपंथियों द्वारा पुलिस की हत्या पर क्या कहा जाए? जब गाय का मसला संवेदनशील और भावनात्मक है तो फिर एक ख़ास मज़हब के लोग बार-बार वही काम क्यों करते हैं जिससे भावनाएँ भड़कती हैं और दंगे तक होते हैं? क्या हिन्दू समाज को उकसा कर, अपने अल्पसंख्यक होने की बात कहकर मजहबी अपराधी अपने दुष्कृत्यों को अंजाम देते रहेंगे?

शायद हाँ, क्योंकि आपने ‘संघे शक्ति कलौयुगे’ या ‘संघे शक्ति युगे युगे’ की रट तो लगाई लेकिन देश की सबसे बड़ी आबादी होने के बावजूद उस संगठन की शक्ति को कहीं दिखा नहीं पाए। और मैं यह नहीं कह रहा कि आप दूसरे मजहबों के संस्थानों पर चढ़ाई कर दें या उनके जुलूसों पर पत्थर मारने लगें, क्योंकि उस स्थिति में आपराधिक मजहबी भीड़ और सर्वसमावेशी भाव से चलने वाले सनातनियों में कोई फर्क नहीं रह जाएगा।

मैं तो यह कह रहा हूँ कि जो उचित है, जहाँ सच में इंसाफ की दरकार है, जहाँ किसी हिन्दू को उसके हिन्दू होने के कारण एक भीड़ मार देती है, जहाँ 50 दिनों में दस जगह मंदिर और मूर्तियों को विखंडित कर दिया जाता है, जहाँ गायों को काट कर दंगे कराने की योजना बनाई जाती है, तब भी आप चुप कैसे रहते हैं? चुप और न्यूट्रल भी वही रहते हैं जिनके समुदाय का आतंकी होता है। हमारी, एक किस्म की, समस्या यह है कि हम अपने लोगों को कोसने में कोताही नहीं बरतते अगर वो अपराधी हो, और दूसरों के अपराध पर इंतजार करते हैं कि फलाँ आदमी ने ट्वीट क्यों नहीं किया।

फलाँ सेलिब्रिटी जब ऑर्गेज्म के लिए इक्वालिटी की बात करने में व्यस्त है तो उसे हिन्दू की भीड़ हत्या से क्षोभ नहीं होगा, चरमसुख ही मिलेगा। उनका अजेंडा तय है कि उन्हें कब बोलना है, कब चुप रहना है। वो अपने कैलेंडर के हिसाब से चलते हैं। हमारे जैसों की समस्या यह है कि हम उनका पीछा करने में लगे रहते हैं कि तुमने इस पर क्यों नहीं बोला। ये एक्शन नहीं, रिएक्शन है।

हिन्दुओं को यह सीखना होगा कि तुम्हारे ऊपर अगर एक पत्थर भी कोई फेंकता है तो कानून को अपना काम करने पर मजबूर तो करो ही, साथ ही हर माध्यम और स्तर से अपनी संगठन क्षमता दिखाते हुए नैरेटिव में इस बात को लाओ कि तुम्हें सिर्फ तुम्हारे धर्म के कारण परेशान किया जा रहा है। सिर्फ सरकार चुन लेने से धर्म की रक्षा नहीं होती, सत्ताधीशों की जीभ पर अंकित से लेकर ध्रुव तक के नामों को बिठाने की कवायद भी ज़रूरी है।

अगर तुम्हें लगता है कि अन्याय हो रहा है तो प्रतिकार करना सीखो। तुम्हारी लड़ाई वो 49 लोग क्यों लड़ेंगे जिनका अजेंडा ही तुम्हारी सरकार को कमजोर करना है। उनके पास लिखने और बोलने का सामर्थ्य है, क्या तुम्हारे पास वो सामर्थ्य नहीं? अगर है तो वो दिखता क्यों नहीं? क्यों तुम्हारे राम बेबस हो जाते हैं, क्यों कोई शिवलिंग पर पेशाब कर देता है, कैसे किसी दुर्गा की मूर्ति तोड़ दी जाती है और वही इस्लामी भीड़ तुम्हें खाना बाँट कर ठग लेती है?

क्या इतने भीरु हम इतिहास के किसी और मोड़ पर थे? सत्ता भी हमारी चुनी हुई लेकिन हम उनकी तरफ ताकते हैं जो घोषित रूप से हमारे विरोध में हैं! ये बेवकूफी हिन्दुओं में इस स्तर तक कैसे पाई जाती है कि अपना आंदोलन खड़ा करने की जगह हम विरोधियों से पूछते हैं कि भाई, तुम हमारे लिए क्यों नहीं लड़ रहे? ये क्या बात हुई? उन्हें भी घसीटो, लेकिन अपनी बात भी स्वतंत्र रूप से रखो।

वो जहाँ पाँच ट्वीट करें, पोस्ट करें तो हमें दस करना चाहिए जिसमें पाँच उनके फर्जीवाड़े, उनकी हिपोक्रिसी को ललकारते हुए हो, और पाँच अपनी बात कहने के लिए। अगर ऐसा करने की आदत हम नहीं डालेंगे तो मंगरू को समुदाय विशेष वाला, उसके घर के बाहर छुरा मार कर मार डालेगा, तुम जब अपने पिता की अंत्येष्टि के बाद घाट से घर तक भजन-कीर्तन करते लौटोगे तो मस्जिदों की छत से तुम पर पत्थर फेंके जाएँगे।

इसलिए जगना ज़रूरी है क्योंकि हमारी लड़ाई कोई और नहीं लड़ेगा। हमारी लड़ाई दूसरों से नहीं है, हमारी लड़ाई इस बात को लेकर है कि वैचारिक दोगलापन नैरेटिव से बाहर जाए और हेट क्राइम पर चर्चा मजहब और धर्म से परे हो कर हो। क्योंकि दो महीने में अगर चार घटनाएँ ‘जय श्री राम’ को लेकर वास्तव में हुईं तो दस ऐसी हैं, जहाँ ख़ास मजहब वालों ने झूठ बोला कि उनसे जय श्री राम कहने को बोला गया।

इसलिए अपने आप को तैयार रखें तथ्यों के साथ। इंटरनेट सबके पास है, इस्तेमाल करें। हमें हर ऐसी घटना पर अपनी आवाज उठानी होगी। हर माध्यम पर साथ हो कर सारे ट्रेंड हथियाने होंगे, हर स्तर पर हमें अपने ख़िलाफ़, अपने धर्म को ख़िलाफ़ हो रहे हमलों पर मुखर होना पड़ेगा। वो 49 तुम्हारे लिए कभी चिट्ठी नहीं लिखेंगे क्योंकि वो बिके हुए लोग हैं।

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अजीत भारती
अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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