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कष्टभंजनदेव हनुमानजी के स्वरूप, ‘किंग ऑफ सालंगपुर’ और कॉपीराइट विवाद: जानें क्या है पूरा मामला, क्यों हो रहा है विरोध?

गुजरात के बोटाद जिले में स्थित प्रसिद्ध सालंगपुर धाम एक बार फिर धार्मिक और सामाजिक चर्चाओं का केंद्र बन गया है। कष्टभंजनदेव हनुमानजी महाराज मंदिर से जुड़े एक फैसले ने न केवल स्थानीय क्षेत्र बल्कि गुजरात के कई संतों, धार्मिक संगठनों और भक्तों के बीच भी बहस छेड़ दी है।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब यह जानकारी सामने आई कि ‘किंग ऑफ सालंगपुर’ के नाम से प्रसिद्ध विशाल हनुमान प्रतिमा, कष्टभंजनदेव हनुमानजी के अलग-अलग दिव्य स्वरूपों, विशेष वाघा-श्रृंगार और अन्य रचनात्मक प्रस्तुतियों के लिए कॉपीराइट और ट्रेडमार्क सुरक्षा ली गई है।

मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि यह कदम आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखने और डिजिटल दौर में बढ़ती धोखाधड़ी तथा गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए उठाया गया है। वहीं दूसरी ओर कई संत, ब्राह्मण, महामंडलेश्वर और हिंदू संगठन इसे भगवान के स्वरूपों से जुड़ी आस्था और परंपरा का विषय बता रहे हैं और इसका विरोध कर रहे हैं।

इसी कारण पिछले कुछ दिनों से सालंगपुर धाम कॉपीराइट, ट्रेडमार्क और धार्मिक अधिकारों को लेकर चर्चा में बना हुआ है। आखिर सालंगपुर धाम ने ऐसा क्या किया जिससे यह विवाद शुरू हुआ? मंदिर ट्रस्ट का पक्ष क्या है? विरोध करने वाले संतों और संगठनों की आपत्तियां क्या हैं? और इस पूरे मामले की सच्चाई क्या है? — पढ़िए पूरी रिपोर्ट।

सालंगपुर धाम ने कौन सी ऐसी घोषणा की जिससे खड़ा हुआ विवाद?

विवाद की शुरुआत 12 जून 2026 को हुई। इस दिन सालंगपुर धाम की ओर से घोषणा की गई कि श्री कष्टभंजनदेव हनुमानजी महाराज के विभिन्न दिव्य स्वरूपों, ‘किंग ऑफ सालंगपुर’ के नाम से प्रसिद्ध विशाल प्रतिमा, विशेष वाघा-श्रृंगार और कुछ अन्य रचनात्मक प्रस्तुतियों के लिए कॉपीराइट और ट्रेडमार्क से जुड़े प्रमाणपत्र प्राप्त किए गए हैं।

इसके बाद इन प्रमाणपत्रों को हनुमानजी महाराज के पवित्र चरणों में समर्पित किया गया। मंदिर के कोठारी विवेकसागर स्वामी ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को आधुनिक बौद्धिक संपदा कानूनों के माध्यम से सुरक्षित रखना समय की आवश्यकता बन गया है।

मंदिर प्रशासन के अनुसार, यह केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि भविष्य में मंदिर की अलग पहचान और उससे जुड़ी आध्यात्मिक संपत्ति के संरक्षण की दिशा में उठाया गया कदम है। घोषणा सामने आते ही सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएँ शुरू हो गईं।

कई लोगों ने इसे मंदिर की विशेष पहचान को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी फैसला बताया, जबकि दूसरी ओर कुछ लोगों के बीच यह सवाल उठने लगा कि क्या अब भगवान के स्वरूपों पर भी कॉपीराइट या ट्रेडमार्क लिया जा सकता है? इसी सवाल ने पूरे विवाद को जन्म दिया।

मंदिर ट्रस्ट को यह कदम उठाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

सालंगपुर धाम के प्रशासन का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में मंदिर के नाम पर बड़ी संख्या में ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले सामने आए थे। ट्रस्ट के अनुसार, कई फर्जी वेबसाइट, सोशल मीडिया पेज और अन्य डिजिटल माध्यमों के जरिए सालंगपुर के नाम पर नकली रूम बुकिंग, ऑनलाइन प्रसाद, दान और विभिन्न सेवाओं के नाम पर श्रद्धालुओं के साथ ठगी की जा रही थी।

मंदिर का कहना है कि ऐसे मामलों में केवल सामान्य शिकायतें काफी साबित नहीं हो रही थीं। कई बार धोखाधड़ी करने वाले लोग मंदिर की तस्वीरों, प्रतिमाओं, श्रृंगार और पहचान का इस्तेमाल करके श्रद्धालुओं को गुमराह कर रहे थे। ऐसी स्थिति में कानूनी कार्रवाई को अधिक प्रभावी बनाने और साइबर अपराधियों के खिलाफ तेजी से कदम उठाने के लिए कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपी राइट्स) का कानूनी संरक्षण लेना जरूरी हो गया था।

मंदिर ट्रस्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि फिलहाल सालंगपुर धाम की ओर से कोई ऑनलाइन रूम बुकिंग सेवा या घर बैठे प्रसाद भेजने की व्यवस्था नहीं चलाई जा रही है। श्रद्धालुओं को केवल आधिकारिक माध्यमों पर ही भरोसा करना चाहिए और किसी भी संदिग्ध व्यक्ति या वेबसाइट को पैसे देने से पहले पूरी सावधानी बरतनी चाहिए।

विरोध प्रदर्शन की शुरुआत कहाँ से हुई?

घोषणा के बाद सबसे पहले विरोध की आवाज अलग-अलग संतों और सनातन संगठनों की ओर से उठी। सनातन संत समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्योतिर्नाथ महाराज ने इस मुद्दे पर आपत्ति जताते हुए सवाल उठाया कि अगर आज हनुमानजी के स्वरूपों से कॉपीराइट और ट्रेडमार्क जोड़ा जा सकता है, तो कल किसी अन्य देवी-देवता को लेकर भी इसी तरह के दावे किए जा सकते हैं।

उनके अनुसार, सनातन परंपरा में भगवान को इस तरह कानूनी स्वामित्व से जोड़ना उचित नहीं माना जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म की परंपरा में भगवान सभी के हैं और उन्हें किसी कानूनी सीमा या अधिकार में बांधने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। ज्योतिर्नाथ महाराज ने इस मामले में जरूरत पड़ने पर कानूनी लड़ाई लड़ने की भी बात कही।

विरोध करने वालों में एक और प्रमुख नाम मेंदरडा के खाखीमढ़ी रामजी मंदिर के गादीपति सुखरामदास बापु का रहा। उन्होंने कहा कि भगवान कभी किसी के कॉपीराइट नहीं हो सकते। उनके अनुसार, भगवान पूरे समाज के हैं और उन्हें किसी एक संस्था या ट्रस्ट से विशेष रूप से जोड़ने की कोशिश दुखद है।

ब्राह्मण संगठन भी संघर्ष में हुए शामिल

विवाद केवल संतों तक सीमित नहीं रहा। वर्ल्ड ब्राह्मण ऑर्गेनाइजेशन और समस्त गुजरात ब्रह्म समाज सहित कई संगठनों ने भी इस मुद्दे पर विरोध दर्ज कराया। वर्ल्ड ब्राह्मण ऑर्गेनाइजेशन के चेयरमैन, जो कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता भी हैं, हेमांग रावल ने कहा कि भगवान पर हर भक्त का अधिकार है, किसी एक ट्रस्ट का नहीं।

उनके अनुसार, हनुमानजी, भगवान राम और गणपति जैसे देवी-देवता किसी एक संप्रदाय की कॉर्पोरेट संपत्ति नहीं बन सकते और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और 25 नागरिकों को अपने धर्म और आस्था का पालन करने का अधिकार देते हैं। ऐसे में भगवान के नाम या स्वरूपों को कॉपीराइट और ट्रेडमार्क जैसी व्यवस्थाओं से जोड़ना कई सवाल खड़े करता है।

उन्होंने कहा कि इस मामले को लेकर चैरिटी कमिश्नर के सामने प्रस्तुति देने के साथ जरूरत पड़ने पर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक भी जाया जा सकता है। ब्रह्म समाज के नेताओं अश्विन त्रिवेदी और हेमांग रावल ने यह भी तर्क दिया कि ‘सालंगपुर’ एक गाँव का नाम है और ‘कष्टभंजनदेव’ हनुमानजी के पारंपरिक नामों में से एक है। ऐसे में इन शब्दों और प्रतीकों के साथ ट्रेडमार्क जोड़ने का मुद्दा भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

महामंडलेश्वर और अन्य संतों ने क्या कहा?

विवाद बढ़ने के साथ अन्य संत और महामंडलेश्वर भी इस मामले में शामिल हो गए। महामंडलेश्वर अखिलेश्वरदासजी महाराज ने कहा कि भगवान किसी एक संप्रदाय, ट्रस्ट या संस्था के नहीं होते, बल्कि पूरे समाज के होते हैं। कई अन्य धार्मिक नेताओं ने भी इसी तरह की भावना व्यक्त की।

उन्होंने भी कहा कि सनातन परंपरा में भगवान को सभी का माना जाता है और आस्था के केंद्रों पर किसी प्रकार का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। हलाँकि सभी संतों, धार्मिक नेताओं और विरोध करने वालों के शब्द अलग-अलग थे, लेकिन उनका मुख्य तर्क एक ही था कि भगवान पर किसी का विशेष अधिकार नहीं हो सकता।

ट्रस्ट ने क्या स्पष्टीकरण दिया?

विवाद बढ़ने के बाद सालंगपुर धाम के प्रशासन ने इस मामले पर विस्तार से अपनी सफाई भी दी। ट्रस्ट ने कहा कि पूरे विवाद में सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि लोग इसे ऐसे देख रहे हैं जैसे मंदिर भगवान पर मालिकाना हक का दावा कर रहा हो। ट्रस्ट के अनुसार, उनका ऐसा कोई उद्देश्य नहीं है और हनुमानजी महाराज पूरी सृष्टि के हैं और हमेशा सभी के रहेंगे।

ट्रस्ट का कहना है कि कॉपीराइट और ट्रेडमार्क का संबंध भगवान से नहीं, बल्कि मंदिर की अलग पहचान, विशेष प्रतिमाओं, रचनात्मक प्रस्तुतियों, वाघा-श्रृंगार और उनसे जुड़ी दृश्य अभिव्यक्तियों से है। इन कदमों का मुख्य उद्देश्य श्रद्धालुओं को धोखाधड़ी से बचाना और मंदिर की पहचान के गलत इस्तेमाल को रोकना है।

क्या है विवाद का केंद्र?

अगर इस पूरे विवाद को ध्यान से देखा जाए तो साफ समझ आता है कि यहाँ दो अलग-अलग दृष्टिकोण आमने-सामने हैं। एक तरफ मंदिर ट्रस्ट का मानना है कि आज के समय में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए कानूनी उपायों का इस्तेमाल जरूरी हो गया है।

वहीं दूसरी तरफ विरोध करने वालों का कहना है कि भगवान के स्वरूपों और धार्मिक प्रतीकों को कॉपीराइट और ट्रेडमार्क जैसी व्यवस्थाओं से जोड़ने पर आस्था और परंपरा से जुड़े सवाल खड़े होते हैं। फिलहाल इस विवाद का मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि मंदिर ट्रस्ट भगवान पर मालिकाना हक का दावा कर रहा है या नहीं।

असली सवाल यह है कि कॉपीराइट और ट्रेडमार्क के दायरे में आने वाली बातों को लोग किस तरह समझते हैं और इसका उनकी धार्मिक भावनाओं पर क्या असर पड़ता है।

क्या है वर्तमान स्थिति?

फिलहाल इस विवाद को लेकर दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ अलग-अलग संत और संगठन विरोध दर्ज करा रहे हैं और कुछ मामलों में कानूनी लड़ाई तक जाने की चेतावनी भी दी जा रही है। वहीं दूसरी ओर सालंगपुर धाम का प्रशासन लगातार यह कह रहा है कि उनका उद्देश्य भगवान पर मालिकाना हक स्थापित करना नहीं है, बल्कि मंदिर की अलग पहचान और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को बनाए रखना है।

आने वाले दिनों में यह बहस केवल धार्मिक मंचों तक सीमित रहती है या फिर कानूनी स्तर तक पहुँचती है, इस पर सभी की नजर रहेगी। लेकिन एक बात तय है कि सालंगपुर धाम के इस फैसले ने कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, आस्था और धार्मिक विरासत के संरक्षण को लेकर एक बड़ी चर्चा शुरू कर दी है, जिसके आगे और बढ़ने की संभावना बनी हुई है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


कहीं च्यूइंगम पर रोक तो कहीं बच्चों के नामों पर बंदिशें, कई शहरों में तो मरना भी गैरकानूनी: जानिए कुछ ऐसे देशों के बारे में जिनके अजब गजब हैं कानून

दुनिया भर में कानून उस समाज की जरूरतों के हिसाब से बनाए जाते हैं जहाँ वे लागू होते हैं। जहाँ कुछ कानून, जैसे चोरी या हत्या जैसे अपराधों से जुड़े कानून, आम तौर पर हर जगह एक जैसे होते हैं, वहीं कुछ कानून या स्थानीय नियम किसी खास समस्या से निपटने के लिए भी हो सकते हैं। ऐसे नियम या कानून स्थानीय लोगों को तो बिल्कुल सही लग सकते हैं, लेकिन बाहरी लोग, जिन्हें इन कानूनों के पीछे के सामाजिक, ऐतिहासिक या सांस्कृतिक संदर्भ की जानकारी नहीं होती, उन्हें ये अजीब लग सकते हैं।

दुनिया भर के सात ऐसे नियम- कानून काफी अजीबोगरीब माने जाते हैं और ये समझ से परे हैं। ये अलग अलग देशों में लागू हैं।

सिंगापुर में च्यूइंगम पर प्रतिबंध

च्यूइंग गम एक समय सिंगापुर में बड़ी समस्या बन गई थी। इस चिपचिपी चीज को शरारती तत्वों ने सबवे दरवाजों के सेंसर, लॉक सिलेंडर के अंदर, मेलबॉक्स, चाबी के छेदों, लिफ्ट के बटन और एलिवेटर के बटन जैसी जगहों पर चिपकाना शुरू कर दिया था। इससे रखरखाव और सफाई का खर्चा बढ़ गया। सिंगापुर में 1987 में मास रैपिड ट्रांजिट (MRT) लोकल रेलवे सिस्टम शुरू हुआ। ये उस वक्त का सबसे बड़ा सार्वजनिक प्रोजेक्ट था, लेकिन च्यूइंगम की समस्या MRT तक भी पहुँच गई। शरारती तत्वों ने MRT ट्रेनों के दरवाजों के सेंसर पर च्यूइंगम चिपकाना शुरू कर दिया, जिससे दरवाजे ठीक से काम नहीं कर पाते थे और ट्रेन सेवाओं में रुकावट आती थी।

उस समय सिंगापुर सरकार सिंगापुर को एक ग्लोबल ट्रेडिंग हब बनाने के लिए प्रतिबद्ध थी। सफाई और सार्वजनिक स्वच्छता पर खास ध्यान दे रही थी। सरकार ने 1992 में च्यूइंग गम के आयात, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून पास किया। कानून के अनुसार, देश में च्यूइंग गम रखना गैर-कानूनी नहीं है, लेकिन च्यूइंगम बेचना, आयात करना या वितरित करना गैर-कानूनी है।

इसलिए, सिंगापुर जाने वाला कोई व्यक्ति अपने निजी इस्तेमाल के लिए थोड़ी मात्रा में च्यूइंगम देश में ला सकता है, लेकिन गलत जगह पर गम थूकना गैर-कानूनी है। सिंगापुर सरकार ने 2004 में कुछ खास वजहों जैसे दांतों की देखभाल और निकोटीन वाली च्यूइंगम के लिए कानून में छूट दी। इन्हें डॉक्टर या रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट से खरीदा जा सकता है।

दुनिया के कुछ देशों में मरना गैर-कानूनी है, मौत को रोकने के लिए नियम तक बना दिेए गए हैं

सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन दुनिया में ऐसी जगहें हैं, जहाँ मरना मना है। मौत आम तौर पर हर जगह एक डरावनी और अनचाही घटना मानी जाती है, लेकिन कुछ इलाकों में तो मौत को रोकने के लिए नियम तक बना दिए गए हैं। ऐसे दुनिया के छह देश हैं, जहाँ कुछ खास शहरों में मरने के खिलाफ नियम हैं।

नॉर्वे का लॉन्गईयरब्येन शहर: स्वालबार्ड द्वीप समूह में बहुत सर्द और पर्माफ्रॉस्ट (हमेशा जमी रहने वाली जमीन) वाली जगह लॉन्गईयरब्येन है। ठंड की वजह से यहाँ लाशें सड़ती नहीं हैं। बीमारियों या संक्रमण के फैलने के खतरे को रोकने के लिए, स्वालबार्ड के गवर्नर ने अजीब नियम बना दिए हैं। नियम के अनुसार, जो लोग मर चुके हैं या लाइलाज बीमारी से जूझ रहे हैं, उन्हें दफनाने या इलाज के लिए नॉर्वे के दूसरे शहरों में जाना पड़ेगा। हालाँकि, अगर किसी की मौत शहर में हो जाती है, तो उसका अंतिम संस्कार वहीं किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए लाइसेंस और बहुत सारे कागजी काम की जरूरत होती है जिसमें महीनों लग सकते हैं।

1998 में यह साबित हो गया कि लाशों से संक्रमण फैल सकता है। दरअसल वैज्ञानिकों ने 80 साल पहले बर्फ में दफनाए गए सात लोगों के शव निकाले। ये सातों लोग 1918 की बड़ी महामारी के दौरान स्पेनिश फ्लू से मरे थे। हैरानी की बात यह है कि वैज्ञानिक सातों शवों से वायरस के जीवित नमूने निकालने में कामयाब रहे। इससे यह पुष्टि हुई कि जानलेवा बीमारियाँ पर्माफ्रॉस्ट में दफनाई गई लाशों में जीवित रह सकती हैं।

स्पेन का लानजारोन शहर लानजारोन के मेयर जोस रुबियो ने 1999 में शहर में मरने पर रोक लगा दी थी। इस रोक की वजह यह थी कि स्थानीय कब्रिस्तान अपनी क्षमता की सीमा तक भर चुका था।

फ्रांस के तीन शहरों में रोक दक्षिणी फ्रांस के तीन शहरों – ले लावांडू, सारपुरेंक्स और कुग्नॉक्स, में भी ऐसी ही रोक लगाई गई थी। 2000 में ले लावांडू के मेयर ने स्थानीय कब्रिस्तान में दफनाने के लिए जगह की कमी के कारण मरने पर रोक लगा दी। सारपुरेंक्स और कुग्नॉक्स शहरों ने भी 2007 और 2008 में ऐसे ही वजहों को देखते हुए मौत पर रोक लगा दी।

इटली का सेलिया शहर इटली के मध्ययुगीन गाँव सेलिया के मेयर ने 2015 में एक आदेश पारित किया, जिसके तहत गाँव में बीमार पड़ना या मरना आधिकारिक तौर पर गैर-कानूनी हो गया। यह कदम गाँव की बूढ़ी होती आबादी को बचाने के लिए उठाया गया था। मेयर डेविड जिकिनेला ने एक आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कहा गया था कि निवासियों को बीमार पड़ने की मनाही है, और उन्हें अपनी सेहत को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह सख्त कदम तब उठाया गया जब गाँव की आबादी 1960 में 1300 से घटकर 2015 में 537 रह गई थी। इसके अलावा बची हुई आबादी में से 60% लोग 65 साल से ज्यादा उम्र के थे।

ब्राजील का बिरिटिबा मिरिम: ब्राजील के बिरिटिबा मिरिम शहर के मेयर ने 2005 में एक सार्वजनिक बिल पेश किया, जिसमें निवासियों के लिए शहर में मरना गैर-कानूनी बना दिया गया, क्योंकि स्थानीय कब्रिस्तान भर चुका था। बिल में किसी सजा का प्रावधान नहीं था, लेकिन मेयर का मकसद मरने वाले लोगों के रिश्तेदारों पर जुर्माना लगाना और जरूरत पड़ने पर जेल भेजना था, ताकि कब्र के पत्थरों के लिए और जगह मिल सके।

जापान का इट्सुकुशिमा शहर: जापान का इट्सुकुशिमा शहर को मियाजिमा के नाम से भी जाना जाता है। शहर को काफी पवित्र माना जाता है, क्योंकि यहाँ कई धार्मिक स्थल और मंदिर हैं। इस जगह की पवित्रता बनाए रखने के लिए 19वीं सदी के आखिर में यहाँ बच्चे के जन्म और मृत्यु पर रोक लगा दी गई थी। इस द्वीप पर कोई कब्रिस्तान या अस्पताल नहीं है।

ऑस्ट्रेलिया में वोट न देना अपराध है

लोकतांत्रिक देशों में वोट देना नागरिकों का अधिकार माना जाता है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने एक कदम आगे बढ़कर वोट न देने को दंडनीय अपराध बना दिया। दूसरे शब्दों में, ऑस्ट्रेलिया में वोट देना सिर्फ़ एक अधिकार नहीं बल्कि एक कानूनी जिम्मेदारी है, जिसका उल्लंघन करने पर A$20 ($13, £10) तक का जुर्माना लग सकता है और कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है। यह 1924 में कानून में संशोधन के जरिए किया गया था।

इस कानून के पास होने के बाद ऑस्ट्रेलिया सबसे ज्यादा वोटिंग प्रतिशत वाले देशों में से एक बन गया। भले ही यह सजा जैसा लगे, लेकिन इस कानून को लोगों का समर्थन मिला हुआ है। लोगों को वोट देने में आसानी हो, इसके लिए अधिकारियों ने कई उपाय अपनाए हैं। जैसे- देश में चुनाव शनिवार को होते हैं। इस दिन ज्यादातर लोगों की छुट्टियाँ होती है। इसके अलावा कंपनियों के लिए यह जरूरी है कि वे चुनाव के दिन कर्मचारियों को सवेतन छुट्टी दें ताकि लोगों के पास वोट देने के लिए पर्याप्त समय हो।

बच्चों के नामों को मंजूरी देती है सरकार

दुनिया भर के कई देशों में बच्चों के नाम रखने से जुड़े कुछ नियम और कानून हैं। जहाँ कुछ देशों में बच्चों के नामों के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी माना जाता है, वहीं कुछ देश ऐसे हैं जहाँ सरकार चाहे तो बच्चों के नाम को अस्वीकार कर दे। कुछ देशों में खास नामों पर रोक है।

आइसलैंड: इस यूरोपीय देश में ‘नेशनल नेम एक्ट’ (1971, 2019 में संशोधित) के तहत लोगों का एक नेशनल रजिस्टर बना हुआ है। कानून के मुताबिक, बच्चों के नाम आइसलैंड की व्याकरण संबंधी परंपराओं के अनुसार होने चाहिए।

न्यूजीलैंड: इस देश में, ‘बर्थ्स, डेथ्स, मैरिजेज़ एंड रिलेशनशिप्स रजिस्ट्रेशन एक्ट 1995’ के तहत कुछ ऐसे नामों पर साफ तौर पर रोक है, जो अपमानजनक, शर्मनाक या बेवजह लंबे हों।

डेनमार्क: डेनमार्क में ‘पर्सनल नेम्स एक्ट’ (नेवनेलोवेन, 2003) के तहत नाम चुनने पर पाबंदियाँ लगी हुई हैं और करीब 7000 नामों को मंजूरी दी गई है, जिसमें से ही नाम रखा जा सकता है।

जर्मनी: जर्मनी का ‘सिविल स्टेटस एक्ट’ (पर्सनेंस्टैंड्सगेसेट्ज़) और ‘स्टैंडेसाम्ट’ (रजिस्ट्रार ऑफिस) के तहत नाम मंजूर करने के नियम कानूनी रूप से ज रूरी हैं। जर्मनी में बच्चों के नाम उस इलाके के ‘वाइटल स्टैटिस्टिक्स’ ऑफिस (स्टैंडेसाम्ट) से मंज़ूर होने चाहिए जहाँ बच्चे का जन्म हुआ हो। नाम से बच्चे के लिंग का पता चलना चाहिए, और नाम ऐसा नहीं होना चाहिए जो पारंपरिक रूप से सरनेम (उपनाम) के तौर पर इस्तेमाल होता हो।

फिनलैंड: ‘नेम्स एक्ट 1985’ के मुताबिक, फिनलैंड के सभी नागरिकों के फर्स्ट नाम ज्यादा से ज्यादा चार अक्षर वाले होने चाहिए। जिन लोगों का कोई ‘फर्स्ट नेम’ नहीं है, उन्हें फिनलैंड के नेशनल पॉपुलेशन डेटाबेस में नाम दर्ज कराते समय एक नाम रखना जरूरी है। इसके अलावा कानून के तहत नवजात बच्चों के माता-पिता के लिए जरूरी है कि वे अपने बच्चों का नाम रखें और जन्म के दो महीने के भीतर पॉपुलेशन रजिस्ट्री को इसकी जानकारी दें।

इस मामले में भारत माता-पिता को अपने बच्चों का नाम अपनी पसंद के अनुसार रखने की पूरी आजादी देता है। बच्चों के नाम पर पाबंदी लगाने वाला कानून भारतीयों के लिए तो कल्पना से परे है।

कबूतरों को दाना खिलाने पर रोक

किसी भी इलाके में कबूतरों की बढ़ती आबादी एक बड़ी समस्या हो सकती है, और वेनिस ने इसका समाधान ढूंढ लिया है। इटली के इस तैरते हुए शहर की सिटी काउंसिल ने कबूतरों की आबादी को तेजी से बढ़ने से रोकने के लिए उन्हें दाना खिलाने पर रोक लगाने वाला एक म्युनिसिपल नियम पास किया। शुरू में यह रोक ऐतिहासिक स्मारकों वाले इलाकों में लागू थी, लेकिन 2008 में इसे पूरे शहर में लागू कर दिया गया।

इस रोक से पहले सेंट मार्क्स स्क्वायर पर कबूतरों को दाना खिलाना पर्यटकों की एक आम गतिविधि हुआ करती थी। इस प्रतिबंध के पीछे कारण यह था कि कबूतरों की बीट से स्मारकों के संगमरमर को नुकसान पहुँचता था और इससे सफाई व सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ पैदा होती थीं। स्थानीय प्रशासन इस नियम को लागू करता है और इसका उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना लगाया जाता है।

महाराष्ट्र के मुंबई में भी हाई कोर्ट के आदेश के बाद बीएमसी ने ऐसा ही प्रतिबंध लगाया था। इस फैसले के कारण दादर कबूतरखाना बंद हो गया। यह करीब 100 साल पुराना था और मुंबई में कबूतरों को दाना खिलाने की एक प्रमुख जगह माना जाता था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के लिए गंभीर खतरा बताया था।

ग्रीस में हाई हील्स नहीं

जो यात्री आकर्षक स्मारकों या प्राचीन पुरातात्विक स्थलों के सामने हाई हील्स पहनकर पोज देना पसंद करते हैं, उनके लिए अपनी शानदार वास्तुकला के बावजूद ग्रीस सही जगह नहीं है। दरअसल यहाँ एक नियम है, जो ऐतिहासिक स्थलों पर हाई हील्स पहनने पर प्रतिबंध लगाता है।

2009 में ग्रीक सरकार ने एक सार्वजनिक निर्देश जारी किया, जिसमें पर्यटकों को ऐसे जूते पहनकर ऐतिहासिक स्थलों पर जाने से रोका गया, जिनसे प्राचीन संगमरमर को नुकसान पहुँच सकता है। यह प्रतिबंध तब लगाया गया जब विशेषज्ञों ने कहा कि नुकीली और पतली हील्स वाले जूते ऐतिहासिक स्थलों के फर्श को नुकसान पहुँचा सकते हैं। इन्हें आसानी से ठीक नहीं किया जा सकता। नियम तोड़ने वाले पर्यटकों के लिए €900 तक के भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया था।

कई देशों में खास कपड़े पहनने पर प्रतिबंध

हालाँकि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में कैमोफ्लाज प्रिंट यानी सेना की तरह के कपड़े पहनना बिल्कुल सामान्य बात है, लेकिन कैरिबियन क्षेत्र यानी अफ्रीका, एशिया और मध्य पूर्व के कुछ देशों में आम नागरिकों के लिए कैमोफ्लाज प्रिंट वाले कपड़े पहनने पर प्रतिबंध है। दुनिया भर में दो दर्जन से ज्यादा ऐसे देश हैं, जहाँ इस तरह के प्रतिबंध लगे हुए हैं। एंटीगुआ और बारबुडा, बारबाडोस, बहामास, डोमिनिका, ग्रेनाडा, सऊदी अरब, घाना, नाइजीरिया और फिलीपींस में इससे जुड़ा कानून हैं, जो आम नागरिकों के लिए कैमोफ्लाज कपड़ों पर प्रतिबंध लगाते हैं।

इन कानूनों का उल्लंघन करने पर सामान जब्त किया जा सकता है, भारी जुर्माना लगाया जा सकता है या गिरफ्तारी भी हो सकती है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

FIFA विश्व कप की पहली महान रात्रि: ऑरान्जे बनाम उगते सूरज के योद्धा

विश्व कप के इस नवप्रभात ने अपने साथ कई रोचक कथाएँ लेकर आगाज़ किया है। भारतीय समयानुसार रविवार की सुबह तक कुल चार मुकाबले खेले जा चुके हैं और उनमें से एक ने इतिहास के पन्नों पर अपना नाम अंकित करा लिया।

चार वर्ष पहले अपने ही घर में आयोजित विश्व कप में बिना एक भी अंक अर्जित किए विदा हो जाने वाला कतर इस बार एक बदले हुए आत्मविश्वास के साथ मैदान पर उतरा। ग्रुप बी के अपने प्रथम मुकाबले में उसका सामना यूरोप की सुदृढ़ और अनुशासित टीम स्विट्जरलैंड से था। अधिकांश विशेषज्ञों की दृष्टि में स्विस टीम इस मुकाबले की प्रबल दावेदार थी, किंतु फुटबॉल बार-बार यह स्मरण कराता है कि भविष्यवाणियाँ घास के मैदान पर नहीं, खिलाड़ियों के पैरों से लिखी जाती हैं।

नब्बे मिनट तक चले इस संघर्ष में स्विट्जरलैंड अधिकांश समय बढ़त बनाए रखने में सफल रहा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कतर के हिस्से एक और निराशाजनक हार लिखी जा चुकी हो। किंतु अंतिम क्षणों में आया वह गोल केवल स्कोरबोर्ड पर अंकित एक संख्या नहीं था; वह कतर के फुटबॉल इतिहास में अंकित होने वाला एक मील का पत्थर था।

स्कोर 1-1 हुआ और उसी के साथ कतर ने फीफा विश्व कप के इतिहास में पहली बार एक अंक अर्जित कर लिया। ह्यूस्टन में उपस्थित दर्शकों की गर्जना ने उस क्षण को और भी स्मरणीय बना दिया।

वैसे भी कतर के मुख्य प्रशिक्षक जुलेन लोपेतेगुई ने मुकाबले से पूर्व स्पष्ट शब्दों में कहा था, “हम यहाँ केवल उपस्थिति दर्ज कराने नहीं आए हैं।”

ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी टीम ने अपने प्रदर्शन से उस कथन को सार्थक सिद्ध करने की दिशा में पहला कदम बढ़ा दिया है।

वहीं बोस्टन स्टेडियम में खेले गए ग्रुप सी के मुकाबले में स्कॉटलैंड ने मेक्गीन के गोल के साथ हैती को 1-0 से मात देकर अपने ग्रुप में जरूरी तीन अंक लिए।

वैंकूवर में ग्रुप डी के मुकाबले में वैश्विक रैंकिंग में तीसवें स्थान पर स्थित ऑस्ट्रेलिया ने तेईसवीं रैंक की तुर्की को 2-0 धो डाला। अरदा गुलेर, काल्हानोग्लू, डेमीराल, यिल्दीज़ व यिल्माज़ जैसे सितारा खिलाड़ियों से सजी तुर्की की टीम को ऑस्ट्रेलिया ने सधे हुए खेल से मैच में पाँव जमाने ही नहीं दिए।

वहीं ग्रुप स्टेज के जिस मैच का सभी को इंतजार था वह रविवार सुबह साढ़े पांच बजे न्यूयॉर्क के न्यू जर्सी स्टेडियम में खेला गया। ब्राजील का मुकाबला मोरक्को से था। ब्राजील ने मैच की शुरुआत मिडफील्ड में कासेमीरो व गुईमराएज़ को रख 4-2-3-1 की फॉर्मेशन के साथ की। मोरक्को ने हालाँकि मैच के इक्कीसवें मिनट में इस्माइल साईबारी के गोल के साथ ब्राजील समेत संपूर्ण स्टेडियम को झकझोर दिया था। साईबारी के गोल ने मोरक्को के दर्शकों में खुशी की लहर पैदा कर दी थी।

लेकिन मोरक्को की यह खुशी ज्यादा देर बनी न रह सकी। ठीक ग्यारह मिनट पश्चात ही मैच के बत्तीसवें मिनट में ब्राजील के स्टार लेफ्ट विंगर विनीसियस जूनियर लगभग हाफ-लाइन से गेंद को अकेले ही लेकर मोरक्को के गोल पोस्ट की ओर बढ़े। मोरक्को के तीन डिफेंडरों को छका कर उन्होंने गोलपोस्ट की दिशा में एक राइट फुटर किक लिया जिसका गोलकीपर बोनू के पास कोई जवाब नहीं था। स्कोर हो गया था 1-1, जो फाइनल व्हिस्ल बजने तक यही रहा।

विश्व कप का हर संस्करण खेलप्रेमियों को कई खूबसूरत कहानियाँ व कुछ बेहतरीन खिलाड़ी देता है, जो अपने खेल से सभी का दिल जीत लेते हैं। ऐसे ही इस विश्व कप में वो एक खिलाड़ी होंगे मोरक्को के अठारह वर्षीय मिडफील्डर अयूब बोउदादी। सुबह खेले गए इस मुकाबले में अयूब बोउदादी ने सितारों से सजी ब्राजीली मिडफील्ड को चोक कर के रख दिया। उन्होंने विपक्षी टीम के हर हमलों को अपने गोलपोस्ट तक पहुँचने ही न दिया।

कासेमीरो व गुईमराएज़ जैसे अनुभवी मिडफील्डरों की अयूब बोउदादी ने एक न चलने दी। अगर आपने यह मैच नहीं भी देखा तो इस मैच की हाईलाइट जरूर देखिएगा; ब्राजील के खिलाफ अठारह वर्षीय अयूब बोउदादी की मास्टरक्लास के लिए।

अब आगे ग्रुप ई के मुकाबले में ह्यूस्टन स्टेडियम में एक ओर होंगे फुटबॉल जगत के सूरमा जर्मन खिलाड़ी तो वहीं दूसरी ओर होंगे फुटबॉल विश्व कप के इतिहास में जनसंख्या के आधार पर विश्व कप के लिए क्वालीफाई करने वाले सबसे छोटे देश कुराकाओ के कैरेबियन लड़ाके। जर्मन टीम अपने पिछले पाँचों मैच जीत कर बेहतरीन फॉर्म के साथ टूर्नामेंट में अपने अभियान की शुरुआत करेगी।

वहीं कुराकाओ पिछले पाँच मैचों में तीन हार, एक ड्रॉ व एक जीत के साथ कुछ खास फॉर्म में नहीं है परन्तु विश्व कप में अपने पर्दापण को वो कैरेबियन अंदाज में एक जश्न की भांति ले रहे हैं और हर एक पल का आनंद ले रहे हैं। विश्व कप के इस संस्करण के सबसे युवा कोच जूलियन नागेल्समान की अटैकिंग फिलॉस्फी के साथ खेलते हुए निश्चित तौर पर जर्मन टीम विश्व कप के पिछले दो संस्करणों में अपने बेहद निराशाजनक प्रदर्शन को भुला कर अपने समर्थकों का दिल जीतना चाहेंगे। इस मैच में आपको अटैकिंग फुटबॉल देखने को मिलेगी। इस मैच को आप रविवार रात भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे देख सकेंगे।

और अब दृष्टि टिकती है उस मुकाबले पर जिसकी प्रतीक्षा केवल डच और जापानी समर्थक ही नहीं, बल्कि विश्व फुटबॉल का प्रत्येक रसिक कर रहा है। भारतीय समयानुसार रात ठीक डेढ़ बजे डल्लास के मैदान पर दो ऐसी परंपराएँ आमने-सामने होंगी, जिन्होंने पिछले एक दशक में अपने खेल से दुनिया को बार-बार चकित किया है।

एक ओर होंगे नीदरलैंड्स के ‘ऑरान्जे’, विश्व फुटबॉल का वह महान अपूर्ण अध्याय, जिसने प्रतिभा, सौंदर्य और सामूहिकता से खेल के इतिहास को समृद्ध तो किया, परंतु विश्व कप की स्वर्णिम ट्रॉफी आज तक उसके हाथों की पहुँच से कुछ इंच दूर ही रही। सन् 1994 के बाद से विश्व कप के ग्रुप चरण में पराजय का स्वाद न चखने वाली यह टीम एक ऐसी विरासत की वाहक है, जिसने टोटल फुटबॉल जैसी क्रांतिकारी अवधारणा को जन्म दिया और पीढ़ियों तक खेल की दिशा बदल दी। किंतु इतिहास का एक निर्मम व्यंग्य भी उनके साथ जुड़ा है, विश्व कप फाइनल तक पहुँचने के बाद सर्वाधिक बार उपविजेता रहने का।

दूसरी ओर होंगे जापान के ‘समुराई ब्लूज़’; एशियाई फुटबॉल के उस अनुशासित और अथक योद्धा दल की संज्ञा, जिसने पिछले कुछ वर्षों में स्वयं को केवल एक प्रतिभागी नहीं, बल्कि एक वास्तविक दावेदार के रूप में स्थापित किया है। विश्व कप क्वालीफाइंग अभियान में चौवन गोल दागना और मात्र तीन गोल स्वीकार करना किसी संयोग का परिणाम नहीं होता। यह उस संरचना, अनुशासन और दीर्घकालिक योजना का प्रतिफल है, जिसे जापान ने वर्षों की साधना से निर्मित किया है।

और यदि किसी को अब भी जापान की क्षमता पर संदेह हो, तो उसे पिछले विश्व कप की स्मृतियों में लौट जाना चाहिए, जहाँ इसी टीम ने समूह चरण में जर्मनी और स्पेन जैसी यूरोपीय महाशक्तियों को पराजित कर पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया था। इसीलिए जापान के विरुद्ध मैदान पर उतरने वाली कोई भी टीम यदि उन्हें हल्के में लेने की भूल करती है, तो उसका मूल्य अक्सर स्कोरबोर्ड पर चुकाना पड़ता है।

हाँ, दोनों दल इस महायुद्ध में अपनी पूर्ण शक्ति के साथ नहीं उतर रहे। अंतिम समय में लगी चोटों ने दोनों शिविरों से कुछ महत्वपूर्ण नाम छीन लिए हैं। आधुनिक फुटबॉल के निरंतर व्यस्त कैलेंडर का दुष्परिणाम इस विश्व कप में भी दिखाई दे रहा है, जहाँ कई टीमें अपने कुछ सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के बिना अभियान प्रारंभ करने को विवश हैं।

किन्तु विश्व कप का आकर्षण ही यही है। यहाँ केवल ग्यारह खिलाड़ियों की नहीं, विचारधाराओं की टक्कर होती है। एक ओर डच सौंदर्य और रचनात्मकता होगी, तो दूसरी ओर जापानी अनुशासन और अथक परिश्रम। और जब ऐसी दो धाराएँ एक ही मैदान पर मिलती हैं, तब परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है स्वयं वह दृश्य, जिसका साक्षी बनने का अवसर फुटबॉल प्रेमियों को प्राप्त होता है।

आगे सोमवार के दिन आइवरी कोस्ट का मुकाबला इक्वाडोर से, स्वीडन का मुकाबला ट्यूनीशिया से व कलात्मक खेल के लिए जाने जानी वाली स्पेन की टीम काबो वर्दे के खिलाफ अपने अभियान का आगाज़ करेंगे।

आगे भी ऐसी ही कहानियाँ जन्म लेंगी। कहीं कोई दिग्गज अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए संघर्ष करेगा, तो कहीं कोई अनजान चेहरा विश्व फुटबॉल के आकाश में नए नक्षत्र की भाँति उदित होगा। यही तो विश्व कप का आकर्षण है; नब्बे मिनटों में इतिहास बदल जाने का आकर्षण।

फिलहाल निगाहें टिकी हैं रविवार रात होने वाले मुकाबलों पर, जहाँ ‘ऑरान्जे’ का सामना ‘समुराई ब्लूज़’ से होगा और जर्मनी अपने अभियान का शुभारंभ करेगा। तब तक के लिए; फुटबॉल की बातों का यह सिलसिला यहीं विराम लेता है।

वीवा ला फुटबॉल।

साइबर ठगी के शिकार या बैंक खाते के पैसे हो गए फ्रीज? आपकी मदद करेगा मोदी सरकार का MRM पोर्टल: जानिए घर बैठे कैसे वापस पा सकेंगे अपनी रकम

अक्सर हम ऐसा सुनते हैं कि लोगों के मोबाइल पर एक कॉल आता है, जिसमें सामने वाला खुद को बैंक अधिकारी बताता है और KYC अपडेट करने के नाम पर आपसे कुछ जानकारी ले लेता है। कुछ ही मिनटों में आपके खाते से हजारों रुपए निकल जाते हैं।

घबराकर आप 1930 हेल्पलाइन पर शिकायत करते हैं और पुलिस की मदद से ठग के खाते में पहुँची रकम फ्रीज भी हो जाती है। लेकिन इसके बाद शुरू होती है लंबी प्रक्रिया। बैंक, पुलिस और कई बार अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कई लोगों को महीनों तक अपने पैसे का इंतजार करना पड़ता है।

ऐसे ही लाखों साइबर ठगी पीड़ितों की परेशानी को कम करने के लिए गृह मंत्रालय के अधीन इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल (MRM) शुरू किया है।

यह राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) का नया डिजिटल मॉड्यूल है, जिसके जरिए साइबर फ्रॉड के पीड़ित घर बैठे अपनी फ्रीज हुई रकम वापस पाने के लिए आवेदन कर सकेंगे।

आखिर MRM पोर्टल की जरूरत क्यों पड़ी?

भारत में डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ा है। UPI, नेट बैंकिंग और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन ने लोगों की जिंदगी आसान तो बनाई है, लेकिन इसके साथ साइबर अपराधों जैसी समस्या में भी जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है।

सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 2022 में साइबर सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं की संख्या करीब 10.29 लाख थी, जो 2024 में बढ़कर 22.68 लाख तक पहुँच गई। आज साइबर ठग केवल OTP फ्रॉड तक सीमित नहीं हैं।

बल्कि डिजिटल अरेस्ट, फर्जी निवेश योजनाएँ, पार्ट-टाइम जॉब स्कैम, KYC अपडेट और फेक कस्टमर केयर जैसे कई नए तरीकों से लोगों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि यदि किसी पीड़ित की रकम समय रहते फ्रीज भी हो जाए तो उसे वापस पाने की प्रक्रिया बेहद जटिल रहती थी। MRM इसी परेशानी को दूर करने के लिए लाया गया है।

क्या है मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल (MRM)?

मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल एक ऑनलाइन रिफंड सिस्टम है जिसे I4C ने विकसित किया है। इसका उद्देश्य साइबर ठगी के पीड़ितों को एक ऐसा प्लेटफॉर्म देना है जहाँ वे अपनी फ्रीज हुई रकम वापस पाने के लिए डिजिटल तरीके से आवेदन कर सकें।

पहले लोगों को बैंक शाखाओं, पुलिस कार्यालयों और अन्य विभागों के चक्कर लगाने पड़ते थे। कई मामलों में अदालत से आदेश लेने की जरूरत भी पड़ती थी। अब इस प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन कर दिया गया है ताकि पीड़ितों को कम परेशानी हो और रिफंड की प्रक्रिया तेज हो सके।

MRM पोर्टल का लाभ हर साइबर ठगी पीड़ित को नहीं मिलेगा। इसके लिए दो महत्वपूर्ण शर्तें पूरी होना जरूरी हैं। पहली यह कि पीड़ित ने ठगी का पता चलते ही 1930 हेल्पलाइन या NCRP पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई हो।

दूसरी यह कि ठगी की रकम अपराधी के बैंक खाते में ट्रेस होकर फ्रीज कर दी गई हो। यदि पैसा किसी दूसरे खाते में ट्रांसफर हो चुका है या निकाल लिया गया है, तो इस मॉड्यूल के जरिए रिफंड संभव नहीं होगा। इसलिए साइबर विशेषज्ञ हमेशा सलाह देते हैं कि फ्रॉड का पता चलते ही तुरंत शिकायत दर्ज करानी चाहिए।

MRM पोर्टल पर रिफंड के लिए आवेदन कैसे करें?

रिफंड पाने के लिए सबसे पहले पीड़ित को MRM पोर्टल पर जाना होगा और सिटीजन लॉगिन विकल्प पर क्लिक करना होगा। इसके बाद उसी मोबाइल नंबर से लॉगिन करना होगा जो NCRP शिकायत में दर्ज है।

OTP सत्यापन पूरा होने के बाद रिफंड का अनुरोध करें वाले सेक्शन में जाकर 14 अंकों वाली शिकायत ID दर्ज करनी होगी। इसके बाद पैन कार्ड की कॉपी, बैंक खाता संख्या और IFSC कोड जैसी जरूरी जानकारी भरनी होगी।

जिन मामलों में FIR और कोर्ट ऑर्डर की आवश्यकता है, वहाँ उनकी कॉपी भी अपलोड करनी होगी। आवेदन सबमिट करने के बाद पोर्टल एक यूनिक रिक्वेस्ट ID जारी करेगा, जिसकी शुरुआत ‘MR2026’ से होगी। इसी ID की मदद से आवेदक अपने रिफंड की स्थिति ऑनलाइन ट्रैक कर सकेगा।

संचार साथी ऐप भी कर रहा है बड़ी मदद

जहाँ MRM का उद्देश्य साइबर ठगी के बाद फंसी रकम वापस दिलाना है, वहीं सरकार का ‘संचार साथी’ प्लेटफॉर्म साइबर अपराध को रोकने और डिजिटल पहचान की सुरक्षा में मदद कर रहा है।

दूरसंचार विभाग द्वारा शुरू किए गए इस प्लेटफॉर्म के जरिए नागरिक अपना खोया या चोरी हुआ मोबाइल ब्लॉक कर सकते हैं, IMEI नंबर ट्रैक कर सकते हैं, संदिग्ध कॉल और मैसेज की शिकायत कर सकते हैं और मोबाइल की वैधता की जाँच कर सकते हैं।

सरकार के अनुसार इस पहल की मदद से लाखों संदिग्ध सिम कार्ड और IMEI नंबर ब्लॉक किए जा चुके हैं, जबकि लाखों मोबाइल फोन भी बरामद किए गए हैं।

साइबर ठगी का शिकार होने पर क्या करें?

अगर आपके साथ साइबर ठगी होती है तो घबराने की बजाय तुरंत कार्रवाई करना सबसे जरूरी है। सबसे पहले 1930 हेल्पलाइन पर कॉल करें या NCRP पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएँ।

अपने बैंक को तुरंत जानकारी दें ताकि ट्रांजैक्शन को ट्रैक किया जा सके। किसी अनजान व्यक्ति या एजेंट को रिफंड दिलाने के नाम पर पैसे न दें और केवल सरकारी पोर्टल का ही इस्तेमाल करें। जितनी जल्दी शिकायत दर्ज होगी, रकम फ्रीज होने और वापस मिलने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।

‘इनोवेट इन इंडिया’ का ग्लोबल विस्तार: जानिए फ्रांस में ‘Bharat Innovates 2026’ के आयोजन के पीछे क्या है मोदी सरकार का प्लान

साल 2047 तक ‘विकसित भारत’ के संकल्प को पूरा करने के लिए मोदी सरकार नवाचार पर लगातार जोर दे रही है। 2 लाख से अधिक स्टार्टअप्स, 21 लाख नौकरियाँ, एआई, डीपटेक, रिसर्च और Bharat Innovates 2026 जैसी पहल इस दिशा में मजबूत कदम है। इसी कड़ी में फ्रांस के नीस शहर में 14 से 16 जून तक ‘भारत इनोवेट्स 2026’ का आयोजन किया जा रहा है।

यह आयोजन इसलिए खास है क्योंकि यह भारत की डीप-टेक क्षमता को वैश्विक निवेशकों, उद्योगपतियों और राष्ट्रों के सामने प्रस्तुत करने वाला अब तक का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय मंच है, जो सॉफ्टवेयर आउटसोर्सिंग से आगे बढ़कर भारत की नई तकनीकी पहचान बना रहा है। मोदी सरकार भी इनोवेशन के दम विकास पर खासा जोर दे रही है। ऐसे में भारत इनोवेट्स 2026 केवल सिर्फ स्टार्टअप सम्मेलन नहीं, बल्कि भारत की डीप-टेक (Deep Tech) क्षमता को दुनिया के सामने लाने का मंच भी है।

क्या है भारत इनोवेट्स 2026

भारत इनोवेट्स 2026 भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की पहल है, जिसका उद्देश्य भारत के सर्वश्रेष्ठ डीप-टेक स्टार्टअप्स, शोध संस्थानों और इनोवेशन को वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करना है।

‘भारत इनोवेट्स’ का ध्यान 13 अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों पर केंद्रित है। इनमें एडवांस्ड कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर्स, अगली पीढ़ी के संचार माध्यम, एडवांस्ड मटीरियल्स और रेयर मिनरल्स, बायोटेक्नोलॉजी, अंतरिक्ष और रक्षा, मैन्युफैक्चरिंग और उद्योग 4.0 शामिल हैं। इसका लक्ष्य भारतीय युवाओं, निवेशकों और उद्योगों के बीच एक मजबूत सेतु का निर्माण करना तथा स्टार्टअप्स को कमर्शियलाइजेशन के अवसर देना है।

फ्रांस के कार्यक्रम में कौन-कौन पहुँचे

फ्रांस के दो दिवसीय सम्मेलन में 120 भारतीय डीप-टेक स्टार्टअप, 15 से अधिक IIT, IISc जैसे हाई एजुकेशन संस्थान, 500 से अधिक वैश्विक निवेशक, अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के CEO, वेंचर कैपिटल फर्म और रिसर्च इंस्टीट्यूट शामिल हो रहे हैं।

इस सम्मेलन के माध्यम से भारत की तकनीकी ताकत का वैश्विक प्रदर्शन होगा। अब तक भारत की पहचान IT सेवाओं और सॉफ्टवेयर आउटसोर्सिंग से जुड़ी रही है। भारत इनोवेटिव्स का लक्ष्य यह दिखाना है कि भारत अब सेमीकंडक्टर, स्पेस टेक, एआई, बायोटेक, एडवांस्ड कंप्यूटिंग, हेल्थ टेक, क्लीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भी दुनिया को नई दिशा दिखाने का माद्दा रखता है।

आज भारत की कई कंपनियाँ ऐसी तकनीकों पर काम कर रही हैं जो वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालने वाली हैं। भारतीय स्टार्टअप्स क्वांटम साइबरसिक्योरिटी प्लेटफॉर्मस (Quantum Cybersecurity Platforms) विकसित कर रहे हैं। एआई की मदद से औद्योगिक सुरक्षा सिस्टम विकसित कर रहे हैं।

एडवांस रोबॉटिक्स, बहुभाषावाली एआई मॉडल्स, क्लाइमेट तकनीक और अगली पीढ़ी के हेल्थकेयर सोल्यूशन पर काम कर रही हैं। ऐसी कई कंपनियाँ भारत की यूनिवर्सिटी और रिसर्च इंस्टीट्यूट्स से निकली हैं। इससे पता चलता है कि भारत में उच्च शिक्षा और इनोवेशन में संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं।

IIT Madras और IIT Bombay आज देश के प्रमुख DeepTech Incubation Hubs बन चुके हैं। इन दोनों संस्थानों से जुड़े 1000 से अधिक स्टार्टअप्स की संयुक्त वैल्यूएशन 9 अरब डॉलर से अधिक बताई जा रही है। इन कंपनियों ने हजारों रोजगार भी पैदा किए हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में अकेले IIT Madras ने 100 से अधिक डीपटेक स्टार्टअप्स को इनक्यूबेट किया।

विदेशी निवेश आकर्षित करने का मंच

भारत के कई स्टार्टअप्स के पास तकनीक है, लेकिन पूँजी और वैश्विक बाजार तक पहुँच काफी कम है। फ्रांस में हो रहा ‘भारत इनोवेस्ट 2026’ भारतीय कंपनियों को सीधे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और उद्योगों से जोड़ने के दिशा में भी अहम कदम है। भारत लगातार ‘मेक इन इंडिया’ पर जोर देता रहा है। अब इसका अगला कदम ‘इनोवेट इन इंडिया’ है।

मोदी सरकार लंबे समय से भारत को केवल मैन्युफैक्चरिंग हब नहीं, बल्कि नवाचार और अनुसंधान का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। सरकार की नीतियाँ देश में अनुकूल माहौल बना रही है। विश्वविद्यालय और शोध संस्थान प्रतिभा, प्रयोग और खोज को आगे ले जा रहे हैं। सब मिल कर काम करेंगे तभी ‘इनोवेशन क्रांति’ देश में संभव है। भारत इनोवेस्ट इसी रणनीति का हिस्सा है।

यह आयोजन ‘India-France Year of Innovation 2026’ के तहत हो रहा है। इसका मकसद दोनों देशों के बीच तकनीक, अनुसंधान, रक्षा और उद्योग क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना है।

भारत इनोवेट्स 2026 के माध्यम से भारत का लक्ष्य

  • भारतीय डीप-टेक स्टार्टअप्स को वैश्विक बाजार से जोड़ना।
  • विदेशी निवेश और तकनीकी साझेदारी आकर्षित करना।
  • भारतीय विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को वैश्विक नेटवर्क से जोड़ना।
  • तकनीकी हस्तांतरण को बढ़ावा देना, ताकि इनोवेशन को नई धार मिले।
  • भारतीय इनोवेशन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना और कॉमर्शियलाइजेशन करना है।

भारत इनोवेट्स 2026 को सफल बनाने के लिए सरकार ने क्या-क्या किया

राष्ट्रीय स्तर पर चयन प्रक्रिया- देशभर से हजारों आवेदनों के बीच चयन कर सर्वश्रेष्ठ डीप-टेक स्टार्टअप्स को चुना गया। इसके लिए वैज्ञानिकों और उद्योग विशेषज्ञों की तकनीकी निगरानी समिति बनाई गई थी, जिसकी अगुवाई भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार अजय कुमार सूद ने किया। IIT नेटवर्क को जोड़ा गया। IIT गाँधीनगर में राष्ट्रीय बेसकैम्प लगाया गया। IIT बॉम्बे में डीप-टेक प्री-समिट आयोजित किया गया।

इसके अलावा दूसरे देश के प्रमुख तकनीकी संस्थानों की भागीदारी सुनिश्चित की गई। स्टार्टअप्स की मॉनेटरिंग की गई और वैश्विक प्रस्तुति के लिए तैयार किया गया।

सरकार ने वैश्विक VC फंड्स, कॉर्पोरेट्स, विश्वविद्यालयों और रिसर्च संस्थानों को इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया ताकि भारतीय स्टार्टअप्स को फंडिंग, पायलट प्रोजेक्ट्स और व्यावसायिक अवसर मिल सकें।

फ्रांस के नीस शहर को इसलिए चुना गया क्योंकि यह यूरोपीय इनोवेशन, अनुसंधान और निवेश नेटवर्क से जुड़ा प्रमुख केंद्र माना जाता है। इससे भारतीय कंपनियों को यूरोपीय बाजार तक पहुँच बनाने में मदद मिल सकती है।

यदि G20 भारत की कूटनीतिक शक्ति का प्रदर्शन था, तो भारत इनोवेस्ट 2026 को मोदी सरकार की ‘तकनीकी डिप्लोमैसी’ का प्रदर्शन माना जा सकता है। इसका संदेश साफ है कि भारत अब केवल दुनिया का बाजार नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीकों का निर्माता और निर्यातक देश भी बनना चाहता है।

एक तरह से देखा जाए तो भारत इनोवेस्ट 2026, स्टार्टअप इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, राष्ट्रीय शिक्षा नीति और भारत की डीप-टेक रणनीति को एक वैश्विक मंच पर एक साथ प्रदर्शित करने वाला पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय आयोजन है।

‘गले लगाएँगे, ₹50 लाख देंगे… बस पुजारी को जेल भिजवाओ’: कर्नाटक में धर्मस्थल को बदनाम करने के पीछे था वामपंथी प्रकाश राज का भी हाथ? जानिए शिकायतकर्ता ने अब तक क्या बताया

कर्नाटक के धर्मस्थल को बदनाम करने के मामले में साजिशकर्ता के तौर पर अब अभिनेता प्रकाश राज का नाम सामने के बाद विवाद फिर गहरा गया है। कर्नाटक हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में मुख्य शिकायतकर्ता और पूर्व सफाईकर्मी CN चिन्नैया ने दावा किया है कि एक्टिविस्ट गिरीश मट्टन्नावर ने उसकी अभिनेता प्रकाश राज से फोन पर बात कराई थी और फोन पर ही प्रकाश राज ने उसे निर्देश दिए थे।

चिन्नैया के अनुसार, प्रकाश राज ने उससे अधिकारियों के सामने वही बातें कहने को कहा था, जो उसे पहले से समझाई गई थीं। यह दावा ऐसे समय सामने आया है, जब इसी मामले में SIT अपनी जाँच के बाद पहले ही कई शिकायतकर्ताओं और गवाहों पर झूठी जानकारी देकर जाँच को गुमराह करने का दावा कर चुकी है।

चिन्नैया ने अपनी याचिका में यह भी आरोप लगाया है कि धर्मस्थल और धर्माधिकारी (पुजारी) वीरेंद्र हेगड़े को निशाना बनाने के लिए एक बड़ी साजिश रची गई थी, जिसकी जाँच अभी जारी है।

प्रकाश राज का नाम कैसे आया?

हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में चिन्नैया ने दावा किया कि एक्टिविस्ट गिरीश मट्टन्नावर ने उसे अभिनेता प्रकाश राज से फोन पर बात कराई थी। उसके अनुसार, प्रकाश राज ने तमिल भाषा में उससे कहा था कि वह अधिकारियों और जाँच एजेंसियों के सामने वही बयान दे, जो मट्टन्नावर ने उसे समझाया है।

चिन्नैया ने यह भी आरोप लगाया कि धर्मस्थल के खिलाफ अभियान चलाने वाले कुछ लोग लगातार उसके संपर्क में थे और उसे विशेष तरीके से बयान देने के लिए तैयार किया जा रहा था।

200 करोड़ की साजिश, 50 लाख का लालच और दबाव के आरोप

चिन्नैया ने याचिका में दावा किया कि एक्टिविस्ट महेश शेट्टी तिमरोडी ने उसे बताया था कि पूरी योजना का बजट लगभग 200 करोड़ रुपए है। उसने आरोप लगाया कि धर्मस्थल धर्माधिकारी वीरेंद्र हेगड़े को जेल भेजने में सहयोग करने पर उसे 50 लाख रुपए देने का वादा किया गया था।

याचिका में यह भी कहा गया है कि कुछ लोगों को बाहरी स्रोतों से आर्थिक मदद मिल रही थी और धर्मस्थल की छवि खराब करने के लिए सुनियोजित अभियान चलाया जा रहा था।

चिन्नैया ने आरोप लगाया कि उससे यूट्यूब चैनलों पर बयान दिलवाए गए, कोर्ट में क्या कहना है इसकी ट्रेनिंग दी गई और कई बार मानसिक तथा शारीरिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी। उसने यह भी दावा किया कि जब उसने कथित झूठे आरोपों के साथ आगे बढ़ने में हिचक दिखाई तो उसे धमकियां दी गईं।

प्रकाश राज की सफाई

बता दें कि शिकायतकर्ता के इस दावे के बाद अभिनेता प्रकाश राज ने भी धर्मस्थल मामले से जुड़े अपने नाम को लेकर चल रही खबरों पर प्रतिक्रिया दी। सोशल मीडिया पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए, उन्होंने अफवाहों को निराधार बताया और कहा कि वे जल्द ही मीडिया से व्यक्तिगत रूप से बात करके सभी शंकाओं को दूर करेंगें।

कैसे शुरू हुआ धर्मस्थल मामला और जाँच में कैसे बदली पूरी कहानी?

पूरा मामला जून 2025 में सामने आया था, जब धर्मस्थल मंदिर के पूर्व सफाईकर्मी सीएन चिन्नैया ने दावा किया था कि उसे 1995 से 2014 के बीच महिलाओं, बच्चियों और अन्य लोगों के शव दफनाने के लिए मजबूर किया गया था।

उसने आरोप लगाया था कि धर्मस्थल के आसपास कई स्थानों पर सामूहिक कब्रें मौजूद हैं। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने जुलाई 2025 में SIT का गठन किया।

जाँच के दौरान चिन्नैया ने कई स्थानों की पहचान की, जहाँ खुदाई की गई। हालाँकि अधिकांश जगहों से उसके दावों की पुष्टि करने वाले सबूत नहीं मिले। जिस खोपड़ी और हड्डियों को उसने सबूत बताया था, उनकी जाँच में भी उसके आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी।

बाद में चिन्नैया ने अपने कई दावों से पीछे हटते हुए कहा कि वह कुछ लोगों के प्रभाव में था और उससे झूठे बयान दिलवाए गए थे। इसके बाद SIT ने करीब 3900 पन्नों की चार्जशीट दाखिल कर मुख्य शिकायतकर्ता समेत कई लोगों पर झूठी जानकारी देने, सबूत छिपाने और जाँच को गुमराह करने के आरोप लगाए।

SIT का दावा है कि धर्मस्थल में सामूहिक दफन की कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया या गलत तथ्यों के आधार पर प्रचारित किया गया। दिलचस्प बात यह रही कि जिन लोगों ने शुरुआत में FIR और जाँच की माँग की थी, बाद में उन्हीं में से कुछ लोग अदालत पहुँचकर FIR रद्द कराने की माँग करने लगे।

सिर्फ टेस्टिंग नहीं, डिजाइन से लेकर स्पेस हार्डवेयर निर्माण तक: अहमदाबाद में बनेगा स्पेस मैन्युफैक्चरिंग पार्क, जानें कैसे मिलेगी भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को रफ्तार

गुजरात सरकार ने अहमदाबाद के पास खोराज GIDC में विकसित किए जा रहे स्पेस मैन्युफैक्चरिंग पार्क के लिए कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज (CTF) स्थापित करने की घोषणा की है। इन सुविधाओं के विकास के लिए IN-SPACe की ओर से उपकरणों पर 100 करोड़ रुपए तक का योगदान दिया जाएगा।

वहीं निर्माण और संचालन का अतिरिक्त खर्च राज्य सरकार उठाएगी। यह घोषणा 10वें IN-SPACe इंडस्ट्री कनेक्ट कार्यक्रम के दौरान की गई।

प्रस्तावित कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज में क्लास 100,000 क्लीनरूम, थर्मो-वैक्यूम चैंबर, 12 टन तक पेलोड क्षमता वाली वाइब्रेशन टेस्टिंग सिस्टम, EMI/EMC टेस्टिंग सुविधाएँ, क्लाइमेट टेस्ट चैंबर, मास प्रॉपर्टीज मापन प्रणाली, मैग्नेटिक फील्ड टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थ ऑब्जर्वेशन ऑप्टिक्स के कैलिब्रेशन की सुविधाएँ शामिल होंगी।

राज्य सरकार ने खोराज में 50 एकड़ जमीन आवंटित की है, जिसे भविष्य में 100 एकड़ तक बढ़ाने की व्यवस्था भी रखी गई है। पहली नजर में यह खबर किसी नए औद्योगिक पार्क या सरकारी परियोजना की घोषणा जैसी लग सकती है।

लेकिन अगर इसके पीछे के व्यापक संदर्भ को समझने की कोशिश की जाए तो साफ होता है कि यह केवल एक नई सुविधा का निर्माण नहीं है, बल्कि भारत के तेजी से बढ़ते निजी स्पेस सेक्टर के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का प्रयास है।

वास्तव में इस परियोजना को समझने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि अंतरिक्ष में भेजी जाने वाली किसी भी चीज को धरती पर किस तरह तैयार किया जाता है।

यह कोई साधारण औद्योगिक पार्क नहीं, जानिए क्यों है खास

जब आम लोग सैटेलाइट के बारे में सोचते हैं तो उनके मन में अक्सर सिर्फ लॉन्चिंग का दृश्य आता है। रॉकेट तेज आवाज के साथ आसमान में उड़ता है और सैटेलाइट अंतरिक्ष में पहुँच जाता है। लेकिन हकीकत में लॉन्चिंग से पहले कई सालों तक तैयारी और परीक्षण की लंबी प्रक्रिया चलती है। अंतरिक्ष पृथ्वी जैसा वातावरण नहीं होता।

वहाँ हवा नहीं होती, दबाव नहीं होता, तापमान में बहुत ज्यादा बदलाव होता है और लॉन्चिंग के दौरान भारी कंपन का सामना करना पड़ता है। इसलिए किसी भी सैटेलाइट या दूसरे स्पेस हार्डवेयर को अंतरिक्ष में भेजने से पहले उसकी कई तरह की जाँच और टेस्ट किए जाते हैं। क्लीनरूम इसका सबसे आसान उदाहरण है।

सैटेलाइट में लगाए जाने वाले कैमरे, सेंसर और दूसरे बेहद संवेदनशील उपकरणों पर धूल का एक छोटा सा कण भी असर डाल सकता है। इसलिए ऐसे उपकरणों को सामान्य माहौल में नहीं बल्कि बेहद नियंत्रित और साफ वातावरण वाले क्लीनरूम में तैयार और असेंबल किया जाता है। थर्मो-वैक्यूम चैंबर का काम अंतरिक्ष जैसी परिस्थितियाँ बनाना होता है।

इसमें हवा निकालकर वैक्यूम तैयार किया जाता है और बहुत ज्यादा गर्म और बहुत ज्यादा ठंडी स्थितियाँ बनाकर यह जाँचा जाता है कि सैटेलाइट अंतरिक्ष में सही तरीके से काम कर पाएगा या नहीं। इसी तरह वाइब्रेशन टेस्टिंग भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। जब रॉकेट लॉन्च होता है तो उससे भारी कंपन और यांत्रिक दबाव पैदा होता है।

अगर सैटेलाइट या उसके अंदर लगे उपकरण इस कंपन को सहन नहीं कर पाए तो पूरा मिशन असफल हो सकता है। इसलिए पृथ्वी पर ही कृत्रिम रूप से ऐसी स्थिति बनाकर उसकी जाँच की जाती है। EMI/EMC टेस्टिंग के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि अलग-अलग इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम एक-दूसरे को प्रभावित किए बिना सही तरीके से काम कर सकें।

सरल शब्दों में कहें तो खोराज में बनने वाली ये सुविधाएँ ऐसी जगह होंगी जहाँ पृथ्वी पर ही अंतरिक्ष जैसी परिस्थितियां तैयार करके सैटेलाइट और दूसरी स्पेस सिस्टम्स की जांच और परीक्षण किए जाएँगे।

स्टार्टअप्स के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?

पिछले कुछ वर्षों में भारत में स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़ी है। रॉकेट तकनीक से लेकर सैटेलाइट मैन्युफैक्चरिंग, अर्थ ऑब्जर्वेशन, कम्युनिकेशन और डेटा एनालिटिक्स जैसे क्षेत्रों में कई नई कंपनियाँ सामने आई हैं। लेकिन ज्यादातर स्टार्टअप्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती इंफ्रास्ट्रक्चर की होती है।

किसी स्टार्टअप के लिए अपनी थर्मो-वैक्यूम चैंबर, क्लीनरूम या वाइब्रेशन टेस्टिंग सिस्टम तैयार करना बहुत महंगा काम होता है। कई मामलों में इसका खर्च करोड़ों रुपए तक पहुँच जाता है। इसी वजह से कंपनियों को ऐसी सुविधाओं के लिए दूसरी संस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। अब तक कई निजी कंपनियाँ ISRO की उपलब्ध सुविधाओं का इस्तेमाल करती रही हैं।

2020 के बाद सरकार ने निजी क्षेत्र के लिए स्पेस सेक्टर खोला, जिसके बाद IN-SPACe के जरिए इस तरह की सुविधाओं तक पहुँच को ज्यादा व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध कराया गया। लेकिन ISRO की सुविधाएँ मूल रूप से उसके अपने मिशनों के लिए बनाई गई हैं। भारत में निजी स्पेस कंपनियों की संख्या बढ़ने के साथ इन सुविधाओं की माँग भी लगातार बढ़ रही है।

ऐसी स्थिति में खोराज में विकसित की जा रही कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज का उद्देश्य यह है कि कई कंपनियाँ एक ही प्लेटफॉर्म पर आधुनिक टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल कर सकें। इससे सिर्फ लागत कम नहीं होगी, बल्कि नई कंपनियों के लिए स्पेस सेक्टर में आने की मुश्किलें भी कम होंगी।

हालाँकि सबसे ज्यादा चर्चा कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज की हो रही है, लेकिन खोराज परियोजना को केवल एक टेस्टिंग सेंटर के रूप में देखना सही नहीं होगा। राज्य सरकार और IN-SPACe की योजना एक ऐसा स्पेस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करने की है, जहाँ कंपनियाँ सिर्फ अपने उत्पादों की जाँच ही नहीं करेंगी, बल्कि सैटेलाइट, पेलोड सिस्टम और दूसरे स्पेस हार्डवेयर की डिजाइन, विकास, असेंबली और मैन्युफैक्चरिंग भी कर सकेंगी।

यानि CTF पूरे प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इस परियोजना का उद्देश्य केवल टेस्टिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे कहीं बड़ा है।

2020 के बाद भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में क्या बदलाव आए?

इस पूरे प्रोजेक्ट को समझने के लिए 2020 के स्पेस रिफॉर्म्स को समझना जरूरी है। लंबे समय तक भारत का स्पेस सेक्टर लगभग पूरी तरह ISRO पर केंद्रित रहा। देश की अंतरिक्ष क्षमताओं का विकास हुआ और मंगलयान व चंद्रयान जैसे ऐतिहासिक मिशन सफल रहे, लेकिन निजी क्षेत्र की भागीदारी बहुत सीमित थी।

2020 में केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया। इसके साथ ही IN-SPACe का गठन किया गया। IN-SPACe का काम निजी कंपनियों को अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रवेश के लिए जरूरी मंजूरी, मार्गदर्शन और समन्वय देना है।

इसके बाद आज कई भारतीय स्टार्टअप्स रॉकेट, सैटेलाइट और अन्य स्पेस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं। निजी क्षेत्र को स्पेस सेक्टर में शामिल करने का मतलब सिर्फ नई कंपनियों को मौका देना नहीं था, बल्कि इसका यह भी मतलब था कि देश को नए तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पड़ेगी।

खोराज में विकसित की जा रही कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज को इसी बड़े बदलाव का एक हिस्सा माना जा सकता है।

गुजरात निभा रहा महत्वपूर्ण भूमिका

खोराज में विकसित किया जा रहा स्पेस पार्क सिर्फ टेस्टिंग की जगह नहीं होगा, बल्कि इसे एक पूरा औद्योगिक क्लस्टर के रूप में तैयार करने की योजना है। यहाँ भविष्य में ऐसी कंपनियाँ आ सकती हैं जो सैटेलाइट के अलग-अलग हिस्से बनाएँगी, पेलोड सिस्टम विकसित करेंगी, स्पेस आधारित एप्लीकेशन पर काम करेंगी और उसी इकोसिस्टम में अपने उत्पादों का परीक्षण भी कर सकेंगी।

यानी डिजाइन से लेकर फ्लाइट के लिए तैयार सिस्टम बनने तक की पूरी प्रक्रिया के लिए जरूरी ढाँचा एक ही क्लस्टर में विकसित करने की कोशिश की जा रही है। खोराज प्रोजेक्ट का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि यह गुजरात में बन रहा है। इसके पीछे कई रणनीतिक कारण भी हैं। IN-SPACe का मुख्यालय अहमदाबाद में स्थित है।

साथ ही गुजरात का ISRO से भी लंबे समय से जुड़ा हुआ संबंध रहा है। अहमदाबाद में स्थित स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम में अहम भूमिका निभाता आया है। पिछले कुछ वर्षों में गुजरात सरकार ने डिफेंस, एयरोस्पेस और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया है। राज्य में सेमीकंडक्टर क्षेत्र में बड़े निवेश भी हो रहे हैं।

स्पेस टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर उद्योग आपस में जुड़े हुए हैं, क्योंकि सैटेलाइट और अन्य अंतरिक्ष प्रणालियों के लिए उन्नत इलेक्ट्रॉनिक घटकों की जरूरत होती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो खोराज में विकसित किया जा रहा स्पेस मैन्युफैक्चरिंग पार्क कोई अलग-थलग प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि गुजरात में विकसित हो रहे बड़े हाई-टेक इकोसिस्टम का एक हिस्सा है।

क्या हो सकते हैं इसके दीर्घकालिक प्रभाव?

खोराज प्रोजेक्ट का वास्तविक असर आने वाले वर्षों में दिखाई देगा। अगर यहाँ प्रस्तावित इंफ्रास्ट्रक्चर सफलतापूर्वक विकसित हो जाता है और उद्योग इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करता है, तो यह भारत के स्पेस स्टार्टअप्स के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन बन सकता है।

इससे स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ेगी, सप्लाई चेन और मजबूत होगी और आयात पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिलेगी। इस प्रोजेक्ट का एक और महत्वपूर्ण पहलू ISRO से जुड़ा हुआ है। जब निजी क्षेत्र के लिए अलग और समर्पित टेस्टिंग इकोसिस्टम तैयार होगा, तो ISRO की सुविधाओं पर दबाव धीरे-धीरे कम हो सकता है।

इससे ISRO अपने वैज्ञानिक शोध, अगली पीढ़ी की तकनीक, मानव अंतरिक्ष मिशन और अन्य उन्नत अभियानों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर सकेगा। यानी यह पहल सिर्फ निजी क्षेत्र की मदद नहीं करेगी, बल्कि पूरे भारतीय स्पेस इकोसिस्टम को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकती है। खोराज में बनने वाली कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज को सिर्फ एक नई लैब या सरकारी प्रोजेक्ट के रूप में देखना सही नहीं होगा।

यह भारत के स्पेस सेक्टर में हो रहे बड़े बदलाव का हिस्सा है, जिसमें सरकार, उद्योग, स्टार्टअप्स और वैज्ञानिक संस्थान मिलकर एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो आने वाले दशकों में भारत को वैश्विक स्पेस अर्थव्यवस्था में मजबूत स्थिति दिला सके। इसी वजह से खोराज का यह प्रोजेक्ट सिर्फ गुजरात ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय स्पेस सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नोट: यह रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित लेख पर आधारित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।


बंगाल नगर पालिका भर्ती घोटाले में TMC MLA मदन मित्रा के ठिकानों पर ED की छापेमारी, ₹200 करोड़ का हुआ खेल: जानें- इस संगठित लूट की पूरी कहानी

पश्चिम बंगाल में करीब ₹200 करोड़ के नगर पालिका भर्ती घोटाले की जाँच के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शनिवार (13 जून 2026) को तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) विधायक और पूर्व मंत्री मदन मित्रा से जुड़ी कई संपत्तियों पर छापेमारी की। जाँच एजेंसी ने मदन मित्रा से जुड़े कुल सात ठिकानों पर कार्रवाई की।

ED का कहना है कि जाँच के दौरान ऐसे सबूत मिले हैं जिनसे संकेत मिलता है कि कई नगर पालिकाओं में पैसे और सोना लेकर अवैध नियुक्तियाँ कराने में उनकी भूमिका रही है।

ED के मुताबिक, जाँच में पता चला है कि मदन मित्रा ने बिचौलियों के जरिए रिश्वत ली और नगर पालिकाओं में अयोग्य उम्मीदवारों को नौकरी दिलाने में मदद की। जाँच एजेंसी का दावा है कि खास तौर पर कमरहाटी नगर पालिका में उन्होंने करीब 125 लोगों की नियमों के खिलाफ नियुक्तियाँ करवाने में भूमिका निभाई।

छापेमारी के दौरान ED की टीम कमरहाटी स्थित मदन मित्रा के घर ‘उदय विला’ भी पहुँची। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस कार्रवाई में बैरकपुर पुलिस कमिश्नरेट के अधिकारी भी टीम के साथ मौजूद थे। बताया गया कि घर बंद मिला, जिसके बाद अधिकारियों ने ताला तोड़कर अंदर प्रवेश किया और कई घंटों तक तलाशी अभियान चलाया।

इस दौरान दस्तावेज, डिजिटल डिवाइस और अन्य सामग्री जब्त की गई, जिनकी अब जाँच की जा रही है। जाँच एजेंसियाँ इस बात की भी पड़ताल कर रही हैं कि जिस जमीन पर यह संपत्ति बनी है, वह कहीं किसी केंद्रीय सरकारी एजेंसी की जमीन तो नहीं है।

तलाशी के दौरान कुछ गोपनीय दस्तावेज मिलने की भी बात सामने आई है, जिन्हें अब इस पूरे मामले की जाँच के तहत खंगाला जा रहा है।

TMC विधायक सुजीत बोस को इसी साल की शुरुआत में ED ने किया था गिरफ्तार  

मदन मित्रा पर ED की यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब इसी भर्ती घोटाले से जुड़े मामले में कुछ ही हफ्ते पहले मई 2026 में TMC के एक अन्य वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सुजीत बोस को भी ED ने गिरफ्तार किया था।


ED के मुताबिक, जाँच में सामने आया कि सुजीत बोस ने दक्षिण दमदम नगर पालिका और अन्य नगर निकायों में नौकरी दिलाने के लिए करीब 150 उम्मीदवारों की सिफारिश की थी और इसके बदले पैसे लिए गए थे। जाँच एजेंसी का दावा है कि उन्हें ऐसे सबूत मिले हैं जिनसे पता चलता है कि नगर पालिका में नियुक्तियाँ कराने के बदले बोस को फ्लैट और अन्य संपत्तियाँ मिली थीं, जिन्हें अपराध से अर्जित संपत्ति माना जा रहा है।

ED ने यह भी दावा किया कि उनसे जुड़े बैंक खातों में बड़ी मात्रा में नकदी जमा की गई थी। उनकी गिरफ्तारी से पहले एजेंसी ने कई बार पूछताछ की और उन्हें कई समन भी जारी किए थे। पूर्व मंत्री ने इससे पहले विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान ईडी के सामने पेश होने से छूट मांगते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख किया था।

हालाँकि चुनाव खत्म होने के बाद वह जाँच एजेंसी के सामने पेश हुए। बाद में ED ने दोबारा पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इससे पहले भी ED ने सुजीत बोस से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की थी, जिनमें उनका दफ्तर और उनके परिवार से जुड़े परिसर शामिल थे।

अक्टूबर 2025 में हुई एक ऐसी कार्रवाई के दौरान अधिकारियों को 45 लाख रुपए नकद और कई दस्तावेज मिले थे, जिन्हें जाँच के लिए अहम सबूत माना गया।

क्या है नगरपालिका भर्ती घोटाला और कैसे सामने आया?

दिलचस्प बात यह है कि नगर पालिका भर्ती घोटाला शुरुआत में अलग मामले के तौर पर सामने नहीं आया था। इसका खुलासा पश्चिम बंगाल के चर्चित शिक्षक भर्ती घोटाले की जाँच के दौरान हुआ। साल 2023 में ED ने TMC से जुड़े प्रमोटर और कारोबारी अयान शील के ठिकानों पर छापेमारी की थी।

उस समय एजेंसी स्कूल भर्ती में अनियमितताओं और उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जाँच कर रही थी। तलाशी के दौरान अधिकारियों को बड़ी संख्या में दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और अन्य सामग्री मिली। इन सबूतों की जाँच के दौरान एजेंसी को संकेत मिले कि पश्चिम बंगाल की कई नगर पालिकाओं में भी पैसे लेकर नौकरी देने का ऐसा ही नेटवर्क चल रहा था।

इसके बाद ED ने अपनी जाँच का दायरा बढ़ाया। बाद में कलकत्ता हाई कोर्ट ने नगर पालिका भर्ती में अनियमितताओं की जाँच के लिए CBI जाँच का आदेश दिया।
जैसे-जैसे ED और CBI ने जाँच आगे बढ़ाई, वैसे-वैसे राज्य के कई नगर निकायों में बड़े स्तर पर अवैध नियुक्तियों के नेटवर्क का खुलासा होने लगा।

नगरपालिकाओं में बेची गईं हजारों नौकरियाँ

यह भर्ती घोटाला बंगाल की कई नगर पालिकाओं में साल 2014 से 2018 के बीच हुई नियुक्तियों से जुड़ा है। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, इस दौरान कई पदों पर पैसे लेकर नौकरियाँ दी गईं। इनमें मजदूर, सफाईकर्मी, क्लर्क, चपरासी, एम्बुलेंस अटेंडेंट, ड्राइवर, वार्ड मास्टर, सैनिटरी असिस्टेंट, हेल्पर, पंप ऑपरेटर और मेडिकल स्टाफ जैसे पद शामिल थे।

ED और CBI का दावा है कि इन नियुक्तियों में तय भर्ती प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। आरोप है कि जिन्होंने पैसे दिए उन्हें नगर पालिकाओं में स्थायी नौकरी मिल गई, जबकि योग्य उम्मीदवारों को मौका नहीं मिला।

जाँच एजेंसियों का यह भी कहना है कि अयान शील इस पूरे मामले में एक अहम बिचौलिए की भूमिका में था और उसने कई नगर पालिकाओं में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर नियुक्तियाँ कराने का काम किया।

करोड़ों रुपए और धन का व्यापक जाल 

जैसे-जैसे जाँच आगे बढ़ी, ED और CBI को पश्चिम बंगाल की कई नगर पालिकाओं में फैले पैसे लेकर नौकरी देने के बड़े नेटवर्क के संकेत मिलने लगे। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, यह मामला सिर्फ कुछ नियुक्तियों तक सीमित नहीं था, बल्कि कई नगर निकायों तक फैला हुआ एक बड़ा भर्ती घोटाला हो सकता है।

साल 2023 में कलकत्ता हाई कोर्ट में दाखिल अपनी शुरुआती रिपोर्ट में ED ने बताया था कि नगर पालिका भर्ती घोटाले से जुड़े लेनदेन की रकम करीब 200 करोड़ रुपए तक हो सकती है। एजेंसी के अनुसार, यह अनुमान मुख्य आरोपित अयान शील से पूछताछ में मिले बयानों और उसके ठिकानों से बरामद दस्तावेज, डिजिटल डिवाइस और रिकॉर्ड के आधार पर लगाया गया था।

जाँचकर्ताओं का मानना है कि उम्मीदवारों से नगर पालिका में नौकरी दिलाने के बदले पैसे लिए गए थे। ED के मुताबिक, इन अवैध नियुक्तियों का बड़ा हिस्सा उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना जिलों की नगर पालिकाओं में हुआ। एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि आरोपितों के बयान और जाँच में मिले दस्तावेजी व डिजिटल सबूतों का मिलान करने के बाद इस घोटाले की अनुमानित रकम तय की गई।

जाँच के दौरान ED ने कोलकाता के तारातला इलाके में छापेमारी कर 1.5 करोड़ रुपए से ज्यादा नकद बरामद करने का दावा किया। वहीं लेक टाउन में की गई कार्रवाई के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी, सोने के आभूषण और लग्जरी वाहन मिलने की बात कही गई।

जाँच एजेंसी का दावा है कि भर्ती घोटाले से मिले पैसों को वैध दिखाने के लिए कई निजी कंपनियों का इस्तेमाल किया गया। ED अधिकारियों के अनुसार, अवैध भर्ती से जुटाए गए करोड़ों रुपए अलग-अलग बैंक खातों और कारोबारी संस्थाओं के जरिए घुमाए गए। एजेंसी को शक है कि इस पूरे पैसे के नेटवर्क से कई प्रभावशाली लोगों को फायदा पहुँचा।

जाँच एजेंसियों का मानना है कि इस घोटाले का असली दायरा इससे भी बड़ा हो सकता है क्योंकि अभी कई अन्य नगर पालिकाओं और संभावित लाभार्थियों की जाँच जारी है।जाँचकर्ताओं के अनुसार, यह भर्ती नेटवर्क कई सालों तक चलता रहा, जिसमें बिचौलियों, नगर पालिका अधिकारियों, नेताओं और निजी संस्थाओं की भूमिका की जाँच की जा रही है।

CBI ने की 1,814 अवैध नियुक्तियों की पहचान

इस मामले में सबसे बड़े खुलासों में से एक CBI की जाँच के दौरान सामने आया। सूत्रों के मुताबिक, CBI ने पश्चिम बंगाल की 15 नगर पालिकाओं में कुल 1,814 अवैध नियुक्तियों की पहचान की। जाँच में सामने आया कि इनमें से कई भर्तियाँ अयान शील की कंपनी एबीएस इन्फोजोन प्राइवेट लिमिटेड के जरिए कराई गई थीं।

जाँच एजेंसी ने 17 नगर पालिकाओं के भर्ती रिकॉर्ड की जाँच की। इनमें से 15 नगर निकायों में अनियमित नियुक्तियाँ मिलीं। जाँच के दायरे में आई नगर पालिकाओं में दक्षिण दमदम में सबसे ज्यादा 329 नियुक्तियों को संदिग्ध या नियमों के खिलाफ पाया गया।

इसके अलावा कमरहाटी, बारानगर और टीटागढ़ जैसी नगर पालिकाओं में भी बड़ी संख्या में संदिग्ध नियुक्तियों के मामले सामने आए। CBI ने इन निष्कर्षों की जानकारी कोलकाता की विशेष अदालत को दी और नियुक्तियों से जुड़े विस्तृत रिकॉर्ड भी जमा किए।

जाँच के दौरान एजेंसी को कम से कम 25 ऐसे बैंक खातों की जानकारी मिली, जिनका इस्तेमाल घोटाले से जुड़े पैसों के लेनदेन के लिए किया गया। जाँचकर्ताओं ने पाया कि इन खातों में बड़ी रकम जमा होने के कुछ घंटों के भीतर ही निकाल ली जाती थी, जिससे मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका और मजबूत हुई।

जाँच के तहत CBI अधिकारियों ने 42 अलग-अलग ठिकानों पर छापेमारी की और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े कई अहम दस्तावेज अपने कब्जे में लिए।

फाइनल चार्जशीट में मुख्य आरोपितों के नाम आए सामने

इस मामले की जाँच एक अहम मोड़ पर तब पहुँची जब CBI ने इस साल जनवरी में अलीपुर स्थित विशेष CBI कोर्ट में अपनी अंतिम चार्जशीट दाखिल की। चार्जशीट में जिन बड़े नामों को शामिल किया गया, उनमें पश्चिम बंगाल कैडर के वरिष्ठ IAS अधिकारी ज्योतिष्मान चट्टोपाध्याय का नाम भी शामिल है।

CBI के मुताबिक, साल 2017 से 2019 के बीच वह शहरी विकास और नगर मामलों के विभाग के अंतर्गत स्थानीय निकाय निदेशालय में अहम पद पर तैनात थे और सितंबर 2018 में विभाग के निदेशक बने थे। यह निदेशालय नगर पालिका भर्ती प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसमें नियुक्तियों का आवंटन और भर्ती प्रक्रिया को मंजूरी देना शामिल होता है।

CBI का आरोप है कि अपने कार्यकाल के दौरान ज्योतिष्मान चट्टोपाध्याय ने अपने पद का गलत इस्तेमाल किया और नियमों के खिलाफ नियुक्तियाँ कराने में मदद की। उनके घर से मिले कुछ दस्तावेजों को भी जाँच एजेंसी ने इन आरोपों का आधार बताया है।

अंतिम चार्जशीट में एबीएस इन्फोजोन प्राइवेट लिमिटेड का नाम भी शामिल किया गया है। जाँच एजेंसियों का मानना है कि अयान शील ने इसी कंपनी के जरिए अवैध भर्तियों को अंजाम दिया। इससे पहले की चार्जशीट में अयान शील और दक्षिण दमदम नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन पंचुगोपाल राय को भी आरोपित बनाया जा चुका था।

जाँचकर्ताओं के अनुसार, अयान शील इस पूरे मामले के प्रमुख चेहरों में से एक माना जा रहा है और उसका नाम मुख्य रूप से TMC से जुड़ा बताया गया है। कोलकाता और चिनसुरा स्थित उसके दफ्तरों और घरों पर छापेमारी के बाद ED ने दावा किया था कि उससे जुड़ी करीब 100 करोड़ रुपए की संपत्तियों और कई अहम दस्तावेजों का पता चला है।

अंतिम चार्जशीट दाखिल होने और ED की लगातार कार्रवाई के बाद नगर पालिका भर्ती घोटाला पश्चिम बंगाल के स्थानीय निकायों से जुड़े सबसे बड़े भ्रष्टाचार मामलों में से एक बनकर सामने आया है। हाल में मदन मित्रा के ठिकानों पर हुई छापेमारी और सुजीत बोस की गिरफ्तारी को जाँच के दायरे के लगातार बढ़ने के तौर पर देखा जा रहा है। जाँच एजेंसियाँ अब इस मामले में अन्य लोगों की भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं।

मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।




फीफा विश्व कप 2026 में पुलिसिच की कप्तानी और बालोगन के दमदार गोलों से USA ने पैराग्वे को 4-1 से रौंदा, अब ब्राजील Vs मोरक्को पर सबकी नजर

मेजबान अमेरिका ने लॉस एंजेलिस के सोफी स्टेडियम में 70 हजार से अधिक घरेलू दर्शकों के सामने पैराग्वे को 4-1 से हराकर अपने फीफा विश्व कप 2026 अभियान की धमाकेदार शुरुआत की है। ग्रुप डी के इस मैच में उनका मुकाबला था पैराग्वे की टीम से। पैराग्वे जो नवीं दफा फीफा विश्व कप में खेलने जा रही थी।

इस दफा अमेरिकी फ़ुटबॉल टीम का संपूर्ण दारोमदार युरोपीयन फुटबॉल जगत में बेहद मशहूर कोच/मैनेजर ‘मारियो पोच्चेटीनो’ के सक्षम हाथों में है। पोच्चेटीनो को अपेक्षाकृत छोटी टीमों के संग भी बड़े क्लबों के विरुद्ध उनकी बारीक रणनीतियों को मैदान में सफलतापूर्वक आकार देने के लिए जाना जाता है।

सत्तर हजार घरेलू दर्शकों के अपार समर्थन के मध्य अमेरिकी टीम ने बेहद ही शानदार फुटबॉल खेली। उन्होंने मैच के पहले मिनट से ही विरोधी टीम के गोलपोस्ट के आसपास कई घातक मूव्स बनाए। कभी यूरोपीयन जाएंट्स ‘चेल्सी’ के लिए खेल चुके व फिलहाल ‘एसी मिलान’ के लिए खेल रहे ‘क्रिश्चियन पुलिसिच’ मैदान की बांई फ्लैंक से लगातार साथी खिलाड़ियों के लिए गोल स्कोर करने के मौके बना रहे थे। पैराग्वे को भनक भी न थी की अमेरिकी टीम ऐसी फुटबॉल भी खेल सकती है।

अमेरिकी टीम के आक्रामक खेल के चलते मैच के सातवें मिनट में ही ‘वेस्टन मैक्केनी’ के शॉट को रोकने के प्रयास में पैराग्वे के ‘बोबाडिल्ला’ एक आत्मघाती गोल कर बैठे। फिर तो अमेरिकी टीम ने लगातार विरोधी गोलपोस्ट की दिशा में आक्रमण करना शुरू कर दिया। वर्तमान में फ्रेंच फुटबॉल क्लब मोनाको के सेंट्रल फॉरवर्ड, चौबीस वर्षीय, ‘बालोगन’ ने मैच के इकत्तीसवें व ’45+5′ मिनट में दो शानदार गोल दाग अमेरिका को मैच के पहले हाफ में ही 3-0 से बढ़त दिला दी। मैच के दूसरे हाफ में मानो अमेरिकी लड़ाकों ने अपने घातक टैंकों के गियर से पैर हटा लिया हो।

पैराग्वे फिर भी पहले हाफ में हुए हमलों से उबर ही न सका। मैच के अंतिम क्षणों में ‘जियोवानी राएना’ ने इस टूर्नामेंट में अबतक का सबसे बेहतरीन गोल दाग स्कोर 4-1 कर दिया, जो अंतिम व्हिस्ल बजने तक समान ही रहा। मैच में क्रिश्चियन पुलिसीच की कलात्मकता व बालोगन के दो बेहतरीन गोलों ने सोफी स्टेडियम में दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। ‘जियोवानी राएना’ ने लामीन यमाल के अंदाज में ‘त्रिवेला’ किक लगा जो मैच के अंतिम क्षणों में गोल दागा, वह चैरी ऑन द केक सरीखा था।

विश्व कप का आगाज़ सही मायनों में चुका है। पिछले चार वर्षों से जो धरा बारूद के ढर्रे पर बैठी हुई है उसे फिर मुस्कुराने की वजह मिल गई है। मेजबान देशों अमेरिका, कनाडा व मेक्सिको, खासकर मेक्सिको व कनाडा में विश्व भर से फुटबॉल प्रेमी पहुँच चुके हैं और खेल का आनंद ले रहे हैं। मेक्सिको ने तो अपने सेवा भाव से तमाम आगंतुकों का दिल जीत लिया है।

टूर्नामेंट के पहले दिन मेजबान मेक्सिको ने ओपनिंग मैच में, राउल जिमिनेज़ के बेहतरीन गोल की बदौलत, दक्षिण अफ्रीका को 2-0 से हराया था और दक्षिण कोरिया ने संपूर्ण टीम के शानदार खेल की बदौलत चेक-रिपब्लिक को 2-1 से मात दी थी।

अब है टूर्नामेंट का पहला वीकेंड। अब धीरे-धीरे बड़ी टीमें भी मैदान में उतरेंगी। रोमांच अपने चरम पर होगा। शनिवार (13 जून 2026) की रात होंगे दो मुकाबले। भारतीय समयानुसार रात साढ़े बारह बजे ग्रुप बी की दो टीमें, कतर व स्विट्जरलैंड, आपस में भिड़ने जा रही हैं। वहीं रात साढ़े तीन बजे होगा एक ऐसा महासंग्राम, जिसपर निश्चित ही आपकी नजर बनी रहनी चाहिए। ग्रुप सी में पिछले विश्व कप के ‘जाएंट किलर्स’ मोरक्को का सामना होने जा रहा है ब्राजील से। ग्रुप स्टेज के सबसे बड़े मैचों में एक इस मैच का सभी को इंतजार था।

विनीसीयूस जूनियर, राफिन्हा, ऐलीसन, मार्क्विन्हॉस, कासेमीरो, मार्टेनेली, कुन्हा, गुईमराएज़, पाक्वेता आदि सितारा खिलाड़ियों से सजी ब्राजीली टीम कोच ‘कार्लो एन्सिलोटी’ के मार्गदर्शन में एक दफा फिर घातक दिखने लगी है। कोच एन्सिलोटी ने इस टीम पर काफी काम किया है। हांलांकि, नेमार, द प्रिंस हू नेवर बिकेम द किंग, घायल हैं और इस मैच का हिस्सा नहीं होंगे।

वहीं मोरक्को को एक सूपरपॉवर बनाने वाले उनके कोच ‘वालिद रेग्रागुई’ अब उनका नेतृत्व नहीं कर रहे हैं। फिर भी मोरक्को एक ऐसी टीम है जिसे आप कम तर नहीं आँक सकते। वो सदैव मैदान में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। हाकीमी के नेतृत्व में बोनू, अमराबात और माज़ारूई जैसे खिलाड़ियों से लैस मोरक्को जरूर आज रात बड़ा शिकार करने के लिए आतुर होगी।

मेटलाइफ स्टेडियम में होने जा रहे इस मुकाबले पर आपकी नजर बनी रहनी चाहिए। आगे खेल के इस रोचक महाकुंभ की बातें चलती रहेंगी। आप भी अब जहाँ कहीं भी हों, अपनी तमाम उलझनों को कुछ दिन भूल कर, इस महासम्मेलन के उन्माद में गोते लगाइए।

करोड़ों का इनाम, जेल से शुरुआत… ट्रंप ने जिस आतंकी संगठन ‘ट्रेन डी अरागुआ’ को बताया ‘खून का प्यासा’, पढ़ें- मजदूर से माफिया बनने की उसकी कहानी: सरगना नीनो गुएरेरो को US ने किया ढेर

जुर्म का अंत हमेशा बुरा होता है। अपराधी चाहे कितना भी ताकतवर हो, वह बच नहीं सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक सीधे आदेश ने इस बात को सच साबित कर दिया है। उनके आदेश पर अमेरिकी सेना ने एक बड़ा हवाई हमला किया। इस हमले में वेनेजुएला का सबसे खूंखार गैंगस्टर नीनो गुएरेरो मारा गया है। नीनो गुएरेरो ‘ट्रेन डी अरागुआ’ नाम के खतरनाक आतंकी संगठन का मुख्य सरगना था। ट्रंप ने इस गैंग को ‘खून का प्यासा’ बताया। उसका खूनी साम्राज्य लातिन अमेरिका से लेकर अमेरिका तक फैला हुआ था। ट्रंप ने इस सफलता का खुद एलान किया। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि अब दुनिया में कहीं भी इन अपराधियों के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बची है।

ट्रंप का सीधा आदेश और पेंटागन का बड़ा एक्शन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बड़े सैन्य ऑपरेशन की जानकारी दी। ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी सेना के ‘साउदर्न कमांड’ ने यह हमला किया था। यह हमला बेहद तेज और जानलेवा था। इस हमले का मुख्य मकसद ‘ट्रेन डी अरागुआ’ के कुख्यात लीडर नीनो गुएरेरो को खत्म करना था। ट्रंप ने इस संगठन को धरती का सबसे क्रूर और हिंसक आतंकी गिरोह बताया है।

पेंटागन के प्रमुख पीट हेगसेथ ने भी इस हमले की पुष्टि की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसके बारे में बताया। यह हवाई हमला इसी सप्ताह की शुरुआत में किया गया था। पूरी जाँच के बाद अब साफ हो चुका है कि गुएरेरो इस हमले में मारा गया है। ट्रंप प्रशासन ने इस कार्रवाई का एक Video भी जारी किया है। इस Video में तबाही का मंजर साफ देखा जा सकता है।

वेनेजुएला सरकार की पुष्टि और संयुक्त खुफिया ऑपरेशन

इस खूंखार आतंकी को ढेर करने में वेनेजुएला सरकार ने भी अमेरिका का साथ दिया है। वेनेजुएला के सूचना और संचार मंत्रालय ने एक बयान जारी कर बताया कि यह एक साझा ऑपरेशन था। सुरक्षाबलों और इस आपराधिक संगठन के बीच काफी देर तक भीषण मुठभेड़ चली। इस मुठभेड़ के दौरान ही आतंकी नीनो गुएरेरो को ‘न्यूट्रलाइज’ यानी हमेशा के लिए शांत कर दिया गया।

यह पूरा ऑपरेशन दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों की गहरी सूझबूझ का नतीजा था। इसमें आधुनिक तकनीक और हाई-टेक सपोर्ट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। वेनेजुएला की सरकार ने बताया कि उन्होंने अमेरिका के साथ मिलकर इस खूंखार अपराधी की हर हरकत पर नजर रखी थी। इसके बाद सही मौका मिलते ही इस पर अंतिम प्रहार किया गया।

न्यूयॉर्क कोर्ट में काला चिट्ठा और 41 करोड़ का इनाम

नीनो गुएरेरो लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के निशाने पर था। पिछले साल दिसंबर में न्यूयॉर्क की एक फेडरल कोर्ट में उसके खिलाफ गंभीर धाराओं में चार्जशीट दाखिल की गई थी। उस पर नार्को-आतंकवाद, जबरन वसूली, हत्या की साजिश और आतंकियों को हथियार और पैसा सप्लाई करने जैसे दर्जनों संगीन मामले दर्ज थे। वह एक दशक से ज्यादा समय से इन वारदातों को अंजाम दे रहा था।

अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने गुएरेरो की गिरफ्तारी या उसके बारे में सही जानकारी देने वाले को 50 लाख डॉलर का इनाम देने का ऐलान किया था। भारतीय रुपयों में यह रकम करीब 41 करोड़ रुपए बैठती है। अमेरिकी वकीलों के मुताबिक, नीनो गुएरेरो का यह गैंग (खून का प्यासा) पूरे उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और यूरोप के कई देशों में अनगिनत हत्याओं और ड्रग्स की तस्करी के लिए जिम्मेदार था।

जेल से चला साम्राज्य और ‘डॉन’ का जन्म (2013)

इस खूंखार गैंग ‘ट्रेन डी अरागुआ’ की शुरुआत साल 2005 में एक मजदूर संगठन के रूप में हुई थी। वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के राज में एक रेलवे लाइन का निर्माण हो रहा था। इस प्रोजेक्ट में काम करने वाले मजदूरों ने मिलकर एक यूनियन बनाई। लेकिन जल्द ही इन मजदूरों के मन में लालच आ गया। उन्होंने ठेकेदारों को डराना और उनसे पैसे ऐंठना शुरू कर दिया। साल 2011 में जब सरकार ने यह रेलवे प्रोजेक्ट बंद किया, तो वो मजदूर पूरी तरह एक क्रिमिनल गैंग बन चुके थे। नाम पड़ा- ‘ट्रेन डी अरागुआ’ (अरागुआ की ट्रेन)।

साल 2013 में इस गैंग की कमान मिली हेक्टर रस्टेनफोर्ड गुएरेरो उर्फ नीनो गुएरेरो को। नीनो वेनेजुएला की सबसे बदनाम ‘तोकोरॉन जेल’ (Tocorón Prison) में बंद था। लेकिन वह मामूली कैदी नहीं था, वह वहाँ का ‘प्रान’ (जेल का डॉन) बन गया। उसने जेल के अंदर ही ऐश-ओ-आराम का महल बनाया। वहीं बैठे-बैठे उसने पूरे देश में ड्रग्स, जबरन वसूली और इंसानों की तस्करी का धंधा फैला दिया।

मजबूरी का फायदा और सरहदें पार

साल 2015 में वेनेजुएला में भयंकर गरीबी और भुखमरी फैल गई। लाखों लोग देश छोड़कर भागने लगे। नीनो गुएरेरो ने इस मजबूरी को धंधा बना लिया। उसके गैंग ने बॉर्डर पर कब्जा किया और भागने वाले गरीबों से टैक्स वसूलने लगे। इतना ही नहीं, इस गैंग के शातिर अपराधी आम शरणार्थियों के भेष में कोलंबिया, पेरू, चिली और अमेरिका जैसे देशों में घुस गए।

इन देशों में जाकर उन्होंने वेनेजुएला के ही प्रवासियों को अपना शिकार बनाना शुरू किया। उन्होंने वहाँ महिलाओं की तस्करी की और छोटे स्तर पर ड्रग्स बेचने का धंधा शुरू कर दिया। लातिन अमेरिका की पुलिस के मुताबिक, इस गैंग ने कई देशों में अपनी परमानेंट सेल (गुप्त ठिकाने) बना ली थीं।

चिली में पूर्व सैन्य अधिकारी की हत्या से मचा था हड़कंप

‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग अपनी बेरहमी और खौफनाक हत्याओं के लिए जाना जाता है। मार्च 2023 में इस गैंग ने चिली में एक ऐसी वारदात को अंजाम दिया, जिससे दो देशों के बीच तनाव बढ़ गया। गैंग के शूटरों ने वेनेजुएला की सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट और सरकार के विरोधी रोनाल्ड ओजेडा का अपहरण कर लिया। इसके बाद उनकी बेहद क्रूरता से हत्या कर दी गई।

यह गैंग पनामा से लेकर ब्राजील तक फैल चुका था। अपहरण, मनी लॉन्ड्रिंग, सुपारी लेकर हत्या करना और बड़े-बड़े मॉल में डकैती डालना इनका रोज का काम था। साल 2023 में जब वेनेजुएला की सेना ने इनकी तोकोरॉन जेल पर धावा बोला, तो गुएरेरो जेल के नीचे बनी एक गुप्त सुरंग से अपने साथियों के साथ भाग निकला था। तब से वह लगातार अपनी लोकेशन बदल रहा था।

अमेरिका के ऑरोरा में घुसपैठ और ट्रंप का चुनावी मुद्दा

पिछले साल अगस्त में अमेरिका के कोलोराडो राज्य के ऑरोरा शहर से एक वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में कुछ हथियारबंद वेनेजुएला के प्रवासी एक अपार्टमेंट की बिल्डिंग में जबरन घुसते दिखे थे। इस घटना के बाद वहाँ के मकान मालिक और नेताओं ने दावा किया कि ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग ने अमेरिका की सोसायटियों पर कब्जा करना शुरू कर दिया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे को बहुत जोर-शोर से उठाया था। उन्होंने ऑरोरा शहर में एक बड़ी रैली की थी और मंच पर इन अपराधियों के पोस्टर लगाए थे। ट्रंप ने अमेरिकी जनता से वादा किया था कि वह राष्ट्रपति बनते ही देश में अवैध रूप से रह रहे इन अपराधियों को तुरंत बाहर निकालेंगे। ट्रंप की इस आक्रामक नीति को जनता का भारी समर्थन मिला था।

राष्ट्रपति निकोलस मादुरो से कनेक्शन और अमेरिकी सेना का एक्शन

राष्ट्रपति ट्रंप का हमेशा से आरोप रहा है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने जानबूझकर अपने देश के कैदियों को अमेरिका भेजा ताकि वहाँ अपराध बढ़ सके। हालाँकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट में इस बात के सीधे सबूत नहीं मिले थे। इसके बावजूद, अमेरिकी सेना ने इसी साल जनवरी में एक बेहद गुप्त ऑपरेशन चलाकर निकोलस मादुरो को वेनेजुएला से उठा लिया था। मादुरो पर फिलहाल अमेरिका में नार्को-आतंकवाद का केस चल रहा है।

अदालत में पेश की गई नई चार्जशीट में खुलासा हुआ है कि मादुरो सरकार और नीनो गुएरेरो का गैंग आपस में मिलकर काम कर रहे थे। वे मिलकर ड्रग्स के धंधे से मोटा मुनाफा कमा रहे थे। ट्रंप ने गुएरेरो की मौत पर कहा कि जो बाइडेन की कमजोर नीतियों के कारण अमेरिका की सीमाएं असुरक्षित हो गई थीं। लेकिन अब उनकी सरकार इन राक्षसों को चुन-चुनकर खत्म कर रही है।

जोसलीन और लेकन रीली की मौत का लिया बदला

अमेरिका में अवैध प्रवासियों द्वारा की गई कुछ हत्याओं ने पूरे देश को नाराज कर दिया था। 12 साल की मासूम बच्ची जोसलीन नुंगारे और 22 साल की छात्रा लेकन रीली की बिना दस्तावेज वाले प्रवासियों ने हत्या कर दी थी। ट्रंप ने नीनो गुएरेरो की मौत का ऐलान करते हुए इन दोनों बच्चियों का विशेष रूप से नाम लिया।

ट्रंप ने अपने बयान में लिखा कि अमेरिकी सेना ने इन मासूम बच्चियों और उनके परिवारों के साथ पूरा न्याय किया है। इस खूंखार गैंग के सरगना को मारकर सेना ने उनकी मौतों का बदला ले लिया है। ट्रंप ने साफ किया कि उनके राज में अपराधियों को कोई माफी नहीं मिलेगी और अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा।

‘एलियन एनिमीज एक्ट’ और मास डिपोर्टेशन की तैयारी

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही ‘ट्रेन डी अरागुआ’ को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। उन्होंने देश के 200 साल पुराने ‘एलियन एनिमीज एक्ट’ का इस्तेमाल करने का फैसला किया है। यह कानून सरकार को यह ताकत देता है कि वह किसी भी संदिग्ध विदेशी नागरिक को बिना किसी अदालती सुनवाई के तुरंत गिरफ्तार करके देश से बाहर निकाल सकती है।

अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि यह गैंग कोई मामूली चोर-उचक्कों का ग्रुप नहीं है, बल्कि यह एक हमलावर विदेशी सेना की तरह है। ट्रंप सरकार ने इस गैंग के कई संदिग्ध सदस्यों को बिना कोर्ट की मंजूरी के अल साल्वाडोर की सबसे खतरनाक ‘सेकोट जेल’ में भेजना शुरू कर दिया था। हालांकि अदालतों ने इस पर कुछ पाबंदियां लगाई हैं, लेकिन सरकार अपनी कार्रवाई पर टिकी हुई है।

मैक्सिकन कार्टेल्स के सामने कमजोर था यह गैंग

भले ही अमेरिका में इस गैंग को लेकर काफी डर का माहौल बनाया गया हो, लेकिन खोजी संस्था ‘इनसाइट क्राइम’ की रिपोर्ट कुछ और ही कहानी कहती है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग अमेरिका के अंदर उतना मजबूत नहीं है। अमेरिका के ड्रग मार्केट पर पहले से ही मैक्सिको के बेहद खतरनाक ‘सिनालोआ कार्टेल’ और ‘जालिस्को न्यू जनरेशन कार्टेल’ का पूरी तरह कब्जा है।

वेनेजुएला का यह गैंग मैक्सिकन कार्टेल्स के सामने बहुत छोटा और कमजोर है। अमेरिकी सीमा पर इस गैंग के गुर्गे खुद को बचाने के लिए मैक्सिकन माफियाओं के लिए छोटे-मोटे काम करते हैं। अमेरिकी गृह मंत्रालय के अनुसार, पूरे अमेरिका में इस गैंग के केवल 600 के करीब एक्टिव मेंबर्स हैं। यह संख्या अमेरिका में रहने वाले 7 लाख अच्छे और शांतिप्रिय वेनेजुएला के प्रवासियों का बहुत छोटा हिस्सा है।

इस बड़े सैन्य एक्शन का आगे क्या असर होगा?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बड़े और आक्रामक कदम ने दुनिया भर के अपराधियों को हिलाकर रख दिया है। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि वे इन क्रूर हत्यारों और ड्रग तस्करों को दुनिया के किसी भी कोने से ढूँढ निकालेंगे। अमेरिकी साउदर्न कमांड का यह एक्शन दिखाता है कि अमेरिका अब अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग ने वेनेजुएला की जेल से निकलकर कई देशों में मौत और खौफ का जो खेल शुरू किया था, उसका अंत अब नजदीक है। इसके मुख्य सरगना नीनो गुएरेरो की मौत ने इस पूरे गैंग की कमर तोड़ दी है।