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हुई गवा? करवा ली बेइज्जती? ‘दी प्रिंट’ ने पहले थूका, फिर पकड़े जाने पर चाटा

शेखर गुप्ता और उनके प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘दी प्रिंट’ ने दक्षिणपंथी समाचार पोर्टल ‘स्वराज्य मैगजीन’ की जर्नलिस्ट स्वाति गोयल शर्मा पर एक कथित ‘विचार’ प्रकाशित किया, जिस पर हुए भारी विरोध के बाद आखिर में ‘दी प्रिंट’ को माफ़ी माँगते हुए अपनी वेबसाइट से चुपके हटाना पड़ा।

दरअसल, दी प्रिंट ने एक रिपोर्ट प्रकाशित करते हुए इसमें स्वाति गोयल शर्मा का नाम घसीटते हुए ‘लव जिहाद’ पर की गई उनकी रिपोर्टिंग के तरीकों पर कई तरह के आरोप लगाए थे। लेकिन स्वाति गोयल ने ना सिर्फ दी प्रिंट के अजेंडा को बेनकाब किया बल्कि उन्हें जमकर लताड़ा भी।

दी प्रिंट ने एक रिपोर्ट (विचार) प्रकाशित की जिसमें उन्होंने स्वाति गोयल शर्मा पर आरोप लगे कि उन्होंने ट्विटर पर ‘लव-जिहाद’ का कैम्पेन चलाया। यही नहीं, दी प्रिंट ने अपनी इस रिपोर्ट में स्वाति गोयल शर्मा पर आरोप लगाया कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के हाथरस कांड में पीड़िता और आरोपितों की जाति को भी विवादित तरीके से पेश किया।

1 अक्टूबर को, शेखर गुप्ता के ‘दी प्रिंट’ ने यह ‘विचार’ प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने स्वाति गोयल शर्मा पर हाथरस हत्या मामले में जाति के नजरिए को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया। साथ ही, उन्होंने ट्विटर पर ‘लव जिहाद’ के बारे में ‘एक अभियान चलाने’ के लिए भी स्वाति गोयल को निशाना बनाया और कहा कि उन्होंने ‘लव’ में ‘जिहाद’ देखा।

स्वाति गोयल शर्मा ने अपने ट्विटर अकाउंट पर शेखर गुप्ता को टैग किया और ‘दी प्रिंट’ की इस रिपोर्ट के स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “यह गटर के स्तर की चीज है। क्या आपके कम अनभिज्ञ लेखकों की यह आदत है और उनके काम की जाँच के बिना ही उन पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाते हैं? आपने आईआईटी-कानपुर के वाशी शर्मा के साथ भी ऐसा ही किया और बाद में माफी माँगी थी।”

स्वाति शर्मा ने लिखा, “तुम्हारे अनपढ़ लेखक मुझे यह स्पष्ट करें कि मैंने हाथरस मामले में जाति की बात को कब नकारा या फिर माफ़ी माँगे।”

प्रिंट के इस लेख का शीर्षक था – “आप हाथरस बलात्कार के बारे में अन्य बलात्कारों को भी रखते हुए बात नहीं कर सकते – आईटी सेल की व्हाटअबाउट्री को धन्यवाद।”

‘व्हाटअबाउट्री’ का सामान्य शद्बों में अर्थ गुमराह करने की कला होता है। इस ‘विचार’ में स्वाति शर्मा पर यह कहते हुए हमला किया गया कि जब वह ‘लव’ में ‘जिहाद’ देख सकती हैं, तो वह ‘जाति के नजरिए’ को नहीं देख पाई क्योंकि ‘4 ऊँची जाति के पुरुषों ने एक दलित महिला का बलात्कार किया था’।

‘दी प्रिंट’ ने जो लिखा है, वह ट्विटर पर पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा द्वारा साझा किए गए इन स्क्रीनशॉट्स में देखा जा सकता है –

दिलचस्प बात यह है कि, ‘दी प्रिंट’ इस लेख को प्रकाशित करने से पहले मूल तथ्यों की भी जाँच नहीं कर पाए। स्वाति गोयल शर्मा एक ग्राउंड रिपोर्टर हैं, जिन्होंने दलितों के अधिकारों और उनके खिलाफ अपराधों के बारे में कई मामले सामने रखे हैं। यहाँ तक ​​कि वह दलित कार्यकर्ता संजीव नेवार या अज्ञेय के साथ एक एनजीओ भी चलाती हैं।

स्वाति गोयल शर्मा द्वारा दी प्रिंट के झूठ को उजागर करने के बाद ‘दी प्रिंट’ ने चुपचाप अपने इस ‘विचार’ को हटा दिया। लेकिन तब तक स्वाति गोयल शर्मा लेख के स्क्रीनशॉट ले चुकी थीं। स्वाति गोयल शर्मा ने ट्विटर पर लिखा कि उन्हें ख़ुशी है कि यह लेख हटा लिया गया है लेकिन लेखक फैक्ट चेक करने का ध्यान अवश्य रखें।

यह देखने के बाद कि ‘दी प्रिंट’ का प्रोपेगेंडा बेनकाब हो चुका है, उन्होंने एक ट्वीट के माध्यम से स्वाति गोयल शर्मा से माफ़ी माँगी जिसमें कि डिलीट भी स्क्रीनशॉट रह गया था। दी प्रिंट ने अपने आर्टिकल की ही तरह फिर इस ट्वीट को भी डिलीट किया और दोबारा ट्वीट किया और इस बार स्वाति गोयल के ट्वीट को इसमें लिंक नहीं किया।

हाथरस कांड

मंगलवार (सितम्बर 29, 2020) की सुबह दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में पीड़िता की मौत के बाद से हाथरस मामले को लेकर काफी बहस और राजनीतिक उथल-पुथल देखी जा सकती हैं। हाथरस पुलिस ने बृहस्पतिवार को कहा कि ‘जबरन यौन क्रिया’ अभी तक भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पुष्टि नहीं हो पाई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंटने से मौत को मौत का कारण बताया गया था।

मंगलवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में एक कथित सामूहिक बलात्कार पीड़िता की मौत हो गई। उसके साथ दो सप्ताह पहले कथित तौर पर बलात्कार किया गया था। इस मामले ने देशव्यापी आक्रोश देखा जा रहा है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि हाथरस पुलिस ने परिवार के सदस्यों की सहमति के बिना मंगलवार रात लड़की का जबरन अंतिम संस्कार कर दिया। हालाँकि, पुलिस ने बाद में कहा था कि दाह संस्कार के दौरान पीड़िता के पिता मौजूद थे।

चीन के विरुद्ध हो रहे प्रदर्शन में हॉन्गकॉन्ग की सड़कों पर लहराया तिरंगा, लोगों ने कहा- भारत चीन से लड़ रहा इसलिए हमारा दोस्त

हाल फ़िलहाल के कुछ दिनों में हॉन्गकॉन्ग के भीतर चीन सरकार के विरुद्ध बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन देखा गया है। लौरेल कोर (laurel chore) नाम की पत्रकार और फोटोग्राफर ने हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों की कुछ तस्वीरें और वीडियो ट्विटर पर एक थ्रेड में साझा किए। तमाम तस्वीरों के बीच एक तस्वीर में कुछ ऐसा नज़र आया जिसने सभी का ध्यान अपनी तरफ खींचा। 

विरोध के दौरान वहाँ लोगों के हाथ में भारत का झंडा था। जब उस व्यक्ति से पूछा गया कि उसके पास भारत का झंडा क्यों है तब उसने कहा, “भारत चीन से लड़ रहा है इसलिए भारत हमारा दोस्त है।” लौरेल ने अपने ट्वीट में इस बात का भी ज़िक्र किया कि वह व्यक्ति “STAND WITH INDIA” (भारत के साथ खड़े हो) कह रहा था और भीड़ उसका समर्थन भी कर रही थी। 

चीन के राष्ट्रीय दिवस के मौके पर हॉन्गकॉन्ग के नागरिक चीनी सरकार का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरे थे। लोकतांत्रिक व्यवस्था के समर्थक यह प्रदर्शनकारी लगभग एक साल से सड़कों पर विरोध कर रहे हैं जबसे चीन ने प्रत्यर्पण विधेयक (Hong Kong’s Extradition Bill) पारित किया था। इस विधेयक की मदद से अगर कोई व्यक्ति अपराध करके हॉन्गकॉन्ग आ जाता है तो उसे चीन वापस भेजा जा सकता है। इसमें ताइवान भी शामिल हैं। 

इसके बाद हज़ारों लोग सड़कों पर उतर गए और उन्होंने नारे भी लगाए “Liberate Hong Kong, Revolution of our Times” यानी हॉन्गकॉन्ग को आज़ाद करो, यह हमारे वक्त की क्रांति है। इसके बाद पुलिस ने आंदोलनकारियों को विफल करने का प्रयास किया, हज़ारों पुलिस वालों ने लोगों की तलाशी लेना शुरू कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पुलिस ने दर्जन भर लोगों की घेराबंदी की, उन्हें दीवारों के सामने खड़ा कर दिया, उन्हें हथकड़ियाँ लगा कर अपने साथ ले गई। पुलिस का कहना था कि हॉन्गकॉन्ग की आज़ादी के लिए लगाए जाने वाले नारे लोगों में अलगाव की भावना पैदा करने के लिए और राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुँचाने के लिए लगाए गए थे।

लोकतंत्र समर्थक समूह सिविल ह्यूमन राइट फ्रंट ने पिछले साल हज़ारों लोगों की मौजूदगी में विरोध प्रदर्शन किया था। इसके अलावा सिविल ह्यूमन राइट्स फ्रंट ने पुलिस से चीन के राष्ट्रीय दिवस के मौके पर रैली निकालने की अनुमति भी माँगी थी। लेकिन कोरोना वायरस महामारी के चलते इस रैली की अनुमति नहीं दी गई थी। पिछले साल इतिहास में पहली बार पुलिस ने नौजवान प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई थी। इसके अलावा भीड़ को अलग करने के लिए आँसू गैस के गोले भी छोड़े गए थे।  

PM मोदी ने महात्मा गाँधी और शास्त्री जी को दी श्रद्धांजलि, कहा- बापू के आदर्श समृद्ध, दयालु भारत बनाने में मदद करेंगे

आज लाल बहादुर शास्त्री और महात्मा गाँधी की जयंती है, दोनों नेताओं का देश के लिए योगदान अतुलनीय था। आज पूरा देश उन्हें याद कर रहा है, इसी कड़ी में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजघाट जाकर महात्मा गाँधी को श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें याद करने के अलावा उनकी दी हुई सीख का भी उल्लेख किया। इसके अलावा उन्होंने विजयघाट पर लाल बहादुर शास्त्री को भी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी के साथ गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत अन्य नेता भी मौजूद थे। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजघाट पर महात्मा गाँधी के सामने सिर झुकाया और उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसके अलावा विजयघाट पर देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को श्रद्धांजलि दी। इसके अलावा उन्होंने महात्मा गाँधी का एक वीडियो भी ट्वीट किया। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “गाँधी जयंती के अवसर पर हम बापू के सामने सिर झुकाते हैं। महात्मा गाँधी के जीवन और महान विचारों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। हम आशा करते हैं कि बापू के आदर्श एक समृद्ध और दयालु भारत बनाने में मदद करेंगे।”  

प्रधानमंत्री मोदी ने लाल बहादुर शास्त्री का वीडियो साझा करते हुए उन्हें भी नमन किया। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “लाल बहादुर शास्त्री जी विनम्र और दृढ़ निश्चय वाले व्यक्ति थे। वह सादगी के प्रतीक थे और वह हमेशा देश की भलाई के लिए जिये। उनकी जयंती के अवसर पर हम हृदय तल की गहराइयों से उनका सम्मान करते हैं, हर उस काम के लिए जो उन्होंने देश की भलाई के लिए किया है।” 

वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी उन्हें महात्मा गाँधी की जयंती की पूर्व संध्या पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा, “सरकार जितने भी बड़े कदम उठाती है वह पूरी तरह महात्मा गाँधी की शिक्षा और विचारों से प्रेरित होते हैं।” मोदी सरकार द्वारा देश के लिए किए गए कई उल्लेखनीय प्रयास जैसे महिला सशक्तिकरण, स्वच्छ भारत अभियान, गरीबों और दलितों को सशक्त बनाना किसानों की सहायता और गाँवों में आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना, इन सभी प्रयासों पर राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें इस बात की प्रसन्नता है कि गाँधी जी की शिक्षा ही उनकी सरकार का आधार है। इसके अलावा राष्ट्रपति ने नैतिकता और लक्ष्यों की शुद्धि पर भी बहुत महत्त्व दिया।

राष्ट्रपति ने कहा, “आइए हम राष्ट्र के कल्याण और प्रगति के लिए खुद को फिर से समर्पित करने का संकल्प लें, सत्य और अहिंसा के मार्ग का पालन करें। स्वच्छ, सक्षम, समृद्ध और मज़बूत भारत के निर्माण का संकल्प लें और महात्मा गाँधी के सपनों को सच में तब्दील करें। हमारे राष्ट्रपति महात्मा गाँधी की 151वीं जयंती के अवसर पर मैं कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। उनकी जीवन शैली समाज के कमज़ोर लोगों को सशक्त और मज़बूत बनाने का ज़रिया है। उनके द्वारा दिए गए सत्य और अहिंसा के संदेश से समाज में समरसता और समानता का मार्ग प्रशस्त होता है।”

अंत में लाल बहादुर शास्त्री को याद करते हुए उन्होंने कहा, “देश के पूर्व प्रधानमंत्री की जयंती पर हम उन्हें याद करें, इस देश के एक महान पुत्र जिन्होंने देश के लिए प्रत्याशित रूप से समर्पित थे। चाहे हरित क्रांति हो या श्वेत क्रांति, दोनों में उनकी अहम भूमिका और अद्भुत लीडरशिप देश के लिए हमेशा प्रेरणादायी बनी रहेगी।”

पुलिस स्टेशन में 8 घंटे तक हुई अनुराग कश्यप की ‘रगड़ाई’, रेप के आरोपों का किया खंडन, जाँच के लिए फिर बुला सकती है पुलिस

फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप से मुंबई पुलिस द्वारा अभिनेत्री पायल घोष द्वारा लगाए गए आरोपों के सम्बन्ध में आठ घंटे से अधिक समय तक पूछताछ की गई। पुलिस द्वारा बुलाए जाने के बाद कश्यप सुबह 11 बजे अपने दो सहयोगियों और अपने वकील के साथ वर्सोवा पुलिस स्टेशन पहुँचे। अनुराग कश्यप बुलाए गए समय से पहले ही कागजों के ढेर के साथ उपस्थित हो गए थे।

‘मिड-डे’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुराग कश्यप ने एक विस्तृत बयान दिया और एफआईआर में उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों का खंडन किया। मुंबई पुलिस अब उनके लंबे बयानों को सत्यापित करने के लिए तैयारी कर रही है। प्राथमिकी में कश्यप के बयान में अगर कोई विसंगतियाँ पाई जाती हैं, तो कश्यप को फिर से बुलाया जाएगा।

अनुराग कश्यप शाम 6 बजे पुलिस स्टेशन से चले गए थे। पुलिस अधिकारियों ने कहा कि अनुराग कश्यप के खिलाफ शिकायत दर्ज करने के बाद अभिनेत्री पायल घोष ने अपना मेडिकल परीक्षण करवाया।

अनुराग कश्यप के खिलाफ पायल घोष ने गत 22 सितंबर को वर्सोवा पुलिस के पास एफआईआर दर्ज की, जिसमें आरोप लगाया गया कि उसने 2013 में उसके साथ बलात्कार किया था। कश्यप ने अपने सभी आरोपों से इनकार किया है। घोष और केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने कश्यप के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए महाराष्ट्र के राज्यपाल बी एस कोश्यारी से मुलाकात की थी।

वहीं, अनुराग कश्यप ने अपने वकील प्रियंका खिमानी के माध्यम से एक बयान जारी कर कहा था कि आरोप पूरी तरह से झूठे और दुर्भावनापूर्ण हैं। इस बयान के अनुसार, “मेरे मुवक्किल, अनुराग कश्यप पर लगे यौन दुराचार के झूठे आरोपों से उन्हें गहरा दुख हुआ है, जो हाल ही में उनके खिलाफ सामने आए हैं। ये आरोप पूरी तरह से झूठे, निंदनीय और गलत हैं। यह दुखद है कि #MeToo आंदोलन जितना महत्वपूर्ण है, उसे निहित स्वार्थों के लिए चुना गया है और चरित्र हनन का एक उपकरण मात्र बना दिया गया है।”

कागज के ढेर के साथ उपस्थित हुए अनुराग कश्यप

बृहस्पतिवार (अक्टूबर 01, 2020) सुबह थाने पहुँचने के दौरान अनुराग कश्यप के हाथ में कागजों का बंडल नजर आया। इस बंडल के साथ वह पुलिस थाने में घुस रहे थे। फिल्म निर्माता की हालिया तस्वीरें सामने आने के बाद ट्विटर पर एक पुरानी बहस छिड़ गई। यह बहस ‘कागज नहीं दिखाने’ को लेकर थी।

दरअसल, जिस समय सीएए के विरोध में प्रदर्शन हो रहे थे और प्रदर्शनकारी ‘कागज नहीं दिखाएँगे’ जैसे नारे लगा रहे थे, उस समय अनुराग बॉलीवुड की उन शख्सियतों में से थे जो सोशल मीडिया पर जोर-शोर से इसका समर्थन कर रहे थे और ज्यादातर ट्वीट के जवाब में लिखते थे, ‘कागज नहीं दिखाएँ।’

अब सोशल मीडिया यूजर्स उनके ऐसे ही ट्वीट को उनकी हालिया तस्वीर के साथ शेयर करके मजाक उड़ा रहे हैं। कोई पूछ रहा है कि अनुराग ने जब अपने सारे डॉक्यूमेंट्स जला दिए थे तो कागज कहाँ से आए। कोई कह रहा है कि अभी तो एनआरसी भी नहीं आई, अभी से क्यों कागज निकाल लिए। इसके अलावा कोई अनुराग के हाथों में बंडल देखकर उसे फिल्म की स्क्रिप्ट बता रहा है तो कोई उन्हें ही झूठा बता रहा है।

सुपर कम्युनिस्ट शास्त्री: बेटी इंदिरा के हाथ में देश सौंपने के लिए नेहरू ने मृत्यु से पहले ही कर लिए थे पूरे इंतजाम

‘Who After Nehru’ यानी, ‘नेहरू के बाद कौन?’ मई 27, 1964 को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अखबारों के पहले पन्नों पर यही प्रमुख शीर्षक था।

1964 में जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने भारत के प्रधानमंत्री का पद संभाला। जिस तरह से ब्रिटेन में विंस्टन चर्चिल को ‘वॉर टाइम प्राइम मिनिस्टर’ कहा जाता है, उसी तरह से यदि लाल बहादुर शास्त्री को भी एक ऐसे समय में चुने गए प्रधानमंत्री की संज्ञा दी जाए, जब भारत हर तरफ से संकट से घिरा हुआ था तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा।

प्रधानमंत्री बनने के लिए शास्त्री जी का जनादेश आसान नहीं था। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद राष्ट्र का नेतृत्व करने की उनकी क्षमता को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर एक खंडित सहमति थी। वहीं, 1962 की हार और एक गंभीर खाद्य संकट से जूझने के बाद भारत का मनोबल गिर गया था। 1965 में पाकिस्तान इस ‘कमजोर नेतृत्व’ का फायदा उठाना चाहता था। उम्मीदों के विपरीत, शास्त्री जी ने शुरू से ही संसद में भाषणों के माध्यम से सीमा पर पाकिस्तानी उकसावे का जवाब दिया, जिससे भारत की सीमाएँ और भावना स्पष्ट हो गईं। वह पकिस्तान के राष्ट्रपति खान को यह कठोर संदेश दे चुके थे कि दृढ़ संकल्पित राष्ट्र भारत की इच्छा नहीं है कि पाकिस्तानी क्षेत्र के एक वर्ग इंच का भी अधिग्रहण करे लेकिन कभी भी कश्मीर, जो कि भारत का अभिन्न अंग है, में पाकिस्तान द्वारा किसी भी तरह के हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देगा।

भारत तब किन हालातों से गुजर रहा था इसका अंदाजा नेहरू की मौत के बाद सी राजगोपालाचारी द्वारा कही गई बातों से लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा था,

“अब भारत के सामने सबसे बड़ा खतरा पाकिस्तान के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित कर पाने में असमर्थता या फिर इस महत्वपूर्ण मुद्दे की उपेक्षा है। कम्म्युनिस्ट आक्रामकता भारत और पाकिस्तान के सभी समझदार लोगों की पहली चिंता होनी चाहिए। मुझे यह भी लगता है कि आर्थिक धरातल पर अब सबसे बड़ा खतरा महंगे टैक्सेशन की नीति और अब तक की योजनाबद्ध सोवियत शैली की योजना भी महँगाई की ओर ले जा रही है। जनसंख्या का महत्वपूर्ण तत्व, जिस पर लोकतंत्र निर्भर करता है, मुद्रास्फीति और कराधान के बीच कुचल दिया जाता है। सामान्य शब्दों में कहें, तो सबसे बड़ा खतरा अब नई सरकार के लिए चली आ रही नीतियों में बदलाव का है।”

नेहरू की मौत के बाद प्रधानमंत्री का चुनाव

नेहरू की मौत के बाद शुरु हुई अगले प्रधानमंत्री की खोज और ये जिम्मेदारी दी गई उस वक्त कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष के कामराज को दिया गया। वर्तमान समय में कई लोग, खासकर कॉन्ग्रेस के ही कुछ कद्दावर नेता यह तर्क देते हुए कि कॉन्ग्रेस में गैर-गाँधी/नेहरू परिवार से पहले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ही थे। जाहिर सी बात है कि कॉन्ग्रेस के समर्थकों द्वारा दिए जाने वाले यह कुतर्क सिर्फ इस राजनीतिक दल में व्याप्त ‘डायनेस्टी पॉलिटिक्स’ के सत्य पर पर्दा डालने के लिए ही इस्तेमाल किए जाते रहे हैं।

नेहरू की मृत्यु के बाद तत्कालीन कॉन्ग्रेस जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और इंदिरा गाँधी के खेमें में बँट चुकी थी। लेकिन एक ओर जहाँ मोरारजी देसाई किसी भी सूरत में मानने को राजी नहीं थे तो वहीं के कामराज खुद मोरारजी देसाई को देश की बागडोर नहीं सौंपना चाहते थे।

लेकिन क्या लाल बहादुर शास्त्री ही तब कॉन्ग्रेस की पहली पसंद थे या यह बस इंदिरा गाँधी को सत्ता तक लाने का एक जरिया मात्र था? वास्तव में, इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने की जो रणनीति जवाहरलाल नेहरू ने बनाई थी, उसे धरातल तक लाने का काम के कामराज ने ही किया था। वह जानते थे कि अगर मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बनते हैं, तो आगे चलकर इंदिरा गाँधी की राजनीति की राह कठिन हो जाएगी।

यही वो समय था जब कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के कामराज ने अप्रत्याशित तरीके से लाल बहादुर शास्त्री का नाम प्रधानमंत्री पद के लिये प्रस्तावित किया और सारे बड़े नाम धराशाई हो गए।

जवाहरलाल नेहरू के मन में अपने उत्तराधिकारी के तौर पर हमेशा से ही उनकी बेटी इंदिरा गाँधी थी। यह बात किसी और ने नहीं बल्कि खुद लाल बहादुर शास्त्री ने दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैय्यर से कही थी। इसका जिक्र कुलदीप नैय्यर ने अपनी पुस्तक ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में किया है।

कुलदीप नैय्यर ने लिखा, ”एक बार मैंने शास्त्री का मन टटोलते हुए पूछा था कि नेहरू का उत्तराधिकारी कौन होगा? तो शास्त्री ने कहा था कि उनके (नेहरू) दिल में तो उनकी सुपूत्री (इंदिरा गाँधी) हैं। लेकिन ये आसान नहीं होगा।”

कुलदीप नैय्यर ने अपनी इस पुस्तक में इस बात का भी खुलासा किया कि लाल बहादुर शास्त्री नेहरू के दिमाग में अपने उत्तराधिकारी के लिए पहले विकल्प नहीं हैं। इन सभी घटनाक्रमों का भविष्य में क्या प्रभाव पड़ा इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंदिरा गाँधी लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद दिल्ली में उनकी समाधि बनाने के पक्ष में नहीं थी।

कुलदीप नैय्यर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री ने जब आमरण अनशन की धमकी दी तो मामले की गंभीरता को समझते हुए इंदिरा को फैसला बदलना पड़ा और दिल्ली में शास्त्री जी की समाधि बनवानी पड़ी।

इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने की क्रोनोलॉजी

जवाहरलाल नेहरू ने इंदिरा गाँधी को सिर्फ 42 साल की उम्र में कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष बनने में मदद की। कॉन्ग्रेस में वंशवाद की राजनीति का पहला चरण यही था। नेहरू की मृत्यु के बाद, इंदिरा गाँधी को राज्यसभा भेजा गया और शास्त्री सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया। लाल बहादुर शास्त्री जी के देहांत के तुरंत बाद इंदिरा गाँधी देश की प्रधानमंत्री बन गई थी।

जो लोग यह दावा करते हैं कि नेहरू के बाद प्रधानमंत्री बनने की रेस में इंदिरा गाँधी का नाम तक नहीं लिया गया था उन्हें ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की उस खबर का हवाला दिया जाना चाहिए जिसमें नेहरू की मृत्यु से ठीक 5 महीने पहले ही जनवरी 09, 1964 को नेहरू के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में इंदिरा गाँधी का उल्लेख किया गया था।

नेहरू और शास्त्री की मौत के बाद सत्ता परिवर्तन का गवाह बने कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता डीपी मिश्रा, नेहरू के इस पूरे खेल की योजना बताते हुए कहते हैं –

“नेहरू द्वारा विकसित की गई रणनीति के अनुसार, अपनी बेटी को प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार किया जाना था, फिर मोरारजी देसाई और जगजीवन राम – दो महत्वाकांक्षी, सक्षम और प्रभावशाली प्रतिद्वंद्वियों को हटाना, और अंत में सरकार और कॉन्ग्रेस, दोनों को ऐसे पुरुष के हाथों में देना होगा जिसे उनकी बेटी द्वारा आसानी से हटाया जा सकता हो।”

“कामराज योजना के माध्यम से, उन्होंने अपनी सरकार से देसाई और जगजीवन राम को हटा दिया। कामराज को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष चुना गया और सरकार को गुलजारीलाल नंदा, टीटी कृष्णामाचारी और लाल बहादुर शास्त्री के हाथों में छोड़ दिया।”

‘सुपर कम्युनिस्ट लाल बहादुर शास्त्री’

शास्त्री जी को रूस में ‘सुपर कम्युनिस्ट’ बुलाए जाने की घटना से शायद ही बहुत लोग वाकिफ हों। दरअसल, जनवरी 03, 1966 में ताशकंद के दौर पर गए लाल बहादुर शस्त्री ने तत्कालीन सोवियत संघ के अपने समकक्ष अलेक्सी कोशिगिन (Alexei Kosygin) द्वारा उपहार में दिए गए कोट को अपने साथ गए एक स्टाफ को दे दिया था। इससे प्रेरित होकर रूसी प्रधानमंत्री कोशिगिन ने उन्हें ‘सुपर कम्युनिस्ट’ कहा था।

जब शास्त्री जी रूस पहुँचे तो उनके शरीर पर उन्हें ठंड से बचने के लिए पर्याप्त कपड़े तक नहीं थे। यह देखकर कोशिगिन ने शास्त्री जी को एक ओवरकोट उपहार में दिया था। उनका कहना था कि ‘मैंने इसे अपने एक स्टाफ को दे दिया, जो कड़ाके की ठंड में पहनने के लिए अच्छा ऊनी कोट नहीं लाया था।’

इस पर कोशिगिन ने शास्त्री और जनरल अयुब खान के सम्मान में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में इस घटना का जिक्र करते हुए कहा, “हम बस नाम के कम्युनिस्ट हैं, लेकिन शास्त्री सुपर कम्युनिस्ट हैं।”

शास्त्री जी के जीवन मूल्य और उनके जीवन से जुड़े कई ऐसी पहलू हैं, जो उन्हें किसी भी समय और काल के राजनेता से कहीं ऊपर साबित करते हैं लेकिन शास्त्री जी के व्यक्तित्व को समेट पाना इतना भी आसान नहीं है।

इस चित्र में शास्त्री जी के निधन के 3 महीने बाद उनकी पत्नी ललिता शास्त्री इस फसल को काट रही हैं। शास्त्री जी ने 10 जनपथ पर यह फसल खाद्य संकट के दौरान देशवासियों को प्रेरित करने के लिए उगाई थी।

चाहे कर्ज लेकर फ़िएट कार खरीदने की घटना हो, अकाल के समय अपने घर पर खेती कर देशवासियों को संदेश देने का उदाहरण या फिर सादे जीवनशीली के कारण रूस में ‘सुपर कॉमरेड’ कहलाए जाने की घटना हो, शास्त्री जी के रूप में इस देश को अकस्मात् ही सही लेकिन एक विराट व्यक्तित्व मिला था, जिसे कि दुर्भाग्यवश हमने शायद बहुत ही कम समय में खो भी दिया।

लाल बहादुर शास्त्री ने मात्र अपने 18 महीने के कार्यकाल में ही ‘नेहरू के बाद कौन?’ जैसे सवालों का बेहद सटीक जवाब दे दिया था। बेहद आम, सरल स्वभाव के शास्त्री जी ने महज 18 महीनों में नेहरू को कद के सामने एक ऐसी और कहीं अधिक मजबूत तस्वीर पेश कर डाली थी, जिसका एकमात्र ध्येय भारत निर्माण था। और ऐसा उन्होंने समकालीन नेताओं की तरह अंतरराष्ट्रीय पत्राचार, सैद्धांतिक भाषण या फोटोग्राफ से नहीं बल्कि अपने द्वारा किए गए कार्यों से कर के दिखाया। एमके गाँधी जिस परिवर्तन की बात करते थे, शास्त्री जी वो परिवर्तन स्वयं बने।

प्राइम टाइम में अर्नब का डंका, 77% दर्शक देखते हैं रिपब्लिक; राजदीप और NDTV के शो दर्शकों के लिए तरसे

अर्नब गोस्वामी ने जब से अपना न्यूज चैनल रिपब्लिक टीवी लॉन्च किया है तभी से उनके इस चैनल ने समाचार जगत में टॉप पोजिशन बनाई हुई है। अपने आरंभ के साथ ही इंग्लिश न्यूज सेक्टर में शीर्ष स्थान बना लेने वाले इस मीडिया नेटवर्क के हिंदी चैनल ‘रिपब्लिक भारत’ ने भी व्यूअरशिप डेटा में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लिया है।

रिपब्लिक टीवी का यह हिंदी चैनल दशकों से चले आ रहे इंडिया टीवी, आजतक, एनडीटीवी इंडिया को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ा है। इसकी जानकारी ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल ऑफ इंडिया (BARC) ने जारी की है।

हालाँकि, इन आँकड़ों के साथ ही अब जब रिपब्लिक नेटवर्क के दोनों चैनल प्रतिस्पर्धा में आगे निकल गए हैं, प्राइम टाइम में अर्नब गोस्वामी और अन्य शीर्ष एंकर के बीच का अंतर और भी व्यापक हो गया है।

BARC के ताजा आँकड़ो के अनुसार, रात 9 बजे का स्लॉट, जो प्राइम टाइम का होता है और जिसे समाचार चैनलों के शीर्ष एंकर होस्ट करते हैं, उसमें भी रिपब्लिक टीवी की व्यूअरशिप अन्य अंग्रेजी समाचार चैनलों की तुलना में बहुत अधिक है।

इंग्लिश चैनल का 19 से 25 सितंबर तक का BARC डेटा
हिंदी चैनल का 19 से 25 सितंबर तक का BARC डेटा

गौरतलब है कि अर्नब गोस्वामी रिपब्लिक टीवी पर “द डिबेट विद अर्नब गोस्वामी एट 9” शो होस्ट करते हैं। उसी समय पत्रकार राजदीप सरदेसाई इंडिया टुडे पर न्यूज़ टुडे को होस्ट करते हैं और नविका कुमार टाइम्स नाउ पर न्यूजऑवर को होस्ट करती हैं। टाइम्स नाउ में रहते अर्नब गोस्वामी इस शो को होस्ट करते थे।

9 बजे के स्लॉट के लिए रिपब्लिक टीवी का मार्किट शेयर 77.18% है, जिसका मतलब है कि अंग्रेजी न्यूज चैनल देखने वाले हर पाँच में से चार दर्शक ने रात 9 बजे अर्नब गोस्वामी के मशहूर डिबेट डिस्कशन को देखा है।

इस कड़ी में 7.56% के साथ अगला नंबर CNN News18 है। इसके बाद 7.02% के साथ तीसरे स्थान पर इंडिया टीवी है। CNN News18 के शो ब्रास ट्रैक को ज़क्का जोकोब द्वारा होस्ट किया जाता है, वहीं इंडिया टुडे के कार्यक्रम को राजदीप सरदेसाई होस्ट करते हैं।

वहीं NDTV के आँकड़ों को जान कर आप चौक जाएँगे। उसके 9PM डिबेट शो का डेटा मात्र 1.30% है। NDTV के रात 9 बजे का शो विष्णु सोम होस्ट करते हैं।

उल्लेखनीय है कि रिपब्लिक भारत भी 9 बजे के स्लॉट में सबसे टॉप स्थान पर है। हालाँकि यहाँ कंपीटिशन में अंतर अंग्रेजी चैनलों के विपरीत है। चैनल का रात 9 बजे के स्लॉट का शेयर 15.8% है। वहीं ज़ी न्यूज़ का 14.28%, आजतक का 14.06%, न्यूज़ 18 इंडिया का 12.22% और इंडिया टीवी के 11.58% शेयर डेटा सामने आया है।

अर्नब गोस्वामी का चैनल उन मुद्दों पर आवाज उठाने की वजह से चर्चा में आया है, जिन मुद्दों पर इंडिया टुडे और एनडीटीवी जैसे चैनलों ने चुप्पी साध ली थी या तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे थे। जैसे हाल ही का सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में लगातार कवरेज। आँकड़ों से पता चलता है कि उनके कार्यक्रमों को दर्शकों द्वारा पसंद किया जाता है। 75% से अधिक दर्शक उनके शो को देखते हैं। दूसरी और जो चैनल अर्नब की खिंचाई करने में पीछे नहीं रहते, उनके 9 बजे के स्लॉट के आँकड़े मार्किट में एक डिजिट से भी कम है।

लॉकडाउन, मास्क, एंटीजन टेस्ट… कोरोना को रोकने के लिए भारत ने समय पर लिए फैसले, दुनिया ने किया अनुकरण

भारत में कोरोना संक्रमण के मामले अब धीरे-धीरे 63 लाख का आँकड़ा पार कर चुके हैं। पिछले 24 घंटों की यदि बात करें तो पॉजिटिव केसों की संख्या 86 हजार से अधिक आई है। इसी के साथ भारत हर दिन सबसे अधिक नए कोरोना केस और मौतें रिकॉर्ड करने वाला देश बन गया है।

ऐसे में कई लोगों को लगता है कि भारत ने कोरोना संक्रमण को रोकने के नाम पर अपनी प्रतिक्रिया का केवल प्रचार ही किया है और उचित कदम नहीं उठाए हैं। इन दावों की पड़ताल करते हुए ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के सीनियर फेलो और हेल्थ इनिशिएटिव के हेड ओसी कुरियन ने इस पर अपनी बात रखी है। उन्होंने ट्वीट थ्रेड में एंटीजन, मास्क और लॉकडाउन सब पर चर्चा की है।

वह लॉकडाउन से बात शुरू करते हैं और बताते हैं कि लॉकडाउन को एक आपदा कहना फैशन हो गया है, जबकि लॉकडाउन का मकसद कोरोना के प्रसार पर रोक लगाना था। साथ ही लॉकडाउन से हेल्थ सिस्टम को अच्छे से तैयारी करने का मौका भी मिला।

आगे वह कहते हैं कि यह बहस हो सकती कि लॉकडाउन को कैसे लंबे समय तक के लिए लागू किया गया था। लेकिन उसी दौरान, ये ध्यान में रखना होगा कि लॉकडाउन एकमात्र साधन था जिससे हम महामारी से होने वाले नुकसान को कम कर सकते थे और इससे निपटने के लिए थोड़ा समय ले सकते थे। आज मृत्यु दर के आँकड़े देखकर हम इस बात की शिकायत नहीं कर सकते कि इससे संक्रमण पर फर्क नहीं पड़ा।

इसके बाद वह भारत के उन निर्णय पर गौर करवाते हुए कहते हैं कि जब सरकार ने रैपिड एंटीजन टेस्ट को बढ़ावा दिया था, तब भारतीय विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया था। मगर अब WHO ही रैपिड टेस्ट का विज्ञापन पूरी दुनिया में कर रहा है। ध्यान रखने वाली बात हैं कि भारत ने रैपिड टेस्टिंग का फैसला लॉकडाउन रहते ही ले लिया था।

आगे वह बताते हैं कि जून तक भी WHO इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं था कि जनता को मास्क पहनने से फायदा होगा या नहीं। मगर, 130 करोड़ जनसंख्या वाले भारत में बड़े भागों में इसे अप्रैल से पहले ही कंपल्सरी कर दिया गया। अमेरिका में मास्क अनिवार्य 5 जुलाई किया गया था।

वह लिखते हैं कि भारत एक जटिल देश हैं और निश्चित रूप से उसके लिए महामारी से निपटना बड़ी चुनौती है। प्रणालीगत कमजोरियों को देखते हुए, भारत के राज्य और केंद्र, संक्रमण की बढ़ती संख्या के बावजूद मृत्यु दर को कम रखने और उसमें गिरावट को लेकर, एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य को कर रहे हैं। हम विफल नहीं हुए हैं।

UP: भदोही में 14 साल की दलित बच्ची की सिर कुचलकर हत्या, बिना कपड़ों के शव खेत में मिला

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में एक दलित नाबालिग किशोरी का शव खेत से बरामद किया गया है। 14 साल की किशोरी की सिर कुचलकर हत्या की गई है। परिजनों ने बलात्कार की आशंका भी जताई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना भदोही के गोपीगंज कोतवाली क्षेत्र की है। 14 वर्षीय दलित नाबालिग दोपहर के वक़्त शौच के लिए खेत की तरफ गई थी। काफी देर तक वह नहीं लौटी तो परिजनों ने खेत की तरफ जाकर उसे खोजा। वहाँ उसकी खून से सनी लाश पड़ी थी। उसका सिर कुचल दिया गया था।

नाबालिग लड़की को तुरंत पास के अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। उसका सर किसी बड़े पत्थर की कुचला गया था। उसके शरीर पर कपड़े भी नहीं थे।

घटना की जानकारी प्राप्त होते ही पुलिस मौके पर पहुँच गई। शव को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। परिजनों ने आशंका जताई है कि उनकी बेटी को रेप के बाद मारा गया है। पुलिस ने वारदात स्थल की जाँच पड़ताल की साथ ही फोरेंसिक एक्सपर्ट और क्राइम ब्रांच की टीम को भी मौके पर जाँच के लिए बुलाया गया।

भदोही पुलिस ने इस मामले में ट्विटर पर जानकारी देते हुए बताया कि 14 वर्ष की किशोरी की हत्या अज्ञात व्यक्तियों द्वारा ईंट-पत्थर से मारकर हत्या कर दी गई है। थाना गोपीगंज पुलिस द्वारा घटना के सम्बन्ध में हत्या का अभियोग पंजीकृत किया गया है।

वहीं मामले में पुलिस अधीक्षक ने बताया उसके साथ दुष्कर्म हुआ है या नहीं, ये पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही पता चल सकेगा। फिलहाल मौके पर जिले के आला अधिकारी के साथ भारी पुलिस बल तैनात है। पुलिस अधीक्षक के मुताबिक अपराधियों की खोजबीन की जा रही है।

इंडिया टुडे के राहुल कँवल, हिन्दी नहीं आती कि दिमाग में अजेंडा का कीचड़ भरा हुआ है?

हाथरस मामले में जिस तरह से मीडिया गिरोह के लोगों ने अपने प्रोपेगेंडा को भुनाया है, उसे देख कर यही लगता है मानो उन्हें किसी ऐसी ही घटना के होने का इंतजार था। हर एंगल को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। पीड़ित परिवार का दुख तो मानो ऐसे लोगों से कोसो दूर है। ताजा कारनामा इंडिया टुडे के न्यूज डायरेक्टर राहुल कँवल ने कर दिखाया है। 

राहुल कँवल ने योगी सरकार से घृणा व्यक्त करने और यूपी प्रशासन की छवि खराब करने के लिए अपने सोशल मीडिया फॉलोवर्स को बरगलाने की कोशिश की है। उन्होंने ट्विटर पर मृतका के पिता और जिलाधिकारी के बीच बातचीच का एक वीडियो शेयर किया है।

इसमें साफ सुना जा सकता है कि जिलाधिकारी मृतका के पिता को समझा रहे हैं कि मीडिया वाले ज्यादा दिन वहाँ नहीं रहने वाले। कुछ अभी चले गए हैं और कुछ कल चले जाएँगे। ऐसे में उनके साथ सिर्फ़ वही (प्रशासन) खड़े रहेंगे। इसलिए वह बार-बार अपने बयान न बदलें।

वे कहते हैं, “आप अपनी विश्वसनीयता खत्म मत करिए। ये मीडिया वाले, मैं आपको बता दूँ, आज अभी आधे चले गए, कल सुबह तक आधे और निकल जाएँगे, दो-चार बचेंगे कल शाम तक। हम आपके साथ खड़े हैं। अब आपकी इच्छा है कि आपको बार बार बयान बदलना है कि नहीं बदलना है।”

जिलाधिकारी के उक्त बयान से साफ पता चल रहा है कि वे पीड़िता परिवार के साथ खड़े होने की बात कर रहे हैं। मगर अब राहुल कँवल जिलाधिकारी की इसी बात को ऐसे लिखते हैं जैसे जिलाधिकारी किसी कोने में ले जाकर मृतका के पिता से बात कर रहे हों और किसी ने चुपचाप उनका स्टिंग कर लिया।

राहुल लिखते हैं, “हाथरस के जिलाधिकारी  कैमरे पर पीड़ित परिवार को भयभीत करते पकड़े गए।” राहुल का दावा है कि जिलाधिकारी कह रहे हैं, “आधा मीडिया चला गया है। आधा जल्दी चला जाएगा। हम ही यहाँ बचेंगे।”

गौर करिए कि एक ओर जहाँ वीडियो में जिलाधिकारी स्पष्ट तौर पर कह रहे हैं कि वही लोग उनके साथ खड़े रहेंगे। उसमें राहुल चंद शब्दों के फेर बदल से कैसे उसे अपने अजेंडा के लिए तैयार कर रहे हैं। राहुल आगे पूछते हैं कि अगर वरिष्ठ अधिकारियों का ही यह बर्ताव होगा तो निष्पक्ष जाँच कैसे हो पाएगी। 

राहुल के ट्वीट और जिलाधिकारी की ऑडियो सुनकर विचार करने वाली बात ये है कि आखिर क्या इंडिया टुडे ने ऐसे पत्रकारों को अपने संस्थान का बड़ा चेहरा बनाया हुआ जिन्हें भावानुवाद की इतनी भारी समस्या है कि वो भाषा बदलने भर से सारी बातचीत का भाव ही बदल दें? या फिर ये राहुल कँवल के खुद के अजेंडे का हिस्सा है कि सब कुछ जानने-सुनने-समझने के बाद भी वह केवल आदतों से बाज नहीं आना चाहते।

प्रियंका गाँधी ने भी शेयर की थी वीडियो, पीछे से आ रही थी आवाज

गौरतलब है कि इससे पहले एक वीडियो कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने पोस्ट की थी। इस वीडियो में मृतका के पिता आरोप लगा रहे थे कि उन पर दबाव बनाया गया। हालाँकि, वीडियो में यह स्पष्ट सुनाई पड़ रहा था कि कोई उन्हें बैकग्राउंड से वैसी बात कहने को बोल रहा है। इस वीडियो में सीबीआई जाँच की माँग कर रहे थे।

कठुआ कांड की तरह ही मीडिया लिंचिंग की साजिश तो नहीं? 31 साल पहले भी 4 नौजवानों ने इसे भोगा था

शहर एक नए किस्म के अपराधियों से परेशान था। ये लड़कों के छोटे-छोटे समूहों में होते थे और लोगों पर हमला कर उनके साथ मारपीट और लूटपाट किया करते थे। ‘वाइल्डिंग’ नाम के ऐसे समूह 1989 के दौर में अमेरिका के न्यूयॉर्क में खासे कुख्यात थे।

न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क में वसंत की एक शाम 1989 में ऐसे ही एक ‘वाइल्डिंग’ गिरोह के हमले की खबर आई। इसे ‘सेंट्रल पार्क जॉग्गर केस’ बुलाया जाता है। तृषा मिली नाम की 28 साल की एक युवती जो शाम के वक्त जॉगिंग करने गई थी, उस पर हमला कर उसे बेहोश कर दिया गया और फिर उसके साथ बलात्कार किया गया था।

उस शाम ये इकलौता हमला नहीं था। उस शाम ‘वाइल्डिंग’ गिरोहों ने सेंट्रल पार्क में ही 8 दूसरे हमले किए थे। कई लोगों को चोटें आई थीं, और लूटपाट भी हुई थी। इस बलात्कार की घटना पर हंगामा मच गया। न्यूयॉर्क पुलिस डिपार्टमेंट के साथ-साथ फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआई) पर भी इस मामले को जल्द से जल्द सुलझाने का दबाव था। अमेरिका के लिए 80-90 के दशक नारीवादी आंदोलनों और महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के बढ़ते मामलों का दौर था तो सभी नारीवादियों ने इस मामले पर जमकर लिखा-बोला।

अमेरिकी (और इसाई) लोगों पर जो रंगभेद के आरोप लगते हैं, उसने भी अपनी भूमिका निभाई। पीड़िता गोरी थी और 5 लड़के जो इस मामले में पकड़े गए थे, वे सभी अश्वेत थे। गिरफ्तार लड़कों में से सिर्फ कोरी वाइज ही 16 साल का था। बाकी चारों कम उम्र के थे इसलिए उन्हें जुविनाइल होम में सजा काटने भेजा गया। कोरी वाइज को जेल में डाल दिया गया। इन लोगों को 5 से 15 वर्ष तक की सजा हुई थी। अपराधियों ने अपना जुर्म स्वीकार लिया था, सजा हो गईं, लेकिन वो डीएनए टेस्टिंग का दौर नहीं था। बलात्कार एक ने किया था या सभी ने ये भी पता नहीं चला।

कई वर्ष बीत गए और 2001 में एक दिन मटियास रीज़ ने स्वीकार किया कि 29 अप्रैल 1989 की शाम इन लड़कों ने नहीं, बल्कि उसने अकेले ही तृषा मिली का बलात्कार किया था! इस बयान के आधार पर मामले की जब दोबारा जाँच हुई तो पता चला कि सचमुच ऐसा ही था।

गिरफ्तार करके सजा भुगतने वाले पाँचों लड़कों के सभी रिकॉर्ड से उनके जेल जाने और बलात्कार के अपराधी होने को मिटाया गया। इन्हें जो 41 मिलियन डॉलर का मुआवजा मिला, वो न्यूयॉर्क शहर के इतिहास में सबसे ज्यादा था। ओपरा विनफ्रे ने हाल ही में इन लड़कों की कहानी पर एक डॉक्यूमेंट्री श्रृंखला “व्हेन दे सी अस” बनाई है जो कि खासी चर्चित भी रही।

भारत के लिहाज से ऐसी घटनाओं को देखें तो फिल्मों के जरिए जो नैरेटिव गढ़ा जाता है उसका ठाकुर अत्याचारी, लाला पैसे चुराने वाला कपटी और ब्राह्मण धूर्त ही दिखाते हैं। ऐसे में जब शोषित समाज के वंचित कहे जाने वाले तबकों से हो और आरोपित तथाकथित ऊँची मानी जाने वाली जातियों से, तो मीडिया लिंचिंग के लिए एक बढ़िया मौका तैयार हो जाता है।

खुद को नारीवादी घोषित करते बुद्धिपिशाच मामले में जाति का एंगल घुसेड़ते हैं। परंपरागत रूप से हिन्दू समाज में होने वाले तथाकथित शोषण का तड़का और ‘बेटियाँ बचेंगी क्या?’ के सवाल का छौंका लगाते हैं। अपराध के अनुसंधान से पहले ही मामले में आरोपित को अपराधी घोषित कर दिया जाता है।

वैसे देखा जाए तो इसमें कानूनों का दोष भी कम नहीं है। आम अपराधों की तरह बलात्कार में ‘अपराध सिद्ध होने तक निर्दोष (Innocent until proven guilty)’ के सिद्धांत पर नहीं, बल्कि ‘स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने तक अपराधी (Guilty until proven otherwise)’ के सिद्धांत पर मुकदमा चलता है।

हाथरस कांड के आरोपितों में से एक, रामकुमार के पिता बताते हैं कि रामकुमार 14 सितंबर को हर रोज की तरह सुबह 7 बजे फैक्ट्री के लिए निकला था। वहाँ के सीसीटीवी और हाजिरी के रजिस्टर की जाँच होगी।

क्या कठुआ की तरह बुद्धि-पिशाचों ने फिर एक बेक़सूर की मीडिया लिंचिंग की तैयारी की है? जब तक मामला अदालत की सुनवाई तक नहीं पहुँचता, तब तक बुद्धिपिशाचों के नोंचने के लिए कुछ नौजवान तो हैं। फिर अदालत से बरी हुए भी तो क्या, उसे ये “इंसाफ की हत्या” कह देंगे!