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कहानी खूनी मिंजर की: संप्रदाय विशेष के स्थानीय लोगों ने आतंकियों को दी थी शरण… और चम्बा में मार डाले गए थे 35 हिन्दू

भारत में हिन्दुओं के कई नरसंहार ऐसे हैं, जिनके बारे में हमें ही कुछ भी पता नहीं है। ऐसी ही एक घटना हिमाचल प्रदेश के चम्बा में हुई थी, जब हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के आतंकियों ने 35 हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया था। जो कहते हैं कि आतंकियों का कोई मजहब नहीं होता, उनके मुँह पर इन आतंकियों ने बार-बार तमाचा मारा है – हिन्दुओं को निशाना बना कर। हिमाचल के चम्बा में भी ऐसा ही कुछ हुआ था।

चम्बा जिले की सीमा जम्मू के डोडा से लगती थी। वहाँ अधिकतर हिन्दू ही थे, ऐसे में आतंकियों ने उस जगह को जानबूझ कर निशाना बनाया था। इस घटना में 11 लोग घायल भी हुए थे। सबसे बड़ी बात कि इस नरसंहार में मारे गए लोगों में अधिकतर गरीब मजदूर थे। लेकिन, उनका कसूर बस इतना था कि वो हिन्दू थे। गरीबों के हितों का दावा करने वाले एक्टिविस्ट्स और राजनीतिक दल इस पर बात नहीं करते।

आइए, शुरू से जानते हैं कि उस सोमवार (अगस्त 3, 1998) को हुआ क्या था। वो ऐसा समय था जब जम्मू कश्मीर में अशान्ति फैली रहती थी। सत्ता के ठेकेदार दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक मलाई चापते रहते थे और जनता मरती रहती थी। आतंकियों के मंसूबे आसमान पर हुआ करते थे। लेकिन, हिमाचल प्रदेश शांत था। वहाँ इस तरह की ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी। लेकिन अगस्त 1998 के पहले हफ्ते में ही सब बदल गया।

आतंकियों ने उस दिन चम्बा जिले के दो अलग-अलग जगहों को निशाना बनाया था। दूसरा हमला रात के डेढ़ बजे सतरुंडी में हुआ रहा, जहाँ 6 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया और 3 घायल हुए। इससे पहले कालाबान में आतंकियों ने धावा बोला था। यहाँ 26 लोग गोलियों से भून डाले गए थे और 8 घायल हुए। दूसरी घटना भी एकदम तड़के हुई। सुबह जब हिमचाल के लोग सोकर उठे तो उनकी नींद इस खूनी खबर के साथ खुली।

आतंकियों ने ऐसी हिमाकत कैसे की, इसे समझने के लिए पहले हमें हिमाचल प्रदेश के चम्बा का भूगोल समझने की ज़रूरत है। ये वही जिला है, जहाँ ऐतिहासिक मिंजर और मणिमहेश मेला लगता आ रहा है। हमेशा मेले के समय आतंकी हमलों का खतरा बना रहता था और आतंकियों से निपटने के लिए विशेष व्यवस्था करनी होती थी। इस जिले की खासियत ये है कि इसके कुछ हिस्सों से जम्मू कश्मीर और पंजाब, दोनों राज्यों में पैदल ही पहुँचा जा सकता है।

मिंजर मेले का प्रभाव प्रदेश स्तरीय है, जबकि मणिमहेश इतना लोकप्रिय है कि इसमें देशभर से तीर्थ यात्री चंबा का रुख करते हैं। चम्बा-पठानकोट हाईवे पर तुन्नूहट्टी में सुरक्षा व्यवस्था का विशेष ध्यान रखना पड़ता है और वहाँ अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ती है। अब आते हैं वापस 1998 के नरसंहार पर। दरअसल, जब हिमाचल के चम्बा में उस वक्त हिन्दुओं का नरसंहार हुआ था, तब वहाँ मिंजर मेला ही लगा हुआ था।

चम्बा में जब आतंकियों ने मचाया कोहराम (साभार: जम्मू कश्मीर नाउ)

इसे आज भी लोग ‘खूनी मिंजर’ के नाम से जानते हैं। आज भी जब ये मेला लगता है तो लोग उस पल को याद कर ज़रूर काँप उठते हैं। मिंजर मेले में हमला करने वाले आतंकियों ने न सिर्फ हिन्दुओं को मारा और उन्हें घायल किया था, बल्कि कइयों को वो बँधक बना कर भी ले गए थे। कालाबान में भी ये आतंकी जम्मू कश्मीर के डोडा से ही घुसे थे। उनके पास ऑटोमेटिक हथियार थे। आतंकियों ने जैसे ही गरीब हिन्दू मजदूरों को सोते हुए देखा, फायरिंग शुरू कर दी।

दोनों जगह मरने वाले हिन्दुओं में अधिकतर मजदूर ही थे। कई ख़बरों में तो ऐसा भी बताया गया था कि आतंकियों ने उन हिन्दुओं को मारने से पहले उन्हें पेड़ से बाँध दिया था, उसके बाद उन्हें एक-एक कर गोलियों से भून डाला गया। सबसे बड़ी बात तो ये कि इतना सब कुछ हो गया और पुलिस-प्रशासन सोता रहा, सरकार सोती रही। इस घटना के 6 घंटे बाद पुलिस को इसके बारे में पता चला, जब दो घायल किसी तरह 8 किलोमीटर पहाड़ ट्रेक कर के मनसा पुलिस स्टेशन पहुँचे।

असल में आतंकियों के गुस्से का कारण वहाँ हो रहे कंस्ट्रक्शन के काम थे। आतंकी नहीं चाहते थे कि क्षेत्र का विकास हो, क्योंकि इससे दूरदराज के क्षेत्रों में लोगों की आवाजाही आसान हो जाती। वो लोग बैरागढ़-सतरुंडी रोड के निर्माण के कारण खफा थे, इसीलिए उन्होने इस नरसंहार को अंजाम दिया। आतंकियों ने उस क्षेत्र को एक तरह से अपना अड्डा ही बना रखा था और पंजाब व जम्मू कश्मीर में दबाव के कारण वो बर्फ पिघलते ही वहाँ जम जाते थे।

जब ये घटना हुई, तब जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री थे फ़ारूक़ अब्दुल्ला और हिमाचल प्रदेश में प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में भाजपा की सरकार चल रही थी। जैसे ही ये घटना हुई, धूमल ने अपने समकक्ष अब्दुल्ला से बातचीत की और जॉइंट ऑपरेशन के जरिए आतंकियों के सफाए का ऑफर दिया। हालाँकि, अब्दुल्ला परिवार शुरू से आतंकियों और अलगाववादियों को लेकर नरम रुख दिखाता रहा है।

इसके बाद डोडा के भदरवाह में कैम्प कर रहे राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों को आनन-फानन में हिमाचल प्रदेश पुलिस की मदद के लिए उन दुर्गम इलाक़ों में भेजा गया। राष्ट्रपति केआर नारायणन और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस घटना की निंदा की थी। राष्ट्रपति ने अपने शोक सन्देश में उम्मीद जताई थी कि प्रशासन इस निर्दयी नरसंहार को रोकने में सक्षम होगा और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए दोषियों को गिरफ्तार करेगा।

वहीं पीएम वाजपेयी ने भी सरकार व अधिकारियों को इस हमले के गुनहगारों से कठोरतम तरीके से निपटने का निर्देश जारी किया। इससे कुछ दिनों पहले ही अब हिमाचल प्रदेश के कुछ लोग बगल के डोडा जिले में जड़ी-बूटियों के लिए गए थे तो आतंकियों ने उनमें से 4 को मौत के घाट उतार दिया था। एक गुज्जर ने उनके मृत शरीर को देखा, जो वहीं पड़े हुए थे। इसके बाद पुलिस को सूचित किया गया था।

असल में दिक्कत ये थी कि जैसे ही बर्फ पिघलनी शुरू होती थी, चम्बा के लोग वहाँ से उतर कर मैदानी इलाक़ों में काम-धाम के लिए निकलते थे और उनके घर खाली रहते थे। जब पूरे क्षेत्र में अधिकतर घर खाली हो जाते थे तो जम्मू कश्मीर में केंद्रीय बलों से बचने के लिए आतंकी उन्हें अपना ठिकाना बना कर वहीं रहने लगते थे। जम्मू कश्मीर के आतंकी उन घरों को अपने ‘हाईडआउट्स’ के रूप में इस्तेमाल करते थे, ऐसा सीएम धूमल ने भी ध्यान दिलाया था।

इतिहास और भूगोल के बाद अब जरा वहाँ के समाज को समझ लेते हैं। दरअसल, इस नरसंहार के बाद गुज्जरों और गद्दियों में संघर्ष शरू हो गया था। उनमें तनाव पसर गया था क्योंकि गुज्जर संप्रदाय विशेष के थे और गद्दी हिन्दू। सरकार ने मजबूर होकर गुज्जरों को मैदानी इलाकों में पर उतारा, ताकि वहाँ शांति बनी रहे। उन्हें अपने जानवरों सहित नीचे उतारा गया। इसके एक साल बाद गुज्जर वापस चम्बा के ऊँचे इलाक़ों में लौटे थे।

वर्तमान में ‘नेटवर्क 18’के ग्रुप कंसल्टिंग एडिटर प्रवीण स्वामी ने तब ‘फ्रंटलाइन’ में इस तनाव पर लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया था कि हिन्दुओं ने कभी गुज्जरों (संप्रदाय विशेष) के खिलाफ हिंसा नहीं की लेकिन उनका आरोप था कि ये गुज्जर आतंकी हरकतों में भागीदार हैं और आतंकियों की मदद करते हैं। वो आतंकियों को अपने घर देते थे और भोजन-पानी की भी व्यवस्था करते थे। हिमाचल स्थित चम्बा में हिन्दुओं के नरसंहार मामले में जिन 6 लोगों को आतंकियों की मदद के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, वो सभी गुज्जर (संप्रदाय विशेष) थे।

इस घटना की चर्चा 17 सालों बाद कोर्ट में तब हुई थी, जब एक समाजिक कार्यकर्ता संगत सिंह चौहान ने संप्रदाय विशेष के सारे लोगों को पाकिस्तान भेजने के लिए याचिका दायर की थी और कुछ मजबूत पॉइंट्स भी दिए थे। उस दौरान इसकी चर्चा हुई थी कि किस तरह हिमाचल के चम्बा में हिंदुओं का नरसंहार करने वाले संप्रदाय विशेष के ही थे और वो हिन्दू मंदिरों को भी अक्सर निशान बनाते रहते हैं। हालाँकि, जस्टिस रोहिंटन ने इसे नकारते हुए पूछा था कि क्या वो सचमुच इसे लेकर गंभीरता से दलीलें पेश करना चाहते हैं?

उसी साल वंधामा में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। रविवार (जनवरी 25, 1998) की रात इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, वंधामा (Wandhama Massacre) के 23 हिन्दू क़त्ल किए जा चुके थे। उन्हें बेरहमी से मारा गया था। कइयों के तो शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए थे। लाशों को देख कर स्पष्ट पता चलता था कि ये कोई आम कत्लेआम नहीं है क्योंकि कातिलों के मन में हिन्दुओं के प्रति इतनी घृणा थी, जो क्षत-विक्षत लाशों को देख कर ही पता चल रहा था।

समीर खान ने बेगम आयशा को रॉड से पीट-पीटकर मार डाला, शव के 6 टुकड़े कर हाइवे पर फेंका

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में एक महिला का शव ट्रोली बैग में मिला था। पुलिस ने इस मामले की गुत्थी सुलझा ली है। मृतक महिला की पहचान आयशा के तौर पर हुई है। उसकी हत्या उसके शौहर समीर खान ने की थी।

ख़बरों के मुताबिक़ समीर खान नेपाल की और भागने की तैयारी में था। लेकिन पुलिस ने उसे समय रहते गिरफ्तार कर लिया।  

कुछ ही दिन पहले लखनऊ-अयोध्या राजमार्ग पर सफेदाबाद थाने के तहत आने वाले केवाड़ी मोड़ पर एक ट्रोली बैग और ब्रीफकेस मिला था। ट्रोली बैग में एक महिला का शव था। शव 6 टुकड़ों में था। पुलिस ने मामले में जाँच शुरू की तो पता चला कि महिला का नाम आएशा है। वह मुंबई के अंबेडकर नगर टाटा वहसत मार्ग, भारत नगर के रहने वाले बादशाह शेख की बेटी है। आएशा लखनऊ के इंदिरानगर में अपने पति समीर खान के साथ रहती थी। जिसने उसकी हत्या करके उसके 6 टुकड़े किए थे। पुलिस ने आरोपित पति को लखनऊ इंदिरानगर के मुंशी पुलिया से सर्विलांस के ज़रिये गिरफ्तार किया।  

ख़बरों के मुताबिक़ 5 जुलाई को आएशा और उसके पति समीर खान में कुछ विवाद हुआ। इसके बाद समीर ने रॉड से पीट-पीट कर उसकी हत्या कर दी। समीर खान मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलरामपुर महाराजगंज थाना क्षेत्र के गुलरिहा का रहने वाला है। वह मुंबई के बांद्रा क्षेत्र की चिकन शॉप में काम करता था और लॉकडाउन की शुरुआत में लखनऊ वापस आ गया था।

आयशा की हत्या करने के बाद समीर खान ने बाजार से चापड़ और शव को पैक करने के लिए अन्य सामग्री खरीदकर लाया। हत्या की रात शव के छह टुकड़े कर ब्रीफकेस और बैग में भरकर अपने वाहन से ले जाकर हाइवे पर फेंक दिया था।  

इस मामले पर बाराबंकी पुलिस अधीक्षक ने बताया कि जिस ट्रोली बैग में महिला का शव मिला, उसमें ही पुलिस को दो सबसे अहम सुराग मिले थे। पहला सुराग था बिजली का बिल जिसमें कुछ नंबर थे। दूसरा सुराग था आरोपित पति की जींस जिसमें लखनऊ के एक पार्क के दो टिकट मिले थे। इन दो अहम सुरागों के आधार पर पुलिस ने इस मामले की जाँच शुरू की थी। बिजली का बिल एक महिला के नाम पर था। पुलिस जब उस महिला से पूछताछ करने पहुँची तो उसने बताया कि मकान समीर खान को बेच दिया है।  

महिला ने ही पुलिस को समीर खान का नंबर भी दिया। पुलिस ने नंबर को सर्विलांस पर रखा और उसकी कॉल डिटेल भी निकाली।  इन दोनों की मदद से पुलिस को आरोपित पति की लोकेशन का पता चला। हालाँकि तब तक समीर खान ने वह नंबर बंद भी कर दिया था। इसके बावजूद पुलिस ने सर्विलांस सेल की मदद से आरोपित की असल लोकेशन खोज ली। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में उसने बताया कि वह नेपाल भागने की फ़िराक में था। 

‘कोर्ट ने बाबरी गिराने वालों को पुरस्कृत किया’: स्वरा भास्कर के खिलाफ अवमानना का मामला को लेकर याचिका

स्वरा भास्कर के खिलाफ आपराधिक अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करने की माँग को लेकर भारत के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल के समक्ष एक याचिका दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि कथित विचारक ने माननीय न्यायालय के खिलाफ लोगों को विद्रोह के लिए उकसाने के इरादे से बयान दिया था।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि स्वरा भास्कर ने 01 फरवरी 2020 को मुंबई में ‘सांप्रदायिकता के खिलाफ कलाकार’ (Artists against communalism) नामक एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए अयोध्या फैसले को लेकर कहा था कि अदालत तय नहीं कर पा रही है कि वो संविधान में यकीन करती है या नहीं।

याचिका के अनुसार, स्वरा भास्कर ने कहा था, “हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं, जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस गैरकानूनी था और उसी फैसले में मस्जिद को गिराने वाले लोगों को पुरस्कृत किया गया।”

याचिका में स्वरा भास्कर पर यह आरोप लगाया गया है कि उनका बयान न केवल सस्ती लोकप्रियता का स्टंट था, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के खिलाफ जनता को विद्रोह करने के लिए जान-बूझकर किया गया प्रयास भी था।

एडवोकेट अनुज सक्सेना, उषा शेट्टी, प्रकाश शर्मा और महेश माहेश्वरी की ओर से दायर इस याचिका में कहा गया है कि कथित विचारक के बयान माननीय न्यायालय की कार्यवाही और सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों की विश्वसनीयता के संबंध में जनता के बीच अविश्वास की भावना पैदा करने की क्षमता रखता है।

उल्लेखनीय है कि शीर्ष अदालत की 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गत वर्ष 9 नवंबर को अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हुए सर्वसम्मति से फैसला सुनाया था और केंद्र को सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए पाँच एकड़ भूमि आवंटित करने का निर्देश दिया था। इस फैसले के बाद श्रीराम मंदिर निर्माण की प्रक्रियाओं ने जोर पकड़ा और इसी माह की 5 तारीख को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर का भूमिपूजन किया।

स्वरा भास्कर के खिलाफ याचिका ऐसे समय में डाली गई है जब सुप्रीम कोर्ट ने वकील प्रशांत भूषण को अवमानना मामला में दोषी करार दिया है।

‘गलवान में चोट लगने से हुई हवलदार बिशन सिंह की मौत’: हिंदुस्तान टाइम्स के दावे को पीआईबी ने नकारा

हिंदुस्तान टाइम्स ने हवलदार बिशन सिंह की मौत को लेकर जो दावा किया था उसे सोमवार (17 अगस्त 2020) को प्रेस इन्फोर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) ने खारिज कर दिया है। हिंदुस्तान टाइम्स में 16 अगस्त 2020 को प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया था गलवान घाटी में चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच टकराव के दौरान चोटें आने से 42 साल के बिशन सिंह की मौत हो गई।  

पीआईबी ने इसे गलत बताते हुए कहा कि बिशन सिंह की मौत का कारण चोटें नहीं थी। लेह के सैनिक अस्पताल में बिशन सिंह का इलाज चल रहा था। 6 अगस्त को उन्हें चंडीगढ़ के सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हवलदार सिंह मूल रूप से पिथौरागढ़ के बंगपानी के रहने वाले थे। रविवार 16 अगस्त को हल्द्वानी, नैनीताल के रानीबाग़ में उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई।

पीआईबी ने हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि बिशन सिंह की मृत्यु अन्य स्वास्थ्य कारणों से हुई है, न कि गलवान घाटी में चीन के सैनिकों के साथ हुए टकराव के बाद आई चोटों की वजह से। पीआईबी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर इस घटना से संबंधित जानकारी दी।  

इसके पहले भी हिंदुस्तान टाइम्स गलत तथ्यों पर आधारित ख़बरें प्रकाशित कर चुका है। मई में हिंदुस्तान टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें ऐसा कहा गया था एक प्रवासी बच्चे की मौत हो गई, जब उसके पिता रेलवे स्टेशन पर दूध की तलाश कर रहे थे। इस खबर में दावा किया गया था कि मूल रूप से बिहार का रहने वाला 4 साल का बच्चा स्टेशन पर भूख की वजह से मर गया। इस दौरान उसके पिता दूध और कुछ खाने का सामान खोज रहे थे। हिंदुस्तान टाइम्स ने अपनी ख़बर में बच्चे की मौत का कारण भूख बताया।  

इस ख़बर के चर्चा में आने के बाद रेलवे ने इसका असल पहलू बताया। रेलवे ने बताया कि वह बच्चे पहले से ही काफी बीमार था। इलाज करवाने के बाद श्रमिक स्पेशल ट्रेन में दिल्ली से अपने घर बिहार जा रहा था। रेलवे ने यह भी बताया कि बच्चे की मृत्यु ट्रेन से उतरने के 5 घंटे बाद हुई थी। इन बातों से यह साफ़ होता है कि बच्चे की मौत का कारण भूख नहीं थी।    

नहीं रहे शास्त्रीय संगीत के ‘रसराज’, लॉकडाउन के चलते अमेरिका के न्यूजर्सी में ली अंतिम साँस

लोकप्रिय भारतीय शास्त्रीय गायक पंडित जसराज का सोमवार (अगस्त 17, 2020) को अमेरिका के न्यूजर्सी में कार्डियक अरेस्ट के कारण निधन हो गया। वह इस साल जनवरी में 90 साल के हो गए थे।

पद्म विभूषण पंडित जसराज पिछले कुछ समय से अपने परिवार के साथ अमेरिका में ही थे। उन्होंने कोरोना वायरस के बीच जारी लॉकडाउन के कारण अमेरिका में ही रुकने का फैसला लिया था। उनके परिवार की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, “गहरे दुख के साथ हम बता रहे हैं कि संगीत मार्तंड पंडित जसराज जी ने आज सुबह 5.15 EST को न्यूजर्सी, यूएसए में अपने घर पर कार्डियक अरेस्ट के कारण अंतिम साँस ली।”

लगभग 80 वर्षों के संगीतमय करियर के दौरान, पंडित जसराज भारतीय शास्त्रीय संगीत के शीर्ष पर रहे और पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण सहित विभिन्न प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों का प्राप्त किया। उन्होंने शास्त्रीय गायकों की एक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व किया।

पीएम मोदी ने जताया शोक

पंडित जसराज के निधन पर प्रतिक्रिया देते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट में कहा, “पंडित जसराज जी के निधन से भारतीय सांस्कृतिक क्षेत्र में एक खालीपन आ गया है। न केवल उनकी प्रस्तुतियाँ उत्कृष्ट थीं, उन्होंने कई अन्य गायकों के लिए एक असाधारण गुरु के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। दुनियाभर में उनके परिवार और प्रशंसकों के प्रति संवेदना। ॐ शांति।”

पंडित जसराज पहले भारतीय संगीतकार थे जिनके नाम पर एक छोटे ग्रह का नाम रखा गया था। अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने मंगल और बृहस्पति के बीच एक छोटे सा ग्रह -VP32 (संख्या -300128), नवंबर 11, 2006 को ‘पंडितराज’ के रूप में खोजा गया था। इनके अलाव अन्य प्रसिद्ध संगीतकार जिनके नाम पर खगोलीय पिंड हैं, वे मोजार्ट, बीथोवेन और टेनर लुसियानो पावारोट्टी हैं।

साल 2012 में उन्होंने 82 साल की उम्र में अंटार्कटिका पर अपनी प्रस्तुति दी। इसके साथ ही वे सातों महाद्वीप में कार्यक्रम पेश करने वाले पहले भारतीय बन गए। पद्म विभूषण से सम्मानित मेवाती घराना के पंडित जसराज ने जनवरी 08, 2012 को अंटार्कटिका तट पर ‘सी स्पिरिट’ नामक क्रूज पर गायन कार्यक्रम पेश किया था।

अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था ‘रसराज’

पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी, जो कि कविता और संगीत के पारखी, ने पंडितजी को ‘रसराज’ कहा था। उन्होंने अपनी जीवनी, ‘रसराज: पंडित जसराज’ के लॉन्च के दौरान इस बात का खुलासा किया था। उन्होंने कहा था कि यह एक उपाधि है, जिसे वह सबसे ज्यादा प्यार करते हैं।

‘उम्मीद है और बीजेपी वाले मरेंगे’: चेतन चौहान की मौत का जश्न मनाने वाले को फॉलो करते हैं कॉन्ग्रेस, आप के नेता

अमित बहेरे पहले भी बीजेपी और आरएसएस से जुड़े लोगों के खिलाफ नफरत फैला चुका है। अब वह ट्विटर पूर्व क्रिकेटर और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रहे चेतन चौहान की मौत का जश्न मना रहा है। चौहान कोरोना से संक्रमित थे। इलाज के दौरान रविवार को मेदांता में उनकी मृत्यु हो गई थी।

जब सभी लोग महामारी की वजह से चौहान की असमय मृत्यु का शोक मना रहे थे, संवेदनाएँ जता रहे थे, तभी बहेरे ने उनको लेकर घृणा से भरी टिप्पणी की। उसने कहा कि उसे इस बात की बेहद ख़ुशी है कि भाजपा नेता की मौत हुई। वह चाहता है कि भाजपा के ज़्यादा से ज्यादा नेताओं की मौत हो। उसने अपने ट्वीट में लिखा, “मैं चाहता हूँ कि मौत से पहले उन्हें (भाजपा के नेताओं) बहुत पीड़ा हो।”

इसके बाद उसने मनोहर पार्रिकर, अरुण जेटली और चेतन चौहान के लिए अपशब्द भी लिखे। अंत में उसने लिखा कि चाहता है कि यह सारे नेता मर जाएँ।

इस ट्रोल (अमित बहेरे) को कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी के तमाम बड़े नेता भी फॉलो करते हैं। इसके अलावा कई बड़े मीडिया समूहों के मशहूर पत्रकार भी उसे फॉलो करते हैं। इसमें बरखा दत्ता का मोजो, स्वघोषित फैक्ट चेकिंग वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़ का सह संस्थापक हर्ष मंदर जैसे लिबरल शामिल हैं।  

वह सिर्फ इतने पर ही रुका नहीं इसके बाद उसने कारण भी बताया कि वह चेतन चौहान की मौत पर क्यों खुश है। दूसरे ट्वीट में कारण बताते हुए उसने एक बार फिर नफ़रत फैलाई और कई अपशब्द कहे। इसके बाद उसने कहा कि वह हर नाज़ी की मौत का भी जश्न मनाएगा। अमित बहेरे ने सिलसिलेवार तरीके से ट्वीट करके मौत जैसे संजीदा मुद्दे पर ज़हर उगला।  

लेकिन हैरानी की बात है कि यह पहला ऐसा मौक़ा नहीं है जब उसने इस तरह सोशल मीडिया पर नफ़रत फैलाई हो। यह वही ट्रोल है जिसने कुछ समय पहले कहा था ‘संघियों को गटर में होना चाहिए।’ इस साल जनवरी में एक ट्विटर यूज़र ने अपनी 90 वर्षीय दादी को ‘प्राउड भक्त’ कहा। इस बात को केंद्र में रखते हुए अमित ने ट्विटर पर कहा जब उसकी दादी की मौत होगी, तब वह उन्हें भी गटर में फेंक देगा। बाद में अपने बच्चों को बताएगा भी कि उसने ऐसा क्यों किया।  

इसके पहले रक्षा विश्लेषक अभिजीत अय्यर मित्रा ने भी इस इंसान द्वारा फैलाई गई नफ़रत के बारे में बताया था। अभिजीत ने एक स्क्रीनशॉट साझा किया था, जिसमें अमित कह रहा था कि वह चाहता है कि अरुण जेटली जैसे नेताओं को धीमी और पीड़ा से भरी मौत मिले। इसके बाद उसने यह भी कहा कि वह कैसे वह इन मौतों की ख़ुशी मनाएगा। इसके अलावा उसने मनोहर पार्रिकर के बारे में भी ज़हर उगला था।      

‘बीजेपी की वफादार फेसबुक’ ने जब BJP समर्थक कटेंट को किया सेंसर: पेज एडमिन्स ने बताया क्या-क्या झेला

फेसबुक को भाजपा समर्थक बताने के इरादे से एक प्रोपेगेंडा बड़े स्तर पर शुरू किया गया है। हालाँकि, ये सभी आरोप पहली नजर में ही बेबुनियाद और हास्यास्पद नजर आते हैं। वाम-उदारवादियों ने फेसबुक को अनइनस्टॉल करने की इस मुहिम में तथ्य और तर्कों को सबसे पहले हाशिए पर रख दिया है।

अमेरिकी समाचार पत्र ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ द्वारा फेसबुक के भाजपा समर्थक होने के आरोप लगाते लेख प्रकाशित होने के बाद एक नई किस्म की बहस ने जन्म ले लिया है। फेसबुक के भाजपा समर्थक होने के सभी आरोप बेबुनियाद हैं, क्योंकि फेसबुक की कम्युनिटी गाइडलाइन्स भी हमेशा से ही वामपंथियों के समर्थन में ही रही है।

फेसबुक यूजर की ‘लैंगिक पहचान’, जो कि वामपंथी राजनीतिक विचारधारा की गहराई में समाया हुआ शब्द है, को बेहद वास्तविक अवधारणाओं, जैसे कि नस्ल, जातीयता, धार्मिक पहचान और ऐसी अन्य पहचान के साथ रखता है।

यदि कोई फेसबुक यूजर इस अवधारणा के खिलाफ मुखर है कि एक पुरुष, एक महिला हो सकती है, यदि वह ऐसा होने का दावा करता है, तो यूजर पर ‘हेट स्पीच’ का आरोप लगाया जा सकता है और उसका अकाउंट निलंबित किया जा सकता है। ऐसे में भी हमें यह विश्वास करना होगा कि इस तरह के एक संगठन ने अचानक हिंदुत्ववादी पार्टी में दिलचस्पी दिखाई है।

हेटस्पीच के सम्बन्ध में फेसबुक गाइडलाइंस

ऐसे भी कई प्रमाण हैं जब देखा गया कि फेसबुक भाजपा के पक्ष में नहीं हो सकता है, क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कुछ लोगों द्वारा अभियान चलाया गया और भाजपा का समर्थन करने वाले कुछ फेमस फेसबुक पेजों को बिना किसी स्पष्ट कारण के सस्पेंड करवाया गया।

उदाहरण के लिए, अप्रैल 2019 में फेसबुक द्वारा INC का समर्थन करने वाले 687 फेसबुक पेजों को निलंबित कर दिया गया था। इसके बाद भाजपा का समर्थन करने वाले पेजों को भी फेसबुक से हटा दिया गया, लेकिन ख़ास बात यह थी कि भाजपा के ये पेज इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस के हटाए गए पेजों के मुकाबले कहीं अधिक फेमस और ऑडियंस वाले थे।

भाजपा के समर्थन में लिखने वाले ऐसे ही फेसबुक पेजों में से एक ‘चौपाल’ पेज था, जिसके कि वर्तमान में फेसबुक पर करीब 10.8 मिलियन ‘लाइक्स’ हैं। इन पेजों को फेसबुक द्वारा मिलने वाला पैसा भी स्थगित कर दिया गया था। ‘चौपाल’ पेज को 90 दिनों में फिर से ‘री-स्टोर’ कर दिए जाने का भी आश्वासन दिया गया था, लेकिन यह नहीं हुआ।

सोशल मीडिया इन्फ़्लुएन्सर विकास पाण्डेय ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया था कि कॉन्ग्रेस का समर्थन करने वाले जिन पेजों को बंद कर दिया गया था, वह भाजपा के बंद कर दिए गए पेजों की तुलना में बेहद छोटे और ख़ास फेमस भी नहीं थे। इसके अलावा, भाजपा समर्थक पेजों को बंद करने का कारण यह बताया गया कि इन्हें चलाने वाले पेज एडमिन की ‘प्रोफाइल फेक’ थी।

इसी तरह की घटना से ‘द फ्रस्ट्रेटेड इन्डियन’ (The Frustrated Indian) नाम के फेसबुक पेज को भी रूबरू होना पड़ा। IANS समाचार एजेंसी द्वारा प्रकाशित खबर को पब्लिश करने पर बूम लाइव द्वारा उसे फेक बता दिया गया। यह समाचार एजेंसी द्वारा प्रकाशित एक सिंडिकेट न्यूज़ थी। जब इस पेज के एडमिन ने फेसबुक से सम्पर्क करने की कोशिश की तो वह विफल रहा।

इसी तरह से नेशन वांट्स नमो (Nation Wants NaMo) नाम के एक पेज को आम चुनावों से ठीक पहले बिना किसी कारण और चेतावनी के ही हटा दिया गया था।

इसी तरह से ‘पॉलिटिकल कीड़ा’ नाम के पेज चलाने वाले अंकुर सिंह ने ऑपइंडिया को बताया कि फेसबुक की गाइडलाइन्स या तो स्पष्ट नहीं या फिर वह इसे बेहद अस्पष्ट रखते हैं ताकि मनमुताबिक पेजों को हटा दिया जाए। उनका कहना है कि उनके MEME और चुटकुले फैक्टचेक कर दिए जाते हैं। इसके साथ ही, ऐसे वीडियो, जो कॉन्ग्रेस पार्टी को निशाना बनाते हैं, उन्हें वायरल होने से पहले ही फेसबुक से हटा दिया जाता है।

अंकुर सिंह ने कहा कि पेजों को बिना किसी सूचना और जानकारी के विशेष तरीके से हटा दिया जाता है और जब कोई अपील की जाती है, तो उन्हें किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया देने के बजाए ऑटो-आंसर द्वारा जवाब दिया जाता है।

फेसबुक से ‘डोभाल फैन क्लब’, ‘आई सपोर्ट अजीत डोभाल ’, ‘आई सपोर्ट ज़ी न्यूज़’ जैसे बड़े फेन फ़ॉलोविंग वाले पेज, जिनके पास 4 मिलियन से लेकर 1 मिलियन तक की ऑडियंस थी, फेसबुक द्वारा सेंसर किए गए थे। भाजपा के समर्थक कई अन्य फेसबुक पेज हैं, जो इसी तरह के कुछ ‘हादसों’ का शिकार हुए हैं।

इन तमाम उदाहरणों के बावजूद वाम-उदारवादी वर्ग द्वारा लगाए जाने वाले आरोप शुरू से ही बेबुनियाद नजर आते हैं। यह भी सम्भव है कि फेसबुक ने अब इन लिबरल्स की शर्तों पर खरा उतरना बंद कर दिया हो, जिस कारण फेसबुक के खिलाफ यह प्रायोजित अभियान छेड़ा जा रहा है।

सलमान ने की साजिश, शाहरुख खान ने भी किया था बेइज्जत, बेह​द दुखी थे सुशांत: ​जिम पाटर्नर ने लगाए गंभीर आरोप

सुशांत सिंह के जिम पार्टनर सुनील शुक्ला ने सलमान और शाहरुख खान पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि शाहरुख खान ने सुशांत का अपमान किया था। इससे वे काफी दुखी थे। इसके अलावा वह सलमान खान की रची गई साज़िश का भी शिकार हुए हैं। सुनील शुक्ला ने करन जौहर और सलमान खान पर सुशांत सिंह की फिल्म ‘ड्राइव’ बंद करने का भी आरोप लगाया।  

सुनील शुक्ला ने कहा कि एक वक्त ऐसा आ गया था जब ये सारे लोग तय करते थे कि सुशांत सिंह को कम से कम फ़िल्में मिलें। इसके अलावा सुनील ने बताया कि सुशांत सिंह आईफ़ा अवार्ड्स में शाहरुख खान और शाहिद कपूर के साथ मंच साझा करने वाले थे। शाहरुख ने शो के पहले सुशांत से बात की थी। उनसे कहा था कि वे मंच पर उनकी फिल्म ‘काई पो चे’ का ज़िक्र करेंगे।  

सुनील ने कहा, “सुशांत ने मुझे बताया था कि शाहरुख खान ने एक सिगनेचर स्टेप तैयार करने के लिए कहा था। सुशांत इस प्रस्ताव और बुलावे से बेहद खुश था। शाहरुख खान ने उससे यह भी कहा था कि उसके (सुशांत) संघर्ष और अब तक के सफ़र के बारे में भी पूछेंगे। लेकिन इन सारी बातों से ठीक उलट उन्होंने मंच पर सुशांत को बेइज्ज़त करना शुरू कर दिया। शाहिद कपूर और शाहरुख खान ने सुशांत को सभी के सामने बेइज्ज़त किया।”  

सुनील के मुताबिक़ सुशांत शाहरुख खान के इस व्यवहार से सुशांत बहुत ज़्यादा निराश थे। उन्हें इस बात का दुःख था कि वे शाहरुख खान को हमेशा से अपना पसंदीदा कलाकार मानते रहे थे, लेकिन उन्होंने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया। सुनील ने करन जौहर और सलमान खान पर भी कई आरोप लगाए। सुनील के मुताबिक़ सलमान और करन दोनों ने यह साज़िश रची कि सुशांत सिंह को बड़ी फिल्म में काम करने का मौक़ा नहीं मिले। 

करन जौहर ने सुशांत सिंह और जैकलीन फर्नांडिस को ‘ड्राइव’ फिल्म के लिए साइन किया था। लेकिन फिल्म के बीच में ही जैकलीन को रेस 3 में काम करने का प्रस्ताव मिल गया। यहाँ करन ने जैकलीन को दूसरी फिल्म में काम करने से नहीं रोका पर सुशांत को दूसरी फिल्म में काम करने से पूरी तरह मना कर दिया। इसके अलावा भी सुनील शुक्ला ने सुशांत सिंह से जुड़े ऐसे कई खुलासे किए हैं जो हैरान करने वाले हैं।      

सुनील ने बताया कि साल 2018 के नवंबर-दिसंबर के दौरान उनकी सुशांत से मुलाक़ात हुई थी। उनके अनुसार सुशांत मिजाज़ में सबसे अलग थे और वह कभी अवसाद में नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि सुशांत ने बहुत संघर्ष किया था और उसमें बहुत ज्यादा आत्मविश्वास था। सुनील के मुताबिक़ वह दोनों जिम में वर्कआउट के दौरान मिलते थे और काफी बातें भी करते थे।             

हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत की कथित आत्महत्या मामले में एक और बड़ा रहस्य सामने आया था। एक तरफ सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियाँ इस मामले की जाँच कर रही है, वहीं दूसरी तरफ सामने आए एक वीडियो में एक मिस्ट्री बैग और एक संदिग्ध महिला के देखे जाने के बाद चर्चा का बाजार फिर से गर्म हो गया था। इस वीडियो में एक और व्यक्ति भी दिख रहा है, जिसकी पहचान हो गई थी।

ये वीडियो ‘रिपब्लिक टीवी’ ने जारी किया था। इस वीडियो में देखा जा सकता है कि सुशांत सिंह राजपूत के मृत शरीर के पास एक व्यक्ति काले रंग का बैग लेकर खड़ा है। गुलाबी रंग की टोपी पहने उस आदमी को सुशांत सिंह राजपूत का हाउस मैनेजर दीपेश सावंत बताया जा रहा है, जो काला बैग लेकर सीढ़ियों से उतर रहा है। साथ ही एक महिला भी दिख रही है, जो नीले और सफ़ेद रंग की स्ट्रीप्ड शर्ट पहनी हुई है।

इस वीडियो में उक्त महिला को सुशांत के अपार्टमेंट वाली कंपाउंड में दौड़ते हुए देखा जा सकता है। वो लड़की दौड़ते हुए आकर उस आदमी से मिलती है, जो काला बैग थामे हुए है। अगले फुटेज में उस आदमी के हाथ से बैग गायब नज़र आता है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि जब ये होता है, तब मुंबई पुलिस वहीं पर मौजूद रहती है। इस बैग का क्या रहस्य है और वो ‘मिस्ट्री वुमन’ कौन है, इस पर सवाल उठ रहे हैं।

इस वीडियो के सामने आने के बाद सुशांत सिंह राजपूत के परिवार के वकील ने भी बैग, उसे थामे व्यक्ति और लड़की को लेकर सवाल खड़े किए थे। वकील विकास सिंह ने कहा था कि इस वीडियो में जो दिख रहा है वो सब संदिग्ध है। उन्होंने कहा कि उक्त व्यक्ति क्या सामान लेकर जा रहा है और वो लड़की कौन है, इसका खुलासा होना चाहिए। उन्होंने पूछा कि कहीं ये सब सबूत मिटाने के लिए तो नहीं क्या गया?

‘सोनिया गाँधी को 100 नेताओं ने लिखी चिट्ठी, नेतृत्व बदलने की माँग’: कॉन्ग्रेस ने कहा- हमारे नहीं संजय झा

संजय झा ने एक बार कॉन्ग्रेस की अंदरूनी राजनीति गरमा दी है। उन्होंने आज (अगस्त 17, 2020) ट्वीट कर दावा किया कि लगभग 100 कॉन्ग्रेस नेता (सांसद सहित) पार्टी के आंतरिक मामलों से परेशान हैं और इसे लेकर उन्होंने पार्टी हाईकमान को पत्र लिखा है।

झा को पार्टी ने पिछले दिनों निलंबित कर दिया था। अब इस ट्वीट के बाद पार्टी ने उनसे पूरी तरह पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हुए कहा है कि वे बीजेपी के इशारे पर ऐसा कर रहे हैं।

संजय झा ने अपने ट्वीट में दावा किया कि सोनिया गाँधी को लिखे पत्र में इन नेताओं ने राजनीतिक नेतृत्व बदलने की माँग की है। साथ ही कॉन्ग्रेस कार्यसमिति में पारदर्शी चुनावों की भी माँग की है।

इस ट्वीट के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। कॉन्ग्रेस ने उनके दावे को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी कोई चिट्ठी ने लिखी गई और न उन्हें मिली है।

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, “गलत सूचना फैलाने वाले टीवी चैनलों को आज वॉट्सऐप पर निर्देश आ चुका है कि क्या करना है। आज उनको कॉन्ग्रेस नेताओं के ऐसे पत्र पर स्टोरी चलाने को कहा गया है, जो कभी लिखा ही नहीं गया है। ये फेसबुक से भाजपा के लिंक की खबरों से ध्यान हटाने की एक कोशिश है।”

गौरतलब है कि पिछले दिनों संजय झा को कॉन्ग्रेस ने प्रवक्ता पद से हटा दिया था। गहलोत-पायलट के विवाद के बीच ट्वीट को लेकर उन्हें बाद में पार्टी से निलंबित कर दिया गया। महाराष्ट्र प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी ने पार्टी के खिलाफ काम करने और अनुशासन तोड़ने को लेकर संजय झा के खिलाफ ये कार्रवाई की थी।

बता दें, इससे पहले जून में एक लेख लिखने पर उन्हें प्रवक्ता पद से हटा दिया गया था। संजय झा ने कोरोना के दौरान कॉन्ग्रेस नेतृत्व की आलोचना करते हुए एक प्रमुख अखबार में एक लेख लिखा था और पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी की बात कही थी।

पीएम केयर फंड पर आरटीआई को लेकर द हिंदू ने किया गुमराह, विरोधियों ने बता डाला घोटाला

कोरोना वायरस महामारी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीएम केयर फंड बनाया। आम लोगों से निवेदन किया कि वह इसके लिए अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ दान और सहयोग करें।

27 मार्च को पीएम केयर फंड ट्रस्ट की आधिकारिक घोषणा हुई थी। प्रधानमंत्री इसके चेयरमैन हैं और गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री इसके सदस्य हैं। जैसे ही इस योजना का ऐलान हुआ वैसे ही विरोधी दलों ने इस पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए थे। उनके मुताबिक़ सरकार इस फंड का दुरुपयोग कर सकती है, क्योंकि उसका ऑडिट CAG नहीं करेगा। सोनिया गाँधी ने तो आरोपों की झड़ी ही लगा दी थी।

उन्होंने इस फंड के तहत इकट्ठा की गई राशि पीएम नेशनल रिलीफ फंड में स्थानांतरित करने की मॉंग की थी। जबकि इस कोष में भी इकट्ठा राशि का CAG ऑडिट नहीं करता। इसमें भी लोगों को अपनी मर्ज़ी से सहयोग करना होता है। पीएम केयर फंड के बारे में दुष्प्रचार यहीं पर खत्म नहीं होता।

द हिंदू का ट्वीट

हाल-फ़िलहाल में इस फंड के बारे में दुष्प्रचार का एक नया दौर चला है। द हिंदू ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि एक आरटीआई में पीएम केयर फंड से जुड़ी कुछ जानकारी माँगी गई थी। लेकिन ट्रस्ट ने किसी भी तरह की जानकारी साझा करने से साफ़ मना कर दिया है।  

एक ट्वीट में उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक आरटीआई से जुड़ी जानकारी साझा करने से साफ़ मना कर दिया है। कार्यालय का कहना है कि इससे कार्यालय के संसाधन प्रभावित होंगे।” 

इस ट्वीट से साफ़ तौर पर यही नज़र आता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने फंड से जुड़ी जानकारी साझा करने से साफ़ मना कर दिया है। कॉन्ग्रेस से जुड़े तमाम लोगों ने इस रिपोर्ट को बिना समझे कई गंभीर आरोप लगाना भी शुरू कर दिया। इस ख़बर को आगे रख कर ऐसा दुष्प्रचार किया गया जैसे प्रधानमंत्री कार्यालय ने कोई जानकारी देने से साफ़ मना कर दिया हो। जबकि इस पूरे मामले की सच्चाई कुछ और ही थी।  

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार एक्टिविस्ट लोकेश बत्रा ने एक आरटीआई दायर की थी। जिसमें उन्होंने पूछा था कि अप्रैल 2020 से अभी तक प्रधानमंत्री कार्यालय को कितनी आरटीआई मिली और उनमें से कितनी निरस्त की जा चुकी हैं। साथ ही उन्होंने अपनी आरटीआई में यह भी पूछा था कि पीएम केयर फंड और पीएम नेशनल रिलीफ फंड से संबंधित कितनी आरटीआई दायर की गई है। इसके आधार पर कहा जा सकता है कि आरटीआई में फंड के इस्तेमाल से जुड़ी कोई बात नहीं पूछी गई थी। इसमें साफ़ तौर पर आरटीआई की संख्या के बारे में सवाल किया गया है।  

जवाब में पीएमओ ने कहा कि ‘जिस तरह की जानकारी आरटीआई में माँगी गई है उसका कोई ब्यौरा अलग-अलग या खण्डों में नहीं रखा जाता है। जानकारी देने के लिए इसे अलग करना पड़ेगा और उससे कार्यालय के संसाधन प्रभावित होंगे। इसलिए अधिनियम की धारा 7 (9) को मद्देनज़र रखते हुए ऐसा नहीं किया गया है।

इसमें सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि आरटीआई में फंड के इस्तेमाल से संबंधित कोई सवाल ही नहीं था। बल्कि फंड का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है इसकी जानकारी समय समय पर दी जा रही थी। 3100 करोड़ रुपए कोरोना वायरस से लड़ने के लिए जारी किए गए थे। इस राशि का उपयोग वेंटिलेटर बनाने के लिए हुआ।  

द हिंदू ने अपनी रिपोर्ट की शुरुआत में ही आरोप लगा दिया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने जानकारी देने से साफ़ मना कर दिया है। रिपोर्ट में उच्च न्यायालय का हवाला देते हुए कहा गया है। इस तर्क के आधार पर जानकारी का प्रारूप ज़रूर बदला जा सकता है, पर जानकारी देने से मना नहीं किया जा सकता है। इसके बाद रिपोर्ट में कहा गया है कि विभाग कोई भी जानकारी खण्डों में नहीं बल्कि एक साथ रखता है। इसलिए जितनी जानकारी साझा की गई है वह संयुक्त रूप से की गई है।  

पीएमओ द्वारा धारा 7 (9) का हवाला देने पर द हिंदू ने कई और आरोप लगाए हैं।  

द हिंदू ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पीएमओ ने जिस धारा के आधार पर जानकारी देने से मना किया है वह गलत है। हिंदू के मुताबिक़ अगर पीएमओ कोई जानकारी देने से मना करता है तो उसके लिए धारा 8 (1) का प्रावधान है। धारा 7 (9) इस प्रक्रिया के लिए सही नहीं है। इसके अलावा द हिंदू की रिपोर्ट में जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, उससे ही मंशा स्पष्ट हो जाती है। पीएमओ द्वारा जिस धारा का इस्तेमाल किया गया है उसे गलत बता कर द हिंदू ने क़ानून का अपमान किया है। इतना ही नहीं द हिंदू ने जानकारी नहीं देने से जुड़े दावे करके भी नियमों की अनदेखी की है।  

पीएमओ द्वारा रखे गए पक्ष में यह स्पष्ट किया गया है पीएमओ किसी भी आरटीआई का जवाब खण्डों में नहीं देता है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि पीएम केयर फंड और पीएम नेशनल फंड रिलीफ दोनों से जुड़ी जानकारी संयुक्त रूप से रखी जाती है। द हिंदू की रिपोर्ट में खुद उच्च न्यायालय के हवाले से लिखा गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय जानकारी का प्रारूप बदल सकता है, लेकिन जानकारी देने से मना नहीं कर सकता है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने ठीक ऐसा ही किया भी है। कार्यालय ने पूरी जानकारी दी है, लेकिन अलग प्रारूप में।  

द हिंदू ने जिस तरह प्रधानमंत्री कार्यालय की कार्यप्रणाली पर आरोप लगाया। उसके आधार पर विरोधी दलों ने दुष्प्रचार शुरू कर दिया। उन्होंने यहाँ तक आरोप लगा दिया कि इस फंड के तहत भ्रष्टाचार हो रहा है। द हिंदू ने इसके पहले भी दस्तावेज़ों की गलत तरीके से व्याख्या करके सीधे प्रधानमंत्री पर आरोप लगाए हैं। उसने राफेल डील में पीएमओ पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। इस रिपोर्ट को आधार बनाते हुए राहुल गाँधी और उनकी पार्टी के तमाम लोगों ने भी आरोप लगाना शुरू कर दिया था। सही जानकारी सामने आने के बावजूद द हिंदू ने सुधार करने से साफ़ मना कर दिया था।