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कोरोना वायरस को लेकर केंद्र और बंगाल सरकार में फिर से ठन गई, केंद्रीय टीम को नहीं करने दिया जा रहा काम

एक तरफ तो पूरा देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा है दूसरी ओर ऐसे समय में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री अपनी पहचान के अनुरूप केन्द्र सरकार की नीतियों को विरोध करने से बाज नहीं आ रही हैं। इस बार कोरोना वायरस को लेकर केंद्र और बंगाल सरकार में फिर से ठन गई है। गृह मंत्रालय ने आरोप लगाया है कि राज्य में पहुँची इंटर-मिनिस्ट्रीयल सेंट्रल टीमों (ICMTs) के साथ बंगाल प्रशासन सहयोग नहीं कर रहा है।

केन्द्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव राजीव सिन्हा को पत्र लिखकर कहा कि मंत्रालय के ध्यान में लाया गया है कि कोलकाता और जलपाईगुड़ी में इंटर-मिनिस्ट्रीयल सेंट्रल टीमों के लिए राज्य और स्थानीय प्रशासन की ओर से जरूरी सहयोग नहीं किया गया। इन टीमों को क्षेत्रों का दौरा करने, स्वास्थ्यकर्मियों से मिलने और जमीनी स्तर को जानने से रोका गया।

स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय के मुताबिक कोरोना वायरस संक्रमण की रोकथाम के लिए देश में 3 मई तक जारी लॉकडाउन के कार्यान्वयन और कुछ क्षेत्रों में इसके उल्लंघन की खबरों के साथ कोविड 19 की स्थिति का आकलन करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा मध्‍य प्रदेश, महाराष्‍ट्र, राजस्‍थान और पश्चिम बंगाल में इंटर-मिनिस्ट्रीयल सेंट्रल की टीमें भेजी गई हैं, वहीं केन्द्र सरकार को दूसरे राज्यों में तो सहयोग मिल रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से इन टीमों को विभिन्‍न लोकेशन पर जाने और जमीनी स्थिति का आकलन करने की अनुमति नहीं दी जा रही है।

दरअसल, इन टीमों के कार्यक्षेत्र में हॉटस्पॉट्स, हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर, आपदा प्रबंधन, राज्यों की सहायता, लॉकडाउन के नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करना, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन, हेल्थवर्कर्स की सुरक्षा और शेल्टर्स की स्थिति जैसे मुद्दों को देखना बताया गया।

इसके बाद मंगलवार को गृह मंत्रालय ने कहा कि केंद्रीय दलों को पश्चिम बंगाल में कार्य नहीं करने दिया जा रहा है। खबर के मुताबिक गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल सरकार को एक और पत्र लिखा है, जिसमें कहा गया है कि राज्‍य सरकार केंद्रीय दलों को कोलकाता की विभिन्‍न लोकेशंस पर जाकर काम करने की अनुमति दे। पत्र में कहा गया कि यह केंद्र सरकार के डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 का उल्लंघन है और साथ ही सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना करने जैसा है।

इससे पहले सोमवार को मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर इसे एकपक्षीय बताया था और राज्य में दल भेजने पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि इस तरह का कदम एकपक्षीय और अनपेक्षित है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से आकलन के लिए टीम द्वारा अपनाए जाने वाले वे आधार साझा करने को कहा था, जिनके बिना उनकी सरकार आगे कोई कदम नहीं उठा पाएगी।

पालघर मॉब लिंचिंग: गिरफ्तार आरोपितों के परिजनों ने पुलिस से मिलीभगत के शक में BJP सरपंच को दी जान से मारने की धमकी

पालघर जिले के गडचिनचले गाँव में 2 साधुओं सहित 3 लोगों की भीड़ द्वारा मॉब लिंचिंग किए जाने की भयानक घटना के बाद इस मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों के परिजनों ने भाजपा सरपंच चित्रा चौधरी को पुलिस से मिलीभगत के शक में कथित तौर पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है। मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपितों के परिजनों को शक है कि सरपंच ने ही मामले की जानकारी पुलिस को दी थी।

मुंबई से गुजरात जाते समय पालघर जिले में 200 लोगों की भीड़ ने एक अफवाह के आधार पर दो साधुओं सहित तीन लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। मामले में पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए 110 आरोपितों को गिरफ्तार किया है। जानकारी के मुताबिक इलाके में अफवाह थी कि वे लोग बच्चों की किडनी सहित अन्य अंगों की तस्करी के लिए बच्चों का अपहरण करते थे। लोकमत की रिपोर्ट के अनुसार गिरफ्तार किए गए लोगों के परिजनों ने तीन लोगों के हत्यारोपियों की पहचान पुलिस से साझा करने के संदेह में भाजपा सरपंच, उनके दो बच्चों के साथ उनके पति को भी जान से मारने की धमकी दी है।

दरअसल, खूनखराबे की इस घटना को 16 अप्रैल 2020 को महाराष्ट्र के पालघर में अंजाम दिया गया था। जूना अखाड़े से जुड़े दो साधु, 70 वर्षीय कल्पवृक्ष गिरि महाराज और 35 वर्षीय सुशील गिरि महाराज अपने ड्राइवर 30 वर्षीय नीलेश तेलगड़े के साथ मुंबई से गुजरात के लिए एक अन्य साधु के अंतिम संस्कार में शामिल होने जा रहे थे। इसी बीच रास्ते में पड़ने वाले गड़चिनचले गाँव में, 100 से अधिक लोगों की भीड़ ने उन्हें चोर समझकर जानलेवा हमला कर दिया। पुलिस का दावा किया है कि जब पुलिस की टीम पीड़ित व्यक्ति को बचाने के लिए मौके पर पहुँची तो वह भी भीड़ के हमले का शिकार हो गई।

सोशल मीडिया पर वायरल पालघर की घटना के भयावह दृश्य, जिनमें 100 से अधिक लोगों की भीड़ दो साधुओं और उनके ड्राइवर को पीट-पीटकर हत्या कर दी, जबकि इस दौरान पुलिस हमलावरों के सामने मूकदर्शक बनकर खड़ी दिखाई दे रही है।

साधु समुदाय के लोगों का कहना है कि यह गाँव आदिवासि बाहुल्य गाँव है, जिनमें से अधिकांश ईसाई हैं, जबकि कुछ मुस्लिम हैं। कुछ साधुओं का कहना है कि पुलिस ने आदिवासियों के डर से साधुओं को भीड़ के हवाले कर दिया, जिन्होंने बाद में उन साधुओं की लाठियों से पीट-पीटकर हत्या कर दी। आरोप यह भी है कि जब एक विशेष धर्म के आदिवासियों द्वारा साधुओं की पिटाई की जा रही थी तब पुलिस ने इसका किसी भी तरह से विरोध नहीं किया।

एफआईआर के मुताबिक घटनास्थल पर पहुँची पुलिस टीम का नेतृत्व करने वाले सहायक पुलिस निरीक्षक आनंद राव काले का दावा है कि तीन लोगों की जान लेने पर उतारू 400-500 लोगों की भीड़ के सामने कम संख्या वाली पुलिस की टीम बेबस थी। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि पीड़ितों को बचाने के लिए पहुँची पुलिस टीम पर भी भीड़ ने हमला किया था।

यहाँ तक कि जब पुलिस ने अपने वाहन में पीड़ितों को बिठाकर बचाने की कोशिश की तो भीड़ ने पुलिस वाहन को भी क्षतिग्रस्त कर दिया और तीनों लोगों पर लगातार पत्थर फेंकते रहे। वहीं आनंद राव काले ने इस दौरान 400-500 की भीड़ में से पाँच लोगों की पहचान की है, जिनका नाम एफआईआर में शामिल किया गया है, जो कि जयराम भावर (25), महेश सीताराम रावटे (19), गणेश देवजी राव (31), रामदास रूपजी असारे (27) और सुनील सोमजी रावटे (25) के रूप में हैं।

घटना में 400-500 लोगों की भीड़ के साथ ही इन पाँच लोगों पर आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 120 (बी), 427, 147, 148 और 149 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोनोवायरस के चलते लागू लॉकडाउन के दौरान लोगों की भीड़ इकट्ठा होने के आरोप में आरोपितों के खिलाफ आईपीसी की धारा 188 के तहत भी मामले दर्ज किया गया है

चीन को क्लीन चिट देने वाले रवीश कुमार बन चुके हैं राष्ट्रीय आपदा

वैश्विक विपदा की इस घड़ी में जब टीवी के पास नए एपिसोड या घटनाक्रम नहीं हैं तो वो पुराने एपिसोड और डॉक्युमेंट्री दिखा रहे हैं। लोगों का घर में मन लगा रहे सो आजकल पुराने प्रचलित कार्यक्रम भी प्रसारित हो रहे हैं। न्यूज़ चैनल के पास भी अपनी समस्याएँ हैं। ऐसे में जो चैनल जितना अधिक प्रयास करता है वो उतना ही अधिक फूहड़ साबित हो रहा है। कई न्यूज़ ऐंकर तो बने रहने को ख़बरों की टोह में गुलाटियाँ भी मार रहे हैं आजकल। इन सबके बीच एक चैनल और उसके प्रसिद्ध ऐंकर न केवल दिनों दिन ख़ुद को फूहड़ साबित कर रहे हैं बल्कि वायरस सरीखे ख़तरनाक भी होते जा रहे हैं।

जी हाँ, रवीश कुमार अब एक राष्ट्रीय आपदा बनते जा रहे हैं। नि:संदेह एक बड़ा वर्ग इनका फ़ॉलोअर है लेकिन उस हुजूम को अब नियमित तौर पर सिर्फ़ ज़हर का प्रसाद बाँट रहे हैं रवीश। माना कि रवीश जी के पास पड़े संविधान की कॉपी में मीडिया द्वारा सरकार की खिंचाई मात्र अवश्यंभावी गुण लिखा होगा।

खिंचाई, आलोचना और सरकार की ख़ामियों को उजागर करना ही चौथे खम्भे का काम है, ये भी लिखा होगा उसमें। किंतु सरकार के ख़िलाफ़ भड़ास मात्र निकालना है, विपक्ष और अपने समर्थकों की टोली में ज़हर ही फैलाना है ये कहाँ लिखा है, मुझे नहीं पता।

समय के साथ साथ जोकर बनते जा रहे रवीश कुमार कहते हैं- झूठी मीडिया से बचिए। पता नहीं किस बात की आंतरिक ख़ुशी चेहरे पर लिए वो कहते हैं- सरकारें कोरोना के प्रति अपनी नाकामी छुपाने को नई कहानियाँ गढ़ती हैं। उनके ताज़े प्राइम टाइम की चर्चा चहुँओर है।

अपनी आदत के मुताबिक़ हमेशा नकारात्मक और विपरीत दिशा में बात करने वाले रवीश जी इस कार्यक्रम में चीन का स्तुति गान गा रहे हैं। जिस वायरस की बात पर आज सारा विश्व चीन पर उँगली उठा रहा है, उस वायरस पर रवीश जी चीन को क्लीन चिट भी दे रहे हैं और कुछ विजुअल्स भी दिखा रहे की देखिए सब कुछ सामान्य है यहाँ।

मासूम और दयनीय है चीन: प्राइम टाइम में खुलासा

मुझे नहीं पता यह किस लालच या विवशता में हुआ होगा किंतु वामपंथी भर होने के एवज़ में यह प्राइम टाइम न केवल चीन को मासूम और दयनीय हालत को झेलने वाला बता रहा है बल्कि उसे सबसे सक्षम महामानव भी बता रहे। रवीश जी के गैंग में से एक कथित वैश्विक एक्स्पर्ट न केवल वुहान से वायरस फैलने को सम्भावना कह रहे हैं बल्कि वुहान से 1100 किलोमीटर उत्तर में बसे बीजिंग की क्लिप दिखाकर वो स्थिति को सामान्य बता रहे। दुनिया को पता है कि चीन के अंदर वायरस का प्रकोप वुहान के अलावा और कहीं न के बराबर फैला। किंतु एक्स्पर्ट महोदय को इस पर कोई शंका नहीं हुई।

वायरस कहाँ से फैला, किसने फैलाया ये अभी तक जाँच का विषय है, इसके बग़ैर न तो किसी को क्लीन चिट दिया जाना ठीक है और न ही आरोप तय करना। अच्छा होता एक्स्पर्ट महोदय चीन द्वारा वायरस के प्रसार को रोकने में टेक्नॉलजी के इस्तेमाल पर कुछ कहते। अच्छा होता वो चीनी सरकार के ख़िलाफ़ उबल रहे ग़ुस्से पर बात करते। उन्होंने इस बात पर भी कोई बात नहीं कही की आख़िर क्यों WHO के द्वारा चीन में मरने वालों की संख्या अपडेट हुई? आख़िर क्यों चीन झूठे कन्जम्प्शन और प्रोडक्शन के डेटा दिखा रहा है दुनिया को?

मुझे समझ नहीं आता की आख़िर क्यों ये कामरेड रूपी पत्रकार ख़ुद को सेक्युलर और विश्व राजनीति का एक्स्पर्ट तो कहते हैं किंतु वो ‘उईघर’ की चिंता नहीं करते और न कभी ये कहते कि चीन में उइगरों को नमाज़ नहीं पढ़ने दिया जाता है। बल्कि चीन पर हो रहे इस बहस में भी इन लोगों को चिंता इस बात की होती रही कि यहाँ जमात के नाम पर क़ौम विशेष का नाम ख़राब किया जा रहा है।

कार्यक्रम में रवीश कुमार जी को हिंदुस्तान की झूठी पत्रकारिता पर रोना तो आ रहा है किंतु वो चीन में वायरस रिपोर्ट करने वाले रिपोर्टर के ग़ायब होने पर चुप रह जाते हैं। वो वहाँ होने वाले पत्रकारिता के नाटक पर कुछ नहीं कहते, जिसमें हर एक ख़बर सरकार के विशेष विभाग द्वारा फ़िल्टर होता है। भारत में पत्रकारिता की स्वघोषित मिसाल रवीश जी भारत में डॉक्टर पर हुए हमले पर अपने हिसाब की सही वजह ढूँढकर उसे जस्टिफ़ाय करने लगते हैं।

यहाँ तक कि साधुओं की हत्या पर भी वो एक लाइन कह कर हें हें हें करके निकल जाते हैं कि ये हत्या धोखे में हुई। पुलिस ने क्यों उन साधुओं को भीड़ के हवाले कर दिया ये सवाल भी वो सिर्फ़ इसलिए नहीं करते क्योंकि वहाँ भाजपा की सरकार नहीं है। बल्कि इस मामले में तो वो इसलिए ख़ुश हैं क्योंकि मामला अब तक मज़हबी साबित नहीं हुआ।

विषय पर वापस आते हुए हम चीन की बात करते हैं। जब किसी कार्यक्रम में हम चीन और कोरोना की बात करते हैं तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए की ताइवान ने WHO को 31 दिसम्बर को ईमेल के द्वारा चीन की त्रासदी के बारे में बताते हुए कुछ प्रश्न किए थे किंतु चीन के दवाब में उसका जवाब नहीं दिया गया। यदि चीन ख़ुद परेशान है तो फिर इस वैश्विक संकट में वो निष्पक्ष जाँच क्यों नहीं होने देता? एक्स्पर्ट और रविश जी को या तो विषय की जानकारी नहीं या फिर वो छुपा रहे हैं कि चीन ने अपने लैब में यह झूठ साबित किया है कि इटली और अमेरिका के वायरस की प्रजाति अलग और पुरानी है।

जो मोदी की तारीफ़ कर दे, वो सब रवीश कुमार की नज़र में बुरे

हालाँकि, ऐसा नहीं होगा क्योंकि अव्वल तो मैं उनकी महिमामंडन वाली मंडली का सदस्य नहीं हूँ, शक्ल से भी कामरेड नहीं लगता हूँ और फिर शाम के बाद नशे में डूब कर लम्बी लम्बी फेंकने का शौक़ भी नहीं है मुझे। रवीश कुमार जी ने इसी कार्यक्रम में एक लाइन में हिंदुस्तानी पत्रकारों के संक्रमण की बात भी की। उन्हें यह बात सिर्फ़ एक लाइन में इसलिए समाप्त करनी पड़ी क्योंकि ख़ुद वो पिछले लगभग एक महीने से घर से नहीं निकले हैं। क्योंकि, पत्रकार लॉबी अब उनसे जवाब माँगने लगी है कि अन्य निकायों में रोज़गार पर चिंता में दुबले होते रविश जी आख़िर क्यों अभी मीडिया में जाती नौकरी पर चुप हैं। आख़िर क्यों रवीश ख़ुद अपने चैनल में छोटे पत्रकारों की तनख़्वाह में देरी पर चुप हैं? क्या वो पत्रकारों के मामले में हैंडल करने का चीनी तरीक़ा अपना रहे हैं?

भड़ास निकालने की हद देखिए कि चूँकि ट्रम्प ने मोदी की तारीफ़ कर दी तो इसीलिए ट्रम्प की भी बुराई हो। कार्यक्रम में उपस्थित एक्स्पर्ट महोदय ट्रम्प पर अपनी ज़िम्मेवारी और असफलता से बचने को चीन पर आरोप लगाते हैं। आजकल बेरोज़गारी में अमेरिका की ख़बर अधिक दिखाने की होड़ में रविश जी अक्सर ये कहते हुए पाए गए की “न्यूयॉर्क के मेयर से सीखना चाहिए भारत के मुख्यमंत्रियों को, वो बहादुरी से रोज़ाना ट्रम्प से सवाल करते हैं। अपने यहाँ तो कोई प्रधानमंत्री को सवाल ही नहीं पूछता।”

भले मानस रवीश कुमार और उनके औंघाए विशेषज्ञ को थोड़ा पढ़ना चाहिए। ये लोग पत्रकारिता में 20 साल लगा आए लेकिन बस ऊपर-ऊपर या फिर अपने हित की बात करके निकल लेते हैं। अमेरिका की ख़बर को पढ़िए। वहाँ न्यूयॉर्क के मेयर को सबसे अधिक गाली पड़ रही है। और वो भी इस वजह से कि उसने राष्ट्रपति ट्रम्प के आदेश के बाद भी न्यूयॉर्क शहर में पाबंदियाँ लगाने में देरी की और उसी का परिणाम आज भुगत रहा है न्यूयॉर्क।

भाई, यदि कुछ विदेशी अख़बार पढ़कर आप लोग एक्स्पर्ट बन जाते हैं तो मैं आज से स्वयं को विदेश मामलों का पत्रकार घोषित करता हूँ। क्योंकि मैं अख़बार भी पढ़ता हूँ और इन जगहों के लोगों से कॉन्टैक्ट में भी हूँ। मैं वामपंथी नहीं हूँ और न ही कथित सेक्युलर ही, रवीश के महिमा मंडन में लम्बे आलेख भी नहीं लिख पाता हूँ और न ही क़ब्ज़ पीड़ित मुस्कान ला पाता हूँ चेहरे पर। किंतु दुष्कर देश चीन और पाकिस्तान के मित्र हैं सम्पर्क में, जो मुझे आपका झूठ पकड़ने में मदद कर जाते हैं। महोदय, आप अपने फ़ॉलोअर को बरगलाइए। वो उछल-उछल कर आपको वाह-वाह कहेंगे। बाकी, वो सब जो आपके छद्म अजेंडे को पहचान गए हैं वो आपकी खोल देंगे सर। और धनिया भी बो देंगे।

खग ही जाने खग की भाषा: रामचरित मानस के बहाने कोरोना और चमगादड़ वाली धूर्तता के पीछे का सच

“खग ही जाने खग की भाषा”, हिंदी का एक प्रचलित मुहावरा है। मोटे तौर पर इसका इस्तेमाल तब होता है जब दो लोग बात तो सार्वजनिक तौर पर कर रहे हों मगर उसका गूढ़ अर्थ केवल वही दोनों समझ रहे हों। बाकी लोगों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं निकलता है। जो लोग संवाद (कम्युनिकेशन, मास कम्युनिकेशन) जैसे विषय पढ़ते हैं, उन्होंने इसे किसी ना किसी अध्याय में टार्गेटेड कम्युनिकेशन के नाम से पढ़ रखा होता है। जासूसी फिल्मों के शौक़ीन लोगों ने भी देखा होगा कि कैसे कोई चिट्ठी जो आम सी लगती है, उसमें छुपा कोई कूट सन्देश निकल आता है।

ये सब टार्गेटेड कम्युनिकेशन है, जिसे मोटे तौर पर “खग ही जाने खग की भाषा” कह दिया जाता है। इस जुमले के पैदा होने के पीछे रामचरितमानस है। रामचरितमानस को अलग-अलग जगह दो लोगों के संवाद के तौर पर लिखा गया है। जैसे अगर शुरुआत का हिस्सा देखें तो ये शिव-पार्वती संवाद है। रामचरितमानस का आखरी हिस्सा काकभुशुण्डी और गरुड़ का संवाद है। वहाँ होता कुछ यूँ है कि गरुड़ जी राम कथा सुनना-समझना चाहते थे मगर खुद भगवान भी उन्हें समझा पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे।

अंततः उन्होंने निर्णय लिया कि कोई पक्षी (खग) ही गरुड़ को रामकथा समझा पाएगा। इसलिए गरुड़ को काकभुशुण्डी जी के पास रामकथा के श्रवन के लिए भेज दिया गया और कहा गया “खग ही जाने खग की भाषा”। ये कहानी आज इसलिए याद आई क्योंकि रामचरितमानस के उत्तर काण्ड में जहाँ काकभुशुण्डी, गरुड़ को सात प्रश्नों के उत्तर दे रहे होते हैं, वहाँ किसी ने “चमगादड़” शब्द देख लिया। वहाँ काम-क्रोध, लोभ इत्यादि की बीमारी से तुलना की गई है तो “रोग” शब्द भी नजर आ गया।

अब इस (संभवतः धूर्त) व्यक्ति को ये भी पता था कि अधिकांश हिन्दुओं की रामचरितमानस में श्रद्धा तो है, लेकिन कभी उन्होंने इसे पूरा पढ़ा नहीं! तो एक पन्ने की तस्वीर को उन्होंने दोहा संख्या 120 में चमगादड़ और रोग का जिक्र है, ऐसा कहकर व्हाट्स-एप्प इत्यादि माध्यमों से दौड़ा दिया। पूरा पढ़ने वालों को पता होता है कि वहाँ काम को वात (वायु), लोभ को कफ, और क्रोध को पित्त कहा गया है, जिनके बढ़ने से रोग होता है। सबकी निंदा करने वाले अगले जन्म में चमगादड़ होंगे, शायद उल्टा लटकने वाले, तुलसीदास जी का ऐसा आशय रहा होगा।

इसका वो मतलब तो बिलकुल नहीं जो बताया जा रहा है। बाकी अगर खुद भी ऐसा फॉरवर्ड देखा हो तो सोचियेगा, अभी दस-बारह दिन बाकी हैं। इतने दिनों में अगर पूरी रामचरितमानस एक बार पढ़ लें, तो कम से कम कोई इतनी आसानी से तो नहीं ठग पाएगा! थोड़ी मेहनत तो करवाइए ठगों से।

उम्माह के पैरोकार इक़बाल ने कैसे बदल दिया था ‘सारे जहाँ से अच्छा’ तराना: कट्टरपंथी थे Pak के जनक

अल्लामा इक़बाल, जिन्हें मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान कहा जाता है, यानी पाकिस्तान का विचारक। ये सही भी है क्योंकि सबसे पहले ‘टू नेशन थ्योरी’ की बात इन्होंने ही की थी। इन्हें शायर-ए-मशरिक, अर्थात पूरब का शायर भी कहा जाता है। इक़बाल को हाकिम-उल-उम्मत, अर्थात उम्माह का विद्वान भी कहा गया है। यहाँ उम्माह आते ही आप समझ गए होंगे कि इसका अर्थ है मुस्लिमों का शासन। यही मुहम्मद इक़बाल की विचारधारा भी थी- पूरी दुनिया के मुस्लिम एक राष्ट्र के रूप में हैं। ‘तराना-ए-मिल्ली’ का सार यही है कि पैगम्बर मुहम्मद ही सारी दुनिया के मुस्लिमों के नेता हैं। इन्होंने इस्लाम में राष्ट्रवाद की भावना होने की बात को ही नकार दिया।

अल्लामा इक़बाल के बारे में एक बात जाननी ज़रूरी है कि उनका परिवार पहले कश्मीरी पंडित था, जिसने बाद में इस्लाम स्वीकार कर लिया था। उनका जन्म नवंबर 8, 1877 को सियालकोट में हुआ था। इक़बाल के ‘तराना-ए-हिंदी’ को न सिर्फ़ भारत में पढ़ाया गया बल्कि इसे देशभक्ति दिखाने के लिए भी गाया जाता रहा है। इक़बाल, जिसने पहली बार भारत विभाजन की बात की, जिसने भारत को धमकाया और जिसकी विचारधारा की आड़ में मजहबी कट्टरता ऐसी फैली कि देश में आग लग गई। कट्टरवाद के उस जनक को भारत में पूजा जाना आश्चर्यजनक है। हाँ, पाकिस्तान में उनका सम्मान होना समझ में आता है।

अल्लामा इक़बाल के दोनों तराने और उनके बीच का अंतर

इक़बाल ने ‘सारे जहाँ से अच्छा’ अंग्रेजों से लड़ाई के दौरान 1904 में लिखा था। इसे मूलतः बच्चों के लिए लिखा गया था, जो देशभर में लोकप्रिय हुआ। समय के साथ सिर्फ़ इक़बाल ही नहीं बदले बल्कि उन्होंने अपने तराने को भी तोड़-मरोड़ के बदल दिया। मोहम्मद इक़बाल उस समय गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में लेक्चरर थे। उनके एक छात्र लाला हरदयाल ने उन्हें एक कार्यक्रम को सम्बोधित करने के लिए आमंत्रित किया था, जहाँ उन्होंने ‘सारे जहाँ से अच्छा’ गाया। उन्होंने भाषण देने की जगह अपने इस तराने को ही गाया और सभा में लोगों ने इसकी खूब प्रशंसा की। हरदयाल ने बाद में ग़दर पार्टी की स्थापना की और सिविल सर्विस को ठोकर मार कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे।

अब आते हैं कट्टरपंथी इक़बाल पर, जिन्होंने ‘तराना-ए-मिल्ली’ लिख कर इस्लाम के शासन की बात की और उनकी देशभक्ति तेल लेने चली गई। ‘तराना-ए-हिंदी‘ की पहली पंक्तियाँ तो आपको याद ही होंगी। इसका अर्थ भी सभी को लगभग पता ही है- हिंदुस्तान बाकी सारी दुनिया से अच्छा है और ये एक ऐसा चमन है, जिसमें हम सब बुलबुल के रूप में रहते हैं । वो पंक्तियाँ कुछ इस तरह से हैं:

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा

आज भारत में कथित बुद्धिजीवियों का ही एक बड़ा वर्ग है जो फैज अहमद फैज और मुहम्मद इक़बाल को पूजने में लगा हुआ है और चाहता है कि बाकी लोग भी ऐसा ही करें। ऊपर वाले तराने के ठीक 4 साल बाद यूरोप से लौटे मुहम्मद इक़बाल की ‘तराना-ए-मिल्ली‘ की पहली पंक्तियाँ देखिए, जो बताता है कि किस तरह उनके मन में भारत के लिए कोई सम्मान था ही नहीं और उनकी नज़र में इस्लाम ही एकमात्र सत्ता थी:

चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारा
मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा

इसका अर्थ है कि चीन और अरब हमारे हैं, हिंदुस्तान भी हमारा ही है। हम तो मुस्लिम हैं और ये सारी दुनिया ही हमारी है। यहाँ चीन का तात्पर्य पूरे मध्य एशिया से था। इसकी अगली पंक्तियों में उन्होंने लिखा है कि एक अल्लाह को मानना मुस्लिमों की साँस में, सीने में बसता है। इसकी अगली पंक्ति में वो लिखते हैं कि मुस्लिमों को मिटाना इतना आसान भी नहीं है। इसके बाद वो मंदिरों और मूर्ति पूजा का मखौल उड़ाते हुए लिखते हैं कि उन सबमें उनके ख़ुदा का घर सबसे ऊपर का स्थान रखता है। इसका एक अर्थ ये भी है कि मुस्लिमों का काबा जो है, उसका स्थान दुनिया के सारे मंदिरों से भी ऊपर है, सबसे ऊँचा।

इस्लाम की बात करते हुए इक़बाल लिखते हैं कि वो सब तलवारों से साए में बड़े हुए हैं और वो अर्धचंद्र का खंजर है न, वही उनके कौम की निशानी है। इस्लामिक मुल्कों के झंडों पर प्रतीकों में अर्धचंद्र और तारे मिलते हैं, यहाँ ‘क़ौमी निशाँ’ की बात इस्लाम के लिए ही हो रही है, इसमें कोई शक नहीं। हिंदी तराने में हिमालय को भारत का संतरी बताने वाले मुहम्मद इक़बाल के लिए अब पहाड़ियों में भी इस्लाम घुस गया। तभी तो उन्होंने लिखा कि पश्चिम की वादियों में इस्लामी अजान ही गूँजता रहा और किसी में इतनी ताक़त नहीं हुई कि वो मुस्लिमों को आगे बढ़ने से रोक सके। इसके बाद इक़बाल स्पेन और टिगरिस के बहाने धमकाते हैं कि किस तरह इस्लाम ने वहाँ अपनी सत्ताएँ स्थापित की।

दोनों ही तरानों में इक़बाल का टोन बदलता नज़र आता है। एक में वो राष्ट्रवाद की बात करते हैं, दूसरे में उसी को नकार कर इस्लाम का बखान करते हैं। अंतर इतना है कि हिंदी तराने में इस्लाम की झलक मिलती है लेकिन ‘तराना-ए-मिल्ली’ में राष्ट्रवाद को नकार दिया जाता है। ‘तराना-ए-हिंदी’ की कुछ पंक्तियों को उद्धृत कर के ये कहा जाता है कि इक़बाल ख़ूब सेक्युलर थे, असल में इससे बड़ा मजाक कुछ हो ही नहीं सकता है। इक़बाल ने ‘हिन्दोस्ताँ हमारा’ से ‘सारा जहाँ हमारा’ तक का जो सफर तय किया, उसमें उनकी सोच नहीं बदली बल्कि उनके भीतर छिपी हुई सोच ही सामने आई। 1930 में उनका कट्टरवाद लाखों को अपने आगोश में ले लेता है।

मुस्लिम लीग के मंच पर अध्यक्षीय सम्बोधन

दरअसल, दिसंबर 29, 1930 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में मुस्लिम लीग का 25वाँ वार्षिक सम्मलेन था और मुहम्मद इक़बाल ने अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में विभाजन की ऐसी नींव रखी, जिसका खामियाजा पूरे भारत को भुगतना पड़ा। उन्होंने धमकाया कि भारत में तब तक शांति का नामों-निशाँ भी नहीं हो सकता, जब तक मुस्लिमों को अलग देश और उन्हें अपना शासन न मिले। वहाँ ऐलान कर दिया कि एक मुस्लिम कभी भी इस बात को स्वीकार नहीं करेगा कि उसके देश की नीतियाँ इस्लामी क़ानून से अलग हों क्योंकि इस्लाम में प्रारम्भ से ही सामाजिक व्यवस्था, न्याय और अन्य चीजों के लिए अलग से ही क़ानून है, जो इसे ईसाइयत से अलग बनाता है।

उनका सीधा कहना था कि इस्लाम की मजहबी व्यवस्था को मानने वाला मुस्लिम देश का क़ानून नहीं मानेगा, अगर वो इस्लामिक कानून से अलग हो। उन्होंने सेकुलरिज्म और राष्ट्रवाद को नकार दिया। आज उन्हीं की पंक्तियों को लेकर लोग उन्हें सेक्युलर बताने के लिए तुले हुए हैं। इसके बाद इक़बाल यूरोप और पश्चिम देशों में घूम-घूम कर न सिर्फ़ मुस्लिम लीग की विचारधारा के लिए समर्थन जुटाने लगे, बल्कि फंडिंग के लिए भी जी-जान लगा दिया। उनके जितने भी लेक्चर प्रकाशित हुए, उसमें मुहम्मद को नेता मानने की बात थी और उन मुस्लिम नेताओं की भी उन्होंने निंदा की, जो ‘इस्लामी समाज की भावनाओं’ को नहीं समझते थे।

उनका कहना था कि सेकुलरिज्म एक ऐसा हथियार है, जिसका इस्तेमाल कर के हिन्दू अब मुस्लिमों की विरासत, संस्कृति और राजनीतिक प्रभाव पर हावी हो जाएँगे। उनका कहना था कि इससे मुस्लिमों का मजहबी आधार कमजोर पड़ जाएगा। उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि भले ही ब्रिटिश सरकार के अंतर्गत लेकिन पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रान्त को एक अलग राज्य का दर्जा मिलना चाहिए, जो सत्ता चलाने के मामले में स्वतंत्र हो। वो भारत के अंदर एक ‘मुस्लिम भारत’ की स्थापना की अवधारणा को सही ठहराते थे। उन्होंने समुदाय विशेष से स्पष्ट पूछा था कि क्या वो देश का क़ानून ऐसा चाहते हैं, जो इस्लाम के अनुरूप न हो?

इक़बाल को सेक्युलर साबित करने के पीछे की मंशा क्या?

इसके बाद 1932 में भी अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में मुहम्मद इक़बाल ने ये बातें दोहराईं। एक शायर इक़बाल में से नेता इक़बाल या फिर कट्टरपंथी इक़बाल को निकाल बहार कर उन्हें सेक्युलर साबित करने की होड़ एक बेहूदा प्रतियोगिता है, जो ओसामा बिन लादेन को ‘एक अच्छा पति’ या फिर आतंकी बुरहान वानी को ‘हेडमास्टर का बेटा’ बताने वाली होड़ से अलग नहीं है। इक़बाल को इस्लामी कट्टरवाद से अलग नहीं किया जा सकता। अगर पाकिस्तान नहीं भी बनता और उनकी चलती तो आज यहाँ भारत में एक समांनातर इस्लामी सत्ता चलते रहती, जो भारत को एक नरक में तब्दील करने की ताक़त रखती।

ये भी बताते चलें कि मुहम्मद इक़बाल ने अपनी ज़िंदगी के अधिकतर हिस्से अहमदिया बन कर जिया। इसके बाद उन्होंने अहमदिया संप्रदाय को अलविदा कह दिया क्योंकि उन पर कट्टरपंथियों का दबाव था और वे लोग मानते थे कि अहमदिया विधर्मी हैं। आज पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय पर हो रहा अत्याचार किसी से भी छिपा नहीं है। वो 1931 तक अहमदिया नेताओं के संपर्क में थे और ‘ऑल इंडिया कश्मीर कमिटी’ का अध्यक्ष भी किसी अहमदिया खलीफा को बनाना चाहते थे। यानी, इक़बाल के नाम पर ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की बात करने वालों को पता होना चाहिए कि इक़बाल ने अहमदिया पंथ क्यों छोड़ा!

रमजान पर मस्जिदों में वैसे ही लॉकडाउन का पालन कराया जाए, जैसा ईस्टर पर चर्चों में हुआ: डोनाल्ड ट्रम्प

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि रमजान के समय मस्जिदों में भी सोशल डिस्टन्सिंग का पालन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि रमजान के दौरान पुलिस एवं प्रशासन मस्जिदों में सोशल डिस्टेंसिंग के लिए अलग व्यवस्था कर सकती है। ट्रम्प का इशारा राज्यों की तरफ था। उन्होंने कहा कि जिस तरह से चर्चों में सोशल डिस्टन्सिंग का पालन कराया गया, उस तरह से मस्जिदों में भी कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि देखना पड़ेगा कि ईस्टर के समय जैसे चर्चों से लॉकडाउन का पालन कराया गया था, वैसे रमजान के दौरान मस्जिदों में कराया जाएगा या नहीं।

कोरोना वायरस को लेकर मीडिया को सम्बोधित कर रहे ट्रम्प ने कहा कि ईस्टर और रमजान के समय पुलिस-प्रशासन के बर्ताव में कुछ अंतर आ सकता है। ट्रम्प ने कहा कि वो अमेरिका में सालों से इस तरह के व्यवहार में गहरी असमानता देखते आ रहे हैं, इसीलिए रमजान के वक़्त ही पता चलेगा कि समुदाय विशेष से लॉकडाउन का पालन कैसे कराया जाता है। एक पत्रकार ने जब ट्रम्प से पूछा कि क्या वो ऐसा सोचते हैं कि मजहब के नेता लॉकडाउन का पालन नहीं करेंगे, तो ट्रम्प ने कहा कि नहीं वो ऐसा कुछ भी नहीं सोचते।

ट्रम्प ने बताया कि उन्होंने इमामों और नेताओं से फोन पर बातचीत की है। उन्होंने कहा कि पता नहीं इस देश के साथ क्या हो रहा है कि ईसाई समुदाय के साथ ठीक से व्यवहार नहीं किया जाता, अच्छी तरह से ट्रीट नहीं किया जाता। बता दें कि 12 अप्रैल को ईस्टर के मौके पर देश भर में ईसाईयों को लॉकडाउन का पालन करने की सलाह दी गई थी लेकिन कुछ जगहों पर इसके उल्लंघन की ख़बर आई। ‘इस्लामिक सोसाइटी ऑफ नार्थ अमेरिका’ ने समुदाय विशेष को सलाह दी है कि वो घर में ही नमाज पढ़ें और समूह में जुट कर दुआ वगैरह न करें।

अमेरिका में कोरोना से हालत बदतर

पूरे अमेरिका में अब तक कोरोना वायरस के 7,95,602 मामले आ गए हैं। इनमें से 43,177 लोगों की मौत हो चुकी है। हालाँकि, 72,561 लोग ठीक भी हुए हैं लेकिन अब भी 6,79,874 मामले सक्रिय हैं। डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि वो लोग चर्चों के मामले में तो आगे आते हैं लेकिन मस्जिदों की बात आते ही पीछे हट जाते हैं। उन्होंने कहा कि वो इस ट्रेंड को देख रहे है। रमजान गुरुवार (अप्रैल 23, 2020) को शुरू हो रहा है।

बता दें कि भारत ने भी आपदा की इस घड़ी में अमेरिका की मदद की है और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन की एक बड़ी खेप यूएसए को भेजने का निर्णय लिया गया। इसके बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने पीएम मोदी को धन्यवाद भी दिया था। उससे पहले ख़ुद ट्रम्प भारत दौरे पर आए थे, जब दोनों देशों के बीच कई डील साइन किए गए थे। कोरोना आपदा के बीच भी पीएम मोदी और प्रेजिडेंट ट्रम्प की फोन पर बातचीत हुई थी।

तेल के दाम को लेकर राहुल गाँधी ने करवाई अपनी बेइज्जती: कॉन्ग्रेस नेता ने ही समझाया WTI और ब्रेंट क्रूड का अंतर

दुनिया भर में क्रूड आयल के दाम घट रहे हैं और इसी बहाने विपक्ष भारत सरकार पर निशाना साधने में लगा हुआ है। 34 साल बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि कच्चे तेल के भाव 0 यानी जीरो से भी नीचे चले गए हैं। अमेरिका सहित विश्व के अन्य हिस्सों में भी कच्चे तेल की माँग काफ़ी कम हुई है, जिसका परिणाम है कि भाव में जम कर गिरावट हुई है। अधिकतर देश लॉकडाउन में हैं और कोरोना संक्रमण की आपदा के कारण गाड़ियाँ निकल नहीं रहीं, इसीलिए तेल की माँग ही ख़त्म हो गई है। अब आते हैं राहुल गाँधी के आरोपों पर।

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने पूछा कि दुनिया में कच्चे तेल की क़ीमतें अप्रत्याशित आँकड़ो पर आ गिरी हैं, फिर भी हमारे देश में पेट्रोल ₹69, डीज़ल ₹62 प्रति लिटर क्यों मिल रहा है? उन्होंने आगे कहा कि इस विपदा में जो दाम घटे, सो अच्छा। कब सुनेगी ये सरकार? राहुल गाँधी ने ये बयान तो दे दिया लेकिन शायद वो तेल के भाव गिरने की ख़बर को ठीक से पढ़ नहीं पाए। दरअसल, ‘अमेरिकी बेंचमार्क क्रूड वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI)’ की कीमतों में इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली है, जिससे राहुल गाँधी भ्रमित हो गए।

भारत कच्चे तेल का सबसे बड़ा इम्पोर्टर है और देखा जाए तो यहाँ 85% तेल आयात से ही आता है। कच्चे तेल में गिरावट डब्ल्यूटीआई के भाव में देखने को मिली है जबकि भारत ब्रेंट क्रूड की सप्लाई पर निर्भर है- इस छोटी सी बात को राहुल गाँधी समझ नहीं पाए। ब्रेंट का भाव अब भी 20 डॉलर से ऊपर बना हुआ है, इसीलिए भारत को इससे कुछ राहत नहीं मिली है और डब्ल्यूटीआई में कीमतें कम होने से यहाँ तेल सस्ता नहीं हो जाएगा। राहुल गाँधी की ही पार्टी के नेता मिलिंद देवड़ा ने यही चीज समझाने की कोशिश की।

भाजपा आईटी सेल के अध्यक्ष अमित मालवीय ने कहा कि राहुल को अपने ही साथी देवड़ा से सीखना चाहिए। देवड़ा ने बताया कि भारत आयात के मामले में ब्रेंट क्रूड पर निर्भर है, डब्ल्यूटीआई पर नहीं। उन्होंने जानकारी दी कि माँग कमजोर होने के कारण भारत के लिए अब तेल के आयात में कमी आएगी। उन्होंने लिखा कि पेट्रोल और डीजल के भाव में कमी होने का ग्राहकों को कोई फायदा नहीं मिल पाएगा। हालाँकि, अपनी बेइज्जती होने के बावजूद राहुल गाँधी ने ट्वीट डिलीट नहीं किया।

हाल ही में एक और मामले में कॉन्ग्रेस आईटी सेल ने राहुल गाँधी को शुभकामनाएँ देते हुए एक ट्वीट किया और ट्वीट में बताया गया कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने वायनाड में कोरोना वायरस रोकने के प्रयासों व तरीकों की प्रशंसा की है। राहुल ने भी इस फेक न्यूज़ को आगे बढ़ाया। उन्होंने सरकार पर कोरोना वायरस को लेकर निर्णायक कदम नहीं उठाने का आरोप लगाया था और कहा था कि उसकी (सरकार की) ‘अक्षमता’ की भारत को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने यह भी कहा था कि कोरोना वायरस की समस्या से निपटने के लिए तेजी से कदम उठाने चाहिए।

दुबई में फँसे सोनू निगम को इस्लामी कट्टरपंथियों ने बनाया निशाना, 3 साल पुराने अजान ट्वीट पर घेरा

इस्लामी कट्टरपंथियों ने आज फिर से बॉलीवुड गायक सोनू निगम के 2017 के उस ट्वीट को लेकर हमला बोला, जिसमें उन्होंने मस्जिदों से लाउडस्पीकर से पाँच बार नमाज पढ़ने की बात कही थी। इसके लिए कट्टरपंथियों ने उन्हें कुत्सित और घृणित भी कह दिया।

कई लोगों ने तो अपने ट्वीट में दुबई पुलिस को भी टैग किया और उनसे सोनू के खिलाफ कार्रवाई करने का आग्रह किया।

कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर हुए लॉकडाउन की वजह से सोनू निगम फिलहाल दुबई में फँस हुए हैं। बता दें कि जब लॉकडाउन की घोषणा की गई, तब वो उसी देश में थे और सारी यात्रा सेवाएँ बंद होने की वजह से वो वहाँ पर फँस गए हैं।

यहाँ पर उल्लेखनीय है कि सोनू निगम को अजान से कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि उन्हें तो इसके लिए लाउडस्पीकर के उपयोग पर प्रतिक्रिया दी थी। बता दें कि सोनू निगम ने पहले भी गणपति विसर्जन के दौरान लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर नाराजगी जताई थी।

सोनू निगम अजान विवाद

गौरतलब है कि 2017 में सोनू निगम ने मस्जिद पर लाउडस्पीकर पर होने वाली अजान को लेकर सवाल खड़ा किया था। उन्होंने ट्वीट करके लिखा था कि मस्जिद की अजान से उनकी नींद टूट गई। उन्होंने कहा था कि अगर मैं मुस्लिम नहीं हूँ तो मस्जिद की अजान की आवाज से उनको हर रोज क्यों सुबह उठना पड़ता है। उन्होंने कहा कि हम आखिर कब तक धार्मिक रीतियों को जबरदस्ती ढोते रहेंगे। उन्होंने लिखा था कि मंदिर और गुरुद्वारे में भी ऐसा होने से उन्हें समस्या होती है। सोनू ने कहा कि जब बिजली का आविष्कार नहीं हुआ था तब तो ऐसा नहीं होता था, आखिर अब ऐसा क्यों हो रहा है।

उस दौरान भी उनके ट्वीट्स को इस्लामोफोबिक करार दिया गया था और उनका खूब विरोध हुआ था। कुछ ने गायक के लिए गले के कैंसर के लिए भी कामना की थी।

उनका ट्वीट वायरल होने के बाद, रिज़वान मलिक द्वारा उनके सिर पर 21 करोड़ रुपए का इनाम रखा गया था। पश्चिम बंगाल के एक मौलवी ने फतवा जारी किया था और और कहा था कि जो कोई भी सोनू निगम को गंजा करेगा, उसे 10 लाख रुपए का ईनाम दिया जाएगा।

इसके बाद सोनू ने सिर भी मुंडवाया था। हालाँकि इस बारे में जब मौलवी से बात की गई तो उन्होंने कहा कि सोनू निगम ने सभी शर्तें पूरी नहीं की हैं। उन्होंने कहा, “मैंने 3 चुनौतियाँ दी थीं, जिनमें से 2 अभी बाकी हैं। हम 10 लाख रुपये तभी देंगे जब वह फटे हुए जूतों की माला पहनकर देश भर में घूमेंगे।”

हापुड़: जमातियों की सूचना देने पर 300 मुस्लिमों की भीड़ ने लाठी-डंडे, पत्थरों और चाकू से किया हिंदुओं पर हमला, 6 गिरफ्तार

उत्तरप्रदेश के हापुड़ जनपद में शहर कोतवाली क्षेत्र के सरावा गाँव में दो समुदायों के बीच शुरू हुई मामूली कहासुनी खूनी झड़प में बदल गई। जिसके बाद जमकर पथराव और चाकू से हमला हुआ जिसमें करीब 5 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए सूचना के बाद पहुँची पुलिस ने मामला शांत कराया तहरीर के आधार पर पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली है।

मामले में इमरान, साजिद, हासम, मेहताब, नौशाद, इरफान, मोहसिन, अमन, परवेज आलम, यामीन. सफी उल्ला, गुल मोहम्मद, रिजवान और फुरकान को आरोपित बताया गया है। इसके अलावा कई अन्य अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

हापुड़ में इमरान ने भीड़ इकट्ठी कर हिंदुओं पर किया हमला

दरअसल, सरावा गाँव में राकेश त्यागी का पुत्र प्रशांत का इस्लाम के पुत्र इमरान के साथ कुछ हल्की फुल्की कहासुनी हो गई थी, लेकिन मामला शांत हो गया। दोपहर बाद जब प्रशांत गुलफाम की दुकान पर दाल लेने के लिए गया था तो फिर से मामला बढ़ गया और कहासुनी शुरू हो गई मामला बढ़ा तो प्रशांत पक्ष के लोगों ने इमरान पक्ष के लोगों से शांत रहने के लिए कहा और अपने पक्ष के प्रशांत और अन्य को डाँट डपट कर घर भेज दिया। 

250-300 की भीड़ के साथ साजिद ने किया चाकू से हमला

इमरान पक्ष के लोग शांत नहीं हुए और पीछे से लाठी-डंडों और हथियारों से लैस होकर प्रशांत पक्ष लोगों पर धावा बोल दिया। जिसके बाद जमकर पथराव हुआ। इमरान पक्ष के लोगों ने चाकू से भी हमला किया। जिसमें आशाराम त्यागी, प्रयास त्यागी, प्रशांत त्यागी, जॉनी त्यागी और मुकेश त्यागी घायल हो गए। घायल लोगों ने बताया कि उन्हें चाकू साजिद ने मारा था। उन्होंने बताया कि लगभग 250-300 मुस्लिमों की भीड़ ने उन पर हमला बोला।

लोगों की छतों पर एकत्र हो गए थे पत्थर

पथराव का एक वीडियों भी वायरल हुआ है, जिसमें साफ दिख रहा है कि कैसे सैकड़ों की मुस्लिम भीड़ हिंदू समुदाय के लोगों पर पथराव कर रही है और वो बचाव की कोशिश कर रहे हैं। यह पथराव लगभग एक घंटे तक होता रहा। पथराव के दौरान आसपास के लोगों के घरों में भी पत्थर फेंके गए। इस दौरान घरों की छतों पर काफी संख्या में पत्थर एकत्र हो गए। पथराव को देखकर जान बचाने के लिए लोग कमरों में कैद हो गए। घटना में घायल पाँचों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है और पुलिस ने मामले में 6 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है।

सूचना के बाद मौके पर पहुँची पुलिस ने मामला शांत कराया। पुलिस मामले की जाँच में जुट गई हैं। पुलिस क्षेत्राधिकारी भी गाँव में पहुँचे। क्षेत्राधिकारी राजेश सिंह का कहना है कि तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज किया जा रहा है दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाएगी।

जमातियों की सूचना देने पर भुगतने की दी थी धमकी

उल्लेखनीय है कि सरावा गाँव में कुछ दिन पहले दिल्ली के तबलीगी जमात में शामिल होकर आए एक ग्रामीण की कुछ लोगों ने पुलिस और स्वास्थ्य विभाग को सूचना दी थी। जिसके बाद पुलिस ने उक्त व्यक्ति के अलावा कुछ लोगों को क्वारंटाइन किया था। हालाँकि सभी लोग क्वारंटाइन की अवधि पूरा करके अपने घर भी पहुँच चुके हैं। लेकिन बताया जाता है कि मुस्लिम समुदाय के युवकों में इसी बात को लेकर गुस्सा था। विवाद और मारपीट के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोगों ने जमकर इसी बात को लेकर भुगत लेने की धमकियाँ भी दी थीं।

पहले भी बनाया जा चुका है हिंदुओं को निशाना

गौरतलब है कि दिल्ली में फरवरी में हुए दंगों के दौरान भी मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं को निशाना बनाया गया था। मुस्लिम दंगाइयों ने हिंदुओं के घरों, उनकी गाड़ियों और उनके शैक्षणिक संस्थानों पर हमला करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रखी थी। इसी तरह उत्तराखंड में दिवाली के दौरान पटाखा फोड़ने पर मेहरुद्दीन, शाहनवाज, सोहैल सहित 60 मुस्लिमों की भीड़ ने हिंदुओं पर हमला बोला था।

उमर खालिद और सहयोगियों पर UAPA के तहत केस दर्ज, दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों की साजिश का आरोप

नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े एक मामले में दिल्ली पुलिस ने जामिया के छात्रों मीरन हैदर और सफूरा जरगर के खिलाफ गैर कानूनी गतिविधि (निरोधक) अधिनियम (UAPA) के तहत केस दर्ज किया है। बताया गया है कि हैदर की तरफ से पेश हुए वकील अकरम खान का कहना है कि पुलिस ने JNU छात्र नेता उमर खालिद के खिलाफ भी UAPA के तहत केस दर्ज किया है।

उमर खालिद और उसके साथियों पर UAPA के तहत आरोप दर्ज

रिपोर्ट्स के अनुसार हैदर और जरगर फिलहाल न्यायिक हिरासत में है। उन्हें फरवरी माह में दिल्ली में भड़के हिन्दू विरोधी दंगों को भड़काने की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उल्लेखनीय है कि जरगर जामिया समन्वय समिति का मीडिया समन्वयक है और हैदर इस समिति का सदस्य है।

35 वर्षीय हैदर PhD छात्र है और दिल्ली में RJD की युवा इकाई का अध्यक्ष है, जबकि जरगर जामिया मिल्लिया इस्लामिया से एम.फिल कर रहा है। पुलिस ने FIR में दावा किया है कि दिल्ली में भड़के हिन्दू-विरोधी दंगे एक पूर्व नियोजित साजिश थी, जिसे उमर के ही दो साथियों द्वारा रची गई थी।

FIR में इन छात्रों पर राजद्रोह, हत्या, हत्या के प्रयास, धार्मिक आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी फैलाने और दंगे करने का मामला दर्ज है। FIR के मुताबिक, उमर खालिद ने 2 जगहों में भड़काऊ भाषण दिए थे और अमेरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान इसे बंद करने के लिए लोगों से सड़क पर उतरने की बात कही थी।

ज्ञात हो कि दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगे डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा की पहली शाम से ही भड़के थे। FIR में बताया गया है कि हथियार, पेट्रोल बंद तेजाब की बोतलें और पत्थर कई घरों में साजिश के तहत इकट्ठे किए गए थे। इन कथित छात्रों पर यह भी आरोप हैं कि इन्होने 23 फरवरी को महिलाओं और बच्चों से जाफराबाद मेट्रो स्टेशन की सड़क को बंद करवाकर परिस्थितियों को तनावपूर्ण बनाया।

गौरतलब है कि दिल्ली में नागरिकता कानून के विरोध के नाम पर बड़े स्तर पर हिन्दू-विरोधी दंगों को अंजाम दिया गया था। यह सिलसिला शाहीन बाग़ से शुरू हुआ था जो गत दिसम्बर माह से ही अपनी गतिविधियों के कारण चर्चा का विषय बना रहा।

क्या है UAPA

इसके तहत कोई भी व्यक्ति जो आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होगा, उसे आतंकी घोषित कर प्रतिबंधित किया जा सकेगा। ऐसे लोग किसी आतंकी संगठन में तो शामिल नहीं होते, लेकिन वो सभी काम करते हैं, जो एक आतंकी संगठन के माध्यम से किया जा सकता है। ऐसे व्यक्तियों को ‘लोन वुल्फ’ की संज्ञा दी जाती थी। इससे पहले सिर्फ़ आतंकी गतिविधियों में संलिप्त संगठनों को ही प्रतिबंधित किया जा सकता था।