मुरादाबाद में पिछले सप्ताह पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम पर हमला करने वाले पाँच पत्थरबाजों को कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। इसकी जानकारी मिलते ही जेल प्रशासन के साथ पूरे जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया है। इसके बाद जेल और संबंधित थानों को सैनेटाइज करने का काम शुरू हो गया है। नागफनी थाने के सभी पुलिसकर्मियों को क्वारंटाइन कर दिया गया है। वहीं अब सैकड़ों पुलिसकर्मियों को क्वारंटाइन करने पर विचार किया जा रहा है।
मुरादाबाद के नवाबपुरा इलाके में 15 अप्रैल को सर्वे करने गई स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की टीम पर स्थानीय लोगों ने पत्थरबाजी कर दी थी। इसके आरोप में गिरफ्तार किए गए 17 लोगों को पुलिस ने जेल भेज दिया था। साथ ही सभी के सैंपल लेकर जाँच के लिए भेज दिए, लेकिन मंगलवार को आई रिपोर्ट में इन्ही में से पाँच पत्थरबाजों को कोरोना पॉजिटिव पाया गया।
इसके बाद प्रशासन ने तत्काल पाँचों को जिला अस्पताल स्थित वार्ड में भर्ती करा दिया। उधर जेल के अन्य बंदियों को एक मॉडर्न पब्लिक स्कूल स्थित अस्थाई जेल में शिफ्ट करने की कार्रवाई की जा रही है। मंगलवार को आई जाँच रिपोर्ट में नवाबपुरा निवासी 5 पत्थरबाज महफूज अली, फहीम अहमद, सब्लू आजम, असद और दिल्ली निवासी कृष्णा कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। जेल प्रशासन ने इसकी पुष्टि की है।
जाँच रिपोर्ट सामने आते ही पुलिस प्रशासन के साथ पूरे जेल प्रशासन में हड़कंप मच गया है। वहीं स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जेल के साथ नागफनी थाने को भी सैनेटाइज किया है और नागफनी के सभी पुलिस स्टाफ को तत्काल क्वारंटाइन कर दिया गया है। वहीं शेष सैकड़ों पुलिसकर्मियों को क्वारंटाइन करने पर विचार किया जा रहा है, क्योंकि जिस समय पुलिस ने आरोपितों को गिरफ्तार किया था उस समय कई बड़े पुलिस अधिकारियों के साथ सौ से अधिक पुलिस फोर्स के जवान मौजूद थे।
गौरतलब है कि 15 अप्रैल को नागफनी थाना क्षेत्र के नवाबपुरा इलाके में स्वास्थ्य विभाग की टीम कोरोना वायरस की चपेट में आकर जान गँवाने वाले सरताज अली के करीबियों को क्वॉरंटाइन करने गई डॉक्टरों और पुलिस टीम पर लोगों ने पथराव कर दिया था। इस हमले में तीन डॉक्टर गंभीर रुप से घायल हो गए थे। मामले में तत्काल कार्रवाई करते हुए पुलिस ने 7 महिलाओं सहित 17 लोगों को गिरफ्तार कर दूसरे दिन जेल भेज दिया था।
वहीं डॉक्टरों और पुलिस टीम पर हमला करने के मामले में कारोबारी डिल्लन को मास्टर माइंड माना जा रहा है। इतना ही नहीं मामले का मास्टर माइंड अभी पुलिस की पकड़ से दूर है। इसे देखते हुए पुलिस ने डिल्लन के बारे में जानकारी देने वाले को इनाम देने की घोषणा कर दी है। पुलिस का कहना है कि डिल्लन का पूरा कुनबा मोस्ट वांटेड हो गया है, क्योंकि नवाबपुरा बवाल में कारोबारी डिल्लन के कुनबे ने ही लोगों को भड़काया था।
This is from Moradabad. People, you can identify with their cloth, started pelting stones on health workers n police. Watch till end to see what happened. pic.twitter.com/4ovqOgbozd
दरअसल, पूरा कुनबा पत्थरबाजी करते कैमरे में कैद पाया गया था। इससे पहले डिल्लन की पत्नी शमीम बेगम, बेटी शबनम को पुलिस मौके से गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है, लेकिन बेटा शानू उर्फ सलीम, नदीम उर्फ राजू और खुद डिल्लन अन्य बवालियों के साथ फरार है।
महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं सहित तीन लोगों की भीड़ ने निर्मम तरीके से हत्या कर दी। लेकिन कॉन्ग्रेस चुप रही, क्योंकि राज्य में वह शिवसेना के साथ सत्ता में साझीदार है। इस मॉब लिंंचिंग पर चुप्पी को लेकर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गॉंधी को घेरते हुए ‘रिपब्लिक टीवी’ के संस्थापक अर्नब गोस्वामी ने तीखे सवाल पूछे हैं।
अर्नब ने कहा कि इस मामले में मीडिया का रवैया काफ़ी पक्षतापूर्ण है। कोरोना वायरस पर तो सभी न्यूज़ चैनल कार्यक्रम कर रहे हैं। लेकिन साधुओं की मॉब लिंचिंग पर सारे के सारे मौन धारण किए हुए हैं। इस दौरान उन्होंने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी पर भी निशाना साधा और उनसे सवाल पूछे।
अर्नब ने याद दिलाया कि देश की 80% जनसंख्या सनातन धर्म को मानती है। सनातनी है। वे साधुओं की क्रूरता से की गई हत्या से व्याकुल दिखे। अर्नब ने कहा कि आज भारत में हिन्दू होना और भगवा वस्त्र धारण करना पाप हो गया है।
मॉब लिंचिंग पर सोनिया गॉंधी को घेरते हुए उन्होंने पूछा कि अगर किसी मौलवी या किसी पादरी की इस तरह से हत्या की गई होती तो क्या मीडिया, सेक्युलर गैंग व राजनीतिक दल आज शांत होते? एक पैनलिस्ट ने जवाब दिया कि अगर ऐसा होता तो अब तक पता नहीं क्या-क्या जला दिया गया होता।
इसके बाद अर्नब ने पूछा कि अगर पादरियों की हत्या होती तो क्या ‘इटली वाली एंटोनिया माइनो’ चुप रहतीं? इस दौरान पैनल में ‘तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त’ पर ठुमके लगाने वाले और ख़ुद को संभल स्थित कल्कि धाम का पीठाधीश्वर बताने वाले आचार्य प्रमोद कृष्णन भी मौजूद थे। वे कॉन्ग्रेस नेता भी हैं।
अर्नब ने उनसे कहा कि अगर किसी पादरी की हत्या होती तो आपकी पार्टी और आपकी पार्टी की ‘रोम से आई हुई, इटली वाली’ सोनिया गाँधी बिलकुल चुप नहीं रहतीं। अर्नब ने दावा किया कि मॉब लिंचिंग पर सोनिया गाँधी आज चुप हैं तो इसका मतलब है कि वो मन ही मन में खुश भी हैं। मॉब लिंचिंग पर सोनिया गॉंधी की चुप्पी को लेकर अर्नब ने कहा:
“सोनिया गाँधी तो खुश हैं। वो इटली में रिपोर्ट भेजेंगी कि देखो, जहाँ पर मैंने सरकार बनाई है, वहाँ पर हिन्दू संतों को मरवा रही हूँ। वहाँ से उन्हें वाहवाही मिलेगी। लोग कहेंगे कि वाह, सोनिया गाँधी ने अच्छा किया। इनलोगों को शर्म आनी चाहिए। क्या उन्हें लगता है कि हिन्दू चुप रहेंगे? आज प्रमोद कृष्णन को बता दिया जाना चाहिए कि क्या हिन्दू चुप रहेंगे? पूरा भारत भी यही पूछ रहा है। बोलने का समय आ गया है।”
बता दें कि अर्नब गोस्वामी ने हाल ही में एक लाइव शो के दौरान ही एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया से त्यागपत्र दे दिया था। अर्नब ने अपने इस्तीफे के लिए एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के गिरते हुए मूल्यों को जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने व्यक्तिगत पूर्वग्रहों के लिए नैतिकता से समझौता किया है। उन्होंने कहा कि वह काफी लंबे वक्त से एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के सदस्य हैं। लेकिन अब यह मात्र कुछ लोगों का समूह है, जिनमें फेक खबरों को फेक कहने का दम नहीं है।
विश्व भर में कोरोना के मद्देनजर लागू लॉकडाउन के बावजूद संक्रमण के आँकड़ों में इजाफा देखा जा रहा है। इसके साथ घरेलू हिंसा के आँकड़ों में वृद्धि एक व्यापक समस्या बनकर सुर्खियों में आई है। भारत, ब्राजील, चीन के अलावा यूके, यूएस और फ्रांस में भी इस बीच घरेलू हिंसा के मामलों में उछाल देखने को मिला है।
भारत की राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस संबंध में जानकारी देते हुए पिछले दिनों भी कहा है कि लॉकडाउन के बाद मामलों में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई है। इस साल 27 फरवरी से 22 मार्च तक यह आँकड़ा 397 था। 23 मार्च से अप्रैल 16 के बीच यह बढ़कर 587 हो गया। WHO ने भी वैश्विक स्थिति देखते हुए इस मामले पर कॉन्फ्रेंस कर हर देश से उपयुक्त कदम उठाने को कहा है।
अब हालाँकि, कुछ लोग लॉकडाउन के बीच बढ़े इन आँकड़ों के लिए सरकार, प्रशासन, कानून, निरक्षरता व पिछड़े समाज को जिम्मेदार ठहराएँगे। कुछ इन बढ़े आँकड़ों के पीछे लॉकडाउन को ही वजह समझना शुरू कर देंगे। मगर इससे पहले इन आँकड़ों को देखकर हम अतिभावुक हों व लॉकाडउन को कोसना शुरू करें, सरकार, प्रशासन, कानून, अदालत पर सवाल उठाएँ, उससे पहले कुछ बातों पर गौर करना बेहद जरूरी है।
पहली बात तो ये कि पूरे देश में लॉकडाउन वर्तमान की वह आवश्यकता है जिसका इस समय कोई और विकल्प नहीं है। यदि मानव जाति को कोरोना के कहर से संरक्षित करना है तो उन्हें कुछ दिन घरों में लॉकडाउन रहना ही होगा। इसके उलट दूसरी बात घरेलू हिंसा जिसके आँकड़ों में उछाल को लॉकडाउन से जोड़ा जा रहा है, वह देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में फैली पितृसत्ता का प्रमाण है। वो पितृसत्ता जो एक जहरीली व्यवस्था के रूप में सदियों से समाज में तटस्थ रही। मगर भागती दुनिया की बराबरी करने की होड़ में हमें ऐसा लगा कि ये बीते समय की बात है।
इतिहास की यही कुरीति आज महामारी के बीच पैदा हुई मजबूरियों का फायदा उठाकर फिर उभर आई है। हालाँकि खत्म ये कभी नहीं हुई थी। लेकिन भ्रम में जीने वालों ने खुद के ख्यालों से इसे डायवर्ट कर दिया था। आज जब हर देश में घरेलू हिंसा की समस्या को प्राथमिकता से दिखाया जा रहा है, तो समझ आता है कि इसका लेना-देना निरक्षरता या पिछड़े समाज से नहीं है। बल्कि इसका एकमात्र कारण वो सोच है जो पुरुषों को ये मानने का अधिकार देती है कि उनके घर की महिलाएँ व बच्चे उनकी वो वस्तु हैं जिस पर वे जब जी चाहे अपनी भड़ास निकाल सकते हैं।
साभार: euractiv
लॉकडाउन में कमियाँ निकालने से पहले और उससे जोड़कर कोई भी घोषणा करने से पहले हमें समझने की जरूरत है कि इस बीच बाहरी अपराधों जैसे रेप, हत्या, मार पिटाई, चोरी-चकारी आदि मामलों में बहुत कमी कैसे आई है और आखिर क्यों डोमेस्टिक वायलेंस बढ़ा है? क्षण भर विचार करने पर मालूम होगा कि आधुनिकता का राग अलापे जो पुरुष लॉकडाउन से पहले जगह-जगह विचरण कर अपना मन बहलाया करते थे, वो अब घर में बैठे हैं। इसके कारण बाहर का समाज सुरक्षित होता जा रहा है लेकिन घरों में रहने वाली महिलाएँ व बच्चे खतरे में आ गए हैं।
विश्व भर में हो रही घटनाएंघरेलू हिंसा में वृद्धि के मायने
वास्तविकता में सच तो ये है कि ये घरेलू हिंसा का लॉकडाउन से कोई संबंध नहीं है। ये केवल पितृसत्ता से जकड़े समाज का एक परिणाम है जो एक जगह स्थिर होने के कारण फिर से अपना असली चेहरा दिखाने लगा है। ऐसे समाज के लिए बराबरी और समानता सिर्फ़ दोयम दर्जे का विषय है या फिर दिखावे का। पुरुष प्रधानता इनके लिए मुख्य विषय है।
अगर हर देश से आते आँकड़ों को देखकर भी हम इन बातों से तसल्ली कर रहे हैं कि इनके लिए हमें सरकार मदद करेगी, कानून सहायता देगा, अदालत फैसला करेगी, तो समझ लीजिए, ये समस्या का हल नही बल्कि समस्या को दुसरे के सहारे टालने की प्रक्रिया है। जब तक पितृसत्ता है तब तक घरेलू हिंसा के पीड़ितों को रेस्क्यू करने का सिलसिला साल दर साल चलता रहेगा। भले ही लॉकडाउन के बाद ये आँकड़े सामान्य हो जाएँगे, लेकिन खत्म कभी नहीं होंगे। हर दूसरे नहीं हर दसवें घर से एक मामला जरूर आएगा।
और, सत्ता कब किसके हाथ में आएगी और वे कब आपके लिए क्या कदम उठाएगी ये भी अनिश्चितकाल की प्रक्रिया है। आज मलेशियन सरकार के एक फैसले को सुनकर हम इसे और अच्छे से समझ सकते हैं। वहाँ घरेलू हिंसा के आँकड़ों को बढ़ता देख सरकार ने महिलाओं को सुझाव दिया कि वे घर में रह रहे पुरुषों को टोके नहीं, बल्कि अगर उनसे कुछ काम करवाना है तो फिर उनके सामने डोरेमॉन की आवाज निकालें या अपनी बात मजाकिया अंदाज में कहें, जिससे उन्हें टोकना न बुरा लगे। इसके अलावा वे घर में मेकअप करके भी रखें और अच्छे कपड़े पहनकर भी रखें।
गौरतलब है कि सरकार के इस तरह के सुझाव (मेकअप आदि को लेकर) भी एक तरह से स्त्रियों के ऑब्जेक्टिफिकेशन की ही बात है। इसकी कई कार्यकर्ताओं व संस्थाओं ने आलोचना भी की है और इसके कारण वहाँ की सरकार को अपने इन सुझावों के लिए माफी माँगनी पड़ी।
मलेशियन सरकार द्वारा पोस्ट किया गया सुझाव
ऐसे ही फ्रांस सरकार को देखिए। फ्रांस में लॉकडाउन के बाद घरेलू हिंसा में 36 प्रतिशत का उछाल आया तो उन्होंने एक्शन लेने की बात पर महिलाओं के लिए होटल के रूम बुक कर दिए। भारत में तसल्ली की बात ये है कि न्यायपालिका इन बढ़े आँकड़ों पर गंभीर है और हर जगह बंदी के बावजूद इस पर कदम उठाने की दिशा में सुनवाई कर रही है।
साभार: indian express
आज यदि हम ये भी मान रहे हैं कि औरतें जागरूक हो रही हैं, आधुनिक हो रही हैं, पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, तो ये भी अपवादों का उदाहरण है। विश्व भर में ऐसी अनेकों महिलाएँ हैं जो पुरुषों के अत्याचार को सहने के लिए खुद को मानसिक तौर पर तैयार किए हुए हैं। ऐसी महिलाओं का किसी संस्कृति, समाज, सभ्यता, सीमा से कोई लेना-देना नहीं है। बस इसकी एक वजह है कि वे अपने साथी या परिवार से भावनात्मक तौर पर इस कदर जुड़ी हैं कि उन्हें समझ ही नहीं आता कि उनके साथ क्या हो रहा है। भारत में तो डोमेस्टिक वायलेंस सह रही महिलाओं के कई उदाहरण हमारे पास पहले से ही हैं। मगर, जिन देशों की सभ्यता को प्रगति के मानक मानते हैं वहाँ भी औरतें इतनी ही लाचार हैं। इनके अतिरिक्त वे महिलाएँ जो वर्तमान में नारी विषयों पर लिखती हैं उनमें से भी कई इसकी पीड़िता होती हैं।
क्रेजी लव्स की लेखिका लेस्ली मॉर्गन वर्तमान में अमेरिकन राइटर होने के अलावा नारीवाद का एक बड़ा चेहरा हैं। वे खुद एक वीडियो में कहती हैं कि उन्हें घरेलू हिंसा समझने में सालों साल लगे और जब उन्हें समझ भी आया तो करीब दो साल उन्होंने अपने साथी से अलग होने में लगाए। उनका मानना है कि लॉकडाउन ने भले ही घरेलू हिंसा के मामले को बढ़ावा दिया है। लेकिन इसे एक अवसर की तरह देख सकते हैं कि पीड़िताएँ अपने साथी को छोड़ने के लिए खुद को तैयार करें या फिर उनकी शिकायत करें।
आज कई नारी विषय पर लिखने वाले कार्यकर्ताओं और लेखकों का ये भी मानना है कि इस लॉकडाउन में घर पर ज्यादा समय बिताने के कारण हिंसा हो रही हैं। जहाँ पुरुष कभी दारू न मिलने के कारण अपराध कर रहे हैं, तो कभी घरेलू कामों का दबाव बनाए जाने के कारण ऐसा कर रहे हैं। आउटलुक ने पदमा रेवाड़ी नामक मनोवैज्ञानिक के हवाले से बताया है कि उनके घरेलू कार्यों में सहायता करने वाली खुद घरेलू हिंसा का शिकार हैं। वे कहती हैं कि उनकी सहायिका को इन दिनों और परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उसका पति बिना शराब के अधिक हिंसक होता है।
अंत में यही जानिए कि आज के समय में कई ऐसी संस्थाएँ हैं जो महिलाओं को इस नर्क से निकालने के लिए अथक प्रयास कर रही हैं। अमेरिका से लेकर भारत तक में इनका विस्तार है। इसके अलावा देश की सरकारें भी अपनी ओर से समाज में औरतों को अधिकार दिलवाने के लिए कार्य कर रही हैं। न्यायपालिका और प्रशासन भी इसी पर मंथन करते हैं कि कैसे बढ़ते समाज में महिलाओं की स्थिति को सुधारा जाए। उन्हें कैसे स्वावलंबी जीवन प्रदान किया जाए। मगर, अधिकांश महिलाओं की मनोस्थिति को समझकर लगता है कि जिन्हें घरेलू हिंसा से निजात पानी है, उन्हें अपने अधिकारों के लिए अब खुद आवाज उठानी होगी।
उन्हें खुद आत्मसम्मान के साथ या तो उस माहौल से खुद को अलग करने का फैसला लेना होगा या फिर उस व्यक्ति विशेष और सोच को सबक सिखाने के लिए दंड दिलवाना होगा। इसके लिए ये जरूर है कि उन्हें जागरूक होना पड़ेगा, मजबूत होना होगा। मगर जब तक बर्दाश्त और सहनशीलता के भाव आदर्श नारी और उसके हॉर्मोन्स को जस्टिफाई करने के लिए प्रयोग किए जाएँगे, तब तक ये घरेलू हिंसा बढ़ती रहेगी और इसके पीछे लॉकडाउन एक कारण कभी नहीं होगा।
केरल से जाकर तबलीगी जमात के कार्यक्रम का हिस्सा बनने वाले 284 लोगों की गुमशुदगी ने प्रशासन को सकते में ला दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन 284 लोगों की सूचना अब तक पुलिस को नहीं मिल पाई है। केरल के इन तबलीगी जमातियों के मोबाइल फोन भी स्विच ऑफ आ रहे हैं, जिसके कारण इन्हें ट्रेस करना भी मुश्किल हो गया है।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार केरल से तबलीगी जमात का हिस्सा बनने वाले 1000 से ज्यादा लोगों में से 518 लोग केरल वापस लौटे। जिन्हें हाल ही में पहचान करके क्वारंटाइन किया गया। हालाँकि, टेस्ट के बाद इनमें से केवल 6 लोग कोरोना पॉजिटिव आए।
इसके बाद 509 जमाती, जिन्होंने 12 से 28 मार्च तक के बीच में केरल से दिल्ली जाकर मरकज़ कार्यक्रम को अटेंड किया, वे फिलहाल तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में हैं। इनकी जानकारी राज्यों के गृह प्रशासन को सौंप दी गई है। इसके अलावा 20 अप्रैल तक राज्य में 408 कोरोना मामले आए हैं। जिन्हें उपयुक्त इलाज देकर ठीक करने का प्रयास जारी है। मगर, इस बीच राज्य प्रशासन की चिंता वे जमाती बन गए हैं, जो बहुत कोशिशों के बाद भी पकड़ में नहीं आ रहे।
Kerala model:
On @aajtak Kerala DGP said 284 Tablighis returned from Nizamuddin are untraceable. They have switched off their phones. 504 Kerala Tablighis are quarantined in various states, outside Kerala
मालूम रहे कि भारत में कोरोना का सबसे पहला मामला केरल में ही आया था। जिसके बाद पूरे देश में इसका प्रसार शुरू हुआ और आज आँकड़े 20 हजार पहुँचने वाले हैं। वहीं अकेले केरल में इन केसों की संख्या 408 पहुँच गई है। जिनमें से 288 रिकवर कर चुके हैं। जबकि वायरस के कारण 3 लोग दम तोड़ चुके हैं। अब समय के बीतने के साथ पुलिस को डर है कि अगर ये 284 जमाती जल्द से जल्द नहीं पकड़े जाते हैं तो ये अन्य लोगों को भी संक्रमित कर देंगे। इसलिए पुलिस इनकी धड़पकड़ में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। सूचना के अनुसार, तबलीगी जमात में केरल से गए लोगों की संख्या 1,311 थी।
बता दें कि 29 मार्च को आईबी निदेशक अरविंद कुमार ने राज्य डीजीपी को इन तबलीगियों की मूवमेंट पर जानकारी दी थी। राज्य मुख्यमंत्री ने भी इसके बाद पुलिस की योजना को मंजूरी देते हुए सभी जमातियों की पहचान करके क्वारंटाइन करने की बात की थी। लेकिन साथ ही ये भी आदेश दिया था कि ये बातें मीडिया सुर्खियों में न आए।
अब जब लाख कोशिशों के बाद 284 जमातियों की कोई सूचना नहीं मिल रही है, तो पुलिस के लिए ये एक सिरदर्दी बन गए हैं। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, एक पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ये जमाती प्रत्येक संपर्क में आने वाले व्यक्ति के जरिए इस संक्रमण को और फैला सकते हैं और इससे पूरे राज्य में वायरस का समुदाय के बीच विस्फोट हो सकता है।
गौरतलब है कि इससे पहले, सभी स्थिति को देखते हुए भी केरल सरकार ने 20 अप्रैल के बाद लॉकडाउन में कुछ छूट देने का एलान किया था। इस पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कड़ी आपत्ति जाहिर की थी। गृह मंत्रालय ने कहा था कि शहरों में रेस्तरां खोलने, बस यात्रा की अनुमति देने और निगम के इलाकों में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम (MSME) उद्योगों को खोलने की अनुमित देना लॉकडाउन के दिशा-निर्देशों को कमजोर करने के बराबर है।
स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले की घटनाएँ रुकती नहीं दिख रही। ताजा मामला कर्नाटक के मैसूर का है। यहॉं सुमय्या फिरदौस नामक आशा वर्कर पर हमला किया गया।
तीन युवकों को मास्क पहनने व सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की सलाह देना उसे महँगा पड़ गया। युवकों ने फिरदौस की सलाह मानने की बजाए उस पर हमला कर दिया। युवकों की पहचान महबूब, खलील और जीशान के रूप में हुई है।
घटना के बाद महिला ने इस मामले में पुलिस थाने जाकर शिकायत दर्ज करवाई। उसने बताया कि सोमवार को हलीम नगर के मैसूर में कोरोना संदिग्धों की जाँच करने गई थी। मगर वहाँ उसके साथ बदसलूकी हुई। आशाकर्मी की शिकायत पर पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया है।
An ASHA (Accredited Social Health Activist) worker from Mysuru, Sumayya Firdose said that she was threatened by 3 people when she asked them to maintain social distance&wear masks. “This is wrong, they cannot use foul language. We’re here to work”, she said. (21/04/20) #Karnatakapic.twitter.com/zUyDfpsbts
जानकारी के मुताबिक, सुमय्या फिरदौस नाम की आशाकर्मी बैनीमंतप सरकारी अस्पताल से जुड़े होने के कारण इलाके में जाँच के लिए गई थीं। जहाँ युवकों ने उनके साथ बदसलूकी की और उन्हें धमकी भी दी। महिला के मुताबिक तीनों युवकों से सवाल पूछे जाने पर वे उसे गाली देने लगे। जान से मारने की धमकी दी। महिला के मुताबिक मामला बढ़ने पर उन्हें आसपास के लोगों ने बचाया।
Karnataka: Three booked for attacking and threatening to kill ASHA worker Sumayya Firdose for asking them to follow coronavirus guidelines https://t.co/C6YAhYnu2e
बता दें इस मामले के संज्ञान में आने के बाद जिला इंचार्ज मिनिस्टर एसटी सोमेश्वर ने कहा कि उन्होंने इस संबंध में मैसूर आयुक्त से बात की है। आरोपितों के ख़िलाफ़ एफआईआर भी दर्ज हो गई है।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले बेंगलुरु के पदरायनपुरा इलाके में पुलिस और स्वास्थ्य अधिकारियों पर हमला हुआ था। इस संबंध में पुलिस ने 110 लोगों से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया था। इससे पहले सादिक नगर इलाके में भी आशाकर्मियों पर हमले की खबर सामने आ चुकी है।
पुलिस और मेडिकल टीम पर हमले की हाल में कई घटनाएँ सामने आई है। बिहार के दरभंगा, हरियाणा के पंचकुला, बेंगलुरु के पदरायनपुर जैसे कई इलाकों से ऐसे मामले आए हैं। बेंगलुरु में हुए हमले की यदि बात करें तो यहाँ जिस भीड़ ने स्वास्थ्यकर्मियों पर बेरहमी से हमला किया उसे फिरोजा नाम की महिला ने उकसाया था।
अमेरिकी सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक ने भारत के डिजिटल मार्केट में अपने कदम बढ़ाने के लिए रिलायंस के साथ एक बड़ी डील की है। फेसबुक ने उद्योगपति मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के डिजिटल ऑपरेशन रिलायंस जियो में 5.7 बिलियन यानी 43,574 करोड़ रुपए का निवेश किया है।
इस डील के बाद फेसबुक भारत के लोगों को बिजनेस करने के नए अवसर प्रदान करेगा। इस बात का ऐलान खुद फेसबुक ने किया है। इस डील के बाद जियो की वैल्यू 4.62 लाख करोड़ रुपए हो गई है। फेसबुक उसकी सबसे बड़ी शेयरहोल्डर बन गई है।
डील के बाद फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने कहा है कि मैं मुकेश अंबानी और पूरी Jio टीम को उनकी साझेदारी के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ। मैं नई डील को लेकर बहुत उत्साहित हूँ। उन्होंने कहा कि जियो प्लेटफार्म के साथ मिलकर फेसबुक कई प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। हम एक वित्तीय निवेश कर रहे हैं और इससे भी अधिक, हम कुछ प्रमुख परियोजनाओं पर एक साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं जो पूरे भारत में लोगों को बिजनेस के नए अवसर देगा।
मार्क जकरबर्ग ने कहा कि यह विशेष रूप से अभी महत्वपूर्ण है, क्योंकि छोटे व्यवसाय हर अर्थव्यवस्था के लिए अहम होते हैं और उन्हें मदद की आवश्यकता होती है। भारत में 6 करोड़ से अधिक छोटे व्यवसाय हैं और लाखों लोग नौकरियों के लिए उन पर निर्भर हैं।
दरअसल, साल 2016 में जियो की लॉन्चिंग के बाद रिलायंस देश की एकमात्र ऐसी कंपनी के रूप में उभरी है, जो तेजी से बढ़ते भारतीय बाजार में अमेरिकी तकनीकी समूहों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम है। रिलायंस ने मोबाइल टेलीकॉम से लेकर होम ब्रॉडबैंड तक हर चीज में तेजी से ई-कॉमर्स का विस्तार किया है।
वहीं भारत भी फेसबुक और उसके मैसेजिंग प्लेटफॉर्म वॉट्सऐप के लिए एक बड़ा मार्केट है। भारत में फेसबुक के 400 मिलियन यूजर्स हैं। इतना ही नहीं फेसबुक और व्हाट्सएप का इस्तेमाल भारत के बड़े हिस्से में किया जाता है। साथ ही, भारत इस समय एक बड़े डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के दौर में है। जियो इस समय करोड़ों भारतीय और छोटे बिजनेसमैन के लिए कारोबार आसान करने में मदद कर रहा है। कंसल्टेंसी पीडब्ल्यूसी के अनुसार, भारत में साल 2022 में इंटरनेट यूजर्स की संख्या बढ़कर 850 मिलियन होने की उम्मीद है।
कोरोना वायरस के संक्रमण पर काबू पाने के लिए भारत के प्रयासों की दुनियाभर में सराहना हो रही है। इसने पूरी दुनिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख और मजबूत की है। वे सबसे लोकप्रिय ग्लोबल लीडर हैं।
कोरोना से लड़ने के लिए अन्य देशों के मुकाबले भारत की नीति व प्रयास कई मायनों में अभूतपूर्व रहे हैं। इन्हीं कोशिशों का नतीजा है कि 130 करोड़ की जनता वाले देश में ये संक्रमण व्यापक स्तर पर अब तक नहीं फैल पाया। लॉकाडउन जैसे फैसले यहाँ पर स्थिति बिगड़ने से पहले ही ले लिए गए। रोकथाम के उपायों पर भी खूब काम हुआ।
तबलीगी जमात से हॉट्सपॉट बनकर निकले नासूरों का पता लगने के बाद भी देशों ने खुद को बहुत स्तर तक इस महामारी के प्रकोप से बचाया। मगर, कुछ विरोधी फिर भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर उंगलियाँ उठाते रहे। अब इन्हीं सवालों का जवाब देते हुए एक पोल में दी गई रेटिंग आई है। जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक देश के अन्य नेता से ज्यादा रेटिंग मिली है। इसे पोलस्टर मॉर्निंग कंसल्ट ने जारी किया है।
Amidst Coronavirus outbreak, PM Modi’s approval rating soars to 68%, higher than any other world leader: Here are the detailshttps://t.co/84IPjyUXvM
इस रेटिंग के मुताबिक भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता सबसे अधिक है। जानकारी के अनुसार, साल की शुरुआत में नरेंद्र मोदी की रेटिंग 62% थी जो 14 अप्रैल तक बढ़कर 68% हो गई थी। मोदी के बाद दूसरे नंबर पर मेक्सिको के प्रेसिडेंट एंड्रेस मैनुअल लोपेज ओबराडोर हैं। जनवरी में उनकी रेटिंग 39% थी। उसके बाद थोड़ी गिरावट के साथ 36% पर पहुँच गई है। बावजूद इसके वे दूसरे नंबर पर हैं। लोकप्रियता में सबसे अधिक बढ़त देखने ऑस्ट्रेलियन प्राइम मिनिस्टर स्कॉट मॉरिसन की रेटिंग में देखने को मिली है। साल की शुरुआत में ये -26 थी जो अब 26 तक पहुँच गई है।
मॉर्निंग कंसल्ट के डेटा से पता चलता है कि सर्वे किए गए सभी दस देशों में, जापान के पीएम शिंजो आबे की अप्रुवल रेटिंग सबसे कम है (-33 पर), और नेट अप्रुवल में भी ये सबसे खराब गिरावट है। ग्राफ को यदि देखें तो नीली रेखा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अप्रुवल रेटिंग को दर्शाती है और इसका लगातार सबसे ऊपर बने रहना बताता है कि पीएम मोदी इस मामले में किसी भी विश्व के अन्य नेता से ऊपर उठ गए हैं।
दिलचस्प यह है कि केवल कोरोना महामारी के बीच ही नहीं बल्कि साल की शुरुआत में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेट अप्रुवल रेटिंग 62% के साथ सबसे ऊपर बनी हुई थी। मगर अब उनकी ये रेटिंग 68 पहुँचने के बाद उन्हें नेताओं से काफी बढ़त मिली है।
गौरतलब है कि अप्रैल 14 को देश की स्थिति को समझते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन बढ़ाने का फैसला किया था। हालाँकि ये घोषणा करते हुए उन्होंने ये भी कहा था कि 20 अप्रैल तक हर एरिया हर क्षेत्र, हर नगर, हर राज्य पर सख्ती से निगरानी की जाएगी और फिर तय किया जाएगा कि जहाँ पर भी स्थिति सुधरी है वहाँ पर छूट दें। बता दें, 22 अप्रैल तक जो संक्रमितों की संख्या 15, 122 तक पहुँच गई है। वो संख्या 20 अप्रैल तक देश में 14, 175 पहुँच चुकी थी। जिसे देखते हुए कई राज्यों ने अपने यहाँ लॉकडाउन को बढ़ाए रखने का फैसला किए रखा।
अक्टूबर क्रांति के फलस्वरूप 1917 में विश्व में पहली बार लाशों के ढेर पर एक ऐसी शासन व्यवस्था का सृजन हुआ, जो पूर्ण रूप से नास्तिक प्रकृति की और कार्ल मार्क्स के विचारों के विचारों की ही परिणति थी। इसके पीछे प्रमुख व्यक्ति था सोवियत समाजवादी गणराज्य का वास्तुकार, रूसी साम्यवादी पार्टी का संस्थापक, बोल्शेविक क्रांति का प्रमुख नेता और महान नरसंहारक साम्यवादी व्लादिमीर लेनिन! आज सर्वहारा क्रांति के नायक कहे जाने वाले व्लादिमीर लेनिन का 150वाँ जन्मदिन है।
एक ओर जहाँ समाज का बड़ा वर्ग लेनिन-वाद (Leninism) से सदियों से अनुप्राणित रहा, वहीं वह लेनिन के उस ऐतिहासिक विप्लव (Revolution) के सच को नकारता ही आया है, जो लाखों बेगुनाहों की मौत की विभीषिका का आधार बनी। लेकिन फिर साम्यवाद (Communism) की पहली शर्त भी तो यही है, अर्थात – नकारना, अस्वीकरण और सत्य से विमुख रहने की कला ही साम्यवाद है।
व्लादिमीर लेनिन महज सोलह साल का था जब उसके पिता की मृत्यु ने उसे नास्तिक बना दिया। रही-सही कसर निर्वासन के दौरान पढ़े हुए कार्ल मार्क्स के मार्क्सवाद ने पूरी की। लेकिन इस बीच जिस एक बात ने उसे जारशाही के खिलाफ खड़ा होने की प्रेरणा दी, वह थी ज़ार अलेक्जेंडर तृतीय (Tsar-The Russian monarch Alexander III) को मारने की योजना में शामिल उसके बड़े भाई साशा (Sacha) को दी गई फाँसी की सजा।
सवाल व्लादिमीर इलिच उल्यानोवा के एक ‘वाद’ (-ism) बन जाने तक के सफर मात्र का नहीं है, बल्कि प्रमुख सवाल यह है कि यदि यह लाखों लोगों की लाशों को जरिया बनाकर अपनी सनक को साकार रूप देने वाला लेनिन ना होता, तो भारत जैसे देश में आज खुद को वामपंथ का सिपहसलार बताने वाले कहाँ होते?
यह सीधा सवाल इस वामपंथी विचारधारा की अर्थी ढो रहे उन लोगों के अस्तित्व पर ही है, जिन्होंने महज दक्षिणपंथ और सत्ता के विरोध के लिए खुद को हत्यारे लेनिन और तानाशाह स्टालिन का वंशज होना तक स्वीकार कर लिया है। और यह हो भी क्यों नहीं? क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि यह वामपंथी समुदाय आरम्भ से ही अपनी वस्तुस्थिति को समझ पाने में आज तक सफल नहीं रहा है, फिर भी इसने मानो बाकी सभी विचारधाराओं को लाइसेंस वितरण की जिम्मेदारी अपने सर पर उठाई हुई है।
सर्वहारा और शासन में से शासन को चुनता आया है वामपंथ
वामपंथियों के पास आज के समय में भी खुद को प्रासंगिक बनाए रखने और अपने अस्तित्व को तर्कसंगत साबित करने का बस एक ही बहाना रहा है और वो ये कि इन्होंने खुद को हमेशा किसानों, मजदूरों (सर्वहारा) का शुभचिन्तक होने का मुखौटा ओढ़े रखा। लेकिन क्या खुद वामपंथी उस समय को भूल गए हैं जब जारशाही का निर्मम दमन कर वहाँ विरोधियों की लाशों के ढेर पर विश्व की पहली साम्यवादी सरकार के गठन के बाद रूस में छिड़े गृह युद्ध में उन्हीं किसानों को ख़त्म कर देने का ऐलान किया गया।
फासीवाद का ही व्यापक स्वरुप है लेनिनवाद
कम्युनिस्ट लेनिन की प्राथमिकता शासन थी या सर्वहारा? सत्ता की भूख में लेनिन एक ऐसा नेता बनकर उभरा, जिसने रूस की एक तानाशाही को खत्म करने के लिए खुद को एक क्रूर तानाशाह बना लिया। यहाँ तक कि अपने जीवन के अंतिम समय में वो सत्ता के नौकरशाही का चोला ओढ़ने को लेकर परेशान रहा और जोसफ़ स्टालिन की बढ़ती ताक़त को लेकर भी वह चिंता जताता देखा गया। हालाँकि बाद में स्टालिन ही लेनिन का उत्तराधिकारी बना और उसने भी तानाशाही का ही मॉडल अपनाया।
ऐसे कई प्रमाण हैं जिनसे पता चलता है कि जिस हिटलर को आज के नव-बुद्धिजीवी लेनिन-वादी कॉमरेड फ़ासिस्ट बताते नहीं थकते, उसी फ़ासिस्ट हिटलर की तरह ही लेनिन-वादियों के मसीहा लेनिन ने अपनी सेना को मजबूत करने का काम किया। लेनिन अपनी साम्यवादी तानाशाही को सिर्फ रूस तक ही सीमित नहीं रखना चाहता था बल्कि उसका ख्वाब पूरे यूरोप में इसका प्रसार करना था।
सेना में जबरन नौजवानों और कृषकों को भर्ती किया जाने लगा। किसानों से उनकी फसलों और अनाजों को देश के नाम पर सेना का पेट भरने के लिए छीन लिया गया। परिणाम यह हुआ कि इससे एक बड़ी तादाद में रूसी लोग भूख से मरने लगे और रूस की अर्थव्यवस्था तबाह होती गई।
Red Terror : क्रांति और बोल्शेविकों का लाल आतंक
निर्वासन के बाद रूसी क्रांति के वक्त 1917 में लेनिन के वापस लौटने के बाद रूस तीन साल तक गृहयुद्ध की आग में जला। आखिरकार बोल्शेविक जीते और सारे देश का नियंत्रण हासिल कर लिया। जुलाई, 1918 में बोल्शेविकों ने जार निकोलस द्वितीय को उसकी पत्नी और पाँच बच्चों के साथ फाँसी दे दी। क्रांति के बाद रूस में गृह युद्ध एक बड़ी समस्या बनकर उभरा। सिविल वॉर वहाँ की ‘रेड आर्मी’ और ‘व्हाइट आर्मी’ के बीच था।
रेड आर्मी बोल्शेविक तर्ज के समाजवाद के लिए लड़ रही थी, जबकि व्हाइट आर्मी समाजवाद के विकल्प के रूप में पूँजीवाद, राजशाही के लिए लड़ रही थी। 1920 में बोल्शेविकों ने लेनिन के नेतृत्व में विरोधियों को हरा दिया और 1922 में यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स (यूएसएसआर) की स्थापना हुई।
जब रूस में छिड़े गृहयुद्ध के दौरान लेनिन के सामने शासन और सर्वहारा में से किसी एक को चुनने का समय आया, तब उसने सर्वहारा में ही जार को देखा। कहा गया कि दूसरी क्रांति पहली क्रांति की रक्षा के लिए हुई। लेनिन ने किसानों को अपनी सेना में शामिल होने के लिए मजबूर किया और उसके सैनिक भूखे ना रहें, यह सुनिश्चित करने के लिए उसने किसानों से उनका भोजन भी हड़प लिया।
गृहयुद्ध ने रूस की अर्थव्यवस्था का बहुत कुछ नष्ट कर दिया और लाखों लोग भूख से मर गए। रूस की क्रांति को उस वक्त झटका लगा, जब मार्च, 1918 में वामपंथी पार्टी ने ब्रेस्ट-लिटोवस्क समझौते का विरोध करते हुए बोल्शेविकों से अलग होने का निर्णय लिया। इसके बाद जुलाई से गृह युद्ध की शुरुआत हो गई। इस बारे में इतिहासकार मोशे लेविन कहते हैं कि वर्ष 1914 से 1921 के बीच रूस में जो हुआ, उसका नुकसान रूस को लंबे समय तक उठाना पड़ा।
नरसंहारक बोल्शेविक
लेनिन अपने विरोधियों को किसी भी कीमत पर कुचल देना चाहता था। इसका एक नमूना वह बोल्शेविक क्रांति के दौरान पेश कर चुका था और सत्ता हथियाने के बाद भी वह ऐसा करने से चूकने वाले नहीं था। लेनिन की ओर से रूस की सुरक्षा एजेंसियों ने उसका विरोध करने वाले हजारों लोगों को मौत के घाट उतारा।
कम्युनिजम-किसान-मजदूर का नारा और कैपिटलिज्म यानी पूँजीवाद की धुर विरोधी सोच वाली बोल्शेविकों की सरकार बनते ही रूस में नरसंहार का खूनी खेल शुरू हो गया। जारशाही से मुक्ति का आह्वान कर सर्वहारा की बलि देकर अब उसी सर्वहारा के लिए कम्युनिस्ट लेनिन एक क्रूर और निर्दयी शासक बन चुका था। उसकी शासन व्यवस्था और उसके खिलाफ उठने वाली हर आवाज की उसके इशारे पर हत्या कर दी जाने लगी।
इस तरह से रेड टेरेरिज्म यानी, लाल आतंक की शुरुआत रूसी क्रांति के साथ ही सन 1917 से हुई और यह तब तक चला जब तक कि बोल्शेविकों के विरोध में उठने वाली हर एक आवाज को दबा नहीं दिया गया। लेनिन के राज्य में विरोधियों को रेड-टेरर का सामना करना पड़ा, ये वो हिंसक अभियान था। जो लेनिन की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा चलाए गए। लाल सेना के साथ ही लेनिन की सरकार से समर्थन प्राप्त बोल्शेविकों की एक गुप्त पुलिस ‘चेका’ द्वारा इस कार्य को अंजाम दिया गया।
लेनिन ने अगस्त 09, 1918 को सार्वजनिक रूप से 100 विरोधियों को फाँसी देने का हुक्म भी दिया। इसके कुछ माह बाद ही चेका पुलिस ने सोशल रिवॉल्यूशनरी पार्टी के 800 सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया और हजारों को मजदूरी कैंपों में भेज दिया गया। हज़ारों लोगों को प्रताड़ना दी गई। वर्ष 1917-1922 के बीच लेनिन की सरकार ने रूसी गृहयुद्ध में दक्षिणपंथी और वामपंथी बोल्शेविक-विरोधी सेनाओं का भी निर्मम दमन किया।
लाल आतंक (1918-22) के दौरान 2,00,000 लोग मारे गए। अकाल और Dekulakization (Dekulakization राजनीतिक दमन का सोवियत अभियान था, जिसमें पहली पंचवर्षीय योजना, 1929-1932 की अवधि में समृद्ध किसान और उनके परिवारों के लाखों लोगों की गिरफ्तारी, निर्वासन सहित फाँसी दी गई। ये वो कृषक थे जिन्होंने बोल्शेविकों को जबरन अनाज देने से मना कर दिया था। लेनिन ने इन किसानों को रक्त चूसने वाले प्रेतों की संज्ञा दी थी) से 11 मिलियन लोग मारे गए। वहीं 7,00,000 लोग 1937-38 के दौरान लाल आतंकियों द्वारा मार दिए गए। 1929 और 1953 के बीच 4,00,000 अधिक मौत के घाट उतार दिए गए, जबकि जबरन जनसंख्या हस्तांतरण के दौरान 1.6 मिलियन लोग मरे और गुलाग, श्रम कालोनियों और उनके बंदोबस्त में कम से कम 2.7 मिलियन लोगों ने अपनी जान गॅंवाई।
इस प्रकार युद्धरत साम्यवाद के तले दशकों तक एक बड़े पैमाने पर निर्मम हत्या का तांडव जारी रहा और कुल मिलाकर, 20,000,000 सोवियत नागरिकों को शासन द्वारा मार दिया गया, या उनकी दमनकारी नीतियों के प्रत्यक्ष परिणामस्वरुप वो मारे गए। उल्लेखनीय है कि इस आँकड़े में वे मौतें शामिल नहीं हैं, जो या तो सैनिक के रूप में मरे या फिर बोल्शेविकों द्वारा मार दिए गए।
सन 1920 तक बोल्शेविकों का रेड-टेरर भयावह शक्ल ले चुका था। ख़ुफ़िया एजेंसी ‘चेका’ में लगभग 2 लाख बोल्शेविक भर्ती हो गए, जिन्होंने विरोधियों का सामूहिक नरसंहार किया। विरोधियों को यातना दी और सरेआम फाँसी पर लटकाया जाने लगा। लेनिन के शासन ने ‘चेका’ को खुली छुट दी थी, ये पूर्ण रूप से लाल आतंकी थे।
इस चेका पुलिस को साम्यवादी सरकार द्वारा सिर्फ एक ही निर्देश दिया गया था- वह ये कि हर विरोधी आवाज को किसी भी तरह से बंद करना! तात्पर्य अंततः यही निकलता है कि वामपंथ और कुछ नहीं बल्कि सत्ता के लिए फासीवाद का ही एक अपेक्षाकृत अधिक विनाशक तन्त्र है।
और एक बात यह कि क्या ये कैम्प द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर के होलोकॉस्ट (The Holocaust) से मेल नहीं खाते? क्या भारत में नागरिकता कानून (CAA) के विरोध में जब भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग यानी नव-वामपंथी डिटेंशन कैम्प की तुलना होलोकॉस्ट से कर रहे थे, तब उनकी कल्पना में लेनिन का यही कैम्प था?
लेनिन ने नरसंहार के बाद बताया था पूंजीवाद को आवश्यक
रूस में विरोधियों का खात्मा करने के बाद वहाँ जो भुखमरी फैली उसने घोर निराशा को जन्म दिया। सर्वहारा के दमन के बाद ‘सर्वहारा का मसीहा’ यही लेनिन एक बार फिर अपने शब्दों और पाखंड की विचारधारा का खुद ही उपहास करता नजर आया। उसने गरीबी, भुखमरी और रसातल में जा चुकी अर्थव्यवस्था से निपटने के लिए नई आर्थिक नीतियों के ज़रिए हालात उलटने की कोशिश की।
एक समय युद्ध को अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद का प्राकृतिक प्रतिफल बताने वाले लेनिन ने गृहयुद्ध के बाद पूँजीवाद का ही समर्थन किया। जब रूसी अर्थव्यवस्था को सोशलिस्ट मॉडल के हिसाब से बदलने की उनकी कोशिशें थम गईं, तो लेनिन ने नई आर्थिक नीति का ऐलान किया, जिसमें प्राइवेट एंटरप्राइज़ को एक बार फिर इजाज़त दी गई और ये नीति उनकी मौत के कई साल बाद भी जारी रहीं।
वामपंथ का भारत में संघर्ष
आज हम सब यह जानते हैं कि कपटी कम्युनिस्टों ने वामपंथ के निकृष्ट अध्याय पर पर्दा डालने के लिए और इस विचारधारा को जायज ठहराने के लिए हर प्रकार का दुराग्रह किया है और इसके समर्थन में सबूत जुटाने के प्रयास किए हैं । कभी ये कहते नजर आते हैं कि भगत सिंह लेनिन के विचारों से ही क्रांतिकारी बने थे और कभी कहे जाते हैं कि यह आज के समाज की भी जरूरत है। जबकि खुद को लिबरल बताने की आड़ में आज इनका पहला संघर्ष सिर्फ और सिर्फ दक्षिणपंथ के अस्तित्व को नकारने तक सीमित हो गया है। वामपंथियों की पूरी ऊर्जा सिर्फ विरोधी विचारधारा को छोटा साबित करने की या फिर उन्हें ‘भक्त’ कहने में खर्च हुई जाती है।
सर्वहारा के मसीहा लेनिन के नाम पर मॉस्को के राज्य ऐतिहासिक संग्रहालय कुछ ऐसा है जो बुर्जुआ वर्ग के वाहनों के कुछ अंतिम उदाहरणों में से एक है- एक रोल्स रॉयस कार, सिल्वर घोस्ट मॉडल!
कम्युनिस्ट लेनिन सिर्फ एक पर ही नहीं रुका। उसके पास ऐसी कुल 9 रोल्स रॉयस कार थीं। यानी, जब रूसी किसान और सर्वहारा पूरे रूस में भूख से मर रहे थे, लेनिन ने अपनी लग्जरी कार में घूम-घूमकर लोगों को कम्युनिस्ट नीतियों के बारे उपदेश दिया। यानी, एक आकर्षक, पूँजीवादी, महँगी, बुर्जुआ रोल्स रॉयस में। क्या लेनिन का यही शगल आजकल के भारतीय स्वघोषित लेफ्ट-उदारवादियों की भी हकीकत से मेल नहीं खाती है?
यह ठीक उसी तरह से है जिस तरह से आज का वामपंथी कॉमरेड तमाम पूँजीवादी संस्थाओं का लाभ लेकर पूँजीवादी व्यवस्थाओं को कोसकर बुद्धिजीवी बना बैठा है। वह कहीं से भी सर्वहारा और कृषक वर्ग का हितैषी नजर नहीं आता, वह अभिजात्यता का दास है, फिर भी कहता है कि उसकी क्रांति का मूल सर्वहारा का विप्लव है।
बुतों को तोड़ने की कविता गाने वाले आज लेनिन के बुतों के उपासक हैं। जो धर्म को अफीम बताते हैं उन्होंने लेनिन को धर्म बना दिया। उसके मृत शरीर के चर्म को जीवित रखने के लिए लेनिन का ममी बन चुका शरीर मॉस्को के लाल चौक पर बने मकबरे में कैद हैं। वामपंथ की विचारधारा एक फूहड़ चुटकुले से अधिक कुछ भी नहीं हैं।
मॉस्को में लेनिन के शरीर को रसायनों की मदद से ममी बनाकर सुरक्षित रखा गया है
सनकी व्लादिमीर लेनिन ने बोल्शेविक क्रांति के दम पर सर्वहारा यानी, कृषकों, श्रमिकों और गरीबों की लाशों के ढेर के ऊपर अपनी साम्यवादी सरकार बनाई। नव-उदारवादी और कम्युनिस्टों के लिए यह बेशक एक उपाधि हो सकती है कि लेनिन के हाथ मासूम लोगों के खून से रंगे हुए थे। उसकी विचारधारा का एकमात्र उदेश्य हर वामपंथी की तरह ही किसी भी हाल में राजनीतिक द्वंद्व में सबसे ऊपर वाली श्रेणी में स्वयं को प्रतिष्ठित करना था। फिर चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़ती, और उसने ऐसा किया भी।
सर्वहारा के ये तथाकथित ‘चिंतक’ और ‘विचारक’ कोरोना की महामारी के दौरान भी नंगे ही नजर आए हैं। इससे पहले जहाँ इनकी सुबहें सोशल मीडिया पर सत्ता के विरोध में प्रलाप और शाम इसी प्रपंच में समाप्त हो जाया करतीं थीं, यही सोशल मीडिया से पैदा हुई ‘वामपंथी विचारक जमात’ कोरोना के दौरान गरीब और बेसहारा लोगों की मदद के दौरान अपने बिलों में छुप गई। वहीं जिन लोगों को ये 2014 से ही ‘भक्त’ और अनपढ़ साबित करने का प्रयास करते नजर आते रहे, वही बेसहारा और जरुरतमंदों की पीड़ा से चिंतित दिखे और उनकी मदद कर रहे हैं।
यानी, वामपंथ की पहचान उसकी विरोध की प्रवृत्ति तक ही सीमित है। सिर्फ समय बदला है, लेकिन मूल में वही है। लेनिन से लेकर आज के जेएनयू के कॉमेरड और खुद को पत्रकारिता के प्रहरी बताने वाले वामपंथी, असल में सत्ता पिपासु हैं। विपरीत विचारधारा का उभार वे तब भी बर्दाश्त नहीं कर पाते थे, आज भी नहीं कर पाते।
इन दिनों पाकिस्तान कोरोना महामारी के साथ कुछ कट्टरपंथियों की मनमानी से जूझ रहा है। इस बीच अब खुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पर कोरोना का खतरा मँडराने लगा है। दरअसल, पिछले दिनों पाक पीएम को मोटी रकम का चेक सौंपने वाले एक युवक को कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। पाक पीएम ने उक्त व्यक्ति के हाथों से अपने हाथ चेक लिया था।
Social worker and head of Edhi Foundation, Faisal Edhi recently met PM Imran Khan: Courtesy Pakistan’s GEO News pic.twitter.com/wU1pPG6RUd
पीएम इमरान खान से मुलाकात करने वाले शख्स के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद से ही पूरे पाकिस्तान में हड़कंप मच गया है। एक तरफ तो पीड़ित सहित उसके पूरे परिवार को क्वारंटाइन कर दिया गया है तो वहीं अब पीएम इमरान खान डॉक्टरी सलाह लेते घूम रहे हैं। एधी की रिपोर्ट आने के बाद पाकिस्तानी हुक्कमरानों में खलबली मची हुई है और वो चाह रहे हैं कि इमरान खुद को जल्द से जल्द क्वारंटीन कर लें।
पाकिस्तानी अखबार डॉन न्यूज ने भी फैसल एधी के बेटे साद एधी के हवाले से बताया कि प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद घर लौटने पर फैसल एधी की तबियत ठीक नहीं रही। प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद घर लौटने पर ही उनमें कुछ लक्षण दिखाई देने लगे थे। हालाँकि, तीन से चार दिन के बाद यह लक्षण कम होने लगे। इस बीच, कोरोना जाँच के लिए नमूना भेजा गया तो मंगलवार को आई रिपोर्ट में उनको कोरोना पॉजिटिव पाया गया।
वहीं बताया गया कि मुलाकात के दौरान इमरान ने फैसल एधी को पहचाना नहीं था। जब लोग उनसे मिलकर लौटने लगे तो एक व्यक्ति ने इमरान से कहा कि यह फैसल एधी हैं। इसके बाद इमरान ने दरवाजे के पास खड़े होकर फैसल से कुछ देर तक बात की थी।
खबर के मुताबिक सामाजिक कार्यकर्ता फैसल एधी ने पिछले हफ्ते 15 अप्रैल को प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाकात कर कोरोना वायरस राहत कोष के लिए एक करोड़ रुपये का चेक सौंपा था। दरअसल फैसल एधी एदी फाउंडेशन के चेयरमैन और मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल सत्तार के पुत्र हैं। इस फाउंडेशन की स्थापना दिवंगत अब्दुल सत्तार एधी ने ही की थी और यह प्रमुख परमार्थ संगठन है।
गौरतलब है कि एधी फाउंडेशन पाकिस्तान में एंबुलेंस सेवा का एक बड़ा नेटवर्क ऑपरेट करता है। बता दें कि पाकिस्तान में कोरोना वायरस संक्रमितों का आँकड़ा साढ़े नौ हजार से ज्यादा पहुँच चुकी है और करीब दो सौ लोगों की मौत हो चुकी है।
देश में जारी लॉकडाउन के बीच कोरोना योद्धा अपनी जान की परवाह किए बिना कोरोना के खिलाफ घरों से बाहर रहकर जंग लड़ रहे हैं। अब इनका कोई तो सम्मान कर रहा है तो कोई अपने तरीके से इन्हें अपमानित भी कर रहा है। कुछ ऐसा ही मामला बिहार से आया, जहाँ एक सरकारी अधिकारी को लॉकडाउन के बीच पुलिसकर्मी द्वारा रोके जाने पर पुलिसकर्मी को उठक-बैठक की सजा भुगतनी पड़ी।
In Bihar’s Araria, a homeguard was made to do sit-ups as punishment and beg for mercy after he stopped an agriculture officer, asked for pass and checked his car. What an honourable way to thank Corona-fighters! pic.twitter.com/8kICdUdNAg
दरअसल, एक वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है, जिसमें आप देख सकते हैं कि एक पुलिसकर्मी कुछ अधिकारियों के सामने उठक-बैठक करते हुए उनसे माफी माँग रहा है, लेकिन कुछ ही देर में वायरल वीडियो की सच्चाई सभी के सामने आ गई।
जानकारी के मुताबिक मामला सोमवार को बिहार अररिया के बैरगाछी चौक इलाके का है। यहाँ पुलिस के साथ चौकीदार के रूप में कार्य कर रहे गणेश तात्मा ने लॉकडाउन के दौरान कृषि पदाधिकारी मनोज कुमार की गाड़ी को चेकिंग के लिए रोक लिया। अपनी गाड़ी को रुकते देख कृषि विभाग से जुड़े अधिकारी मनोज कुमार आग बबूला हो गए।
इसके बाद अधिकारी ने पुलिसकर्मी को उठक-बैठक करने की सजा का फरमान सुना दिया। साथ ही धमकाते हुए उससे माफी माँगने की भी बात कही। चौंकाने वाली बात यह है कि मौके पर मौजूद पुलिस के आला अधिकारी ने भी मनोज कुमार का समर्थन करते हुए चौकीदार की जमकर क्लास लगाई और फिर से अधिकारी से माफी माँगने की बात कही।
इतना ही नहीं वीडियो में मनोज कुमार ने चौकीदार को डाँटते हुए कहा कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की वजह से वह जल्दी में हैं वरना उन्हें रोकने के बदले चौकीदार को जेल भिजवा देते। खबर के मुताबिक वीडियो वायरल होने पर अररिया एसपी धूरत सयाली ने टीम गठित कर इस मामले की जाँच के आदेश दे दिए हैं।
दरअसल, पास में खड़े किसी सज्जन ने इस पूरी घटना का वीडियो बना लिया, जोकि कुछ ही देर में सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो गया। वीडियो में पुलिस की वर्दी पहने हुए आदमी कान पकड़कर उठक-बैठक लगा रहा है और फिर हाथ जोड़कर घुटनों के बल अधिकारी से माफी भी माँग रहा है।
वहीं इस बीच दूसरी खबर उत्तर प्रदेश के जिला रामपुर से आई, जहाँ एक जिलाधिकारी को लॉकडाउन के दौरान रोकने पर डीएम ने पुलिसकर्मी को अपने ऑफिस बुलाकर सम्मानित किया। मामला रामपुर जिले का है, यहाँ जिलाधिकारी आञ्जनेय कुमार सिंह जब रात में बाइक से शहर का जायजा लेने के लिए निकले तो उन्हें एक सिपाही ने रोककर बाहर घूमने का कारण पूछा।
इसके बाद सिपाही ने डीएम को लॉकडाउन की अहमियत समझाई। आधी रात लॉकडाउन का उल्लंघन करने पर कानूनी कार्रवाई और सजा क्या क्या हो सकती है ये भी बताया। सिपाही के समझाने के बाद डीएम साहब ने अपनी मोटर साइकिल पर सवार होकर वहाँ से चुपचाप निकल गए।
पुलिसकर्मी की सख्त ड्यूटी से खुश होकर रामपुर डीएम ने अगली सुबह को ही उसी मोहित नाम के सिपाही को कलेक्ट्रेट में बुलवा लिया, जिसने डीएम को रात में समझाया था। डीएम ने खुश होकर न सिर्फ शाबासी दी बल्कि उसे प्रमाण पत्र देकर सम्मानित भी किया और कहा कि असली और सच्चा तो सही मायने में सिपाही ही सरकारी मुलाजिम निकला, जिसने एलआईसी चौराहे पर मुझे रोक लिया। बाकायदा उसने मुझे लॉकडाउन की अहमियत समझाई।