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महबूर मियाँ ने नाबालिग लड़की को प्रेमजाल में फँसाया, फिर 2 दोस्तों के साथ रेप के बाद पेट्रोल से जला डाला

पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर के कुमारगंज इलाके में 17 साल की लड़की (राधा, बदला हुआ नाम) के साथ गैंगरेप के बाद हुई हत्या मामले ने अब न सिर्फ पूरे राज्य बल्कि देश भर में तूल पकड़ लिया है। सोमवार को मामला प्रकाश में आने के बाद पुलिस ने तीन लोगों को शक के आधार पर गिरफ्तार किया। आरोपितों की पहचान महबूर मियाँ, पंकज बर्मन और गौतम बर्मन के तौर पर हुई थी।

सोमवार तक आशंका जताई जा रही थी कि इन्हीं तीनों ने नाबालिगों के साथ हुई पूरी वारदात को अंजाम दिया। लेकिन अब आशंका की जगह पुष्टि हो चुकी है कि इस जघन्य अपराध को अंजाम देने के पीछे इन्हीं तीनों का हाथ है। महबूर, पंकज, गौतम ने ही रविवार को लड़की का पहले बलात्कार किया। फिर उसे तेजधार वाले हथियार से मारा। उसके बाद उसमें पेट्रोल छिड़ककर आग लगाई और बाद में शव कुत्तों के पास नोचने के लिए छोड़ गए। सुबह आधे बचे शव को गाँव वालों ने देखा और पुलिस को सूचना दी। जिसके बाद पूरे मामले पर जाँच शुरू हुई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने बताया कि पीड़िता और इस अपराध के पीछे का मास्टमाइंड महबूर मियाँ खान पिछले एक साल से संबंध में थे। रविवार को लड़की अपने घर से बाजार जाने को कहकर निकली थी। लेकिन महबूर उसे अपने साथ बेलखोर इलाके में सुनसान जगह ले गया। यहाँ उसने अपने दोस्त पंकज बर्मन और गौतम बर्मन को भी आने को कहा हुआ था।

पुलिस के मुताबिक इन्हीं तीनों ने लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उसे मारा। फिर सबूत मिटाने के लिए उस पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी। सोमवार को लड़की का शव स्थानीय लोगों को सफानगर और अशोकग्राम के बीच एक पुलिया के नीचे से बरामद हुआ। स्थानीय लोगों के अनुसार इलाके से गुजरते हुए उन्होंने पहले कुछ कुत्तों को माँस के टुकड़े के लिए लड़ते देखा, फिर उन्हें पुलिया पर खून नजर आया। जब उन्होंने पास जाकर देखा तो वहाँ एक शव पड़ा था। जिसे कुत्ते और सियार आधा खा चुके थे।

बता दें कि इस मामले में पुलिस ने शुरुआती जाँच के बाद तीनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया था। साथ ही बलूरघाट सत्र अदालत के समक्ष पेश करके इन्हें 10 दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया था।

गौरतलब है कि इस मामले के तूल पकड़ने के बाद सोशल मीडिया पर भी 17 साल की लड़की के लिए न्याय दिलाने की गुहार लगाई जा रही है। भाजपा भी इस पूरे मामले पर ममता सरकार को लगातार कटघरे में खड़ा कर रहा है और बंगाल को दुष्कर्म राज्य करार दिया है।

बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और पश्चिम बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने ट्वीट ममता बनर्जी पर निशाना साधा। उन्‍होंने कहा, “जिस राज्य की मुख्यमंत्री (ममता) महिला हो, वहाँ महिला सुरक्षा का खास ध्यान रखा जाता है लेकिन पश्चिम बंगाल में मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म की वारदात लगातार हो रही है। कानून व्यवस्था भंग है। बेलूरघाट की बच्ची को न्याय कब मिलेगा।”

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नेता किसी भी देश, समाज और समय की रफ्तार और दिशा पर पूरा नियंत्रण रखते हैं और यही वजह है कि जब भी इतिहास लिखा जाता है, अच्छा या बुरा, उसे इन नेताओं की छाया से होकर गुजरना ही होता है। भारत को तोड़कर पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुल्क की रूपरेखा रखे जाने और मजहब के नाम पर इस नए देश के सृजन के बहुत किस्से और कहानियाँ हैं। इन्हीं किस्सों में सबसे अहम योगदान तत्कालीन नेताओं का भी देखने को मिलता है। इसमें मोहम्मद अली जिन्ना से लेकर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी अक्सर चर्चा का विषय रहे हैं।

यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि जवाहरलाल नेहरू को एक ओर जहाँ दूरदर्शी और कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा नए भारत का शिल्पकार कहा जाता है, वहीं नेहरू द्वारा की गई अनेकों हिमालयी भूलों को इन्हीं नेहरूवियन सभ्यता के इतिहासकार और दरबारी लेखकों ने नेहरू के भक्ति-गीतों के बीच दफ़्न कर दिया।

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जिक्र आते ही याद आता है कि भारत में तुष्टिकरण जैसे शब्द का बीजारोपण करने वाले ऐसे भी नेता हुए, जिन्होंने स्वयं की छवि को भारत देश से भी ऊपर रखकर खूब वाहवाही लूटी। इसमें साथ देने के लिए दरबारी इतिहासकार तो कॉन्ग्रेस के साथ आजादी के बाद से हमेशा से ही रहे हैं।

‘नया भारत’ अभी प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस जैसी बर्बर ऐतिहासिक घटना से घायल ही था कि जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर जैसी महान समस्या का तौहफा भारत देश को सौंप दिया। यह समस्या इतनी बड़ी थी कि इसके नीचे ही नेहरू को अपनी ‘उदारवादी’ और तुष्टिकरण की छवि को मजबूत करने के लिए और भी कई भूल करने का मौका मिल गया।

सिंधु जल समझौता यानी भारत बनाम नेहरू

साठ साल पहले वियना समझौते का हासिल सिंधु जल समझौता इस देश का एक ऐसा समझौता है, जिस पर आज भारत स्वयं बैकफुट पर नजर आता है। पाकिस्तान द्वारा किसी भी आतंकी हमले के बाद यह चर्चा का विषय बन जाता है कि भारत को इस संधि को तोड़ देना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस समझौते की मजबूरी भारत को सौंपी किसने?

वास्तव में यह विवाद वर्ष 1947 में भारत के बँटवारे के पहले से ही शुरू हो गया था, खासकर पंजाब और सिंध प्रांतों के बीच। वर्ष 1947 में भारत-पाकिस्तान के नौकरशाहों ने पाकिस्तान की तरफ़ जाने वाली कुछ प्रमुख नहरों पर ‘स्टैंडस्टिल समझौते’ पर हस्ताक्षर कर पाकिस्तान के लिए पानी का बंदोबस्त कर दिया। यह समझौता मार्च 31, 1948 तक कायम रहा।

अप्रैल 01, 1948 को भारत ने इन दो प्रमुख नहरों का पानी रोक दिया, जिससे पाकिस्तान स्थित पंजाब में करीब 17 लाख एकड़ ज़मीन के बुरे दिन शुरू हो गए। पाकिस्तान के इस क्षेत्र के मरुस्थल में तब्दील होने के हालात बन गए।

तत्कालीन विचारकों ने बताया कि नेहरू की अगुवाई वाली भारत सरकार ऐसा कर के पाकिस्तान पर कश्मीर मुद्दे को लेकर दबाव बना रही थी। लेकिन इसी वक़्त वर्ष 1951 में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने पत्राचार के पुराने शौक के चलते विश्व बैंक (तत्कालीन ‘पुनर्निर्माण और विकास हेतु अंतरराष्ट्रीय बैंक’) प्रमुख और पाकिस्तान के प्रमुखों से इस बारे में संपर्क किया।

कश्मीर की तरह ही इस बार भी नेहरू ने अपने देश के अंदरूनी मुद्दों के लिए विदेशी शरण ली और इसे भी भारत के गले की हड्डी बना दिया। नेहरू के इस पत्राचार के बाद दोनों पक्षों के बीच करीब एक दशक तक बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया। आखिरकार 1960 को कराची में सिंधु नदी समझौते पर हस्ताक्षर हुए। भारत की ओर से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान की तरफ से फील्ड मार्शल मुहम्मद अयूब खाँ ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस संधि का परिणाम यह हुआ कि साझा करने के बजाय नदियों का विभाजन हो गया।

इस समझौते से एक ‘फायदा’ यह भी हुआ कि देश की अवश्यकताओं की जगह जवाहरलाल नेहरू की शांति के कबूतर उड़ाने और कूटनीति की छवि को खूब वाहवाही मिली। नेहरू ने इस संधि द्वारा ऐतिहासिक नारे दिए कि इंजीनियरिंग और अर्थशास्त्र, राष्ट्रवाद और राजनीति से ऊपर रहेंगे। जाहिर सी बात थी कि अंततः इससे नेहरू की कबूतर उड़ाने की (शांति के)अंतरराष्ट्रीय छवि को ही बल मिला।

इस समझौते के अनुसार यह तय हुआ कि पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए होगा और बदले में इन नदियों के पानी का कुछ सीमित इस्तेमाल का अधिकार भारत को दिया जाएगा। इसमें भारत को बिजली बनाने और कृषि के लिए सीमित पानी मिला।

हो सकता है कि दूरदर्शी नेता जवाहरलाल नेहरू ने 1960 में यह सोचकर पाकिस्तान के साथ इस संधि पर हस्ताक्षर किए हों कि शायद भारत देश को पानी के बदले आतंकवाद से मुक्ति और शांति मिलेगी। लेकिन, हुआ यह कि इस संधि के लागू होने के महज पाँच साल बाद ही पाकिस्तान ने भारत पर 1965 में हमला कर दिया।

भारत पर संधि के बदले आर्थिक जुर्माना

1960 में ही इस संधि के तहत तय किया गया कि भारत द्वारा पाकिस्तान को £62 मिलियन पाउंड (आज की राशि में 575 करोड़ रुपए) दिया जाएगा, जिससे पाकिस्तान इस संधि में वर्णित नई नहरों और प्रोजेक्ट्स का निर्माण करेगा। इसके अलावा पाकिस्तान को विश्व बैंक द्वारा $1.101 बिलियन की भी आर्थिक मदद उपलब्ध की गई। यानी, इस संधि के अनुसार, दोनों देशों इस बात पर सहमत हुए कि पाकिस्तान में इस पानी से सम्बंधित हर नए निर्माण और योजनाओं का आर्थिक भार भारत देश वहन करेगा। नेहरू के अनुसार यह उनकी बड़ी कूटनीतिक जीत थी क्योंकि अब विज्ञान ने राष्ट्रवाद को पीछे छोड़ दिया था।

इस सहमति के बाद इस संधि पर दोनों ही देशों राजनीतिक रूप से खूब आलोचना हुई। हालाँकि पाकिस्तान जैसे सैन्य देश में इस आलोचना को काफी हद तक दबा दिया गया। हालाँकि, मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना, जो कि जनरल अयूब खान की बड़ी आलोचक रहीं, ने जनरल अयूब खान पर पानी के अधिकारों से वंचित कर देने का आरोप भी लगाया। समय के साथ पाकिस्तान में इस संधि से असहमति दर्ज करने वाले कई लोग सामने आए। उनके अनुसार यह संधि पाकिस्तान के लिए संतोषजनक सहमति नहीं थी।

भारत में नेहरूवियन विचारकों का तब भी मानना था कि यह आलोचना सिंधु जल समझौते के लिए किसी भी प्रकार से हानिकारक नहीं थी। हालाँकि, भारत में लोगों के मन में नेहरू की सरकार के विरुद्ध पाकिस्तान को संधि के बदले पानी के साथ ही आर्थिक मदद देने पर सहमत होने के कारण रोष व्याप्त था। यहाँ के लोगों ने इस संधि को सरकार की ‘तुष्टिकरण और आत्मसमर्पण’ की संधि बताया।

इस विरोध में तत्कालीन सरकार में नियुक्त राजनयिकों से लेकर पदाधिकारी भी शामिल थे। बीके नेहरू (पीएम नेहरू के भाँजे), जो कि उस समय भारतीय राजनयिक और संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय राजदूत थे, से लेकर तत्कालीन विदेश मंत्री कृष्ण मैनन इस संधि से नाराज थे और खुलकर इसका विरोध करते रहे।

उस समय इस संधि से असहमति और विरोध का सबसे प्रमुख कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पाकिस्तान को आर्थिक मदद देने के लिए राजी होना था। यहाँ तक कि मोरारजी देसाई, जो कि उस समय कैबिनेट मंत्री थे, ने विपक्षी दलों को भी इस संधि के खिलाफ एकसाथ होने की सलाह दी। तत्कालीन गृहमंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त भी पाकिस्तान को दी जाने वाली इस आर्थिक सहमति से नाखुश थे। वो चाहते थे कि इस आर्थिक राशि का उस धन के साथ सामन्जस्य बैठाया जाए, जो हिन्दू शरणार्थी पाकिस्तान में छोड़ कर आ चुके हैं।

1965 के भारत-पाक युद्ध तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को संसद में यह स्पष्टीकरण देना पड़ा कि पाकिस्तान, भारत सरकार और विश्व बैंक द्वारा पाकिस्तान को उस संधि के बदले दी गई धनराशि से हथियार नहीं खरीद रहा है।

इस तरह से, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सिर्फ अपनी शांतिप्रिय छवि गढ़ने के लिए ही सिंधु जल समझौते के रूप में कश्मीर जितनी ही भयानक भूल कर चुके थे। यह हर हाल में भारत की कमजोर कूटनीति और अदूरदर्शी सोच का ही परिणाम था कि इस जल समझौते का घाव आज तक भारत के सीने पर बना हुआ है। जम्मू कश्मीर (लेह-लद्दाख) में ही बगलिहार और किशनगंगा जैसे बाँध स्थित हैं और हकीकत यह भी है कि पाकिस्तान अक्साई चीन इलाके में ऐसे कई छोटी-बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जो हर दृष्टि से भारत के लिए भविष्य में खतरनाक साबित हो सकते हैं।

वास्तव में इस संधि के बदले पाकिस्तान को दिया जाने वाला सिंधु नदी के कुल पानी का 80 प्रतिशत पानी नेहरू की ‘अति-उदारवादी’ छवि और ‘दूरदर्शी व्यक्तित्व’ का जुर्माना है, जिसे भारत देश हमेशा भरता ही रहेगा।

इस लेख में शामिल किए गए तथ्य भारत के पूर्व राजनयिक टीसीए राघवन द्वारा लिखित पुस्तक The People Next Door: The Curious History of India-Pakistan Relations पुस्तक से लिए गए हैं।

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मैथिली में क्यों वायरल हो रही ‘हम देखेंगे’, क्या मिथिला से भी है फैज का कनेक्शन!

फैज़ अहमद फैज़ की कविता ‘हम देखेंगे’ को लेकर आजकल एक नई बहस छिड़ी हुई है। इसकी शुरुआत आईआईटी कानपुर द्वारा एक समिति बनाने से हुई। समिति को यह जॉंचने का जिम्मा दिया गया है कि जिस विरोध-प्रदर्शन के दौरान फैज की नज्म का पाठ हुआ उस दौरान संस्थान के किस नियम-कानून का उल्लंघन तो नहीं हुआ। लेकिन, इस बात से वामपंथियों को मिर्ची लग गई। फैज़ को ‘भारत का राष्ट्रभक्त’ साबित करने पर उन्होंने पूरा जोर लगा रखा है। ट्विटर पर जावेद अख्तर सरीखे लोगों ने फैज़ के गुणगान में ट्वीट्स किए। फैज़ की कविताएँ शेयर की गईं।

अब फैज के इस नज्म का मैथिली अनुवाद अचानक से वायरल हो रहा है। इसके पीछे की वजह जानने से पहले ‘हम देखेंगे’ का मैथिली अनुवाद पढ़िए;

हमहूँ देखबै!
देखबे करबै!
एकटा वादा छल सभ स’
अछि बिधिनाक बनायल जे
हमहूँ देखबै!

जुलुमक ई दुष्कर पहाड़
रुइक फाहा सन जेना उड़ि जायत
आ दुखिया जनता के तरबा तर
ई धरती जखन धड़-धड़ धड़कत
सत्ता के मद में चूर जे छथि
हुनका माथा ठनका बजरत
हमहूँ देखबै!

गोसाईं बनल जे बैसल छथि
गरदनियाँ द’ फेकल जयताह
भलमानुष जे सदा उपेक्षित
तोशक पर बैसाओल जयताह
मुकुट हवा में उछलि खसत
आ सिंघासन खंडित होयत

रहि जेतै नाम त’ ओकरे टा
जे सगुण आ निर्गुण दुनू अछि
जे नजरिक संग नजारो अछि
लागत ‘हमहीं ब्रह्म’क जयकारा
जे हमहूँ छी आ अहूँ छी
जनता जनार्दन करत राज
जे हमहूँ छी आ अहूँ छी

साभार: whatsapp

यह मैथिली की खूबसूरती है कि ‘हम देखेंगे’ की ‘बुतपरस्ती’ सगुण-निर्गुण ब्रह्म में बदल जाती है। लेकिन, फैज कट्टर पाकिस्तानी थे। यह बात सालों पहले हरिशंकर परसाई दुनिया को बता चुके हैं।

ऑपइंडिया की पड़ताल से पता चला कि हम देखेंगे का यह मैथिली अनुवाद बुतपरस्त मैथिल मजे लेने के लिए वायरल कर रहे हैं। विदेह की धरती से फैज का दूर-दूर तक कोई कनेक्शन नहीं है।

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11 आतंकियों के खिलाफ NIA ने दाखिल की चार्जशीट, इस्लामी शासन स्थापित करना चाहते थे

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) स्पेशल कोर्ट में NIA ने अंसारुल्लाह से जुड़े 11 आतंकवादियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल किया है। चार्जशीट में कहा गया है कि आरोपित जिहाद के जरिए भारत में इस्लामी शासन स्थापित करना चाहते थे।   

जिन आतंकियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल किया गया है, उसमें हसन अली, हरीश मोहम्मद, मोहम्मद इब्राहिम, मोहम्मद शेख मैथेन, मीरान गनी, गुलाम नबी असथ, अहमद अजरुद्दीन, तौफीक अहमद, मोहम्मद इब्राहिम, मोहम्मद अफजर और फारूक का नाम शामिल है। इनके खिलाफ आईपीसी और यूएपीए के विभिन्न धाराओं के तहत आरोप-पत्र दायर किया गया है।

NIA ने इस संबंध में एक प्रेस रिलीज जारी किया है। इसमें कहा गया है कि एजेंसी ने 9 जुलाई, 2019 को तमिलनाडु के सोलह आरोपितों के खिलाफ आईपीसी की धारा 120 B, धारा 121 A के साथ ही  यूएपीए की धारा 17, 18, 18-B, 38 और 39 के तहत मामला दर्ज किया गया था। यह मामला विश्वसनीय सूचना के आधार पर दर्ज किया गया था, जिसके मुताबिक आरोपितों और उनके सहयोगियों ने संयुक्त अरब अमीरात में रहते हुए साजिश रची थी।

साथ ही हिंसक जिहाद और गैरकानूनी गतिविधियों को बढ़ावा देने के माध्यम से भारत में इस्लामी शासन की स्थापना के उद्देश्य से मजहबी कक्षाएँ संचालित की गईं थीं। उन्होंने भारत में अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए एक आतंकी मॉड्यूल ‘अंसारुल्लाह’ बनाया था।

इस मामले में चौदह आरोपितों को हिंसक जिहाद और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों को बढ़ावा देने के इरादे से मजहबी बैठकों का आयोजन करने के लिए संयुक्त अरब अमीरात में गिरफ्तार किया गया था। संयुक्त अरब अमीरात और भारत में एनआईए द्वारा जाँच में पाया गया कि जिन आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दायर किया गया है, उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात में मोहम्मद इब्राहिम के नेतृत्व में एक जिहादी समर्थक समूह या जमात का गठन किया था।

इस समूह ने यूएई में विभिन्न स्थानों पर मजहबी बैठकें और कक्षाएँ आयोजित की थीं। इन बैठकों का उद्देश्य भारत में इस्लामी शासन की स्थापना करना था। ये समूह गैरकानूनी गतिविधियों को बढ़ावा देने के इरादे से कक्षाएँ आयोजित करती थीं, जिसका मुख्य टॉपिक जिहाद और खिलाफत हुआ करता था।

जानकारी के मुताबिक, हसन अली, हरीश मोहम्मद, मोहम्मद इब्राहिम, मीरान गनी, अहमद अजरुद्दीन सहित कई आरोपित, संगठन के हिंसक जिहादी विचारधारा का समर्थन और प्रसार करने के लिए आतंकवादी संगठन ISIS / Daish के साथ जुड़े थे। इसके अलावा आपराधिक साजिश रचने के आरोप में रफी अहमद, मुंतशिर, उमर बरोक, मोइदीन सेनी शाहुल हमीद और फैजुल शौर के खिलाफ जाँच जारी है। इन आतंकियों को यूएई से भगाया गया था। अन्य आरोपित सैय्यद मोहम्मद बुहारी और दीवान मुजिपीर एनआईए की प्रेस रिलीज के अनुसार तमिलनाडु के रहने वाले हैं।

JNU हिंसा में धरे गए वामपंथी, 9 की तस्वीर जारी: AISA, AISF, DSF, SFI के कई रंगरूट

रविवार (जनवरी 5, 2019 को जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय (JNU) में हुई हिंसा का खुलासा हो गया है। क्राइम ब्रांच के डीसीपी ने हिंसा का खुलासा करते हुए 4 लेफ्ट ग्रुप का हाथ बताया। उन्होंने कहा कि व्हाट्सएप ग्रुप, प्राइम विटनेस के आधार पर आरोपितों तक पहुँचना मुमकिन हो सका, क्योंकि विश्विद्यालय के छात्रों ने 4 जनवरी को सीसीटीवी को डैमेज कर दिया था। 

पुलिस ने इसमें AISA, AISF, DSF और SFI के शामिल होने की भी बात कही। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में हुई हिंसा में जेएनयू छात्र संघ प्रेसीडेंट आइशी घोष समेत चुनचुन कुमार, पंकज मिश्रा, प्रियरंजन, योगेंद्र भारद्वाज, वास्कर विजय मेक, सुचिता तालुकदार, डोलन सामंता और विकास पटेल का नाम शामिल है। डीसीपी ने बताया कि इस हिंसा के पीछे व्हाट्सएप ग्रुप का भी हाथ है, जिसका नाम है- यूनिटी अगेन्स्ट लेफ्ट। इस ग्रुप में 60 सदस्य हैं और योगेंद्र भारद्वाज इस ग्रुप का एडमिन है।

डीसीपी का कहना है कि 4 जनवरी को ही जेएनयू के सीसीटीवी को डैमेज कर दिया गया था, जिसकी वजह से जाँच करने में काफी दिक्कतें हुईं। हालाँकि वहाँ पर मौजूद लोगों के द्वारा मोबाइल से बनाए वीडियो और विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसमें काफी मदद की। पुलिस ने अब तक सभी आरोपितों की तस्वीरें भी जारी कर दी है।

पुलिस ने बताया कि 4 जनवरी को फिर कुछ लोग विश्विद्यालय के अंदर घुसे और सर्वर को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। इसके बाद सारा प्रोसेस रुक गया। इसके बाद अगले दिन रजिस्ट्रेशन करने वाले छात्र के साथ मारपीट की गई। फिर अगले दिन इन्हीं लोगों ने पेरियार हॉस्टल में जाकर मारपीट की, जिसमें छात्रसंघ के लोग भी थे।

उसी समय कुछ वाट्सएप ग्रुप भी बनाया गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा गया कि सीसीटीवी फुटेज नहीं मिल पाए, लेकिन वायरल फोटो और वीडियो से काफी मदद मिली है। यूनिटी अगेंस्ट लेफ्ट नाम के ग्रुप में 60 लोग हैं। कुछ लोगों को चिन्हित किया गया है। इन लोगों को नोटिस जारी किया जा रहा है। उनसे और जानकारी माँगी जाएगी।

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता एमएस रंधावा ने कहा कि प्रदर्शनकारी लगातार कानून का उल्लंघन कर रहे हैं। कल भी कुछ प्रदर्शनकारी जबरन कनॉट प्लेस चले गए, जो जेएनयू स्टूडेंट यूनियन से जुड़े थे, इनकी वजह से आम लोगों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा। मामले की जाँच चल रही है और जैसे-जैसे और तथ्य सामने आएँगे, मीडिया के सामने रखा जाएगा।

कॉल डिटेल और मोबाइल लोकेशन से धरे गए 3 नकाबपोश! JNU हिंसा में क्राइम ब्रांच कर सकती है खुलासा

JNU प्रेसिडेंट आइशी घोष सहित 19 के खिलाफ FIR: मारपीट और संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का आरोप

JNU की जिस प्रेसिडेंट का रात में फूटा माथा, दिन में वो खुद नक़ाबपोश हमलावरों के साथ थीं – Video Viral

लड़कियों के प्राइवेट पार्ट्स पर हमला करने वालों के साथ खड़ी हुईं दीपिका: स्मृति ईरानी

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के प्रदर्शनकारी वामपंथी छात्रों के बीच पहुॅंचने को लेकर दीपिका पादुकोण की केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने तीखी आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि दीपिका अच्छी तरह से जानती थीं कि वे उस टुकड़े-टुकड़े गैंग के समर्थन में खड़ी हैं, जो भारत के विनाश की कामना करते हैं।

एक कार्यक्रम के दौरान स्मृति ईरानी ने कहा, “मैं ये जानना चाहती हूँ कि उनकी राजनीतिक विचारधारा क्या है। जिस किसी ने भी ये ख़बर पढ़ी उन्हें ये पता है कि वो आखिर वहाँ क्यों गईं। ये हमारे लिए हैरानी की बात नहीं है कि वो उन लोगों के साथ खड़ी हुईं, जो भारत की बर्बादी चाहते हैं। वो उनके साथ खड़ी हुईं, जिन्होंने लाठियों से लड़कियों के प्राइवेट पार्ट्स पर हमला किया। मैं उनका ये अधिकार छीन नहीं सकती।”

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ‘ThinkEdu Conclave 2020’ के समापन सत्र के कार्यक्रम के दौरान चेन्नई में यह बात कही। एक साक्षात्कार का हवाला देते हुए कहा उन्होंने कहा दीपिका ने साल 2011 में ही बता दिया था कि वे कॉन्ग्रेस पार्टी का समर्थन करती हैं। साक्षात्कार में उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गाँधी का समर्थन किया था। उन्होंने कहा, “इसके बारे में लोग पहले नहीं जानते थे। इसलिए हैरान हैं। उनके बहुत सारे फैंस को इस बारे में अभी-अभी पता चला है।”

JNU में हुई हिंसा के मद्देनज़र केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से जब सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, “मैं इतना कहना चाहूँगी कि इस मामले में अभी जाँच चल रही है। मैं संवैधानिक पद पर हूँ और पुलिस की तरफ़ से जाँच के पहलू कोर्ट के समक्ष रखें जाने तक कुछ कहना ठीक नहीं होगा।” कार्यक्रम के दौरान पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए उनका एक वीडियो भाजपा नेता तजिंदर पाल बग्गा ने भी ट्वीट किया है।

ग़ौरतलब है कि मंगलवार (7 जनवरी) को दीपिका जेएनयू पहुॅंची थीं। बात में यह बात सामने आई कि उनका जेएनयू जाना फ़िल्म ‘छपाक’ के प्रचार की पैंतरेबाजी थी। इस दौरान दीपिका ने JNU छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष से मुलाक़ात भी की। हालॉंकि सार्वजनिक तौर पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। लेकिन, हिंसा के बाद छात्रों के एक खास समूह से ही मुलाकात को लेकर उनकी खासी आलोचना हो रही है।

बता दें कि फ़िल्म छपाक की बात करें तो ये दिल्ली की एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल की जिंदगी से प्रेरित है। फ़िल्म में दीपिका पादुकोण संग विक्रांत मैसी, अंकित बिष्ट संग अन्य एक्टर्स हैं। मेघना गुलज़ार के निर्देशन में बनी फ़िल्म छपाक, 10 जनवरी को सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गई है।

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‘जिन्ना वाली आजादी’ के नारे से गूँजा शाहीन बाग: CAA के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन का पर्दाफाश, Video Viral

नागरिकता संशोधन कानून बनने के बाद पूरे देश में इस्लामिक कट्टरपंथियों और वामपंथियों ने उत्पात मचाया। विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंदू विरोधी नारे लगाए गए। ‘फक हिंदुत्व’ लिखकर ‘ऊँ’ चिह्न का भरी दुनिया के सामने अपमान हुआ। हालाँकि, इतना सब देखने के बाद ये साफ हो गया था कि इन प्रदर्शनकारियों के भीतर हिंदुओं को लेकर गहरी नफरत है। लेकिन, 10 जनवरी की मध्यरात्रि इस इस्लामिक भीड़ के असल मनसूबों का खुलासा भी सरेआम हो गया, जब शाहीन बाग के प्रोटेस्ट में जिन्ना वाली आजादी के नारों से पूरा इलाका गूँज उठा और वहाँ किसी ने इस पर आपत्ति नहीं जताई।

शाहीन बाग में 10 जनवरी की देर रात 2 बजे लगे नारों में जिन्ना का नाम सुना जा सकता है। वायरल वीडियो में देख सकते हैं कि एक शख्स मंच से आजादी के नारे लगा रहा है, जिसके बोल हैं “हम लड़के लेंगे आजादी। नेहरू वाली आजादी। गाँधी वाली आजादी। भगत वाली आजादी। अश्फाक वाली आजादी। जिन्ना वाली आजादी। दिल्ली वाली आजादी…।”

यहाँ प्रदर्शन के दौरान किसी भी व्यक्ति को समझ आ सकता है कि ये वामपंथी और कट्टरपंथी धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़कर ‘नेहरू वाली आजादी की माँग कर रहे हैं। जिसे अपने दौर में नेहरू ने अल्पसंख्यकों को सुपुर्द किया था। लेकिन यहाँ ‘जिन्ना वाली आजादी’ चिल्लाने का क्या मतलब है? बता दें जिन्ना वही शख्स है, जिसने भारत के 2 टुकड़े किए और इस्लामिक कट्टरपंथियों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान बनाया। इसका तो मतलब यही है कि जो भीड़ जिन्ना जैसी आजादी चाहता है, वो एक बार फिर देश को तोड़ना चाहता है। ताकि एक और पाकिस्तान बने, जहाँ के कायदे-कानून सब इस्लाम के अनुसार हों।

जिन्ना का दो राष्ट्र सिद्धांत (Two Nation Theory) का आधार यही था कि मुस्लिम हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते हैं। इस थ्योरी में बताया गया था कि हर परिभाषा के अनुसार हिंदू-मुस्लिम के लिए दो अलग-अलग राष्ट्र होने चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि मुस्लिमों के अलग रिवाज़ हैं, अलग मजहब है। इसके अलावा मुस्लिम सामाजिक एवं नैतिक हर बिंदु से हिंदुओं से अलग है। इसलिए मुस्लिमों के पास भारत जैसी अपनी एक जमीन होनी चाहिए। वो भी वहाँ, जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हों और जहाँ इस्लाम सबसे शक्तिशाली मजहब हो।

गौरतलब है कि उस दौरान भी जिन्ना की ये विचारधारा मुस्लिमों को जगाने के नाम पर उठी थी, जिसने भारत को 2 टुकड़ों में बाँट दिया था। संविधान के जनक डॉ बीआर अम्बेडकर ने कई बार मुहम्मद अली जिन्ना की और उनकी 14 माँगो की आलोचना की थी। जिनमें वंदे मातरम को खारिज करना और मुस्लिमों को गाय काटने की आजादी देना, मुस्लिम लीग के झंडे को बराबर सम्मान देना जैसे बिंदु थे। इन सभी बिंदुओं का जिक्र ‘Pakistan or the partition of India’ नामक बुक के 11वें अध्याय में डॉ अंबेडकर ने खुद किया है। ये डॉ बीआर अंबेडकर का ही मत था कि मुस्लिम अपनी माँगों से हिंदुओं को शोषण कर रहे हैं। ताकि हिंदु उनके बिंदुओं को नकार दें।

16 नवंबर 1942 को जिन्ना के शब्द

आज जब शाहीन बाग में प्रदर्शनकारी पाकिस्तान से प्रताड़ित हिंदुओं को नागरिकता देने का विरोध कर रहे हैं, तो साफ पता चलता है कि ये जिन्ना की विचारधारा से प्रभावित भीड़ है। जो अब बिना किसी शर्म के ‘जिन्ना जैसी आजादी’ के नारे खुलेआम लगा रहे हैं। और वो हर शख्स, जो भारत में रहते हुए जिन्ना वाली आजादी की माँग कर रहा है। वो चाहता है कि हिंदुओं और मुस्लिमों को अलग राष्ट्र मिले। जिसमें मुस्लिम अलग रहे और देश एक बार फिर दो टुकड़ों में बँटे, जिसका एक हिस्सा कोई नया पाकिस्तान कहलाए।

बता दें कि बीते दिनों सीएए के ख़िलाफ़ हुए दंगों में देश ने इस्लामिक भीड़ का एक अलग ही चेहरा देखा। ये याद रखने वाली बात है कि खुद को भारत का नागरिक कहने वाले लोग एक तरफ देश में धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हैं, वहीं दूसरी तरफ ये लोग हिंदुओं से आजादी की माँग कर रहे थे। और हिंदू विरोधी नारों के साथ उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली में हिंसा मचा रहे थे। ख़िलाफत 2.0 का संदेश दे रहे थे और ला इलाहा इल्लल्लाह के नारे लगा रहे थे।

नफरती नारों में AMU ने JNU को पछाड़ा, हिन्दुत्व के बाद मोदी और योगी की भी कब्र खोदी

देश विरोधी और सांप्रदायिक उन्मादी नारों के मोर्चे पर उत्तर प्रदेश का अलीगढ़ मुस्लिम विश्वद्यिालय (AMU) रोज नए कीर्तिमान गढ़ रहा है। इस मामले में उसने JNU को भी पीछे छोड़ दिया है। नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध के नाम पर बीते दिसंबर में AMU ने अपने नारों से देश को चौंका दिया था। प्रदर्शनकारी छात्रों ने “हिन्दुत्व की क़ब्र खुदेगी AMU की धरती पर” जैसे नारे लगाए थे।

AMU के इन नफरती नारों को लेकर देशभर में आक्रोश देखा गया। लेकिन इससे एएमयू के कथित उन्मादी छात्रों को कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा। गुरुवार (9 जनवरी) को AMU में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कब्र खुदने के नारे लगे। सोशल मीडिया पर नारेबाजी का यह वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहा है।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि नागरिकता संशोधन क़ानून, एनआरसी, जेएनयू हिंसा के विरोध में पंक्तिबद्ध होकर चल रहे छात्र AMU की आर्ट्स फैकल्टी से लेकर एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक तक एक सुर में “मोदी तेरी क़ब्र खुदेगी AMU की धरती पर”, “योगी तेरी क़ब्र खुदेगी AMU की धरती पर” जैसे नारे लगा रहे हैं। देर शाम इस घटना पर संज्ञान लेते हुए पुलिस ने 50-60 छात्रों के ख़िलाफ़ धारा-153 ए के तहत मुक़दमा दर्ज किया है।

ख़बर के अनुसार, गुरुवार को CAA के विरोध में उन्मादी छात्रों की भीड़ जब स्टाफ़ क्लब से AMU गेस्ट हाउस नंबर एक की ओर बढ़ रही थी तभी उन्मादी छात्रों ने मोदी और योगी को लेकर आपत्तिजनक नारे लगाए। पुलिस मामले की जाँच में जुट गई है। भड़काऊ नारेबाज़ी करने वालों से सख़्ती से निपटने की बात कही गई है।

कानून से खेलो, हिंदुत्व की कब्र खोदो… क्योंकि वे जब आएँगे सारे गुनाह दफन हो जाएँगे

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रट लें जनगणना में पूछे जाएँगे ये 31 सवाल, कोई 32वां गिनाए तो पत्थर ले सड़क पर न करें ‘छपाक’

राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या रजिस्‍टर (NPR) को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद से विपक्ष उसी तरह अफवाह फैलाने में जुटा है, जैसा उसने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC) को लेकर किया। वह NPR को भी NRC से जोड़कर पेश कर रहा है, जबकि तथ्य यह है नागरिकता कानून 1955 और नागरिकता नियम 2003 के तहत NPR पहली बार 2010 में तैयार किया गया था। आधार से जोड़े जाने के बाद 2015 में इसे अपडेट किया गया था।

अब एक अप्रैल से शुरू हो रहे जनगणना को लेकर अधिसूचना जारी कर दी गई है। जनगणना आयुक्त की ओर से जारी इस अधिसूचना में यह भी बताया गया है कि इस दौरान आपसे कौन से सवाल पूछे जाएँगे। कुल 31 सवाल पूछे जाएँगे जो हैं,

1. बिल्डिंग नंबर (म्यूनिसिपल या स्थानीय अथॉरिटी नंबर)
2. सेंसस हाउस नंबर
3. मकान की छत, दीवार और सीलिंग में मुख्य रूप से इस्तेमाल हुआ मटीरियल
4. मकान के इस्तेमाल का उद्देश्य क्या है
5. मकान की स्थिति
6. मकान का नंबर
7. घर में रहने वाले लोगों की संख्या
8. घर के मुखिया का नाम
9. मुखिया का लिंग
10. घर का मुखिया SC/ST या अन्य समुदाय से ताल्लुक रखते हैं
11. मकान का ओनरशिप स्टेटस
12. मकान में मौजूद कमरे
13. घर में कितने शादीशुदा जोड़े रहते हैं
14. पीने के पानी का मुख्य स्नोत
15. घर में पानी के स्नोत की उपलब्धता
16. बिजली का मुख्य स्नोत
17. शौचालय है या नहीं
18. किस प्रकार के शौचालय हैं
19. गंदे पानी की निकासी है या नहीं
20. वॉशरूम है या नहीं
21. रसोई घर है या नहीं, इसमें एलपीजी/पीएनजी कनेक्शन है या नहीं
22. रसोई के लिए इस्तेमाल होने वाला ईंधन
23. रेडियो/ट्रांजिस्टर
24. टेलीविजन
25. इंटरनेट की सुविधा है या नहीं
26. लैपटॉप/कंप्यूटर है या नहीं
27. टेलीफोन/मोबाइल फोन/स्मार्टफोन
28. साइकिल/स्कूटर/मोटर साइकिल/मोपेड
29. कार/जीप/वैन
30. घर में किस अनाज का मुख्य रूप से उपभोग होता है
31. मोबाइल नंबर

अधिसूचना में साफ शब्दों में कहा गया है कि जनगणना अधिकारियों को देश में एक अप्रैल से 30 सितंबर तक चलने वाली गृह सूचीकरण और गृह जनगणना की कवायद के दौरान हर परिवार से जानकारी हासिल करने के लिए 31 प्रश्न पूछने के निर्देश दिए गए हैं। मोबाइल नंबर सिर्फ जनगणना के मकसद से ही पूछा जाएगा और उसका इस्तेमाल किसी और प्रयोजन के लिए नहीं किया जाएगा। यह जनगणना पारंपरिक पेन और पेपर के बजाए मोबाइल फोन एप्लीकेशन के जरिए होगी। इस कवायद के साथ ही राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का काम भी चलता रहेगा, क्योंकि केंद्र सरकार ने इसे सितंबर 2020 तक तैयार करने का फैसला किया है।

जनगणना की संदर्भ तिथि एक मार्च, 2021 होगी, लेकिन पर्वतीय राज्यों जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लिए यह तिथि एक अक्टूबर, 2020 रहेगी।

इसी के साथ जनगणना के दौरान जुटाई जानी वाली जानकारियों को लेकर आधिकारिक रूप से तस्वीर साफ हो गई है। सरकार पहले भी कह चुकी है कि इन जानकारियों का मकसद लोककल्याण की योजनाओं का बेहतर तरीके से खाका खींचना है। इस अधिसूचना से इससे जुड़ी तमाम अफवाहों पर भी विराम लग गया है। एनआरसी और सीएए पर विपक्ष के अफवाह के कारण देश के कई हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुए थे। समुदाय विशेष के लोगों ने विरोध के नाम पर जमकर पत्थरबाजी और आगजनी की थी।

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भाजपा ने नहीं, कॉन्ग्रेस की सरकार ने NPR को NRC से जोड़ा था: 9 साल बाद मोदी सरकार ने अलग किया

सरकारी योजनाओं में नहीं होगा फर्जीवाड़ा, घुसपैठ रुकेगा: NDTV के इस वीडियो से समझें NPR के फायदे

शवयात्रा में भी नहीं थी राम नाम लेने की इजाजत, Tanhaji ने बताया औरंगज़ेब कितना ‘महान’

यहाँ बाकी समीक्षकों की तरह फ़िल्म की कहानी नहीं बताई जाएगी। फ़िल्म ‘तानाजी’ झूठे सेक्युलर दिखावों में नहीं फँसती। इसमें ‘अच्छा मुस्लिम’ और ‘बुरा मुस्लिम’ वाला कॉन्सेप्ट दिखाने से बचा गया है, जो अब तक बॉलीवुड का ट्रेंड रहा है। मराठों के ‘हर हर महादेव’ और ‘जय भवानी’ की गूँज से आपका रोम-रोम खड़ा हो जाएगा। इसे Goosebumps कह लीजिए। सबसे अच्छी बात ये है कि छत्रपति शिवाजी राजे के किरदार की गरिमा के साथ कोई खिलवाड़ नहीं किया गया है। राजे जब स्क्रीन पर आते हैं तो हाव-भाव और दमदार आवाज़ से लगता है कि उनके किरदार को पूरी सावधानी से लिखा गया है।

अजय देवगन ने ‘सिंघम’ सरीखी फ़िल्मों में मराठी किरदार निभाया है, इसीलिए एक मराठा वीर के किरदार में वो फिट बैठे हैं। लेकिन, सैफ अली ख़ान एक ‘सरप्राइज पैकेज’ हैं, जिन्होंने उदयभान के किरदार को पूरी शिद्दत के साथ निभाया है। गाय और भेंड़ की माँस खाने वाला उदयभान। हिंदुओं को हिंदुओं के साथ लड़ाने की मुगलिया रणनीति और गद्दारों की वजह से हिंदुओं का सत्यानाश कैसे होता था, इसे भी दिखाया गया है।

औरंगज़ेब जैसा कट्टर मुस्लिम था, उसे वैसे ही दिखाया गया है। संजय मिश्रा ने कहानी को नैरेट किया है, पूरे संजीदापन के साथ। स्क्रिप्ट इतनी कसी हुई है कि इंटरवल कैसे आ गया, पता ही नहीं चला। ‘भगवा’ हमारी पहचान है, ये आपको फ़िल्म देखने पर पता चलेगा।

शिवाजी राजे की तलवार चलती है तो ब्राह्मणों का जनेऊ और लोगों का घर-बार सुरक्षित रहता है- भंसाली जैसों की फ़िल्मों में इस तरह के डायलॉग के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। मुस्लिम आक्रांताओं के डर का आलम ये था कि लोग राम नाम बोलते हुए शवयात्रा निकालने से भी डरते थे, तानाजी के किरदार में अजय देवगन का ये डायलॉग उस समय की परिस्थियों की बयान करता है।

आप जरा उस महिला के बारे में सोचिए, जो 17वीं शताब्दी में औरंगज़ेब जैसों के डर के कारण घर से बाहर तक नहीं निकल पाती थीं। ऐसी हज़ारों महिलाओं की जगह पर ख़ुद को रख कर देखिए, जो इस्लामी आक्रांताओं से आए दिन इज़्ज़त बचाते फिरती थीं। काजोल का किरदार फ़िल्म के दूसरे भाग में ऐसे उभर कर आया है, जैसी आपने कल्पना भी नहीं की होगी। इमोशनल दृश्यों में इस जगह पर उनसे अच्छा अभिनय शायद ही कोई कर पाता।

तानाजी को बिना ‘Larger Than Life’ दिखाए हुए, अजय देवगन ने उनकी वीरता, बहादुरी, साहस और कारनामे को इस तरह से दिखा कर फ़िल्म के साथ पूरा न्याय किया है। एक और महिला किरदार है। नेहा शर्मा ने उस किरदार को बखूबी अदा किया है। चाहे वो किसी जीत के लिए गए राजपरिवार की महिला हो या फिर एक ऐसे योद्धा की पत्नी, जिसका पति एक ऐसे युद्ध में गया है, जहाँ से लौटने की संभावना न के बराबर है- इस्लामी आक्रांताओं के क्रूरकाल की एक अच्छी झलक मिलेगी आपको।

दूसरे हाफ में अधिकतर युद्ध ही है, जो कहानी के हिसाब से आवश्यक भी था। लेकिन, वीर शिवाजी की महानता की झलकियाँ भी आपको मिलेंगी। भगवा हमारी पहचान है, भगवा हमारी स्वाधीनता का प्रतीक है और भगवा ही हमारा इतिहास एवं संस्कृति है- इस फ़िल्म से आपको पता चलेगा। शिवाजी राजे के किरदार में शरत केलकर गजब के जँचे हैं। उन्हें पता था कि वो किसका किरदार निभा रहे हैं।

सबसे बड़ी बात कि स्क्रिप्ट को कसी हुई रखने के लिए फ़िल्म की लंबाई को जबरदस्ती नहीं खींचा गया। सवा 2 घण्टे से भी कम में सब कुछ दिखा दिया गया है। अजय देवगन ने बॉलीवुड की फ़िल्मों में दिखाई जाने वाली ‘पोलिटिकल करेक्टनेस’ को ठेंगा दिखा दिया है। कुल मिला कर ये मातृभूमि के लिए लड़ने वाले एक ऐसे योद्धा की कहानी है, जिसे आपको देखनी चाहिए।

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