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पाक फैला रहा आतंक, 1 इंच भी जमीन नहीं देंगे: 15 विदेशी राजनयिकों से बोले कश्मीरी

विभिन्न देशों का 15 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल मौजूदा स्थिति का जायजा लेने के लिए गुरुवार को दो दिवसीय दौरे पर जम्मू-कश्मीर पहुँचा। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद विदेशी राजनयिकों की यह पहली यात्रा है। इस समूह के साथ विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी और सुरक्षा अधिकारी भी हैं। इससे पहले यूरोपीय संसद के सांसदों के एक समूह ने जमीनी हकीकत जानने के लिए जम्मू-कश्मीर का दौरा किया था।

कश्मीर घाटी का जायजा लेने के बाद विदेशी प्रतिनिधियों ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में स्थानीय लोगों ने पाकिस्तान के उन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिनमें पड़ोसी मुल्क द्वारा कहा जा रहा था कि घाटी में रक्तपात हो रहा है। इसके अलावा प्रतिनिधियों ने बताया कि कश्मीर के लोग पाकिस्तान के झूठ को पूरी तरह से खारिज करते हैं और वहाँ के लोगों का कहना है कि वो पाकिस्तान को एक इंच भी जमीन नहीं देंगे। साथ ही लोगों ने जम्मू-कश्मीर में हत्याओं के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया और दूतों को पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए कहा।

गुरुवार की यात्रा के दौरान राजनयिकों ने पंचायत सदस्यों और स्थानीय निकायों और गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की। प्रतिनिधिमंडल को चिनार कॉर्प्स कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों ने सुरक्षा स्थिति पर भी जानकारी दी। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद स्थानीय लोगों को कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि क्षेत्र में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक था।

दो दिवसीय यात्रा के पहले दिन के दौरान प्रतिनिधिमंडल श्रीनगर में सामान्य स्थिति के गवाह भी बने। उन्होंने कहा कि श्रीनगर की सड़कों पर आम दिन की तरह ही दुकानें खुलीं और सब कुछ बिलकुल सामान्य रहा। प्रतिनिधिमंडल ने जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक नेताओं से भी मुलाकात की। इनमें गुलाम हसन मीर, अल्ताफ बुखारी, शोएब इकबाल लोन, हिलाल अहमद शाह, नूर मोहम्मद शेख, अब्दुल मजीद पद्दर, अब्दुल रहीम राथर और रफी अहमद मीर शामिल थे।

प्रतिनिधिमंडल की यात्रा पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि उनकी पहली बैठक वहाँ के सुरक्षा जवानों के साथ थी, ताकि उन्हें जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के हालातों की जानकारी मिल सके। उन्होंने कहा कि यात्रा का उद्देश्य राजनयिकों को यह दिखाना है कि सरकार ने जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य करने के लिए क्या-क्या प्रयास किए हैं। रवीश कुमार ने बताया कि अमेरिका, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, बांग्लादेश, मालदीव, मोरक्को, फिजी, नॉर्वे, फिलीपींस, अर्जेंटीना, पेरू, नाइजर, टोगो और गुयाना के दूत इस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे।

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J&K: सुप्रीम कोर्ट ने कहा मानवाधिकार जरूरी लेकिन सुरक्षा को दरकिनार नहीं कर सकते, रिव्यू का निर्देश

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 निष्क्रिय होने के बाद सुरक्षा लिहाज से इंटरनेट पर लगाए गए प्रतिबंध समेत कई पाबंदियों के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी शुक्रवार (जनवरी,10, 2019) को अपना फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने फैसले में कहा है कि जम्मू कश्मीर सरकार एक सप्ताह के भीतर सभी प्रतिबंधात्मक आदेशों की समीक्षा करे।

कोर्ट ने प्रशासन से अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों जैसी आवश्यक सेवाएँ प्रदान करने वाली सभी संस्थाओं में इंटरनेट सेवाओं को बहाल करने के लिए कहा। न्यायालय का मानना है कि इंटरनेट का अनिश्चितकालीन निलंबन उन्हें स्वीकार्य नहीं है और धारा 144 सीआरपीसी के तहत बार-बार आदेश देने से सत्ता का दुरुपयोग होगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, किसी विचार को दबाने के लिए धारा 144 सीआरपीसी (निषेधाज्ञा) का इस्तेमाल समाधान के तौर पर नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, “कश्मीर में बहुत हिंसा हुई है। हम सुरक्षा के मुद्दे के साथ मानवाधिकारों और स्वतंत्रता को संतुलित करने की पूरी कोशिश करेंगे। इंटरनेट पर एक समय-सीमा तक ही रोक लगनी चाहिए।”

कोर्ट ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी हवाला दिया। अदालत ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि लोकतंत्र स्थापित करने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक जरूरी साधन है। इंटरनेट का इस्तेमाल फ्री स्पीच के आर्टिल 19 (1) के तहत मौलिक अधिकारों में आता है।

गौरतलब है कि न्यायमूर्ति एनवी रमण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति बीआर गवई की 3 सदस्यीय पीठ ने इन प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली गुलाम नबी आजाद और अन्य की याचिकाओं पर पिछले साल 27 नवंबर को सुनवाई पूरी की थी।

केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान समाप्त करने के बाद वहाँ लगाए गए प्रतिबंधों को 21 नवंबर को सही ठहराया था। केंद्र ने न्यायालय में कहा था कि सरकार के एहतियाती उपायों की वजह से ही राज्य में किसी व्यक्ति की न तो जान गई और न ही एक भी गोली चलानी पड़ी।

इस दौरान केंद्र ने कश्मीर घाटी में आतंकी हिंसा का हवाला देते हुए कहा था कि कई सालों से सीमा पार से आतंकवादियों को यहाँ भेजा जाता था। स्थानीय उग्रवादी और अलगावादी संगठनों ने पूरे क्षेत्र को बंधक बना रखा था और ऐसी स्थिति में अगर सरकार नागरिकों की सुरक्षा के लिए एहतियाती कदम नहीं उठाती तो यह मूर्खता होती।

JNU हिंसा की जाँच में भी रोड़े डाल रहे वामपंथी, प्रोफेसरों की 5 सदस्यीय समिति के विरोध में JNUTA

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में रविवार (5 जनवरी) को साबरमती हॉस्टल में नक़ाबपोश बदमाशों की हिंसा के कारणों का पता लगाने के लिए कुलपति एम जगदीश कुमार ने पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया है। इस समिति में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी टीचर्स फेडरेशन (JNUTF) के सदस्यों को शामिल किया गया है। इनमें, प्रोफ़ेसर सुशांत मिश्रा, मज़हर आसिफ़, सुधीर प्रताप सिंह, संतोष शुक्ला और भसवती दास शामिल हैं।

ख़बर के अनुसार, कुलपति द्वारा जारी की गई अधिसूचना में कहा गया है कि यह समिति हिंसा के कारणों का पता लगाकर जल्द ही अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। इसके अलावा, कुलपति ने कहा कि यदि सुरक्षा में किसी भी तरह की चूक हुई होगी, तो समिति छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उचित उपायों की सिफ़ारिश भी करेगी।

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (JNUTA) ने कुलपति द्वारा नियुक्त की गई जाँच समिति के सदस्यों के चयन पर सवाल उठाए हैं। सेंटर फॉर कॉपरोटेविव पॉलिटिक्स एंड पॉलिटिकल थ्योरी स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर मोहिंदर सिंह ने कहा कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सुलह का रास्ता दिखाया था। उससे पहले कुलपति द्वारा अपने लोगों को शामिल कर समिति का गठन करना ठीक नहीं। उन्होंने जाँच समिति की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए हैं। JNUTA वैचारिक रूप से JNUTF का विरोधी माना जाता है।

JNUTF के वरिष्ठ सदस्य और स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के डीन अश्विनी महापात्रा ने बताया कि जाँच समिति का गठन JNU के छात्रों को राष्ट्रहित में काम करने के लिए किया गया। जिस तरह से विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नकारात्मक मुद्दों को लेकर चर्चा में बना हुआ है उससे हम आहत हैं। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि JNU को लेकर नकारात्मक धारणाएँ बदल जाएँ। आने वाले दिनों में, हमारे पास कैंपस के लिए कई कार्यक्रम हैं। उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों के सन्दर्भ में कहा कि हमें उनके प्रदर्शनों से समस्या नहीं है, लेकिन हम चाहते हैं कि छात्र राजनीतिक हकीकत और अपने विरोध की सीमाओं को समझें।

अश्विनी महापत्रा का कहना है कि वो कुलपति से केवल औपचारिक बैठकों में ही मिलते हैं। इस दौरान उनकी चर्चा का विषय विश्वविद्यालय की जगह को सभी के लिए एकसमान रूप से उपलब्ध कराना होता है, जिसमें नियमित तौर पर अनुसंधान की अनुमति देना भी शामिल है। बता दें कि JNUTF ने पिछले महीने JNUTA की कमियों के चलते ख़ुद को उससे अलग कर लिया था।

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दिल्ली के बाद वडोदरा से भी पकड़ा गया ISIS आतंकी, तमिलनाडु का वांटेड है जफर अली

गुजरात में आतंकवाद-रोधी दस्ते (ATS) को बड़ी कामयाबी हासिल हुई है। गुजरात एटीएस ने एक वांटेड आतंकवादी को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आतंकवादी का नाम जफर अली मोहम्मद हलीक है। एटीएस ने उसे वडोदरा शहर के गोरवा क्षेत्र से पकड़ा है। जफर नाम का यह आतंकवादी तमिलनाडु में वांटेड था।

जानकारी के मुताबिक जफर अली पिछले 10-12 दिनों से वडोदरा में था और उसके जिम्मे शहर में आईएसआईएस मॉड्यूल को फैलाना था। अधिकारियों ने बताया कि जफर तमिलनाडु के कुड्डलोर जिले का रहने वाला है। उसे गोरवा इलाके के पंचवटी सर्किल के पास वडोदरा पुलिस और एटीएस के संयुक्त अभियान के तहत पकड़ा गया। पुलिस ने बताया कि एटीएस और स्थानीय पुलिस को जफर के वडोदरा में होने की खुफिया सूचना मिली थी। वह 6 संदिग्ध लोगों के साथ कई दिनों से गायब था।

एटीएस ने अपने बयान में कहा, “खुफिया सूचनाओं से संकेत मिला था कि 6 फरार लोग किसी अज्ञात स्थान पर जिहादी गतिविधियों के संचालन की बात कर रहे थे। वे आईएसआईएस से प्रेरित थे और इस्लामिक चरमपंथी थे, जिसकी वजह से यह इस बात की आशंका थी कि वे देश में आतंकी गतिविधि की योजना बनाएँगे।”

इसके बाद गुजरात एटीएस के अधिकारियों ने तलाशी अभियान शुरू किया। इस दौरान अधिकारियों को एक ऐसे ही शख्स के वडोदरा में छुपे होने की सूचना मिली। इस सूचना के आधार पर गुजरात एटीएस और वडोदरा पुलिस ने कार्रवाई करते हुए उसे गोरवा से उसे धर दबोचा।

गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आईएसआईएस के तीन आतंकियों को गिरफ्तार किया था। ये दिल्ली एनसीआर और उत्तर प्रदेश में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने की योजना बना रहे थे। बताया जा रहा है कि जफर अली भी उसी आतंकी मॉड्यूल से जुड़ा है जिसे ये तीनों आतंकवादी स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे।

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सैन्य शिविर पर हमले में 25 लोगों की मौत, 63 आतंकवादी भी मार गिराए गए: रक्षा मंत्रालय

अफ्रीकी देश नाइजर में हथियारों से लैस हमलावरों ने गुरुवार (जनवरी 9, 2020) को एक सैन्य शिविर पर हमला किया। हमले में 25 लोगों की मौत हुई और 63 आतंकवादी मारे गए। खबर की पुष्टि खुद वहाँ के रक्षा मंत्रालय ने की। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता कर्नल सुलेमानी गाजोबी ने टेलीविजन पर कहा कि यह हमला माली की सीमा से लगे काफी संवेदनशील क्षेत्र में हुआ।

उन्होंने बताया कि हमलावर गाड़ियों और मोटरसाइकिल पर आए थे। यह हमला पश्चिमी तिलाबेरी के चिनेगोदार क्षेत्र में हुआ जो बुर्किना फासो की सीमा से भी लगा है। प्रवक्ता ने बताया कि नाइजर वायु सेना और सहयोगियों की मदद से जवाबी कार्रवाई की गई और हमलावरों को सीमा से बाहर खदेड़ दिया गया।

यहाँ बता दें कि अफ्रीका देश के अनुसार सहयोगी का मतलब अक्सर अमेरिकी ड्रोन या फिर फ्रांस के विमान या ड्रोन होते हैं। उन्होंने बताया कि मित्र पक्ष के 25 लोगों की मौत हुई और छह घायल हुए। वहीं 63 आतंकवादी मारे गए।

गौरतलब है कि अभी कुछ समय पहले अफ्रीकी देश बुर्किना फासो के अरबिंदा शहर में भी एक बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था। जिसमें 35 लोगों की मौत हुई थी। लेकिन सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में 80 आतंकवादी भी मारे गए थे। 

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प्रियंका गाँधी की खुली पोल-पट्टी, देखिए JNU हिंसा में घायल छात्र से कैसे मुँह मोड़ा

जेएनयू में 5 जनवरी को छात्रों के साथ हुई हिंसा के विरोध में कई जगह प्रदर्शन हुए हैं। कई नेता इस दौरान अपनी राजनीति साधने के लिए घायल छात्रों का समर्थन करने की आड़ में केंद्र सरकार को घेर रहे हैं। इसी सूची में एक नाम प्रियंका गाँधी का भी है। प्रियंका गाँधी लगातार जेएनयू में घायल छात्रों की दुर्दशा के पीछे एबीवीपी और भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। हालाँकि ये बात अलग है कि एबीवीपी के छात्र भी इस हमले में बुरी तरह घायल हुए हैं। उन पर भी बर्बरता हुई है। उन्हें भी वामपंथियों ने दौड़ा-दौड़ाकर मारा है। लेकिन, शायद प्रियंका का इस पक्ष से कोई सरोकार नहीं है। उनकी संवेदना सिर्फ़ वामपंथियों, कट्टरपंथियों और कॉन्ग्रेसियों के सिर-माथे फूटे देख जागती है। उनके आँसू सिर्फ़ उन लोगों के लिए गिरते हैं जो भाजपा सरकार के पक्ष में नहीं होता।

इसकी पुष्टि करते हुए सोशल मीडिया पर इंडिया टीवी के पत्रकार सुशांत सिन्हा ने एक वीडियो अपलोड की है। वीडियो उनके अपने शो की है। इसमें एबीवीपी के राज्य सचिव सिद्धार्थ यादव भी बतौर पैनेलिस्ट मौजूद थे। सुशांत के शो में यादव ने उस दिन हमले के बाद एम्स पहुँचीं प्रियंका गाँधी की पोल-पट्टी खोल दी।

उन्होंने बताया कि रविवार की रात वे भी एम्स में थे। उनके साथ 11 एबीवीपी के कार्यकर्ता भी वहाँ मौजूद थे। उन्होंने खुद देखा कि प्रियंका गाँधी कुछ डॉक्टर्स की भीड़ लेकर अस्पताल में आईं। उन्हें देखकर विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता शिवम चौरसिया ने उनके पास जाकर कहा कि वे उन्हें एसएफआई और AISA के लोगों ने मारा है। लेकिन जैसे ही प्रियंका गाँधी ने सुना कि घायल युवक एबीवीपी का है, उन्होंने उससे मुँह मोड़ लिया और फौरन उनके गार्ड ने शिवम को पीछे किया। इसके बाद वो बिना कुछ कहे मुड़कर चलीं गईं।

इसके बाद सिद्धार्थ ने अपने फोन से नेशनल टीवी पर इस वीडियो को दिखाया। वीडियो में वही सब था, जिसका खुलासा सिद्धार्थ ने किया था। कार्यक्रम के दौरान हुए इस खुलासे को लेकर सुशांत सिन्हा ने ट्विटर पर वीडियो पोस्ट की है। उन्होंने लिखा है, “ये वीडियो देखकर एक ही सवाल मन में आता है कि कोई इतना निर्मोही कैसे हो सकता है? प्रियंका गाँधी जी,आपने एक चोटिल छात्र से अस्पताल में मुँह सिर्फ इसलिए मोड़ लिया, क्योंकि वो ABVP का था। आपके सुरक्षा गार्ड्स ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया, क्योंकि उसकी विचारधारा अलग है।शर्मनाक।”

सिद्धार्थ यादव ने भी इस वीडियो को ट्विटर पर शेयर किया है। उन्होंने लिखा है, “ये वो वीडियो है जिसे मैंने एम्स में अपने फोन से रिकॉर्ड किया। मैं हैरान था कि प्रियंका गाँधी इस तरह कैसे मुँह मोड़ सकती हैं। मैं वो दिन नहीं भूल सकता और न ही वो पल।”

गौरतलब है कि प्रियंका गाँधी अक्सर यूपी में हुई हिंसा को लेकर सरकार पर हमलावर रहती हैं। दंगाइयों को पीड़ित बताकर उनका पक्ष सुनने की बात कहती हैंं। पुलिस कार्रवाई में घायलों के प्रति संवेदना प्रकट करती हैं। इसके अलावा भी वो वह सब कुछ करती हैं जिससे केंद्र सरकार बर्बर दिखे। लेकिन वास्तविकता क्या है, ये इस वीडियो में साफ है। जिसे देखकर पता चलता है कि प्रियंका के लिए राजनीति से बढ़कर कुछ भी नहीं है।

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छपाक कैसा होता होगा? कोई चंदा बाबू से पूछे…

जरूरी नहीं कि छपाक के बारे में जानने के लिए कोई बड़ी-मोटी किताबें पढ़ी जाएँ। बिहार के लोग छपाक का मतलब अच्छी तरह जानते हैं। यहाँ एक ऐसा दौर था जिसे जंगलराज कहा जाता है। सिवान में एक अपराधी शहाबुद्दीन की तूती बोलती थी। बिहार से सभी लोग पलायन तो नहीं करते, या कर पाते, कुछ लोग यहीं रहते भी हैं। चंद्रशेखर प्रसाद उर्फ़ चंदा बाबू अपनी पत्नी और बच्चों के साथ इसी सिवान में गुज़र-बसर कर रहे थे। शहर के मुख्य बाजार में उनकी दो दुकानें थी। अगस्त 2004 में उनसे शहाबुद्दीन के गुंडों ने रंगदारी मांगी और उन्होंने मना कर दिया।

राजद के नेता को रंगदारी देने से इनकार! चन्दा बाबू की दुकानें लूट ली गई और उनके बेटों को उठा लिया गया। दो भाइयों सतीश और गिरीश रौशन को अगस्‍त 2004 में बेरहमी से तेज़ाब से नहला कर मौत के घाट उतार दिया गया था। जब राजद का सांसद, शहाबुद्दीन दो भाइयों को तेज़ाब से नहलाकर मार रहा था तो चंदा बाबू का एक बेटा राजेश वहीं बाँध कर रखा गया था। इन दोनों भाइयों की हत्या के चश्मदीद गवाह रहे तीसरे भाई राजेश रौशन को भी बाद में गोलियों से उड़ा दिया गया था। अगर आप सोच रहे हैं तेज़ाब से नहलाकर क़त्ल करने के लिए शहाबुद्दीन गिरफ़्तार हुआ होगा, तो ऐसा नहीं है।

बाद में जब सरकार बदली तब कहीं जाकर उसे गिरफ़्तार किया गया। सरकारी रिकॉर्ड के हिसाब से वो ‘ए टाइप‘ मुजरिम है, यानि जिसके सुधारने की कोई संभावना ना हो, वैसा अपराधी। उसके गिरफ़्तार होने के बाद भी जेल में ‘दरबार‘ लगाने की घटनाएँ आम रहीं। छापे मारकर जेल से यदा कदा मोबाइल ज़ब्त करवाए जाते रहे। जब तेज़ाब काण्ड के चश्मदीद गवाह, चंदा बाबू के तीसरे बेटे की हत्या हुई थी तब भी शहाबुद्दीन ने इसे जेल से ही अंजाम दिया था। फ़रवरी 2012 में सिवान से ही मुन्ना खान नाम का एक अपराधी गिरफ़्तार हो गया।

ये शहाबुद्दीन का पुराना गुर्गा था। इस पर चंद्रशेखर उर्फ़ कॉमरेड चंदू को सरे बाजार गोलियों से भून डालने का आरोप था। जेएनयू के छात्र नेता रहे कॉमरेड चंदू की हत्या शहाबुद्दीन के ही आदेश पर हुई थी। गुंडे शाहबुद्दीन ‘छपाक’ की हैसियत का अंदाज़ा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि सितम्बर 2016 में जब शाहबुद्दीन ‘छपाक’ को ज़मानत मिली, तो जेल से निकले उसके काफ़िले में 4 मंत्री, 30 सरकारी गठबंधन के विधायक, कुल 1300 गाड़ियों का काफ़िला था। उस दौर में सुशासन बाबू ख़ुद को ’32 दाँतों के बीच जीभ’ बताते थे। क़रीब-क़रीब इसी दौर में राजदेव रंजन की हत्या हुई थी।

कहने को राजदेव रंजन को पत्रकार बताया जाता है, लेकिन पद के हिसाब से देखें तो वो काफी ऊँचे ओहदे पर थे। सरेआम हुई उनकी हत्या के बाद तथाकथित ‘निष्पक्ष और निर्भीक’ कहलाने वाले पत्रकार भी लम्बे समय तक शाहबुद्दीन ‘छपाक’ के विरोध में कुछ नहीं लिख पाए। हाँ, इस हत्या के विरोध में अख़बार का मुख्य पन्ना ज़रूर ब्लैक एंड व्हाइट कर दिया गया था (सिर्फ़ उस अख़बार का जहाँ राजदेव रंजन नौकरी करते थे)। जब आप ‘छपाक’ की बात करेंगे तो भला शहाबुद्दीन ‘छपाक’ का नाम बिहार के लोगों को कैसे याद नहीं आएगा?

इस मामले को याद करने का एक दूसरा कारण भी है। कॉन्ग्रेस नेता सलमान खुर्शीद वकील भी हैं। उन्होंने अपने मुवक्किल शहाबुद्दीन ‘छपाक’ की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि उसे एकांतवास में क्यों रखा गया है और उसे क्या हमेशा एकांतवास में ही रखा जाएगा? ‘नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए शहाबुद्दीन ‘छपाक’ को जेल में नमाज़ पढ़ने की जगह देने की माँग भी की गई है! इससे पहले इस आशय की याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में भी दायर की गई थी। बाकी फ़िल्म ‘छपाक’ और उससे जुड़े हंगामे का शोर ज़्यादा है। देखिएगा, कहीं नक्कारखाने में तूती की आवाज़ की तरह शहाबुद्दीन ‘छपाक’ के एसिड अटैक भुला ना दिए जाएँ।

नमाज के लिए जेल में जगह चाहिए हत्यारे पूर्व सांसद शहाबुद्दीन को, कॉन्ग्रेसी नेता वकील की SC में याचिका

अब छत पर कोई सोनाली नहीं सोती… फिर भी तेजाब की बारिश से आँखें खुलती है

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भारत में हमले का बड़ा प्लान: 40 रोहिंग्याओं का दस्ता, पाकिस्तान दे रहा ट्रेनिंग

पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई भारत में बड़े आतंकी हमलों को अंजाम देने की फिराक में है। इसके लिए उसने रोहिंग्याोंओं का दस्ता तैयार किया है। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने इस बाबत सेना और अर्ध सैनिक बलों को अलर्ट किया है।

खुफिया सूत्रों के मुताबिक, भारत पर हमले के लिए आईएसआई करीब 40 रोहिंग्याओं को बांग्लादेश में ट्रेनिंग दे रही है। इसमें बांग्लादेशी आंतकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन (जेएमबी) आईएसआई की मदद कर रहा है। खुफिया एजेंसी की जानकारी के बाद सीमा पर तैनात सुरक्षाबलों को अलर्ट किया गया है।

खुफिया एजेंसियों ने कहा, “पाकिस्तान पड़ोसी बांग्लादेश की सीमा से भारत के खिलाफ बड़ा षड्यंत्र रच रहा है। बांग्लादेशी आतंकी संगठन जेएमबी को आईएसआई धन मुहैया करा रही है। आईएसआई बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में रहने वाले 40 रोहिंग्याओं को आतंकी ट्रेनिंग दे रही है।”

एजेंसी ने बताया है कि जेएमबी को धन सऊदी अरब और मलेशिया के जरिए मुहैया कराया जा रहा है और पहली किस्त के रूप में जेएमबी को एक करोड़ टका उपलब्ध कराए गए हैं। खुफिया एजेंसियों ने इसकी सूचना राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) के साथ भी शेयर किया है।

दरअसल, पाकिस्तान एलओसी पर भारतीय सुरक्षाबलों की मुस्तैदी के चलते आतंकियों की घाटी में घुसपैठ कराने में नाकाम रहा। ऐसे में उसने भारत में हमलों को अंजाम देने के लिए बांग्लादेश को चुना है। इसी कड़ी अब भारत में आतंकी हमला करने के लिए पाकिस्तान रोहिंग्याओं को तैयार कर रहा है।

पिछले साल एनआइए प्रमुख वाईसी मोदी ने कहा था कि जेएमबी पूरे भारत में अपना जाल फैलाना चाह रहा है। इसको लेकर 125 संदिग्धों की सूची विभिन्न राज्यों के साथ साझा की गई है। इनके जमात-उल-मुजाहिदीन के नेृतत्व से करीबी रिश्ते हैं।

एनआईए चीफ मोदी के मुताबिक, जेएमबी ने झारखंड, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में अपनी गतिविधियाँ तेज की हैं। इस आतंकी संगठन ने 2014 से 2018 यानी 4 साल के भीतर अकेले बेंगलुरु में 20-22 ठिकाने बनाए और इसे दक्षिण भारत के दूसरे राज्यों तक फैलाने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि जेएमबी ने कर्नाटक सीमा पर कृष्णागिरी की पहाड़ियों में रॉकेट लॉन्चर तक टेस्ट किए हैं। जेएमबी ने भारत में 2007 में अपनी गतिविधियाँ शुरू कीं। शुरुआत में पश्चिम बंगाल और असम को अपना ठिकाना बनाया और फिर देश के अन्य राज्यों में पहुँचा।

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं रोहिंग्या: बांग्लादेश की PM शेख हसीना

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रेप के मामले: मध्य प्रदेश देश में सबसे आगे, दूसरे नंबर पर भी कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान

साल 2018 में एक बार फिर मध्यप्रदेश बलात्कार मामलों में देश में पहले नंबर पर रहा। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा बुधवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार साल 2018 में देश में कुल 33,356 रेप की घटनाएँ हुईं। इनमें से 5,433 घटनाएँ यानी लगभग 16 प्रतिशत घटनाएँ मध्यप्रदेश में घटीं। शर्मनाक बात ये है कि इन आँकड़ों में 54 ऐसे मामले हैं जिनमें पीड़िता की उम्र 6 साल से कम उम्र की रही।

गौरतलब है कि साल 2016 और साल 2017 में भी मध्यप्रदेश ही इस सूची में पहले पायदान पर था। वर्ष 2016 में प्रदेश में जहाँ बलात्कार की 4, 882 घटनाएँ हुईं थी। वहीं साल 2017 में 5, 562 घटनाएँ सामने आई थी।

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एनसीआरबी की रिपोर्ट के अ्नुसार साल 2018 में प्रदेश में बलात्कार का शिकार होने वाली लड़कियों में 2,841 लड़कियाँ ऐसी थीं, जिनकी उम्र 18 साल से कम थी। इनमें से 6 साल से कम उम्र की 54 बच्चियाँ थीं और 6 से 12 साल की 142 बच्चियाँ, 12 से 16 की उम्र की 1,143 बालिकाएँ और 16 से 18 साल की 1,502 लड़कियाँ शामिल है।

एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक बलात्कार मामलों में दूसरे नंबर पर राजस्थान है। यहाँ साल 2018 में बलात्कार की 4,335 घटनाएँ दर्ज की गई। तीसरे नंबर पर उत्तरप्रदेश है जहाँ रेप की 3,946 घटनाएँ सामने आई। महाराष्ट्र में ये आँकड़े 2,142 दर्ज किए गए और छत्तीसगढ़ में 2,091।

मध्यप्रदेश अभियोजन विभाग के आँकड़ों के अनुसार बच्चियों के साथ बलात्कार के 18 मामलों में अदालत ने साल 2018 में दोषियों को मौत की सजा मुकर्रर की। बता दें कि मध्य प्रदेश में कानून व्यवस्था की मुजूदा हालात को देखते हुए इन आँकड़ों में सुधार की उम्मीद नहीं दिखती।

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‘काट के लेंगे आजादी’: JNU के छात्र कर रहे थे प्रदर्शन, युवती ने IPS अधिकारी को काटा

वीसी को हटाने के लिए जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के छात्रों के एक धड़े ने गुरुवार को प्रदर्शन किया। जेएनयू कैंपस से लेकर मंडी हाउस और जंतर-मंतर तक मार्च निकाला गया। प्रदर्शनकारी छात्र राष्ट्रपति भवन की ओर जाना चाहते थे। लेकिन, पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया।

इस दौरान एक हैरान करने वाला वाकया हुआ। एक प्रदर्शनकारी युवती ने विजय चौक पर आईपीएस अधिकारी इंगित प्रताप सिंह के अँगूठे पर दाँत से काट लिया। सिंह दक्षिणी-पश्चिमी दिल्ली के एडिशनल डीसीपी हैं। प्रदर्शन का आह्वान JNU छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष ने किया था।

प्रदर्शनकारी युवती की हरकत पर ट्वीट करते हुए अभिनेता रणवीर शौरी ने लिखा है, “काट के लेंगे आज़ादी!” हालॉंकि, दॉंत काटने वाली युवती की पहचान नहीं हो पाई है। डीसीपी ने किसी तरह उससे अपना हाथ छुड़ाया। दॉंत काटने से उनके हाथ पर हल्के घाव हो गए। बाद में उपचार के लिए उन्हें अस्पताल ले जाया गया। 

ख़बर के अनुसार, 2011 बैच के अधिकारी इंगित प्रताप सिंह एक पुरुष प्रदर्शनकारी को खींचने की कोशिश कर रहे थे, तभी उस महिला ने अपने मित्र को बचाने की कोशिश में आईपीएस अधिकारी का अँगूठा काट लिया। वहीं, पुलिस ने शांति-व्यवस्था बनाए रखने की अपील की। इसके अलावा, कुछ छात्रों ने दिल्ली के कनॉट प्लेस में सड़क किनारे खड़े होकर कुलपति के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी भी की। इसके चलते जनपथ पर जाम लग गया और आवागमन भी प्रभावित हुआ।

बता दें कि JNU के छात्रों और अध्यापकों के एक धड़े ने कुलपति एम जगदीश कुमार को पद से हटाने की माँग के बीच गुरुवार को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उन्हें हटाने से इनकार किया। मंत्रालय का कहना था कि कुलपति को हटाना समाधान नहीं है और सरकार का ध्यान परिसर में उठे मुद्दे का निपटारा करने पर है। वही, मंत्रालय ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि छात्रों और प्रशासन के साथ बैठक के दौरान तय ‘फॉर्मूले’ को लागू करने की भी ज़रूरत है। कुलपति समेत यूनिवर्सिटी के अधिकारियों को छात्रों के दावे पर बातचीत करने के लिए शुक्रवार (10 जनवरी) को मंत्रालय बुलाया गया है। छात्रों ने दावा किया है कि मानव संसाधन मंत्रालय के हस्तक्षेप के दौरान तय संशोधित शुल्क को लागू नहीं किया गया है।

ग़ौरतलब है कि JNU में पिछले दो महीने से चल रहा विवाद ने रविवार को हिंसक हो गया था। शुक्रवार और शनिवार (3, 4 जनवरी) को छात्रों ने JNU परिसर में हंगामा किया था। इस दौरान छात्रों ने सर्वर रूम ठप कर लोगों को बँधक बनाया और सरकारी सम्पत्ति को नुक़सान पहुँचाया। इसके बाद पाँच जनवरी की रात कुछ नक़ाबपोश गुंडोंं ने हाथों में रॉड और डंडे लेकर छात्रों को पीटा और तोड़फोड़ की।

एबीवीपी के छात्रों के रूम का गेट तोड़ कर उन पर हमला किया गया। किसी की गर्दन में चोटें आई हैं तो किसी का हाथ टूट गया है। जब कैम्पस में पुलिस पहुँची तो पुलिस के ख़िलाफ़ भी ‘गो बैक’ के नारे लगाए गए। छात्रों को घेर-घेर कर पीटा गया। एबीवीपी की एक छात्रा शाम्भवी की वेशभूषा में एक वामपंथी छात्रा ने हमले किए ताकि इसमें संगठन का नाम बदनाम हो। बाद में पता चला शाम्भवी ख़ुद घायल हुई हैं और वामपंथी गुंडों की पोल खुल गई। इस हिंसा पर वामपंथी और अज्ञात हिंसक छात्रों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया गया है। इसमें JNU छात्र संग की आइशी घोष भी शामिल हैं।

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