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‘हैदराबाद के जैसा दौड़ा-दौड़ाकर गोली मारी जाए…’ – उन्नाव में जला कर मार दी गई बेटी के पिता का छलका दर्द

उन्नाव ज़िले के सिंधुपुर गाँव में पाँच आरोपितों द्वारा गैंगरेप की पीड़िता को ज़िंदा जलाए जाने की ख़बर ने सबका दिल दहला दिया था। पीड़िता ने अपने परिवार से कहा था कि वो मरना नहीं चाहती, वो आरोपित को मौत की सज़ा पाते देखना चाहती है। लेकिन अफसोस! 23 वर्षीय पीड़िता, जो बुरी तरह जला दी गईं थी, जिन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था, कल रात वो जिंदगी की जंग हार गईं। पीड़िता को ज़िंदा जलाने का प्रयास 5 दिसंबर की सुबह उस समय किया गया था, जब वो रेप के मामले की सुनवाई के लिए रायबरेली की एक अदालत जा रही थी।

साल भर पहले शुभम और शिवम त्रिवेदी ने पीड़िता का अपहरण करने बाद उसके साथ गैंगरेप किया था। मार्च 2019 में पुलिस ने केस दर्ज किया। 30 नवम्बर को इन्हें बेल मिली। गुरुवार को जब पीड़िता रायबरेली कोर्ट जा रही थीं, तब शिवम और शुभम के अलावा हरिशंकर त्रिवेदी, राम किशोर त्रिवेदी और उमेश बाजपाई ने उन्हें पीटा, चाकुओं से गोदा और फिर तेल उड़ेल कर आग लगा दी।

पीड़िता के भाई ने इंडिया टुडे को बताया,

“उसने कहा कि भईया मुझे बचा लो, मुझे मरना नहीं है। जिन्होंने मेरे साथ यह किया है, उन्हें मैं मौत की सज़ा पाते देखना चाहती हूँ।” 

उन्नाव गैंगरेप पीड़िता को गुरुवार (5 दिसंबर) की शाम को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी। अस्पताल ने तभी कहा था, “अगले 24-48 घंटे उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। अभी वेंटिलेटर पर रखा गया है। हम पूरी कोशिश कर रहे हैं। उनका शरीर 90 प्रतिशत तक जल गया है, शरीर पर काफी चोटें हैं।” लेकिन डॉक्टरों की पूरी कोशिश के बावजूद उन्नाव की यह बेटी अपने साथ हुए जघन्य अपराध के दोषियों को सजा मिलते देख पाने की ख्वाहिश लिए इस दुनिया से चली गईं।

वहीं, पीड़िता के पिताजी का कहना है कि उनके गुनहगारों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए। हैदराबाद में जो हुआ, वही सज़ा मिलनी चाहिए। उन्हें दौड़ा-दौड़ाकर गोली मारी जानी चाहिए या फिर फाँसी की सज़ा दी जानी चाहिए।

उन्नाव गैंगरेप पीड़िता, जो 90 प्रतिशत तक जल गई थी और ज़िंदगी व मौत के बीच जंग लड़ रही थी उन्हें पाँच लोगों ने बड़ी बेरहमी से मारा-पीटा और फिर मिट्टी का तेल डालकर पीड़िता को ज़िंदा ही आग के हवाले कर दिया। 

इस मामले में शिवम त्रिवेदी और शुभम त्रिवेदी मुख्य आरोपित हैं, जिनके ऊपर अगवा कर गैंगरेप का आरोप लगा हुआ है। यह दोनों ही फ़िलहाल ज़मानत पर रिहा थे। इनके अलावा, पुलिस ने मुख्य आरोपितों की मदद करने वाले उमेश वाजपेई, हरिशंकर त्रिवेदी और राम किशोर त्रिवेदी को भी गिरफ़्तार किया है। 

पीड़िता ने एसडीएम दयाशंकर पाठक को दर्ज कराए अपने बयान में बताया कि आरोपित पक्ष उस पर केस वापस लेने के लिए लगातार दबाव बना रहा था। जब उसने केस वापस नहीं लिया तो आरोपितों ने उस पर यह जानलेवा हमला कर दिया। घटना के तुरंत बाद पुलिस ने अपनी कार्रवाई के तहत पाँचों आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया।

बता दें कि बलात्कार के मामले में जेल में बंद शुभम को 30 नवंबर, 2019 को ज़मानत दी गई थी। ज़मानत मिलने के तुरंत बाद, शुभम ने पीड़िता का पीछा करना और उन्हें धमकी देना शुरू कर दिया। पीड़िता और उसके परिवार ने कथित तौर पर पुलिस को धमकियों के बारे में सूचित किया लेकिन पुलिस ने शिक़ायतों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। फ़िलहाल, एक विशेष जाँच दल इस मामले की छानबीन कर रहा है।

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9 दिसंबर तक शवों को ना तो जलाया-दफनाया जाए, ना ही घर वालों को सौंपा जाए: हाई कोर्ट का आदेश

तेलंगाना हाईकोर्ट ने हैदराबाद में मारे गए बलात्कार आरोपितों के शवों के अंतिम संस्कार को रोक दिया है। हाईकोर्ट ने एक आदेश जारी कर कहा कि चारों आरोपितों के शव सोमवार (दिसंबर 9, 2019) तक सुरक्षित रखे जाएँ। उस दिन शाम 8 बजे तक इन शवों को जलाया या दफनाया नहीं जा सकेगा। कोर्ट ने इस सम्बन्ध में तेलंगाना सरकार को आदेश दिया है। अब कोर्ट द्वारा निर्धारित समय तक आरोपितों के शवों को उनके परिवार को भी नहीं सौंपा जा सकेगा। तेलंगाना के मुख्य न्यायाधीश कार्यालय को एक प्रतिवेदन मिला था, जिसमें इस एनकाउंटर को न्यायेतर हत्या बताया गया था।

इस एनकाउंटर को फ़र्ज़ी बताते हुए कोर्ट में पीआईएल भी दाखिल की गई है। सोमवार को इस पर सुनवाई होगी। हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि चारों आरोपितों के शवों के पोस्टमॉर्टम प्रक्रिया की वीडियोग्राफ़ी कराई जाए। उन वीडियो फुटेज को शनिवार की शाम तक कोर्ट में सब्मिट किया जाएगा। हालाँकि, शुक्रवार की शाम चारों आरोपितों के शवों की ऑटोप्सी पूरी कर ली गई थी और उसी दिन रात 10 बजे तक उन सभी का अंतिम संस्कार किया जाना था। अभी तक ये नहीं पता चला है कि ऑटोप्सी कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार हुई है या नहीं। 15 महिला एवं मानवाधिकार एक्टिविस्ट्स ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि ये एनकाउंटर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन्स के ख़िलाफ़ है।

इन याचिकाओं में माँग की गई है कि चारों आरोपितों के शवों की ऑटोप्सी तेलंगाना व आंध्र प्रदेश से बाहर के डॉक्टरों द्वारा कराई जाए। साथ ही फॉरेंसिक जाँच के लिए भी दोनों राज्यों के बाहर से विशेषज्ञों को बुलाने की माँग की गई है। साथ ही हाईकोर्ट से दरख्वास्त की गई है कि वो एक कमिटी बनाए, जो इस पूरे मामले की जाँच करे। शनिवार सुबह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक समिति हैदराबाद पहुँचेगी। आयोग ने इस एनकाउंटर का स्वतः संज्ञान लिया है और कहा है कि इसकी सावधानी से जाँच करनी ज़रूरी है।

बता दें कि 26 वर्षीय डॉक्टर प्रीति रेड्डी (बदला हुआ नाम) के गैंगरेप के बाद उनकी हत्या कर दी गई थी। मोहम्मद आरिफ और जॉली शिवा सहित 4 आरोपितों ने गैंगरेप के बाद डॉक्टर रेड्डी का नाक और मुँह दबा कर उनकी हत्या कर दी। दरिंदगी का आलम ये था कि डॉक्टर रेड्डी की लाश के साथ भी बलात्कार किया गया। इसके बाद पीड़िता के डेड बॉडी पर पेट्रोल व डीजल छिड़क कर आग लगा दी गई। पुलिस शुक्रवार की सुबह पूरे दृश्य को रीक्रिएट करने के लिए चारों आरोपितों को घटनास्थल पर लेकर गई।

वहाँ उन चारों ने पुलिस पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। साथ ही पुलिसकर्मियों के हथियार लेकर भागने की कोशिश की। आत्मरक्षा में की गई फायरिंग में चारों मारे गए। इसके बाद से ही लोगों ने हैदराबाद पुलिस की वाहवाही शुरू कर दी। हैदराबाद के क़ानून मंत्री ने इसे ‘उपरवाले का इंसाफ’ करार दिया। हालाँकि, मानवाधिकार संगठनों ने एनकाउंटर पर शक जताते हुए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और पुलिस का विरोध किया। अब मामला कोर्ट और ह्यूमन राइट्स कमीशन तक जा पहुँचा है।

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समाज एनकाउंटर पर जश्न मनाता है, तो उसका कारण है: उन्नाव की बेटी भी कल मर गई

रात के 12 बज कर 43 मिनट हो रहे थे। दिन भर हैदराबाद एनकाउंटर की खबरों पर लोगों के विचार पढ़ता रहा। उसी बीच उन्नाव की लड़की के बारे में भी खबर आई कि कोर्ट में केस की तारीख पर जा रही थी, रास्ते में पाँचों आरोपितों ने, जिनमें से दो ने उसके साथ पिछले साल दिसम्बर में बलात्कार किया था, तेल छिड़क कर आग लगा दिया।

आग लगाने की घटना गुरुवार (दिसंबर 5) की थी। साल भर पहले पीड़िता का, शुभम और शिवम त्रिवेदी ने, अपहरण करने के बाद उसके साथ बलात्कार किया था। मार्च 2019 में पुलिस ने केस दर्ज किया। 30 नवम्बर को इन्हें बेल मिली। गुरुवार को जब पीड़िता रायबरेली कोर्ट जा रही थी तब शिवम और शुभम के अलावा हरिशंकर त्रिवेदी, राम किशोर त्रिवेदी और उमेश बाजपाई ने उसे पीटा, चाकुओं से गोदा और फिर आग लगा दी।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आग लगने के बाद भी पीड़िता लगभग एक किलोमीटर तक भागती रही और मदद माँगती रही। अंत में, खुद ही 112 नंबर पर फोन कर के शिकायत की। बाद में लखनऊ के अस्पताल में इलाज शुरु हुआ, फिर उसे दिल्ली लाया गया जहाँ अपना बयान लिखवाने के बाद उन्नाव की बिटिया की हृदयाघात के कारण कल रात 11:40 पर मृत्यु हो गई।

हैदराबाद वाले मामले में पुलिस ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि चूँकि कैदियों के हाथ खुले हुए थे, तो उन्होंने हथियार छीन कर पुलिस पर हमला बोल दिया और जवाबी फ़ायरिंग में उनकी गोली लगने से मौत हो गई। हालाँकि, बलात्कारियों से सहानुभूति रखने वालों को इस बयान पर विश्वास नहीं हो रहा, और उन्होंने यहाँ तक कहा है कि ऐसी कहानियाँ अब फिल्मों में भी नहीं दिखाई जातीं।

अधिकांश लोगों को कल सुबह की यह खबर अच्छी लगी। नेताओं ने, मंत्रियों ने, पत्रकारों ने और बुद्धिजीवियों ने इस घटना की न सही, पर परिणाम पर अवश्य प्रसन्नता जताई। एनकाउंटर पर कई लोगों ने अलग-अलग विचार रखे कि पुलिस का कहना अगर सही भी है तो भी इसमें गलती पुलिस की है कि उसकी तैयारी इतनी लचर थी कि कैदियों ने उनके हथियार छीन लिए।

मूलतः, जश्न न मनाने वालों का पक्ष यह रहा कि अगर एनकाउंटर को ही समाधान मान लिया जाएगा तो हम एक वहशी समाज हो जाएँगे जहाँ कानून-व्यवस्था की परवाह किसी को नहीं रहेगी। किसी ने इसे मॉब जस्टिस या भीड़ का न्याय कह कर उसकी निंदा की। ओवैसी जैसे नेताओं और शेखर गुप्ता जैसे पत्रकारों ने सीधा एनकाउंटर को माफिया-स्टायल बताते हुए सवाल किए कि पुलिस और आइसिस या तालिबान में क्या अंतर रह गया है।

न्यायिक प्रक्रिया और बुद्धिजीवी

हैदराबाद वाले कांड में कहा जा रहा है कि न्यायिक प्रक्रिया फॉलो नहीं की गई, लोगों का कानून पर विश्वास नहीं है, और वो विक्षिप्त हो गए हैं अगर उन्हें यह एनकाउंटर सही लग रहा है। लेकिन ऐसा कहने वाले लोग यह बात बड़ी आसानी से भूल जाते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया तो बाईस साल चली थी याकूब मेमन के लिए, तब तो आपने लिखा था- एंड दे हैंग्ड याकूब!

अफजल गुरु को जब न्यायिक प्रक्रिया से फाँसी मिलती है तो आप उसे शहीद कहते हैं या फिर बुद्धिजीवियों की जुबान में ‘एक्स्ट्रा जुडिशियल किलिंग’ कह कर भर्त्सना करते हैं। अयोध्या मामले में जब यही प्रक्रिया अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँचती है तो आप ही कहते हैं कि हमें अपनी अंतरात्मा से पूछना चाहिए कि न्याय हुआ है कि नहीं? जस्टिस लोया के मसले पर प्रक्रिया से चलने के बाद सुप्रीम कोर्ट कोई गलती नहीं पाता तब आप हर रात छाती पीटते हैं कि गलत हो रहा है।

फिर मैं यह कैसे मान लूँ कि दस साल तक मोहम्मद आरिफ पर केस चलता, और तब उसे सजा-ए-मौत मिलती तब आप यह न कह रहे होते कि ‘और उन्होंने आरिफ को भी टाँग दिया’? क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया पर आपका विश्वास सिर्फ तभी होता है जब फैसला आपके मन की मुराद पूरा करने जैसा रहा हो। फिर मैं यह कैसे मान लूँ कि आपको डॉ रेड्डी के बलात्कारियों और हत्यारों, या डॉ रेड्डी के परिवार वालों से कोई भी मतलब है? आप बस हर तंत्र को झकझोड़ना चाह रहे हैं ताकि लोग सड़कों पर उतर आएँ और दंगे करें।

यही लक्ष्य है इन लोगों का जो सिर्फ एक एनकाउंटर को, जिस देश में इतनी बड़ी जनसंख्या है, जहाँ हर मिनट कहीं न कहीं कोई जघन्य हत्या या बलात्कार जैसे कुकृत्य होते रहते हैं, ऐसे दिखा रहे हैं मानो हर मिनट बस एनकाउंटर ही हो रहे हैं।

आखिर समाज जश्न क्यों मना रहा है?

प्रश्न यह नहीं है कि एनकाउंटर सही है या गलत। हम कभी भी नहीं जान सकते कि एनकाउंटर योजना बना कर हुआ या फिर पुलिस जो कह रही है वो सत्य है। इसलिए लोग अपना-अपना पक्ष रख रहे हैं। प्रश्न यह है कि एक सभ्य समाज ऐसे असामान्य तरीकों पर जश्न क्यों मना रहा है? प्रश्न यह है कि जो हैदराबाद के नहीं हैं, जो डॉ रेड्डी को जानते तक नहीं, वो क्यों खुश हैं?

मैं एक पत्रकार के तौर पर इस एनकाउंटर पर यही कहना चाहता हूँ कि या तो ऐसा कानून बने कि अगर बलात्कारियों ने स्वीकार लिया हो, ओपन एंड शट केस हो, वीभत्स हो, तो पुलिस उन्हें चौराहे पर भीड़ के हवाले कर सकती है, या पुलिस सतर्क हो कर, अपने हथियार जोर से पकड़ कर, कैदियों के हाथ में हथकड़ी डाल कर कहीं भी लाया-ले जाया करे। एनकाउंटर का सच मैं नहीं जानता लेकिन मैं यह मानता हूँ कि इन चारों आरोपितों की मौत ज़रूरी थी क्योंकि डॉ रेड्डी वापस नहीं आ सकती पर ऐसे लोगों का समाज में रहना गलत है। हालाँकि, ये मौत उन्हें एक सजा के तौर पर कोर्ट से मिलती, महीने भर में मिलती, मर्सी पटीशन रिजेक्ट हो कर मिलती, तो बेहतर होता।

एक भाई, बेटा, दोस्त या सामान्य नागरिक के तौर पर, जिसने कल ही यह भी सुना कि उन्नाव की उस लड़की के साथ क्या हुआ, ऐसे एनकाउंटरों के परिणाम सुन कर खुशी क्यों नहीं होगी? एक नागरिक के तौर पर हमने न्याय और पुलिस व्यवस्था को टूटते हुए देखा है। हैदराबाद के बलात्कारियों का एनकाउंटर किसी को मॉब जस्टिस भले लग रहा है, लेकिन ये कोई सामान्य घटना नहीं है, ये एक हर दिन होने वाली बात नहीं है। यह एक अपवाद है।

जब नागरिक ऐसे मामलों से उब जाते हैं तो फिर ऐसी मौतों का जश्न मनाते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में जब किसी की हत्या ही न्यायोचित थी, भले ही उस पर केस न चला हो, आम नागरिक के लिए यह एक छोटी-सी जीत है, जिस पर खुश होने का उन्हें हक है। इससे कोई तंत्र बिखर नहीं कर रहा, समाज कहीं नहीं जा रहा। इससे समाज को लगा है कि कर्मों का फैसला ऐसे भी होता है और ये दानव भगवान की कृपा से मारे गए हैं। समाज को हम दोषी तब मानते जब किसी निरपराध व्यक्ति को मार दिया जाता और पुलिस पर फूल बरसाए जाते।

समाज की नीयत पर सवाल तब उठाए जाते जब इस समाज ने किसी निर्दोष की हत्या पर ताली बजाई हो। समाज की सामूहिक संवेदना पर तब प्रश्नचिह्न लगाना उचित होता अगर भ्रम की स्थिति वाले मामले में, या किसी छोटे अपराध के आरोपित को, किसी ने सरे आम गोली मार दी, या पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया। समाज ने आज तक किसी निर्दोष की हत्या पर जश्न नहीं मनाया है। हमारी सामूहिक संवेदना ऐसे मामलों में हमेशा सही निर्णय लेती है। ये लाशें भले ही क़ानूनी प्रक्रिया के बिना गिरी हैं, लेकिन इनका गिरना किसी भी तर्क से गलत नहीं।

जो लोग समाज को असभ्य, वहशी और दरिंदगी वाला कह रहे हैं, उन्हें यह मत भूलना चाहिए कि दरिंदा यहाँ कौन था। अगर आपको उन चार बलात्कारियों में दरिंदगी नहीं दिख रही जिन्होंने एक अकेली लड़की के विश्वास को तोड़ा, धोखे से कहीं ले जा कर बलात्कार किया, जान ले ली, लाश के साथ भी बलात्कार किया, फिर लाश को जला दिया, फिर वापस देखने आए कि लाश जली है या नहीं, तो फिर आपको मनोचिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।

समाज जश्न मनाने को स्वतंत्र भी है, और अपनी जगह सही भी है। इसी समाज ने अपराधियों को जेल से बेल पर बाहर आने के बाद बलात्कार पीड़िता और उसके पति को जान से मारते भी देखा है। इसी समाज ने सैकड़ों बार अपराधियों को सजा काट कर बाहर आने के बाद दोबारा वही अपराध करते देखा है, जो जघन्य की श्रेणी में आते हैं। यहाँ न्यायिक व्यवस्था समाज के सामने बिखर रही है, उसकी उम्मीदों को तोड़ रही है।

इसलिए, न्यायिक व्यवस्था से परे जब किसी भी तरह से न्याय हो जाता है तो समाज जश्न मनाता है। समाज किसी सामान्य घटना पर जश्न नहीं मना रहा, वो जानता और मानता है कि एनकाउंटर में हुई घटना विलक्षण है, सालों में एक बार होने वाली घटना है, हजारों बलात्कारियों के बाहर होने के बावजूद चार की ही मौत का समाचार लाने वाली घटना है। इसलिए समाज इसे एक प्रतीक के रूप में देखता है। समाज इसे उस उम्मीद के रूप में देखता है कि क्या पता कुछ बलात्कारी इस घटना से भी डरें, उन्हें यह याद रहे कि एक बार पुलिस ने यह भी किया था।

समाज की सामूहिक सोच हमेशा हमारी और आपकी वैयक्तिक सोच से ऊपर होती है। इसलिए न्यायिक व्यवस्था में, कई देशों में ज्यूरी का सिस्टम होता है, जहाँ कई लोग एक केस को सुनते हैं, और अपनी राय देते हैं। वहाँ सिर्फ कानून की दलीलें ही नहीं, संदर्भ और मानसिक अवस्था, सामाजिक व्यवस्था को भी ध्यान में लिया जाता है। आप एक ज्यूरी बिठा दीजिए, पुलिस अगर यह भी कह दे कि उन्होंने जान-बूझ कर एनकाउंटर किया, फिर भी ज्यूरी उन्हें बाइज़्ज़त रिहा कर देगी।

पॉलिटिकली करेक्ट लोग

मानवाधिकारों की बात और न्याय के रास्ते चलने की बात करने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अपराधियों के मानवाधिकार नहीं होते। अगर होते तो वो संवैधानिक स्वतंत्रता का लाभ ले रहे होते, न कि उन्हें जेलों में बंद किया जाता। अब बात यह आती है कि डॉ रेड्डी के बलात्कारी और हत्यारे तो अभियुक्त थे, अपराधी नहीं, वो अब स्वयं को बचाने कैसे आएँगे? सही बात है! लेकिन डॉ रेड्डी को भी तो यही तर्क मिलना चाहिए न? क्या वो जीवित है यह बताने के लिए कि इन चारों ने जो किया, वो कैसे किया? जितनी जानकारी उपलब्ध है, जो पुलिस ने बताया है वो अपने आप में इतनी विश्वसनीय है कि समाज आज उनकी मौत पर फूल बरसा रहा है। पुलिस के पास उनके डीएनए के सैंपल हैं, उसके आधार पर बलात्कार अगर कन्फर्म हो जाता है, तो हत्या भी कन्फर्म हो जाएगी। इसलिए मानवाधिकारों का रोना रोना बंद कीजिए।

कल तक जो लोग कह रहे थे कि जिंदा जला देना चाहिए, हत्या कर देनी चाहिए वो अब ऐसे पलट गए हैं जैसे इन हैवानों के होने से प्याज के दाम कम हो जाते और देश से भुखमरी गायब हो जाती। सनद रहे कि ऐसे लोगों की हत्या से आपकी बहन और बेटियाँ कुछ हद तक सुरक्षित हैं। अब लोग कह रहे हैं कि न्यायिक प्रक्रिया से फाँसी होती तो ठीक रहता! भारतीय क़ानून की किस किताब में अपराधी को जलाने की सजा है? किस किताब में बीच चौराहे पर पत्थर मारने की सजा है?

चूँकि एक एनकाउंटर हो गया है, और आपके भीतर का ‘पोलिटिकली करेक्ट’ हृदय धड़कने लगा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि इस घटना से मिला परिणाम गलत है। घटना गलत हो सकती है, जो कि पुलिस साबित करेगी कोर्ट में लेकिन परिणाम और भी भयावह होते, तो भी समाज को स्वीकार्य होता। हम लोग हर बलात्कार के बाद अपनी संवेदना में बहुत कुछ लिखते हैं, सिस्टम को गाली देते हैं, बताते हैं कि कैसे फलाना बिशप रेप के बाद भी घूम रहा है, लेकिन जब उसी को किसी कारण से जो सजा कोर्ट से मिलती, वो सड़क हादसे में मिल जाए तो क्या आप खुश नहीं होते? इसका मतलब है कि आपको मतलब परिणाम से तो है लेकिन वो गिफ्टरैप में लिपटा हुआ आना चाहिए।

किसी देश में पत्थर मारने की सजा भी तो है, आप ने ही कई बार बलात्कारियों के लिए ऐसी सजा का समर्थन किया है, क्या तब आपके भीतर का वहशीपना बाहर नहीं आ रहा था? पोलिटकिली करेक्ट होने के चक्कर में हम सबने ‘आतंक का कोई मजहब नहीं होता’ भी गाया है। मत गाइए ऐसे गीत। हाँ, यह भी याद रखिए कि जो हुआ है वो अपवाद है, पुलिस हर बलात्कारी को ऐसे ही नहीं मार रही। लेकिन, पुलिस को बिना जाँच के फिल्मी कहानी बनाने वाला कह देना बताता है कि आप कहीं न कहीं बलात्कारियों के पक्ष में हैं। बलात्कारियों के पक्ष में मत रहिए, उनका जाना ही उचित है, तरीका चाहे जो भी हो।

समाज को हक है उबलने का

इसलिए, अगर यह समाज हर दूसरे दिन बलात्कार की जघन्य घटनाओं के बारे में सुनता है, पढ़ता है, उससे दो-चार होता है, तो इस समाज का क्रोध कहीं तो अभिव्यक्त होगा ही। वो कहीं तो रास्ता ढूँढेगा प्रस्फुटित होने का। जब यह समाज देख रहा है कि भले ही कोई न्यायिक प्रक्रिया अपनाए, या तारीखों के चक्कर में घूमता रहे, उसे अपराधी मौका देख कर जला ही देगा, तो फिर वह समाज कल अखबार में यह खबर देख कर खुश क्यों नहीं होगा कि उन्नाव की बेटी के हत्यारों को यूपी पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया।

इसके पीछे पुलिस चाहे कितनी ही वाहियात कहानी क्यों न बना ले, समाज उसे पूरी तरह से माफ करने को तैयार क्यों नहीं रहेगा? उन्नाव की पीड़िता को यही तंत्र सुरक्षा नहीं दे सका, उसके जैसे हजारों को इस तंत्र ने बाहर छोड़ रखा है जो बार-बार अपराध कर रहे हैं, जो संसद में पहुँच गए हैं, जो मंत्री हैं, मुख्यमंत्री हैं… समाज ने इन सबको देखा है।

इसलिए, समाज ऐसे मौकों पर जश्न मनाता है जब वो जानता है कि सही क्या है, गलत क्या है। समाज को अच्छे से पता है कि पुलिस की कहानी में कितना दम है, लेकिन वो ‘विलिंग सस्पेंशन ऑफ डिस्बिलीफ़’ की राह चल पड़ता है और कहता है कि भैया आपकी कहानी बिलकुल सच्ची है, हमें पूरा यकीन है कि उन अपराधियों ने आपकी बंदूक छीन ली होगी, और आप पर गोली चलाई होगी।

ऐसा मानने के लिए समाज को बाध्य भी इसी तंत्र ने किया है। समाज इसलिए किसी भी तरह से गलत नहीं है जब वो इन अपराधियों की मौत पर जश्न मनाता है। इन अपराधियों को मौत के अलावा और कोई सजा मिलनी ही नहीं चाहिए थी। ऐसे लोगों की समाज में जरूरत नहीं है। लोग टैक्निकैलिटीज़ पर सवाल उठाते रहें, लेकिन एक नागरिक के तौर पर, जो हर दिन इसी देश की इसी न्यायिक व्यवस्था को नेताओं के बिस्तर पर, अमीरों के स्वीमिंग पूल में और बड़े वकीलों की जेब में देखता है, तो वो ऐसे दिनों का इंतजार करता है जब हैदराबाद की तर्ज पर उन्नाव की बेटी के लिए भी ‘न्याय’ उन पाँचों, शुभम त्रिवेदी, शिवम त्रिवेदी, राम किशोर त्रिवेदी, हरिशंकर त्रिवेदी और उमेश बाजपाई की लाश के रूप में मिले।

और हाँ, गोली अगर भौंहों के बीचों-बीच लगी हो, तो और भी बढ़िया।

मोदी सरकार ने रेलवे के 32 ‘अक्षम’ वरिष्ठ अधिकारियों को किया जबरन रिटायर

आम धारणा है कि सरकारी नौकरी से रिटायर होने की उम्र 60-62 साल मानी जाती है, लेकिन सरकार को यदि ऐसा लगे कि कोई कर्मचारी 50 की उम्र पार कर लेने के बाद अपने काम को ठीक से अंजाम नहीं दे पा रहा है तो वह 50 के बाद ही उस कर्मचारी को पेंशन पर भेज सकती है। इन नियम का इस्तेमाल करते हुए मोदी सरकार ने हाल ही में 32 रेलवे अफ़सरों को रिटायर कर दिया है। यह जानकारी राज्य सभा में सरकार ने खुद दी है।

कार्मिक मामलों के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने एक सवाल के जवाब में कल (बृहस्पतिवार, 5 दिसंबर, 2019 को) बताया कि रिटायर किए गए 32 लोगों में 22 कर्मचारी निदेशक (डायरेक्टर) और उससे ऊँचे पदों पर आसीन थे। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने सरकारी अधिकारियों के हवाले से यह दावा किया है कि हालाँकि एक तय उम्र के बाद सामयिक समीक्षा सरकारी कमर्चारियों की सेवा शर्तों का हिस्सा तो है, लेकिन इसका इस्तेमाल बहुत कम होता है। हाल-फ़िलहाल में इसके पहले भी रेलवे में इसका इस्तेमाल करने वाली मोदी सरकार ही थी, जब 2016-17 में 4 ऐसे कर्मचारियों को रिटायर कर दिया था।

1780 पर लटकी थी तलवार, पिछली बार 1824

रेलवे के अनुसार 2016-17 में ग्रुप A के कर्मचारियों के बीच उम्र के तकाज़े से अक्षम और अकुशल की छँटनी में 1824 लोगों के प्रदर्शन को जाँचा-परखा गया था, लेकिन अंत में गाज केवल 4 पर ही गिरी। इस बार उसके मुकाबले केवल 1780 लोग ही रडार पर थे, लेकिन 32 की गर्दन नप गई है। अभी यही प्रक्रिया विभिन्न जोनों में गैर-राजपत्रित (नॉन-गज़ेटेड) और JAG स्तर के अधिकारियों के साथ अपनाई जाएगी।

इस बाबत जितेंद्र सिंह ने संसद को सूचित किया कि 220 भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों को मोदी सरकार ने इसके इस्तेमाल से 5 साल में चलता किया है। इनमें से 96 वरिष्ठ अधिकारी थे। उनके लिखित जवाब के अनुसार 96 ग्रुप A के और 126 ग्रुप B के अधिकारियों को विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से सरकार ने सेवा के मूलभूत नियमों (फंडामेंटल रूल्स) में नियम FR 56 (j) के इस्तेमाल से बाहर का रास्ता दिखाया है। यह नियम सरकार को पूरा अधिकार देता है कि किसी सरकारी अधिकारी को अक्षमता, या ईमानदारी के अभाव में ‘सार्वजनिक हित के लिए’ रिटायर कर दे। सिंह के अनुसार इस नियम का इस्तेमाल सरकार की कुशलता में बेहतरी सुनिश्चित करने के लिए किया गया है।

‘अल्लाह का कानून सबसे ऊपर, रामराज्य शिर्क, जामिया के छात्रों ने अयोध्या के फैसले को बताया मजाक’

‘जामिया के छात्र’ नामक जामिया मिलिया इस्लामिया का एक कथित छात्र संगठन ने एक ऐसी बैठक के लिए पोस्टर जारी किया है जो मजहब विशेष के लोगों से राजनीतिक रूप से अल्लाह के कानून द्वारा ‘शासन स्थापित करने’ के लिए संगठित होने का आह्वान करता है।

‘जामिया के छात्रों’ ने अपने फेसबुक पेज पर कहा है कि विश्वविद्यालय के पॉलिटेक्निक लॉन में आज शुक्रवार 6.40 बजे, ‘अल्लाह की आज्ञा हर कानून से ऊपर है’ (“The Command of Allah Is Over Every Law”) शीर्षक से एक निर्धारित बैठक आयोजित की थी।


Students of Jamia

संगठन के फेसबुक पेज द्वारा साझा किए गए इवेंट के पोस्टर में दावा है कि “बाबरी मस्जिद एक मस्जिद है और ऐसा ही रहेगा, ऐसा न हो कि हम भूल जाएँ।”

संगठन द्वारा साझा किया गया एक अन्य पोस्टर यह घोषणा करता है कि ‘अल्लाह का कानून सभी से ऊपर है’ और यह भी कहता है कि ‘बाबरी मस्जिद एक मस्जिद रहेगी’।


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संगठन ने यह भी स्पष्ट रूप से घोषणा करते हुए पोस्ट साझा किए हैं कि वे ‘अल्लाह के कानून’ के सिवा कोई कानून नहीं मानते हैं। 29 अक्टूबर को साझा किए गए उनके एक पोस्ट में कहा गया है, “पूरी दुनिया कई आधारों पर विभाजित है। रंग, नस्ल और और इन सबसे ऊपर राष्ट्रीयता के आधार पर। लोग देश के आधार पर अपने रंग या अपने प्रजाति के आधार पर दूसरों के प्रति प्रेम और शत्रुता रखते हैं।”

यह आगे कहा गया है कि अल्लाह में विश्वास जुड़े रहने का सबसे शानदार तरीका है, राष्ट्रीयता या जन्म की तुलना में। यह अल्लाह के सभी विश्वासियों को अल्लाह के प्रति विश्वास के आधार पर फिलिस्तीनियों के साथ सहानुभूति रखने के लिए कहता है और इसलिए इजरायल को दुश्मन की तरह ट्रीट करने को कहा गया है।


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15 नवंबर को साझा किए गए एक अन्य पोस्ट में संगठन के अनुयायियों को यह याद दिलाने की कोशिश की गई है कि जो कोई उनके साथ असहमत था, वह अब पूरे दिल से सहमत होगा। संदर्भ अयोध्या का फैसला था, जिसे 9 नवंबर को घोषित किया गया था। पोस्ट में कहा गया है, “अदालत और अन्य संस्थान के पीछे के कई दुष्चक्र हैं। इसके पीछे गंदी डार्क रियलिटी है और हमें इससे पहले ही इसका खुलासा करने की जरूरत है। क्योंकि तब बहुत देर हो चुकी होगी।” 


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इस पोस्ट को पिछले साल 6 दिसंबर, 2018 को बाबरी मस्जिद विध्वंस की सालगिरह पर उनके फेसबुक पेज पर पोस्ट किया गया था जिसे इस साल फिर से साझा किया गया था।

बाबरी विध्वंस दिवस पर साझा की गई 2018 की पोस्ट ने घोषणा की गई थी कि 1948 से, भारत में ब्राह्मणवादी शासन चल रहा है और ये शासन उत्पीड़न, और अन्याय’ की बात करता है। इसमें आगे कहा गया है कि बाबरी विध्वंश, दरअसल उम्मा अर्थात (पूरे विश्व में इस्लाम का शासन) के पतन का प्रतीक था।

इसमें कहा कि रामराज्य कुछ और नहीं बल्कि शिर्क (अत्याचारी, गैर मजहबी) का झंडा और बाबरी विध्वंस तौहीद अर्थात न्याय के झंडे के पतन के अलावा और कुछ नहीं है।

“मु###नों के नेतृत्व का दावा करने वाले और एक झूठी आशा देते हुए कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट या किसी भी कानून द्वारा अपने वर्ग के लाभ के लिए उन लोगों के एक झुंड द्वारा लिखा जा रहा है (जिनकी वैधता कभी भी उन सभी के द्वारा ही स्वीकार नहीं की गई है) उन्हें पता होना चाहिए कि कृत्रिम कानून, शक्तियाँ, लोग और अदालतें बदल जाएँगी और गायब हो जाएँगी लेकिन मस्जिद के मस्जिद होने की वास्तविकता क़यामत तक बनी रहेगी।”

जिस तरह से यरूशलेम में मस्जिद अल अक्सा को इजरायल ने ‘कब्जे’ में ले लिया है उसी तरह से बाबरी मस्जिद भी कब्जे में है। इस बात की भी घोषणा है, “न्याय तब तक दूर है जब तक तौहीद का झंडा और अल्लाह की कलमा सभी पर हावी नहीं होता है।”


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गौरतलब है कि विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने नाम न छापने की शर्त के पर कहा है कि इस संगठन के छात्र परिसर के अंदर नियमित बैठकें करते हैं, और इस समूह द्वारा आयोजित ‘फ्रेशर्स मीट’ आयोजनों में से एक में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के दो प्रोफेसर भी शामिल हुए हैं। जो की संस्था में अतिथि वक्ताओं के रूप में जुड़े हैं, ऐसा दावा किया गया है। 

छात्रों ने कहा कि समूह अपनी गतिविधियों और बैठकों को निर्बाध रूप से और विश्वविद्यालय प्रशासन के संज्ञान में चलाता आया है। उनके बयान अक्सर भारतीय पहचान को तोड़फोड़ और मजहबी पहचान को गले लगाने के लिए उकसाते हैं। उन्होंने कथित तौर पर ऐसी घटनाओं का भी आयोजन किया था जहाँ उन्होंने फिलिस्तीन के समर्थन की घोषणा की थी और इजरायल की निंदा की थी।

समूह द्वारा साझा की गई 4 अक्टूबर की पोस्ट वास्तुकला संकाय में एक इज़राइल द्वारा प्रायोजित घटना की निंदा करती है और कहती है कि इजरायल द्वारा किसी भी कार्यक्रम की अनुमति देना विश्वविद्यालय के संस्थापक सिद्धांतों के खिलाफ है।

छात्रों ने यह भी जोड़ा कि विश्वविद्यालय का एक नियम है कि प्रशासन की अनुमति के बिना कैंपस लॉन पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की मनाही है, यह विशेष समूह ‘जामिया के छात्र’ लगभग हर शुक्रवार को ऐसी बैठकें आयोजित करते रहे हैं।

जब ऑपइंडिया ने जामिया मिलिया इस्लामिया के जनसंपर्क अधिकारी, अहमद अज़ीम से बात करने की कोशिश की, तो हमें बताया गया कि उन्हें इस तरह के किसी भी आयोजन की जानकारी नहीं है और विश्वविद्यालय अपने परिसर को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने की मंजूरी नहीं देता है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी छात्र समूह के कार्यक्रम में, परिसर के अंदर किसी भी लॉन या मैदान का उपयोग करने से पहले विश्वविद्यालय प्रॉक्टर से अनुमति लेनी होगी।

छात्रों के समूह के फेसबुक पेज पर एक नज़र बताता है कि वे वास्तव में इस्लामिक दृष्टिकोण से विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करने के लिए लगभग हर हफ्ते बैठक करते रहे हैं। यहाँ उनकी पिछली बैठकों के एजेंडे पर समूह द्वारा साझा किए गए कुछ पोस्टर हैं।



Students of Jamia past meetings

पोस्टर में से साथी छात्रों के लिए “आज का सलाउद्दीन होना” और “अल-कुद्स की मुक्ति (यरूशलेम के लिए इस्लामी नाम)” के लिए खड़े होने को कहता है। एक अन्य पोस्टर जिसका शीर्षक है ‘कौन आपका कानून बनाने वाला डिज़र्व करता है?’  ‘अल्लाह के सिवा कोई और नहीं।’

RSS की किस शाखा में जाते हो? राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने कर्मचारियों से पूछा

ऐसा प्रतीत हो रहा है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ाव को एक बार फिर ‘गुनाह’ बनाने का दुष्चक्र शुरू हो चुका है। नेहरू और गाँधी जो दमन नहीं कर पाए उसे करने की कोशिश अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार कर रही है। अजमेर में जिला प्रशासन ने सरकारी कर्मचारियों से घोषणा-पत्र के जरिए यह बताने को कहा है कि वे संघ की किस शाखा में जाते हैं।

एडिशनल डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर कैलाश चंद्र शर्मा ने सर्कुलर जारी किया है। कर्मचारियों से उनकी निजी जानकारी और वे संघ की किस शाखा से जुड़े हैं, यह पूछा गया है। टाइम्स नाउ ने सूत्रों के हवाले से बताया है की यह आदेश सभी जिलों को ऊपर से दिया गया है। इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि गंगापुर सिटी (सवाईमाधोपुर) के विधायक रामकेश मीणा ने विधानसभा में इस साल सवाल पूछ कर इसकी जानकारी माँगी थी। उन्होंने न केवल संघ की शाखाओं और उनमें जाने वाले सरकारी कर्मचारियों के बारे में पूछा था, बल्कि उनके सवाल का हिस्सा यह भी था कि सरकार आरएसएस का हिस्सा बने सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बारे में क्या विचार रखती है।

उत्तरी अजमेर से भाजपा के विधायक और पूर्ववर्ती वसुंधरा राजे सरकार में शिक्षा मंत्री रहे वासुदेव देवनानी ने गहलोत सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे राज्य में कर्मचारियों के बीच अघोषित आपातकाल लाने की कोशिश करार दिया है। उन्होंने पूछा कि जब किसी सामाजिक संस्था में शामिल होने पर कोई रोक नहीं है, तो फिर सरकार ऐसा स्व घोषणा-पत्र सरकार क्यों माँग रही है। गौरतलब है कि आरएसएस एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है। आज़ादी के दो दशक पहले हुई स्थापना से लेकर आज तक यही इसका स्वरूप और स्वभाव है।

यहाँ यह याद दिलाया जाना ज़रूरी है कि कॉन्ग्रेस भले ही संघ को ‘नाज़ी’ बताती है, लेकिन उसकी राज्य सरकार का यह कदम खुद खालिस फासीवाद है। इटली और जर्मनी, दोनों ही देशों में फासीवादी शासकों मुसोलिनी और हिटलर के उदय के समय ऐसे ही कदम उठाए गए थे। कम्युनिस्टों, समलैंगिकों, यहूदियों समेत ‘अवांछित’ समूह के संगठनों से ताल्लुक रखने वाले लोगों को चिह्नित किया गया था, जिसके बाद पहले उनके संगठन अवैध घोषित किए गए, फिर उन्हें ही ‘अवैध’ घोषित कर हत्याकाण्ड शुरू कर दिया गया।

उबर को सेक्स क्राइम की 5981 शिकायतें मिली: 464 के साथ रेप, 19 हत्याएँ भी

उबर को 2017 से 2018 के बीच यौन उत्पीड़न की 5,981 शिकायतें मिली। इसमें से 464 मामले रेप के हैं। यह पहला मौका है जब उबर ने इस तरह के आँकड़े जारी किए है। यह आँकड़ा केवल अमेरिका का है। सीएनएन के मुताबिक 84 पन्नों की रिपोर्ट में बताया गया है कि रेप पीड़ितों में से 92 फीसदी सवारी और 7 फीसदी चालक थे। रिपोर्ट में कंपनी से जुड़े 19 जानलेवा मामलों का भी खुलासा किया गया है। उत्पीड़न की बढ़ती शिकायतों के कारण उबर और उसकी प्रतिद्वंद्वी ‘लिफ्ट’ पर लगातार इनसे निपटने का दबाव बढ़ रहा है।

कंपनी को 2017 और 2018 में कुल मिलाकर बलात्कार के प्रयास की 587 शिकायतें मिली। उत्पीड़न के अन्य मामले बिना सहमति के छूने और चुंबन से संबंधित हैं। रिपोर्ट के अनुसार, “उबर ने 2017 से 2018 के बीच पॉंच सबसे गंभीर श्रेणी के यौन उत्पीड़न मामलों में 16 प्रतिशत गिरावट दर्ज की है। सभी पॉंच श्रेणियों में गिरावट दर्ज की गई है।”

उबर की रिपोर्ट के अनुसार 2017 में जानलेवा शारीरिक उत्पीड़न के 10 और 2018 में नौ मामले सामने आए।उबर ने कहा कि मारे गए लोगों में आठ सवारियॉं, सात चालक और चार तीसरे पक्ष यानी आसपास के लोग थे। 2017 में यौन हिंसा के 2,936 और 2018 में 3,045 मामले सामने आए। हालाँकि उबर का कहना है कि जिस बड़े पैमाने पर वह सेवा दे रही है उस लिहाज से अपराध का आँकड़ा बहुत ही कम है। अमेरिका में उबर ने पिछले साल 1.3 बिलियन लोगों को सेवा मुहैया कराई था। इतनी बड़ी संख्या में सवारी के लिहाज से अपराध का आँकड़ा एक फीसदी से भी काम बैठता है।

गौरतलब है कि 2017 में उबर का एक मामला भारत में भी बेहद सुर्खियों में रहा था। एक महिला ने सफर के दौरान रेप और यौन हिंसा की शिकायत उबर चालक के खिलाफ दर्ज करवाई थी। बाद में उसने उबर पर भी केस कर दिया था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार महिला ने आरोप लगाया था कि उबर ने उसके मेडिकल रिकॉर्ड्स के साथ छेड़छाड़ की थी। हालॉंकि बाद में दोनों के बीच समझौता हो गया था।

अमेरिका में एक साल पहले सीएनएन ने उबर सवारी के दौरान यौन हिंसा को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी। इससे पता चला था कि बीते चार साल के दौरान अमेरिका में उबर के 103 ड्राइवर के खिलाफ सवा​री ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी। यह पहला मौका था जब अमेरिका में उबर सफर के दौरान सुरक्षा का मुद्दा गरमाया था।

गैंगरेप पीड़िता की अर्ध-नग्न लाश: टूटी उंगलियाँ, आँखें बाहर निकली हुईं – शाबोद्दीन, शेख बाबू, मकदूम ने कबूला जुर्म

‘वो छटपटा रही थी, मैं रेप कर रहा था, मरने के बाद भी… फिर बेटी के साथ भी’ – नसीरुद्दीन का कबूलनामा

दलित महिला की गैंगरेप के बाद हत्या: बाबू, शहाबुद्दीन और मकदूम ने कबूला जुर्म

हम क्रिमिनल नहीं नेता हैं, फिर भी कर रहे ऐसा सलूक: फ़ारूख़ अब्दुल्ला का दर्द-ए-लेटर

कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने नेशनल कॉन्फ़्रेंस के पूर्व अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूख़ अब्दुल्ला का एक पत्र ट्वीट किया है। पत्र का मजमून यह है कि अधिकारी टाइम पर फारूक साहब को लेटर भी नहीं दे रहे। घर में नजरबंद कर ऐसा सलूक किया जा रहा है जैसे नेता नहीं वे अपराधी हों।

थरूर ने यह पत्र ट्वीट कर लिखा है, “कैद फारूख़ साब का पत्र है। संसद सदस्यों को संसद सत्र में भाग लेने की अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि उन्हें इस मामले में संसदीय विशेषाधिकार मिला हुआ है। अन्यथा गिरफ्तारी का इस्तेमाल विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए किया जा सकता है। संसद में भागीदारी लोकतंत्र और लोकप्रिय संप्रभुता के लिए आवश्यक है।”

फारूक अब्दुल्ला ने पत्र में लिखा है, “आपका (शशि थरूर) पत्र आज मुझे मजिस्ट्रेट के हाथों मिला। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि वे मेरा डाक भी समय से नहीं देते। एक वरिष्ठ सांसद और पार्टी नेता के साथ ऐसा सलूक करने का यह कोई तरीका नहीं है। हम क्रिमिनल नहीं हैं।”

गौरतलब है कि अगस्त में आर्टिकल 370 के तहत मिले जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त कर मोदी सरकार ने राज्य को दो क्रेंदशासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया था। फैसले से पहले एहतियातन राज्य में सक्रिय दलों के नेताओं और अलगावादियों को हिरासत में लिया गया था। कई नेताओं को उनके घर में ही नजरबंद कर दिया था। ऐसे नेताओं में अब्दुल्ला और मुफ़्ती परिवार के राजनीतिक रूप से सक्रिय सदस्य भी हैं। इन्हें बीच में मोदी सरकार ने मौका दिया था कि घाटी में हिंसा न भड़काने, शांति-व्यवस्था में सहयोग करने की शर्त पर इनकी रिहाई सम्भव है। लेकिन न ही अब्दुल्ला और न ही मुफ़्ती घराने ने इसे स्वीकार किया था।

थरूर के इस ट्वीट के बाद लोगों का ट्विटर पर गुस्सा फूट पड़ा है और वे अब्दुल्ला की जम कर आलोचना कर रहे हैं। एक व्यक्ति ने उन्हें अपराधियों से भी गया-बीता बता दिया। आरोप लगाया कि अब्दुल्ला के शासनकाल में न केवल कश्मीर में जिहाद को बढ़ावा दिया गया, बल्कि जम्मू को लूटा भी गया।

एक अन्य यूज़र ने पूछा कि फ़ारूख़ अब्दुल्ला और सोनिया गाँधी तब क्या कर रहे थे, जब कश्मीर में हिन्दू पुरुषों और बच्चों का हत्याकाण्ड चल रहा था, महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार हो रहा था। हालाँकि इस यूज़र ने जो आँकड़े दिए हैं वे अतिशयोक्ति से भरे हैं।

एक यूज़र ने कहा है अब्दुल्ला लिखित आश्वासन दें कि वे देश-विरोधी गतिविधियों में हिस्सेदारी नहीं करेंगे।

फ़ारूख़ अब्दुल्ला ने राम मंदिर पर दिया बेहद भावनात्मक बयान- कहा इजाज़त मिलने पर खुद लगाऊँगा मंदिर की ईंट

जाते-जाते जेटली गिना गए नेहरू और अब्दुल्ला की करतूतें, लिखा- ‘यह नया भारत है, बदला हुआ भारत है’

फारुख अब्दुल्ला पर फूटा कश्मीरी पंडितों का गुस्सा, मंदिर में घुसने से रोका और भगाया

हैदराबाद एनकाउंटर: आरिफ ने पुलिस से छीने थे हथियार, कर्नाटक में भी अपराधों को अंजाम दे चुके थे प्रीति रेड्डी के गुनहगार

हैदराबाद में पशु चिकित्सक प्रीति रेड्डी (बदला हुआ नाम) की गैंगरेप के बाद हत्या करने वाले चारों आरोपित कर्नाटक में भी कई अपराधों में शामिल थे। यह संदेह साइबराबाद पुलिस ने जताया है। अभियुक्तों को एनकाउंटर में मार गिराए जाने को लेकर हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पुलिस ने यह बात कही। साइबराबाद के पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनर ने कहा कि प्रीति रेड्डी के साथ हुई वारदात को सूक्ष्मता से समझने के लिए पुलिस चारों आरोपितों को घटनास्थल पर लेकर गई थी। वहॉं उन्होंने पहले पुलिस पर लाठियों से हमला किया। इसके बाद पुलिस के हथियार छीन उन पर फायरिंग की।

साथ ही उन्होंने कहा कि पुलिस को शक है कि चारों आरोपित आरिफ, केशवुलु, शिवा और नवीन कर्नाटक में भी कई आपराधिक मामलों में शामिल हो सकते हैं। उन्होंने साफ़ किया कि जाँच जारी है।

पुलिस ने बताया कि वैज्ञानिक तरीके से जॉंच के बाद ही चारों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर हुई थी। इसके आधार पर ही कोर्ट ने 10 दिन की न्यायिक हिरासत दी थी। पुलिस के मुताबिक 4 और 5 दिसंबर को आरोपितों से पूछताछ की गई। शुक्रवार सुबह सीन रीक्रिएशन के लिए चारों आरोपियों को घटनास्थल पर लेकर पुलिस गई थी। आरिफ ने पुलिस से हथियार छीने। डंडे और पत्थर से पुलिस पर हमला भी किया और भागने की कोशिश की। दो आरोपितों ने पुलिस के ऊपर गोली भी चलाई। घटना 5.45 से 6.15 के बीच हुई।

गौरतलब है कि जिस जगह डॉ. रेड्डी की लाश बरामद हुई थी, उस जगह अन्य महिलाओं की जली हुई लाशें भी मिलने की बात स्थानीय मीडिया में आई थी। उनमें से एक लाश को लेकर पुलिस ने कहा था कि फॉरेंसिक साक्ष्य देख कर प्राथमिक तौर पर लग रहा है मानसिक रूप से बीमार मृतका ने शायद आत्महत्या कर ली होगी। यह ‘एंगल’, कि आरोपित ऐसे ही अपराधों को अंजाम दे रहे किसी बड़े गैंग का हिस्सा हो सकते हैं, इस दावे से फिर से ताज़ा हो गया है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) द्वारा आज की घटना का स्वतः संज्ञान लेने पर सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि पुलिस घटना का संज्ञान लेने वाले सभी पक्षों को उत्तर देगी- भले ही वह राज्य सरकार हो या एनएचआरसी।

प्रीति रेड्डी मर गई फिर भी रेप करते रहे दरिंदे: आरिफ के प्लानिंग की पूरी डिटेल

आरिफ ने ‘प्रीति रेड्डी’ का मुँह-नाक दबाया, उसी ने डेड बॉडी पर पेट्रोल डाला: पुलिस की रिपोर्ट में भयावह खुलासे

मारे गए सभी आरोपित: पुलिस ने वहीं किया एनकाउंटर, जहाँ ‘प्रीति रेड्डी’ के साथ किया था जघन्य अपराध

मिथिला की नई सीताएँ: छेड़खानी कर रहे युवक का किया ऑन स्पॉट फ़ैसला, पिटाई का वीडियो वायरल

एक तरफ जहाँ पूरा देश बलात्कार और हत्या के मुद्दे पर उबल रहा है, वहीं बिहार के दरभंगा में कुछ छात्राओं ने मिलकर छेड़छाड़ करने वाले एक मनचले को बिना देरी किए ऑन स्पॉट ही फ़ैसला सुना दिया। फ़ैसला भी ऐसा जिसे याद कर आरोपित अब शायद ही ज़िंदगी में फिर किसी अन्य महिला को छेड़ने का दुस्साहस करे। 

दरअसल, सोशल मीडिया पर एक वीडियो बड़ी तेज़ी के साथ वायरल हो रहा है। दरभंगा के ललित नारायरण मिथिला विश्वविद्यालय के कमला पीजी गर्ल्स हॉस्टल की एक छात्रा के साथ बीते बुधवार (4 दिसंबर) को छेड़खानी की एक घटना हुई थी। पीड़ित छात्रा ने बताया कि बेलवागंज के एक लड़के ने लड़कियों के हॉस्टल के पास ही उससे छेड़खानी की थी। काफ़ी देर तक वो छात्रा के सामने अश्लील हरक़तें करता रहा। इस बात से नाराज़ छात्राओं ने उस युवक को सबक सिखाने का मन बनाया।

इसके बाद एक साथ कई छात्राओं ने मिलकर अश्लील हरक़तें करने वाले शख़्स को जूते-चप्पलों से पिटाई करके सबक सिखाया। विश्वविद्यालय थाने की पुलिस को जब घटना की सूचना मिली तो वो उस मनचले को पकड़कर थाने ले गईं। पीछे-पीछे छात्राएँ भी थाने पहुँची, जहाँ उन्होंने मनचले के ख़िलाफ़ शिक़ायत दर्ज करवाई।

इसके बाद हॉस्टल सुपरिटेंडेंट डॉ लावण्य कीर्ति सिंह काव्या भी वहाँ पहुँची, जहाँ उन्होंने छात्राओं को समझा-बुझाकर हॉस्टल वापस भेजा। सुपरिटेंडेंट ने कहा कि दो दिन पहले भी कमला हॉस्टल के पास एक मनचले ने छात्रा और सिक्योरिटी गार्ड के साथ बदतमीज़ी की थी। छात्राओं के अनुसार, उनके हॉस्टल के बाहर अक्सर लड़के अश्लील हरक़तें करते हैं और उन पर भद्दी टिप्पणियाँ भी करते हैं। उन्होंने शिक़ायत की कि उनके हॉस्टल के बाहर सुरक्षा गार्ड भी मौजूद नहीं रहता। इस सन्दर्भ में विश्वविद्यालय प्रशासन से भी कई बार शिक़ायत की, लेकिन उस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

ख़बर के अनुसार, विवि थाना प्रभारी पवन कुमार सिंह ने बताया कि छात्राओं की ओर से सामूहिक शिक़ायत दर्ज कराई गई है। फ़िलहाल आरोपित पुलिस की हिरासत में है और उससे पूछताछ जारी है। वहीं, एसएसपी बाबू राम ने बताया कि सामूहिक शिक़ायत में हॉस्टल के आसपास संदिग्ध गतिविधियों का उल्लेख किया गया। उन्होंने बताया कि आरोपित के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।