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हैदराबाद एनकाउंटर पर रवीश कुमार के प्राइम टाइम की स्क्रिप्ट हुई लीक, NDTV में मचा हड़कम्प

सुबह हैदराबाद एनकाउंटर के बाद दोपहर में NDTV के पत्रकार रवीश कुमार के शाम वाले प्राइम टाइम की स्क्रिप्ट लीक हो गई, जिसकी एक कॉपी हमारे एक सुप्त सूत्र के हाथ लगी। हालाँकि, ऑपइंडिया इसकी सच्चाई की कोई जिम्मेदारी नहीं लेता। हम उस स्क्रिप्ट को ज्यों का त्यों आपके लिए रख रहे हैं।

नमस्कार, मैं रवीश कुमार!

याद आ रहे हैं वेद प्रकाश शर्मा जिन्होंने 1992 में ‘वर्दी वाला गुंडा’ नामक कालजयी उपन्यास लिखा था जिसकी 15 लाख प्रतियाँ पहले ही दिन बिक गई थी, और कुल 8 करोड़ प्रतियाँ आज तक बिकी हैं। मेरी किताब ‘इश्क में शहर होना’ की 8 हजार बिकी हैं। ख़ैर, अपने बारे में मैग्सेसे अवार्ड के बाद ज्यादा बोलना उचित नहीं समझता।

आज सुबह की खबर सुनी कि हैदराबाद में पशु चिकित्सक के बलात्कार और हत्या के मामले के चार आरोपितों को पुलिस ने आत्मरक्षा में मार गिराया। पुलिस इसे मुठभेड़ कह रही है। पुलिस का क्या है, वो चाहे तो इसे फिल्म की शूटिंग भी कह सकती है और इन चार लालों की माँओं को कह सकती है कि उनका बेटा जिंदा है और जेल में बंद है, बस मिलने नहीं दे सकते।

आप सोचिए उस माँ की हालत जिसके घर का एकमात्र कमाने वाला चला गया। आप सोचिए उस माँ की हालत जो पहले ही अपने बेटे पर लगे आरोपों के कारण परेशान थी कि उन्हें भारत की इस लम्बी न्यायिक प्रक्रिया से लड़ना है, अब वो किसके लिए वकील लाएगी? आप सोचिए क्विंट के उस रिपोर्टर की मानसिक स्थिति जिसे फिर से उसी माँ से पूछना पड़ेगा कि अपने घर के एकमात्र कमाने वाले हाथ का पुलिस के मुठभेड़ में, इस एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल हत्या का किरदार बनने पर कैसा लग रहा है!

मैंने तो सोचा था कि आज मैं दर्शकों को महाराष्ट्र सरकार की एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा अजित पवार को बाइज़्ज़त क्लीन चिट देने के ऊपर बताऊँगा कि उन्हें किस तरह से फड़णवीस सरकार ने न सिर्फ फँसाया था बल्कि पाँच साल का नकली शासन भी किया, लेकिन सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं। उसी ब्यूरो ने उद्धव ठाकरे की सरकार आते ही क्लीन चिट दे दी, जो बताता है कि भाजपा अपने विरोधियों को हर हाल में जेल में डाल कर ही राज करना चाहती है।

लेकिन भाजपा वालों से यह देखा नहीं गया, और हैदराबाद की पुलिस ने मोदी और शाह के दवाब में आ कर किसी फिल्मी कहानी की तरह इन चार मासूमों को बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के मुँहअँधेरे में घेर कर गोली मार दी। अब आप कहेंगे कि रवीश जी, आप ये किस आधार पर कह रहे हैं कि मुठभेड़ झूठा है? आप यह भी पूछेंगे कि जिस तर्क से मैं बलात्कारियों को पूरी न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने की बात कह रहा हूँ, वैसे ही पुलिस को भी जाँच करने का पूरा हक है, फिर उन्हें एक लाइन में झूठा क्यों कहा जा रहा है।

मेरा जवाब है कि मैं संघियों से बात नहीं करता। मैं उनके मुँह ही नहीं लगता। तुम सब आईटी सेल वाले हो जिसे मोदी ने मुझे घेरने के लिए भेजा है। मुझे ऐसे ही मैग्सेसे और लंकेश अवार्ड नहीं मिला है। मैंने बार-बार, अपनी सहूलियत के हिसाब से सवाल पूछे हैं, जिसमें मैंने जय शाह से ले कर शौर्य डोभाल और जस्टिस लोया की बातें की हैं। सवाल का जवाब जरूरी नहीं है, सवाल जरूरी है क्योंकि सवालों से ही लोकतंत्र चलता है। सुप्रीम कोर्ट की बात भी तभी तक मानी जाए, जब तक वो मेरे मतलब की है क्योंकि हर व्यक्ति के पास सोचने की क्षमता होती है, उसे किसी सुप्रीम कोर्ट या पुलिस के तर्कों की ज़रूरत नहीं होती।

ये मानवाधिकारों का हनन है जहाँ पुलिस ने इन मासूम बच्चों को एक झूठी कहानी सुना कर, फुसला कर घुप्प अँधेरे में ले जाती है, और वहाँ कहती है कि वो भागने की कोशिश कर रहे थे! आप बताइए कि अंधेरे में वो कैसे भागते भला? दोपहर में तो उन्हें रास्ता भी दिखता लेकिन मानसिक यातनाओं से परेशान ये बच्चे उस जगह पर से कैसे भागते, किस दिशा में भागते? क्या उनके पास कोई जीपीएस था जो उन्हें राह बताता? ये सब सवाल हैं जो एक लोकतंत्र में पूछा जाना चाहिए। और ये सवाल मोदी और शाह से पूछा जाना चाहिए।

आप कहेंगे कि पुलिस तो स्टेट सब्जेक्ट है! जी, है स्टेट सब्जेक्ट लेकिन ये मानसिकता कहाँ से आई है? पुलिस तो डभोलकर, पनसरे, कलबुर्गी, गौरी लंकेश और अखलाख मामले में भी गैरभाजपा की थी, लेकिन हमने फिर भी तय किया कि जहाँ सीधे तौर पर भाजपा या मोदी पर आरोप लगाना संभव न हो, हम ये तो कह ही सकते हैं कि अपराधी भाजपा की नीतियों से प्रेरित था! हम ये तो कह ही सकते हैं कि अखलाख को मारने वाले लोग वो थे जिन्होंने विधानसभा चुनावों में सपा को वोट दिया था, और लोकसभा में मोदी को… आखिर पत्रकार थोड़ी कल्पनाशीलता न दिखाए तो उसे मैग्सेसे तो छोड़िए शैम्पू का सेशै भी नहीं मिलेगा! बात करते हैं!

कोई मुझे ये बता दे कि विवाह की पार्टियों में व्यस्त तेलंगाना मुख्यमंत्री केसीआर जी के पास क्या इतना समय रहा होगा कि वो उस ‘डीजे… डीजे… प्रतापगढ़… छलकत हमरो जबनिया ऐ राजा’ इस वाले शोर में साइबराबाद पुलिस से बात भी कर पाए होंगे? फिर पुलिस का मुखिया किसको फोन करेगा? जी, केन्द्र के गृह मंत्रालय को। फिर बात क्या हुई होगी?

‘ऊपर’ आवाज आई होगी कि निपटा दो। और निपटाने की बात क्यों कही गई होगी? क्योंकि उसमें एक अल्पसंख्यक है जो कि हजार कारणों से उस दिन वहाँ हो सकता था! हमने विदेशी मामलों में कई बार देखा है कि आरोपित कभी-कभी मानसिक दवाब में, शारीरिक जरूरत के प्रभाव में, एक सेक्सुअली कुंठित समाज में अपनी इच्छा को पूर्ण होते न देख कर ऐसी गलतियाँ कर बैठता है।

मोहम्मद आरिफ और बाकी के तीन लोगों ने हो सकता है यही किया हो। जर्मनी में एक ऐसा मामला सामने आया था जहाँ एक बच्चे का बलात्कारी एक इराकी शरणार्थी था जिसे ‘सेक्सुअल इमरजेंसी’ लगी थी तो उसने बच्चे का रेप कर दिया। उसे डिपोर्ट भी नहीं किया गया क्योंकि वो डिप्रेशन में था। उसे मामूली सजा दी गई थी। जर्मनी गोरे लोगों का देश है, सभ्य लोगों का देश है, वहाँ बलात्कारी के हर मनोभाव की पूरी जाँच होती है, तब जा कर सजा दी जाती है। हम लोग कौन हैं? हम लोग वो हैं जहाँ के न्यायालय का न्यायाधीश संदिग्ध परिस्थितियों में मारा जाता है, और न्यायालय कहता है सब ठीक है।

हम यह नहीं देख पा रहे कि कोई अल्पसंख्यक समुदाय का बच्चा आखिर क्या सोच रहा होगा जब उसने ऐसा किया होगा। आप देखिए कि कथित तौर पर उसने पूरी योजना बनाई कि वो कब आती है, कब जाती है, किस वाहन का उपयोग करती है। इसका मतलब है कि उसे अगर सही विद्यालय में रखा जाता, उसे तर्कशास्त्र पढ़ाया जाता, उसे योजना बनाने वाली बातें पढ़ाई जातीं तो वो बेहतरीन छात्र हो सकता था।

लेकिन आरिफ, नवीन, केशव, शिवा सब गरीब थे। और आप गरीब हैं तो आपको शिक्षा कहाँ मिलेगी! आपके लिए जो एक जगह थी, जेएनयू, वहाँ भी महीने के तीन सौ रुपए लिए जाएँगे! यही है सत्य इस सभ्य समाज का, इस देश का जहाँ विक्रम लैंडर ठीक से लैंड नहीं करा पाते इसरो वाले और उन पर करोड़ों ऐसे फूंका जाता है जैसे फ्री का पैसा हो। क्या वो पैसा जेएनयू जैसे संस्थानों को दे कर ऐसे योजनाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए नहीं दिया जा सकता था?

आप ये तो देखिए कि आरिफ ने बलात्कार कर के छोड़ा ही नहीं, उसे जलाया भी ताकि सबूत नष्ट हो जाए। इसका मतलब समझते हैं आप? इसका मतलब है कि उसका दिमाग सही तरीके से काम कर रहा था, वो सोच-समझ पा रहा था, उसमें काबिलियत थी कि उसे सही दिशा दी जाती, उसे जेएनयू जैसी जगहों पर रखा जाता तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि वो बहुत आगे जाता।

लेकिन मोदी, शाह और भाजपा ने जिस तरह की विषाक्त विचारधारा को लगातार हवा दी है, ऐसे भटके हुए नौजवान अंधेरे में मार दिए जाते हैं ताकि भविष्य में पुलिस के मुखिया को मोटा पद मिले। लेकिन, बात इतनी ही नहीं है, आप इन मानसिक रूप से विक्षिप्त प्रदेशवासियों को देखिए जो पुलिस की इस गुंडई पर उन्हें राखी बाँध रही हैं, फूल बरसा रही हैं, जिंदाबाद के नारे लगा रही हैं!

ये कैसा समाज है जो बलात्कार और हत्या के मासूम आरोपितों को मारने वाली गुंडा पुलिस पर पुष्पवर्षा कर रही है? हमारे मित्र शेखर गुप्ता, जो वरिष्ठ पत्रकार हैं, उन्होंने भी इसे माफिया-स्टाइल की हत्या कहा है। उन्होंने कहा है कि क्या आरोपितों को न्यायिक प्रक्रिया का लाभ मिला? उन्होंने पुलिस को आईसिस के बराबर रख कर पूछा है कि उनके कत्लेआम और इस हत्याकांड में क्या अंतर है?

अब कुछ आईटी सेल वाले, संघी ट्रोल, शेखर गुप्ता जैसे कद्दावर पत्रकार से यह सवाल पूछ रहे हैं कि उन्हें कैसे पता कि पुलिस मुठभेड़ सही नहीं है? कुछ लोग कह रहे हैं कि एक लोकतांत्रिक सरकार की अनुशासित पुलिस और आइसिस को बराबर मानना घटिया मानसिकता का परिचायक है। वो शेखर गुप्ता से पूछ रहे हैं कि उन्होंने जिस न्यायिक प्रक्रिया और जाँच का फायदा बलात्कारियों, मेरा मतलब है बलात्कार आरोपितों, को दिया है, वही ‘ड्यू प्रोसेस’ की बात पुलिस के लिए क्यों नहीं? वो कैसे जानते हैं कि पुलिस ने फ़र्ज़ी एनकाउंटर किया है?

ये सारे लोग संघी हैं। ये इसी तरह बड़े पत्रकारों को घेरते हैं, गाली-गलौज करते हैं सोशल मीडिया पर। इनके सवालों में कोई दम नहीं। शेखर गुप्ता ने इस देश को मिलिट्री तख्तापलट से बचाया है जब उन्होंने सेना द्वारा दिल्ली पर रातोंरात चढ़ाई की खबर को इंडियन एक्सप्रेस के मुखपृष्ठ पर छाप कर पूरा प्लान चौपट कर दिया था। शेखर गुप्ता हमारे पूजनीय होने चाहिए, मेरा वश चले तो अपने मैग्सेसे अवार्ड का थ्री-डी प्रिंट करवा कर उन्हें भेज दूँ, लेकिन आपको पता ही हिन्दी पत्रकार की इतनी औकात कहाँ कि वो अपने पैसे से फ़ोटोकॉपी भी करवा सके!

ये सारे लोग जो खुश हो रहे हैं, जो पुलिस पर वाहवाही की बौछार कर रहे हैं, एक बीमार मानसिकता के लोग हैं। मुझे तो आश्चर्य हो रहा है कि मेरी ही टीम के लगभग सारे लोग खुश हैं कि सही हुआ। लगता है मोदी और शाह ने कुँए में भाँग मिला दी है और सब नशे में झूम रहे हैं। मेरे सहयोगियों से मैंने पूछा कि वो क्यों खुश हैं तो वो कहने लगे कि अजित पवार को क्लीन चिट दे दी गई और वो खबर दब गई, इस बात पर खुश हैं। फिर मुझे विश्वास हुआ कि रवीश की टीम ने रवीश से दगाबाजी नहीं की है, वो अभी भी मेरे हैं, मेरे अपने…

आप देखिए कि कश्मीर से तेलंगाना तक मानवाधिकारों का हनन कैसे हो रहा है। पहले मुख्यमंत्री को विवाह का कार्ड दिया जाता है, फिर वहाँ भोजपुरी संगीत वाला डीजे बजाया जाता है, शोर मचाया जाता है, फिर पुलिस को ‘ऊपर’ से आदेश आता है कि हैदराबाद वाले कांड की त्वरित रिपोर्ट सौंपी जाए। पुलिस फोन मिलाती है, मुख्यमंत्री संगीत के शोर में फोन की घंटी सुन नहीं पाते। ‘ऊपर’ से दवाब बनता है, पुलिस आरोपितों को ले कर निकलती है, और बाकी क्या होता है, आपको पता ही है… इसलिए केसीआर पर बात करने की जरूरत ही नहीं है क्योंकि कोई भी विवेकशील व्यक्ति ये जानता है कि ऐसे कार्रवाई सिर्फ भाजपा वाले ही करा सकते हैं।

केसीआर को आपने देखा है? उन्हें देख कर लगता ही नहीं कि उन्होंने कभी फोन रखा होगा, फोन कौन रखते हैं ये आप भी जानते हैं…

माहौल बनाया जा रहा है कि पब्लिक खुश है। पब्लिक तो लगातार भाजपा को वोट भी दे रही है, मेरे लाख बार समझाने के बाद भी, पत्रकारिता के दायरे से बाहर जा कर पाँच साल तक की स्टूडियो से कैम्पेनिंग के बाद भी मोदी को पहले से ज्यादा मतों से सत्ता दे दी… पब्लिक तो ऐसी है भारत की, ये किस बात पर खुश होते हैं, किस पर नहीं, अगर इसी को आधार बना दिया जाता तो मैं इतने सालों से प्रोपेगेंडा, सॉरी प्राइम टाइम और फेसबुक पर तीन-तीन किलोमीटर लम्बे पोस्ट लिखता रहता क्या? मुझे तो ये लोग टीवी समेत फेंक देते, लेकिन मेरी बात मानते कहाँ हैं!

एक समाज के तौर पर हम कहाँ जा रहे हैं? क्या पुलवामा में सीआरपीएफ के दस्ते को आरडीएक्स से उड़ा देना गुनाह है! क्या बुरहान वनी के के जनाजे में जाना कोई गुनाह है? या गुनाह यह है कि अहमद डार का बचपन में किसी अफसर ने कान उमेठा? या गुनाह यह है कि किसी हेडमास्टर के बेटे को आतंकवादी बनने को मजबूर होना पड़ा? क्या गुनाह यह है कि हैदराबाद की पशु चिकित्सक का बलात्कार करने के बाद, उसकी लाश से भी बलात्कार किया जाता है, फिर उसे जला दिया जाता है, या फिर गुनाह यह है कि वो चारों मासूम बच्चे पैसों की कमी की वजह से जेएनयू तक पहुँच नहीं पाए और किसी के स्कूटी के टायर की हवा निकाल दी…

अल्पसंख्यक वर्ग में शिक्षा का प्रतिशत पता कीजिए, पता चलेगा कि हम एक समाज के तौर पर कितने बेकार हो चुके हैं। आपने कैसा समाज दिया है जहाँ ये चार मासूम आज अपने मानवाधिकार की लड़ाई लड़ने के लिए जिंदा नहीं बचे। आप याद कीजिएगा उन बड़ी ताकतों को जो पुलिस से ऐसे काम करवाती है। आप याद रखिएगा ऐसे समाज को जो इन हत्याओं का जश्न मना रही है। आप कहेंगे कि मैंने पीड़िता पर तो कुछ बोला ही नहीं। मेरा जवाब है कि वो तो काफी पहले चली गई, आज तो एक की जगह चार को मार दिया गया है। लोकतंत्र है, चार हत्याओं पर ज्यादा बात होनी चाहिए।

याद आ रहे हैं वेद प्रकाश शर्मा और याद आ रहा है निरहुआ दिनेश यादव जिसने ‘वर्दी वाला गुंडा’ लिखा, जिसने ‘वर्दी वाला गुंडा’ फिल्म बनाई। यही आज का सत्य है। मैं व्यथित हूँ।

NRC और CAB एक ही सिक्के के पहलू, बंगाल में लागू नहीं होने दूँगी: ममता बनर्जी

नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (NRC) के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) पर भी अपने विरोध का इजहार किया है। केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा है कि एनआरसी और कैब एक ही सिक्के के पहलू हैं। वे दोनों का पुरजोर विरोध करेंगी। साथ ही कहा कि पश्चिम बंगाल में कैब को भी लागू नहीं होने देंगीं।

ममता बनर्जी के अनुसार NRC और CAB का मुद्दा अर्थव्यवस्था में सुस्ती से ध्यान हटाने को लेकर उठाया गया है। उनका कहना है कि यदि सभी समुदाय के लोगों को नागरिकता दी जाएगी तो ही वे इसे स्वीकार करेंगे। लेकिन अगर धर्म के आधार पर भेदभाव होगा तो वे इसका विरोध करेंगी। ममता बनर्जी ने सभी पार्टियों से इस विधेयक का विरोध करने की अपील करते हुए कहा, “अगर मेरी जान भी चली जाए तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन सीएबी को अंतिम दम तक स्वीकार नहीं करूँगी।”

उल्लेखनीय है कि सीएबी के मसौदे को कुछ संशोधनों के साथ कैबिनेट ने पास कर दिया है। इस विधेयक में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आकर देश में रह रहे गैर मुस्लिम शरणार्थियों को बगैर वैध दस्तावेजों के भी भारत की नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है। इसके अलावा इस विधेयक में भारत में निवास की अवधि की अनिवार्यता को भी 11 साल से घटाने का प्रस्ताव है।

साथ ही ममता ने मालदा में महिला को जलाकर मारे जाने की घटना स्वीकार की है। आज लोकसभा में जब केंद्रीय महिला बाल एवं विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने जब मालदा का जिक्र किया तो टीएमसी के सांसद आपत्ति जताते हुए हंगामा करने लगे थे। ममता ने कहा कि मालदा की घटना की पुलिस जॉंच कर रही है। जलाने से पहले महिला के साथ रेप किया गया था या नहीं इस निष्कर्ष पर पहुॅंचने के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया। उन्होंने कहा कि मैं महिलाओं के खिलाफ किसी तरह की हिंसा बर्दाश्त नहीं करूॅंगी। मैंने आरोपित की तत्काल गिरफ्तारी और 3-10 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल करने के निर्देश पुलिस को दे रखे हैं।

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‘न्यूट्रल पत्रकार’ राजदीप ने कॉन्ग्रेस के कार्यक्रम में अपनी पुस्तक को किया प्रमोट, दिया महाराष्ट्र पर लेक्चर

कॉन्ग्रेस पार्टी और देश के न्यूट्रल पत्रकारों के बीच जो परस्पर रिश्ता है वो बेहद ख़ास है। इनके बीच मधुर रिश्तों का लाभ निश्चित तौर पर कॉन्ग्रेस को मिलता रहता है। वहीं, न्यूट्रल पत्रकार भी अक्सर कॉन्ग्रेस पार्टी की चाटुकारिता करते नज़र आ ही जाते हैं। ऐसा ही कुछ न्यूट्रल पत्रकार राजदीप सरदेसाई करते नज़र आए। कॉन्ग्रेस पार्टी की अखिल भारतीय व्यावसायिक कॉन्ग्रेस (AIPC) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को उन्होंने अपनी पुस्तक
“2019 मोदी ने भारत को कैसे जीता” को प्रमोट करने के लिए चुना।

न्यूट्रल पत्रकार राजदीप सरदेसाई जो कि कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रति अपनी वफ़ादारी और नज़दीकियों के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने AIPC द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में चर्चा की, जहाँ कॉन्ग्रेस प्रवक्ता संजय झा के अलावा और कोई मौजूद नहीं था। इस दौरान राजदीप सरदेसाई ने महाराष्ट्र की राजनीति पर भी बात की।

प्रतिभाशाली स्पिन-मास्टर, राजदीप सरदेसाई का कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके वरिष्ठ नेताओं के साथ बड़े मधुर और सौहार्दपूर्ण संबंध होने का इतिहास रहा है। राजदीप सरदेसाई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने के लिए 2002 की गोधरा की घटना का राजनीतिकरण करके कॉन्ग्रेस के प्रचार को प्रमोट करके पत्रकारिता क्षेत्र में क़दम रखे थे।

ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी न्यूट्रल पत्रकार ने कॉन्ग्रेस की चाटुकारिता करके ख़ुद को प्रमोट करने की कोशिश की हो। पिछले साल, ‘मुख्यधारा मीडिया के प्रख्यात, पत्रकार’, करन थापर ने अपनी पुस्तक को प्रमोट करने के लिए AIPC द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। इस दौरान उन्होंने अपनी पुस्तक को प्रमोट करने के अलावा,  लोगों से AIPC में शामिल होने की अपील भी की थी।

दिलचस्प बात यह है कि करण थापर की पुस्तक को प्रमोट करने वाले वीडियो के अंत में, उनकी पिछली पुस्तक “न्यूज़मैन: ट्रैकिंग इंडिया इन द मोदी एरा” को प्रमोट करने के लिए राजदीप सरदेसाई ने बतौर अतिथि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

वर्षों से, राजदीप सरदेसाई कॉन्ग्रेस परिवार के प्रति वफ़ादार रहे हैं। इस साल फरवरी में, उन्होंने इंडिया टुडे टीवी में अपने एक शो के दौरान वाड्रा को बेगुनाह साबित करने पर तुले नज़र आए। उन्होंने अपने कार्यक्रम में यह दावा किया था कि लंदन में संबंधित सम्पत्तियाँ रॉबर्ट वाड्रा के नाम से पंजीकृत नहीं थी।

इस शो में वो यह कहते हुए नज़र आए कि लंदन की सम्पत्ति, वास्तविक मालिक के नाम पर पंजीकृत नहीं होने के तथ्य को पूरी तरह से अनदेखा किया गया। आधारभूत जानकारियों का अभाव और इस बात की पुष्टि की कि वाड्रा के नाम का उल्लेख सम्पत्ति के दस्तावेजों में नहीं है, इसलिए ईडी के द्वारा इस मामले को ग़लत तरीके से लक्षित किया जा रहा है, इसे सोशल मीडिया पर लोगों द्वारा अनदेखा नहीं किया गया।

राजदीप सरदेसाई का दर्द उस समय भी छलका था जब केंद्र सरकार ने जस्टिस गौर को पीएमएलए का चेयरमैन नियुक्त किया था। केंद्र के इस फ़ैसले पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा था कि यही है असली कहानी क़िस्मत की। यह देखना बेहद आश्चर्यजनक लगता है कि राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार अपने आर्थिक हितों को बढ़ावा देने के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी की ख़ूब बढ़चढ़ कर वाह-वाही करते हैं, और बिना किसी शर्म के हर दिन ख़ुद की न्यूट्रल छवि बनाए रखनी की जद्दोज़हद भी करते हैं।

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के दौर में मुख्यधारा के मीडिया की विश्वसनीयता पहले ही काफी कम हो गई है। सोशल मीडिया के ज़माने में अब कुछ भी छिपा नहीं रह जाता। सोशल मीडिया के यूज़र्स अपनी खोजबीन करके राजदीप सरदेसाई जैसे न्यूट्रल पत्रकारों की पोल खोल कर रख देते हैं।

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बाँह चढ़ाकर मेरी ओर बढ़े कॉन्ग्रेस सांसद, सोमवार को देखूँगी: स्मृति ईरानी

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने लोकसभा में अपने साथ हुई घटना पर हैरानी जताई है। उन्होंने कहा है कि सदन में कुछ पुरुष सांसद मेरी ओर बॉंह चढ़ाकर आए। उनमें से एक ने कहा कि स्मृति ईरानी बोल क्यों रही है? उन्होंने कहा कि जो कुछ हुआ उससे वे स्तब्ध हैं। क्या बीजेपी का सांसद होना उनकी गलती है। सोमवार को देखूॅंगी कि महिलाओं के हक में बोलने के लिए विपक्ष मुझे क्या सजा देता है।

उल्लेखनीय है कि शुक्रवार को लोकसभा में कॉन्ग्रेस ने उन्नाव में दुष्कर्म पीड़िता को जलाए जाने का मामला उठाया था। इस दौरान कॉन्ग्रेस के दो सांसदों टीएम प्रतापन और डीन कोरियाकोस पर स्मृति ईरानी के साथ अभद्रता करने का आरोप भाजपा ने लगाया है। भाजपा ने बिना शर्त माफी की मॉंग की है।

संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि कॉन्ग्रेस सांसदों का धमकी भरे अंदाज में ईरानी के सामने जाकर अपनी बात कहना गलत है। दोनों को इसके लिए बिना शर्त माफी माँगनी चाहिए। कॉन्ग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि जब यह मामला हुआ उस समय वह सदन में नहीं थे और उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है। वह सदस्यों से बात करेंगे। वहीं ईरानी की पीछे वाली सीट पर बैठी भाजपा की संगीता देव ने कहा कि कांग्रेस के दोनों सांसद आस्तीन चढ़ाकर मारने के अंदाज में महिला एवं बाल विकास मंत्री के पास आए थे।

केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि ईरानी के बोलने के दौरान कॉन्ग्रेस के कुछ सांसदों ने जैसे हरकत की वह निंदनीय है और उन्हें इसके लिए माफी मॉंगनी चाहिए। इससे पहले उन्नाव का मामला उठाते हुए अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि आज हम एक तरफ राम मंदिर बनाने वाले हैं, दूसरी तरफ देश में ‘सीताएं’ जलाई जा रही हैं। जवाब में ईरानी ने कहा कि बलात्कार जैसी घटनाओं पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। इस मुद्दे पर ईरानी और कांग्रेस के कुछ सदस्यों के बीच तीखी नोकझोंक हो गई। ईरानी ने इसका जवाब देते हुए विपक्षी सांसदों से कहा कि आप यहॉं मुझ पर चिल्ला रहे हैं। इसका मतलब है कि आप एक महिला के साथ खड़ा नहीं होना चाहते और न ही मुद्दे पर बात करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में जब पंचायत चुनाव के दौरान विरोधियों को चुप कराने के लिए रेप का इस्तेमाल राजनैतिक तौर पर किया गया तब आप चुप थे।

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार ईरानी ने कहा कि आज बंगाल के एक सांसद यहॉं मंदिर का नाम ले रहे थे। हैदराबाद-उन्नाव की घटना के बारे में बोल रहे थे। लेकिन, मालदा पर क्यों चुप्पी साध कर बैठे हैं। मालदा का जिक्र होते ही विपक्षी सदस्यों ने हॅंगामा शुरू कर दिया। टीएमसी के सदस्यों ने पूछा कि बताइए क्या हुआ? जवाब में ईरानी ने कहा कि बंगाल का अखबार पढ़िए। मालदा में रेप को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया।

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डांस बंद करने पर महिला के मुँह पर चलाई गोली: डांसर की हालत गंभीर, Video वायरल

उत्तरप्रदेश के चित्रकूट में एक विवाह समारोह के दौरान नाचने आई महिला डांसर पर गोली चलने की वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। वीडियो में देखा जा सकता है कि महिला अपनी साथी डांसर के साथ स्टेज पर डांस कर रही है और उनके पीछे बहुत तेज आवाज में गाने चल रहे हैं। समारोह में बहुत लोगों ने दोनों महिलाओं को घेरा हुआ है और बार-बार उनसे नाचते रहने की बात कर रहे हैं।

इस वीडियो के बीच में सुना जा सकता है कि कुछ लोग बार-बार महिलाओं से कह रहे हैं कि अगर नाच रुका तो गोली चल जाएगी। जिसे सुनकर पहले तो दोनों महिला डांसर नाचती रहती हैं, लेकिन तभी गाने में रुकावट आती है और दोनों रुककर पीछे देखने लगती हैं। इतने में वीडियो में आवाज आती है “सुधीर भैया, आप गोली चला ही दो।” जिसके बाद तुरंत फायरिंग होती हैं और गोली जाकर महिला डांसर के मुँह पर लगती है। डांसर लहू-लुहान हो जाती है और वहीं बैठ जाती है। बाद में महिला को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया जाता है और अज्ञात के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज होती है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ये वीडियो 1 दिसंबर को गाँव के मुखिया सुधीर सिंह पटेल की बेटी की शादी का है। जहाँ घटना के दौरान दूल्हे के मामा-चाचा भी स्टेज पर थे और फायरिंग के कारण वे भी घायल हो गए।

जानकारी के मुताबिक इस मामले में लड़के के चाचा राम प्रताप ने अज्ञात के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करवाई है। अब पुलिस इस मामले में आगे की जाँच कर रही है। वहीं, महिला डांसर की हालत गंभीर हैं और उसका कानपुर के एक अस्पताल में इलाज जारी है। पुलिस का कहना है कि उन्होंने गोली चलाने वाले शख्स की पहचान कर ली है।

यहाँ बता दें, इसी तरह की घटना साल 2016 में पंजाब के बठिंडा से भी आई थी। जब एक शादी में जश्न मनाने के दौरान एक 25 वर्षीय महिला डांसर की मौत हो गई थी। डांसर का नाम कुलविंदर कौर था, जो घटना के समय गर्भवती थी और जिसने पेट में गोली लगने के कारण मौक़े पर ही दम तोड़ दिया था।

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लोकसभा में स्मृति ईरानी से कॉन्ग्रेस के 2 सांसदों ने की अभद्रता, भाजपा माफी पर अड़ी

लोकसभा में शुक्रवार को कॉन्ग्रेस ने उन्नाव में दुष्कर्म पीड़िता को जलाए जाने का मामला उठाया। इस दौरान कॉन्ग्रेस के दो सांसदों पर महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी के साथ अभद्रता करने का आरोप भाजपा ने लगाया है। भाजपा ने मॉंग की कि अपनी हरकत के लिए कांग्रेस सांसद टीएम प्रतापन और डीन कोरियाकोस सदन में बिना शर्त माफी माँगें।

भोजनावकाश के बाद लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही सत्ता पक्ष के सदस्यों ने यह मामला उठाया और कॉन्ग्रेस के दोनों सांसदों पर ईरानी की सीट के सामने आकर उन्हें धमकाने का आरोप लगाया। संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि कॉन्ग्रेस सांसदों का धमकी भरे अंदाज में उनके सामने जाकर अपनी बात कहना गलत है। दोनों को इसके लिए बिना शर्त माफी माँगनी चाहिए।

कॉन्ग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि जब यह मामला हुआ उस समय वह सदन में नहीं थे और उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है। वह सदस्यों से बात करेंगे। वहीं ईरानी की पीछे वाली सीट पर बैठी भाजपा की संगीता देव ने कहा कि कांग्रेस के दोनों सांसद आस्तीन चढ़ाकर मारने के अंदाज में महिला एवं बाल विकास मंत्री के पास आए थे।

केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि ईरानी के बोलने के दौरान कॉन्ग्रेस के कुछ सांसदों ने जैसे हरकत की वह निंदनीय है और उन्हें इसके लिए माफी मॉंगनी चाहिए। इससे पहले उन्नाव का मामला उठाते हुए अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि आज हम एक तरफ राम मंदिर बनाने वाले हैं, दूसरी तरफ देश में ‘सीताएं’ जलाई जा रही हैं। जवाब में ईरानी ने कहा कि बलात्कार जैसी घटनाओं पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। इस मुद्दे पर ईरानी और कांग्रेस के कुछ सदस्यों के बीच तीखी नोकझोंक हो गई। ईरानी ने इसका जवाब देते हुए विपक्षी सांसदों से कहा कि आप यहॉं मुझ पर चिल्ला रहे हैं। इसका मतलब है कि आप एक महिला के साथ खड़ा नहीं होना चाहते और न ही मुद्दे पर बात करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में जब पंचायत चुनाव के दौरान विरोधियों को चुप कराने के लिए रेप का इस्तेमाल राजनैतिक तौर पर किया गया तब आप चुप थे।

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार ईरानी ने कहा कि आज बंगाल के एक सांसद यहॉं मंदिर का नाम ले रहे थे। हैदराबाद-उन्नाव की घटना के बारे में बोल रहे थे। लेकिन, मालदा पर क्यों चुप्पी साध कर बैठे हैं। मालदा का जिक्र होते ही विपक्षी सदस्यों ने हॅंगामा शुरू कर दिया। टीएमसी के सदस्यों ने पूछा कि बताइए क्या हुआ? जवाब में ईरानी ने कहा कि बंगाल का अखबार पढ़िए। मालदा में रेप को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया।

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पीस पार्टी, जमीयत, मिस्बाहुद्दीन समेत अयोध्या मामले में कई याचिकाएँ दायर कर रहा मुस्लिम पक्ष

मीडिया खबरों के अनुसार पीस पार्टी की ओर से अयोध्या मामले में पुनर्विचार याचिका दायर की जा चुकी है। पीस पार्टी की 217 पन्ने की याचिका में याचिका में दावा किया गया है कि 1949 तक बाबरी के केंद्रीय गुंबद के नीचे नमाज़ अता होती रहती थी। इसके अलावा 1885 में हिन्दुओं के हिस्से में बाहरी अहाते का राम चबूतरा और मुस्लिमों के कब्जे में आंतरिक हिस्सा होने की बात कही गई है।

गौरतलब है कि 9 नवंबर, 2019 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यों वाली संविधान बेंच ने राम जन्मभूमि स्थल का पूरा मालिकाना हक हिन्दुओं दिया था। साथ ही मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए थे। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने की थी और इसमें जज जस्टिस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे। पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से दिया था।

पीस पार्टी के अलावा 4 अन्य व्यक्तियों द्वारा भी याचिकाएँ दाखिल किए जाने की बात मीडिया में कही जा रही है। न्यूज़ 18 की रिपोर्ट के अनुसार इनके नाम मिस्बाहुद्दीन, मौलाना हस्बुल्लाह, हाजी महबूब और रिज़वान अहमद हैं। न केवल इनकी याचिकाओं को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का समर्थन प्राप्त होने की बात कही जा रही है, बल्कि इनका केस भी सुप्रीम कोर्ट में वकील राजीव धवन ही लड़ेंगे।

राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की पैरोकारी करने वाले वकील राजीव धवन ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के ख़िलाफ़ विवादास्पद बयान दिया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में विवादित रहे 2.77 एकड़ समेत पूरी 67 एकड़ भूमि हिन्दुओं को रामलला का मंदिर बनाने के लिए दिए जाने को मुस्लिम पक्ष के साथ अदालत का अन्याय करार दिया था, और साथ ही दावा किया कि हिन्दुओं ने माहौल खराब किया और दूसरा पक्ष शांत रहा। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी ऐसे ही आरोप लगाए थे।

बता दें कि अन्य मुस्लिम पक्षकारों में सुन्नी केंद्रीय वक़्फ़ बोर्ड ने मामले में आगे क़ानूनी लड़ाई लड़ने से कदम पीछे खींच लिए हैं। वह फैसले में मिले 5 एकड़ को भी स्वीकार करने या न करने पर भी विचार करेगा। एक अन्य मरहूम पक्षकार हाशिम अंसारी के पुत्र इक़बाल अंसारी ने भी कोई क़ानूनी कदम उठाने से इंकार कर दिया है।

वहीं जमीयत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका में राजिव धवन को अधिवक्ता के पद से हटा दिया गया है। इसे लेकर धवन बहुत ‘तकलीफ़ में’ भी बताए जा रहे हैं। गौरतलब है कि मुकदमा जीतने के लिए राम के अस्तित्व पर सवाल उठाने, औरंगज़ेब को ‘उदारवादी’ शासक बताने जैसे कई पैंतरे धवन ने अदालत में चले थे, जिससे हिन्दू समाज आहत हुआ था।

अयोध्या में मस्जिद के लिए 5 एकड़ क्यों: SC में याचिका दाखिल करेगी हिन्दू महासभा

अयोध्या मामले में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की अंतिम तिथि पास आते ही दिलचस्प मोड़ भी आने लगे हैं। हिन्दूवादी राजनीतिक दल अखिल भारत हिन्दू महासभा ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के एवज में मुआवजे के रूप में मुस्लिम पक्ष को मिल रही 5 एकड़ ज़मीन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने जा रही है। इस आदेश पर आपत्ति जताते हुए महासभा अदालत से इस आदेश पर पुनर्विचार करने के लिए कहेगी।

पार्टी के वकील विष्णु शंकर जैन के अनुसार, “विवादित इमारत के बाहरी और भीतरी हिस्से पर हिंदू दावा मज़बूत होने के चलते जगह हमें मिली। पूरा इंसाफ करने के नाम पर दूसरे पक्ष को 5 एकड़ जमीन देने का हम विरोध करेंगे। फैसले में 1949 और 1992 की घटनाओं पर जो टिप्पणी की गई है, उसे भी हटाने की माँग करेंगे।” गौरतलब है कि अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 1949 में 22-23 दिसंबर की रात राम लला की मूर्तियाँ वहाँ प्रकट नहीं हुईं थीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से रखवाईं गईं थीं। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में हुए बाबरी ध्वंस (जिसकी कि संयोगवश आज, 6 दिसंबर, 2019 को बरसी है) को भी असंवैधानिक और गैर-क़ानूनी बताया था।

पूरी जमीन दे दी थी राम लला को

9 नवंबर, 2019 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यों वाली संविधान बेंच ने राम जन्मभूमि स्थल का पूरा मालिकाना हक हिन्दुओं को दिया था। साथ ही मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए थे। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने की थी और इसमें मुस्लिम जज जस्टिस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे। पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से दिया था।

लाला लाजपत राय ने बनाई, मालवीय बने पहले अध्यक्ष

याचिकाकर्ता अखिल भारत हिन्दू महासभा 1907 में स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय ने अपने आर्य समाजी साथियों लाल चंद और शादी लाल के साथ मिलकर “पंजाब हिन्दू महासभा” के तौर पर बनाई थी। लाहौर में हुए पहले अधिवेशन की अध्यक्षता महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय ने की थी, जो आगे जाकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक हुए। 1921 के 6ठे अधिवेशन में “अखिल भारत हिन्दू महासभा” के रूप में इसका नामकरण हुआ था।

वीर सावरकर के नेतृत्व में इस संगठन को सबसे अधिक विभाजन के दंगों के समय हिन्दुओं की रक्षा के लिए कदम उठाने के लिए जाना जाता है। इसके अलावा हिन्दू महासभा ने विभाजन के लिए राज़ी हो जाने पर कॉन्ग्रेस और उसके नेताओं गाँधी-नेहरू का भी विरोध किया था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी हिन्दू महासभा के नेता रहे हैं।

फडणवीस ने इस्तीफा दिया, अगले ही दिन सिंचाई घोटाले में अजित पवार को क्लीनचिट

एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के भतीजे अजित पवार को सिंचाई घोटाले में क्लीनचिट मिल गई है। यह घोटाला अजित के महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री रहते हुआ था। 27 नवंबर को एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने बॉम्बे हाई कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर अजित पर लगे सारे आरोप वापस ले लिए। हलफनामा दाखिल होने से एक दिन पहले ही भाजपा के देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। अजित पवार के उप मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर वापस एनसीपी में लौट जाने पर फडणवीस ने अपना पद छोड़ा था।

ह​लफनामा दाखिल करने के अगले दिन 28 नवंबर को राज्य में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महा विकास अघाड़ी की सरकार बनी। इस सरकार में शिवसेना के अलावा एनसीपी और कॉन्ग्रेस भी शामिल है।

हलफनामे में कहा गया है कि जॉंच में वीआईडीसी के चेयरमैन (जल संसाधन मंत्री) की संलिप्तता के प्रमाण नहीं मिले।

महाराष्ट्र एसीबी द्वारा दाखिल हलफनामा

हलफनामे में कहा गया है कि विदर्भ सिंचाई विकास निगम (VIDC) के अध्यक्ष अजीत पवार को क्रियान्वयन एजेंसियों के कृत्यों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।


महाराष्ट्र एसीबी द्वारा दाखिल हलफनामा

गौरतलब है कि साल 1999 से 2009 तक जल संसाधन मंत्री रहे अजित पवार के ख़िलाफ़ ये हलफनामा कई आरोपों से जुड़ा हुआ है। जिसमें विदर्भ में शुरू हुई 32 सिंचाई परियोजनाओं का मामला भी शामिल है, जिनकी लागत 3 महीनों के भीतर 17, 700 करोड़ रुपए तक बढ़ गई थी।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार पूर्व एसीबी अध्यक्ष और मुंबई पुलिस कमिश्नर संजय बर्वे ने अजित पवार के ख़िलाफ़ हलफनामा दाखिल किया था। जिसमें उनपर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने गोसीखुर्द और जिगाँव में अवैध रूप से टेंडर को एक्स्टेंड करने के लिए हस्ताक्षर किए और महाराष्ट्र गवर्नमेंट रूल्स ऑफ बिजनेस एंड इंस्ट्रक्शन के नियम 10 के तहत वे अपने विभाग के सभी कार्यों के लिए जबावदेह हैं।

हालाँकि, नए हलफनामे में संजय बर्वे के आब्जर्वेशन को खारिज करते हुए कहा गया है कि वीआईडीसी द्वारा तय प्रक्रिया का पालन हुआ था और जिस नोट शीट में पवार ने हस्ताक्षर किए थे उसमें कोई भी नकारात्मक टिप्पणी नहीं थी। महाराष्ट्र गवर्नमेंट रूल्स ऑफ बिजनेस ऐंड इंस्ट्रक्शन के नियम 14 का हवाला देते हुए कहा गया कि संबंधित विभाग के सचिव को टेंडर से संबंधित आवश्क मामलों की पड़ताल के बाद ही उसकी जानकारी संबंधित मंत्री और मुख्य सचिव को देनी थी। लेकिन अधिकारी ने ऐसा नहीं किया।

नए हलफनामे में कहा गया कि जल संसाधन विभाग के सचिव और विदर्भ सिंचाई विभाग महामंडल के कार्यकारी संचालक का दर्जा, कर्तव्य तथा जवाबदेही समान है। इसलिए सिंचाई परियोजनाओं के टेंडर व खर्च मंजूरी में अवैधता की पड़ताल करने का दायित्व इन दोनों अधिकारियों का था। उनको संबंधित अवैधता की जानकारी पवार को देनी चाहिए थी। चूँकि उन्होंने अपने दायित्व का निर्वहन नहीं किया, इसलिए घोटाले में पवार की जवाबदेही नहीं तय की जा सकती।

यहाँ बता दें कि साल 2014 के राज्य चुनावों में ये आरोप एक राजनैतिक मुद्दा था। जिससे जुड़े मामले को देवेंद्र फडणवीस ने चुनाव जीतने के बाद ही खोल दिया था। विदर्भ और कोंकण जिले में फैले 44 परियोजनाओं में घोटाले से संबंधित 23 प्राथमिकी और 5 चारशीट दायर हुई थी। इसके बाद कोंकण के बालगंगा परियोजना में पवार की भूमिका हमेशा से जाँच के दायरे में रही। लेकिन इनमें किसी भी मामले पर उन पर आरोप नहीं लगाए गए और न ही उनका नाम किसी एफआईआर में लिया गया।

इस मामले में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस का कहना है कि पवार को क्लीनचिट हैरानी की बात है। ऐसा कैसे हो सकता है कि एसीबी के एक अधिकारी द्वारा दाखिल हलफनामे से दूसरा अलग हो। उन्होंने विरोध जताते हुए उम्मीद जताई कि कोर्ट इसे खारिज कर देगा।

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गैंगरेप पीड़िता की अर्ध-नग्न लाश: टूटी उंगलियाँ, आँखें बाहर निकली हुईं – शाबोद्दीन, शेख बाबू, मकदूम ने कबूला जुर्म

हैदराबाद में 26 वर्षीय पशु चिकित्सक प्रीति रेड्डी (बदला हुआ नाम) के साथ गैंगरेप और फिर उनके शव को जला देने की ख़ौफ़नाक वारदात को अंजाम देने के तीन दिन पहले, उसी तेलंगाना में एक दलित महिला का बलात्कार किया गया था और बड़ी बेरहमी से पीड़िता की हत्या भी कर दी गई थी।

इस मामले में तीन आरोपितों को गिरफ़्तार किया गया है और उन्होंने अपने अपराध को क़बूल कर भी लिया है। वहीं, पीड़ित परिवार का कहना है कि पुलिस उन्हें पीड़िता की पोस्टमार्टम रिपोर्ट देने से मना कर रही है क्योंकि रिपोर्ट में कुछ ऐसा है, जिसे शायद छिपाने का प्रयास किया जा रहा है। जहाँ एक तरफ हैदराबाद गैंगरेप की घटना पूरे देश को पता है वहीं, यह इस घटना के बारे में शायद बहुत कम लोग ही जानते होंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि इस घटना को मीडिया में बहुत कम कवरेज मिली है।

30 वर्षीय गीता (बदला हुआ नाम) का परिवार, निर्मल ज़िले के खानपुर मंडल के गोसम्पल्ली गाँव का रहने वाला है। लेकिन यह अपने पति-बच्चों के साथ यहाँ नहीं रहती थीं। ये खुद, इनके पति और दो बच्चे अपने गाँव से 100 किलोमीटर दूर एक किराए के मकान में रहते थे। आजीविका के लिए इनका परिवार जहाँ रहता था, वो आसिफाबाद ज़िले (पहले इस जिले का नाम आदिलाबाद था) के लिंगापुर मंडल में स्थित है।

पीड़िता अपने पति (38 साल के) की तरह सड़क पर घूम-घूम कर गुब्बारे और महिलाओं के लिए कम दाम वाले साज-सज्जा का सामान बेचती थी। 25 नवंबर की सुबह, उनके पति टेकू गोपी को वो एकांत स्थान पर अर्ध-नग्न अवस्था में मृत मिलीं। शरीर पर कई चोट के निशान भी थे। इससे पहले रात में ही गोपी ने लिंगापुर पुलिस स्टेशन में अपनी पत्नी के लापता होने की शिक़ायत दर्ज कराई थी।

शव मिलने के बाद FIR किया गया। इसमें दर्ज गोपी के बयान के अनुसार वह और पीड़िता (उनकी पत्नी) अपने-अपने काम काम के लिए 24 नवंबर को सुबह 6 बजे घर से निकले थे।

गोपी ने बताया कि उन्होंने अपनी पत्नी को एलापेटार में ड्रॉप किया और खुद मोदीगुडा चले गए। हमेशा की तरह जब वो अपनी पत्नी को दोपहर 2 बजे लेने के लिए एलापेटार लौटे, तो वो वहाँ नहीं मिलीं। इस दौरान उनका मोबाइल भी स्विच ऑफ़ था। उन्होंने अपनी पत्नी की खोजबीन की, लेकिन कहीं कुछ पता नहीं चला। इसके बाद गोपी ने उसी रात, पुलिस में अपनी पत्नी के लापता होने की शिक़ायत दर्ज कराई।

अगली सुबह, वह और कुछ ग्रामीण फिर से तलाश में निकले। आख़िरकार उन्हें सुबह क़रीब 9 बजे लिंगनापुर मंडल के रामनायकटांडा और इलापार गाँवों के बीच उनका शव मिला। उनकी साड़ी घुटनों से ऊपर खींची हुई थी, ऊपरी शरीर पर कोई कपड़ा नहीं था, उनके सिर, गले और हाथों पर गंभीर चोट के निशान थे।

बयान में आगे कहा गया है कि गीता और गोपी बडगा जंगम (अनुसूचित जाति) से संबंध रखते हैं। गोपी को इस जघन्य अपराध के पीछे शाबोद्दीन, बाबू और मकदूम नाम के तीन लोगों पर शक था, क्योंकि ये तीनों भी उस दौरान अपने घरों से ग़ायब थे।

गोपी अपनी पत्नी के साथ हुए इस जघन्य अपराध के बाद से गोसांपल्ली में रह रहे हैं। उन्होंने स्वराज्य को बताया कि इस ख़ौफ़नाक वारदात को अंजाम देते वक़्त पीड़िता के चेहरे और उनके शरीर पर बुरी तरह से कई वार किए गए। उनकी आँखें उभरी हुई थीं, पत्थर से बार-बार वार के कारण शायद उनकी उंगलियाँ टूट गईं थी। गोपी ने यह भी बताया कि उनकी पत्नी के पैर भी अजीब तरीके से मुड़े हुए थे।

गोपी को घटना-स्थल पर प्लास्टिक के दस्ताने भी मिले। उन्होंने बताया,

“आरोपितों ने उनकी (पीड़िता) गला दबाकर हत्या कर दी, शायद उन्होंने प्लास्टिक के दस्तानों का इस्तेमाल इसलिए किया, जिससे उन्हें पकड़ा नहीं जा सकेगा।”

गोपी ने कहा, “केवल पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से ही उनकी मौत का कारण पता चल सकता है।” लेकिन, लिंगायत पुलिस स्टेशन में उन्होंने जब-जब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बारे में पूछा तो उन्हें बार-बार वहाँ से भगा दिया गया।

इस मामले में गोसांपल्ली के सरपंच टेकू गंगाराम ने भी कहा कि पीड़िता की गर्दन में चोट के निशान थे, जिससे यह पता चलता है कि शायद उनकी गला घोंटकर हत्या कर दी गई है। लेकिन, वो इस बात की पुष्टि के लिए पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहे हैं।

समाचार पोर्टल द न्यूज मिनट की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस के अनुसार, आरोपित- शेख बाबू (35), शेख शाबोद्दीन (30) और शेख मकदूम (40) ने बलात्कार और हत्या की बात क़बूल कर ली है। पुलिस ने उन पर हत्या और बलात्कार के साथ-साथ अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है। तीनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

लिंगापुर के सब-इंस्पेक्टर ने बताया कि आरोपितों ने पीड़िता पर तब हमला किया, जब वो एक गाँव में अकेले घूम रही थीं। इसके बाद उन्होंने मिलकर बलात्कार और हत्या की वारदात को अंजाम दिया।

स्थानीय बडगा जंगम जाति के संगठन के महासचिव टेकु मधु ने स्वराज्य को बताया कि आरोपित एलापेटार गाँव से ताल्लुक रखते हैं, जो मुस्लिम बहुल है और गोंड भाषा को उर्दू के साथ मिला कर बोलते हैं। उन्होंने बताया, “हम उनके लिए सार्वजनिक फाँसी से कम कुछ नहीं चाहते।”

गोपी ने घटना के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताया। गंगाराम और अन्य ग्रामीणों ने कहा कि अपराध के एक दिन बाद, उन्होंने खुद पर मिट्टी का तेल डाला और ख़ुद को आग लगाने की कोशिश की, लेकिन पड़ोसियों ने समय रहते उन्हें बचा लिया।

एक महिला पड़ोसी ने गोपी के बारे में बताया, “उनकी स्थिति अभी भी स्थिर नहीं है। आत्महत्या करने की सोचने से पहले उन्होंने बच्चों के बारे में भी नहीं सोचा।” महिला ने कहा, “ऐसी त्रासदी भला कौन सहन कर सकता है? अब बच्चों का क्या होगा।” उन्होंने बताया कि उनका एक बच्चा आठ साल का है और दूसरा 10 साल का है।

पीड़िता के भाई ने कहा कि ग़रीब परिवार को एक बड़ा झटका लगा है और मीडिया के माध्यम से उन्होंने सरकार से वित्तीय सहायता की अपील की है। वहीं, एक अन्य पड़ोसी ने कहा, “सरकार की ओर से अब तक किसी ने भी हमसे मुलाक़ात नहीं की है।”

ग्रामीणों ने कहा कि उन्होंने लिंगापुर में दंपति के पड़ोसियों से सुना है कि आरोपित शराबी और नशेड़ी थे। एक आरोपित ने कहा कि उसकी शादी पिछले साल हुई थी और उसकी पत्नी सात महीने की गर्भवती थी।

गोसांपल्ली में महिलाओं ने कहा कि उन्हें घर से बाहर निकलने से बहुत डर लगता है। इनमें से कई महिलाएँ पीड़िता की ही तरह सड़क पर घूम-घूम कर काम करती हैं। एक महिला ने बताया कि पीड़िता बहुत सुंदर महिला थीं इसलिए आरोपितों की नज़र उनके ऊपर कई दिनों से थी। इस वारदात को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया है।

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