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अजीत डोभाल के बाद ये अधिकारी हैं No. 2, मुंबई हमलों के बाद निभाया था अहम किरदार

इसी साल अक्टूबर के अंतिम हफ्ते में मुंबई के कमिश्नर रहे दत्ता पडसलगीकर को उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (डिप्टी एनएसए) बनाया गया। सुरक्षा के मामलों में सीधा प्रधानमंत्री को सलाह देने वाले अधिकारियों में वह अजीत डोभाल के बाद नंबर 2 हैं। महाराष्ट्र के डीजीपी रहे पडसलगीकर को उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बना कर आतंरिक सुरक्षा मामलों की कमान सौंपी गई है। आईबी में पडसलगीकर और अजीत डोभाल कई वर्षों तक साथ काम कर चुके हैं, इसीलिए दोनों के बीच ट्यूनिंग भी ख़ासी अच्छी है। 1982 बैच के आईपीएस अधिकारी पडसलगीकर ने पूरे 26 साल आईबी में व्यतीत किए हैं।

नवंबर 26, 2008 को मुंबई दहल गई। पाकिस्तान से आए 10 आतंकियों ने मुंबई के 12 ठिकानों को निशाना बनाया और 166 लाशें गिरा दीं। इनमें से 9 आतंकी मार गिराए गए और अजमल कसाब ज़िंदा पकड़ा गया। पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के इस हमले में कई विदेशी भी मारे गए थे। भारत सरकार ने दुनियाभर में कई देशों को इस घटना में पाकिस्तान की भागीदारी के सबूत दिखाए। हमले के बाद हुई जाँच में दत्ता पडसलगीकर का रोल काफ़ी अहम रहा।

पडसलगीकर का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क काफ़ी तगड़ा है और समय-समय पर विभिन्न मामलों में सूचनाएँ जुटाने में उनका यह नेटवर्क काफी कारगर रहा है। अमेरिकी दूतावास में तैनात रहने के कारण उन्हें कूटनीतिक अनुभव भी रहा है। उन्होंने फ्रेंच भाषा की पढाई की है और साहित्य में गहरी रूचि रखते हैं। वे पहले अधिकारी थे जिसने सबूतों के साथ मुंबई हमलों में पाकिस्तान का हाथ होने की बात कही थी। अमेरिकी दूतावास में तैनात रहने के कारण उन्हें कूटनीतिक अनुभव भी रहा है। उन्होंने फ्रेंच भाषा की पढाई की है और साहित्य में गहरी रूचि रखते हैं।

मुंबई हमलों के दौरान देश की वित्तीय राजधानी में घुसे आतंकी पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से लगातार संपर्क में थे। आतंकी आका शागिर्दों को निर्देश दे रहे थे और न्यूज़ चैनल देख कर बता रहे थे कि बाहर क्या कार्रवाई चल रही है। पडसलगीकर ने अमेरिका से ‘वॉइस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल (VOIP)’ प्राप्त कर आतंकियों और उनके आकाओं के बीच हुई बातचीत की जाँच की। मुंबई हमले के दौरान एकमात्र ज़िंदा पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब को लम्बे ट्रायल के बाद नवंबर 21, 2012 को फाँसी की सज़ा दे दी गई थी। कसाब से पूछताछ और उसके ख़िलाफ़ ट्रायल में भी दत्ता पडसलगीकर ने बड़ी भूमिका निभाई। पडसलगीकर के बारे में मुंबई पुलिस के लोग कहते हैं कि वो अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं।

जब वो मुंबई के पुलिस कमिश्नर बन कर आए थे, तब वहाँ उन्हें सरकारी आवास कई दिनों बाद मिला था। तब तक पडसलगीकर वर्ली स्थित आईपीएस ऑफिसर्स मेस में ही रहा करते थे। वह रोज़ सुबह पास के ही एक बेकरी में बिना किसी सुरक्षा के जाया करते थे। उन्होंने पुलिस बल में मानवीय भावनाओं को मजबूती दी। गणेश चतुर्थी व अन्य महत्वपूर्ण मौक़ों पर वह कॉन्स्टेबलों के घर जाकर उनकी ख़ुशी का हिस्सा बनते थे। उन्होंने जवानों को अपने परिवार के साथ समय व्यतीत करने को प्राथमिकता दी। उन्होंने 12 घंटे की शिफ्ट को घटा कर 8 घंटे किया।

जवानों के बीच भाईचारा बढ़ाने के लिए पडसलगीकर अक्सर खेलकूद का सहारा लेते थे। पुलिस और आम नागरिकों के बीच सामंजस्य को सही करने के लिए भी उन्होंने यही तरीका अपनाया। वो ख़ुद एक अच्छे टेनिस खिलाड़ी हैं। क्राइम ब्रांच और इकनोमिक ऑफिस विंग में डायरेक्टर रह चुके पडसलगीकर महाराष्ट्र के लोकायुक्त के रूप में भी कार्य कर चुके हैं।

नाबालिग से गैंगरेप पर लोगों का फूटा गुस्सा: अरबाज गिरफ्तार, कलाम और सिकंदर अब भी फरार

बिहार के कैमूर जिले में नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप और उसका वीडियो वायरल करने के मामले में सोमवार (नवंबर 25, 2019) को लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। आक्रोशित लोगों ने मोहनियां शहर में जमकर तोड़फोड़, पथराव व आगजनी की। इस दौरान आधा दर्जन बाइकें, एक गुमटी व दो झोपड़ीनुमा दुकानों को आग के हवाले कर दिया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि मात्र पाँच मिनट के भीतर ही बाजार की सभी दुकानों के शटर बंद कर दिए गए। इसके बाद पूरे शहर में सन्नाटा पसर गया।

कहा जा रहा है कि प्रदर्शनकारी आरोपितों का घर जलाना चाहते थे, लेकिन मौक़े पर पहुँची पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर कर दिया। सुरक्षा के लिहाज से राज्य सरकार ने कैमूर में इंटरनेट सेवाओं को भी बंद कर दिया है। गृह विभाग के आदेशानुसार 25 से 26 नवंबर तक जिले में इंटरनेट सेवा बंद रहेगी।

‘प्रभात खबर’ के कैमूर संस्करण में प्रकाशित खबर

प्रभात खबर की रिपोर्ट के अनुसार इस मामले में पुलिस ने अरबाज और सोनू को गिरफ्तार कर लिया है। कलाम और सिकंदर अब भी फरार हैं। उनकी गिरफ्तारी के लिए पटना से आई एसटीएफ की टीम स्थानीय पुलिस के साथ छापेमारी कर रही है। पीड़िता की आत्महत्या की फैली अफवाह ने भी लोगों के आक्रोश को बढ़ाने का काम किया।

गौरतलब है कि रविवार को वीडियो वायरल होने के बाद इस मामले ने तूल पकड़ा था। वायरल वीडियो में देखा गया था कि एक कार में कुछ लड़के नाबालिग लड़की का मुँह बंद करके उसका बलात्कार कर रहे हैं और गाड़ी का शीशा लॉक है। इसके बाद रविवार को ही पीड़िता भभुआ स्थित महिला थाने पहुँची और मोहनियां के चारों लड़कों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई।

लड़की ने बताया कि अरबाज उसे कोचिंग आने-जाने के दौरान मिला था। इस दौरान उसने उसे प्रेम जाल में फँसाया। फिर शादी का झाँसा देकर पिछले 5 महीने से वह उसका यौन शोषण कर रहा था। मंगलवार को पीड़िता को कलाम ने मोहनिया में मुंडेश्वरी गेट के पास बुलाया। वहाँ अरबाज और उसके साथी पहले ही गाड़ी लेकर मौजूद थे। लड़की के आते ही उसे गाड़ी में खींच लिया गया। जब लड़की ने चिल्ला कर विरोध किया तो उसके मुँह पर पट्टी बाँध दी गई और हत्या कर फेंकने की धमकी देकर रतवार नदी के पास ले गए। जहाँ चारों ने मिलकर उसके साथ पहले बलात्कार किया और फिर उसका वीडियो वायरल कर दिया।

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कल ही कराओ फ्लोर टेस्ट: सुप्रीम कोर्ट ने फडणवीस सरकार को सदन में बहुमत साबित करने का दिया आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र मामले में बहुप्रतीक्षित फ़ैसला सुना दिया है। ये जजमेंट जस्टिस रमन्ना ने पढ़ा। उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं के बीच सौहार्द ज़रूरी है और इस मामले में न्यायपालिका के हस्तक्षेप को लेकर कुछ विवाद हैं। उन्होंने कहा कि सभी पक्ष संवैधानिक नैतिकता को कायम रखें। उन्होंने 27 नवंबर, 2019 को फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने सदन में वोटिंग की विडियोग्राफी कराने के भी आदेश दिए हैं। साथ ही कहा है वोटिंग ओपन बैलेट से होगा। इससे पहले प्रोटेम स्पीकर का चुनाव किया जाएगा। साथ ही पूरी प्रक्रिया का लाइव प्रसारण भी करने के निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि सदन के सबसे वरिष्ठ सदस्य को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाए। साथ ही पूरी प्रक्रिया बुधवार शाम से पहले पूरी हो जानी चाहिए।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में शुक्रवार (नवंबर 22, 2019) की शाम एनसीपी, कॉन्ग्रेस और शिवसेना की बैठक हुई और मुख्यमंत्री के रूप में उद्धव ठाकरे के नाम पर सहमति बनी। लेकिन देर रात पासा तब पलट गया, जब एनसीपी विधायक दल के नेता अजित पवार विधायकों का समर्थन-पत्र लेकर राज्यपाल से मिले और भाजपा को समर्थन दे दिया। इसके बाद शनिवार की सुबह राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। अजित पवार उप-मुख्यमंत्री बने। राज्यपाल के फ़ैसले को त्रुटिपूर्ण बता कर शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी ने संयुक्त याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की और शपथ ग्रहण को असंवैधानिक बताया।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने रविवार की सुनवाई के दौरान तुरंत फ्लोर टेस्ट का आदेश नहीं दिया। सोमवार को हुई सुनवाई के बाद फ़ैसला सुरक्षित रख लिया गया था। सुनवाई के दौरान विपक्ष के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने 24 घंटे के भीतर फ्लोर टेस्ट कराने की माँग की थी। वहीं भाजपा की तरफ से पेश मुकुल रोहतगी ने कहा कि कोर्ट ऐसा आदेश नहीं दे सकता। रोहतगी ने जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ को बताया कि अजित पवार को हटा कर जयंत पाटिल को एनसीपी विधायक दल का नेता बनाने वाले पत्र में 12 विधायकों के हस्ताक्षर नहीं हैं, इसीलिए पार्टी का ये फ़ैसला वैध नहीं है।

अभिषेक मनु सिंघवी ने दावा किया कि राज्यपाल को सौंपा गया 54 एनसीपी विधायकों के हस्ताक्षर तो वैध हैं, लेकिन इसमें कहीं भी भाजपा को समर्थन किए जाने का जिक्र नहीं है। वहीं शिवसेना की तरफ़ से कपिल सिब्बल ने जिरह की। उन्होंने दलील पेश करते हुए कहा कि इतनी सुबह (5.47 बजे) राष्ट्रपति शासन हटाए जाने की जल्दी क्यों की गई? उन्होंने पूछा कि ऐसी भी क्या हड़बड़ी थी? सिब्बल ने दावा किया कि उद्धव ठाकरे का नाम भावी सीएम के रूप में तीनों दलों द्वारा मीडिया में घोषित किया जा चुका था, लेकिन राज्यपाल ने 24 घंटे भी इन्तजार नहीं किया।

सॉलिसिटर जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राज्यपाल ने अपने समक्ष पेश किए गए दस्तावेजों के आधार पर अपने विवेक से निर्णय लिया और कोर्ट उनके विवेक पर सवाल नहीं उठा सकता।

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महाराष्ट्र: बीजेपी-शिवसेना सरकार के लिए हाई कोर्ट पहुॅंची ठाणे की महिला

महाराष्ट्र में भाजपा ने अजित पवार के नेतृत्व वाले एनसीपी धड़े के साथ मिलकर सरकार बना ली है। इस सरकार के भाग्य का फैसला आज सुप्रीम कोर्ट करेगा। सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी ने संयुक्त याचिका दायर कर रखी है। तीनों दल शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में सरकार बनाने का दावा भी कर रहे हैं।


बावजूद एक महिला ने भाजपा और शिवसेना की साझा सरकार बनने की उम्मीद नहीं छोड़ी है। दोनों दलों ने विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ा था। जनादेश भी गठबंधन सरकार के पक्ष में था। लेकिन, ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद की मॉंग पर शिवसेना के अड़ने के कारण ऐसा नहीं हो पाया।

इस बीच महाराष्ट्र के ठाणे की रहने वाली प्रिया चौहान ने हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की है। इसमें उन्होंने कहा है कि राज्य में भाजपा-शिवसेना को जनता ने जनादेश दिया है। इसलिए उन्हें ही मिलकर सरकार बनानी चाहिए। याचिका में उच्च न्यायालय से शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस के चुनाव बाद हुए गठबंधन से मुख्यमंत्री बनाए जाने के खिलाफ निर्देश देने की माँग की गई है।

प्रिया की तरफ से यह याचिका अधिवक्ता नितिन सातपुते ने दायर की। प्रिया ने अपनी याचिका में कोर्ट से केंद्र और राज्य को यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया है कि चुनाव बाद बने भाजपा-अजित पवार के गठबंधन की सरकार भी नहीं होनी चाहिए।

याचिका में भाजपा-शिवसेना की सरकार नहीं बनने पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की माँग भी की गई है। प्रिया ने याचिका में आरोप लगाया है कि भाजपा और शिवसेना दोनों ने मतदाताओं के साथ विश्वासघात किया है। वे अपने वादों को निभाने में नाकामयाब रहे और चुनाव के बाद उनका गठबंधन बदल गया है।

याचिका में दावा किया गया है कि भाजपा ने महाराष्ट्र की सत्ता में गैर-भाजपा गठबंधन के सरकार के आने की संभावना को देखते हुए राजनीतिक तंत्र का सहारा लिया। इसके साथ ही याचिका में राज्यपाल के महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन को रद्द करने के तरीके पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिसमे देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की अनुमति दी गई थी। इसमें कहा गया है कि राज्यपाल ने पक्षपातपूर्ण तरीके से काम किया है और राज्यपाल के उच्च पद का मजाक उड़ाया है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि 22 और 23 नवंबर की रात को राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री के रूप में देवेंद्र फडणवीस को शपथ ग्रहण दिला कर केंद्र में सत्ताधारी राजनीतिक दल के इशारे पर काम किया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसा करके गवर्नर ने खुद को “बीजेपी के अवैध सत्ता में मोहरा” साबित कर दिया है। फिलहाल याचिका पर सुनवाई शुरू नहीं हुई है।

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अयोध्या में राम मंदिर: नसीर, शबाना सहित 100 हस्तियों ने कहा- पुनर्विचार याचिका से कौम को नुकसान

अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आज (नवंबर 26, 2019) सुन्नी वक्फ बोर्ड की अहम बैठक है।
बोर्ड इस बात पर फैसला करेगा कि सुप्रीम कोर्ट के ​आदेशानुसार वह मस्जिद बनाने के लिए पॉंच एकड़ जमीन कबूल करेगा या नहीं। हालॉंकि फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करने की बात वह पहले ही कह चुका है।

इस अहम बैठक से पहले जानी-मानी 100 मुस्लिम हस्तियों ने एक अपील की है। इनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष की ओर से रिव्यू पीटिशन नहीं दाखिल करना बेहतर होगा। उल्लेखनीय है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा ए हिंद ने पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का पिछले दिनों फैसला किया था।

सोमवार (नवंबर 25, 2019) को अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और शबाना आजमी समेत देश भर की 100 जानी-मानी शख्सियतों ने कहा कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले के कुछ पक्षकारों का पुनर्विचार दायर करने से विवाद जिंदा रखेगा और यह मुस्लिम समुदाय को नुकसान पहुँचाएगा।

इसमें कहा गया है, “हम इस बात से सहमति रखते हैं कि फैसला न्यायिक रूप से त्रुटिपूर्ण है, लेकिन हमारा मजबूती से मानना है कि अयोध्या विवाद को जीवित रखना भारतीय मुस्लिमों को नुकसान पहुँचाएगा और उनकी मदद नहीं करेगा।” बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में इस्लामी स्कॉलर से लेकर म्यूजिशियन, पत्रकार, शायर, फिल्मकार और स्टूडेंट भी शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को अपने ऐतिहासिक फैसले में राम जन्मभूमि रामलला को सौंप दी थी। वहॉं मंदिर बनाने के लिए केंद्र सरकार को तीन महीने में ट्रस्ट का गठन करने के निर्देश दिए थे। साथ ही मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में ही कहीं और पॉंच एकड़ जमीन उपलब्ध कराने को कहा था।

फैसला आने से पहले मुस्लिमों पक्षों ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का जो भी निर्णय हो वह उन्हें मान्य होगा। लेकिन, फैसले के बाद शरीयत का हवाला दे अपने स्टैंड से पीछे हट गए। इसी कड़ी में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने शीर्ष अदालत के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्णय किया है।

वहीं, सुन्नी वक्फ बोर्ड पॉंच एकड़ जमीन को लेकर असमंजस में है। बोर्ड ने लोगों से सुझाव भी माँगा था कि 5 एकड़ जमीन का क्या करें। कई लोगों ने वहाँ स्कूल और कॉलेज बनवाने का सुझाव दिया है।

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166 लोगों की मौत के तुरंत बाद 800 लोगों के साथ ‘पार्टी ऑल नाइट’ में मशगूल हो गए थे राहुल गाँधी

“राहुल गाँधी ने 26/11 मुंबई हमलों में वीरगति को प्राप्त हुए जवानों का तिरस्कार किया है। उन्होंने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर देने वाले हेमंत करकरे, अशोक कामटे, तुकाराम अम्बोले और विजय सालस्कर जैसे मराठा पुलिसकर्मियों की बहादुरी का अपमान किया है। उन्होंने एनएसजी के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को अपमानित किया है। जब मुंबई में हमला हुआ, तब राहुल कहाँ थे?”

ये बयान शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे का है। पुराना है। वही उद्धव ठाकरे, जिनकी उपस्थिति में सोमवार (नवंबर 25, 2019) को कॉन्ग्रेस, शिवसेना और एनसीपी के विधायकों को शपथ दिलाई गई। वह शपथ क्या थी? शपथ थी कि सभी विधायक सोनिया गाँधी, शरद पवार और उद्धव के नेतृत्व में अपनी पार्टियों के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे। इस दौरान पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता अशोक चव्हाण ने शिवसेना के साथ गठबंधन के लिए सोनिया और राहुल गाँधी को धन्यवाद दिया। ऊपर उद्धव के जिस बयान का हमने जिक्र किया है, वो फ़रवरी 2010 का है। दरअसल, राहुल गाँधी ने शिवसेना के उत्तर भारत विरोधी रुख पर प्रहार करते हुए बताया था कि कैसे उत्तर भारतीय एनएसजी कमांडोज़ ने आतंकियों को चित किया। उद्धव इसी पर प्रतिक्रिया दे रहे थे।

राजनीति है। उद्धव के उस बयान के 9 साल होने को आए। सब कुछ बदल गया है। अब उद्धव कभी राहुल से ये नहीं पूछेंगे कि वो मुंबई हमलों के वक़्त या उसके बाद वे कहाँ थे? कम से कम इन परिस्थितियों में तो बिलकुल भी नहीं पूछेंगे। तो इस बयान से सवा 2 साल और पीछे चलते हैं। नवम्बर 26, 2008 का दिन किसको याद नहीं? यही वो दिन है, जब पाकिस्तान से आए 10 आतंकियों ने मुंबई को थर्रा दिया था। इस हमले में 174 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था। यूपीए-1 की सरकार थी। राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस के महासचिव थे। मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। सोनिया गाँधी सरकार की सर्वेसर्वा थीं, कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष थीं।

मुंबई हमले के तुरंत बाद राहुल गाँधी दिल्ली के ग्रामीण इलाक़े में स्थित एक फार्महाउस में पार्टी करते पाए गए थे। तब तक बलिदानी मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की माँ की आँखों के आँसू भी नहीं सूखे थे। 174 मृत लोगों के परिजनों का गम ताज़ा ही था। 300 घायलों के परिचित अभी भी अस्पतालों के चक्कर काट रहे थे। लेकिन, कॉन्ग्रेस के भावी अध्यक्ष पार्टी करने में मशगूल थे। उन्होंने नवंबर 31, 2008 को शाम से ही पार्टी शुरू कर दी थी। पार्टी रात भर चली। भारतीय सुरक्षा बलों का ऑपरेशन नवंबर 29, 2008 तक चला था।

राहुल गाँधी की पार्टी अगले दिन सुबह 5 बजे ख़त्म हुई। मौक़ा स्पेशल था। राहुल के स्कूल के दिनों के सहपाठी समीर शर्मा की शादी थी। ये ‘संगीत’ का कार्यक्रम था। लेकिन, राहुल ये भूल गए कि वो सत्ताधारी पार्टी के महासचिव और भावी अध्यक्ष के रूप में पेश किए जा रहे थे। उनपर कुछ समाजिक जिम्मेदारियाँ बनती थीं। उनके हर क़दम पर मीडिया की नज़र थी। उन्हें जनता को सन्देश देना था। उस क्षण में भारत के साथ खड़ा होना था। लेकिन नहीं, वो दोस्तों संग रात भर मौज करने में व्यस्त हो गए।

पार्टी की जगह भी शानदार थी- छतरपुर के राधे मोहन चौक पर स्थित भव्य फार्महाउस, काफ़ी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ। उस दौरान दिल्ली में चुनाव भी चल रहे थे। जिस दिन राहुल गाँधी ने पार्टी करनी शुरू की, उससे एक दिन पहले ही उनकी बहन प्रियंका गाँधी भी वोट देने निकली थीं। प्रियंका ने इस दौरान 26/11 मुंबई हमलों पर चर्चा करते हुए कहा था कि अगर उनकी दादी इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री होतीं तो मुंबई हमले को इस तरह हैंडल करतीं, जिससे सभी को गर्व महसूस होता। एक ऐसी महिला ने ये बात कही, जिसकी माँ नेपथ्य से भारत सरकार चला रही थी। प्रियंका ने याद दिलाया कि कैसे आतंकवाद ने उनके पिता की जान ले ली थी।

आपके मन में एक सवाल ज़रूर कौंध रहा होगा कि ये समीर शर्मा कौन हैं, जिनकी शादी थी? दरअसल, वो अमेरिका में बसे फर्नीचर डिजाइनर थे। वो राजीव गाँधी के फ़्लाइंग पार्टनर कैप्टन सतीश शर्मा के बेटे हैं। सतीश शर्मा ने ही राजीव गाँधी की हत्या के बाद अमेठी से उनकी जगह लोकसभा चुनाव लड़ा था और जीत कर नरसिम्हा राव सरकार में कैबिनेट मंत्री बने थे। वो गाँधी परिवार के दूसरे गढ़ अमेठी से भी सांसद रहे हैं। यह भी जानने लायक बात है कि मुंबई हमलों के बाद कई रेस्टॉरेंट्स ने पूर्व में निर्धारित कई पार्टियाँ रद्द कर दी थी। सरकारी अधिकारियों ने आयोजनों में जाना मुनासिब नहीं समझा था।

राहुल इन चीजों से दूर थे। देश के मूड से दूर थे। वे 800 अन्य अतिथियों के साथ पार्टी कर रहे थे। इससे मुंबई हमलों को क़रीब से देखने वाले लोगों को तो ख़ासा दुख हुआ। इसकी बानगी तब देखने को मिली, जब 26/11 के दौरान ओबेरॉय होटल में फँसे कॉर्पोरेट वकील अभय बहल ने उनकी आलोचना की। बहल ने कहा कि इन्हीं हरकतों की वजह से देश का उन लोगों पर से विश्वास उठ जाता है, जिन्हें भविष्य का नेता कहा जाता है। ‘इंडिया टुडे’ की एक रिपोर्ट में उसी पार्टी के एक अतिथि का बयान प्रकाशित हुआ। उस अतिथि ने कहा कि यहाँ जो भी लोग पार्टी कर रहे हैं, उनमें से कोई भी सार्वजनिक जीवन में नहीं है। नाम न छपने की शर्त पर उसने बताया कि राहुल गाँधी ज़रूर सार्वजनिक जीवन में हैं और उन्हें किन मौक़ों पर कहाँ और कैसे दिखना है, इसका ध्यान रखना चाहिए।

यूपीए काल के दौरान बम ब्लास्ट जैसे आम बात थे। जुलाई 2011 में भी मुंबई को दहलाया गया था। 26 लोग काल के गाल में समा गए थे और क़रीब 150 घायल हुए थे। तब राहुल गाँधी ने कहा था कि सभी आतंकी हमलों को नहीं रोका जा सकता। साथ ही उन्होंने दावा किया था कि 99% आतंकी हमलों को समय रहते रोक लिया जाता है। उनका कहना था कि आतंकवाद ऐसी चीज है, जिसे हर समय के लिए रोकना असंभव है। अभी 2014 के बाद से भारत के बड़े शहरों में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ। अप्रैल 2019 में गुजरात के अमरेली में एक रैली को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया था कि 2014 के बाद से पूरे देश में कोई बड़ा आतंकी बम ब्लास्ट नहीं हुआ।

‘मेल टुडे’ के दिसंबर 1, 2008 संस्करण में छपी ख़बर: पार्टी मूड में राहुल गाँधी

राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस के उपाध्यक्ष बने। फिर अध्यक्ष बने। फिर इस्तीफा दे दिया। अब राहुल कहते हैं कि वो बस एक मामूली कार्यकर्ता हैं। पार्टी के सेवक हैं। न तो सत्ता में रहते उन्होंने जिम्मेदारी निभाई और न ही उनसे विपक्ष की राजनीति हो पाई। राहुल अब इटली और थाईलैंड जाते हैं। पार्टी करते हैं। लेकिन, अब मुंबई हमले जैसी वारदातों के बाद सरकार चुप नहीं बैठती। उरी हमले के बाद पीओके में घुस कर आतंकियों का सफाया किया जाता है। पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तान में घुस कर वायुसेना बम बरसाती है और आतंकी कैम्पों को तबाह करती है। दुश्मन वही हैं, बस उन्हें हैंडल करने का तरीका बदल गया है। अब डोजियर नहीं सौंपे जाते, स्ट्राइक किया जाता है।

हाँ, प्रियंका गाँधी अब भी दादी इंदिरा पर ही अटकी हैं। मुंबई हमलों के बाद उनके परिवार की सरकार रहते हुए भी वो इंदिरा गाँधी को याद कर रही थीं। लोकसभा चुनाव से पहले जब राजनीति में उनकी एंट्री हुई, तब उनके नैन-नक्श को इंदिरा से मिलता-जुलता बता कर उनमें दादी की छवि देखी गई। लोकसभा चुनाव में उन्हें यूपी की जिम्मेदारी मिली और कॉन्ग्रेस वहाँ फुस्स रही। प्रियंका इधर ट्वीट करती रही कि दादी कैसे उन्हें कहानियाँ सुनाया करती थीं। सब कुछ बदल गया लेकिन प्रियंका गाँधी की इंदिरा से तुलना होती रही। शायद होती ही रहेगी। तब तक, जब तक वो भी अपने भाई की तरह कॉन्ग्रेस की ‘मामूली कार्यकर्ता’ न बन जाएँ। या फिर क्या पता? राजनीति से ही निकल जाएँ।

70 साल में पहली बार J&K में संविधान दिवस: अब तक 103 संशोधन, पहला राज्यसभा के गठन से भी पहले

आज (26 नवंबर 2019) संविधान दिवस की 70वीं वर्षगाँठ है। संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को संविधान अंगीकार किया था। इसे लागू 26 जनवरी 1950 को किया गया था। 26 नवंबर को हर साल संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है।

यह पहला मौका है जब जम्मू-कश्मीर में भी संविधान दिवस मनाया जा रहा है। इसी साल अगस्त में केंद्र सरकार ने आर्टिकल 370 के अधिकतर प्रावधानों को निरस्त कर राज्य का विशेष दर्जा खत्म कर दिया था। साथ ही राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया था।

मीडिया रिपोर्टों में जम्मू-कश्मीर सामान्य प्रशासन विभाग के अतिरिक्त सचिव सुभाष सी छिब्बर के हवाले से बताया गया है कि संविधान निर्माताओं के योगदान के प्रति आभार प्रकट करने और इसमें शामिल उत्कृष्ट मूल्यों और नियमों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

बता दें कि भारतीय संसद ने संविधान में 70 साल के दौरान 103 बार संशोधन किए हैं। इनमें से केवल एक संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित किया। पहला और अंतिम, दोनों संविधान संशोधन सामाजिक न्याय से संबंधित थे। राज्यसभा सचिवालय की तरफ से जारी ब्यौरे के मुताबिक संविधान में पहला संशोधन 1951 में अस्थायी संसद ने पारित किया था। उस समय राज्यसभा नहीं थी।

राज्यसभा सचिवालय ने बताया कि पहले संशोधन के तहत ‘राज्यों’ को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के उत्थान के लिए सकारात्मक कदम उठाने का अधिकार दिया गया था। वहीं संविधान में किया गया अंतिम 103वाँ संशोधन 2019 में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को शैक्षणिक संस्थानों और नियुक्तियों में 10 फीसदी आरक्षण देने से संबंधित था।

विज्ञप्ति में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल 99वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक करार दिया था। यह संशोधन राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन के संबंध में था। 1952 में गठन होने के बाद से राज्यसभा ने 107 संविधान संशोधन विधेयक पारित किए हैं। इनमें से एक को लोकसभा ने अस्वीकार कर दिया था। चार संविधान संशोधन विधेयक निचले सदन के भंग होने की वजह से निष्प्रभावी हो गए।

राज्यसभा ने 1990 में पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगाने संबंधी विधेयक पारित किया था जो लोकसभा में पास नहीं हो सका। लोकसभा से अब तक 106 संविधान संशोधन विधेयक पारित हुए हैं, जिसमें से तीन को राज्यसभा ने अमान्य कर दिया था। इनमें 1970 में तत्कालीन देसी रियासतों के पूर्व शासकों के प्रिवी पर्स और विशेषाधिकार को खत्म करने वाला विधेयक और 1989 में पंचायतों और नगर निकायों तथा नगर पंचायतों में सीधा चुनाव कराने के लिए लाए गए दो विधेयक शामिल हैं।

राज्यपाल को सौंपे पत्र में कॉन्ग्रेस विधायक दल के नेता ने नहीं किया हस्ताक्षर: 162 विधायकों का शक्ति प्रदर्शन

महाराष्ट्र में राजनीतिक घटनाक्रम पल-पल बदल रहा है। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के फ़ैसले को ग़लत साबित करने के लिए तीनों विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट तक गए। शीर्ष अदालत मंगलवार (नवंबर 26, 2019) को इस सम्बन्ध में फ़ैसला देगी। अब कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना ने तीनों दलों के 162 विधायकों की मीडिया के सामने परेड कराई है। तीनों दल लगातार सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत होने का दावा कर रहे हैं। उधर भाजपा भी बहुमत साबित कर दिखाने का दावा कर रही है। ऐसे में तीनों दलों द्वारा मीडिया के सामने शक्ति प्रदर्शन से भाजपा की मुश्किलें बढ़ भी सकती हैं।

मुंबई के बांद्रा में स्थित ग्रैंड हयात होटल में शिवसेना अध्यक्ष शरद पवार, एनसीपी के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और कॉन्ग्रेस नेता व पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने विधायकों को सम्बोधित किया। उद्धव ने इस दौरान आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए कहा कि शिवसेना क्या चीज है, अब पता चलेगा। उन्होंने एनसीपी के साथ गठजोड़ को सही बताते हुए यहाँ तक कह दिया कि उनका गठबंधन अगले 30 सालों तक चलेगा। उद्धव ने कहा कि वो सत्ता में जय नहीं बल्कि सत्यमेव जयते होना चाहिए।

वहीं अशोक चव्हाण ने कहा कि तीनों दलों के 162 नहीं बल्कि उससे भी ज्यादा विधायक हैं। उन्होंने कहा कि शिवसेना के साथ गठबंधन सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी का सराहनीय फ़ैसला है। हालाँकि, राज्यपाल को सौंपे गए समर्थन पत्र में कॉन्ग्रेस विधायक दल के नेता का हस्ताक्षर नहीं है। इसकी जगह प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष बालासाहब थोराट के हस्ताक्षर हैं। साथ ही उस पत्र में ये भी नहीं बताया गया है कि सरकार किसके नेतृत्व में बनेगी और मुख्यमंत्री कौन होगा?

मीडिया के सामने तीनों दलों के शक्ति प्रदर्शन में शरद पवार भी पहुँचे। शिवसेना नेता संजय राउत उन्हें लेकर होटल में पहुँचे। समाजवादी पार्टी के नेता अबू आजमी ने भी इस शक्ति प्रदर्शन में हिस्सा लिया। सपा ने अपने दोनों विधायकों को शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस को समर्थन देने को कहा है। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल ने भी इस दौरान अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन, इस दौरान सबसे ज्यादा सक्रिय शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले दिखीं। उन्होंने एक-एक कर कई विधायकों से मुलाक़ात की। आदित्य ठाकरे भी इस दौरान काफ़ी सक्रिय दिखे।

ग्रैंड हयात होटल में तीनों दलों ने ‘वी आर 162’ लिखे हुए बैनर लगाए। इससे पहले संजय राउत ने ट्वीट कर राज्यपाल कोश्यारी को टैग किया था और इस शक्ति प्रदर्शन की जानकारी दी थी। मंच पर संविधान के कवर पेज की फोटो लगाई गई थी। विधायकों को शपथ भी दिलाई गई कि वे उद्धव ठाकरे, शरद पवार और सोनिया गाँधी के नेतृत्व में अपनी पार्टियों के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे।

अजित पवार को जाँच एजेंसियों ने दी क्लीन चिट: मीडिया व कॉन्ग्रेस के दुष्प्रचार का Fact Check

मीडिया में ऐसी ख़बरें चल रही हैं कि एंटी-करप्शन ब्यूरो ने अजित पवार के ख़िलाफ़ चल रहे सारे मामलों में जाँच बंद कर के उन्हें क्लीन चिट दे दिया है। साथ ही सोशल मीडिया में इस ख़बर को आधार बना कर यह पूछा गया कि क्या भाजपा के साथ आते ही अजित पवार ‘क्लीन’ हो गए हैं और उन्हें देवेंद्र फडणवीस की सरकार का समर्थन करने के बदले यह इनाम दिया गया है? आजतक और न्यू इंडियन एक्सप्रेस जैसे मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों का अलावा नेशनल हेराल्ड जैसे प्रोपेगंडा पोर्टल्स तक, सबने झूठ फैलाया। पत्रकार राजदीप सरदेसाई और कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला भी नहीं चूके।

आजतक ने पूछा कि क्या भाजपा के साथ आते अजित पवार ‘क्लीन’ हो गए हैं? साथ ही लिखा कि उनसे जुड़े सिंचाई घोटाले के 9 मामलों को बंद कर दिया गया है।

आजतक जैसे बड़े मीडिया संस्थान भी नहीं रहे पीछे

राजदीप सरदेसाई ने ‘गोलमाल है भाई, सब गोलमाल है’ गाने का प्रयोग करते हुए तंज कसा कि केस को बंद करने की टाइमिंग संदेहास्पद है।

इसी तरह कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने लिखा कि भ्रष्टाचार के मामलों को बंद किए जाने के एवज में समर्थन माँगा जा रहा है। उन्होंने इसे लोकतंत्र पर धब्बा करार किया।

इधर कॉन्ग्रेस मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ ने लिखा कि अजित पवार को इरीगेशन स्कैम मामले में क्लीन चिट दे दी गई है।

नेशनल हेराल्ड ने फैलाया झूठ: अजित पवार को मिली क्लीन चिट

लेकिन, सच्चाई कुछ और ही निकली। दरअसल, जिन 9 सिंचाई घोटालों की फाइलें बंद की गई थीं, उनमें से एक भी अजित पवार से सम्बंधित नहीं थीं। उन घोटालों का अजित पवार से दूर-दूर तक नाता नहीं था लेकिन मीडिया ने इसे ग़लत तरीके से फैलाया। हालाँकि, जिन केसों को बंद किया गया, वो भी सशर्त रूप से। अगर कुछ और आता है तो उन्हें फिर से खोला जा सकता है।

महाराष्ट्र एंटी-करप्शन ब्यूरो के डायरेक्टर परमबीर सिंह ने मीडिया के सामने आकर इस दुष्प्रचार का ख़ुद खंडन किया। उन्होंने बताया कि एजेंसी सिंचाई घोटाले से जुड़े 3000 टेंडरों की जाँच कर रही है। उन्होंने 9 मामले बंद होने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ये रूटीन इन्क्वाइरी थी। साथ ही उन्होंने साफ़ कर दिया कि इनमें से कोई भी मामला महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री अजित पवार से जुड़ा नहीं है।

आने वाले पाँच वर्षों में विकास की गति बनाए रखने के लिए स्थिर सरकार की ज़रूरत: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झारखंड के डालटनगंज में एक चुनावी रैली के दौरान तीन दिन पूर्व लातेहार में नक्सली हमले में शहीद पुलिसवालों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि उनके परिवार वालों के साथ अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करता हूँ। उन्होंने कहा कि आज अगर पूरे भारत में कमल शान से खिला है, तो इसकी बहुत बड़ी भूमिका यहाँ की जनता की है, यहाँ के भाजपा कार्यकर्ताओं की रही है। उन्होंने कहा कि यहाँ के लोग हमेशा कमल के निशान के साथ खड़े रहे हैं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डालटनंगज और गुमला के चुनावी सभा में कॉन्ग्रेस पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस ने अनुच्छेद-370 को हटाने और राम मंदिर विवाद को 70 साल से लटकाए रखा है। वह चुनावी राज्य झारखंड के पलामू में एक सार्वजनिक रैली को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस को मुद्दों को लटकाए रखने की आदत है। उसने अनुच्छेद-370 को हटाने और राम मंदिर विवाद को 70 वर्षों तक लंबित रखा। कॉन्ग्रेस ने ऐसे मुद्दों को केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए बनाए रखा। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने हल करने का वादा किया था। इस तरह के मुद्दों और हमने अपने वादों को पूरा किया। भाजपा अखंड भारत और महान भारत के लिए काम करती है।”

बता दें कि यह झारखंड में मोदी की पहली चुनावी रैली थी। इस दौरान उन्होंने कहा, “राम मंदिर विवाद सुलझ गया है और अब हर कोई ख़ुश है”।

पीएम मोदी ने कहा, “झारखंड को एक मज़बूत और स्थिर सरकार की ज़रूरत है। यह पिछले पाँच वर्षों में विकास की ओर बढ़ा है और आने वाले पाँच वर्षों में गति बनाए रखने की ज़रूरत है।”

इसके आगे उन्होंने कहा, “झारखंड सरकार पाँच सिद्धांतों पर चल रही थी- स्थिरता, सुशासन, विकास, स्वाभिमान और राष्ट्रीय सुरक्षा। भाजपा ने भ्रष्टाचार मुक्त, पारदर्शी सरकार प्रदान की और राज्य को लुटने से बचाया। माओवादी ख़तरे को समाप्त करने के प्रयास किए गए। राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के कारण माओवाद फल-फूल गया था।”

प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्षी गठबंधन पर हमला किया और कहा कि कॉन्ग्रेस, झामुमो और राजद भाजपा के ख़िलाफ़ एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा, “महागठबंधन सिर्फ़ सत्ता हथियाने के लिए बनाया गया था। अगर विपक्ष जीत गया, तो राज्य की स्थिति फिर से अस्थिर हो जाएगी।”

इस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं को भी सूचीबद्ध किया, जिसमें उन्होंने बताया कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोगों के जीवन में किस तरह से बदलाव आया है।