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NRC के विरोध में ममता बनर्जी: कहा- बांग्लादेशी घुसपैठियों को देंगे यहीं रहने का अधिकार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घुसपैठियों से एक लुभावना वादा किया है। ममता ने साफ़ कर दिया है कि वह एनआरसी से उलट घुसपैठियों को भगाने के पक्ष में नहीं हैं। कैबिनेट मीटिंग से निकलकर उन्होंने कहा कि राज्य में उनकी सरकार सभी शरणार्थियों को रहने का अधिकार देगी।

एक रिपोर्ट के मुताबिक एनआरसी के जवाब में ममता ने यह कदम उठाने का फैसला किया है। दरअसल, ममता एनआरसी योजना की सबसे कठोर आलोचकों में से एक हैं। बता दें कि बंगाल में घुसपैठियों और शरणार्थियों की अधिकांश बस्तियाँ उन जगहों पर बसी हुई हैं जोकि राज्य सरकार की हैं। मगर यहाँ बसने वाले लोग दरअसल मूल रूप से भारतीय नहीं हैं इसीलिए उन्हें अक्सर विरोध का सामना करना पड़ता है।

ममता ने ऐलान किया है कि इन लोगों को उसी ज़मीन का अधिकार दिया जाएगा जिस पर यह रह रहे हैं। गौरतलब है कि ममता सरकार पहले ही बंगाल में ऐसी 94 कालोनियों को रेगुलर कर चुकी है जहाँ घुसपैठिये और रिफ्यूजी रहते हैं। दरअसल 1971 से ही भारत के बंगाल से सटी बांग्लादेश सीमा को पार कर घुसपैठिए इन इलाकों में बसने लगे थे। उस वक़्त आज का बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान हुआ करता था। उस समय बांग्लाभाषी लोगों पर पश्चिमी पाकिस्तान के इशारे पर हुए ज़ुल्म के चलते कई परिवारों ने पलायन कर भारत में शरण ले ली थी। इनमें से अधिकतर रिफ्यूजी असम और पश्चिम बंगाल में जाकर बस गए।

रिफ्यूजियों के सन्दर्भ में भी भारत सरकार ने यह स्पष्ट किया था कि भारतीय सीमा के अन्दर किसी भी रिफ्यूजी को हमेशा के लिए शरण नहीं मिलेगी। यही वजह है कि 1971 युद्ध के बाद जब बांग्लादेश बना, तो रिफ्यूजियों को भारत से उनके अपने देश रवाना कर दिया गया। बावजूद इसके इनमें कई ऐसे थे जो वापस नहीं गए। यहीं परिवार बसा लेने के बाद आज उन रिफ्यूजियों की एक अच्छी खासी तादाद बांग्लादेश की सीमा से जुड़े राज्य बंगाल में रहती है।

देश-विदेश में एड देने वाले AAP के पास चुनाव लड़ने के लिए फंड नहीं: केजरीवाल ने कहा- चंदा दे दो जी

आम आदमी पार्टी के पास दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए फंड नहीं है। रविवार (24 नवंबर) को बुराड़ी की जनसभा में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लोगों से चंदा देने की अपील की। 

रैली को संबोधित करते हुए, केजरीवाल ने कहा, “हमने दिल्ली में पिछले पाँच वर्षों में बहुत काम किया है। आगामी चुनाव लड़ने के लिए हमारे पास पैसे नहीं हैं। मैंने पिछले पाँच वर्षों में एक रुपया भी नहीं कमाया है।” 

2019 के आम चुनावों से पहले, आम आदमी पार्टी को भारत के अलावा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और ओमान में दान विज्ञापन चलाते हुए पकड़ा गया था।

बता दें कि आम आदमी पार्टी के अतीत में दान के साथ एक संदिग्ध संबंध रहा है। मई 2017 में यह आरोप लगाया गया था कि AAP ने हवाला लेनदेन के माध्यम से शेल कंपनियों से करोड़ों का फंड प्राप्त किया। इससे पहले, भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना हज़ारे ने AAP प्रमुख को पार्टी द्वारा मिले दान पर सफाई देने के लिए पत्र लिखा था।

यह ​​आरोप भी लगाया गया कि 2014 के आम चुनावों से पहले केजरीवाल को संदिग्ध चैनलों के माध्यम से पैसा मिला था। आप में रह चुके भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने आरोप लगाया था कि केजरीवाल के वाराणसी से 2014 के आम चुनावों के लिए अपना नामांकन दाखिल करने से एक हफ्ते पहले 5 अप्रैल, 2014 को चार शेल कंपनियों ने AAP के खाते में 2 करोड़ रुपए जमा किए थे। इन 4 कंपनियों में से 3 कंपनियों के डायरेक्टर हेम प्रकाश शर्मा थे। दिल्ली में जीके में किए गए प्रदर्शन के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापे के दौरान 13 करोड़ रुपए की करेंसी बरामद हुई थी। इस कंपनी के निदेशकों में से एक हेम प्रकाश शर्मा भी हैं। कपिल मिश्रा ने केजरीवाल और हेम प्रकाश के बीच गहरे रिश्ते को भी उजागर किया था।

ख़बर के अनुसार, ऑपइंडिया ने जब रहस्यमय हेम प्रकाश शर्मा के बारे में पड़ताल की, तो पता चला कि आधिकारिक रिकॉर्ड यह बताते हैं कि जिन चार कंपनियों ने अप्रैल 2014 में AAP को दान दिया था, उनके पास दिखाने के लिए किसी लेन-देन का कोई रिकॉर्ड नहीं था। इन कंपनियों के तीन कॉमन डायरेक्टर हेम प्रकाश शर्मा, धर्मेन्द्र कुमार और मुकेश कुमार थे। रजिस्ट्रार हाउस में जो पता था उसके मुताबिक़ वहाँ एक डाकघर, एक किराने की दुकान जिसका शटर डाउन था और एक छोटा सिलाई कारखाना था। विवरण से, ऐसा पता चला था कि वो शेल कंपनियाँ थी।

इसके अलावा, डीएनए इन निदेशकों में से एक मुकेश कुमार को ट्रैक करने में सक्षम था, जिन्होंने इस बात से इनकार कर दिया था कि उन्होंने AAP को कभी कोई दान दिया था। उन्होंने इन कंपनियों के मालिक होने की बात स्वीकार की, जो केवल कागज पर मौजूद हैं, लेकिन AAP को दान देने से उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया। डीएनए के अनुसार, जब उन्होंने आधिकारिक रिकॉर्ड में वर्णित हेम प्रकाश शर्मा के पते का दौरा किया, तो उन्हें वहाँ दो मंज़िला घर मिला। उसमें दीपिका शर्मा नाम की एक महिला अपने परिवार के साथ 60 के दशक से रह रही थी। उस महिला ने हेम प्रकाश शर्मा के बारे में कुछ भी पता होने से इनकार कर दिया।

अब सवाल यह उठता है कि फिर ये रहस्यमय पुरुष आख़िर है कौन? क्या वो काल्पनिक हैं? अगर हाँ, तो इन कार्यों का वित्तपोषण कौन कर रहा है? आख़िर अरविंद केजरीवाल, हमसे ऐसा क्या छिपा रहे हैं?

जब आम आदमी पार्टी भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में आई, तो यह भारत में राजनीतिक दलों के काम करने के तरीके को बदलने के वादे के साथ मैदान पर आई। इसने अपने कार्यों में पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता का वादा किया, और अधिकांश लोगों ने उनके इस वादे पर भरोसा भी किया। लेकिन इस पार्टी ने जो एक अभिनव का काम किया, वह यह था कि उसने अपनी वेबसाइट पर मिलने वाले दान की एक सूची प्रकाशित की, जिससे उसकी वित्तीय गतिविधियों की पारदर्शिता सबके सामने रहे।

वर्ष 2016 में, पार्टी ने अपनी वेबसाइट से इस दान सूची को हटा लिया। उस समय, सूची वाला वेबपेज अभी ‘under construction’ है और ‘New Version coming soon..’ जैसा मैसेज दिख रहा था। लेकिन वो New Version… कभी नहीं आया।

दान सूची को हटाने के लिए योगेंद्र यादव और अन्ना हजारे सहित कई लोगों से बातचीत की गई थी। पार्टी के पूर्व सदस्य यादव ने आरोप लगाया था कि पार्टी नकद चंदा इकट्ठा कर रही थी जो कि दर्ज नहीं था।

इसके बाद पार्टी ने अपनी वेबसाइट पर अपने दान पृष्ठ को फिर से जारी किया, लेकिन उसमें एक बदलाव भी शामिल था। उन्होंने पृष्ठ के लिए वेबपेज का पता बदल दिया। पहले पेज का नाम donate.aamaadmiparty.org था, लेकिन बाद में उसे aamaadmiparty.org से बदल दिया। 

पिछले साल नवंबर में, दिल्ली में ज़हरीले प्रदूषण की चपेट में आने के बाद केजरीवाल दुबई की निजी यात्रा पर गए थे। यह भी पता चला था कि दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन भी एक सप्ताह के लिए दुबई गए थे। केजरीवाल इससे पहले भी दुबई की यात्राएँ कर चुके हैं, जिसमें बिजनेस क्लास भी शामिल है।

इस बात का भी पता चला था कि सऊदी अरब स्थित भारतीय समुदाय आम आदमी पार्टी के प्रमुख समर्थकों में से एक है। पता चला था कि फरवरी 2015 में दिल्ली राज्य विधानसभा चुनावों में भाजपा को हराने पर वहाँ उन्होंने जश्न मनाया था। इसके ठीक एक साल बाद, उन्होंने दिल्ली में AAP सरकार के एक साल पूरे होने पर भी वहाँ जश्न मनाया था।

‘नरक से भी बदतर है दिल्ली, एक बार में बम से ही उड़ा दो’: 21 शहरों में सबसे दूषित पानी दिल्ली में

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट लम्बे समय से चिंता जता रहा है। इस बार कोर्ट ने राजधानी में जल प्रदूषण को लेकर टिप्पणी की है। दिल्ली में पानी की समस्या पहले से ही विकट है, तो वहीं दिल्ली में गंदे पानी से फैलने वाले रोगों की भी कमी नहीं हैं। इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है और कहा है कि राजधानी दिल्ली की हालत नरक से भी बदतर है। एक रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाते हुए कहा है कि लोगों को दम घोंट कर मारने से अच्छा है कि एक साथ बारूद से उड़ा दिया जाए।

इस मामले में कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी नोटिस जारी किया है। अपने नोटिस के ज़रिए कोर्ट ने लोगों को पीने का साफ़ पानी और साफ़ हवा उपलब्ध न करा पाने पर मुआवज़ा देने की बात भी कही है। कोर्ट ने कहा कि क्यों न इसके लिए सरकार को ज़िम्मेदारी दे दी जाए। बता दें कि एक जाँच रिपोर्ट के अनुसार भारत में 21 शहरों के पानी का सैम्पल जाँच के लिए लिया गया था। इनमें सबसे दूषित और खराब पानी दिल्ली का पाया गया।

दिल्ली के चीफ सेक्रेट्री ने भी इस बात को माना है कि दिल्ली की सत्ता के दो केंद्र होने के चलते प्रदूषण जैसे गंभीर विषय पर कोई सार्थक निर्णय नहीं लिया जा रहा। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यहाँ तक कह दिया, “लोगों को गैस चैंबर में रहने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है। 15 बोरों में बारूद लाकर सबको उड़ा दीजिए। लोगों को इस तरह क्यों घुटना पड़े।”

वही पंजाब और हरियाणा में पराली जलाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रवैय्या दिखाया। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के मुख्य सचिव से सवाल किया कि आखिर आप ऐसा कर कैसे सकते हैं, ऐसा कर के आप लोगों को मरने के लिए छोड़ दे रहे हैं।

मुख्या सचिव से सीधा सवाल करते हुए कोर्ट ने पूछा कि आप इस पर क्यों नियन्त्रण नहीं कर पा रहे? क्या यह मान लिया जाए कि आप इसमें विफल हो गए हैं ? कोर्ट ने आगे कहा कि आप यह बताइए कि आदेश के बाद और भी ज्यादा पराली क्यों जलाई जा रही है?

इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के मुख्यासचिव से भी जवाब तलब किया। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ” सभी को यह पता होना चाहिए है कि इस मामले को लेकर हम आपको बिलकुल भी छोड़ने वाले नहीं हैं” बता दें कि जस्टिस अरुण मिश्र ने यूपी के चीफ सेक्रेटरी को पराली जलने के सम्बन्ध में कड़ी चेतवानी दी है। वहीं उत्तर प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी ने बताया कि पराली जलाने को लेकर राज्य में तकरीबन 1000 एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं साथ ही एक करोड़ का जुर्माना भी लगा दिया गया है।

मुंबई चलाने में नाकाम पार्टी महाराष्ट्र कैसे चलाएगी: अजित पवार ने मनाने आए NCP नेताओं से कही ये 5 बातें

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और एनसीपी के अजित पवार अपनी पार्टी से बगावत कर के उप-मुख्यमंत्री बने। अजित को मनाने के लिए शरद पवार ने अपने विश्वस्त क्षत्रपों को भेजा लेकिन सब नाकाम हुए। अजित पवार ने सोशल मीडिया पर मिल रही बधाइयों का जवाब देते हुए सबका धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि पूरे 5 साल सरकार चलेगी। हालाँकि, एनसीपी ने उन्हें विधायक दल का नेता पद से तो हटा दिया है लेकिन पार्टी से नहीं निकाला है। जयंत पाटिल, छगन भुजबन और वलसे पाटिल सहित कई नेताओं ने अजित के साथ बैठक कर उन्हें मनाने की कोशिश की।

इस दौरान अजित पवार ने एनसीपी नेताओं के सामने कई तर्क रखे। उन्होंने ख़ुद को सही साबित करने के लिए 5 बिंदुओं को एनसीपी नेताओं के सामने रखा। वो 5 बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. पाँच सालों के लिए NCP का मुख्यमंत्री क्यों नहीं?

अजित पवार ने पूछा कि जब 56 सीटों वाली शिवसेना 105 सीटों वाली भाजपा से ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री माँग रही थी तो अब उसे एनसीपी और कॉन्ग्रेस के साथ वाले गठबंधन में पूरे 5 सालों के लिए मुख्यमंत्री का पद क्यों दिया जाए?

अजित पवार ने एनसीपी नेताओं को कहा कि उद्धव ठाकरे 54 सीटों वाली एनसीपी को ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद क्यों नहीं देगी? उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि एनसीपी नेताओं का शिवसेना के सामने झुकना उन्हें पसंद नहीं है।

2. गठबंधन लोकतंत्र विरोधी नहीं

अजित पवार ने एनसीपी नेताओं से पूछा कि अगर भाजपा और एनसीपी के गठबंधन को अलोकतांत्रिक बताया जा रहा है तो फिर शिवसेना के साथ उसका गठबंधन लोकतान्त्रिक कैसे हुआ? उन्होंने नेताओं को याद दिलाया कि कैसे शिवसेना नेताओं ने चुनाव के दौरान कई बार सीमाएँ लाँघते हुए एनसीपी व एनसीपी नेताओं के ख़िलाफ़ ओछी भाषा का प्रयोग किया।

3. टिकाऊ होगा भाजपा-एनसीपी गठबंधन

अजित पवार ने कहा कि तीन दल मिल कर सरकार बनाएँ, इससे अच्छा है कि दो पार्टियों की एक स्थिर सरकार हो। उन्होंने शंका जताई कि तीन दलों की सरकार ठीक से नहीं चल पाएगी। उन्होंने शिवसेना के व्यवहार की चर्चा करते हुए कहा कि उसके साथ गठबंधन टिकाऊ नहीं होगा।

4. महाराष्ट्र के साथ वफादार नहीं है शिवसेना

अजित पवार ने उदाहरण देते हुए बताया कि शिवसेना ने कॉन्ग्रेस की आपत्ति के कारण ‘महा शिव अघाड़ी’ नाम में से ‘शिव’ हटा दिया। उन्होंने पूछा कि ऐसी पार्टी महाराष्ट्र के गर्व के साथ न्याय कैसे करेगी? उन्होंने कहा कि शिवसेना मराठा स्वाभिमान को आगे ले जाने वाली पार्टी नहीं है।

5. मुंबई संभालने में नाकाम हो रही शिवसेना

बृहन्मुम्बई महानगरपालिका में एक अरसे से शिवसेना काबिज है। अजित पवार ने कहा कि शिवसेना उसे चलाने में ही नाकाम सिद्ध हो रही है। उन्होंने उन्हें मनाने आए एनसीपी नेताओं से पूछा कि जो शिवसेना मुंबई संभालने में नाकाम हो रही है, वो पूरे राज्य को कैसे संभालेगी? उन्होंने कहा कि राज्य चलाने के मामले में शिवसेना पर भरोसा करना सही नहीं है।

जब चमकी मारवाड़ी तलवार तो सलावत खान के दिल के हो गई पार, दरबार छोड़ नंगे पाँव भागा शाहजहाँ

इतिहास में कई योद्धाओं के नाम प्रचलित हैं। उनमें से कई ऐसे भी थे, जिन्हें मज़बूरी में इस्लामिक आक्रांताओं की तरफ से लड़ाइयाँ लड़नी पड़ी थी। कुछ मज़बूरी में गए थे तो कुछ अपनों से ही बदला लेने के लिए। कुछ गद्दार भी थे, जिन्होंने विदेशियों के साथ लड़ते हुए अपनों का ख़ून बहाया। मेवाड़ के शक्ति सिंह ने अकबर के दरबार में हाजिरी लगाई, लेकिन जब उनका जमीर जागा तो उन्होंने बड़े भाई प्रताप के प्राणों की रक्षा की। इसी तरह नागौर के अमर सिंह राठौड़ का नाम भी लोकप्रिय है, जिसे राजस्थान में आज भी याद किया जाता है।

अमर सिंह ने मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के भरे दरबार में ऐसा कारनामा किया था कि ये ख़बर पूरे देश में पहुँची और उनके सहस को देख कर इस्लामिक आक्रांता थर्रा उठे। इस घटना के बारे में विस्तार से बताने से पहले अमर सिंह के बारे में बताना ज़रूरी है। वो राठौड़ राजवंश के राजा गज सिंह प्रथम के पुत्र थे। गज सिंह को ‘दलथम्मन’ भी कहा जाता था। ये उपाधि उन्हें तत्कालीन मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने दी थी। हालाँकि, गज सिंह की मृत्यु के बाद अमर सिंह बड़ा पुत्र होने के बावजूद मारवाड़ के सिंहासन पर नहीं बैठ पाए। सत्ता उनके छोटे भाई जसवंत के साथ में गई। अमर सिंह उनलोगों की नज़र में काफ़ी उद्दंड थे।

उन्हें मारवाड़ से निकाल दिया गया और वो मुगलों के पास गए। शाहजहाँ ने उन्हें नागौर की जागीर दी। लेकिन, अमर सिंह स्वतंत्र विचारों वाले और स्वाभिमानी किस्म के व्यक्ति थे। मारवाड़ में भले ही वो राजा नहीं बन पाए लेकिन वो राजा से भी ज्यादा लोकप्रिय थे। दक्षिण में उनके पिता ने जितने भी युद्ध लड़े थे, उसमें अमर सिंह ने अदम्य सहस और पराक्रम दिखाया था। फिर भी बाहर निकाले जाने पर उन्होंने आगरा के मुग़ल दरबाद में शरण ली। उनके साथ राठौड़ राजवंश के कई अन्य लोग भी अगवा आए।

अमर सिंह की बहादुरी से प्रभावित होकर शाहजहाँ ने उन्हें 3000 घोड़ों वाली सेना का कमांडर बनाया। उन्हें ‘मंसब’ और ‘राव’ के टाइटल से नवाजा गया। नागौर एक स्वतंत्र जागीर था, जिसे शाहजहाँ की गद्दी से चलाया जाता था। अमर सिंह का बढ़ता क़द कई दरबारियों को रास नहीं आया और वो उनसे जलने लगे। शाहजहाँ के दरबार के अन्य दरबारी उन्हें ठिकाना लगाने का उपाय तलाशने लगे। एक बार वो शिकार पर गए और 2 सप्ताह तक नहीं लौटे। अमर सिंह इस दौरान शाहजहाँ के दरबार से भी ग़ैर-हाजिर रहे।

अब यहाँ एक दूसरे किरदार की एंट्री होती है, जिसका नाम था सलावत ख़ान। सलावत ख़ान शाहजहाँ का कोषाधिकारी था। एक तरह से पूरे खजाने का इंचार्ज वही था। जब अमर सिंह वापस आए तो सलावत ख़ान उन पर हुक्म चलाने लगा। उसने दादागिरी दिखाते हुए पूछा कि वो इतने दिनों तक कहाँ थे और दरबार से अनुपस्थित क्यों रहे। अमर सिंह को ये पसंद नहीं आया और उन्होंने कहा कि वो सीधे बादशाह को जवाब देंगे। लेकिन, सलावत ख़ान उनसे जुर्माना वसूलने की बात करने लगा। अमर सिंह ने अपनी तलवार और म्यान दिखाते हुए कहा कि उनके पास यही एक धन है और अगर चाहिए तो सलावत ख़ान आकर ले जाए।

जब यह सब हो रहा था, तब पूरा दरबार भरा हुआ था। शाहजहाँ ख़ुद गद्दी पर बैठा हुआ था। सलावत ख़ान ने अमर सिंह को गँवार बताया और पूछा कि वो बादशाह के सामने अपनी आवाज़ ऊँची कैसे कर सकता है? इसके बाद अमर सिंह ने जो किया, वो इतिहास में दर्ज हो गया। गालियाँ न सिर्फ़ उन्हें बल्कि हिंदुत्व को भी दी गई थी, उनके धर्म को लेकर ओछी बातें कही गई थीं। अमर सिंह ने तुरंत अपने म्यान में से तलवार निकाली और अगले ही क्षण उनकी तलवार सलावत ख़ान के दिल को छेद कर उस पार निकल गई।

पूरे दरबार में हाहाकार मच गया। कुछ लोग वहाँ से उठ कर भागने लगे तो कुछ लोग सन्न रह गए। ख़ुद शाहजहाँ गद्दी से उठ कर अपने कक्ष में भाग खड़ा हुआ। मुग़ल सिपाहियों ने इसके बाद अमर सिंह को बंदी बनाने के लिए उन्हें घेर लिया। उसे एक पल के लिए ऐसा लगा कि अमर सिंह उस पर ही झपट रहे हैं, इसलिए वो वहाँ से नंगे पाँव भाग खड़ा हुआ। अमर सिंह वहाँ से भाग निकले। आगरा किले के दरवाजों को बंद कर दिया गया। लेकिन, बहादुर अमर सिंह घोड़ा सहित दीवार फाँद कर वहाँ से निकल लिए।

जब-जब भारतीय सूरमाओं ने अपनी बहादुरी से इस्लामिक आक्रांताओं को चित कर दिया, तब-तब भारत-विरोधी ताक़तों ने धोखे और छल का तरीका अपनाया। इसलिए, शाहजहाँ ने भी छल का रास्ता अपनाया। अमर सिंह को संधि के बहाने आगरा बुलाया गया और फिर पीछे से मार डाला गया। अमर सिंह के घोड़े की प्रतिमा भी किले के पश्चिमी दरवाजे पर लगवाई गई। अमर सिंह की याद में उनकी बहादुरी को सलाम करने के लिए अकबर दरवाजा का नाम बदल कर अमर सिंह दरवाजा कर दिया गया।

लेकिन, मुगलों ने अमर सिंह जैसे वीर योद्धा के मृत शरीर के साथ जो किया, उसके लिए इतिहास उन्हें शायद ही माफ़ कर पाए। अमर सिंह के मृत शरीर को नदी में फेंक दिया गया- उस जगह पर, जहाँ पर भिखारियों की लाशें पड़ी रहती थीं। अमर सिंह के शरीर को चील-कौवों के खाने के लिए छोड़ दिया गया। अमर सिंह की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी को सती होना पड़ा। अमर सिंह की पत्नी ने पहले ख़ुद तलवार निकाल कर पति का मृत शरीर लाने की ठानी थी, लेकिन भतीजे राम सिंह के आग्रह पर उन्होंने उसे वहाँ जाने दिया। उस वक़्त राम सिंह की उम्र मात्र 15 वर्ष थी।

राम सिंह ने भी अपने चाचा की तरह ही बहादुरी का परिचय दिया और अमर सिंह का मृत शरीर लेकर आए। रोका, लेकिन वो नहीं रुके। हजारों मुग़ल सिपाहियों के बीच से अपने चाचा के पार्थिव शरीर को वे अंतिम संस्कार के लिए वापस लेकर आए। इतिहास में ऐसे योद्धा शायद कहीं गुम हो गए हैं। रह गया है तो शाहजहाँ और उसका ताजमहल। वही ताजमहल, जिसे अपने अंतिम दिनों में वह एक किले में नज़रबंद होकर देखा करता था। वहीं, नागौर और मारवाड़ में आज भी अमर सिंह और राम सिंह के किस्से सुनाए जाते हैं। आज भी ‘अमर सिंह दरवाजा’ उस वीरता की गाथा कहता है।

इतिहास में गुम हैं मुगलों को 17 बार हराने वाले अहोम योद्धा: देश भूल गया ब्रह्मपुत्र के इन बेटों को

‘मुगलों ने हिंदुस्तान को लूटा ही नहीं, माल बाहर भी भेजा, ये रहा सबूत’

पुणे में बैठ कर दिल्ली चलाने वाला मराठा: 16 की उम्र में सँभाली कमान, निज़ाम और मैसूर को किया चित

मुस्लिमों को ख़ुश करने के लिए इंदिरा ने पागल महिला के सामने टेके थे घुटने: दे दिया था दिल्ली का महल

1970 के दशक की बात है। इंदिरा गाँधी देश की प्रधानमंत्री हुआ करती थीं। एक महिला अपने दो बच्चों के साथ दिल्ली आती है और उसका दावा है कि वह अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह की वारिस हैं। उस औरत ने अपना नाम विलायत बेग़म बताया। उस महिला ने अपने बच्चों का नाम राजकुमार रज़ा महल और राजकुमारी सकीना बताया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस महिला ने दावा किया कि एक समय उसका परिवार बेहद आलीशान जिंदगी जिया करता था। उसने सरकार से माँग रखी कि नई दिल्ली के चाणक्यपुरी में बसा मालचा महल उसे रहने के लिए दे दिया जाए।

महिला ने दावा किया कि उसके पति अवध की रियासत के नवाब वाजिद अली शाह के वंशज थे, सम्प्रदाय से वह लोग शिया थे और अवध रियासत के आखिरी नवाब के खानदान से ताल्लुक होने के चलते इसपर उनका हक है। बता दें कि नवाब वाजिद अली शाह को 1856 में अंग्रेजों ने कलकत्ता के पास माटियाबुर्ज में क़ैद कर दिया था।

न्यू-यॉर्क टाइम्स की एक खबर की मानें तो इस महिला ने इंदिरा गाँधी को चकमा देकर सरकार से दिल्ली के मालचा महल की संपत्ति ही हथिया ली। जब विलायत बेग़म ने अपनी माँग को लेकर इंदिरा सरकार पर दबाव डाला तो यूपी सरकार ने भी इस बात पर जोर दिया कि उसकी माँग को मान लिया जाए अन्यथा शिया समुदाय इसे अपनी तौहीनी समझेंगे। इसके बाद खुद इंदिरा गाँधी को अपनी सरकार के प्रति शिया समुदाय के विश्वास की चिंता होने लगी और उन्होंने इस मामले में घुटने टेकना ही मुनासिब समझा।

अपने दावे को और मज़बूत करने के लिए वह महिला विदेशी संवाददाताओं से मिलती जिनके ज़रिये उसकी कहानी दुनिया तक फैलती रही। 1984 आते-आते विलायत बेग़म ने भारत सरकार से समझौता करते-करते मालचा महल ले लिया। इंदिरा गाँधी ने भी इसको लेकर पूछे जाने पर सफाई पेश करते हुए कहा कि विलायत बेग़म ने सबसे कम लोकप्रिय मोनुमेंट मालचा महल को अपने रहने के लिए चुना है। बता दें कि यह खँडहर एक ज़माने में फ़िरोज़शाह तुगलक का हंटिंग लॉज हुआ करता था। तुगलक जब शिकार पर निकलते थे तो यहीं ठहरते थे। 1993 के बाद इस मालचा महल को लेकर कई जनश्रुतियाँ प्रचलित हुईं जिनमे कहा गया कि इस महल में रहने वाली विलायत बेग़म ने हीरे को पीसकर निगल लिया और आत्म-हत्या कर ली।

अवध के राजपरिवार का मालचा महल दरअसल नई दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में स्थित है। कहा जाता है कि वर्ष 2016 में इस खानदान के राजकुमार प्रिंस साइरस और प्रिंस अली रजा की मौत के बाद से ही यह इमारत खाली और वीरान पड़ी है। अभी तक यही माना जाता रहा है कि विलायत बेग़म के पति वाजिद अली शाह के खानदानी थे। लेकिन, न्यू-यॉर्क टाइम्स की एक पत्रकार एलेन बैरी ने यह दावा किया कि यह महज़ एक ढोंग था। खुद को बेग़म कहने वाली विलायत और उसके बच्चों ने जो दावे किए वह झूठे थे।

दरअसल विलायत बेग़म की शादी लखनऊ में हुई थी मगर बँटवारे के वक़्त हुई हिंसा के बाद उनके पति पाकिस्तान में जा बसे। एलेन के मुताबिक, पति की मौत के बाद दिन-प्रतिदिन विलायत की हालत वहाँ बिगड़ने लगी। लखनऊ से बाहर निकलने के बाद वह खुद को संभाल नहीं पाई थी। उसकी हालत इस कदर बिगड़ती चली गई कि एक बार तो उसने पाकिस्तान के पीएम को थप्पड़ तक मार दिया था (हालाँकि एलेन ने पीएम के नाम का ज़िक्र नहीं किया है)।

इस हरकत के लिए विलायत को बड़ी सज़ा से बचाने के लिए लन्दन के एक मेंटल हॉस्पिटल में 6 महीने के लिए डाल दिया गया। उसे वहाँ मेंटल करार दे दिया गया, रोज़ इंजेक्शन लगाए जाते। विलायत ने वहाँ से निकलकर नई दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और अपने चार बच्चों के साथ 1970 में हिन्दुस्तान भाग आई। अपने और अपने चार बच्चों से जुड़े कोई भी वैध दस्तावेज़ उस महिला के पास नहीं थे। न ही भारतीय प्रशासन ने इसके लिए उस महिला की कोई जाँच की।

उस महिला ने भारत में दाखिल होते ही कहा कि वह एक नवाब की खानदानी है और इंदिरा सरकार ने उसकी यह माँग मान ली। दिल्ली के मालचा महल में जाने से पहले उसने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफोर्म पर भी कुछ साल बिताए किसी ने भी इस मामले को लेकर एक सवाल तक नहीं किया।

इमरान खान को अयोग्य ठहराने की उठी माँग: लाहौर HC में दायर हुई याचिका

क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं हैं। आलम ये है अभी तक जहाँ उनके ख़िलाफ़ केवल प्रदर्शन किए जा रहे थे, तरह-तरह की बयानबाजियाँ सामने आ रहीं थी। तो वहीं, अब उनके ख़िलाफ़ खुलकर कानूनी कार्रवाई किए जाने की माँग उठने लगी है। इस वक्त उनपर दो तरफ से मुश्किलें आई हैं। एक ओर जहाँ उनकी पार्टी के संस्थापक सदस्य अकबर एस बाबर ने चुनाव आयोग से उनकी पार्टी के ख़िलाफ़ विदेशी चंदा मामले की जाँच का अनुरोध किया है, तो वहीं अब कोर्ट के खिलाफ कथित तौर पर टिप्पणी करने के मामले में उनके खिलाफ याचिका दायर की गई है। इस याचिका में इमरान खान को अयोग्य करार देने की माँग उठाई गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इमरान ने पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विदेश में इलाज कराने को लेकर कथित तौर पर कोर्ट के खिलाफ और चीफ जस्टिस आसिफ सईद पर टिप्पणी की थी। जिसके बाद एक शख्स ताहिर मसूद ने लाहौर हाईकोर्ट में इमरान के खिलाफ याचिका दायर की। याचिका में मसूद ने कहा कि इमरान खान पर कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चलना चाहिए।

प्रधानमंत्री इमरान खान के खिलाफ़ याचिका दायर करते हुए मसूद ने ये भी आरोप लगाया है कि खान ने वरिष्ठ न्यायधीशों की आलोचना की है। इसके साथ ही उन्होंने पिछली बार 2013 में कोर्ट के खिलाफ टिप्पणी करने के मामले का भी जिक्र भी याचिका में किया और कहा कि इससे पहले भी इमरान खान कोर्ट के ख़िलाफ़ टिप्पणी कर चुके हैं। मसूद ने अपनी याचिका में अन्य नेताओं को कोर्ट के ख़िलाफ़ बोलने पर हुई सजा का हवाला दिया और इमरान खान को अयोग्य करार देने की माँग उठाई।उन्होंने निर्वाचन आयोग से खान की नेशनल असेंबली सदस्यता रद्द करने को भी कहा है।

गौरतलब है कि इससे पहले इमरान खान को उनकी पार्टी के संस्थापक सदस्य अकबर एस बाबर द्वारा भी आड़े हाथों लिया जा चुका है और चुनाव आयोग ने भी उनकी ओर कड़ा रुख अपनाया है। जहाँ बाबर ने चुनाव आयोग से विदेशी चंदा मामले की जाँच का अनुरोध किया है। वहीं, चुनाव आयोग इस माँग से तीन दिन पहले ही पार्टी के खिलाफ़ 5 साल पुराने विदेशी चंदा मामले की सुनवाई रोजाना करने का फैसला कर लिया है।

बता दें, इस संबंध में बाबर ने नवंबर, 2014 में पार्टी को मिले विदेशी चंदे के खिलाफ एक मामला दायर किया था। इसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि 21 करोड़ रुपए की रकम पार्टी को 2 विदेशी कंपनियों से हुंडी के जरिए मिली और बाद में इसे पश्चिम एशिया से पाकिस्तान स्थित खातों में भेजा गया था।

‘BJP ने अजित के रूप में एक भैंसा अपने बाड़े में बाँध दिया और दूध दुहने के लिए ऑपरेशन कमल की योजना बनाई’

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना लगातार भाजपा पर हमला कर रहे हैं। इन सबके बीच शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के जरिए एक बार फिर भाजपा पर तीखा वार किया है। ‘लड्डू हजम होंगे क्या? बगावत असफल!!’ नाम के शीर्षक से लिखे गए इस लेख में कहा गया है कि कुछ भी हो जाए, बीजेपी विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाएगी।

इस लेख में बीजेपी का नाम लेते हुए कहा गया है, “अजित पवार के रूप में उन्होंने एक भैंसे को अपने बाड़े में लाकर बाँध दिया है और भैंसे से दूध दुहने के लिए ‘ऑपरेशन कमल’ योजना बनाई है। यही लोग सत्ता ही उद्देश्य नहीं है, ऐसा प्रवचन झाड़ते हुए नैतिकता बघार रहे थे। अब तुम्हारे पास बहुमत है ये देखकर ही राज्यपाल ने शपथ दिलाई है, ऐसा तुम कह रहे हो न? तो फिर ‘ऑपरेशन कमल’ जैसी ‘उठाईगिरी’ क्यों? हम उन्हें इस उठाईगिरी और भैंसागिरी के लिए शुभकामनाएँ देते हैं।”

लेख में आगे कहा गया है कि अजित पवार की यह कथित बगावत बालू पर गधे के मूतने पर हुई गंदगी जैसी हो गई है। महाराष्ट्र में जो कुछ हो रहा है उसे ‘नाटक’ कहना रंगमंच का अपमान है। पहले उन्होंने (बीजेपी) शिवसेना जैसा मित्र खो दिया और अब वे शातिर चोर की तरह रात के अंधेरे में अपराध कर रहे हैं। सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में राज्यपाल के समक्ष भाजपा के पास सरकार बनाने का मौका था। राज्यपाल उन्हीं की पार्टी और उन्हीं की नीति के होने के कारण भगतसिंह कोश्यारी ने भाजपा के नेताओं को निमंत्रित किया ही था। उन्होंने नकार दिया। शिवसेना को बुलाया गया। लेकिन सरकार बनाने के लिए 24 घंटे भी नहीं दिए गए। इसलिए पर्दे के पीछे जो तय किया गया था उसके अनुसार राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लाद दिया।

संपादकीय में लिखा गया है, “कॉन्ग्रेस, शिवसेना और राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी की आने वाली सरकार नैतिक या अनैतिक की बात छोड़ो लेकिन देवेंद्र फडणवीस और उनकी पार्टी ने ये किसको जन्म दिया है? सिर गधे का और धड़ भैंसे का ऐसा प्रारूप महाराष्ट्र के माथे पर मार कर ये लोग एक-दूसरे को लड्डू खिलाते हैं। लेकिन लड्डू खिलाते समय वो उनके गले के नीचे नहीं उतर रहा था और उनके चेहरे पर आनंद के भाव भी नहीं थे। असली सवाल ये है कि ये लड्डू उन्हें हजम होंगे क्या और इसका उत्तर है- नहीं।”

सामना के संपादकीय में अंत में लिखा गया है कि भाजपा के साथ जाकर अजित पवार ने राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस के विधायकों को फँसाया है। भाजपा ने अजित पवार को फँसाया और सबने मिलकर महाराष्ट्र को फँसाया। इस धोखाधड़ी में राजभवन का दुरुपयोग हुआ। ये पाप है। लेकिन पाप-पुण्य की बजाय जिनके लिए सत्ता महत्वपूर्ण है, ये उनका आखिरी दौर है। थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए।

175, 162, 154… कितने MLA हैं साथ, यह शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस को खुद नहीं पता

288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में बहुमत का आँकड़ा 145 है। विधानसभा चुनाव में शिवसेना को 56, कॉन्ग्रेस को 44 और एनसीपी को 54 सीटें मिली थी। तीनों दलों की सीटें जोड़ दें तो यह आँकड़ा 154 होता है। शिवसेना का दावा है कि कुछ निर्दलीय भी उसके साथ हैं। इसके अलावा कुछ छोटे दलों का समर्थन होने की बात भी कही जा रही है। लेकिन, शायद ही तीनों दलों में किसी नेता को पता है कि असल में उनके साथ कितने विधायक हैं।

इसका कारण यह है कि शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस के खेमे से आज ही समर्थक विधायकों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान इनके वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने 154 विधायकों के समर्थन का दावा किया। वहीं, शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे ने बताया कि गवर्नर को 162 विधायकों के समर्थन का पत्र सौंपा गया है।

वैसे, शिंदे जिस नंबर का दावा कर रहे हैं वह उनके ही पार्टी के सांसद संजय राउत की ओर से बार-बार किए जा रहे दावे से अलग है। ढाई साल के लिए सीएम पद की शिवसेना की मॉंग जब भाजपा ने ठुकराई उसके बाद से ही राउत 175 के करीब विधायकों के समर्थन का दावा करते रहे हैं। 3 नवंबर को राउत ने कहा था, “170 विधायक हमारा समर्थन कर रहे हैं। यह आँकड़ा 175 भी हो सकता है।” इसके बाद से वे लगातार इस नंबर को दुहराते रहे हैं। यहॉं तक कि अजित पवार के नेतृत्व वाले एनसीपी के धड़े के बीजेपी के साथ जाने के बाद से भी वे इस आँकड़े को दोहराते रहे हैं।

शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस के नेता आज यानी 25 नवंबर को राज्यपाल के पास गए। इसके बाद एनसीपी नेता जयंत पाटिल ने कहा कि उनके साथ 162 विधायक हैं। यही संख्या शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे ने भी दुहराया।

25 नवंबर को ही सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस की ओर नया शपथ-पत्र पेश किया गया, जिसमें 154 विधायकों के समर्थन की बात कही गई थी। हालॉंकि कोर्ट ने इसे लेने से मना कर दिया। इसके बाद कॉन्ग्रेस नेता और याचिकाकर्ताओं के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि वे इस शपथ-पत्र को वापस ले रहे हैं।

इन तीनों दलों का गठबंधन भले बहुमत होने, 10 मिनट में बहुमत साबित करने का दावा कर रहे हों, लेकिन, समर्थक विधायकों को लेकर जिस तरह हर मौके पर इनकी संख्या बदली है, उससे जाहिर होता है कि वे खुद भी नहीं जानते कि उनके साथ कौन है और कौन नहीं। अजित पवार के बीजेपी के साथ जाने के बाद से एनसीपी दावा कर रही है कि 54 में से 52 विधायक पार्टी के साथ हैं। लेकिन, 24 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सिंघवी ने कहा था कि मात्र 42-43 विधायकों के समर्थन से अजित पवार उप मुख्यमंत्री कैसे बन सकते हैं?

ऑपइंडिया को सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार अजित पवार के साथ कम से कम 27 विधायक हैं। एनसीपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री छगन भुजबल ने सोमवार की सुबह उनसे बात की थी। बताया जाता है कि भुजबल ने अजित पवार से कहा कि पार्टी के 30 से 35 विधायक उनके न होने से असहज महसूस कर रहे हैं और यह आँकड़ा बढ़ भी सकता है।

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ध्रुव राठी, आकाश बनर्जी, पीईंग हृयूमन, कुणाल कामरा… तुम करो तो प्यार-व्यार, हम करें तो…

वामपंथी-लिबरल गिरोह के नैरेटिव पर लगातार प्रहार करने की जरूरत है क्योंकि ये रक्तबीज बन कर समाने आए हैं। एक प्रपंच को काटिए, दूसरा पैदा कर देंगे, उसको काटिए, तीसरा आ जाएगा। प्रपंच और प्रोपगेंडा बनाना एक सतत प्रक्रिया है जिसमें, अपने तंत्र के कारण, राठी-बनर्जी-कामरा टाइप के फेक न्यूज फैलाने वाले नवलौंडे भी लाखों लोगों द्वारा ‘तथ्य और आँकड़ों’ के साथ बात करने वाले के तौर पर देखे जाते हैं।

चाहे वो ध्रुव राठी हो या लम्पट आकाश बनर्जी, इन्होंने इस पूरे साल, और उससे पहले भी, इतना ज्यादा झूठ बोला है, अपने विडियो में जिसकी न तो आदि है, न अंत। इन्हें लगता है कि सामने वाला तो मूर्ख है, विडियो के कोने में कुछ भी जोड़-घटाव और कुछ संख्या दिखा दो, वो उसे तथ्यात्मक आँकड़ा मान लेगा। और दुर्भाग्य देखिए वामपंथियों का कि वे सच में इन चिरांधों की विष्ठा को सुगंधित पुष्प मान कर चरमसुख पाने लगते हैं।

इनका क्या है, इन्हें आम आदमी पार्टी जैसों से लगातार प्रश्रय मिलता रहा है, केजरीवाल इनके प्रपंच को ट्वीट करते हैं, अजेंडाबाज रवीश अपने शो में बुला कर इन्हें सर्टिफाय करता है और बीबीसी तक इन जैसों को चुनाव में वैचारिक रैलियाँ करने के लिहाज से पैसे देता है। ये पूरा तंत्र है, और उसके बाद अकादमिक संस्थानों में वामपंथियों के वर्चस्व से स्कूल से निकल कर, कॉलेज पहुँचे विद्यार्थी इनका सबसे पहला शिकार बनते हैं। इन्हें सत्यान्वेषी मानने वालों की सबसे बड़ी भीड़ दिल्ली जैसे जगहों के कॉलेजों के 20-22 साल के अंडरग्रेजुएट छात्र-छात्राओं की है।

कैसे काम करता है यह तंत्र?

इनमें बच्चों का ज्यादा दोष नहीं है। इस उम्र में जब आपको अचानक से उस ‘यूनिफॉर्म’ से छूट मिलती है, जो न सिर्फ एक कपड़ा था बल्कि हर बच्चा एक ही तरह से उठता-बैठता-सोचता था, क्योंकि विद्यालयों में यही होता है, तब आप इस अचानक से मिली स्वच्छंदता से एक सुंदर आघात महसूस करते हैं। आप उस मोड में चले जाते हैं जहाँ ‘हाँ’ कहने वाले से ज्यादा वजन ‘ना’ कहने वाले की बातों में होता है।

ये मनोविज्ञान है और आप स्वयं इसे महसूस करते होंगे कि किसी भी समूह में, अगर अधिकतर व्यक्ति कह रहे हों ‘सुबह का सूरज लाल होता है’, लेकिन एक व्यक्ति कह दे कि वो ऐसा नहीं मानता, तो सब उसकी तरफ देखने लगते हैं। उसके बाद वो अपने बोलने के तरीके से आपसे मनवा लेगा कि सूरज होता तो पीला है, लेकिन हवाओं में मौजूद फलाने अवयवों के कारण हमें लगता है कि वो लाल है।

वैसे ही, अन्य मौकों पर भी एकदम अलग विचार रखने वालों को ‘रेबेल’ के रूप में इज्जत मिलती है, चाहे वो विचार सच्चाई से दूर और तथ्यहीन ही क्यों न हों। ऐसे में कॉलेज में पहुँचे बच्चों को यह मनाने में बहुत आसानी होती है कि सरकार बेकार है। भारत जैसे देश में सरकार का बेकार होना, हर काल और परिस्थिति में एक अकाट्य सत्य है। आप गरीबी का आँकड़ा ले आइए, टूटी सड़क दिखा दीजिए, हॉस्पिटल के कोने में जमा कूड़ा दिखा दीजिए, देखने वाले को हमेशा लगेगा कि भारत बेकार है।

यही होता है कि इन बच्चों के साथ। ये बच्चे स्कूल छोड़ कर आते हैं, ऊर्जा भरी होती है, चार विलक्षण सीनियर या शिक्षक आपसे कह देते हैं कि सवाल करना चाहिए, और इससे पहले कि आप यह सोच पाएँ कि क्या सवाल करना चाहिए, आपको वामपंथी-लिबरल समूह अपने सवाल थमा देगा। फिर वो आपको समझाएगा कि विद्यार्थी जीवन पढ़ाई के लिए नहीं है, विद्रोह के लिए है, पोस्टर बनाने के लिए है, सत्ता से संघर्ष के लिए है। आपको कोई यह कह देगा कि पढ़ने से क्या हो जाएगा, पास करने भर नंबर लाओ, उतनी ही ज़रूरत होती है परीक्षा का फॉर्म भरने के लिए।

आप उनके जाल में फँसते जाते हैं। फिर आपको बताया जाता है कि जवानी बर्बाद मत करो, वैचारिक क्रांति करो। आप उनके ऐसे गुलाम बन चुके होते हैं कि स्वच्छंदता का मतलब अपने इस तरह के सीनियरों की हर बात को मानना हो जाता है। आपकी वैचारिक स्वतंत्रता का मतलब होता है कि ये वामपंथी-लिबरल गिरोह जिस तरह से सोचता है, आप भी वही सोचें। उसके बाद थोड़ा सा सेक्स का तड़का लगा दिया जाता है, थोड़ी शराब मिला दी जाती है, और अभी तक हर चीज माँ-बाप से डर कर करने वाले बच्चे, सेक्स को ही लिबरेशन मानने लगते हैं।

एक तरह से सीनियर आपको यूज करते हैं, आप यूज होते हैं, और आपको लगता है कि आप स्वतंत्र सोच रखने वाले वामपंथी हैं। आपको उकसाया जाता है क्योंकि आप झंडा उठा सकते हैं, कुर्सियाँ लगा सकते हैं, पोस्टर बना सकते हैं, खुले में दारू पी सकते हैं। आपको समझाया जाता है कि यही असली जीवन है, माँ-बाप और परिवार एक बंधन है। इस तरह से चक्रीय तरीके से साल-दर-साल इनके पैदल सिपाहियों की खेप तैयार होती रहती है।

आज के दौर में कॉलेजों की क्रांति से ही बात नहीं बनती। कॉलेज और यूनिवर्सिटी के बच्चे तो बस भीड़ होते हैं। तकनीक ने सीमाओं को तोड़ा है इसलिए सोशल मीडिया पर वामपंथियों ने अपने वर्चस्व के लिए वैचारिक आतंकियों की नियुक्ति की। इन्हें बुद्धिजीवी कहा गया जो कि ‘उदारवादी’ विचार रखने के नाम पर, ‘जो हम कह रहे हैं वही अभिव्यक्ति की आजादी है, बाकी सब कुछ हेट स्पीच, यानी घृणा फैलाने वाली बात है’, जैसे ध्येय वाक्य के साथ चलते हैं।

ऐसे परिदृश्य में इन कच्ची उम्र के युवाओं को उन्हीं के उम्र के लोगों द्वारा इस भेड़चाल का डिजिटल सिपाही बनाने के लिए ध्रुव राठी, आकाश बनर्जी, कुणाल कामरा जैसे लोगों से ले कर पीईंग ह्यूमन जैसे सोशल मीडिया हैंडल तैयार किए गए। ये लोग कहीं से आए नहीं, इन्हें योजनाबद्ध तरीके से, धीरे-धीरे, स्वतंत्र विचारों के नाम पर लाया गया। उसके बाद इन्हें राजनैतिक धक्के लगा कर, रवीश कुमार और केजरीवाल के गिरोह द्वारा ऊपर उठाया गया। बाकी का काम कॉलेज के इन बच्चों ने किया जिन्हें ‘व्यवस्था के खिलाफ’ होने के नाम पर कुछ भी दे दो, वो ले लेंगे। वो इसलिए ले लेंगे क्योंकि पहले से स्थापित नामों ने इन्हें अपना समर्थन दिया है। केजरीवाल राजनीति में मसीहा बन कर आए थे, रवीश पत्रकारिता के मसीहा थे, इन्होंने समर्थन दे दिया तो बाकी ज्यादा करना बचा नहीं।

इस प्रक्रिया के बाद ‘उदारवादी’ विचारधारा के नाम पर, ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर, इन्हें जो सबक सबसे पहले दिया जाता है, वो यह होता है कि दूसरे लोगों को तो दिमाग ही नहीं है, वो न तो पढ़े-लिखे हैं, न ही उन्हें बात करने की तमीज है। इन्हें कहा जाता है कि उन्हें तुरंत नकार दिया करो। इसलिए आप देखेंगे कि जेएनयू छाप लम्पट माओवंशी फेसबुक के कमेंट में भी अगर सवालों के घेरे में फँस जाता है तो वो लिखेगा, ‘थोड़ा पढ़ लिया करो कि मार्क्स ने क्या कहा है, भारत का संविधान क्या है’।

कहानी एक वामपंथी की

उसके बाद वो आपसे बात नहीं करेंगे। सोशल मीडिया पर ऐसा करना आसान है। लेकिन अगर बात आमने-सामने हो रही हो, तब वामपंथी बुरी तरह से फँस जाता है। यहाँ मैं एक कहानी सुनाना चाहूँगा, जो बीस दिन पहले ही मेरे साथ घटित हुई। एक वामपंथी थे, सीनियर हैं तो किसी के कहने पर मिलने चला गया। उन्होंने कहा कि वो मेरे विचारों का समर्थन नहीं करते, मैंने कहा कोई बात नहीं, सबको करना भी नहीं चाहिए। मैं चाह रहा था कि बातें वैयक्तिक ही रहे, राजनैतिक दिशा न लें, वरना दोनों के लिए असहज हो जाता।

लेकिन वामपंथी हर जगह अपनी राजनीति जरूर घुसा देते हैं, ये उनकी मजबूरी है। बात आ गई कि मोदी ने तो बर्बाद कर दिया है। मैंने पूछा कि क्या बर्बाद कर दिया। कहने लगे कि समाज में देखो कितनी समस्याएँ हैं, सब बर्बाद कर रहा है, लोग हिंसक हो गए हैं, अल्पसंख्यकों में डर है, सताया जा रहा है लोगों को। मैंने कहा कि अगर इतनी बर्बादी है, लोग डर रहे हैं तो समुदाय विशेष के इलाकों की आधी सीटों पर भाजपा कैसे जीत गई, लगातार हर राज्य में और केन्द्र में पहले से ज्यादा सीटें कैसे पा रही है?

वो कहने लगे कि हिटलर को भी इसी तरह का समर्थन हासिल था, मोदी भी वही है। मैंने दोबारा पूछा कि किस आधार पर हिटलर कह रहे हैं? वो कहने लगे कि कहना क्या है, वो है, गोधरा देख लो। मैंने पूछा कि ट्रेन में आग भी मोदी ने ही लगवाई थी जिसमें 59 कारसेवक जल गए? उस एक दंगे के अलावा बाकी के हर बड़े दंगे में उसी की सरकार रही है जिसमें आपको अचानक से आशा नजर आने लगी है, कम्यूनिस्टों ने बंगला और केरल में कितनी हत्याएँ करवाई हैं, वो भी पता कीजिए।

अब वो चर्चा से भागने की कोशिश करने लगे कि ये सब फासिज्म है, लोगों पर कानून थोपा जा रहा है, एक खास धर्म के लोगों को ही फायदा हो रहा है। मैंने फिर से पूछा कि सिलिंडर जो बाँटे गए, वो क्या हिन्दुओं को ही मिले? बिजली जो पहुँची वो हिन्दुओं के ही घर में पहुँची? बैंक खाते में जो सब्सिडी पहुँचती है वो हिन्दुओं का ही होता है? शौचालय जो बने वो हिन्दुओं के ही घरों में बने? ट्रिपल तलाक पर कानून हिन्दू महिलाओं के हित में आया? अगर ये फासिज्म है, तो बिलकुल सही है, सबको ऐसे फासिज्म का सपोर्ट करना चाहिए।

कहने लगे कि तुम आर्टिस्ट हो, क्रिएटिव व्यक्ति हो, तुम्हें सत्ता के खिलाफ होना चाहिए। मेरा सवाल था कि ऐसा किस तर्क से सही है? मतलब, कोई सरकार अगर अच्छे काम कर रही है तो हम उसकी इतनी आलोचना करें, ऐसा नैरेटिव बनाएँ कि वो अगली बार सत्ता में न आए, फिर दूसरी आए तो उसकी आलोचना करो… ये कैसा कुतर्क है? चोरों को सत्ता इसलिए दे दो क्योंकि क्रिएटिव लोगों को सत्ता के खिलाफ होना चाहिए! हद है!

जब कोई जवाब नहीं मिला, तो वामपंथियों का अंतिम जुमला आया, देख लेना आने वाले समय में इस देश का क्या होगा। मैंने पलट कर कह दिया कि जिनकी उम्मीद राहुल गाँधी पर टिकी हो, उन्हें भविष्य की चिंता नहीं करनी चाहिए। फिर चिकन चिली आ गई, और हम खाने लगे। ऐसा मेरे साथ एक बार नहीं, कई बार हुआ है। वामपंथियों से, या इन बच्चों से, आप सिर्फ सवाल पूछिए और वो कुछ नहीं बोल पाएँगे। कॉलेज में भी क्लास लेने गया था, वहाँ के बच्चों का भी यही हाल था। मैंने कहा कि जो कह रहा हूँ, वो मत मानो, इंटरनेट पर सर्च कर लो। फिर चुप हो गए सब।

अभिव्यक्ति की आजादी का ढोंग

वापस, पीईंग-राठी-बनर्जी-कामरा पर आते हैं जिन्होंने बौद्धिक आतंकवाद फैला रखा है। उनका मूल हथियार है निःसंकोच, चेहरे पर बिना किसी शिकन के, झूठ बोलते रहना। ऐसा ये लगातार करते रहे हैं। साथ ही, फ्रीडम ऑफ स्पीच के नाम पर आतंकवादियों और नक्सलियों के समर्थन में आने वाले ये लोग, कभी तक फ्रीडम ऑफ स्पीच में विश्वास दिखाते हैं जब तक वो बात इनके मतलब की हो। जहाँ बात इनके खिलाफ होती है, उसे ये सेकेंड भर में ‘फेक न्यूज’ कह कर खारिज कर देते हैं।

ऑपइंडिया ने लगातार वैसे अपराधों की रिपोर्टिंग की है जहाँ पीड़ित हिन्दू हो, और अभियुक्त मजहब विशेष से, क्योंकि बाकी लोग ऐसी रिपोर्ट में नाम छुपा लेते हैं, इसे ‘समुदाय विशेष’ लिखकर निपटा दिया करते हैं और कभी-कभी तो घटना को ही गायब कर देते हैं। हमने आँकड़े जुटाने शुरू किए, इस पर बात करने की कोशिश की कि मंदिरों पर आज भी हमला कौन करता है, मूर्तियाँ कौन तोड़ रहा है, गौरक्षकों को किस मजहब के लोग मार रहे हैं, काँवड़ियों पर रात के एक बजे छत पर बैठ कर पत्थरबाजी कौन करता है… और हर बार एक ही मजहब के लोगों के नाम सामने आए। बलात्कारियों के नामों में जब एक खास मजहब के लोग सामने आने लगे, और उस पर चर्चा होने लगी तो, एक लाइन में कहा जाने लगा कि ऑपइंडिया तो फेक न्यूज फैलाता है, कम्यूनल है।

हमने पूछा कि मजहब का आदमी बलात्कारी है, तो इसमें कम्यूनल क्या है? कट्टरपंथी मंदिर तोड़ रहा है तो इसमें साम्प्रदायिकता कहाँ हैं? कट्टरपंथियों ने घेर कर दसियों हिन्दुओं की लिंचिंग की है, तो इसमें धर्मांधता या बिगट्री कहाँ है? हिन्दुओं के त्योहारों पर अगर पत्थरबाजी हुई है तो इसमें झूठी बात क्या है, बिलकुल मजहबी घृणा से ओतप्रोत कट्टरपंथियों ने ये काम किया है, और वो हर बार रिपोर्ट किया जाएगा।

लेकिन इस तरह की रिपोर्टिंग से वामपंथियों की अधोजटाएँ सुलगने लगीं और स्थान विशेष से धुआँ निकलने लगा। वो सब इसलिए क्योंकि अभी तक बलात्कार की घटनाएँ तभी रिपोर्ट होती थी, जब अभियुक्त हिन्दू हो। हमने दूसरा पक्ष भी दिखाया। हमने बताया कि लिंचिंग तो भरत यादव, अंकित सक्सेना, ध्रुव त्यागी, प्रशांत पुजारी, डॉक्टर नारंग की भी हुई है। हमने बताया कि गौतस्करों ने तो बीस महीने में बीस हिन्दुओं की हत्या की है। पिछले सालों में 50 घटनाएँ ऐसी हुई हैं जो डरा हुआ ‘शांतिप्रिय’ के फर्जी नैरेटिव को ध्वस्त करता है। तब ये कहने लगे कि हम तो घृणा फैलाते हैं। अगर तथ्यों के साथ रिपोर्ट करना, वैचारिक स्तंभ लिखना घृणा फैलाना है, क्योंकि उसमें अपराधी की संलिप्तता है, तो ये काम जारी रहेगा।

अचानक से प्रेस के फ्री होने पर कोई चर्चा नहीं हो रही। मैं इन सब चम्पुओं को खुला चैलेंज देता रहा हूँ कि आओ, पूरी साइट पड़ी हुई है, हिन्दी में ही है, एक खबर निकाल दो जो गलत हो, तुम्हारी बात मान जाऊँगा। इनका दुर्भाग्य यह है कि हमने इनके फैक्टचेकरों का फैक्टचेक किया हुआ है। इनके ‘हेट क्राइम’ का डेटा इकट्ठा करने वालों का सच हम सामने लाए कि ये हिन्दुओं द्वारा, सामान्य अपराध में भी, समुदाय विशेष के पीड़ित होने पर उसे हेट क्राइम मान लेते हैं।

इसके उलट, पूरी तरह से मजहबी कारणों से की हुई हत्याएँ भी जिसमें हत्यारा मजहब विशेष से हो, पीड़ित हिन्दू, उसे हेट क्राइम नहीं मानते। सुप्रीम कोर्ट में इन वामपंथियों के वकील ने उसी साइट का नाम ले कर गलत आँकड़े दिखाने की कोशिश की, और सॉलिसिटर जनरल ने ऑपइंडिया की वो रिपोर्ट जजों के सामने रख दीं जहाँ उस साइट की फैक्ट चेकिंग कर हमने उसे झूठा साबित कर रखा था।

अभिव्यक्ति सिर्फ मेरी सही है, तुम्हारी नहीं

हाल ही में रेडियो जॉकी रौनक को इन निकम्मों के गैंग ने निशाने पर लिया। आरजे रौनक ने जेएनयू के आंदोलन पर एक विडियो बनाते हुए अपनी बात रखी और उसमें त्रुटिवश एक तस्वीर शेयर की जो कि उस आंदोलन का नहीं था। किसी ने जब उसकी ओर ध्यान दिलाया तो भूल-सुधार करते हुए, विडियो को संपादित करने के बाद, माफीनामे के साथ रौनक ने उसे सही किया। लेकिन आकाश बनर्जी जैसे चतुर चम्पू, जिनका फेक न्यूज फैलाने का इतिहास रहा है, ध्रुव राठी और पीईंग ह्यूमन के साथ इस बात के लिए उसे ऐसे टार्गेट करने लगे जैसे कि दुनिया की सारी समस्याओं की जड़ तो रौनक ही है।

ध्रुव राठी कई बार गलत आँकड़े देता पकड़ा जा चुका है। आम आदमी पार्टी की चाटुकारिता में इसकी जीभ और केजरीवाल जी का पृष्ठ भाग, दोनों ही, छिल चुके होंगे, लेकिन मजाल है कि चाटने में कोई कमी आई हो! बनर्जी भी कई बार लोगों द्वारा दुत्कारा जा चुका है, लेकिन मजाल है कि सुधरने की कोशि की हो, फेक न्यूज फैलाने पर कभी माफी माँगी हो! बिलकुल नहीं, क्योंकि तंत्र इनके झूठ को तथ्य की तरह फैलाता है, और हिटलर के प्रोपगेंडा मंत्री गोएबल्स के सारे दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए, एक ही प्रपंच को इतने जगह से चलाता है कि वो सच लगने लगता है।

लेकिन आम जनता इन रक्तबीजों को उन्हीं के प्लेटफॉर्म पर, उन्हीं की भाषा में जवाब देने लगी है। रौनक वाले मामले में, एक भूल के लिए, उसके बहिष्कार का जब ट्विटर ट्रेंड चला, तो उससे दुगुने लोगों ने उसके समर्थन का हैशटैग चला दिया। साथ ही, इन सारे लम्पटों के ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब पर आप कभी भी कमेंट सेक्शन में जाइए, इनके वैचारिक पैगम्बर रवीश के भी, तो आप पाएँगे कि कमेंट की संख्या तो बहुत ज्यादा होती है, लेकिन अधिकतर लोग उन्हें लानतें देने जाते हैं वहाँ।

इसलिए, बेचारे अब बिलबिला रहे हैं। लेकिन इन पर दया न करें। कॉलेज के बच्चों को बताएँ कि ये लोग प्रपंच फैलाते हैं। उनसे कहिए कि वो सिर्फ एक तरह की विचारधारा वालों को न पढ़ें, चाहे वो वाम हो या दक्षिण, हर तरफ से आँकड़े लें। सबको पढ़िए, और तब विचार बनाइए कि कौन सही है, कौन गलत। वामपंथियों की जड़ों में मट्ठा नहीं, हायड्रोक्लोरिक या सल्फ्यूरिक एसिड डालने की जरूरत है। इनके भीतर ट्यूमर नहीं है, ये कैंसर के ट्यूमर का मानवीय रूप हैं।

इन्हें बर्दाश्त मत कीजिए, जहाँ मिले तोड़ दीजिए। इनको काटिए अपने प्रश्नों से, तैयार रहिए अपने आँकड़ों के साथ। कहें कि ‘थोड़ा पढ़ लो’, तो जवाब में पूछिए कि क्या उसके बाप के ही पुस्तकालय में सारी किताबें हैं कि बाकियों ने पढ़ी ही नहीं होंगी? इन नक्सलियों को तब तक तोड़िए जब तक ये क्षितिज और परिधि से गायब न हो जाएँ। दोबारा दिखें, फिर जलील कीजिए। इनका समूल नाश ही समय की माँग है और इसमें आपको उतरना ही होगा।