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बाबरी वर्षगाँठ पर CM योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में सुरक्षा तंत्र को दुरुस्त करने का दिया निर्देश

योगी आदित्यनाथ ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद विध्वंस की वर्षगाँठ से पहले पर्याप्त सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करने के लिए सभी नागरिकों और पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है।

इस महीने की 9 तारीख को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवादित भूमि पर ऐतिहासिक फ़ैसला दिया था। इसके तहत मंदिर निर्माण के लिए हिन्दुओं को पूरी विवादित ज़मीन देने का फ़ैसला सुनाते हुए मस्जिद के लिए अयोध्या में ही विवादित स्थल से अलग पाँच एकड़ ज़मीन देने के आदेश दिया था।

अधिकतर मुस्लिम याचिकाकर्ताओं ने मस्जिद के लिए पाँच एकड़ ज़मीन के आदेश को खारिज कर दिया था और शीर्ष अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ उन्होंने एक समीक्षा याचिका दायर करने की योजना बनाई।

ख़बर के अनुसार, सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने वाले सीएम योगी ने कहा कि सभी सुरक्षा व्यवस्था 15 दिसंबर तक लागू रहेगी। एक आधिकारिक बयान के अनुसार, सीएम ने गश्त, यूपी-112 पेट्रोलिंग के साथ पीस कमिटियों, धर्मगुरुओं और समाज के प्रमुख लोगों से लगातार संवाद कायम रखने पर ज़ोर दिया।

सीएम योगी ने धार्मिक स्थलों, वाणिज्यिक और औद्योगिक प्रतिष्ठानों, एटीएम और बैंकों समेत अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया है।

ख़बर के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार की देर शाम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए ज़िला, रेंज और मंडल के पुलिस और प्रशासनिक अफसरों के साथ क़ानून-व्यवस्था सहित महत्वपूर्ण मुद्दों की समीक्षा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अधिकारी मुख्यालय से लेकर प्रत्येक स्तर पर कम से कम एक घंटा जनसुनवाई के लिए सुनिश्चित करें। महिला अपराधों पर तेजी से कार्रवाई करने के निर्देश देते हुए सीएम ने पॉक्सो ऐक्ट से जुड़े मामलों में प्रगति पर संतोष जताया। सीएम ने प्लास्टिक, थर्मोकोल, पॉलीथीन के प्रयोग को प्रभावी तरीके से रोकने को कहा।

इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए कि प्राथमिक विद्यालयों में छात्र-छात्राओं को हर हाल में 30 नवंबर तक स्वेटर उपलब्ध कराए जाएँ। इस लापरवाही बरतने वाले संबंधित डीएम और बीएसए के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई की जाएगी। जनगणना कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को जनगणना के साथ पारदर्शिता व ईमानदारी से कार्य करते हुए शौचालय निर्माण और अन्य योजनाओं से जुड़े आंकड़ों पर नज़र रखने के निर्देश भी दिए गए।

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‘राम प्रहर’ में शपथ लेने वाले फडणवीस कभी भी साबित कर देंगे बहुमत: सुनते ही विधायकों से मिलने भागे उद्धव

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सोमवार (नवंबर 25, 2019) को महाराष्ट्र मामले में फिर से सुनवाई की जाएगी। उस दिन राज्यपाल के आदेश की कॉपी भी कोर्ट में रखी जाएगी। भाजपा और कॉन्ग्रेस, दोनों ही इसे अपनी जीत के रूप में दर्शा रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने कहा है कि वो सुप्रीम कोर्ट का आभार व्यक्त करते हैं। उन्होंने कहा कि देवेंद्र फडणवीस की नई सरकार अवैध है और इसे जाना होगा। उधर भाजपा ने भी मुंबई में अपने विधायकों की बैठक बुलाई। भाजपा नेता आशीष शेलार ने कहा कि जब भी मौक़ा मिलेगा, भाजपा सदन में बहुमत साबित कर के दिखा देगी।

उधर उद्धव ठाकरे को न सिर्फ़ अपनी पार्टी बल्कि कॉन्ग्रेस और एनसीपी की भी चिंता सता रही है। वह मातोश्री से निकल कर ललित होटल में रुके शिवसेना विधायकों से मिलने पहुँचे। उससे पहले वो पोवई में स्थित आरएमसी सेंटर पहुँचे, जहाँ एनसीपी के विधायकों को ठहराया गया है। उनके साथ शिवसेना के सुभाष देसाई और संजय राउत भी थे। एकनाथ सिंदे को पहले से ही वहाँ तैनात कर के रखा गया है। इसके बाद उद्धव जुहू के जेडब्ल्यू मैरियट होटल पहुँचे, जहाँ उन्होंने कॉन्ग्रेस के विधायकों से मुलाक़ात की।

फ़िलहाल तीनो ही विपक्षी पार्टियों के विधायकों को अलग-अलग होटलों में रखा, ठाकरे उन सभी पर नज़र बनाए रखना चाहते हैं। इधर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद भाजपा भी एक्टिव मोड में आ गई है। अगर सुप्रीम कोर्ट आज ही बहुमत साबित करने का आदेश देता तो दिक्कतें आ सकती थीं। पार्टी को पता है कि समय बहुत कम है और बहुमत साबित करना कोई आसान काम नहीं है। कॉन्ग्रेस के कई नेता भाजपा पर ‘लोकतंत्र की हत्या’ का आरोप लगा रहे हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी ऐसा ही आरोप लगा चुके हैं।

फडणवीस को शपथ दिलाए जाने के समय पर टिप्पणी करते हुए भाजपा नेता आशीष शेलार ने कहा कि उस वक़्त ‘राम-प्रहर’ चल रहा था और यही वो समय होता है जब लोग संघ की शाखाओं में जाते हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा कभी भी भगवान श्रीराम को नहीं भूल सकती है। शेलार ने कहा कि ‘राम प्रहर’ का अपना महत्व होता है और इसे ‘रात के अँधेरे में शपथ लेने’ का तमगा देना सही नहीं है।

अजित पवार के साथ हैं NCP के 43 विधायक: शरद पवार के दावों की सुप्रीम कोर्ट में खुली पोल

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार को शपथ दिलाए जाने के ख़िलाफ़ विपक्षी पार्टियाँ सुप्रीम कोर्ट पहुँची, जहाँ दोनों पक्ष अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। अगली सुनवाई सोमवार (नवंबर 25, 2019) को होगी। इस दौरान राज्यपाल के आदेश की कॉपी भी कोर्ट में रखी जाएगी। एनसीपी-कॉन्ग्रेस की तरफ से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए। सिंघवी ने इस दौरान अजित पवार का समर्थन कर रहे विधायकों की संख्या को लेकर राज़ खोल दिया। जहाँ एनसीपी दावा कर रही है कि उसके 54 में से 49 विधायक वापस लौट आए हैं। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट में सिंघवी ने अलग ही दावा किया।

सुनवाई के दौरान कॉन्ग्रेस नेता सिंघवी ने पूछा कि मात्र 42-43 विधायकों के समर्थन से अजित पवार उप-मुख्यमंत्री कैसे बन सकते हैं? उन्होंने इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार दिया। सिंघवी ने अपनी दलीलें रखते हुए कोर्ट में कहा कि राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने अपनी जिम्मेदारियाँ ठीक से नहीं निभाई। उन्होंने कहा कि राज्यपाल को विधायकों के हस्ताक्षर वाले पत्र को वेरीफाई करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि राज्यपाल ने उन हस्ताक्षरों की पुष्टि नहीं की और शपथग्रहण करा दिया। लेकिन, क्या सिंघवी ने अनजाने में यह बता दिया कि अजित पवार के साथ एनसीपी के 43 विधायक हैं? एनसीपी और सिंघवी के बयान अलग-अलग क्यों?

अगर अभिषेक मनु सिंघवी के बयान पर विश्वास करें तो देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली भाजपा और एनसीपी के अजित धड़े की सरकार आराम से बहुमत साबित कर देगी। 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में 105 सीटों वाली भाजपा को बहुमत का जादुई आँकड़ा छूने के लिए 39 अन्य विधायकों के समर्थन की ज़रूरत है। अजित पवार के 43 विधायकों को मिला कर ये आँकड़ा आराम से पार हो जाता है। वहीं अगर एनसीपी के दावों पर विश्वास करें तो भाजपा के लिए संकट खड़ा हो सकता है, क्योंकि अजित पवार के साथ मात्र 3-4 विधायकों के होने की बात ही कही जा रही है।

अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि शुक्रवार (नवंबर 22, 2019) की शाम को ही शिवसेना-एनसीपी और कॉन्ग्रेस के गठबंधन ने उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाए जाने की घोषणा कर दी थी। उन्होंने पूछा कि इस घोषणा के बाद राज्यपाल को जल्दबाजी में फ़ैसला लेने की बजाय इंतजार नहीं करना चाहिए था? राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी फ़िलहाल दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में आयोजित ‘गवर्नर्स कॉन्फ्रेंस’ में हिस्सा ले रहे हैं।

शनिवार को एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने विधायकों की बैठक बुलाई थी। बैठक में अजित पवार को विधायक दल के नेता के पद से हटा दिया गया था। बैठक के बाद एनसीपी के प्रवक्ता नवाब मलिक ने कहा था कि पार्टी के केवल पॉंच विधायक नेतृत्व के संपर्क में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष के लिए होने वाले चुनाव में ही बीजेपी और अजित पवार वाले धड़े की हार तय है। इसके बाद शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस का राज्य में सरकार बनाना तय है।

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‘अहमदिया होकर बाजवा कैसे बन गए पाक आर्मी अध्यक्ष, मुस्लिम ही नहीं है, नियुक्ति अवैध’

पाकिस्तान आर्मी के चीफ कमर जावेद बाजवा को आने वाले वक़्त में नई मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। उनके खिलाफ पेशावर की उच्च अदालत में एक याचिका दायर की गई है। दरअसल अदालत में दायर याचिका में कहा गया है कि बाजवा मुस्लिम ही नहीं हैं। वह कादियानी समुदाय से सम्बन्ध रखते हैं जोकि इस्लाम का हिस्सा नहीं हैं। बता दें कि पाकिस्तान में उसके अपने संविधान के अनुसार किसी भी गैर-मुस्लिम को पाक सेना अध्यक्ष का पद ग्रहण करने की इजाज़त नहीं है।

पाक आर्मी चीफ के खिलाफ यह याचिका पाक आर्मी के पूर्व मेजर खालिद शाह ने पेशावर की अदालत में याचिका दायर की है। उनका आरोप है कि बाजवा जिस अहमदिया समुदाय से आते हैं वह इस्लाम का हिस्सा ही नहीं है। यही वजह है कि उन्होंने आरोप लगाया है कि पाकिस्तान में इस पद पर बाजवा की नियुक्ति असंवैधानिक है।

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में मुसलामानों के अधिकतर धर्मगुरु अहमदिया समुदाय को इस्लाम का हिस्सा तक नहीं मानते। इसी सम्बन्ध में मामले को लेकर पेशावर की उच्च-अदालत में खालिद शाह ने याचिका दायर कर बाजवा के सेनाध्यक्ष पद पर बने रहे को लेकर सवाल उठाए हैं। अपनी दलील में खालिद ने कहा है कि वह (बाजवा) कादियानी हैं, वह पाक आर्मी के चीफ कैसे बन सकते हैं। पाकिस्तानी संविधान के मुताबिक यह पद किसी भी गैर-मुस्लिम को नहीं दिया जाना चाहिए।

‘कादियानी’ दरअसल अहमदिया समुदाय के लोगों को ही कहा जाता है। इस मामले में बाजवा के अलावा आईएसआई के डीजी रिजवान अख्तर का भी नाम सामने आया है। इस सम्बन्ध में दायर याचिका में रिजवान पर यह आरोप है कि एक मुस्लिम के तौर पर रिजवान ने अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं किया। याचिकाकर्ता ने कहा है कि उन्होंने सरकार से इस बारे में जानकारी छुपाई।

इस मामले को लेकर पेशावर के हाईकोर्ट में दायर दलील में खालिद ने बाजवा के अलावा आईएसआई के डीजी रिजवान अख्तर का भी नाम है। इस सम्बन्ध में दायर याचिका में रिजवान पर यह आरोप है कि एक मुस्लिम के तौर पर रिजवान ने अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं किया। याचिकाकर्ता ने कहा है कि उन्होंने सरकार से इस बारे में जानकारी छुपाई कि बाजवा मुस्लिम नहीं हैं।

बता दें कि 58 वर्षीय बाजवा को नवम्बर 2016 में पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम नवाज़ शरीफ ने इस पद पर नियुक्त किया था। इसके बाद इमरान खान की सरकार ने भी बाजवा को इस पद पर रहने के लिए तीन साल का एक्सटेंशन दे दिया था। याचिका में कहा गया है कि बाजवा को हाल ही में इमरान खान सरकार ने जो एक्सटेंशन दिया वह भी अवैध है।

इतिहास में गुम हैं मुगलों को 17 बार हराने वाले अहोम योद्धा: देश भूल गया ब्रह्मपुत्र के इन बेटों को

आपने मुगलों और राजपूतों की लड़ाई ज़रूर सुनी होगी। बाबर के ख़िलाफ़ लड़ाई में सैकड़ों घाव लिए लड़ते राणा सांगा की वीरता और अकबर के विरुद्ध घास की रोटी खा कर आज़ादी का युद्ध लड़ने वाले महाराणा प्रताप का नाम सबसे सुना है। उनकी गाथाएँ घर-घर पहुँचनी चाहिए। आज हम आपको कुछ ऐसे योद्धाओं के बारे में बताना चाह रहे हैं, जिन्होंने मुगलों के पसीने छुड़ाए थे। ये हैं असम के अहोम योद्धा। असम को प्राचीन काल में कामरूप या प्राग्यज्योतियशपुरा के रूप में जाना जाता था। इसकी राजधानी आधुनिक गुवाहाटी हुआ करती थी। इस साम्राज्य के अंतर्गत असम की ब्रह्मपुत्र वैली, रंगपुर, बंगाल का कूच-बिहार और भूटान शामिल था।

जैसे मुगलों को मराठों से बार-बार टक्कर मिली, ठीक उसी तरह अहोम ने भी मुगलों को कई बार हराया। दोनों पक्षों के बीच डेढ़ दर्जन से भी ज्यादा बार युद्ध हुआ। अधिकतर बार या तो मुगलों को खदेड़ दिया गया, या फिर वो जीत कर भी वहाँ अपना प्रभाव कायम नहीं रह सके। असम में आज भी 17वीं सदी के अहोम योद्धा लाचित बरपुखान को याद किया जाता है। उनके नेतृत्व में ही अहोम ने पूर्वी क्षेत्र में मुगलों के विस्तारवादी अभियान को थामा था। अगस्त 1667 में उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे मुगलों की सैनिक चौकी पर जोरदार हमला किया। लाचित गुवाहाटी तक बढ़े और उन्होंने मुग़ल कमांडर सैयद फ़िरोज़ ख़ान सहित कई मुग़ल फौजियों को बंदी बनाया।

मुग़ल भी शांत नहीं बैठे। अपमानित महसूस कर रहे मुगलों ने बड़ी तादाद में फ़ौज अहोम के साथ युद्ध के लिए भेजी। सैकड़ों नौकाओं में मुग़ल सैनिकों ने नदी पार किया और अहोम के साथ एक बड़े संघर्ष की ओर बढ़े। मुगलों ने इस बार काफ़ी मजबूत सेना भेजी थी। लेकिन, इस बार जो हुआ वो इतिहास की हर उस पुस्तक में पढ़ाई जानी चाहिए, जहाँ ‘नेवल वॉर’ या फिर जलीय युद्ध की बात आती है। लाचित के नेतृत्व में अहोम सैनिक सिर्फ़ 7 नौकाओं में आए। उन्होंने मुगलों की बड़ी फ़ौज और कई नावों पर ऐसा आक्रमण किया कि वो तितर-बितर हो गए। मुगलों की भारी हार हुई। इस विजय के बाद लाचित तो नहीं रहे लेकिन इस हार के बाद मुगलों ने पूर्वी क्षेत्र की ओर देखना ही छोड़ दिया। मुगलों की इस हार की पटकथा समझने के लिए थोड़ा और पीछे जाना होगा।

दरअसल, लाचित के इस पराक्रम से 50 साल पहले से ही मुगलों और अहोम के संघर्ष की शुरुआत हो गई थी। सन 1615 में ही मुगलों ने अबू बकर के नेतृत्व में एक सेना भेजी थी, जिसे अहोम ने हराया। हालाँकि, शुरुआत में अहोम को ख़ासा नुकसान झेलना पड़ा, वो अंततः मुगलों को खदेड़ने में कामयाब हुए। दरअसल, 1515 में कूच-बिहार में कूच वंश की शुरुआत हुई। विश्व सिंह इस राजवंश के पहले राजा बने। उनके बेटे नारा नारायण देव की मृत्यु के बाद साम्राज्य दो भागों में विभाजित हो गया। पूर्वी भाग कूच हाजो उनके भतीजे रघुदेव को मिला और पश्चिमी भाग पर उनके बेटे लक्ष्मी नारायण पदासीन हुए। लक्ष्मी नारायण का मुगलों से काफ़ी मेलजोल था। अहोम राजा सुखम्पा ने रघुदेव की बेटी से शादी कर पारिवारिक रिश्ता कायम किया। यहीं से सारे संघर्ष की शुरुआत हुई।

उपजाऊ भूमि, सुगन्धित पेड़-पौधों और जानवरों, ख़ासकर हाथियों के कारण कामरूप क्षेत्र समृद्ध था और मुगलों की इस क्षेत्र पर बुरी नज़र होने के ये भी एक बड़ा कारण था। अहोम ने एक पहाड़ी सरदार को अपने यहाँ शरण दी थी। मुग़ल इस बात से भी उनसे नाराज़ थे। जब शाहजहाँ बीमार हुए, तब उसके बेटे आपस में सत्ता के लिए लड़ रहे थे। इस कलह का फायदा उठा कर अहोम राजा जयध्वज सिंघा ने मुगलों को असम से खदेड़ दिया। उन्होंने गुवाहाटी तक फिर से अपना साम्राज्य स्थापित किया। लेकिन, असली दिक्कत तब आई जब मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने उस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए बंगाल के सूबेदार मीर जुमला को भेजा।

मार्च 1662 में मीर जुमला के नेतृत्व में मुगलों को बड़ी सफलता मिली। अहोम के आंतरिक कलह का फायदा उठाते हुए उसने सिमूलगढ़, समधारा और गढ़गाँव पर कब्ज़ा कर लिया। मुगलों को 82 हाथी, 3 लाख सोने-चाँदी के सिक्के, 675 बड़ी बंदूकें 1000 जहाज मिले। उन्होंने इनके अलावा भी कई बहुमूल्य चीजें लूटीं। लेकिन, ठण्ड आते ही मुगलों को वहाँ के मौसम में मुश्किलें आने लगी और उनका दिल्ली से संपर्क टूट गया। मुग़ल वहाँ से भाग खड़े हुए। बारिश का मौसम आते ही मुगलों और अहोम राजा जयध्वज सिंघा में फिर युद्ध हुआ लेकिन अहोम को हार झेलनी पड़ी। मुगलों को 1 लाख रुपए देने पड़े और कई क्षेत्र गँवाने पड़े। ‘ग़िलाजारीघाट की संधि’ अहोम को मज़बूरी में करनी पड़ी। जयध्वज को अपनी बेटी और भतीजी को मुग़ल हरम में भेजना पड़ा।

जयध्वज को ये अपमान सहन नहीं हुआ। उनकी मृत्यु हो गई। प्रजा की रक्षा के लिए उन्हें मज़बूरी में विदेशी आक्रांताओं के साथ संधि करनी पड़ी थी। जयध्वज के पुत्र चक्रध्वज ने इसे अपमान के रूप में लिया और मुगलों को खदेड़ना शुरू किया। वो मुगलों को भगाते-भगाते मानस नदी तक ले गए और मीर जुमला ने जितने भी अहोम सैनिकों को बंदी बनाया था, उन सभी को छुड़ा कर ले आए। अहोम ने अपनी खोई हुई ज़मीन फिर से हासिल की। गुवाहाटी से मुगलों को भगाने के बाद मानस नदी को ही सीमा माना गया। इसके बाद चक्रध्वज ने कहा था कि अब वो ठीक से भोजन कर सकते हैं।

इस अपमान के बाद औरंगज़ेब ने एक बहुत बड़ी फ़ौज असम भेजी लेकिन ऐतिहासिक सरायघाट के युद्ध में लाचित बोरपुखान के हाथों उन्हें भारी हार झेलनी पड़ी। ऊपर हमने इसी युद्ध की चर्चा की है, जिसके बाद लाचित मुगलों के ख़िलाफ़ अभियान के नए नायक बन कर उभरे। 50,000 से भी अधिक संख्या में आई मुग़ल फ़ौज को हराने के लिए उन्होंने जलयुद्ध की रणनीति अपनाई। ब्रह्मपुत्र नदी और आसपास के पहाड़ी क्षेत्र को अपनी मजबूती बना कर लाचित ने मुगलों को नाकों चने चबवा दिए। उन्हें पता था कि ज़मीन पर मुग़ल सेना चाहे जितनी भी तादाद में हो या कितनी भी मजबूत हो, लेकिन, पानी में उन्हें हराया जा सकता है।

लाचित ने नदी में मुगलों पर आगे और पीछे, दोनों तरफ से हमला किया। मुग़ल सेना बिखर गई। उनका कमांडर मुन्नवर ख़ान मारा गया। असम सरकार ने 2000 में लाचित बोरपुखान अवॉर्ड की शुरुआत की। ‘नेशनल डिफेंस अकादमी’ से पास हुए सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को ये सम्मान मिलता है। आज भी उनकी प्रतिमाएँ असम में लगी हुई हैं। ऐसे में हमें उन अहोम योद्धाओं को याद करना चाहिए, जिन्होंने मराठाओं और राजपूतों जैसे कई भारतीय समूहों की तरह मुगलों से संघर्ष किया। आज भी 24 नवंबर को ‘लाचित दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

हमारे पास 165 विधायक, 10 मिनट में साबित कर देंगे बहुमत: शिवसेना सांसद संजय राउत

महाराष्ट्र में जारी सियासी घमासान के बीच शिवसेना नेता संजय राउत ने एक बार फिर बीजेपी पर निशाना साधा है। रविवार को राउत ने कहा कि अजित पवार को तोड़कर सरकार बनाना बीजेपी को उल्टा पड़ जाएगा। एनसीपी के सभी विधायक वापस लौट आए हैं। इसके साथ ही राउत ने इसे भाजपा के अंत की शुरुआत बताया है।

उन्होंने कहा, “सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग और पुलिस भाजपा के चार मुख्य पार्टी कार्यकर्ता हैं। वर्तमान गवर्नर भी उनके कार्यकर्ता हैं, लेकिन भाजपा अब अपने ही खेल में फँस गई है। यह उनके अंत की शुरुआत है।”

राउत ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए आरोप लगाया कि राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भाजपा के देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में नई सरकार के गठन की इजाजत दी। राउत ने यह भी कहा कि सरकार को बहुमत साबित करने के लिए 30 नवंबर की समय-सीमा केवल इसलिए दी गई ताकि दल-बदल कराया जा सके। राउत ने कहा, ‘‘शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस के पास 165 विधायक हैं। अगर राज्यपाल हमें बुलाते हैं तो हम दस मिनट में अपना बहुमत साबित कर सकते हैं।’’

संजय राउत ने आगे कहा कि इंदिरा गाँधी के काल में इमरजेंसी को काला दिन कहा जाता था। पर जो कल महाराष्ट्र में हुआ उससे बड़ा काला दिन और कुछ नही हो सकता है। उन्होंने कहा कि कल का दिन ‘Black saturday’ था। जनता सोई थी और जब जागी तब उनको पता चला कि महाराष्ट्र में शपथ हो गई। उन्होंने बीजेपी पर हमला करते हुए कहा कि ऐसा काम पॉकेटमार करते हैं। राज्यपाल, एनसीपी और शिवसेना को 24 घंटे नहीं देते हैं, लेकिन अजित पवार एक फर्ज़ी डॉक्यूमेंट लेकर जाते हैं और उनको मान लिया जाता है।

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सामने आए पवार के दोनों गुमशुदा विधायक, कहा- हम चाचा-भतीजा दोनों के साथ हैं

महाराष्ट्र में जारी सियासी उठापठक के बीच एनसीपी के वे दो विधायक सामने आ गए हैं जो गुमशुदा बताए जा रहे थे। विधायक दौलत दारोगा और नितिन पवार की गुमशुदगी को लेकर शिकायत भी दर्ज कराई गई थी। दोनों ने सामने आने के बाद एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार और शनिवार को राज्य के उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले अजित पवार, दोनों के प्रति निष्ठा जताई है।

यह बेहद दिलचस्प है क्योंकि अजित पवार के भाजपा को समर्थन देने के बाद शरद पवार ने उन्हें विधायक दल के नेता पद से हटा दिया था। उन्होंने यह भी कहा था कि बीजेपी को समर्थन अजित का व्यक्तिगत फैसला है न कि पार्टी का। इसके बाद एनसीपी विधायकों की बैठक भी हुई थी। बैठक के बाद पार्टी प्रवक्ता नवाब मलिक ने कहा था कि केवल चार-पॉंच विधायक ही नेतृत्व के साथ नहीं हैं।

इनमें से एक दौलत दारोगा के लापता होने को लेकर ठाणे जिले के शाहपुर पुलिस स्टेशन में शनिवार को शिक़ायत दर्ज कराई थी। रविवार को उन्होंने कहा, “मैं सुरक्षित हूँ। मैं एनसीपी के निशान पर चुनाव जीतकर आया हूँ, इसलिए पार्टी बदलने का कोई सवाल ही नहीं है। शरद पवार और अजित पवार जो भी फ़ैसला लेंगे मैं उसके साथ हूँ। किसी भी अफ़वाह पर विश्वास न करें।”

देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार के शपथ ग्रहण के बाद दारोगा के लापता होने की खबरें आई थी। इसके बाद, NCP और विधायक के परिवार ने उनके लापता होने की शिक़ायत दर्ज करवाई। शाहपुर से NCP विधायक दौलत दारोगा शनिवार की सुबह शपथ ग्रहण के दौरान राजभवन में मौजूद थे।

एक अधिकारी ने बताया कि पूर्व विधायक पांडुरंग बरोरा ने शाहपुर पुलिस थाने में मामला दर्ज करवाया। पुलिस ने गुमशुदगी का मामला दर्ज किया था।

एक अन्य विधायक नेता नितिन पवार के लापता होने की भी ख़बर थी। उनका भी पता चल गया है। उन्होंने कहा, “मैं अपने परिवार और लोगों से अनुरोध करता हूँ कि वे मेरी चिंता न करें। मैं शरद पवार, अजित पवार और छगन भुजबल के साथ हूँ। मेरे परिवार और लोगों द्वारा अन्यथा कुछ भी नहीं सोचा जाना चाहिए।”

इसके अलावा एनसीपी विधायक माणिकराव कोकाते भी रविवार को मुंबई के उस होटल पहुॅंचे जहॉं पार्टी के अन्य विधायक मौजूद हैं। वे भी शनिवार को शपथ ग्रहण के समय अजित पवार के साथ दिखे थे। बाद में उनकी भी कोई सूचना नहीं होने की बात सामने आई थी।

गौरतलब है कि फडणवीस और अजित पवार के शपथ ग्रहण को शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी ने सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दे रखी है। सोमवार को इस मामले में तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई करते हुए तत्काल बहुमत परीक्षण की मॉंग नहीं मानी। अदालत ने राज्यपाल का आदेश और फडणवीस की तरफ से उन्हें सौंपे गए समर्थन पत्र की कॉपी मंगलवार को पेश करने का निर्देश दिया है।

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मुस्लिम छात्रों के बीच झड़प को मीडिया ने दिया सांप्रदायिक रंग, ‘कश्मीरियों पर हमले’ के रूप में किया प्रचारित

राजस्थान के मेवाड़ यूनिवर्सिटी में दो पक्षों में हुए झगड़े को मीडिया ने जबरदस्ती सांप्रदायिक रंग दिया। समाचार पत्रों से लेकर ‘द वायर’ जैसे प्रोपेगंडा पोर्टल्स ने भी इसे मुस्लिम छात्रों पर अत्याचार के रूप में दिखाया। चितौड़ जिले क्व गंगवाड़ थाने में मेवाड़ यूनिवर्सिटी के ताहिर मजीद, बिलाल अहमद, इश्फाक अहमद और मोहम्मद अली ने यूनिवर्सिटी ही कुछ अन्य छात्रों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया। उन्होंने बिहार के कुछ छात्रों पर मारपीट का आरोप लगाया। आरोपितों में बिहार के तीन मुस्लिम छात्र हैं। मीडिया में इसे ‘कश्मीरी छात्रों पर लगातार हो रहे हमले’ की श्रृंखला की एक कड़ी के रूप में चलाया गया।

ऑपइंडिया ने सच्चाई जानने के लिए गंगवाड़ थाने से संपर्क किया, जहाँ से पता चला कि ये मामला कहीं से भी सांप्रदायिक नहीं है और न ही छात्रों को कश्मीरी होने के कारण निशाना बनाया गया। गंगवाड़ थाना ने स्पष्ट कर दिया कि इस मामले में दोनों पक्ष मुस्लिम ही हैं, ऐसे में इसके सांप्रदायिक होने का सवाल ही नहीं उठता। पुलिस ने ‘द वायर’ की उस रिपोर्ट को साफ़-साफ़ नकार दिया, जिसमें बिहारी छात्रों द्वारा कश्मीरी छात्रों को आतंकी कहने की बात लिखी गई है। पुलिस ने बताया कि इस झगड़े के दौरान किसी ने भी कश्मीरी छात्रों को आतंकी नहीं कहा। पुलिस ने इसे छात्रों के बीच का आपसी विवाद करार दिया।

‘द वायर’ ने इस ख़बर को कश्मीरी छात्रों पर हमले के रूप में दिखाया

वहीं मेवाड़ यूनिवर्सिटी ने भी इस पूरे प्रकरण के सांप्रदायिक होने की बात को नकार दिया। ऑपइंडिया से बात करते हुए यूनिवर्सिटी डीन सीके शर्मा ने बताया कि मीडिया में इसे ग़लत तरीके से पेश किया जा रहा है। दरअसल, ये मामला छात्रों के बीच आपसी झड़प का था, जो थाने तक पहुँच गया। पुलिस ने ऑपइंडिया को बताया कि हॉस्टल मेस में छात्रों के बीच किसी बात को लेकर वाद-विवाद हुआ और इसने संघर्ष का रूप ले लिया। जबकि ‘द वायर’ ने बिलाल के हवाले से बताया है कि उन्हें आतंकी कहा गया। सवाल ये उठता है कि ये आतंकी वाली बात कश्मीरी छात्रों ने एफआईआर में क्यों नहीं दर्ज कराई?

इस मामूली विवाद को यूनिवर्सिटी डीन ने समाप्त कर दिया था। इसके बाद फिर से कश्मीरी छात्रों का एक गुट संघर्ष पर उतारू हो गया। जवाब में बिहारी छात्रों ने भी हमला किया और दोनों एक-दूसरे से लड़ बैठे। इसका न तो उनके कश्मीरी होने से कुछ लेना-देना था और न ही मुस्लिम होने से। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, मेवाड़ यूनिवर्सिटी में सैकड़ों कश्मीरी छात्र पढ़ते हैं और उनके लिए अलग से हॉस्टल की व्यवस्था भी की गई है। उन हॉस्टल्स में अन्य मुस्लिम छात्रों को भी रखा गया है।

‘द वायर’ की ही रिपोर्ट को आधार बना कर ‘द क्विंट ने’ भी इसे कश्मीरी छात्रों पर हमले का रंग देकर दिखाया। मीडिया पोर्टल ने ऐसा जताया है कि ये एक सांप्रदायिक घटना थी। पुलिस के बयान के बाद इनकी पोल खुलती दिख रही है। सीताराम येचुरी जैसे वामपंथी नेताओं ने भी इसे अल्पसंख्यकों पर हमले के रूप में प्रचारित किया।

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बधाई सुप्रिया! हल हो गई शरद पवार के उत्तराधिकार की समस्या: पवार पॉलिटिक्स पर दिग्विजय सिंह का तंज

महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन के बावजूद सियासी घमासान अभी थमा नहीं है। शनिवार को सुबह से लेकर शाम तक हुए तमाम ड्रामे के बाद शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले में रविवार (नवंबर 24, 2019) को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर कल फैसला सुनाएगा।

इस बीच, राज्य के सियासी घटनाक्रमों के बहाने कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने पवार परिवार की अंदरूनी राजनीति पर तंज कसा है। दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, “NCP के 54 में से 53 विधायक शरद पवार जी के साथ रहेंगे। अजित पवार अकेले रह जाएँगे। शरद पवार के उत्तराधिकारी की समस्या भी हल हो गई। बधाई सुप्रिया!!”

इससे पहले सिंह ने मीडिया से बात करते हुए कहा था, “राज्यपाल द्वारा संविधान का मजाक बनाया जा रहा है। गोवा और मेघालय में भी ऐसा ही हुआ था। NCP का कोई भी विधायक भाजपा का समर्थन नहीं करेगा।”

महाराष्ट्र में जारी सियासी घमासान के बीच दिग्विजय सिंह ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक के बाद एक कई ट्वीट किए। एक ट्वीट करते हुए उन्होंने लिखा, “शिवसेना, NCP और कॉन्ग्रेस को अपनी ताक़त ज़मीन पर दिखने के लिए सड़कों पर उतरना चाहिए। देखते हैं मुंबई और महाराष्ट्र की जनता किसके साथ है? तीनों पार्टियों के लिए यह अस्तित्व का सवाल है। विशेष कर उद्धव और ठाकरे परिवार के लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न है।”

एक अन्य ट्वीट में दिग्विजय सिंह ने लिखा, “महाराष्ट्र के नए उप-मुख्यमंत्री दो आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। अजित पवार का एनसीपी छोड़ भाजपा का पल्ला पकड़ने का कारण समझे? अमित शाह/मोदी के सबसे ताकतवर हथियार प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, आईटी हैं। भाजपा पारस पत्थर है उसके छूने से भ्रष्ट भी ईमानदार हो जाता है।”

इसके साथ ही उन्होंने लिखा कि महाराष्ट्र के घटनाक्रम पर मोहन भागवत जी की कोई टिप्पणी नहीं आई। देश उनसे जानना चाहता है कि जिन अजित पवार को देवेंद्र फडणवीस जी ने जेल भेजने का जनता से वादा किया था अब उन्हें उप-मुख्य मंत्री बनाया, क्या यह अनैतिक नहीं है? क्या इसी रास्ते से संघ राष्ट्र निर्माण करना चाहता है?

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अयोध्या में राम मंदिर: मोदी बोले- फ़ैसले के बाद 130 करोड़ भारतीयों ने साबित किया देशहित से बढ़कर कुछ नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को 59वीं बार देशवासियों से मन की बात की। उन्होंने कहा कि 9 नवंबर को अयोध्या मामले पर उच्चतम न्यायालय का फैसला न्यायपालिका के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। उन्होंने कहा कि अयोध्या मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद देश में जिस प्रकार की प्रतिक्रिया देखने को मिली उससे साबित हो गया कि देशवासियों ने देशहित को सर्वोपरि माना।

मोदी ने अपने मासिक ‘मन की बात’ कार्यक्रम में देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा ”पिछले ‘मन की बात’ में मैंने 2010 में अयोध्या मामले में आए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बारे में चर्चा करते हुए कहा था कि देश ने तब किस तरह से शांति और भाईचारा बनाए रखा था। निर्णय आने के पहले भी, और निर्णय आने के बाद भी। इस बार भी, जब, नौ नवम्बर को उच्चतम न्यायालय का फैसला आया, तो 130 करोड़ भारतीयों ने फिर से साबित कर दिया कि उनके लिए देशहित से बढ़कर कुछ नहीं है। देश में शांति, एकता और सद्भावना के मूल्य सर्वोपरि हैं। राम मंदिर पर जब फ़ैसला आया तो पूरे देश ने उसे दिल खोलकर गले लगाया। पूरी सहजता और शांति के साथ स्वीकार किया।

‘मैं आज भी ख़ुद को कैडेट मानता हूँ’

प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि नवंबर महीने का चौथा रविवार हर साल एनसीसी डे के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने कहा, “मैं भी आप ही की तरह कैडेट रहा हूँ और आज भी मन से खुद को कैडेट मानता हूँ। दुनिया के सबसे बड़े यूनिफॉर्म्ड यूथ ऑर्गनाइजेशन में भारत की एनसीसी एक है। इसमें सेना, नौ-सेना, वायुसेना तीनों शामिल हैं।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “7 दिसंबर को आर्म्ड फोर्सेज फ्लैग डे मनाया जाता है। यह वो दिन है, जब हम अपने सशस्त्र बलों के सहयोग को याद करते हैं। हर किसी के पास उस दिन आर्म्ड फोर्सेज का फ्लैग होना ही चाहिए। हम वीर सैनिकों का स्मरण करें। लीडरशिप, देशभक्ति, सेल्फलेस सर्विस, अनुशासन और कड़ी मेहनत इन सबको अपने कैरेक्टर का हिस्सा बनाएँ। अपनी आदत बनाने की एक रोमांचक यात्रा मतलब है एनसीसी।”

पीएम मोदी ने स्कूलों से किया ‘फिट इंडिया वीक’ मनाने का आग्रह

पीएम मोदी ने कहा कि फिट इंडिया मूवमेंट से आप परिचित हो गए होंगे। स्कूल्स फिट इंडिया मूवमेंट दिसंबर में कभी भी मना सकते हैं। इसमे बच्चे चित्रकारी, खेलकूद प्रतियोगिताएँ और योग में शामिल हो सकते हैं। बच्चों को इसमें पसीना बहाना है। अधिकतम फोकस्ड एक्टिविटी करनी है। उन्होंने कहा, “मैं स्कूलों से आग्रह करता हूँ कि हर जगह फिट इंडिया वीक मनाएँ। इससे फिटनेस के लिए जागरूकता बढ़ती है। सभी स्कूल फिट इंडिया रैंकिंग में शामिल हों और फिट इंडिया को सहज स्वभाव बनाएँ। यह एक जनआंदोलन बने।”

उन्होंने कहा कि फिट इंडिया मूवमेंट में फिटनेस को लेकर स्कूलों की रैंकिंग की व्यवस्था की गई है। इसे हासिल करने वाले सभी स्कूल, फिट इंडिया लोगो और फ्लैग इस्तेमाल कर पाएँगे। फिट इंडिया पोर्टल पर जाकर स्कूल स्वयं को फिट घोषित कर सकते हैं। फिट इंडिया के तहत उन्हें फिट इंडिया 3 स्टार और 5 स्टार रेटिंग दी जाएगी।

भाषाएँ-बोलियाँ धरोहर हैं, इन्हें बचाएँ

पुष्करम, पुष्करालु, पुष्कर: के बारे में आपने नहीं सुना होगा। यह नदियों के किनारे मनाए जाने वाले उत्सव हैं। पुष्करम ऐसा उत्सव है जिसमें नदी का महात्मय, नदी का गौरव, जीवन में नदी की महत्ता एक सहज रूप से उजागर होती है। यह देश की 12 अलग-अलग नदियों पर जो उत्सव होते हैं उनके भिन्न-भिन्न नाम हैं। हर वर्ष एक नदी पर यानी उस नदी का नंबर फिर 12 वर्ष के बाद लगता है। यह उत्सव देश के अलग-अलग कोने की 12 नदियों पर होता है। बारी-बारी से होता है 12 दिन चलता है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस संदर्भ में असम नौगाँव के रमेश शर्मा की टिप्पणी का भी ज़िक्र किया। इसमें 4-16 नवंबर तक चले ब्रहमपुत्र पुष्कर के बारे में बताया गया था।

मन की बात कार्यक्रम में पीएम मोदी ने कहा कि हमारी भारत भूमि पर सैकड़ों भाषाएँ सदियों से पुष्पित पल्लवित होती रही हैं। हालाँकि, हमें इस बात की भी चिंता होती है कि कहीं भाषाएँ, बोलियाँ ख़त्म तो नहीं हो जाएँगी। लेकिन उत्तराखंड के धारचुला की कहानी से मुझे काफी संतोष मिला। वहाँ की आबादी कम है, लेकिन इसके बाद भी बुजुर्ग और युवा सभी अपनी भाषाओं को बचाने के लिए आगे आए। भाषाओं और बोलियों को बचाए रखने के लिए हम सभी को आगे आना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष को उन भाषाओं का वर्ष बताया है जो विलुप्त होने की कगार पर हैं।

ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महीने के आख़िरी रविवार को मन की बात के ज़रिए देशवासियों को संबोधित करते हैं। पीएम मोदी के रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ का यह 59वाँ संस्करण था। इससे पहले उन्होंने 27 अक्टूबर को मन की बात कार्यक्रम में देश को संबोधित किया था।

कौन हैं ‘प्लॉगर’ रिपुदमन बेल्वी और सिस्टर थ्रेसिया? PM मोदी ने ‘मन की बात’ में की जिनकी चर्चा

लंगोट पहन पेड़ से उलटा लटक पत्तियाँ क्यों नहीं चबा रहे PM मोदी? मीडिया गिरोह के ‘मन की बात’

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