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कॉन्ग्रेस लेकर आई थी भाड़े की भीड़! गाँधी परिवार के सुरक्षा के नाम पर भी नहीं जुटे कार्यकर्ता, Video Viral

इन दिनों विपक्ष की हकीकत को जनता के सामने लेकर आने वाले हर मीडिया हाउस को विपक्ष द्वारा ‘मोदी मीडिया’ कहा जाता है। अब ऐसे में अगर कोई मीडिया हाउस किसी पार्टी के कारनामों की पोल खोल दे तो ‘मोदी मीडिया मुर्दाबाद’ के नारे लगाने से भी विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ता गुरेज नहीं करते। कुछ ऐसा ही बुधवार को भी हुआ।

हुआ यह कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गाँधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटाए जाने को लेकर दिल्ली की सड़कों पर यूथ कॉन्ग्रेस द्वारा विरोध-प्रदर्शन किया जा रहा था। इस विरोध में बहुत से युवा छात्र भी शामिल थे। ये प्रदर्शन के दौरान काफी उत्तेजित दिखाई दिए। इस प्रदर्शन की कवरेज लगभग हर मीडिया चैनल पर जोर-शोर से चली और मोदी सरकार की खूब आलोचना हुई। लेकिन tv9 भारतवर्ष द्वारा इस प्रदर्शन के कवरेज की कुछ वीडियो अचानक सोशल मीडिया पर वायरल होने लगीं।

ऐसा इसलिए क्योंकि जहाँ अन्य मीडिया हाउस इस प्रदर्शन को गाँधी परिवार के समर्थन में ‘युवाओं का आक्रोश’ वाला एंगल दिखाने की कोशिश कर रहे थे वहीं, TV9 भारतवर्ष के संवादादाता विपिन चौबे ने प्रदर्शनकारियों से बात करने की कोशिश की। इस दौरान उन्होंने जानना चाहा कि आखिर जिस प्रदर्शन में युवा चेहरे इतना बढ़-चढ़ कर अपनी भागीदारी दे रहे हैं, वे मामले की गंभीरता को लेकर कितने सचेत हैं। बस इसीलिए उन्होंने वहाँ मौजूद युवाओं से पूछना शुरू किया कि वो यहाँ क्यों आए हैं? अब ये सवाल इतना भी कठिन नहीं था, क्योंकि अगर आप वहाँ प्रदर्शन के लिए आए हैं तो उसके बारे में तो पता होना ही चाहिए। लेकिन हैरानी तो तब हुई जब वहाँ मौजूद कॉलेज छात्र ये ही नहीं बता पाए कि वो प्रदर्शन कर रहे हैं तो किस चीज के लिए!

हडबड़ाते-सकपकाते वहाँ मौजूद कॉलेज छात्र-छात्राएँ सिर्फ़ यही कहती नजर आईं कि नरेंद्र मोदी ने राहुल गाँधी के साथ बहुत गलत किया है और वो तानाशाही कर रहे हैं। लेकिन जब छात्र-छात्राओं से पूछा गया कि तानाशाही क्या है, तो वे जवाब देते भी हिचकते नजर आए और तानाशाही को छेड़खानी बताने लगे। इसके बाद एक-दूसरे को कैमरे के आगे खींचती छात्राओं से जब पूछा गया कि एसपीजी की फुल फॉर्म क्या है तो वह उसे भी बता नहीं पाईं और कैमरे के सामने से भागने लगीं। इतना ही नहीं, वहाँ कुछ प्रदर्शनकारियों को ये तक नहीं पता था कि राहुल गाँधी की SPG सुरक्षा हटाई गई है। जिसके कारण वह SPG की जगह CPG सुरक्षा कहती नजर आई। जब संवादादाता ने छात्रा से इसकी फुलफॉर्म पूछी तो भीड़ से निकलकर कुछ कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता रिपोर्टर के सामने आ गए और उनके बदसलूकी करने लगे।

रिपोर्टर से चिल्ला-चिल्ला के पूछा जाने लगा कि वो यहाँ क्या कर रहे हैं। जब उन्होंने कहा कि वो सिर्फ़ सवाल ही तो कर रहे हैं तो उन्हें एक कार्यकर्ता कहता नजर आया कि कॉन्ग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी हैं, जबकि अन्य कार्यकर्ता उसी बीच तेज-तेज आवाज में मोदी मीडिया मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे और रिपोर्टर का विरोध होने लगा। जिस पर रिपोर्टर ने साफ कहा कि सवाल पूछने पर मिर्ची लग रही है।

इसके अलावा बता दें कि इस कवरेज की एक और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। जिसमें कुछ कॉलेज छात्र उग्र होते नजर आ रहे हैं और बैरिकेडिंग को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में विपिन चौबे जब इनके पास जाते हैं और बैरिकेट पर चढ़े एक छात्र से पूछते हैं कि वो प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं, तो वो पहले सिर्फ़ चिल्लाता है- तानाशाही नहीं चलेगी… लेकिन जब उससे पूछा जाता है कि तानाशाही कौन कर रहा है? तो वो कहता नजर आता है कि तानाशाही सब कर रहे हैं और जब पूछा जाता है कि ये प्रदर्शन क्यों हो रहा है तो उसके शब्द होते हैं- “हमें ये सब कुछ नहीं पता हमें बस अपनी टीम के साथ रहना है।” इसके अलावा वीडियों में अन्य छात्रों को ये भी कहते सुना जा सकता है कि ये प्रदर्शन उनकी सुरक्षा के लिए किया जा रहा है और उन्हें सरकारी नौकरियाँ दिलाने के लिए हो रहा है।

गौरतलब है कि ये पहला मामला नहीं है, जब कॉन्ग्रेस के लिए इकट्ठा हुई भीड़ की हकीकत का खुलासा हुआ हो। इससे पहले चुनाव के दौरान भी कई वीडियो के कारण कॉन्ग्रेस पार्टी के समर्थकों पर और उनके प्रदर्शनों की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग चुके हैं।

गाँधी परिवार को दिलाने चले थे SPG कवर, हाई कोर्ट ने वकील पर ही लगाया ₹25000 का जुर्माना

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने अधिवक्ता उमेश बोहरे द्वारा दायर एक याचिका को ख़ारिज कर दिया है। इस याचिका में गाँधी परिवार को SPG सुरक्षा देने की तत्काल माँग इस आधार पर की गई थी कि परिवार के दो सदस्य, जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री (इंदिरा गाँधी और राजीव) के तौर पर देश सेवा की थी, उनकी हत्या कर दी गई थी।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर यह कहते हुए 25,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया कि याचिकाकर्ता ‘सस्ती लोकप्रियता’ हासिल करने की कोशिश में था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने हाल ही में कॉन्ग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी और महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा के लिए विशेष सुरक्षा दल (SPG) कवर वापस ले लिया था।

गाँधी परिवार और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के SPG सुरक्षा कवर को वापस लेने के केंद्र के क़दम का विरोध करते हुए, कॉन्ग्रेस ने राज्यसभा में यह मुद्दा उठाते हुए सरकार से विशेष सुरक्षा बहाल करने का आग्रह किया, सदन का वॉक आउट भी किया।

पार्टी नेता आनंद शर्मा ने कहा कि गाँधी परिवार को SPG कवर की बहाली राष्ट्रीय हित में थी। उन्होंने कहा कि चार नेताओं की व्यक्तिगत सुरक्षा और जीवन पर ख़तरा था और इसलिए केंद्र को ‘पक्षपातपूर्ण राजनीति’ से ऊपर उठना चाहिए।

समाचार एजेंसी ANI ने कॉन्ग्रेस नेता के हवाले से कहा,

“कृपया इससे ऊपर उठें और समीक्षा करें और बहाल करें। यह राष्ट्रीय हित में होगा, अन्यथा आज, कल और भविष्य में भी इस पर सवाल उठाया जाएगा।”

हालाँकि, मोदी सरकार ने यह कहते हुए सुरक्षा कवर को बहाल करने से इनकार कर दिया कि इस तरह के फ़ैसले गृह मंत्रालय के पैनल द्वारा ख़तरों की गहन समीक्षा के आधार पर लिए जाते हैं। इसके अलावा, इस बात का भी उल्लेख किया गया कि इस तरह के फ़ैसलों में कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता।

केंद्र के फ़ैसले का समर्थन करते हुए, वरिष्ठ भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि जिन लोगों को इस पर आपत्ति है, वे कोर्ट में जा सकते हैं और इसे चुनौती दे सकते हैं। उन्होंने आगे कहा कि जब यूपीए सत्ता में थी, तब कुछ राजनेताओं का सुरक्षा घेरा डाउनग्रेड कर दिया गया था।

राज्यसभा सांसद ने यह भी कहा कि लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (LTTE) द्वारा राजीव गाँधी की हत्या के बाद परिवार को ख़तरा पैदा हो गया था। लेकिन, अब लिट्टे ख़त्म हो गया है और पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए लोगों के प्रति, सोनिया गाँधी और परिवार के अन्य सदस्यों का रवैया भी बदल गया है।

बता दें कि इससे पहले भी अधिवक्ता उमेश बोहरे ने कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसका संबंध लोकसभा चुनाव 2019 में इलेक्ट्रॉनिक वोटर मशीन (EVM) मशीन को लेकर था। इसमें उन्होंने EVM मशीन को लेकर कई सवाल खड़े किए थे, तब भी उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। दिलचस्प बात यह है कि उमेश बोहरे जैसे अधिवक्ता के पास बेवजह के मुद्दे उठाने की आदत है, फिर भले ही उनकी बेबुनियादी याचिकाओं के लिए उन्हें कोर्ट से फ़टकार ही क्यों न लगे।

29 बंदूक, 2 राइफल, 1 रिवॉल्वर और 519 कारतूस के साथ कॉन्ग्रेस नेता अरेस्ट, टीपू सुल्तान भी गैंग में शामिल

बिहार के मुंगेर ज़िले के क़ासिम बाज़ार थाना अंतर्गत मशसपुर मुहल्ला स्थित एक गोदाम से पुलिस ने बुधवार (20 नवंबर) को 29 दोनाली बंदूक, दो राइफल, वेबलीस्कॉट का एक रिवॉल्वर और 519 कारतूस बरामद किए हैं। इसके अलावा भारी मात्रा में हथियार के उपकरण और सामान ज़ब्त किया गया है। इस सिलसिले में हथियार तस्करों को भी गिरफ़्तार किया गया। इनमें युवा कॉन्ग्रेस के मुंगेर विधानसभा अध्यक्ष यतीन्द्रनाथ सिंह भवानी कुमार, टीपू सुल्तान, आर्म्स डीलर मनोज शर्मा समेत चार तस्करों को गिरफ़्तार किया गया है।

भारी मात्रा में हथियार के उपकरण और सामान ज़ब्त (तस्वीर साभार: दैनिक दागरण)

ख़बर के अनुसार, पुलिस उपमहानिरीक्षक मनु महाराज ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में हथियार और कारतूस के साथ अपराधियों को गिरफ़्तार किया गया था। इसी के मद्देनज़र पुलिस लगातार हथियार तस्करों की तलाश में जुटी हुई थी। इसी कड़ी में कासिम बाज़ार थाना क्षेत्र के मकससपुर निवासी रविन्द्र शर्मा के पुत्र मनोज शर्मा के घर पर छापे मारी की गई, जहाँ अवैध हथियारों का जखीरा बरामद किया गया है। इसमें 29 दोनाली बंदूक, दो राइफ़ल, वेबलीस्काट का एक रिवॉल्वर, 519 कारतूस और हथियार बनाने के अन्य उपकरण बरामद किए गए और चारों तस्करों को गिरफ़्तार किया गया।

उन्होंने बताया कि मनोज शर्मा मुंगेर बंदूक फ़ैक्ट्री का निर्माता था और एक साल पहले उसका लाइसेंस रद्द हो गया था। इसके बावजूद वो अपने घर में न सिर्फ़ अवैध रूप से बंदूक रखे हुआ था बल्कि उनकी बिक्री भी कर रहा था। पुलिस उपमहानिरीक्षक ने बताया कि 2020 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र अपराधियों व नक्सलियों से सांठगांठ कर हथियार सप्लाई करने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि गिरफ़्तार किए गए आरोपितों ने पूछताछ के दौरान अपना जुर्म क़बूल करते हुए इस अवैध धंधे में काफी समय से संलग्न रहने की बात स्वीकार की है। उन्होंने कहा कि ये लोग माँग के अनुसार अपराधियों एवं नक्सलियों को हथियार की सप्लाई करते हैं। उन्हें एक हथियार की कीमत 50 हज़ार रुपए से एक लाख रुपए तक मिलती थी और वे दो से तीन गुणा दाम पर कारतूस बेचते थे। वे बरामद वेबलीस्कॉट रिवॉल्वर को पाँच लाख रुपए में नक्सलियों से सौदा करने जा रहे थे।

एक गोदाम से पुलिस ने हथियारों का जखीरा बरामद किया(तस्वीर साभार: दैनिक दागरण)

इसके अलावा, पुलिस आरोपितों की निशानदेही पर लगातार छापेमारी कर रही है। पुलिस उपमहानिरीक्षक मनु महाराज की विशेष टीम द्वारा जिन आरोपितों की गिरफ़्तारी की गई है, उनमें मुफ़स्सिल थाना क्षेत्र के मुबारचक निवासी मोहम्मद कमरुद्दीन का बेटा टीपू सुल्तान उर्फ़ मोहम्मद शबीर हसन, क़ासिम बाज़ार थाना क्षेत्र के मकससपुर चुआबाग निवसी अनिल मंडल का पुत्र किशन कुमार, मकससपुर निवासी रविंद्र शर्मा का पुत्र मनोज शर्मा एवं वासुदेवपुर ओपी क्षेत्र के दलहट्टा निवासी सह युवा कॉन्ग्रेस के मुंगेर विधानसभा अध्यक्ष यतींद्रनाथ उर्फ़ भवानी कुमार शामिल है।

ख़बर के अनुसार, पिछले साल मुंगेर में AK-47 का जखीरा बरामद किया गया था। उस समय रेलवे स्टेशन से लेकर गाँव तक AK-47 राफ़ल्स बरामद हुई थी। इसके अलावा, एक कुएँ से भी प्रतिबंधित राइफल AK-47 के कल-पुर्ज़े मिले थे।

350 को बुलाया, आए सिर्फ 40… बहुत नाइंसाफी: प्रियंका गाँधी के ‘स्टाइल’ से परेशान UP के कॉन्ग्रेसी नेता?

उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस पार्टी को दोबारा से खड़ा करने का प्लान बनाने वाली पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी इन दिनों अपनी ही पार्टी के पुराने नेताओं का विरोध झेल रही हैं। दरअसल, हाल ही में एक बैठक के लिए प्रियंका गाँधी की ओर से पार्टी के 350 पूर्व सांसद, विधायक, एमएलसी, 2019 के लोकसभा उम्मीदवार और 2017 के विधानसभा उम्मीदवारों को बुलावा भेजा गया था। लेकिन इंदिरा गाँधी की छवि वाली प्रियंका के बुलावे के बावजूद आए कितने? सिर्फ 40! मतलब 350 में से सिर्फ 40… बहुत नाइंसाफी हो गया ये तो!

कहाँ तो प्रियंका गाँधी को भारतीय राजनीति की दूसरी इंदिरा कह कर प्रोजेक्ट किया जा रहा था, और कहाँ वो कार्यकर्ता तो छोड़िए, कॉन्ग्रेस के नाम पर टिकट मिल चुके, जीत चुके नेताओं का नेता बनने तक का क्षमता प्रदर्शन करने में चूक रही हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की शैलवी शारदा की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश के पुराने कॉन्ग्रेसी नेताओं ने पिछले 15 दिनों में दो बैठकें की हैं। यह बैठकें इसलिए हुईं क्योंकि इन नेताओं को लगता है कि UPCC (उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी) से इन्हें दरकिनार कर दिया गया है। साथ ही पार्टी के इन पुराने निष्ठावान नेताओं पर नए नेतृत्व (प्रियंका गाँधी और उनके आस-पास के नेता) अपनी मर्जी की चीजें थोप देते हैं।

इस संबंध में पहली मीटिंग नवंबर के पहले हफ्ते में पार्टी नेता सिराज मेहंदी के आवास पर हुई। मेहंदी ने अक्टूबर में सोनिया गाँधी को यह कहकर अपना इस्तीफा दिया था कि नई टीम में एक भी शिया नहीं है। दूसरी मीटिंग पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की जयंती पर आयोजित की गई। इस मीटिंग में तो हद हो गई थी। एक नेता ने प्रियंका वाड्रा की ओर इशारा करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि कॉन्ग्रेस कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं है।

अब ताजा जानकारी के मुताबिक इस संबंध में तीसरी बैठक भी जल्दी ही पूर्व विधायक रंजन सिंह सोलंकी के निवास स्थान नोएडा में होने वाली है। अनुमान लगाया जा रहा है कि सोनिया गाँधी से मिलने के लिए प्रतिनिधि मंडल का चुनाव इसी मीटिंग में किया जाना है।

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ कॉन्ग्रेस महासचिव को अपनी नीतियों के कारण अपने पार्टी नेताओं का प्रत्यक्ष विरोध झेलना पड़ रहा है। वहीं, वे पार्टी में पड़ी फूट को सुलझाने की बजाए सत्ताधारी पार्टी पर हमला बोलने में जुटी हुई हैं। अभी बीते दिनों उन्नाव के किसान की एक वायरल वीडियो को शेयर कर प्रियंका ने केंद्र सरकार को घेरने का प्रयास किया था। उन्होंने वीडियो में नजर आ रहे किसान को ‘अधमरा’ बताया था, लेकिन उन्नाव पुलिस द्वारा पूरी वीडियो शेयर करने के बाद पता चला था कि वो किसान अधमरा नहीं था बल्कि अपनी जिद में वहीं पड़ा था और पुलिस के हटाने के बावजूद भी नहीं हट रहा था।

NRC का असर: बंगाल से वापस बांग्लादेश लौटने लगे घुसपैठिए, कन्हैया सहित वामपंथी नेताओं ने सरकार को कोसा

भारत-बांग्लादेश की सीमा से सटे इलाकों में एनआरसी का असर साफ़ दिखाने लगा है। सरकार ने जब से एनआरसी को लेकर अपनी नीति स्पष्ट की है। तब से ही देश में बाहर से आकर अवैध रूपसे बसने वालों के बीच खलबली मच गई है।

अख़बार में छपी एक खबर के मुताबिक जो लोग कभी सीमा पर तैनात सुरक्षाबालों की निगरानी से बचते-बचाते भारत में घुस आए थे आज वे सभी वापस सीमा पर जाने लगे हैं। यही कारण है कि बंगाल के सीमावर्ती गाँवों में एकदम सन्नाटा पसर गया है। बता दें कि बांग्लादेश से आए यह लोग चाय-पत्ती तोड़ने से लेकर रुई धुनने और घर बनाने का काम किया करते थे।

एनआरसी के बाद अवैध शरणार्थियों के गाँव को छोड़कर चले जाने के बाद स्थानीय विधायक ने इसपर राजनीति शुरू कर दी। इस सम्बन्ध स्थानीय विधायक अली इमरान ने एक सभा बुलाई थी। इस सभा में वामपंथी नेता कन्हैया कुमार भी शामिल हुए थे। सभी ने एक सुर में एनआरसी और बीजेपी सरकार को खूब कोसा।

दरअसल बीएसएफ का कोकरौदा कैम्प बंगलादेश सीमा के बेहद नज़दीक है। इसके करीब दर्जनों ऐसे गाँव हैं जो एनआरसी के फैसले के बाद सूने हो गए हैं। पास के ही एक गाँव पंडितपारा के रहने वाले मोहम्मद शमशाद आलम ने बताया कि अधिकतर गाँव पूरी तरह से खाली हो गए हैं। इन गाँव में रहने वाले लोग अब सीमा पार करके वापस जाने लगे हैं।

देखें VIDEO: JNU छात्र ने दी पत्रकार को धमकी, कहा- ‘खरीद सकता हूँ AK-47’

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इन दिनों फीस वृद्धि को लेकर हो रहे प्रदर्शन और हंगामे के बीच हैरान कर देने वाली घटना सामने आई है। जेएनयू में एक प्रदर्शनकारी छात्र ने सवाल पूछने वाली एक महिला पत्रकार को ही धमकी दे डाली।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार रिपब्लिक भारत की एक पत्रकार ने JNU के प्रदर्शनकारियों के चलते अन्य लोगों को हुई समस्या पर सवाल किया तो वह छात्र इस पर भड़क गया। इस दौरान उसने हिंसा को जायज़ ठहराते हुए सीधे एके-47 खरीद कर मीडिया और पुलिस को ही गोली मारने की बात कह डाली।

बता दें कि जेएनयू के प्रदर्शन के चलते कई लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। इस दौरान आम आदमी से लेकर मरीज को अस्पताल ले जा रही एम्बुलेंस तक को दिक्कत का सामना करना पड़ा था। फीस में बढ़ोतरी को लेकर तीन हफ्ते से चले आ रहे इस विरोध प्रदर्शन में JNU के छात्रों ने संसद तक पैदल मार्च निकालने का निर्णय किया था।

वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि जब छात्र से अवैध प्रदर्शन को लेकर सवाल पूछा गया तो वह भड़क गया और बोला, “मैं फिजिकली हैंडीकैप्ड हूँ, मुझे जानवरों की तरह मारा गया। क्या मैं एके-47 नहीं खरीद सकता, मेरी इतनी औकात नहीं है क्या?” इशारा साफ़ था, हमारी हैसियत बन्दूक खरीदने की है, हमने चाहा तो पत्रकारों को मारेंगे”

बता दें कि इससे पहले भी लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देने वाले जेएनयू के छात्रों ने रिपब्लिक भारत के मीडियाकर्मियों से काफी बदतमीजी की थी।

दरअसल बीते कई दिनों से JNU के छात्र यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा लगाए गए नए नियमों का विरोध कर रहे हैं। इन नियमों के तहत छात्रावासों की फीस से लेकर ड्रेस कोड और गेट के टाइमिंग आदि कड़े किए दिए गए हैं। बता दें कि कुछ ही दिन पहले इस विश्वविद्यालय के प्रांगण स्वामी विवेकानंद की मूर्ति का अनावरण किया गया था, हालाँकि नए-नियमों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे इन उपद्रवियों ने उस प्रतिमा को भी तहस-नहस कर दिया।

लव-जिहाद: मोहम्मद रियाज़ ने सोनू बनकर की शादी, भेद खुलने पर दिया तीन-तलाक, 15 लाख लेकर फरार

छत्तीसगढ़ के भिलाई से लव-जिहाद की घटना सामने आई है। घटना को लेकर पुलिस में शिकायत करने वाली हिन्दू लड़की का आरोप है कि मोहम्मद रियाज़ के नाम के लड़के ने उसके साथ धोखा-धड़ी से शादी कर उसकी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी।

लड़की ने मोहम्मद पर आरोप लगाया है कि उसने अपना नाम बदलकर उसे शादी करने के लिए राज़ी किया। कुछ समय बाद जब लड़की ने बच्चे को जन्म दिया तो उसे रियाज़ की सच्चाई पता चली। दरअसल मोहम्मद रियाज़ खुदको हिन्दू बताकर धीरे-धीरे लड़की के परिवार से करीबी बढ़ाने लगा। पीड़ित लड़की के मुताबिक शादी से पहले उसने अपना नाम रियाज़ नहीं सोनू ताजानी बताया था।

रियाज़ ने पीड़िता के पिता से कहा था कि उसके बाप ने दूसरी शादी कर ली और उसकी सौतेली माँ ने उसे घर से निकाल दिया है। पीड़ित लड़की के परिवार ने रियाज़ पर भरोसा किया, इसके बाद रियाज़ ने 6 जुलाई 2014 को लड़की से हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार शादी की।

लड़के का भेद तब खुला जब साल भर बाद लड़की ने बच्चे को जन्म दिया। नवजात के सर्टिफिकेट में आरोपित लड़के ने अपना असली नाम मोहम्मद रियाज़ ताजानी (पिता कादर ताजानी) लिखा। समुदाय विशेष का नाम देखते ही लड़की के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। इसके बाद रियाज़ उसे ओडिशा के उमरकोट जिला स्थित नवरंगपुर के अपने घर ले गया जहाँ पर रियाज़ और उसके परिवार वालों ने जबरन लड़की का धर्म परिवर्तन करवाया। उन्होंने उसका नाम शिरिन बानो रख दिया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक लड़की का यह भी आरोप है कि उसका पति रियाज़ अक्सर उसके साथ मारपीट करता था। इस सबके बावजूद लड़की ने अपना परिवार बनाए रखने के लिए सब कुछ सहन किया। धीरे-धीरे रियाज़ के तेवर बढ़े तो वह लड़की के परिवार वालों पर भी इस्लाम स्वीकार करने का दबाव डालने लगा।

मोहम्मद रियाज़ ने पीड़िता के परिवार की मजबूरी का फायदा उठाने की भी पूरी कोशिश की। उसने लड़की के पिता से 15 लाख रुपए की माँग रख दी। बहाना दिया कि इस पैसे वह एक मकान खरीदेगा और उसे एक बिजनेस शुरू करना है। जब पीड़िता का परिवार उसकी यह माँग पूरी नहीं कर सका तो उसने 12 अक्टूबर 2019 को दूसरी शादी करने का हवाला देकर पीड़ित हिन्दू लड़की को तीन-तलाक दे दिया।

इस सम्बन्ध में पीड़ित महिला ने स्थानीय पुलिस और परिवार परामर्श केंद्र में अपनी शिकायत दर्ज कराई। पीड़िता का आरोप है कि इस मामले में रियाज़ के अलावा उसके परिवार के अन्य लोगों की भी अहम भूमिका थी। अपनी इस शिकायत में पीड़िता ने सभी परिवार वालों का ज़िक्र किया है। इनमें मोहम्मद रियाज़, उसके बाप अब्दुल कादर ताजानी, उसकी माँ ज़रीना ताजानी, भाभी शहनाज़, बहन फरजाना व रुबना के नाम शामिल हैं।

राहुल गाँधी ने आँख मारी तो उनके विधायक जी ने भरी सभा में दे दी फ्लाइंग किस

संसद सत्र के दौरान 2018 में राहुल गाँधी ने भरे सदन के बीच पीएम की ओर देखकर आँख मारी थी तो राहुल की इस हरकत से उनकी काफी बदनामी हुई थी। इस घटना का वीडियो इतना वायरल हुआ कि इसकी चर्चा आजतक होती है। इसपर राहुल को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था। इसके बावजूद उनकी पार्टी के नेता घटना से सबक लेने की बजाय उन्ही के पदचिन्हों पर चलने में लगे हैं। राहुल के बाद अब उन्ही की पार्टी के एक विधायक ने विधानसभा में अजीब हरकत कर दी है।

घटना ओडिशा विधानसभा की है जहाँ कॉन्ग्रेस पार्टी के एक विधायक ने सदन में बोलते हुए अचानक विधानसभा स्पीकर के सामने उसे फ्लाइंग किस दे डाली। इस हरकत को अंजाम देने वाले कॉन्ग्रेस पार्टी के विधायक का नाम ताराप्रसाद बाहिनीपति है जोकि जेपोर क्षेत्र से आते हैं। ताराप्रसाद ने यह हरकत सदन में स्पीकर एसएन पात्रो के सामने उन्ही से कर डाली। उनकी इस घटना के बाद पूरे सदन का माहौल एकएक मजाकिया हो गया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विधायक ने इस घटना का स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि वह बस अपनी खुशी का इज़हार कर रहे थे। उन्होंने बताया कि उनकी ख़ुशी इस बात को लेकर थी कि स्पीकर ने 147 सदस्यों वाली विधानसभा में बोलने के लिए सबसे पहला मौका उन्हें दिया। साथ ही ताराप्रसाद ने कहा कि इस फ़्लाइंग किस देने के बहाने उनका इरादा किसी को भी ठेस पहुँचाने का नहीं था। अपने स्पष्टीकरण में कॉन्ग्रेस विधायक ने कहा कि वह स्पीकर से पिछड़े क्षेत्रों के प्रति उनके समर्पण के चलते और भी ज्यादा खुश हैं।

आमतौर पर माना जाता है कि संसद और विधानसभा में निर्वाचित होने वाले जनप्रतिनिधि अपने व्यवहार से शालीनता और शिष्टाचार का परिचय देते हैं मगर जब पार्टी अध्यक्ष खुद ही संसद में सारी मर्यादा को तार-तार कर दे तो ओडिशा में इस कॉन्ग्रेसी विधायक की ऐसी हरकत पर ज्यादा आश्चर्य नहीं होता।

BHU: लिबरलो, वामपंथियो, मीठे हिन्दुओ, धिम्मियो… यज्ञ की विधि गैर हिन्दू नहीं सिखाएगा

समय में थोड़ा पीछे चलते हैं। गुलामी के उस दौर में चलिए जब अंग्रेज़ विलियम जोन्स जैसे उपन्सासकारों की प्रपंची कल्पना को भारत के इतिहास के नाम पर दर्ज कर रहे थे। मैक्स मूलर जैसे लोग किसी कपोल-कल्पना को आधार मान कर भारत के इतिहास ही नहीं, वेद-पुराण आदि पर ‘शोध’ करके दुनिया को आने वाले समय की सबसे प्रचलित भाषा में हिन्दू धर्म साहित्य उपलब्ध करा रहे थे।

फिर जो हुआ, वो तो होना ही था। मैक्स मूलर को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ‘बोडन प्रोफेसर ऑफ संस्कृत’ का चेयर बनाया गया। मैक्स मूलर वेद-पुराण का अनुवाद करते हुए, अपने अब्राहमिक रिलीजन के रंगीन चश्मे से लिखने लगे कि वेद गड़रियों के गीतों का संग्रह था। आगे यह भी बताया कि ब्रह्म और ब्राह्मण एक ही बात है।

आप यह समझिए कि जिस व्यक्ति की समझ इतनी कम हो, जिसे संदर्भ का पता न हो, वो किस स्तर पर एक छोटी गलती करता है, और आगे पूरे विश्व में उसके अनुवाद, और फिर उसके अनुवादों के अनुवाद प्रचलन में आते हैं। फिर, इन अनुवादों पर रिसर्च होता है, तब बताया जाता है कि हिन्दू धर्म तो ये है, कान में सीसा डाल देते थे… एक पूरे धर्म को कलुषित और प्रदूषित किया जाता है, और इसके आधार में एक व्यक्ति द्वारा किया गया वह अनुवाद होता है जो उसकी अनभिज्ञता से उपजा है।

कालांतर में भारत उस विद्वान को आँखों का तारा बनाता है, दिल्ली में उसके नाम पर भवन का नामकरण होता है, भारत-जर्मनी वार्ताओं में उसकी चर्चा होती है। यही वो बीज था जो सनातन धर्म के धार्मिक साहित्य की जड़ों को खोखला करने के लिए करीब दो सौ साल पहले बोया गया था। तब, फेसबुक पर चंद्र प्रकाश जी लिखते हैं, महर्षि दयानंद ने मैक्स मूलर द्वारा अनुवाद करने की खबर का विरोध करते हुए कहा – “यस्मिन् देशे द्रुमो नास्ति तत्रैरण्डोऽपि द्रुमायते” यानी जिन देशों में विशाल वृक्ष नहीं होते, वहाँ के लोग अरंड (Castor) की झाड़ियों को ही पेड़ समझते हैं।

ऐसे लोग शब्दों को समझते हैं, संदर्भ को नहीं:
यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य।
एवं हि शास्त्राणि बहून्यधीपत्य चार्थेषु मूढाः खरवत् वहन्ति॥

भावार्थ यह है कि किसी गधे के ऊपर आपने चंदन की लकड़ियों की गठरी रख दी हो, तो वो गधा सिर्फ उसके भार को ही जानता है, न कि चंदन की विशिष्टता को। उसी प्रकार मूर्ख लोग, कई शास्त्रों के अभ्यास करके भी गधे के भार वहन करने के समान उसके स्थूलार्थ को ही जानते है, गूढ़ार्थ या तत्वार्थ को नहीं।

तब के विरोध का कोई असर नहीं हुआ और आज भारतीय लोग स्वयं, देवदत्त पटनायक जैसे कुबुद्धि के रूप में उसी अनुवाद को आधार मान कर धर्म की विवेचना करते हैं और जो परिणाम है वो आपके सामने है। कभी महिषासुर को मूलनिवासी बताया जाता है, कभी व्यभिचारी, बलात्कारी रावण को महान बनाया जाता है, कभी राम द्वारा सीता की अग्नि परीक्षा की आधी बात बता कर पूरे रामायण को नारीविरोधी बता दिया जाता है…

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जिस मुद्दे की, जिस ज्ञान की व्याख्या करने आप बैठे हैं, उसके समाज की, उसके संचित ज्ञान की, उससे जुड़े अंग-प्रत्यंग की समझ आपको होनी चाहिए। वरना ईसाई धर्म का पादरी जो स्त्रियों के पीरियड्स को ईव के पतन से जोड़ कर एक पाप की तरह देखता है, उसे यह समझ में नहीं आएगा कि कामख्या में किस देवी की, किस स्थिति में पूजा होती है। उनका समाज अलग है, अतः व्याख्या अलग होगी।

अब बात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की

महामना मदन मोहन मालवीय ने जब बनारस में इस विश्वविद्यालय की नींव रखी थी, तो पूरा विश्वविद्यालय भारतीय छात्र-छात्राओं, अनुसंधानकर्ताओं, शिक्षकों, शोधार्थियों से ले कर अकादमिक क्षेत्र के हर कार्य के लिए, बिना किसी मनाही के, किसी सीमा के सब के लिए समान रूप से उपलब्ध था। हालाँकि, पंडित जी ने मैक्स मूलर और ब्रिटेन के अन्य कलाकारों को हिन्दू धर्म की थातियों को, इसके ग्रंथों की व्याख्या को समझा होगा, अतः उन्होंने इस संस्थान में एक जगह ऐसी भी बनाई जहाँ स्पष्ट रूप से किसी भी गैर-हिन्दू का प्रवेश वर्जित था।

यह जगह थी ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’, जिसका पूर्व नाम ‘वैदिक महाविद्यालय’ था। इसका लक्ष्य यह नहीं था कि यह संकाय किसी को अपमानित कर रहा है, किसी के ऊपर सवाल उठा रहा है कि उसको हिन्दू धर्म में आने से मनाही है, या वो संस्कृत पढ़ या पढ़ा ही नहीं सकता। बिलकुल नहीं, क्योंकि इसी विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा और संस्कृत साहित्य के पठन-पाठन हेतु कला संकाय, यानी आर्ट्स फैकल्टी के अंतर्गत संस्कृत विभाग है। अतः यह कहना कि समुदाय विशेष को संस्कृत पढ़ाने से रोका जा रहा है, न सिर्फ गलत है बल्कि अपने स्तर पर आलस्यजनित धूर्तता भी है।

ऑपइंडिया ने बार-बार यह बताया है कि डॉक्टर फिरोज खान की विद्वता, उनके संस्कृत ज्ञान, और यहाँ तक कि उनके हिन्दू धर्म से स्नेह पर किसी ने सवाल नहीं उठाए हैं। न ही विश्वविद्यालय के धरनारत छात्रों को उस पर आपत्ति है। वो जहाँ से आते हैं, उनके बारे में कुछ छात्रों ने मुझे भी ईमेल के जरिए बताया कि वो प्रतिभावान हैं। इसलिए, इस पर विवाद नहीं है कि उन्हें संस्कृत आती है कि नहीं, और उनकी डिग्रियाँ किस भाषा में हैं, कहाँ से हैं।

अगर विश्वविद्यालय प्रशासन, या वीसी प्रोफेसर राकेश भटनागर, इसे सम्मान का मुद्दा बना कर डॉ फिरोज खान को इसी संकाय में रखवा लेते हैं, और इस पर विद्यार्थी उनकी कक्षा में जाने से इनकार करने लगें, जाएँ ही नहीं, तो प्रशासन क्या करेगा? उन्हें जबरदस्ती क्लास में बिठाएगा? डॉ फिरोज खान को ये बच्चे अगर आज नहीं स्वीकार रहे, तो जाहिर है कि उनसे वो कर्मकांड तो पढ़ेंगे नहीं। इसलिए भी, वामपंथी वीसी भटनागर जी को, जो विश्वविद्यालय परिसर के धार्मिक आयोजनों का हिस्सा बनने से हमेशा कतराते हैं, या वहाँ अनुपस्थिति रहते हैं, डॉ फिरोज खान को भविष्य में होने वाले नए तरह के विरोध से बचाना चाहिए।

भाषा और धर्मशास्त्रों की भाषा

विश्वविद्यालय के शिल्पकार मालवीय जी ने इस एक संकाय को हिन्दू धर्म विधान, मीमांसा, वेद-वेदांग, कर्मकांड, यज्ञ, अनुष्ठान आदि के लिए सिर्फ हिन्दुओं के लिए सीमित कर दिया था क्योंकि यहाँ अगर कोई विधर्मी आएगा, तो जाहिर है कि वो इसे अपने पूर्वग्रहों और अपने मजहबी संदर्भों से ही देखेगा। यहाँ पठन-पाठन के लिए आप, चाहे किसी भी जाति/वर्ग आदि के हों, पहले जनेऊ संस्कार कराते हैं (अगर न हुआ हो तो), फिर शास्त्रोचित तरीके से वेदाध्ययन हेतु ब्राह्मण बनते हैं, तब इसमें उतरते हैं।

मैं नहीं समझता कि डॉक्टर फिरोज खान जनेऊ पहनेंगे और फिर किसी के अंतिम संस्कार के कर्मकांड हेतु आवश्यक धार्मिक अनुष्ठानादि के लिए मार्गदर्शन दे पाएँगे। दे भी दें, तो मेरा प्रश्न है कि आवश्यकता क्या है? क्या हिन्दुओं के धार्मिक अनुष्ठानों में संस्कृत भाषा के प्रयोग होने मात्र से वो सांस्कृतिक या धार्मिक अनुष्ठान न हो कर मात्र भाषाई बात हो जाएगी? क्या ‘कयामत के दिन सारे मुर्दे कब्र से बाहर निकलेंगे’ की बात मानने वाले अंतिम संस्कार के कर्मकांड में मृतक के अगले जन्म की बात पर सहजता से समझा सकेंगे?

अधिकतर लोग, जो आज बीएचयू के इस संकाय के छात्रों के विरोध में खड़े हो कर दूसरों को बिगट, या धर्मांध, साम्प्रदायिक और पता नहीं किन-किन विशेषणों से नवाज रहे हैं, वो संस्कृत को महज एक भाषा की तरह देख रहे हैं जिसका ज्ञान अगर फिरोज खान को है तो वो क्यों नहीं पढ़ा सकते। यहाँ ये तर्क लेने की भी आवश्यकता नहीं है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के सुन्नी थियोलॉजी विभाग में कितने हिन्दू हैं।

तर्क यह है कि संस्कृत भाषा अलग बात है और हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों और धर्मविज्ञान से संबंधित साहित्य, जो कि धार्मिक प्रकृति के हैं, वो भी संस्कृत में हैं। जैसे कि आपको नमाज याद है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप बिना मुस्लिम बने, जामा मस्जिद के माइक पर अजान देने लगेंगे! भाषा का ज्ञान आपको भाषा सीखने, समझने, उसके साहित्य को समझने के लिए मददगार है, लेकिन जहाँ बात धर्म की है, मान्यताओं की है, आस्था की है, वहाँ ये तर्क बेकार हो जाता है कि ‘पढ़ाने दो न, क्या हो जाएगा’।

यहाँ से जो छात्र बाहर जाते हैं, वो किसी के जनेऊ संस्कार में मंत्र पढ़ते हैं, किसी के विवाह में अग्निदेव के सात फेरे लगवाते हैं। ये वही अग्नि है जिससे समुदाय विशेष वाले कट्टरपंथी बचते हैं। यहाँ के छात्र यज्ञ में हवनकुंड के सामने बैठते हैं और अभीष्ट की प्राप्ति के लिए एक तय तरीके से, शारीरिक और आत्मशुद्धि के बाद, आचरण करते हुए अनुष्ठान करते हैं। चूँकि इसकी भाषा संस्कृत है तो फिरोज या डेनियल को बिना यज्ञोपवीत पहनाए, वहाँ नहीं बिठाया जा सकता।

जब कुतर्क ही करना है तो यही कह दिया जाए कि जनेऊ क्या है, धागा ही तो है, पहना दो। जवाब यह है कि चूँकि आपकी समझ में कुछ चीजें नहीं आतीं तो शिवलिंग आपके लिए पत्थर हो जाएगा, मंगलसूत्र एक बंधन हो जाएगा, और मृतक को चिता पर जलाना एक क्रूर कृत्य। इसलिए एक भाषा को अकारण केन्द्र में मत रखिए क्योंकि संयोगवश उसी भाषा में हिन्दुओं के धर्मग्रंथ भी हैं।

कोई हिन्दू धर्म को प्रेम करता है उसे मत रोको…

अब बात उन लोगों की आती है जो डॉ कलाम, मोहम्मद रफी, परमवीर अब्दुल हमीद, बलिदान अशफाक आदि का नाम ले आते हैं कि उन्होंने हिन्दुओं के साथ मिल कर काम किया, कभी भेदभाव नहीं किया। ये तर्क भी लचड़ है और अनभिज्ञता से उपजा हुआ है। किसी ने इन लोगों की उपलब्धियों पर प्रशन्चिह्न लगाए क्या? किसी ने कहा कि मोहम्मद रफी को भजन नहीं गाने देंगे? किसी ने कहा कि महाभारत के संवाद डॉ राही मासूम रजा से नहीं लिखवाएँगे?

वो इसलिए नहीं कहा गया क्योंकि भारत की सर्वसमावेशी विरासत हैं आज के भारतीय। हिन्दुओं को इससे कभी समस्या नहीं रही कि उनके भजन कौन लिख रहा है और बिस्मिल्ला खाँ शहनाई पर क्या बजा रहे हैं। हमने उन्हें सम्मान दिया क्योंकि उन्होंने भारत की विरासत का मान बढ़ाया। डॉ फिरोज खान और बीएचयू के धर्म विज्ञान संकाय पर यह तर्क लागू नहीं होता। वहाँ भजन या मनोरंजन के लिए धारावाहिक नहीं बनाए जा रहे।

वहाँ हिन्दू धर्म के मूल विषयों की पढ़ाई ही नहीं होती बल्कि उनके तंत्र-मंत्र, यज्ञ-अनुष्ठान की विधियाँ बताई जाती हैं ताकि वहाँ से बाहर निकल कर वो विद्यार्थी वृहद समाज में पुरोहितों का भी कार्य कर सकें। अगर किसी बच्चे को सत्यनारायण भगवान के बनने वाले प्रसाद को पूजा से पहले खाने नहीं दिया जाता, तो वहाँ आपके वाले तर्क सही लगने लगेंगे कि ‘खा ही लेगा तो क्या होगा’।

यज्ञ करते BHU SVDV के छात्र

बात यह है कि बच्चे के जूठे हाथों से छूने से प्रसाद की शुद्धता प्रभावित होती है, इसलिए बेहतर है कि उसे प्रसाद से दूर रखा जाए। यह बच्चे के साथ भेदभाव नहीं है, यह एक तय विधि से चलना है ताकि अभीष्ट की प्राप्ति उसकी पूर्णता में हो। कल को दुर्गा की मूर्ति के आठ हाथ हटवा दिए जाएँ क्योंकि बहुतों को दस हाथ के होने का औचित्य समझ में नहीं आता?

फिरोज खान हिन्दू धर्म से प्रेम करते हैं, करते रहें। उनका स्वागत है। हम उनके गाए भजनों को सुनेंगे और अपने मंदिरों में भी बजाएँगे, इस बात को ले कर चर्चा हो ही नहीं रही। समस्या तो यही है कि किसी को यह भी नहीं पता कि संस्कृत विभाग अलग है और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय अलग है। चूँकि, दोनों में संस्कृत शब्द है, डॉ फिरोज के पास संस्कृत भाषा की डिग्री है, तो बवाल काट दो कि हिन्दू धर्मांध हो गए हैं, ये हमारी संस्कृति नहीं है, हमें ऐसे लोगों का स्वागत करना चाहिए!

क्या इसी स्वागत के नाम पर मंदिरों में क़व्वालियों का आयोजन कराया जाए कि ‘काली-काली जुल्फों के फंदे न डालो, हमें जिंदा रहने दो ऐ हुस्नवालों’? मंदिरों के रंगभवनों में भरतनाट्यम की जगह ‘शीला की जवानी’ पर टू-पीस बिकिनी में नृत्य का आयोजन हो क्योंकि दोनों तो नृत्य ही हैं और सुश्री कटरीना जी ने भरतनाट्यम की शिक्षा भी ली है! मैं ये तो कह ही नहीं रहा हूँ कि मस्जिदों के प्रांगण में बहुत सारी जगह होती है, वहाँ दशहरे में रामलीला का आयोजन होना चाहिए, और होली में होलिका दहन।

क्या ये सेकुलर होना है? या ये बेहूदगी है? आप धर्म को अपने नजरिए से मत देखिए, खास कर तब जब आप उस धर्म से वास्ता नहीं रखते, उसमें आपकी श्रद्धा या गहन आस्था नहीं हो। जब तक हम उसके मूल्यों को, उसके तत्वों को, उसके दर्शन को, उसके विज्ञान को नहीं समझते, उसे उनके पास ही रहने देना चाहिए जो समझते हैं। ये ‘क्या हो जाएगा’ वाली पीढ़ी अनभिज्ञता और अज्ञान में नहाई हुई है इसलिए उसके चश्में में बस संस्कृत ही नाच रहा है और सिर्फ मुझे गलत साबित करने के लिए वेदों के कुछ मंत्र, गोमांस खाते हुए सुना कर, बोल देगी कि ‘देखो तो, क्या हो गया, मैंने तो पढ़ दिया’।

हर जगह, हर दलील लागू नहीं होती। अचानक से ‘नारीविरोधी’ कहा जाने वाला रामायण, जिससे हिन्दू समाज प्रभावित है, और पितृसत्तात्मक हो गया है, संस्कृत भाषा का एक ग्रंथ नहीं हो जाता क्योंकि अभी आपके नैरेटिव को हिन्दू वाला एंगल सूट कर रहा है। उसे अभी आप ये नहीं कह सकते कि इसमें हिन्दुओं का क्या है, ये तो संस्कृत में लिखी हुई एक किताब है। कल तक वो हिन्दुओं की ही किताब थी। जैसे कि ‘योग’ करना कभी विशुद्ध हिन्दू चीज हो जाती है जिसे पाठ्यक्रम में शामिल करने का जेएनयू में ‘भगवाकरण’ के नाम पर विरोध होता है लेकिन जब आपकी इच्छा हो, तो कहेंगे ये तो व्यायाम है, इसको हिन्दू धर्मावलम्बी अपने धर्म से क्यों जोड़ रहे हैं कि हिन्दुओं ने दुनिया को योग दिया।

प्रदर्शनकारी छात्रों को अपनी घृणा का पात्र न बनाएँ

हिन्दुओं ने ‘भक्ति आंदोलन’ के बाद से सनातन परंपराओं को सबसे ज्यादा बिगाड़ा है। किसी के घर में धर्म चर्चा नहीं होती, बच्चों को अपनी ही धार्मिक पुस्तकों का ज्ञान नहीं, सीता को महाभारत में पांडवों की पत्नी बताते हैं, और कुरुक्षेत्र में राम-रावण युद्ध देखते हैं। ये हुआ कैसे? इसके बीज मैक्स मूलर जैसों ने बो दिए थे जिसने वेदों को ज्ञान की निधि समझने की जगह गड़रियों का गीत कह दिया क्योंकि गड़रियों से ही भगवान आए हैं उनके, तो सब कुछ भेड़ चराते हुए ही प्राप्त हो जाता होगा!

सर्वसमावेशन और प्लूरलिज्म क्या है, इसके नाम पर भी लोग खेल जाते हैं। सर्वसमावेशन का मतलब यह नहीं है कि आपने किसी को अपने पास बुलाया और अपने मूल को भुला कर उसके तरीकों से रहने लगे। प्लूरलिस्ट होने का मतलब यह नहीं होता कि कई तरह के लोगों के साथ रहने के चक्कर में चर्च के पादरी हिन्दू हो जाएँ जिससे सारे ईसाई रिलीजन के लोगों को समस्या होने लगे। दूसरे मतों के सम्मान का कतई मतलब नहीं होता कि हम उन्हें अपने मतों को छेड़ने को लिए आमंत्रित करें।

मेल्टिंग पॉट, सहिष्णुता, प्लूरलिज्म आदि अपने मूल को बचाते हुए, दूसरों को ससम्मान उनके मूल को बचाने में सहयोग देना है। इसका मतलब ये बिलकुल भी नहीं है कि चूँकि उसे पता है कि मंदिर में घंटी बजाना होता है तो वो मंदिर की घंटी तक न पहुँचे तो हम उसे अपने सामने शिवलिंग पर लात रख कर घंटी तक पहुँचते देखते रहें, और कुछ न करें। साथ ही, ये प्लूरलिज्म म्यूचुअल होता है, एकमार्गी नहीं।

इसलिए, इन प्रदर्शनकारी छात्रों का समर्थन कीजिए अगर आपकी हिन्दू धर्म में आस्था है। इन्हें जो धर्मांध और विभाजनकारी कह रहे हैं, वो वही लोग हैं जिन्हें फर्क नहीं पड़ता कि अयोध्या में मंदिर बने या मस्जिद। ये वही लोग हैं जिन्हें माँ दुर्गा को वेश्या कहना अभिव्यक्ति आजादी लगती है। इन्होंने माँ सरस्वती की नग्न पेंटिंग करने वाले को महान बनाया है। इसलिए इन्हें इस बात में अंतर नहीं पता चल रहा संस्कृत भाषा और यज्ञ के संस्कृत श्लोकों में क्या अंतर है।

आप दरवाजे खोलिए, दीवाली में दीये जलाइए, होली में रंग खेलिए उनके साथ, ईद की सेवइयाँ खाइए, किसी को कई समस्या नहीं। ये उत्सव है। लेकिन अगर आप कह रहे हैं कि मेरे घर के कलश स्थापन में, कलश के नीचे की मिट्टी में छींटे जौ को कोई समुदाय विशेष वाला सिर्फ इसलिए छू देगा क्योंकि वो तो एक पौधा है, तो उसमें मुझे समस्या है। वो मेरे और मेरे आराध्य के बीच की शुद्धता और उस ऊर्जा के प्रवाह को प्रदूषित करने जैसा है। ऐसा मेरी अनुपस्थिति में हो, और मुझे पता न चले तो मैं कुछ नहीं कर सकता, लेकिन मेरे सामने ऐसा हो, तो वो मैं होने नहीं दूँगा।

पाकिस्तान के नदीम खान के जाल में फॅंस दुबई भागी मेरठ की युवती, पिता ने लव जिहाद बता लगाई गुहार

उत्तरप्रदेश के मेरठ के कंकरखेड़ा निवासी कपिल गुप्ता नामक एक शख्स ने ट्विटर पर अपनी बेटी को पाकिस्तानी युवक के चंगुल से छुड़ाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री, विदेश मंत्रालय और प्रदेश के मुख्यमंत्री को संदेश लिखा है।

उन्होंने ट्वीट किया है, “मैं एक 18 वर्षीय बेटी का लाचार पिता हूँ। मेरी मासूम बेटी को लव जिहाद के जाल में फँसा लिया गया है। वह लड़का पाकिस्तान से है, जो मेरी बेटी से पिछले कुछ समय से रोमियो बनकर बात कर रहा था। मेरी बेटी को बहला फुसलाकर दुबई ले गया है। न जाने मेरी बेटी किस हाल में होगी।”

कपिल गुप्ता नामक इस शख्स ने अपनी पीड़ा को बयान करते हुए एक और ट्वीट किया है। जिसमें उन्होंने गृह मंत्रालय, दुबई पुलिस, प्रधानमंत्री मोदी आदि से मदद माँगी है। उन्होंने बताया है कि वे इस संबंध में एसएसपी के दफ्तर कंकरखेड़ा में रिपोर्ट करवा चुके हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी बेटी का पासपोर्ट नंबर और लड़के की फोटो भी शेयर की है।

जिसके बाद दुबई स्थित भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने युवती के पिता को कॉल करके पूरे प्रकरण की जानकारी माँगी है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि जैसे ही उन्हें भारत से रिपोर्ट मिलेगी, वे आगे की प्रक्रिया के लिए त्वरित कार्रवाई करेंगे। बता दें कि दूतावास के अधिकारियों ने फेसबुक और इंस्टाग्राम मुख्यालय से भी रिपोर्ट माँगने की बात की है।

लड़की के पिता का कहना है कि उन्होंने कंकरखेड़ा में जहाँ इस मामले पर रिपोर्ट लिखवाई है वहाँ की पुलिस ने उनकी बेटी को ढूँढने के लिए हाथ खड़े कर दिए हैं। इसलिए उन्हें सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा और सिर्फ़ इसी काम के लिए उन्होंने ट्विटर अकाउंट खोला।

जानकारी के मुताबिक 18 नवंबर की रात कांसुलेट जनरल ऑफ इंडिया (सीजीआई) दुबई की तरफ से युवती के पिता को ट्वीट कर कहा गया,” आपकी बेटी को ढूँढने के लिए हमने दुबई की एजेंसियों से बात की है। लेकिन किसी संपर्क नंबर या पते के बगैर सूचना मिलना काफी कठिन रहेगा। हम हरसंभव प्रयास करेंगे।”

लड़की के पिता ने बताया, “हमारे पास बेटी का कोई फोन नंबर नहीं है, क्योंकि वह उस पाकिस्तानी युवक के साथ दुबई जा चुकी है। लेकिन हम आपको लड़के की इंस्टा और एफबी आईडी दे सकते हैं।” इसके बाद सीजीआई ने अपनी आईडी देते हुए उनसे लड़के की एफबी और इंस्टाग्राम आईडी की जानकारी माँगी।

बता दें पेशे से व्यापारी कपिल गुप्ता के इस ट्वीट को अब तक सोशल मीडिया पर ढाई हजार से ज्यादा बार रीट्वीट किया जा चुका है। लोग इसे लेकर अलग-अलग प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कुछ का कहना है कि उन्होंने अपनी बेटी का पासपोर्ट बनवाया ही क्यों, तो कुछ का कहना है कि विदेश जाने से पहले घरवालों को इसकी जानकारी नहीं हुई ये आश्चर्यजनक है। बता दें अधिकांश लोग उनके ट्वीट पर कमेंट करके उनको हिम्मत दे रहे हैं और कह रहे हैं कि उनकी बेटी मिल जाएगी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार कपिल गुप्ता की बेटी फेसबुक और इंस्टाग्राम के जरिए पाकिस्तानी युवक नदीम खान से मिली थी और 4 नवंबर को ही उसका पासपोर्ट बना था। इसके बाद 8 नवंबर की सुबह लड़की पासपोर्ट, शैक्षिक प्रमाण-पत्र और सात हजार रुपए के साथ लापता हो गई। खोजबीन शुरू हुई तो 10 नवंबर को लड़की के पिता ने सांसद राजेंद्र अग्रवाल से मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई। जिससे मेरठ पुलिस सक्रिय हुई और विदेशी क्षेत्रीय पंजीयन कार्यालय (एफआरआरओ) दिल्ली से संपर्क किया। 15 नवंबर को FRRO ने अपनी रिपोर्ट दी कि 8 नवंबर की रात युवती दिल्ली एयरपोर्ट से दुबई गई है। जिसके बाद परिवार ने कयास लगाया कि इसके पीछे नदीम ही है, जो पाक के एक पाँच सितारा होटल का मैनेजर है। उसने अपने प्रोफाइल में आई लव पाकिस्तान लिख रखा है।

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