राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने बुधवार (नवंबर 20,2019) को ‘तानाजी: द अनसंग वॉरियर’ के मेकर्स को धमकी दी है। उन्होंने कहा है कि मेकर्स फिल्म से जुड़े मूल तथ्यों को सही करें और इतिहास या उसके किरदारों को गलत तरीके से न दिखाएँ, नहीं तो वे इसपर कार्रवाई करेंगे।
‘तानाजी’ का किरदार निभाने वाले अजय देवगन की 100वीं फिल्म पर आव्हाड ने कहा है कि मेकर्स को फिल्म में कई बदलाव करने की आवश्यकता हैं। उन्होंने फिल्म निर्देशक ओम राउत पर आरोप लगाया है कि उन्होंने फिल्म के इतिहास को गलत तरह से और अनैतिक रूप से पेश किया हैं। इतना ही नहीं, उनका दावा है कि मराठा योद्धा तान्हाजी मालुसरे को भी गलत तरीके से दिखाया गया हैं।
ओम राऊत तुमच्या तान्हाजी चित्रपटाचा ट्रेलर पाहिला , त्यामध्ये काही प्रसंगात तुम्ही ज्या अनैतिहासिक आणि चुकीच्या गोष्टी घुसडल्या आहेत त्यामध्ये लवकरात लवकर बदल करा अन्यथा यामध्ये मला माझ्या पद्धतीने लक्ष घालावे लागेल. याला धमकी समजली तरी चालेल.#TanhajiTrailer@omraut
अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा, “ओम राउत, मैंने ट्रेलर देखा और आपको इसमें कुछ बदलाव करने जी जरूरत है। अगर ये बदलाव तुरंत नहीं किए गए तो मैं फिल्म के खिलाफ ऐक्शन लूँगा। अगर मेकर्स मेरी डिमांड को धमकी के रूप में लेते हैं तो ले सकते हैं।”
गौरतलब है कि इससे पहले संभाजी ब्रिगेड ने भी ट्रेलर में दिखाए गए कुछ सीन्स पर डायरेक्टर से स्पष्टीकरण माँगा हैं। ब्रिगेड ने अपने पत्र में कहा है कि फिल्म में भगवा झंडे पर ओम का चिह्न दिखाकर जानबूझकर शिवाजी की धर्मनिरपेक्ष छवि को खत्म करने की कोशिश की गई है। इसके अलावा बता दें कुछ लोगों द्वारा काजोल के डायलॉग्स पर भी आपत्ति जताई गई है जो फिल्म में सावित्रीबाई मालुसरे का किरदार निभा रही हैं।
इसके अतिरिक्त संभाजी ब्रिगेड ने फिल्म रिलीज से पहल पहले अपने लिए इसकी स्पेशल स्क्रीनिंग की माँग की हैं। यहाँ बता दें कि ‘तानाजी: द अनसंग वॉरियर’ बड़े पर्दे पर 10 जनवरी 2020 को 3डी में रिलीज होगी। लेकिन इससे पहले इसे काफी आलोचनाओं को सामना करना पड़ा है। अभी ट्रेलर के बाद द क्विंट ने इसपर अपना लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने तानाजी का उदाहरण देते हुए कहा है कि जानिए कैसे बॉलीवुड हिंदुत्व को इतिहास बताकर धकेल रहा है।
हरिद्वार में एक कव्वाली आयोजन के दौरान एक अजीब वाकया हुआ, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि लोग सीट पाने के लिए एक दूसरे को बेहरमी से कुर्सियाँ मार रहे हैं और चोट लगने पर भी रुकने का नाम नहीं ले रहे।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ये वीडियो 19 नवंबर का है और घटना कैथवार मोहल्ले की है। इस वाकये में किसी शख्स को कोई नुकसान नहीं होने की सूचना है, लेकिन फिर भी वीडियो देखकर ऐसा नहीं लग रहा कि किसी को कोई चोट न आई हो। वायरल वीडियो में हम देख सकते हैं कि आयोजन में मौजूद कुछ लोग इतने उग्र हो गए थे कि उन्हें रोकने के लिए पुलिस को बीच में आना पड़ा और समझाकर सबको शांत करवाना पड़ा।
#WATCH People hurled chairs at one another at a Qawwali event in Haridwar last night, after a fight broke out reportedly over seating arrangements. No injuries reported. #Uttarakhandpic.twitter.com/OoOSMF2OhQ
हालाँकि, ये वीडियो देखकर आप उस स्थिति की कल्पना जरूर करने लगें होंगे, लेकिन सोशल मीडिया यूजर्स इसे देखते ही चुटकी लेने लगे। वीडियो में लड़ रहे लोगों को देखकर किसी यूजर्स ने कहा, “संजय राउत को बुला लिया था क्या कव्वाली में”, तो किसी ने कहा ‘ये जेएनयू वाले थे’।
आरोही त्रिपाठी नाम की यूजर्स ने इस वीडियो पर चुटकी लेते हुए लिखा कि ये सभी लोग संसद वाली फीलिंग ले रहे हैं। जिस पर दूसरे यूजर ने कहा ये सब लॉयर बन सकते हैं।
इसके बाद कुछ लोगों ने इस पूरे वाकये के लिए उस इलाके में रहने वाले 30 प्रतिशत समुदाय विशेष के लोगों को जिम्मेदार बताया, जो कि बहुत ही गलत है। बैठने की लड़ाई का किसी के मजहब से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन सोशल मीडिया पर किसका बस चलता है भला!
Google ने अपने Play Store पर मौजूद भारत-विरोधी ऐप ‘2020 Sikh Referendum’ को हटा दिया है। पंजाब सरकार ने इस ऐप को हटाने की माँग की थी। इसके परिणामस्वरूप अब भारत में यूज़र्स के लिए यह उपलब्ध नहीं है।
पंजाब सरकार द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ऐप ने “आम जनता को RE PUNJAB REFERENDUM 2020 KHALISTAN’ में मतदान करने के लिए ख़ुद को पंजीकृत करने के लिए कहा।”
रिलीज़ में कहा गया है कि आवेदन के विश्लेषण से पता चला है कि ऐप पर पंजीकृत मतदाताओं का डेटा ‘est yestoKhalistan.org’ नामक वेबसाइट के वेब सर्वर पर संग्रहीत किया गया था।
ऐसा माना जाता है कि इस वेबसाइट को एक यूएस-आधारित अलगाववादी समूह ‘Sikhs for Justice’ द्वारा बनाया और प्रबंधित किया गया है। इस समूह को भारत सरकार द्वारा इस साल जुलाई में अलगाववाद के आधार पर प्रतिबंधित कर दिया गया था।
प्रतिबंध के बाद, सिंह ने कहा
“यह ISI समर्थित संगठन के भारत-विरोधी अलगाववादियों से राष्ट्र की रक्षा करने की दिशा में पहला क़दम था”
पंजाब के डिजिटल जाँच, प्रशिक्षण और विश्लेषण केंद्र (DITAC) साइबर लैब ने नवंबर की शुरुआत में भारत में Google की क़ानूनी टीम से इस मुद्दे को उठाया था, क्योंकि उनका मानना था कि ‘Sikhs for Justice’ नामक प्रतिबंधित संगठन द्वारा ग़ैर-क़ानूनी और देश-विरोधी गतिविधियों के लिए इस ऐप का दुरुपयोग किया गया था।
वेबसाइट के अनुसार, पंजाब रेफरेंडम 2020 एक अनौपचारिक ऑनलाइन रेफरेंडम है, जो दावा करता है कि यह अभियान पंजाब को मुक्त करने के लिए काम कर रहा है, जो ‘वर्तमान में भारत के क़ब्जे’ में है।
यह अभियान, SFJ द्वारा आयोजित किया जा रहा था। यह एक ऐसा संगठन है जो 2007 में गठित किया गया था, जो सिखों के लिए एक अलग मातृभूमि चाहता है। SFJ का कहना है कि यह नवंबर 2020 में पंजाब और उत्तरी अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, केन्या और मध्य पूर्वी देशों के प्रमुख शहरों में इस तथाकथित रेफरेंडम को आयोजित करने की योजना बना रहा है।
वेबसाइट में कहा गया है कि एक बार जब पंजाबी लोगों के बीच यह सहमति बन जाती है कि उन्हें भारत से आज़ादी चाहिए, तो हम पंजाब को एक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के लक्ष्य के साथ संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय रूपों और निकायों से भी संपर्क करेंगे।
रेफरेंडम के माध्यम से, यह अभियान पंजाब के लिए स्वतंत्रता के समर्थन में कम से कम 5 मिलियन वोट प्राप्त करना चाहता है, जिसके बाद वह संयुक्त राष्ट्र से सम्पर्क करने की योजना बना रहा है। पंजाब पुलिस का कहना है कि SFJ और रेफरेंडम 2020 दोनों ही पाकिस्तान द्वारा समर्थित हैं।
SFJ का चेहरा गुरपतवंत सिंह पन्नुन नाम का एक शख़् है, जो भारतीय राजनेताओं के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर करने के लिए जाना जाता है। अमेरिका में स्थित पन्नून ने 2002 के गुजरात दंगों और 1984 के सिख विरोधी दंगों के मुद्दों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए हैं।
2016 में, अमरिंदर सिंह को SFJ द्वारा दायर एक मामले के कारण कनाडा की यात्रा रद्द करनी पड़ी थी। 2018 में, शिरोमणि अकाली दल अमृतसर (मान) के अध्यक्ष, सिमरनजीत सिंह मान, और सबसे दूर के समूह दल खालसा ने पन्नून को लिखा है कि एक ऑनलाइन रेफरेंडम के लिए SFJ का आह्वान ‘दूर की कौड़ी’ और ‘असाध्य’ था।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों द्वारा संकाय में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर लगातार विरोध जारी है। मीडिया के एक बड़े धड़े ने इसे सिर्फ ‘संस्कृत भाषा’ और ‘मुस्लिम टीचर का विरोध’ का प्रश्न बनाकर जनता को मूल मुद्दे से भटका दिया है। इस मुद्दे पर मीडिया और सोशल मीडिया के कूपमंडूकों द्वारा हद से ज़्यादा भ्रम पैदा किया किया गया है। जबकि ऑपइंडिया ने इस पूरे मुद्दे पर पहले भी स्पष्ट और विस्तार से छात्रों की बात रखी है।
अब इसी कड़ी में हम आपको उसी संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के साहित्य, ज्योतिष और वेद सहित कई विभागों के वर्तमान प्रोफ़ेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष, काशी के आचार्यों का बयान आपके सामने रख रहे हैं कि उनका फिरोज खान की नियुक्ति और धर्म विज्ञान के विषय में क्या कहना है? क्यों वे इस नियुक्ति के विरोध में हैं?
SVDV के प्रोफेसर्स का कहना है
फिरोज खान की नियुक्ति से पैदा हुए विवाद के कारण SVDV पूरी तरह से ठप्प है। नौकरी में होने के बावजूद वहाँ के कुछ प्रोफ़ेसर खुल कर इस मुद्दे पर छात्रों के साथ है। कुछ ऐसे प्रोफेसरों से भी हमारी बात हुई जो नौकरी में होने की जटिलता के कारण खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं लेकिन छात्रों को उनका नैतिक समर्थन मिला हुआ है।
संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग के सहायक प्रोफ़ेसर रजनीश पाण्डेय का कहना है कि मैं छात्रों के साथ हूँ, तकनीकि रूप से भले ही कानून उनके पक्ष में नहीं हो लेकिन उनके माँग मालवीय जी के इस संकाय की स्थापना के उद्देश्यों के अनुसार ही है। चूँकि, अभी तक SVDV संकाय में किसी अन्य मजहब के व्यक्ति की नियुक्ति नहीं हुई तो पहले ऐसे विवाद की जरुरत ही नहीं पड़ी। पिछले 100 साल से अधिक समय के बाद ऐसा पहली बार हुआ है। इसलिए परीक्षा नजदीक होने के बावजूद भी छात्र धरना-प्रदर्शन को मजबूर हैं।
साहित्य विभाग के प्रोफ़ेसर रजनीश पांडेय जी कहते हैं, “कल मैं फिरोज खान और उनके पिता के वक्तव्य को ‘दैनिक जागरण’ में पढ़ रहा था जिसका लब्बोलुआब यह था कि उनके साथ मुस्लिम होने के कारण यह सब हो रहा है। उनके अनुसार आज तक उनके साथ कभी मुस्लिम होने से कोई भेद भाव नहीं हुआ पर आज मुस्लिम होने के कारण ये सब हो रहा। उनके अनुसार उन्होंने बचपन से संस्कृत पढ़ा और उनके घर में कृष्ण की फोटो है आदि आदि बहुत सी बातें संस्कृत प्रेम को सिद्ध करने के लिए कहा है।”
सहायक प्रोफ़ेसर ने कहा, “मैं उनसे सिर्फ यह जानना चाहता हूँ कि क्या इस देश में कहीं मुस्लिम संस्कृत नहीं पढ़ा रहे और यदि हाँ तो उनके साथ ये भेद भाव क्यों नहीं हुआ। अरे ये वो देश है, जिसमें हजारों मन्दिरों को इस्लाम के नाम पर लूटा गया, तोड़ा गया, रूह कपा देने वाले अत्याचार किए गए। जननी-जन्मभूमिश्च के लिए स्वर्ग का भी परित्याग कर देना चाहिए, ऐसा विश्वास करने वाले हिन्दू जनमानस के सामने ही उसकी माँ से भी प्रिय मातृभूमि के इस्लाम के नाम पर टुकड़े कर दिए गए। राम के ही देश में हमें राम के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए न्यायालयों में वर्षों तक चक्कर लगाने पडे़। कौन सा ऐसा ईसाई देश है, जहाँ ईसा मसीह के अस्तित्व के लिए केस चला हो कौन सा ऐसा मुस्लिम देश जहाँ मुहम्मद साहब के अस्तित्व के लिए केस चला हो। लेकिन फिर भी इस देश ने मुस्लिम को अपना हिस्सा समझकर बराबरी का व्यवहार किया, जानते हैं क्यों? क्योंकि संस्कृत भाषा के रूप में भले ही आमभाषा न रह गई हो पर संस्कार के रूप में आज भी इस देश के हर हिन्दू के नस-नस में जिन्दा है।”
रजनीश पांडेय कहते हैं, “आप ने सही कहा कि आपने बचपन से संस्कृत पढ़ी लेकिन उसको ग्रहण केवल भाषा के रूप में किया पर संस्कृत के संस्कार को आत्मसात नहीं कर पाए वरना ये भेदभाव वाली दृष्टि केवल शान्तिपूर्ण विरोध के कारण कभी पैदा ही नहीं होती। इतिहास पढ़िए तब समझ में आएगा कि इतने पद-दलन अपमान अत्याचार को धैर्यपूर्वक सहते हुए भी हिन्दू जनमानस ने कभी मुस्लिमों को अपने से अलग नहीं समझा ये है संस्कृत के संस्कार का चमत्कार। जो केवल पढ़ने से नहीं आ सकता, जिसका आप दावा कर रहे हैं।”
इतनी बातचीत के बाद रजनीश जी SVDV में छात्रों के विरोध पर बात करते हुए कहते हैं, “अब आइए विरोध के कारणों पर। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जिसके नाम में ही महामना के द्वारा ‘हिन्दू’ शब्द जुड़ा हुआ है जिसे हटाने के लिए 60 के दशक में नेहरू के समय शिक्षामंत्री MC छागला (मुहम्मदअली करीम छागला) द्वारा अभियान चलाया गया। बाकायदा बिल पेश किया गया और जब उस समय के जनमानस का विरोध झेलना पड़ा तब जाके उसे वापस लिया गया और वहीं से छागला के ही कारण JNU के स्थापना की भूमिका बनी। महामना, गाँधी जी के विरोध के बावजूद भी विश्विद्यालय के नाम में ‘हिन्दू’ शब्द पर अड़े रहे तो वहीं उन्होंने हिन्दू धर्म और सनातन मूल्यों के प्रति अपनी दृढ़ता और आग्रह प्रदर्शित कर दी थी।
रजनीश जी थोड़ा तल्ख़ होते हुए कहते हैं कि महामना कोई भंगेड़ी या नशेड़ी नहीं थे जो नशे में विश्वविद्यालय के नाम में हिन्दू शब्द जोड़ दिया और विश्विद्यालय में संस्कृत विभाग के साथ ही वैदिक विद्यालय जिसे बाद में नाम बदलकर संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय किया गया। मालवीय जी एक युग द्रष्टा तपस्वी त्यागी महापुरुष थे जिनको अच्छी तरह से मालूम था कि इस शब्द का क्या अर्थ है। जिन्होंने बीएचयू के बीचो-बीच काशी विश्वनाथ का मन्दिर स्थापित किया, वो यह प्रमाण है कि हिन्दू पूजा पद्धति और सनातन मूल्यों के प्रति उनका क्या लगाव था। और उसी लगाव के चलते उन्होंनें हिन्दू धर्म के अध्ययन और उसकी अस्मिता को बचाए और बनाए रखने के लिए ‘धर्म विज्ञान’ संकाय की स्थापना की न कि संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए जिसके लिए संस्कृत विभाग कला संकाय में है और उसका दरवाजा सभी के लिए खुला है।
रजनीश जी कहते हैं कि अब सवाल यह है कि हिन्दू धर्मशास्त्र कौन पढ़ाएगा? उस धर्म का व्यक्ति जो बुतपरस्ती कहकर मूर्ति और मन्दिर के प्रति उपहासात्मक दृष्टि रखता हो और वो ये सिखाएगा कि पूजन का विधान क्या होगा? क्या जिस धर्म के हर गणना का आधार चन्द्रमा हो वो सूर्य सिद्धान्त पढ़ाएगा, जो धर्म साकार स्वरूप को मानता ही न हो वो साकार और निराकार के सबन्ध को समझाएगा? जहाँ साहित्य का अर्थ केवल संस्कृत नृत्य और गायन मात्र हो वो ‘व्यक्तिविवेक’ और ‘रसगंगाधर’ जैसे हिन्दू धार्मिक चिन्तन से ओतप्रोत ग्रंथों की शिक्षा देगा, जो धर्म तीन बार तलाक तलाक कहकर नारी को घर से बाहर निकाल देने की इजाजत देता हो उस धर्म का व्यक्ति सप्तपदी और जन्म जन्मातर के विवाह संस्कार की व्याख्या करेगा? जो किसी गुण में ही विश्वास न करता हो वो सृष्टि की त्रिगुणात्मक व्याख्या करेगा? जिस धर्म में ‘मजहबी’ होने का प्रमाण गुप्तांग विच्छेदन से हो वो उपनयन संस्कार और ब्रह्मचर्य का उपदेश देगा? ऐसे एक नहीं हजारों यक्ष प्रश्न विरोध का कारण हैं जिसको आपने अपनी तुच्छ हिन्दू मुस्लिम दृष्टि से तौल दिया।
रजनीश जी स्पष्ट तौर पर कहते हैं, “आपकी हताशा का कारण मात्र आर्थिक, मानसिक और व्यक्तिगत है और विरोध का व्यक्तिगत आर्थिक स्वार्थ से दूर-दूर तक लेना देना नहीं है। हमारे यहाँ साफ कहा गया है ‘धर्मो रक्षति रक्षितः। हो सकता है आप बहुत अच्छे इन्सान हो पर एक सत्य यह भी है कि दूध का जला मठ्ठा भी फूँक-फूँक कर पीता है। आपने संस्कृत पढ़ा और पढ़ाया इसके लिए मेरी नजर में आप अत्यंत सम्मान और स्नेह के पात्र हैं। लेकिन फिरोज खान महोदय धर्म और बेडरूम की अपनी मर्यादा व निजता होती है। भारतीय संविधान भी इसकी इजाजत देता है। कितना भी मैं उर्दू और कुरान पढ़ लूँ पर मै मौलवी नहीं बन जाऊँगा, नहीं मैं ऐसा किसी आर्थिक कारण लिए करना चाहूँगा।”
उन्होंने कहा, “ये कहना कि ‘अच्छा होता कि संस्कृत पढ़ाने की जगह मुर्गे की दुकान खुलवा देता’ ऐसा आक्रोशपूर्ण वक्तव्य देना और संस्कृत प्रेमी का दावा करना निःसंदेह विचित्र विरोधाभास है। अरे आपके ही राजस्थान की बहु रही मीराबाई ने प्रेम के लिए हंसते हुए जहर पी लिया और आपका संस्कृत प्रेम कुछ छात्रों के विरोध मात्र से मुर्गे की दुकान पर पहुँच गया। ये प्रेम का कौन सा रुप है, मैं समझ नहीं सका। यह विश्वविद्यालय जेएनयू सरीखे विश्वविद्यालयों से अलग है जहाँ देश विरोधी नारे लगते हैं लानत है ऐसी शिक्षा को। इस विश्वविद्यालय की स्थापना के मूल में हिन्दू संस्कृति थी, है और रहेगी। जिसको इसमें आपत्ति है वो आपत्ति रख सकता है पर आपत्ति से ऐतिहासिक सत्य नहीं बदल जाता।”
एक ही विश्वविद्यालय में दो संस्कृत विभाग क्यों?
संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के ज्योतिष विभाग के प्रोफेसर गिरिजाशंकर शास्त्री ने भी अपने बयान में इस बात को समझाने पर जोर दिया कि धर्मप्राण भारतरत्न महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी ने विशेष उद्देश्य से धर्म, ज्ञान-विज्ञान एवं मोक्ष की नगरी वाराणसी में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की संस्थापना की। धर्म अत्यन्त व्यापक शब्द है, इसकी गति भी अत्यन्त सूक्ष्म है, धर्म और धर्म का तत्व भी बड़े-बड़े महापुरुषों महामनीषियों के बुद्धिरुपी गुहा में स्थित है, समग्र धर्म तो परमात्मा ही है, जिसे सनातन परम्परा द्वारा जानने की चेष्टा सर्वदा से होती रही है, सनातन धर्म शाश्वत है, यह किसी महापुरुष या व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं चलाया गया है।
प्रोफ़ेसर शास्त्री इस बात पर जोर देते हुए कहते हैं, “सनातन धर्म को छोड़कर अन्य धर्म किसी न किसी व्यक्ति के द्वारा प्रवर्तित किए गए हैं। यही कारण है कि इन धर्मों को सम्प्रदाय कहा गया है। सनातन धर्म की रक्षा हेतु परमात्मा का भी समय-समय पर अवतरण होता रहा है। सनातन संस्कृति के रक्षक वेद एवं वेदांग ही हैं, इसी की रक्षा हेतु भगवान केे विशेष अंश से अवतरित दूरदर्शी महामना मालवीय ने सर्वप्रथम संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय की स्थापना की। कालान्तर में संस्कृत भाषा एवं संस्कृत ज्ञान के प्रचार प्रसार हेतु बीएचयू के कला संकाय में एक अन्य संस्कृत विभाग की भी स्थापना की। संस्कृत के दोनो विभागों का उद्देश्य पृथक-पृथक है।
ज्योतिष विभाग के प्रोफ़ेसर गिरिजाशंकर शास्त्री बताते हैं कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के प्राध्यापकगण मालवीय भवन में होने वाले कृष्णजन्माष्टमी, गीताप्रवचन, ऋषिपूजन, श्रावणीकर्म, सरस्वती पूजा, विश्वविद्यालय स्थित विश्वनाथ मंदिर में पूजन-अर्चन प्रत्येक वर्ष समयानुसार करते हुए वेद-वेदांग की शिक्षा प्रदान करते हुए सनातन धर्म की रक्षा करते हैं। जबकि संस्कृत विभाग का सम्बन्ध अन्य विषयों की भाँति केवल पठन-पाठन, शोधकार्य तथा अन्य संस्कृत से सम्बन्धित गतिविधियों में सीमित हैं। अतएव मालवीय जी का दो विभाग स्थापित करने का उद्देश्य भी यही था। अतएव महामना ने नियम निर्देश करते हुए शिलापट्ट में ‘नैष्ठिक हिन्दू’ के अतिरिक्त अन्य किसी भी धर्मावलंबी के लिए संस्कृत विद्या धर्मविज्ञान संकाय में अनुमति नही प्रदान की होगी।
SVDV के साहित्य विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष श्यामानन्द मिश्रा का कहना है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय की स्थापना के पीछे महामना मालवीय जी की संकल्पना सनातन धर्म एवं संस्कृति में निहीत उदात्त मूल्यों की रक्षा तथा उनके प्रचार-प्रसार की थी। अन्यथा संस्कृत का सामान्य अध्ययन ही उद्देश्य होता तो एक ही विश्वविद्यालय में धर्म विज्ञान संकाय से पृथक कला संकाय में भी संस्कृत विभाग की स्थापना मालवीय जी द्वारा क्यों होती? पूर्व विभागाध्यक्ष ने लोगों से अपील भी की कि जिनको भी धर्म-विज्ञान (Theology) संकाय का वास्तविक ज्ञान नहीं है, वे इस विषय में अनावश्यक टिप्पणी करने का दुस्साहस न करें। उन्होंने भी इस बात को दोहराया और कहा- विशेष ज्ञान के लिए संकाय-भवन में लगा शिलापट्ट पढ़ें।
SVDV शिलापट्ट
SVDV के ही वेद विभाग के प्रोफ़ेसर दीक्षित ने भी फिरोज खान के नियुक्ति के सम्बन्ध में अपने बयान में उस किताब के तरफ ही ध्यान आकर्षित किया कि ‘वैदिक महाविद्यालय’ का पूरा उद्देश्य उसी किताब में लिखा है जिसका लोकार्पण माननीय कुलपति जी ने ही किया है। वर्णाश्रम धर्म और उसके रीति से प्रवेश की वकालत की। उन्होंने जो कुछ कहा उसका जिक्र हम पहले भी अपनी रिपोर्ट में कर चुके हैं जिसे यहाँ पढ़ा जा सकता है।
SVDV के प्रोफेसरों के अलावा काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने भी छात्रों के आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि महामना ने जब BHU की स्थापना कि थी तो ‘धर्म विज्ञान संकाय’ की स्थापना के साथ उन्होंने भविष्य में इस विभाग में नियुक्ति के लिए एक पत्थर भी लगवाया था जिस पर लिखा है कि सनातन धर्म में आस्था रखने वाला हिन्दू ही यहाँ अध्ययन-अध्यापन करेगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा जिस तरह विश्वनाथ मंदिर में गैर सनातनी दर्शन पूजन के लिए नहीं जा सकता है उसी तरह BHU के धर्म विज्ञान संकाय में भी शिक्षक सनातन धर्म का होना चाहिए। इसी से धार्मिक शुद्धता बची रहेगी।
इसके अलावा विश्वविद्यालय के कई अन्य प्रोफेसरों के साथ ही काशी के पंडितो और आचार्यों का भी कहना है कि उस संकाय में सनातन धर्म पढ़ाया जाता है दूसरा कोई और धर्म नहीं जो किसी भी धर्म का शिक्षक आकर पढ़ाए। उन सभी ने छात्रों की माँगों का समर्थन किया।
इस समय मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा जो बिना इस मुद्दे को समझे ही इसे सिर्फ भाषा का मुद्दा समझकर और ब्राह्मणवाद के विरोध के नाम पर अपनी कुंठा को कई अन्य रूपों में प्रकट करने में लगा है। जिससे अब ये मुद्दा राजनीतिक और धार्मिक रूप ले चुका है। एक तरह जहाँ विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी नियुक्ति को सही ठहरा रहा है तो वहीं छात्रों की माँग भी अगर हिन्दू धर्म और उसके मूल्यों के सन्दर्भ में देखें तो सही लग रहा है। इस पूरे परिपेक्ष्य में जरुरत लोगों को सही मुद्दे से परिचित कराने की भी है।
ये पूरा मुद्दा न भाषा का है और न ही BHU में मुस्लिम अध्यापक के प्रवेश के विरोध का क्योंकि BHU की स्थापना के समय से ही वहाँ लगभग सभी धर्मों के शिक्षक स्वतंत्रता पूर्वक पढ़ा रहे हैं। सवाल सिर्फ एक विशिष्ट संकाय संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय का है। जहाँ पर नियुक्ति के अभी तक अघोषित नियम थे जिनका पालन पिछले 100 सालों से होता आया और जब पहली बार किसी ने उससे अलग जाने की कोशिश की तो आज विश्वविद्यालय को उन छात्रों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है जिनके लिए संस्कृत भाषा नहीं बल्कि माध्यम है, सनातन धर्म और उसके मूल्यों की रक्षा और उसके संवर्धन करने का। SVDV के छात्र सिर्फ आज की नहीं बल्कि आने वाले समय को भी ध्यान में रखकर चल रहे हैं वो नहीं चाहते जिसे वो मन से स्वीकार ही नहीं कर पाएँगे कि वो उनका गुरु है वो उन्हें शिक्षा दे।
JNU में छात्रों का प्रदर्शन अराजकता के स्तर पर पहुँच गया है जिससे न सिर्फ प्रशासन बल्कि आम जनता भी तंग आ चुकी है। सोशल मीडिया पर पक्ष-विपक्ष दोनों तरफ से कई तरह के बयान सामने आ रहे हैं। इसी बीच रहमान मलिक ने HRD मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को पत्र लिखकर JNU के स्थान्तरण की ही माँग रख दी है। अपने पत्र में उन्होंने उन्होंने इसके कई कारण बताए हैं।
रहमान मलिक लिखते हैं, “मान्यवर मैं आपका ध्यान ऐसे विषय के तरफ केंद्रित करना चाहता हूँ जो देश में शैक्षणिक स्तर और देश की राजधानी दिल्ली के सुनहरे भविष्य के लिए हितकारी होगा। देश की राजधानी में 1019.32 एकड़ में बनी जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पढाई कर रहे देश के छात्र और छात्राओं को के लिए अलग से दिल्ली एनसीआर में भूमि अधिग्रहण कर यूनिवर्सिटी बनाई जाए जहाँ एकांत व खुला स्वच्छ वातावरण हों।
@DrRPNishank letter sent to you for betterment of students of #JNU.#JNU must be transferred out of Delhi. Climate condition and social atmosphere in Delhi creates distraction for students and researcher. Please Re-establish it in #Mewat region in Haryana #shiftJNUtoMEWATpic.twitter.com/oCi0Jbbylv
राजधानी दिल्ली में JNU के छात्र एकाग्रता से पढाई नहीं कर पाते। दिल्ली बहुत भीड़ भाड़ वाला इलाका है जहाँ छात्रों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दिल्ली का वातावरण भी अच्छा नहीं है उन्हें कच्ची आयु में दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ता है। देखने में आया है कि कुछ छात्र 40-45 की उम्र में भी अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाते। यह चिंताजनक है। पूरा पत्र आप नीचे पढ़ सकते हैं।
बता दें कि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में हॉस्टल मैन्युअल अपडेट किए जाने को लेकर विवाद चल रहा है। इस यूनिवर्सिटी में सबसे ज्यादा छात्र आर्ट्स, सोशल स्टडीज, लैंग्वेज कोर्स और इंटरनेशनल स्टडीज पढ़ते हैं। जेएनयू में लगभग 8,000 छात्र हैं। इनमें से आधे से ज्यादा आर्ट्स, लैंगवेज, लिटरेचर और सोशल साइंस के हैं। 57% छात्र इन्हीं चार विषयों की पढ़ाई करते हैं। बाकी बचे छात्रों में से 15% इंटरनेशनल स्टडीज में हैं। कुल छात्रों में से 55% एमफिल और पीएचडी कर रहे हैं। जो सालों तक वहीं पड़े रहकर राजनीतिक गतिविधियाँ चला रहे हैं।
सिनेमा का सफर शुरुआती दौर से लेकर अब तक अविस्मरणीय रहा है। एक ऐसा माध्यम जिसने चलचित्रों के माध्यम से अनेकों कहानियाँ हम तक पहुँचाई और हमारी उसमें रुचि पैदा की। इस माध्यम का प्रभाव इतना ज्यादा रहा कि शुरुआती समय में तो दर्शक यही भूल गया कि उसे क्या ग्रहण करना है और क्या दरकिनार। बस, जो भी पर्दे पर आया वहीं अंतिम सत्य…। दर्शकों की इसी प्रतिबद्धता का फायदा उठाकर इस पर खूब राजनीति हुई। अपनी विचारधारा के ओट में दर्शकों की मानसिकता तय की जाने लगी। एक समय ये भी आया जब हिन्दी सिनेमा ने हिंदू सम्राटों के इतिहास को हाशिए पर रख दिया और भारतीय संस्कृति को एकमात्र गंगा-जमुनी तहजीब की धरातल पर परोसने लगे।
इस दौरान मुगल शासकों पर अलग-अलग तरीकों से फिल्में बनीं, अलग-अलग कहानियों के साथ। इनमें जहाँगीर को चाहते-न चाहते हुए भी कुरीतियों पर लगाम लगाने वाला बताया गया। हिंदुओं की बहन-बेटियों का अपहरण कर उन्हें दरबार में प्रदर्शनी बनाने वाले अकबर की कहानी कुछ ऐसे पेश की गई कि उसे हिंदू तक अपना नायक मानने लगे। इस काल में महान मराठा सम्राट शिवाजी की वीरगाथा मौन रही, दिल्ली सम्राट पृथ्वीराज चौहान को छोटे पर्दे कर सीमित कर दिया गया और बाकी हिंदू शासकों को बिना शोध के जान पाना असंभव हो गया।
लंबे समय बाद कुछ सालों पहले ये स्थिति बदली और कुछ समय से मुगल शासकों के अलावा विस्मृत हिंदू सम्राटों पर भी फिल्में बननी लगीं। हालाँकि इन फिल्मों की सिनेमेटोग्राफी, डॉयलॉग डिलीवरी, कलाकारों की एक्टिंग आदि यहाँ चर्चा का विषय नहीं हैं। यहाँ विषय है इतिहास के उन नायकों का, जो एक समय तक दबे रहे और अब उन्हें सिनेमाई पर्दे पर जगह दी जा रही है। अब दर्शकों को इतिहास के उन नामों से परिचित कराया जा रहा है, जिनकी गाथा शोधार्थियों के शोध में है, लेकिन इतिहास की किताबों में वे एक पंक्ति या पैराग्राफ में समेट दिए गए।
समय बदला, नदरिया बदला, कुछ डायरेक्टर-प्रॉड्यूसर आए, कुछ नए लेखकों ने अलग कहानियाँ लिखीं। तब जाकर बड़े पर्दे पर हिंदुस्तान का इतिहास भी दिखने लगा। बॉलिवुड प्रेमियों को पिछले कुछ वर्षों से यह लगने लगा कि हिंदू नायकों को भी उतनी ही महत्ता दी जा रही है, जितनी की कभी किसी मुगल शासक को दी जाती थी। लेकिन प्रोपेगेंडा फैलाने में माहिर मीडिया हाउस द क्विंट जैसे संस्थान को यह भला रास क्यों आता। दर्शक को ‘आधा पहलू या अलग पहलू’ दिखाने का चलन आदि उन्हीं जैसे लोगों ने तो बनाया है। ऐसे में अगर दूसरा पक्ष भी सिनेमा पर उतरने लगा तो उनके विचारों का क्या होगा? उन्हें तो डर है कि लोग जानने-समझने के इच्छुक हो जाएँगे और उनके बताए ‘सच’ को कोई नहीं सुनेगा। इसलिए जैसे ही तानाजी का ट्रेलर रिलीज हुआ, और उससे पहले पानीपत का ट्रेलर को भी लोग देख चुके है… तो क्विंट ने इस पर एक लेख लिख मारा। माफ कीजिए, लेख नहीं – जहर लिखा है, जहर!
हालाँकि ये पूरा लेख किसी तथाकथित सेकुलर के लिए एक आदर्श लेख हो सकता है। लेकिन एक आम नागरिक और सेकुलरिज्म की उचित परिभाषा समझने वाले के लिए ये लेख केवल हिंदुओं के इतिहास और उसके पर्दे पर दिखाए जाने को लेकर पैदा हुई कुंठा का प्रतिबिंब ही है।
तानाजी फिल्म पर लेख में लिखे मुख्य बिंदु
लेख की शुरुआत में ही ये साफ कर दिया जाता है कि किसी भी प्रकार का सिनेमा अपने समय की राजनीति को दर्शाता है। इसलिए नेहरू के समय ‘जिस देश में गंगा बहती है’ और ‘2 बीघा जमीन’ जैसी फिल्मों का निर्माण होता है। जबकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘बेबी’ और ‘उरी-द सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी फिल्मों की झड़ी लग जाती है।
इसके अलावा इस लेख में ये भी बताया जाता है कि मोदी सरकार के नेतृत्व में सिनेमा सिर्फ़ हिंदू राष्ट्रवाद के नैरेटिव को बढ़ावा दे रहा है। जिसके सबूत संजय लीला बंसाली की फिल्म ‘पदमावत’,’बाजीराव मस्तानी’ जैसे फिल्में हैं और अब ‘पानीपत-द ग्रेट बिट्रेयल’ और ‘तानाजी’ भी इसके ही उदाहरण हैं। लेकिन उस समय का क्या जब नेहरू काल में ‘अनारकली’ और ‘ताजमहल’ जैसी फिल्में बन रहीं थी और उससे पहले हुमायूँ जैसी फिल्में तैयार हो चुकीं थीं… क्या उस समय वो फिल्में राजनेताओं के चरित्र का उल्लेख नहीं करती थीं? अगर इस समय हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है तो कॉन्ग्रेस काल में बनी अकबर जैसी फिल्में दर्शकों को इतिहास का कौन सा चेहरा दिखाना चाहती थी?
मोदी सरकार को घेरने की आड़ में लेख लिखने वाले पत्रकार हिंदु राष्ट्रवाद को किस नीचता से समझाते हैं, ये लेख को आगे पढ़ने पर समझा जा सकता है। ‘तानाजी’ फिल्म कुल मिलाकर छत्रपति शिवाजी द्वारा मुगल शासक पर कूच की एक कहानी है। जिसमें तानाजी मालूसोर (छत्रपति शिवाजी की ओर से उनके कोली जनरल होते हैं, और राजपूत उदयभान सिंह राठौड़ मुगलों की ओर से कमांडर। अब चूँकि इस फिल्म में तानाजी का किरदार अजय देवगन द्वारा निभाया गया है और उदयभान सिंह का सैफ अली खान द्वारा तो द क्विंट इसमें हिंदू-मुस्लिम ढूँढने से गुरेज नहीं करता और बताता है कि आखिर कैसे एक मराठा और राजपूत के बीच की लड़ाई साम्प्रादायिक बनी।
लेख में जोर देकर बताया जाता है कि फिल्म के तानाजी और उदयभान सिंह दोनों हिंदू थे, लेकिन ट्रेलर में अजय देवगन के माथे पर तिलक है, जबकि सैफ अली खान के माथे पर नहीं। अब ये बात इतिहास को थोड़ा-बहुत भी जानने वाला हर शख्स जानता है कि जिस समय मुगलों ने राज किया उस दौरान आम जनता समेत हिंदू राजाओं को उनके अधीन होना पड़ा था, और उनके तौर-तरीकों से हिंदुओं के जीवन-बसर पर भी असर पड़ा था। कई हिंदू मुगलों की ओर से लड़ते थे, क्योंकि उनके पास और कोई विकल्प नहीं था। अब अगर 5000 मुगल सैनिकों का प्रतिनिधि करने वाले ‘उदयभान राठौड़’ तिलक लगाकर मैदान में आते तो क्या मुगल उनके ऊपर यकीन कर पाते या फिर वो 5,000 सैनिक…
तथ्यों को अपनी कल्पना की जमीन पर परोसने वाले लोगों को अगर तानाजी का रोल कर रहे अजय देवगन के माथे पर लगे तिलक में ‘अच्छा-बुरा’, ‘हिंदू-मुस्लिम’ एंगल दिखता है, तो इसमें दर्शकों या पाठकों की क्या गलती है, उन्हें क्यों बरगलाया जा रहा है? पूरी कहानी मराठाओं औऱ मुगलों के बीच लड़ी गई, लड़ाई का प्रतिनिधित्व मराठाओं की ओर से तानाजी ने किया, इसलिए उनकी वीरगाथा पर आज फिल्म बनी है। अगर उनकी जगह उदयभान सिंह होता और उस वीरता से वो लड़ता तो शायद उस पर भी फिल्म बनती। हम चाहे कितने भी तर्क-कुतर्क कर लें, लेकिन इस बात को नहीं झुठलाया जा सकता है कि मुगलों ने भारत पर कब्जा किया था और मराठा इस देश की धरती को माँ की तरह पूजते थे। ऐसे में तानाजी के पक्ष को न दिखाकर उदयभान (जो मुगलों की ओर था, कारण चाहे जो भी हो) का पक्ष दिखाना कौन सा सेकुलरिज्म कायम करता है?
लेख में इस बात को भी बताया जाता है कि ट्रेलर में तानाजी कि माँ कहती हैं कि -“जब तक कोनढ़ाना में फिर से भगवा नहीं लहरेगा, हम जूते नहीं पहनेंगे।” और तानाजी कहते हैं “हर मराठा पागल है स्वराज का, शिवाजी राजे का, भगवे का।”
लेख लिखने वाले पत्रकार और उनकी मानसिकता वाले अन्य लोगों को समझने की जरूरत है कि जिन बिंदुओं को गलत-सही ठहराकर वो हिंदू राष्ट्रवाद को और इतिहास के नायकों की छवि धूमिल करने की कोशिश कर रहे हैं- वो किसी धर्म का प्रतीक है और ‘भगवा’ उसी भाव का एक रूप। क्या कभी किसी मुस्लिम शासक को आपने सुना है जंग के लिए संस्कृत में दहाड़ते हुए या फिर ‘जय श्री राम’ बोलते हुए जंग का आगाज करते – नहीं। वो वही बोलते हैं, जो उनके मजहब ने उन्हें सिखाया होता है। इसी तरह भगवा प्रतीक है भारतीय पृष्ठभूमि के एक पूरे काल का। अगर मराठाओं ने भगवा रंग पर अपने भाव जाहिर किए, तो इसमें साम्प्रादायिकता कहाँ से आ गई। क्या सिर्फ़ इसलिए की उदयभान राजपूत होने के बाद ऐसा नहीं कर पाया और तानाजी ने अपने धर्म का मान रखा! मतलब हद नहीं है मानसिक दिवालिएपन की!
इसके बाद हिंदू बनाम मुस्लिम करते हुए जब पत्रकार महोदय थक गए तो उन्होंने इसे केवल हिंदुओं का मसला नहीं बताया। बल्कि उन्हें तो इस फिल्म में ऊँची जाति वालों का वर्चस्व भी दिखने लगा। उन्होंने काजोल के एक डॉयलॉग पर अपना जहर उगलना शुरु किया। जहाँ काजोल ट्रेलर में कहती सुनी जा सकती हैं कि जब शिवाजी राजे की तलवार चलती है तब औरतों का घूँघट और ब्राहम्णों के जनेऊ सलामत रहते हैं।
हालाँकि, बौद्धिक स्तर पर पत्रकार महोदय का कितना विकास हुआ है ये कुछ ज्यादा पता नहीं, लेकिन ये साफ है कि ये डायलॉग उस समय ऊँची जाति वालों के वर्चस्व वाली स्थिति को दिखाने के लिए नहीं बोला गया। भारतीय संस्कृति में औरतों के घूँघट को इज्जत से जोड़ के देखा जाता है और ब्राह्मणों के जनेऊ को धर्म से। इसलिए जाहिर है यहाँ बात औरतों की इज्जत और सनातन धर्म की रक्षा के लिए हुई थी न कि ब्राहम्णों और पितृसत्ता के वर्चस्व के लिए। इसलिए हे पत्रकार महोदय! कृपया आँखें खोल कर सिनेमा देखें। और हाँ, प्रोपेगेंडा वाला चश्मा तो बिल्कुल ही उतार दें सिनेमा घर में।
‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई, जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई…’ मीराबाई के इस भजन को आज के युग में सार्थक कर दिखाया है यूपी में अलीगढ़ की रहने वाली यमुना ने। भक्ति रस में सराबोर यमुना बचपन से ही भगवान कृष्ण की पूजा में तल्लीन थीं। समय के साथ-साथ उनका कृष्ण प्रेम इस क़दर बढ़ गया कि उन्होंने सांसारिक मोह से दूरी बनाते हुए भगवान कृष्ण की मूर्ति से शादी कर ली।
कृष्णमय हुईं यमुना ने बक़ायदा पूरे हिन्दू रीति-रिवाज़ से भगवान कृष्ण के साथ सात फेरे लिए। यमुना के इस निर्णय से उनकी माँ लज्जावती समेत घर के अन्य सदस्य बेहद ख़ुश हैं और उन्होंने इस विवाह में सभी आयोजनों में यमुना का पूरा साथ दिया। पुराणों के अनुसार, यमुना कृष्ण की प्रेयसी हैं, तो यह यमुना भी बचपन से ही कृष्ण भक्ति में तल्लीन रहती हैं।
यमुना का कहना है कि वो जीवनभर भगवान श्री कृष्ण (विग्रह) के साथ रहेंगी। बता दें कि बनारस निवासी उनके बहनोई उमेश शर्मा ने सारी व्यवस्थाओं का संचालन किया, देर रात फेरों की रस्म हुई। वहीं, इस अनूठे विवाह में वर पक्ष बांके बिहारी मंदिर को बनाया गया। इसके लिए मंदिर समिति को विवाह का कार्ड भी दिया गया। इस विवाह के कार्ड पर दूल्हे का पता वृंदावन लिखवाया गया। वहीं, लड़की पक्ष की सारी ज़िम्मेदारियाँ दुल्हन के जीजा ने निभाई। इस विवाह में किसी प्रकार का कोई विघ्न उत्पन्न न हो, इसके लिए नज़दीकी गाँधीपार्क पुलिस को अवगत कराया गया और उन्हें भी विवाह में शामिल होने का न्यौता दिया।
विवाह सम्पन्न होने के बाद मीरा बनीं यमुना ने अपना पारिवारिक जीवन त्यागकर वृंदावन जाने का फ़ैसला किया है। जानकारी के अनुसार, यमुना चार बहनों में सबसे छोटी हैं। उनकी तीनों बहनों की शादी हो चुकी है। और वो ख़ुद पेशे से एक प्राइवेट कंपनी में सहायक मैनेजर के पद पर हैं। लेकिन, अब यमुना ने सब कुछ छोड़कर वृंदावन में कृष्ण भक्ति में जीवन बिताने का संकल्प ले लिया है।
यमुना ने बताया कि कृष्ण भक्त मीराबाई से उन्हें काफ़ी प्रेरणा मिली है। भगवत गीता के अलावा उन्होंने गरुण पुराण का भी अध्ययन किया है। जब वो बचपन में अपने परिवार के साथ वृंदावन जाया करती थीं, तभी से उनके मन यह प्रबल इच्छा उठती थी कि वो भगवान कृष्ण से विवाह करें। जैसे-जैसे वो बड़ी हुईं, उनकी यह इच्छा और प्रबल होती गई, जिसे अब उन्होंने साकार कर दिखाया।
बता दें कि इस अनोखे विवाह के दौरान जिस किसी ने भी दूल्हे के रूप में भगवान कृष्ण की मूर्ति को विराजमान देखा, उसने भक्ति-भाव के साथ उन्हें नमन किया और आगे चला गया।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद यह स्थिति साफ़ हो गई कि सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत किसी भी दल के पास नहीं है। भाजपा 105 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी मगर शिवसेना के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन के बावजूद राज्य में सरकार बनाने को लेकर दोनों दलों में एक राय नहीं बन पाई। दरअसल उद्धव ठाकरे और उनकी शिवसेना राज्य की होने वाली सरकार में 50-50 प्लान के तहत अपनी पार्टी की हिस्सेदारी माँग रहे थे। वहीं उद्धव ने अपनी पार्टी के लिए मुख्यमंत्री पद की भी माँग रखी थी जिसे भाजपा ने ख़ारिज कर दिया था।
इसके बाद से ही राज्य में सरकार बनाने के लिए शिवसेना उन पार्टियों से संपर्क साधने में जुट गई, जिन्होंने अपना चुनाव ही शिवसेना के खिलाफ लड़ा था। इसी बात को लेकर एक शख्स ने पुलिस थाने में जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराई है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार औरंगाबाद के रहने वाले इस शख्स का नाम रत्नाकर चौरे है। इस व्यक्ति ने शिवसेना पर आरोप लगाया है कि शिवसेना ने उनके और उनके परिवार के साथ छल किया है। पुलिस को दी गई इस शिकायत में रत्नाकर ने तीन लोगों के नाम लिखवाए हैं। वोट के साथ चीटिंग को लेकर की गई इस कंप्लेंट में रत्नाकर ने विधायक प्रदीप जैसवाल, चंद्रकान्त खैरे और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का नाम डाला है।
बता दें कि यह शिकायत बेगमपुरा पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई है। प्रदीप जैसवाल, चंद्रकान्त खैरे और उद्धव ठाकरे पर की गई इस शिकायत में चौरे ने आरोप लगाया है कि शिवसेना ने हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर वोट माँगा था। इसके उलट नतीजे आने के बाद शिवसेना अपने खिलाफ चुनाव लड़ने वाली पार्टियों के साथ सरकार बनाने की कोशिश कर रही है जबकि उसने भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार बनाने के नाम पर वोट माँगा था। चौरे के मुताबिक यह उनके और उनके परिवार के साथ चीटिंग का मामला है, उन्होंने तीनों पर मामला दर्ज करने की तहरीर दी है।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका था। यही वजह है कि गठबंधन के बगैर कोई भी राजनीतिक दल सूबे में सरकार नहीं बना सकता। यही वजह है कि भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद शिवसेना ने शरद पवार की एनसीपी और कॉन्ग्रेस पार्टी का मुँह ताकना शुरू कर दिया था। कयास यह भी लगाए जा रहे हैं कि एनसीपी और कॉन्ग्रेस के समर्थन देने से महाराष्ट्र में शिवसेना के नेतृत्व वाली सरकार बन सकती है। दरअसल महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने भाजपा को सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बाद सरकार बनाने के लिए न्योता भेजा था। भाजपा के बाद उन्होंने शिवसेना और एनसीपी को भी न्योता भेजा था मगर पर्याप्त बहुमत और आपसी मतभेद के चलते दलों में एक राय नहीं बन पाई थी। इसके बाद से ही महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था।
पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में एक मिशनरी स्कूल में पढ़ने वाली छात्राओं की जबरन लेगिंग्स उतरवाने का मामला सामने आया है। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि लेगिंग्स का रंग स्कूल की ड्रेस से मेल नहीं खाता था। यह घटना सोमवार (18 नवंबर) की है, लेकिन मामला सामने तब आया जब अगले दिन मंगलवार को छात्राओं के माता-पिता ने इस घटना के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन किया। उनका कहना है कि वह अपने बच्चों को ठंड से बचाने के लिए लेगिंग्स पहनाते हैं, ऐसे में स्कूल का ऐसा करना बेहद शर्मनाक है। बता दें कि यह स्कूल बोलपुर में स्थित है, जहाँ का तापमान काफ़ी कम रहता है।
आश्चर्य तो इस बात पर है कि इस शर्मनाक घटना की माफ़ी माँगने की बजाय स्कूल प्रशासन ने तर्क दिया कि कई बार माता-पिता को कहा गया था कि लेगिंग्स स्कूल ड्रेस कोड का हिस्सा नहीं है। स्कूल की प्रधानाचार्या अर्चना फ़र्नांडिज ने इस बात का बचाव करते हुए कहा कि यह घटना छात्राओं को अपनी लेगिंग्स उतारने के लिए मज़बूर करने की घटना नहीं थी, बल्कि “छात्राओं को केवल लेगिंग्स देने को कहा था क्योंकि वे स्कूल की वर्दी से मेल नहीं खा रही थी।”
ख़बर के अनुसार, स्कूल के एक वरिष्ठ शिक्षक, जहीर अली मोंडल ने मीडियाकर्मियों से कहा,
“कुछ स्टूडेंट्स ने लेगिंग्स पहनी हुई थी। हमारे स्कूल में एक ड्रेस कोड है और कुछ स्टूडेंट्स ने ऐसे कपड़े पहने जो स्कूल ड्रेस कोड का उल्लंघन करते हैं। लेकिन किसी को भी अपनी लेगिंग्स उतारने के लिए मजबूर नहीं किया गया। हमने बच्चों से कहा है कि वे इन लेगिंग्स को दोबारा न पहनें।”
वहीं, कुछ अभिभावकों ने शिक़ायत की है कि उनके बच्चों ने लेगिंग्स के नीचे अंडरवियर नहीं पहना था और स्कूल ने उन्हें शर्मिंदा करने का काम किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सोमवार को पाँच से नौ वर्ष की बच्चियाँ सुबह ठंड होने के कारण लेगिंग्स पहनकर स्कूल गईं थी, लेकिन प्रधानाचार्या और अन्य शिक्षकों ने उनकी ड्रेस से मेल न खाने के कारण लेगिंग्स उतरवा दी। इस घटना पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हुए अभिभावकों ने स्कूल के ख़िलाफ़ शांतिनिकेतन पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज करवाया।
सोशल मीडिया पर भी इस घटना को लेकर रोष प्रकट किया जा रहा है।
पश्चिम बंगाल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (WBCPCR) की अध्यक्ष अनन्या चटर्जी चक्रवर्ती ने कहा, “हमने स्कूल को लिखा है और स्पष्टीकरण माँगा है।” वहीं, स्कूल की एक अध्यापिका का कहना है,
“माता-पिता को पहले कई बार चेतावनी दी गई थी जब बच्चे ऐसे कपड़े पहन रहे थे, जो हमारे ड्रेस कोड में नहीं है। लेकिन बच्चों के कपड़े उतारने के जो आरोप लगाए गए, वह ग़लत हैं। मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि माता-पिता अभी भी क्यों विरोध कर रहे हैं।”
जानकारी के अनुसार, बोलपुर के पुलिस अधिकारी अभिषेक रॉय ने इस बात की पुष्टि की है कि उन्हें अभिभावकों की ओर से शिक़ायत मिली है। इस सन्दर्भ में वो माता-पिता और अध्यापक दोनों से बात करेंगे। एक बच्ची के पिता का कहना है, “मैं अपनी बच्ची को उसकी लेगिंग्स के बिना स्कूल से बाहर आते हुए देखकर चौंक गया। उसके पास अंडरवियर नहीं था। यह अपमानजनक है। हेड मिस्ट्रेस को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।”
पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री ने इस घटना के सन्दर्भ में कहा, “हमने कथित घटना को गंभीरता से लिया है।” इसके अलावा, ज़िला शिक्षा विभाग से भी स्कूल अधिकारियों से इस पर रिपोर्ट माँगने को कहा है। चटर्जी ने कहा, “रिपोर्ट मिलने के बाद मैं सुनिश्चित करूँगा कि उचित कार्रवाई की जाए। हम आईसीएसई बोर्ड से भी इस संबंध में बात करेंगे।”
शिक्षा मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार इस मामले को देखेगी, क्योंकि निजी स्कूल उनके दायरे में नहीं आते हैं। शिक्षाविद् पाबित्रा सरकार ने कहा, “अगर इस तरह की घटना हुई है, तो इसका बच्चों के दिमाग पर बुरा असर पड़ेगा।”
महाराष्ट्र में किसकी सरकार, किसके साथ सरकार? महाराष्ट्र में कौन मुख्यमंत्री, किसके बनेंगे कितने मंत्री? राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने के बाद अब तक यह गुत्थी सुलझी नहीं है। इसी क्रम में शरद पवार के दिल्ली स्थित बंगले पर कल देर रात (20 नवंबर 2019 को) तक बैठकों का सिलसिला जारी रहा। इसमें कॉन्ग्रेस के अहमद पटेल और NCP सुप्रीमो पवार समेत अन्य नेताओं हिस्सा लिया लेकिन बात एक शब्द पर अटक गई।
इंडिया टुडे ने सूत्रों के हवाले से लिखा कि इस बैठक में ‘सेक्युलरिज़्म’ एक कांटे का मुद्दा बना रहा, बाद में इसे कॉमन मिनिमम प्रोग्राम (CMP) में शामिल किया गया।
बैठक में मौजूद एक शीर्ष सूत्र ने पुष्टि की है कि कॉन्ग्रेस शिवसेना की कट्टर हिन्दुत्व की छवि से संशय में है और वो चाहती है कि इस सन्दर्भ में CMP में एक स्पष्ट संदेश शामिल किया जा सके, जिससे नई सरकार के गठन में किसी तरह की समस्या का सामना न करना पड़े। नेताओं ने बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा की। इसके बाद अहमद पटेल, कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी के पास वापस चले गए।
सूत्रों के मुताबिक़, इस मामले पर शिवसेना तक पहुँचने और उन्हें समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्युलरिज़्म’ शब्द निहित है। लेकिन शिवसेना अगर शब्द पर सहमत होती है तभी महाराष्ट्र में सरकार के गठन पर गतिरोध कुछ दिनों में समाप्त होने की संभावना है। क्योंकि कॉन्ग्रेस-NCP ने बुधवार को घोषणा की थी कि वे जल्द ही शिवसेना के साथ साझेदारी की शर्तों को अंतिम रूप देने के बाद राज्य में एक स्थिर सरकार का गठन करेंगे।
ख़बर तो यह भी आई थी कि कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने सोमवार (18 नवंबर) को NCP प्रमुख शरद पवार के साथ अपनी बैठक के दौरान शिवसेना के साथ गठबंधन का संकेत दिया था। ऐसे में इस बैठक पर सभी की नज़र टिकी हुई थी, क्योंकि इस बैठक के तहत नेताओं को कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के खाके पर चर्चा करने के लिए बुलाया गया था।
आज फिर से (21 नवंबर) कॉन्ग्रेस नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि राज्य में एक स्थिर सरकार बनेगी। उन्होंने यह भी कहा कि NCP के साथ बातचीत गुरुवार को भी जारी रहेगी। उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस-NCP के बीच आज लंबी और सकारात्मक चर्चा हुई है। चर्चा जारी रहेगी। मुझे यक़ीन है कि हम बहुत जल्द महाराष्ट्र को एक स्थिर सरकार दे पाएँगे।”
मीडिया को संबोधित करते हुए, चव्हाण ने यह भी कहा कि NCP और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच एक और बैठक होगी, जिसमें सरकार गठन से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की जाएगी।
Prithviraj Chavan, Congress on Maharashtra govt formation: Congress leaders and Cong-NCP will meet tomorrow. By evening we will leave for Maharashtra. Day after tomorrow all three parties (Congress-NCP-Shiv Sena) will meet. pic.twitter.com/V0v7FNA0pH
दरअसल, NCP, ढाई साल के कार्यकाल के साथ रोटेशनल मुख्यमंत्री की माँग पर ज़ोर दे रही है, जबकि उसने कॉन्ग्रेस के लिए डिप्टी सीएम पर अपना मत दिया है। सूत्रों के मुताबिक़, विधायकों के कोटे के हिसाब से 16-15-12 के फॉर्मूले के हिसाब से मंत्री पद बाँटे जाने की संभावना है।
वहीं दूसरी ओर शिवसेना सांसद संजय राउत ने प्रेस वार्ता में कहा कि एक दिसंबर से पहले सरकार का गठन हो जाएगा।
Sanjay Raut, Shiv Sena: The process to form government has started. It will be completed before December 1. All three parties will hold meeting in Mumbai pic.twitter.com/vnxhUEKQpx
इससे पहले, शिवसेना ने बुधवार (20 नवंबर) को कहा था कि महाराष्ट्र में एक स्थिर सरकार बनाने की राह में सभी मुश्किलों को दूर कर लिया गया है और इसकी घोषणा आज दोपहर तक की जाएगी। शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि सरकार के बारे में सभी विवरणों को 4-5 दिनों में अंतिम रूप दिया जाएगा और सभी मुश्किलों को हटा दिया जाएगा। साथ ही यह संभावना जताई जा रही है कि NCP और कॉन्ग्रेस के बीच गुरुवार को अपने स्तर पर बातचीत के बाद तीनों पार्टियाँ शुक्रवार (22 नवंबर) को बैठकों का दौर करेंगी।