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कमलेश तिवारी का वो आखिरी FB पोस्ट… आईबी ने पहले ही जताई थी जिहादियों से हमले की आशंका

पैगम्बर मुहम्मद पर टिप्पणी करने के बाद कमलेश तिवारी की नृशंस हत्या में उत्तर-प्रदेश पुलिस के डीजीपी ने इस बात को पुख्ता कर दिया कि घटना प्रथम-दृष्टया कट्टरता की है। इस मामले में पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए व्यक्ति ने भी इस बात को कबूला है कि मुहम्मद पर टिप्पणी करने के चलते कमलेश की हत्या की गई। शुक्रवार 18 अक्टूबर को हुई इस घटना की जाँच में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया, इनमें राशिद, फैज़ान और मौलाना मोहसिन शामिल हैं।

जब इस घटना की तस्वीरें लोगों तक पहुँचीं तो गहरे घाव वाली कमलेश तिवारी की गला रेती लाश देखकर हर कोई विचलित हो गया। कमलेश तिवारी ने फेसबुक पर एक पोस्ट अपनी मौत से करीब दो दिन पहले साझा किया था। उन्होंने उस पोस्ट में लिखा था कि कैसे उन्हें यूपी आईबी से फोन कर इस सन्दर्भ में बताया गया था। इसी से यह भी पता चलता है कि कमलेश पहले से ही जिहादियों के निशाने पर थे।

कमलेश तिवारी का आखिरी फेसबुक पोस्ट

बता दें कि हाल ही में पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के में एक पूरे हिन्दू परिवार की हत्या के विरोध में तिवारी की हिन्दू समाज पार्टी बंगाल में इसका विरोध प्रदर्शन करने में व्यस्त थी। कमलेश ने यह भी लिखा है कि उन्हें यूपी आईबी से कॉल आया था, जिसमें उन्होंने कमलेश से उनके कोलकाता जाने के बारे में सारी जानकारी माँगी थी क्योंकि उन्हें जिहादियों से खतरा था।

बीते दिनों कमलेश तिवारी के ट्विटर से अख़बार की एक तस्वीर ट्वीट की गई थी, जिसमें खबर यह थी कि एटीएस ने गुजराती मूल के दो संदिग्ध (ISIS से ताल्लुक रखने वाले) को गिरफ्तार किया गया था, जो उनकी हत्या करना चाहते थे। 2015 में पैगंबर मुहम्मद को लेकर बयान देने के बाद से ही वे कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गए थे। बयान के बाद सहारनपुर से लेकर देवबंद और पश्चिम बंगाल के कट्टरपंथियों ने तिवारी का सर काट देने जैसी माँगें उठाकर दंगे जैसे हालात कर दिए थे। कमलेश तिवारी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत साल भर से ज्यादा समय के लिए जेल में बंद कर दिया गया था। 2016 में इन सभी आरोपों को अवैध करार देते हुए इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस मामले में हिन्दू समाज पार्टी के नेता पर लगे रासुका के आरोपों को गलत बताया था।

पैगम्बर मुहम्मद पर कमलेश तिवारी के बयान के बाद विवाद इतना बढ़ गया था कि पश्चिम बंगाल के मालदा में कट्टरपंथियों ने विरोध प्रदर्शन के नाम पर भयंकर उपद्रव किया था। उनके बयान पर कट्टरपंथियों का विरोध इतना भयंकर था कि ढाई लाख लोगों ने इकट्ठा होकर मालदा के कालियाचक बाज़ार में दुकानों को लूट लिया, सड़क पर खड़ी बसें जला डालीं और पुलिस के एक थाने को आग के हवाले कर दिया।

अब सैनिक स्कूलों में भी पढ़ सकेंगी लड़कियाँ, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दी मंजूरी

देश के सैनिक स्कूल में अब लड़कियाँ भी पढ़ सकेंगी। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 2021-22 के शैक्षणिक सत्र से सैनिक स्कूलों में छात्राओं के प्रवेश के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। दो साल पहले मिजोरम में सैनिक स्कूल छिंगछीपी में छात्राओं के प्रवेश के लिए रक्षा मंत्रालय द्वारा शुरू की गई पायलट परियोजना की सफलता के बाद यह निर्णय लिया गया है। अब इसे सभी सैनिक स्कूलों में लागू करने का फ़ैसला लिया गया है।

रक्षा मंत्री ने संबंधित अधिकारियों को इस आदेश के सुचारू कार्यान्वयन के लिए सैनिक स्कूलों में आवश्यक व्यवस्था और पर्याप्त महिला स्टाफ़ की उपलब्धता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। रक्षा मंत्री के इस निर्णय से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुहिम ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ को मज़बूती मिलेगी। साथ ही सशस्त्र बलों में महिलाओं की अधिक भागीदारी हो सकेगी, जिससे लैंगिक समानता के उद्देश्य की भी पूर्ति होगी। सैनिक स्कूलों में कक्षा 6 से 12वीं तक की पढ़ाई होती है और सैन्य अकादमियों में प्रवेश की तैयारी भी कराई जाती है।

बता दें कि देश भर में 33 सैनिक स्कूल हैं। सैनिक स्कूल ने 2017 में केंद्र सरकार के पायलट प्रोजेक्ट के तहत सैनिक स्कूल में 6 लड़कियों प्रवेश देकर इसकी शुरुआत की गई थी। सैनिक स्कूलों को पारंपरिक रूप से एक पुरुष गढ़ के रूप में देखा जाता है। सैनिक स्कूलों में लड़कियों को प्रवेश देना राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में महिला कैडेटों को शामिल करने की दिशा में यह पहला क़दम है।

ख़बर के अनुसार, पिछले साल दो नए स्कूल झुंझनू (राजस्थान) और सियांग (अरुणाचल प्रदेश) में खुले थे, जो अब चालू हो चुके हैं। इसके अलावा एक दर्जन से अधिक स्कूलों को मंज़ूरी मिल चुकी है, जिनके अगले साल चालू होने की संभावना है। वर्तमान समय में रक्षा अकादमी में प्रवेश पाने वाले एक चौथाई से भी अधिक बच्चे सैनिक स्कूलों के होते हैंं। पिछले साल चुने गए कुल 348 उम्मीदवारों में से 99 बच्चे सैनिक स्कूल के थे, जो 28.45 फ़ीसदी है। 

पिछले साल अप्रैल में देश में पहली बार लखनऊ के एक सैनिक स्कूल ने लड़कियों के दाखिले के लिए दरवाज़े खोले थे। विभिन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि की 15 लड़कियों को कैप्टन मनोज कुमार पांडेय उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल  (यह देश का एकमात्र सैनिक स्कूल है जो रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत नहीं आता) में शैक्षणिक वर्ष 2018-19 के लिए कक्षा-9 में प्रवेश मिला था।

फारूक अब्दुल्ला की बहन और बेटी पर बोले DGP, पोस्टर भी होते हैं भड़काऊ

जम्मू-कश्मीर पुलिस के मुखिया दिलबाग सिंह ने कहा है कि राज्य में हालात जब तक पूरी तरह नियंत्रित नहीं होते, तब तक किसी को विरोध-प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि केवल शब्द ही नहीं, पोस्टर भी भड़काऊ होते हैं। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की बहन सुरैया और बेटी साफिया को हिरासत में लेने के मामले में प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने यह बात कही है।

सुरैया और साफिया सहित एक दर्जन से अधिक महिलाओं को मंगलवार को (अक्टूबर 15, 2019) श्रीनगर के लाल चौक पर प्रदर्शन करने के दौरान हिरासत में लिया गया ​था। प्रदर्शन में शामिल महिलाएँ जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने और उसे दो केंद्र शासित प्रदेश में बाँटने का विरोध कर रही थीं।

NDTV से बातचीत जम्मू कश्मीर पुलिस के डीजीपी दिलबाग सिंह ने कहा, जब तक स्थिति बेहतर नहीं होती ब तक किसी तरह के प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलेगी फिर चाहें वो धरना ही क्यों ना हो। उन्होंने बताया कि वैसे घाटी में भी अब प्रतिबंध पूरी तरह हटा दिए गए हैं। आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त करने से पहले केंद्र सरकार ने एहतियातन पाबंदियॉं लगाई थी। कई नेताओं को भी हिरासत में लिया गया था।

सिंह ने बताया कि विरोध-प्रदर्शन की अनुमति देने से पहले प्रशासन का ध्यान पूरी तरह शांति कायम करने पर है। उन्होंने कहा कि कुछ महिलाओं के हाथ में जो पोस्टर थे, वह बहुत अच्छे नहीं थे। निश्चित रूप से वे कानून और व्यवस्था के हित में नहीं थे। यही कारण है कि उन्हें हिरासत में लिया गया। उन्होंने कहा कि शांति के लिए प्रतिबंधों का सबको सम्मान करना चाहिए। महिला प्रदर्शनकारियों को भी इसकी अनुमति के लिए डिप्टी कमिश्नर के पास जाने की सलाह दी गई थी।

गौरतलब है कि पाकिस्तान की शह पर आतंकी राज्य में खून-खराबे की लगातार कोशिश कर रहे हैं। हालॉंकि छिटपुट घटनाओं को छोड़ दे तो सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के कारण वे अपने मंसूबे में अब तक नाकामयाब रहे हैं।दो दिन पहले ही आतंकियों ने शोपियां में पंजाब के अबोहर ज़िले के दो सेब व्यापारियों को गोली मार दी थी। कश्मीर से जो सेब जम्मू की मंडियों में पहुँच रहे थे, राज्य का माहौल खराब करने के प्रयासों में उन पर इस्लामी आतंकी ज़ाकिर मूसा, बुरहान वानी जैसे जिहादियों से लेकर पाकिस्तान और उसके तालिबान-समर्थक प्रधानमंत्री इमरान खान के समर्थन के नारे लिखे मिले थे। सेबों पर ‘Go back India-Go back India’ जैसे हिंदुस्तान-विरोधी नारे भी लिखे हुए थे।

लड़कियों को नहीं पढ़ाएँगे ‘जवान टीचर’: राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार का अजीबोगरीब फरमान

सरकारी स्कूलों में लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ पर विराम लगाने के लिए राजस्थान सरकार ने एक अजीबोगरीब उपाय खोजा है। राज्य के शिक्षा मंत्री गोविंद डोटासरा ने शुक्रवार (18 अक्टूबर) को घोषणा करते हुए कहा कि लड़कियों के सरकारी स्कूल में 50 साल से कम उम्र के पुरुष शिक्षक नहीं पढ़ाएँगे। पुरुष शिक्षकों की जगह पर महिला शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी।

राजस्थान के शिक्षा मंत्री गोविंद डोटासरा ने कहा, “शिक्षक संगठनों और शिक्षकों से बातचीत करने के बाद हम एक रोडमैप तैयार तैयार करेंगे और नीति बनाएँगे, जिससे अधिक से अधिक महिला टीचर्स की नियुक्ति हो सके। महिला शिक्षकों के होने से लड़कियाँ उनसे अपनी माँ और बहन की तरह की अपनी समस्याएँ साझा कर सकेंगी और उन्हें कोई समस्या नहीं होगी।”

इसके अलावा, उन्होंने कहा कि सभी गर्ल्स स्कूलों में महिला टीचर्स  को प्राथमिकता दी जाएगी, वहीं 50 वर्ष की उम्र से अधिक के पुरुष टीचर्स को आवश्यकता के आधार पर नियुक्त किया जाएगा। 

राज्य सरकार के इस फ़ैसले को कई लोगों ने अपरिपक्व और बचकाना बताया है। बाद में शिक्षा मंत्री गोविंद डोटासरा ने यह भी कहा कि यह फ़ैसला तभी लागू होगा, जब हमारे पास पर्याप्त संख्या में महिला शिक्षक मौजूद रहेंगी। ख़बरों के अनुसार, संभवत: हाल ही में कुछ पुरुष शिक्षकों द्वारा लड़कियों के यौन शोषण का मामला सामने आने के बाद शिक्षा मंत्री द्वारा यह फैसला लिया गया है।

राजस्थान सरकार द्वारा जारी शिक्षा रिपोर्ट 2018-19 के अनुसार, राज्य में सिर्फ़ 1,109 गर्ल्स स्कूल हैं, जबकि शेष 68,910 स्कूलों में लड़के-लड़कियाँ एक साथ पढ़ते हैं। 3.82 लाख टीचर्स की संख्या में पुरुष और महिला टीचर्स का अनुपात 2:1 है। इसका मतलब यह हुआ कि 69,929 स्कूलो में ही महिला टीचर्स मौजूद हैं। ऐसे में शिक्षा मंत्री के बयान में विरोधाभास नज़र आ रहा है।

देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाने वाले को पद्म विभूषण, पैगम्बर पर टिप्पणी करने वाले को जेल और मौत!

हिन्दू महासभा के नेता कमलेश तिवारी की हत्या के बाद कई तरह के सवाल उभरे हैं। सवाल वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का है। कोई भी धर्म या मज़हब हो, उसे इतिहास की कसौटी पर समय-समय पर तौला गया है और उसके बारे में विभिन्न प्रकार की धारणाएँ दी गई हैं। हिन्दू देवी-देवता, इतिहास और पवित्र पुस्तकें हमेशा से चर्चा का विषय रही हैं और इन्हें लेकर न जाने कितनी आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गई हैं, इसका अनुमान भी लगाना मुश्किल है। हिन्दू ख़ुद को सबसे खुले विचारों वाला बता कर सब कुछ बर्दाश्त तो कर लेते हैं लेकिन एक बहुत बड़ा धड़ा ऐसा भी तो है जिसे यह सब देख कर नाराज़गी महसूस होती है। अगर लिबर्टी है तो फिर एक-पक्षीय क्यों है? वन-साइडेड क्यों है?

कमलेश तिवारी ने 2015 में पैगम्बर मुहम्मद पर कोई टिप्पणी की थी। इसे लेकर बवाल मचा। ख़बरें आईं कि 1 लाख मुस्लिमों ने सड़क पर उतर कर उन्हें फाँसी पर लटकाने की माँग की। मौलानाओं ने उन पर फतवे जारी किए, उनका सिर कलम करने की बात कही गई और उन्हें सरेआम धमकी दी गई। भारत में हिन्दुओं को ‘मॉब लिंचिंग करने वाला’ साबित करने की कवायद में मीडिया और बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग शामिल है। क्या आपने सुना है कि किसी हिन्दू ने किसी मुस्लिम को इसीलिए मार डाला क्योंकि उसने राम, कृष्ण या फिर दुर्गा को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी? नहीं।

चार्ली हेब्दो (Charlie Hebdo) फ्रांस से प्रकाशित होने वाली की एक मैगजीन है, जो अपने कार्टूनों के जरिए कटाक्ष और व्यंग्य का पुट लिए सामग्री के लिए जानी जाती है। इसमें एक बार पैगम्बर मुहम्मद को लेकर कार्टून छापा गया था, जिसके बाद दुनिया भर के मुस्लिम सड़कों पर उतर आए। कई जगह रैलियाँ हुईं। 2011 में और फिर 2015 में, दो बार इसके दफ्तर पर आतंकी हमला हुआ। दूसरे हमले में 12 लोग मारे गए। अगर कोई हिन्दू ये कहता है कि उसका धर्म ख़तरे में है तो बुद्धिजीवी उसे याद दिलाते हैं कि ‘क्या तुम्हारा धर्म इतना कमज़ोर है कि ये इन छोटी-मोटी चीजों से ख़तरे में आ जाता है?’ तो फिर उस मज़हब के बारे में क्या कहा जाएगा, जिसका अनुसरण दुनिया भर की एक चौथाई जनसंख्या करती है? वह तो कभी ख़तरे में आ ही नहीं सकता।

आइए, कुछ उदाहरण से देखते हैं कि कैसे हिन्दुओं के धार्मिक प्रतीकों और भावनाओं से बार-बार इसी देश के लोगों ने खिलवाड़ किया और उनका कुछ नहीं बिगड़ा, जो बताता है कि सहिष्णु कौन है? कमलेश तिवारी को तो जेल की सजा भी मिली थी। लेकिन, करूणानिधि, ज़ाकिर नाइक, एमएफ हुसैन और ओवैसी में से कितने जेल गए? इन उदाहरणों से आपको पता चलेगा कि ‘सेक्सी दुर्गा’ को ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ बताने वाले पैगम्बर मुहम्मद पर टिप्पणी को मज़हब विशेष का अपमान बताना नहीं भूलते। आइए आपको उन लोगों और उनकी करतूतों को याद दिलाते हैं।

हिन्दू देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाओ और 3 पद्म अवॉर्ड्स लेकर जाओ

एमएफ हुसैन को पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण दिया गया। उन्हें 60 के दशक से लेकर 90 के दशक तक लगातार सरकारी अवॉर्डों से नवाजा जाता रहा। हुसैन ने हिन्दू देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाई थीं। इस मामले को लेकर ख़ूब विरोध प्रदर्शन हुआ था। तब महाराष्ट्र के तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री आरआर पाटिल को सामने आकर यह कहना पड़ा था कि हुसैन के ख़िलाफ़ पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। हुसैन ने हिन्दू देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरों पर पूरी की पूरी सीरीज ही की थी। तब नितिन गडकरी महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष थे। उन्होंने भी एमएफ हुसैन की गिरफ़्तारी की माँग की थी।

हुसैन ने भारत माता की भी नंगी तस्वीर बनाई। उस तस्वीर को भारत के नक़्शे के साथ दिखाया गया और शरीर के विभिन्न भागों पर भारत के अलग-अलग राज्यों को दर्शाया गया। विश्व हिन्दू परिषद् और भारत जाग्रति समिति के कड़े विरोध प्रदर्शन के बाद एमएफ हुसैन ने दावा किया कि उन्होंने माफ़ी माँगी है। हुसैन इन तस्वीरों को बेच कर कश्मीर भूकंप पीड़ितों के लिए फण्ड जुटाने का दावा कर रहे थे। एमएफ हुसैन सुरक्षित रहे, आजीवन। उन्हें न जेल हुई और न ही किसी ने उन्हें कोई नुकसान पहुँचाया। जरा सोचिए, अगर उन्होंने यही काम किसी अन्य मज़हब के साथ किया होता तो क्या होता?

राम को दारूबाज बताने वाले करूणानिधि

करूणानिधि 5 दशक तक तमिलनाडु की राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण धुरी बने रहे। 5 बार मुख्यमंत्री रहे लेकिन अपने बाद के दिनों में भी उन्होंने भगवान राम को लेकर आपत्तिजनक बातें कहनी नहीं छोड़ी। द्रविड़ आंदोलन के सबसे बड़े नेता माने जाने वाले करूणानिधि ने राम को काल्पनिक बताते हुए यहाँ तक दावा कर दिया कि महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें दारूबाज कहा है। उन्होंने इस मुद्दे पर भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी को रामायण पर चर्चा के लिए चुनौती देते हुए ये बातें कही थीं। करूणानिधि ने मुख्यमंत्री रहते ये बयान दिया था। विरोध तो हुआ लेकिन कोई उनका क्या बिगाड़ लेता? पुलिस-प्रशासन हाथ में ही था।

ऐसा नहीं है कि उनकी जुबान फिसल गई थी। रामसेतु के मुद्दे पर तो उन्होंने एक बार ये तक पूछ डाला था कि क्या राम कोई सिविल इंजीनियर थे? सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का विरोध करते हुए उन्होंने पूछा था कि श्रीराम ने किस कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री ली थी? उन्होंने पूछा था कि राम ने सेतु कब बनाया और इसका क्या सबूत है? करूणानिधि का 2018 में निधन हो गया। उनके समर्थक उन्हें भारत रत्न देने की माँग भी करते हैं लेकिन वो न तो कमलेश तिवारी की तरह इस मामले में जेल गए और न ही उनसे किसी ने मारपीट की।

हिन्दुओं को लगातार ललकारते रहने वाले ओवैसी ब्रदर्स

दो ओवैसी हैं। कहा जाता है कि एक अच्छा है और एक बुरा है। एक एआईएमआईएम पार्टी का अध्यक्ष है, तो दूसरा तेलंगाना विधानसभा में पार्टी के विधायक दाल के नेता। असदुद्दीन ओवैसी जिस बात को शालीनता से कहते हैं और विभिन्न मीडिया मंचों पर उपस्थिति दर्ज करा कर बयान देते हैं, उनका भाई अकबरुद्दीन उसी बात को जनता के बीच भड़काऊ तरीके से कहता है। अकबरुद्दीन ‘मुस्लिमों की ताक़त देखने के लिए’ 15 मिनट के लिए पुलिस हटा लेने की बात करता है। खैर, ओवैसी भाई शक्तिशाली हैं। विरोध का उन पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। तेलंगाना की सरकार भी कुछ नहीं करती क्योंकि मुख्यमंत्री केसीआर इनके साथ मिलकर चुनाव लड़ते हैं।

ज़ाकिर नाइक ने गणेश जी का अपमान किया

इस्लामिक उपदेशक ज़ाकिर नाइक मलेशिया में बैठा हुआ है। वहाँ बैठ कर वह तरह-तरह की बातें करता रहता है। भारतीय जाँच एजेंसियाँ उसके प्रत्यर्पण में जुटी है लेकिन इमरान ख़ान ने जब से मुस्लिम देशों को कश्मीर और इस्लाम को जोड़ कर देखने की बात कही है, तुर्की के साथ-साथ मलेशिया के सुर भी बदले-बदले से हैं। हालाँकि, मलेशिया इससे पहले भी ज़ाकिर नाइक पर कार्रवाई कर चुका है लेकिन उसकी बयानबाजी नहीं रुकी। ज़ाकिर नाइक ने यह मानने से इनकार कर दिया कि गणेश एक देवता हैं और हिन्दुओं को चुनौती दी कि वे इस बात को साबित कर के दिखाएँ।

ज़ाकिर नाइक ने हिन्दुओं का अपमान करते हुए उनसे पूछा कि जो भगवान अपने बेटे को नहीं पहचान पाया, वो कैसे समझेगा कि उसका भक्त ख़तरे में है और कैसे बचा पाएगा? ज़ाकिर नाइक भी ऐसे बयान देकर निकल लेता है। गला सिर्फ़ कमेलश तिवारी का रेता जाता है क्योंकि वो हिन्दू हैं और उन्होंने इस्लाम पर टिप्पणी की है। फिर भी हिन्दू ही ‘मॉब लिंचिंग’ करता है, फिर भी ‘अल्पसंख्यकों को ही दबाया जा रहा’ है। और तो और, आर्टिस्टिक लिबर्टी के नाम पर भी किसी अन्य मज़हब को लेकर कभी कुछ देखने को नहीं मिला लेकिन हिन्दू देवी-देवताओं का तरह-तरह से मज़ाक बनाया गया।

साल का दूसरा सबसे घातक हमला: अजान के वक्त मस्जिद के भीतर 2 धमाके, 62 मरे

अफगानिस्तान में शुक्रवार को एक मस्जिद के भीतर हुए धमाके में 62 लोगों के मरने की खबर है। 100 के करीब घायल बताए जा रहे हैं। दो धमाके पूर्वी नांगरहार प्रांत की एक मस्जिद में उस वक्त हुआ जब लोग जुमे की नमाज पढ़ रहे थे।

टोलो न्यूज के मुताबिक प्रांतीय गवर्नर के प्रवक्ता अताउल्लाह ख़ोग्यानी ने दोनों धमाके की पुष्टि की है। हस्का मेयना जिले के जाव डारा इलाके में स्थित मस्जिद में धमाके हुए। खोग्यानी ने बताया कि दोपहर के करीब 1:30 बजे विस्फोट हुआ।

अधिकारियों के मुताबिक विस्फोटक मस्जिद के भीतर रखे गए थे। जब लोग नमाज अता कर रहे थे तब धमाके किए गए। खोग्यानी के अनुसार घायलों में से कई की हालत गंभीर है। इस घटना की अभी तक किसी ने जिम्मेदारी नहीं ली है। इस इलाके में तालिबान का प्रभाव है। लेकिन, उसने इसके पीछे हाथ होने से इनकार किया है।

अल जजीरा के मुताबिक यह इस साल का अफगानिस्तान में हुआ दूसरा सबसे घातक हमला है। मीडिया रिपोर्टों में चश्मदीदों के हवाले से बताया गया है कि धमाके के वक्त मस्जिद में करीब 350 लोग थे। चश्मदीदों ने मस्जिद की छत गिरने से पहले एक बड़ा धमाका सुना। स्थानीय पुलिस अधिकारी तेज़ाब ख़ान ने बताया कि मौलवी अजान पढ़ रहे थे और फिर अचानक एक धमाके के बाद उनकी आवाज बंद हो गई।

धमाका संयुक्त राष्ट्र के उस बयान के एक दिन बाद हुआ है जिसमें अफगानिस्तान में आम लोगों की मौत की बढ़ती संख्या को लेकर चिंता जताई गई थी। यूएन के मुताबिक इस साल जुलाई से सितंबर के बीच कम से कम 1174 नागरिक मारे गए हैं। 3,139 जख्मी हुए हैं। जुलाई 2019 इस दशक का सबसे खूनी महीना रहा है। मृतकों और हताहतों में 40 फीसदी संख्या महिलाओं और बच्चों की है। रिपोर्ट के मुताबिक ये आँकड़े पिछले साल के इसी समय के मुकाबले 42 फीसदी ज्यादा हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने एंटोनियो गुटेरेस ने अफ़ग़ानिस्तान में हुए इन धमाकों की कड़ी निंदा की। यूएन महासचिव ने पीड़ितों के परिवारों के प्रति अपनी गहरी सहानुभूति और संवेदना व्यक्त करते हुए उनके जल्द ठीक होने की कामना की है। साथ ही उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के नागरिकों और सरकार के साथ संयुक्त राष्ट्र की एकजुटता को भी दोहराया।

बाबरी मस्जिद को राम मंदिर बताने पर मुहम्मद का इस्लामी संगठनों ने किया विरोध, सम्मान समारोह रद्द

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी रहे केके मुहम्मद के सम्मान में आयोजित एक समरोह को रद्द करना पड़ा है। इस्लामिक कट्टरपंथियों ने इस कार्यक्रम को रद्द करने की धमकी आयोजकों को दी थी। मुहम्मद ने ही सबसे पहले बताया था कि अयोध्या में खुदाई में इस बात के सबूत मिले हैं कि जिस जगह बाबरी मस्जिद बनी है वह असल में मंदिर था।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ओल्ड स्टूडेंट्स एसोसिएशन, केरल (AMUOSAK) की ओर से पद्मश्री मुहम्मद को सम्मानित करने के लिए समारोह का आयोजन किया गया था। कई मुस्लिम छात्र संगठन इसका विरोध कर रहे थे। वे बाबरी मस्जिद को राम मंदिर बताने वाले मुह​म्मद बयानों पर एतराज जता रहे थे।

सम्मान समारोह शनिवार को सर सैयद डे के मौके पर कोझीकोड के फारूक कॉलेज में होना था। मुहम्मद एएमयू के छात्र रहे हैं, इसलिए AMUOSAK ने उन्हें सम्मानित करने की योजना बनाई थी। कार्यक्रम का उद्धाटन राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को करना था। राज्यपाल खान भी एएमयू के छात्र रहे हैं।

मुहम्मद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के क्षेत्रीय निदेशक रह चुके हैं। 1976-77 में अयोध्या में खुदाई करने वाली पहली टीम के वे सदस्य थे। एएसआई की टीम ने कहा था कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि बाबरी मस्जिद के नीचे भगवान विष्णु का मंदिर है।

लेकिन, कई मुस्लिम संगठन उनको सम्मानित करने का विरोध कर रहे थे। इनमें मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन (MSF), IUML का छात्र संगठन और और सुन्नी स्टूडेंट्स फेडरेशन (SSF) ने आयोजन के विरोध में प्रदर्शन किया था। उन्होंने आरएसएस की मदद के लिए मुहम्मद पर ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि ऐसे शख्स का सम्मान किया जाना अनुचित है।

इस्लामिक संगठनों की तर्ज पर ही अतीत में कई वामपंथी इतिहासकार भी मुहम्मद पर इसी तरह का आरोप लगा चुके हैं। कई ने तो उस टीम में उनके शामिल होने के दावे पर ही सवाल उठाए थे। हालॉंकि ऐसे सारे आरोप निराधार साबित हो चुके हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर की गई खुदाई ने भी उन तथ्यों की पुष्टि की थी जिसका जिक्र लगातार मुहम्मद करते रहे हैं।

अयोध्या: हिन्दू-मुस्लिम पक्षों ने सीलबंद लिफाफे में जमा किए ‘मोल्डिंग ऑफ़ रिलीफ़’

शनिवार को मुस्लिम पक्ष ने अयोध्या मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में ‘मोल्डिंग ऑफ़ रिलीफ़’ दस्तावेज़ सीलबंद कवर नोट में जमा किए। स्रोतों का कहना है कि मुस्लिम पार्टियों ने सुझाव दिया कि अगर विवादित भूमि का मालिकाना अधिकार/टाइटल उन्हें न दी जाए तो उस सूरत में क्या किया जा सकता है। हिन्दू पार्टियों में से अखिल भारतीय हिन्दू महासभा ने भी अपना नोट जमा किया है। अपने नोट में हिन्दू महासभा ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट चाहे तो एक ट्रस्ट का निर्माण कर सकता है जो राम मंदिर के निर्माण की देखभाल करेगा। वह यह सुझाव भी दे सकता है कि राम मंदिर का निर्माण कौन करे।

इस बीच राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति ने अपने नोट में कहा है कि ज़मीन का मालिकाना अधिकार रामलला को मिलना चाहिए। उसने सुप्रीम कोर्ट से मध्यस्थता पैनल के सोच-विचार में भी गौर करने की गुज़ारिश की है। समिति का यह भी मानना है कि मंदिर प्रबंधन की देखरेख के लिए एक ट्रस्ट का निर्माण होना चाहिए। एक अन्य पक्षकार रामलला विराजमान की तरफ से भी एक नोट दाखिल किया गया है। रामलला की ओर से दायर नोट में कहा गया है पूरे मंदिर के निर्माण का अधिकार उन्हें ही सौंपा जाना चाहिए। निर्मोही अखाड़ा या मुस्लिम पार्टियों को कोई मालिकाना हक नहीं दिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मामले विवाद मामले में 16 अक्टूबर 2019 को सुनवाई समाप्त की है। राष्ट्र को मुख्य फैसले का इंतज़ार है, जो अगले महीने (नवंबर) आने की उम्मीद है। भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई के आसन्न अगले महीने की 17 तारीख को रिटायरमेंट के चलते फैसला उसके पहले ही आने की उम्मीद की जा रही है। इसके पहले सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने विवादित भूमि पर से अपना दावा किसी और डील के बदले छोड़ देने की पेशकश भी की थी।

7 अगस्त को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद केस की सुनवाई दैनिक रूप से शुरू हुई थी। निर्मोही अखाड़े ने दावा किया था कि 1934 से विवादित स्थल पर नमाज़ नहीं हुई है। गोगोई के अलावा चार अन्य जजों की संवैधानिक बेंच ने मामले की सुनवाई की है। इलाहबाद उच्च न्यायालय ने ज़मीन तीनों पक्षकारों में बाँट दी थी।

इस बीच योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आता है, उसे पूरी तरह लागू करने की बात कही है। एक साक्षात्कार में उन्होंने मामले की सुनवाई खत्म करने के लिए अदालत की तारीफ़ भी की।

कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती से बढ़ेगा निवेश, समस्याओं को लेकर मोदी सरकार सजग: IMF

अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘इंटरनेशनल मोनेटरी फण्ड (IMF)’ ने कॉर्पोरेट टैक्स घटाने के मोदी सरकार के फैसले का स्वागत किया है। आईएमएफ ने कहा है कि इस निर्णय से निवेश को बढ़ावा मिलेगा। आईएमएफ की एशिया पैसिफिक डायरेक्टर ने कहा कि भारत के पास ज्यादा वित्तीय स्पेस नहीं है, इसलिए उसे वित्तीय घाटे को काबू में रखते हुए एक सुरक्षित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि आईएमएफ कॉर्पोरेट टैक्स कम करने के भारतीय वित्त मंत्रालय के फ़ैसले का स्वागत करती है, क्योंकि इससे निवेश पर सकारात्मक असर पड़ेगा।

उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले वित्तीय वर्ष में भारत की विकास दर बढ़ कर 7% होने की सम्भावना है। उन्होंने भारत सरकार को नॉन-बैंकिंग वित्तीय सेक्टर पर ध्यान देने की सलाह दी। आईएमएफ मानता है कि सरकारी बैंकों को रीकैपिटलाइज करना इस दिशा में एक अच्छा क़दम है। आईएमएफ ने माना है कि नॉन-बैंकिंग सेक्टर में आ रही समस्याओं को लेकर मोदी सरकार सजग है और उसे इसका अंदाजा भी है। संस्था ने यह भी माना है कि एक संघीय ढाँचे में वित्त सम्बन्धी सुधारों को लागू करना कठिन होता है, क्योंकि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग स्थितियाँ होती हैं।

इससे पहले आईएमएफ ने कहा था कि भारत सरकार ने आर्थिक मोर्चे को लेकर कुछ आधारभूत काम किए हैं लेकिन कई सारी समस्याओं को ख़त्म करने की दिशा में काम करना अभी बाकी है। आईएमएफ ने कहा कि महिलाओं को भी कामकाजी बनाने की दिशा में काम किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे ‘लेबर फोर्स’ में इजाफा होगा। संस्था ने कहा कि भारत की महिलाएँ काफ़ी प्रतिभावान हैं, लेकिन उनमें से अधिकतर घरों में ही रहती हैं। आईएमएफ ने बताया कि पिछले कुछ सालों में भारत ने काफ़ी मजबूत विकास दर से तरक्की की है और आने वाले दिनों में भी ऐसा ही होगा।

आईएमएफ ने दुनिया भर में चल रही मंदी की बात करते हुए कहा कि विश्व के अन्य हिस्सों की तरह भारत में भी आर्थिक मंदी देखने को मिल रही है। बता दें कि इसी महीने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अर्थव्यवस्था को कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती की सौगात दी थी। यह सरकार के राजस्व का एक अहम जरिया होता है, जिसे कंपनियों पर लगाया जाता है। टैक्स में कटौती से कंपनियों के मुनाफे में वृद्धि होती है, जिससे कम्पनियाँ निवेश करने के लिए अतिरिक्त धन का उपयोग कर पाएँगी। वित्त मंत्री के इस ऐलान का असर शेयर बाजार पर भी देखने को मिला, जिसने इस ख़बर के साथ ही उछाल मारी।

भारत में आर्थिक मंदी को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। कई लोग इसे अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर से जोड़ कर भी देख रहे हैं। वहीं कॉन्ग्रेस इसे सरकार की विफलता बताते हुए नोटबंदी और जीएसटी को जिम्मेदार ठहरा रही है। हालाँकि, सरकार ने आर्थिक मंदी की ख़बरों के बीच आर्थिक सुधार के लिए कई क़दम उठाए हैं और समय-समय पर वित्त मंत्रालय ने मीडिया के सवालों का जवाब दिया है।

कट्टरपंथी और वामपंथियों का तीन तिकड़म, राम मंदिर लटकाएँगे और टपकाएँगे

एक चीफ जस्टिस जो 17 नवंबर को रिटायर होने से पहले दशकों से लटके अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाना चाहता है। इसके लिए वह और उसकी अगुवाई वाली संविधान पीठ में शामिल साथी जस्टिस मध्यस्थता प्रक्रिया नाकाम होने के बाद लगातार 40 दिन मामले की सुनवाई करते हैं। चीफ जस्टिस इस मामले को अहमियत देकर कई मामलों की सुनवाई आगे टाल देते हैं। यहॉं तक कि ‘अनिवार्य कार्य’ का हवाला देकर पहले से तय अपनी विदेश यात्रा रद्द कर देते हैं।

दूसरी ओर, वो साजिशें जिसकी वजह से आज तक अयोध्या मामला का फैसला नहीं हो पाया। लिबरलों, वामपंथियों, कट्टरपंथियों और कॉन्ग्रेसियों का वो गिरोह फिर से सक्रिय हो गया है ताकि भव्य राम मंदिर के निर्माण की हर संभावना को खत्म किया जाए। इसके लिए दोहरा आक्रमण हो रहा है। क्या इसे संयोग माना जाए कि सुन्नी वक्फ बोर्ड अपना दावा छोड़ने के लिए उस दिन तैयार होता है, जिस दिन सुनवाई का आखिरी दिन होता है। उससे पहले किस तरह सुनवाई को लंबा खींचने की कोशिश की गई उसे याद कीजिए। कभी सुनवाई से एक खास पार्टी को फायदा होने की दलील दी गई। जब अदालत ने रोजाना सुनवाई का फैसला कर लिया तो सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील ने दलील दी कि वे पॉंच दिन की सुनवाई से तालमेल बिठाने में सक्षम नहीं है। ऐसा हुआ तो वे केस छोड़ने को मजबूर होंगे। पीठ ने दलील नहीं मानी तो मिड ब्रेक का बहाना बनाया गया और जब मामले को लंबा खींचने का हर तिकड़म नाकाम रह गया तो हलफनामा दायर कर दावे से पीछे हटने की बात कही गई।

इस मामले में मुस्लिम समुदाय की तरफ से जो 7 पक्षकार हैं उसमें सुन्नी वक्फ बोर्ड की अहमियत इस लिहाज से भी ज्यादा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जिन तीन पक्षों के बीच जमीन बॉंटा था, उसमें बोर्ड था। हलफनामा दायर किए जाने के बाद से ही यह अंदेशा जताया जा रहा था कि मामले को लटकाने के लिए शायद ऐसा किया जा रहा है। यह अगले दिन ही जाहिर हो गया, जब अन्य मुस्लिम पक्षकारों ने इस समझौते को खारिज कर दिया। कानून के जानकारों का मानना है कि अब अदालत ने इस समझौते पर गौर किया तो शायद फैसला लटक जाए। यानी उनका मंसूबा पूरा हो जाएगा। वे चाहते भी यही हैं। उन्हें पता है कि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई यदि फैसला सुनाए बिना रिटायर हुए तो फिर से एक नया पीठ बनेगा। नए सिरे से सुनवाई होगी और वे फिर से वहीं दलीलें रखेंगे जो कैमियर की अदालत से लेकर आज तक टिक नहीं पाए हैं।

क्या यह भी महज संयोग है कि जिस दिन अयोध्या विवाद के अन्य मुस्लिम पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड के हलफनामे से खुद को अलग करते हैं उसी दिन हिंदू महासभा के नेता कमलेश तिवारी की निर्मम हत्या कर दी जाती है। यूपी के डीजीपी ओपी सिंह का कहना है कि इस वारदात में शामिल संदिग्धों से प्रारंभिक पूछताछ से पता चला है कि हत्या की साजिश के पीछे मुख्य वजह कमलेश तिवारी का 2015 का एक बयान था। सिंह ने उस समय पैंगबर मुहम्मद को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। इसके लिए उस पर रासुका लगाई गई थी और वह जेल में भी रहा था। उसकी हत्या में यूपी के बिजनौर से मुफ्ती नईम काजमी और मौलाना अनवारुल हक को हिरासत में लिया गया है। गुजरात से राशिद पठान, मौलवी मोहसिन शेख और फैजान को पकड़ा गया। उसकी हत्या के बाद सोशल मीडिया में हा-हा करते शांतिदूतों की प्रतिक्रिया आती है। क्या यह सब महज संयोग हैं?

ये वही लोग हैं जिन्होंने अपने धर्म के शासकों की बदौलत और हथियारों के दम पर बहुसंख्यकों के पवित्र स्थलों को तबाह किया, उन पर कब्जा किया। ये जानते हैं कि अयोध्या में बनने वाला भव्य राम मंदिर केवल बहुसंख्यक हिंदुओं की आस्था का प्रतीक नहीं होगा। विदेशी अक्रांताओं की, हथियार के बल पर अपना धर्म थोपने वालों की हार होगी। उनके हमदर्द वामपंथी जानते हैं कि भव्य मंदिर के सामने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किए गए उनके तथ्य बौने हो जाएँगे। लिबरल जानते हैं कि उनका यह झूठ औंधे मुॅंह गिरेगा कि बहुसंख्यक हिंदू अल्पसंख्यकों को डराते हैं। कॉन्ग्रेसी जानते हैं कि भव्य मंदिर में विराजमान रामलला बार-बार बताएँगे कि उन्हें कैसे नेहरू ने बेदखल करने की कोशिश की थी। कैसे उनके नाम पर राजीव गॉंधी ने शाहबानो का पाप धोने की कोशिश की। इसलिए वे नहीं चाहते कि अयोध्या का फैसला आए। वे पर्दे के पीछे से साजिश भी रचेंगे और आपको डराने के लिए खून भी बहाएँगे। वे चाहेंगे कि माहौल बिगड़े ताकि मंदिर निर्माण टलता रहे। वे पूछेंगे कि राम मंदिर का ये डिजाइन किसने बनाया? वे नक्शे को भरी अदालत में फाड़ेंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि जिस दिन बहुसंख्यक हिंदू जग जाएगा उस दिन उनका इतिहास हर गली-नुक्कड़ पर फाड़ा जाएगा।

दिसंबर 1992 में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में कहा था कि ‘राम का मंदिर छल और छद्म’ से नहीं बनेगा। यकीनन हिंदुओं के नैतिक बल पर, अदालत के फैसले से ही राम मंदिर बनेगा। काशी और मथुरा का हल भी निकलेगा। लेकिन, इस छल और छद्म से सावधान रहने की जरूरत है ताकि उसकी काली छाया में राम का वनवास और लंबा न हो।