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मुझे घर का खाना चाहिए, कैंटिन का खाना नहीं खाऊँगा: कोर्ट की अनुमति नहीं होने से रात भर भूखे सोए चिदंबरम

पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने CBI की हिरासत में अपनी पहली रात बिना कुछ खाए-पिए बिताई। दरअसल, उन्होंने घर के खाने की माँग की थी, लेकिन बिना कोर्ट की अनुमति के ऐसा नहीं किया जा सका। इसके बाद चिदंबरम ने कैंटिन का खाना खाने से इनकार कर दिया। इसके अलावा, CBI द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब भी उन्होंने ठीक से नहीं दिए।

ख़बर के अनुसार, चिदंबरम पूरी रात शांत रहे, उन्होंने मुश्किल से ही CBI और डॉक्टर्स से बात की। डॉक्टर्स ने उनसे उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा और रेग्युलर चेकअप किया, जो नॉर्मल रहा। चिदंबरम को ग्राउंड फ्लोर स्थित सूइट-5 में रखा गया है और उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी CBI ऑफिसर्स की है। उनकी निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसके तहत 24X7 उन पर नज़र रखी जा रही है।

CBI ने उनसे कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे, इसमें मनी लॉन्ड्रिंग मामले से संबंधित सवाल भी शामिल थे। विदेशी कंपनियों और पेमेंट मोड को लेकर भी उनसे सवाल किए गए। ज्ञात हो कि CBI ने इस संबंध में तीन देशों को पत्र लिखकर लेन-देन को लेकर जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है। चिदंबरम से स्पष्ट तौर पर नॉर्थ ब्लॉक में पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी से उनकी मुलाक़ात के बारे में सवाल किया गया, इसके जवाब में उन्होंने दोनों से मुलाक़ात होने की बात से साफ़ इनकार कर दिया।

इसके अलावा, CBI ने चेस मैनेजमेंट कंपनी के बारे में उनसे पूछा, एडवांटेज और आसब्रिज कंपनी के संदर्भ में भी सवाल किए और कार्ति चिदंबरम की कंपनियों के बारे में भी सवाल पूछे गए। भास्कर रमन नाम के शख़्स के बारे में चिदंबरम से पूछा गया कि क्या आप उन्हें जानते हैं? साथ ही यह भी पूछा कि INX मीडिया ने आपके बेटे की कंपनी को किश्तों में करोड़ों रुपयों का भुगतान क्यों किया?

ग़ौरतलब है कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा चिदंबरम को अग्रिम ज़मानत नहीं मिली थी, जिसके बाद उनके वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया था।

YAK की सवारी पड़ी भारी: मेरठ बवाल में वॉन्टेड हाजी सईद को UP पुलिस ने फेसबुक देख किया गिरफ्तार

पिछले कुछ महीनों से लगातार पुलिस को चकमा देकर भाग निकलने वाला हिस्ट्रीशीटर अपनी छोटी सी गलती के कारण पकड़ा गया। हिंसा भड़काने समेत 9 मामलों के दोषी हाजी सईद को पुलिस ने सोशल मीडिया पर उसकी फोटो देखने के बाद गिरफ्तार कर लिया।

सईद की ये फोटो शिमला की है, जो सोशल मीडिया पर डलने के बाद खूब वायरल हुई। इस तस्वीर में सईद एक याक की सवारी करता नजर आ रहा है। इस फोटो के सोशल मीडिया पर पोस्ट होने के बाद पुलिस ने उसकी लोकेशन का फौरन पता लगाया और उसकी गिरफ्तारी संभव हुई।

पोस्ट की जानकारी मिलते ही पुलिस तुरंत एक्शन में आई और उसने अपनी एक टीम को शिमला भेज दिया। लेकिन सईद के कुछ जानकारों ने उसके ऊपर होने वाली कार्रवाई के बारे में उसे पहले ही इत्तेला कर दिया था, जिस कारण उसने अपनी लोकेशन बदलनी शुरू कर दी थी। पर पुलिस ने अपनी सूझ-बूझ से उसे आखिर में गिरफ्तार कर लिया ।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो एसएसपी अजय साहनी ने सईद की गिरफ्तारी के बाद बताया कि भूसा मंडी निवासी हिस्ट्रीशीटर हाजी सईद 9 मुकदमों में वांटेड था। 6 मार्च को भूसा मंडी-मछेरान में अवैध निर्माण तोड़ने को लेकर हुए बवाल और आगजनी में उस पर कुल 3 मुकदमे दर्ज हुए थे। हाजी सईद ने ही भीड़ को आगजनी और तोड़फोड़ करने के लिए उकसाया था।

इसके अलावा 1 जुलाई को भीड़ हत्या के खिलाफ फैज-ए-आम कॉलेज से निकले शांति मार्च में जो बवाल हुआ था, हाजी सईद उसका भी सह-अभियुक्त था। जानकारी के मुताबिक हाजी सईद और बदर अली ने मिलकर शांति मार्च के बहाने बवाल कराया था। कुल मिलाकर हाजी सईद पर सदर बाजार थाने में 5, कोतवाली में 1, रेलवे रोड में 2 और देहली गेट थाने में 1 मुकदमा दर्ज था।

दिल्ली में 10 PM-6 AM तक न्यूड वीडियो कॉल: नजमा, असगर, राजा गिरफ्तार; 20 साल की लड़की सहित कई गायब

दिल्ली के नंद नगरी इलाके में चल रहे सेक्स रैकेट का पर्दाफाश करते हुए दिल्ली पुलिस ने एक दंपत्ति समेत 3 लोगों को गिरफ्तार किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ये लोग कुछ समय से रोजाना एक ऐप के जरिए रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक युवतियों से न्यूड विडियो कॉल करवाते थे। आरोपितों की पहचान नजमा (27 साल), असगर (30 साल), कमर राजा (30 साल) के तौर पर हुई है। ये सभी नंद नगरी ए-3 इलाके के रहने वाले हैं।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस को इस मामले की जानकारी पीसीआर कॉल के जरिए मिली थी। कॉलर ने पुलिस को बताया था कि इस इलाके के ए-1 ब्लॉक में लड़कियों से वेश्यवृति करवाई जा रही है। सूचना मिलते ही दिल्ली महिला आयोग की टीम वहाँ पहुँची और अपनी जाँच में जुट गई। जब पुलिस घर पर गई तो उसे दो लोग मिले। एक नजमा और दूसरी मंडावली की अस्मिता। जब मकान में रहने वाली नजमा से बारे में पूछताछ की गई तो नजमा ने बताया कि वह शादीशुदा है और उसके दो बच्चे हैं।

नजमा के मुताबिक बीते 5-6 महीने से वह इस काम से जुड़ी है। काम तेज चले इसलिए उसने इस्तेमाल की जाने वाली मोबाइल ऐप पर अपना नंबर भी रजिस्टर करवा रखा है। जिससे लोग उसे संपर्क करते थे। इस काम में उसका पति असगर भी उसका पूरा सहयोग करता था। उनके पास न्यूड वीडियो के लिए कई लोगों के मैसेज और कॉल आते थे।

शुरुआती जाँच के बाद पुलिस ने आरोपितों के फोन और सिम कार्ड सीज कर लिए हैं। पुलिस आगे की जाँच कर रही है। पुलिस ने आईपीसी की धारा 328, आईटी और पॉक्सो ऐक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है। 

बता दें कि इस मामले के संबंध में 14 अगस्त को एक महिला ने आयोग की हेल्पलाइन पर कॉल करके बताया था कि उसकी 20 साल की बेटी कृष्णा नगर से लापता है। जाँच की गई तो लड़की की बहन ने बताया कि उसकी एक दोस्त इस बारे में कुछ बता सकती है, लेकिन वो उन्हें बताने से इनकार कर रही है। आयोग की टीम लापता लड़की की बहन के दोस्त से मिली। बहुत समझाने-बुझाने के बाद उसने बता दिया कि नंद नगरी में कुछ लोग ऑनलाइन सेक्स रैकेट चला रहे हैं, जहाँ 15-20 लड़कियों से न्यूड वीडियो कॉल करवाई जाती है। उस लड़की ने ये भी बताया कि वह खुद वहाँ 15-20 दिन थी। उससे वहाँ रात के 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लोगों को न्यूड कॉल करवाई जाती थी। इस दौरान कई अंतराष्ट्रीय कॉल भी आती थी।

पूरा मामला जानने के बाद महिला आयोग की अध्यक्ष ने स्वाति मालिवाल कहती हैं, “मुझे हैरानी है कि कैसे इस तरह के हाईप्रोफाइल इंटरनैशनल सेक्स रैकेट पुलिस की नाक के नीचे चलते हैं? 20 साल की लड़की अभी भी कई लड़कियों के साथ गायब है। दिल्ली पुलिस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें जल्द से जल्द सुरक्षित वापस लाया जाए।”

मोदी है तो मुमकिन है: 2022 नहीं, अगले ही साल ‘सबको घर’ का सपना होगा हकीकत

मोदी सरकार अक्सर ‘मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिम गवर्नेंस’ की बात करती है। यदि इस फलसफे पर अमल किया जाए तो किस तरह के बदलाव आ सकते हैं, इसका बेहतरीन नमूना बनकर प्रधानमंत्री आवास योजना उभरा है।

जून 2015 में जब इस योजना का ऐलान किया गया तो इसकी व्यावहारिकता पर कई तरह के सवाल उठाए गए थे। योजना के तहत 2022 तक सभी परिवार को घर मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया। लेकिन, इस योजना को सरकार जिस तेजी से आगे बढ़ा रही है उससे लगा रहा है कि शहरी क्षेत्र में 1.12 करोड़ घर बनाने का लक्ष्य अगले साल ही पूरा हो जाएगा। योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में 2.95 करोड़ घर बनाने का लक्ष्य भी जद में दिख रहा है।

रीयल एस्टेट क्षेत्र के उद्योगपतियों के संगठन नेशनल रीयल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल (नारेडको) के 15वें राष्ट्रीय सम्मेलन में बीते दिनों केन्द्रीय आवास एवं शहरी विकास राज्य मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा, “इस महत्वाकांक्षी योजना को पूरा करने में कई तरह की चुनौतियॉं हैं। लेकिन उम्मीद है कि हर भारतीय को घर उपलब्ध कराने का सरकार का लक्ष्य दो साल पहले यानी 2020 में ही हासिल कर लिया जाएगा।”

पुरी के अनुसार इस साल के अंत तक एक करोड़ मकान तैयार हो जाएँगे। शेष 12 लाख घर अगले साल मार्च तक पूरा होने की उम्मीद है। योजना के तहत 1.4 लाख घर बनाने की मंजूरी सरकार ने बीते जुलाई में ही दी है।

जुलाई में ही सरकार ने लोकसभा में बताया था कि प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत कुल 83,68,861 आवास मंजूर किए गए हैं। इनमें से 48,37,466 आवास का निर्माण चल रहा है। 26,13,799 आवास बनकर तैयार हैं।

प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) जो ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन चल रहा है के तहत 1,05,54,674 आवास अब तक मंजूर किए गए हैं। इनमें से 82,07,054 घर तैयार हो चुके हैं।

पुरी के मुताबिक शहरी क्षेत्र में तैयार मकानों की संख्या जल्द ही 75 लाख हो जाएगी। इस योजना के तहत अब तक 24 लाख परिवारों को घर दिए भी जा चुके हैं।

बीते साल दिसंबर में क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने अनुमान लगाया था कि शहरी क्षेत्रों में एक करोड़ आवास का लक्ष्य पूरा करने के लिए सरकार को 2022 तक 1500 अरब रुपए खर्च करना होगा। शहरी विकास मंत्रालय में
पीएमएवाई के संयुक्त सचिव अमृत भंजन ने नारेडको के ही कार्यक्रम में बताया कि इस योजना के लिए फंड की कोई कमी नहीं है। 5 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया गया है। उन्होंने बताया कि करीब छह लाख रुपए के हिसाब से 85 लाख घरों के लिए पैसा मंजूर किया गया है। इसमें से 52,000 करोड़ रुपए केन्द्र सरकार जारी भी कर चुकी है।

योजना के ऐलान के वक्त विशेषज्ञों ने कई और तरह की भी आशंकाएँ उठाई थी। मसलन, नई तकनीक का अभाव, शहरी क्षेत्र में जमीन की कमी, महॅंगी जमीन, संपत्ति एवं भू-स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों में समस्या वगैरह। आवासीय अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र की 2017 की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत को आवासीय क्षेत्र में मानव अधिकारों पर आधारित एक व्यापक और अधिक दूरदर्शी कानून की आवश्यकता है। ऐसा कानून जो असमानता को दूर करता हो और लंबे समय के लिये रोड मैप मुहैया कराता हो।

सरकार पर यह भी आरोप लगा था कि उसने पहले से चली आ रही इंदिरा आवास योजना पर ही नया मुलम्मा चढ़ाया है। लेकिन, 2014 की आधिकारिक ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के दौरान आवास बनाने की सालाना दर 16.5 लाख आवास थी। बीजेपी सरकार के दौरान 2016 से 2018 के दौरान सालाना 18.6 लाख आवास तैयार किए गए।

बीते साल खुद प्रधानमंत्री ने बताया था कि यूपीए सरकार के कार्यकाल के आखिरी चार सालों में 25 लाख घर निर्मित किए गए थे, जबकि 2014 से सरकार में आने के बाद उनकी सरकार ने 1.25 करोड़ घर लोगों के लिए बनवाए हैं।

जाहिर है, मोदी सरकार जिस तरीके से इस योजना का कार्यान्वयन कर रही है उसके कारण अपने बुनियादी लक्ष्य में आकर्षक दिखने वाली प्रधानमंत्री आवास योजना अब हकीकत में भी वैसी ही दिख रही।

‘कुछ लोग नहीं चाहते मेरे पिता की मौत का रहस्य सुलझे’, बोस की बेटी ने की मोदी से अस्थियों के DNA टेस्ट की माँग

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के निधन से जुड़े विवाद के बीच बृहस्पतिवार अगस्त 22, 2019 को उनकी बेटी अनीता बोस फाफ ने नेताजी की मृत्यु से जुड़े रहस्य को सुलझाने के प्रयासों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना की। इसके साथ ही नेता जी की बेटी अनीता बोस ने पीएम मोदी से जापान के रेनकोजी मंदिर में रखी नेताजी की अस्थियों की डीएनए जाँच कराने का अनुरोध किया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, नेता जी की मृत्यु से रहस्य उठाने के लिए नेता जी की बेटी अनिता बोस ने पीएम मोदी से हस्तक्षेप करने की माँग करते हुए दावा किया कि पिछली सरकारों में कुछ ‘खास लोग’ नहीं चाहते थे कि इस रहस्य से कभी पर्दा उठे। माना जाता है कि जापान के रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियां नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हैं। अस्थियों के DNA टेस्ट की जाँच की माँग करते हुए अनीता ने कहा कि इससे उनके पिता की मौत की सच्चाई सामने आ सकेगी।

अनीता जर्मनी में रह रही प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं। उन्होंने कहा कि जब तक कोई और बात साबित नहीं हो जाती, वह भी इस बात में यकीन करती हैं कि उनके पिता की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में हुई थी। साथ ही उन्होंने कहा कि हालाँकि बहुत लोग इसे नहीं मानते इसलिए वो जरूर चाहती हैं कि जाँच हो।

अनीता बोस ने अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए कहा कि रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियों के डीएनए परीक्षण की अनुमति देने के लिए अनुरोध करने की खातिर वह प्रधानमंत्री से और जापानी अधिकारियों से भी मिलना चाहेंगी।

नेता जी की बेटी की यह टिप्पणी 18 अगस्त को केंद्र सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के एक ट्वीट पर पैदा हुए विवाद के बाद आया है। पीआईबी ने एक ट्वीट में कहा था कि पीआईबी महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को उनकी पुण्यतिथि पर याद करता है।

‘पिछली सरकारों में कुछ लोग नहीं चाहते थे कि यह रहस्य सुलझे’

नेताजी के परिवार के एक वर्ग द्वारा विरोध किए जाने के बाद इस ट्वीट को वापस ले लिया गया था। अनिता ने इस सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया कि क्या उन्हें लगता है कि पिछली सरकारों ने (कॉन्ग्रेस सरकार सहित) नेताजी की मौत के रहस्य को जानबूझकर नजरअंदाज किया? लेकिन अनिता ने कहा- “हालाँकि मेरे पास ऐसा कोई सबूत नहीं है कि कॉन्ग्रेस की सरकारों ने इस मुद्दे की अनदेखी की लेकिन पिछली सरकारों में ‘कुछ लोग’ नहीं चाहते थे कि यह रहस्य सुलझे और इसकी अनदेखी की गई।”

‘ईमानदार’ राजीव गाँधी के जन्मदिन पर सोनिया बोलीं- उन्होंने सत्ता का दुरुपयोग बिलकुल नहीं किया

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के पद पर हाल ही में अंतरिम तौर पर वापसी करने वालीं संप्रग अध्यक्षा सोनिया गाँधी भी मोदी सरकार पर ‘डर का माहौल’ बनाने का आरोप लगाने वालों में शामिल हो गईं हैं। उन्होंने राजीव गाँधी के 75वें जन्मदिवस के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी पर अप्रत्यक्ष निशाना साधते हुए यह बात कही। सोनिया गाँधी पूर्व प्रधानमंत्री के जन्मदिन कार्यक्रम पर दिल्ली में बोल रहीं थीं।

1984 में मिला था पूर्ण बहुमत

1984 में अपनी माँ इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए आम चुनावों में राजीव गाँधी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस को 404 सीटें मिलीं थीं, और जनसंघ को पुनर्जीवित कर बनी भाजपा महज़ 2 सीटों पर सिमट गई थी। सोनिया गाँधी ने उन्हीं चुनावों को याद कराते हुए कहा कि राजीव ने कभी ‘भय का वातावरण’ बनाने या लोगों की आज़ादी और अधिकारों का हनन करने के लिए बहुमत का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने कभी लोकतंत्र के मूल्यों को खतरे में नहीं डाला।

राजीव के फैसले याद दिलाए

सोनिया गाँधी ने इस मौके पर राजीव गाँधी के कई फैसले याद दिलाए। उन्होंने राजीव सरकार द्वारा मतदान की उम्र घटाकर 18 साल किए जाने, स्थानीय निकायों (पंचायतों और नगरपालिकाओं) को वैधानिक दर्जा मिलने, दूरसंचार क्रांति आदि का ज़िक्र किया।

साथ ही इस मौके पर सोनिया ने नरेंद्र मोदी पर भी भरपूर निशाना साधा। उन्होंने राजीव गाँधी के घमंड न करने, नारे न लगाने आदि का ज़िक्र कर मोदी को घेरने की भरपूर कोशिश की। साथ ही दावा भी किया कि जैसे 1989 में राजीव गाँधी ने ‘निःस्वार्थ’ ईमानदारी से पूर्ण बहुमत न होने के चलते सरकार बनाने से मना किया, वैसा आज कोई और नेता नहीं कर सकता।

दलित की इज्जत लूटने आने वाला मुस्लिम नंगा भी हो तो मीडिया गिरोह पीड़िता का ही मुँह दबा देता है

स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल-शर्मा ट्विटर पर अंग्रेजी मीडिया का वह घिनौना चेहरा नकाब उधेड़ कर सामने रखतीं हैं, जिसके बारे में सोशल मीडिया और “राइट-विंग” पत्रकारों के दौर से पहले भी हम सब अख़बार पढ़ते, टीवी देखते हुए जानते तो थे, लेकिन कहने की हिम्मत नहीं कर पाते थे। स्वाति बतातीं हैं कि कैसे दलितों का उत्पीड़न अगर ब्राह्मण-सवर्ण की बजाय मुस्लिम के हाथों हो, अगर ‘एंगल’ ऐसा बने कि दलित को हिन्दू पीड़ित के रूप में दिखाना पड़े, तो सच को झुठलाने के लिए पत्रकारिता का समुदाय विशेष और खुद को ‘फैक्ट-चेकर’ कहने वाले नफ़रती किस हद तक गिर जाते हैं।

न केवल पीड़ितों की गैसलाइटिंग (उनके दर्द, उनके अनुभव को अपने क्षुद्र एजेंडे के लिए दूसरों के ही नहीं, खुद पीड़ित के दिमाग में झुठलाने की कोशिश करना; अपने अनुभव को खुद झुठलाने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से बरगलाना और भ्रमित करना) से वह बाज़ नहीं आते, बल्कि अगर कोई सच दिखाने की कोशिश कर भी रहा हो तो उसे जेल भेजने की कोशिश करने, धमकी से उसे चुप कराने की कोशिश करने में भी यह मीडिया गिरोह नहीं हिचकिचाता।

दलित-बनाम-मुस्लिम पर असहज हो जाता है मीडिया गिरोह

बेगूसराय के नूरपुर में एक महादलित परिवार की महिलाओं के साथ बलात्कार की कोशिश इलाके में बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय के लड्डू मियाँ और अन्य कुछ मुस्लिम पर लगा था। आरोप यहाँ तक लगा था कि बलात्कार करने मुस्लिमों में से एक बेधड़क नंगा आया था। इस पर स्वराज्य ने विस्तृत ग्राउंड-रिपोर्टिंग की थी, जिसे यहाँ पढ़ा जा सकता है।

उसी मामले की रिपोर्टिंग के अपने अनुभव ट्विटर पर साझा करते हुए स्वाति गोयल-शर्मा ने निम्न थ्रेड लिखा। इसमें पीड़ित परिवार के साथ Factchecker.in के संवाददाता की लीक हुई बातचीत का ज़िक्र करते हुए उन्होंने लिखा कि इससे यह साबित हो जाता है कि नैरेटिव के धंधा करने वालों के लिए मुसीबत खड़ी हो जाती है अगर दलितों पर अत्याचार करने वाला ‘सही’ समुदाय से ताल्लुक न रखे।

यहाँ स्वाति गोयल-शर्मा जिस रिकॉर्डिंग्स की बात कर रहीं हैं, वे पीड़ित परिवार के साथ Factchecker.in के संवाददाता की रिकॉर्डिंग हैं, जिन्हें ट्विटर पर जारी IIM-C और IIT-G से पढ़े (यानि मीडिया गिरोह के ‘अनपढ़-नाकारा लोग ही हिंदूवादी बनते हैं’ का मिथक तोड़ने वाले) हिंदूवादी सामाजिक कार्यकर्ता संजीव नेवर ने जारी किया था। वे शुरू से इस मामले से जुड़े रहे थे और इसे SC-ST आयोग तक भी लेकर गए। इन रिकॉर्डिंग में वायर और फैक्टचेकर के रिपोर्टर को पीड़ित परिवार पर अपना बयान बदलने या उसमें से हिन्दू-मुस्लिम ‘एंगल’ हटा मामूली सा ज़मीन विवाद बना देने का दबाव बनाते सुना जा सकता है।

सच बोलने के लिए जेल की धमकी

स्वाति गोयल-शर्मा ट्विटर पर आगे लिखतीं हैं कि अंग्रेजी मीडिया में से वह अकेली थीं जो इस मामले को कवर कर रहीं थीं। मीडिया के एक हिस्से ने उनके काम को, उनके द्वारा इस मामले की उजागर की गई सच्चाईयों को झुठलाने की भरसक कोशिश की। पहले मामले को नज़रअंदाज़ किया, फिर उसकी गंभीरता कम करके दिखाने की कोशिश की, फिर उसमें से साम्प्रदायिक एंगल हटाने की कोशिश की और फिर अंत में स्वाति को साम्प्रदायिक और पीड़ितों को झूठा दिखाने की कोशिश की गई।

स्वाति आगे तंज़ कसतीं हैं कि उनका ‘अपराध’ “मुस्लिम गाँव” छोड़ने के लिए एक गरीब दलित परिवार पर पड़ रहे दबाव और आधी रात में हुए हमले को रिपोर्ट करना था। इसके लिए एक ‘फैक्टचेकिंग’ वेबसाइट के सह-संस्थापक ने उन्हें गिरफ्तार करने की भी अपील की।

गवाहों के बारे में दोहरापन

स्वाति ने यह भी बताया कि एक न्यूज़ पोर्टल ने जब अपनी स्वतंत्र ग्राउंड-रिपोर्टिंग में पाया कि पीड़ित परिवार अपनी कहानी, अपने बयान पर कायम हैं, तो उसने 4 ऐसे लोगों से बात करके, जो मौके पर मौजूद नहीं थे, यानि मामले के गवाह नहीं थे, एक रिपोर्ट छाप दी कि गाँव वालों ने स्वराज्य की “मामले को साम्प्रदयिक रंग देने की कोशिश” को झुठला दिया है।

वे केस की आगे की प्रगति के बारे में बतातीं हैं कि जब संजीव नेवर की शिकायत पर राष्ट्रीय SC आयोग ने हस्तक्षेप किया तो जाँच में निकल कर आया कि पुलिस ने कई सारी गलतियाँ की थीं। SHO को मूल FIR बदलने के लिए निलंबित कर दिया गया, और बदले के इरादे से पीड़ित परिवार पर दाखिल दो काउंटर-FIRs नकली निकलीं, और पीड़ितों को पुलिस सुरक्षा दी गई।

‘दलित ईसाई’ शब्द के इस्तेमाल पर The News Minute की सम्पादक को लोगों ने लताड़ा

केरल के एक ईसाई युवक की हत्या के मामले में उसके लिए ‘दलित ईसाई’ शब्द के इस्तेमाल पर The News Minute पोर्टल की सम्पादक धन्या राजेंद्रन को ट्विटर पर लोगों के गुस्से का शिकार होना पड़ा। कई लोगों ने उन्हें आड़े हाथों लेते हुए इस शब्द की वैधता पर ही सवाल खड़े किए। उनके अनुसार हिन्दू धर्म के बाहर इस शब्द के इस्तेमाल का कोई औचित्य नहीं है।

दरअसल राजेंद्रन ने केरल के युवक केविन पी जोसेफ़ की हत्या के मामले में केरल के सेशन कोर्ट द्वारा 10 को दोषी ठहराने की खबर शेयर करते हुए कहा था कि ‘दलित ईसाई’ युवक की हत्या में दस लोगों को दोषी पाया गया है।

कानूनी रूप से नहीं है ‘दलित ईसाई’ का अस्तित्व

कानूनी रूप से ‘दलित ईसाई’ वैध नहीं है। दलित के रूप में वर्गीकरण केवल हिन्दुओं, सिखों और बौद्धों का ही हो सकता है। हालाँकि कई दलित संगठन ईसाईयों और समुदाय विशेष को भी यह दर्जा दिलाने के लिए प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अब तक ऐसा हुआ नहीं है

‘हर वक्त मोदी को खलनायक बताने से कुछ नहीं मिलेगा, आपको समझना होगा कि वह कैसे इतने सम्माननीय बने’

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने बयान दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन का मॉडल पूरी तरह नकारात्मक गाथा नहीं है। इसके साथ ही जयराम नरेश ने कहा कि पीएम मोदी के काम के महत्व को स्वीकार नहीं करना और हर समय उन्हें खलनायक की तरह पेश करके कोई फायदा नहीं होने वाला है।

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने बुधवार (अगस्त 21, 2019) को कहा- “यह वक्त है कि हम मोदी के काम और 2014 से 2019 के बीच उन्होंने जो किया उसके महत्व को समझें, जिसके कारण वह सत्ता में लौटे। इसी के कारण 30% मतदाताओं ने उनकी सत्ता में वापसी करवाई।” लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा को 37.4% वोट मिले, जबकि सत्तारूढ़ NDA को कुल मिलाकर 45% वोट हासिल हुए थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर यह बयान जयराम रमेश ने राजनीतिक विश्लेषक कपिल सतीश कोमीरेड्डी की किताब ‘मालेवॉलेंट रिपब्लिक: ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ द न्यू इंडिया’ का विमोचन करते हुए दिए।

जयराम रमेश ने कहा- “वह (मोदी) ऐसी भाषा में बात करते हैं जो उन्हें लोगों से जोड़ती है। जब तक हम यह न मान लें कि वह ऐसे काम कर रहे हैं, जिन्हें जनता सराह रही है और जो पहले नहीं किए गए, तब तक हम इस व्यक्ति का मुकाबला नहीं कर पाएँगे।”

इसके आगे कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि अगर आप हर समय उन्हें (मोदी को) खलनायक की तरह पेश करने जा रहे हैं, तो आप उनका मुकाबला नहीं कर पाएँगे। UPA के दौरान मनमोहन सिंह सरकार में ग्रामीण विकास और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय संभालने वाले जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि वह किसी से प्रधानमंत्री की सराहना या तारीफ करने के लिए नहीं कह रहे है बल्कि वे चाहते हैं कि राजनीतिक वर्ग कम से कम उन बातों को माने जो वह शासन में लेकर आए खासतौर से ‘शासन के अर्थशास्त्र’ के संदर्भ में।

‘शासन की राजनीति पूरी तरह अलग है’

जयराम रमेश ने कहा- “मैं आपको बता दूँ कि जब शासन के अर्थशास्त्र की बात आती है, तो यह पूरी तरह नकारात्मक गाथा नहीं है, शासन की राजनीति पूरी तरह अलग है। मोदी के शासन मॉडल से जिस प्रकार के सामाजिक संबंध सृजित हुए हैं वे भी पूर्णत: भिन्न हैं।” अपने बयान के तर्क में जयराम रमेश ने मोदी सरकार की कुछ उपलब्धियों, जैसे- प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUJ) का उदाहरण देते हुए बताया कि वह कैसे प्रधानमंत्री मोदी के लिए सफल साबित हुई।

‘हम सबने मोदी की योजनाओं का मजाक उड़ाया, लेकिन ..’

नरेंद्र मोदी की जनता के बीच पकड़ का उदाहरण देते हुए जयराम रमेश ने कहा- “साल 2019 में राजनीतिक विमर्श में हम सभी ने उनकी एक या दो योजनाओं का मजाक उड़ाया लेकिन सभी चुनावी अध्ययनों में यह सामने आया कि पीएमयूजे अकेली ऐसी योजना रही जो उन्हें करोड़ों महिलाओं से जोड़ पाई। इसने उन्हें ऐसा राजनीतिक खिंचाव दिया जो उनके पास 2014 में नहीं था।” उन्होंने कहा कि पिछले दशक में ऐसा कुछ हुआ जिसने मोदी को 2009 के आम चुनाव में राष्ट्रीय राजनीति में एक मामूली नेता से ऐसा व्यक्ति बना दिया, जिसने लगातार चुनाव जीते।

‘आपको समझना पड़ेगा कि वह कैसे इतने सम्माननीय बने’

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा- “हमने अपने पूरे अभियान के दौरान किसानों की हालत के बारे में बात की, लोगों ने माना कि किसान संकट में हैं। लेकिन उन्होंने इसके लिए मोदी को जिम्मेदार नहीं ठहराया। आपने देखा कि उसके बाद चुनाव नतीजों में क्या हुआ। आपको समझना पड़ेगा कि वह कैसे इतने सम्माननीय बने।”

वामपंथ एक कैंसर है, इसको इग्नोर करने से काम नहीं चलेगा, इनकी जड़ पर एसिड डालना ज़रूरी

वामपंथ के नाम पर आपको खूब इमोशनल अदरक-लहसुन सुँघाया जाएगा। वो कहेंगे कि ‘कामनिष्ठ मैनिफेस्टो’ पढ़ो। आप पूछिए कि क्यों पढ़ें? वो कहें कि मार्क्स के विचार पढ़ो, आप पूछिए कि क्यों पढ़ें? वो कहेंगे कि वामपंथ की विचारधारा उदारवादी है, आप कहिए कि नक्सलियों के हिमयाती और हिंसक क्रांति की बात करने वाले उदारवादी और सर्वाहारा की बात तो नहीं ही करते। वो कहें कि वो सर्वहारा की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनसे कहिए कि कौन नहीं लड़ रहा।

इस कैंसरकारी विचारधारा ने सिवाय रक्त के समाज को कुछ नहीं दिया है। इन्होंने हिंसा को जायज बताया, सर्वहारा की रीढ़ पर लात रख कर सत्ता तक पहुँचे और हर जगह के इतिहास को इन्होंने गंदा किया। आपसे जब पूछें कि उदाहरण दो, उनसे कहिए कि वो इस लायक नहीं हैं कि वो हमारी बात सुन कर सर्टिफिकेट दें। वामपंथियों से, या उनके हिमायतियों को वहाँ मारिए जहाँ उन्हें दर्द हो। इन्हें डिबेट का शौक है, इन सूअरों के साथ कीचड़ में मत उतरिए।

इन्होंने भारत के इतिहास को बदला, क्रांतिकारियों को आतंकी की तरह दिखाया, प्रतापी और पराक्रमी हिन्दू शासकों को नकारा, इस्लामी आक्रांताओं को ऐसे दिखाया जैसे कि मंदिर तोड़ कर, बलात्कार और हत्याएँ करते हुए उन्होंने भारतीय संस्कृति में अपना सकारात्मक योगदान दिया।

आजादी के बाद इन्होंने भारत को तोड़ने की तैयारी जारी रखी। ये आश्चर्य की बात नहीं है कि इनके मंसूबे ईसाई चर्चों और इस्लामी आतंकियों के लहसुन-ए-हिन्द से बिलकुल अलग नहीं है। अगर ये उनके अजेंडे को आगे नहीं बढ़ाते रहते तो फिर ‘केरल माँगे आजादी, पंजाब माँगे आजादी’ कहते हुए विश्वविद्यालयों में क्यों हल्ला करते? इनका अजेंडा सिर्फ एक है वो है तमाम हिन्दू प्रतीकों की तबाही और भारतीय संस्कृति का खात्मा। इस वाक्य को साबित करने के लिए मैं कोई उदाहरण नहीं दूँगा क्योंकि उसकी ज़रूरत नहीं है।

नैरेटिव पर कब्जा

दुर्भाग्य देखिए कि ये लोग हैं तो गिने-चुने लेकिन आम भारतीय किन बातों पर चर्चा करे, ये यही लोग तय करते हैं। वो आखिर होता कैसे है? सत्ताधारियों की चाटुकारिता करते हुए, नेहरू जैसे अक्षम और स्वार्थी नेताओं की चालीसा लिखते हुए, पैसों के लालच में जमीर बेच कर इतिहास के नाम पर काल्पनिक कहानियाँ लिखते हुए, ये पीढ़ी दर पीढ़ी अपने वैचारिक संतानों को पोषित करते रहे।

ये हमारे विश्वविद्यालयों के एकेडमिक काउंसिल में बहुमत में हैं, इन्होंने फिल्मी दुनिया में अपना वर्चस्व बना रखा है, इन्होंने टीवी और अखबारों में सारे बड़े संस्थानों में अपने लोग बिठा रखे हैं। इनमें से मीडिया वाले लगातार अपनी चाटुकारिता दिखाते रहते हैं। बाकी लोग परोक्ष रूप से कार्य करते हैं, जब ज़रूरत पड़ती है तो सिग्नेचर कैम्पेन या ट्वीट के जरिए, मुद्दों को चुन कर, सेलेक्टिव ट्रीटमेंट देते हुए इस कैंसर को पोषण पहुँचाते हैं।

इनके तौर-तरीकों को देखते हुए आपको पता चल जाएगा कि इनकी धूर्तता का ओर-अंत नहीं है। इन्हें न तो गरीबों से कोई मतलब है, न दलितों से, न कथित अल्पसंख्यकों से। हर बार ये इन लोगों का इस्तेमाल करते हैं ताकि चर्चा में ये बने रहें। सत्ता से लगातार दूर होते ये माओ की नाजायज संतानें चाहती हैं कि किसी तरह से, किसी भी कीमत पर, वैसे लोग सत्ता में न रहें जो इनके विपरीत विचारों के हैं। चाहे उसके लिए इन्हें दलितों को मोहरा बना कर, अफवाह फैला कर सड़कों पर आगजनी करने के लिए उतारना हो, या अनुच्छेद 370 के बाद कश्मीरियों को सड़कों पर आ कर विरोध के नाम पर पत्थरबाजी और अराजकता के लिए उकसाना। ये चाहते हैं कि पूरे देश में दंगे हों, लोग सड़कों पर आ जाएँ और खूब रक्तपात हो।

लोग कहते हैं इग्नोर कीजिए

इन सब बातों के लिए मीडिया की मदद ली जाती है। लेकिन इंटरनेट और डिजिटल मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया के आने से इनकी नग्नता उजागर होने लगी है। आज के दौर में सूचनाओं का सबसे ज्यादा महत्व हो गया है। पहले भारत के बहुत बड़े हिस्से के पास खबर या विचारों के सही या गलत होने को जानने का तरीका ही नहीं था। इसलिए पहले चर्चा होती ही नहीं थी। चर्चा का मतलब था कि आपके मतलब के लोग, आपके मतलब की जगहें, आपके मतलब के मुद्दे और आपके मतलब की बातें।

एक तरफा सेमिनार से लेकर टीवी के पैनल डिस्कशन तक पूरी तरह से मैनेज्ड। आप एनडीटीवी के पैनल देखा कीजिए कि वहाँ किस तरह के लोग आते हैं। विरोधी विचारों के लोगों को बुलाया ही नहीं जाता। आप कहेंगे कि भाजपा ने मना कर रखा है। सही बात है लेकिन क्या भाजपा के इतर दक्षिणपंथी लोग नहीं हैं जिन्हें कश्मीर या तलाक के मुद्दे पर बोलने को बुलाया जाए? या वही वामपंथी असहिष्णुता कि एक्सपर्ट तो सिर्फ वामपंथी हो सकते हैं, बाकी को कुछ नहीं आता।

ऐसे लोगों को इग्नोर करने से ये बढ़ते रहेंगे। ये सीधे तौर पर राष्ट्रविरोधी हैं और इन्हें भारतीयता से, हिन्दू संस्कृति से या यहाँ के वृहद समाज से कोई मतलब नहीं। इन्होंने लगातार उन बातों पर हमला किया है जिससे हिन्दुओं की आस्था बिखर जाए। त्योहारों को प्रदूषण से जोड़ा, पितृसत्ता से जोड़ा, उस पूरे धर्म को असहिष्णु कह दिया दिया जिसने बलात्कारियों और आतंकियों को भी बसने की जगह दी। सब की जड़ में वही बात कि ये लोग सत्ता में कैसे पहुँच गए, ये तो हमारे प्रोजेक्ट को पूरा होने से रोक रहे हैं।

इन्हें सिर्फ रोकना ज़रूरी नहीं है, इनका समूल नाश आवश्यक है। इनका लक्ष्य मोदी या भाजपा नहीं, इनका लक्ष्य हिन्दुओं को इतना पंगु और लाचार बना देना है कि ये बिखर जाएँ, नेतृत्वहीन हो जाएँ, और अंत में इस संस्कृति को भुला दें जिसकी जड़ में वैयक्तिक और सामाजिक स्वतंत्रता, सहिष्णुता, सर्वधर्म समभाव है।

इसलिए इग्नोर करने पर तो ये अपनी राह बनाते ही रहेंगे। ज़रूरत है कि इन पर चौतरफा हमला हो। इनकी फंडिंग बंद की जाए, इनके पैसे कमाने के जरिए खत्म किए जाएँ, विश्वविद्यालयों से ऐसे चूहों को बिलों से पानी और मिर्च का धुआँ डाल कर निकाला जाए। जो लोग शब्दों की आड़ लेकर देश को तोड़ने की बात करें उन्हें आर्थिक रूप से नुकसान पहुँचाना आवश्यक है। इनके पैसे खत्म कर दो ये सब स्वतः गिड़गिड़ाते हुए कहने लगेंगे कि ‘मेरे तो बाप हिन्दू ही थे, मैं तो चाल में फँस गया था।’

इन नक्सलियों और आतंकियों से लेकर वैचारिक तानाशाहों की सारी निष्ठा पैसों से ही है। विचारधारा तो ये दो रुपए के लिए त्याग देते हैं। इन्हें सिर्फ उपेक्षित रखना ही सही उपाय नहीं है, इन्हें अप्रासंगिक बनाना आवश्यक है। इनकी सच्चाई सामने लाकर, इन्हें बिना किसी भी तरह का मौका देते हुए, पूरी तरह से डिसमिस करते हुए, दुत्कार कर सामाजिक चर्चा से बाहर करना समय की माँग है।

समूल नाश ही एकमात्र उपाय है

वो आपको कुछ लिखें, या कहें कि ये तो गलत लिखा है, इसका आधार क्या है, तो उन्हें जवाब मत दीजिए, उन्हें दुत्कार कर भगाइए कि वो इस लायक नहीं है कि उनसे किसी भी तरह की बात की जाए। क्योंकि यही इनका इतिहास रहा है। पत्रकारिता के सम्मानों में कितने सम्मान दक्षिणपंथियों को मिले हैं? साहित्यिक सम्मानों में क्या कोई घोषित दक्षिणपंथी है? ऐसे कितने महत्वपूर्ण मंचों पर आपने दक्षिणपंथियों को अपनी बात खुल कर कहते सुना है?

इन्होंने हर संस्था पर, हर संस्थान पर, हर जगह अपनी ऐसी पकड़ बना रखी है कि व्यक्ति अपने आप को अभिव्यक्त करने से डरता है। ये सारे लोग स्वयं को लिबरल बताते हैं, जबकि इनसे ज्यादा इन्टॉलरेंट, अनुदार, एक आयामी, इन्फ्लेक्सिबल और तानाशाही प्रवृत्ति के लोग आपको ढूँढने से भी नहीं मिलेंगे। हर जगह ये अपने तरह के विचारों को ही विचार मानते हैं, ये जिनको सही मानते हैं, अगर आपने उसके अलावा किसी को वोट दे दिया, तो आपको मूर्ख और अज्ञानी कह कर डिसमिस कर देंगे।

इसीलिए, समय की ज़रूरत यही है कि इन्हें फ्लश किया जाए समाज से। दुर्भाग्य से ऐसे हिंसक विचारों को पोषित करने वालों के लिए समाज में कोई जगह नहीं है। आप इनके साथ अगर इन्हीं के तरीके से पेश नहीं आएँगे तो ये रक्तबीज की तरह पैदा होते रहेंगे।

इस वैचारिक युद्ध में छोटी लड़ाइयों को जीत कर खुश होने की जरूरत नहीं है। ज़रूरत है इस विचारधारा के समूल नाश का। जब ये पूछें कि ‘क्या तुम भगत सिंह के विचारों को मिटा दोगे’, तो पहले तो ऐसे आदमी को अपने मुँह से बलिदानी भगत सिंह का नाम लेने पर दो वैचारिक तमाचा तुरंत मारिए और फिर कहिए कि भगत सिंह के विचारों को कलुषित करने वालों को उनका नाम लेने का कोई हक नहीं।

विचारधारा तुम्हारे मैनिफेस्टो में क्या कहती है, उससे मतलब नहीं है। मतलब इससे है कि आज तुम उस विचारधारा के नाम पर संस्थागत बलात्कार (जो वामपंथियों में खूब प्रचलित है), अपने ही देश की सेना के जवानों की नृशंस हत्या, देश को तोड़ने की बातें और चुने गए नेता को मारने की योजना बनाते हो। मतलब इससे है कि तुमने गरीबों के नाम पर कितना आतंक मचाया है और उन्हें लगातार सरकारी योजनाओं से, विकास से दूर रखा है। जरूरत पड़ी तो तुमने उन्हीं गरीबों को ढाल बना कर सुरक्षाबलों के आगे कर दिया।

वामपंथियों को चिह्नित कर, अप्रासंगिक बनाना समय की माँग

इनके जितने भी प्रोपेगेंडा फैक्ट्री हैं, उन्हें पढ़ना बंद कीजिए। चाहे ये छोटे हों, बड़े हों, तोप हों, या तलवार, इन्हें पहचानिए और सार्वजनिक रूप से उन्हें उनकी करतूतें गिना कर सबके सामने लाइए। मीडिया वाले ऐसा करें तो उनके झूठ और प्रोपेगेंडा को सत्य से काटिए। आप ये मान कर चलिए कि सही बात तो ये कर ही नहीं सकते। इनके डीएनए में ही सही बोलना नहीं है। अगर ये घटना सही उठा रहे हों, तो आप तय मान कर चलिए कि उस घटना में ये कुछ सवर्ण-दलित या साम्प्रदायिक प्रपंच पक्का करेंगे। इसलिए, पहली नजर में तो इन्हें सही मानने का सवाल ही नहीं उठता।

जस्टिस लोया, अमित शाह के बेटे जय शाह, अजित डोभाल के बेटे शौर्य डोभाल से लेकर राफेल, इन्टॉलरेंस, जय श्री राम जैसे दसियों प्रपंच इनके गैंग ने गढ़े। कभी कुछ साबित नहीं हो पाया। लेकिन ये कोरस में गाते रहें। आज भी गाते हैं। इनका हर बड़ा मुद्दा मोटिवेटेड होता है जिसकी जड़ में या तो अपने मालिकों को बचाने की बात होगी या फिर हिन्दुओं को नीचा दिखाने की। इसलिए, इन्हें जहाँ देखिए, वहीं कील ठोक दीजिए।

अगर इनकी छटपटाहट देख कर आपको दया आए तो भी दया मत दिखाइए। ये मत सोचिए कि विरोधी विचारों का रहना आवश्यक है। ये सारी फर्जी बातें इन्हीं चम्पकों ने फैलाई हैं। विरोधी विचारों का नहीं, सही को सही, और गलत को गलत कहने वालों का रहना जरूरी है। आप याद कीजिए कि गौरक्षकों ने कानून को हाथ में लिया तो क्या दक्षिणपंथियों ने उन्हें नहीं नकारा? क्या कठुआ कांड पर दक्षिणपंथी चुप रहे? जब-जब सरकार ने कुछ गलत किया तब इन्हीं दक्षिणपंथियों ने मोदी तक को नहीं छोड़ा। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा कैसे हारी?

लेकिन इसके उलट आप याद कीजिए कितने वामपंथियों ने राहुल गाँधी जैसे नकारे नेता को प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहा? आप याद कीजिए कि कितनी बार मौलवियों द्वारा मस्जिदों और मदरसों के भीतर किए जाने वाले बलात्कार पर इन्होंने दो शब्द बोले हों? आप याद कीजिए कि आतंकी घटनाओं पर ‘हिन्दू टेरर’ की थ्योरी लाने वाले कितने बार इस्लामी आतंक की निंदा कर पाए? याद कीजिए दलितों को अफवाह फैला कर सड़कों पर आगजनी करने और परिणामतः बारह लोगों की हत्या करने को उकसाने के बाद कितने वामपंथियों ने इसकी निंदा की? कितने नक्सली नरसंहारों पर इन्होंने दो शब्द बोले कि उनकी विचारधारा इसका समर्थन नहीं करती? ममता बनर्जी के राज में बंगाल का कौन सा इलाका मजहबी दंगों से अछूता रहा, किस वामपंथी मीडिया ने उसे आप तक पहुँचाया?

इसलिए, इस मुगालते में मत रहिए कि विरोध का स्वर इनके जाने से गायब हो जाएगा। विरोध का स्वर हमारे बीच ही मौजूद है। ये तो कैंसर हैं, कोढ़ हैं, सड़े हुए सेव हैं टोकरी के जिन्हें समाज से निकालना ज़रूरी है। इन्होंने गलतियों को डिफेंड किया है, सही काम आज तक किया नहीं। इसलिए, इन्हें सब्जियों की जड़ में उगे पराश्रित घास की तरह एक-एक कर खोजिए, और उखाड़ लीजिए। उखाड़ने के बाद इन्हें जमीन पर मत रखिए, इन्हें धूप में सुखाइए, फिर जलाइए और फिर कहीं फेंक दीजिए।

और हाँ, राह चलते कोई वामपंथी दिखे तो उसे बिना पूछे दो वैचारिक कंटाप मार दीजिए क्या पता दिमाग पर कुछ असर पड़े और सही राह चल पड़े! आप ही को बाद में धन्यवाद कहेगा।