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विभाग संभालें या मंत्री पद छोड़ दें: कैप्टन के फरमान से बैट्समैन सिद्धू के राजनीतिक विकल्प लगभग खत्म

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के बीच तनाव नए मुकाम तक पहुँच गया है। कैप्‍टन और नवजोत सिंह सिद्धू की तकरार घटने के बजाए और बढ़ गई है। कैप्‍टन अमरिंदर का सिद्धू को लेकर रुख आक्रामक हो गया है। राज्य के नए बिजली मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू को नया विभाग मिले हुए 24 दिन हो गए हैं, लेकिन अभी तक उन्होंने अपना विभाग नहीं संभाला है। 24 दिन बाद भी कार्यभार नहीं संभालने के कारण सिद्धू का मंत्री पद खतरे में है। 

जानकारी के मुताबिक, अगर अगले कुछ दिनों में सिद्धू ने अपना मंत्रालय नहीं संभाला तो मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह उन पर एक्शन ले सकते हैं। इस मसले पर कैप्टन अमरिंदर सिंह ने शनिवार (जून 29, 2019) को कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ लीडर अहमद पटेल से मुलाकात की। बता दें कि अहमद पटेल को अमरिंदर और सिद्धू के बीच मतभेद दूर कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस मुलाकात के दौरान अमरिंदर ने साफ कर दिया कि वो सिद्धू का विभाग बदले जाने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का कोई इरादा नहीं रखते। ऐसे में अब सिद्धू के लिए दो ही रास्ते बचे हैं- या तो वो नए विभाग का कार्यभार संभाल लें या फिर मंत्री पद छोड़ दें।

वहीं खबर ये भी है कि इस बारे में राहुल गाँधी ने भी ये साफ कर दिया है कि कैप्टन को अपनी मर्जी से सरकार चलाने का अधिकार है और मंत्रिमंडल में फेरबदल का भी उन्हें विशेषाधिकार है। गौरतलब है कि 6 जून को पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने कैबिनेट में फेर बदल किया था। इस दौरान कैप्टन अमरिंदर ने नवजोत सिंह सिद्धू से शहरी निकाय मंत्रालय विभाग वापस ले लिया था और उन्हें ऊर्जा मंत्रालय का प्रभार सौंपा था। जिससे सिद्धू नाराज थे और उनकी नाराजगी अभी तक जारी है। इस बीच बिजली मंत्री के अभाव में बिजली सप्लाई पर असर पड़ा है। नए बिजली मंत्री सिद्धू की गैरहाजिरी में सीएम अमरिंदर खुद बिजली विभाग के अधिकारियों की मीटिंग ले रहे हैं और उन्हें लगातार निर्देश दे रहे हैं।

राशिद, नदीम, वाहिद और तसुव्वर ने तमंचे के बल पर मदरसे में 13 साल की किशोरी के साथ किया दुष्कर्म

उत्तर प्रदेश में 13 साल की एक किशोरी को अगवा कर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किए जाने का मामला प्रकाश में आया है। यह शर्मनाक वारदात सदरपुर थाना इलाके की है। बुधवार (जून 26, 2019) की शाम शौच के लिए निकली किशोरी को चार वहशी दरिंदों ने हथियारों के बल पर अगवा कर लिया और फिर मदरसे के अंदर ले जाकर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। 

जानकारी के मुताबिक, गाँव के बाहर निकलते ही जब किशोरी सुनसान रास्ते से गुजर रही थी, तभी राशिद, नदीम, वाहिद एवं तसुव्वर नामक चारों दरिंदों ने उसका रास्ता रोका। इससे पहले कि किशोरी को कुछ समझ में आता, वो लोग उसे जबरन खींच कर खेत की ओर ले गए। किशोरी के शोर मचाने पर बदमाशों ने उसे तमंचा दिखाया और फिर तमंचे के बल पर उसे मदरसे में ले जाकर चारों दरिंदों ने किशोरी के साथ बलात्कार किया। इसके साथ ही बदमाशों ने किशोरी को इसके बारे में किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी भी दी और फिर फरार हो गए।

पीड़िता ने जब वापस लौटकर अपने परिवारवालों को इस घटना के बारे में बताया, तो वो हक्के-बक्के रह गए। लेकिन उनके अंदर उन दरिंदों का खौफ इतना ज्यादा था कि वो लोग पुलिस के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। मगर जब गाँववालों को इस शर्मनाक और घिनौनी वारदात के बारे में पता चला तो उन लोगों ने पीड़िता के परिवार को हिम्मत दी और पुलिस से इसकी शिकायत करने के लिए कहा। इसके बाद घरवालों ने चारों दरिंदों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई।

शिकायत दर्ज होने पर पुलिस ने एक्शन लेते हुए चारों आरोपितों के खिलाफ दुष्कर्म एवं पॉक्सो ऐक्ट के तहत केस दर्ज किया और पीड़िता को मेडिकल चेकअप के लिए भेज दिया। सदरपुर के थानाध्यक्ष ने इस बारे में बात करते हुए कहा, “एक किशोरी के साथ तमंचे के बल पर सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया है। पीड़िता की तहरीर पर सभी आरोपियों के विरुद्ध दुष्कर्म व पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया गया है। जल्द सभी आरोपित गिरफ्तार कर लिए जाएँगे।”

बिहार: आमना खातून के नवजात बच्चे की हुई चोरी, गुस्साई भीड़ ने की आगजनी, पुलिस पर पथराव

बिहार में एक नर्स द्वारा कथित तौर पर बच्चा चुराए जाने पर आगजनी कर रही गुस्साई हुई भीड़ ने पुलिसबल पर पथराव कर दिया। जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने तीन राउंड फायरिंग की। मामला काबू में न आते देख डीएसपी को दलबल के साथ मौके पर ही कैम्पिंग करनी पड़ रही है। मामला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा का है।

आगजनी रोकने पहुँची थी पुलिस

पुलिस नालंदा के इस्लामपुर में आगजनी रोकने और सड़क-जाम खत्म कराने पहुँची थी। शुक्रवार रात इस्लामपुर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से एक नवजात बच्चे की चोरी हो गई थी। जब चोरी का पता चला तो परिजनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। समाचार एजेंसी ANI के के मुताबिक उन्होंने अस्पताल पर पत्थरबाजी की और सम्पत्ति को क्षतिग्रस्त कर दिया:

जन्म और चोरी के समय को लेकर विरोधाभास

मामले को लेकर मीडिया में विरोधाभासी वृत्तांत सामने आ रहे हैं। एक ओर इंडिया टुडे के मुताबिक हिलसा, नालंदा के सब डिवीजनल अफसर (एसडीओ) वैभव चौधरी ने ANI से बात करते हुए कहा कि शुक्रवार देर रात लाई गई महिला ने शनिवार (29 जून) सुबह 9 बजे शिशु को जन्म दिया

वहीं न्यूज़ 18 ने शुक्रवार रात के तीन बजकर 20 मिनट के आसपास चोरी होने का दावा किया है। न्यूज़ 18 यह भी कहता है कि आमना ने एक नर्स पर ही बच्चे की चोरी का आरोप लगाया है। लेकिन ड्यूटी पर तैनात डॉ. प्रभाकर के हवाले न्यूज़ 18 ने यह भी लिखा है कि जिस महिला पर बच्चा चुराने का आरोप है, उसने नर्स से रात में कहा कि वह आमना खातून के ही साथ है, और वह आमना की सेवा करने लगी। रात करीब तीन बजकर 20 मिनट वह बच्चे को भाप दिलाने के नाम पर निकली और फरार हो गई

योगी सरकार में बहुरेंगे UP के भिखारियों के भी दिन, करेंगे पुनर्वास की समुचित व्यवस्था


चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरिम बजट में ही घुमन्तु और भिखारियों के पुनर्वास के प्रति अपनी योजना और चिंता का खुलासा किया था। शुरुआत कर दी है उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार योगी आदित्यनाथ ने भिखारियों के पुनर्वास के लिए नए सिरे से प्रयासरत है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ नगर निगम को 45 दिनों के अंदर भिखारियों का पुनर्वास करने को कहा है। नगरपालिका आयुक्त ने कहा कि लखनऊ नगर निगम इन भिखारियों के लिए आश्रयगृहों में पानी, बिस्तर की चादर और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएँ प्रदान करेगा।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, नगर आयुक्त इंद्रमणि त्रिपाठी ने सभी जोनल अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा, “हम एक सर्वेक्षण कराने की प्रक्रिया में हैं और एक बार यह पूरा हो जाए तो हम भिखारियों को 45 आश्रयगृहों में भिजवा देंगे।” शारीरिक रूप से अक्षम भिखारियों को आश्रयगृहों में रखा जाएगा, जबकि सक्षम को नागरिक कर्तव्य सौंपे जाएँगे, ताकि उन्हें जीविकोपार्जन का अवसर मिले जिससे वह भी समाज की मुख्यधारा से जुड़ें। उन्होंने कहा कि शारीरिक रूप से स्वस्थ भिखारियों के पुनर्वास के लिए शहर के 5.8 लाख घरों से कचरा इकट्ठा करने और इसके बदले उपयोगकर्ता शुल्क वसूलने का काम सौंपा जाएगा। इनमें से कुछ को दैनिक स्वच्छता कार्यों में प्रतिनियुक्त किया जाएगा, जैसे कि कचरा इकठ्ठा करना, नालियों की सफाई और सड़कों की सफाई आदि।

बता दें कि लखनऊ नगर निगम ने निर्णय लिया है कि पुनर्वासित भिखारियों को उनके द्वारा वसूले गए यूजर चार्ज का 10 से 20 प्रतिशत तक रकम दी जाएगी। इसके अलावा दैनिक स्वच्छता कार्यों में लगाए गए बाकी लोगों को 300 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी की बात कही जा रही है। अधिकारियों ने बताया कि यह वही राशि है, जो संविदाकर्मियों को दी जाती है।

महबूबा की ‘ट्विटर वाली बिकिनी’ पर भड़के देवबंदी उलेमा, बोले- इस्लाम नहीं देता ऐसे पहनावे की इजाज़त

जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के बिकिनी पहनने वाले ट्वीट ने विवाद का रूप ले लिया है। महबूबा के ट्वीट पर अब देवबंद के उलेमा भड़क गए हैं। उनका कहना है कि महबूबा मुफ्ती ने जो कहा वो उनकी अपनी सोच है। हालाँकि, इस्लाम और शरीयत मुस्लिम महिलाओं को इस तरह के पहनावे की इजाजत नहीं देता है।

महबूबा मुफ्ती के मुस्लिम महिलाओं के बिकिनी पहनने वाले ट्वीट पर बहस शुरू हो गई है। उन्होंने ट्वीट किया है कि मुस्लिम महिला बिकिनी पहने या बुर्किनी यह उसकी मर्जी है। यह उन्हें खुद तय करना होगा। महबूबा मुफ्ती के ट्वीट पर दारुल उलूम जकरिया के मोहतमिम मौलाना मुफ्ती शरीफ कासमी ने कहा कि यह महबूबा की अपनी सोच है। लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिए बुर्का जरूरी है। बिकनी या कोई और पहनावे की इस्लाम और शरीयत कतई इजाजत नहीं देता।

दरअसल, महबूबा मुफ्ती ने रायटर्स का वीडियो पोस्ट रीट्वीट किया जिसका कैप्शन था, “फ्रांस में मुस्लिम महिलाओं का एक समूह बुर्कीनी प्रतिबंध का विरोध करता है।” इस वीडियो में कुछ महिलाएँ बिकनी में थीं तो कुछ ने बुर्किनी पहनी हुई थी। महबूबा ने इसी ट्वीट को रीट्वीट कर लिखा “मुस्लिम महिला बिकिनी पहने या बुर्किनी यह उसकी मर्जी है। यह उन्हें खुद तय करना होगा।”

महबूबा मुफ्ती के ट्वीट पर दारुल उलूम जकरिया के मोहतमिम मौलाना मुफ्ती शरीफ कासमी ने कहा कि यह महबूबा की अपनी सोच है, लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिए बुर्का जरूरी है। उन्होंने कहा कि इस्लाम में औरत के लिए लिबास रखा गया है ताकि उससे उसका पूरा शरीर ढका रह सके। शरीयत में बिकिनी पहनना जायज नहीं है और फिर इसी तरह का कोई और पहनावा पहनने की इस्लाम इजाजत नहीं देता।

शामली: मोमोज़-विवाद में नामजद लोगों के घर लगे ‘पलायन’ के बोर्ड, पुलिस ने कहा स्टंट

शामली में कुछ दिन पहले मोमोज़ खाने को लेकर हुए दो समुदायों के विवाद के नामजदों की जब पुलिस ने धरपकड़ शुरू की तो समुदाय विशेष के बहुत से लोगों के घर ‘पलायन’, ‘मकान बिकाऊ है’ आदि लिखा जाने लगा है। जहाँ मीडिया इसे ‘डरा हुआ मजहब’ के अपने नैरेटिव के लिए ‘कच्चा माल’ मान रहा है, वहीं पुलिस ने इसे महज़ स्टंट और पुलिस पर दबाव बनाने का हथकंडा करार दिया है।

मोमोज़ खाने को लेकर हुई मारपीट, पुलिस पर हमला

मोमोज़ खाने को लेकर उत्तर प्रदेश के शामली में अजुध्या चौक बाजार में गुरुवार (जून 6, 2019) को 3 युवकों ने मोमोज़ खाने को लेकर बजरंग दल के 2 कार्यकर्ताओं पर हमला किया। हमले में दोनों कार्यकर्ता घायल हो गए। आरोपितों में से एक को पुलिस ने गिरफ्तार किया लेकिन मजहबी भीड़ ने इकट्ठा होकर पुलिस से हाथापाई शुरू कर दी और अपने साथी को भगा ले गए।

साजिद, आबिद और तौफिक नामक इन युवकों के भाग निकलने के बाद पुलिस ने 7-8 नामजदों और लगभग 25 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। नामजदों को पकड़ने के लिए दबिश शुरू हुई, और मामले की फुटेज इकठ्ठा होने लगी ताकि अज्ञातों की शिनाख्त हो सके। इसी के बाद ‘पलायन’, ‘मकान बिकाऊ है’ आदि लोगों के घरों के बाहर लिखा मिलने लगा।

पत्रकारिता के समुदाय विशेष का दोगलापन

वहीं दूसरी ओर पत्रकारिता के समुदाय विशेष ने इस मामले को भी ‘डरा हुआ मजहबी’ के अपने नैरेटिव में बुनते हुए हिन्दुओं के माथे ही मढ़ना शुरू कर दिया है। नवभारत टाइम्स (गाज़ियाबाद संस्करण, 29 जून) को लिखता है:

वहीं जब स्थानीय पुलिस अधिकारी से इस बाबत मीडिया ने बात की तो उन्होंने दो-टूक बताया कि पुलिस को दबाव में लेने, प्रशासन का ध्यान भटकाने और खुद को हिंसा करने के बाद पीड़ित दिखाए जाने की कोशिश हो रही है, और इसी के अंतर्गत पलायन और मकान बेचने का नाटक किया जा रहा है।

पहले भी हो चुका है

ऐसा पहले भी हो चुका है कि सामान्य घटनाओं में शामिल संदिग्धों के बचाव और/या फिर हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए मामलों को बेवजह साम्प्रदायिक रूप दे दिया जाता है। लगभग साढ़े तीन साल पहले मणिपुर में यही हुआ था जब एक अध्यापक मोहम्मद हसमद अली की ज़मीन विवाद में हुई हत्या को मीडिया गिरोह ने गौरक्षकों का कृत्य दिखाने की कोशिश की थी। लेकिन उनका भांडा फोड़ते हुए खुद अली के बेटे ने अपने रिश्तेदार पर आरोप लगाया था

कुख्यात ट्रोल ध्रुव राठी ने उड़ाया भारतीय क्रिकेट टीम का मजाक, नाराज प्रशंसकों ने दिखा दी औकात

आईसीसी ने एक जैसे रंग वाली जर्सी पहनने वाली टीमों को अलग कलर वाली जर्सी पहनने के लिए कहा है, ताकि मैच के दौरान सभी खिलाड़ी एक जैसे न दिखें। आईसीसी ने भारत की जर्सी का रंग भी बदलने को कहा और कलर चुनने के लिए बीसीसीआई को छूट दी। बीसीसीआई ने फाइनली केसरिया रंग की जर्सी का चयन किया है। अब इस रविवार, यानी 30 जून को होने वाले मैच में भारत इंग्‍लैंड के खिलाफ अपनी नियमित नीली जर्सी की जगह केसरिया जर्सी पहनकर उतरेगा। लेकिन कुछ लोगों को इस रंग से भी आपत्ति हुई है और उनमें से ही एक नाम झूठे आँकड़ों की मदद से सरकार विरोधी प्रोपेगैंडा चलाने वाले ध्रुव राठी का भी है।

इंटरनेट पर बैठकर भ्रामक तथ्य बताकर लोगों को गुमराह करने वाले ध्रुव राठी को भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी का केसरिया (भगवा) रंग शायद पसंद नहीं आया और उन्होंने अपने जहर को ट्विटर पर उढ़ेल ही दिया। ध्रुव राठी ने नई जर्सी पहने हुए इंडियन क्रिकेट टीम के खिलाडियों को ट्वीट करते हुए लिखा, “ये तो पेट्रोल पम्प वालों की तरह दिख रहे हैं।” लेकिन भगवा रंग से उनकी यह नफरत ट्विटर यूज़र्स को ख़ास पसंद नहीं आई और उन्होंने तुरंत ध्रुव राठी को याद दिलाया कि उसका खुद का स्तर पेट्रोल पम्प वालों के आसपास भी नहीं ठहरती है और इस वजह से उसे उनका मजाक बनाने का अधिकार नहीं है।

हैरानी की बात यह है कि क्रिकेट टीम में इस नए रंग से आपत्ति सिर्फ ध्रुव राठी को ही नहीं है, बल्कि जर्सी में भगवा तलाश लेने वाले लगभग हर दूसरे व्यक्ति को है। मजाक बनाने वाले लोगों में से अधिकांश पाकिस्तान के नागरिक हैं, लेकिन वो कम से कम ध्रुव राठी की तरह इस देश का अनाज तो नहीं खाते हैं। खेल में भी अपनी विषैली मानसिकता का परिचय देकर इन लोगों ने कम से कम यह तो साबित कर दिया है कि इनकी नफरत का कारोबार अब इनकी नसों में बहने लगा है।

ध्रुव राठी की इस घटिया हरकत पर ट्विटर यूज़र्स ने भी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उसे जमकर लताड़ लगाई। साथ ही, ध्रुव राठी को यह याद दिलाया कि पेट्रोल पम्प पर काम करने वाले व्यक्तियों की भी अन्य लोगों के ही समान इज्जत होती है।

हालाँकि, कुछ क्रिकेट प्रेमी ध्रुव राठी की आलोचना करने में भावनाओं में बहकर कुछ ऐसी टिप्पणी भी कर बैठे जिनसे हमें बचना चाहिए। हमें प्रतिक्रिया व्यक्त करते समय अपनी भाषा का ध्यान रखना चाहिए।

सलीके से हुई आलोचना से जलील होकर ध्रुव राठी ने सफाई देने का प्रयास करते हुए कहा कि वो सिर्फ मजाक कर रहा था।

यह देखना दुखद है कि सरकार, समुदाय और किसी विशेष राजनीतिक दल से घृणा के कारण कुछ लोग खेल तक को नहीं छोड़ रहे हैं और उसमें भी अपनी घृणा को नहीं छुपा पाते हैं। पेट्रोल पम्प पर काम करने वाले हर हाल में राजनीतिक दलों से रिश्वत लेकर यूट्यूब पर फर्जी आँकड़ों के जरिए लोगों को गुमराह करने और अफवाह फैलाने वाले ध्रुव राठी से लाख बेहतर हैं। क्योंकि वो समाज में एलिटिज्म और उन्माद फैलाने वाले षड्यंत्र रचकर उसे तोड़ने का प्रयास नहीं कर रहे होते हैं।

‘मोदी ने विज्ञापन रोका’ वाली फ़र्ज़ी खबर ‘सूत्रों के हवाले से’ फैला रहा है पत्रकारिता का समुदाय विशेष

‘सूत्रों के हवाले से’ हमेशा से पत्रकारिता में विवादास्पद विषय रहा है- एक ओर कुछ लोग इसे ज़रूरी मानते हैं ताकि सरकारों और सार्वजनिक पद पर बैठे, टैक्स के पैसे का लाभ ले रहे अधिकारियों की जवाबदेही बनी रहे, और वह किसी भी जनहित की सूचना को आधिकारिक गोपनीयता के आवरण में न दबा लें, वहीं दूसरी ओर यही वाक्यांश पत्रकारों को किसी भी जवाबदेही, सबूत की अनिवार्यता की जिम्मेदारी से मुक्त कर देता है। इसीलिए पत्रकारों को यह सिखाया जाता है कि ‘सूत्रों के हवाले से’ रिपोर्टिंग कम-से-कम और विशेष परिस्थितियों में ही हो। खासकर कि राजनीतिक बीट पर इसके इस्तेमाल के लिए पत्रकारिता के और व्यक्तियों के खुद के कई सारे नैतिक ‘फ़िल्टर’ होते हैं।

लेकिन नैतिक मानदंडों से कभी कोई लेना-देना न पत्रकार से पत्तलकार बने सिद्धार्थ वरदराजन का रहा है, न उनके ‘द वायर’ का। रॉयटर्स की जिस खबर को वायर ने कॉपी-पेस्ट मारकर ऐसा दिखाने की कोशिश की कि मोदी सरकार विज्ञापन न देकर टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप, द हिन्दू और टेलीग्राफ़ का गला घोंटे दे रही है, वह न केवल तथ्यहीन और केवल ‘सूत्रों के हवाले से’ पर आधारित है, बल्कि अंदर की खबर खुद ही कई जगहों पर हेडलाइन का खंडन करती है। इसके अलावा यह ‘द वायर’ के पिछले प्रोपेगंडे कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया मोदी सरकार का पिट्ठू है, के भी विपरीत दिशा में है।

किसने कहा? कब कहा? सबूत कहाँ है?

सबसे पहले तो यह खबर किस आधार पर है? केवल ‘गुप्त सूत्रों’ से बातचीत के आधार पर। ऐसे कैसे ‘गुप्त सूत्र’ हैं जो इतने बड़े तो हैं कि उन पर विश्वास कर लिया जाए, लेकिन वे न केवल खुद सामने नहीं आ सकते बल्कि कोई ऐसा दस्तावेज भी नहीं दे सकते जिससे उनकी बात सही होने का सबूत मिल जाए? विनीत जैन (टाइम्स ऑफ़ इंडिया), राजगोपाल (टेलिग्राफ) या एन राम (हिन्दू) सब अधिकारियों के whatsapp और फेसबुक चेक करते हैं क्या?

इसके अलावा वायर/रॉयटर्स का यह भी दावा है कि इन तीनों समाचारपत्रों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सीईओ) ने रॉयटर्स के इस बाबत ईमेल का जवाब नहीं दिया है। भला ऐसा वह क्यों करेंगे, जब तक कि खबर फ़र्ज़ी न हो? अगर उनका काम-धंधा सरकार के इस कदम से पहले से ही चौपट है, तो वह भला ईमेल का जवाब क्यों नहीं देंगे? कायदे से तो उन्हें ईमेल का जवाब देकर अपना मुद्दा उठा रहे अन्य क्रांतिकारी पत्रकारों की सहायता करनी चाहिए।

15% का क्या चक्कर है?

खबर की हैडलाइन के मुताबिक तो मोदी सरकार ने तीनों अख़बारों में विज्ञापन एकदम रोक दिए हैं। पढ़कर कोई भी विवेकशील इंसान नाराज हो जाए। यही बात खबर के पहले वाक्य में भी कही गई है। लेकिन और अंदर जाकर पता चलता है कि नहीं, नहीं, बंद केवल पूरी तरह टाइम्स ऑफ़ इंडिया का विज्ञापन हुआ है, बाकी टेलीग्राफ़ और द हिन्दू का केवल कम हुआ है।

उसमें भी ‘दिलचस्प’ बात यह है कि जहाँ टाइम्स ग्रुप की कुल विज्ञापन आय का 15% केंद्र के सरकारी विज्ञापन से है (जो कि कथित तौर पर बंद हो गई है), वहीं टेलीग्राफ़ ने इसी आँकड़े (15%) बराबर कमी केंद्र सरकार से मिलने वाले विज्ञापन में दर्ज की है। यह एक संयोग है, या पूरा आँकड़ा फ़र्ज़ी है, और एक ही संख्या को बार-बार दिखाकर ‘इम्पैक्ट’ बनाने की कोशिश हो रही है? द हिन्दू का तो कोई आँकड़ा भी नहीं है कि बंद हुआ है विज्ञापन, या फिर केवल कमी हुई है। बस एक दावा है- मोदी सरकार हमारे राफेल ‘कवरेज’ (जिसे ऑपइंडिया ने महज़ फोटोशॉप साबित किया था) से नाराज़ होकर विज्ञापन रोक दिए हैं।

कोबरापोस्ट भूल गए?

रॉयटर्स ने यह लेख लिखा तो लिखा, लेकिन इसे चेपने से पहले वायर वालों को अपनी आर्काइव तो देख लेनी चाहिए थी। अभी खाली साल भर पहले कोबरापोस्ट के एक तथाकथित ‘स्टिंग’ के भरोसे वायर वालों ने टाइम्स ग्रुप को मोदी का ‘पिट्ठू’ घोषित कर दिया था। और अब उसी टाइम्स ग्रुप, जो आपकी खबर के हिसाब से मोदी की जेब में था, का मोदी ने ‘जेब खर्च’ रोक दिया? ऐसे तो अभी तक खुद मोदी को अम्बानी की जेब में बताने के बाद क्या कल वायर यह भी छाप देगा कि अंबानी ने मोदी को “10 लाख का सूट” पहनने के लिए भी पैसा देना बंद कर दिया है? कम-से-कम प्रोपेगंडे में तो निरंतरता बनाए रखते!

पत्रकारिता के समुदाय विशेष, और उसमें भी खास कर कि वायर वालों, को यह समझने में और कितना समय लगेगा कि जनता उनके ‘हिट जॉब’ को पत्रकारिता और नहीं मानेगी? प्रोपेगेंडा-पर-प्रोपेगेंडा फैलाते रहना, बार-बार पकड़े जाते रहना, शर्मिंदा होना- अगर यही बिज़नेस मॉडल है तो बात दूसरी है, वरना वायर वालों को बाज आ जाना चाहिए।

14 साल के लड़के के मुँह में डाला तेज़ाब, तीन आरोपितों में से नूर गिरफ़्तार

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में एक 14 साल के लड़के के मुँह में ज़बरदस्ती तेज़ाब डालने की ख़ौफ़नाक वारदात को अंजाम दिया गया। तेज़ाब मुँह में जाने से उसकी बोलने की क्षमता अभी के लिए ख़तम हो गई है। फ़िलहाल, नाबालिग को लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

दरअसल, यह दर्दनाक घटना गुरुवार (27 जून) की है, जब पीड़ित के परिजन शिक़ायत दर्ज कराने पुलिस स्टेशन पहुँचे। बुधवार (26 जून) की सुबह वो नाबालिग किसी काम के लिए सुबह घर से निकला था। लेकिन, जब वो दोपहर को घर वापस आया तो वो दर्द से तड़प रहा था। उसने चेहरे को एक कपड़े से ढका हुआ था। ऐसी गंभीर हालत में परिजन उसे तुरंत अस्पताल ले गए, जहाँ डॉक्टर्स ने बताया कि तेज़ाब की वजह से उसके चेहरे पर जलने के कई घाव हो गए हैं। डॉक्टर्स ने नाबालिग को ख़तरे से बाहर तो बता दिया, लेकिन उसकी वोकल कॉर्ड और बात करने की क्षमता को किस हद तक हानि पहुँची है, इस पर वो कुछ नहीं बता सके। 

जब यह मामला पुलिस तक पहुँचा तो पीड़ित ने इशारे से तीन बदमाशों की हरक़त के बारे में बताया कि कैसे उन्होंने उसके मुँह में ज़बरदस्ती तेज़ाब डाल दिया। काफ़ी प्रयास करने पर पीड़ित ने उनमें एक का नाम नूर बताया। फ़िलहाल वो पुलिस की हिरासत में है। पुलिस ने बताया, “हम अभी भी हमले के मक़सद को नहीं जानते हैं क्योंकि नूर इसमें शामिल होने से इनकार कर रहा है।” 

ख़बर के अनुसार, पीड़ित की माँ ने आरोप लगाया कि उनके बेटे पर यह हमला उस वक़्त हुआ जब उसने बदमाशों को नशीले पदार्थों की आपूर्ति करने से मना कर दिया था। उन्होंने दावा किया कि इस काम को करने के लिए कई अन्य युवाओं ने भी उनके बेटे पर दबाव बनाया था।

‘भगवाकरण’ से परेशान मोदी-शाह ने लिया ऐतिहासिक निर्णय: इंद्रधनुष, तिरंगे से हटाया जाएगा भगवा

विपक्ष के पास आजकल मुद्दों की इतनी कमी हो गई है कि उनका पूरा विमर्श अब ‘सेफ्रनाइजेशन’, यानी भगवाकरण, पर आ कर ठहर गया है। अब गाजर के हलवे को ‘सॉफ्ट शेड ऑफ सैफ्रन’ कहने से ले कर भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी तक में भाजपा और संघ का हस्तक्षेप बताने की बातें अत्यंत गंभीर और ‘डर का माहौल’ वाले चेहरे के साथ की जा रही है।

हाल ही में कॉन्ग्रेस ने, जो आजकल इस्तीफों की बारात बना कर, चूहों की तरह अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा डूबते जहाज को छोड़ने के कारण पार्टी में व्याप्त अराजकता संभालने में व्यस्त है, देश को नया विमर्श देने की कोशिश की जब उन्हें पता चला कि भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड के खिलाफ नारंगी रंग की जर्सी पहन कर खेलने उतरेगी। उसके बाद उन्होंने खूब बवाल काटा कि क्रिकेट टीम में भी अब भगवा घुस रहा है।

इनके समर्थक, जी, आज के डेट में भी कॉन्ग्रेस के समर्थक धरती पर हैं, सोशल मीडिया पर पिल पड़े कि ‘हाँ, सब कुछ सैफ्रन हो रहा है। देश को बर्बाद किया जा रहा है। ये सब नहीं चलेगा। मोदी हर चीज को भगवा बनाने के चक्कर में है।’ चूँकि, समर्थक कॉन्ग्रेस के हैं तो उनसे यह आशा करना गलत है, और शायद असंवैधानिक भी, कि वो आईसीसी के नए नियम पढ़ें, या नीली जर्सी को गौर से देखें कि उसमें देश का नाम, खिलाड़ी का नाम और उनके नंबर सहित कॉलर आदि का रंग क्या है। आम तौर पर जो कलर स्कीम होती है, उसी को उलट दिया जाता है, अगर आपको दो जर्सी रखनी हो तो।

उच्चस्तरीय बैठक में हुआ ऐतिहासिक फैसला

यह बात अब छिपी हुई नहीं है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, जो कि अब गृह मंत्री भी हैं, और नरेन्द्र मोदी, जो कि आजकल 2.0 में चल रहे हैं, उनका एकसूत्री अजेंडा देश ही नहीं कॉन्ग्रेस तक को कॉन्ग्रेस मुक्त करने का है। इसी संदर्भ में गुप्त सूत्रों के अनुसार, जो कि हमारे पास बहुतायत हैं, पता चला है कि कल शाम एक उच्चस्तरीय बैठक में भाजपा के आलाकमान ने एक निर्णय लिया है। हमारे सूत्रों ने बहुत देर तक यह नहीं बताया कि निर्णय क्या लिया गया है क्योंकि मोदी जी ने कहा कि वो खुद ही अनाउंस करेंगे, फेसबुक लाइव के जरिए।

मीटिंग में कॉन्ग्रेस समेत, तमाम विपक्ष आजकल जिस शब्द के पीछे छिप कर भाजपा पर वार करना चाहता है, उस शब्द और संदर्भ को ही गायब करने की बात हुई। इन विचारकों, उठौना लगा कर पाव भर आउटरेज हर दिन करने वाले फेसबुकिया बुद्धिजीवियों, और मोदी विरोधियों को एस साथ पटकने के लिए मोदी जी ने, इन असोसिएशन विद अमित शाह, यह फैसला लिया कि भारत से भगवा रंग को ही गायब कर दिया जाएगा।

मोदी जी ने ऑपइंडिया को दिए गए एक अप्रकाशित एवम् अप्रचारित इंटरव्यू में बताया, “जब मीटिंग चल रही थी तो मैंने बीच में ही कहा अगर भगवा रंग ही खत्म कर दिया जाए तो ये लोग किस बात पर घेरेंगे? फिर मैंने मीटिंग में मौजूद लोगों को कहा कि ये तो देशहित का सवाल है क्योंकि अगर भगवा वाला मुद्दा गायब हो जाएगा तो हो सकता है विपक्ष अपनी जिम्मेदारी भी निभाने लगे। तो राजनाथ सिंह जी ने बिना कड़ी निंदा किए कहा, ‘वाह मोदी जी वाह, एक ही दिल है कितनी बार जीतोगे।’ फिर मैंने उनको बताया कि डिफेंस से आगे आपके लिए जगह नहीं है, चिल कीजिए। आप बताइए, उन्हें चिल करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए।”

कैसे हटाया जाएगा भगवा रंग

उच्चस्तरीय बैठक में यह निर्णय लिया गया कि शुरुआत तो अजय देवगन से की जाएगी क्योंकि उन्होंने देश के हर व्यक्ति की जुबाँ केसरी करने की कसम खा रखी है। गुप्त सूत्रों ने बताया है कि अब से विमल गुटखा (सॉरी, पान मसाला -एक आँख वाली स्माइली) अपने विज्ञापनों में ‘जुबाँ हरी हरी’ कहेंगे और अजय देवगन के मुँह से हरे रंग का द्रव गिरता नजर आएगा। साथ ही, राजस्थानियों का ‘केसरिया बालम’ अब ‘हरिया बालम’ या ‘करिया बालम’ के नाम से पधारने को कहा जाएगा। ऐसी सारी ग़ज़लों को उनके गायकों की कब्रों पर बैठ कर कोक स्टुडिओ वालों से रिकॉर्ड कराया जायेगा।

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि पूरे देश में पुलिस को कहा गया है कि आने वाले दिनों में रातों-रात छापे मार कर केसरिया, भगवा, नारंगी, हल्का भगवा, बहुत हल्का भगवा, एकदम हल्का भगवा, गहरा भगवा, बहुत ज़्यादा गहरा भगवा आदि रंग बनाने वाले कारखानों से रंग जब्त कर लें। उन्हें या तो फेंक दिया जाएगा या फिर उनमें काला रंग मिला कर कोई और रंग बनाया जाएगा ताकि यह न कहा जाए कि मोदी सरकार ने गरीब फैक्ट्री वाले का काम खराब कर दिया।

आगे बताया गया कि नारंगी के फलों को पकने से पहले ही तोड़ लिया जाएगा ताकि वो बाहर से हरे और भीतर से सफेद ही दिखें और देश की सेकुलर फैब्रिक टाइट बनी रहे। नागपुर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय शिफ्ट करके वायनाड कर दिया जाएगा और उनके झंडे का रंग गहरा हरा होगा जो देश की हरियाली और किसानों की फसलों से प्रेरित होगा। साथ ही, संघ की एक शाखा देवबंद में भी स्थापित की जाएगी।

इन्द्रधनुष देखने के लिए दिए जाएँगे इसरो प्रदत्त चश्मे

मीटिंग के दौरान किसी ने याद दिलाया कि इन्द्रधनुष के ‘बैनीआहपिनाला’ में जो ‘ना’ है, वो तो नारंगी के लिए है, उससे कैसे निजात पाई जाएगी। इस पर गिरिराज सिंह जी ने कहा कि बारिश बंद करा दी जाएगी, तो इन्द्रधनुष बनेगा ही नहीं। लोगों ने देर तक उन्हें देखा और किसी ने कुछ नहीं कहा। फिर किसी ने सुझाया कि सरकार इसरो से कह कर ऐसे चश्मे बनवाए जिसे पहनने के बाद नारंगी रंग हरे जैसा दिखे। उसके बाद पाठ्यक्रम में भी बदलाव किए जाएँगे ताकि बच्चों को पता ही न चले कि इन्द्रधुनष में छठा रंग कौन सा होता है।

तिरंगा अब होगा दोरंगा

इसी बात पर जब भाजपा का थिंकटैंक, जो आप मानें या न मानें, अस्तित्व में है, विचार करते-करते इस बात पर आया कि भारत का झंडा भी तो एक तिहाई केसरिया है, उसका क्या किया जाए! बात देशहित की थी क्योंकि विरोधियों को सिवाय सैफ्रनायजेशन के कुछ सूझ नहीं रहा था तो सुझाव दिया गया कि संविधान संशोधन के ज़रिए झंडा बदल दिया जाएगा।

किसी ने कहा कि झंडे में से केसरिया हटा दिया जाएगा तो झंडा पतला हो जाएगा, फिर सुझाव दिया गया कि नीचे के हरे रंग को ही ऊपर भी रख लिया जाएगा ताकि सिमेट्री भी बरकरार रहे। साथ ही, हरा तो वैसे भी सेकुलर कलर है, तो आसानी से राज्यसभा और लोकसभा में भी विरोधी पार्टयों के सासंदों से स्वीकृति मिल जाएगी, ऐसा माना गया।

भाजपा समर्थकों ने कहा ‘ये होती है असली राष्ट्रवादी सरकार’

भाजपा के समर्थकों ने लोकसभा चुनाव के बाद इस कदम को नोटबंदी और जीएसटी सदृश राष्ट्रवादी कदम बताते हुए खुशी की लहर का संचार फील किया और मुख्यालय के बाहर लड्डू बाँटते एवं डीजे पर नाचते दिखाई दिए। इसकी विशेष कवरेज एनडीटीवी के महान पत्रकार रवीश कुमार ने की लेकिन वो आदतानुसार बहुत ही नाखुश दिखे। हमने उनसे बिना पूछे ही अंदाजा लगा लिया कि वो इस बात से नाराज होंगे कि भाजपा नेता तो छोड़िए, भाजपा समर्थक भी उनके मुँह नहीं लगना चाहते।

देवलसारी, गढ़वाल, से पैदल चल कर नाचने आए आशीष नौटियाल नामक एक समर्थक ने मुझसे निजी बातचीत करते हुए चुपके से बताया, “देखिए अजीत जी, मोदी जी जो हैं वो एक विजनरी आदमी हैं। विजनरी का मतलब होता है दूरद्रष्टा। उन्हें पता है कि राष्ट्रीय झंडे से तो कॉन्ग्रेसियों को वैसे भी कुछ लेना-देना है नहीं, उन्होंने बस झंडे के नाम पर देश को लूटा ही है। लोगों को पागल बनाने के लिए इन्होंने पार्टी के झंडे तक में तिरंगा घुसा दिया और कालांतर में बैलों से लेकर गाय-बछड़ा तक करते रहे हैं। इसलिए अमित चाणक्य शाह ने ये मास्टरस्ट्रोक खेला है कि ये जो भगवाकरण-सैफ्रनाइजेशन चिल्लाते हैं, इनसे ये भी छीन लिया जाए।”

एक लड्डू मेरी तरफ बढ़ा कर, मेरे लेने से पहले ही खुद खाते हुए, नौटियाल जी ने बात जारी रखी, “विरोधी बस किसी भी बात से विरोध करना चाहते हैं। इसलिए, इनके बेकार वाले मुद्दों को खत्म कर दिया जाए तो क्या पता ये पानी, सड़क, बिजली जैसे मुद्दों पर बात करने लगें। इसी कारण मुझे मोदी जी बहुत प्रिय हैं।”

जल्द ही लागू हो जाएगी यह योजना

सूत्र बताते हैं कि यह योजना जल्द ही लागू की जाएगी ताकि विपक्षी पार्टियों की नौटंकी बंद हो और राष्ट्रीय मुद्दों पर बात हो सके। कपड़ों की मिलों के मालिकों को कहा गया है कि या तो रंग फेंक दें या फिर अमित शाह पर्सनली उनके रंग के हौज में काला रंग फेंक कर भाग जाएँगे। बच्चों की किताबों पर अब भगवा से मिलते जुलते रंग की जिल्द नहीं लग सकेगी और टैंग से लेकर ऑरेंज फ्लेवर के ग्लूकोन-डी टाइप के पेय पदार्थ नींबू फ्लेवर में ही आएँगे।

आगे जैसे-जैसे हमें सूचना मिलेगी, हम आप तक पहुँचाते रहेंगे।

जय हिन्द, जय भारत, जय भारती