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मध्य प्रदेश: SP दफ्तर के सामने युवक ने खुद को पेट्रोल डालकर जलाया, हालत गंभीर

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में एक युवक ने कल (जुलाई 8, 2019) एसपी दफ्तर के बाहर खुद को आग के हवाले कर मारने की कोशिश की। व्यक्ति की पहचान 25 वर्षीय कन्हैयालाल अग्रवाल के रूप में हुई है।

जानकारी के अनुसार उसे उसका पड़ोसी अमन दुबे लंबे समय से मोटरसाइकिल चोरी के मामले में फँसाने की धमकी देकर उससे पैसे ऐंठने की कोशिश कर रहा था। इस संबंध में उसने (कन्हैया) पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी, लेकिन पुलिस उसकी शिकायतों पर कार्रवाई नहीं कर रही थी।

ऐसे में 25 वर्षीय कन्हैया ने सोमवार की दोपहर परेशान होकर एसपी कार्यालय के बाहर लगे एक पेड़ के नीचे खुद पर पेट्रोल डालकर आग लगा ली। आग से झुलस रहे युवक को कार्यालय के पुलिसकर्मियों ने आग बुझाकर बचाया और जिला अस्पताल पहुँचाया। यहाँ सीएसपी और सिविल लाइन टीआई ने न्यायिक बयान दर्ज किए।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार कन्हैया 90 प्रतिशत जल चुका है, उसकी हालत बेहद गंभीर बनी हुई है। अस्पताल में उसका ईलाज चल रहा है। इलाके के एसपी शुक्ला ने मामले में बताया है कि सराणी निवासी दुबे (35 वर्ष) पर इस मामले में मुकदमा दर्ज हुआ है, जिसके चलते उसकी गिरफ्तारी का प्रयास किया जा रहा है।

कन्हैया के पिता ने मीडिया से बातचीत की। उनके मुताबिक कुछ दिन पहले उनके पड़ोसी दुबे परिवार की एक बाइक चोरी हो गई थी, जिसका संदेह उनके पड़ोसियों को कन्हैया पर था। इसी के चलते कन्हैया का पड़ोसी अमन उसकी 4 दिन से तलाश भी कर रहा था।

कन्हैया के परिवार को इसका पता चलते ही वे सभी मारपीट के डर से अपने घर का ताला लगाकर रिश्तेदार के घर छुपे थे। लेकिन सोमवार को कन्हैया, अमन से बचने के लिए एसपी तिलक सिंह के पास शिकायत दर्ज कराने पहुँचा। जहाँ मौजूद पुलिसकर्मी ने उसे एसपी से मिलवाने की बजाय 4 बजे के बाद आने की बात की कही। कुछ समय कन्हैया वहीं खड़ा रहा, लेकिन थोड़ी देर बाद उसने परेशान होकर खुद को आग के हवाले कर दिया।

‘MP कॉन्ग्रेस की सरकार अपने-आप गिर जाएगी, कर्नाटक जैसी स्थिति’, कमलनाथ ने कहा- MLA भोपाल में ही रहें

कर्नाटक की सत्ताधारी गठबंधन के भीतर चल रही उठापटक के बीच मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार को भी डर सताने लगा है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने विधानसभा सत्र के दौरान सभी कॉन्ग्रेस विधायकों को भोपाल में ही रहने को कहा है। इस बीच मध्य प्रदेश भाजपा ने भी अपने विधायकों को कर्नाटक के घटनाक्रम पर निगाह बनाए रखने को कहा है। भाजपा नेताओं ने कहा कि कर्नाटक की तर्ज पर मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार गिरने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। भाजपा नेताओं की बैठक में एक ‘छाया मंत्रिमंडल’ बनाया गया, जो कमलनाथ सरकार के सभी विभागों पर नज़र रखेगा।

इस बैठक में उन सभी मुद्दों पर चर्चा की गई, जिससे कॉन्ग्रेस को मध्य प्रदेश में भाजपा से सत्ता हथियाने में सफलता मिली थी। इसके अलावा पुराने मुद्दों पर भी चर्चा की गई, जिनके कारण भाजपा यहाँ कई वर्षों से काबिज़ थी। राज्य में विपक्ष के नेता गोपाल भार्गव ने कहा,

“कॉन्ग्रेस की सरकार अपने-आप गिर जाएगी। लोकसभा चुनाव से पहले जब राज्य में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी, तब लोगों को लगा था कि पार्टी अपने सारे वादे पूरी करेगी। लेकिन, इस मामले में कॉन्ग्रेस पूरी तरह फेल हो गई और यही कॉन्ग्रेस की बुरी हार का कारण भी बना। भाजपा सरकार गिराने की कोशिश नहीं करेगी लेकिन कर्नाटक में जो हो रहा है, उसके यहाँ भी होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।”

भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेताओं को नए विधायकों का मार्गदर्शन करने को कहा है ताकि वे कॉन्ग्रेस सरकार के मंत्रियों द्वारा किए जा रहे कार्यों में कमी निकाल सकें और उन्हें जनता के बीच रख सकें। भाजपा ने कॉन्ग्रेस की क़र्ज़माफ़ी, सभी को सस्ती बिजली, किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य देने और ग़रीबों को घर देने सम्बन्धी वादों की पड़ताल करने के लिए कमर कस लिया है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने राज्य की क़ानून व्यवस्था पर सरकार को घेरते हुए कहा कि ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ता भाजपा की मजबूती हैं और वो जनता को इन सारी बातों से अवगत कराएँगे।

वेबदुनिया की ख़बर के मुताबिक़, कॉन्ग्रेस ने अपने मंत्रियों को राज्य में विधायकों को एकजुट रखने की जिम्मेदारी सौंपी है। हर एक मंत्री को तीन-तीन विधायकों की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा विधायकों को भाजपा के प्रलोभन से दूर रहने की सलाह दी गई है। कमलनाथ ने विधायकों को सदन में रहने को कहा। कमलनाथ ने अपने विधायकों को आक्रामक रुख अख्तियार करने की सलाह देते हुए सदन में आकाश विजयवर्गीय द्वारा निगम अधिकारी की बल्ले से पिटाई वाला मामला उठाने को कहा।

बता दें कि कर्नाटक में कई विधायकों के इस्तीफे के बाद अब सभी मंत्रियों ने भी इस्तीफा दे दिया है। दोनों ही दलों के विधायकों के विभिन्न रिसॉर्ट्स में ठहराए जाने की बातें सामने आ रही हैं। पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने कहा कि भाजपा अभी ‘वेट एंड वॉच’ की रणनीति पर काम कर रही है। लोकसभा में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस घटनाक्रम में भाजपा का हाथ होने से इनकार करते हुए कटाक्ष किया कि कॉन्ग्रेस में इस्तीफों का चलन तो पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी ने ही शुरू किया है।

एयर इंडिया के फ्लाइट्स में हज यात्री नहीं ला सकेंगे जमजम का पानी, हज कमिटी ने जताई आपत्ति

एयर इंडिया ने जेद्दाह से आने वाली फ्लाइट्स में यात्रियों द्वारा जमजम का पानी लेकर आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। एयर इंडिया ने सभी ट्रेवल एजेंट्स और हज यात्रियों को इस बात की जानकारी दे दी है कि 15 सितम्बर तक जेद्दाह-हैदराबाद-मुंबई और जेद्दाह-कोचीन फ्लाइट्स में जमजम का पानी लेकर आना प्रतिबंधित रहेगा। एयर इंडिया के इस नोटिस पर कई हज यात्री और ट्रेवल एजेंट्स ने आपत्ति जताई है। यह नोटिस एयर इंडिया के जेद्दाह ऑफिस द्वारा जारी किया गया है।

एयर इंडिया के इस पत्र में कहा गया है, “एयरक्राफ्ट में बदलाव और सीटों की सीमित संख्या के कारण हम जमजम का पानी वाले डब्बों को फ्लाइट में लाने की अनुमति नहीं दे सकते।” इसके बाद कई हज यात्रियों ने कॉन्ग्रेस विधायक अमीम पटेल से मामले में हस्तक्षेप करने की माँग की। अमीम पटेल महाराष्ट्र के मुम्बादेवी से लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए हैं। पटेल ने नागर विमानन मंत्रालय और अल्पसंख्यक मामले मंत्रालय को पत्र लिख कर स्थिति से अवगत कराया है।

पटेल ने मंत्रालय को लिखे पत्र में माँग की है कि हज यात्रा से लौटने वाले यात्रियों के लिए जमजम के पानी की व्यवस्था की जाए। उन्होंने कहा, “जमजम एक पवित्र जल है, इसका कुछ मज़हबी महत्त्व है। यह इतना पवित्र है कि इससे बीमारियों तक के ठीक होने की बात सामने आती है। हज यात्रियों को जमजम का पानी लेकर आने की अनुमति मिलनी चाहिए।” टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, एयर इंडिया के एक सूत्र ने इस तस्दीक की है कि कम्पनी का यह नोटिस सही है। एक ट्विटर हैंडल ने उससे जुड़ा पत्र ट्वीट किया:

भारतीय हज कमिटी के अध्यक्ष एएम ख़ान ने कहा कि एयर इंडिया सभी हज यात्रियों को अपने साथ 5 लीटर के डब्बे में जमजम का पानी लेकर आने देने को बाध्य है क्योंकि यह हज कमिटी और एयर इंडिया के बीच हुई करार का हिस्सा है। जमजम जल स्रोत के बारे में इस्लाम में मान्यता है कि हज़ारों वर्ष पहले जब इब्राहिम का नन्हा बेटा इस्माइल अपनी माँ के साथ रेगिस्तान में फँस गया था, तब अल्लाह ने उन्हें जमजम के रूप में पानी दिया। यह जलस्रोत सऊदी अरब स्थित मक्का के मस्जिद अल-हरम में स्थित है।

7वीं कक्षा की छात्रा का अपहरण और बलात्कार, आरोपित अब्दुल्ला और मेजान अंसारी गिरफ़्तार

झारखण्ड के साहिबगंज में एक सातवीं वर्ग की छात्रा के साथ बलात्कार करने का मामला सामने आया है। पुलिस इस मामले की जाँच-पड़ताल में लगी हुई है। दैनिक जागरण में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, छात्रा जब स्कूल जा रही थी, तभी स्कॉर्पियो से जा रहे कुछ बदमाशों ने उसे उठा लिया। अपहरण करने के बाद उसके साथ बलात्कार किया गया।

पीड़िता के परिजनों ने पुलिस थाना पहुँच कर मामले की शिकायत दर्ज कराई है। इस मामले में पुलिस ने दो आरोपितों को गिरफ़्तार किया है। गिरफ़्तार आरोपितों अब्दुल्ला और मैजान अंसारी से पूछताछ की जा रही है। अपहरण के लिए इस्तेमाल की गई स्कॉरपियो गाड़ी को भी पुलिस ने जब्त कर लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़िता के पिता ने ही आरोपितों को धर-दबोचा और फिर उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया।

छात्रा के पिता ने बताया कि इस दौरान आरोपितों के साथ उनकी हाथापाई भी हुई। पीड़िता के साथ उक्त घटना तब हुई, जब वह साइकिल से स्कूल पढ़ने जा रही थी। जब गाड़ी में उसके साथ बलात्कार किया जा रहा था, तब उसके लाख चीखने-चिल्लाने के बावजूद उसकी आवाज़ बाहर नहीं पहुँच पा रही थी। पीड़िता के पिता ने गाड़ी का शीशा तोड़ कर आरोपितों को पकड़ा। अभी तक पीड़िता का मेडिकल टेस्ट नहीं हुआ है।

ब्वॉयफ्रेंड अमानुल्लाह ने 8 साथियों संग 16 साल की लड़की से किया गैंगरेप, सभी गिरफ़्तार

टाइम्स ऑफ इंडिया की ख़बर के अनुसार, तमिलनाडु के कोयंबटूर ज़िले के पोलाची के बाहरी इलाक़े में 16 साल की नाबालिग लड़की से बलात्कार के आरोप में नौ आरोपितों को महिला पुलिस की टीम ने गिरफ़्तार किया।

ख़बर के मुताबिक़, पोलाची पुलिस ने जिन नौ आरोपितों को गिरफ़्तार किया है उनमें- ए अमानुल्लाह, मोहम्मद आशिफ़, ए मोहम्मद रफ़ीक, जे सैयद इब्राहिम, ए मोहम्मद अली, के डेविड उर्फ़ ​​सेंथिल कुमार, इरशाद बाशा, एस मोहम्मद ख़ान और एन अरुण नेहरू के नाम शामिल हैं। कथित रूप से कक्षा-10 में पढ़ने वाली नाबालिग का दो साल से बलात्कार कर रहा था। गुरुवार (4 जुलाई) को लड़की के लापता होने के बाद यह घटना सामने आई।

ख़बर के अनुसार, बलात्कार की इस घटना को तब अंजाम दिया गया जब नाबालिग अपने ब्वॉयफ्रेंड अमानुल्लाह से मिलने उसके निवास स्थान पर गई थी। पुलिस सूत्रों के अनुसार, सामूहिक बलात्कार उसके प्रेमी के निवास स्थान पर ही हुआ जहाँ वो उससे मिलने गई थी।

पुलिस ने कहा कि मुख्य आरोपी अमानुल्लाह ने उसे अपने प्यार के जाल में फँसाया और फिर बाद में अपने दोस्त के साथ मिलकर उसने सामूहिक बलात्कार की घटना को अंजाम दिया। इसके अलावा अमानुल्लाह ने नाबालिग को धमकाया था कि वो इस घटना का ज़िक्र वो किसी से न करे, वरना इसके लिए उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

पीड़िता ने पुलिस को बताया कि नौ लोगों ने मिलकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। पुलिस ने इस बात की भी जानकारी दी कि घटना के बाद से प्रभु नाम का एक शख़्स वहाँ से फ़रार हो गया।

अधिकारी ने बताया कि गुरुवार को, अमानुल्लाह नाबालिग लड़की को गाँव से लेकर आया और अपने दोस्त बागवथी के साथ बलात्कार किया। जब लड़की ने उसे घर छोड़ने का अनुरोध किया, तो दोनों ने इनकार कर दिया और फिर अपने दोस्त प्रभु को बुलाया और उसने भी लड़की का बलात्कार किया। नाबालिग के रिश्तेदारों को इस घटना के बारे में तब पता चला जब वह शुक्रवार (5 जुलाई) को लौटी। घर लौटने के बाद परिजनों ने पोलाची महिला पुलिस से सम्पर्क किया।

पुलिस ने बताया कि आरोपितों के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 366 (ए) और POCSO अधिनियम के तहत सामूहिक बलात्कार का मामला दर्ज कर लिया गया है।

पुरी रथयात्रा: लाखों की भीड़ के बीच से भी वॉलिंटियर्स ने ऐम्बूलेंस के लिए रास्ता बना पेश की मिसाल, देखें VIDEO

ओडिशा के पुरी में रथयात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की काफ़ी भीड़ उमड़ती है। भक्तों की इस भीड़ में पाँव रखने की जगह बड़ी मुश्किल से बन पाती है। ऐसी तंग स्थिति में भी भक्तों ने एक ऐसी मिसाल पेश की जिसकी जितनी तारीफ़ की जाए वो कम ही होगी।

दरअसल, सोशल मीडिया पर इस रथयात्रा का एक वीडियो शेयर किया गया है। इसमें 1200 वॉलिंटियर्स द्वारा ऐम्बूलेंस के लिए ऐसा नायाब रास्ता बनाया गया जिससे रथयात्रा के दौरान वहाँ से गुज़रने वाले मरीज़ों को किसी भी तरह की तकलीफ़ का सामना ना करना पड़े।

इस वीडियो को पुरी के एसपी ने ख़ुद ट्विटर पर शेयर किया। उन्होंने लिखा, “1200 वॉलिंटियर्स, 10 संगठनों और घंटों की मेहनत के बाद रथयात्रा 2019 के दौरान ऐम्बुलेंस की सरल गतिविधि के लिए ह्युमन कॉरिडोर बनाना संभव हो पाया।”

ग़ौरतलब है कि हर साल आषाढ़ माह में भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र की रथयात्रा का आयोजन किया जाता है। यह रथयात्रा उनकी मौसी के घर गुंडीचा मंदिर तक पहुँचती है जहाँ अगले 9 दिनों तक उनके दर्शन करने देश-विदेश से भक्तजन आते हैं।

सोशल मीडिया पर यह वीडियो काफ़ी तेज़ी से वायरल हो रहा है। ट्विटर यूज़र्स ने वॉलिंटियर्स के इस अनोखे अंदाज़ की जमकर तारीफ़ की।

मानहानि मामले में केजरीवाल और सिसोदिया को कोर्ट ने जारी किया समन, ₹1 करोड़ का दावा

भाजपा नेता विजेंद्र गुप्ता द्वारा दायर किए गए मानहानि मामले में दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने सोमवार (जुलाई 8, 2019) को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ समन जारी किया। कोर्ट ने दोनों को 16 जुलाई को पेश होने का आदेश दिया है। विपक्षी पार्टी बीजेपी के नेता विजेंद्र गुप्ता ने मानहानि मामले में केजरीवाल और सिसोदिया के उपर मानहानि का केस फाइल किया था जिस पर कोर्ट ने उन्हें समन जारी किया है। इसके साथ ही मुआवजे के तौर पर ₹1 करोड़ का दावा किया गया है।

विजेंद्र गुप्ता द्वारा ये केस 4 जून को दर्ज कराया गया था। उन्होंने कहा था कि ये आरोप ना सिर्फ झूठे हैं, बल्कि इससे उनका नाम खराब करने की भी कोशिश की जा रही है। इससे उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा धूमिल हुई है। केस में गुप्ता ने कहा कि वे किसी को जाने या अनजाने में भी चोट पहुँचाने के बारे में नहीं सोच सकते हैं, फिर केजरीवाल की हत्या की साजिश रचना तो बहुत दूर की बात है। गुप्ता ने आगे ये भी कहा कि ये दोनों मिलकर हमारा नाम और छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। इस तरह के झूठे आरोप लगाकर वो उनकी और उनकी पार्टी की छवि खराब करने का प्रयास कर रहे हैं। इस मामले पर इससे पहले 6 जुलाई को सुनवाई हुई थी।

गौरतलब है कि, लोकसभा चुनाव के दौरान केजरीवाल ने एक चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि बीजेपी उनकी हत्या करवाना चाहती है। उनके (केजरीवाल) सुरक्षाकर्मी बीजेपी को रिपोर्ट करते हैं और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की तरह उनके सुरक्षाकर्मी भी बीजेपी के इशारे पर उनकी हत्या कर सकते हैं। केजरीवाल के इस आरोप पर जब विजेन्द्र गुप्ता ने ट्वीट कर उनका विरोध किया, तो मनीष सिसोदिया ने पलटवार करते हुए विजेन्द्र गुप्ता पर भी केजरीवाल की हत्या की साजिश में शामिल होने का आरोप लगा दिया था।

इसके बाद विजेंद्र गुप्ता ने केजरीवाल और सिसोदिया को कानूनी नोटिस भेजकर उनसे माफी माँगने के लिए कहा था, लेकिन केजरीवाल और सिसोदिया दोनों में से किसी ने भी विजेंद्र द्वारा भेजे गए कानूनी नोटिस का जवाब नहीं दिया। दोनों नेताओं की तरफ से किसी तरह का कोई जवाब न मिलने पर विजेंद्र गुप्ता ने कोर्ट में दोनों पर मानहानि का मुकदमा कर दिया था।

सबा नकवी और ट्रिब्यून वालो, जब से तुम पैदा हुए हिन्दुओं का इतिहास तभी से शुरू नहीं होता

आजकल वे लोग भी राम और रामायण के विशेषज्ञ बन गए हैं, जिन्हें शायद इससे पहले राम के अस्तित्व पर ही विश्वास नहीं था। आज कुछ पत्रकार अपने वरिष्ठता के दौर में श्रीराम के बारे में गोस्वामी तुलसीदास से भी अधिक ज्ञान होने का दिखावा कर रहे हैं। इसी क्रम में ‘ट्रिब्यून इंडिया’ के लिए लिखे गए सबा नक़वी का एक लेख भी आया है जिसमें कहा गया है कि ‘जय श्री राम’ से मर्दवाद की बू आती है लेकिन ‘जय सिया राम’ एक अच्छा नारा था। नक़वी का मानना है कि ‘जय सिया राम’ से एक स्त्रीवाद की विनीत झलक आती थी, जो अच्छा था।

नक़वी ने इसके बाद ‘जय श्री राम’ का इतिहास समझाना शुरू किया है और उसे बड़ी चालाकी से लालकृष्ण आडवाणी के मंदिर आंदोलन से जोड़ कर बात की शुरुआत की है। सबा नक़वी के खोखले इतिहास-ज्ञान की बखिया उधेड़ते हुए हम आगे बढ़ेंगे लेकिन उससे पहले जरा उनके शब्द-ज्ञान पर बात करते हैं। असल में ‘जय श्री राम’ (जो कि नक़वी के अनुसार मर्दवादी है) और ‘जय सिया राम’ (जो नक़वी के अनुसार स्त्रीवादी है) के बीच बस एक शब्द का फ़र्क़ है। एक नारे में ‘श्री’ है तो दूसरे में उसकी जगह ‘सिया’ है। शायद नक़वी को पता नहीं है कि ये दोनों शब्द इंटरचेंजेबल हैं।

हिन्दू धर्म ग्रंथों में और संस्कृत में लक्ष्मी को वैभव, धन और समृद्धि की देवी माना गया है। जैसा कि रामचरितमानस में वर्णन है, सीता भी लक्ष्मी की ही रूप थीं और जिस तरह भगवान विष्णु ने राम के रूप में धरती पर अवतार लिया था, लक्ष्मी ने सीता के रूप में धरती पर क़दम रखा। लक्ष्मी के कई नामों से एक नाम श्री भी है। इसीलिए ‘जय श्री राम’ कहा जाए या फिर ‘जय सिया राम’- दोनों का अर्थ एक ही निकलता है। दोनों में ही सीता और राम की जय कही गई है। सीता को ‘सिया’ कहा जाए या फिर ‘श्री’- दोनों एक ही बात है।

भगवान विष्णु के कई नामों में से एक श्रीपति भी है। रामचरितमानस के बालकाण्ड में भगवान विष्णु के बारे में कहा गया है– “दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी॥ ” जैसा कि आप देख सकते हैं, इस चौपाई में विष्णु को ‘श्रीपति’ कहा गया है, अर्थात श्री के पति। यहाँ श्री और लक्ष्मी पर्यायवाची हैं। ठीक इसी तरह, ‘जय श्री राम’ में भी राम से पहले श्री यानी सीता का नाम लिया गया है। स्त्री को सम्मान देते हुए सीता का नाम पहले रखा गया है और सबा नक़वी को इससे मर्दवाद की बू आ रही है। इन्होने असल में न तो कभी रामायण के पन्ने पलटे हैं, न भारत के इतिहास की जानकारी है लेकिन ज्ञान देने में ये सबसे आगे रहतीं हैं।

आख़िर जिस स्लोगन में स्त्री को सम्मान दिया गया है, उसे मर्दवाद का चेहरा बना कर पेश करने वाली नक़वी रामायण क्यों नहीं पढ़तीं? अगर पढ़तीं नहीं तो इसके बारे में लिखती ही क्यों हैं? ‘श्री’ के रूप में सीता आक्रामकता का प्रतीक हो जाती है, वही ‘सिया’ के रूप में वो अच्छी लगने लगती है। ये कैसी अजीब बात है? क्या अब सबा नक़वी और ट्रिब्यून इंडिया यह तय करेगा कि हिन्दू अपने धर्मग्रंथों में से कौन सी चीजों को आत्मसात करें, किन चीजों का प्रयोग करें और किन चीजों को नज़रअंदाज़ करें? सबा नक़वी अब बताएँगी कि शिव को ‘महादेव’ कहना है या फिर ‘भोलेनाथ’?

सबा नक़वी हिन्दुओं को (राम जिनके आराध्य हैं) और भारत को (जहाँ की धरती के कण-कण में राम हैं) को इस बात की सलाह दे रही है कि राम का नाम कैसे और किस रूप में लेना है? क्या अब हिन्दू ‘कुरान शरीफ’ पढ़ कर सीखेंगे कि सीता और राम को किन नामों से पुकारा जाए? इनके हिसाब से ‘जय श्री राम’ नया स्लोगन है और इसके नाम पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है। वहीं ‘अल्लाहु अकबर’ के नाम पर हिंसा जायज है क्योंकि वह डेढ़ हज़ार वर्ष पुराना स्लोगन है।

अब सबा नक़वी के इतिहास-ज्ञान की ओर बढ़ते हैं और उससे पहले आपको बता देते हैं कि उन्होंने ‘जय श्री राम’ के इतिहास के बारे में क्या लिखा है? वह बात बाबरी मस्जिद से शुरू करती हैं। 1990 में लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर के निर्माण की माँग करते हुए सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा शुरू की थी। रास्ते में आडवाणी को तो गिरफ़्तार कर लिया गया लेकिन कार्यकर्ता आगे बढ़ते हुए अयोध्या पहुँचने में सफल रहे। सबा नक़वी लिखती हैं कि इसी आंदोलन के दौरान ‘जय श्री राम’ एक उत्तेजक और आक्रामक नारा बन कर उभरा। इसके बाद नक़वी ने 1998 के चुनाव प्रचार अभियान कवर करने की बात करते हुए ख़ुद की वरिष्ठता दिखाई है।

सबा नक़वी ने दावा किया है कि पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजेपयी ने सूरत में एक भाजपा कार्यकर्ता द्वारा ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने के बाद उसे पलट कर कहा था- “बोलते रहो जय श्री राम, और करो मत कोई काम“। इसके बाद नक़वी ने यह भी दावा किया है कि वाजपेयी भाजपा के ‘हिन्दू फर्स्ट’ वाली नीति से ख़ुश नहीं थे। ये तो रही दावों की बात। ये वही सबा नक़वी हैं, जिन्होंने एक बार दावा किया था कि ‘प्राइवेट बातचीत के दौरान’ वाजपेयी राम मंदिर आंदोलन के दौरान अपनाए गए तरीकों पर आपत्ति जताते थे। लेकिन, सबा नक़वी को यह जानना चाहिए कि वाजपेयी राम मंदिर के सबसे बड़े पैरवीकारों में से एक थे। बाबरी विध्वंस से एक दिन पहले लखनऊ में दिए गए भाषण में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था:

“वहाँ नुकीले पत्थर निकले हैं। उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता तो ज़मीन को समतल करना पड़ेगा, बैठने लायक करना पड़ेगा। यज्ञ का आयोजन होगा तो कुछ निर्माण भी होगा। कम से कम वेदी तो बनेगी। मैं नहीं जानता कल वहाँ क्या होगा?”

आज वाजपेयी को राम मंदिर के विरोधी बताने वाली सबा नक़वी कल को ये भी कह सकती हैं कि उन्हें भगवा रंग पसंद नहीं था। इसके बाद उन्हें वाजपेयी की कविता ‘गगन में लहरता है भगवा हमारा‘ सुनानी पड़ सकती हैं। माफ़ कीजिए, लेकिन दशकों तक भाजपा को काफ़ी नजदीक से कवर करने के बाद और कई लेख, कवर स्टोरी और पुस्तक लिखने के बाद भी अगर आप इस तरह की भ्रामक बातें करती हैं तो आपके इस मक्कारी भरे पत्रकारिता करियर को धिक्कार है। जहाँ सोशल मीडिया पर वाजपेयी के सार्वजनिक भाषण, कविताएँ और इंटरव्यू पड़े हों, वहाँ उनके ‘प्राइवेट कंवर्शेसन’ का ज़िक्र कर एक अलग तरह का नैरेटिव तैयार करना असहिष्णुता गिरोह के कुप्रयासों का हिस्सा है।

इसके बाद लेख में एक घुमाव आता है। यह घुमाव वहीं पहुँचता है, जहाँ इसके पहुँचने की आशंका थी। झारखण्ड में एक चोर की मॉब लिंचिंग की बात की जाती है, टैक्सी ड्राइवर को जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवाने की बात की जाती है और इस तरह की कुछ घटनाओं को गिना कर ‘जय श्री राम’ कितना उत्तेजक, आक्रामक और हिंसक है- इस पर प्रकाश डाला गया है। हालाँकि, सबा नक़वी ने कई ऐसी घटनाओं पर जानबूझ कर चुप्पी बनाए रखी है, जिनमें जबरन मुस्लिमों के ‘जय श्री राम’ बुलवाए जाने वाले कई आरोप ग़लत निकले। गुरुग्राम में यह आरोप ग़लत निकला। एक मौलवी का आरोप ग़लत निकला। एक अन्य मामले में तो एक मुस्लिम ने ही जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवाया।

चलिए, कुछ मिनट तक सबा नक़वी के इतिहास ज्ञान को दरकिनार कर यह मान ही लेते हैं कि ‘जय श्री राम’ का जन्म आज और इसी वक़्त हुआ है। लेकिन क्या अगर यह नया स्लोगन है तो ‘अल्लाहु अकबर’ कह कर कई जानें लेने वाले आतंकी सही साबित हो जाते हैं? 2-4 शरारती तत्व अगर किसी-किसी मामले में जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवा भी रहे हैं तो इस हिसाब से ‘अल्लाहु अकबर’ को तो प्रतिबंधित ही कर देना चाहिए क्योंकि कश्मीर से लेकर लंदन तक, इस नारे का आतंकियों द्वारा प्रयोग कर कई जानें ली गईं। ज्यादा पीछे नहीं जाते हैं, अगर ‘जय श्री राम’ आडवाणी की वजह से प्रचलित हुआ तो फिर 1987 में आई रामानंद सागर की ‘रामायण’में हनुमान बार-बार इसे दुहराते क्यों दिखते हैं?

क्या अब ये छद्म बुद्धिजीवी तय करेंगे कि हम सीता को किस नाम से पुकारें, राम का नाम कैसे भजें और वाजपेयी की ‘निजी बातचीत’ (जो सिर्फ़ सबा नक़वी ने देखी व सुनी है) के आधार पर उनकी कैसी इमेज बनाएँ? ‘अल्लाहु अकबर’ लाख बार मरने-कटने, ख़ून बहाने, मारने, आत्मघाती हमला करने और जिहाद छेड़ने के लिए प्रयोग किया जाए लेकिन फिर भी यह नारा पवित्र है लेकिन कुछेक शरारती तत्वों की वजह से ‘जय श्री राम’ उत्तेजक, आक्रामक, मर्दवादी और हिंसक हो जाता है? सबा नक़वी को रामायण पढ़ने की ज़रूरत है, रामकथा सुनने की ज़रूरत है और वाजपेयी की कविताएँ सुनने की ज़रूरत है।

अंत में, सबा नक़वी को गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित राम की यह स्तुति पढ़नी चाहिए, जिसकी शुरुआत कुछ यूँ होती है- “श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भाव भय दारुणम्।” यहाँ राम के नाम के आगे ‘श्री’ लगाया गया है, जिसका यह कतई अर्थ नहीं है कि तुलसीदास मर्दवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। ये आज से डेढ़ हज़ार वर्ष पूर्व लिखा गया था। लेकिन नहीं, ‘जय श्री राम’ तो 1990 में लोकप्रिय हुआ।

गढ़चिरौली नक्सली हमला: गिरफ्तार NCP नेता के कई इनामी नक्सलियों से थे सम्बन्ध

गढ़चिरौली में हुए नक्सली हमले में एक एनसीपी नेता का नाम सामने आया है। इस मामले में कुल 8 आरोपितों की गिरफ़्तारी हुई है, जिनमें से एक का नाम कैलाश रामचंदानी है। कैलाश कुछ दिनों पहले तक एनसीपी की तहसिल इकाई का अध्यक्ष था। सभी 8 आरोपितों से पुलिस द्वारा पूछताछ की गई है। एनसीपी के स्थानीय पदाधिकारियों के अनुसार, पार्टी में कैलाश की सदस्यता ख़त्म कर दी गई थी। उसे 29 जून को गिरफ्तार किया गया।

एनसीपी में पदाधिकारी रहे कैलाश को 12 जुलाई तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया था। इस हमले की छानबीन राष्ट्रीय जाँच एजेंसी द्वारा की जा रही है। कैलाश के बारे में स्थानीय एनसीपी नेताओं ने यह भी कहा कि उसने मार्च में पार्टी के लिए समय न निकाल पाने की बात कहते हुए इस्तीफा दे दिया था। वह पार्टी की स्थापना के समय से ही इसका सदस्य था। ईनामी नक्सलियों किरण कुमार और नर्मदक्का की गिरफ़्तारी के बाद उनकी निशानदेही पर कैलाश को गिरफ़्तार किया गया, जिसके कई नक्सलियों से सम्बन्ध होने की बात कही जा रही है।

ज्ञात हो कि महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में 1 मई को हुए नक्सली हमले में 15 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। यह एक जबरदस्त विस्फोट था, जिसके कारण वहाँ सड़क पर गहरा गड्ढा हो गया था। इस हमले की पहले से भी आशंका थी क्योंकि ख़ुफ़िया अधिकारियों ने ऐसे किसी हमले के बारे में आगाह किया था। लेकिन, लोकसभा चुनाव शांतिपूर्वक बीत जाने के बाद सतर्कता में ढील दी गई, जिसके कारण नक्सली इस हमले को अंजाम देने में कामयाब रहे। इससे कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में भाजपा विधायक भीमा मांडवी की हत्या कर दी गई थी।

‘जब भीड़ अल्लाहु-अकबर चिल्लाते हुए आगे बढ़ी तो उनसे बचने के लिए हम जहर पीने के लिए भी तैयार थे’

दिल्ली के हौज़ काज़ी में बीते दिनों सांप्रदायिक तनाव और मंदिर में तोड़-फोड़ की घटना सामने आई थी। ऑपइंडिया, स्वराज्य, ऑर्गेनाईजर और सुदर्शन टीवी को छोड़कर बाकी मीडिया हाउस ने तब तक इसे नजरअंदाज किया, जब तक कि एसएम ने इसे रिपोर्ट करने के लिए दबाव नहीं बनाया। मेरठ में दंगे भड़कने की खबर, प्रह्लादनगर से पलायन करने वाले परिवारों की खबर ने पुरानी यादें ताजा कर दी।

मैं राजधानी दिल्ली से 80 किमी दूर उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर मेरठ में पली-बढ़ी हूँ। पश्चिम यूपी के छोटे से शहर में 70-80 के दशक में लोगों की ज़िंदगी काफी नीरस रही। इस दौरान सभी लोग साल भर होने वाले साम्प्रदायिक दंगों के साथ ही पले-बढ़े हैं। दंगे हमेशा मध्यम वर्गीय परिवार की मौजूदगी से दूर दूसरे तबके में होते थे।
हम हमेशा से जानते थे कि दंगे प्रायोजित होते थे और इसकी भयावहता ने हम प्रायः अछूते। मेरठ में मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग के हिंदू रहते थे। हिंदुओं और दूसरे मजहब के लोगों में गहरी दोस्ती थी, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ी। वहाँ पर उस समय ऐसी स्थिति थी कि अगर दंगे के समय कोई हिंदू, समुदाय विशेष बहुल इलाके में दूसरे मजहब के दोस्त के घर फँस जाता है, तो वो सुरक्षित रहेगा। दंगा के शांत होने के बाद माहौल को देखते हुए उसे बाहर निकाला जाएगा।

मेरी दादी ने एक उर्दू अखबार की सदस्यता ली थी। यह शेर-ओ-शायरी को जानने के लिए सामाजिक परिष्कार का संकेत था। हिंदू घरों के दर्जी दूसरे समुदाय के थे, जिनकी चूड़ीदार और शरारा बनाने की विशेषज्ञता नायाब थी। समुदाय विशेष के इलाकों में घुमावदार गलियाँ हमारे लिए भूलभुलैया जैसी थी। मोहल्ले की महिलाएँ हर सोमवार लगने वाले बाजार में बुर्का पहना करती थी, जो कि मेरठ के मध्यम वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग के अल्पसंख्यकों में इतनी साधारण बात नहीं थी। इसके अलावा मुहर्रम के जुलूसों के दौरान दो मजहबों के बीच की प्रगाढ़ता देखने को मिलती थी। मगर, 1986 से 1987 के बीच इस सौहार्द ने अचानक एक अलग ही मोड़ ले लिया। दंगे अधिक तीव्र और हिंसक होते गए। यहाँ तक कि मध्यम में भी यह बीमारी फ़ैल गई।

शास्त्री नगर में एक हिंदू बहुल मध्यवर्गीय कॉलोनी में सुबह-सुबह का समय था। 1987 की गर्मी के मौसम में सुबह में अचानक से दूर-दूर तक अल्लाहु अकबर के नारे गूँजने लगे और धुएँ के काले बादल आकाश पर छा गए। इससे पहले कि हम कुछ जान पाते कि मामला क्या है, हापुड़ रोड (अल्पसंख्यक बाहुल्य क्षेत्र) के बगल में शास्त्री नगर (एक हिंदू बहुल कॉलोनी) के बाहरी इलाके में रहने वाले अधिकतर लोग अचानक से भागने लगे। कोई पैदल भाग रहा था, कोई साईकल पर, तो कोई स्कूटर पर भाग रहा था। उन्होंने कहा कि एक इस्लामी भीड़ ने उन पर हमला किया था और वो उनके घरों में जलते हुए टायर फेंक रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि हापुड़ रोड पर एक पेट्रोल पंप भी जला दिया गया।

हम लोगों ने छत पर जाकर देखा, एक भीड़ जली हुई टायर फेंकते हुए और ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा लगाते हुए  मेन रोड की तरफ जा रही थी। मुझे याद है कि मेरे पिता, जो कि एक समर्पित कम्युनिस्ट थे, उन्होंने हॉकी स्टिक उठाकर मेरे छोटे भाई को कॉलोनी की सुरक्षा करने के लिए कहा। सुबह-सुबह आस-पास के गाँवों से दूधवाले साईकल से आ रहे थे। जब उन्होंने भीड़ को देखा, तो वो भाग गए और देशी कट्टा (बंदूकें) लेकर लौटे और हर-हर महादेव के नारों के साथ भीड़ का सामना करना शुरू कर दिया।

उस समय मेरठ की सांसद कॉन्ग्रेस की मोहसिना किदवई थीं। मेरी दादी भी एक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता थीं, लेकिन वह दिल्ली में थी और हमारी मदद करने के लिए वहाँ पर कोई नहीं था। एक चाचा मदद के लिए पुलिस चौकी गए, लेकिन वहाँ जाकर पता चला कि पुलिस चौकी में पुलिस फोर्स मौजूद ही नहीं थी, सभी पुलिसकर्मियों को किसानों की रैली से निपटने के लिए दिल्ली भेजा गया था। वहाँ लाठियों के साथ कुछ ही पुलिसवाले थे।

अचानक हमें एहसास हुआ कि हम असहाय और बेहद असुरक्षित थे। हमारे पास हॉकी स्टिक्स, लाठियों और किचेन में इस्तेमाल की जाने वाली चाकू के अलावा अन्य कोई हथियार नहीं था। इस बीच गाँव वालों ने भीड़ को किसी तरह हटा दिया था। चूँकि, कॉलोनी नई थी, चारों तरफ खुला मैदान था, तो हमले हर तरफ से हो रहे थे। मैं उस आतंक, विश्वासघात और उस बेबसी वाले अनुभव को कभी नहीं भूल सकती। राजीव गाँधी पीएम थे। वह एक युवा आइकन थे। ये सब कैसे हो रहा था? पुलिस कहाँ थी? सांसद कहाँ थे? आखिर, हमें असुरक्षित क्यों छोड़ दिया गया?

ऐसा हफ्तों तक चलता रहा। कर्फ्यू लगा दिया गया। रमजान का महीना था। लोग पूरी रात घर के बाहर पहरा देते रहे। बाहरी क्षेत्रों के निवासी हमारे साथ रहने आए। देर रात तक पार्क में महिलाओं का जमघट लगा रहा और फिर सभी लोग ऊपर के घरों में सोने चले गए, जिसे सुरक्षित माना जाता था। हमने सोच लिया था कि अगर हमारी कॉलोनी खत्म हो गई, तो हम चूहे मारने वाला जहर पी लेंगे। हमने ईंटें एकत्रित कीं और इसे छत पर रखा, ताकि अगर हम पर हमला किया जाता है, तो इससे अपनी रक्षा कर सकें। रात में किसी भी तरह की भीड़ के हमले की आवाज़ सुनने पर काफी डर लगता था। उनके कुछ प्रयासों को पुलिस और हमारी अपनी चौकीदार पार्टियों ने नाकाम कर दिया था।

सुबह में पास की मस्जिद से ड्रम बजने की आवाजें आती थीं। फिर लाउडस्पीकर पर नारे लगाए जाते थे। हिंसा की धमकियों के बाद पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाते। हमें डराया जाता था कि बकरों की जगह हिंदुओं की कुर्बानी दी जाएगी। इस बीच कई अफवाहें, झूठी खबर भी फैलाई गई। किसी ने कहा कि समुदाय विशेष वाले ने चंडी माता मंदिर को तोड़ दिया। फिर उन्होंने उन हिंदू इलाकों के बारे में भी बताया, जिन पर उन लोगों ने हमला किया था और उनमें कितने लोग मारे गए थे। इस तरह की घोषणा हमें डराने के लिए, हमारे अंदर खौफ पैदा करने के लिए किया जा रहा था। हालाँकि, बाद में पुलिस ने इन सभी अफवाहों को नकार दिया।

हमारे इलाके में कुछ समुदाय विशेष के परिवार भी थे, जो कि सुरक्षित थे। हम जानते थे कि वे इस पूर्वग्रह का हिस्सा नहीं थे। लेकिन फिर एक और परेशान करने वाली घटना हुई। एक पूरी तरह से अनजान शख्स हमारे कॉलोनी में आया और दूसरे समुदाय के परिवारों के बारे में पूछा और फिर हमें उनकी सुरक्षा के खिलाफ चेतावनी दी। पुलिस ने उनके परिवारों को रात के अंधेरे में मेरठ के बाहर रिश्तेदारों के पास भेज दिया। अगले दिन फिर कई अपरिचित लोग आए, लेकिन पुलिस ने उन्हें बताया कि समुदाय विशेष के परिवार दंगों से पहले ही वहाँ से कहीं चले गए और पुलिस ने उन्हें उनका खाली घर दिखाया।

अंत में मेरठ में पीएसी तैनात कर दी गई। वे हमारे लिए हीरो थे। उन्हें तैनात करने के बाद मस्जिद खामोश हो गए। पड़ोस शांत हो गया और हम सब अपने अपने घरों में सोने लगे। अजनबी गायब हो गए और वो परिवार वापस आ गए। हमारे अंदर पुराने दोस्तों के लिए कोई कड़वाहट नहीं थी। हमें पता था कि हमने इस पागलपन का हिस्सा नहीं बनना है और वे जानते थे कि वे हमारी कॉलोनी में सुरक्षित हैं।

इंडिया टुडे पत्रिका के संस्करण में दंगों की विभीषिका को प्रकाशित किया गया था। मुझे उम्मीद थी कि हमारे दंगों को भी कवर किया जाएगा। मीडिया के साथ मेरा पहला अविश्वास तभी शुरू हुआ था। इसमें हिंदू बहुल क्षेत्रों में हुए दंगों का कोई कवरेज नहीं था। हमारे लिए पीएसी भगवान थे, लेकिन मीडिया के लिए कुछ और। फिर बाद में सब कुछ सामान्य हो गया। हमारा धोबी जो किदूसरे मजहब जा था और इस्त्री करने वाला लड़का, जो उस इलाके में रहता था, जहाँ से भीड़ आई थी, उसने हमें बताया था कि अजनबियों ने इस उन्मादी भीड़ का निर्माण किया था।

यह आखिरी बड़ा दंगा मेरठ में हमने देखा था। लेकिन परेशान करने वाले सवाल आज भी बने हुए हैं। भीड़ का वह कौन सा हिस्सा था? पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे मस्जिदों से क्यों लगाए गए? कोई पुलिस फोर्स वहाँ क्यों नहीं था? उन्हें दिल्ली क्यों भेजा गया? हिन्दू कॉलोनियों में दूसरे समुदाय के परिवारों के ऊपर हिंसा करने वाले अनजान लोग कौन थे? जब मैं मंदिरों के तोड़-फोड़ और इस्लामी भीड़ की अराजकता और दंगे की खबरें देखती हूँ, तो दिल्ली से 80 किमी दूर मेरठ दंगे से जुड़ी मेरी यादें ताजा हो जाती हैं, जिस दंगे के आतंक का सामना हमने 1987 में किया था।

2019 आ गया है। दिल्ली इस तरह की घटनाओं से बुरी तरह से प्रभावित है। किसे दोषी ठहराया जाए? वोट बैंक की राजनीति? आज भी अविश्वास का भाव बना रहता है। तो क्या हौज़ काज़ी, मेरठ, आगरा, मुज़फ़्फ़रनगर, हरियाणा, सूरत, पश्चिम बंगाल और अन्य ऐसी जगहों पर हिंदू परिवारों को उनके साथ रहना चाहिए, जहाँ समुदाय विशेष की आबादी काफी है और जहाँ अब सड़कों पर उन्मादी और अराजक भीड़ निकल रही है। ये मॉब क्यों इस तरह से हमला कर रही है? क्या पुलिस लाचार है, इसलिए? आखिर, अचानक हुई इन घटनाओं के पीछे की असली कहानी क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी सत्ता में हैं। मैं भारत में आतंक के ऐसे पलों से छुटकारा पाना चाहती हूँ। क्या कभी मेरा यह सपना पूरा होगा? आखिर कब तक अमन और शांति से रहने के लिए भी ज़द्दोज़हद करनी होगी। आखिर कौन देगा इसका जवाब?

(यह लेख मूल रूप से लेखिका के ब्लॉग पर प्रकाशित किया गया है। जिसका अनुवाद रचना कुमारी ने किया है।)