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द वायर वालो, जनेऊ के लिए इतना जहर उगलने से पहले पता किया था जनेऊ क्या है?

वायर ने हिन्दुओं के खिलाफ फिर झूठ और जहर से बुझा हुआ लेख छापा है- “आधुनिक ब्राह्मण ‘उत्पीड़न’ के इस प्रतीक को क्यों इठला कर दिखाते फिर रहे हैं?” बताया गया है कि जनेऊ ब्राह्मणों द्वारा दूसरी जातियों, खासकर कि अनुसूचित जातियों के, उत्पीड़न का, ब्राह्मण-प्रभुतावाद का प्रतीक है, और जनेऊ पहनने वालों को कंधे पर नफरत का, दूसरों को नीचा देखने का ‘बोझ’ महसूस होना चाहिए।

‘फर्जी’ ऑनलाइन फोरम का सहारा

एक पूरे जनसांख्यिकीय समूह को, उनकी अस्मिता और उनकी पवित्र परंपराओं को अवैध घोषित कर देने के लिए लेखिका सहारा लेती है इंटरनेट के किसी अँधेरे कोने में बैठे किसी तमिल ब्राह्मणों के लिए बनी वेबसाइट के चैट थ्रेड का। उसमें कोई एक-आधा आदमी लिख देता है कि मुझे ऐसा लगता है कि मेरी बुद्धि ब्राह्मण-कुल में पैदा होने के कारण अधिक तीक्ष्ण है, कोई बता देता है कि मैं ‘सेक्युलर’ (धार्मिक कर्मकांडों को ढकोसला मानने वाला) ब्राह्मण हूँ और उसके बावजूद मुझे ख़ुशी होती है कि मेरे बच्चे जाति के बाहर शादी नहीं कर रहे, और बस इतने भर से मेघाली मित्रा न केवल सभी ब्राह्मणों को सभी अनुसूचित जाति वालों के उत्पीड़न का दोषी बना देतीं हैं, सभी ब्राह्मणों से स्थायी क्षमा-याचना मुद्रा में जीने की उम्मीद करने लगतीं हैं। जबकि उस वेबसाइट पर जो लिख रहा है, वह सही में तमिल ब्राह्मण है भी या नहीं, इसका भी कोई सबूत नहीं है, और इसके आधार पर वह सभी ब्राह्मणों से अपना जनेऊ उतार फेंकने की अपेक्षा करतीं हैं।

यहाँ पहली बात तो यह कि ब्राह्मण (या कोई भी जाति/वर्ण) जन्म से ज्यादा कर्म पर आधारित होता है, अतः जिसे धार्मिक कर्मकांडों को ढकोसला मानना है, वह काहे का हिन्दू, काहे का ब्राह्मण? उसके विचारों का बोझ हिन्दू क्यों उठाए? उसके विचारों के आधार पर ब्राह्मणों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है, जो हिन्दू ही नहीं है?

लेखिका यह भी कहती है कि क्या ऐसी चीज जिसने ऐतिहासिक रूप से बड़ी तादाद में लोगों को तुम्हें मिलने वाली सुरक्षा को लेकर ईर्ष्यालु बनाया हो, सच में क्षतिविहीन (harmless) हो सकती है? तो पहली बात तो हाँ, बिलकुल। किसी की ईर्ष्या ब्राह्मण का ठेका नहीं है। और जिसे लगता है ब्राह्मण होना आसान है, उसे यह पता होना चाहिए कि जो स्मृतियाँ ब्राह्मणों को वेद-पाठ का विशेषाधिकार देतीं हैं, सैद्धांतिक रूप से ‘सर्वोच्च’ बनातीं हैं, वही स्मृतियाँ ब्राह्मणों को भीख माँगने और यजमान अथवा छात्र के दान-दक्षिणा पर निर्भर रहने का भी आदेश देतीं हैं। सुदामा और द्रोण ऐसे ही प्रतिभासम्पन्न, ज्ञान-सम्पन्न होने के बावजूद कँगले थे।

जनेऊ का इतिहास हिन्दुओं से पूछो

जनेऊ के इतिहास शीर्षक वाले खंड में पहली बात तो जनेऊ की उत्पत्ति और इतिहास की बात ही नहीं है, सिवाय आखिर में एक-आधे वाक्य के अलावा। बाकी के खंड में लेखिका खुद ही यह मानती है कि अन्य जातियाँ भी ‘ब्राह्मणों-जैसा’ बनने के लिए जनेऊ पहनने के लिए स्वतंत्र थीं, और उन्होंने ब्राह्मणों जैसा आचरण करने (जनेऊ पहनने, माँस-मदिरा का त्याग करने, आदि) का प्रयास किया भी। तो इसमें फिर भेदभाव बचा ही कहाँ?

अब आते हैं मूल मुद्दे यानि कि जनेऊ/यज्ञोपवीत के असली अर्थ/महत्व पर (जोकि द वायर के लेखकों जैसे असुर-प्रकृति के लोगों को पता ही नहीं होगा)। तो यज्ञोपवीत मात्र एक ‘प्रतीक’ नहीं है- यह एक कवच होता है, जोकि योग करते समय शक्ति के शरीर में संचालन को नियंत्रित करता है। योग के अनुसार शरीर में विभिन्न चक्र होते हैं, और यज्ञोपवीत गले के विशुद्धि चक्र से लेकर जननांग के स्वाधिष्ठान चक्र तक की रक्षा करता है। यहाँ तक कि कई गणपति मूर्तियों में उन्हें भी सर्प को यज्ञोपवीत की तरह धारण किए हुए दिखाया जाता है। इसके अलावा यज्ञोपवीत पहली बात तो यज्ञ करने का अधिकारी होने का सूचक होता है (जोकि न हर कोई होता है, न ही अपने आप, बिना गुरु की अनुमति के बना जा सकता है), और दूसरी चीज यज्ञोपवीत कपड़ों के अंदर पहना जाता है, बाहर पहन कर कोई भी इठलाते हुए नहीं घूमता।

जिन्हें यज्ञ करने की योग्यता, योग में निहित शक्ति जैसी चीजों में विश्वास नहीं (जैसे द वायर, या फिर मेघाली मित्रा), उनके लिए यह विषय है ही नहीं- अतः वह किसी भी तरह से इस विषय की चर्चा का हिस्सा ही नहीं हैं। और जिन्हें इस विषय पर अधिक जानकारी चाहिए, वे या तो अपने-अपने गुरु से सम्पर्क करें, या फिर 18वीं-19वीं सदी के योगी त्रैलंग स्वामी की उमाचरण मुखोपाध्याय द्वारा लिखित किताब खंगाल सकते हैं।

यही ‘प्रतीक से भय’ का नाटक समुदाय विशे के साथ हो, तो वायर वालों कैंसर होने लगेगा

और जिस चूँकि-जनेऊ-‘उत्पीड़न’-का-प्रतीक-है-अतः-इसे-हटा-देना-चाहिए के तर्क का इस्तेमाल पत्रकारिता के समुदाय विशेष वालों के पसंदीदा मज़हब इस्लाम पर किया जाए, तो इन्हें कैंसर होने लगता है। हजारों-लाखों जानें बिना मूंछों की दाढ़ी वाले पंथिक नफरत से भरे इस्लामी हमलावरों ने ले लीं हैं केवल आधुनिक युग में ही (600 ईस्वी से शुरू करने पर तो यह आँकड़ा करोड़ पार कर शायद अरब में पहुँच जाए), लेकिन अगर मैं कहूँ कि इसी तर्क के इस्तेमाल से बिना मूँछों की दाढ़ी मेरे लिए पंथिक हिंसा का प्रतीक है, इस्लाम वाले इसे त्याग दें तो मजहब वालों से पहले वायर फतवे जारी करेगा। क्या मैं यह कहता फिरूँ कि समुदाय विशेष के लोगों को दाढ़ी हटा लेनी चाहिए? ऐसा मानना सर्वथा अनुचित है, इसलिए यह तर्क हर तरह के विषय पर लागू होना चाहिए न कि सिर्फ हिन्दू प्रतीकों पर।

अंग्रेजों ने 190 साल भारत को अपने बूटों तले रौंदा लेकिन अगर मैं विक्टोरिया मेमोरियल या किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज का नाम बदलना चाहूँ तो यही वायर शायद इन्हीं मेघाली मित्रा से लिखवाएगा कि भला उससे क्या होगा; मासूम-सा लगने वाला हिन्दूफोबिक तर्क होगा कि सताने वाले और सताए जाने वाले, दोनों मर चुके हैं।

असल बात यही है कि मेघाली मित्रा और वायर दोनों की ही दिक्कत यज्ञोपवीत नहीं, उसका हिन्दू उद्गम है, और उन्हें ‘भारी मन से’ यह सूचित करना चाहूँगा की उनकी इस ‘दिक्कत’ का कोई इलाज नहीं हो सकता…

भगवान राम की मूर्त‍ि चुराने वाला खुद आया लौटाने, बोला- आ रहे थे डरावने सपने

रामजन्मभूमि थाना क्षेत्र के नजरबाग मोहल्ले में स्थित माधुरीकुंज से 140 साल पुरानी अष्टधातु से बनी भगवान राम की मूर्ति चोरी होने के ठीक 5वें दिन वापस मिल गई है। लेकिन यह पूरा किस्सा बहुत दिलचस्प है। कमाल की बात यह है कि बीते सोमवार को चोर मूर्ति को चुराकर ले गया था और शुक्रवार को दोपहर में खुद ही भागा-भागा मूर्ति लौटाने मंदिर पहुँच गया।

मूर्ती चुराने वाले चोर अजय का कहना है कि जब से चोरी की, तब से उसके शरीर मे अजीब-सा दर्द शुरू हो गया है। उसको घबराहट के साथ डरावने सपने आ रहे हैं। वह मूर्ति को बहुत दिन तक अपने साथ रख नहीं पाया और खुद युगल माधुरी कुंज मंदिर में पहुँच मंदिर के पुजारी को भगवान राम की मूर्ति सौंप दी। मूर्ति सौंपने के बाद उसके शरीर का दर्द तो ठीक हो गया, लेकिन वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया। पुलिस ने चोर अजय शुक्ला को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

बीते सोमवार की दोपहर मेंं मंदिर के गर्भगृह का ताला तोड़कर 9 इंच की अष्टधातु से बनी भगवन राम की मूर्ति चोरी हो गई थी। महंत राजबहादुर शरण ने बताया, “यह भगवान की दिव्य शक्ति ही है कि, दोपहर में भगवान को भोग लगाने के बाद जैसे ही मंदिर के गर्भगृह से बाहर देखा तो एक आदमी खड़ा था, उसने कहा ‘आपके यहाँ से कोई मूर्ति गायब हो गई है क्या?’ जवाब में मैंने ‘हाँ’ कहा। तो वह बोला ‘मैं वही मूर्ति लौटाने आया हूँ’।”

महंत ने आगे बताया- “जैसे ही उस युवक से मूर्ति दिखाने के लिए कहा उसने हमारे ठाकुरजी को हमारी गोद में रख दिया।” चोरी की घटना कैसे हुई यह पूछे जाने पर आरोपित अजय ने बताया कि, उसने ताला तोड़कर मूर्ति चुराई थी। वह मूर्ति को अपने साथ घर ले गया था। घर वालों ने इस बात का विरोध किया था। मूर्तिचोर आजय ने महंत को बताया कि चोरी की रात से नींद नहीं आ रही है और पूरा शरीर अकड़ने लगा है इसीलिए मूर्ति को वापस करने पहुँच गया।

चोर ने महंत से अनुरोध किया था कि यह बात पुलिस को ना बताएँ, लेकिन घटना की जानकारी पुलिस को दी गई। पुलिस ने मूर्ति सहित चोर को हिरासत में ले लिया है। एसओ आरजेबी राजेश कुमार गुप्ता ने मूर्ति बरामद हो जाने का खुलासा नहीं किया, यह जरूर बोले कि पुलिस अपराधी के करीब पहुँच गई है और कुछ घंटे बाद चोरी का खुलासा हो जाएगा।

कॉन्ग्रेस MLA, मेयर, पूर्व मेयर के ख़िलाफ़ छेड़छाड़ का मामला दर्ज, महिला को मिली जान से मारने की धमकी

गोवा पुलिस ने शनिवार (1 जून) को शहर के महापौर (मेयर) उदय मडकाईकर, एक पूर्व महापौर यतिन पारेख और पणजी के कॉन्ग्रेसी विधायक अतानासियो मोनसेरात पर एक महिला से छेड़छाड़ के आरोप में मामला दर्ज किया है। इन सभी पर एक प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान महिला के साथ दुर्व्यव्हार करने का आरोप लगा है।

महिला से छेड़छाड़ की यह घटना अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान हुई थी। दरअसल, पणजी नगरपालिका ने मांडवी नदी के तटीय इलाक़े पर स्थित कसीनो से अतिक्रमण हटाने का अभियान शुरू किया था। इस कसीनो ने फुटपाथ पर अतिक्रमण कर रखा था और नगर निगम के कर्मचारी जब इसे खाली कराने पहुँचे तो उनके साथ मेयर उदय मडकाईकर, एक पूर्व डिप्टी मेयर यतिन पारेख और पणजी से कॉन्ग्रेस विधायक अतानासियो मोनसेरात भी मौजूद थे।

पुलिस के अनुसार, शिक़ायत करने वाली महिला अतिक्रमण हटाने का विरोध कर रहे समूह में शामिल थी। महिला ने आरोप लगाया कि मेयर उदय मडकाईकर, एक पूर्व डिप्टी मेयर यतिन पारेख और पणजी से कॉन्ग्रेस विधायक
अतानासियो मोनसेरात ने उसके साथ छेड़छाड़ की, उसे ग़लत तरीक़े से छुआ और दुर्व्यव्यवहार किया।

द हिंदू को इस शिक़ायत की पुष्टि करते हुए उत्तरी गोवा के पुलिस अधीक्षक चंदन चौधरी ने बताया, “हाँ, पणजी पुलिस ने एक महिला द्वारा दर्ज की गई शिक़ायत के आधार पर तीनों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज की गई है, जो एक कसीनो कार्यालय के अग्रभाग के विध्वंस का विरोध कर रही थीं।”

वहीं, पणजी पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर ने पीटीआई से बातचीत में कहा, “देर रात दर्ज हुई शिक़ायत में महिला ने आरोप लगाया कि सभी आरोपियों ने उसे मारने की धमकी भी दी।” फ़िलहाल, पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए इसकी जाँच शुरू कर दी है।

दूसरी तरफ़, कॉन्ग्रेस विधायक मोनसेरात का कहना है कि अतिक्रमण विरोधी अभियान सार्वजनिक स्थान पर हुआ था और उस समय कोई अप्रिय घटना नहीं घटित हुई थी। उन्होंने कहा कि वे तो सिर्फ़ पालिका कर्मियों के साथ मौक़े का मुआयना करने गए थे और शिकायत में जिन लोगों का नाम दर्ज है उनमें से किसी ने भी महिला के साथ कोई बदसलूकी नहीं की थी।

जानकारी के अनुसार, यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुँचाना), 354 (अपमानजनक शील), 504 (शांति भंग), 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज किया गया है।

ग़ौरतलब है कि गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद पणजी की सीट खाली हो गई थी। इस सीट पर वे 1994 से लगातार 25 साल तक जीतते रहे थे। उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव के बाद कॉन्ग्रेस के खाते में यह सीट आई। अतानासियो मोनसेरात का मुक़ाबला RSS के पूर्व गोवा प्रमुख सुभाष वेंलिंगकर से हुआ था।

मणिपुर में फर्जी आधार कार्ड के साथ 9 रोहिंग्या मुस्लिम गिरफ्तार

मणिपुर के तनगनौपाल जिले में भारत-म्यांमार सीमा के पास स्थित मोरेह शहर से 9 रोहिंग्याओं को फर्जी आधारकार्ड के साथ गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने शनिवार (जून 1, 2019) को यह जानकारी दी है। पुलिस अधीक्षक (एसपी) विक्रमजीत ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि पुलिस को मिली गुप्त सूचना के बाद फर्जी आधारकार्ड रखने के आरोप में तनगनौपाल चेक से दो महिलाओं समेत चार रोहिंग्याओं को गिरफ्तार किया था। इन चारों को 27 मई को गिरफ्तार किया गया था।

इसके अलावा पुलिस ने 28 मई को मोरेह शहर में एक होटल से तीन महिलाओं समेत 5 अन्य रोहिंग्याओं को गिरफ्तार किया। एसपी ने बताया कि जाँच में खुलासा हुआ कि गिरफ्तार किए गए रोहिंग्याओं में से एक ताहिर अली ने स्थानीय मणिपुरी मुस्लिम महिला से विवाह किया और वही इन विदेशियों को अवैध तरीके से देश के अंदर लाने के मामले का मास्टरमाइंड था।

पुलिस ने कहा कि अली को थौबल जिले से गिरफ्तार किया गया। उन्होंने कहा कि ताहिर अली को छोड़कर ये सभी फर्जी आधार कार्ड लेकर राज्य की राजधानी से सीमाई शहर आए थे। एसपी ने बताया कि गिरफ्तार रोहिंग्या न तो हिन्दी और न ही अंग्रेजी बोलना जानते हैं, जिसके कारण उनसे बात करने में परेशानी आ रही है। उन्होंने बताया कि वे भारत के अंदर कैसे घुसे और फर्जी आधारकार्ड उन्हें कैसे मिला, इस बारे में पता लगाया जा रहा है।

रोहिंग्या का मुद्दा काफी पुराना है। म्यांमार से अवैध रूप से रोहिंग्या भारत में प्रवेश करते रहे हैं। मोदी सरकार ने इन पर कठोर कार्रवाई करते हुए पिछले साल रोहिंग्या नागरिकों को वापस उनके देश म्यांमार वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। पिछले साल अक्टूबर में शुरू हुई इस प्रक्रिया में सात रोहिंग्या नागरिकों को म्यांमार सौंपा गया था।

यूपीए में हुए विमानन घोटाले के सिलसिले में ED ने पूर्व मंत्री प्रफुल्ल पटेल को भेजा समन

एनसीपी नेता और पूर्व उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पेटल की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने दीपक तलवार अवैध विमानन सौदे मामले में प्रफुल्ल पटेल को समन भेजकर 6 जून को पेश होने के लिए कहा है। प्रफुल्ल पटेल पर आरोप है कि यूपीए सरकार के दौरान जब प्रफुल्ल पेटल नागरिक उड्डयन मंत्री थे, उस समय दीपक तलवार को गलत तरीके से फायदा पहुँचाया गया था। वहीं, प्रवर्तन निदेशालय के नोटिस पर प्रफुल्ल पटेल ने कहा है कि अधिकारियों के साथ जाँच में सहयोग करने पर उन्हें खुशी होगी। उन्होंने कहा कि वो विमानन क्षेत्र की जटिलताओं के बारे में जाँच एजेंसी को बताएँगे।

विमानन लॉबिस्ट दीपक तलवार की गिरफ्तारी के बाद हुए कुछ खुलासों और एजेंसी द्वारा जुटाए गए सबूतों के मद्देनजर पटेल से सवाल-जवाब किया जाना है। एजेंसी ने हाल ही में दीपक तलवार को नामजद करते हुए आरोपपत्र दाखिल किया है। उसमें कहा गया है कि तलवार लगातार पटेल के संपर्क में था। यूपीए सरकार में जब पटेल उड्डयन मंत्री थे, उस दौरान एयर इंडिया ने 111 विमान खरीदने का निर्णय लिया था, जिसमें 43 एयरबस के विमान शामिल थे।

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने 2017 में अपने एफआईआर में जिक्र किया है कि इस प्रकार की महत्वाकांक्षी खरीद के ऑर्डर आवश्यकताओं का अध्ययन, आवश्यक पारदर्शिता के बिना दिए गए, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान हुआ। 2014 में तलवार, सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा के आधिकारिक आवास पर तकरीबन 63 बार मिलने गया था। इसको लेकर भी तलवार जाँच के दायरे में है। एयरबस ने अगस्त और सितंबर 2012 के बीच तलवार के अंतर्गत चलने वाली कंपनियों के लिए 10.5 मिलियन डॉलर के दो ट्रांसफर किए और खास बात ये है कि ये ट्रांसफर उसी समय किए गए, जब यूपीए शासनकाल के तहत नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने विमानों की खरीद के आदेश दिए थे।

गौरतलब है कि, ईडी ने अगस्त 2017 में इसकी जाँच शुरू की थी। पूछताछ से बचने के लिए दीपक देश छोड़कर भाग गया था, मगर इसी साल 31 जनवरी को उसे इमिग्रेशन डिपार्टमेंट के अफसरों ने दुबई से प्रत्यर्पण करवाया और फिर बाद में ईडी ने उसे गिरफ्तार किया था। तलवार के साथ-साथ यूपीए शासनकाल के हाई प्रोफाइल लॉबिस्ट राकेश सक्सेना को भी दुबई से प्रत्यार्पित करके लाया गया था।

ईडी के एक अधिकारी का कहना है कि जाँच में पता चला कि दीपक तलवार नेताओं और मंत्रियों (प्रफुल्ल पेटल और दूसरे उड्डयन मंत्रियों) के साथ दलाली और लॉबिंग करता था। वह एयर अरबिया और कतर एयरवेज को गलत फायदा पहुँचा रहा था। तलवार पर आरोप है कि उसने 2008-09 के बीच इन एयरलाइंस को गलत फायदा पहुँचाया और जिसका नुकसान सरकारी एयरलाइंस एअर इंडिया को उठाना पड़ा। ईडी ने पाया कि अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस के द्वारा दीपक तलावर के बैंक ऑफ सिंगापुर के अकाउंट में ₹270 करोड़ जमा हुए हैं, जबकि उसने अपने एक एनजीओ के द्वारा ₹88 करोड़ प्राप्त किया।

थरूरों, योगेंद्र यादवों, येचुरियों को जनादेश ने पीट कर सुन्न कर दिया, लेकिन इनकी ऐंठ कायम है

मोदी की सुनामी के बाद विपक्षी दलों से लेकर मीडिया तक सभी के लिए यह आत्मचिंतन, आत्ममंथन का समय है- यह सोचने और मनन करने का समय है कि हमसे गलती भला कहाँ हो गई, कहाँ पर जनता का और हमारा साम्य इतना टूट गया कि एक ओर हम मोदी की हार को लेकर आश्वस्त हो गए, और दूसरी ओर जनता ने मतप्रतिशत, कुल सीटें, मत-संख्या, हर पहलू में मोदी को 2014 से ज्यादा ही समर्थन दिया।

मगर कोई भी बड़ी पार्टी या नेता खुल कर, बिना किसी अगर-मगर के बहाने के यह तक मानने को तैयार नहीं दिख रहा है कि उनसे मूलभूत, वैचारिक स्तर पर कोई गलती भी हुई है, तो सुधार तो दूर की कौड़ी है। अखिलेश यादव प्रवक्ताओं को निकाल रहे हैं, मानो उनका ‘संदेश’ (जोकि केवल एक जातिवादी, अवसरवादी गोलबंदी थी) अपने आप में कोई बड़ा क्रांतिकारी चमत्कार था, जिसे प्रवक्ता ज़मीन पर नहीं ले जा पाए (जोकि असल में नेता की जिम्मेदारी होती है, प्रवक्ता की नहीं)। उसी तरह कॉन्ग्रेस में राहुल गाँधी के इस्तीफे का नाटक चल रहा है-CWC यह मानने को नहीं तैयार कि राहुल गाँधी के चेहरे को ही जनता का सबसे बड़ा ‘रिजेक्शन’ मिला है, और उस चेहरे के अलावा पार्टी में सबकुछ बदलने के लिए तैयार है।

दर्प अभी भी हावी

और यह “हम और हमारे विचार तो गलत हो ही नहीं सकते” का दर्प उन कुछ नेताओं की बातों में भी साफ है जिनके इंटरव्यू इस हार के बाद सामने आ रहे हैं। मैं दो उदाहरण शशि थरूर और माकपा महासचिव सीताराम येचुरी के लूँगा। दोनों ने ही इंटरव्यू तिरंगा टीवी पर करण थापर को दिए गए हैं, और दोनों ही ‘डिनायल’ से भरे हुए हैं- जनता साम्प्रदायिकता की तरफ मुड़ रही है, संविधान खतरे में है, भाजपा संवैधानिक संस्थाओं को अपना गुलाम बना रही है, उसे केंद्र की सत्ता में होने का लाभ मिला, मोदी ने अपने व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द के एक नया ही पंथ (पर्सनालिटी-कल्ट) खड़ा कर दिया (अंबानी के) पैसे से, और हमारी हार इन्हीं सब वजहों से हुई।

दोनों ही वैचारिक रूप से अपनी गलती एक राई-माशा भी मानने को तैयार नहीं हैं। न ही उनके हिसाब से भारत के विकृत सेकुलरिज़्म में किसी बदलाव की आवश्यकता है, न ही हिन्दू आतंकवाद और हिन्दू फासीवाद का शिगूफा छेड़ना गलती थी। जाति के आधार पर गोलबंदी कर भाजपा को हराने का व्यूह रचना भी सही था, अंबेडकर के महिमागान की आड़ में दशकों से सवर्णों को दुष्ट उत्पीड़कों के रूप में चित्रित करना भी सही था; बेरोजगारी के बढ़ा-चढ़ा कर किए गए दावे भी सही थे, और नोटबंदी-जीएसटी का दुर्भावनापूर्ण विरोध भी सही था।

येचुरी सबरीमाला को मुद्दा मानने से ही मना कर देते हैं- उनके अनुसार ‘कोर्ट के फैसले के बाद हमारी राज्य सरकार के हाथ बँधे थे’। या तो वह जनता को मूर्ख समझते हैं, या शायद खुद ही भूल गए कि उनकी सरकार के चंगुल में चल रहे त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने फैसले का अनुमोदन करते हुए पुनर्विचार याचिका का विरोध करते हुए प्रतिबंधित आयु-वर्ग की महिलाओं के प्रवेश का समर्थन किया था। उसी तरह शशि थरूर कुतर्कशास्त्र का नया अध्याय लिखते हुए बताते हैं कि चूँकि वायनाड (जहाँ, यह जान लेना जरूरी है कि, हिन्दू अल्पसंख्यक हैं) की जनता ने राहुल गाँधी को रिकॉर्ड मतों से जिता दिया, और इसलिए अमेठी से उनका नकारा जाना (पता नहीं कैसे) नकारे जाने में नहीं गिना जाएगा।

एलीटिज़्म का चरम

अपनी शाब्दिक परिभाषा के अनुसार एलीट (अभिजात्य वर्ग का) होना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन एलीटिज़्म को सर पर हावी हो जाने देना गलत है, यह मान लेना गलत है कि अगर मैं अपने किताबी ज्ञान या फलाना प्रतिभा के वर्ग में चोटी पर हूँ तो न केवल इस कारण मैं हर चीज़ का विशेषज्ञ हो गया, बल्कि मेरे ‘नीचे’ आने वाले हर व्यक्ति के जीवन को मैं बेहतर जानता हूँ, और उसे मेरे हिसाब से चलना चाहिए। एलीट सेंट स्टीफेंस के छात्रों, येचुरी और थरूर की, यही समस्या है।

इन्हें पहले तो यह लगा कि एक बार अपनी प्रतिभा से सेंत स्टीफेंस जैसे एलीट कॉलेज पहुँच गए तो इन्हें जिंदगी भर बाकी लोगों को क्या सोचना चाहिए, कैसे चलना चाहिए, इसका ‘हुक्म’ देने का हक मिल गया है। वही हक़ 2014 में चला गया जिसे यह लोग 2019 की हार के बाद भी नहीं स्वीकार पा रहे हैं। चूँकि यह लोग जड़ से, ज़मीन से कटे हुए हैं, इसीलिए इनके लिए यह समझना मुश्किल है कि भला एक टॉयलेट, बिजली, सिलिंडर जैसी चीजों को पाकर कोई इंसान इतना निहाल कैसे हो सकता है कि ‘सदियों की प्रताड़ना के बदले’ का सपना भूल जाए, ‘सेक्युलरिज़्म’ जैसी ‘पवित्र’ वस्तु को दाँव पर लगा दे, जीडीपी के तिमाही आँकड़ों का उसे फर्क न पड़े।

दिल्ली के शैम्पेन लिबरल बनने के बाद ज़ाहिर तौर अपनी खुद की मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि इनके जेहन से बाहर है, तभी इन्हें यह नहीं समझ में आ रहा कि स्वरोजगार के लिए एक मुद्रा लोन पा लेने या एक टिकट बुक/कैंसिल करने के लिए रेलवे के चक्कर काटने से निजात भर पाकर कोई इंसान इतना ‘स्वार्थी’ कैसे हो सकता है कि राहुल गाँधी के राफेल के शिगूफे पर ध्यान न दे!

भूल तो अपनी जड़, अपनी शुरुआत ‘दलित आईकन’ मयावती भी गईं थीं- जिस गेस्टहाउस कांड को दुधारू गाय की तरह दूह कर उन्होंने गरीब अनुसूचित जाति वालों को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करते हुए सपा के गुंडों से पिटने के लिए आगे कर दिया, अपना उल्लू सीधा करने के लिए उन्हीं गुंडों को वोट देने के लिए उन्हीं मजलूमों को ‘हुकुम’ जारी कर दिया। यह भी एक तरह का ‘एलीटिज़्म’ था- उन्होंने सोचा कि उनकी सुनहरी सैंडिल देख वह वर्ग खुद के पैरों की बिवाई भूल लहालोट हो जाएगा।

योगेंद्र यादव और शेखर गुप्ता की ‘लगभग ईमानदार’ गलती की स्वीकृति

इन ‘बड़े’ नेताओं के बालू में सर छुपाए झूठ के मुकाबले तो एडिटर्स गिल्ड वाले शेखर गुप्ता और नेता-से-ज्यादा-निर्वाचन-विश्लेषक योगेंद्र यादव (योया) की स्वीकारोक्ति अधिक महत्वपूर्ण और ईमानदार है। शेखर गुप्ता ने हाल में यह माना कि मोदी सरकार की जनकल्याणकारी स्कीमों से देश को निश्चय ही फायदा हुआ है- और पत्रकारिता के समुदाय विशेष को भी यह फायदा दिखा तो जरूर, मगर उन्होंने घरों में सिलिंडर देख कर आँखें फेर लीं

योगेंद्र यादव इससे भी आगे बढ़ गए। उन्होंने माना कि मोदी-विरोधियों ने नाहक ही राष्ट्रवाद को बदनाम किया, और केवल और केवल नकारात्मकता की राजनीति की। उन्होंने यह भी माना कि सामाजिक न्याय के नाम पर जातिवादी गोलबंदी ही हुई है। सेक्युलरिज़्म के नाम पर समुदाय विशेष को डरा-धमका कर गोलबंद किए जाने की बात भी उन्होंने मानी।

हालाँकि विकृत सेक्युलर कीड़े के जहर से ‘योया’ जी अभी भी पूरी तरह मुक्त नहीं हुए हैं। उन्होंने हिन्दुओं के मुद्दों पर बात किए जाने को भी हिन्दुओं को उसी तरह भय के माहौल में डाला जाना बताया जैसा सत्तर साल अल्पसंख्यकों के साथ गैर-भाजपा दलों ने किया है।

यह पूरी तरह गलत और झूठ है, क्योंकि एक तो हिन्दू मजहब विशेष के उलट 70 साल इस देश के विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग नहीं बल्कि 70 साल से नज़रअंदाज़ किया गया समुदाय हैं, दूसरा, मजहब विशेष के उलट हिन्दू माँगें अभी भी किसी विशेषाधिकार की नहीं, बल्कि सामान्य बराबरी की माँगें हैं- हमारे मंदिरों में सरकारें दखल देना और उनके खजाने को जोंक की तरह चूसना बंद करें, संविधान के अनुच्छेद 25-30 में प्रदत्त आस्था को सुरक्षा देश के हर समुदाय के लिए दी जाए, RTE के अनुपालन से पड़ने वाला आर्थिक बोझ केवल हिन्दुओं के स्कूलों को ढोने के लिए मजबूर न किया जाए, इत्यादि।

योया जी यह ‘बैलेंसिंग एक्ट’ बंद करें- इससे वह जहाँ से शुरू होते हैं, घूम फिर कर वहीं दोबारा पहुँच जाते हैं। बाकी की पार्टियों ने तो लगता है दुराग्रह की जमीन में ही पैर धँसाए रखने की कसम खाई हुई है।

अमित शाह के गृह मंत्री बनते ही 5 आतंकियों ने किया सरेंडर, मीरवाइज़ ने भी बदले सुर

एक ओर जहाँ अमित शाह ने आज (जून 1, 2019) गृह मंत्री के रूप में अपना पदभार संभाला, वहीं दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर में कुलगाम जिले के 5 ‘भटके हुए’ नौजवानों ने आतंकवाद और हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण कर दिया। इस बात की जानकारी खुद पुलिस ने दी है।

पुलिस ने बताया कि अलग-अलग आतंकवादी संगठनों में शामिल हो चुके इन युवकों को परिवार और पुलिस के प्रयासों से मुख्यधारा में लौटा लिया गया है लेकिन अभी सुरक्षा कारणों से उनके नामों का खुलासा नहीं किया गया है।

दरअसल, आतंकियों के आत्मसमर्पण को लेकर पुलिस द्वारा की गई घोषणा के बाद से अब तक बड़ी संख्या में आतंक की राह पकड़ चुके युवक आत्मसमर्पण कर चुके हैं। पुलिस ने स्पष्ट कहा था कि अगर मुठभेड़ के दौरान कोई स्थानीय आतंकवादी आत्मसमर्पण करने की गुजारिश करता है तो उसे स्वीकार लिया जाएगा।

गौरतलब है आत्मसमर्पण और पुनर्वास की नीति घाटी में सर्वप्रथम 1995 में लाई गई थी। इस नीति की रूपरेखा उसी ‘पुनर्वास प्रोग्राम’ पर आधारित थी जिसे नक्सलियों के लिए शुरू किया गया था।

इसके अलावा खबरों के मुताबिक अमित शाह के गृह मंत्री बनते ही कश्मीर में हुर्रियत नेता मीरवाईज उमर फ़ारूक़ के सुर भी बदलने लगे हैं। अभी तक सरकार की खुलकर आलोचना करना वाले मीरवाइज उमर फारूक ने कहा है कि प्रचंड बहुमत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कश्मीर मुद्दे के समाधान में निर्णायक भूमिका निभाने का मौका दिया है। फारूक ने उम्मीद जताई है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की बातचीत की पेशकश को एनडीए की नई सरकार गंभीरता से लेगी।

पुत्र को पत्र: सोनिया ने मार्मिक और भावुक शब्दों में लिखा- राहुल, तुमने प्यार कमाया है

लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को मिली जबरदस्त हार के बाद अपना पद छोड़ने पर अड़े कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को रोकने के लिए पूरी कॉन्ग्रेस ने जोर लगा दिया है। तमाम वरिष्ठ पदाधिकारियों के बाद अब राहुल गाँधी की मम्मी सोनिया गाँधी ने भी राहुल गाँधी को मनाने के लिए भावुक और बेहद मार्मिक कदम उठाया है। सोनिया गाँधी ने आज एक 3 पन्नों के पत्र के माध्यम से पुत्र राहुल गाँधी का हौसला बढ़ाने का प्रयास किया है। और लगता नहीं है कि इस मार्मिक अपील के बाद अध्यक्ष पद त्यागने के लिए राहुल गाँधी तैयार होंगे।

अपने पत्र में सोनिया ने कहा है, “राहुल गाँधी ने पार्टी के लिए शानदार अभियान चलाया। राहुल गाँधी के नेतृत्व में तीन राज्यों छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी। सदन में हमारी संख्या भले ही कम है, लेकिन हम एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएँगे।”

सोनिया गाँधी ने अपनी चिट्ठी में लिखा, “कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गाँधी ने पार्टी के कार्यकर्ताओं और देश के करोड़ों मतदाताओं का प्यार कमाया। इसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की। पूरे देश से उनके लिए भावनात्मक संदेश आ रहे हैं। आज परेशानी के समय में हमें यह जरूर जानकारी होनी चाहिए कि कॉन्ग्रेस पार्टी कई चुनौतियों का सामना कर रही है।”

कॉन्ग्रेस पार्टी में राजनीतिक संकट की पृष्ठभूमि में पार्टी संसदीय दल की नेता सोनिया गाँधी ने शनिवार (जून 01, 2019) को कहा कि कॉन्ग्रेस को फिर से मजबूत करने के लिए कई निर्णायक कदमों पर चर्चा चल रही है। सोनिया को नई दिल्ली में पार्टी संसदीय दल की बैठक में नेता चुना गया। इससे पहले वह भी वह संसदीय दल की नेता की भूमिका निभा रही थीं। संसदीय दल की बैठक में उन्होंने कहा, “हमारे कार्यकर्ता हमारे अग्रिम मोर्चे के सैनिक हैं। उन्होंने पिछले पांच वर्षों में नि:स्वार्थ भाव से काम किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि जिस भारत के लिए हम लड़ रहे हैं, उससे जुड़ी भावना का विस्तार देश के कोने-कोने में हो।”

कॉन्ग्रेस को वोट ना देने वाले लोगों के आँकड़े को बड़ी चालाकी से हटाकर सोनिया गाँधी ने सिर्फ कॉन्ग्रेस को ही वोट देने वाले लोगों को ही धन्यवाद देते हुए सोनिया ने कहा, ‘‘मैं अपने कार्यकर्ताओं का धन्यवाद करना चाहती हूँ, जिन्होंने सत्तारूढ़ पार्टी की शत्रुता का सामना किया। यह उनकी मेहनत और धैर्य का परिणाम है कि देश के 12.3 करोड़ लोगों ने कॉन्ग्रेस में अपना विश्वास प्रकट किया। मैं इस मौके पर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का धन्यवाद करना चाहती हूँ, जिन्होंने पूरी मेहनत से प्रचार अभियान चलाया। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने पार्टी के लिए दिन-रात एक कर दिया।”

रोजगार पर ज्ञान देने वाले ज्ञानी समुदाय के नाम

कुछ सेंसिबल लोगों को जब ‘रोजगार’ पर सरकार को अभी भी घेरते देखता हूँ तो मन बहुत करता है कि कुछ लिखूँ न लिखूँ, एक-दो लिंक ही दे दूँ कि आदमी पढ़ ले कि जिस 45 साल में सबसे ज्यादा दर पर हल्ला कर रहे हो, उसी मंत्रालय ने, उन्हीं अख़बारों ने, यह भी लिखा है कि निर्धारण के मानक बदल दिए गए हैं, इसलिए पिछले डेटा के आधार पर तुलना गलत है।

यही कारण है कि वो महान हस्तियाँ अब विडियो पर खुद स्वीकार रही हैं कि उनसे समझने में गलती हुई कि मोदी की योजनाओं का लाभ किसी को नहीं मिला। सत्य यह है कि रोजगार के जितने अवसर पिछले पाँच साल में बने, और लोगों को चाहे स्वरोज़गार से जीवनयापन का तरीका मिला हो, या फिर इन्फ़्रास्ट्रक्चर बनने के कारण, वो पहले नहीं हुआ

तुम ढोल पीटते रहो, रोते रहो कि नौकरी मतलब सरकारी नौकरी, एसी में बैठने वाली नौकरी। जबकि भारत जैसी जनसंख्या वाले देश में, जो समय-समय पर, वैश्विक प्रोसेस या तय तरीक़ों से अलग स्टेप को स्किप करते हुए, जम्प करते हुए, आगे बढ़ रहा है तो वो वहाँ सरकारी नौकरियों की कमी होती रहेगी। साथ ही, लगभग 90% लोग असंगठित क्षेत्रों में यहाँ रोजगार पाते हैं।

मतलब यह है कि आप माइक लेकर इस जनता के बीच जाइएगा तो आपको हमेशा बेरोज़गारी दिखेगी क्योंकि यहाँ नौकरी का मतलब सरकारी नौकरी है। उस सरकारी नौकरी में जाने का पहला कारण, बहुत बड़े प्रतिशत का, आराम करना और घूस लेने से लेकर ‘पावर मिलता है भैया’ होती है।

सारे ऐसा नहीं करते लेकिन सरकारी विभागों की इनएफिसिएंसी का ज़िम्मा तंत्र के साथ-साथ ‘अब तो लंच हो गया है’ वाले एटीट्यूड वालों को भी लेना होगा। आप खूब आदर्श व्यक्ति होंगे लेकिन आप बहुसंख्यक नहीं हैं।

सच्चाई यही है कि ट्रेडिशनल सरकारी नौकरियाँ कम होंगी क्योंकि नई तकनीक आ रही है। आप दिल्ली यूनिवर्सिटी में सिर्फ एडमिशन को ऑनलाइन कर पाए हैं और कर्मचारी यूनियन अभी भी दसियों फ़ॉर्म पेपर पर माँगता है क्योंकि वो वहाँ कम्प्यूटर नहीं चाहता, भले ही विद्यार्थी का खूब समय नष्ट हो। लेकिन ऐसे लोग एक दिन खत्म होंगे। नया विभाग बनेगा, नए अवसर पैदा होंगे।

ये एक नैसर्गिक चाल है। बाकी, अगर आप रोजगार के तमाम आँकड़ों को न मान कर ‘मैं जब मुखर्जीनगर पहुँचा तो वहाँ सारे युवा बेरोज़गार थे’ वाला लॉजिक लेकर चलिएगा तो मैं कहूँगा कि ‘मैं जब सायबर हब पहुँचा तो वहाँ सारे लोग लाखों की सैलरी पाने वाले थे, भारत बदल गया है, बेरोज़गारी शून्य प्रतिशत है’। जबकि, जितने गलत आप हैं, उतना नहीं तो थोड़ा कम गलत तो मैं भी हूँ।

फेसबुक पर मुद्दों की बात करना आपको बॉन्ड जरूर बना देगा, लेकिन आप सही नहीं हैं। एक पक्ष का डेटा लेना छोड़िए। आपके घर के आगे की सड़क टूटी है तो पूरे देश की सड़क टूटी है, ऐसा मत लिखिए। आप बेरोज़गार हैं, आप तबाह हैं, आप परेशान हैं नौकरी में तो उसके कई कारण हो सकते हैं। लेकिन, आपकी परेशानी पूरे युवा वर्ग की परेशानी नहीं है। खुद को यूनिवर्स मत समझिए, न ही उस व्यक्ति को जो हर शाम टीवी पर झूठ बोलता है और झूठ पकड़े जाने पर शेखर गुप्ता की तरह हिम्मत नहीं दिखाता कि सही बोल सके।

खैर, मुझे क्या। मैं इतनी नकारात्मकता लेकर नहीं चलता, न ही मुझे शौक है इस बात को भूलने का कि भारत में 130 करोड़ लोग हैं, आधे से ज़्यादा युवा और उनको जिस तरह की शिक्षा मिली है, जहाँ से भेड़चाल में वो सब कुछ बन गए, जिसमें उनकी रुचि नहीं थी, वो रोजगार के लिए सरकारी ऑफ़िस ढूँढ रहे हैं।

आप बेशक ढूँढते रहिए, अवसाद में चेहरा मलिन कर लीजिए लेकिन बता देता हूँ कि इस अर्थव्यवस्था में, इस जीडीपी के साथ, इस जनसंख्या के साथ, न तो आप बेहतर शिक्षा दे सकते हैं, न पोषण, न सबको सरकारी या संगठित क्षेत्रों में रोजगार। वो असंभव है इसलिए पीएचडी वाले चपरासी की नौकरी पाना चाहते हैं क्योंकि उनकी पीएचडी 5000 में ख़रीदी गई है, उन्होंने एमए कर लिया है लेकिन विषय का ज्ञान नहीं है, वो बीटेक हैं लेकिन वो नौकरी दिए जाने योग्य नहीं हैं।

अभी जो आँकड़े आए हैं उन तक पहुँचने के लिए मंत्रालय ने जो मानक तय किए थे, वो पिछली बार से बिलकुल अलग हैं। 2011-12 तक के सर्वेक्षणों में सैम्पल के रूप में लिए जाने वाले गाँवों/ब्लॉक्स में घरों के मासिक ख़र्च के आधार पर रोजगार और बेरोज़गारी के आँकड़े इकट्ठा किए जाते थे। इस बार मानक बदल कर लोगों की शिक्षा और आकांक्षाएँ हैं।

इसका मतलब है कि लोगों की शिक्षा का स्तर बढ़ा है और वो संगठित क्षेत्रों में, ज्यादा वेतन वाली नौकरियाँ करना चाहते हैं, न कि असंगठित क्षेत्रों में लेबर या वर्कफोर्स यानी कम पैसे वाली और एक तरह से मज़दूरी का काम। ये हमारे लिए सौभाग्य और दुर्भाग्य दोनों ही है। अच्छी बात यह है कि शिक्षा का स्तर बढ़ा है, लेकिन दुर्भाग्य यह कि जनसंख्या इतनी ज़्यादा होने के कारण हर व्यक्ति की आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया जा सकता।

स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल आदि बनाने की बातें होती हैं। मैनुफ़ैक्चरिंग पर ध्यान देने की बातें होती हैं, निवेश लाने की बातें होती हैं, लेकिन ये सारी बातें सिर्फ एक सरकार पर निर्भर नहीं। निवेश या विदेशी कम्पनियों की भागीदारी के लिए दूसरे देश और यहाँ की सरकारों द्वारा तय नियमों का पालन भी ज़रूरी है। ऐसा नहीं है कि उस पर काम नहीं हो रहा। काम हो रहा है लेकिन वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका चीन से उलझा हुआ है, चीन भारत में सामान डम्प करता है, वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइज़ेशन के नियमों से भारत के हाथ बँधे हुए हैं।

इन सारी दिक़्क़तों को दूर करने के लिए डिप्लोमैटिक स्तर पर बातचीत ज़रूरी है। उसके बाद, भारत के कॉलेजों से निकलने वाले ग्रेजुएट या नौकरी की तलाश करते लोगों की दक्षता पर हमेशा सवाल उठे हैं। कई बार, कई बड़ी कम्पनियों ने सीधे तौर पर कहा है कि भारतीय कॉलेजों के 70% इंजीनियर काम देने योग्य नहीं होते। ये एक सतत प्रयास से दूर होगा और उसमें समय जाएगा।

सरकार जो त्वरित प्रयास कर सकती थी, वो किया है। उसमें अगर सुधार की आवश्यकता है तो वो भी होंगे। आपके पास कुछ काम का आइडिया है तो आपको लोन लेने में आसानी होगी। लाखों लोगों ने मुद्रा लोन लिया है, और वो दूसरों को भी रोजगार दे रहे हैं। भले ही सरकार के मुँह से निकलने वाले इन आँकड़ों को आप नकारते रहें, लेकिन उससे सत्य बदल नहीं जाता। आप उसी सरकार के दूसरे आँकड़े पर हल्ला कर रहे हैं क्योंकि वो आपके विचारों के अनुकूल है।

हमारी समस्या यह है कि हम संदर्भ से परे, योग्यता की उपेक्षा करते हुए नौकरी तलाशते युवा वर्ग को एक ही खाँचे में रख देते हैं मानो पूरा युवा वर्ग एक तरह की दक्षता के साथ नौकरी ढूँढ रहा है। जबकि ऐसा नहीं है। इसमें एक बड़ा हिस्सा उन लोगों का है, जो हमारे दोस्त हैं, और हम जानते हैं कि उन्होंने आँख मूँद कर एक तरह की डिग्री ले ली। हम शायद जानते हैं कि उनके पास सिर्फ डिग्री ही है, योग्यता नहीं।

इसमें भी दोष सिस्टम का है, लेकिन उतना ही दोष आपका भी कि आपने गलत योग्यता पाने की कोशिश की, जबकि आपको पता होना चाहिए था कि इस डिग्री के साथ नौकरी मिलनी मुश्किल है। हर डिग्रीधारी न तो एक स्तर की योग्यता रखता है, न ही सारे नकारे होते हैं। एक ही क्लास के बच्चे को कैम्पस सलेक्शन से नौकरी मिलती है, बहुतों को नहीं। इन बातों को हम नकार देते हैं क्योंकि सरकारों को कोसने में आसानी हो जाती है।

इसलिए असंगठित क्षेत्र में एक लेबर फ़ोर्स की तरह काम करना भी रोजगार है। उससे भी घर चलता है, वो भी काम है। अपनी शिक्षा या डिग्री का दंभ मत पालिए, आप सक्षम हैं तो नौकरी है। नौकरी खत्म है तो आपको अपना स्किल सेट दोबारा डेवलप करना होगा। लोन लीजिए सरकार से, दूसरों को रोजगार दीजिए।

क्या ये इतना आसान है? जी नहीं, फेसबुक पर रोने और ज्ञान देने से बहुत कठिन है। आप बिना भविष्य को देखे इंजीनियरिंग क्यों पढ़ रहे हैं? आपको ये समझ में नहीं आता कि जितने लाख ये पढ़ाई कर रहे हैं उतनी नौकरियाँ नहीं हैं? आपने कुछ दूसरी चीज सोची कभी करने को?

क्या इस देश में 25 करोड़ लोगों को नौकरी मिल सकती है? नहीं। यह एक सत्य है। रोजगार मिल सकता है, पेट भरा जा सकता है। रोजगार के मौके मिल सकते हैं लेकिन यह कहना कि मेरे पास बीटेक या एमबीए की डिग्री है लेकिन रोजगार नहीं, वो तो पूरी तरह से सरकार पर आरोप फेंकने की बात है क्योंकि आपने रोजगार के बाज़ार को सही से नहीं पढ़ा। आप अपनी ज़िम्मेदारी लीजिए। सारी ज़िम्मेदारी सरकार की नहीं है। कुछ आपकी भी है।

सरकार जो कर सकती है, कर रही है, आगे भी करेगी। आप खुद पर थोड़ा ब्लेम लेना सीखिए। तंत्र अगर पचास सालों से बेकार बनाया गया है तो उसे ठीक होने में भी एक पीढ़ी निकल जाएगी। लेकिन आपको क्या, आप एक तरह की चीज पढ़िए, जनसंख्या को भूल जाइए और चिल्लाइए कि रोजगार नहीं हैं। आपका दुर्भाग्य कि आँकड़े आपकी भाषा नहीं बोलते।

फोन पर ‘हैलो’ नहीं, ‘जय बांग्ला/ जय हिंद’ बोलेंगे TMC कार्यकर्ता: ममता बनर्जी का फ़रमान

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और बीजेपी के बीच सियासी जंग थमने का नाम नहीं ले रही है। वैसे तो बंगाल में हो रही हिंसात्मक गतिविधियाँ आए दिन सुर्ख़ियों में नज़र आती रहती हैं, लेकिन ममता बनर्जी द्वारा एक फ़रमान जारी करने की ख़बर सामने आई है। इस आदेश के अनुसार अब TMC कार्यकर्ता फोन पर ‘हैलो’ की जगह ‘जय बांग्ला’ या ‘जय हिंद’ बोलेंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने कार्यकर्ताओं को यह निर्देश ‘जय श्रीराम’ के नारे से तंग आकर दिया है।

इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि एक जनसभा को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी कह रही हैं कि वो ‘जय बांग्ला’ एक बार नहीं, हज़ार बार भी नहीं बल्कि लाख बार बोलने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि ‘जय हिंद’ पर किसी समुदाय का एकाधिकार नहीं है क्योंकि यह स्लोगन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दिया था। अपने संबोधन में उन्होंने फोन पर और सड़क पर चलते-फिरते भी ‘जय हिंद’ बोलने की अपील की। कड़े शब्दों में ममता ने कहा, “बाहर से आए लोग हमारी संस्कृति को ख़त्म करने में लगे हैं, लेकिन हमारी संस्कृति इतनी सस्ती नहीं है।”

जनसभा को संबोधित करते समय ममता दीदी के मुँह से निकले शब्द काफ़ी तल्ख़ अंदाज़ में बाहर आ रहे थे। उनके इस ग़ुस्से को देखकर यही लग रहा था जैसे वो राज्य में ‘जय श्रीराम’ के नारे से बेहद आहत हों। ‘जय श्रीराम’ के नारे से तिलमिलाई ममता ने अपनी भड़ास निकालने के लिए ‘जय बांग्ला’ और ‘जय हिंद’ शब्दों का इस्तेमाल शायद एक विकल्प के रूप में चुना है। शब्दों को लेकर ममता बनर्जी की यह सोच उनकी कुंठित मानसिकता को उजागर करती है।

दरअसल, पिछले काफ़ी समय से ममता बनर्जी ‘जय श्रीराम’ के नारे को लेकर सुर्ख़ियों में छाई हुईं हैं। कोलकाता के मेदनीपुर और बैरकपुर में ममता बनर्जी के क़ाफ़िले के सामने जब कुछ लोगों ने ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए थे, तो ममता दीदी न सिर्फ़ उन पर भड़कीं थीं बल्कि वो उनके ख़िलाफ़ कड़ी क़ानूनी कार्रवाई कराने के निर्देश तक दे दिए थे।

गुरूवार (31 मई) को भी एक ऐसा मामला सामने आया था जब ममता बनर्जी अपने क़फ़िले के साथ जा रही थीं और उस समय जय श्रीराम का नारा लगाने वाले 10 लोगों के ख़िलाफ़ ज़मानती धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। ममता बनर्जी को ‘जय श्रीराम’ का नारा इतना नागवार लगता है कि वो तुरंत अपनी गाड़ी से उतरती हैं और नारा लगाने वालों को ख़ूब डाँटती-फटकारती हैं। कहने को तो ममता ने यह बात स्वीकारी थी कि वो बंगाली और बिहारी में कोई भेदभाव नहीं करतीं, लेकिन असलियत इससे परे है।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या की ख़बर लगातार सामने आती रहती हैं। 30 मई को 52 वर्षीय बीजेपी कार्यकर्ता सुशील मंडल की हत्या सिर्फ़ इसलिए कर दी गई थी क्योंकि वो प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण के एक दिन पहले पार्टी के झंडे सजा रहे थे और ‘जय श्रीराम’ का नारा लगा रहे थे।