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कभी-कभी लगता है मैं स्वयं ही ‘बेरोज़गारी’ हूँ: रवीश, रोज़गार और आँकड़े

CMIE एक संस्था है जो भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजर रखती है और रोज़गार आदि से संबंधित आँकड़े और सर्वेक्षण आदि भी करती रहती है। उसी के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ हैं महेश व्यास। व्यास जी बिजनेस स्टैंडर्ड में कॉरपोरेट में रोज़गारों की स्थिति पर लिखने की कोशिश की। कोशिश ही कहूँगा क्योंकि जब व्यक्ति बहुत ज़्यादा आँकड़े फेंकता है, और हर पैराग्राफ़ में प्रतिशत और इन्फ्लेशन जैसी भारी बातें करता है, तो उसका मक़सद एक ही होता है कि डेटा को टॉर्चर करते हुए अपने मन की बात क़बूल करवा लेना।

आर्टिकल को ज़बरदस्ती का कॉम्प्लेक्स बना देना एक अच्छी ट्रिक है। आँकड़े भर दीजिए आदमी पागल होता रहे। महेश व्यास का वो आर्टिकल वैसी ही एक कोशिश है। वहाँ उन्होंने बताया है कि उनके संगठन के आँकड़ों के हिसाब से कॉरपोरेट सेक्टर में नौकरियों में धीमापन आया है। ध्यान रहे कि जो शब्द उन्होंने इस्तेमाल किया वो ‘स्लोडाउन’ है, यानी धीमापन, न कि कमी आना, या नकारात्मक में जाना। जैसे कि अगर हर साल दस प्रतिशत की गति से रोजगार के अवसर आते थे, तो इस बार आठ प्रतिशत की ही दर है। अगर यह दर कुछ सालों तक ऊपर न उठे, तो उसे स्लोडाउन कहेंगे।

महेश व्यास के आर्टिकल की तस्वीर

लेकिन, यही प्रतिशत नकारात्मक होकर, 100 की जगह 95 नौकरी पर पहुँच जाए, तब कहेंगे कि नई नौकरियों का सृजन नहीं हो पा रहा है। खैर, महेश व्यास के आर्टिकल में दो मुख्य बातें हैं, जो समझनी जरूरी है, वरना रवीश कुमार टाइप अवसाद से आप मर जाएँगे। रवीश कुमार ने आँकड़ों को समझने की कोशिश किए बिना, अनुवाद कर दिया। वहाँ उनको ‘जॉब’ और ‘स्लोडाउन’ दिखा, बस अनुवाद कर के मोदी को लपेट लिए।

रवीश अपने पूर्वग्रहों के साथ अनुवाद करने बैठे क्योंकि बेरोज़गारी उनका फ़ेवरेट मुद्दा है जबकि सरकार ने हर साल लगभग एक करोड़ से ज़्यादा रोज़गार सृजन किए हैं। सरकारी आँकड़ों और रोज़गारों की बात आगे विस्तार से करेंगे, फ़िलहाल यह देखते हैं कि रवीश ने महेश व्यास के जटिल आर्टिकल को कहाँ गलत समझा।

जब मुद्रास्फीति या इन्फ्लेशन उच्च स्तर पर होता है, तो नौकरी देने वाली संस्था भी अपने कर्मचारियों की वेतन में सालाना वृद्धि करते हुए, सैलरी की वृद्धि की दर ज़्यादा रखते हैं। मतलब यह कि अगर आपकी सैलरी पिछले साल मार्च में 100 रुपए थी, इन्फ्लेशन 8% था, तो कम्पनी इस बात को ध्यान में रखते हुए, आपकी सैलरी में इस साल 12% की वृद्धि करेगी। ये बस उदाहरण है, लेकिन सामान्यतया तर्क यही होता है।

अब याद कीजिए 2009-14 का दौर जब इन्फ्लेशन बहुत ज़्यादा था। ज़ाहिर है कि औसत सैलरी वृद्धि भी ज़्यादा हुई थी। उसके बाद आई मोदी सरकार, जिसने इन्फ्लेशन पर लगाम लगाई, और महँगाई की दर को क़ाबू में किया। फिर क्या होगा? फिर जहाँ आपकी सैलरी मार्च 2013 से मार्च 2014 में 112 रुपए तक पहुँची, वहीं मार्च 2018 में 100 रुपए पाने वाले को मार्च 2019 में कम इन्फ्लेशन के कारण 107 रुपए तक ही पहुँचेगी।

अब एक बार और इन्फ्लेशन को समझिए कि अगर महँगाई की दर कम हो तो आप उसी 10 रुपए में एक किलो सब्जी ख़रीद सकते हैं, जो पहले 12 रुपए में ख़रीदते थे। यानी, आपके पास जो सैलरी बढ़कर आई है, वो भले ही प्रतिशत के हिसाब से कम हो, पर बाज़ार में चीज़ों के मूल्य कम रहने से, आपके दैनिक या मासिक बजट पर फ़र्क़ पड़ने नहीं दे रहा। मतलब 2009 की 12% वृद्धि 2019 के 7% के बराबर हो सकती है, अगर इन्फ्लेशन एडजस्ट किया जाए।

महेश व्यास जी ने अपने आर्टिकल में एक चालाकी कर दी। व्यास जी ने यह तो बता दिया कि कैसे 2013-14 में सैलरी में औसत वृद्धि 25% की थी, लेकिन वो ये बताना भूल गए कि 2014 से मोदी सरकार के आते ही न सिर्फ सैलरी वृद्धि दर आधी हुई बल्कि इन्फ्लेशन भी 11 और 9% की जगह 5 और 6% तक गिरते हुए, 2016 में 2.23 और 2017 में 4% तक आ गया था। बाकी की जानकारी इन ग्राफ़ में आप देख सकते हैं।

महेश व्यास ने अपने लेख में 2009-14 के बढ़े हुए इन्फ्लेशन का ज़िक्र नहीं किया

फिर से महेश व्यास जी आँकड़े को देखें, तो पता चलता है कि सैलरी की वृद्धि का प्रतिशत इन्फ्लेशन के अनुपात से ही घटा और बढ़ा है लेकिन चालाकी यही होती है कि आप 25% वृद्धि की बात तो कह देते हैं, लेकिन सरकार ने महँगाई पर रोक लगाई, वो कहने में आपकी नानी मरती है। उसके बाद बहुत सारे प्रतिशतों की बात हुई है, और बताया गया है कि इन्वेस्टमेंट आदि के कारण कॉरपोरेट सेक्टर में नौकरियाँ पहले की तरह से नहीं बढ़ रहीं।

नई नौकरियाँ मिलीं या नहीं?

वैसे तो इसके कई कारण हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में ऑटोमेशन, नई तकनीक आदि और वैश्विक मंदी भी इनमें आए धीमेपन के कारण माने जाते हैं। महेश व्यास ने शुरुआती पैराग्राफ़ में एक माहौल बनाया कि लोगों को बड़े कॉरपोरेट हाउसेज़ में नौकरियाँ चाहिए, वो वहाँ काम करना चाहते हैं। यहाँ उन्होंने चाहने की बात की, और यह भूल गए कि कई सर्वेक्षणों में कई बार यह भी कहा है कि भारत के 70-90% इन्जीनियर्स काम करने के लिए अयोग्य होते हैं, और उन्हें ट्रेनिंग देनी पड़ती है।

नौकरी चाहने और नौकरी योग्य होने में बहुत अंतर है। वर्ल्ड बैंक के एक आँकड़े के अनुसार भारत में 91% लोग अव्यवस्थित क्षेत्रों, यानी अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर, में काम करते हैं। महेश व्यास जी की ही कम्पनी ने एक और सर्वे किया जिसमें पता लगा कि पिछले तीन सालों में कुल 7.19 करोड़ नौकरियों का सृजन हुआ है। इसमें से एक बड़ा हिस्सा, 6.9 करोड़ बारहवीं या उससे कम शिक्षित लोगों के लिए है।

अब इसमें वर्ल्ड बैंक का ऊपर का प्रतिशत लगाइए कि 91% रोजगार अव्यवस्थित क्षेत्रों में है, तो लगभग तस्वीर समझ में आ जाती है। साथ ही, दो-तीन बार अलग-अलग सर्वे से (मोहनदास पई और यश बेद) हमारे पास लगातार यह आँकड़े आए हैं कि सिर्फ ऑटोमोबाइल सेक्टर से 1.4 करोड़ और प्रोफ़ेशनल सेक्टर से 40 लाख नई नौकरियों का सृजन हुआ है। इसी तरह, CII द्वारा जारी आँकड़ों के हिसाब से MSME सेक्टर में, मोदी सरकार के कार्यकाल में, लगभग 6 करोड़ लोगों को रोजगार मिला है।

आप चाहें, तो रवीश कुमार की तरह माइक लेकर मुखर्जी नगर चले जाएँ और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लगे प्रत्याशियों की भीड़ दिखाकर कह दें कि यहाँ तो हर कोई बेरोज़गार ही है, या फिर देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए, यहाँ की दुःखद शिक्षा व्यवस्था के सामने, इन आँकड़ों को मानें कि हाँ, नौकरियों का सृजन हुआ है।

ये बात और है कि रवीश कुमार जैसे लगो जब रोजगार की बात करते हैं तो उनके लिए देश का हर युवा आईएएस या सीईओ होना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है। ऐसी नौकरियाँ हमेशा घटती रहेंगी क्योंकि नई तकनीक, और नई ज़रूरतों के हिसाब से कम लोग, पहले के सारे काम निपटाने में सक्षम होंगे। ये एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, इसमें सरकार को कोसना मूर्खता है। नई तरह की नौकरियाँ आएँगी, लेकिन पुरानी में गिनती घटेगी।

सरकार को हम तब कोस सकते हैं जब हम यह कहेंगे कि शिक्षा व्यवस्था क्यों नहीं सुधर रही, शोध और उच्च शिक्षा पर पैसे क्यों नहीं दिए जा रहे। लेकिन ऐसा तंत्र बनाने में लम्बा समय जाता है, और हमारे देश का दुर्भाग्य देखिए कि सत्तर सालों में दो से ढाई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ही आ पाई है। खैर, यह एक अलग ही विषय है, जिस पर फिर कभी चर्चा होगी।

यहाँ, दोबारा महेश व्यास जी और रवीश कुमार की बात करना चाहूँगा कि एक ही संस्था ने यह आँकड़े दिए हैं, जहाँ रोज़गारों में वृद्धि भी हुई है, और इन्फ्लेशन घटा है। फिर रवीश कुमार किस आधार पर रोज़गार का राग हर दिन अलापते हैं, पता नहीं। आप अपने देश की स्थिति अगर नहीं समझ रहे, और आपको यहाँ का हर व्यक्ति वॉल स्ट्रीट में काम करता दिखना चाहिए, तो आप सपनों की दुनिया से बाहर आइए। वहाँ तक पहुँचने के लिए पूरा तंत्र खड़ा करना होता है। पहले सीवेज़ ट्रीटमेंट प्लांट बनाना पड़ता है, तब जाकर गंगा साफ दिखती है। लेकिन आपको पहले गंगा साफ चाहिए, प्लांट बनाने की क़वायद आपको करनी ही नहीं।

नौकरी, जॉब, सैलरी, मज़दूरी आदि का सच

हम इन बातों से दूर नहीं भाग सकते कि पकौड़ा बेचना भी किसी के लिए नौकरी है। किसी के लिए ही नहीं, बल्कि बहुत लोग स्ट्रीट फ़ूड को एक व्यवसाय के रूप में करते हैं, और उतने पैसे कमाते हैं कि परिवार का पोषण कर सकें। इसे आप जेनरलाइज़ कर के यह कह दें कि मोदी ने कहा कि सबको पकौड़ा तलना चाहिए, तब आप धूर्त हैं।

काम या रोज़गार की परिभाषा यह नहीं है कि सरकारी नौकरी ही मिले, या किसी कॉरपोरेट हाउस में ही सैलरी वाली जॉब हो। बल्कि रोजगार का मतलब यह है कि आप कुछ काम करते हैं जिससे आपको आमदनी होती है, आपका घर चलता है। परिवार भूखा नहीं सोता। ऐसा भी नहीं है कि देश में हर व्यक्ति को रोज़गार मिल गया है, और कोई भी भूखा नहीं मर रहा। ये समस्याएँ हमारे देश में हैं, और हमारी बढ़ती जनसंख्या के कारण रहेंगी।

आप खूब ख़याली पुलाव बना लें कि सबको रोजगार देंगे, लेकिन जब तक जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं होगा, आपकी बड़ी आबादी कम क्लास तक ही पढ़ेगी और उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा या तो सर पर ईंट ढोएगा, या स्विगी आदि में डिलीवरी ब्वॉय बनेगा। वो भी नौकरियाँ हैं, लेकिन हर वो व्यक्ति जो वैसी नौकरी कर रहा है, वही नौकरी करना चाहता हो, ऐसा भी नहीं।

रवीश कुमार ने अपने चिर-परिचित अंदाज में अपने लेख में लिखा कि वो कई बैंकरों से मिले और उन्होंने इन्हें बताया कि काम करने के हालात खराब हुए हैं। फिर उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि इन हालात में भी कई बैंकर मोदी-मोदी कर रहे हैं। मतलब, रवीश को बैंकरों की स्थिति से कुछ लेना-देना नहीं है, उनके दुःख और प्रलाप का कारण यह है कि ये लोग मोदी-मोदी क्यों कर रहे हैं।

वैसे ही, लेख की शुरुआत में रवीश कुमार ने बताया कि पिछले कुछ सालों में देश से 36 बिज़नेसमैन फ़रार हैं और रवीश जी को चार नाम ही मालूम हैं- नीरव मोदी, माल्या, मेहुल चौकसी और संदेसरा बंधु। चालाक पत्रकार आधी बात बता कर यह जताना चाहता है कि ये लोग मोदी के कार्यकाल में फ़रार हो गए। लेकिन रवीश ने अपनी खोजी पत्रकारिता से यह नहीं बताया कि इन बिज़नेसमैन के घोटालों के समय सरकार किसकी थी?

रवीश कुमार ने यह लिखने की ज़हमत नहीं उठाई कि किस सरकार ने इन्हें भागने से रोकने, और भाग जाने के बाद विदेशों से यहाँ लाने के लिए कानून बनाए। रवीश कुमार आधा लिखते हैं, आधा अनुवाद करते हैं, और पूरे समय कहते हैं टीवी मत देखिए, लेकिन टीवी पर आना बंद नहीं करते। रवीश कुमार, कुल मिलाकर, एक अवसादग्रस्त व्यक्ति में बदल चुके हैं जो अब इस बात से नाराज है कि लोगों को मोदी में आशा क्यों दिख रही है।

रवीश कुमार अनुवादित ज्ञान पूरा दे देते हैं और लोगों को कोस लेते हैं कि वो बेरोज़गारी में भी मोदी-मोदी क्यों कर रहे हैं, लेकिन वो कोई विकल्प नहीं दिखा पाते। रवीश कुमार अपने तमाम लेखों में यह नहीं बता पाए हैं कि पिछले किन सरकारों के कौन से नेता वैसे हैं जो विजन लेकर घूम रहे हैं रैलियों में और बता रहे हैं कि अगर उनकी सरकार आई तो इस तरह से नौकरियाँ बढ़ेंगी।

रवीश कुमार, इसके उलट, कॉन्ग्रेस के ‘न्याय’ में आशा देख लेते हैं जो कि बेरोज़गारों को और भी नकारा बनाने की एक तकनीक है। एक उत्थानोन्मुखी राष्ट्र धीरे-धीरे सब्सिडी घटाता है, और अपनी जनसंख्या को क़ाबिल बनाता है कि वो स्वयं अपना पोषण कर सके। एक विजनरी नेता अपनी जनता को सक्षम बनाने के लिए प्रयासरत रहता है कि उसके पास निपुणता आए, और वो स्वयं ही सरकारी सहयोग राशि लेना बंद कर दे।

लेकिन रवीश को पंगू बनाने वाली उस स्कीम में आशा दिखती है जिसके संचालक को जीडीपी के नौ प्रतिशत और बजट के नौ प्रतिशत का फ़र्क़ पता नहीं। वो वहाँ राहुल गाँधी में आशा देखते हैं जिसे यह पता नहीं कि तीन प्रतिशत के वित्तीय घाटे में चलता देश, लगभग 90% आबादी को ‘न्याय’ योजना के ₹72,000 सालाना कहाँ से लाकर देगा?

इसलिए हे रवीश, अपने आप को ज़लील करना बंद करो। अनुवाद करो, तो थोड़ा दिमाग लगाया करो। आप एंकर हैं, वित्तीय और आर्थिक मामलों के जानकार नहीं। अंग्रेज़ी पढ़ कर, कीवर्ड देखने के बाद, लपलपाती जीभ निकालकर आप ‘जॉब’ और ‘स्लोडाउन’ का अनुवाद बेशक कर देंगे, लेकिन आप यह भूल जाएँगे कि सैलरी वृद्धि और इन्फ्लेशन का क्या संबंध है।

इसलिए, अपने होने का घमंड मत करो हे रवीश! चूँकि आपने बेरोज़गारी पर खूब लिखा है, इसका मतलब यह क़तई नहीं है कि आप सच ही लिख रहे हो। आपने नौकरियों पर शृंखला की, जो काबिलेतारीफ है, लेकिन वो सिस्टम आज का नहीं है, न ही जल्दी सही हो पाएगा। सुप्रीम कोर्ट में एसएससी के रिजल्ट को लेकर हर साल बवाल होता है।

आप जब भी बेरोज़गारी की बात करें, और सबको टाई पहनाकर, काले जूतों में गुड़गाँव भेजने की मंशा रखें, तब यह आँकड़ा भी ज़रूर दें कि किस सरकार में जनसंख्या का कितना प्रतिशत इस तरह के रोजगार में शामिल था, और दुनिया में ऐसे रोज़गारों की क्या स्थिति है। आप यह भी आँकड़ा लाकर दें कि कॉलेज से भारत की कितनी बड़ी जनसंख्या पहले निकलती थी, कितने प्रतिशत को नौकरी मिलती थी, अब कितनी निकलती है, कितने प्रतिशत को नौकरी मिलती है, एवम् नौकरियों को लेकर वैश्विक परिदृश्य कैसा है।

रवीश कुमार और उनके जैसों की समस्या है कि वो आँकड़ों को संदर्भ से हटा कर, आदर्श स्थिति में देखते हैं। स्थिति आदर्श नहीं है, संदर्भ हमेशा रहेंगे। आप 2012-13 के 25% हाइक की बात कर देंगे, लेकिन उस साल का इन्फ्लेशन बताना ज़रूरी नहीं समझेंगे। इसी को कहते हैं संदर्भ हटाना, और गुलाबी समाँ बनाना कि आहा! मनमोहन सिंह के समय कितनी नौकरियाँ थीं, कितनी सैलरी बढ़ी होती थी। आप भूल जाते हैं कि मनमोहन सिंह के समय दाल और प्याज की क़ीमत कितनी हुआ करती थीं।

इसलिए हे रवीश! दिन-रात बेरोज़गारी पर लिख-लिख कर, आपको हप्पू सिंह की उलटन-पलटन के बेनी की तरह यह अहसास होने लगा है कि आप स्वयं ही बेरोज़गारी का मूर्त स्वरूप हैं। ऐसा मत कीजिए अपने साथ, अच्छा नहीं लगता। डेटा छुपाना गलत बात है, एकदम गलत बात।

चुनाव आयोग की सिफारिश पर वेल्लोर चुनाव रद्द, द्रमुक नेता के पास से बरामद हुए थे ₹11 करोड़ से ज़्यादा

चुनाव आयोग ने चुनावी भ्रष्टाचार पर चाबुक चलाते हुए वेल्लोर के लोकसभा चुनावों को फ़िलहाल रद्द करवा दिया है। ऐसा लोकसभा क्षेत्र के द्रमुक उम्मीदवार से जुड़े सीमेंट गोदाम से कथित तौर पर ₹11.5 करोड़ की नकदी बरामद होने के बाद किया गया है। भारत के चुनावी इतिहास में यह पहली घटना है जब भ्रष्टाचार की आशंका के चलते किसी सीट पर लोकसभा मतदान रद्द किए जा रहे हैं। मीडिया में कथन जारी करते हुए चुनाव आयोग ने अपनी इस सफलता की जानकारी दी।

राष्ट्रपति से की थी अनुशंसा, तमिलनाडु से अब तक ₹500 करोड़ की नकदी और सोना बरामद

चुनाव आयोग ने गत 14 अप्रैल को राष्ट्र्पति रामनाथ कोविंद से वेल्लोर के चुनाव रद्द करने की सिफारिश की थी, जिसे उन्होंने विचार करने के उपरांत स्वीकार कर लिया है। वेल्लोर में लोकसभा चुनावों के दूसरे चरण के अंतर्गत तमिलनाडु की बाकी 38 सीटों सहित 18 अप्रैल को चुनाव होना था।

अब चुनाव आयोग 23 उम्मीदवारों वाली इस सीट पर चुनाव के लिए नई तारीख तय करेगा। इस बीच तमिलनाडु में ₹500 करोड़ की नकदी और सोना बरामद किया जा चुका है। इसके अलावा जिले की पुलिस ने आयकर विभाग, जिसने यह छापा और बरामदगी की थी, की 10 अप्रैल की रिपोर्ट पर आरोपियों, डीएम कातिर आनंद व दो द्रमुक पदाधिकारियों, के खिलाफ़ मामला दर्ज कर लिया है। अब कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। आनंद द्रमुक के वरिष्ठ नेता दुरई मुरुगन के बेटे हैं।

‘लोकतंत्र की हत्या’: द्रमुक

वहीं द्रमुक ने इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया है। पार्टी ने मतदान रद्द करने के निर्णय को चुनौती देने की बात भी कही है।

ईसाईयों ने सबरीमाला को 1950 में आग लगा दी थी, आज भी नफरती चिंटुओं की नज़र पर है आस्था

नोट्रे डेम डी पेरिस का अंग्रेजी में शाब्दिक अर्थ “आवर लेडी ऑफ़ पेरिस” होता है, जो हिन्दी में सबसे करीबी तौर पर “पेरिस की हमारी देवी” कहा जा सकता है। इस कैथेड्रल के जलने पर पूरे विश्व भर में अफ़सोस होता रहा। मरम्मत के दौरान इसमें आग लग गयी थी। नोट्रे डेम के नाम से ख्यात इस गिरजाघर (कैथेड्रल) की खासी मान्यता है। इसे फ्रेंच-गोथिक किस्म के निर्माण के सबसे अच्छे उदाहरणों में से एक माना जाता है। इसके अलावा भी इसके पीछे एक लम्बा इतिहास रहा है।

ऐसा माना जाता है कि यहाँ पहले ज्यूपिटर (बृहस्पति) को समर्पित पैगन मंदिर हुआ करता था। यहाँ पाए गए “पिलर ऑफ़ बोटमेन” को उसका प्रमाण माना जाता है। एक पुराने चर्च पर 1163 में किंग जॉर्ज (सप्तम) और पोप एलेग्जेंडर (तृतीय) की मौजूदगी में इसका निर्माण शुरू करवाया गया था। इस भवन में पहले भी आग लग चुकी है। कई साल पहले जब 1790 के दौर में ये फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान तोड़ फोड़ डाला गया था। जर्जर हालत में पड़े इस भवन पर लोगों का ध्यान विक्टर ह्यूगो ने दिलाया जब 1831 में उनकी किताब “नोट्रे-डेम ऑफ़ पेरिस” आई। अंग्रेजी में ये किताब “हंचबैक ऑफ़ पेरिस” नाम से आती है।

इस किताब के आने के बाद 1844-64 के दौरान अभियंता जीन बैप्टिस्ट एंटोनी लॉसस और इम्मानुएल विओल्लेट ली डुक ने इसमें वो चीज़ें जोड़ी जो आज इसे फ्रेंच गोथिक निर्माण के रूप में पहचान दिलाती हैं। इसकी प्रसिद्धि की एक वजह फ़्रांस की जॉन ऑफ़ आर्क की वजह से भी है। फ्रांस की ओर से ब्रिटिश सेना से लड़ने के लिए जाने जानी वाली इस नायिका को चर्च के आदेश पर जिन्दा जला दिया गया था। सदियों बाद अपने कुकृत्यों की माफी के रूप में जॉन ऑफ़ आर्क को “संत” घोषित किया गया। जॉन ऑफ़ आर्क का बिटीफिकेशन (संत घोषित करने की प्रक्रिया) इसी चर्च में पोप पायस (दशम) ने की थी।

धार्मिक भावनाएँ इसके जलने से आहत तो हुई होंगी, मगर इसके जलने पर जैसा मीडिया कवरेज दिखता है, वैसा दूसरे धर्मों के मामलों में नहीं होता। बरसों पहले भारत के एक जाने माने मंदिर में भी आग लगी थी। इस कैथेड्रल की तरह ये आग अपने आप या मानवीय भूल, किसी गलती से नहीं लगी थी। सबरीमाला के मंदिर को जानबूझ कर जलाया गया था। मई 1950 में इस मंदिर को जला कर खत्म कर देने की साजिश रची गयी थी। चोरी जैसा इरादा नहीं था, ये पुलिस को आसानी से समझ में आ गया था, क्योंकि कोई कीमती सामान चुराया नहीं गया था। दरवाजे पर कोल्लम के डीएसपी को, करीब महीने भर बाद जाने पर, काटने की कोशिश के 15 निशान मिले थे।

करीब सत्तर साल पहले के उस दौर में सबरीमाला के आस पास लगभग 20 किलोमीटर की दूरी में कोई आबादी नहीं थी। इस घटना में अपराधियों के पकड़े न जाने के कई कारण बताए जा सकते हैं। एक वजह ये थी कि जब ये घृणित साजिश रची गयी उस वक्त मंदिर बंद था। 17 जुलाई को जब इस घटना की रिपोर्ट दर्ज हुई, तब तक बारिश में ज्यादातर सुराग जैसे पैरों के निशान या उँगलियों के निशान धुलकर मिट चुके होंगे। पुजारी और उनके साथ के लोग इस वीभत्स घटना को देखकर घबरा गए थे, जिसकी वजह से वो सही-सही कुछ बता ही नहीं पाए। केशव मेनन जिन्हें तीन माह बाद सितम्बर में ये मामला सौंपा गया, उनके आने तक शुरूआती जाँच से अपराधी चौकन्ने हो चुके होंगे।

जो भी वजहें रही हों, मंदिरों पर जारी हमलों की बात कम ही होती है। इस बार के चुनावों में जनता के सबरीमाला मुद्दे पर अड़े रहने की वजह से शायद हमारा ध्यान भी मंदिरों की ओर जाने लगा है। सवाल यह है कि जब भारत को विविधताओं का देश कहा जाता है, तो एक मंदिर की अलग पद्दतियों को अलग रहने देने पर विविधताओं के शत्रुओं को इतनी दिक्कत क्यों है? आखिर वो नफरती चिंटू इतनी नफरत कहाँ से लाते हैं कि हिन्दुओं को उनके अपने पूजा-पाठ के तरीके जो संविधान ने दिए हैं, वो भी उन्हें नहीं देना चाहते?

बाकी सवाल यह भी है कि क्या हम खुद अपने मंदिरों पर जारी हमलों को उसी तरह देखने और बयान करने की हिम्मत जुटाएँगे जैसा वो सचमुच हैं? सेकुलरिज्म का टिन का चश्मा हम अपनी आँख से उतारेंगे क्या?

मतदाताओं को बरगलाने के लिए चिदंबरम पिता-पुत्र शिवगंगा में किराने की दुकानों में छिपा रहे हैं कालाधन: IT अधिकारी

वरिष्ठ आयकर अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम और उनके बेटे कार्ति चिदम्बरम पर शिवगंगा के लोकसभा चुनाव में काले धन के उपयोग का आरोप लगाया है।

चुनाव अधिकारी की मिलीभगत का भी आरोप

खबरिया पोर्टल PGurus में छपी खबर के मुताबिक श्रीवास्तव के दो पन्नों के पत्र में कार्ति चिदम्बरम द्वारा कथित तौर पर छिपाई गई करोड़ों की संपत्ति और शिवगंगा लोकसभा क्षेत्र में उसके लोकसभा चुनावों के पूर्व दुरुपयोग का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। श्रीवास्तव ने यह भी कहा कि चिदंबरम पिता-पुत्र शिवगंगा की कई किराने की दुकानों में पैसे छिपा रहे हैं ताकि उन दुकानों से मुफ्त का सामान बाँट कर मतदाताओं को रिझाया जा सके।

श्रीवास्तव ने स्थानीय चुनाव अधिकारियों पर भी चिदंबरम पिता-पुत्र से मिलीभगत करने का आरोप लगाया। उनके मुताबिक कई शिकायतें दर्ज होने के बावजूद चिदंबरम पिता-पुत्र के खिलाफ़ कदम उठाने से बचा जा रहा है।

केन्द्रीय चुनाव आयोग को लिखे गए श्रीवास्तव के पत्र के अनुसार विशेष खर्च पर्यवेक्षकों के दौरे के दौरान उन्होंने यह पाया कि 67 शारीरिक रूप से उपस्थित शिकायतकर्ताओं ने चिदंबरम पर कला धन मलीगाई स्टोर (किराने की दुकानों) पर छिपाने का आरोप लगाया था। जिला चुनाव पर्यवेक्षक और रिटर्निंग अफ़सर ने आँखों में धूल झोंकने वाली खोखली जाँच कर के यह कह दिया कि कनिष्ठ अधिकारियों को जाकर देखने पर ऐसा कोई मामला नहीं दिखा था। जिला चुनाव पर्यवेक्षक और रिटर्निंग अफ़सर की हिम्मत इतनी ज्यादा बढ़ गई थी कि उन्होंने विशेष खर्च पर्यवेक्षकों से कह दिया कि वे शिकायतकर्ताओं की शिकायतों की जाँच करना, उनसे सबूत माँगना आदि जरूरी नहीं समझते।

श्रीवास्तव ने चुनाव आयोग से यह भी कहा कि उनके पास अपने आरोप सिद्ध करने के लिए सबूत भी हैं। उनके अनुसार जिला स्तर के चुनाव अधिकारियों के पास ‘पी चिदंबरम जैसे आदतन अपराधी’ (“hardened criminal like P Chidambaram”, श्रीवास्तव के पत्र में लिखे गए शब्द) के आर्थिक अपराधों की जाँच के लिए न जरूरी प्रशिक्षण होता है न सहायता-प्रणाली। अतः जिला चुनाव पर्यवेक्षक और रिटर्निंग अफ़सर के रूप में कार्यरत अधिकारी को कम-से-कम स्थानीय आयकर विभाग को सूचित कर देना चाहिए था। उनके ऐसा न करने से ही उनकी नीयत पता चल जाती है- एक ओर उन्होंने आयकर विभाग को शिकायतों की इत्तला नहीं की, और दूसरी ओर विशेष खर्च पर्यवेक्षकों से कह दिया कि शिकायतों में कोई सत्यता नहीं है। श्रीवास्तव के पत्र अनुसार जिला चुनाव पर्यवेक्षक और रिटर्निंग अफ़सर के रूप में नियुक्त अफ़सर के नाटक का पर्दाफ़ाश करने के लिए यह पर्याप्त है।

क्या कार्ति ने भरा झूठा हलफ़नामा?

श्रीवास्तव ने कार्ति चिदंबरम पर चुनावी धोखाधड़ी का भी आरोप लगाया और कहा कि उनका शपथपत्र झूठा है। उन्होंने वह संपत्ति तो घोषित ही नहीं की है जो आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय ने छापा मारकर सामने लाई थी।

एनडी तिवारी के बेटे रोहित शेखर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत, जाँच जारी

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी के बेटे रोहित शेखर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई है। दक्षिण दिल्ली के DCP विजय कुमार ने स्टेटमेंट जारी कर मृत्यु की पुष्टि की। उनके कथन के मुताबिक रोहित को मृत अवस्था में ही साकेत के मैक्स अस्पताल में लाया गया था। मौत के कारणों की जाँच चल रही है, पर अभी तक कोई तस्वीर साफ़ नहीं हो पाई है।

नाक से बहने लगा यकायक खून, माँ पहले ही थीं अस्पताल में भर्ती

दिल्ली पुलिस के संयुक्त कमिश्नर देवेश श्रीवास्तव के मुताबिक मंगलवार को दिन में रोहित की नाक से अचानक खून बहने लगा। उनकी माँ उज्ज्वला पहले ही अपनी मेडिकल जाँच के लिए किसी अस्पताल में भर्ती थीं, और रोहित घर पर अकेले थे। उन्हें एम्बुलेंस से आनन-फानन में मैक्स अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। रोहित दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी क्षेत्र के निवासी थे।

पितृत्व की लम्बी लड़ाई, पिछले वर्ष पिता की मृत्यु  

रोहित शेखर ने लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद अपने पिता एनडी तिवारी के नाम का हक़ जीता था। एक लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद 2014 में जाकर तिवारी ने उन्हें अपने जैविक पुत्र के रूप में स्वीकार किया था। 2014 में ही उन्होंने रोहित की माँ उज्ज्वला से विवाह भी किया था। 18 दिसंबर, 2018 को लम्बी बीमारी के बाद 93 वर्ष की आयु में एनडी तिवारी की मृत्यु हो गई थी।

फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद ने पुराना वीडियो रीट्वीट कर भाजपा की छवि बिगाड़ने की कोशिश की

जेएनयू की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद ने हाल ही में सक्रिय राजनीति में कदम रखा है। शेहला ने कुछ दिनों पहले ही भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) छोड़कर नेता बने शाह फैसल के द्वारा बनाई गई पार्टी में शामिल होकर राजनीतिक पारी की शुरुआत की है। शेहला ने आज सूरत के एक पुराने वीडियो को रीट्वीट करते हुए भाजपा सरकार की बुराईयों को दिखाने की कोशिश की।

शेहला रशीद द्वारा रीट्वीट किया गया पुराना वीडियो

ट्विटर यूजर द्वारा अपलोड किए गए वीडियो में ये दिखाने की कोशिश की गई है कि आज भाजपा समर्थकों द्वारा सूरत में एक बाइक रैली निकाली गई, जिसकी वजह से लोगों को काफी परेशानी हुई। लोग काफी गुस्सा हो गए थे। ट्वीटर अपलोड करने वाले ट्वीटर यूजर का यह भी कहना है कि चूँकि ये भाजपा के नकारात्मक छवि को दर्शाता है, इसलिए मेनस्ट्रीम के किसी भी मीडिया चैनल में इतनी हिम्मत नहीं है कि वो इसे दिखा सके।

बता दें कि ट्विटर यूजर द्वारा किया गया ये दावा पूरी तरह से निराधार और बेबुनियाद है। सच्चाई तो ये है कि इस वीडियो या फिर इस मुद्दे को किसी मेनस्ट्रीम मीडिया ने इसलिए कवर नहीं किया, क्योंकि आज सूरत में भाजपा समर्थकों द्वारा कोई बाइक रैली नहीं की गई थी और ट्वीटर यूजर द्वारा जो वीडियो अपलोड की गई है, वो दिसंबर 2017 का एक पुराना वीडियो है। शेहला रशीद ने इस ट्वीट को रीट्वीट करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फर्जी खबरों का प्रचार करना शुरू कर दिया।

वैसे ये पहली बार नहीं है कि शेहला रशीद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फर्जी खबरों और अफवाहों को फैलाने के लिए रंगे हाथों पकड़ी गई है। पुलवामा हमले के बाद अफवाहें फैलाने के लिए हाल ही में शेहला राशीद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। इससे पहले एक ट्वीट कर नितिन गडकरी पर पीएम मोदी की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाने की वजह से शेहला के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई थी और जब गडकरी ने उन्हें कानूनी कार्रवाई की धमकी दी, तो उन्होंने दावा किया कि ट्वीट केवल एक व्यंग्य था और फिर शेहला रशीद ने खुद को इस परेशानी से निकालने के लिए ‘इस्लामोफोबिया’ का कार्ड खेल दिया।

भाजपा के खिलाफ़ हिंसा बदस्तूर जारी, भाजपा नेता के दफ्तर पर हमला, मीडिया खामोश

भाजपा नेताओं के खिलाफ मौजूदा चुनावों में हिंसा का दौर खिंचता ही जा रहा है। विधायक की हत्या, नेताओं और समर्थकों की हत्या, मनसे द्वारा भाजपा-समर्थक के घर पर हमले के बाद अब केरल भाजपा के नेता और कई दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्मों में काम कर चुके चर्चित नेता व गायक सुरेश गोपी के कार्यालय पर हमला हुआ है। सुरेश गोपी राज्यसभा के सदस्य हैं और लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उन्हें त्रिसूर क्षेत्र से अपना उम्मीदवार बनाया है।

प्रचार सामग्री को ही बनाया निशाना, महज़ ₹50 के नुकसान का केस दर्ज  

हमले की राजनीतिक प्रकृति इस तथ्य से साफ़ हो जाती है कि हमले के वक्त गोपी के कार्यालय में मुख्यतः झंडे, पोस्टर आदि चुनाव-प्रचार से जुड़ी सामग्री ही मौजूद थी। इसी को हमलावरों ने निशाना बना कर नष्ट कर दिया। रात दो बजे के करीब हुए इस हमले का संज्ञान लेते हुए मन्नूति पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।

द न्यूज़ मिनट से बात करते हुए मन्नूति पुलिस ने बताया कि मामला भारतीय दण्ड विधान की धाराओं 153 (दंगे भड़काने के लिए उकसावा) और 427 (₹50 का शरारतपूर्ण नुकसान) के अंतर्गत दर्ज किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि मामला अनाम आरोपियों के विरुद्ध दर्ज किया गया है, क्योंकि यह साफ नहीं हो पाया है कि हमला किसने किया था।

मीडिया के समुदाय विशेष में सन्नाटा

भाजपा और संघ पर राजनीतिक विपक्ष से भी ज्यादा हमलावर हो उनपर आतंकवाद से लेकर गुंडागर्दी तक का आरोप लगाने वाले मीडिया के समुदाय विशेष ने इस मुद्दे पर सन्नाटा मार लिया है। यह पिछले 8 दिनों में भाजपा पर हिंसक हमले की सातवीं घटना है, पर मीडिया पूरी तरह ‘मौन-संहिता’ का पालन कर रहा है। मामले पर कोई रिपोर्ट प्रकाशित करना तो दूर, न्यूज़ मिनट के अलावा किसी अन्य बड़े मीडिया हाउस ने हिंसा का संज्ञान तक नहीं लिया है। खबर लिखे जाने तक सोमवार रात को हुई घटना पर मीडिया हाउसों का ट्वीट तक नहीं आया है।

माकपा पर आरोप

हमले के पीछे भाजपा नेताओं ने माकपा का हाथ होने का दावा किया है। स्थानीय भाजपा नेता विनोद ने मीडिया से बात करते हुए कहा उनके कार्यकर्ता आधी रात तक कार्यालय में ही थे, अतः यह हमला रात 1 बजे के बाद का ही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि क्षेत्र में राजग का बहुत सकारात्मक प्रभाव है; जिन दलों को इस क्षेत्र में भाजपा की बढ़त नहीं सुहा रही है, वही हमले के लिए जिम्मेदार हैं, और उन्हें (विनोद को) लगता है कि वह माकपा है।

उन्होंने यह भी खुलासा किया कि आसपास की सीसीटीवी फुटेज ने खुलासा किया है कि करीब दो बजे के आसपास कुछ लोगों का समूह कार्यालय के पास जा रहा था।

गोपी ‘देर आयद, पर दुरुस्त आयद’

गौरतलब है कि गोपी को भले ही इस लोकसभा क्षेत्र का उम्मीदवार देर से बनाया गया है पर कम समय में ही उन्होंने इलाके में अच्छी-खासी पैठ बना ली है। उनसे पहले तुषार वेलापल्ली यहाँ से उम्मीदवार थे, पर राहुल गाँधी के केरल के वायनाड से लड़ने की घोषणा होने पर तुषार को वहाँ भेज दिया गया। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा ज़ोरों पर है कि राहुल गाँधी ने वायनाड को इसीलिए चुना क्योंकि इस बार केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के हाथों उनकी अमेठी में हार का खतरा है। ऐसे में भाजपा उन्हें दक्षिण में भी घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती, और इसीलिए केरल के प्रभावी नेता तुषार को उन्हें चुनौती देने त्रिसूर से वायनाड भेज दिया, और सुरेश गोपी को त्रिसूर में उतारा गया।

अय्यप्पा के लिए चुनाव आयोग के आदेश की अवहेलना

सुरेश गोपी सबरीमाला के भगवान अय्यप्पा के लिए चुनाव आयोग के आदेश की भी अवहेलना कर चुके हैं। उन्हें त्रिसूर की जिलाधिकारी टीवी अनुपमा ने चुनाव आयोग के निर्देशों की अवहेलना कर सबरीमाला और भगवान अय्यप्पा के नाम पर वोट माँगने को लेकर नोटिस जारी किया है।

चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार में भगवान अय्यप्पा का नाम लेकर प्रचार करने पर रोक लगा दी थी, जिसका सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट सरकार के एलडीएफ़ गठबंधन और कॉन्ग्रेस के गठबंधन यूडीएफ़ ने समर्थन किया था; वहीं भाजपा ने इसका एक स्वर में विरोध था। भाजपा के राज्य अध्यक्ष के सुरेन्द्रन और पूर्व राज्य अध्यक्ष कुम्मानाम राजशेखरन ने स्पष्ट किया था कि वे और उनकी पार्टी इस मुद्दे को राज्य की जनता के बीच हर हाल में लेकर जाएगी। उसके संकल्प पत्र में भी आस्था के मुद्दों को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने का दावा किया गया है।

Tik Tok पर सरकार का बड़ा फैसला, Google और Apple से कहा- App Store से डिलीट करे ऐप

भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने गूगल और एप्पल को अपने ऐप स्टोर से चीनी वीडियो एप्लिकेशन टिक-टॉक को हटाने का निर्देश दिया है। यानी कि अब सिर्फ वही लोग टिक टॉक ऐप का इस्तेमाल कर सकेंगे, जिनके फोन में ये ऐप पहले से डाउनलोड है। नए यूजर्स इसे डाउनलोड नहीं कर सकेंगे। उच्चतम न्यायालय ने सोमवार (अप्रैल 15, 2019) को मद्रास उच्च न्यायालय के टिक टॉक एप पर प्रतिबंध लगाने के आदेश पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है।

गौरतलब है कि 3 अप्रैल को मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने अश्लील सामग्री तक पहुँच होने की चिंताओं के चलते एक आदेश पारित कर सरकार को देश में टिक टॉक के डाउनलोड पर रोक लगाने का निर्देश दिया था, जिसके बाद इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाया गया, जिसने इस आधार पर आदेश को रोकने से इनकार कर दिया कि यह मामला अभी भी विचाराधीन है और कोर्ट 22 अप्रैल को मामले की सुनवाई करेगा। मद्रास उच्च न्यायालय में 16 अप्रैल को इस मामले पर सुनवाई हो सकती है।

वहीं, टिक टॉक ने अपने बचाव में कहा कि उसे ‘अश्लील और अनुचित सामग्री’ के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है, जो प्लेटफ़ॉर्म पर थर्ड-पार्टीज अपलोड करती है। टिक टॉक ने इस आदेश को भेदभावपूर्ण और मनमाना बताया है। कंपनी का कहना है कि इस ऐप को एक अरब से ज्यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है और उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ का ये आदेश एकतरफा  है।

टिक टॉक ऐप पिछले एक साल में कुछ ज्यादा ही लोकप्रिय हुआ है। बता दें कि कंपनी ने पहले इसे म्यूजिकली के नाम से लॉन्च किया था, लेकिन फिर बाद में इसका नाम बदलकर टिक टॉक कर दिया गया। इस कंपनी के अधिकार चीनी कंपनी बाइटडांस के पास है, जो दुनिया की सबसे ज्यादा वैल्यू वाली स्टार्टअप कंपनियों में से एक है।

अख्तर शेख ने नाबालिग को रेप के बाद दरगाह में रखा, फिर दोस्त के घर, मीडिया गिरोह ने किया इग्नोर

मुंबई की घाटकोपर पुलिस ने एक नाबालिग लड़की के बलात्कार के आरोपित अख्तर शेख के नाम को एफआईआर में शामिल करने से नकार दिया। चूँकि, पीड़िता दलित समुदाय से आने वाली एक नाबालिग थी फिर भी घाटकोपर पुलिस ने मामले को पोस्को एक्ट या फिर एससी/एसटी एक्ट से जोड़ना उचित नहीं समझा। इतना ही नहीं, मामले की जाँच को एक सब-इंस्पेक्टर को सौंप दिया गया। जबकि कानून में स्पष्ट है कि इस तरह के मामलों को केवल डीएसपी और एसीपी स्तर के अफसरों द्वारा ही संभाला जाएगा। इसके अलावा पीड़ित पक्ष के बयान को धारा 164 के तहत दर्ज नहीं करना इस संवेदनशील मामले को संभालने में मुंबई पुलिस द्वारा की गई लापारवाहियों का एक उदाहरण है। जिसके मद्देनजर आयोग ने मुंबई पुलिस आयुक्त से मामले में जवाब माँगा है।

स्वराज में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक कुछ दिन पहले एक नाबालिग के लापता होने की खबर आई थी। जिसमें लड़की के रात भर घर न लौटने के कारण उसके माता-पिता ने अगली सुबह पुलिस में एफआईआर कराई, जिसे पुलिस ने दर्ज तो किया लेकिन मामले के पहले ही स्तर पर उसमें गड़बड़ी कर दी।

पहले तो पुलिस ने अख्तर शेख नामक आरोपित का नाम एफआईआर में दर्ज ही नहीं किया, जबकि लड़की की माँ बार-बार अपने बयान में उसे लेकर संदेह जता रही थी। माँ के बयान को एफआईआर में बड़े ही साधारण तरीके से दर्ज किया गया कि उनकी 17 साल की बेटी एक अज्ञात व्यक्ति के साथ बिना अपनी मर्जी के कही चली गई है। इसके अलावा पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने के दौरान पोस्को (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्डरन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेस) एक्ट को भी मामले से नहीं जोड़ा। इस मामले में लड़की 4 दिन तक घर से गायब रही।

लड़की की माँ की मानें तो जिस पुलिस अफसर ने उनका केस लिया वो उन पर चिल्लाई और उसने भी शेख का नाम एफआईआर में लिखना जरूरी नहीं समझा। मामले के तूल पकड़ने पर सब इंस्पेक्टर शीतल कनाडेडकर को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) के रोष का सामना करना पड़ रहा है।

19 मार्च को पीड़िता के मिलने के बाद उसे किशोर गृह में भेज दिया गया है। जहाँ पर वो तब से अब तक रह रही है। पीड़िता की माँ की मानें तो उनकी बेटी धीरे-धीरे सभी जानकारी दे रही है। लड़की ने बताया है कि अख्तर शेख ने उसे पहले एक दरगाह में रात भर रखा और फिर तीन दिनों के लिए एक दोस्त के घर पर रखा।

पीड़िता की माँ ने बताया कि लड़की के मिल जाने के बाद जब वो आगे की जाँच की माँग के लिए सब-इंस्पेक्टर शीतल के पास गए तो उसने उन्हें दुतकार दिया। साथ ही पीड़ित पक्ष से यह भी कहा कि मामले को हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा बनाकर सामप्रदायिक बनाना चाहते हैं।

बता दें कि अख्तर शेख को घटना के 10 दिन बाद यानी 28 मार्च को गिरफ्तार किया गया और जल्द ही जमानत पर रिहा भी कर दिया गया।

घाटकोपर की इस खबर को किसी भी मीडिया हाउस द्वारा नहीं उठाया गया। इस मामले के सामने आने के पीछे राकेश पाटिल नाम का एक शख्स है जिसने इस मामले पर ट्विटर पर शृँखला लिखी। जिसके आधार पर इस खबर के बारे में जानकारी प्राप्त होती रही।

गौरतलब है कि अग्निवीर नाम के एक अधिकार संरक्षण संगठन ने इस मामले पर ध्यान दिया और इसे एनसीएससी को भेज दिया। 15 अप्रैल को, आयोग ने मामले की अनदेखी के लिए मुंबई पुलिस को एक पत्र भेजा। इसके अलावा सीताराम जुवतकर नाम के एक स्थानीय कार्यकर्ता ने स्वराज्य को बताया कि जब उन्हें इस मामले का पता चला, तो वह 2 अप्रैल को लड़की की माँ के साथ पुलिस के पास गए, जिसमें प्राथमिकी में POCSO को शामिल करने के लिए कहा गया। लेकिन उनकी मानें तो तब भी शीतल ने इस पर काम करने की जगह उसे साफ़ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि हमें अब इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए कि लड़की मिल गई है।

बताते चलें कि यह पहली बार नहीं है कि जब ऐसे पक्षपातपूर्ण मामले सामने आए हैं, जहाँ पुलिस ने नाबालिग लड़कियों के अपहरण के मामलों में ऐसी लापरवाही दिखाई हो, खासकर जब आरोपित समुदाय विशेष से है।

इस चुनाव में ऐसा छक्का मारो कि मोदी बाउंड्री से पार चला जाए: सिद्धू की बेलगाम जवान

लोकसभा चुनाव की बढ़ती सरगर्मी के बीच विवादित बयानों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक तरफ आज़म खान का जया प्रदा पर दिया गया विवादित बयान का शोर अभी थमा भी नहीं था कि पूर्व क्रिकेटर और पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू का नाम भी इस फेहरिस्त में शामिल हो गया है।

बता दें कि बिहार के कटिहार में चुनाव प्रचार के लिए पहुँचे सिद्धू ने मुस्लिम समुदाय से एकजुट होकर कॉन्ग्रेस को वोट देने की अपील की। सिद्धू ने कहा, “आप (मुस्लिम समुदाय) यहाँ अल्पसंख्यक होकर भी बहुसंख्यक हैं। आप अगर एकजुटता दिखाएँगे तो आपके प्रत्याशी तारिक अनवर को कोई भी नहीं हरा सकता है।”

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सिद्धू कटिहार संसदीय क्षेत्र के बलरामपुर विधानसभा के बारसोई प्रखंड के उच्च विद्यालय ढठ्ठा के मैदान में चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे। सिद्धू ने भाषण के दौरान कहा, “आपकी आबादी यहाँ 64 % है। यहाँ के मुस्लिम हमारी पगड़ी हैं। अगर आपको कोई दिक्कत हो तो मुझे याद करना, मैं पंजाब में भी आपका साथ दूँगा।”

सिद्धू यहीं नहीं रुके। विरोधियों पर निशाना साधते हुए कहा, “ये लोग आपको बाँट रहे हैं। मुस्लिमों को बाँट रहे हैं। औवैसी जैसे लोगों को लाकर वोट बाँटना चाहते हैं और जीतना चाहते हैं।” इसके साथ ही सिद्धू ने कहा, “आप लोग इकठ्ठे होकर 64% एक साथ आ जाएँ तो सब उलट जाएँगे और मोदी सलट (हार जाएँगे) जाएँगे। इस बार के चुनाव में ऐसा छक्का मारो कि मोदी बाउंड्री से पार चला जाए।”

बता दें कि कुछ दिन पहले मायावती भी मुस्लिमों से एकजुट हो बसपा-सपा गठबंधन को वोट देने की अपील कर चुकी हैं। अब देखना ये है कि ध्रुवीकरण की अपील करने वाले सिद्धू पर राजनीतिक पार्टियों के साथ चुनाव आयोग की क्या प्रतिक्रिया आती है।