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निर्मला सीतारमण ने जो किया, वो आजम खान जैसों के मुँह पर ‘तमाचा’ है – शशि थरूर ने भी किया सैल्यूट!

लोकसभा चुनावों के चलते एक ओर जहाँ नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोपों का दौरा जारी है, हर ओर से सिर्फ़ आचार संहिता के उल्लंघन की खबरें आ रही हैं। वहीं दूसरी ओर राजनैतिक गलियारे से दिल को सुकून देने वाली तस्वीर सामने आई है। इसमें कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण एक दूसरे से हाथ मिलाते दिखाई दे रहे हैं।

इस तस्वीर में देश की रक्षा मंत्री कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर से तिरुवनंतपुरम के अस्पताल में मिलने पहुँची हैं। इसके बाद शशि थरूर ने खुद इस तस्वीर को साझा करते हुए रक्षा मंत्री की तारीफ़ की।

दोनों पार्टियों के मध्य अनेकों मतभेदों के बाद भी निर्मला सीतारमण का थरूर से मिलना उन्हें भावुक कर गया। उन्होंने ट्विटर पर अपनी तस्वीर को साझा करने के साथ कहा कि राजनीति में शिष्टाचार एक दुर्लभ गुण है।

थरूर ने अपने ट्वीट पर लिखा, “निर्मला सीतारमण का यहाँ आना दिल को छू गया। केरल में अपने व्यस्त चुनावी कार्यक्रम के बीच आज सुबह अस्पताल पहुँचकर उन्होंने मेरा हाल जाना। भारतीय राजनीति में शिष्टाचार एक दुर्लभ गुण है। उन्हें इसका बेहतरीन उदाहरण पेश करते देखकर बहुत अच्छा लगा।”

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता और केरल के तिरुवनंतपुरम से मौजूदा सांसद शशि थरूर एक मंदिर में पूजा करने के दौरान बुरी तरह गिर पड़े थे। जिसके कारण उनके माथे पर गहरी चोट लगी। उन्हें वहाँ के जनरल अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ डॉक्टरों ने बाद में उन्हें खतरे से बाहर बताया।

चोट गहरी होने के कारण उनके माथे पर 11 (पहले मीडिया में थरूर को 6 टाँके लगने की खबर थी) टाँके आए। खबरों के मुताबिक इस घटना के समय शशि थरूर मंदिर में तुलाभरम पूजा कर रहे थे। जो केरल के कुछ गिने-चुने मंदिरों में ही होती है। इस पूजा में देवी-देवताओं को अर्पित की जाने वाली वस्तुओं को व्यक्ति के बराबर तोला जाता है। इस कार्य के लिए वहाँ के मंदिरों में बड़ी-बड़ी मशीनें लगी हुई हैं। तराजू में बैठकर जिस समय शशि वस्तुओं के साथ खुद को तोल रहे थे तभी चेन टूट गई थी और वे गिर गए थे।

धूँ-धूँ कर जला 800 साल पुराना नॉट्र डाम चर्च, मुस्लिमों ने मनाई ख़ुशी, रिएक्ट किया ‘हा-हा’

जब आप फ्रांस का नाम सुनते हैं तो आपके दिमाग में आइफल टॉवर की छवि उभरती होगी। लेकिन उससे भी पुरानी और ऐतिहासिक एक बिल्डिंग है… सही मायने में थी, जो हादसे का शिकार हो गई। दरअसल, फ्रांस में नॉट्र डाम नामक 800 वर्ष पुरानी ईमारत में आग लग गई। पेरिस स्थित यह चर्च विश्व प्रसिद्ध है। 9 घंटे बाद आग पर काबू तो पाया जा सका लेकिन तब तक इसके गुम्बद और छत गिर चुके थे। हाँ, मुख्य इमारत और दोनों मीनारों के हिस्सों को किसी तरह बचा लिया गया। लेकिन सोमवार (अप्रैल 15, 2019) शाम को लगी इस आग से इमारत बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। बेहद पुरानी होने के कारण ईमारत पहले से ही जर्जर स्थिति में थी और लोगों द्वारा इसके जीर्णोद्धार के प्रयास भी किए जा रहे थे। ईमारत के नवीनीकरण का कार्य भी चल रहा था। हर साल यहाँ लाखों लोग आते हैं।

जब पूरी दुनिया आग के जल्द ख़त्म होने और इमारत के बच जाने की दुआ कर रही थी, तब सोशल मीडिया पर कुछ मुस्लिम इस आपदा के मज़े ले रहे थे। कई मुस्लिम नाम वाले लोग ख़ुशी मनाते हुए नज़र आए। एक बुद्धिजीवी यूजर ने वीडियो शेयर कर बताया कि कैसे मुस्लिम थोक की संख्या में नॉट्र डाम में लगी आग से ख़ुश होकर फेसबुक पोस्ट्स पर ‘हा हा’ रिएक्ट कर रहे हैं।

इसके बाद एक अन्य यूजर ने भी कई सारे ऐसे ट्वीट्स शेयर किए, जिसमें मुस्लिम लोग इस की निंदा करने की बजाए ख़ुशी मना रहे थे। ये सभी हँस-हँस कर मज़े ले रहे थे। उधर फ्रांस के राष्ट्रपति व दुनिया भर के नेताओं ने इस ईमारत का दोबारा जीर्णोद्धार करने की शपथ ली है।

कुछ मुस्लिमों ने इसे विश्व की सबसे सुन्दर आग बताया तो कुछ मुस्लिमों ने पूरे फ्रांस के ही बर्बाद होने की कामना की। कुछ मुस्लिम आपस में बधाइयाँ देते हुए भी नज़र आए। युसूफ, वाहिद, खालिद, मोहम्मद नाम वाले ये मुस्लिम यूजर्स प्राचीन ईमारत में आग लगने से प्रफुल्लित नज़र आए। जब ऑपइंडिया ने कुछ ऐसी अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ वेबसाइट्स के सोशल मीडिया पोस्ट्स को खंगाला तो हमें भी ये दावे सही मिले। नीचे दिए स्क्रीनशॉट् में देखा जा सकता है कि मुस्लिम इस त्रासद आग से जुड़ी ख़बर पर ‘हा हा’ का रिएक्शन दे रहे हैं।

हा-हा रिएक्शन देने वालों के नाम पढ़ें

कुछ मुस्लिमों ने तो यहाँ तक कहा कि नॉन-मुस्लिम इमारतों व पूजा घरों का इस तरह से बर्बाद होना इस्लाम की सत्यता की पुष्टि करता है। कुछ ने कहा कि ये अल्लाह का दंड है जो इस्लाम न मानने वालों को मिलता है। किसी एक क्षेत्र नहीं बल्कि दुनिया भर के कई हिस्सों के मुस्लिमों ने इस आग को लेकर ख़ुशी मनाई। पुलवामा हमले के समय भी मुस्लिमों ने थोक की संख्या में वीरगति को प्राप्त हुए 40 सीआरपीएफ जवानों का मज़ाक उड़ाया था। तब भारत में कई मुस्लिम गिरफ़्तार भी किए गए थे।

मोदी बायोपिक, योगी पर बैन के बाद अब चुनाव आयोग ने किया ‘Saffron Swords’ का विमोचन रद्द

चुनाव आयोग की भाजपा और दक्षिणपंथी संस्थाओं के विरुद्ध कार्रवाई जारी है। मोदी की बायोपिक और योगी आदित्यनाथ के चुनाव प्रचार को प्रतिबंधित करने के बाद चुनाव आयोग ने अब दो किताबों का JNU में विमोचन करने को लेकर आयोजकों को नोटिस थमाया है।

इनमें से एक किताब ‘Safron Swords’ पिछले 1300 सालों में अंग्रेज़ और इस्लामी आक्रान्ताओं के आतंक से वीरतापूर्वक लड़ते हुए जान गँवाने वाले गुमनाम शूरवीरों में से 52 की कथाओं का संकलन है। इसकी लेखिका मानोशी भारतीय/हिन्दू संस्कृति के प्रचार और उत्थान के लिए स्थापित इंटरनेट पोर्टल ‘My India My Glory’ की भी संस्थापिका हैं, और सोशल मीडिया पर हिन्दू मंदिरों और पुरातात्विक स्थलों की अपनी यात्रा के बारे में अक्सर लिखती रहतीं हैं।

दक्षिण दिल्ली की रिटर्निंग अफ़सर निधि श्रीवास्तव ने JNU में इस कार्यक्रम के आयोजकों द्वारा कार्यक्रम की पूर्वानुमति न लेने को आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन माना है और इसी पर कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

अकादमिक था कार्यक्रम, राजनीतिक नहीं: आयोजक

आयोजकों में से एक मनीष जांगिड़ ने इन्डियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा कि जिन किताबों का विमोचन प्रतिबंधित हुआ, वह दोनों, यानि मानोशी सिन्हा की ‘Safron Swords’, और पूर्व में मार्क्सवादी रह चुके आभास मालदहियार  की किताब ‘मोदी अगेन’, पहले से सार्वजनिक क्षेत्र में वितरण में हैं। इसके अलावा वह यह भी कहते हैं कि लेखकों की अनुपलब्धता के चलते 12 अप्रैल को ही कार्यक्रम को टाला जा चुका था, और यही बात चुनाव आयोग को दिए गए जवाब में कह दी गई है।

एक अन्य आयोजक और जांगिड़ सहित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े दुर्गेश कुमार के अनुसार यह कार्यक्रम राजनीतिक नहीं, अकादमिक था। उन्होंने किसी भी राजनीतिक पार्टी के नेता को इस कार्यक्रम में निमंत्रण नहीं दिया था। साथ ही उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि यह (सार्वजनिक क्षेत्र में पहले से मौजूद किताबों पर आधारित गैर-राजनीतिक, अकादमिक वार्तालाप) भी चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन में आता है।

दोनों किताबें स्टार्टअप प्रकाशक ‘गरुड़ प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित की गईं हैं।

‘आभास’ होता है कि कार्यक्रम राजनीतिक था, इसलिए दिया नोटिस

वहीं इन्डियन एक्सप्रेस से ही बात करते हुए रिटर्निंग अफ़सर निधि श्रीवास्तव ने यह कहा कि भले ही यह किताबें पहले से वितरण में हों, पर इस कार्यक्रम को देखकर इसके राजनीतिक होने का ‘आभास’ होता है; ऐसा ‘लगता है’ कि एक नेता विशेष का प्रचार हो रहा है। इसीलिए यह नोटिस जारी किया गया।

सोशल मीडिया पर लेखकों, पत्रकारों का कड़ा विरोध शुरू

लेखक संक्रांत सानु ने इस निर्णय को आड़े हाथों लेते हुए लिखा:

Goa Chronicles व Indian Expose पोर्टलों के संस्थापक-मुख्य संपादक सैवियो रोड्रिग्वेज़ ने क्षुब्ध प्रतिक्रिया व्यक्त की:

वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने भी इसके औचित्य पर सवाल उठाते हुए लिखा:

जिन किताबों का विमोचन रद्द हुआ, उनमें से एक के लेखक आभास ने भी ट्विटर पर कड़ी आपत्ति जताई।

उन्होंने द हिन्दू अख़बार के विवादस्पद संपादक एन राम की राफेल विवाद पर आधारित किताब का भी उदाहरण दिया।

इंडिया टुडे की एक खबर का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे उस किताब की 5,000 प्रतियाँ दस-दस रुपए में बेचीं गईं। इंडिया टुडे की उसी रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के जिस उड़न-दस्ते ने इसमें हस्तक्षेप किया था, उसके सदस्यों को न केवल चुनावी ड्यूटी से हटा दिया गया है, बल्कि उन्हें खुद कारण बताओ नोटिस का सामना करना पड़ रहा है।

उनके इस ट्विटर-थ्रेड को रीट्वीट करते हुए दक्षिणपंथी स्तंभकार और रक्षा विशेषज्ञ अभिजित अय्यर-मित्रा ने लिखा:

‘कैसा लोकतंत्र है यह?’: मानोशी सिन्हा

‘Saffron Swords’ की लेखिका मानोशी सिन्हा ने ऑपइंडिया संवाददाता से बात करते हुए अपना विरोध जताया। उन्होंने कहा कि यह कैसा लोकतंत्र है जब EC उसी JNU के प्रांगण में अन्य किताबों के विमोचन में हस्तक्षेप नहीं करता पर उनकी ‘Saffron Swords’ और आभास की Modi ‘Again’ का विमोचन रोक देता है। उन्होंने पूछा कि क्या ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि आयोजक एबीवीपी था, या फिर कारण यह था कि उनकी किताब में कम्युनिस्ट-वामपंथी नैरेटिव नहीं था; क्या ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सिन्हा की किताब का दृष्टिकोण राष्ट्रवादी है; या फिर इसलिए कि इस किताब में हमारे वीर पूर्वजों का गुणगान है, जिनके कारण आज हम हज़ारों वर्ष पुरानी अपनी सभ्यता की पहचान को आगे ले जा पा रहे हैं।

AAP-कॉन्ग्रेस एक-दूसरे पर थूक कर चाटने की रेस में, बीच में कूदे 4 महान दरबारी पक्षकार

आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस का प्यार-तकरार-नफरत का रिश्ता हाल ही में सुर्खियों में रहा है। जहाँ एक तरफ जनाब केजरीवाल कहते नज़र आए कि “उन्होंने तो लगभग मना कर दिया जी” फिर भी अपने सिद्धांतों पर अडिग अपनी बात से बात-बे-बात पलटी मरने वाले जनाब केजरीवाल ने हार नहीं मानी। लाख उनके अपने ही पार्टी के पूर्व नेता और शुभचिंतक कुमार विश्वास जैसे लोग उनका कितना भी मज़ाक बनाए हों लेकिन वैकल्पिक राजनीति का घटिया उदाहरण प्रस्तुत करने वाले जनाब केजरीवाल लगे रहे। हाँ जो कहे उस पर कभी कायम नहीं रहे। लोगों ने बार-बार कहा “एक पे रहना, कभी घोड़ा-कभी चतुर मत कहना।”

दिल्ली में लोकसभा चुनाव के लिए AAP और कॉन्ग्रेस कभी घोर प्रतिद्वंदी रहे थे। लेकिन कॉन्ग्रेस के घोटालों और काले कारनामों के समूल नाश के लिए अपने बच्चों की कसम खाने वाले केजरीवाल अब भी उसी कॉन्ग्रेस की गोद में झूला झूलने की उम्मीद पाले बैठे हैं। लोकसभा चुनाव की तारीखें नज़दीक आ रही हैं तो जो अंदर है वो सब उबल कर बाहर आ रहा है, इस उम्मीद में कि शायद ‘वो’ मान जाएँ। दोनों दलों के बीच गठबंधन की खिचड़ी पकाने के लिए रची गई कई कहानियों और तमाम टिप्पणियों के बाद, आखिरी प्रयास के रूप में या तो अब इसे अंतिम रूप दे दिया जाए या रद्द कर दिया जाए। अंतिम प्रयास के रूप में राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल, जो एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं, परदे के पीछे के इस नाटक को जैसे ही ट्विटर पर ले आते हैं तो कहानी और भी मनोरंजक हो जाती है।

जनाब राहुल गाँधी ने कहा कि वह 7 में से 4 सीटों पर AAP को चुनाव लड़वाने को तैयार थे, राहुल ने आरोप लगाया कि केजरीवाल ही यू-टर्न कर गए। हालाँकि, कॉन्ग्रेस के दरवाजे अभी भी खुले हैं। उस पर, जनाब अरविंद केजरीवाल ने कहा कि AAP कोई यू-टर्न नहीं ले रही थी बल्कि कॉन्ग्रेस वास्तव में गठबंधन को अंतिम रूप नहीं देकर बीजेपी की मदद कर रही थी। उस बीजेपी का जो महात्मा गाँधी के कॉन्ग्रेस मुक्त भारत के सपने को अपना मूल-मन्त्र बनाए हुए है।

फिर क्या था, इस विस्तृत नाटक के बाद, लुटियंस का ‘पक्षकार’ मीडिया भी चक्कर खा गया। मम्मी मीडिया के लिए घोर चिंता की बात यह थी कि पक्षकार मीडिया के लाडले दो बिगड़े बच्चों के बीच लड़ाई से बीजेपी काफी हद तक लाभान्वित हो सकती है। पूरा गिरोह दो युद्धरत बच्चों के बीच बने नाटकीय स्थिति को संभालने और शांति स्थापित करने के लिए कूद पड़ा।

‘तेज तर्रार’ निखिल वाघले ने AAP नेता संजय सिंह को टैग करते हुए टिप्पणी की कि AAP पर भरोसा न करके, कॉन्ग्रेस बीजेपी को दिल्ली जीतने में मदद करने की कोशिश कर रही है।

इसके बाद निखिल कॉन्ग्रेस पदाधिकारी के साथ वाकयुद्ध में लग गए। जबकि कॉन्ग्रेस के पदाधिकारी ने कॉन्ग्रेस का बचाव किया, लेकिन ‘तटस्थ पक्षकार’ वाघले ने AAP का बचाव किया और कॉन्ग्रेस को दोषी ठहराया।

‘न्यूट्रल पक्षकार’ सबा नकवी ने भी बिगड़े बच्चों को कुछ अच्छी सलाह देने के लिए ट्विटर का सहारा लिया, जो सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे की मिट्टी-पलीद कर रहे थे।

नकवी ने ट्वीट किया कि राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल को टेबल पर बैठना चाहिए, हाथ मिलाना चाहिए और गठबंधन की घोषणा करनी चाहिए। मोहतरमा ने कहा, “दिल्ली के लोग आपसे अच्छे व्यवहार की उम्मीद कर रहे हैं”।

आशुतोष, जो एक ‘पक्षकार’ से AAP राजनेता बनने के बाद फिर से एक तथाकथित ‘न्यूट्रल पक्षकार’ बन गए हैं, ने भी नानी-अम्मा का किरदार निभाने के लिए ट्विटर का ही सहारा लिया। उन्होंने केजरीवाल को ट्वीट कर कहा कि अगर वे मोदी और शाह को हराना चाहते हैं तो गठबंधन जरूरी है।

तटस्थ और धर्मनिरपेक्ष टिप्पणीकार तुफैल अहमद ने भी दो बच्चों, राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल को सभी विवाद दफनाने की सलाह दी। उन्होंने जनाब केजरीवाल को सलाह दी कि ज़्यादा लालची न बनें, वे बीजेपी को फायदा पहुँचाने के बजाय जनाब राहुल गाँधी के उचित प्रस्ताव को मान लें।

अंत में, जबकि कई अन्य “तटस्थ” टिप्पणीकारों, पक्षकारों और तथाकथित पत्रकारों ने बिगड़े बच्चों को सम्भालने की कोशिश की, इस कड़ी में निखिल वाघले ने अंतिम फैसला सुनाया।

अंतिम फैसला बहुत ही महान और आसान है। यदि भाजपा सत्ता में लौटती है, तो पूरा चाटुकार, पक्षकार तथाकथित पत्रकार पारिस्थितिकी तंत्र या कम से कम इसका एक हिस्सा, कॉन्ग्रेस को दोष देने के लिए तैयार है। राहुल गाँधी को नहीं क्योंकि राजकुमार की हर हाल में रक्षा करना लुटियंस दरबारियों का राजधर्म है।

यह पूरा वाकयुद्ध पक्षकारों की तठस्थता, पत्रकारिता के पतन और चाटुकारिता की सभी सीमाएँ लाँघने का प्रमाण हैं। मोदी से नफ़रत और घृणा ने इन्हें इतना अँधा कर दिया है कि अब ये सेक्युलर, न्यूट्रल जैसे चोले से निकलकर खुलेआम मैदान में आ गए हैं। अभी तक गठबंधन की कोई सूरत नज़र नहीं आ रही। लेकिन एक ओर 60 साल तक देश का बंटाधार करने वाली, घोटालों और देश को लुटने का कीर्तिमान स्थापित करने वाली और दूसरी ओर 5 साल तक दिल्ली की जनता से छल करने के बाद और अब पूर्ण राज्य का शिगूफा छोड़ने के बाद भी दिल्ली के कानों पर ज़ू रेंगता हुआ भी नहीं देखने वाली आम से बेहद खास बन चुकी पार्टी चोर-चोर मौसेरे भाई के सिद्धांत पर आखिरी दाँव खेलने को बेचैन है। अब देखना यह है कि क्या ये एक बार फिर बीजेपी के नाम पर जनता को डरा कर उनसे फिर से छल करने में कामयाब होते हैं। या जनता इनके छल को नंगा कर उसका मुहतोड़ जवाब देती है।

लड़ाई मजेदार है। इस चुनाव में AAP-कॉन्ग्रेस से लेकर उन तमाम न्यूट्रल पक्षकारों की भी अस्मिता दाँव पर लगी है जो अभी तक विभिन्न संस्थाओं पर कब्ज़ा जमाकर सत्ता की मलाई खा रहे थे।

‘आजम खान की ये औकात कि हमारी चड्डी नापेगा, वो पापी है, उनका संहार होगा’

समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने भाजपा प्रत्याशी जया प्रदा की तरफ इशारा करते हुए खाकी अंडरवियर वाला बयान दिया था। इश पर क्या मीडिया, क्या सोशल मीडिया… हर तरफ उनकी थू-थू हो गई। चौतरफा निंदा से बचने के लिए सपा ‘प्रमुख’ अखिलेश की तरफ से ये कहा गया कि आजम खान ने ये बयान जया प्रदा के लिए नहीं, बल्कि अमर सिंह के लिए दिया था।

अब इस मामले पर अमर सिंह ने आजम खान पर पलटवार किया है। उन्होंने आजम खान पर भड़कते हुए कहा कि आजम खान की इतनी औकात हो गई है कि वो हमारी चड्डी के बारे में बात करेगा। उन्होंने कहा कि आजम खान न तो उनके गुरू हैं और न ही उनकी ऊँगली पकड़कर वो (अमर सिंह) रामपुर गए थे। इसके साथ ही अमर सिंह ने कहा कि रामपुर में 10 साल तक जया प्रदा सांसद थी ना कि वो। अमर सिंह इतने पर ही नहीं रूके, उन्होंने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि दुष्ट लोगों की नजर में महिलाओं की कोई ईज्जत नहीं है। इस दौरान उन्होंने पार्टी संरक्षक मुलायम सिंह यादव के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि अच्छी आकर्षक महिला को देखकर युवाओं का मन मचल जाता है।

अमर सिंह ने कहा कि आजम पापी है, उनका संहार होगा। उन्होंने आगे कहा कि जया प्रदा उनकी छाया की तरह हैं, इसलिए आजम खान को खुजली हो रही है। वहीं, जया के प्रचार के लिए रामपुर जाने के सवाल पर अमर सिंह ने कहा कि पार्टी का हर कार्यकर्ता अमर सिंह है और वो जया प्रदा के लिए काम कर रहा है।

गौरतलब है कि आजम खान ने रामपुर में लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि उन लोगों ने 17 सालों में उनको (जया प्रदा) को नहीं पहचाना, जबकि उन्होंने केवल 17 दिन में उनकी वास्तविकता को पहचान लिया। उन्होंने कहा, “उसकी असलियत समझने में आपको 17 साल लग गए। मैं तो 17 दिन में ही पहचान गया कि इनके नीचे का जो अंडरवियर है, वो भी खाकी रंग का है।”

आजम खान के इस विवादित बयान पर चुनाव आयोग ने संज्ञान लिया और कड़ा कदम उठाते हुए आजम खान पर तीन दिन के लिए चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी। इसके साथ ही आजम खान के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई है।

एक छोटी सी फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ की सफलता से क्यों भयभीत हैं वामपंथी समीक्षक?

अभी अभी आई फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ को आम दर्शकों का ख़ूब प्यार मिल रहा है। जैसा कि हमने पिछले कुछ दिनों में देखा, फ़िल्म की रिलीज रोकने की हरसंभव कोशिश की गई लेकिन फ़िल्म अंततः सिनेमाघरों तक पहुँचने में कामयाब रही। तमाम विवादों के बावजूद फ़िल्म 250 स्क्रीन्स पर रिलीज होने में सफल रही और इसके साथ ही एक अलग ही खेल शुरू हुआ। ‘द ताशकंद फाइल्स’ का जब निर्माण हो रहा था, तब कुछ तथाकथित इतिहासकारों व बुद्धिजीवियों ने इसे भ्रामक, तथ्यों से भटकाने वाला और इतिहास से छेड़छाड़ बताया। जब उन्होंने जी भर खेल लिया और फ़िल्म का ट्रेलर रिलीज हुआ तो राजदीप सरदेसाई जैसे गिद्धों ने खेलना शुरू किया। फ़िल्म को प्रोपेगंडा बताने से लेकर इसकी रिलीज की टाइमिंग पर ऐसे सवाल खड़े किए गए, जैसे फ़िल्म के प्रोड्यूसर नरेंद्र मोदी ही हों।

समीक्षकों का कुटिल दुष्प्रचार, रिव्यु से किया इनकार

तमाम कुटिल खेलों के बावजूद जब फ़िल्म रिलीज हुई तो कुछ समीक्षकों ने अपना गंदा खेल शुरू कर दिया। राजा सेन जैसे तथाकथित समीक्षकों ने इस फ़िल्म की समीक्षा करने से मना कर दिया। राजा सेन जब ‘रामगोपाल वर्मा की आग’ की समीक्षा कर सकता है और उसे पसंद करने की कोशिश कर सकता है तो ‘द ताशकंद फाइल्स’ तो एक वास्तविक और संजीदा मूवी है, जिसे बनाने के लिए गहन रिसर्च का सहारा लिया गया है। ये हमारे दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के निधन/हत्या के पीछे रहे कारणों की खोज करती है। ना इस फ़िल्म में कहीं भाजपा को वोट देने की अपील की गई है और न ही इसमें कॉन्ग्रेस को सत्ता से दूर रखने की बात कही गई है, फिर भय कैसा?

एनडीटीवी ने फ़िल्म को आधा स्टार दिया। स्क्रॉल ने इसे नेगेटिव रिव्यु दिया। लेकिन, इन सारे पक्षपाती समीक्षाओं की पोल तो तब खुली जब दर्शकों और सजग लोगों ने आईएमडीबी पर इसे रेट किया। आईएमडीबी सिनेमा का एक वैश्विक डेटाबेस है, जिसकी रेटिंग पर न सिर्फ़ भारत बल्कि दुनियाभर के दर्शक भरोसा जताते हैं। आज से 10 वर्ष बाद जब ‘द ताशकंद फाइल्स’ का नाम सामने आएगा, तब एनडीटीवी, स्क्रॉल और राजा सेन की समीक्षाएँ कहाँ पड़ी होगी नहीं पता लेकिन आईएमडीबी रेटिंग गूगल सर्च के पहले पन्ने पर दिखेगी। ये रिपोर्ट लिखे जाने तक आईएमडीबी पर हज़ार से भी अधिक लोगों ने मिलकर फ़िल्म को 10 में से 8.4 औसत रेटिंग दी है। ये अपनेआप में बड़ी बात है क्योंकि इस पोर्टल पर 8 की रेटिंग पार करनेवाली फ़िल्मों का एक अलग ही क्लब है।

यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि आख़िर इस फिल्म से किसे भय है? कॉन्ग्रेस पार्टी के इशारे पर इसके नेताओं ने फ़िल्म की रिलीज रोकने के लिए निर्देशक विवेक अग्निहोत्री को लीगल नोटिस भेजा और धमकाया। तथाकथित समीक्षकों ने इसकी समीक्षा करने से इनकार कर दिया। एनडीटीवी के लिए इस फ़िल्म की समीक्षा करते हुए सैबल चटर्जी ने इसे जंक यानी कचरा बताया। आगे बढ़ने से पहले जान लेते हैं कि इसी चटर्जी ने एनडीटीवी में ‘उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक’ की समीक्षा करते वक़्त इसके बारे में क्या कहा था। चटर्जी ने कहा था कि उरी फ़िल्म एक ऐसे ग्रेनेड की तरह है जो फकफकाता तो है लेकिन फटता नहीं है।

इतनी छोटी सी फ़िल्म से इतना ज्यादा भय?

चटर्जी अकेला नहीं है, ताशकंद फाइल्स को ख़राब रेटिंग देने वाले अधिकतर समीक्षकों का इतिहास यही है। क्या राजकुमार हिरानी पर ‘मी टू’ का आरोप लगने के बाद इन समीक्षकों ने ऐसे फ़िल्मों की समीक्षा करना छोड़ा, जिनसे वो जुड़े हुए थे? क्या इन समीक्षकों ने गोलमाल और धमाल सीरीज की समीक्षा करना छोड़ा जो दर्शकों को ग्रांटेड लेकर सचमुच का जंक दिखाते हैं? क्या इन समीक्षकों ने माँ दुर्गा के नाम पर बनी आपत्तिजनक फ़िल्म की समीक्षा करने से रोका? सीधा जवाब है, नहीं। क्या ये समीक्षक इतिहास से जुड़ी हर ऐसी फ़िल्म की समीक्षा नहीं करेंगे जिसमे सत्य ढूँढने की कोशिश की गई हो? अभिनेत्रियों के ‘ऊप्स मोमेंट’ अपनी वेबसाइट पर चलाने वाले इन समीक्षकों को किसका भय सता रहा है?

ये भय है नैरेटिव के बदल जाने का। ये भय अच्छा है क्योंकि जब केवल 250 स्क्रीन्स में रिलीज होने वाली एक छोटी सी फ़िल्म इन्हे इतना भयभीत कर सकती है तो सोचिए उस दिन क्या होगा जब ऐसे विषयों पर कोई बहुत बड़ी फ़िल्म बनेगी? तब क्या ये समीक्षक देश छोड़कर भाग जाएँगे? अभी तो ये बस शुरुआत है। ‘द ताशकंद फाइल्स’ उस कार्य में सफल रही है जो उसे करना था। लोग लाल बहादुर शास्त्री में नए सिरे से इंटेरेस्ट ले रहे हैं। उनसे जुड़ी पुस्तकें खंगाली जा रही हैं, उनके बारे में युवा पढ़ रहा है। फ़िल्म का जो मोटिव था, जो विवेक अग्निहोत्री का विजन था, जो इस फ़िल्म के निर्माण के पीछे का उद्देश्य था, वो सफ़ल हुआ है।

वीकेंड पर फ़िल्म ने क़रीब सवा 2 करोड़ रुपए बटोरे। कम स्क्रीन्स मिलने के बावजूद जहाँ भी फ़िल्म लगी, उसे अच्छा रिस्पांस मिला। लेकिन बॉक्स ऑफिस से भी बढ़कर फ़िल्म ने आम दर्शकों और युवाओं के बीच जो इम्पैक्ट क्रिएट किया है, वो क़ाबिले तारीफ़ है। रिलीज से पहले निर्देशक और पूरी टीम ने युवाओं के साथ बातचीत की, उनके सवालों के जवाब दिए। आज अगर लाल बहादुर शास्त्री के बारे में नई चर्चा निकल पड़ी है, लोग उनके बारे में और जानने को उत्सुक हो रहे हैं, सोशल मीडिया में उनका नाम गूँज रहा है, इससे अधिक श्रद्धांजलि उस महान आत्मा के लिए और क्या हो सकती है? समीक्षकों के कुटिल संकीर्ण दायरों से आगे निकल चुकी ‘द ताशकंद फाइल्स’ की सफ़लता अब दर्शक तय कर रहे हैं।

अभी तो तुम लोगों (कुटिल समीक्षकों) को और ज़लील होना है

ऑपइंडिया ने फ़िल्म की समीक्षा प्रकाशित की जिसमे बताया गया था कि कैसे ये फ़िल्म सभी पक्षों को सामान रूप से रखकर तथ्यों से छेड़छाड़ किए बिना सच्चाई दिखाने की कोशिश करती है। फ़िल्म के ट्रेलर लॉन्च के मौके पर विवेक अग्निहोत्री ने पूछा था कि अगर मुंबई के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ने वाला उनका बेटा शास्त्रीजी के बारे में नहीं जानता, तो क्या ये हमारे शिक्षा व्यवस्था के लिए बुरी बात नहीं? इस दौरान लाल बहादुर शास्त्री के बेटे सुनील शास्त्री ने पीएम मोदी से अपने पिता की तुलना की। शास्त्रीजी के नाती संजय नाथ सिंह ने बताया कि कैसे उनकी मृत्यु के बाद उनके पार्थिव शरीर के चेहरे पर किसीने चन्दन मल दिया था। विवेक अग्निहोत्री ने ऑपइंडिया को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू देते हुए वामपंथियों को ये फ़िल्म देखने का निमंत्रण दिया था। इन सभी लेखों से गिरोह विशेष को तगड़ा झटका लगा।

अभी वीडियो स्ट्रीमिंग पोर्टल्स का ज़माना है और एक बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचने के लिए ‘द ताशकंद फाइल्स’ जब वहाँ रिलीज होगी तब ऐसे समीक्षकों, रोमिला थापर छाप इतिहासकारों व देश से खेल रहे नेताओं व उनके परिवारों में जो खलबली मची हुई है, वो और बढ़ जाएगी। असर हुआ है, दूर तक हुआ है और सबसे बड़ी बात कि ‘द ताशकंद फाइल्स’ जैसी छोटी फ़िल्म ने मात्र 250 स्क्रीन्स में रिलीज होकर ऐसा असर कर दिया है। ये एक ऐसा ग्रेनेड साबित हुआ है जिसके फटने से बहुत कुछ फटा। सबसे बड़ा फायदा तो यह हुआ कि मनोरंजन की दुनिया में पाँव जमाकर बैठे भेड़ की खाल में भेड़ियों की कलई खुल गई।

‘BJP का डर दिखा कॉन्ग्रेस माँग रही है समुदाय विशेष से वोट, जबकि भागलपुर दंगे और बाबरी मस्जिद कांड के हैं जिम्मेदार’

एक तरफ़ बंगाल में जहाँ ममता बनर्जी द्वारा कॉन्ग्रेस पर चुनाव जीतने के लिए भाजपा की मदद लेने का आरोप लगाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर ओवैसी कॉन्ग्रेस पर आरोप मढ़ रहे हैं कि वो जनता में बीजेपी का डर दिखाकर लोगों से वोट की गुहार लगा रही है।

सोमवार (अप्रैल 15, 2019) को चुनाव प्रचार के दौरान बिहार के किशनगंज में एक जनसभा को संबोधित करते हुए एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दिन ओवैसी ने अपनी पार्टी के उम्मीदवार अख्तरुल इमान को वोट करने के लिए लोगों से अपील की।

इस दौरान उन्होंने वादा किया कि वह सीमांचल के सड़क से लेकर पुल-पुलिया का विकास तथा गरीबों की आवाज को सरकार तक पहुँचाने का काम करेंगे। साथ ही उन्होंने इस दौरान राहुल गाँधी, नरेंद्र मोदी और नीतीश पर जमकर निशाना साधा।

जनसभा को संबोधित करने के दौरान उन्होंने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि आज कॉन्ग्रेस भाजपा का डर दिखाकर कथित अल्पसंख्यकों से वोट माँग रही है, जबकि उसके खुद के शासन काल में भागलपुर के दंगे और बाबरी मस्जिद जैसी घटनाएँ हुईं थीं।

ओवैसी ने संसदीय सीट किशनगंज में अपनी पार्टी की रैली को संबोधित करते हुए नीतीश कुमार की बिहार में जीत पर भी बात की। उन्होंने कहा, ”मैंने आप लोगों को 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान आगाह किया था कि तथाकथित महागठबंधन के वादों के झाँसे में ना आएँ, आपने ध्यान नहीं दिया था। आपने नीतीश कुमार को वोट दिया जो अब भाजपा की गोद में बैठे हैं आपको वही गलती दोबारा नहीं करनी चाहिए।”

इस दौरान उन्होंने जनता के समक्ष तीन तलाक मुद्दे पर की भी बात उठाई। ओवैसी ने दावा किया कि ट्रिपल तलाक का बिल लोकसभा जब पहुँचा था तो उस वक्त उन्होंने ही इसका विरोध किया था।

उन्होंने लोकसभा चुनावों को जनता के लिए सुनहरा मौका बताते हुए कहा कि यदि वहाँ की जनता अख्तरुल इमान को जिताकर लोकसभा तक भेजती है, तो वहाँ पर उनकी ताकत दोगुनी हो जाएगी। ओवैसी ने जनता से अपील की है कि इस बार गफलत का शिकार न हों। उनकी मानें तो जबसे नरेंद्र मोदी पीएम बनें हैं, तबसे गरीबों, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के मामले काफ़ी बढ़ोतरी हुई है।

पाकिस्तान में पिछले सिर्फ एक साल में 1000 से अधिक हिन्दू-ईसाई लड़कियों का जबरन धर्मान्तरण: HRPC

पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख़्यकों के क्या हालात हैं इस पर कई घटनाएँ सामने आती रहती हैं। अभी पाकिस्तान में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। जिसके आँकड़े चौकाने वाले हैं। पाकिस्तान के एक स्वतंत्र मानवाधिकार संगठन ने देश में हिन्दू एवं ईसाई लड़कियों के जबरन धर्मांतरण और निकाह पर सोमवार को चिंता जाहिर की और कहा कि पिछले साल अकेले सिंध प्रांत में ऐसे तकरीबन 1000 मामले सामने आए हैं।

अपनी वार्षिक रिपोर्ट में पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने कहा, “सरकार ने ऐसी जबरन शादियों को रोकने के लिए अतीत में बहुत कम कोशिशें की हैं।” इस कारण से एचआरसीपी ने सांसदों से इस चलन को खत्म करने के लिए प्रभावी कानून बनाने की गुजारिश की।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आयोग ने 335 पन्नों की 2018 में मानवाधिकार की स्थिति रिपोर्ट में कहा है कि 2018 में सिर्फ सिंध प्रांत में ही हिन्दू एवं ईसाई लड़कियों से संबंधित अनुमानित 1000 मामले सामने आए। जिन शहरों में बार-बार ऐसे मामले हुए हैं, उनमें उमरकोट, थरपारकर, मीरपुरखास, बदीन, कराची, टंडो अल्लाहयार, कश्मोर और घोटकी शामिल हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में जबरन धर्मांतरण और जबर्दस्ती निकाह का कोई प्रमाणिक आँकड़ा मौजूद नहीं है। उसमें बताया गया है कि ‘सिंध बाल विवाह रोकथाम अधिनियम 2013’ को प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया गया और जबरन निकाह पर सरकार की प्रतिक्रिया चलताऊ ही रही।

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर पुलिस की मिली-भगत नहीं रही तो भी अधिकतर मामलों में उसका रवैया असंवेदनशील और बेरूखी भरा रहा। रिपोर्ट में कहा गया कि 2018 में पाकिस्तान में अपनी आस्था के मुताबिक जिदंगी गुजारने पर अल्पसंख्यकों ने उत्पीड़न का सामना किया, उन्हें गिरफ्तार किया गया। यहाँ तक की कई मामले में उनकी मौत भी हुई।

मस्जिद में महिलाएँ Vs मर्द: बहनो… एक साथ खड़े होने का समय अब नहीं तो कब?

कुछ समय पहले सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर काफ़ी विवाद खड़ा किया गया था। इस दौरान मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं को दरकिनार करके हर जगह से सवाल उठाए जा रहे थे। सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश निषेध को महिलाओं के अधिकारों का दमन बताया जा रहा था। उस समय अनेकों तर्क देने के बाद भी कुछ तथाकथित फेमिनिस्टों का जोश ठंडा नहीं हुआ था, उस दौरान उन्हें किसी भी प्रकार से मंदिर में प्रवेश की लड़ाई लड़नी थी। चाहे फिर उस मंदिर से जुड़ी सभी मान्यताएँ ही क्यों न तार-तार हो जाएँ।

सबरीमाला के विवादों में घिरे रहने के बीच एक ऐसा ही मामला सामने आया है। इस मामले में और सबरीमाला में फर्क सिर्फ़ इतना है कि ये मुद्दा उस समुदाय के ठेकेदारों से जुड़ा है, जिन पर आवाज़ उठाने का मतलब ट्रोल हो जाना है। हुआ यह कि पुणे के एक मजहबी दंपति ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिका दायर करते हुए न्याय व्यवस्था से गुहार लगाई कि भारत के मस्जिदों में औरतों की रोक को अवैध और असंवैधानिक घोषित किया जाए।

आगे बात करने से पहले बता दूँ कि भारत में अधिकांश मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है, जिसके मद्देनज़र इस दंपति ने याचिका दायर की है। याचिका में यासमीन जुबेर अहमद पीरजादे और जुबेर अहमद पीरजादे नामक दंपति ने जिक्र किया है कि कुरान और हदीस में ऐसे किसी बात का उल्लेख नहीं है, जो लिंग भेद को जरूरी बताए। इसके अलावा संविधान में प्राप्त अधिकारों को रखते हुए दंपति ने अपनी याचिका में धारा 14, 15, 21 और 25 का हवाला देते हुए इस प्रैक्टिस को महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है।

दंपति ने याचिका में इस बात का भी जिक्र किया है कि देश में बहुत सी औरतें इस भेदभाव से पीड़ित हैं लेकिन वो कोर्ट तक अपनी आवाज़ पहुँचाने की हालत में नहीं हैं। याचिका में इस बात का भी उल्लेख किया है कि लिंग भेद को लेकर विभिन्न जगहों पर अलग-अलग मान्यताएँ हैं। एक ओर जहाँ कनाडा के अहमद कुट्टी के अनुसार लिंगभेद की इस्लाम में कोई आवश्यकता नहीं है। वहीं दूसरी ओर सउदी अरब के अब्दुल रहमान अल-बराक इस्लाम में लैंगिक भेदभाव को मिटाने की बात करने वाले लोगों पर फतवा (डेथ वारंट) जारी कर चुके हैं।

मतभेदों के बीच दंपति की याचिका में इस बात का भी उल्लेख है कि जमात-ए-इस्लामी और मुजाहिद वर्ग के लोग महिलाओं को मस्जिदों में नमाज पढ़ने की अनुमति देते हैं जबकि सुन्नी समुदाय में महिलाओं के मस्जिद में जाने पर प्रतिबंध है। हालाँकि जिन मस्जिदों में महिलाओं को जाने दिया जाता है वहाँ पर उनके प्रवेश द्वार से लेकर उनके नमाज पढ़ने वाले स्थान को अलग रखा जाता है। जबकि समुदाय के सबसे पाक स्थल मक्का में इस तरह का भेदभाव नहीं किया जाता है। काबा में महिलाएँ और पुरूष दोनों गोले में बैठकर नमाज़ अदा करते हैं।

दंपति द्वारा दर्ज याचिका में दिए तर्कों से जाहिर होता है कि महिलाओं का मस्जिदों में प्रवेश निषेध होना कुरान या अल्लाह के बताए रास्तों में से एक तो बिलकुल भी नहीं हैं। बावजूद इसके कभी भी इस मुद्दे पर सवाल उठाने का प्रयास किसी तथाकथित प्रोग्रेसिव फेमिनिस्ट टाइप लोगों ने नहीं किया। गलती उनकी भी नहीं है। बीते कुछ सालों में हमारे इर्द-गिर्द जिस माहौल का निर्माण किया गया है, वो हमें अपनी छवि को बूस्ट करने के लिए हिंदू धर्म पर सवाल उठाने का ही एकमात्र विकल्प देता है। सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम लोगों की जमात है, जो दंपति के समर्थन में अपना एक पोस्ट तक लिखना जरूरी नहीं समझेंगे, न ही उनकी इस कोशिश को सराहेंगे, लेकिन वहीं अगर बात हिंदू धर्म और किसी मंदिर से जुड़ी होगी, तो उनके अधिकारों का हनन भी होगा और समाज असहिष्णु भी हो जाएगा।

याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि विधानमंडल आम महिलाओं और मजहबी महिलाओं की गरिमा और उनके समानता के अधिकार सुनिश्चित करने में विफल रहा है, विशेष रूप से तब जब बात महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश को लेकर हो या फिर उनके बुर्के पहनने को लेकर हो।

याचिका में सबरीमाला मंदिर विवाद का भी हवाला दिया गया है, जिसका फैसला सुनाते समय शीर्ष अदालत ने कहा था कि महिलाओं को पूजा-अर्चना के अधिकारों से वंचित रखने के लिए धर्म का उपयोग नहीं किया जा सकता है। साथ ही यह भी उदाहरण स्वरूप बताया गया है कि सऊदी अरब, यूएई, मिस्र, अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर की मस्जिदों में महिलाओं को जाने की अनुमति है। याद दिला दिया जाए कि सबरीमाला विवाद के दौरान महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के लिए ह्यूमन चेन तक बनाई गई थी, जिसमें समुदाय की महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर महिलाओं के साथ हो रहे भेद-भाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी।

ह्यूमन चेन में महिलाओं का योगदान

अब ऐसे में देखना ये है कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सुनवाई करते हुए किसके पक्ष में फैसला करेगा, और मजहबी महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए कहाँ तक आवाजें बुलंद कर पाएँगी? या फिर मज़हब की बात आने पर कुरान (फर्जी मजहबी धर्म गुरुओं द्वारा परिभाषित) द्वारा दर्शाए मार्ग पर आश्रित हो जाएँगी। शाइस्ता अम्बर का कहना है, “महिलाएँ मस्जिद में नमाज पढ़ सकती हैं। महिलाएँ इमामत करते हुए दूसरी महिलाओं को नमाज पढ़ा भी सकती हैं। लेकिन एक महिला पुरुषों की इमामत कर सकती है या नहीं, पुरुष महिला के पीछे नमाज पढ़ सकते हैं या नहीं इस मामले में हमें शरियत का पालन करना चाहिए। कुरान की रोशनी में मुफ्ती हजरात क्या कहते हैं, उसी को मानना चाहिए।”

एक ओर मक्का का उदाहरण देने वाले दंपति हैं। जिन्होंने तर्कों के आधार पर अपनी याचिका की बुनियाद रखी। तो दूसरी ओर इस्लामिक पीस ऐंड डेवलपमेंट फाउंडेशन के अध्यक्ष मोहम्मद इकबाल के तर्क भी जरा पढ़ लीजिए। वो कहते हैं, “महिलाओं के नमाज पढ़ने के लिए देश में कई मस्जिदें हैं। कुछ जगहों पर एक महिला दूसरी महिलाओं की इमामत भी कर रही है। मालेगाँव, महाराष्ट्र के मदरसे जामिया मोहम्मदिया के परिसर में बनी एक मस्जिद में लड़कियाँ नमाज पढ़ती हैं। उनकी नमाज महिला इमाम ही पढ़ाती हैं।”

बात अगर सभी मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की हो रही है तो यह कैसा तर्क कि फलां-फलां में चले जाओ! फिर सबरीमाला मामले में मजहबी महिलाओं की वायरल होती तस्वीर क्या थी? क्या भारत के हर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है? नहीं। इसीलिए बहनो! यह सही वक्त है चोट करने का। मस्जिद में पल रही मर्दवादी सोच पर प्रहार करने का। एक साथ उठ खड़ी हो, हजारों किलोमीटर लंबी ह्यूमन चेन बनाओ। अल्लाह ने चाहा तो सुप्रीम कोर्ट भी आपके हक में फैसला सुनाएगा!

समाजवादियों के फिर बिगड़े बोल, एक और मंत्री का जया प्रदा पर विवादित बयान

जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है नेताओं की भाषा शैली उसी तरह बिगड़ती चली जा रही है। नेताओं के होने वाले भाषण मर्यादा को तार-तार कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान के द्वारा रामपुर से भाजपा प्रत्याशी जया प्रदा के ऊपर ‘खाकी अंडरवियर’ वाले बयान के बाद अब सपा के एक और नेता ने जया को लेकर एक विवादित बयान दे दिया है। पार्टी के नेता विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह ने आजम खान द्वारा रामपुर की भाजपा प्रत्याशी जया प्रदा पर की गई अश्लील टिप्पणी का समर्थन करते हुए कहा कि अगर आजम खान साहब ने बयान दिया है तो ये उनकी अपनी सोच है। और जब मीडिया वालों ने उनसे पूछा कि आपको नहीं लगता है कि एक महिला के लिए इस तरह से बोलना गलत है, तो उन्होंने इसका जवाब देते हुए कहा, “आपको लगता है कि वो महिला है, वो महिला नहीं है, उनका बहुत ऊँचा है सोच।”

गौरतलब है कि आजम खान ने रविवार (अप्रैल 14, 2019) को रामपुर में लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि उन लोगों ने 17 सालों में उनको (जया प्रदा) को नहीं पहचाना, जबकि उन्होंने केवल 17 दिन में उनकी (जया प्रदा) वास्तविकता को पहचान लिया। उन्होंने कहा, “उसकी असलियत समझने में आपको 17 साल लग गए। मैं तो 17 दिन में ही पहचान गया कि इनके नीचे का जो अंडरवियर है, वो भी खाकी रंग का है।”

इस महिला विरोधी बयान देने के बाद आजम ने डीएम से मायावती की जूती साफ करवाने की बात कही। आजम यहीं पर नहीं रूके, इन विवादित बयान के बाद उन्होंने एक पत्रकार से बदसलूकी करते हुए कहा, “आपके वालिद की मौत में आया था, आपके वालिद मर गए हैं उसमें आया था।” दरअसल मध्य प्रदेश के विदिशा में दिवंगत सांसद मुनव्वर सलीम के अंतिम क्रिया-कर्म से लौटते वक्त जब आजम से मीडिया वालों ने जयाप्रदा के बारे में सवाल किया तो वो भड़क गए और इस तरह का विवादित बयान दे दिया।

वहीं, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने आजम के महिला-विरोधी ‘अंडरवियर बयान’ पर उनका बचाव करते हुए कहा था, “आजम खान के बयान को गलत परिपेक्ष्य में पेश किया गया। उन्होंने ऐसा किसी और के लिए कहा था। संघ के कपड़ों को लेकर दिया गया उनका बयान किसी और के लिए था। मीडिया इस मामले में गलती कर रही है, कुछ और ही दिखाया जा रहा है।” इतना ही नहीं, अखिलेश यादव ने आजम खान के साथ एक फोटो ट्वीट कर भी यह दिखाया कि कि वो उनके साथ खड़े हैं। हालाँकि, मुलायम सिंह यादव की बहू अपर्णा यादव ने आजम खान के बयान की निंदा की है। उन्होंने निर्वाचन आयोग और सपा प्रमुख अखिलेश से इस मामले में त्वरित कार्रवाई करने की अपील की थी। चुनाव आयोग ने आजम खान पर कार्रवाई करते हुए उन्हें 72 घंटे चुनाव प्रचार करने से रोक दिया है।