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U-Turn: चुनावी ‘धंधे’ में अब उतरा मूँछ वाला ‘गुंडा’, अभिनेताओं की राजनीति को कभी बताया था दुर्भाग्य!

भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अलग मुक़ाम बनाने के बाद अब प्रकाश राज ने अपनी कमाई इज्जत पर बट्टा लगाने की कसम खा ली है। यह और बात है कि बेइज्जती के कीचड़ में भी वो लोट-पोट होकर गर्व महसूस कर रहे हैं। पहले के प्रकाश राज को राजनीति में कोई ख़ास रूचि नहीं थी। लेकिन 2014 में मोदी सरकार के सत्ता संभालने के साथ ही उन्हें देश में सब कुछ बिगड़ता सा नज़र आने लगा। वैसे तो इस जमात में और भी कई लोग हैं लेकिन प्रकाश राज इसके नेतृत्वकर्ताओं में से एक हैं। इस पर आगे चर्चा होती रहेगी लेकिन शुरुआत करते हैं उनके नवंबर 2017 में दिए गए बयान से। प्रकाश राज ने उस दौरान अभिनेताओं के राजनीति में आने को देश का दुर्भाग्य बताते हुए कहा था कि वो अभिनेताओं के राजनीति में आने को सही नहीं मानते। उन्होंने यह भी कहा था कि वो किसी भी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़ेंगे।

प्रकाश राज उस समय अप्रत्यक्ष रूप से तमिल अभिनेता कमल हासन पर निशाना साध रहे थे। तमिलनाडु में राजनीति और सिनेमा के संगम को आगे बढ़ाते हुए सुपरस्टार रजनीकांत और कमल हासन राजनीति में एंट्री की घोषणा कर चुके हैं। प्रकाश राज को अपने उस बयान को भूलने में बस 1 साल से कुछ ही महीने अधिक लगे। नवंबर 2017 में अभिनेताओं की राजनीति में एंट्री को देश का दुर्भाग्य बताने वाले प्रकाश राज ने जनवरी 2019 में घोषणा कर दी कि वो लोकसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उतरेंगे। अभिनय के लिए नेशनल अवॉर्ड जीत चुके प्रकाश राज ने वास्तविकता में भी ऐसा ही किरदार निभाया, जैसा वो फ़िल्मों में निभाते आ रहे हैं।

बेंगलुरु सेंट्रल से चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे प्रकाश राज ने अब कहा है कि चुनाव एक धंधा बन चुका है और वो अभिनेता और स्थानीय होने के कारण इतिहास बदलने की क्षमता रखते हैं। प्रकाश राज ने ख़ुद को सेक्युलर इंडिया की आवाज़ बताते हुए आगे कहा कि आज की चुनाव प्रणाली एक ब्रांडिंग बन चुकी है, मार्केटिंग टूल बन चुकी है। बकौल राज, वो नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ नहीं हैं, सिर्फ़ सत्ता से सवाल पूछ रहे हैं। वॉन्टेड, सिंघम और दबंग-2 में मुख्य विलेन की भूमिका निभा चुके प्रकाश राज वास्तविक दुनिया में लीड हीरो बनने की फ़िराक़ में हैं, भले ही उनकी कथनी और करनी में कोई मेल नहीं हो।

वामपंथी पार्टियों के दुलारे प्रकाश राज को आम आदमी पार्टी का भी समर्थन मिल रहा है। भाजपा और संघ को भर-भर कर गालियाँ देने वाले प्रकाश राज यू-टर्न लेने के मामले में अपने साथी अरविन्द केजरीवाल को भी पीछे छोड़ चुके हैं। वामपंथी पार्टियों के सम्मेलनों में उनके चेहरे को ख़ूब भुनाया गया। कहने को तो वो निर्दलीय मैदान में हैं लेकिन उन्हें किन पार्टियों का समर्थन प्राप्त है, यह किसी से छिपा नहीं है। गाय और गोमूत्र को लेकर भी उनके बयान ख़ासे चर्चा में रहे। उन्होंने अपने आलोचकों को गोमूत्र में गोबर मिलाकर कपड़े साफ़ करने को कहा था। खैर, उनकी यू-टर्न की एक और बानगी देखिए।

प्रकाश राज नरेंद्र मोदी की आलोचना में इतने खो गए कि उन्होंने अपना नेशनल अवॉर्ड वापस करने तक की भी घोषणा कर दी थी। लेकिन फिर शायद उन्होंने अपने घर में रखे पाँच नेशनल अवॉर्ड्स को जी भर देखने के बाद यू-टर्न लेने की योजना बनाई। बाद में उन्होंने कहा कि वो इतने भी बड़े मूर्ख नहीं हैं कि अपने अवॉर्ड्स वापस कर दें। उन्हें पता भी नहीं चला कि उन्होंने अनजाने में ही सही, अवॉर्ड वापसी करने वाले अपने साथियों को मूर्ख ठहरा दिया। अभी से ही यू-टर्न ले रहे प्रकाश राज शायद वो सारे दाँव-पेंच आज़मा रहे हैं जो उन्होंने फ़िल्मों में एक्टिंग के दौरान सीखे हैं।

वैसे बहुत लोगों को पता नहीं है लेकिन ये बात जानने लायक है कि प्रकाश राज पहले ऐसे एक्टर हैं, जिन्हें तेलुगू फ़िल्म इंडस्ट्री (टॉलीवुड) द्वारा बैन किया गया था। कई तेलुगू फ़िल्मों में काम कर चुके प्रकाश राज को उनकी ही इंडस्ट्री ने प्रतिबंधित कर दिया था। माँ दुर्गा के नाम पर बनी एक आपत्तिजनक टाइटल वाली फ़िल्म का भी उन्होंने समर्थन किया था। आलम यह है कि दिखावा के चक्कर में वो विदेशों में छुट्टियाँ मनाने के दौरान भी अपने आलोचकों के बारे में ही सोचते रहते हैं और अपनी लक्ज़री वाली लाइफस्टाइल से जुड़ी चीजें सोशल मीडिया पर पोस्ट कर तथाकथित ‘ट्रॉल्स’ को डेडिकेट करते हैं। कई ट्वीटर यूजर्स ने तो कहा भी है कि प्रकाश राज 24 घंटे आलोचकों को नीचा दिखाने के तरीके के बारे में ही सोचते रहते हैं।

अगर अभिनेताओं का राजनीति में आना ग़लत है, देश का दुर्भाग्य है तो प्रकाश राज आज ख़ुद राजनीति में क्यों हैं? अगर अवॉर्ड वापसी सही था तो उन्होंने ये क्यों कहा कि अवॉर्ड वापस करना उनके लिए मूर्खता है? अगर उनका व्यवहार अच्छा रहा है तो जिस इंडस्ट्री में उन्होंने कई हिट फ़िल्में दीं, उसने ही उन्हें क्यों प्रतिबंधित कर दिया? उमर ख़ालिद, कन्हैया कुमार और शेहला रशीद के साथ फोटो खिंचवा कर उन्हें प्रोत्साहित करने वाले प्रकाश राज भाजपा और केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के कृत्य का समर्थन कर अपने-आप को लोकतंत्र का सबसे बड़ा हीरो मानते हैं। और तो और, स्टैचू ऑफ यूनिटी से भी उन्हें ख़ासी दिक्कत थी।

इन अभिनेताओं के साथ असल दिक्कत यह है कि ये पहले तो सामाजिक कार्यकर्ता होने का ढोंग रचते हैं और फिर धीमे-धीमे राजनीति को गंदगी बताते-बताते कैसे उसी में उतर जाते हैं, पता ही नहीं चलता। ये ग़रीबों के लिए कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता नहीं होते, ये ख़ुद को एक्टिविस्ट कहलाना पसंद करते हैं और उसके लिए एकमात्र क्राइटेरिया है, वर्तमान मोदी सरकार को गालियाँ देना और इस जमात के अन्य लोगों का समर्थन करना, चाहे वो कोई भी हो। प्रकाश राज ने भी देखा कि जब करुणानिधि, अन्नादुराई, जयललिता और एनटीआर जैसे फ़िल्मों से जुड़े लोग मुख्यमंत्री बन सकते हैं और अम्बरीष, चिरंजीवी, विजयकांत जैसे अभिनेता अच्छे पदों पर पहुँच सकते हैं तो वो क्यों नहीं!

शायद इसी लालच से प्रकाश राज का मन डोल गया होगा। कर्णाटक में वामपंथी दलों व मोदी विरोधी खेमे के पोस्टर बॉय तो वो हैं ही। वो अलग बात है कि कॉन्ग्रेस ने ख़ूब कोशिश की कि वो बेंगलुरु सेंट्रल से न उतरें क्योंकि पार्टी ने वहाँ से एक मुस्लिम को टिकट दिया है और उसे अंदेशा है कि प्रकाश राज उसी का वोट काट बैठेंगे। ऐसे में, कॉन्ग्रेस को डर है कि कहीं भाजपा सांसद पीसी मोहन जीत की हैट्रिक न लगा बैठें। अब देखना यह है कि राजनीति को गाली देकर राजनीति में उतरे ‘एक्टिविस्ट’ प्रकाश राज का राजनीतिक करियर कितना लम्बा चलता है।

शहर नहीं, उइगरों का कैदखाना: हर 100 गज पर पुलिस, एक रोड पर 20 कैमरे – लेकिन मसूद अजहर है मसीहा

चीन का आतंकवाद के प्रति दोहरा रवैया भारत समेत पूरी दुनिया के लिए बड़ा खतरा और समस्‍या बना हुआ है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि चीन जहाँ पाकिस्‍तान में बैठे मसूद अजहर को आतंकी नहीं मानता है, वहीं अपने यहाँ के उइगर उसको आतंकी दिखाई देते हैं। चीन ने उइगर समुदाय पर कई तरह की पाबंदियाँ लगा रखी हैं। लाखों उइगरों को हिरासत केंद्रों में रखा गया है और चीन इन हिरासत केंद्रों को व्यावसायिक शिक्षा केंद्र कहता है। चीन उनके ऊपर नियंत्रण का जाल बिछा रहा है, जो कम्युनिस्ट पार्टी के स्वचालित तानाशाह के दृष्टिकोण को दर्शाता है। इसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी निंदा की जा रही है।

दरअसल, चीन के उत्तर-पश्चिम में काशगर नामक एक प्राचीन शहर है। जहाँ लाखों उइगर और अन्य अल्पसंख्यकों को कैम्पों में एक बंदी की तरह रखा जाता है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, उन्होंने काशनगर के लोगों की स्थिति जानने के लिए वहाँ का कई बार दौरा किया, लेकिन वो लोग स्थानीय लोगों का इंटरव्यू ले पाए, क्योंकि ये काफी जोखिम भरा था। पुलिस लगातार पीछा कर रही थी और हर जगह प्रतिबंधित था। हर 100 गज की दूरी पर पुलिसकर्मी बंदूकों के साथ चेकपॉइंट्स पर मौजूद थे। वहाँ से निकलने के लिए कतार में लगे अल्पसंख्यकों के चेहरे पर कोई भाव नहीं था, वे अपने आधिकारिक आईडी कार्ड को स्वाइप करने के लिए कतारबद्ध थे। बड़े चेकपॉइंट पर उन्होंने अपना सिर ऊपर उठाया ताकि उनकी तस्वीरें मशीन द्वारा ली जा सकें। उनकी पुष्टि हो जाने के बाद उन्हें जाने दिया गया।

इतना ही नहीं, पुलिस कभी-कभी जरूरी सॉफ्टवेयर जाँचने के बहाने उइगरों का फोन ले लेती है, ताकि उनके कॉल और मैसेज पर नज़र रखी जा सके। शिनजियांग चीन के सुदूर पश्चिम में मौजूद है, लेकिन यह मध्य एशिया का हिस्सा ज्यादा लगता है। उइगर, कजाख और ताजिक जनसंख्या के मामले में यहाँ के हॉन समुदाय से ज्यादा हैं। वे ज्यादातर सुन्नी समुदाय के लोग हैं जिनकी अपनी संस्कृति और भाषा है।

उइगरों की निगरानी के लिए पड़ोसियों को छोड़ रखा गया है। निगरानी कर रहे लाखों पुलिस और अधिकारी उइगरों से कभी भी पूछताछ कर सकते हैं और उनके घरों की छानबीन कर सकते हैं। सर्विलांस कैमरा हर तरफ है चाहे वह सड़क हो, दरवाजा, दुकान या मस्जिद। एक रास्ते पर 20 कैमरे मौजूद हैं। बंदियों के बच्चों को अनाथालय उससे दूर ले जाते हैंं। सरकार का कहना है कि पिछले साल अनाथालय में 7,000 बच्चे काशनगर के ही थे।

शुक्रवार समुदाय के लोगों के लिए प्रार्थना के लिए खास दिन होता है। इस दिन जहाँ मस्जिदों में काफी भीड़ होती है, वहीं यहाँ पर इस दिन भी मस्जिद में केवल कुछ ही लोग आए, जबकि कुछ सालों पहले यहाँ पर हजारों लोग नमाज अदा करने के लिए इकट्ठा हुए थे। इस मस्जिद में नमाज पढ़ने आए लोगों का रजिस्ट्रेशन होता है और फिर वो मस्जिद के अंदर कैमरे की निगरानी में नमाज पढ़ते हैं, ताकि पुलिस उन पर नजर रख सके। इस दौरान बच्चों से भी उनके माता-पिता के कुरान पढ़ने को लेकर सवाल किए जाते हैं।

शहर को नियंत्रित करने के लिए आसान बनाने के लिए काशगर की वास्तुकला को बदल दिया गया है। मिट्टी से बने ज्यादातर घरों को नष्ट कर दिया गया है। सरकार ने कहा कि यह सुरक्षा और स्वच्छता के लिए था। पुनर्निर्माण में अच्छी सड़कें भी बनाई हैं, जिससे मानीटरिंग और पेट्रोलिंग करने में आसानी होती है। कुछ क्षेत्रों में अभी भी पुनर्निर्माण का कार्य चल रहा है। ईंट से बने नए घर देखने में काफी अच्छे लगते हैं, लेकिन उइगर आज भी अपने उसी पुराने दर्द से गुजर रहा है। यहाँ घूमने आए पर्यटक अक्सर उन प्राचीन गलियों से अनजान होते हैं, जिन्हें बदल दिया गया है। इसके साथ ही आगंतुकों को शहर के किनारे पर स्थित आवास शिविरों से दूर रखा जाता है।

अगस्त 2016 में दक्षिणी काशगर का एक टुकड़ा खाली था। आज यह लगभग 20,000 लोगों की क्षमता वाला एक पुन: शिक्षा शिविर है। सरकार का कहना है कि यह एक व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र है। एक हालिया उपग्रह चित्र से पता चलता है कि शिविर 2 मिलियन वर्ग फुट से अधिक का है। इस तरह से आगे बढ़ने वाला यह शिविर अकेला नहीं है। पिछले साल काशगर में तेरह शिविर 10 मिलियन वर्ग फीट से अधिक तक पहुँच गए थे। वहाँ पर घूमने पर्यटक तो आ रहे हैं, लेकिन अभी भी वहाँ पर लाखों उइगर भय में जीने को मजबूर हैं।

राहुल गाँधी के लिए ममता के दिल में कोई ‘ममता’ नहीं: कॉन्ग्रेस पर RSS से मदद लेने का लगा दिया आरोप

चुनाव जीतने के लिए से इन दिनों हर राजनैतिक पार्टियों के बीच आरोप-प्रत्यारोपों का दौर जारी है। इसी कड़ी में कभी विपक्ष को एकजुट करके रैली निकालने वाली ममता बनर्जी आज खुद कॉन्ग्रेस पर चुनाव जीतने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मदद लेने का आरोप लगा रही है। साथ ही जनता से अनुरोध कर रही हैं कि वह कॉन्ग्रेस, भाजपा और वामपंथी दलों के ‘घातक गठबंधन’ को पराजित करके उन्हें विजयी बनाएँ।

सोमवार (अप्रैल 15, 2019) को तृणमूल कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष ने नागपुर(2018) में RSS के एक कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के शामिल होने को आधार बनाकर संघ पर आरोप लगाया कि वह लोग पूर्व राष्ट्रपति के बेटे और कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता अभिजीत मुखर्जी के लिए प्रचार में जुटे हुए हैं।

मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा गाँव में एक चुनावी सभा में कॉन्ग्रेस के विषय पर बात करते हुए ममता ने कहा, “भानुमति का पिटारा खोलने के लिए मुझे बाध्य मत कीजिए, नहीं तो प्रदेश में कॉन्ग्रेस की समूची योजना का खुलासा हो जाएगा।”

ममता के मुताबिक बहरामपुर और जंगीपुर में कॉन्ग्रेस उम्मीदवारों के लिए संघ द्वारा प्रचार किया जा रहा है। बनर्जी का कहना है कि बहरामपुर कॉन्ग्रेस उम्मीदवार अधीर चौधरी की वामपंथी दलों और बीजेपी के सहयोग से चुनाव जीतने की रणनीति इस बार सफल नहीं होगी। उन्होंने इस दौरान लोगों से अपील की है कि ऐसे संदिग्ध चरित्र वाली पार्टी को वोट नहीं करना चाहिए।

गौरतलब है कि ममता के अनुसार राष्ट्रीय सेवक संघ, जंगीपुर में अभिजीत मुखर्जी के लिए और बहरामपुर में अधीर चौधरी के लिए प्रचार कर रही है। उनकी मानें तो सीपीएम पहले ही बीजेपी के हाथों बिक चुकी है।

बता दें कि इससे पहले भी ममता बनर्जी ने शनिवार (अप्रैल 13, 2019) को भाजपा पर जमकर हमला बोला था। इस दौरान उनका आरोप था कि वह (भाजपा) जनता को गुमराह करने के लिए धर्म का इस्तेमाल करके राजनैतिक लाभ इस्तेमाल करने की कोशिश में हैं।

टीम इंडिया का वो प्लेयर जो खेलेगा वर्ल्ड कप लेकिन BJP संग मोदी को सपोर्ट कर मचा दी है ‘खलबली’

वर्ल्ड कप टीम में चयन होने के कुछ घंटे बाद ही भारतीय क्रिकेट टीम के ऑलराउंडर रवींद्र जडेजा ने भारतीय जनता पार्टी के समर्थन का ऐलान कर दिया है। लोकसभा चुनाव के बीच जडेजा ने सोमवार (अप्रैल 15, 2019) को अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, “ मैं बीजेपी का सपोर्ट करता हूँ, जय हिंद।” इस ट्वीट में उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी को टैग करने के साथ ही अपनी पत्नी रिवाबा का हैशटैग भी इस्तेमाल किया है। जडेजा ने ट्वीट में बीजेपी का सिंबल भी शेयर किया है।

बता दें कि, रवींद्र जडेजा का पूरा परिवार हाल ही में सक्रिय राजनीति में आया है। उनकी पत्नी रिवाबा जडेजा ने 3 मार्च को बीजेपी का दामन थामा था। रिवाबा ने जामनगर में गुजरात के कृषि मंत्री आरसी फालदू और सांसद पूनम मदाम की उपस्थिति में पार्टी ज्वाइन की थी। क्रिकेटर की पत्नी के बाद रविवार (अप्रैल 14, 2019) को उनके पिता अनिरुद्ध सिंह और बहन नैना जडेजा भी राजनीति में उतर आए हैं। हालाँकि उन्होंने भाजपा के मुख्य विरोधी दल कॉन्ग्रेस का हाथ थाम लिया है। जडेजा के पिता और बहन जामनगर जिले के कलवाड शहर में एक रैली के दौरान कॉन्ग्रेस नेता हार्दिक पटेल की मौजूदगी में पार्टी में शामिल हुए। इस मौके पर जामनगर लोकसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार मुलु कंडोरिया भी उपस्थित थे।

नैना महिलाओं को सशक्त करने की दिशा में काम करना चाहती हैं और उन्हें लगता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी महिलाओं, किसानों और युवाओं के अधिकार के लिए लड़ती है, इसलिए उन्होंने कॉन्ग्रेस में शामिल होने का फैसला किया।

गौरतलब है कि रवींद्र जडेजा और उनकी पत्नी रिवाबा जडेजा ने पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जामनगर में मुलाकात की थी। जिसके बाद पीएम मोदी ने ट्विटर पर तस्वीर जारी करते हुए लिखा था कि क्रिकेटर रविंद्र सिंह जडेजा और उनकी पत्नी रिवाबा के साथ शानदार बातचीत हुई।

$33100 करोड़ पहुँचा निर्यात, 2018-19 में 9% की वृद्धि, टूटा पिछले 5 वर्षों का रिकॉर्ड

भारत ने निर्यात में अच्छी-ख़ासी बढ़ोतरी दर्ज की है। सरकार ने वित्त वर्ष 2018-19 के विदेशी व्यापार का आँकड़ा जारी कर दिया है। आँकड़ों के अनुसार, निर्यात में 9 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है। निर्यात अब 331 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। पिछले वर्ष यह 303 बिलियन डॉलर था। इसके साथ ही 2013-14 का वो रिकॉर्ड भी धराशयी हो गया, जब निर्यात 314.4 अरब डॉलर दर्ज किया गया था।

भारत सरकार द्वारा जारी किए गए भारतीय विदेश व्यापार के आँकड़े

मार्च महीने में निर्यात में 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह अक्टूबर 2018 के बाद से अब तक की सबसे बड़ी मासिक वृद्धि है। उस समय निर्यात में 17.86 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी। फार्मा, इंजीनियरिंग, टेक्सटाइल्स, ड्रग्स और पेट्रोलियम जैसे क्षेत्रों में ऊँची वृद्धि के कारण निर्यात में भारत ने छलांग लगाई है। नीचे दी गई ग्राफ़िक्स में आप इसे बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

निर्यात: किस क्षेत्र में कितनी वृद्धि

भारतीय वाणिज्य मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, “वैश्विक मंदी के रूप में आई बड़ी गिरावट के बावजूद व्यापारिक निर्यात 2018-19 में 331 अरब डॉलर दर्ज किया गया जो कि अब तक का उच्चतम स्तर है। यह 2013-14 के 314.4 अरब डॉलर के स्तर से आगे बढ़ गया है। यह उपलब्धि चुनौतिपूर्ण वैश्विक माहौल में हासिल की गई है।” बता दें कि व्यापार घाटे में भी कमी दर्ज की गई है। मार्च 2018 में व्यापार घाटा 13.51 अरब डॉलर था जो अब घटकर 10.89 अरब डॉलर हो गया है। सोने के आयत में वृद्धि दर्ज की गई है। यह 31.22 प्रतिशत बढ़कर 3.27 अरब डॉलर पर पहुँच गया है।

बीते वित्त वर्ष कच्चे तेल का आयात 5.55 प्रतिशत की छलांग के साथ 11.75 अरब डॉलर रहा। अगर पूरे वित्त वर्ष 2018-19 में आयात की बात करें तो यह 8.99 प्रतिशत बढ़कर 507.44 अरब डॉलर पर आ गया। वाणिज्य मंत्रालय ने बताया कि 2016-17 से कुल निर्यात (वस्तुओं और सेवाओं का मिलाकर) लगातार बढ़ रहा है। 2018-19 में यह पहली बार 500 अरब डॉलर के आँकड़े को पार कर गया है।

किसी के बुरा लगने पर आस्था नहीं छोड़ सकता: CM योगी का EC को जवाब, चली हनुमान चालीसा की ‘चाल’

आचार संहिता उल्लंघन के आरोप में हाल ही में चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मायावती को नोटिस भेजकर स्पष्टीकरण माँगा था, जिसके जवाब में योगी आदित्यनाथ ने अपनी सफाई भेज दी है।

आयोग को दिए इस जवाब में योगी ने कहा है कि बजरंगबली में उनकी अटूट आस्था है। ऐसा में किसी को बुरा लगे या कोई अज्ञानतावश असुरक्षित महसूस करे, तो इस डर से वो अपनी आस्था को नहीं छोड़ सकते हैं। योगी ने अपने जवाब में स्पष्ट किया है कि उन्होंने अपने भाषण (जिसके कारण उन पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगा) में केवल छद्म धर्मनिरपेक्षता को उजागर किया था, धर्म के नाम पर वोट नहीं माँगा था। अपने जवाब में उन्होंने यह भी लिखा कि हर नागरिक को अपने धर्म व आस्था की स्वतंत्रता है।

योगी आदित्यनाथ का कहना है कि उन्होंने किसी जाति या धर्म के नाम पर वोट नहीं माँगा था। उनकी मानें तो धर्म और जाति के आधार पर अगर कोई वोट माँग रहा है तो वह विपक्ष के नेता हैं। योगी ने मायावती की राजनीति पर प्रश्न किया कि वह (मायावती) खुद को धर्मनिरपेक्ष बताती हैं। लेकिन क्या मजहब को आधार बनाकर समुदाय विशेष से वोट माँगना धर्म निरपेक्षता की श्रेणी में आएगा?

योगी आदित्यनाथ की मानें तो देश का जिम्मेदार नागरिक होने के नाते उनका फर्ज बनता है कि वो छद्म धर्मनिरपेक्षता का लोगों के समक्ष पर्दाफाश करें। इसके साथ ही अपने जवाब में उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने ‘हरे वायरस’ उपनाम का उपयोग संकीर्ण राजनीति के मद्देनजर किया था।

बता दें कि चुनाव आयोग द्वारा योगी आदित्यनाथ के चुनाव प्रचार पर 72 घंटे का प्रतिबंध लगने के बाद वे आज (अप्रैल 16, 2019) सुबह हनुमान मंदिर पहुँचे। यहाँ वह 10-15 मिनट के लिए रुके। उन्होंने वहाँ सिर्फ हनुमान चालीसा का पाठ किया। इस बीच उन्होंने किसी से भी बात नहीं की। मीडिया की खबरों के मुताबिक योगी आदित्यनाथ ने खुद पर लगे प्रतिबंध के बाद चुनाव प्रचार का यही नया तरीका निकाला है।

गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने योगी के भाषण देने पर प्रतिबंध लगाया है। लेकिन इसमें मंदिर जाना शामिल नहीं है। खबरों के मुताबिक इस मंदिर में पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह आने वाले थे, लेकिन वे यहाँ नहीं आ पाए।
ऐसे में भले ही योगी आदित्यनाथ नामांकन के दौरान राजनाथ के साथ न हों, लेकिन दोनों राजनेता हनुमान सेतु मंदिर में एक साथ होंगे। माना जा रहा है कि यहीं से आज एक तरीके से चुनाव प्रचार की शुरुआत होगी।

Jesus School में नाबालिग आदिवासी छात्राओं से रेप, ORS में मिला कर दिए जाते थे ड्रग्स

महाराष्ट्र स्थित चंद्रपुर से एक जघन्य अपराध का मामला सामने आया है। यहाँ पुलिस ने एक हॉस्टल सुपरिटेंडेंट और डिप्टी हॉस्टल सुपरिटेंडेंट को गिरफ़्तार किया है। ये दोनों ही इन्फेंट जीसस इंग्लिश स्कूल के हॉस्टल में कार्यरत थे। राजुरा पुलिस ने उस मेडिकल टेस्ट के बाद यह कार्रवाई की, जिसमें इस बात की पुष्टि हुई कि 9 व 11 वर्ष की दो आदिवासी नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार किया गया है। इन दोनों बच्चियों को 6 अप्रैल को चंद्रपुर स्थित जीएमसीएच अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इन दोनों को सेडेटिव ड्रग्स का ओवरडोज दिया गया था।

दोनों ही हॉस्टल सुपरिटेंडेंट पर बच्चियों से बलात्कार और उनका यौन शोषण करने का आरोप है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपने सूत्रों के हवाले से लिखा कि हॉस्टल सुपरिटेंडेंट चबन पचारे (Chaban Pachare) के दफ़्तर से पुलिस ने भारी मात्रा में वियाग्रा और कंडोम्स ज़ब्त किए हैं। उसे शनिवार (अप्रैल 13, 2019) को गिरफ़्तार किया गया। बता दें कि यौन क्षमता बढ़ाने के लिए पुरुषों द्वारा वियाग्रा का इस्तेमाल किया जाता रहा है। डिप्टी हॉस्टल सुपरिटेंडेंट नरेंद्र विरुत्कर को रविवार (अप्रैल 14, 2019) को गिरफ़्तार किया गया।

स्थानीय पुलिस-प्रशासन और जनजातीय विभाग तब पूरी तरह से सक्रिय हो उठा जब राज्य के वित्त मंत्री और चंद्रपुर के प्रभारी मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने मामले का संज्ञान लेते हुए विस्तृत जाँच के आदेश दिए। पुलिस ने बताया कि हॉस्टल सुपरिटेंडेंट को गिरफ़्तार कर लिया गया है और उसके दफ़्तर से आपत्तिजनक वस्तुएँ ज़ब्त की गई हैं। एसपी महेश्वर रेड्डी ने बताया कि एक अन्य लड़की को भी ड्रग्स देने का मामला सामने आया है। बेहोशी की शिकायत करने के बाद उसे अस्पताल में इलाज के लिए दाखिल कराया गया है। वहाँ उसका मेडिकल परीक्षण भी होगा।

सामाजिक कार्यकर्ता और मनसे नेता राजू कुकुड़े ने एक प्रतिनिधिमंडल के साथ एसपी से मिलने के बाद बताया कि 6 अप्रैल को हॉस्टल की 13 लड़कियाँ बेहोशी की हालत में थीं। राजुरा के एक लोकल अस्पताल में उनका इलाज कराया गया था। उनमें से दो को चंद्रपुर जीएमसीएच में भर्ती कराया गया क्योंकि उनकी हालत गंभीर थी। डॉक्टर्स ने शुरुआती इलाज के दौरान कुछ गड़बड़ियाँ देखी और उन्हें रेप का शक हुआ। डॉक्टर्स ने ये बात मर्दानी महिला मंच को बताई, जिसने मामले को पुलिस तक पहुँचाया।

दोनों लड़कियाँ एक सप्ताह तक मेडिकल परीक्षण कराने से इनकार करती रहीं लेकिन उनके अभिभावकों की सहमति से उनका मेडिकल परीक्षण किया गया, जिसमें रेप की पुष्टि हुई। मामले में पोस्को एक्ट और एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है। जिन अन्य लड़कियों के बेहोश होने की सूचना मिली है, उनके घर भी पुलिस भेजकर बयान रिकॉर्ड किए जा रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता और वकील पारोमिता गोस्वामी ने हॉस्टल की अन्य लड़कियों का भी यौन उत्पीड़न किए जाने का अंदेशा जताया है।

घटना की निंदा करते हुए गोस्वामी ने हॉस्टल की पीड़ित लड़कियों से बातचीत करने के बाद कहा कि उन्हें ओआरएस के घोल में सेडेटिव ड्रग्स मिला कर दिए जाते थे। हॉस्टल प्रशासन ने गिरफ़्तार सुपरिटेंडेंट को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। राजुरा विधायक संजय धोते ने मामले को मुख्यमंत्री फडणवीस तक ले जाने की बात कही है। उन्होंने उस जनजातीय हॉस्टल का रजिस्ट्रेशन रद्द करने के साथ ही बच्चियों को दूसरे हॉस्टल शिफ्ट करने की माँग की।

टीओआई के सूत्रों के अनुसार, उस हॉस्टल में 300 छात्र-छात्राएँ हैं, जिसमें से 130 कक्षा पहली से दसवीं तक की लड़कियाँ हैं। इस मामले में शिवसेना ने आज मंगलवार को विरोध प्रदर्शन की योजना बनाई है। 18 अप्रैल को एक दर्जन से भी अधिक जनजातीय समूहों व संगठनों द्वारा जान आक्रोश मोर्चा बनाकर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।

‘सुन लो नचनिया राज बब्बर के कुत्तो, तुम्हें और तुम्हारे नेता को दौड़ा-दौड़ा कर जूता से मारूँगा’

आम चुनाव का मौसम है और नेताओं की बदजुबानी नित नए सिरे से नैतिकता के सारे स्तर लाँघ रही है। अब इस कड़ी में नया नाम जुड़ा है बहुजन समाज पार्टी के नेता गुड्डू पंडित का। फतेहपुर सिकरी से सपा-बसपा महागठबंधन उम्मीदवार गुड्डू पंडित उर्फ़ श्रीभगवान शर्मा का एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमे वो कॉन्ग्रेस पार्टी व उसके नेताओं के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हुए धमकियाँ देते हुए नज़र आ रहे हैं। इस वीडियो में उन्होंने उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राज बब्बर को सीधा निशाना बनाया है। इसमें न सिर्फ़ उन्होंने राज बब्बर को नचनिया कहा है बल्कि उन्हें व उनके समर्थकों को दौड़ा-दौड़ा कर जूते से मारने की धमकी भी दी है।

इस वायरल हुए वीडियो में अपने समर्थकों से घिरे गुड्डू पंडित ने कहा:

“सुन लो राज बब्बर के कुत्तो तुमको और तुम्हारे नेता नचनिया को दौड़ा-दौड़ाकर जूतों से मारूँगा। जो झूठ फैलाया समाज में। जहाँ मिलेगा गंगा माँ की सौगंध तुझे जूतों से मारूँगा, तुझे और तेरे दलालों को।”

अगर गुड्डू पंडित की बात करें तो वो दसवीं तक पढ़े हैं। यूपी के देबाई से 2 बार विधायक रहे गुड्डू पार्टी लाइन से अलग जाकर भाजपा विधान परिषद उम्मीदवार को वोट करने के कारण सपा से निष्कासित होकर बसपा में आए हैं। उससे पहले भी वो बसपा में ही थे। इससे पहले वो चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी व सीएम योगी के लिए भी अपशब्दों का प्रयोग कर चुके हैं। उन पर पूर्व में दो समुदायों के बीच शांति भंग करने का मामला दर्ज किया जा चुका है। उन्होंने भाजपा नेता व पूर्व विधायक अरिदमन सिंह के लिए भी अपशब्दों का प्रयोग किया था। ये इस चुनाव के दौरान पाँचवा मौक़ा है, जब उन्होंने ऐसी हरकत की है। उनके ऊपर रंगदारी सही सात आपराधिक मामले दर्ज हैं।

उनकी इस धमकी पर अभी तक राज बब्बर की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। बता दें कि सोमवार को फतेहपुर सिकरी में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी, पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया की रैली हुई। इस रैली में प्रियंका ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर आप राष्ट्रवादी हैं तो सभी का सम्मान करना सीखिए, विपक्षी दल के नेता के पिता का भी। उनका इशारा राजीव गाँधी की ओर था। उन्होंने भाजपा को चुनाव के वक़्त पाकिस्तान की बात न करके युवा, किसानों व ग़रीबों की बात करने की हिदायत दी। राहुल गाँधी ने भी नोटबंदी व कृषि के मुद्दे को लेकर पीएम मोदी को घेरा।

ज्ञात हो कि फतेहपुर सिकरी से कॉन्ग्रेस ने राज बब्बर को ही उम्मीदवार बनाया है। 3 बार लोकसभा सांसद और 1 बार राज्य सभा सांसद रह चुके राज बब्बर ने 2009 में फ़िरोज़ाबाद से डिंपल यादव को हरा कर सनसनी मचा दी थी। 2014 में हुए पिछले आम चुनाव में उन्हें ग़ाज़ियाबाद में जनरल वीके सिंह ने बुरी तरह हरा दिया था। साढ़े पाँच लाख से भी अधिक मतों से उनकी हार हुई थी। पिछले आम चुनाव में वीके सिंह ही सबसे अधिक मतों से जीते थे। समाजवादी पार्टी से बग़ावत कर कॉन्ग्रेस में आए राज बब्बर को जुलाई 2016 में उत्तर प्रदेश में पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था।

हिन्दू त्योहारों पर आम होती इस्लामी पत्थरबाज़ी: ये भी मोदी के मत्थे मढ़ दूँ?

रामनवमी हुई। हर साल हुआ करती थी। पिछले साल रामनवमी खबरों में आई। कारण राम नहीं, मजहबी लोग थे। बिहार और बंगाल में पिछले साल रामनवमी में लोगों ने दंगे किए। पाँच लोग बंगाल में मरे। उसी समय बिहार में भी छिटपुट झड़पें हुईं जिसमें मारपीट की वारदातें हुईं (कोई मरा नहीं)। महान पत्रकार, और हिन्दी पत्रकारिता के स्वघोषित स्तम्भ श्री रवीश कुमार जी ने प्राइम टाइम और लेखों की झड़ी लगाकर बिहारियों को चिट्ठी लिख दी थी। जबकि पाँच लोगों की मौत वालें दंगे पर एक शब्द नहीं निकला।

बंगाल में उसी समय के आस पास बर्धमान, धूलागढ़ में दंगे और बाकी जगहों पर चुनावी हिंसा चरम पर थी। रवीश की क़लम में उबाल आया, और उन्होंने बिहारियों से प्रार्थना करते हुए बंगाल पर भी लिखा, लेकिन जैसी तीक्ष्णता बिहार के हुक्मरान को गरियाने में दिखी, बंगाल में इन्हें पता ही नहीं चला कि किस पार्टी का शासन है, किसकी पार्टी के लोग किसको मार और काट रहे हैं चुनावों में। रवीश तक सूचना ही नहीं पहुँची।

इस साल भी रामनवमी आई। इस साल फिर से रामनवमी चर्चा में रही। इस साल फिर चर्चा का कारण समुदाय विशेष वाले ही थे। कट्टरपंथी पत्थरबाज़, जिन्हें क्यूट लोग ‘रेडिकल्स’ कहा करते हैं। कट्टरपंथी पत्थरबाज़ों ने रामगढ़ में रामनवमी में पत्थरबाज़ी की। कसमारा में मस्जिद के सामने से जुलूस निकलाने पर आपत्ति दर्ज की जैसे कि हुकूमत ख़लीफ़ा की चल रही हो, उस भारत सरकार की नहीं जिसने जुलूस निकालने की इजाज़त दी थी। सूरसागर में जुलूस पर पत्थरबाज़ी हुई और गाड़ियों में आग लगा दिया गया।

किसी अच्छे कट्टरपंथी ने निंदा नहीं की। वो तो आतंकी हमलों की भी निंदा नहीं कर पाते। वो बस बताते हैं कि कौन अच्छा कट्टरपंथी है, और जिसने कुछ भी ग़ैरक़ानूनी या आतंकी किया, उसे ये ‘मजहबी’ मानने से इनकार कर देते हैं। हाँ, सैफ्रन टेरर होता है, हिन्दू इन्हें हर जगह लिंच कर देते हैं, मोदी राज में ये बहुत डर से जी रहे हैं।

सितम्बर 2017 के रामगंज, जयपुर के दंगे भी याद आते हैं जब पूरी रात इन्होंने पुलिस थाने को ही बंधक बना लिया था और आगजनी, दंगे और हिंसा के बाद इनके दबाव के कारण प्रशासन को केस वापस लेने पड़े, और दंगाइयों को छोड़ना पड़ा। पत्थरबाज़ी और आगजनी से इन्होंने पंद्रह मिनट में पूरी भीड़ जुटा ली, इलाके में बवाल काटा, और फिर प्रशासन मूक बना रहा।

मैं क्यों गिना रहा हूँ ये दंगे और मज़हब? वो इसलिए कि असहिष्णुता का ठप्पा उस पर पड़ा है जिसने इन अल्पसंख्यकों के हर आतंक को चुपचाप सहा है, और पोलिटिकली करेक्ट होने के चक्कर में ये कहते-कहते पीढ़ियाँ निकाल दीं कि आतंक का कोई मज़हब नहीं होता। हर आतंकी और उसका संगठन एक ही नारा लेकर निकलता है, काले झंडे पर सफ़ेद रंग से लिखा वाक्य क्या है, सबको पता है। बोल नहीं सकते, वरना ‘बिगट’ और ‘कम्यूनल’ होने का ठप्पा तुरंत लग जाएगा।

छिट-पुट सामाजिक हिंसा को धार्मिक रंग देकर त्रिशूल पर कंडोम टाँगा गया, अख़लाक़ की भीड़हत्या पर पूरा हिन्दू समाज ज़िम्मेदार हुआ, उना के दलित की पिटाई का ज़िम्मा भी सारे हिन्दू समाज पर, सीट की लड़ाई में मरे जुनैद का ज़िम्मा भी हिन्दुओं के सर… लेकिन प्रशांत पुजारी, डॉक्टर नारंग, अंकित सक्सेना, और दर्जन भर से ज़्यादा हिन्दुओं की भीड़हत्या का ज़िम्मा इस्लाम पर कभी नहीं पड़ा क्योंकि हमें पोलिटिकली करेक्ट होने का रोग है।

अख़लाक़ के बाद भी साम्प्रदायिक घटनाएँ हुईं। कहीं दंगे हुए, कहीं एक हिन्दू लड़की को चौदह समुदाय विशेष वाले लड़कों ने ये पूछकर सरेराह छेड़ा, हाथ लगाया, दुपट्टा खींचा कि उसका बुर्क़ा कहाँ है। कहीं प्रशांत पुजारी को काट दिया गया क्योंकि वो आरएसएस का था। डॉक्टर नारंग को घर से खींचकर इस्लामी भीड़ ने मार दिया। जीटीबी नगर मेट्रो स्टेशन के पास एक हिन्दू ई-रिक्शाचालक के कुछ मजहबी युवकों ने इतना मारा कि वो मर गया। कासगंज में चंदन को ‘शंतिप्रियों’ ने मार दिया। अंकित को उसकी गर्लफ़्रेंड के समुदाय विशेष के परिवार वालों ने बीच सड़क पर गला रेत कर, चाकुओं से गोदकर मार दिया।

इन पर्वों में अब पत्थरबाज़ी आम क्यों हो गई है? क्योंकि ‘शांतिप्रिय’ डरा हुआ है? ‘शंतिप्रियों’ में मोदी सरकार में इस तरह का भय है कि वो दुर्गा विसर्जन से लेकर सरस्वती पूजा, होली, दिवाली और रामनवमी का इंतज़ार करते हैं और पत्थरबाज़ी करते हैं। ये अपने आप में अलग स्तर का भय है। ये भय इस स्तर का है कि ये भयाक्रांत लोग हिन्दुओं को हर पर्व पर पत्थरबाज़ी और दंगे भड़का कर अपने डर का इज़हार कर देते हैं।

ये नैरेटिव नहीं बन पाता क्योंकि कट्टरपंथियों का इस देश के बुद्धिजीवियों और पत्रकारों के समुदाय विशेष में दूध-भात है। अल्पसंख्यक के नाम पर जो मार-काट और हिंसा इन्होंने हर पर्व पर फैलाई है, वो महज़ घटनाएँ नहीं हैं, ये सिग्नेचर है, ये स्टेटमेंट हैं, शक्तिप्रदर्शन है कि देखो हम क्या कर सकते हैं, और तुम क्या कर लोगे।

इसका कारण भी बहुत अजीब है कि इन्हें ये कॉन्फ़िडेंस मिलता कहाँ से है। ये कॉन्फ़िडेंस इन्हें रामचंद्र गुहा टाइप के लुच्चे कहानीकार देते हैं, ये कॉन्फिडेंन्स इन्हें राजदीप, बरखा, रवीश सरीखे लोग और फेसबुक पर टहलते वैसे युवा देते हैं जिन्हें एक ही तरह की खबरें सुनाने और पढ़ने का शौक है। पूरा माहौल बनाया जाता है कि मोदी के आने के बाद ही सब कुछ हो रहा है, जबकि ऐसा कुछ नहीं है।

चूँकि आप अभी ही किशोरावस्था से जवानी में पहुँचे हैं, तो दुनिया अभी ही शुरु नहीं हुई है। चूँकि आपने अभी ही खबरें पढ़नी शुरु की हैं, तो ज़रूरी नहीं कि वारदातों का होना भी आज ही शुरु हुआ है। चूँकि आपने रवीश का प्राइम टाइम ही देखा है, तो उसका मतलब यह नहीं बाकी कोई और पत्रकारिता कर ही नहीं रहा। चूँकि, कोई कह दे रहा है कि भले ही घटनाएँ कॉन्ग्रेस-सपा-तृणमूल के कार्यकाल में हुई, लेकिन माहौल तो मोदी के कारण बना है, तो वो सच नहीं हो जाता।

पहलू खान को मारने की हिम्मत अगर मोदी देता है भीड़ को, तो फिर फ़ैयाज़ और क़ुरैशी नामक गौतस्करों द्वारा यवतमाल से नागपुर दाने के रास्ते में कॉन्स्टेबल प्रकाश मेशराम पर ट्रक चढ़ा कर मार देते हैं तो उसको हिम्मत कौन देता है? और ऐसी एक घटना नहीं है, कि गौतस्करों ने गाड़ी पुलिस पर चढ़ा कर भागने की कोशिश की। गूगल पर सर्च कर लीजिए।

चूँकि एक जगह ‘शांतिप्रिय’ मार दिया गया, तो क्या उसकी बराबरी तभी होगी जब एक हिन्दू को मार दिया जाए! या फिर, भारत के हर हिस्से में मजहबी नारा चिल्लाकर बम से दसियों को उड़ा देने वाली घटनाओं को भी इसी आलोक में देखा जाएगा? क्या आपको वो दौर याद नहीं है, पाँच-सात साल पहले का ही था कि हर पर्व में बड़े धमाके सुनाई दे जाते थे? कौन करवाता था, किस मज़हब के लोगों को डर का माहौल उन्हें ऐसा करने पर मजबूर करता था?

कितने नाम गिनाऊँ, कितनी घटनाएँ याद दिलाऊँ? छिटपुट घटनाओं को जेनरलाइज़ करने और लगातार होने वाली आतंकी घटनाओं को भटके हुए नौजवान और ‘रेडिकल्स’ के नाम कर देने से कुछ नहीं बदलता। नैरेटिव में कुछ होने भर से वही सत्य नहीं हो जाता। नैरेटिव के उस पार देखने की कोशिश करने पर दूसरे पक्ष की सच्चाई भी दिखती है। आप गौरी लंकेश, दभोलकर, पनसरे याद रखते हैं, किसके राज में हुआ, कब हुआ, उससे आपको मतलब नहीं।

तर्क यह आता है कि अब रामनवमी पर जुलूस क्यों निकाला जाता है, पहले तो नहीं होता था। ये कितनी वाहियात बात है! जुलूस निकालने में क्या समस्या है? निकालेंगे तो कट्टरपंथी पत्थर बरसाएगा? संविधान में ऐसा लिखा है कि आसमानी किताब में? तुम्हारे तमाम जुलूस सही, हिन्दू निकाल रहे हैं तो पूछा जाता है कि ज़रूरत क्या है? पहले भी निकाले जाते थे, जिसे सरकारों ने बंद कराया।

जुलूस ही निकाल रहे हैं, दंगे नहीं कर रहे। किसी का जुलूस निकालना अगर दंगे करने, पत्थरबाज़ी का लाइसेंस होता तो याद करो कितने मुहर्रम बीते, कितने जुलूस निकले, और कितनी बार अप्रिय घचनाएँ हुईं। फिर कोई क्यों न कहे कि इनकी सामूहिक सोच में ही समस्या है कुछ। ये इतनी जल्दी डरने का नाटक कर के दूसरों के साथ आगजनी, दंगे और हिंसा पर कैसे उतर आते हैं?

जो भी संवैधानिक है, इजाज़त के दायरे में है, वो करने पर किसी दूसरे मज़हब के लोगों को समस्या क्या है? क्या उन्होंने मस्जिद में रामनवमी का झंडा गाड़ दिया या फिर उनके घरों में घुस कर पताका लहरा आए? फिर दंगा करने की बात कहाँ से आई? किसी का इलाक़ा किसी के बाप का नहीं है, वो भारत सरकार का है, और वहाँ की सड़कों पर चलने का सबको हक़ है।

समुदाय विशेष की आबादी कोई यूएन सर्टफाइड ख़िलाफ़त की ज़मीन नहीं है जो दूतावासों की तरह जेनेवा कन्वेन्शन द्वारा देश के कानून से परे है। लेकिन कुछ लोगों को ऐसा ही लगता है कि वो ‘शांतिप्रिय’ हैं, उन्हें मत छेड़ो। कौन छेड़ रहा है? सड़क से जाना छेड़ना कब से हो गया? हम ‘जय श्री राम’ का नारा लगाएँ तो उससे तुम्हें दिक्कत और तुम दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर से अजान दो तो वो सही?

हम अजान को सुनते हैं क्योंकि हम स्वीकारते हैं कि तुम्हारी मजहबी ज़रूरत है, तुम करते हो, इसमें समस्या नहीं। इसे पीसफुल कोएग्जिस्टेंस कहते हैं, जो शायद बहुतों को रास नहीं आता। दूसरी तरफ से यमुना की तहज़ीब बहती नहीं दिखती, गंगा वाले अकेले ढो रहे हैं। हमारे नारे से क्या दिक्कत है किसी को? क्या किसी को गाली दी जा रही है? किसी पर हमला किया जा रहा है? जैसे तुम्हारी अजान बर्दाश्त करते हैं, दिन में पाँच बार, वैसे ही साल में कुछ दिन हमारी जय-जय कार भी सुन लो। क्या समस्या है? पीसफुल कोएग्जिस्टेंस की पालकी को थोड़ी देर तुम भी कंधा दे दो, क्योंकि साल भर तो हम देते ही हैं।

लेकिन नहीं, ये भी मंज़ूर नहीं। पत्थरबाज़ी होती रहेगी, और उसका दोष भी हिन्दुओं पर ही मढ़ा जाएगा कि तुमने त्योहार ही क्यों मनाया। क्या करें सरकार, इस्लाम के नाम पर हो रहे दंगे, आतंकी वारदातों पर हर बार इनकी मुहर, और इनके भटके हुए नौजवानों के कारनामे हमें कन्विन्स नहीं कर पाते कि ये शांति का मज़हब है। होगा, कहीं किसी और दुनिया में। हमारी दुनिया में तो नहीं है।

आतंकियों और दंगाइयों को यह कह कर नकार देना कि ये लोग समुदाय विशेष से हो ही नहीं सकते, क्योंकि इस्लाम यह नहीं सिखाता, और इस समस्या पर बैठकर विचार करना तो दूर, इसकी निंदा करने में आनाकानी, यह बताता है कि आप इसको लेकर सीरियस नहीं हैं, फिर हम कैसे मान लें कि रामनवमी के जुलूस पर पत्थर फेंकने वाले लोगों का मज़हब शांति का संदेश देता है?

मिल गया प्रमोशन, तो पति हो गया टेंशन?

जागरण ग्रुप के समाचार पोर्टल नई दुनिया ने एक विचित्र, और शायद दुखद, खबर प्रकाशित की है। खबर के मुताबिक भोपाल के जिला कुटुम्ब न्यायालय में कई ऐसे तलाक/सम्बन्ध-विच्छेद के मामले लंबित हैं जिनमें पत्नी ने तलाक का मुकदमा नौकरी में पदोन्नति मिलने या नई नौकरी लगने के बाद ही दायर किया है और साफ़-साफ़ कहा है कि पति के साथ अब जीवन में उन्नति कर लेने के पश्चात नहीं रहना।

पति की पंडिताई से की पढ़ाई, नौकरी मिलते ही ठेंगा

भोपाल जिले की बैरसिया नगरपालिका निवासी एक पंडित ने पंडिताई से इकट्ठा पैसों से पत्नी की पढ़ाई कराई, उसके एसआई (सब-इन्स्पेक्टर) बनने में सहयोग किया। तीन-चार साल तक अपने पैरों पर खड़े-होने लायक शिक्षा दिलाई। पर नौकरी मिलते ही इंदौर में तैनात पत्नी ने तलाक की अर्जी लगा दी।

काउंसलिंग के दौरान भी सब-इन्स्पेक्टर पत्नी ने साफ-साफ कहा कि अब उसके पति की इतनी हैसियत नहीं है कि पति उसे ‘रख’ सके।

पीओ पत्नी नहीं सुनेगी सुपर मार्केट संचालक पति के ताने

एक दूसरा मामला जिला सेवा विधिक प्राधिकरण के समक्ष ईदगाह हिल्स में रह रहे युगल का आया है। इनकी 7 साल की शादी में 5 साल का बेटा भी है। पर हाल ही में बैंक में पीओ का पद प्राप्त करने वाली पत्नी ने साफ कर दिया है कि वह पति के साथ और नहीं रह सकती। कारण यह बताया है कि जब वह कार्यरत नहीं थी तो पति हर समय काम न करने का ताना उसे मारता रहता था। अतः अब उसे ऐसे पति के साथ और नहीं रहना।

सब-इन्स्पेक्टर पत्नी कथित रूप से करती थी हवालदार पति की पब्लिक में पिटाई

एक अन्य मामले में सब-इन्स्पेक्टर पत्नी ने कहा कि वो अपने से नीचे, हवलदार के पद की नौकरी कर रहे पति के साथ अब और नहीं रह सकती। तीन साल पहले हुई शादी के शुरुआती समय के बाद पत्नी-पति में ओहदे का अहम टकराने लगा। तथाकथित रूप से पत्नी ने कई बार पति की लोगों के बीच खुलेआम पिटाई भी कर दी।

तलाक के केस में काउंसलिंग के दौरान पत्नी ने कहा कि वह अपने पति से अधिक कमाती है, और अपने से कम ओहदे वाले इन्सान के साथ नहीं रह सकती।

पुरुष अधिकार कार्यकर्ता की राय

सामाजिक कार्यकर्ता दीपिका भारद्वाज ने इस मामले पर ट्वीट करते हुए कहा:

‘काउंसलर कहते हैं कि अक्सर जब महिलाएँ नौकरी में बड़ी सफलता पा लेतीं हैं तो वे पति के साथ नहीं रहना चाहतीं- भले ही उन्हें वह सफलता दिलाने में पति द्वारा दिलाई गई शिक्षा और किया गया संघर्ष हो। उदाहरण उन महिलाओं का है जिन्होंने अपने पति के ‘निचले स्टेटस’ के चलते तलाक की अर्जी दी है।’

दीपिका भारद्वाज समाज और क़ानून में व्याप्त पुरुष-विरोधी लिंगभेद (Misandry) व पुरुषों पर महिलाओं के द्वारा होने वाले अत्याचारों के खिलाफ और उनके हक़ की लड़ाई लड़तीं हैं।

रॉलो तोमासी:

मशहूर ब्लॉगर और ‘The Rational Male’ किताब के लेखक रॉलो तोमासी अपने ब्लॉग पर इस मुद्दे पर कई विस्तृत लेख लिख चुके हैं। वह इस बारे में अक्सर ट्विटर पर भी लिखते रहते हैं। उनके अनुसार महिलाओं में यह Hypergamy नामक प्रवृत्ति अनुवांशिक विकास (genetic evolution) से आई हुई है। वह कहते हैं कि महिलाएँ अपना यौन और सामाजिक जोड़ीदार हमेशा अपने से ‘ऊँचे’ दर्जे का ही चाहतीं हैं- यह उनकी genetic प्रवृत्ति है, कोई चैतन्य निर्णय (conscious decision) नहीं, और यह अनुवांशिक विकास से विकसित हुई विशेषता है। ज़रूरी नहीं कि ऊंचे-नीचे का अंतर आर्थिक ही हो, पर यह महिलाओं के पार्टनर के चुनाव में एक महत्वपूर्ण और निर्णायक पहलू होता ज़रूर है।