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भारत का पहला स्वदेशी लड़ाकू विमान ‘तेजस’ अब विदेशों में भी अपनी ताक़त दिखाने के लिए तैयार

देश का पहला स्वदेश निर्मित लड़ाकू विमान तेजस जिसे विश्व में सबसे हल्के सुपरसोनिक लड़ाकू विमान का दर्जा हासिल है। वो अब विदेशों में भी अपनी ताक़त और हवाई गतिविधियाँ दिखाने के लिए तैयार है।

तेजस, 26 मार्च से मलेशिया में शुरू होने वाली 5 दिवसीय लंगकावी इंटरनेश्नल मेरीटाइम एंड एयरोस्पेस प्रदर्शनी में भाग लेने वाला है। इसके लिए भारतीय वायु सेना मलेशिया पहुँच चुकी है। इस हवाई प्रदर्शन में भारत ने पहली बार हिस्सा लिया है। भारत यहाँ तेजस विमान को बड़े स्तर पर पेश करेगा।

वायु सेना ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकॉउंट पर जानकारी दी है कि भारत का स्वदेशी सुपरसोनिक हल्का लड़ाकू विमान तेजस और भारतीय वायु सेना में पहले ही शामिल हो चुका है और अब वह पहली बार पाँच दिवसीय लंगकावी इटरनेशनल मैरीटाइम एंड एयरोस्पेस एक्जीबिशन में हिस्सा लेगा।

इसके अलावा वायु सेना ने ट्वीट किया, “26 मार्च 2019 से शुरू हो रहे एलआईएमए 2019 के लिए उद्घाटन प्रदर्शन से पहले आज आख़िरी अभ्यास सत्र था। मलेशिया, लंगकावी इंटरनेशनल हवाई अड्डे पर अभ्यास सत्र के दौरान भारतीय वायुसेना का तेजस।” वायुसेना ने अभ्यास करते तेजस की तस्वीरें और वीडियो भी पोस्ट की हैं।

एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी(एडीए) द्वारा भारतीय वायु सेना और नौसेना के लिए डिजाइन किए गए तेजस का निर्माण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने पूर्ण रूप से भारत में ही किया है। इसे लीमा एयर शो में पेश करने के पीछे भारत की योजना इसकी तरफ मलेशिया का ध्यान आकर्षित करना है ताकि वो इसे ख़रीदने में दिलचस्पी पैदा कर सके। इसके अलावा भारतीय वायुसेना का दल इस दौरान रॉयल मलेशियाई एयरफोर्स के साथ द्विपक्षीय मुलाक़ात भी करेगा, जिसमें दोनों सेनाओं के बीच सहयोग मज़बूत करने की कोशिश होगी।

‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ कहने वाला हिन्दुस्तानी नेता: जो Pak को 1 गाली देगा, मैं उसे 10 गालियाँ दूँगा

नेशनल कॉन्फ्रेंस के बारामूला निर्वाचन क्षेत्र के सांसद अकबर लोन ने कश्मीर के कुपवाड़ा में एक रैली को संबोधित करते हुए “पाकिस्तान ज़िंदाबाद” का नारा लगाया।

ख़बर के अनुसार, एक सार्वजनिक रैली को संबोधित करते हुए लोन ने कहा कि उन्होंने पाकिस्तान ज़िंदाबाद का नारा उस भाजपा नेता को जवाब देने के लिए लगाया है, जिन्होंने पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए थे। लोन ने आगे कहा कि उन्होंने अपनी पूरी ज़िम्मेदारी के साथ पाकिस्तान के समर्थन में ये नारा लगाया है।

बता दें कि लोन ने एक उत्साही भीड़ से कहा, “मेरा पार वाला वो मुल्क़ (पाक) है, वो आबाद रहे, वो क़ामयाब रहे, हमारी और उसकी दोस्ती बढ़े, पाकिस्तान और हिंदुस्तान की दोस्ती आपस में रहे, उस दोस्ती का मैं आशिक़ हूँ…अगर उनको कोई एक गाली देगा तो मैं यहाँ से दस गालियाँ दे दूँगा।”

इसके साथ ही लोन ने कहा, “देश भर में एक मुस्लिम देश है और वह चाहता है कि यह फलता-फूलता रहे, नई ऊँचाइयों तक पहुँचे और दोस्ती बढ़ती जाए। मैं भारत-पाकिस्तान की दोस्ती का प्रशंसक हूँ। अगर कोई उन्हें गाली देता है, तो मैं उन्हें दस गुना अधिक वापस गाली दूँगा।”

गौरतलब है कि इससे पहले, फ़रवरी 2018 में भी अकबर लोन ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाए थे। उनका पाकिस्तान समर्थित नारा तब जम्मू के सुजवान में सेना के शिविर पर हुए आत्मघाती हमले के बाद विधानसभा में भाजपा नेता द्वारा लगाए गए पाकिस्तान विरोधी नारे के जवाब में था। उस समय भी उमर अब्दुल्ला ने माफ़ी माँगने से इनकार कर दिया था।

गणेश शंकर विद्यार्थी की याद में: मॉब लिंचिंग का कोई मज़हब नहीं होता

आज के जाने-माने अदाकार नवाजुद्दीन सिद्दिकी का शुरुआती दौर याद है क्या? मुन्ना भाई एमबीबीएस में वो एक जेबकतरे की छोटी सी भूमिका में दिखते हैं। नायक के पिता का किरदार निभा रहे सुनील दत्त जैसे ही मुम्बई में रेलगाड़ी से उतरते हैं, वो उनकी जेब काटने की कोशिश करता है, मगर पकड़ा जाता है। भीड़ इकट्ठा होती है, लोग चोर को मारने पर आमादा होते हैं। उसे पकड़े हुए सुनील दत्त कहते हैं, कर दूँ इस भीड़ के हवाले?

यहाँ कोई अपने ऑफिस से बॉस की डाँट खाकर आया है, कोई बीवी से तो कोई बच्चों से, कोई पड़ोसियों से झगड़ के नाराज है। हरेक के पास अपनी अपनी नाराजगी है, सब गुस्सा निकालना चाहते हैं। सुनील दत्त उस वक्त चोर बने नवाजुद्दीन को बचा लेते हैं। लोगों को याद आ जाता है कि नाराजगी तो किसी और बात की है और वो उसे कहीं और निकालने जा रहे थे। हर बार भीड़ को समझाने की कोशिश करता कोई नहीं मिलता। हर बार भीड़ मानती भी नहीं।

ऐसी ही भीड़ की पिटाई को मॉब-लिंचिंग कहते हैं। एक समुदाय विशेष जब इस भीड़ की पिटाई का शिकार होकर मारा जाता है तो उस पर कीमत देकर खरीदे जाने वाले अख़बारों और टीवी चैनलों में खूब शोर होता है। मारा जाने वाला कोई डॉ. नारंग या दिल्ली का ई-रिक्शा वाला रविन्द्र हो, तो कोई पूछने नहीं जाता। हाँ ये जरूर है कि ऐसी घटनाओं को एक धर्म के रंग में रंगने की हर संभव कोशिश किराये की कलमों ने की है। ये वही किराये की कलमें हैं जो आम तौर पर कहती हैं कि आतंक का कोई मजहब नहीं होता।

भारत की धीमी न्याय व्यवस्था ने लोगों की सोच जरूर बदली है। इसमें हिन्दी फिल्मों की खासी भूमिका रही है। अपराधी को सजा न मिलने पर बाद में पीड़ित परिवार का बेटा हथियार उठा ले, इस कहानी को लेकर अनगिनत फ़िल्में बनी हैं। किसी दौर में मिथुन चक्रवर्ती की फिल्मों में बहन का किरदार होता ही इसलिए था ताकि खलनायक उसका बलात्कार कर सके और बाद में नायक उसका हिंसक प्रतिशोध ले। इनके असर से धीरे-धीरे लोगों के लिए नैतिकता के मायने बदले।

आज आम लोग संस्था की कानूनी प्रक्रिया की प्रतीक्षा किए बिना त्वरित न्याय कर डालना चाहते हैं। चोर के पकड़े जाने, या किसी युवती के साथ अश्लील व्यवहार के इल्जाम पर जो भीड़ की पिटाई है, वो इसी का नतीजा है। थाने जाकर मुश्किल से लिखाई जा सकने वाली रिपोर्ट और जो कहीं रिपोर्ट लिखवा भी ली तो लम्बी अदालती करवाई का इन्तजार कौन करे? व्यवस्था की कमियों का नतीजा कई बार निर्दोष भी भुगतते हैं। गिद्ध ऐसी ही घटनाओं के इन्तजार में बैठे होते हैं।

फर्जी ख़बरों यानि #FakeNews की फैक्ट्री और व्हाट्स-एप्प यूनिवर्सिटी चलाने वालों के हाथ अभी हाल में हरियाणा का एक मामला आ गया। अचानक शोर मच गया कि एक समुदाय विशेष को भारत के तथाकथित बहुसंख्यक जीने नहीं दे रहे! मामूली जाँच में ही पोल खुल गई कि विवाद क्रिकेट को लेकर हुआ था और मार-पीट बढ़ गई थी। झूठ का पर्दाफाश होने के बाद भी ये उम्मीद मत रखिए कि दिल्ली के ठग और #बेगुसरायकाबकैत अपनी बेशर्मी के लिए कोई माफ़ी माँगेंगे। ये वो लोग हैं जो अपने गिरोह के लोगों या खुद की की हुई यौन शोषण, बलात्कार जैसी हरकतों पर भी चुप्पी साधते हैं।

मॉब-लिंचिग को याद ही करना है तो पत्रकारिता का वो दौर याद कीजिए जब ‘प्रताप’ जैसे पत्र थे और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकार। गाँधीवादी गणेश शंकर विद्यार्थी के समय तक एमके गाँधी ने कॉन्ग्रेस छोड़ी नहीं थी (वो 1936 में कॉन्ग्रेस से अलग हुए थे)। इसके वाबजूद वो सरदार भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के समर्थक थे। 1931 में कॉन्ग्रेस ने जब जुलूस निकाला था तो गणेश शंकर विद्यार्थी एक बैठक से लौट ही रहे थे। उस समय तक कानपूर में दंगा भड़क चुका था। ऐसे ही उपद्रवियों की एक भीड़ को समझाने की कोशिश कर रहे गणेश शंकर विद्यार्थी को आज ही के दिन, 25 मार्च 1931 को तेज धार वाले हथियारों से काट डाला गया।

बाकी भीड़ कौन से मजहब की थी ये सोचना बेमानी है, जाहिर है भीड़ का मजहब नहीं होता। हाँ भारत की पत्रकारिता और विशेष तौर पर हिन्दी पत्रकारिता ने गणेश शंकर विद्यार्थी को कितना याद रखा है, ये उनके लिखे में आज भी देखा जा सकता है।

कश्मीरी बच्चे की कविता में दिखा हिन्दुस्तान-प्रेम, पाकिस्तान और अलगाववादियों को नहीं भाएँगे ये सुर

कश्मीर के जो हालात हैं उससे पूरी दुनिया वाक़िफ़ है। आए दिन हमलों की गिरफ़्त में रहने वाला कश्मीर कभी पाकिस्तान की छद्म हरक़तों का शिकार होता है, तो कभी अलगाववादी नेताओं की देश-विरोधी विचारधाराओं की भेंट चढ़ता है। इन्हें अक्सर यह कहते पाया गया है कि कश्मीर की जनता भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के साथ की कामना करती है। पाकिस्तान भी आए दिन ऐसी बयानबाज़ी करता रहता है जिसमें उसकी कुटिल चाल स्पष्ट दिख जाती है। ऐसे माहौल में एक मासूम बच्चे ने अपनी एक कविता के माध्यम से पाकिस्तान और अलगाववादी नेताओं के गाल पर ज़ोरदार तमाचा मारने का काम किया है।

इस कविता में कश्मीरी बच्चे ने ‘भारत देश’ के लिए मानों अपना दिल ही निकालकर सामने रख दिया हो। देशभक्ति की ऐसी अनूठी मिसाल, वो भी इतनी सी उम्र में कम ही देखने को मिलती है। हिन्दूस्तान को ऐसे बच्चों पर बड़ा नाज़ है, जिनकी मासूमियत भले ही नफ़रत के साये में पल रही हो, लेकिन उनका दिल हिन्दुस्तान के लिए धड़कता है।

कश्मीरी बच्चे की यह कविता देश और बाकी दुनिया के लिए संदेश है कि जिस भारत के सीने को पाकिस्तान हमेशा से ही छलनी करता आया है, उसकी असलियत तो बच्चे भी जानते हैं। ये कविता ऐसे ही लोगों के लिए मुँहतोड़ जवाब है जो कहते हें कि कश्मीर की जनता भारत की बजाए पाकिस्तान के साथ रहना चाहती है।

आइये इस बच्चे की कविता की चंद पंक्तियों पर ग़ौर करते हैं, जिसमें उसने दुनिया को बताना चाहा है कि उसके दिल और दिमाग में केवल भारत ही बसता है…

क्‍या पूछता है मुल्‍क में किसका नज़ारा है
मेरी नज़रों में देखों मुल्‍क का दिलकश नज़ारा है
मेरे हाथों की रेखाओं में नक्‍शे हिंद सारा है
खूं के आख़िरी कतरे ने हिंदुस्‍तान पुकारा है
मेरा दिल है मेरी जां है मेरी आँखों का तारा है
ये हिंदुस्‍तान, ये हिंदुस्‍तान ये हिंदुस्‍तान हमारा है
ये हिंदुस्‍तान, ये हिंदुस्‍तान ये हिंदुस्‍तान हमारा है

भारत, देश के ऐसे बच्चों पर हमेशा गर्व करता है, जिसकी देशभक्ति आसमान छूती है। ऐसे बच्चे एक मिसाल क़ायम करने की दिशा में होते हैं जिनका कोमल मन केवल प्रेम का देना जानते हैं।

अरविंद केजरीवाल के ख़िलाफ़ चुनाव मैं लड़ूँगा – Bigg Boss के विवादित कंटेस्टेंट ने किया ऐलान

टीवी जगत के चर्चित रिएलिटी टीवी शो ‘बिग बॉस’ के सीज़न 10 के सबसे विवादित कंटेस्टेंट स्वामी ओम अपने विवादित बयानों को लेकर हमेशा ही चर्चा में रहते हैं। स्वयंभू बाबा स्वामी ओम एक बार फिर से सुर्ख़ियों में तब आ गए, जब उन्होंने रविवार (24 मार्च 2019) को एक बयान देते हुए कहा कि वह नई दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे ।

‘बिग बॉस’ के प्रतिभागी रहे स्वामी ओम दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के ‘हिंदू-विरोधी’ रवैये के ख़िलाफ़ लड़ेंगे। स्वामी ओम का कहना है कि जिस तरह से केजरीवाल ने कुछ दिनों पहले ट्वीट करते हुए आम आदमी पार्टी के चुनाव चिन्ह ‘झाड़ू’ को हिंदू धर्म के प्रतीक ‘स्वास्तिक’ का पीछा करते हुए दिखाया था, वो हिंदुओं की भावना के साथ खिलवाड़ है। इससे गुस्साए स्वामी ओम ने अब चुनाव में अरविंद केजरीवाल की नीतियों के ख़िलाफ़ ताल ठोंकने का मन बना लिया है। स्वामी ओम कहते हैं कि बीते शनिवार को तमाम हिंदू संगठनों की बैठक के बाद उनका नाम चुनाव लड़ने के लिए प्रस्तावित किया गया है।

बता दें कि स्वामी ओम अपने बड़बोलेपन की वजह से कई शो और कार्यक्रम में पिट भी चुके हैं। बिग बॉस में भी वो हमेशा अपनी हरक़तों और विवादित बयानों की वजह से सुर्ख़ियों में रहे। उनकी हरक़तों से तंग आकर बिग बॉस शो ने बीच शो से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। बाहर निकलने के बाद स्वामी ओम ने शो के होस्ट सलमान ख़ान और बिग बॉस के मेकर्स पर तमाम गंभीर आरोप लगाए, मगर वो आज तक अपने किसी भी आरोप को साबित नहीं कर पाए।

ग़ौरतलब है कि दिल्ली की राजनीति में नई दिल्ली की लोकसभा और विधानसभा सीट को अहम माना जाता है । क्योंकि यहाँ से दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं और इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी इसी विधानसभा सीट जीतती आई हैं । फिलहाल दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का क़ब्ज़ा है।

ICU में 29 साल की महिला का डॉक्टर समेत 3 लोगों ने किया रेप: शादाब मुख्य आरोपित, नियाजू और नर्स भी शामिल

उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक प्राइवेट नर्सिंग होम में 3 लोगों (डॉक्टर समेत) पर 29 वर्षीय महिला के बलात्कार का आरोप लगा है। साथ ही 1 नर्स पर भी इस दुष्कर्म में शामिल होने का इल्ज़ाम है। इस मामले में पुलिस ने अब तक तीन आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया है जबकि एक अब भी फ़रार है।

पुलिस का कहना है कि 21 मार्च को सांस की परेशानी होने के कारण महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ महिला की जाँच के बाद फैटी लीवर की परेशानी सामने आई। पीड़िता के पति ने पुलिस को अपनी शिक़ायत में बताया कि नर्सिंग होम में उसकी पत्नी को एडमिट करने के बाद पहले नर्स ने उसे एक नशे का इंजेक्शन लगाया और बाद में 3 लोगों ने उसके साथ गैंग रेप किया।

पीड़िता के मुताबिक उसे इसकी जानकारी तब हुई जब उसे होश आया और उसने अपने पास वार्ड ब्वॉय को लेटा हुआ देखा। इसके बाद वह चिल्लाई, लेकिन जब तक महिला का पति आईसीयू में पहुँचा तब तो आरोपित वहाँ से भाग चुका था। इन सबके बाद पीड़िता की ओर से पुलिस में FIR दर्ज करवाई गई।

इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक पुलिस ने बताया है कि यह मामला धारा 376 के तहत 4 लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज हुआ है। आरोपितों के नाम नियाजू (20), अशोक मलिक (35), शादाब (23) और लक्ष्मी (50) हैं। शादाब को इस पूरे मामले का मुख्य आरोपी बताया जा रहा है।

बता दें कि पीड़िता को मेडिकल जाँच के लिए भेज दिया गया है और अब रिपोर्ट आने का इंतज़ार है। ग़ौर करने वाली बात है कि मेरठ के अस्पताल में हुए बलात्कार का यह पहला मामला नहीं हैं। पिछले साल नवंबर में भी रिटायर्ड फौजी की बीमार 60 वर्षीय पत्नी के साथ नशे के इंजेक्शन को लगाकर रेप किए जाने का मामला सामने आया था, जिसके बाद कंपाउंडर को देर रात पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किया गया था।

‘बाप-बेटी’ ने कश्मीर दिया, अब नाती-पोते पाक के लिए कर रहे बैटिंग!

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के मुख्य सलाहकार सैम पित्रोदा का पुलवामा हमले में पाकिस्तान को क्लीन चिट देना और भारतीय सेना के पराक्रम पर सवाल उठाना, यह क्या यह अनजाने में दिया गया व्यक्तिगत बयान है? यदि यह मान भी लें कि सैम पित्रोदा की उम्र हो चली है, इसलिए उनकी जुबान फिसल गई तो अभी कुछ दिन पूर्व राहुल गाँधी ने भी सार्वजनिक रूप से टीवी के कैमरों के सामने दुर्दांत आतंकवादी मसूद अजहर को जी लगाकर सम्मानित किया था। कॉन्ग्रेस की ओर से इस पर सफाई नहीं आई और इस मुद्दे को गोलमोल करने का प्रयास किया गया। दावा किया जाता है कि राहुल गाँधी 50 साल की उम्र में भी अभी नवयुवक हैं, इसलिए कॉन्ग्रेस यह भी नहीं कह सकती कि उम्र के कारण उनकी याददाश्त कमजोर हो गई है और उनसे अनजाने में यह भूल हुई है।

पाकिस्तान के पक्ष में और भारत के विरोध में बैटिंग करने वाले शीर्ष कॉन्ग्रेसियों की सूची लंबी भी है और पुरानी भी। दिग्विजय, मणिशंकर अय्यर, नवजोत सिंह सिद्धू, शशि थरूर जैसे तमाम नाम हैं, जो निश्चित समयांतराल पर पाकिस्तान-परस्त बयानबाजी करके भारतीय हितों के विरुद्ध पाकिस्तान के दावे को न केवल मजबूत करते हैं, बल्कि भारत के लोगों, भारत की सेना और भारत की संवैधानिक संस्थाओं का मनोबल गिराने का प्रयास करते हैं।

यह सवाल अक्सर उठता है कि आखिर कॉन्ग्रेस पार्टी के शीर्ष नेता इस तरह की ‘गलती’ बारबार और जानबूझकर क्यों करते हैं? इसकी तह में जाने के लिए आपको कॉन्ग्रेस के इतिहास को खंगालना होगा और इस इतिहास में नेहरू परिवार के प्रभुत्व के काल को ठीक से देखना होगा।

आजादी के बाद नेहरू कॉन्ग्रेस को एक तरह अपने परिवार की प्राइवेट कंपनी में बनाने में कामयाब हो गए और प्रधानमंत्री के रूप में उनके हाथ में देश की तकदीर लिखने का जिम्मा आया तो देखिए जरा किस तरह उन्होंने भारतीय हितों की अनदेखी करके पाकिस्तान के आतंक का पक्ष लिया। आजादी मिलते ही पाकिस्तान ने कबाइलियों के वेश में कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। यह सूचना दिल्ली पहुंची, पर उस हमले को जानबूझकर अनदेखा कर दिया और हमलावरों ने कश्मीर में हजारों की संख्या में हिंदू, सिख और बौद्धों को हमलावरों ने मार डाला। यहाँ तक कि महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा। कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि​ सिंह ने भारत से कश्मीरियों को नरसंहार से बचाने की सहायता भी माँगी, लेकिन नेहरू ने उनकी गुहार भी नहीं सुनीं। नेहरू ने स्वयं 2 नवंबर 1947 को आकाशवाणी पर संबोधन में यह स्वीकार किया कि पाकिस्तानी कश्मीर में नरसंहार कर रहे थे, लेकिन उन्होंने कोई दखल नहीं दिया। परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान ने कश्मीर के एक हिस्से पर अनधिकृत कब्जा कर लिया। दखल देने का उनका इरादा भी नहीं था। इसी संबोधन में नेहरू ने यह भी कहा कि वह कश्मीर पर भारत का दावा नहीं करते हैं, स्थिति सामान्य होने पर वे वहाँ जनमत संग्रह कराएँगे और कश्मीर की जनता यदि पाकिस्तान के साथ जाना चाहे तो रायशुमारी देने के लिए स्वतंत्र है।

तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल नेहरू के एक तरह ही पाकिस्तान-परस्ती से दुखी भी थे और गुस्सा भी। सरदार पटेल पाकिस्तान को जवाब देने के लिए सेना भेजना चाहते थे, लेकिन नेहरू ने इनकार कर दिया। इसके बाद नेहरू के विरोध के बाद भी सरदार पटेल ने अर्द्ध सैन्य बलों को हमलावरों से निपटने के लिए लगाया और हमलावरों को खदेड़ा। बाद में नेहरू को सरदार पटेल के आगे झुकना पड़ा और सेना लगाई गई। जब भारत पाकिस्तान को धूल चटाकर कश्मीर को अपने नियंत्रण में लेने सफलता की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा था तो सरदार पटेल के विरोध के बावजूद नेहरू इस मामले को स्वयं ही संयुक्त राष्ट्र परिषद में लेकर चले गए और इस मसले को विवादित बनाकर कश्मीर पर पाकिस्तान के दावे को एक तरह से मान्यता दिला दी। इस तरह नेहरू ने पटेल जी की इच्छा के विरुद्ध युद्धविराम कराकर पाकिस्तान की भरपूर मदद की। नेहरू ने कुछ ऐसा ही तब किया जब भारत को 1953 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थायी सदस्यता मिल रही थी, लेकिन उन्होंने इसे ठुकराकर चीन का नाम आगे बढ़ा दिया, जबकि चीन उस समय भी भारत के खिलाफ शत्रुतापूर्ण व्यवहार कर रहा था और भारतीय भूभागों पर अ​नधिकृत रूप से दावा ठोंक रहा था।

मजे की बात यह है कि इतिहास की इस पर्त पर से पर्दा किसी और ने नहीं, बल्कि आज पाकिस्तानी बोल बोलने वाले कॉन्ग्रेसी नेता और संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव डॉ. शशि थरूर ने हटाया था। डॉ थरूर ने अपनी पुस्तक ‘नेहरू द इन्वेंशन आफ इंडिया’ में लिखा है कि ‘जिन भारतीय राजनयिकों ने इस संबंध में फाइलें देखी हैं, वे कहते हैं कि नेहरू ने स्थाई सदस्यता का प्रस्ताव ठुकरा दिया था।’ पुस्तक में उल्लेख है कि नेहरू ने कहा कि चीन एक महान राष्ट्र है और चीन की कीमत पर भारत को स्थायी सदस्यता नहीं चाहिए।

भारत को नुकसान पहुंचाकर भी पाकिस्तान की मदद करने का नेहरू का सिलसिला यहीं नहीं रुका। जब पूरा देश विरोध कर रहा था और तत्कालीन जनसंघ सिंधु नदी जल बंटवारा की प्रस्तावित संधि का मुखर विरोध कर रहा था, नेहरू 19 सितम्बर, 1960 को कराची गए और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करके यह अन्यायपूर्ण संधि कर ली। कभी ऐसा सुना है कि किसी चीज का बंटवारा किया जाए और जिसकी आबादी 85 प्रतिशत हो उसको 20 प्रतिशत से भी कम हिस्सा मिले, जबकि जिनकी आबादी 15 प्रतिशत हो उन्हें 80 प्रतिशत हिस्सा मिले? किंतु नेहरू द्वारा भारत के हितों को किनारे रखकर शत्रुता निभा रहे देश पाकिस्तान को अपनी भूमि से गुजरने वाली उन नदियों का लगभग शत-प्रतिशत जल दे​ दिया, जिन नदियों का स्रोत या तो भारत में है अथवा जो भारत के उच्च क्षेत्र अर्थात जिनका प्रवाह भारत से पाकिस्तान की ओर है। जबकि देश के बंटवारे के समय भारत के पास 39 करोड़ जनसंख्या और पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) सहित पाकिस्तान की कुल आबादी लगभग 6 करोड़ थी। बावजूद इसके भारत के खिलाफ नेहरू ने पाकिस्तान के साथ यह विसंगतिपूर्ण संधि की।

इस संधि के अनुसार तीन पश्चिमी नदियों सिंधु, चिनाब और झेलम का नियंत्रण पूरी तरह से पाकिस्तान को दे दिया गया। पूर्वी नदियों व्यास, रावी और सतलुज का नियंत्रण भारत को मिला, लेकिन इसमें भी भारत के पानी के प्रयोग का अधिकार सीमित कर दिया गया। सिंधु जल संधि दुनिया का ऐसा सबसे उदार समझौता माना जाता है, जहाँ नदियों के जलसंसाधन के स्वामी देश ने उस संसाधन पर अपनी संप्रभुता स्वयं ही एक ऐसे देश को अनावश्यक रूप से और देश की जनता के साथ अन्याय करते हुए सौंप दी, जिसके निर्माण का आधार ही भारत के विरुद्ध विध्वंसात्मक विष था। इतना ही नहीं, नेहरू ने संधि में यह भी व्यवस्था की कि जब तक पाकिस्तान अपने यहाँ इन नदियों के जल के संग्रहण व वितरण की प्रणाली विकसित नहीं कर लेता भारत 12,780 करोड़ (आज की रुपए की विनियम दर के अनुसार) रुपए पाकिस्तान को मुआवजा देगा। पाकिस्तान पर कॉन्ग्रेस की मेहरबानी का आलम यह थ कि आजादी के बाद आई इनकी सरकारों ने अपने 20 प्रतिशत हिस्से के पानी का एक भी बूंद इस्तेमाल नहीं लिया और इतनी बड़ी मात्रा में भारत की जनता का धन पाकिस्तान को मुआवजे के रूप में दिया।

कॉन्ग्रेस पार्टी के पाकिस्तान परस्ती की एक और घटना का उल्लेख करना समीचीन होगा। यह सर्वविदित है कि इंदिरा गाँधी के शासन में कॉन्ग्रेस ने भिंडरवाले को न केवल प्रश्रय दिया, बल्कि सुविधा और संरक्षण भी दिया। जबकि खुफिया एजेंसियाँ यह रिपोर्ट दे रही थीं कि भिंडरवाले और उसका खालिस्तान आंदोलन पंजाब को भारत से अलग करने के लिए पाकिस्तान और उनकी आईएसआई द्वारा तैयार किया गया षड्यंत्र है। इंदिरा की पाकपरस्ती का यह तथ्य भी हमें भूलना नहीं चाहिए। भारतीय सुरक्षा बलों ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को धूल चटाते हुए न केवल पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बाँट दिया, बल्कि पाकिस्तान के जनरल समेत 93000 पाकिस्तानी सैनिकों को आत्मसमर्पण करना पड़ा। भारत के पास सुनहरा मौका था कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को मुक्त करा लिया जाता। तत्कालीन विदेशी प्रेक्षकों ने कहा है कि तत्कालीन पाकिस्तान प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो अपने सैनिकों को छुड़ाने के लिए पीओके छोड़ने को तैयार थे। पर इंदिरा ने भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों की राय मानने के बजाय हारे हुए पाकिस्तान को प्लेट में सजाकर ‘उपहार’ दिया और वह था संधि में यह प्रावधान शामिल करवाना कि कश्मीर मसले के हल तक पाकिस्तान वहाँ अपनी सेना रख सकती है। जबकि इससे पूर्व अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत पीओके में पाकिस्तान को कश्मीर में सैन्य हस्तक्षेप की अनुमति नहीं थी। यह एक तरह से पाकिस्तान को कश्मीर का एक हिस्सा आधिकारिक रूप से देने जैसा था।

यह समाचार आप अक्सर पढ़ते होंगे कि कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पाकिस्तान की तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं और पाकिस्तान का दौरा कर भारत की सरकार को अस्थिर करने की खुलेआम अपील करते हैं।

इतने सारे ऐतिहासिक तथ्य और आज की कॉन्ग्रेस का व्यवहार और नीति तमाम संदेहों को उत्पन्न करती हैं।

मोदी सरकार ने पहली बार सिंधु जल प्रणाली के जल का उपयोग भारत की जनता व किसानों के लिए करने पर दीर्घकालिक योजना तैयार की है। 2014 में सरकार बनने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि, सिंचाई और जलसंसाधन को लेकर एकीकृत व लक्षित प्राथमिकताओं के साथ दीर्घकालिक योजनाएँ बनाईं। सरकार ने इस ओर ध्यान देते हुए तय किया कि भारत के हिस्‍से का पानी अब पाकिस्‍तान नहीं जाएगा। इस पानी को रोककर हरियाणा में पानी की किल्‍लत दूर की जाएगी तथा पानी को राजस्‍थान तक ले जाया जाएगा। केंद्र सरकार उत्‍तराखंड में तीन बांध भी बनाने जा रही ​है, ताकि भारत की तीन नदियों का पाकिस्तान जाने वाला पानी यमुना में लाकर इस क्षेत्र की कृषि सिंचाई व पेयजल समस्या को दूर किया जा सके।

यह ध्यान देने योग्य है कि जिस दिन से सिंधु के जल को भारत के लोगों तक पहुँचाने की योजना का खुलासा हुआ है कॉन्ग्रेस के कई नेताओं ने संधि का हवाला देते हुए ऐसा रूदन किया, मानो वे भारत नहीं, पाकिस्तान के राजनीतिज्ञ हों।

इसलिए कॉन्ग्रेस और इसके नेताओं द्वारा भारतीय सेना का अपमान करने अथवा उसके पराक्रम पर सवाल उठाने या फिर भारतीय हितों के विरुद्ध पाकिस्तान और पाकिस्तान पोषित आतंकवाद के पक्ष में बैटिंग करना यह सोचने पर विवश करती है कि कॉन्ग्रेस ऐसा अनजाने में नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति के तहत नेहरू की नीति का अनुसरण करते हुए करती है।

खतरनाक चक्रवात से जूझकर भारतीय नौसेना ने बचाई 192+ लोगों की जान, हजारों को पहुँचाई राहत सामग्री

भारतीय नौसेना के जवान केवल भारतीय सीमा की ही सुरक्षा के लिए तट पर नहीं रहते हैं बल्कि भारत से कई किलोमीटर दूर देशों में भी अपने पराक्रम का परचम लहराते हैं। इसका हालिया उदाहरण इस समय मोजाम्बिक में देखने को मिल रहा है। यहाँ पर भारतीय नौसेना के जवान खतरनाक चक्रवात का सामना कर रहे लोगों के लिए किसी मसीहे की तरह बनकर पहुँचे हैं।

विदेश मंत्रालय ने खुद अपने एक बयान में इस बात की जानकारी दी है कि मोजाम्बिक में राहत अभियान के चलते अब तक भारतीय सेना के लोगों ने वहाँ के 192 लोगों की जान को सुरक्षित बचा लिया है और अपने चिकित्सकीय शिविरों में ले जाकर 1,381 लोगों को स्वास्थ्य संबंधी सहायता दी है।

विदेश मंत्रालय ने बताया कि मोजाम्बिक के आग्रह पर भारत ने तत्काल कार्रवाई की और नौसेना की तीन पोतों (आईएनएस सुजाता, आईएनएस सारथी और आईएनएस शारदुल) को बीरा बंदरगाह भेज दिया। मंत्रालय द्वारा जारी बयान में बताया गया कि अब तक नौसेना के जवानों द्वारा 192 से अधिक लोगों को बचाया जा चुका है। साथ ही 1381 लोगों को मेडिकल मदद भी मुहैया कराई जा चुकी है।

इसके साथ ही देश की नौसेना ने भयानक चक्रवात से 36 भारतीयों को भी राहत दी है। इस चक्रवात में अधिकांश मौतें बीरा शहर में हुई हैं। यहाँ बिजली लाइनों के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद बंदरगाह हब और सोफाला प्रांत की लाइटें लगभग कट गई हैं। हवाई अड्डों को भी बंद कर दिया गया है।

बता दें पिछले शुक्रवार (मार्च 15, 2019) को मध्य मोजाम्बिक के तट से चक्रवात टकराने के कारण वहाँ तेज हवाएँ चलने लगीं थीं और भारी बारिश भी शुरू हो गई थी। इस प्राकृतिक आपदा ने देश से एक हिस्से को बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया और कई हजार किमी तक का क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आ गया। अब तक इस चक्रवात से मरने वालों की संख्या लगभग 676 हो चुकी है। इसके अलावा मोजाम्बिक के क़रीब 90000 लोगों को आश्रय स्थलों में ले जाया गया है, जबकि हजारों अन्य बाढ़ के पानी में फँसे हुए हैं। बता दें कि भारत समेत यहाँ अन्य देशों ने भी राहत पहुँचाने का प्रयास किया है।

ट्रम्प ने किया ISIS के ख़त्म होने का दावा लेकिन कहाँ गया ₹173 करोड़ का इनामी आतंकी बगदादी?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक नक्शा दिखा कर मीडिया को यह तो बता दिया कि खूँखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) का ख़ात्मा हो चुका है लेकिन इसका मुखिया बगदादी कहाँ है, यह अब भी एक चर्चा का विषय है। बता दें कि बगदादी पर 173 करोड़ रुपए का इनाम है। ड्रम्प के घोषणानुसार, सीरिया के सभी क्षेत्रों को आईएस के चंगुल से मुक्त करा लिया गया है। अधिकारियों ने भी ट्रम्प के दावे की पुष्टि करते हुए बताया कि अब कुछ ही ऐसे इलाक़े हैं, जहाँ छिटपुट लड़ाके बचे हुए हैं। इसी के साथ ख़लीफ़ा शासन के अंत की भी घोषणा की गई। असल में सीरिया के कुछ भाग में आईएस के कब्ज़े के कारण उसे दुनियाभर में आतंकी हमलों को अंजाम देने के लिए एक ठिकाना मिल गया था। आख़िरकार लाखों बम के प्रयोग और कई नागरिकों की मृत्यु के बाद आईएस का सफाया हुआ।

इसके अलावा कुर्द नेतृत्व वाले सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज (SDF) के प्रवक्ता मुस्तफा बाली ने ट्वीट कर कहा कि ‘बागुज मुक्त हो गया है और इसी के साथ आईएस के खिलाफ सैन्य जीत हासिल कर ली गई है।’ बागुज में आईएस के कब्ज़े वाले क्षेत्र को मुक्त कराने के साथ ही आतंकवादियों के कथित ख़लीफ़ा का भी अंत हो गया है। आईएस ने इलाके में अपने कब्ज़े के दौरान बड़े पैमाने पर नरसंहार मचाया और इनका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर भी फैलाया। आईएस के वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल होते थे और इससे आतंकियों को लोगों के भीतर डर बैठाने में कामयाबी मिल जाती थी।

वर्ष 2014 में इराक के सिंजार क्षेत्र में आतंक मचाने के दौरान बगदादी के आतंकी संगठन ने यजीदी धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय की हजारों महिलाओं और लड़कियों को बंधक बनाया और उनका यौन शोषण किया। इनमें से कई आज तक लापता हैं। आईएस का अब सीरिया या इराक में किसी भी क्षेत्र पर कब्ज़ा नहीं है, लेकिन वह अब भी इन दोनों देशों में आतंकवादी हमले कर रहा है। बता दें कि आईएस से जुड़े कई आतंकी भारत में भी पकड़े गए थे। एनआईए ने आईएस से जुड़े एक मॉड्यूल का पर्दाफाश किया था। इसमें इंजीनियर से लेकर मौलवी तक शामिल थे। अब आईएस के ख़ात्मे के ऐलान के बाद अधिकारियों ने राहत की साँस ली होगी।

आईएस सरगना बगदादी इराक के समारा की एक मस्जिद में मौलवी था। बगदादी को विद्रोह भड़काने के आरोप में दक्षिण इराक के बक्का कैंप में चार वर्षों तक जेल में रखा गया था। जेल में बगदादी कथित इस्लामिक राज्य की स्थापना करने का मन बना चुका था। उसके मन में इसके लिए ख़तरनाक और खुराफाती योजना तभी तैयार होने लगी थी जब 2010 में बगदादी रिहा हुआ और आईएसआईएस का मुखिया बना। बगदादी का इराक, सीरिया, साइप्रस, जॉर्डन, लेबनान, फिलिस्तीन, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर ‘द इस्लामिक स्टेट ऑफ खोरासान’ बनाने का सपना था। बगदादी 2014 में पहली बार जनता के सामने आया था।

रूस के रक्षा मंत्रालय के बयान में कहा गया था कि यह हमला आईएस के गढ़ रक्का के पास किया गया था और वहाँ आईएस नेता अबू बकर अल बगदादी भी मौजूद था। सेना कई तरीकों से यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वो मारा गया है या नहीं। लेकिन, रूसी सेना इस मामले में बगदादी के मारे जाने की कोई पुख्ता सबूत नहीं दे पाई। अब देखना यह है कि अधिकारियों के इन दावों में कितनी सच्चाई है। जब तक बगदादी की कोई ख़बर नहीं मिलती, तब तक आईएसआईएस को लेकर डर बना रहेगा।

मोदी बीफ बिरयानी खा कर सो गए थे क्या : ओवैसी

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। हैदराबाद लोकसभा क्षेत्र के प्रत्याशी और वर्तमान सांसद ओवैसी ने पूछा, “जब पुलवामा का हमला हुआ तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या बीफ बिरयानी खा कर सो रहे थे।”

ओवैसी ने यहीं नहीं रुके आगे बोलते रहे, “हिन्दुस्तानी एयर फ़ोर्स बालाकोट में बम गिरा आई। अमित शाह कहते हैं कि 250 लोग मारे गए। राजनाथ सिंह कहते हैं कि एनटीआरओ ने 300 मोबाइल टैप किए थे। आपने बालाकोट में 300 मोबाइल तो देख लिए पर अपनी नाक के नीचे पुलवामा में 50 किलो आरडीएक्स की स्मगलिंग नहीं देख पाए?’ शनिवार को एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा। ‘मैं प्रधानमंत्री मोदी और राजनाथ सिंह जी से यह पूछना चाहता हूँ कि जब यह सब हो रहा था तो वे क्या बीफ बिरयानी खा कर सो रहे थे?”

अपनी लड़ाई देश से सेक्युलरिज्म मिटाने की चाह रखने वालों के खिलाफ बताते हुए ओवैसी ने कहा कि भाजपा और कॉन्ग्रेस में कोई अंतर नहीं है।

ओवैसी ने अपने भड़काऊ भाषण में आगे कहा, ‘अगर कोई कहे कि देश में दो राष्ट्रीय दल हैं तो मैं उन्हें ना कहू दूँगा क्योंकि एक राष्ट्रीय पार्टी भाजपा है दूसरी ड्योढ़ी (1.5) भाजपा है। भाजपा और कॉन्ग्रेस में कोई अंतर नहीं है।’ ओवैसी ने आगे कहा। ‘मेरी लड़ाई उन सभी ताकतों से है जो देश से भाईचारा और सेक्युलरिज्म खत्म करना चाहतीं हैं।’