Home Blog Page 6100

फेसबुक लव स्टोरी: जब पीएम मोदी ने दो दिलों को मिलाया

दो अनजान लोग फेसबुक पर मिले, दोनों में प्यार हुआ और फिर उन्होंने शादी कर ली। लेकिन ये सुन कर आप चौंक जाएंगे कि इस पूरी कहानी के पीछे नरेंद्र मोदी हैं। यह बात ख़ुद उस व्यक्ति ने ट्वीट कर बताई। जय दवे नमक व्यक्ति ने अपनी पत्नी के साथ फ़ोटो ट्वीट कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि वो और उनकी पत्नी पीएम मोदी के कारण शादी के बंधन में बंधे हैं।

जय दवे ने ट्वीट कर पीएम को धन्यवाद दिया।

जय के अनुसार, एक लड़की ने नरेंद्र मोदी के समर्थन में किए उनके कमेंट को लिखे किया, जिसके बाद उनका प्रेम परवान चढ़ा। जय ने पीएम को टैग करते हुए लिखा:

“नरेंद्र मोदी जी हम आपके कारण शादी के बंधन में बंधे हैं। मैंने राहुल गाँधी के फेसबुक पेज पर आपके समर्थन में कॉमेंट किया और इस सुंदर लड़की ने मेरे कॉमेंट को लाइक किया। हमने बात की, एक-दूसरे से मिले और पाया कि हम दोनों आपका समर्थन करते हैं क्योंकि हम भारत के लिए जीना चाहते हैं। इसलिए हमने शादी करने का फैसला कर लिया।”

दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तेजिंदर बग्गा सहित कई लोगों ने इस जोड़े को बधाई दी। इसके बाद यह ट्वीट डिलीट हो गया, जिसके बाद लोगों ने जय को ट्रोल करना शुरू कर दिया। इस पर जवाब देते हुए उन्होंने दो और ट्वीट किया। उन ट्वीट्स में जय ने बताया:

“मैं कुछ और डिलीट करना चाहता था लेकिन गलती से वह ट्वीट डिलीट हो गया। मीडिया और सोशल मीडिया में एक गलतफहमी है कि मैंने ट्रोल होने के डर से वह ट्वीट डिलीट किया है। सच यह है कि मोदी जी की तरह ही मैं भी ट्रोलिंग और आलोचना का आदी हो चुका हूँ। देश की ओर मेरा कमिटमेंट ट्रोल्स से प्रभावित नहीं होगा। जय हिंद।

जय की लव स्टोरी काफ़ी वायरल हो रही है और लोग उनकी प्रेम कहानी को पसंद भी कर रहे हैं। यह सोशल मीडिया पर भी काफ़ी शेयर किया जा रहा है।

एक वीर और भी था… गाँधीजी के साथ जिनकी पुण्यतिथि हर वर्ष मनाई जानी चाहिए

30 जनवरी 1948- यह वो तारीख़ है, जब राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या कर दी गई थी। यह विडम्बना ही है कि अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी के जीवन का अंत हिंसा से हुआ। इसीलिए इस दिन को हम ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाते हैं। लेकिन एक और व्यक्ति था, जिसकी मृत्यु इसी दिन हुई थी, गाँधीजी के निधन से 420 वर्ष पहले। एक ऐसा शख़्स, जिसने इस्लामिक आक्रांताओं को भारत की धरती पर प्रवेश करने से रोकने के लिए सारे प्रयास किए, लेकिन तकनीक के सामने असफल रहा। मेवाड़ की जब भी बात आती है तो हमें महाराणा प्रताप याद आते हैं लेकिन आज हम उस शूरवीर की बात करने जा रहे हैं जो जज़्बा, वीरता, हठधर्मिता और देशभक्ति के मामले में प्रताप से भी दो क़दम आगे था।

अब तक आप समझ गए होंगे- हम यहाँ राणा सांगा की बात करने जा रहे हैं। उनका भी स्वर्गवास 30 जनवरी यानी आज के ही दिन हुआ था। महाराणा सांगा की मृत्यु के साथ ही दिल्ली में मुग़ल सत्ता स्थापित होने का मार्ग प्रशस्त हो गया और देश तब तक इस्लामिक आक्रांताओं का ग़ुलाम रहा, जब तक उन्हें 18वीं शताब्दी के बाद सिखों, मराठों और अंग्रेजों के वर्चस्व का सामना न करना पड़ा। लेकिन यह सब कुछ सिर्फ़ एक युद्ध के परिणाम से तय हो गया था। वह था- खानवा का युद्ध।

16वीं शताब्दी की शुरुआत में जब बाबर ने काबुल पर कब्ज़ा किया, तभी से उसके मन में एक ही शब्द घूम रहा था और वह था- हिंदुस्तान। अपने पूर्वज तैमूर की कहानियाँ सुन कर बड़ा हुआ बाबर को ज्ञात था कि कैसे तैमूर ने झटके में शहर के शहर तबाह किए थे और हजारों को मौत के घाट उतारा था। वह तैमूर द्वारा पंजाब में जीते गए कुछ क्षेत्रों को वापस हथियाना चाहता था। जब बाबर ने दिल्ली में लोदी को हरा कर उसके सारे धन-वैभव पर कब्ज़ा जमाया, तब आम धारणा यह थी कि वह भी तैमूर की तरह लूटपाट कर वापस चला जाएगा लेकिन अति-महत्वकांक्षी बाबर के इरादे नेक नहीं थे।

बाबर के दिल्ली में साम्राज्य स्थापित करने की ख़बर सुनते ही राणा सांगा के कान खड़े हो गए। राणा का मानना था कि बाबर का दिल्ली में बैठना लोदी से भी बड़े ख़तरे का संकेत था। बाबर के अनुसार, राणा के पास 2 लाख सैनिकों की एक मज़बूत सेना थी। राणा ने बाबर के ख़िलाफ़ कई राजाओं का गठबंधन बनाने की हरसंभव कोशिश की और उसमें वह बहुत हद तक सफल भी हुए। राजस्थान के राजपूत राज्य, जैसे- हरौती, जालौर, सिरोह, डूंगरपुर, धुंधर और अम्बर। तुर्क़-अफ़ग़ान के अवशेषों पर एक हिन्दू राज्य की स्थापना का स्वप्न लिए राणा ने बाबर के इरादों की भनक लगते ही उसे सबक सिखाने का मन बना लिया था।

दिल्ली में हिन्दू राज्य की स्थापना के लिए महाराणा सांगा ने अफ़ग़ान तक की भी मदद ली। उन्होंने विशाल सेना-सेनापतियों की एक ऐसी फ़ौज खड़ी की, जिसके ‘जय एकलिंग’ का नाद करते ही आसमान भी थर्रा कर काँप उठता था।

बाबर ने इस युद्ध को हिन्दू बनाम मुस्लिम बना दिया। जैसा कि आज के ज़िहादी आतंकी कहते आए हैं, उसने राणा के साथ युद्ध को इस्लाम की रक्षा से जोड़ कर अपनी सेना में जोश भर दिया। बाबर ने अपने सिपहसालारों से क़ुरानशरीफ़ पर हाथ रख कर राणा जैसे जिहादी ताक़त को ख़त्म करने की शपथ दिलाई। खानवा में हुए युद्ध से एक शाम पहले बाबर ने एक ऐसा उत्तेजित भाषण दिया- जिसने भावी युद्ध को कथित काफ़िर बनाम इस्लाम के रक्षक से जोड़ दिया। बाबर ने इस्लाम की आन, बान और शान की हिफ़ाज़त के लिए अपनी सेना से एक सच्चे मुस्लिम की तरह लड़ने का वादा लिया। सच्चे मुस्लिम की परिभाषा में फ़िट बैठने के लिए उसने शराब के मर्तबान पटक डाले और शराब छोड़ने की क़सम खाई।

खानवा का युद्ध भारतीय इतिहास का एक ऐसा युद्ध है, जिसके दूरगामी परिणाम हुए। सांगा के बलिदान के बाद दिल्ली में मुग़ल सत्ता की स्थापना हुई लेकिन इस युद्ध में देश की माटी की रक्षा के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले राणा सांगा ने जिस वीरता और देशभक्ति का परिचय दिया- उसकी मिसाल इतिहास में शायद ही कहीं और मिले। युद्ध की शुरुआत में ही राणा सांगा ने बाबर की सेना पर ऐसा हमला किया, जिस से पूरी इस्लामिक फ़ौज में हड़कंप मच गया। राणा के ताबरतोड़ आक्रामक से बाबर की सैन्य संरचना बिखर सी गई।

लेकिन, राणा सांगा एक जगह चूक गए थे। बाबर ने जिस तरह पानीपत में इब्राहिम लोदी को हराया था, उस से उन्होंने कोई सीख नहीं ली थी। भारतीय वीरों की उस सूची में राणा का भी नाम है, जिन्होंने अपनी वीरता के बावज़ूद दुश्मन के छल, कपट और पैंतरेबाज़ी का अंदाज़ा लगाना उचित नहीं समझा। युद्ध के पहले बाबर ने युद्धस्थल का पूरी तरह मुआयना किया था। किस तरफ से, कहाँ और किस ओर वार करना है- ये सब उसने पहले ही सुनिश्चित कर लिया था। खानवा और आगरा की दूरी 35 मील के क़रीब है।

राणा सांगा ने इन सब की जरूरत नहीं समझी। अपनी हाथी सेना और तलवारबाज़ों की क्षमता पर भरोसा करने वाले राणा को इस बात का अंदाज़ा न था कि बाबर की तोपों के सामने वीरता का प्रदर्शन कर बलिदान तो दिया जा सकता है, लेकिन तीर और भाले से मशीनों को शायद ही जीता जा सकता है। मालवा और गुजरात की संयुक्त सुल्तानी सेना को धुल चटाने वाले राणा सांगा बाबर की पैंतरेबाज़ी ने वाक़िफ़ न थे। उन्होंने संगठन, सेना और रणनीति- इन सब पर ध्यान दिया था, लेकिन दुश्मन की चाल को समझने की कोशिश न करना उन्हें भारी पड़ा।

बाबर ने खानवा में भी पानीपत वाला तरीका ही आज़माया। उसने ख़ुद को मध्य में रख बाकी दोनों तरफ से सेना का ऐसा चक्रव्यूह बनाया, जिस से एक बार में कई तरफ से आक्रमण किया जा सके। अगर राणा पानीपत के युद्ध से थोड़ी भी सीख ले लेते, तो शायद इस तकनीक की काट की योजना तैयार कर सकते थे। तन-बदन पर लगे अनगिनत घावों से जूझते राणा सांगा ने सीधा बाबर की तरफ प्रस्थान किया और दुश्मन के मुखिया का ही काम तमाम करने के लिए पूरी ताक़त से धावा बोला।

लेकिन बीच में ही राणा की सेना बिखर गई। बाबर द्वारा कई तरफ से हो रहे आक्रमण और तोपों द्वारा काफ़ी कम दूरी से किए जा रहे फायर ने राणा के योद्धाओं को तितर-बितर कर डाला। हालाँकि, राजपूत सेना की हार देख योद्धाओं ने राणा को युद्धस्थल छोड़ने की सलाह दी। हठी राणा ने साफ़ मना कर दिया। हालाँकि, किसी तरह राणा को वहाँ से निकाल लिया गया लेकिन उनके ज़ख्म ऐसे थे, कि वह फिर युद्ध में लौट नहीं सके। राणा के जाते ही उनकी सेना की हार हुई और बाबर ने इस्लामिक साम्राज्य को एक नया विस्तार दिया। साम्राज्यवाद का यह रथ बाद में क़रीब दो दशकों के लिए रुका, जिसका श्रेय शेरशाह सूरी और हेमचन्द्र विक्रमादित्य को जाता है।

लेकिन राणा हार मानने वालों में से नहीं थे। अपनी पराजय उन्हें स्वीकार न थी। इतिहासकार प्रदीप बरुआ लिखते हैं कि अगर बाबर ने तोपों की मदद नहीं ली होती और पानीपत वाली रणनीति न दोहराई होती, तो शायद दिल्ली में मेवाड़ का केसरिया ध्वज फहरा रहा होता। इस युद्ध के बाद राणा का गठबंधन बिखर गया।

लेकिन इस युद्ध में राणा सांगा ने जिस तरह का प्रदर्शन किया, उसकी तुलना महाभारत काल के योद्धाओं से की जा सकती है। राणा के शरीर पर 80 ज़ख्म थे। पहले की कई युद्धों में लड़ते-लड़ते उनका एक हाथ जा चुका था। एक ही आँख से देख पाते थे, दूसरी युद्ध की बलि चढ़ गई थी। एक ही पाँव से ठीक से चल पाते थे, दूसरा अपाहिज हो चुका था। फिर भी उन्होंने बाबर से टक्कर लेने का निर्णय लिया और उसे नाकों चने चबाने को मज़बूर किया। यह जज़्बा प्रशंसनीय है।

आज (30 जनवरी) के दिन ही 1528 में उनका स्वर्गवास हो गया। ज़ख्मों से जूझ रहे राणा दिल्ली में बैठे बाबर को फिर से ललकारने की योजना तैयार कर रहे थे। लेकिन, उनके दरबारियों और अन्य राजाओं को ये पसंद नहीं था। उन्हें दिल्ली और आगरा कब्ज़ा कर बैठा बाबर अपराजेय नज़र आ रहा था। उनके निधन के बाद भी बाबर उन्हें अपना सबसे बड़ा ख़तरा मानता रहा, जब तक वह निश्चित नहीं हो गया कि राणा सचमुच नहीं रहे। कुछ इतिहासकारों का दावा है कि बीमार राणा के दोबारा युद्ध की योजना से तंग आकर उनके ही लोगों ने उन्हें ज़हर दे दिया था।

जो भी ही, अगर हम अहिंसा के पुजारी गाँधीजी को याद करते हैं, तो 30 जनवरी को वीरों के वीर महाराणा सांगा को भी याद करना चाहिए। राणा ने जिस जज़्बे की नींव रखी, उस पर चल कर प्रताप, हेमू और बाजीराव जैसे कितने योद्धा अमर हो गए। राणा का अखंड हिन्दू साम्राज्य का स्वप्न भले ही उनके जीवन रहते सफल न हो पाया हो, लेकिन उनके व्यक्तित्व से पूरा राजस्थान प्रेरणा लेता है, उनकी वीरता भारत के कण-कण में समाहित है।

References:

  1. Medieval India: From Sultanat to the Mughals Part – II (By Satish Chandra)
  2. The State at War in South Asia (By Pradeep Barua)

सिर्फ आतंकवाद या Pak ही नहीं, भारत को है और भी ‘खतरा’: USA की ख़ुफ़िया वार्षिक रिपोर्ट

अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा तैयार की गई ‘US Worldwide Threat Assessment Report‘ में भारत को लेकर कई बातें कही गई हैं, जिन पर ग़ौर करना जरूरी है। इस रिपोर्ट में दुनिया भर में आतंकवाद के प्रभाव से लेकर परमाणु बम तक की बात की गई है। आइए एक-एक कर जानते हैं कि इस विस्तृत रिपोर्ट में कौन-कौन सी ऐसी बातें हैं, जो आपको जाननी चाहिए। इस रिपोर्ट को मंगलवार (जनवरी 29, 2019) को USA कॉन्ग्रेस में डायरेक्टर ऑफ़ नेशनल इंटेलिजेंस डेनियल कोट द्वारा टेबल किया गया।

क्षेत्रीय ख़तरे

अमेरिका की रिपोर्ट में ‘Regional Threats’ के लिए एक पृथक वर्ग बनाया गया है, जिसमें दक्षिण एशिया से लेकर इराक़ तक- पूरी दुनिया में जो भी क्षेत्रीय ख़तरे पनप रहे हैं, उनकी तरफ ध्यान आकर्षित कराया गया है। इस वर्ग में दक्षिण एशिया वाले खंड में भारत की भी चर्चा की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान समर्थित आतंकी गुट पाक स्थित सुरक्षित आतंकी ठिकानों (Safe Heaven) का इस्तेमाल करना जारी रखेंगे ताकि भारत में हमलों को अंजाम दिया जा सके और इसके लिए योजना बनाई जा सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये आतंकी अमेरिकी हितों को भी निशाना बनाएंगे।

साथ ही, अमेरिका ने पकिस्तान पर भी कड़ी टिप्पणी की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में सहयोग के मामले में इस्लामाबाद का दृष्टिकोण काफ़ी संकीर्ण है। इस रिपोर्ट में आतंकी गुटों को लेकर पाकिस्तान के दोहरे रवैये पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान आतंकी संगठनों का प्रयोग ‘नीतिगत हथियार (Policy Tools)’ की तरह कर रहा है। पाकिस्तान सिर्फ़ उन्हीं आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध कार्रवाई करता है, जिस से उसे सीधा ख़तरा (Direct Threat) है।

रिपोर्ट में पाकिस्तान के दोहरे रवैये के प्रति चिंता जताते हुए कहा गया है कि पाकिस्तान का यह व्यवहार तालिबान के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे अमेरिकी अभियान को विफल कर देगा।

लोकसभा चुनाव और सांप्रदायिक हिंसा

बता दें कि इस साल भारत में लोकसभा चुनाव होने हैं और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में होने वाले इस चुनाव पर सभी अंतरराष्ट्रीय ताक़तों की नज़र है। अमेरिकी रिपोर्ट में आगामी चुनाव को लेकर सांप्रदायिक हिंसा की संभावना बढ़ने का अंदेशा जताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है:

“अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी आगामी लोकसभा चुनावों में हिन्दू राष्ट्रवादी विषयों पर ज़ोर देती है तो सांप्रदायिक हिंसा की संभावना बढ़ जाएगी। मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान भाजपा सरकार की नीतियों ने कई भाजपा शासित राज्यों में सांप्रदायिक तनाव को और गहरा करने का कार्य किया है।”

वैसे रिपोर्ट में इस निष्कर्ष के पीछे का कारण नहीं बताया गया है। नरेंद्र मोदी के पिछले साढ़े चार साल पहले सत्ता संभालने के बाद से अब तक देश में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ है। ऐसे में अमेरिकी रिपोर्ट में ऐसी बातें चौंकाने वाली है। यही नहीं, इस रिपोर्ट में कई अन्य हिंदूवादी नेताओं के बयानों से भी ख़तरों के उपजने की बात कही गई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ राज्य-स्तरीय हिन्दू राष्ट्रवादी नेता अपने समर्थकों को उत्तेजित करने के लिए हिन्दू राष्ट्रवादी अभियान को लोकल स्तर पर हिंसा भड़काने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं

रिपोर्ट में फिर से इस निष्कर्ष के आधार का जिक्र नहीं किया गया है। वो कौन से हिन्दू राष्ट्रवादी नेता हैं, जो हिंसा भड़का कर समर्थकों को उत्तेजित करते हैं- इस बारे में कुछ और नहीं बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसा की ऐसी वारदातें मुसलामानों को अलग-थलग कर देगी और भारत में इस्लामिक आतंकवादी समूहों को अपने प्रभाव का विस्तार करने में सहयोग करेंगी

US के WTA रिपोर्ट का एक अंश (साभार: डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस)

भारत-पकिस्तान तनाव और आतंकवाद

रिपोर्ट में भारत-पकिस्तान के बीच तनाव और पाकिस्तान समर्थित आतंकियों द्वारा भारत में हमले करने की भी बात की गई है। रिपोर्ट के अनुसार निम्नलिखित बातों का भारत-पाक तनाव पर ख़ासा असर पड़ेगा:

  • सीमा पार से आतंकवाद
  • LOC (नियंत्रण रेखा) पर गोलीबारी
  • भारत में विभाजनकारी राष्ट्रीय चुनाव
  • भारत-अमेरिकी रिश्ते को देखने का इस्लामाबाद का नज़रिया

रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम मई 2019 (भारतीय चुनावों की समयसीमा या फिर उसके बाद) तक तो भारत और पाकिस्तान के बीच ऐसी तनावपूर्ण स्थिति बनी रहेगी। अमेरिका ने कहा है कि दोनों देशों के बीच विश्वास को मज़बूत करने के सीमित उपायों के बावज़ूद उन्होंने कश्मीर सीमा पर संघर्ष विराम जारी रखा है। लगातार हो रहे आतंकी हमलों और सीमा पार से गोलीबारी ने दोनों देशों की सोच को और सख्त कर दिया है तथा मैत्री के लिए जरूरी इच्छाशक्ति को भी कम कर दिया है

अमेरिकी विशेषज्ञों और ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में भारत-पाक संबंध के निकट भविष्य में अच्छे होने की संभावना से इनकार किया गया है। इसके लिए भारत में आगामी लोकसभा चुनाव में होने वाली पैंतरेबाज़ी को जिम्मेदार ठहराया गया है।

भारत-चीन संबंधों में तनाव

अमेरिका ने अंदेशा जताया है कि इस वर्ष भी भारत और चीन के रिश्ते तनावपूर्ण बने रहेंगे। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सेनाओं की गतिविधियों के बारे में गलत धारणाएँ बनेंगी और सीमा पार चल रहे निर्माण कार्यों को लेकर भी स्थिति तनावपूर्ण बनी रहेगी। रिपोर्ट में इस बात को लेकर चिंता जताई गई है कि भारत और चीन के बीच का तनाव सशस्त्र संघर्ष का रूप भी ले सकता है

2017 के डोकलाम विवाद की तरफ इशारा करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि उस घटना के बाद से दोनों तरफ से शांति के लिए प्रयास किए गए हैं लेकिन अनजाने में तनाव के गहरा हो जाने का जोखिम बना हुआ है। बकौल अमेरिकी रिपोर्ट, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने तनाव को कम करने और संबंधों को सामान्य करने के लिए अप्रैल 2018 में एक अनौपचारिक शिखर सम्मेलन आयोजित तो किया, लेकिन उन्होंने सीमा-संबंधी मुद्दों को संबोधित नहीं किया।

भारत और परमाणु हथियार

अमेरिका ने भारत और पकिस्तान- दोनों ही देशों के परमाणु हथियार कार्यक्रमों में हो रही निरंतर वृद्धि और विकास पर चिंता जताई है। कहा गया है कि इस से दक्षिण एशिया में परमाणु सुरक्षा से जुड़े ख़तरे बढ़ जाएंगे। नए प्रकार के हथियार क्षेत्र में सुरक्षा से जुड़े नए प्रकार के जोखिम पैदा करेंगे। अमेरिका ने पकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में बात करते हुए रिपोर्ट में कहा:

पाकिस्तान ने नए प्रकार के परमाणु हथियारों का विकास जारी रखा है, जिसमें छोटी दूरी के सामरिक हथियार, समुद्र आधारित क्रूज मिसाइल, हवा से लॉन्च क्रूज मिसाइल और लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल शामिल हैं।

इसके अलावा अमेरिका ने INS अरिहंत के बारे में बात करते हुए कहा कि भारत ने भी 2018 में मिसाइलों से लैस पहली परमाणु संचलित पनडुब्बी की तैनाती की है। पाकिस्तान ने नए प्रकार के परमाणु हथियारों का विकास जारी रखा है, जिसमें छोटी दूरी के सामरिक हथियार, समुद्र आधारित क्रूज मिसाइल, हवा से लॉन्च क्रूज मिसाइल और लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल शामिल हैं। बता दें कि अरिहंत भारत का पहला परमाणु बैलेस्टिक मिसाइल पनडुब्बी है और 2018 में उसने अपना पहला निवारक गश्त (Deterrent Patrol) पूरा कर इतिहास रच दिया था।

अर्थव्यवस्था

अमेरिकी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्ष 2018 में निवेशकों ने ब्राजील, भारत, इंडोनेशिया और तुर्की से पूंजी खींच ली है, जिसके कारण उन देशों में पहले से ही ख़राब हो रहा मुद्रा विमूल्यन (Currency Depreciation) और गहरा हो गया है। इस कारण ये देश 2019 में यूएस डॉलर वाले ऋण पर काम करने में कठिनाई महसूस करेंगे।

इसके अलावा रिपोर्ट में बताया गया है कि 2018 में भारत और चीन में तरल प्राकृतिक गैस (LNG) की काफ़ी माँग रही। बता दें कि भारतीय रेलवे भी अब एलएनजी के इस्तेमाल करने की योजना तैयार कर रहा है।

क्या गाँधी की हत्या को रोका जा सकता था? कौन से लूपहोल्स थे? क्यों हो गए थे अपने ही लोग लापरवाह?

आज जब हम गाँधी जी की 150वीं जयंती मना रहे हैं तो याद आता है बापू आज़ाद हिंदुस्तान में केवल साढ़े पाँच महीने जीवित रह सके। हमने ऐसा क्या किया कि 125 साल तक ज़िंदा रहने कि इच्छा रखने वाले गाँधी अपने आखिरी दिनों में मौत की कामना करने लगे थे।

आज़ाद हिंदुस्तान में उन्होंने अपनी एक ही वर्षगाँठ देखी उस दिन प्रार्थना सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा, “मेरे लिए तो आज मातम मनाने का दिन है। मैं आज तक ज़िंदा पड़ा हूँ। इस पर मुझको खुद आश्चर्य होता है। शर्म लगती है, मैं वही शख्स हूँ जिसकी जुबान से एक चीज निकलती तो करोड़ो मानते थे लेकिन आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है। मैं कहूँ कि तुम ऐसा करो, ‘नहीं, ऐसा नहीं करेंगे’ ऐसा कहते हैं। ऐसी हालत में हिन्दुस्तान में मेरे लिए जगह कहाँ है और मैं उसमें ज़िंदा रह कर क्या करूँगा?…..”

आखिर क्यों? कहना पड़ा गाँधी को यह सब अपनी हत्या से ठीक पहले की वर्षगाँठ पर? क्या गाँधी की हत्या को रोका जा सकता था? कौन से थे वे लूप होल्स जहाँ लगा कि कुछ लोग हैं जिनके लिए अब गाँधी का नाम ही काफी है, गाँधी नहीं? चलिए थोड़ा पीछे ले चलता हूँ।

शुक्रवार 30 जनवरी 1948 की शुरुआत गाँधी जी के जीवन में एक आम दिन की तरह ही हुई। हालाँकि माहौल इतना शान्तिपूर्ण नहीं था, गाँधी जी को भी पता था उनकी वज़ह से उनके अपने ही देश में कुछ लोग नाराज़ हैं। वज़ह गाँधी जी की यह ज़िद कि पाकिस्तान को उसके हिस्से का 55 करोड़ रुपए मिलना चाहिए। बेशक़, वह उससे भारत के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए हथियारों की ख़रीद में ही क्यों न इस्तेमाल करे। पाकिस्तान को उसका हक़ दिलाने के लिए कई दिनों तक गाँधी जी ने अनशन भी किया था। गाँधी जी, शरीर जर्ज़र होने के बावज़ूद भी उस दिन हमेशा की तरह तड़के साढ़े तीन बजे सोकर उठ गए थे। प्रार्थना की, उसके बाद दो घंटे अपनी डेस्क पर कॉन्ग्रेस की नई जिम्मेदारियों के मसौदे पर काम किया और इससे पहले कि दूसरे लोग उठ पाते, छह बजे फिर सोने चले गए।

कौन जानता था कि आज शाम गाँधी जी हमेशा के लिए आँखें मूँद लेंगे। एक ऐसी चिरकालीन निद्रा में चले जाएँगे, जहाँ से शायद फिर कभी वापसी न हो।

नोआखाली के दंगों के बाद से ही गाँधी जी की जान को ख़तरा बढ़ गया था। जग़ह-जग़ह उनके ख़िलाफ़ नारेबाज़ी हो रही थी। फिर भी, गाँधी जी उसे नज़रअंदाज़ करते हुए अपनी धुन में जिए जा रहे थे। लेकिन उनके आस-पास के लोग जो सत्ता में थे, वो उनपर बढ़ते खतरे को देखते हुए भी क्यों इतने लापरवाह हो गए थे, ये सवाल आज भी है? क्यों गाँधी जी कॉन्ग्रेस को भंग कर देना चाहते थे? क्यों ख़ुद को खोटा सिक्का कहने लगे थे? क्यों अपने ही देश में उपेक्षित महसूस कर रहे थे?

तनाव के उस दौर में, उनका ज़्यादातर समय नेहरू और पटेल के मतभेद सुलझाने में जा रहा था। पटेल ने सत्ता से दूर हटने के संकेत दे दिए थे? शायद नेहरू मंजूरी भी दे देते लेकिन गाँधी जानते थे कि पटेल देश की ज़रूरत हैं। सच्चाई ये भी है कि नेहरू, गाँधी के उनके प्रति मोह की वज़ह से ही सत्ता के केंद्र बने हुए थे। तनातनी के माहौल में गाँधी का ख़ुद को उपेक्षित महसूस करना अनायास नहीं था, बल्कि माहौल ही ऐसा था।

शायद आज की नई पीढ़ी उस समय के घटनाक्रमों से वाकिफ़ न हो! पिछले कई दिनों से जब मैं उस समय की परिस्थितियों पर गौर कर रहा था, तो बार-बार कुछ बातें दिमाग में हलचल पैदा करती रहीं कि कैसे थोड़ी सी लापरवाही, थोड़ी सजगता की कमी और थोड़ी सी ज़िद ने इतिहास के घटनाक्रमों का रुख मोड़कर, उस दौर में देश, तमाम विरोधाभाषी विचारों और व्यक्तित्वों के टकराव का केंद्र बन चुका था।

कहते हैं “इतिहास गौरव से ज़्यादा विश्लेषण का विषय वस्तु है” जिससे सबक लेकर आने वाली पीढ़ियाँ उन गलतियों के दोहराव से बच सकती हैं। चलिए आपको जनवरी 1948 के कुछ तारीख़ों से परिचय कराते हैं कि कैसे षड्यंत्रों के बीज बोए गए, कहाँ सुरक्षा में चूक हुई, कि तमाम आहटों और स्पष्ट जानकारियों के बावजूद भी हमने गाँधी को खो दिया।

20 जनवरी 1948, की सुबह साफ़ और चमकदार थी। फ़िज़ा में अनशन के बाद गाँधी जी के स्वास्थ्य में सुधार की ख़बर थी। सुबह के 8.30 बजे गाँधी जी हत्या कर देने के इरादे से चार षडयंत्रकारी आप्टे, करकरे, बागड़े और किस्तैया बिड़ला निवास के लिए निकले। गोपाल गोडसे इस योजना का हिस्सा था, लेकिन किसी कारण से नाथूराम गोडसे ने षड्यंत्र की प्रारंभिक योजना में भाग नहीं लिया था। 20 जनवरी को गाँधी को पीछे से हथगोला फेंक कर मार देने की योजना थी। उनके हथियारों में पाँच हथगोले और दो पिस्तौल थी लेकिन पिस्तौल सही हालत में न थी।

उस दिन प्रार्थना सभा में ऐन वक़्त पर प्लानिंग के हिसाब से कुछ भी नहीं हुआ। उस शाम एक षड्यंत्रकारी पाहवा के भगदड़ मचाने के लिए पलीते में आग लगाने के बाद भी प्रार्थना सभा में कोई भगदड़ नहीं मची। हालाँकि, उस समय बागड़े और किस्तैया गाँधी के पास ही ही खड़े थे, पर फिर भी किसी तरह के ख़ास हलचल न मचने की वज़ह से गाँधी को मार देने की योजना बुरी तरह विफ़ल हो गई थी। और षड्यंत्रकारी पाहवा पुलिस की हिरासत में था। विडम्बना कहें या लापरवाही? पूछताछ में पाहवा ने उस रात बाकी सभी षड्यंत्रकारियों के नाम बता दिए थे। फिर भी न गाँधी की सुरक्षा बढ़ाई गई, न बाकी के षड्यंत्रकारियों को पकड़ने की कोई योजना ही बनी। अगले दिन मदनलाल पाहवा के हिरासत में होने की ख़बर प्रमुखता से अख़बारों में छपी।

जब ये ख़बर बम्बई में डॉ. जैन ने पढ़ी तो वे तुरंत अधिकारियों से मिलने की सोचने लगे क्योंकि उनके पास बाकी षड्यंत्रकारियों के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी थी। हुआ यूँ था कि 13 जनवरी को जब पाहवा मुंबई में ही था और कोई भी षड्यंत्रकारी दिल्ली के लिए नहीं निकला था, तब पाहवा ने डॉ. जैन के माध्यम से समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण से मिलने का समय माँगा था। लेकिन आखिरी वक़्त में एक दुर्घटना के कारण पाहवा की मुलाक़ात डॉ. जैन, जयप्रकाश नारायण से नहीं करा पाए।

प्रार्थना सभा में धमाके के अगले दिन, डॉ.जैन हड़बड़ी में एक से दूसरे सरकारी विभाग फोन कर रहे थे। सरदार पटेल भी उस दिन बम्बई में ही थे लेकिन वो भी व्यस्त थे। बम्बई कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष एस के पाटिल के बम्बई में मौजूद नहीं होने से उनसे मिलना सम्भव नहीं था। अंततः बी जी खेर से जैन की मुलाक़ात हुई और डॉ. जैन ने उन्हें पाहवा और विष्णु करकरे के नाम के बारे में बताया। पाहवा ने इस षड्यंत्र के बारे में खुद ही जैन को बताया था। उसने सावरकर का आशीर्वाद होने की बात भी कही थी। जब डॉ. जैन ये कहानी सुना रहे थे, तब उनको भी अंदेशा था कि उनकी बात पर कोई भरोसा नहीं करेगा क्योंकि ये आम धारणा है कि कोई साज़िश कर्ता अपने षड्यंत्रों के बारे में किसी को क्यों बताएगा और यही हुआ भी। हालाँकि, डॉ. जैन के अति प्रतिष्ठित होने की वजह से उन पर भी किसी ने शक नहीं किया।

महात्मा गाँधी , नेहरू और पटेल

बी जी खेर ने डॉ. जैन पर भरोसा जताते हुए उन्हें मोरारजी देसाई से मिलाया। उस समय मोरारजी बम्बई सरकार के गृहमंत्री थे इसलिए पुलिस और अपराधों की छानबीन की जिम्मेदारी उनकी थी। पर जो कहानी डॉ. जैन ने मोरारजी को सुनाई थी, वह इतनी अनपेक्षित थी कि मोरारजी उस पर यकीन ही नहीं कर पाए। उन्होंने सोचा कि भला मदनलाल पाहवा भाषा के एक प्राध्यापक को अपने षड्यंत्र के बारे में क्यों बताएगा, जो कि उसे संयोग से बम्बई की व्यस्त गलियों में मिल गए थे? दूसरी बात, डॉ. जैन ये बात उन्हें बताने के लिए इतने उतावले क्यों थे? हालाँकि डॉ. जैन ने उनके सभी प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश की थी, जो उनसे पूछे गए थे। लेकिन इसके बावजूद मोरारजी उनसे सन्तुष्ट नहीं हुए। और उन्होंने ख़ुश्क और अशिष्ट स्वर में डॉ. जैन से पूछा कि फिर तो आपको भी उन षड्यंत्रकारियों में से एक होना चाहिए। एक क्षण को वो हिल गए पर संभलते हुए उन्होंने एक और कोशिश की कि उन्हें दिल्ली भेजा जाए, हो सकता है कि पाहवा उन्हें अपनी योजना के बारे में बता दे। मोरारजी ने ये सुझाव भी एक तरफ सरका दिया और कोई ध्यान नहीं दिया।

यहाँ लगता है कि किस तरह किसी घटना को ठीक से समझ न पाने के कारण हम भारी अनिष्ट को निमंत्रण दे देते हैं। उस समय भी अँग्रेज सरकार में 11 साल मजिस्ट्रेट रह चुके मोरारजी देसाई से एक भारी भूल हुई थी।

फिर भी मोरारजी उसी दिन अहमदाबाद जाते हुए बम्बई के उपायुक्त जे डी नागरवाला को इस षड्यंत्र के बारे में ब्रीफ करते हुए, सावरकर के घर पर नज़र रखने को बोल गए। अगले कुछ दिनों तक डॉ. जैन परेशान रहे कि इतनी महत्वपूर्ण सूचना को नज़र अंदाज़ किया जा रहा है। षड्यंत्रकारियों को पकड़ने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। हालाँकि, 20 जनवरी को गाँधी से महज़ 70 फ़ीट की दूरी पर भगदड़ के लिए पाहवा द्वारा आग लगाए गए बम फटने से सरदार पटेल ने बिड़ला हाउस में पुलिस बल बढ़ा ज़रूर दिया था पर डॉ. जैन को पुलिस पर भरोसा नहीं था।

पता नहीं क्यों षड्यंत्रकारियों को पकड़ने की चिंता न पटेल को थी, न मोरारजी को और न पुलिस को। क्या ऐसा नासमझी की वज़ह से हो रहा था। या लोग मन ही मन गाँधी से छुटकारा चाहने लगे थे? जीवित गाँधी अब उनके काम के नहीं थे। पता नहीं क्या रहा होगा उस समय के सत्ताधीशों के मन में, जिसका अब सिर्फ़ अनुमान ही किया जा सकता है।

इस पर पड़ी धुंध थोड़ी तब छटती है, जब इस घटना के 20 वर्ष बाद गाँधी से जुड़ी कुछ अनसुलझी बातों का पता लगाने के लिए जस्टिस कपूर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन हुआ। समिति की रिपोर्ट से पता चला कि पुलिस महकमे ने आलस्य और ढिलाई का परिचय देते हुए इस मामले की तफ़्तीश का कोई लिखित विवरण भी नहीं रखा था। शायद कोई तफ़्तीश हुई ही न हो। गाँधी की हत्या के षड्यंत्र के मामले में उच्च पदस्थ लोग इतने उदासीन हो चुके थे कि जैसे उन्हें गाँधी से कोई मतलब ही न हो। ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता का सुख भोगने के लिए, सब इस षड्यंत्र को अपने हिसाब से पूरा हो जाने देना ही चाहते थे। शीघ्र ही, एक ऐसी हत्या इतिहास में दर्ज़ हो जाने वाली थी, जिस पर उच्च सरकारी अधिकारियों के साथ पुलिस की भी मौन सहमति थी।

20 जनवरी की असफलता के बाद बागड़े और किस्तैया ने पूना तथा नाथूराम गोडसे और आप्टे ने बम्बई की ट्रेन पकड़ी। गोपाल गोडसे और करकरे ने फ्रंटियर होटल में रात गुज़ारी। इस असफलता से वे सभी निराश नहीं हुए थे बल्कि चारों तरफ़ फैली सुस्ती से अब गाँधी की हत्या के लिए पहले से कहीं अधिक दृढ़ थे।

महात्मा गाँधी और नाथूराम गोडसे

जल्द ही, पुनः योजना बनी पर हमेशा की तरह इस बार भी समस्या पिस्तौल की थी। क्योंकि गोपाल गोडसे द्वारा ठीक की गई बंदूकों का कोई भरोसा नहीं था। एक बार फिर पुरानी फिल्म जैसे चल पड़ी थी।

26 जनवरी 1948 की रात को थाने स्टेशन पर नाथूराम, आप्टे और करकरे मिले, जहाँ गोडसे ने पाहवा द्वारा उनके नाम उजागर कर देने की बात भी कही। उसके विचार में अब 9-10 के ग्रुप में चलने की मूल योजना ग़लत थी। अतः गोडसे अब बार-बार कहने लगा कि गाँधी की हत्या वही करेगा। लेकिन उसे किसी की मदद की भी ज़रूरत है। शायद इतने बड़े महामानव का सामना करने के लिए, नैतिक बल चाहता हो। यहीं पर, नाथूराम गोडसे ने इस योजना से अपने भाई गोपाल गोडसे को भी बाहर रखने का निर्णय लिया। इस प्रकार अब यही तीनों हत्या की योजना में शामिल थे।

योजना के अनुसार, नाथूराम और आप्टे हवाई जहाज़ से और करकरे को रेल से दिल्ली पहुँचकर 29 जनवरी को बिड़ला मंदिर में मिलना था।

नारायण आप्टे, नाथूराम गोडसे, मदन लाल पाहवा, विष्णु करकरे

षड्यंत्रकारियों ने अपने आप को छिपाने का कोई प्रयत्न नहीं किया था। हमेशा की तरह नाथूराम गोडसे अनगिनत लोगों से अपनी योजना की चर्चा कर रहा था। यहाँ तक कि बम्बई से दिल्ली की हवाई यात्रा के लिए उसने अपना नाम एन विनायकराव लिखवाया, उसका पूरा नाम था नाथूराम विनायक गोडसे। इसी प्रकार आप्टे ने डी नारायण के नाम से यात्रा की, उसका पूरा नाम था नारायण दत्तात्रेय आप्टे। कोई भी बुद्धिमान जासूस या अधिकारी उन्हें हवाई जहाज़ में ही आराम से पकड़ सकता था। पर पता नहीं क्यों, उस समय के महकमे को इसकी भनक नहीं लगी या पूरा महक़मा जान बूझकर मौन साधे रहा। ये भी इतिहास के गर्भ में छिपी सच्चाई ही है।

27 जनवरी को दिल्ली पहुँचकर, गोडसे और आप्टे दिल्ली-मद्रास एक्सप्रेस से रात 10.38 पर ग्वालियर पहुँचे। यहाँ से जगदीश प्रसाद गोयल से 500 रुपए में नई रिवॉल्वर और सात गोली ली। उसी रात रेल से ही वे दिल्ली वापस आ गए। रिवॉल्वर के लिए 400 किलोमीटर की यात्रा में भी किसी को भनक नहीं लगी। ये भी कमाल है। शायद ही कहीं कोई तफ़्तीश हुई या कार्यवाही की रूप रेखा बनी, जबकि घटना के विस्तार के साथ सूत्रों के स्रोत फैलते जा रहे थे।

यहाँ तक कि, दिल्ली आने पर विनायकराव के नाम से इस बार होटल न लेकर, रेलवे स्टेशन के सस्ते विश्राम गृह में रुकने का निर्णय लिया गया। हालाँकि उस दिन भी प्रार्थना सभा थी पर थके होने की वजह से हत्या की योजना अगले दिन के लिए टाल दी गई। शाम को, दिमाग की शांति के लिए करकरे और आप्टे सिनेमा देखने गए, गोडसे वहीं विश्राम गृह में ही एक क़िताब पढ़ता रहा।

30 जनवरी को गोडसे जल्दी तैयार हो गया था। जंगल में जाकर गोडसे ने रिवॉल्वर का परीक्षण भी किया। सुबह से ही वह किसी से ज़्यादा बात नहीं कर रहा था। दोपहर तक गोडसे ख़ुद में सिमट गया था।

शाम को 4.30 बजे गोडसे ने ताँगा लिया और अकेले ही बिड़ला हॉउस पहुँच कर प्रार्थना सभा की भीड़ में शामिल हो गया। कुछ देर बाद करकरे और आप्टे भी वहाँ पहुँचकर भीड़ में शामिल हो गए।

शाम 5.15 पर गाँधी जी आभा और मनुबेन के कन्धों पर हाथ रखे बिड़ला हाउस से प्रार्थना सभा के लिए आए। रोज़ उनका रास्ता साफ़ करने वाला गुरुवचन आज पीछे आ रहा रहा था क्योंकि पटेल से मुलाकात के कारण थोड़ी देर होने की वजह से गाँधी जी मैदान के बीच से तेजी से आ गए थे।

गाँधी जब प्रार्थना स्थल की सीढियाँ चढ़ रहे थे, तब गुरुवचन को देखकर मुस्करा रहे थे। सीढ़ियाँ चढ़कर कुछ ही कदम चले होंगे कि नाथूराम गोडसे भीड़ से निकलकर उनके सामने आ गया। उसने मनुबेन को इतनी जोर से धक्का दिया कि वह ज़मीन पर गिर पड़ी और गोडसे ने बिलकुल निकट से तीन गोलियाँ गाँधी पर दाग दीं। तभी दौड़ कर रॉयल इंडियन एयरफ़ोर्स का सार्जेंट देवराज सिंह ने एक हाथ से गोडसे की कलाई पीछे मोड़ते हुए दूसरे हाथ से उसके मुँह पर घूँसों की बरसात कर दी।

थोड़ी देर में वहां इकट्ठे कई लोग गोडसे को पीटने लगे। प्रार्थना स्थल पर अफरा-तफ़री मच गई। जब तक लोग कुछ समझ पाते, तब तक गाँधी जी दम तोड़ चुके थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार गाँधी जी अंतिम शब्द ‘हे राम’ नहीं थे। आघात इतना तेज़ और अचानक था कि उन्हें कुछ सोचने-समझने का अवसर ही नहीं मिला।

महात्मा गाँधी का अंतिम दर्शन

वहाँ डर, सिसकियों और उसे मार डालो की चीख़ के बीच लहूलुहान गोडसे को ले जाते हुए भी किसी ने नहीं देखा। दस मिनट तक भीड़ दुःख के आवेग में डूबी रही, लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि करना क्या है? जहाँ गाँधी गिरे थे, अब भी वहीं थे। उनका सर आभा और मनुबेन की गोद में था और उनकी चादर पर निरंतर खून फैलता जा रहा था। अंततः उन्हें बिड़ला हॉउस के भीतर ले जाया गया।

जहाँ गाँधी का शरीर धराशाई हुआ था, वहाँ लोगों के बार-बार आने-जाने से एक फ़ीट गड्ढा हो गया था। थोड़ी ही देर में पुलिस वाले छानबीन के लिए पहुँच चुके थे। घास से दो गोलियाँ तत्काल बरामद हुई थी, तीसरी उनके सीने में फँसी रह गई थी।

कुछ ही दिनों के भीतर सारे षड्यंत्रकारियों को गिरफ़्तार कर लिया गया था। बागड़े को अगले दिन, गोपाल गोडसे और परचुरे को चार दिन बाद व किस्तैया को 14 फ़रवरी को गिरफ़्तार कर लिया गया। 11 अप्रैल को जगदीश प्रसाद गोयल को भी गिरफ़्तार कर लिया गया पर कुछ कारणों से उस पर अन्य क़ैदियों के साथ मुक़दमा नहीं चलाया गया।

कभी-कभी सोचता हूँ, काश पुलिस थोड़ी पहले हरक़त में आई होती तो क्या आज हम जिस भारत में साँस ले रहे हैं, उसकी तस्वीर ऐसी ही होती! मालूम नहीं, गाँधी नहीं रहे पर आज भी उनका जीवन निष्कलंक तो नहीं कहा जा सकता फिर भी अनुभूत सच का पक्षधर ज़रूर है। आज भी गाँधी जैसा व्यक्तित्व इस मुखौटा प्रधान छद्म समाज में शायद ही मिले। गाँधी सत्य की अनुभूति के लिए उसे प्रयोगों की कसौटी पर कसने की जो सीख दे गए हैं, वो आने वाली पीढ़ियों का सदैव मार्गदर्शन करती रहेंगी।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की स्मृति को ऑपइंडिया की तरफ़ से कोटिशः प्रणाम!

के के मुहम्मद को पद्मश्री: अयोध्या के गुनहगारों के मुँह पर ज़ोरदार तमाचा

अयोध्या केवल कुछ एकड़ ज़मीन के मालिकाना हक़ का मसला नहीं है। यह हज़ारों वर्षों से चली आ रही शाश्वत सनातनी परंपरा पर कुठाराघात का सोचा समझा षड्यंत्र था। श्रीराम केवल एक अवतारी देवता ही नहीं बल्कि भारत के लोक में रचे-बसे एक ऐसे तंत्र के संवाहक हैं जिसका शास्त्र पुस्तकीय कम लौकिक अधिक है। विश्वभर में बने अनगिनत राम मंदिर इसी लोकशास्त्र की भक्तिमय परिकल्पना को साकार करते हैं जो प्रभु को मूर्तरूप में निहारना और पूजना चाहती है।

प्रश्न किया जाता है कि जब देशभर में इतने राम मंदिर हैं तब अयोध्या के लिए ही लड़ाई क्यों लड़ी जा रही है। हालाँकि यह प्रश्न पूछने वालों में इतनी हिम्मत नहीं कि सुन्नी वक्फ़ बोर्ड से यही सवाल कर सकें। बहरहाल, यह लोकाचार ही है कि आज भी किसी से भेंट होने पर पूछा जाता है कि रहने वाले कहाँ के हो। मूल निवास पूछने पर उस व्यक्ति का चाल, चरित्र, आचार, विचार सब पता चल जाता है।

मूलनिवास या जन्मस्थान किसी व्यक्ति का आत्मीय गौरव होता है क्योंकि उससे उसकी पहचान जुड़ी होती है। हज़ारों वर्षों तक मध्य भारत के वनवासियों ने अपनी ज़मीन नहीं छोड़ी थी क्योंकि वह उनकी मातृभूमि थी। इसके उल्लेख मिलते हैं कि मौर्यकाल में भी राजा उन वनवासियों की भूमि पर ज़बरन कब्जा नहीं करता था।  

अयोध्या भी भगवान रामलला विराजमान की मातृभूमि है और उसपर ज़बरन हक जताने का अधिकार किसी को नहीं था। लेकिन मीर बकी ने रामजन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़ा और उस पर एक ऐसा ढाँचा खड़ा किया जिसके कारण सदियों तक रामलला को अपमान सहना पड़ा। इतिहास में यह पहला केस है जहाँ भगवान को अपनी जन्मभूमि वापस लेने की लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

यह लड़ाई केवल क़ानूनी लड़ाई नहीं है, यह नैरेटिव बिल्डिंग की लड़ाई है। सही को गलत साबित करने वालों के विरुद्ध खड़े हुए सही को सही कहने वालों की लड़ाई है। अयोध्या को कम्युनल विवाद बताना एक समुदाय विशेष को सनातनी परंपराओं के विरुद्ध भड़काने का षड्यंत्र था जिसके दोषी तथाकथित विख्यात इतिहासकार थे।

उनके ज़रिये ऐसा नैरेटिव जानबूझकर गढ़ा गया था ताकि समुदाय विशेष की भावनाएँ आहत हों और हिंसात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। इस षड्यंत्र की पोल खोलती है पुरातत्वविद के के मुहम्मद की पुस्तक “मैं हूँ भारतीय”।

के के मुहम्मद ने अपनी पुस्तक में जिस साफ़गोई से बातें कहीं हैं उसकी मिसाल मिलना दुर्लभ है। मुहम्मद ने मिथ्या अवधारणा निर्मित करने में वामपंथी इतिहासकारों के साथ मीडिया के एक वर्ग की मिलीभगत को भी रेखांकित किया है। उस समय मुहम्मद प्रोफेसर बी बी लाल के नेतृत्व में अयोध्या में उत्खनन टीम के सदस्य थे।

उन्होंने लिखा है कि 1992 में विवादित ढाँचा गिराए जाने से पहले सन 1976-77 में उन्होंने अयोध्या में उत्खनन के दौरान विवादित ढाँचे की दीवारों में मंदिर के स्तंभ देखे थे। उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थर से हुआ था और उनके निचले भाग में 11वीं-12वीं शताब्दी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। ज्ञातव्य है कि मंदिर निर्माण कला में पूर्ण कलश आठ ऐश्वर्य चिन्हों में से एक होते हैं।

विवादित ढाँचा गिराए जाने से पूर्व ऐसे एक-दो नहीं बल्कि 14 स्तंभों को के के मुहम्मद की टीम ने प्रत्यक्ष देखा था। जिन पत्थरों से इन स्तंभों का निर्माण किया गया था उसी प्रकार के स्तंभ और उसके नीचे के भाग में ईंट का चबूतरा विवादित ढाँचे की बगल में और पीछे के भाग में उत्खनन करने से प्राप्त हुआ था। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर मुहम्मद ने दिसंबर 15, 1990 को यह बयान दिया था कि विवादित ढाँचे के नीचे कभी मंदिर था।

के के मुहम्मद लिखते हैं कि उस समय कुछ मुस्लिम नरमवादी विवादित ढाँचा हिन्दुओं को देकर समस्या का समाधान निकालना चाहते थे परंतु इसे खुलकर कहने की हिम्मत किसी में नहीं थी। कोढ़ में खाज तब उत्पन्न हुआ जब उग्रपंथी मुस्लिम गुट की सहायता करने के लिए कुछ वामपंथी इतिहासकार सामने आए और उन्होंने कथित ‘बाबरी मस्जिद’ के ऊपर दावा न छोड़ने का उपदेश दिया। मुहम्मद ने बड़ी बेबाकी उन इतिहासकारों का नाम भी लिया है जिन्होंने अयोध्या को ‘बौद्ध’ और ‘जैन’ मत का केंद्र साबित करने का प्रयास किया।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रोमिला थापर और बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने ‘रामायण’ के ऐतिहासिक तथ्यों पर सवाल खड़े कर दिए और झूठ बोला कि 19वीं शताब्दी के पहले मंदिर तोड़ने के प्रमाण नहीं हैं। आर एस शर्मा, अनवर अली, द्विजेन्द्र नारायण झा और इरफ़ान हबीब जैसे इतिहासकारों ने इस षड्यंत्र में उनका साथ दिया।

मजे की बात यह कि इस मंडली में केवल सूरजभान ही पुरातत्वविद थे बाकी सब प्रोफेसर इतिहासकार थे। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि इतिहासकार अपना अधिकतर मत शोध प्रबंधों और पुस्तकों के आधार पर प्रकट करता है उसे फील्ड में जाकर उत्खनन करने का प्रशिक्षण नहीं मिलता। इसलिए उत्खनन से मिलने वाले साक्ष्यों पर एक इतिहासकार के मत से अधिक प्रामाणिक पुरातत्वविद का मत समझा जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त अकादमिक जगत के व्यक्ति को एक विशेषज्ञ के रूप में अपना मत प्रकट करते हुए निष्पक्ष होकर सच्चाई का साथ देना चाहिए। लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने मजहबी उन्माद को बढ़ावा देने का काम किया। अयोध्या मसले पर उन्होंने न्यायालय तक में झूठ बोला था। आर एस शर्मा के साथ रहे कई इतिहासकारों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के विशेषज्ञों के रूप में काम किया था।  

के के मुहम्मद लिखते हैं कि बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी की कई बैठकें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष इरफ़ान हबीब की अध्यक्षता में हुई थीं। बाबरी कमेटी की बैठक ICHR के कार्यालय में होने का विरोध भी किया गया था लेकिन इरफ़ान हबीब नहीं माने। वामपंथी इतिहासकार और उनका समर्थन करने वाले टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे मीडिया ने समझौते के पक्ष में रहे मुस्लिम बुद्धिजीवियों को अपने उदार विचार छोड़ने की प्रेरणा दी। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने वामपंथियों के लेख धड़ल्ले से छापे जिसके कारण बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी को संबल मिला।

इसी कारण विवादित ढाँचे को हिन्दुओं को देकर समस्या के समाधान के लिए सोच रहे साधारण मुस्लिमों की सोच में परिवर्तन हुआ और उन्होंने विवादित ढाँचा हिन्दुओं को न देने की दिशा में सोचना प्रारंभ कर दिया। मुहम्मद के अनुसार पंथनिरपेक्ष होकर समस्या को देखने की अपेक्षा वामपंथियों की बाईं आँख से अयोध्या मसले का विश्लेषण करके टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार ने बड़ा अपराध किया।

मुहम्मद द्वारा लिखे इस विवरण से पता चलता है कि पढ़े लिखे अकादमिक और पत्रकारिता जगत के मध्य गठजोड़ हो जाए तो वे किस प्रकार ‘फॉल्स नैरेटिव’ गढ़कर देश के दो समुदायों के बीच तनाव पैदा कर सकते हैं। विवादित ढाँचा गिराए जाने के बाद प्राप्त हुए पुरातत्व अवशेषों में से एक है विष्णु हरिशिला पटल।

इसमें 11वीं-12वीं शताब्दी की नागरी लिपि में संस्कृत में लिखा गया है कि यह मंदिर बाली और रावण को मारने वाले विष्णु को समर्पित किया जाता है। ध्यान रहे कि श्रीराम विष्णु के अवतार हैं इससे यह स्पष्ट होता है कि वह मंदिर श्रीराम का ही था जो बाबर के सिपहसालार मीर बकी ने तोड़ा था।

वर्ष 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के निर्देशानुसार किए गए उत्खनन में मंदिर के 50 स्तंभों के नीचे के भाग में ईंट से बना चबूतरा मिला था। उत्तर प्रदेश भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक डॉ राकेश तिवारी द्वारा समर्पित रिपोर्ट में बताया गया है कि विवादित ढाँचे के आगे के भाग को समतल करते समय मंदिर से जुड़े हुए 263 पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए थे। के के मुहम्मद हमें यह भी बताते हैं कि उत्खनन को निष्पक्ष रखने के लिए कुल 137 श्रमिकों में से 52 मुस्लिम समुदाय से लिए गए थे।

इतनी निष्पक्ष जाँच को मज़हबी रंग देने का काम वामपंथी इतिहासकारों ने किया था। उत्खनन में प्राप्त साक्ष्यों और उच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद वामपंथियों ने अपना सुर आजतक नहीं बदला। वे आज भी अयोध्या में रामजन्मभूमि पर अनर्गल प्रलाप करते हुए कट्टर मज़हबी ताकतों को बल प्रदान करते रहते हैं। विगत 26 वर्षों में इनका बनाया फॉल्स नैरेटिव अब पाठ्यपुस्तकों और कोर्स में दाख़िल हो चुका है।

रामजन्मभूमि मसले को राजनीतिशास्त्र की पुस्तकों में एक ‘सांप्रदायिक’ मामला लिखा जाता है। सरकारी अधिकारियों से लेकर रणनीतिक चिंतक तक समाज के प्रत्येक बुद्धिजीवी वर्ग ने भगवान राम के नाम को कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। भारत के वामपंथी इतिहासकारों का यह नैरेटिव नोम चोम्स्की द्वारा प्रतिपादित ‘मैन्युफैक्चरिंग कन्सेंट’ के विचार का एक क्लासिक केस है। दुखद बात यह है अभी तक हम इस नैरेटिव के ख़तरे से अनभिज्ञ हैं।

बहरहाल, के के मुहम्मद को पद्म सम्मान मिलने से इस नैरेटिव में परिवर्तन की आशा जगी है। मुहम्मद को पद्म श्री अलंकरण दिए जाने से वामपंथी गिरोह के मुँहपर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ा गया है।        

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत लेख में दी गई सभी सूचनाएँ श्री के के मुहम्मद की पुस्तक ‘मैं हूँ भारतीय’ से ली गई हैं।

शशि थरूर ने एक ट्वीट से करोड़ों हिन्दू श्रद्धालुओं को ‘नंगा’ और ‘पापी’ कहा, लेकिन नंगा हुआ कौन?

शशि थरूर एक अच्छे वक्ता, बेहतर लेखक, बढ़िया डिप्लोमैट और हमारे दौर के खूबसूरत विचारक हुआ करते थे। फिर इनको एक दिन कुत्ते ने काटा और कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए। उसके बाद से पारिवारिक उद्यम और उसके कूड़ेदानों को सँभालने में इनकी अंतड़ियाँ निकल गईं और स्थिति यह है कि पढ़ा-लिखा आदमी गंगास्नान को ‘हमाम में नंगे’ होने से तौल रहा है।

एक ट्वीट आया है। बड़े आदमी हैं तो ट्वीट कर देते हैं, और फिर नीचे जो सवाल आते हैं उसका जवाब नहीं देते। ट्वीट में इन्होंने बड़ी ही संजीदगी से लिखा है, “गंगा भी स्वच्छ रखनी है और पाप भी यहीं धोने हैं। इस संगम में सब नंगे हैं! जय गंगा मैया की!”

‘जय गंगा मैया’ तो बोलना ज़रूरी है ही क्योंकि सुनंदा पुष्कर की आत्मा की शांति के लिए शशि ब्रो हरिद्वार के गंगा तट पर ही गए थे। संतों के स्नान से तो शरीर का मैल ही शायद गंगा माँ में मिले, लेकिन आपके मन का मैल, सुनंदा पुष्कर की अस्थियों और राख के साथ जो गंगा में मिला, उससे गंगा कितनी मैली हुई, ये कभी सोचा है?

जब शशि थरूर अपनी तृतीय पत्नी सुनंदा पुष्कर की राख हरिद्वार में प्रवाहित करने गए थे

धूर्त आदमी कम शब्दों में बहुत कुछ कह देता है। शब्दों की समझ हो तो आप दो तरह की बात, कन्विन्सिंग तरीके से रख सकते हैं। यहाँ शशि थरूर ने ‘नमामि गंगे योजना’, ‘कुम्भ मेला’, ‘हिन्दुओं की नदी को लेकर आस्था’, ‘संतों समाज को पापी’ कहते हुए, सिर्फ़ एक ट्वीट में सब लपेटकर सरकार की नीतियों और हिन्दुओं के तमाम प्रतीकों पर बहुत कम शब्दों में हमला किया है।

हो न हो, कल तक इनका यह ट्वीट भी आ जाए कि ‘मेरा वो मतलब नहीं था’, क्योंकि इनके एक्सिडेंटल हिन्दू के परनाती मालिक साल भर में जनेऊ पहनने से लेकर अवतार पुरुष बनकर पोस्टरों पर अवतरित हो रहे हैं। राष्ट्रीय किसान की धर्मपत्नी और कॉन्ग्रेस की अंतिम आस, प्रियंका भी ‘गंगा की बेटी’ बनकर कुम्भ में चार फ़रवरी को आ ही रही हैं। देखना यह है कि शब्दों से लैस थरूर जी ये न ट्वीट कर दें – ‘नंगे संतों के पाप से गंदी गंगा को गंगापुत्री प्रियंका ने छूकर किया निर्मल’।

गंगा की बेटी बनकर थरूर के पार्टी की प्रियंका गाँधी कुम्भ नहाने (यानी पाप धोने) आ सकती हैं

शशि थरूर जी, आपका जो भी मतलब है, वो जनता तय कर देगी। जनता तो नेहरू की ‘कुम्भ में डुबकी’ का सच भी निकाल चुकी है, और आपके अस्थि विसर्जन की तस्वीर भी। बाक़ी का काम सुब्रह्मण्यम स्वामी कर ही रहे हैं, इसलिए पाप और पुण्य की बातें आप तो मत ही कीजिए। 

ट्वीट पर ग़ौर किया जाए तो आप देखेंगे कि एक कॉन्ग्रेसी अनजाने में ही ‘नमामि गंगे’ की सफलता को स्वीकार रहा है। लेकिन ये स्वीकार्यता ऐसे ही नहीं आई है, क्योंकि सामने का पानी निर्मल है, और वो दिख रहा है। इस निर्मल पानी के पीछे साढ़े चार साल की वो मेहनत है, जो सीधे तौर पर कभी दिखी नहीं। पानी को गंदा करने वाले स्रोतों (गंदे, बड़े नाले) को रोकने, उसके कचरे को ट्रीटमेंट प्लांट में ट्रीट करने, रीसायकल्ड और रीचार्ज्ड पानी को गंगा में बहाने तक की प्रक्रिया में काफ़ी समय लगा। 

समय लगा, पर उसका फल सीधा दिख रहा है। जब फल दिख रहा हो, तो ‘मुझे माँ गंगा ने बुलाया है’ वाले मीम बनाने से लेकर ‘राम तेरी गंगा मैली’ का रट लगानेवालों के पास इसपर अटैक करने के लिए कुछ बचा ही नहीं है। अब वो यह नहीं कह सकते कि संतों को गंदगी में नहाना पड़ा रहा है, क्योंकि वो कॉन्ग्रेस के दौर में हुआ करता था।

वो इसलिए हुआ करता था क्योंकि कॉन्ग्रेस, राहुल गाँधी के जनेऊ पहनने और डिस्कवरी ऑफ़ गोत्र करने से पहले, हिन्दुओं को ‘काशी का अस्सी’ की भाषा में वहाँ रखा करती थी जो लिखा नहीं जा सकता। इसलिए कभी नदियों को साफ नहीं किया गया क्योंकि न तो नदियाँ वोट देती हैं, न ही नदी में नहाने वाले इनको वोट देते हैं। कम से कम, गंगा की उपेक्षा से तो यही लगता है कि इन्होंने तय तरीके से यमुना की तरह गंगा को भी मृतप्राय बनाने की पूरी कोशिश की थी। 

इसलिए थरूर साहब ने नैरेटिव बदल दिया है। ये मान लिया है कि गंगा साफ़ हो रही है, और वो नहाने से गंदी हो जाएगी। थरूर ब्रो, ऐसा है कि ‘जा की रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखहिं तिन तैसी’। ये दोहा लैटिन में है, और आपको ज़रूर समझ में आएगा। इसका अंग्रेज़ी इक्वीवेलेंट लाने की कोशिश करें तो एक सकारात्मक कहावत याद आती है कि ‘ब्यूटी लाइज़ इन द आईज़ ऑफ़ बिहोल्डर’। आप तो पढ़े-लिखे आदमी है, इसका नकारात्मक भाव तो मन में समझ ही जाएँगे! 

गंगा पापनाशिनी ज़रूर है, लेकिन ऐसा भी नहीं कि संतों के उतरने से वो गंदी हो जाती है। संत पापी नहीं होते, आप और हम (मैं आप से थोड़ा कम) पापी हैं। जो पापी हैं, चाहे बाबा हों या नेता, वो भुगत रहे हैं, आप भी भुगतेंगे। दूसरी बात, गंगा पापों को हरती है, वो गंदी नहीं होती। कॉन्सेप्ट आपके थोड़े हिले हुए हैं, उसको पेंचकश से ठीक करा लीजिए। गंगा में पाप धोने से हम साफ़ होते हैं, गंगा गंदी नहीं होती।

आगे आपने कुम्भ और संगम को निशाना बनाते हुए लिखा है कि ‘इस संगम में सब नंगे हैं’। क्यूट टाइप की स्माइल वाली प्रोफाइल पिक लगाकर ऊर्दू के मुहावरे में हिन्दू प्रतीक घुसा देने से आपका ज्ञान नहीं, आपकी धूर्तता सामने आती है। संगम में सब नंगे नहीं हैं, संगम साफ़ है, और वहाँ गंगा निर्बाध, अविरल रूप से बह रही है। वो हम्माम नहीं है जहाँ आप राहुल के शरीर का मैल अपने ऊपर लिए मुस्कुरा रहे हैं कि ‘राहुल जी, थोड़ा और छुड़ा कर इधर फेंकिए ना!‘ 

संगम में जाना सौभाग्य है। संगम का तो स्मरण करने भर से व्यक्ति के पाप धुल जाते हैं। लेकिन आपको वो सुविधा नहीं मिलेगी क्योंकि पाप धुलवाने की भी पात्रता होती है। काशी में आने भर से मोक्ष प्राप्त हो जाता है, लेकिन सबको नहीं, उसी को जो उस लायक है। इसलिए, आप लम्बी डींगे मार लीजिए, आपको स्वामी जी समेट लेंगे, और न्यायिक व्यवस्था समेट लेगी। अगर व्यवस्था को आपने मैनेज कर लिया, तो भी हरिद्वार की गंगा आपके पापों का बदला ज़रूर लेगी। 

जब गंगा साफ़ दिख रही है तो हिन्दुओं की आस्था पर आक्रमण किया जा रहा है। अब संत में पाप दिख रहा है। संत जिस धर्म के प्रतीक हैं, उसे ‘नंगा’ कहा जा रहा है। क्योंकि यही धर्म है जहाँ यह कहने और सुनने की गुंजाइश है। वरना मज़हब तो ऐसे भी हैं जो झंडे पर नाम लिखकर, अपनी बातों के अलग कुछ भी कहने, लिखने या बनाने पर तलवार, बम और बंदूक लेकर उतर जाते हैं।

शशि जी ख़ैर मनाइए कि आपने संगम जैसे तीर्थ और हिन्दू धर्म जैसे धर्म के संतों का अपमान किया है। यहाँ यह सब कहने की भी छूट है, ये बात अलग है कि वो हिसाब आपसे ऊपर लिया जाएगा, न कि एके सैंतालीस लेकर यहीं ले लिया जाए, जैसा कि कुछ रिलिजन में प्रैस्क्राइब्ड है! 

अपना इतिहास खँगालिए, अपनी पार्टी का इतिहास खँगालिए। अपने नेताओं के नंगे देह देखिए जब वो गंगा में उतर रहे हों। जब नेता यह सब करते हैं, तब आप पाप की बात करें तो चलता भी है क्योंकि वो आपकी प्रजाति के हैं, तो शायद आप उन्हें बेहतर जानते होंगे। 

पिता की राख प्रवाहित करने के बाद जवाहरलाल नेहरू गंगा से बाहर आते हुए

लेकिन, संतों को, और उनके नाम पर करोड़ों श्रद्धालुओं को आपने ‘नंगा’ और ‘पापी’ कहा है। शब्द की समझ तो आपको है ही, इसलिए आप जान-बूझकर, सोच-समझकर ट्वीट करते होंगे कि कम कहकर कैसे माखौल किया जाए। आपने बहुत कुछ कहने की कोशिश की है जो कि आपकी बेकार मानसिकता, टार से भरे दिमाग और कुत्सित सोच का परिचायक है। 

यही ‘नंगे’ और ‘पापी’ लोग आपकी पार्टी को, आपकी निजी ज़िंदगी को और आपको डिफ़ेंड करनेवालों को जवाब देंगे। ट्विटर पर अंग्रेज़ी लिखकर आप ज्ञान नहीं दे रहे, आप बस दूसरों को नंगा कहते हुए अपना ही नाड़ा कटवा रहे हैं। बाक़ी, ‘गंगा मैया की जय’ कहने से भी आपके पाप तो नहीं धुलनेवाले। 

‘द प्रिंट’ का नया फ़र्ज़ीवाड़ा: ऐसी कोई ‘IB रिपोर्ट’ मौजूद नहीं है, जो संस्थानों के मोदी-विरोधी होने की बात करती हो

‘द प्रिंट’ ने जनवरी 28, 2019 को एक ‘कहानी’ प्रकाशित की, जिसमें दावा किया गया कि मोदी सरकार के पास IB (इन्फ़ॉर्मेशन ब्यूरो) की एक ‘नोट’ आई जिसमें कई निजी विश्वविद्यालयों को ‘मोदी विरोधी’ लोगों द्वारा संचालित होने के कारण ‘उत्कृष्ट संस्थान’ यानि ‘इंस्टीट्यूट ऑफ़ एमिनेंस’ (IoE) का दर्जा देने से मना करने का प्रस्ताव है।

रिपोर्ट के अनुसार, इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) ने कहा है कि विश्वविद्यालयों से जुड़े व्यक्ति नरेंद्र मोदी और भाजपा के आलोचक हैं। ‘द प्रिंट’ का कहना है कि IB ने पिछले महीने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट भेजी थी। रिपोर्ट में अशोक विश्वविद्यालय, KREA विश्वविद्यालय और अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय को IB द्वारा ‘रेड फ्लैग्ड’ संस्थानों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय के शिक्षा सचिव के अनुसार, उन विश्वविद्यालयों की कोई भी IB रिपोर्ट मंत्रालय को प्राप्त नहीं हुई है। ‘द प्रिंट’ की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए आर सुब्रह्मण्यम, जो मंत्रालय में उच्च शिक्षा सचिव हैं, ने ट्वीट किया कि उनके विभाग को IB से ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं मिली है, और इस वजह से यह रिपोर्ट सही नहीं है। सुब्रह्मण्यम ने यह भी बताया कि यूजीसी अधिक विश्वविद्यालयों को आईओई (IoE) दर्जा देने से संबंधित मामला उठाएगा।

गौरतलब है कि IB द्वारा ‘रेड-फ्लैग्ड’ विश्वविद्यालयों को वास्तव में Empowered Expert Committee (EEC) की सिफारिशों में शामिल किया गया है, ताकि उन्हें यहाँ दर्जा प्रदान किया जा सके।

EEC का गठन मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संस्थानों का चयन करने के लिए किया गया है। आज (जनवरी 29, 2019) समिति ने सुझाव दिया कि 20 के वर्तमान प्रस्ताव से बढ़ाकर IoE की संख्या 30 की जानी चाहिए।

इसके अलावा, समिति ने दिसंबर में IoE दर्जा देने के लिए 19 संस्थानों की एक सूची प्रस्तुत की थी और इस सूची में अशोक विश्वविद्यालय, KREA विश्वविद्यालय और अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय शामिल थे, जिनके ख़िलाफ़ ‘द प्रिंट’ के अनुसार ‘नकारात्मक’ IB रिपोर्ट हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय पहले ही यूजीसी के पास नाम प्रस्तुत कर चुका है, और यह मामला यूजीसी के पास लंबित है। इस पर विरोधाभास यह है कि यदि सरकार इन संस्थानों को दर्जा देने में हिचकिचा रही होती, तो वे यूजीसी द्वारा जारी सूची में नाम शामिल ही नहीं करते।

इससे पहले, EEC ने IoE दर्जे के लिए 11 नामों की सिफ़ारिश की थी, जिनमें से 6 को आख़िरकार IoE दर्जा दिया गया था। अब समिति का सुझाव है कि पहले की सूची से बचे हुए 5 एवं, इनके अतिरिक्त 19 अन्य संस्थानों को दर्जा दिया जाना चाहिए। इस हिसाब से ऐसे संस्थानों की कुल संख्या 30 हो जाएगी।

यह साबित करता है कि ‘द प्रिंट’ की रिपोर्ट गलत है और मंत्रालय में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पास ऐसी कोई IB रिपोर्ट नहीं है। ‘द प्रिंट’ एक आदतन प्रोपेगंडा-परस्त और फ़र्ज़ी ख़बर फैलाने वाला पोर्टल मात्र है, जो नियमित रूप से काल्पनिक कहानियाँ प्रकाशित करता रहता है।

सम्बंधित अधिकारी द्वारा उनकी कहानियों को पूरी तरह से ख़ारिज़ कर दिए जाने के बाद भी ‘द प्रिंट’ कहानी को वापस लेने के बजाए स्पष्टीकरण के साथ कहानी को अपडेट करते हैं। इस गिरोह के द्वारा गढ़ी कहानियों के अक्सर ऐसे स्रोत होते हैं जिनका कोई वास्तविक प्रमाण नहीं होता है।

हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के पोस्टर में शाह फ़ैसल को समर्थन न देने की अपील

आईएएस की नौकरी छोड़कर राजनीति में आने का सपना देखने वाले शाह फ़ैसल जल्द-कश्मीर में अपनी नई पार्टी की लॉन्चिंग करने वाले हैं। इसी बीच कुख़्यात आतंकी संगठन हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का एक पोस्टर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। पोस्टर में लोगों से कहा गया है कि वह फ़ैसल का समर्थन नहीं करें। हिज़्बुल मुजाहिद्दीन से जुड़े संगठन का कहना है कि फ़ैसल के आने से राजनीति में उसका मूवमेंट कमज़ोर पड़ेगा। हालाँकि, पुलिस ने अभी तक इस पोस्टर की पुष्टि नहीं की है।  

पोस्टर में कहा गया है, ”भारत ने चुनाव को क़ामयाब बनाने के लिए बहुत ही तेज़ चाल चली है और उन्होंने शाह फ़ैसले को चारा बना लिया है। हम पूरी कौम से अपील करते हैं कि चुनाव में वोट हरगिज़ नहीं डालें, क्योंकि ये भारत की चाल है। जब शाह फ़ैसल को वोट पड़ेंगे तो ये भारत बोलेगा कि पूरा कश्मीर हमारे साथ है।”

9 जनवरी को शाह फ़ैसल ने दिया था पद से इस्तीफ़ा

बता दें कि बीते 9 जनवरी को शाह फ़ैसल ने IAS के पद से इस्तीफ़ा दिया था और राजनीतिक पार्टी लॉन्च करने के लिए लोगों से सुझाव माँगे थे। फ़ैसल ने कहा था, “मेरे पास आइडिया है कि मुझे क्या करना चाहिए, लेकिन मैं अंतिम निर्णय लेने से पहले लोगों के विचार जानना चाहता हूँ।” बता दें कि यह वही फ़ैसल हैं जिन्होंने 2009 की सिविल सेवा सर्विस परीक्षा में भारत में पहला रैंक हासिल किया था।

‘उरी’ से हमारी जली, ‘मणिकर्णिका’ से हुए धुआँ-धुआँ: कट्टर वामपंथी गिरोह एवं एकता मंच

मित्रो! सिनेमाघरों में धपाधप सुपरहिट होती फिल्मों ने नींदें उड़ा रखी हैं। आप बिलकुल सही समझे कि किसकी नींद की यहाँ बात होने जा रही है। सर से पाँव तक प्रोपेगैंडा बनाने में जुटे हुए तमाम मीडिया हाउस कह रहे हैं कि बॉलीवुड की फ़िल्मों में प्रोपेगैंडा चल रहा है। हालात ये हैं कि हर सामान्य-सी बात को भी प्रोपेगैंडा घोषित कर देना इन गिरोहों का प्रोपेगैंडा बन चुका है। ‘उरी’ और ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ के बाद आजकल एक और फ़िल्म की वजह से ‘उधर’ फिल्म समीक्षकों में धुँआ उठा हुआ है, और ये है, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई पर बनी फ़िल्म ‘मणिकर्णिका’।

‘द प्रिंट’ नामक गिरोह की एक हेडलाइन के अनुसार, “Kangana Ranaut in Manikarnika is the perfect Bharat Mata for Modi’s India” जिसका मतलब है कि ‘मणिकर्णिका फ़िल्म वाली कंगना रनौत मोदी के इंडिया के लिए परफ़ेक्ट भारत माता है’। इस शीर्षक के अंतर्गत लिखा गया है कि ‘अगर कंगना रनौत के संवादों को थोड़ा-सा बदल दिया जाए तो आपको लगेगा कि ये देश का प्रधान सेवक मोदी, शहज़ादे राहुल गाँधी से कह रहा है।’ तो भैया, इन्हें मोदी अब सपने में भी आने लगे हैं, और शायद दहशत का माहौल ये है कि जहाँ वो अब नहीं भी होते हैं, वहाँ महसूस कर लेने की अद्भुत क्षमता वामी गिरोहों ने विकसित कर डाली है।

वहीं ‘इंडियन एक्सप्रेस’ का अपने एक लेख में कहना है कि ‘Should We Declare 2019 The Year Of Patriotic Urf Propaganda Films?’ यानि ‘क्या हमें 2019 को देशभक्ति अर्थात प्रोपैगैंडा फ़िल्म का साल घोषित कर देना चाहिए?’ देखा जाए तो ये हेडलाइन अपने आप में ही सब सवालों का उत्तर है। जिन गिरोहों को देशभक्ति और प्रोपेगैंडा में फ़र्क़ महसूस नहीं हो पाता है, वही लोग कुछ दिनों में शिकायत करते मिलते हैं कि देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है।

आख़िर फ़िल्मों का यह साल ‘प्रोपैगैंडा का साल’ किन वजहों से है ?

सर्जिकल स्ट्राइक की घटना पर बनी ‘उरी’ फ़िल्म के बाद इस माओवंशी कामपंथी गिरोह से प्रतिक्रिया आई थी कि यह ‘हायपर नेशनलिज़्म’ से प्रेरित फ़िल्म है। वहीं, ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फ़िल्म के वक़्त तो बवाल ही मच गया था, कारण एक ही था, जिस परिवार की गुलामी करते हुए ये लोग अब तक जीवनयापन कर रहे थे, उस का बस एक चिठ्ठा खोल देने वाली यह फ़िल्म दर्शकों में चर्चा का विषय बन गई। अगर सच्चाई को दिखाना प्रोपेगैंडा और देशभक्ति है तो सवाल उठता है कि इस ‘सत्यशोधक’ गिरोह को सच देख और सुनकर इतनी आपत्ति और छटपटाहट क्यों होती है?

इस गिरोह को इतने वर्षों तक फ़िल्मों से आपत्ति न होने का कारण था कि सिनेमा एक निर्धारित पैटर्न पर अब तक काम करता आया था। इस निर्धारित पैटर्न में होता यह था कि सच्चा मुस्लिम हमेशा दोस्ती के लिए जान देने तक को तैयार दिखाया जाता था। ब्राह्मण और मंदिर के पुजारी को किसी भी तरह से व्यभिचारी दिखाया जाता था। बनिया को हेरफ़ेर करने वाला दिखाया जाता रहा था। तब तक भी इस गिरोह को कभी समस्या नहीं हुई थी। हम देखते हैं कि यही फ़िल्में समाज में, इन वर्गों के लिए इसी तरह का नज़रिया तैयार करने में सफ़ल भी रही हैं। लेकिन आपत्ति इस बात से पैदा होने लगी हैं कि आतंकवाद के धर्म को अब स्पष्ट तरीके से दिखाया जाने लगा है।

वहीं, नवीनतम आपत्ति का केंद्र ‘मणिकर्णिका’ फ़िल्म बन चुकी हैं। फ़िल्म समीक्षकों के अनुसार यह फ़िल्म चुनावों से पहले जानबूझकर लाई गई है और यह भारत देश की क्रान्ति की तस्वीर को गलत तरीके से पेश करती है। तो मियाँ, जब भारत जैसा कोई विचार उस वक़्त नहीं था तो फिर अंग्रेज़ों को यहाँ से भागने की बात पर 1857 की क्रांति कैसे हुई थी? या फिर आप अंग्रेज़ों को आज भी फ़िरंगी नहीं मानते हैं और आप अभी भी उस विचारधारा पर चल रहे हैं जिसके अनुसार भगत सिंह आज भी एक आतंकवादी माने जाते हैं।

वहीं जब मुस्लिम आक्रांताओं पर बॉलीवुड में फ़िल्म बनाई जाती है तो निर्देशक उन्हें बनाते वक़्त एक विशेष चरमसुख का ध्यान रखते आए हैं। लेकिन पद्मावत फ़िल्म में खिलज़ी को गंदगीयुक्त लिबास और खानपान के तरीकों में दरिद्रता दिखाई गई थी तो आप परेशान हो गए थे।

इसलिए वाम गिरोहों की देशभक्ति और हिंदुत्व से ‘एलर्जी’ समझना बहुत ज्यादा मुश्किल काम नहीं है। जिन गिरोहों की दुकान ही व्यवस्थाओं पर हमला कर के चल रही हों, सामाजिक ढाँचे को तोड़कर ही जिनका विस्तार हो रहा हो, आख़िर वो इस विचारधारा से पीछे कैसे हट जाएँ? साफ़ है कि यह गिरोह मात्र व्यक्तिगत विचारधार की लड़ाई ही लड़ रहे हैं, और इनका सुकून बस उसी एक विचारधारा के इर्द-गिर्द मँडराता रहेगा।

‘द प्रिंट’ का तो यहाँ तक मानना है की कँगना रानौत की यह फ़िल्म पितृसत्ता का मुकाबला नहीं करती है। शायद इसके मानकों के अनुसार लक्ष्मीबाई को फिल्मों में समलैंगिक सम्बन्धों और लेस्बियन संबंधों पर भी चर्चा बिठानी चाहिए थी। एक महिला जिसके शौर्य और पराक्रम की कविताएँ पढ़कर इस देश का हर एक व्यक्ति पूजता आया है, द प्रिंट को इतने वर्षों बाद लगता है कि वह पितृसत्ता से नहीं लड़ पाती है, ये कमाल की बात है।

इस पर एक असहिष्णु भारतीय नागरिक ने अपने फ़ेसबुक पोस्ट पर लिखा:

कंगना को मणिकर्णिका में सबसे पहले तो ब्रा खोल लेना चाहिए था, फिर उसे चूड़ियाँ तोड़कर फेंकनी थी, और सिंदूर, मंगलसूत्र गले से उतार कर फेंक देना था। फिर जिस बच्चे को पीठ पर लिए घूमती थी उसको फेंक देती कहीं क्योंकि शेखर गुप्ता के ‘दी प्रिंट’ के लिए शायद पेट्रियार्की ही किसी भी फ़ीमेल लीड के लिए ज़रूरी है, चाहे वह ऐतिहासिक घटनाओं की फ़िल्मी रूपांतरण ही क्यों न हो! आप जरा सोचिए कि एक महिला का पुरुषों की सेना, और कई राजाओं का नेतृत्व करना पेट्रियार्की के ऊपर की बात नहीं है तो आख़िर क्या है? इससे बड़ा क्या प्रूफ़ दिया जाए? जब फ़िल्म इतिहास की हो चुकी घटनाओं पर है तो उसमें पेट्रियार्की से लड़ने के लिए क्या लक्ष्मीबाई को लेडी श्री राम या मिरांडा हाउस में अंग्रेज़ी ऑनर्स करवा देते और ‘नो ब्रा डे’ मनाते हुए भारतीय नारियों की स्थिति सुधारने की बेकार कोशिश करते? 

ख़ैर दर्शक तो मणिकर्णिका देखने के बाद ऊँची आवाज में यही पूछेगा, “हाऊ इज़ दी जोश ब्रोज़?” क्योंकि ये भारत है, और भारत के लोग वामपंथी गिरोह का प्रोपेगंडा पढ़कर फ़िल्में देखने नहीं जाते।

पश्चिम बंगाल में अमित शाह की रैली के बाद बीजेपी समर्थकों पर हमला

पश्चिम बंगाल के पूर्व मिदनापुर में अमित शाह की रैली के पास कुछ गुंडों ने पास में खड़ी गाड़ियों के साथ तोड़फोड़ करते हुए जमकर हंगामा किया। बताया जा रहा है कि इस दौरान बीजेपी समर्थकों पर भी हमला किया गया।

मामले पर बीजेपी के राहुल सिन्हा ने कहा, “टीएमसी हमारी ताकत से डरती है इसलिए उन्होंने हिंसा की है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि पुलिस के सामने सब कुछ हुआ, हमलावरों ने महिला कार्यकर्ताओं को भी नहीं छोड़ा।” उन्होंने हमले के पीछे तृणमूल कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया है।

‘बीजेपी के कर्यकर्ताओं पर हमला पड़ेगा महँगा’

रैली में हमले की वारदात पर बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कहा, “हम ममता जी को चेतावनी देना चाहते हैं कि इस प्रकार से बीजेपी कार्यकर्ता डरने वाला नहीं है। ये ममता जी को बहुत मँहगा पड़ेगा।” बता दें कि, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने यहाँ रैली को संबोधित करते हुए जनता से पूछा कि बंगाल को क्या हुआ है? ‘शोनार बांग्ला’ कहाँ गया? सब बंगाल की तरफ देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के लिए ये चुनाव बंगाल को ‘शोनार बांग्ला’ बनाने के लिए हैं।